वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 381–390

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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वेदार्थपारिजातः १२८१ मन्त्रार्थस्तु - देवा दीप्यमानाः प्राणा रूपं शोभनं ब्राह्म ब्रह्मणोऽपत्यमादित्य जनयन्तः उत्पादयन्त अग्रे प्रथम तद्वचोऽब्रुवन् । 'ब्राह्मोऽजाती' ( पा ० सू० ६।४।१७१ ) इति निपातनात् । हे आदित्य, यो ब्राह्मणस्त्वामेवमुक्तविधिनोत्पन्नं ॥ विद्याज्जानीयात्तस्य देवाः सर्वे इन्द्रादय इन्द्रियाणि च असन् वशे वश्या भवन्ति । आदित्योपासको देवानामपि वश्यता- मापादयतीत्यर्थः । 'श्रीश्व ते लक्ष्मीश्च पल्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुम्म इषाण सर्वलोक म इषाण ॥' (वा० स० ३१।२२ ) 'हे परमेश्वर, ते तव श्रीः सर्वा शोभा लक्ष्मीः शुभलक्षणवती धनादिश्च द्वे प्रिये पत्म्यौ पत्नीवत्सेवमाने स्तः । तथाहोरात्रे द्वे तव पार्श्वे पार्श्ववत् स्तः । ये च कालचक्रस्य कारणभूतस्यापि कक्षात्रयवद् वर्तेते सूर्याचन्द्रमसौ नेत्रे वा तवैव नक्षत्राणि तवैव सामथ्यंस्यादिकारणस्यावयवाः सन्ति, तत्त्वयि रूपवदस्ति, अश्विनौ द्यावापृथिव्यो तवैव व्यात्त विकसित मुखमिव वर्तेते । तथैव यत्किञ्चित् सौन्दर्यगुणयुक्त वस्तु जगति वर्तते, तदपि तव रूपं तवैव सामर्थ्याज्जातमिति जानीमः । हे विराडधिकरणेश्वर, मे ममामु परलोक मोक्षाख्य पदं कृपाकटाक्षेण इष्णन् इच्छन् सन् स्वेच्छया निष्पादय । तथा सर्वलोक सर्वलोकसुख सर्वलोकराज्य वा मदर्थं कृपया त्वमिषाण सिद्धं कुरु । एवमेव सर्वाः शोभा लक्ष्मीश्च शुभलक्षणवतीः सर्वाः क्रियाः मे मदर्थमिषाण । हे भगवन् पूर्णपरमेश्वर सर्वशक्तिमन्, कृपया सर्वान् शुभान् गुणान् मह्यं देहि, दुष्टानशुभान् दोषाश्च विनाशय, सद्यः स्वानुग्रहेण सर्वोत्तमगुणभागिन मा भवान् करोत्विति 1। वत्र प्रमाणानि -' श्रीहि पशव:' ( श० १ | ८| १ | ३६ ), ' श्रीर्वे सोमा ' ( श० ४ | १ | ३ | ९ ), 'श्रीर्वे राष्ट्रम् ( श०- १३।२।९ ।२ ), ' श्रीर्वे राष्ट्रस्य भार:' ( श० १३ ।२।९ ।३ ), 'लक्ष्मीर्लाभाद्वा लक्षणाद्वा लाञ्छनाद्वा लषतेर्वा स्यात् प्रेप्साकर्मणो लज्जतेर्वा स्यात् श्लाघाकर्मणः शिप्रे इत्युपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः' ( नि ० ४।१० ) । अत्र श्रीलक्ष्म्योः पूर्वोक्तयोरर्थसङ्गतिरस्तीति बोध्यम्' ( पृ० १४८ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । वस्तुतः मन्त्र का अर्थ यह होगा - देव अर्थात् देदीप्यमान प्राण ने उस सुन्दर स्वरूप वाले ब्रह्म के पुत्र आदित्य को पैदा करते हुए यह बात पहले पहल कही । 'ब्राह्मोऽजातो' इस पाणिनि सूत्र से ब्राह्म पद निपात द्वारा सिद्ध हैं । हे आदित्य, जो ब्राह्मण तुम्हारी इस प्रकार से हुई उत्पत्ति के रहस्य को जान लेता है, इन्द्र प्रभृति सभी देवगण एवं इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती है । इसका अभिप्राय यह हुआ कि आदित्य का उपासक देवताओ को भी अपने वश में कर लेता है । '(श्री ते ० ) हे परमेश्वर, जो आपकी अनन्त शोभा रूप श्री और अनन्त शुभलक्षण युक्त लक्ष्मी है, वे दोनों स्त्री के समान हैं । अर्थात् जैसे स्त्री पति की सेवा करती है, इसी प्रकार आपकी सेवा आप को ही प्राप्त होती है, क्योकि आपने ही सब जगत् को शोभा और शुभ लक्षणों से युक्त रक्खा है । परन्तु ये सब शोभा और सत्यभाषण आदि धर्म के लक्षणो से लाभ आपकी सेवा के लिये ही हैं । सब पदार्थ ईश्वर के आधीन होने से उसके विषय में यह पत्नी शब्द रूपकालंकार से वर्णित है । वैसे ही दिन और रात्रि ये दोनों आप की बगल के समान है तथा सूर्य और चन्द्रमा भी दोनो आपके बगल के समान अथवा नेत्रस्थानीय है । जितने नक्षत्र हैं, वे सब आपके रूपस्थानीय हैं । द्यौः अर्थात् सूर्य आदि का प्रकाश और विद्युत् अर्थात, बिजुली ये दोनों मुखस्थानीय है । ओठ के तुल्य और जैसा खुला मुख होता है, उसी प्रकार पृथिवी और सूर्य लोक के बीच में जो लोक है, सो मुख के सदृश है | ( इष्णन्० ) हे परमेश्वर, आप की दया से ( अमुम् ) परलोक जो मोक्ष सुख है, उसको हमलोग प्राप्त होते हैं । इस प्रकार की कृपा दृष्टि से हमारे लिये इच्छा करो । तथा मैं सब संसार से सब गुणों से युक्त होकर सब लोकों के सुखों का अधिकारी जैसे होऊँ, वैसी कृपा और इस जगत् में मुझको सर्वोत्तम शोभा और लक्ष्मी से युक्त सदा कीजिये । यह आपसे हमारी प्रार्थना है, सो आप कृपा कर पूरी कीजिये । श्री और लक्ष्मी शब्दो के ऊपर किये गये अर्थों के विषय में यहां शतपथब्राह्मण और निरुक्त के वचनों के प्रमाण दिये गये है । इनसे हम दोनों शब्दों के उक्त अर्थ संगत सिद्ध होते हैं' ( पृ० १४८-१४९ ) । १६१

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वार्थपारिजातः १२८२ तत्रोच्यते - अत्रेववदादिप्रयोगाभावात् प्रसिद्धपरित्यागाप्रसिद्धकल्पनयोरसामञ्जस्याच्च श्रीलक्ष्मीपत्नी- पदाना गौणार्थताश्रयण न युक्तम् । सौन्दर्यादिगुणयुक्त वस्तु तदपि रूप तवैव सामर्थ्याज्जातमित्यप्युदक्षरमेव । वस्तुतस्तु मन्त्रस्यायमर्थः -हे आदित्य आदित्यान्तःपुरुष परमेश्वर विष्णो, ' ध्येयः सदा सवितृमण्डन- मध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥' इति वर्णित । श्रीः लक्ष्मीश्च ते तव पत्न्यौ भार्ये तद्वश्ये यया जनः सर्वजनाश्रयणीयो भवति सा श्रोः, श्रीयतेऽनया श्रीः सम्पदित्यर्थः । यया लक्ष्यते दृश्यते जनैः सा लक्ष्मीः सौन्दर्यमित्यर्थः । अत्र तत्तदधिष्ठात्र्यो देव्यौ विष्णोः पत्न्यौ प्रसिद्धे स्तः । यद्वा सर्वनैरपेक्ष्येण श्रयते हरि या सा श्रोः क्षीरसमुद्रमन्थादाविर्भूता भगवती श्रीः, सर्वानभिलाषिणोऽपि देवान् दैत्यानृषीश्चोपेक्ष्य निरपेक्षमपि हरिमेव वत्रे, तेन साश्रयणाच्छ्रीरुच्यते, तदाश्रयणादेव श्रीयते सर्वैर्गुणैः सौन्दर्य माधुर्या - दिभिर्या सा श्रीः । यद्वा श्रीयते श्रीहरिणापि या सा श्रीः । 'ये यथा मा प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' इति श्रीमद्- भगवद्गीतावचनात् । लक्ष्यते दृश्यते सर्वैर्या सा लक्ष्मीः शोभा, अथवा लष्यतेऽभिलष्यते सर्वेर्या सा लक्ष्मी । यद्वा लष्यते हरिणापि या सा लक्ष्मीः । श्रीलक्ष्मीश्च ते तव पत्न्यौ भार्ये निराकारस्य भगवतो द्वे भार्ये भार्यावद्वश्ये | अहोरात्र तवादित्यरूपस्य पार्श्वे पार्श्वस्थानीये । नक्षत्राणि गगनस्थास्तारास्तव रूपम्, तवैव तेजसा भासमानत्वात् । 'तेजसो गोलकः सूर्यो नक्षत्राण्यम्बुगोलका:' इति ज्योतिषशास्त्राच्च । अश्विनौ द्यावापृथिव्यौ तव व्यात्तं ( विकसितं ) मुख विकसितमुखस्थानीयम् । अश्नुवाते व्याप्नुतस्तावश्विनौ, ' इमे हीदं सर्वमश्नुवाताम्' इति श्रुतेः । एवं कर्मफलमिष्णन् इच्छन् सन् महामहिमवैभव भगवन्तं त्वामह याचे, इषाण इच्छ, किमेषणीयं तत्राह -अमु परलोके मे मम समीचीनो- यह हुई दयानन्द की इस मन्त्र की व्याख्या । इस पर हमारा यह कहना है II इस मन्त्र मे ' इव' 'वत ' जैसे शब्द प्रयुक्त नही है. अतः उनके अभाव मे भी प्रसिद्ध अर्थ का परित्याग और अप्रसिद्ध अर्थ की कल्पना करने में कोई तुक नही है और न लक्ष्मी, पत्नी प्रभृति शब्दो को गौणार्थक ही माना जा सकता है । जो कुछ सौन्दर्य प्रभृति गुणो से युक्त वस्तुएँ है, वह सब तुम्हारे ही सामर्थ्य से उत्पन्न हुई है, इस तरह का अर्थ भी मन्त्रो के अक्षरो से प्राप्त नही होता । वास्तव में मन्त्र का अर्थ यह होगा—हे आदित्य, आदित्यमण्डल के भीतर निवास करने वाले पुरुष, विष्णु भगवान्, आपका स्वरूप इस तरह से वर्णित है -- 'सूर्य मण्डल के मध्य निवास करने वाले नारायण का ध्यान इस रूप में करना चाहिये कि ये कमल के आसन पर विराजमान हैं, केयूर, मकरसदृश कुण्डल, किरीट और हार पहने हुए है, सुवर्ण के समान देदीप्यमान शरीरवाले है और शख- चक्र धारण किये हुए हैं' । श्री और लक्ष्मी नाम की आपकी दो पत्नियाँ है, जो कि सदा आपकी आज्ञा के पालन में लगी रहती है । जिसके रहने से मनुष्य सबका सहारा हो जाता है, उसको श्री कहते है । इसका अर्थ है सम्पत्ति । जिसके रहने से मनुष्य लोगो के लिये दर्शनीय हो जाता है, उसको लक्ष्मी कहते हैं । लक्ष्मी का अर्थ है सोन्दर्य । सम्पत्ति और सौन्दर्य की ये दोनो अधिष्ठात्री देवियाँ विष्णु की पत्नी के रूप में प्रसिद्ध है । अथवा सब की उपेक्षा करके जो केवल विष्णु को अंगीकार करती है, वह क्षीरसमुद्र के मथने से उत्पन्न हुई देवी श्री कहलाती है । सभी चाहने वाले देवो, दैत्यो और ऋषियों की उपेक्षा करके जिसने केवल हरि का ही वरण किया, हरि का इस तरह से आश्रयण करने से ही यह श्री कही जाती है । उस भगवान् विष्णु का सहारा लेने से ही यह भी सौन्दर्य, माधुर्य प्रभृति सभी गुणो का आश्रय बनती है । अथवा जिसका विष्णु भी सहारा लेते है, उसको श्री कहते है । गीता मे बताया गया है कि 'जो मुझे जिस रूप में प्राप्त करना चाहते हैं, उनको मैं उसी रूप में प्राप्त होता हूँ' । जो सबके द्वारा देखी जाती है, उस शोभा को लक्ष्मी कहते है, अथवा जिसको सब लोग चाहते है, उसको लक्ष्मी कहा जाता है । इसका यह भो अर्थ हो सकता है कि जिसको विष्णु भी देखना चाहते है, उसको लक्ष्मी कहते है । श्री और लक्ष्मी ये दो आपकी पत्नियाँ है । भगवान् यद्यपि निराकार है, तथापि ये दोनो भार्या के समान उसके वश में रहने वाले स्वभाव है । दिन और रात आदित्य स्वरूप भगवान् के दोनो पार्श्व ( बगल ) के समान है । आकाश में दिखाई पड़ने वाले तारागण आपके ही स्वरूप है, क्योकि ये आपके प्रकाश से ही प्रकाशित हैं । ज्योतिष शास्त्र में यह बताया गया है कि ' सूर्य तेज का गोलक और नक्षत्र आकाश के गोलक है' । अश्विनी अर्थात् द्यावापृथिवी आपके विकसित मुख का स्थान ग्रहण करते है । 'अश्विनी' पद की व्युत्पत्ति यह है कि यह सबको व्याप्त कर लेते हैं । स्वयं श्रुति इस व्युत्पत्ति का प्रतिपादन करती

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वैवार्थ पारिजात' १२८३ ऽस्त्विच्छ । ननु त्वयैवेष्यता कि मदीयेच्छयेति चेन्न 1 तव परमेश्वरस्यामोघेच्छत्वात् । मम तु जीवत्वान्मोघेच्छत्वमपि सम्भवति, अतो याचे, अस्य परलोक: समीचीनोऽस्त्विति त्वमेवेच्छ । सवं मे मम इषाण सर्वलोकात्मकोऽह भवेय- मितोच्छ । मुक्तो भवेयमित्यभिप्राय, 'सर्वं खल्विद ब्रह्म' इति श्रुते । 'कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यांत' (भ ० गी० ९९ ॥३१३१ ) इत्यत्र भगवानर्जुन भक्त प्रेरयति । हे कौन्तेय, त्वमेतत्प्रतिजानीहि मम वासुदेवस्य भक्तो न प्रणश्यतीत्येता प्रतिज्ञा कुरु । ननु त्वयैव सर्वशक्तिमता प्रतिज्ञायतामिति चेन्न तव भक्तस्यामोघप्रतिज्ञत्वात् त्व प्रतिज्ञा कुरु । मम तु प्रतिज्ञा भीष्मस्य भक्तस्य समक्षे भज्यते, तेन त्वमेव प्रतिजानीहि येन न कदाचिदाप्यनाश्वासाशङ्का स्यात् । यथा भक्तप्रतिज्ञाऽमोघा भवति, तथैव भगवत इच्छा सर्वथाऽमोघा भवति । ' श्रीहिं पशवः' ( श ० १| ८| १ | ३६ ), ' श्रीर्वे सोमः' ( श० ४ १ १ ३१ ९ ), 'श्रीर्वे राष्ट्रम्' ( वा० १३ | २ | ९ | २ ), 'श्रीर्वे राष्ट्रस्य भार:' ( श० १३ | २ | ९ | ३ ) इत्यादिवचनैः पश्वादीनां श्रीत्वम्, श्रीहेतुत्वादौपचारिकमेव श्रीत्वम् । लाभाल्लाभहेतुत्वात् लक्षणत्वात् सौलक्षण्यहेतुत्वाल्लक्ष्म्या लक्ष्मीशब्दप्रयोगः । उपासिताया लक्ष्म्या अनुग्रहादेव लाभादिसम्भवात, तस्या लक्ष्म्या एव विभूतिरूपस्य सुवर्णरत्नादिवैभवस्य लप्स्यमानत्वात्तत्र लक्ष्मीशब्द | विष्णोर्वाम- वक्षमि वामावतंसुवर्णवर्णं रोमराजिरूपलाञ्छनरूपत्वादपि लक्ष्म्या लक्ष्मीत्वम् । 'हारहास उरसि स्थिरविद्युत' इति श्रीमद्भागवतवचनात् । सुरासुरादिभिः सर्वैर्लष्यत्वादभिलषणीयत्वादपि लक्ष्मीत्वम् । लषति भगवन्त कामयत इति वा लक्ष्मीः | 'ब्रह्मादयो बहुतिथ यदपाङ्गमोक्षकामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्नाः । सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादपङ्कजमल भजतेऽनुरक्ता ॥' इति श्रीमद्भागवतवचनात् । लक्ष्मीर्लाभाद्वा, लक्ष्मीवन्त एव लभन्ते नेतरे । आलक्ष- है । कर्मफल की इच्छा रखता हुआ महामहिमाशाली आपसे मैं याचना करती हूँ कि आप ही हमारे लिये इच्छा कीजिये । क्या इच्छा की जाय? यह कि वह परलोक मेरा सुधर जाय । अरे भाई, यह तो तुम्हारे चाहने से ही हो जायगा, इसमे मेरी क्या आवश्यकता है? आपकी इसलिये आवश्यकता है कि आपकी इच्छा कभी व्यर्थ नही होती । मैं तो जीव हूँ, मेरी इच्छा तो कभी व्यर्थ भी हो सकती है । इसलिये मैं याचना करता हूँ कि वह परलोक मेरा सुधर जाय, इसलिये आप कामना कीजिये । मुझे सब कुछ प्राप्त हो जाए, ऐसी आप इच्छा कीजिये, जिससे कि मैं इस संसार मे मुक्त हो सकूँ । श्रुति मे बताया गया है कि ' यह सब कुछ ब्रह्म है' | 'कौन्तेय०' इत्यादि गीता वचन में भगवान् ने अपने भक्त अर्जुन को प्रेरित किया है कि ' हे कौन्तेय, तुम इस बात को प्रतिज्ञापूर्वक जान लो कि मुझ वासुदेव का भक्त कभी नष्ट नही होता' । प्रश्न होता है कि प्रस्तुत मन्त्र मे भक्त भगवान् से इच्छा करने की प्रार्थना करता है, इसके विपरीत गीता के इस वचन में भगवान् ही भक्त से प्रतिज्ञा करने के लिये क्यों कह रहे है? इसका उत्तर यह है कि भक्त की प्रतिज्ञा अमोघ होती है, अतः भगवान् भक्त से ही प्रतिज्ञा करने के लिये कहते हैं । भगवान् की प्रतिज्ञा तो अपने भक्त भीष्म के आगे टूट जाती है । इसलिये भगवान् कहते है कि भक्त ही प्रतिज्ञा करे, जिससे कि उसके टूटने की कोई आशंका न रह जाय । जिस तरह से भक्त की प्रतिज्ञा अमोघ होती है, उसी तरह से भगवान् की इच्छा भी कभी व्यर्थ नही होती । 'श्रीहिं पशव:' इत्यादि श्रुतिवचनों में पशु प्रभृति मे श्रोत्व का आरोप औपचारिक (लाक्षणिक है ), क्योकि पशु प्रभृति श्री के कारण हैं । लाभ का कारण होने से अथवा अच्छे लक्षणो का कारण होने से लक्ष्मी के लिये यह शब्द प्रयुक्त हुआ है । लक्ष्मी की उपासना करने पर उसकी प्रसन्नता प्राप्त होने से ही मनुष्य को व्यापार आदि में लाभ होता है, अर्थात् उस लक्ष्मी के विभूतिस्वरूप सुवर्ण, रत्न आदि वैभव की प्राप्ति होती है । इस कारण से भी इसको लक्ष्मी कहा जाता है । विष्णु के वाम वक्ष मे वामावर्त सुवर्ण के वर्ण वाली रोमराजि रूप लाञ्छन के रूप में अवस्थित रहने से भी इसको लक्ष्मी कहते है । भागवत में इसका इसी रूप में वर्णन है । सुर ओर असुर सभी इसको चाहते हैं, इस लिये भी यह लक्ष्मी कहलाती है । अथवा इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि यह भगवान् को चाहती है । इसमें भी भागवत का यह वचन प्रमाण है -'ब्रह्म प्रभृति देवगण जिसके कृपाकटाक्ष की कामना करके लम्बे समय तक तपस्या करने के बाद उसको प्राप्त करते है, उन्ही भगवान् के चरणकमलो में यह लक्ष्मी अपने निवास स्थान कमलवन को छोड़कर सदा अनुरक्त रहती है' । लभ धातु से लक्ष्मी शब्द बनता है, क्योंकि लक्ष्मीवान् ही सब तरह से लाभान्वित होते हैं । अथवा जो व्यक्ति सब

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१०८४ वार्थपरिजातः णावा, आलक्षित एवं हि लक्ष्मीवान् । लाञ्छनाद्वा, तथा लाञ्छित इव भवति । प्रेप्साकर्मणो लपतेर्वा, सर्व एव हि II तामभिलषति | लग्यतेर्वाश्लेषकर्मणः आश्लिष्येव हि भवति सा पुरुषम् । लज्जतेर्वा स्यात् श्लाघाकर्मणा, ये हि लक्ष्मी- वन्तो भवन्ति ते स्वयमात्मान श्लाघन्ते । अत्र सर्वानुगता लक्ष्मीर्विविधैश्वर्याधिष्ठात्रो महाशक्तिरेव लक्ष्मीर्भवति । अत एव क्वचिद्धतवान्या दियोगाल्लक्ष्मवत्त्वमुच्यते । वाचि विराजमाना लक्ष्मोरन्यादृश्येव । फलदानोन्मुखे शुभकर्मो- - - - - पासनादौ सौभाग्यापरपर्यायेऽपि लक्ष्मीवत्वप्रतिपतिर्भवति । सौभाग्य सोशल्य सौकुमार्य सौन्दयं सौस्वर्य सौरस्य- सौगन्ध्यादिभिर्लाञ्छनैरपि लक्ष्मीवत्त्व प्राप्यने । सव महाशक्तिरिच्छाज्ञानक्रियाशक्तित्रयरूपा भवति । संव वाङ्मयबीज- प्रणवरूपेण प्रकृतिरूपेण च व्यज्यते । सेव सोमामृतावयपदिव्यालङ्कारस्र मौक्तिकाद्याभरणालङ्कृता व्यज्यते । प्रणवरूपा शब्दब्रह्ममयी स्वाध्यायकाले प्रसीदति । द्वितोया भूतले हलाये समुत्पन्ना । सैव सर्ववेदमयी सर्वदेवमयी - सर्वलोकमयी सर्वकीर्तिमयी सर्वधर्ममयी सर्वाधारकार्यकारणमयी भवति । प्रकारान्तरेण संव श्री भू नीलात्मिका - - - - - भद्ररूपिणी प्रभावरूपिणो सोमात्मिका कल्पवृक्ष कामधेनु मणि शङ्ख-पद्मनिधिश्च भवति । पुष्प मूल फल-लता गुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवाना महत्स्तोमप्रदा अमृतेन तृप्ति जनयन्तो मनुष्याणामन्नेन पशूनां तृणेन तृप्तिमापूरयन्ती सैवाभयवरपद्मधरा किरीटाभरणयुक्ता सर्वदेवः परिवृता कल्पतरुमूले चतुभिर्गजं रत्नघट- रमृतजलैरभिषिच्यमाना ब्रह्मादिभिः सर्वदेवर्तर्वन्द्यमाना अणिमाद्यैश्वर्ययुक्ता सम्मुखे कामधेन्वा स्तूयमाना वेदशास्त्रादिभिः स्तूयमाना जयाद्यमरः स्त्रीभिः परिचर्यमाणा आदित्यसोमाभ्या दीपाभ्यां प्रकाश्यमाना तुम्बुरुनारदादिभिर्गीयमाना राकासिनीवालीभिच्छत्रेण ह्लादिनीमायाभ्यां चामरेण स्वाहास्वधाभ्या व्यजनेन भृगुपुण्यादिभिरर्च्यमाना मणिरत्न- तरह के गुणो से सम्पन्न होता है, उसको लक्ष्मीवान् कहते है । लाञ्छन के आधार पर भी लक्ष्मी शब्द बन सकता है, क्योकि लक्ष्मी से लाञ्छित व्यक्ति सब जगह आदर पाता है । उत्कृष्ट प्राप्ति के अर्थ वाले लब् धातु से भी यह बन सकता है, क्योकि सभी व्यक्ति उसकी प्राप्ति के लिये उत्कृष्ट अभिलाषा रखते है । अथवा श्लेषार्थक लग् धातु से लक्ष्मी शब्द बन सकता है, क्योकि वह पुरुष से मलिष्ट सी रहती है । अथवा श्लाघार्थिक लज्जति धातु से लक्ष्मी शब्द बन सकता है, क्योकि लक्ष्मीवान् मनुष्य स्वयं अपने मुँह से डोक हाकते रहते है । प्रस्तुत मन्त्र में इन सब लक्षणो में निवास करनेवाली, विविध ऐश्वर्यों की स्वामिनी, महाशक्ति ही लक्ष्मी कही गई है । इसीलिये कही- कही धन- धान्य आदि की बहुलता में भी लक्ष्मीवान् शब्द का प्रयोग देखा जाता है । वाणी में रहने वाली लक्ष्मी इससे भिन्न ही प्रकार की होती है । फल दान के लिये उम्मुख शुभ कर्म, उपासना प्रभृति में भी, जिसको कि सौभाग्य के नाम से जाना जाता है, इस शब्द का प्रयोग होता है । सोभाग्य, सौशील्य, सौकुमार्य, सौन्दर्य, सौस्वयं, सोरस्य, सौगन्ध्य प्रभृति गुणो से भी व्यक्ति लक्ष्मीवान् कहलाता है । यही महाशक्ति इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति के रूप में शास्त्रों में वर्णित है । यही सारे वाड्मय के कारणभूत प्रणव ( ॐकार ) के रूप में और सारे जगत् की प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त होती है । यही लक्ष्मी सोम और अमृत के अंशभूत दिव्य अलङ्कार, माला, मुक्तामणि के आभरणों से अलकृत होकर रहती है । शब्दब्रह्मस्वरूपिणी प्रणवरूपा लक्ष्मी स्वाध्यायशील व्यक्तियो पर प्रसन्न होती है । दूसरी इस पृथ्वीतल पर हल के अग्रभाग से उत्पन्न होती है । यही सर्ववेदमयी, सर्वदेवमयी, सर्वलोकमयी, सर्वकीर्तिमयी, सर्वधर्ममयी और सबकी आधारभूत अर्थात् कार्यकारण स्वरूपिणी कहलाती है । प्रकारान्तर से यही लक्ष्मी श्री, भू, नीला देवियों के रूप में सबका कल्याण करने वाली, अपने प्रभाव से सोम, कल्पवृक्ष, कामधेनु, मणि, शंख और पद्मनिधि बन जाती है । पुष्प, मूल, फल, लता, गुल्म, औषध, भेषज सब उसी के रूप हैं, वही अमृतमयी है, देवताओ को महत्ता प्रदान करने वाली है, अमृत से उनको तृप्त करती रहती है । वह लक्ष्मी मनुष्यो को अन्त से, पशुओ कोतृणतृण से तृप्त करती रहती है । यह लक्ष्मी अपने हाथो में अभय और वरमुद्रा तथा पद्मो को धारण करती है । किरीट धारण किये है । सभी देव इसको घेरे रहते है । कल्पतरु के पास चार हाथी रत्नजटित कलशो से, जिनमें कि अमृत भरा है, इनका अभिषेक करते है । ब्रह्मा प्रभृति सब देवगण इसकी स्तुति करते है । यह अणिमा प्रभूति आठ ऐश्वर्यों से संयुक्त है । इसके सामने कामधेनु और वेद खड़े हैं और इसकी स्तुति कर रहे है । जया प्रभृति अप्सराए इसकी सेवा में लगी है । आदित्य ( सूर्य ) और चन्द्रमा इन दो दीपकों से यह प्रकाशित है । तुम्बुरु, नारद प्रभुति इसके सामने गान कर रहे है । राका और सिनीवाली छत्र से, ह्लादिनी और माया मणि, रत्न, कामधेनु,, ( ),,से स्वाहा और स्वधा व्यजन पंखा से इसकी सेवा में निरत है भृगु प्रभृति ऋषि इसकी पूजा कर रहे है ऐसी चामर

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वेषार्थपारिजातः १२८५ घनकामधेनुकल्पवृक्ष फलमूलसस्यादिधनलक्ष्मी-वोरलक्ष्मी-साम्राज्यलक्ष्मी -स्वाराज्यलक्ष्मी -मोक्षलक्ष्मी - सौभाग्यलक्ष्मी - त्यादिरूपेण सीतोपनिषदि गोयते । निरुक्तोक्तानि सर्वाण्यपि निर्वचननिमित्तान्यत्रैवान्तर्भवति । ' यत्परममवम यच्च मध्यम प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम् । कियता स्कम्भः प्रविवेश तत्र यन्न प्राविशत् ' ( ), ' कियतद् बभूव ॥ अथर्ववेदसहिता १०१७।८ देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिवि श्रिताः ||', ( अथर्ववेदसहिता ११।९ ।२५) । यत्परम सर्वोत्कृष्टं प्रकृत्यादिकं जगत्, यच्च अवमं निकृष्ट तृण मृत्तिका क्षुद्रकृमिकीटादिकमस्ति यन्मनुष्यादिदेहाद्याकारापर्यन्तं तत् त्रिविधं सर्वं जगत् प्रजापतिरेव ससृजे स्वसामर्थ्यरूपकारणाद् उत्पादितवानस्ति । योऽस्य जगतो विविधं रूपं सृष्टवानस्ति । एतस्मिस्त्रि- विधे जगति स्कम्भः प्रजापतिः स परमेश्वरः कियता सम्बन्धेन प्रविवेश । न चैतत् परमेश्वरे ( यन्न ) यत्त्रिविधं जगन्न प्राविशत्, तत्कियद् बभूव तदिदं जगत् परमेश्वरापेक्षयाऽल्पमेवास्ति । देवा विद्वासः सूर्यादयो लोकाश्च, पितरो ज्ञानिनः, मनुष्या मननशीलाः, गन्धर्वा गानविद्याविदः, सूर्यादयो वा अप्सरस एतेषा स्त्रियश्च ये चापि जगति मनुष्यादि-जातिगणा वर्तन्ते ते सर्वे उच्छिष्टात् सर्वस्मादृध्वं शिष्टात् परमेश्वरात् सामर्थ्यात् जज्ञिरे जाताः सन्ति । ये दिवि देवा दिवि श्रिता दिवि देवाः सूर्यादयो लोका ये च दिवि श्रिताश्चन्द्रपृथिव्यादयो लोकास्तेऽपि सर्वे तस्मादेवोत्पन्नाः' (पृ० १४ ९ - १५० ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । इदमपि विश्वङ्खलमेव, प्रकृतिस्त्वन्मते नित्याऽनादिश्च । सा कथमुत्प- द्यते? प्रकृतिरपि चेत्प्रजायते तदा प्रकृतिजन्यस्य सर्वस्य प्रकृतेश्च ब्रह्मणः कार्यत्वेन ब्रह्मात्मक सेवायाति । तद- नम्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ( ब्र ० सू० २।१।१४ ) इति बादरायणसूत्रानुसारं सर्वस्यैव प्रपञ्चस्य ब्रह्मानम्यत्वेन ब्रह्मक- देशत्वमेव सिद्धयति । अधिष्ठानस्य सत्तास्फूर्तिरूपेण कार्ये प्रवेश: । निरावरणाधिष्ठानरूपे त्वप्रवेश एव, निरावरणे तस्मिस्तदनुपलब्धेः । न चैव त्वयाऽस्युपगम्यते । तस्माद्यत्परमुत्कृष्ट देवादिकं यच्चावमं निकृष्टं पश्वादिकं यच्च मध्यमं मनुष्यादिकं जभ्यते ( जगत्येव त्रैविध्योपलम्भात्) । प्रजापतिविश्वरूप सर्वरूपं जगत्ससृजे । तत्र स्कम्भः सर्वाश्रय- कल्पवृक्ष, फल, मूल, धान्य, धनलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, साम्राज्यलक्ष्मी, स्वाराज्यलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी, सौभाग्यलक्ष्मी आदि रूपो में यह लक्ष्मी ही सीतोपनिषद् में वर्णित है । निरुक्त में बताये गये सभी निर्वचन इसमे गतार्थ हो जाते है । '( यत्परम ० ) जो उत्तम, मध्यम और नीच स्वभाव से तीन प्रकार का जगत् है, उस सबको परमेश्वर ने ही रचा है । उसने इस जगत् में नाना प्रकार की रचना को है | एक वही इस सब रचना को यथावत् जानता है । इस जगत् में जो कोई विद्वान् होते हैं, वे भी कुछ-कुछ परमेश्वर की रचना के गुणो को जानते हैं । वह परमेश्वर सबको रचता है और आप रचना में कभी नही आता । (देवा:) विद्वान् अर्थात् पण्डित लोग और सूर्यलोक भी, ( पितरः ) अर्थात् यथार्थ विद्या को जानने वाले, ( मनुष्याः ) अर्थात् विचार करने वाले, ( गन्धर्वाः ) अर्थात् गानविद्या के जानने वाले, सूर्य आदि लोक और ( अप्सरसः) अर्थात् इन सबकी स्त्रियाँ, ये सब लोग और दूसरे लोग भी, ( उचिछ० ) उसी ईश्वर की सामर्थ्य से उत्पन्न हुए है । ( दिवि देवा: ) अर्थात् जो प्रकाश करने वाले और प्रकाश स्वरूप सूर्य आदि लोक और (दिवि श्रितः ) अर्थात् चन्द्रमा और पृथिवो आदि प्रकाश रहित लोक, वे भी उसी के सामर्थ्य से उत्पन्न हुए है' (पृ० १५० ) यह है इस मन्त्र की दयानन्द की व्याक्या । यह भी ऊटपटाग ही है । प्रकृति को जब आप नित्य और अनादि मानते है, तो उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है । प्रकृति भी जब उत्पन्न होती है, तब प्रकृति से उत्पन्न सारा संसार और स्वयं प्रकृति भी ब्रह्म का ही कार्य होने से यह सब ब्रह्मात्मक ही माना जायगा । 'तदनन्त्व० ' इत्यादि बादरायण सूत्र के अनुसार सारा प्रपंच ब्रह्म से अभिन्न है | अतः यह सब उस ब्रह्म का ही एक अंश माना जायगा । अधिष्ठान की सत्ता स्फूर्ति के रूप में इसके कार्य में प्रवेश को हो कहते हैं । अधिष्ठान को यदि निरावरण माना जाता है, तो उसका इस तरह से कार्य रूप में प्रवेश नहीं बन पावेगा, क्योंकि निरावरण ब्रह्म में इस तरह की स्थिति नही मानी जाती । इस तरह की स्थिति को आप स्वयं भी नहीं मानते । इसलिये जो उत्कृष्ट देव प्रभूति की, निकृष्ट पशु आदि को और मध्यम मनुष्य प्रभृति की, इस तरह की यह तीन प्रकार की सृष्टि जगत् में ही देखी जाती है, अतः प्रजापति इस सब प्रकार को सृष्टि का कर्ता माना जाता है । इसमें

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वेदार्थपारिजातः १२८६ भूतः परमात्मा कियताशेन तत्र विवेश कियताशेन न प्रविवेश? यत्र स न प्राविशत् तत् कियद् बभूव? तदुत्तर तु सामान्यरूपेणाधिष्ठान कार्ये प्रविशति । अपरोक्षयाथात्म्यज्ञानविषयीभूतेन तु न प्रविवेश, तस्य तद्बाधकत्वात् । यत्रा- घिष्ठानसामान्यस्य प्रवेशो न भवति तन्न कियच्चिद् भवति, अधिष्ठानसत्तातिरिक्तायाः कल्पितसत्ताया अनङ्गीकारात् । ' देवा. पितर ' इत्यस्य व्याख्यानमप्यपव्याख्यानमेव । देवा विद्वासः सूर्यादयो लोकाश्चेत्यस्याप्रामाणिकत्वात् । द्युलोकादय एव प्रसिद्धा न सूर्यादयो लोकाः । अत्र शरीरमादित्यलोके प्रसिद्धमिति प्रशस्तपादभाष्यविरोधोऽवधेयः । आदित्यलोके तद्भिन्नादित्यादिदेवतानां शरीरवतीना सिद्धेः । पितरो ज्ञानिन इत्यपि निर्मूलम्, प्रसिद्धदेवपित्रादोना- मपलापायोगात् । यदि गन्धर्वादयो गानविद्याविदो मनुष्या एव तदा मनुष्या इत्यनेनैव कार्यसिद्धी किमर्थं देवाः पितरो मनुष्या इत्यादिनिर्देशः । यदि तेषा स्त्रिय एवाप्सरसस्तदा मनुष्यादिग्रहणेनैव ता अपि गृहीता एवेति पृथक् तासां ग्रहणमनर्थकमेव स्यात् । किञ्चैव ब्राह्मणक्षत्रियादिपत्न्योऽप्यप्सरस इत्याख्यायेरन्, न चैव व्यवहारोऽस्ति न वा तादृशो व्यवहार इष्ट: । ' देवाः' इत्यनेनैव विद्वांसः सूर्यादयश्च गृहीता एव पुनर्दिवि देवा इत्यनेन किमुच्यते? सूर्यादयोऽपि दिवि श्रिता एव, पुनश्चन्द्रपृथिव्यादय कथ दिवि श्रिता इति न वक्तुं शक्यते । तस्मादस्य मन्त्रस्यायमर्थ -wwwww देवा अष्टौ वसवः, एकादश रुद्रा इत्येवं गणशो वर्तमानाः पितरः पितृलोकनिवासिनः पूर्वपुरुषा:, मनुष्या मनोः सकाशादुत्पन्ना मनुष्यत्वजातिमन्तः, 'मनोर्जातावत्र्यतोषुक् च' इति मनुशब्दाद् यत्प्रत्ययः षुगागमश्च । गन्धर्वा विश्वावसुप्रभृतयः, अप्सरस उर्वशीप्रभृतयः, ये चैते देवाद्या अनुक्रान्ताः सर्वे ते उच्छिष्टाद् ब्रह्मोदनो च्छेषणाद् उच्छिष्यमाणाद् ब्रह्मणः सकाशाद् जज्ञिरे उत्पन्नाः । तथा दिवि द्युलोके वर्तमाना ये चान्ये देवाः, तथा दिवि श्रिता दिवमाश्रित्य वर्तमाना ये देवजनाः, तेऽप्युच्छिष्टाद् जज्ञिरे उत्पन्ना इति सायणसम्मतं व्याख्यानमेव विजयते । सबका आश्रयभूत परमात्मा कितने अंश से प्रविष्ट हुआ और कितने अंश से नही? जहाँ वह नही प्रविष्ट हुआ, वह अश कितना था? इसके बाद तो अधिष्ठान सामान्य रूप से कार्य में प्रविष्ट होता है 2, अपरोक्ष यथार्थ ज्ञान का विषय होकर वह प्रविष्ट नही होता, क्योकि यह स्वरूप अधिष्ठानता का बाधक है । जहाँ अधिष्ठान सामान्य का प्रवेश नही होता, वह कुछ भी नही माना जाता, क्योकि अधिष्ठान की सत्ता के अतिरिक्त कल्पित सत्ता की कोई वास्तविक स्थिति नही मानी जाती । 'देवाः पितरः' इसकी व्याख्या भी गलत है, क्योकि देव पद का अर्थ विद्वान् और सूर्य प्रभृति लोक करना सर्वथा असगत । द्युलोक आदि की ही लोक के रूप मे प्रसिद्धि है, सूर्यलोक आदि की नही | आदित्य लोक मे भी सूर्य से भिन्न शरीरवारी देवताओं की स्थिति मानी जाती है, जो कि आपकी अभीष्ट नही है । पितृ शब्द का अर्थ ज्ञानी करना भा ठीक नही है, क्योकि प्रसिद्ध देवता, पितृगण आदि का अपलाप नही किया जा सकता । यदि गन्धर्व गानविद्या के जानकार मनुष्य ही हैं, तब मनुष्य पद से ही इनकी सिद्धि हो जाने से देवता, पितृगण, मनुष्य आदि का अलग-अलग निर्देश व्यर्थ हो जायगा । यदि इनकी स्त्रियों ही अप्सराएं है, तब मनुष्य आदि पदो से ही इनका भी ग्रहण हो जायगा, तब अलग से इनका ग्रहण करना व्यर्थ ही है । इस तरह से ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि की पत्नियाँ अप्सराए कहलावेंगी । ऐसा व्यवहार न तो देखा हो गया है और न किसी को अभीष्ट है । ' देवा:' इस पद से ही जब विद्वान् मनुष्यों का और सूर्यलोक प्रभृति का ग्रहण हो गया, तब फिर 'दिवि देवा:' इन शब्दो से किस अर्थ की अभिव्यक्ति होती है? सूर्य प्रभृति भी आकाश में अवस्थित है, तब चन्द्रमा, नक्षत्र, पृथ्वीं प्रभृति भी आकाश में ही अवस्थित क्यो न माने जाय । अतः इस मन्त्र का दयानन्दीय अर्थ न होकर वस्तुतः यह अर्थ होगा- आठ वसु देवता, एकादश रुद्र देवता, इसी तरह से गणों में रहने वाले देवता इस मन्त्र में स्थित प्रथम देव शब्द का अर्थ है । ये देवगण, पितृलोक में निवास करने वाले हमारे पूर्व पुरुष पितृगण, मनु से उत्पन्न हुए मानव जाति के प्राणीगण । मनु शब्द से यत्प्रत्यय और बुक् का आगम होने से मनुष्य शब्द बनता है । विश्वावसु प्रभूति गन्धर्वगण, उर्वशी प्रभृति अप्सरोगण, ये सब ब्रह्मरूपी ओदन के उच्छिष्ट के रूप में स्थित ब्रह्मा से उत्पन्न हुए है । इसी तरह से स्वर्गलोक में निवास करने वाले अन्य देवगण तथा स्वर्ग को अपने कर्म से अधिष्ठित करने वाले देवगण ये सभी उस उच्छिष्ट ब्रह्मा से ही उत्पन्न हुए है । यह सायणसंमत अर्थ ही सही होने क कारण सर्वमान्य हो सकता है ।

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वेदार्थ पारिजाता १२८७ वस्तुतस्तु या या विद्या उक्ता उच्यन्ते वक्ष्यन्ते वा सर्वास्ता अपूर्णा एव, तासां हेतु- फल-स्वरूपनिरूपणात्, सृष्टिवर्णनस्य कि प्रयोजनमित्यनुक्तेः । नहि सृष्टिप्रकरणे क्वापि सृष्टिज्ञानस्य किञ्चित् फलमुक्तम् । न च स्वाध्याया- ध्ययनविधिगृहीतस्य वेदराशेर्मात्रामात्रस्याप्यानर्थक्य वक्तु युक्तम् । तस्माद्यथा ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इति फलवद्वाक्यस्य सन्निधौ पठिताना ' इडो यजति', 'समिधो यजति' इत्येवमादीनां प्रयाजानामफलानां फलवदङ्गत्वेनैव फलवत्त्वम्, ' फलवत्सन्निधावफल तदङ्गम्' इति न्यायात्, तथैव 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' ( तै ० उ ० २।१ ) इति फलवत्या ब्रह्मविद्याया सन्निधौ पठितायाः, सृष्टेरफलाया ब्रह्मविद्याङ्गत्वेनैव फलवत्स्त्वम्, सृष्टेरद्वैतात्मब्रह्मबोधपर्यवसायित्वात् । यथा समुद्रादुत्पन्नानां तरङ्गफेनबुबुदादीनां समुद्रादनन्यत्वं तथैव ब्रह्मण उत्पन्नाना ब्रह्मानन्यत्वमित्यद्वैतात्मब्रह्म- साक्षात्कारे एव तस्या उपयोगः । पृथिव्यादिलोकभ्रमणविषयः यदपि 'वेदादिशास्त्रोक्तरीत्या पृथिव्यादयो लोकाः सर्वे भ्रमन्त्येव ' ( पृ ० १५१ ) इत्युक्तम्, यच्च तत्र प्रमाणरूपेण ' आय गौ.' (वा० स० ३।६ ) इति मन्त्र उद्धृतः, तत्तु सवं पाश्चात्यप्रभावमूलकमेव | ' आयं गौः पृश्निरक्रमीदासदन् मातर पुरः । पितरं च प्रयन्त्स्वः । ' ( वा ० स ० ३।६ ) 'अय गौः पृथिवीगोल: सूर्यश्चन्द्रोऽन्यो लोको वा पृश्निमन्तरिक्षमक्रमीदाक्रमणं कुर्वन् सन् गच्छति, तथान्येऽपि । तत्र पृथिवी मातर समुद्र+ जलमासदत् ममुद्रजल प्राप्ता सती तथा स्व. सूर्यं पितरमग्निमय च पुरः पूर्वं प्रयन् सन् सूर्यस्य परितो याति । एवमेव सूर्यो वायुं पितरमाकाशं मातरं च तथा चन्द्रोऽग्नि पितरमपो मातरच मातरं प्रति चेति योजनीयम्' इति दयानन्दीयं व्याख्यानमुच्छ्रङ्खलमेव । वास्तव में तो दयानन्द ने अब तक जिन विद्याओ का वर्णन किया है, यहाँ कर रहे हैं और आगे भी करेंगे, वे सब अपूर्ण हैं, क्योंकि उनके कारण का, उनके फल का और स्वरूप का वे ठीक से प्रतिपादन नही कर पाये है । प्रस्तुत स्थल में भी सृष्टि के वर्णन का क्या प्रयोजन है, यह उन्होने नही बताया । सृष्टि को जान लेने से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा, यह भी उन्होने कही नही कहा है । विधि- पूर्वक वेदाध्ययन करने से उसकी एक भी मात्रा का ज्ञान निरर्थक नही माना जाता । इसलिये जिस तरह से दर्शपूर्णमास का फल स्वर्ग की प्राप्ति होने से उसके अङ्ग के रूप में पढे गये प्रयाज आदि के प्रतिपादक वाक्य भी उसी से फलवान् मान लिये जाते हैं, उसी तरह से ' ब्रह्मवेत्ता अपने परब्रह्म स्वरूप को प्राप्त कर लेता है' इस फलवती ब्रह्मविद्या की सन्निधि में पठित सृष्टिविद्या का अपना कोई फल नहोते हुए भी ब्रह्मविद्या के सन्निधान के कारण ब्रह्मविद्या के फल से ही यह भी फलवती हो जाती है, क्योकि सृष्टिविद्या का पर्यवसान अन्ततः अद्वैत ब्रह्मतत्त्व के ज्ञान में ही होता है । जैसे समुद्र से उत्पन्न तरंग ( लहर ), फेन, बुद्बुद ( बुदबुदे ) प्रभृति समुद्र से भिन्न नही है, उसी तरह से ब्रह्म से उत्पन्न यह सारी सृष्टि ब्रह्म से भिन्न नही है । इस तरह से अद्वैत ब्रह्मात्मतत्व के साक्षात्कार में ही सृष्टिविद्या का उपयोग है । पृथिवी प्रभृति का भ्रमण स्वामी दयानन्द ने इस विषय मे कहा है कि-'वेदादि शास्त्रो के प्रमाण और युक्ति से भी पृथिवी और सूर्य आदि सब लोक घूमते है' ( पृ० १५२ ) । इसके प्रमाण में उन्होने 'आयं गौ' इस मन्त्र को उद्धृत किया है । यह सब पाश्चात्य प्रभाव के सिवाय और कुछ नहीं है । इस मन्त्र का अर्थ स्वामी दयानन्द ने इस तरह से किया है- 'गौ नाम हे पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमा आदि लोकों का । वे सब अपनी अपनी परिधि में, अन्तरिक्ष के मध्य में सदा घूमते रहते है । परन्तु जो जल है, वह पृथिवी को माता के समान है, क्योंकि पृथिवी जल के परमाणुओं के साथ अपने परमाणुओ के संयोग से ही उत्पन्न हुई है और मेवमण्डल के जल के बीच में गर्भ के समान सदा रहती है । सूर्य उसके पिता के समान है, इससे यह सूर्य के चारो ओर घूमती है । इसी प्रकार सूर्य का पिता वायु और आकाश माना गया है तथा चन्द्रमा का पिता अग्नि और माता जल है । उनके प्रति वे घूमते है । इस प्रकार से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में सदा घूमते हैं (पृ० १५२ ) । यह व्याख्या सर्वथा निराधार है ।

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१२८८ वेदार्थ पारिजाता स्वाच्छन्द्यायैवायं व्याख्याता पारम्पर्यं ब्राह्मणानि सूत्राणि याज्ञिकपद्धतीश्चोपेक्ष्य स्वैरचारिता प्रदर्शयति । गौरितिपदेन कथञ्चित् पृथिवी ग्रहीतुं शक्यते न पृथिवीलोकः । यथा व्रीहिपदेन व्रीहित्वजातिविशिष्टमन्न ग्रहीतु शक्यते, न तन्निमितास्तण्डुला वा ओदना वा । पृथिवीवाचको गोशब्दस्तु न पुल्लिङ्गः, किन्तु स्त्रीलिङ्गः, अत्र त्वयमिति पुल्लिङ्गनिर्देश एव तद्व्याख्यानमुपहन्ति । यत्तु 'गौः, ग्मा' इत्याद्येकविशतिपृथिवीनामसु गौरिति पठितं यास्ककृते निघण्टौ । स्वः पृश्निर्नाक इति षट्सु साधारणनामसु पृश्निरित्यन्तरिक्षस्य नामोक्त निरुक्ते' ( पृ० १५१ ) इति, तदपि तुच्छम्, अन्तरिक्षनामसु निरुक्ते पृश्निनामानुपलम्भात् । टिप्पणीकारदृष्ट्या निघण्टुपाठस्थ व्याख्याने २ १३ १४ स्वरादय आदित्यस्य दिवश्च साधारणनामानोत्युक्त यास्केन---- 'पृश्निरादित्यो भवति, प्राश्नुत एव वर्णा इति नैरुक्ताः' ( २।१४ ) 'प्रकर्षेण व्याप्नोत्येनमादित्यं वर्णः प्रोज्वल. ' इति नैरुक्ता मन्यन्ते '। 'संस्प्रष्टा यसान् अथास्य कर्म रसादानम्' ( ७।११ ), संस्पृष्टा भासं ज्योतिषां संस्पृष्टा भासेति वा । अथ द्यौः कस्मात् पृश्निरिति सापि संस्पृष्टा ज्योतिभिः पुण्यकृद्भिश्च । तथात्वेऽपि दिवशब्देनान्तरिक्षस्य ग्रहीतु- मशक्यत्वात् दिवः पार्थक्येनान्तरिक्षस्य प्रसिद्धत्वात् । अत एव निघण्टी स्वरादिभ्यः साधारणनामभ्यः प्रागन्तरिक्ष- नामानि पृथक् पठ्यन्ते ॥ 'गौरिति पृथिव्या नामधेयं यद् दूरं गता भवति, यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति' ( नि० २२५ ) (पृ० १५१ ) । अत्रापि गौरिति पृथिव्या नामधेयमुक्तम्, न पथिवीलोकस्य पृथिवीति नामधेयम् 1। विवरेण च दूरं गतेत्युक्तम्, न दूरं गत इत्युक्तम् । दूरं गतेत्यनेनापि न पृथिव्या गमनमुक्तम्, दूरमध्वानं प्रति दूरं गता भवति, नास्या अन्त उपलभ्यत इति तदभिप्राय इति दुर्गाचार्य: । 'सुष्ठु यातुं दातुमृतो गतो भवति' ( नि० २।१४ ) नह्यत्रापि वस्तुभूत गमनं विवक्षितम्, अपना मनमाना अर्थ करने के कारण ही यह व्याख्याकार परम्परा, ब्राह्मण ग्रन्थ, सूत्र ग्रन्थ और याज्ञिक पद्धति की सर्वथा उपेक्षा कर स्वतन्त्र अर्थ करने लगता है । गो पद से किसी तरह से पृथ्वी का ग्रहण किया जा सकता है, किन्तु पृथिवी लोक का नही । जैसे कि व्रीहि शब्द से व्रीहित्व जाति से विशिष्ट अन्न का ग्रहण हो सकता है, उससे बनने वाले तण्डुल अथवा भात का नही । पृथिवी अर्थ का वाचक गौ शब्द पुल्लिंग न होकर स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होता है । इस मन्त्र में 'गौ' शब्द का प्रयोग पुल्लिंग में हुआ है, क्योंकि उसका विशेषण 'अयं' पद पुल्लिंग है । इससे दयानन्द की उक्त व्याख्या गलत सिद्ध हो जाती है । यास्क कृत निघण्टु में 'गौ, ग्मा' प्रभृति पृथिवी के इक्कीस नामो में 'गो: ' शब्द भी पढा गया है और 'स्व. पृश्नि, नाक' प्रभूति छ: साधारण नामों में वहाँ 'पूश्नि नाम अन्तरिक्ष का दिया गया है' यह कथन भी निराधार है, क्योंकि अन्तरिक्ष के नामों में पृश्नि शब्द निरुक्त में कही भी उपलब्ध नही होता । टिप्पणीकार (पृ ० १५१ ) की दृष्टि से निघण्टु के पाठ की व्याख्या करते समय निरुक्तकार ने स्वः प्रभृति शब्दों को आदित्य और द्यो के समान नाम मावे हैं । जैसे कि-' पुश्नि आदित्य को कहते है, क्योंकि इस आदित्य का उज्ज्वल वर्ण सहारा लेते है, ऐसा निरुक्त संप्रदाय वालो का कहना है । अथवा यह सब प्रकार के रसों का या कर्मफलो का आदाता है, इसलिये भी आदित्य को पृश्नि कहा जाता है | यह आदित्य प्रकाश का वितरक है अथवा प्रकाश से संयुक्त है, इसलिये भी यह पृश्नि नाम से प्रसिद्ध है । द्यो को पृश्नि इसलिये कहते हैं कि वह भी ज्योति से अथवा पुण्य करने वाले पुरुषो से संसृष्ट रहती है' ( २११३-१४ ) । इस व्याख्या में भी द्यो से अन्तरिक्ष का ग्रहण नही हो सकता, क्योंकि अन्तरिक्ष द्यौ से सर्वथा पृथक् रूप से भी प्रसिद्ध है । इसीलिये निघण्टु में भी 'स्वः' प्रभृतिशब्द साधारण नामों से पहले ही अन्तरिक्ष के नाम पढ़े गये हैं । 'गो' यह पृथ्वी का नाम है, क्योकि यह बहुत दूर तक चली जाती है और इस पर सब प्राणी चलते-फिरते है' इस निरुक्त निर्वचन में भी पृथिवी को 'गो' बताया गया है, किन्तु पृथ्वीलोक को यहाँ 'गो' नही कहा गया है । विवरण में ' दूरं गता' यह स्त्रीलिंग में निर्देश है, लोक अर्थ होने पर 'दूरं गतः' ऐसा विवरण मिलता । ' दूरं गता' इस विवरण में भी पृथिवी का गमन दुर्गाचार्य ने इसका अभिप्राय यह बताया है कि यह पृथिवी सुदुर मार्ग पर बहुत दूर तक चली जाती है, अर्थात् मनुष्यविवक्षितचलते चलतेनहीं है । थक

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वेदार्थपारिजातः १२८६ यथा वा स्वतो भासेति वा सुष्ठु परिगतो भामेति वा सर्वतो ह्येष परिगतो दीप्त्या भवति । निरुक्तदृष्ट्या -गौरादित्यो भवति । 'गमगति रसान् गच्छत्यन्तरिक्षे ' ( नि० २1१४ ) इति सूर्यस्य गन्तृत्व विज्ञायते । तथैव द्यौरपि गौर्भवति यद्यस्मात्कारणात् पृथिव्यधिदूर गता यच्चास्या ज्योतीष गच्छन्ति । सूर्य रश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्व इत्यपि निगमो भवति । सोऽपि गोरुच्यते । स्वरादिव्यो भवति' ( पृ० १५२ ) ॥ यच्चात्रोक्तम्-' गच्छति प्रतिक्षणं भ्रमति या सा गौः पृथिवी । अद्वयः पृथिवीति तैत्तियोयोपनिपदि । यस्माज्जायते सोऽर्थस्तत्र मातापितृवद् भवति । तथा स्वः शब्देनादित्यस्य ग्रहणात् पितृविशेषणत्याद् आदित्योऽस्याः पितुवदिति निश्चीयते । यद् दूरं गता दूर दूर सूर्याद् गच्छतीति विज्ञेयम् । एवमेव सर्वे लोकाः स्वस्य स्वस्य कक्षायां वाय्वात्मनेश्वरसत्तया च धारिताः सन्तो भ्रमन्तीति सिद्धान्तो बोध्यः' ( पृ० १५२ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । तदप्यविचारित रमणीयम्, गच्छतीति व्युत्पत्त्या पृथिव्या गोनामानुवतेः, किन्तु दूरं गतेति व्युत्पत्तिरुक्ता ॥ यथा पृथिव्या सकाशाद्दिवो गमनेऽपि पृथिव्या दूरे वर्तमानत्वादधिदूरं गतेत्युच्यते, तथैवाध्वान प्रति दूरं दूर विद्यमानत्वाद् दूरं गतेत्युच्यत इत्युक्तमेव । सूर्यस्य गमन तु सम्मतमेव, अत एव तत्र गच्छत्यन्तरिक्ष इति व्युत्पत्तिरुक्ता । किश्व, मन्त्रे पृश्निरिति प्रथमान्त पदम् । दयानन्दीये भाष्ये तत्पद द्वितीयान्तत्वेन परिवर्तितम्, तदपि बलात्करणमेव । यदपि 'अद्भ्यः पृथिवी' इति श्रुत्यामा पृथिव्याः कारणत्वात् पृथिवी मातर समुद्रजलं असदत् प्राप्ता स्वः सूयं पितरमग्निमय च पुरः पूर्वं पूर्वं प्रयन् सन् सूर्यस्य परितः यातीति, तदपि निर्मूलम् । 'अद्द्भ्यः पृथिवी' इति रीत्या अपञ्चीकृतानामपां पृथिव्याः कारणत्वेऽपि न समुद्रजल कारणम्, तस्य पञ्चीकृतरूपत्वात् । पृथिव्यामेव समुद्रजल जाता है, किन्तु इसका अन्त नहीं पाता । ' सुन्दर वस्तुओ को लेने- देने के लिये इस पृथ्वी पर मनुष्य चलता रहता है' इस निरुक वाक्य में भी वास्तविक गमन क्रिया विवक्षित नही है । जैसे कि ' यह आदित्य प्रकाश अथवा दीप्ति से परिवेष्टित रहता है' इस निरुक्त वाक्य की दृष्टि से ' बादित्य भी गी कहलाता है, क्योकि यह मेघो को आप्यायित करता है अथवा अन्तरिक्ष में चलता है' इस तरह के निर्वाचन के आधार पर सूर्य की भी गतिशीलता कही गई है, उसी तरह से ' द्यो' को भी 'गो' इस लिये कहा गया है कि इसमे पृथिवी बहुत दूर तक चली जाती है और इसमें नक्षत्र, तारा प्रभृति ज्योतियां चलती है, सूर्य, चन्द्र की फिरणे आदि भी इसी में चलती है, इसलिये इस को भी 'गौ' कहते हैं । स्व. आदित्य को कहा जाता है, इस तरह से निरुक्त के वचनो को उद्धृत कर धागे दयानन्द ने कहा है - 'जो प्रतिक्षण घूमती रहती है, उसको 'गो' अर्थात् पृथिवी कहते हैं । तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि जल से पृथिवी पैदा होती है । जिससे जो वस्तु पैदा होती है, वह पैदा करने वाली वस्तु पैदा होने वाली वस्तु की माता- पिता के समान कही जाती है । इसी तरह से 'स्व:' शब्द से आदित्य का ग्रहण होने से सूर्य को भी इस पृथ्वी का पितृस्थानीय माना जाता है । ' दूर गता' का अभिप्राय यहाँ सूर्य से यह पृथ्वी बहुत दूर चली जाती है, मानना बाहिये । इसी प्रकार सूत्रात्मा जो वायु है, उसके आधार और आकर्षण से सब लोकों का धारण और भ्रमण होता है । परमेश्वर अपने सामर्थ्य से पृथिवी आदि सब लोकों का धारण, भ्रमण और पालन कर रहा है ' (पृ० १५२) दयानन्द की यह सारी व्याख्या भी अविचारित रमणीय है, क्योकि निरुक्त मे 'गच्छति ' (चलती है ) इस अर्थ में पृथिवी को 'गौ' नही कहा है, किन्तु ' दूरं गता ' इस अर्थ में 'गो' कहा गया है । जैसे कि जब पृथिवी से आकाश की तरफ जाया जाय तो इनमें बहुत दूरी होने से ऐसा कहा जाता है कि पृथिवी आकाश से बहुत दूर है, उसी तरह से मार्ग की दृष्टि से भी यह बहुत दूर तक चली गई है । इसलिए इसको बहुत दूर तक गई हुई कहा जाता है, ऐसा अभी-अभी बताया जा चुका है । सूर्य की गतिमत्ता तो मान्य ही है, इसीलिए उसके अन्तरिक्ष में चलने वाली व्युत्पत्ति निरुक्त में बताई गई है । मन्त्र में ' पूश्नि' पद प्रथमान्त है, किन्तु दयानन्द ने अपने भाष्य में उसको द्वितीया विभक्ति में बदल दिया है । यह जबरदस्ती ही है । इसी तरह से ' जल से पृथिवी की उत्पत्ति बताने वाली श्रुति के अनुसार पृथिवी अपने कारणभूत, अत एव मातृस्थानीय इसलिये वह सूर्य के चारों ओर घूमती है' (पृ० १५२) समुद्र के जल को प्राप्त करती है और अग्निमय सूर्य उसके पिता के समान है, यद्यपि पृथिवी का कारण है, किन्तु समुद्र का जल उसकायह कथन भी सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि उक्त श्रुति के अनुसार अपंचीकृत जल १६२

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
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बेदार्थ पारिजात १२९ ० भवतीति न पृथिवी जल प्राप्नोति तस्य तदाश्रितत्वेन नित्यप्राप्नत्वात् । सूर्यस्य पितृत्व किमूलकमिति तु नोक्तम् । किञ्च यदि पृथिव्या कारणत्वादपा तस्या मातृत्वमुक्तम्, तदा तथैव वायोस्तेजः कारणत्वात् सूर्यस्य वायुर्माते- त्युच्यताम् । अत्राकाशस्य मातृत्वं कथमुक्तम्, चन्द्रमसव कथमग्निः पिता कथ च जल तस्य माता सिद्धयति । यथा- कथञ्चित् तदभ्युपगमेऽपि कार्य कारणात्मक भवतीत्यभिन्नत्वात् कथ कारणं परित. कार्यस्य भ्रमण सिद्धयति । तस्मात् सर्वथा पाश्चात्त्याना दृष्ट्या मन्त्राणां बलात्तत्पुच्छग्राहकत्वेन तद्भ्रमणमाधनम् । किश्व, सूत्रानुसारेण मन्त्रोऽयमग्न्युपस्थाने विनियुक्त | 'आयं गोरिति चोपतिष्ठते सर्पराज्ञो भिर्दक्षिणा-ग्निमुपदधाति' ( का ० ४।९।१८-१९ ) इति इति वचनात् । तिसृणामृचा सार्पराजोति नामधेयम्, सर्परारया कवा दृष्टत्वात् । तथा चाग्निरेवात्र परापररूपेण स्तूयते । अय दृश्यमानोऽग्निः, आ अक्रमोत् सर्वत आहवनीय गार्हपत्य- दक्षिणाग्निस्थानेषु क्रमण पादविक्षेप कृतवान् । आक्रमीत् आक्रमते वा । कोदृशोऽग्निः? गौः गच्छतीति गौः, तत्तद्यज- मानगृहेषु गन्ता । तथा पृश्नि: चित्रवर्ण, लोहितशुक्लादिवहुविधज्वालोपेतः । आक्रमणमेव प्रपञ्चयति –पुरः प्राच्यां दिशि मातरं पृथिवीम्, आसदत् आसीदत्, आहवनोयरूपेण प्राप्तवान् तथा प्रयन् आदित्यरूपेण स्वर्गे सञ्चरन् पितरं द्युलोकमप्यासदत्, 'स्व. शब्देन सूर्यो ग्राह्य ' ( १।४।१ ) इति निरुक्तवाक्यात् । पृथिव्या मातृत्वं द्युलोकस्य पितृत्व तु ' द्यौः पिता पृथिवी माता' इति श्रुतौ प्रसिद्धम् । 'या गौर्वर्तनि पर्येति निष्कृत पयो दुहाना व्रतनोरवारतः । सा प्र ब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्- धविषा विवस्वते || ' (ऋ० स ० १०/६५| ६ ) | 'या पूर्वोक्ता गौर्वर्तनि स्वकाय मार्गम्, अवारतः निरन्तरं भ्रमती सती पर्येति विवस्वते, अर्थात् सूर्यस्य परितः सर्वतः स्वस्वमागं गच्छति । निष्कृतं कथभूत मार्गम्? तद्गमनार्थमीश्वरेण कारण नही हो सकता, क्योंकि वह तो पचीकृत प्रक्रिया के अन्तर्गत आ जाता है । इस पंचीकृत प्रक्रिया के अन्तर्गत तो पृथिवी में ही समुद्र का जल रहता है, अत पृथिवी जल को प्राप्त नही करती, क्योकि वह तो पृथिवी में ही रहता है, अतः सदा ही उसके पास ही है । सूर्य इसका पिता कैसे है? यह बात उक्त भाष्य में स्पष्ट नही की गई । अपि च, आपके मत के अनुसार जल यदि पृथिवी का कारण होने से उसकी माता है, तो उसी पद्धति से वायु के तेज का कारण होने से वायु को सूर्य की माता मानना चाहिये । तब यहाँ आकाश को उसकी माता कैसे कहा गया है? इसी तरह से अग्नि को चन्द्रमा का पिता और जल को माता कैसे कहा जा सकता है? कुछ देर के लिये ऐसा मान भी लिया जाय तो कार्य तो कारणात्मक होने से उससे अभिन्न हो माना जाता है 3, तब कारण के चारो ओर कार्य का भ्रमण कैसे सिद्ध होगा? इसलिये यह सारा प्रयत्न पाश्चात्यों की दृष्टि के अनुसार उनकी पूछ पकड कर चलने वाली उस बुद्धि का परिणाम है, जिससे कि मन्त्रो का जबरदस्ती इस तरह का अर्थ कर पृथिवी के भ्रमण की बात सिद्ध की जाती है । वस्तुतस्तु श्रौतसूत्रो की पद्धति से यह मन्त्र अग्नि के उपस्थान में विनियुक्त है । 'आयं गो' इत्यादि कात्यायन सूत्र का अभिप्राय यह है कि यहां के तीन ऋचाएं सार्पराज्ञी ' कहलाती है, इसलिये कि सर्पों की रानी कद्रू ने इन मन्त्रो को देखा था । पर और अपर रूप में यहाँ अग्नि की स्तुति की गई है । यह दिखाई पडने वाला अग्नि यहां सब जगह आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि के स्थानों में अपना पैर जमाता है, अथवा सब स्थानों पर आक्रमण करता है । यह अग्नि कैसा है? चलने वाला है, उन उन यजमानों के घरो मे चलता-फिरता रहता है । साथ ही यह चित्र वर्ण का है, इसकी लाल, सफेद आदि अनेक वर्णों की ज्वालाएं उठती रहती हैं । यह किस तरह से आक्रमण करता है? पहले यह प्राची ( पूर्व) दिशा में अपनी माता पृथिवी पर आहवनीय के रूप में अधिकार करता है, तथा बाद में आदित्य के रूप में स्वर्ग में संचरण करता हुआ अपने पिता द्युलोक पर भी अधिकार कर लेता है । निरुक्त के प्रमाण पर यहाँ 'स्त्र:' शब्द से सूर्य का ग्रहण किया जाता है । श्रुति मे पृथिबी को माता और द्युलोक को सबका पिता बताया गया है । ' या गोवर्तनि पर्येति० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ दयानन्द ने इस तरह से किया है -' (या गौर्व ० ) जिस जिस का नाम 'गो' कह आये हैं, सो सो लोक अपने अपने मार्ग में घूमता है और पृथिवी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमती है । अर्थात् परमेश्वर ने जिस जिस के घूमने के लिये जो जो मार्ग निष्कृत अर्थात् निश्चित किया है, उस उस मार्ग में सब लोक घूमते हैं । ( पयो दुहाना ० )