वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 371–380
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 371–380
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वेदार्थपारिजातः १२७१ संसारिणां योग्यकरणकलेवरप्रदानेन स्वानुभवयोग्यता सम्पादयति । अभिवदन् स्वप्राप्तिपर्यन्तामाशिष वदन् 'देवानां पूरयोध्या', 'तस्यां हिरण्मयः कोश: स्वर्गो लोको ज्योतिषाऽऽवृत ' इत्यादिश्रुति स्मृति प्रसिद्धेऽतिरमणीये नित्यज्ञानानन्दः मये निरतिशय सौगन्ध्य सौकुमार्यादिविशिष्टानन्तभोगपर्यङ्के श्रीभूनीलाभिः परिचरितचरणयुगलो विराजते तमहं वेद । धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्रदिशश्चतस्र । तमेव विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥ अर्थ: - धाता चतुर्मुख. पुरस्तात् सृष्टिकाले य परमपुरुषम् उदाजहार अस्तौषीत् । यद्वा- घाता पुरस्तात् पूर्वकाले यमुदाजहार ' तद्वैतद् ब्रह्मा प्रजापतयं उवाच, प्रजापतिर्मनवे, मनुः प्रजाभ्यः' इत्युक्तरीत्या उपादिशदित्यर्थ. । प्रविद्वान् भगवतो वामदेवादवाप्ततत्त्वज्ञानः प्रतर्दनाय ब्रह्मविद्योपदेष्टा च शक्रो यमुदाजहारेत्यनुषज्यते । प्रदिशश्चतस्रः प्रधानभूताश्चतस्रो दिशस्तदुपलक्षिता एकत द्वित- त्रित सनकादयश्च यमुदाहरन्तीति विपरिणतस्यानुषङ्गः । तमेवं विद्वानमृत इह भवति । नान्य. पन्था अयनाय विद्यते । इत्थं विस्तृतेन विवेचनेन स्वप्रकाशे परस्मिन् ब्रह्मण्येव पुरुषसूक्ततात्पर्यं स्फुटीभवति । 'अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्तताग्रे । तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्व- माजानमग्रे ॥ ' ( वा० स० ३१।१७ ) । तेन पुरुषेण पथिव्यै पृथिव्युत्पत्त्यर्थमद्द्भ्यो रसः सम्भृतः सगृह्य तेन पृथिवी रचिता । एवमग्निरसेनाग्नेराप उत्पादिताः । अग्निश्च वायोः सकाशाद् वायुराकाशादुत्पादितः । आकाशः प्रकृतेः, प्रकृतिः स्वसामर्थ्यात् । विश्वं सर्वं कर्म क्रियमाणमस्य विश्वकर्मा तस्य परमेश्वरस्य सामर्थ्य मध्ये कारणाख्येऽग्रे सृष्टेः प्राग् जगत् समवर्तत वर्तमानमासीत् । तदानी सर्वमिदं जगत् कारणभूतमेव नेदृशमिति तस्य सामर्थ्यस्यांशान् गृहीत्वा ( ), करण-कलेवर इन्द्रिय- शरीर आदि उन्हें प्रदान कर अपने अनुभव करने की योग्यता को सम्पादित कर देते हैं । वह भगवान् अपनी प्राप्ति होने तक का आशीर्वाद देने वाले भगवान्- ' देवानां पूरयोध्या', 'तस्यां हिरण्मयः कोश: स्वर्गो लोको ज्योतिषाऽऽवृतः ' इत्यादि श्रुति स्मृतियों के द्वारा प्रसिद्ध अत्यन्त रमणीय, नित्यानन्दमय, निरतिशय सोगन्ध्य, सौकुमार्य आदि विशिष्ट भोगसम्पन्न पर्यङ्क पर विराजते हैं, जिनकी चरण-परिचर्या श्री, भू, नीला आदि किया करती है, उस भगवान् को मैं जानता हूँ ॥ १६ ॥
॥१६॥
अर्थ- सृष्टि के समय चतुर्मुख ने जिस परम पुरुष की स्तुति की थी । अथवा पहले किसी समय चतुर्मुख धाता ने जिसे निम्नाकित रोति से उपदेश दिया था - तद्वैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच, प्रजापतिर्मनवे, मनुः प्रजाभ्यः' । भगवान् वामदेव से जिसने तत्त्वज्ञान प्राप्त किया और प्रतर्दन के लिये ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया, उस शक्र ने जिसे उपदेश दिया था, प्रधानभूत चारो दिशाएं और उससे उपलक्षित एकत, द्वित, त्रित नाम के ऋषि तथा सनकादिक जिसका उदाहरण देते है, इस प्रकार विपरिणाम करके अर्थ करना चाहिये । इस प्रकार के उस भगवान् को जानने वाला विद्वान् यहा अमृत हो जाता है । अयन के लिये अन्य मार्ग नही है । इस विस्तृत विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि स्वप्रकाश परब्रह्म में ही पुरुषसूक्त का तात्पर्य है । (अयः संभूतः० ) 'उस परमेश्वर पुरुष ने पृथिवी की उत्पत्ति के लिये जल के सारांश रस को ग्रहण करके पृथिवी और अग्नि के परमाणुओं को मिला कर पृथिवी रची है । इसी प्रकार अग्नि के परमाणु के साथ जल के परमाणुओ को मिलाकर जल की, वायु के परमाणुओं के साथ अग्नि के परमाणुओं को मिला के अग्नि को और वायु के परमाणुओं से वायु की रचना की है । वैसे ही अपने सामर्थ्य से बाकाश को भी रचा है, जो कि सब तत्वों के ठहरने का स्थान है । ईश्वर ने प्रकृति से लगाकर घास तक सारे जगत् को रचा है । इससे ये सब पदार्थ ईश्वर के रचे होने से उसका नाम विश्वकर्मा है । जब जगत् उत्पन्न नही हुआ था, तब वह ईश्वर के सामर्थ्य में कारण रूप से वर्तमान था । ( तस्य० ) जब जब ईश्वर अपने सामर्थ्य से इस कार्य रूप जगत् को रचता है, तब तब कार्य जगत् रूप गुण वाला होकर स्थूल बन के देखने में आता है । ( तन्मर्त्यस्य देवत्वमा० ) जब परमेश्वर ने मनुष्य शरीर आदि को रचा है, तब
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१२७२ वेदार्थपारिजात त्वष्टा रचनकर्तेय सकलं जगद् विदधद् आजानमग्रे वेदाज्ञापनसमये परमात्माज्ञप्तवान् वेदरूपामाज्ञां दत्तवान् मनुष्याय धर्मयुक्त नैव सकामेन कर्मणा कर्मदेवत्वयुक्त शरीरं घृत्वा विषयेन्द्रियसंयोगजन्यमिष्टं सुख भवतु तथा निष्का- मेन विज्ञानपरम मोक्षाख्यं चेति' ( पृ ० १४४ ) इति । दयानन्दीयं व्याख्यानम्, तत्रोच्यते - न पूर्वस्मिन् मन्त्रे पुरुषः प्रकृत इति तेन पुरुषेणेत्यस्य कथ परामर्श:? न चात्र पृथिवीरचनोक्ता, मूले सृजे रचेर्वाऽदर्शनात् । 'अद्भ्यः पृथिवी' ( तै ० उ० २।१ ) इति श्रुत्या तु अद्द्भ्यः पृथिव्या उत्पत्ति: श्रूयते, नाद्द्भ्य सम्भृताद्रसात्तदुत्पत्तिस्तत्र मानाभावात् । एवमग्नेराप इत्यग्नेरप उत्पत्ति. श्रुता, नाग्निरसात् । अग्न्याकाशादीनां नामाप्यत्र न श्रूयते । प्रकृतेराकाशस्योत्पत्ती 'तस्माद्वैतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' इति श्रुति- विरोधश्च । प्रकृतिवादिनः प्रकृतेरुपादानत्वमङ्गीकुर्वन्ति । तथैव प्रकृतेरपि परमेश्वरस्य सामर्थ्यादुत्पत्त्यङ्गीकारे सामर्थ्यस्य च परमेश्वररूपत्वाङ्गीकारे ब्रह्मोपादानकत्वेन प्रपञ्चस्य ब्रह्माभिन्नत्वापत्त्याऽद्वैत मतप्रवेशस्तवापसिद्धान्ता- पत्तिश्च । विश्वकर्मण परमेश्वरसामर्थ्यस्य मध्येऽन्ते वा जगद्वर्तत इत्यपि प्रमाणसापेक्षम् । सामर्थ्यमपि ब्राह्मणो मध्येऽन्ते वा वर्तत इत्यपि वक्तव्यम् । सामर्थ्यस्यैव कारणाख्या, परमेश्वरस्य सामर्थ्यस्यांशवत्त्वे सांशत्वेन घटादिवत् कुतो नानित्यत्वम? सामर्थ्यस्य कारणत्वे कोऽय त्वष्टा य' सामर्थ्याशान् गृहीत्वा सकल जगद्विदधाति? सामर्थ्यस्य सांशत्वे सामग्रयन्तरवदादीयमानत्वे ध्रुवं तस्यानित्यत्वं स्यात् । पुनश्चेद विश्व रूपवत्त्वमेति तदेव विश्वस्य च मर्त्यस्य च रूपवत्त्वमिति वाक्यात् किमुक्तमिति तु न स्पष्टम् । पुनःपदस्य च कथं सार्थक्यम्? पूर्व तु पुरुषेण प्रकृत्याकाशादिकं निर्मितमित्युक्तम्, तच्च सर्वं जगत् परमेश्वरमामर्थ्य मध्ये कारणभूतमासीदित्युक्तम् ॥ तस्य सामर्थ्यांशान् गृहीत्वा सकलं मनुष्य भी दिव्य कर्म करके देव कहाते है और जब ईश्वर की उपासना से विद्या, विज्ञान आदि अत्युत्तम गुणों को प्राप्त होते हैं, तब भी उन मनुष्यो का नाम देव होता है, क्योकि कर्म से उपासना और ज्ञान उत्तम है । इसमे ईश्वर की यह आज्ञा है कि जो मनुष्य उत्तम कर्म में शरीर आदि पदार्थों को चलाता है, वह संसार में उत्तम सुख पाता है, तथा जो परमेश्वर की ही प्राप्तिरूप मोक्ष की इच्छा करके उत्तम कर्म, उपासना और ज्ञान मे पुरुषार्थ करता है, वह उत्तम देव होता है' ( पृ० १४५) । 'अयः संभूत.' इत्यादि मन्त्र की यह दयानन्द की व्याख्या है । इस पर हम पूछते है कि इससे पहले के मन्त्र में पुरुष का कोई उल्लेख नही है, तब यहाँ पुरुष शब्द की अनुवृत्ति कहाँ से आवेगी? यहाँ पृथिवी की रचना का उल्लेख है भी नही, क्योकि मन्त्र में सृज् अथवा रच् धातु विद्यमान नही है । तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार जल से पृथिवी की उत्पत्ति बताई गई है, जल के सारांश को ग्रहण कर रस की उत्पत्ति मानने में कोई प्रमाण नही है । इसी तरह अग्नि से जल की उत्पत्ति श्रुति प्रतिपादित है, अग्नि के रस से नही । अग्नि, आकाश आदि का यहाँ नाम भी नही सुनाई पडता । प्रकृति से आकाश की उत्पत्ति मानने में आत्मा की उत्पत्ति बनाने वाली श्रुति से स्पष्ट विरोध पडता है । प्रकृतिवादी दार्शनिक प्रकृति को उपादानकारण मानते से आकाश प्रकृत स्थल में भी परमेश्वर की सामर्थ्य से सबकी उत्पत्ति मानने पर और सामर्थ्य को परमेश्वर का स्वरूप ही हैंमानने। उसीपर ब्रह्मतरह हीसे सबका उपादानकारण होगा । इस स्थिति में प्रपंच ब्रह्म से अभिन्न ही रहेगा और यदि इसको आप स्वीकार करेंगे मत मे अगत्या प्रवेश हो जायगा, जिसको कि आप सही नही मानते । विश्व के निर्माता इस ईश्वर के सामर्थ्य के तो आप का अद्वैत मध्य अथवा अन्त में ' इस जगत् की स्थिति है, इसमें भी प्रमाण देना पड़ेगा । सामर्थ्य भी ब्रह्म के मध्य या अन्त में रहती ,?, कारण ईश्वर की सामर्थ्य ही है अथवा परमेश्वर भी है यदि सामर्थ्य को ही कारण मानना है तो ब्रह्महै कोइसकोकारणभीबतानेबतानावालेपड़ेगाश्रुति-। वचनों की क्या स्थिति होगी? सामर्थ्य को यदि सावयव मानना है, तो वह घट-पट आदि की तरह सामर्थ्य को कारण मानने पर वह बढई कौन है, जो कि सामर्थ्य के अंशों को ग्रहण कर सारे जगत् अनित्य क्यो नही मानी जायगी? का निर्माण करता है? सामर्थ्य को सावयव मानने पर अन्य सामग्री की तरह उसके अवयवों को लेकर वस्तु का निर्माण होने से निश्चित भी रूपवत्ता है, इस वाक्य से आप क्या आगे इस विश्व की रूपवत्ता का विधान किया गया है । यही इस विश्व की और मनुष्य की ही उसको अनित्य मानना पड़ेगा । कहना चाहते हैं, कुछ स्पष्ट नहीं होता । पुनः पद की यहाँ क्या सार्थकता है? पहले आपने बताया में विद्यमान था, बाद में आपने बताया कि का निर्माण किया और यह भी कहा कि सारा जगत् परमेश्वर की सामर्थ्य में कारणावस्था कि पुरुष ने प्रकृति से आकाश आदि
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१२७३ वैवार्थपारिजातः •?जगद्विदधातीत्युक्तम् । तेनैव सर्वस्य रूपवत्त्व चेत् प्रकृत्याकाशादीनां पूर्वमुत्पत्ति किमर्थमुक्ता वेदाज्ञापनसमये ?परमात्माज्ञप्तवानिति कस्य शब्दस्यार्थः ह्याजानमित्यस्यायमर्थः सम्भवति । सकामेन कर्मणा कर्मदेवत्वयुक्त शरीर घृत्वा विषयेन्द्रियसयोगजनितमिष्ट सुखं भवतु, निष्कामेन विज्ञानपरमं मोक्षाख्यं चेति कम्य वेदाक्षरस्य भाष्यम्? कर्मदेवत्वं किं भवति? तद्युक्ते शरीरे शरीरान्तरापेक्षया कि वैलक्षण्यम्? इदं वाक्य निरर्थकमभिप्रेत्यैव सुखमनु-भवत्विति पाठं कल्पयति टिप्पणीकारः । सर्वथाप्युच्छृङ्खलमिदं दयानन्दीयं भाष्यमुपेक्षणीयमेव वेदार्थजिज्ञासुभिः । -- ' ' ( | | | ) वस्तुतस्तु अद्भयः सम्भृत इत्युत्तरनारायणेनादित्यमुपस्थायेति का० श्री० सू० १ ३ ६ २।२० इति कात्यायनश्रौतसूत्ररीत्या इमाः षट् कण्डिका उत्तरनारायणाभिधानाः । उपान्त्ये द्वे अनुष्टुभौ शेषास्त्रिष्टुभ आदित्यदेवत्याः' इति महीधर । पूर्वकल्पीयपुरुषमेधयाजी आदित्यरूपं प्राप्तोऽत्र स्तूयते । अद्द्भ्यो जलात् पृथिव्याश्च सकाशात्, उपलक्षणमेतद् भूतपञ्चकस्य ॥ तथा च भूतपञ्चकाद् यो रसः सम्भृतः पुष्टः । तथा विश्व कर्म यस्य तस्य विश्वकर्मण. कालस्य रसात् प्रीते ' यो रसोऽग्रे प्रथमं समवर्तत समभवत्, भूतपञ्चकस्य कालस्य च सर्वकारणत्वात् पुरुषमेधयाजिनः कर्मोपासनाभाविते लिङ्गशरीरे पञ्चभूतानि कालश्च तुष्यन्ति । तुष्टेभ्यस्तेभ्यः कश्चिद्रसविशेष- फलरूप उत्तमजन्मप्रद उत्पद्यते ।• तस्य रसस्थ रूपं विदधद धारयन् स्वष्टा आदित्य एति प्रत्यहमुदेति । अग्ने प्रथमं मर्त्यस्य मनुष्यस्य सतः स्वस्य पुरुषमेधयाजिन आजानदेवत्वं मुख्य देवत्व सूर्यरूपेण । कर्मदेवा आजानदेवाश्चेति द्विविधा देवाः । ये कर्मणोत्कृष्टेन देवत्व प्राप्तास्ते कर्मदेवाः, ये सृष्टयादावत्पन्नास्ते आजानदेवाः । ते कर्मदेवेभ्यः श्रेष्ठाः । ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानागानन्द | सूर्यादयश्चाजातदेवाः । पूर्वकाले मर्त्यस्य सतः कर्मोपासनावलाद् उस सामर्थ्य के अंशो को लेकर ईश्वर सारे जगत् को बनाता है और इसा से सब की रूपवत्ता का विधान बताया गया है । यदिबतायाऐसी, बात है तो प्रकृति, आकाश आदि की पहले उत्पत्ति मानने का तात्पर्य क्या है? मनुष्यो को वेद का ज्ञान देते हुए परमात्मा ने धारण कर यह अर्थ कहाँ से निकलता है? 'आजान' पद का यह अर्थ नहीं हो सकता । धर्मयुक्त सकाम कर्म के कारण कर्मदेवता का शरीरयह अर्थ वेद के विषय और इन्द्रिय के संयोग मे उत्पन्न इष्ट सुख का भोगे और निष्काम कर्म से विज्ञानमय मोक्ष सुख को प्राप्त करे, क्या विशेषता रहती? fre? इस मन्त्र के किन अक्षरो से निकलता है कर्मदेवता को कहते है इसके शरीर में अन्य शरोरो की अपेक्षा करता है । इस है? इस वाक्य को निरर्थक मान कर हो टिप्पणीकार 'सुख का अनुभव करें' ( पृ० १४४ टि० ) इस पाठ की कल्पनावेदार्थ के जिज्ञासु को प्रकार दयानन्द के सर्वथा ऊटपटाग इस भाष्य की वेदार्थ के जिज्ञासु के लिये कोई उपयोगिता नही है । अर्थात् इस भाष्य की सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये । ' नाम से वास्तव में कात्यायन के बताये विनियोग के अनुसार ' अद्भ्य • संभृतः' इत्यादि छ: कण्डिकाएइन'उत्तरनारायणसब का देवता आदित्य प्रसिद्ध है । अन्तिम कण्डिका से पहले की दो कण्डिकाएं अनुष्टुप् छन्द में और शेष त्रिष्टुप् छन्द मे निबद्धपूर्व कल्पहै । मे पुरुषमेध यज्ञ के संपादक,,, है । इस तरह से महीधर ने इन कण्डिकाओ का ऋषि देवता छन्द बताकर विनियोग दर्शाया है । शब्द भूतपंचक के सूचक है तथा अब आदित्य मण्डल में प्रविष्ट पुरुष को यहां स्तुति की जाती है । जल और पृथिवी कीसे, प्रीतिये दोनोसे जो सृष्टि के आदि काल मे रस अर्थात् पंच महाभूतों से जिसका रस पुष्ट हुआ है तथा विश्व जिसका कर्म है, ऐसे कालपुरुषमेध यज्ञ करने वाले व्यक्ति के कर्म और संपन्न हुआ, इसका अभिप्राय यह है कि भूतपंचक और काल सारे जगत् के कारण है, अतःरूप में उसे उत्तम जन्म को देने वाले रसविशेष ) उपासना से परिष्कृत लिंगशरीर में पञ्च महाभूत और काल संतुष्ट होकर पुरस्कार के प्रतिदिन उदित होता है । यही प्रारम्भ में ( का सचार करते हैं । उस रस के स्वरूप को धारण करने वाला त्वष्टा अर्थात् आदित्य सूर्य है कि वह भी सूर्य के रूप में प्रविष्ट कर्मदेवता का स्वरूप धारण करने वाले मनुष्य का आजानदेवता बन जाने पर स्वरूप हो जाता से देवता दो तरह के होते है । अपने उत्कृष्ट होकर उसी रूप में प्रतिदिन प्रकाशित होता रहता है । कर्मदेव और आजानदेव के भेद हुए आजानदेव कहे जाते हैं । आजानदेव कर्मों के आधार पर देवता बनने वाले कर्मदेव कहलाते हैं और सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न एक आनन्द श्रुति में माना गया है । कर्मदेवों की अपेक्षा श्रेष्ठ माने जाते हैं । कर्मदेवों के सौ आनन्दों को बराबर आज़ानदेवो का १६०
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१२७४ वेदार्थपारिजात। आजानदेवत्वप्राप्ति: । आदित्यमण्डले अद्भ्यः पृथिव्या विश्वकर्मणो रसाच्च सम्भृतत्वम् । प्रजापतिरूपविश्वकर्मणश्च सर्वकारणत्वात् तद्रसात्तत्प्रीतेः सूर्यस्य निर्मितरूपत्वम् । तदभिमानिनो देवस्याजानदेवत्वम् । त्वष्टा सर्वस्यैव रूपस्य निर्माता, 'विष्णुर्योनि कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिशतु आसिञ्चतु प्रजापतिर्वाता गर्भं दधातु ते' (ऋ ० सं ० १०।१८४ | १ ) इति मन्त्रवर्णात् । सूर्यस्य च विशेषतः संज्ञायाः पित्रा त्वष्टा ' शाणमारोप्य तेजःशातनेन रूपं कृतमिति पुराण- प्रसिद्धम् । बृहदारण्यके सूर्यमण्डलस्य सर्वमूर्तसारत्वमुक्तम् । आदित्यमण्डलान्तर्गतस्य व्याहृत्यवयवात्मनो हिरण्यगर्भरूप- प्रजापतित्वम् । तस्यैव हिरण्यश्मश्रुत्वहिरण्यकेशत्वादिरूपेण परमेश्वरत्वम् । तस्यैव चाशेषविशेषातीतत्वेन मुक्तो -, पसृप्यत्वमपि उत्तरमन्त्राणा तदनुगुणत्वात् । अत एवादित्यस्याजानदेवत्वं प्रजापतित्वमन्तर्यामित्व निर्गुणनिवि- शेषब्रह्मरूपत्वं तत्र तत्रोक्तं सङ्गच्छते । 'वेदाहमेतं पुरुष महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते- ऽयनाय ||' ( वा ० सं ० ३१।१८ ) । 'कि विदित्वा ज्ञानी भवसीति पृच्छयते? तदुत्तरमाह- यतः पूर्वोक्तलक्षणविशिष्टं सर्वेभ्यो महान्त बृहत्तममादित्यवर्ण स्वप्रकाशविज्ञानस्वरूप तमसोऽज्ञानादविद्यान्धकारात् परस्तात् पृथग्वर्तमान पर- मेश्वरं पुरुषमहं वेद जानाम्यतोऽह ज्ञान्यस्मीति निश्चयः । नैव तमविदित्वा कश्चिद् ज्ञानी भवतीति निश्चयः । कुतः? तमेवेति । मनुष्यस्तमेव पुरुषं परमात्मानं विदित्वा अतिमृत्युं मृत्युमतिक्रान्तं मृत्योः पृथग्भूत मोक्षाख्यमानन्दमेति प्राप्नोति । नैवातोऽन्यथेति । एवकारात्तमीश्वरं विहाय नैव कस्यचिदन्यस्य लेशमात्राप्युपासना केनचित् कदा- चित् कार्येति गम्यते । कथमिदं ज्ञायतेऽन्यस्योपासना नैव कार्येति, 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इति वचनात् । अयनाय व्यावहारिकपारमार्थिकसुखायातोऽन्यः पन्था मार्गो न विद्यते । किन्तु तस्यैवोपासनमेव सुखस्य मार्गोऽतो भिन्नस्येश्वर- गणनोपासनाभ्यां मनुष्यस्य दुःखमेव भवतीति निश्चयः । अतः कारणादेव पुरुषः सर्वैरुपासनीय इति सिद्धान्तः' सूर्य प्रभृति आजानदेव कहे जाते है । पहले मनुष्य के रूप मे उत्पन्न व्यक्ति कर्म और उपासना के बल से आजानदेव ( ), 1 आदित्य सूर्य मण्डल में जल पृथिवी और विश्वकर्मा का रस इकट्ठा होता रहता है । प्रजापति रूप विश्वकर्मा बन जाते है । उसकी प्रीति ( रस ) से ही सूर्य का भी निर्माण होता है और उसको आजानदेवता का पद प्राप्त होता है । सबका कारण है, अतः 1 ' ' स्वरूपो के निर्माता को कहते है । विष्णुर्योनि कल्पयतु इत्यादि ऋमन्त्र में त्वष्टा इसी रूप में वर्णित है त्वष्टा जगत् के सभी, त्वष्टा ने गाण पर चढा कर सूर्य का तेज कम कर दिया था इस तरह की कथा पुराणो में प्रसिद्ध है । सूर्य और संज्ञा के पिता मण्डन को सभी मूल पदार्थों में श्रेष्ठ माना गया है । आदित्यमण्डल मे व्याहृति के अवयव के रूप में रहने । बृहदारण्यक उपनिषद् में सूर्य- पुरुषोकहा जाताके द्वारा, है । प्राप्यवहीं, ब्रह्महिरण्यश्मश्रुभी है । औरआगे हिरण्यकेशके मन्त्र वालाइसी ब्रह्मपरमेश्वरका वर्णनमानाकरतेजाताहै ।,है इसीलियेऔरसबवहीसहीश्रुतियोंसमस्तही हैमेंविशेषताओं। वालेयत्र हिरण्यगर्भसे रहितको( हीहोने)प्रजापतिसे मुक्तआजानदेव प्रजापति अन्तर्यामी और निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप बताया गया है वह तत्र आदित्य सूर्य को जो ' ( वेदाहमेतं ० ) प्रश्न – किस पदार्थ के ज्ञान से मनुष्य ज्ञानी होता है? उत्तर--उस पूर्वोक्त लक्षण,,वत् जानकर ही मनुष्य ठीक ठीक ज्ञानी होता है अन्यथा नही । जो सबसे बड़ा सबका प्रकाश सहित परमेश्वर को यथा-,अर्थात् अज्ञान आदि दोषो से अलग है उसी पुरुष को मैं परमेश्वर और इष्टदेव जानता हूँ । करने वाला और अविद्या अन्धकारज्ञानवान् नही हो सकता, क्योकि ( तमेव विदित्वा० ) उसी परमात्मा को जानकर और प्राप्त करउसकोमनुष्यजाने बिना कोई मनुष्य यथावत, -समान दु.ख से छूट कर परमानन्द स्वरूप मोक्ष को प्राप्त होता है अन्यथा किसी प्रकार से मोक्ष जन्म मरण आदि क्लेशों के समुद्रहुआ कि उसी की उपासना सब मनुष्य लोगों को करनी उचित है । उससे भिन्न की सुख नही हो सकता । इससे क्या सिद्धमोक्ष का देने वाला एक परमेश्वर के बिना दूसरा कोई भी नहीं है । इसमें यह प्रमाणउपासना करना किसी मनुष्य को न चाहिये, क्योकि दोनों सुख का मार्ग एक परमेश्वर की उपासना और उसका जानना है, क्योंकि इसकेहै कि (नान्यः पन्था० ) । व्यवहार और परामर्श के बिना मनुष्य को किसी प्रकार से सुख नही हो
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वेदार्थपारिजातः १२७५ ( पृ० १४५ ) इति दयानन्दीय भाष्यम् । तदुपर्युच्यते -स्वल्पाक्षरैरप्येतद्वक्तुं शक्यते, तथापि यथा तथाभूतैः शब्देस्त- स्यैवार्थस्य पिष्टपेषणममनोज्ञमेव । ? किञ्च त्वदीयमोक्षस्य ब्राह्मशतवर्षमितस्य स्वर्गादिवत् क्षयिष्णुत्वेन कुतोऽतिमृत्युत्व सम्भवति चिरस्थायित्वेन तु स्वर्गस्यापि तथात्व वक्तुं शक्यत एव वेदनमन्यदुपासन चान्यत् । मानसक्रियारूपमुपासनं पुरुषतन्त्रम्, तच्च पुरुषेण कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं शक्यते । यथा पद्भ्यां गच्छति, अश्वेन गच्छति, न वा गच्छतीति गमनक्रिया इच्छानुसार भवति । ज्ञानरूपं वेदनं तु न पुरुषतन्त्र भवति, किन्तु वस्तुतन्त्र भवति । वस्तुज्ञान तु यथावस्त्वेव प्रमाणे- नावेद्यते ॥ प्रमाणप्रमेयसम्बन्धे वस्तु नाप्रमातुं न वान्यथा प्रमातुं शक्यते ॥ किञ्च, मोक्षसाधनायात्रान्यः पन्था निषिद्धयते, नहि स्वर्गपशुपुत्रादिसुखप्राप्तयेऽप्यन्योपासन निषिद्धयते? सनातनिसम्मतमिदमस्य व्याख्यान यथा- एतं प्रत्यक्चैतन्याभिन्नमत एवापरोक्ष महान्त भूमानं देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्य तत्पदलक्ष्य व्यापक परमात्मानं न तु देहादिपरिच्छिन्नमल्पमादित्यवर्णमादित्यस्येव वर्णो यस्य तम्, आदित्यो यथोपमानान्तराभावात् स्वोप- मस्तथा निरुपमम्, आदित्यवत् स्वप्रकाशं वा । आदित्यः स्वसमानजातोयप्रकाशानपेक्षोऽयं तु सजातीयविजातीयसर्व- विघप्रकाशनिरपेक्षोऽवेद्यत्वे सत्यपरोक्षव्यवहारार्हत्वेन स्वप्रकाशस्तम् । तमसोऽज्ञानतत्कार्यलक्षणात्तमसः परस्ताद् दूर- तरम् । तादृश तमोऽविद्यादिरहित पुरुषं पूर्षु शयनात् पूर्णं वा सर्वमनेनेति पुरुषं सर्वधीवृत्तिसाक्षिणमहं वेद स्वप्रकाशत्वेन सकता ( पृ ० १४६ ) | यह दयानन्द का भाष्य है । इस पर हमारा कहना है— थोडे शब्दो मे इसी बात को कहा जा सकता है, तो भी उन्ही शब्दों को बार बार इधर -उधर घुमाकर एक ही बात का पिष्टपेषण करना कोई अच्छी बात नही है । अपि च, आपका अभिमत मोक्ष ब्रह्मा के सौ वर्ष तक ही रहता है, बाद में यह भी स्वर्ग की तरह क्षयिष्णु है, तब इसको मृत्यु से अतीत कैसे माना जा सकता है? इस मोक्ष को चिरस्थायी होने से ऐसा माने तो स्वर्ग को भी क्यो न ऐसा माना जाय? ज्ञान और उपासना दो भिन्न बातें है । मानस क्रियारूप उपासना प्रत्येक पुरुष के अधीन है । इसको पुरुष चाहे तो कर सकता है, नही करता अथवा किसी अन्य प्रकार से भी कर सकता है । जैसे कि जो व्यक्ति जाना चाहता है, वह घोडे से जा सकता है, पैदल जा सकता है अथवा नही भी जा सकता, यह सब जाने वाले की इच्छा पर निर्भर है । इसके विपरीत ज्ञान स्वरूप वेदन पुरुष के अधीन न होकर वस्तु के अधीन होता है । वस्तु का ज्ञान जैसे वह वस्तु है, वैसे ही प्रमाण के द्वारा भी ज्ञात होती है । प्रमाण और प्रमेय का संबन्ध हो जाने पर वस्तु का ज्ञान न हो अथवा अन्यथा ज्ञान हो, यह संभव नही है । अपि च, इस मन्त्र में मोक्ष के साधन के रूप मे दूसरे मार्गों का निषेध किया गया है, इसी तरह से स्वर्ग, पशु, पुत्र आदि की प्राप्ति के लिये अन्य उपासनाओं का निषेध नही किया जाता । सनातन पद्धति से इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार होगा------ 1 चैतन्य से अभिन्न, अत एव प्रत्यक्ष, देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित इस व्यापक परमात्मा को, न कि प्रत्यक् देहादि से परिच्छिन्न जीवात्मा को, जो कि आदित्य के समान प्रकाशमान है, अर्थात् जैसे आदित्य के सदृश कोई उपमान न होने से यह स्वयं ही अपने मे उपमा बनता है, उसी तरह उस परमात्मा को समझाने के लिये भी कोई उपमान न होने से वह अपने ही उपमा बनता | अथवा यह परमात्मा आदित्य ( सूर्य ) की तरह ही स्वयं प्रकाशित होने वाला है । आदित्य ( सूर्य ) अपने समानजातीय किसी प्रकाश की सहायता के बिना ही प्रकाशित होता है, उसी तरह से यह परमात्मा सजातीय, विजातीय सभी तरह के प्रकाश की अपेक्षा नही रखता, उनके बिना ही यह स्वयं प्रकाशित होता रहता है, अतः यह स्वप्रकाश कहा जाता है । यह परमात्मा तप से अर्थात् अज्ञान और उसके कार्य स्वरूप अन्धकार से बहुत दूर है । इस तरह से अविद्या प्रभुति से रहित उस पुरुष को, जो कि नाना पुरो ( शरीरो ) मे विश्राम }करता है, अथवा जिसके कारण सब पूर्ण दिखाई पड़ते है तथा जो सभी व्यक्तियो की बुद्धि रूपी वृत्तियो का साक्षी है, उसे मैं जानता
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वेदार्थपारिजातः १२७६ संशयविपर्ययाज्ञान राहित्येन वेद जानामि न तु वृत्तिविषयत्वेन, 'अन्यदेव तद्विदितादथोऽविदितादधि', 'यस्यामतं तस्य मत मत यस्य न वेद सः' इत्यादिश्रुतिभ्यः । तमेव पुरुष विदित्वा प्रत्यगात्मतत्त्वेन साक्षात्कृत्याधिकृतः साधको मृत्युमेति जननमरणाविच्छेदलक्षणा ससृतिमतिक्रम्य सच्चिदानन्दब्रह्मात्मभाव गच्छति । अयनाय सुखमयायतनाय आश्रयणाय सर्वाश्रयभूत ब्रह्मैव सर्वाश्रयस्तस्मै ब्रह्मप्राप्तये वा अन्यः पन्था मार्गो न विद्यते सूर्यमण्डलान्तः पुरुषरूप-प्रत्यगभिन्नब्रह्मसाक्षात्कार एव मुक्तिसाधनमित्यर्थः । 'प्रजापतिश्चरति गर्भेऽन्तरजायमानो बहुधा विजायते ॥ तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थु-र्भुवनानि विश्वा ॥ ' ( वा स ० ३१।१ ९ ) । स एव प्रजापतिः सर्वस्य स्वामी जोवस्थान्यस्य च जडस्य जगतोऽन्तर्मध्ये-ऽन्तर्यामिरूपेणाजायमानोऽनुत्पन्नोऽजः सन् नित्यं चरति । तत्सामर्थ्यादेवेदं सकल जगद् बहुधा विजायते विशिष्ट- तयोत्पद्यते । तस्य ब्रह्मणो योनिं सत्यधर्मानुष्ठानं वेदविज्ञानमेव प्राप्तिकारण धीरा ध्यानवन्तः परिपश्यन्ति सर्वतः प्रेक्षन्ते । तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि सर्वाणि सर्वे लोकास्तस्थुः स्थिति चक्रिरे । हेति निश्चयार्थे । तस्मिन्नेव परमे पुरुष धीरा ज्ञानिनो मोक्षानन्दं प्राप्य तस्थुः स्थिरा भवन्ति' ( पृ ० १४६ ) इति दयानन्दीय भाष्यम् । तदेतदपि शब्दमर्यादयाऽशुद्धमेव । तत्सामर्थ्यादिद सकल भवतीतीमेऽशाः स्वाभ्युहिता मन्त्राक्षरासंस्पृष्टा एव । अन्तरित्यनेनैवोपपत्ती गर्भ इत्यस्य किं प्रयोजनम्? तेनैव वापपत्तौ अन्तरित्यस्य ध्रुव वैयर्थ्यम्, यथाकथञ्चि-दध्याहारादिनाऽर्थ करणमपि भाष्यं चेत् तदा -' सर्वविद स्वामिदयानन्दोक्त वेदविरुद्धमिति शेष: ' इत्यपि भाष्य - — ' ' 'स्यात् । मूले तस्य सामर्थ्यादिदं सकल जगदित्यादिपदानामभावाद् एतानि पदानि कल्पितान्येव । योनिम् इत्यस्यापि सत्यधर्मानुष्ठानं वेदविज्ञानं प्राप्तिकारणमित्यादिव्याख्यानमुदक्षरमेव । तस्य कारणार्थकत्वेऽपि प्राप्तिकारण-मुत्पत्तिकारणं नाशकारण वा नार्थः, मानाभावात् । धीरा इत्यस्य ध्यानवन्त इत्यपि नार्थः" प्रमाणविरहादेव । पूर्वं हूँ, उसके स्वप्रकाश होने से सशय, विपर्यय और अज्ञान से असंस्पृष्ट स्वरूप से जानता हूँ । यह परमात्मा चित्त वृत्तियो का विषय नही हो सकता, क्योकि श्रुतियाँ उसको विदित और अविदित अवस्था से भिन्न ही बताती है । उसी पुरुष को जान कर अर्थात् उसका प्रत्यगात्मतत्त्व के रूप में साक्षात्कार कर साधक जन्म- मरण की अविच्छिन्न परम्परारूप संसृति ( संसार ) को लांघकर सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्मात्मभाव को प्राप्त कर लेता है । अयन के लिये, सुखमय आयतन (स्थान) की प्राप्ति के लिये, सबका आश्रयभूत ब्रह्म ही सबके लिये आश्रयणीय है, अत उस ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति के लिये कोई दूसरा मार्ग नही है । इसका अभिप्राय यह है कि सूर्यमण्डल के अन्दर रहने वाले स्वयंप्रकाश पुरुषरूप प्रत्यगात्मा से अभिन्न ब्रह्म के साक्षात्कार से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है । '( प्रजापति० ) जो प्रजा का पति अर्थात् सब जगत् का स्वामी है, वहो जड़ और चेतन के भीतर तथा बाहर अन्तर्यामी रूप से सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । जो सब जगत् को उत्पन्न करके अपने आप सदा अजन्मा रहता है, ( तस्य योनिं० ) जो उस परब्रह्म की प्राप्ति का कारण, सत्य का आचरण और सत्य विद्या है, उसको विद्वान् लोग ध्यान से देख कर परमेश्वर को सब प्रकार से प्राप्त होते हैं | ( तस्मिन् ह त० ) जिसमे ये सब भुवन अर्थात् लोक ठहर रहे है, उसी परमेश्वर मे ज्ञानी लोग भी सत्य निश्चय से मोक्षसुख को प्राप्त होकर, जन्म-मरण आदि से छूट कर आनन्द में सदा रहते हैं' ( पृ० १४६ ) यह हुआ दयानन्द का भाष्य । शाब्दिक प्रक्रिया के अनुसार यह भी अशुद्ध ही है । उसी परमात्मा की सामर्थ्य से यह सारा जगत् उत्पन्न होता है, इस तरह की सारी बातें अपनी कल्पना है, मन्त्र के अक्षरो से इसका कोई सम्बन्ध नही है । 'अन्तः' शब्द से ही जब अर्थ की प्राप्ति हो गई तो ' गर्भ' शब्द की क्या आवश्यकता है और गर्भ शब्द से गतार्थता हो जाने पर 'अन्त' शब्द की व्यर्थता निश्चित है । जिस किसी तरह से अध्याहार आदि के द्वारा अर्थ करना भी यदि भाष्य कहा जाय तो 'दयानन्द का कहा गया सब कुछ वेदविरुद्ध है, इस वाक्य का अध्याहार भी मन्त्र के भाष्य का अंग हो जायगा । मूल मन्त्र में 'उसी परमात्मा के सामर्थ्य से यह सारा जगत्' इस अर्थ के बोधक पदो के अभाव में ये पद कल्पित ही माने जायेंगे । 'योनिम्' इस पद का सत्य धर्म का अनुष्ठान, वेद का विज्ञान उसकी प्राप्ति का कारण है, ऐसा अर्थ भी अक्षरो से प्राप्त नही होता । योनि शब्द कारणार्थक है अवश्य, किन्तु उसका अर्थ प्राप्ति का कारण, उत्पत्ति का कारण अथवा नाश का कारण हो, इसमें कोई प्रमाण नही है । प्रमाण के अभाव में हो 'घोर' पद का ध्यानवान् अर्थ नही हो
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वेदार्थपारिजातः १२७७ मोक्षस्य सच्चिदानन्दरूपत्वमुक्तम्, इदानी मोक्ष प्राप्य तस्मिन् स्थितिरुच्यते । तदपि न सम्यक् तस्य गृहादिवदधिकरण- वेन विकारित्वापत्ते । वैदिक सनातनिसिद्धान्तानुमारेण मन्त्रस्यार्थो लिख्यते - कीदृशः स आदित्यवर्णो महाव्यापकः पुरुष इत्याह- प्रजापतिः सर्वस्य जगतस्तस्थुषश्च प्रजायाः पतिः पालकः परमेश्वरः अन्त दि स्थितः सन् गर्भे मध्ये चरति प्रविशति, जीवरूपेण जीवान्तर्यामिरूपेण वा तस्य सर्वात्मस्वरूपत्वात् । स चाजायमानोऽनुत्पद्यमानो नित्यः सन् बहुधा कार्य-कारणप्रपञ्चरूपेण विजायते माययोत्पद्यते 1। सर्वथा कूटस्थस्याजस्य मायया कार्यकारणप्रपञ्चरूपेण जनिः, तस्य , प्रपञ्चविवर्ताघिष्ठानत्वात् । अधिष्ठानस्यातात्स्विकोऽन्यथाभावो विवर्तः रज्जुसर्पादिवत् । तात्त्विकोऽन्यथाभावः परिणामः, दुग्धस्य दध्यादिभाववदिति विवेक: । 'कृपणधोः परिणाममुदीक्षते क्षपितकल्मषधीस्तु विवर्तताम् । स्थिरमतिः पुरुष: पुनरीक्षते व्यपगतद्वितय परमं पदम् ॥' इति सक्षेपशारीरकोक्तेः । यद्वा अजायमानोऽनुत्पद्यमानोऽजः सन् बहुधा रामकृष्णादिरूपेण मायया विजायते मायामनुष्याकारेण प्रादुर्भवति, ' अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥' इति भगवद्गीतास्मरणात् । यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ' इत्यादिवचननिचयान्यत्रानु- सन्धेयानि । सर्वथापि य. प्रजापतिर्यश्चाजायमानः स एव बहुधा विजायते, इत्येव मन्त्रार्थः । समानसत्ताकयोर्भावाभावयोविरोघान्नैकत्र सन्निवेशः सम्भवति, तत एव विषमसत्ताकयोर्भावाभावयोः सामञ्जस्य वक्तव्यम् । व्यावहारिकसत्ताकरूप्यात्यन्ताभाववत्यां शुक्तिकाया व्यावहारिकसत्ता करूप्यत्वस्यासम्भवदुक्ति + सकता । पहले मोक्ष को सच्चिदानन्द स्वरूप माना गया है । अंतः आप कहते है कि मोक्ष को प्राप्त कर उसमें स्थिति होती है । यह भी ठीक नही है, क्योंकि यदि मोक्ष को गृह आदि की तरह अधिकरण माना जायगा, तो वह विकारी हो जायगा । वैदिक सनातन पद्धति के अनुसार मन्त्र का अर्थ यह होगा - आदित्य के समान वर्णवाला महान् व्यापक वह पुरुष कैसा है? इसके उत्तर में श्रुति कहती है कि वह प्रजापति है, अर्थात् स्थावर-जगमात्मक इस सारी जगत् रूपी प्रजा का पति अर्थात् पालक वह परमेश्वर ही है । यह परमेश्वर हृदय में निवास करता हुआ सबके गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है । यह परमात्मा सर्वात्मस्वरूप है, अतः सब जीवो के रूप मे अथवा अन्तर्यायी रूप से यह सब जगह रहता है । यह परमात्मा पैदा न होता हुआ नित्य एकरस रहता हुआ कार्यकारण के प्रपंच के रूप में माया के द्वारा अनेक रूप धारण कर लेता है । सर्वथा कूटस्थ इस अजन्मा परमात्मा की माया के द्वारा कार्यकारण रूप से उत्पत्ति मान ली जाती है, क्योकि इस जागतिक प्रपत्र के सभी तरह के विकारो का वही अधिष्ठान है । अधिष्ठान का अवास्तविक अन्यथाभाव ही विवर्त कहा जाता है, जैसे रज्जु में सर्प का भ्रम रज्जु का अवास्तविक अन्यथाभाव ही है । तात्विक ( वास्तविक ) अन्यथाभाव परिणाम कहलाता है, जैसे कि दूध का दही बन जाना वास्तविक है । परिणाम और विवर्त का यही भेद है । संक्षेपशारीरक में इस बात को इस तरह से स्पष्ट किया गया है -'मन्दबुद्धि पुरुष परिणामवाद को ही देख पाता है, क्षीण-पाप निर्मलबुद्धि विवर्तवाद को भी समझ सकता है, किन्तु स्थिरप्रज्ञ पुरुष तो परिणाम और विवर्त से परे बिद्यमान परमवाद को ही देखता है' । tear ' aataara' इत्यादि का दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह अजायमान परमात्मा अज अर्थात् अनुत्पन्न रहते हुए ही राम, कृष्ण आदि नाना रूपो में अपनी माया के द्वारा मनुष्य का मायामय शरीर धारण कर आविर्भूत होता है । भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है- 'मैं अज ( अजन्मा ) और अव्ययात्मा ( अविकार स्वभाव) तथा सभी प्राणियों का स्वामी होते भी अपनी प्रकृति का सहारा लेकर अपनी माया से ही नाना रूपो को धारण करता हूँ । इस प्रसंग मे -'हे अर्जुन, जब- जब धर्म का ह्रास और अधर्म की बढोतरी होती है, तब-तब मैं अवतार ग्रहण करता हूँ । सज्जनों की रक्षा के लिये और दुर्जनो का विनाश करने के लिये तथा धर्म की पुनः प्रतिष्ठा के लिये मैं प्रत्येक युग में अवतार लेता हूँ' गोता के इन वचनो को भी याद रखना चाहिये । सभी दृष्टियों से देखने पर जो प्रजापति है और जो अजायमान है, वही नाना रूपों में प्रकट होता है, यही मन्त्र का अर्थ हो सकता है ।
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१२७८ वेदार्थपारिजातः कत्वेऽपि प्रातिभासिकसत्ताकस्य रूप्यत्वस्य सत्त्वे यथा न बाधः, तथैव प्रकृतेऽपि परमेश्वरे समानसत्ताकयोर्जायमानत्वा- जायमानत्वयोरसम्भवेऽपि विषमसत्ताकयोस्तयोर्विरोधाभावात् । एतेन पारमार्थिक जायमानत्वात्यन्ताभाववति ब्रह्मणि पारमार्थिकसत्ताकजायमानत्वासम्भवेऽपि व्यावहारिकसत्ताकजायमानत्वे बाधाभावः । तेन न केवल परब्रह्मणो राम- कृष्णादिरूपेण जायमानत्वम्, किन्तु सर्वप्रपञ्चरूपेणापि तस्यैव जायमानत्वमुपपद्यते । परमार्थतः शुद्धकूटस्थरूपेणा- जायमानत्वमेव | इयास्तु भेदः - यथा काष्ठ -कुड्य- मेघादिव्यवहितस्य सूर्यस्य प्रावृतत्वेऽपि सूक्ष्मदूरवीक्षणयन्त्रव्यवधान- व्यवहितस्य तस्य न स्वरूपमाव्रियते, किन्तु केवलनेत्रादृष्टस्यापि महामहिमवैभवस्याभिव्यक्तिर्भवति, तथैव कार्य- कारणात्मकप्रपञ्चोपहितस्य ब्रह्मणः सच्चिदानन्दादिस्वरूपस्यावरणं जायते । रजस्तमोलेशानुविद्ध विशुद्धसत्त्वो- पाधिकस्याचिन्त्यदिव्य लीलाशक्त्युपहितस्य ब्रह्मणस्तेन व्यवधानेन न स्वरूपमाव्रियते, किन्तु तस्याचिन्त्यमहामहिम- वैभवमेव स्फुटयते । धीराः धिय बुद्धिमीरयन्ति नियमयन्ति ये ते धीरा योगाभ्यासनियन्त्रितबुद्धिसत्त्वा योगिनो ब्रह्मविदस्तस्य प्रजापतेर्योनि स्वरूपाभिव्यक्तिस्थानम् ' अहं ब्रह्मास्मि' इति महावाक्यजन्यामखण्डाकारा वृत्ति प्राप्य तयाऽसत्त्वापादिका- मज्ञानापादिकां चाविद्यावृत्तिमपोह्य निरावरणस्वप्रकाशात्मस्वरूपं परिपश्यन्ति, तद्विषयकाज्ञानविपर्ययसाय विप्रति- पत्त्यप्रतिपत्तिशून्या भवन्ति ॥ विश्वा विश्वानि सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि तस्मिन् ह तस्मिन्नेव तस्थु स्थितानि । समान सत्ता वाले पदार्थों का भाव और अभाव परस्पर विरुद्ध होने से एक साथ नही रह सकता, इसलिए विषम सत्ता वाले भाव और अभाव को मानकर इनमें परस्पर समन्वय करना पड़ेगा । व्यावहारिक सत्ता वाली चांदी का जहाँ अत्यन्त अभाव है, ऐसी शुक्तिका में व्यावहारिक सत्ता वाली चाँदी की स्थिति बताना यद्यपि अत्यन्त असंभव है, किन्तु प्रातिभासिक सत्ता वाली चाँदी की सत्ता मानने में कोई बाधा नही रहती, उसी तरह से प्रकृत में भी परमेश्वर में समान सत्ता वाले जायमानत्व और अजायमानत्व की एक साथ स्थिति रहने पर भी विषम सत्ता वाले जायमानत्व और अजायमानत्व की स्थिति मानने में कोई बाधा नही होगी । इस तरह से पारमार्थिक दृष्टि से जायमानता के अत्यन्त अभाव वाले ब्रह्म में पारमार्थिक सत्ता वाले जायमानता धर्म के न रहने पर भी व्यावहारिक सत्ता वाली जायमानता के रहने में कोई बाधा नही है । अतः परब्रह्म केवल राम, कृष्ण आदि के रूप में ही नही, किन्तु इस सारे प्रपंच के रूप मे भी पैदा होता है और पारमार्थतः शुद्ध, कूटस्थ रूप में वह अजन्मा भी है । विशेषता इतनी ही है कि जैसे लकड़ी, दीवाल, बादल आदि से व्यवहित सूर्य-नक्षत्र आदि ढक जाते हैं, नहीं दिखाई पड़ते, किन्तु बहुत सूक्ष्म वस्तुओं को दूर से ही देख लेने की सामर्थ्य वाली दूरबीन का व्यवधान होने पर, आँखो का और सूर्य का व्यवधान इससे पड़ जाने पर भी नक्षत्र आदि का स्वरूप उससे ढकता नही, इसके विपरीत केवल आँखो से न दिखाई पडने वाला इनका महान् वैभवशाली रूप उस मन्त्र की सहायता से आँखो के सामने प्रकट हो जाता है, उसी तरह से कार्यकारणात्मक प्रपञ्च से उपहित ब्रह्म का सच्चिदानन्दमय स्वरूप तो ढक जाता है, किन्तु रज और तम के लेश से भी रहित विशुद्धसत्व उपाधि वाले अचिन्त्य, दिव्य लीलाशक्ति से संपन्न ब्रह्म का स्वरूप इस उपाधि से आवृत नही होता, इसके विपरीत उसकी यह अचिन्त्य महिमा इसकी सहायता से अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होने लगती है । ' वीर' पद का व्युत्पत्ति की सहायता से प्राप्त होने वाला अर्थ घी = बुद्धि को नियमित करने वाला है । योगाभ्यास से अपनी बुद्धि को नियन्त्रण में रखने वाले ब्रह्मवेत्ता योगी उस प्रजापति के स्वरूप को कि वह कैसे कहाँ अभिव्यक्त हो सकता है, "मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि श्रुतिप्रतिपादित महावाक्यो के अभ्यास से उत्पन्न अखण्ड आकारवाली अन्तःकरण की वृत्ति को पकडकर और उसकी सहायता से ब्रह्म की असत्ता, अज्ञान को पैदा करने वाली अविद्या की वृत्ति को दूर कर यथार्थ रूप से देख पाते हैं कि वह प्रजापति का स्वरूप निरावरण प्रकाश स्वरूप है और यह जानकर वे ब्रह्मविषयक, अज्ञान, विपरीत ज्ञान अथवा संशय से मुक्त हो जाते है । ये सारे भुवन और उनमें निवास करने वाला यह स्थावर जंगमात्मक सारा जगत् उसी परमात्मा में अवस्थित है, सब कुछ
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१२७६ वेदार्थपारिजातः सर्वं तदात्मकमेव, अधिष्ठानसत्तातिरिक्तायाः कल्पितसत्ताया अनङ्गीकारात् । भक्तिदृष्ट्या योनि तस्याभिव्यक्तिस्थानं भक्तियोगं पश्यन्ति तद्द्द्वारा भजनीयं भगवन्तं सर्वप्राणिपरप्रेमास्पदं च विष्णु शिव राम कृष्णादिरूपेण सर्वान्तर्यामिरूपेण च पश्यन्ति । तस्मिन् ह तदधीनास्तदाश्रयास्तदेकाश्रयाश्च तस्थुस्तिष्ठन्ति । 'यो देवेभ्य आतपति यो देवानां पुरोहितः । पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्मये । ' ( वा ० स ० नान्येभ्यः । ३१।२० ) । 'य पूर्णः पुरुषो देवेभ्यो विद्वद्भ्यस्तत्प्रकाशार्थमातपति आपमन्तात्तदन्तःकरणे प्रकाशयति पूर्वः पूर्वमेव • ( ) यश्च देवानां विदुषां पुरोहितः सर्व सुखैः सह मोक्ष विदुषो दधाति पूर्वो यो देवेभ्यो विद्वद्भ्यो यः देवेभ्यो सनातनत्वेन वर्तमानः सन् जातः प्रसिद्धोऽस्ति ( नमो रुचाय ) तस्मै रुचाय रुचिकराय ब्रह्मणे नमोऽस्तु । यच्च नमोऽस्तु' विद्वद्भ्यो ब्रह्मोपदेश प्राप्य ब्रह्मरुचिर्ब्राह्मः ब्रह्मणोऽपत्यमिव वर्तमानोऽस्ति, तस्मा अपि ब्राह्मये ब्रह्मसेवकाय (पृ० १४७ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । अत्रोच्यते - देवेभ्य इत्यस्य विद्वद्भ्य इत्यशुद्धोऽर्थ, विशिष्टैश्वर्यंमहाभाग्यस्य परमेश्वरविभूतिरूपस्य तन्निर्देशोऽस्ति । विदुषां देवस्य साधितत्वात् । आतपतीत्यस्य प्रकाशयितृत्वार्थकत्वे कर्मनिर्देशेनापि भाव्यम्नित्यत्वेन, न च देवेभ्यः पूर्वं जातत्वमपि सर्वे सुखैः सह मोक्ष आहितत्वेऽपि पुर इति पदमव्याख्यातमेव स्यात् । परमात्मनो । एव ब्रह्मरुचिरिति पदमपि नोपपद्यते । तथैव ब्राह्मिविशेषणत्वेन प्रतीयमानस्य रुचस्य रुचिकरत्वमपि प्रमाणसापेक्षम् नास्त्येव मूले । तेन तस्य ब्रह्मरुचेर्ब्रह्मभक्तस्य ब्राह्मित्वं ब्रह्मापत्यत्वमपि कुतस्त्यम्? देवेभ्योऽर्थाय आतपति वैदिक सनातनिसम्मतं त्विदमस्य मन्त्रस्य व्याख्यानम् -य प्रजापतिरादित्यरूपो , रात्रावसुराणां प्राधान्य- द्योतते, आदित्योदयस्य दैव्यकर्मयज्ञयागादिप्रवृत्तिहेतुत्वात् प्रजापतिरादित्यरूपेण द्योतते यहाँ स्वीकार नही की गई है । भक्तिशास्त्र की दृष्टि से यहाँ भगवन्मय ही है, क्योकि अधिष्ठान की सत्ता के अतिरिक्त कोई कल्पित सत्ता की सहायता से देख पाता है । इस भक्तियोग के द्वारा भक्त अधिकारी है, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण योनि पद का अर्थ है उस परमात्मा का अभिव्यक्ति स्थान इसको भक्तियोग आदि रूपो में सबके -, अपने अपने भजनीय भगवान् को जो कि सभी प्राणियो के परम प्रेम का भगवान् का सहारा लेकर निश्चित हो जाते है । में अन्तर्यामी के नाम से जानता है । वे भक्तगण एकमात्र उसी अपने भजनीय, है हृदय है अर्थात् उनके आत्माओ को प्रकाश में कर देता '( ) यो देवेभ्य० जो परमात्मा विद्वानो के लिये सदा प्रकाशस्वरूपवाला है, इससे वे फिर दुःखसागर में कभी नही गिरते । और वही उनका पुरोहित अर्थात् अत्यन्त सुखो से धारण और पोषण करने के ही ज्ञान से प्रसिद्ध अर्थात् प्रत्यक्ष होता है, (नमो रुचाय ) ( ) को हमारा नमस्कार हो । साथ पूर्वो यो देवभ्यो जातः जो सब विद्वानो से आदिविद्वान् और जो विद्वानो ही जो विद्वानो से वेदविद्या आदि को -, उस अत्यन्त आनन्द स्वरूप और सत्य में रुचि कराने वाले ब्रह्म से प्रेम प्रीति करके सेवा करने वाला विद्वान् मनुष्य है यथावत् पढकर धर्मात्मा अर्थात् ब्रह्म को पिता के समान मान 'करयो देवेभ्यसत्यभाव' इत्यादि वेदमन्त्र की दयानन्द कृत व्याख्या । उसको भी हमलोग नमस्कार करते है' ( पृ० १४७ ) यह हुई गलत है । विशिष्ट ऐश्वर्ययुक्त, महाभाग्यशाली, परमेश्वर — ' इस क्रिया का अर्थ प्रकाशयिता, इस पर हमारा यह कहना है देव शब्द का अर्थ विद्वान् करना माना जाता है तो उसके कर्म की विभूतिस्वरूप देवताओं की सत्ता सिद्ध की जा चुकी है । 'आतपतिहै । विद्वानो के लिये सब तरह के सुखो के साथ मोक्ष देने वाला भगवान्, ही रह जाता है । परमात्मा, का निर्देश भी करना पड़ेगा किन्तु यहाँ कोई कर्ता निर्दिष्ट नही तो नित्य है अतः उसके लिये यह नही ही है, ऐसा अर्थ करने पर पुरोहित पद का पुर शब्द अव्याख्यात। इसी तरह से 'ब्राह्मि' के विशेषण के रूप में प्रतीयमान रुच शब्द का अर्थ कहा जा सकता कि देवताओं से पहले उसकी उत्पत्ति सेहुईमूल मन्त्र मे ब्रह्मरुचि शब्द भी उपलब्ध नही है । तब उस ब्रह्मरुचि अर्थात् रुचिकरके भक्तकरनेकीके ब्राह्मितालिये प्रमाणअर्थात्को अपेक्षाब्रह्म कीहै पुत्रता। इसी कहाँतरहसे आवेगी? अर्थात् वह विद्वान् भक्त ब्रह्म का पुत्र किस प्रमाण की सहायता से सिद्ध किया जा सकेगा? होगा जो आदित्यरूप प्रजापति देवताओं के प्रयोजन ब्रह्म के लिये यज्ञ-यागादि कर्मों में मनुष्यों को प्रवृत, वैदिक सनातन पद्धति के अनुसार इस मन्त्र का यह अर्थ कराने के लिये होता है अतः प्रकाशित होता है, सूर्य का उदय देवों के निमित्त किये जाने वाले
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वेदार्थपारिजातः १२८० मादित्योदये दिने देवाना प्राधान्यमिति श्रवणात् । यश्च देवानामग्नीन्द्रादिपुरोगमाना पुरोहितः सर्वकार्येषु पुर. अग्रे हितः स्थितः, नीत इत्यर्थः । आदित्यस्य देवानामिन्द्ररूपेण पुरोहितत्व ब्रह्मरूपेण पूर्वजातत्व च । यद्वादित्यस्य विष्णु- प्रधानत्वेन विष्णोश्चेन्द्रादीनां सर्वकार्येष्वहितत्वमिति पुराणादिषु स्फुटमेव, देवाना कार्यार्थमेव रामकृष्णवामनादि - रूपेण विष्णोरवतारप्रसिद्धेः । यश्चादित्यरूपेण देवेभ्यः सकाशात् पूर्वं जातः प्रथममुत्पन्नः, तस्मै आदित्याय परमात्म- पुरुषाय नमः प्रह्वीभावः स्वात्मसमर्पणमस्तु । कीदृशाय रुचाय रोचतेऽसौ रुचस्तस्मै दीप्यमानाय । 'इगुपध' ( पा० सू० ३।१।१३५ ) इति कप्रत्यये रूपम् । पुनः कीदृशाय? ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्यापत्य ब्राह्मिहिरण्यगर्भपुत्रस्तस्यै ब्रह्मावयव- भूताय वा नमः, कारणभूतास्वप्सु हिरण्यगर्भतेजोनिक्षेपेण ब्रह्माण्डस्य ब्रह्माण्डाच्चादित्यस्याविर्भावश्रवणात् । 'रुचं ब्राह्मं जनयन्त देवा अग्रे तदब्रुवन् ॥ यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात् तस्य देवा असन् वशे । ' ( वा ० सं० ३१।२१ ) | (रुचं प्रीतिकरं ब्रह्मणोऽपत्यमिव ब्रह्मणः सकाशाज्जात ज्ञान जनयन्तो देवा उत्पादयन्तो विद्वासोऽन्येषा- मग्रे तज्ज्ञानं तज्ज्ञानसाधनं वाऽब्रुवन् उपदिशन्तु च । यस्त्वमुना प्रकारेण तद्ब्रह्म ब्राह्मणो विद्यात् पश्चात्तस्यैव ब्रह्मविदो ब्राह्मणस्य देवा इन्द्रियाणि वशे आसन् भवन्ति नान्यस्य' ( १० १४७ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् ॥ तत्रापीदमुच्यते- ब्रह्मणोऽपत्यमिवेत्यादिना गौणार्थतैवास्य व्याख्यानस्य सिद्धयति न मुख्यार्थता | रुचिकरब्रह्मज्ञानस्योत्पादन मप्युपदेशे-नैव सम्भवति, नह्युपदेशादम्यो ज्ञानोत्पादनप्रकारः श्रूयते स्मर्यते वा युष्माभिः । तेन जनयन्तोऽब्रुवन्नित्यन्यतरस्य वैयर्थ्यमेव स्यात् । कर्मिणां योगिनां चापीन्द्रियाणि वशे भवन्त्येव, सर्वेषामेव कृते दमस्य विधानात् । तस्मादनेवंविदो देवा इन्द्रियाणि वशे न भवन्तीत्यपि रिक्तं वचः । यहाँ कहा गया है कि यह प्रजापति आदित्य के रूप में प्रकाशित होता है । पुराण प्रभृति मे यह प्रसिद्ध है कि रात्रि वेला मे असुरो का प्राधान्य रहता है और दिन में सूर्योदय के बाद देवताओ का प्राधान्य हो जाता है । यह आदित्य सब कार्यों में अग्नि, इन्द्र प्रभृति पुरोगामी देवताओ के आगे आगे वर्तमान रहता है । आदित्य इन्द्र के रूप में देवताओ का पुरोहित और ब्रह्म के रूप में प्रथम उत्पन्न माना जाता है । अथवा आदित्य प्रथम इस लिये माना जाता है कि १२ आदित्यो में विष्णु का प्राधान्य है । यह विष्णु देवताओ के सभी कार्यों में आगे आगे रहता है, यह बात पुराणादि ग्रन्थों में प्रसिद्ध ही है । देवताओ के कार्य को पूरा करने के लिये ही राम, कृष्ण, वामन आदि के रूप में विष्णु अवतार लेते है । जो आदित्य के रूप में सभी देवताओ से पहले उत्पन्न हुआ, उस आदित्य को, परमात्मा परम पुरुष को मेरा नमस्कार, विनम्रता निवेदन, आत्मसमर्पण प्राप्त हो । वह परम पुरुष कैसा है? वह देदीप्यमान है । ' रुच' शब्द ' इगुपध ० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से क प्रत्यय होने पर बनता है । पुनः वह पुरुष कैसा है? वह ' ब्राह्मि' है, अर्थात् ब्रह्म हुआ हिरण्यगर्भ, उस हिरण्यगर्भ का यह पुत्र 'ब्राह्मि' कहलाता है । उस हिरण्यगर्भ के पुत्र अथवा ब्रह्म के अवयवभूत उस आदित्य को मेरा नमस्कार पहुचे । कारणभूत जल में हिरण्यगर्भ के तेज के आधान से ब्रह्माण्ड को और ब्रह्माण्ड से आदित्य की उत्पत्ति शास्त्रो में बताई गई है । उसी की ओर इस मन्त्र में इङ्गित है । ' (रुचं ब्राह्मं ० ) जो ब्रह्म का ज्ञान है, वही अत्यन्त आनन्द करने वाला और उस मनुष्य को उसमें रुचि बढाने वाला है । जिस ज्ञान को विद्वान् लोग अन्य मनुष्यों के मागे उपदेश करके उनको आनन्दित कर देते है । ( यस्त्वैवं ब्राह्मणो० ) जो मनुष्य इस प्रकार से ब्रह्म को जानता है, उसी विद्वान् के सब मन आदि इन्द्रियाँ वश में हो जाती है, अन्य की नही' ( पृ० १४७ ) यह है दयानन्द की व्याख्या | इस पर हमारा यह कहना है -'ब्राह्म' पद का 'ब्रह्म के पुत्र के समान' यह अर्थ गोणी वृत्ति से ही प्राप्त होगा, मुख्य अभिधा वृत्ति से नही । रुचिकर ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति उपदेश से ही हो सकती है, उपदेश के सिवाय ज्ञान की उत्पत्ति का दूसरा कोई उपाय न तो कहीं श्रुति में सुना गया है, न स्मृति में स्मरण किया गया है और न कोई आप ही इस तरह का कोई स्वतन्त्र उपाय मानते है । इस तरह से ज्ञान की उत्पत्ति और उपदेश में से एक की व्यर्थता माननी पडेगी । कर्मयोगी तथा योगाभ्यासी की भी इन्द्रियां वश में रहती है, क्योंकि दम का विधान शास्त्रों में सभी के लिये किया जाता है । इसलिये जो ब्रह्मवेत्ता नही है, उसके देव अर्थात् इन्द्रियाँ वश में नहीं रहती, यह कहना गलत है ।