वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 401–410

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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वेदार्थ पारिजातः १३०१ तव गुणा आकर्षणविकर्षणादयो विश्वा सर्वाणि सर्वान् लोकान् आकर्षणेन येमिरे नियमेन धारयन्ति, अत: कारणात् सर्वे लोकाः स्वां स्वां कक्षां विहायेतस्ततो नैव विचलन्ति' ( पृ ० १५५ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानं कुशकाशावलम्बन मात्रम्, प्रकृते हरिपदस्याश्वे प्रवृत्तत्वात् । इन्द्रपदेनापि मघवेन्द्रो ग्राह्यः, ऐन्द्रसूक्तस्य प्रकृतत्वात् । किश्वात्र 'हरी ' इति द्विवचनं कर्तृपदं ' वावृधाते' इत्यनेनान्वितत्वात् शान्ताकाङ्क्षम् । पुनश्च तद्बहुवचनेन विपरिणमय्य येमिरे इत्यनेन सम्बन्धापादनं बलात्कार एव । वस्तुतस्तु ते त्वया भुवनानि नियम्यन्ते स्मेत्येवार्थ । यदा हरी ववृघाते तदा । हर्यतेत्यपि ' हर्य गतिकान्त्योः' इति धातोर्निष्पन्नः । अस्मिन्नेव सूक्ते २६ मन्त्रे वृत्रवत्रिशब्दाभ्यां २७ मन्त्रे 'यदा ते विष्णु- रोजसा त्रीणि पदा विचक्रमे । आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः ॥ ' (ऋ० स० ८/१२/२७ ) इतीन्द्रानुज विष्णुसम्बन्धाद् इन्द्रो गम्यते, ववक्षतुरिति वहधातुप्रयोगाच्चाश्वावेवात्र हरी ग्राह्यौ । मन्त्रार्थस्तु - हे इन्द्र, त्वदीयौ हर्यता हर्यती कान्तो कान्तिमन्तो कमनीयो वा । हरी हरणशीलावश्व दिवे दिवे प्रतिदिवसं यदा यस्मिन् काले ववृधाते प्रवृद्धौ बभूवतुः, आदित् अनन्तरमेव त्वया विश्वा विश्वानि सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि येमिरे नियम्यन्ते स्म । 'यदा ते मारुतीविशस्तुभ्यमिन्द्र नियेमिरे । आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ॥ ' (ऋ० स ० ८| १२| २ ९) । 'हे पूर्वोक्तेन्द्र, यदा ते तब मारुतीर्मारुत्यो मरणधर्माणो मरुत्प्रधाना वा विशः प्रजास्तुभ्यं नियेमिरे तवाकर्षणधारण- नियम प्राप्नुवन्ति, तदैव सर्वाणि विश्वानि भुवनानि स्थिति लभन्ते, तथा तवैव गुणैर्नियेमिरे आकर्षणनियमं प्राप्नुवन्ति सन्ति, अतः सर्वाणि भुवनानि यथाकक्षं भ्रमन्ति वसन्ति ' ( पृ० १५६ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । अत्रोच्यते - प्रजा मरणधर्माणो मरुत्प्रधाना विश: । ' येमिरे' इत्यस्य आकर्षणविकर्षणनियम प्राप्नुवन्तीति कथमर्थः? उपरमार्थस्य यमेरुप- सर्गपूर्वकस्यापि नार्थे स्वैरिता युक्ता । तथैव भुवनानि येमिरे स्थिति लेभिरे इत्यप्यर्थः कथमिति चिन्त्यम् । तवैव गुणैराकर्षणनियमं प्राप्नुवन्ति सन्तोत्यप्युदक्षरमेव । उनसे सब लोको का दिन- दिन और क्षण-क्षण में धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है । इस हेतु से सब लोक अपनी-अपनी ही कक्षा मे चलते रहते हैं, इधर-उधर नही विचल सकते ' ( पृ० १५५ ) | दयानन्द की यह व्याख्या कुश और काश का सहारा लेने के समान । प्रकृत मन्त्र में हरि पद की प्रवृत्ति अश्व के अर्थ मे हुई है । इन्द्र पद से भी देवराज इन्द्र का ग्रहण होता है, क्योकि प्रकृत सूक्त इन्द्र संबन्धी ही है । यहाँ 'हरी' यह द्विवचनान्त कर्ता है, इसका संबन्ध 'वावृधाते ' क्रिया से होने से इसकी आकाक्षा शान्त हो जाती । फिर भी दयानन्द भाष्य में द्विवचन को बहुवचन मे परिवर्तित कर उसका ' येमिरे' पद से अन्वय करना जबर्दस्ती ही है । वास्तव में यहाँ अर्थ यह होगा कि तुम सारे जगत् का नियमन करते हो, जब कि तुम्हारे घोडे आगे बढते हैं । ' हर्यता' शब्द गति और कान्ति अर्थ वाली ' हर्य ' धातु से बनता है । इसी सूत्र के २६वे मन्त्र में आये वृत्र और वज्रि शब्दो से और २७वें मन्त्र में भी इन्द्र के अनुज विष्णु के संबन्ध से यहाँ इन्द्र का ही संबन्ध बैठता है । 'ववक्षतु:' इस पद में 'वह' धातु का प्रयोग होने से 'हरी ' पद से घोड़ो का ही ग्रहण होता है । मन्त्र का वास्तविक अर्थ यह है—हे इन्द्र, तुम्हारे कान्तिमान् अथवा सुन्दर वहनशील दो घोडे प्रतिदिन जिस समय बढ चलते है, तभी तुम सारे भुवनों को और उसमे रहने वाले प्राणियों को ठीक तरह से अपने नियन्त्रण में लेने में समर्थ होते हो । ' यदा ते मारुती० ' इस मन्त्र की दयानन्द ने यह व्याख्या की है -' इस मन्त्र में भी आकर्षण विद्या है । हे परमेश्वर, आपकी जो प्रजा, उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय धर्मवाली है, तथा जिसमें वायु प्रधान है, वह आपके आकर्षण आदि नियमो से तथा सूर्यलोक के आकर्षण से भी स्थिर हो रही है । जब इन प्रजाओं को आपके गुण नियम में रखते हैं, तभी भुवन अर्थात् सब लोक अपनी- अपनी कक्षा में घूमते हुए रह रहे हैं' ( पृ० १५६ ) । इस पर हमारा कहना है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय धर्मवाली प्रजा, जिसमें कि वायु प्रधान है, वह आपके आकर्षण -विकर्षण नियम से स्थिर है, यह अर्थ आप किन शब्दो से निकालते है । ' येमिरे' पद को तो उपराम अर्थ वाली ' यम ' धातु से उप उपसर्ग लगाकर बनाया जाता है । उससे इस तरह का अर्थ जबर्दस्ती नही निकाला जा सकता । उसी तरह से ' भुवनानि येमिरे' का अर्थ सब लोक अपनी- अपनी कक्षा में घूमते हुए १ रह रहे हैं, यह करना भी विचारणीय है । तुम्हारे ही गुणों के कारण ये आकर्षण के नियम का पालन करते हैं, यह कहना भी अक्षरार्थ के अनुकूल नही है । #

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वेदार्थपारिजातः १३०२ सायणादिसम्मतस्त्वय मन्त्रार्थ: - हे इन्द्र, ते तुभ्य त्वदर्थं मारुत्यो मरुद्रपाः प्रजाः, ते त्वदीया विशः, यदा यस्मिन् काले भूतजातानि नियेमिरे नियच्छन्ति, आदित् अनन्तरमेव ते त्वया भुवनानि येमिरे नियम्यन्ते स्म । सिद्धान्त- रीत्या इन्द्रो देवेश्वरः, मरुद्गणास्तत्प्रजास्थानीयाः । दितेर्गर्भस्य सप्तसप्तघा खण्डितत्वात् तत एकोनपञ्चाशत्संख्याका मरुतो जाताः । ते चेन्द्रस्य सहकारिणो जाताः । अत एव यथा तदीययोर्हर्योरभिवृद्धये न्द्रेण भुवनानि नियम्यन्ते, तथैव तदीयसहकारिणो मरुतो यदा भूतानि नियच्छन्ति तदैवेन्द्रेण लोका नियम्यन्ते । मरुतां सर्वान्तश्चारित्वात् सर्वनियामकत्व- मपि प्रसिद्धमेव । सहकारिसाहाय्येनेश्वराणां नियामकत्वमपि प्रसिद्धमेव । तथा चात्रापि न सूर्यचन्द्रादीनामाकर्षण- विकर्षणादिभिर्धारणादिकं सिद्धयति । 'यदा सूर्यममुं दिवि शुक्र ज्योतिरधारयः । आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे || ' (ऋ ० सं ० ८।१२।३० ) । हे परमेश्वर, अमं सूर्यं भवान् रचितवानस्ति, यद्दिवि द्योतनात्मके त्वयि शुक्रमनन्त सामथ्यं ज्योतिः प्रकाशमयं वर्तते, तेन त्वं सूर्यादिलोकानधारयः धारितवानसि । तदनन्तरं विश्वा भुवनानि सर्वाणि भुवनानि सूर्यादयो लोका अपि येमिरे तदाकर्षण नियमेनैव स्थिराणि सन्ति । अर्थाद् यथा सूर्याकर्षणेन पृथिव्यादयो लोकास्तिष्ठन्ति तथा परमेश्वर- स्याकर्षणेन सूर्यादयः सर्वे लोका नियमेन सह वर्तन्ते' ( पृ ० १६५ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । अत्रापि रचितवानिति क्रियापदं काल्पनिकमेव । भगवदीयं प्रकाशमयं सामथ्यं भगवत्येव सुतरां तिष्ठति, दिवि तद्धारणोक्तिरपार्थेव 1। किव, यथा परमेश्वरस्याकर्षणेन सूर्यादयस्तिष्ठन्ति 2 तथैव तेनैव पृथिव्यादयोऽपि स्थास्यन्त्येव 1। कि सूर्यगताकर्षणकल्पनया? वचनं तु किमपि तादृशं नैवोपलभ्यते, येन त्वदुक्तं सिद्धयेत् । मन्त्रार्थस्तु हे इन्द्र, अमु विप्रकृष्ट शुक्र निर्मल ज्योतिः द्योतमान सूर्य सर्वस्य प्रेरक शोभनवीर्य वादित्यं दिवि द्युलोके जगतः प्रकाशनाय यदा यस्मिन् काले अधारयः धारितवानसि, अनन्तरमेव त्वया विश्वा भुवनानि येमिरे इस मन्त्र का सायण आदि का किया गया अर्थ यह है—हे इन्द्र, तुम्हारे लिये मरुद् देवता रूप तुम्हारी प्रजा सहायक के रूप में उपस्थित होकर जिस समय सब प्राणियो का नियमन करने लगती है, उसके बाद ही तुम इन भुवनो पर शासन करने में समर्थ होते हो । वैदिक पद्धति के अनुसार इन्द्र देवराज है, मरुद्गण उसकी सहायक प्रजा है । जैसा कि राजा के कर्मचारी उसको सहायता करते है, वैसे ही मरुद्गण इन्द्र की सहायता मे लगे रहते है । दिति के गर्भ को इन्द्र ने सात बार काटा था । पुनः उसमे से प्रत्येक टुकड़े के पुनः सात -सात टुकड़े किये थे । इसी से ४ ९ प्रकार के मरुद्गणो की उत्पत्ति हुई थी । ये सब इन्द्र के सहायक हो गये थे । इसीलिये जैसे अपने घोडो की सहायता से इन्द्र सब लोकों पर अपना नियन्त्रण स्थापित करता है, उसी तरह से अपने सहायक मरुद्गणों की मदद से भी वह प्रजा पर नियमन करता है । मरुद्गण सब प्राणियो के अन्दर भी संचरण करते रहते है, अतः उनकी सहायता से यह कार्य भलीभांति होता रहता है । अपने कर्मचारियो की सहायता से ही राजा प्रजा पर नियन्त्रण कर सकता है, यह प्रसिद्ध बात है । इस तरह से इस मन्त्र में भी सूर्य- चन्द्र आदि के आकर्षण-विकर्षण की कोई चर्चा नही सिद्ध हो पाती । 'यदा सूर्यमसुं' इत्यादि मन्त्र की दयानन्द संमत व्याख्या यह है - 'इस मन्त्र में भी आकर्षण विचार है । हे परमेश्वर, जब उन सूर्यादि लोको को आपने रचा, वे आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं और आप अपने अनन्त सामर्थ्य से उनको धारण कह रहे हो, इसी कारण से सूर्य और पृथिवी आदि लोकों और अपने स्वरूप को धारण कर रहे है । इन सूर्य आदि लोकों का सब लोकों के साथ आकर्षण से धारण होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर ही सब लोकों का आकर्षण और धारण कर रहा है' ( पू० १५६ ) । यहाँ भी 'रचितवान्' यह क्रिया मूल मन्त्र में न होकर दयानन्द की कल्पना से पैदा हुई है । भगवान् का प्रकाशमय सामर्थ्य निश्चित रूप से भगवान् में ही रहेगा, आकाश में उसके रहने की बात व्यर्थ है । जब परमेश्वर की आकर्षण सामर्थ्य से सूर्य प्रभृति ठहरे रहते हैं, तो उसी सामर्थ्य से पृथिवी प्रभृति भी स्थिर रहेंगे, फिर सूर्य के आकर्षण की कल्पना व्यर्थ है । आपकी बात का समर्थन करने वाला कोई चचन वेद में उपलब्ध नही है । वस्तुतः मन्त्र का अर्थ यह है— हे इन्द्र, बहुत दूर चमक रहे निर्मल प्रकाशवाले, सब के लिये प्रेरणादायक उत्तम सामर्थ्य चाले इस सूर्य को जब आपने सारे जगत् में प्रकाश को फैलाने के लिये आकाश में स्थापित किया, उसके बाद ही तुम सारे भुवनों तथा •

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वेदार्थपारिजात। १३०३ नियम्यन्ते स्म । सूर्यस्यापि सहकारित्वात् तस्य दिवि धारणेन विश्वनियन्त्रणं युज्यत एव सूर्यस्य देवबलवर्धकत्वात् । 'व्यस्तम्नाद्रोदसी मित्रो अद्भुतोऽन्तर्वावदकृणोज्ज्योतिषा तमः । विचर्षणीव धिषणे अवर्तयद् वैश्वानरो विश्वमधत्त वृष्ण्यम् ॥ ' (ऋ ० सं० ६।८१३ ) । 'हे परमेश्वर, तव सामर्थ्येन वैश्वानरः पूर्वोक्तः सूर्यादिलोकः, रोदसी द्यावापृथिव्यो भूमिप्रकाशौ व्यस्तम्नात् स्तम्भितवान् । अतो भवान् मित्र इव सर्वेषां लोकानां व्यवस्थापकोऽस्ति । अद्भुत आश्चर्यस्वरूपः सवित्रादिलोको ज्योतिषा तमोऽन्तः करोति तिरोहित निवारितं तमः करोति, वावत् तथैव धिषणे धारणकत्र्य द्यावापृथिव्यो धारणाकर्षणे व्यवर्तयद् विविधतयेतयोर्वर्तमानं कारयति 1। कस्मिन्निव? चर्माण्याक- षितानि लोमानीव । यथा त्वचि लोमानि स्थितानि आकर्षितानि भवन्ति तथैव सूर्यादिलोकाकर्षणेन सर्वे लोकाः स्थापिताः सन्तीति विज्ञेयम् । अतः किमागतम्? वृष्ण्यं वीर्यवद् विश्वं सर्व जगच्च सूर्यादिलोको धारयति । सूर्यादेर्धारणमीश्वरः करोति' ( पृ ० १५७ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । तत्राप्युच्यते --- वैश्वानरः सूर्यलोक इति नह्यनुन्मत्तो वक्तुमर्हति । ननु 'विश्वानरस्यादित्यस्य तस्य शवसो महतः' (नि० १२ २१ ) इति निरुक्ते विश्वानरशब्दस्यादित्यपरत्वमस्त्येवेति चेन्न तत्रादित्यपरत्वेऽपि प्रकृते वैश्वानर-, ' ' ( ) शब्दस्यादित्यपरत्वे मानाभावात् विश्वानरस्य वस्पतिम् ऋ ० सं ० ८१६८१४ इति मन्त्रे पृश्निशब्देनेन्द्रवाचिना व्यपदेशात् । षष्ठ्यन्तस्य विश्वानरशब्दस्य द्युस्थानवाचित्वे सामर्थ्यमुपपद्यत इति दुर्गाचार्यः । अतो रजः शब्दो राजसि प्रसिद्धोऽपि यथा आकृष्णेन रजसेत्यत्र न गृह्यते, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । हे परमेश्वर, तव सामर्थ्येनेत्यपि मन्त्रार्थ + बहिर्भूतम्, मन्त्रे तादृशपदाभावात्, वैश्वानराग्नेरेवात्र स्तूयमानत्वात् । परमेश्वरस्यात्र लोकव्यवस्थापकत्वमपि नोक्तम्, परमेश्वरस्याप्रकृतत्वात् ॥ धिषणे धारणकत्र्य लोमानोत्यपि स्वाभ्यूहितमेव, मूले लोमपदस्य शशविषाणायितत्वात् । उनमें रहने वाली सारी प्रजा पर नियन्त्रण स्थापित करने में समर्थ हो सके हो । सूर्य भी इन्द्र का सहायक है । सूर्य देवताओ के बल को बढ़ाने वाला है, अतः इसको आकाश में स्थापित कर इन्द्र का प्रजा पर नियन्त्रण करना उचित हो माना जायेगा । 'व्यस्तम्नाद् रोदसी ० ' इत्यादि मन्त्र का दयानन्द ने यह अभिप्राय बताया है -' इस मन्त्र मे भी आकर्षण विचार है । हे परमेश्वर, आपके प्रकाश से ही वैश्वानर अर्थात् सूर्य आदि लोको का धारण और प्रकाश होता है । इस हेतु से सूर्य आदि लोक भी अपने -अपने आकर्षण से अपना और पृथिवी आदि लोको को भो धारण करने में समर्थ होते है । इस कारण से आप सब लोको के परम मित्र और स्थापन करने वाले है । आपका सामर्थ्य अत्यन्त आश्चर्य रूप है । सविता आदि लोक अपने प्रकाश से अन्धकार को निवृत्त कर देते हैं, तथा प्रकाशरूप और अप्रकाशरूप इन दोनों लोको का समुदाय इनके धारण और आकर्षण के व्यवहार का विषय बनता है । अर्थात् इससे नाना प्रकार का व्यवहार सिद्ध होता है । वह आकर्षण किस तरह का है? जैसे कि त्वचा मे लोम का आकर्षण होता है, वैसे ही सूर्य आदि लोको के आकर्षण के साथ सब लोकों का आकर्षण हो रहा है और परमेश्वर भी इन सूर्य आदि लोको का आकर्षण कर रहा है' (पृ० १५७ ) । इस पर हमारा यह कहना है --पागल आदमी ही वैश्वानर को सूर्यलोक मान सकता है । यदि यह कहा जाय कि निरुक्त में वैश्वानर का अर्थ मादित्य किया गया है, तब आप ऐसी बात क्यो कहते है? तो इसका उत्तर यह है कि निरुक्त में भले ही प्रसंगवश कही वैश्वानर का अर्थ आदित्य किया गया हो, किन्तु प्रस्तुत मन्त्र में तो वैश्वानर पद का अर्थ आदित्य करने में कोई प्रमाण नही है । 'विश्वानरस्य वस्पतिः ' इस मन्त्र में इन्द्रवाची पतिशब्द के साथ इसका उल्लेख हुआ है । अतः दुर्गाचार्य का कहना है कि षष्ठी विभक्ति वाले विश्वानर शब्द का स्थानवाचक आदित्य को बोधित करने का सामर्थ्य हो सकता है । इसलिये रज शब्द यद्यपि धूल अर्थ में प्रसिद्ध है, किन्तु इसका यह अर्थ ' आकृष्णेन रजसा' इस मन्त्र में नहीं ग्रहण किया जाता । इसी तरह से विश्वानर शब्द का आदित्यपरक अर्थ भी यहाँ नहीं दिया जा सकता । है परमेश्वर, तुम्हारे सामर्थ्यं से, यह अर्थ भी मन्त्राक्षरो से बाहर का है, क्योकि मन्त्र में इस अर्थ के. arre va विद्यमान नही है । वस्तुतः इस मन्त्र में वैश्वानर पद से अग्नि का ही बोध होता है । परमेश्वर लोक की सब तरह की व्यवस्था करता है, यह बात भी मन्त्र में नही कही गई है । मन्त्र में परमेश्वर का कोई प्रसंग भी नहीं है । 'विषणे' पद का अर्थ 'धारण करने

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वेदार्थपारिजातः १३०४ लोमपदाभावादेव चर्मणि स्थितानि लोमानीत्यपि कल्पनामात्रम् । सूर्यादिलोकः सर्वं जगद् धारयति तस्य धारण-मीश्वरः करोतीत्यपि मन्त्रेऽस्मिन् खपुष्पायितमेव, तादुगर्थबोधकपदाभावात् । मन्त्रार्थस्त्वेवं ज्ञातव्यः -मित्रः मित्रभूतः सर्वेषाम् अद्भुतो महान् आश्चर्यभूतो वा वैश्वानरोऽग्निः रोदसी अन्तर्वावत्द्यावापृथिव्यो व्यस्तम्नात् अधः पतनात् स्वस्वस्थाने स्थापितवान् तथा ज्योतिषा प्रकाशेन तमोऽन्धकारम् अन्तर्हित तिरोहितमकृणोत् अकरोत् वा गतिगन्धनयोरिति धातोर्यङ्लुगन्तस्य रूपम् । किञ्च, स एव वैश्वानरः धिषणे घारयित्र्यो द्यावापृथिव्यौ चर्मणीव यथा कश्चिच्चर्मकार्यकरः चर्मणी द्वे चर्मणी शोषणार्थं प्रसारयति तथा वि अवर्तयत् विवृते विस्तृते अकरोत् । किं बहुनायं वैश्वानरोऽग्निः विश्व सवं वृष्ण्यं वीर्यमाधत्त धत्ते धारयति । इद सप्तर्चमष्टम सूक्तं भारद्वाजस्याषं वैश्वानराग्निदेवताकम् । महाभाग्याद्देवतायाः वैश्वानरस्य सर्वेषा मित्रभूतत्वमाश्चर्यमयत्वम्, रोदस्योर्धारकत्वं तमस्तरोधायकत्व चर्मवत् द्यावापृथिव्योः प्रसारकत्व सर्वबलधारकत्वं च नानुपपन्नम्, अग्नेर्दाढच हेतु-त्वाद रोदस्योर्घारकत्वं वीर्यबलधारकत्व अग्नेरूष्मायां सत्यामेव बलवत्सु बलदर्शनात् । प्रसारण हेतुत्व ज्योतिष्मत्वाच्च तमोनिवारकत्वम् । स च महान् देवोऽग्निर्यस्य परमेश्वरस्याशो भवति तस्य लोकोत्तरमाहात्म्य नु सुतरा सिद्धयति । यच्च – ' आकृष्णेन रसजा वर्तमानो निवेशयन्नमृत मत्यं च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥ ' ( वा० स ० ३३ | ४ ३ ) | 'अत्राप्याकर्षणाविद्यास्तीति । सविता परमात्मा सूर्यलोको वा रजसा सर्वलोकैः सह आकर्षणगुणेन सह वर्तमानोऽस्ति । कथभूतेन गुणेन हिरण्ययेन ज्योतिर्मयेन । पुनः कथभूतेन गुणेन रमणानन्दादि- } व्यवहारसाधकज्ञानतेजोरूपेण रथेन । किं कुर्वन् मत्यं मनुष्यलोकममृत सत्यविज्ञान किरणसमूह वा स्वकक्षायां निवेशयन् वाले लोग' करना भी आपको मनमानी ही है । मन्त्र में लोम पद के अभाव में इस तरह की कल्पना खरहे के सीग की कल्पना की तरह मानी जायेगी । त्वचा में लोम का आकर्षण होता है, यह भी कोरी कल्पना है । सूर्य आदि लोक सारे जगत् को धारण करते है और इनका भी धारक ईश्वर है, यह अर्थ भी मन्त्र की दृष्टि से आकाश के पुष्प की कल्पना के सदृश है, क्योकि इस अर्थ को बताने वाले पद मन्त्र में विद्यमान नही है । मन्त्र का वास्तविक अर्थ इस प्रकार से है – सभी प्राणियो का मित्र अर्थात् सहायक, महान् आश्चर्यजनक स्वभाव वाला यह वैश्वानर अग्नि आकाश और पृथिवी को अपने अपने स्थान पर रोके हुए है । तथा अपने प्रकाश से अन्धकार को तिरोहित कर रखा है । 'वावत्' यह पद गति और गन्ध अर्थ वाली 'वा' घातु के यङ्लुगन्त प्रत्यय का रूप है । साथ ही यह अग्नि आकाश और पृथिवी को उसी तरह से फैलाये हुए है, जैसे कि कोई चर्मकार चमडे को सुखाने के लिये फैला देता है । इस अग्नि का अधिक माहात्म्य क्या कहा जाय? यह वैश्वानर अग्नि ही सारे वीर्य को धारण करता है । यह सात ऋचाओ वाला आठवा सूक्त भरद्वाज ऋषि द्वारा परिदृष्ट है और वैश्वानर अग्नि इसका देवता है । देवता महान् ऐश्वर्य सम्पन्न होते है । अतः वैश्वानर अग्नि सभी का सहायक हो, उसका स्वरूप अथवा कार्य आश्चर्यजनक हो, यह आकाश और पृथिवी का धारक हो, अन्धकार का नाश करने वाला हो, चमडे के समान आकाश और पृथ्वी " को फैलाता हो, सब तरह के बल का धारक हो तो इसमे क्या अनुपपत्ति हो सकती है? अग्नि से दृढता प्राप्त होती है । आकाश और पृथिवी की धारकता और वीर्य एवं बल की आधायकता अग्नि की गरमी के कारण ही होती है । यह देखा जाता है कि बलवान् के शरीर में गरमी अधिक रहती है । अग्नि प्रसारण का भी कारण है और अपने प्रकाश से अन्धकार का निवारक भी है । यह महान् देवता अग्नि जिस परमेश्वर का अंश है, उसका लोकोत्तर माहात्म्य तो स्वतः सुतरा सिद्ध हो जायेगा । 'आकृष्णेन० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने इसका यह अभिप्राय बताया है--' इस मन्त्र में भी आकर्षण विद्या है । सविता जो परमात्मा, वायु और सूर्य लोक है, वे सब लोकों के साथ आकर्षण, धारण गुण से सहित रहते है । सो हिरण्मय अर्थात् अनन्त बल, ज्ञान और तेज के साथ 'रथेन' आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करने के योग्य ज्ञान और तेज से युक्त है । इसमें परमेश्वर सब जीवों के हृदयों में अमृत अर्थात् सत्य विज्ञान को सदैव प्रकाशित करता है और सूर्य लोक भी रस आदि पदार्थों को मर्त्य अर्थात् मनुष्य लोक में प्रवेश कराता और सब लोको को व्यवस्था से अपने अपने स्थान में रखता है । इसी तरह परमेश्वर धर्मात्मा ज्ञानी लोगो

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वेदार्थपारिजात १३०५ व्यवस्थापयन् सन्, तथा मत्यं पृथिव्यात्मक लोकं प्रत्यमृतं मोक्षम्, ओषध्यात्मकं वृष्ट्यादिकं रसं च प्रवेशयन् सूर्यो बर्तमानोऽस्ति । स च सूर्यो देवो द्योतनात्मको भुवनानि सर्वान् लोकान् धारयति, तथा पश्यन् दर्शयन् सन् रूपादिकं विभक्त याति प्रयातीत्यर्थ । अस्मात् पूर्वमन्त्राद् द्युभिरक्तुभिरिति पदानुवर्तनात् सूर्यो द्युभिः सर्वैदवसंरक्तुभिः सर्वाभी रात्रिभिश्चार्थात् सर्वाल्लोकान् प्रतिक्षणमाकर्षतीति गम्यते । एव सर्वेषु लोकेष्वात्मिका स्वा स्वाप्याकर्षणशक्तिरस्त्येव । तथानन्ताकर्षणशक्तिस्तु खलु परमेश्वरेऽस्तीति मन्तव्यम् । रजो लोकाना नामास्ति । 'लोका रजासि' ( नि० ४।१ ९ ) इति निरुक्तवचनात् । 'रथो रंहतेर्गतिकर्मणः स्थिरतेर्वा स्याद्विपरीतस्य रममाणोऽस्मिस्तिष्ठतीति वा, रयतेर्वा, रसतेर्वा ' ( नि ० ९।११ ), 'विश्वानरस्यादित्यस्य' (नि० १२।२१ ), ( पृ० १५७ - १५८ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । तदपि विशृङ्खलमेव, ' व्यवहिताश्च' ( पा० सू० १ | ४ | ८२ ) इति पाणिनीयाभिधानानुसारेण आङपसर्गस्य वर्तमान इति क्रियापदेन सम्बन्धात्, कृष्णेनेत्यसम्बन्धात्, आकर्षणार्थबोधकत्वाच्च । सविता परमात्मा सूर्यलोको वेति निर्मूलम्, सवितृदेवस्यात्र स्तूयमानत्वात् । रजःशब्दस्य लोकवाचकत्वमपि प्रकरणानुसारेणैव भवति, न तु स्वेच्छ्या, रजःशब्दस्यानेकार्थतास्वीकारात् । 'ज्योती रज उच्यते, उदक रज उच्यते, लोका रजास्युच्यन्ते, असृगहनी रजसी उच्येते, रजासि चित्रा विचरन्ति तन्यव इत्यपि निगमो भवति' ( नि० ४।१० ) इत्यादिवचनेभ्यः । 'त्वया दृढानि सुक्रतो रजांसि' इति च । तच्च रज्जतेर्योगाद् ज्योतिः स्वेन प्रकाशेन द्रव्याणि रञ्जयति, तेन रज उच्यते । उदकं च स्नेहाख्येन गुणेनानुरञ्जयति । 'रजसश्च नेता' (ऋ० सं० १० ८| ६ ) । लोकेष्वपि प्राणिनो रज्यन्त इति लोका 'राजांस्युच्यन्ते, ' असृगहनी रजसी उच्येते रञ्जकत्वात्' ( नि० २।२१ ) इति निरुक्तवचनात् ॥ 'अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च' विवर्तते रजसी वेद्याभि:' (ऋ० सं० ६।९ ।१ ) अत्र कृष्णमहः रात्रिः, अर्जुन शुक्लमहर्दनम् । अत्र च रजसेत्येक-वचनम्, अत एव रात्रिपरं रजः । को अमृतरूप मोक्ष देता और सूर्यलोक भी रसयुक्त औषधि और वृष्टि के अमृतरूप जल को पृथिवी में प्रविष्ट करता है । परमेश्वर सत्य- असत्य का प्रकाश और सब लोको का प्रकाश करके सबको जनाता है, तथा सूर्यलोक भी रूपादि का विभाग दिखलाता है । इस मन्त्र से पहले के मन्त्र में से ' धुभिरक्तुभि: ' इस पद की अनुवृत्ति करने से यह अर्थ निकलता है कि दिन - रात अर्थात् सब समय में सब लोकों के साथ सूर्यलोक का ओर सूर्य आदि लोको के साथ परमेश्वर का आकर्षण हो रहा है । सब लोकों में ईश्वर की ही रचना से अपना अपना आकर्षण है और परमेश्वर की तो आकर्षण रूप शक्ति अनन्त है । यहा लोको का नाम ' रज' है । रथ शब्द के अनेक अर्थ होते है । जिससे रमण और आनन्द की प्राप्ति होती है, उसको रथ कहते हैं । रज और रथ शब्दो के इन अर्थों में प्रयुक्त होने का प्रमाण निरुक्त में बताया है । ऐसे धारण और आकर्षण विद्या को सिद्ध करने वाले मन्त्र वेदो में बहुत है ' ( पृ० १५८-१५९ ) । यह सारी व्याख्या ऊटपटाग है । ' व्यवहिताश्व' इस पाणिनि सूत्र के अनुसार आङ् उपसर्ग का संबन्ध 'वर्तमान ' क्रिया पद से है । 'कृष्णेन' इससे उसका कोई संबन्ध न बन पाने से वह आकर्षण अर्थ का बोधक नही हो सकता । सविता पद का अर्थ परमात्मा या सूर्यलोक कहना भी गलत है, क्योंकि इस मन्त्र में तो सविता देवता की स्तुति की गई है । ' रज' शब्द भी निरुक्त के अनुसार लोक शब्द का वाचक प्रकरण के अनुसार ही हो सकता है, मनमाने तरीके से नही, क्योंकि यह शब्द अनेक अर्थों का वाची होता है और जो शब्द अनेक अर्थों के वाची होते हैं, उनका प्रकरण के अनुसार ही कोई एक अर्थ लिया जाता है । निरुक्त में बताया गया है कि रज शब्द ज्योति, उदक, लोक, असृक् ( रात्रि), दिन आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है । ज्योति को रज इसलिए कहते हैं कि यह अपने प्रकाश से सभी पदार्थों को रंग देता है, जल अपने स्नेह गुण से सबको रंग देता है । लोक को रज इसलिये कहते है कि इसमें प्राणी बड़े आराम से रहते हैं, असृग और अहन् अर्थात् दिन और रात्रि को रज इसलिये कहते हैं कि इनमें सब प्राणी निरन्तर गतिशील अवस्था में अनुरक्त रहते हैं । श्रुति में ' अहस्' शब्द के साथ कृष्ण और अर्जुन शब्द जुडे हुए हैं । इनमें कृष्ण महस् को रात्रि तथा अर्जुन (शुक्ल ) अहस् को दिन कहा जाता है । वे भी रज शब्द से ही जाने जाते है । इस मन्त्र में 'रजसा' पद एक वचन में प्रयुक्त है, अतः कृष्ण रन शब्द से यहाँ रात्रि का ही बोध होगा । १६४

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वेदार्थपारिजातः १३०६ किश्व, त्वयाकर्षणं गुण उच्यते । न च गुणस्य हिरण्यत्व ज्योतिर्मयत्वं वा सम्भवति, गुणे गुणानङ्गी, कारात् । गुणत्वादेव ज्ञानवत्त्वमपि न सम्भवति । अत एव रमणानन्दादिव्यवहारसाधकज्ञानते जोरूपत्वमाकर्षण गुणस्य न सम्भवति । न च ज्ञानरूपमेवाकर्षणमिति वाच्यम्, तथा सति सूर्यादिलोकस्य ज्ञानवत्वेन चेतनत्वापच्या लोकत्न- व्याघातात् । ज्ञानमनधिगतगन्तृ न त्वकृतकर्तृ, तथाऽदर्शनात् । किश्व, रममाणोऽस्मिस्तिष्ठतीति रथो भवति । किञ्च यः शब्दो यस्मिन्नर्थे प्रसिद्ध, तस्मिन्नेव कयाचि- न्निरुक्त्या स शब्दो वर्तत इत्येव निरुक्तस्य कार्यम् । रथशब्दो गमनसाधनविशेषे प्रसिद्धः, तत्र कथं रथशब्दस्य प्रवृत्तिरिति निरुक्त्या प्रदर्श्यते 1। तेन रमणादिव्यवहारहेतुत्वाद् वाहनविशेषे रथशब्दो युज्यते । नहि रमणानन्दादिव्यवहारहेतुत्वेना- कर्षणगुणे रथशब्दस्य प्रवृत्तिः, अन्यथा रमणादिव्यवहारसाधनत्वाद् योषिदादिष्वपि रथशब्दप्रवृत्तिः स्यात् । न च तथेष्यते, शिष्टप्रयोगादर्शनात् । अत एव निरुक्तकारो निरुक्तशब्दस्याविप्रतिपन्नमुदाहरणमपि दर्शयति, यथाऽनुपदमेव रजःशब्दस्य तद्दर्शितम् ॥ ( ९ / ११ ) निरुक्तस्थले 'यज्ञसंयोगाद्राजा स्तुति लभते, राजसंयोगाद् युद्धोपकरणानि तेषां रथः प्रथमगामी भवति' इति युद्धोपकरणभूतस्य रथस्यैव 'रथो रंहतेर्गतिकर्मणः स्थिरतेर्वा स्याद्विपरीतस्य, रममाणोऽ- स्मिस्तिष्ठतीति रमतेर्वा रसतेर्वा इत्यादि निर्वचनम् । तस्माद्रथशब्दस्याकर्षणगुणे योजनमज्ञानविजृम्भितमेव । न चाकर्षणगुणे मनुष्यो रममाणः स्थातुं शक्नोति, गुणस्यामूर्तत्वेन स्थित्याधारत्वायोगात् । एवमेवामृतशब्दस्याप्यर्थान्तर- करणमसङ्गतम् । एवमेव देवशब्दस्य विशिष्टैश्वर्यवद्देवताविशेषार्थपरित्यागोऽपि दोष एव । पश्यन्नित्यस्यापि दर्शयन्नि अपि च, आप आकर्षण को गुण मानते हैं । गुणो में गुण की सत्ता मान्य नहीं है, तब इसमें हिरण्यत्व और ज्योतिर्मयत्व गुण कैसे रह सकते हैं । इसीलिये इसमें ज्ञानवत्त्व भी नही रह सकता । इसीलिये आकर्षण गुण को रमण, आनन्द आदि व्यवहारों के साधक ज्ञान और तेजोरूप भी नही माना जा सकता । आकर्षण को ज्ञानरूप मानने मे यह भी दोष आवेगा कि उस परिस्थिति में सूर्यादि लोक भी ज्ञानरूप होने से चेतन हो जायेंगे और इस तरह से उनमे लोकत्व का व्यवहार न हो सकेगा, क्योकि लोक तो जड ,, होते हैं उनमें रहने वाले प्राणी ही चेतन माने जाते है । अनधिगत वस्तु को अधिगति को ज्ञान कहा जाता है अकृत वस्तु के निर्माण को नही । आनन्दपूर्वक इसमें रहता है, इस व्युत्पत्ति के आधार पर रथ शब्द बनता हैं । जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध होता है, उसी अर्थ में किसी निर्वाचन के आधार पर उस शब्द की निरुक्ति की जाती है•, यही निरुक्त का कार्य है । रथ शब्द जब गमन क्रिया के साधन के रूप में प्रसिद्ध है, तो इस अर्थ में रथ शब्द की प्रवृत्ति कैसे हुई, यही बात निर्वचन के द्वारा समझायी जाती है । इसलिये आनन्दपूर्वक जिससे गमन क्रिया संपन्न हो सकती है, ऐसे वाहन के लिये रथ शब्द का प्रयोग उचित ही माना जायगा । रमण, आनन्द आदि व्यवहारों के कारणभूत आकर्षण गुण में रथ शब्द का प्रयोग कही देखा नही गया । यदि ऐसा मान लिया जाय तब तो रमण आदि व्यवहारों की साधनभूत रमणी में भी रथ शब्द की प्रवृत्ति होने लगेगी । किन्तु ऐसा माना नही जाता, क्योंकि ऐसा कोई व्यवहार शिष्टों में देखा नही गया है । इसीलिये निरुक्तकार निर्वचन के साथ ही निरुक्त शब्द का निर्विवाद उदाहरण भी देते हैं, जैसा कि अभी रज शब्द का उदाहरण दिया गया है । रथ शब्द के प्रसंग में भी निरुक्त में बताया गया गया है कि ' यज्ञ करने से राजा की स्तुति होती है, राजा के साथ युद्ध के उपकरणों की भी स्तुति की जाती है, जिनमें कि रथ का नाम सबसे पहले आता है' । इस तरह से युद्ध के साधन स्वरूप रथ शब्द की ही इस तरह से निरुक्ति वहाँ बताई गई है—गति अर्थ को बताने वाली रंहति धातु से अथवा स्थिरति धातु के वर्णों में व्यत्यय कर रथ शब्द बनाया जाता है । आनन्दपूर्वक इसमें बैठता है, इस निरुक्ति के आधार पर रम धातु से अथवा रस धातु से भो रथ शब्द बन सकता है । इन सब निर्वचनो को देखते हुए रथ शब्द का सम्बन्ध आकर्षण गुण से जोडना अपने अज्ञान को ही उजागर करना है । आकर्षण गुण में मनुष्य आनन्दपूर्वक बैठ नही सकता, क्योंकि गुण तो अमूर्त होते हैं, इनमें बैठने की ? 1जगह कहाँ मिलेगी इसी तरह से अमृत शब्द के अर्थ को बदलना भी असंगत है । देव शब्द का विशिष्ट ऐश्वर्यशाली देवताविशेष ही अर्थ होता है, इसको छोड देना भी गलत बात है । 'पश्यन्' शब्द का अर्थ दिखाते हुए करना निराधार है । इसी तरह से 'यानि

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बदार्थपारिजातः १३०७ त्यर्थकल्पन निर्मूलम् । तथा यातोत्यस्य प्रापयतीत्यर्थोऽपि सदोष एव । 'रथेना देवो याति' इत्यत्र आ इत्यस्याव्याख्यान- मपि दूषणम् । द्युभिरक्तुभिरिति पदद्वय पूर्वमन्त्रे तु नोपलभ्यत इति कुतोऽनुवृत्तिः? भूमिकाखण्डनकारस्तु व्याख्यानेनानेन क्षुब्ध आह—अहो घाष्टयं मुण्डिनः । घाष्टयं वा एतदुच्यते लोकप्रतारकत्वं वा प्रकीर्त्यत, सर्वथापि मौख्यं वा ख्यायेत । वय तु किं वदामः? सर्वत्रापि पाश्चात्यानां प्रभावादेव वेदार्थान्यथाकरणे प्रवृत्तोऽयमिति निश्चीयते । परमेश्वरस्य सर्वधारकत्व तु सर्वास्तिकसम्मतमव । निर्विवादतया च तत् श्रुतिषु स्पष्ट प्रतिपाद्यते । 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापथिव्यौ विघृते तिष्ठतः' (बृ० ३३८ ९ ), 'एष सेतुविधरण एषा लोकानाम- सम्भेदाय' ( बृ ० उ ० ४।४।२२) । मन्त्रार्थस्तु - सविता आदित्यो देवो दानादिगुणकः सर्वप्रसव हेतुत्वाद् हिरण्ययेन ज्योतिर्मयेन रथेन आयाति आगच्छति । किं कुर्वन्? कृष्णेन रजसा रात्रिलक्षणन, रजः शब्दस्यात्र रात्रिपरत्वम्, 'अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च' (ऋ ० स ० ६।९ ।१ ) इत्यादौ तथादर्शनात् । सह आवर्तमानः पुनः पुनभ्रं मणं कुर्वन् । यद्वा मार्गेण आवर्तमानः पुनः पुन- रागच्छन् । अमृतं देवं मत्यं मनुष्यं निवेशयन् स्वस्वव्यवहारे प्रवर्तयन् व्यवस्थापयन् । यद्वा- ' अमृतं मरणरहितं प्राण मत्यं मरणसहितं शरीरं निवेशयन्, ' मर्त्यानि हीमानि शरीराणि अमृतैषा देवता' ( ऐ० ब्रा ० २।१ ) इति श्रुतेः । स सविता भुवनानि लोकान् पश्यन् अवेक्षमाणो ज्योतिर्मयेन रथेनायाति । अमृतं देवादिक मत्यं मनुष्यादिकं च निवेशयन् स्वस्व - क्रिया का अर्थ 'प्राप्त कराता है' करना भी गलत है । 'रथेना देवो' इन पदों में निहित 'आ ' शब्द की दयानन्द ने कोई व्याख्या नही की । उनकी व्याख्या में यह भी एक दोष है । 'धुभिरक्तुभि:' इन दोनो पदो को भी हम इससे पहले के मन्त्र में नही पाते, तब उनकी अनुवृत्ति इस मन्त्र में कैसे होगी? भूमिकाखण्डनकार को इस तरह की ऊलजलूल व्याख्याओ को देखकर परेशान होकर कहना पडता है कि माथा मुड़ा लेने के बाद भी दयानन्द की घृष्टता नही छूटी है । इसको घृष्टता कहा जाय या लोगो को ठगने का व्यापार कहा जाय? अथवा यह सब दयानन्द वे किसी मूर्खता में पड़कर लिख दिया है? हमारा तो यह कहना है कि पाश्चात्यो के प्रभाव मे आकर स्वामी दयानन्द ने इस तरह से वेदो का यह दूसरा ही परम्परा विरुद्ध अर्थ किया है । सभी आस्तिक जन इस बात मे एक मत हैं कि परमेश्वर इस सारे जगत् का आधार है । श्रुतियां विना विवाद के इस बात को स्वीकार करती हैं । 'हे गागि, इस अक्षर ब्रह्म के अनुशासन में यह पृथिवी और आकाश अवस्थित है', ' लोक में अव्यवस्था न फैल जाय अनुशासन भग न हो जाय, इसके लिये यह ब्रह्म सेतु ( बाँध) की तरह है' अर्थात् मजबूत बाँध बँध जाने पर जैसे जल का बहना रुक जाता है, उसी तरह से ईश्वर के अनुशासन में रहकर यह प्रजा नियमित आचरण करती है । इस मन्त्र का अर्थ यथार्थतः इस तरह से किया जाना चाहिये -दान आदि गुण संपन्न सविता अर्थात् आदित्य देवता अपने ज्योतिर्मय रथ में बैठकर हमारे सामने प्रति दिन आता है । आदित्य को सविता इसलिये कहते हैं कि यह सभी वस्तुओं का प्रसव (उत्पत्ति) करने वाला है । सूर्य क्या करता हुआ माता है? वह कृष्ण वर्ण रात्रि के साथ बार-बार भ्रमण करता हुआ आता है । रज शब्द वहीं रात्रि का वाचक है । 'अहश्च कृष्णम्' इत्यादि ऋङ् मन्त्र मे यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । अथवा रज शब्द का अर्थ मार्ग भी कर सकते है । तब इसका अर्थ होगा कि यह सूर्य अन्धकार से भरे मार्ग के बीच में से चल कर बार-बार हमारे सामने याता है । यह आते ही देवताओ और मनुष्यों को अपने - अपने काम में लगा देता है । अथवा इसका यह अर्थ भी किया जा सकता है कि यह आदित्य अमृत अर्थात् मरण ( मृत्यु ) से रहित प्राण को और मरणशील शरीर को अपने-अपने व्यापार में लगा देता है । ऐतरेय ब्राह्मण में शरीर को मर्त्य शब्द से और प्राण को अमृत शब्द से अभिहित किया गया है । वह सविता, सूर्य इन सब लोको का निरीक्षण करता हुआ अपने ज्योतिर्मय रथ में बैठकर आता है । आते समय वह अमृत अर्थात् देव प्रभूति योनियों के प्राणियों को और मनुष्यों को अपने-

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१३०८ वेदार्थपारिजातः प्रदेशेषु निवेशयन् स्थापयन् भुवनानि पश्यन्, कानि साधु कुर्वन्ति कान्यसाधु कुर्वन्तीति जानन् । तस्य कर्मसाक्षित्वात् सूर्यस्य देवमर्त्यादिव्यवस्थापकत्वमपि सम्मतमेव, तन्मूलत्वात् कालविभागस्य वर्णाश्रमादिलक्षणस्य धर्मस्य च । पारम्पर्येण तुस्वगं मोक्षादिहेतुत्वमपि ॥ वृष्टिवृष्टि--फलफल--रसौषधिहेतुत्वमपि युक्तमेव । यद्वा सविता सूर्यः कृष्णवर्णेन रजसान्तरिक्ष- लोकेन । स हि सूर्यागमनात् पुरा कृष्णवर्णो भवति । प्रकाश्यप्रकाशकविषयः एवं सूर्येण चन्द्रादयः प्रकाश्यन्त इत्यस्मिन् विषयेऽपि यदुक्तम्-' सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः । ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधिश्रितः || १|| सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही । अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः ||२|| ' ( अथर्ववेदसंहिता १४ । १ ) । 'कः स्विदेकाकी चरति क उ स्विज्जायते पुनः । कि स्विद्विमस्य भेषजं कि वा आवपनं महत् । सूर्य एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः । अग्निहिमस्य भेषज भूमि- ( ) -' रावपनं महत् ॥ वा० सं० २३।९ -१० । एषामभिप्रायः चन्द्रपृथिव्यादिलोकाना सूर्यः प्रकाशकोऽस्तीति नित्य- स्वरूपेण सत्येन ब्रह्मणा उत्तभितोर्ध्वमाकाशमध्ये धारितास्ति । वायुना सूर्येण च तथा द्यौः सर्वः प्रकाश. सूर्येणोत्तभितो धारितः । तेन कालेन सूर्येण वायुना वादित्या द्वादशमासाः किरणास्त्रसरेणवो बलवन्तः सन्तो वा तिष्ठन्ति । एवं दिवि द्योतनात्मके सूर्यप्रकाशे सोमश्चन्द्रमा अधिश्रितः आश्रितः । स न प्रकाशितो भवति । अर्थाच्चन्द्रादिलोकेषु स्वकीयः प्रकाशो नास्ति । सर्वे चन्द्रादयो लोकाः सूर्येणैव प्रकाशिता भवन्ति । सोमेन चन्द्रलोकेन सहादित्या: किरणाः संयुज्य ततो निवृत्य च भूमि प्राप्य बलिनो बलं कर्तुं शीला भवन्ति, तेषां प्रापकशीलत्वात् । तद्यथा यावत्यन्तरिक्षदेशे सूर्यप्रकाशस्यावरणं पृथिवी करोति, तावति देशेऽधिकं शीतलत्वं भवति, तत्र सूर्यकिरण पतनाभावात् । तदभावे चोष्णत्वाभावात् ते बलकारिणो भवन्ति । सोमेन चन्द्रमसः अपने स्थानो में रहने की व्यवस्था करता हुआ आता है और उन भुवनो का निरीक्षण भी करता हुआ आता है कि कौन भले काम में लगा है और कौन बुरे कर्मों में प्रवृत्त है । इस तरह सभी प्राणियों के कर्मों का साक्षी होने से अर्थात् सभी प्राणियो के भले - बुरे कार्यों को देखते रहने से देवता और मनुष्य सभी का व्यवस्थापक माना जाता है । काल का विभाग सूर्य की इस गति के ही अधीन है । काल विभाग के आधार पर संपन्न होने वाले वर्णाश्रमधर्म का नियामक हो यही है और परम्परा से स्वर्ग और मोक्ष का भी कारण यह सूर्य ही है । तब यह वृष्टि, फल, रस और औषधि का उत्पादक माना जाय तो यह उचित ही है । प्रकाश्यप्रकाशक विचार इस प्रकरण में स्वामी दयानन्द ने ' सत्येनोत्तम्भिता' इत्यादि चार मन्त्रो को उद्धृत कर बताया है कि इन मन्त्रों में यही विषय और उनका यही प्रयोजन प्रतिपादित है कि लोक दो प्रकार के होते है - एक तो प्रकाश करने वाले और दूसरे वे जो प्रकाशित किये जाते हैं । इन मन्त्रों का अर्थ क्रमशः उन्होने इस तरह से किया है- ' ( सत्येनो ० ) सत्यस्वरूप परमेश्वर ने ही अपने सामर्थ्य से सूर्य आदि सब लोकों को धारण किया है । उसी के सामर्थ्य से सूर्यलोक ने भी अन्य लोको का धारण और प्रकाशित किया है । तथा ऋतु अर्थात् काल ने बारह महीने, सूर्य ने किरण और वायु वे भी यथायोग्य सूक्ष्म, स्थूल, त्रसरेणु आदि पदार्थों को यथावत् धारण किया है । ( दिवि सोमो० ) इसी तरह दिवि अर्थात् सूर्य के प्रकाश में आश्रित होकर चन्द्रमा प्रकाशित होता है । उसमें जितना प्रकाश है, वह सूर्य आदि लोक का ही है । ईश्वर का प्रकाश तो सबमें है । परन्तु चन्द्र आदि लोकों में अपना प्रकाश नही है, अतः सूर्य आदि लोकों से हो चन्द्र और पृथिवी आदि लोक प्रकाशित हो रहे हैं । ( सोमेनादित्याः ) जब आदित्य की किरणें चन्द्रमा के साथ संयुक्त होकर उससे उलट कर भूमि को प्राप्त होकर बल वाली होती है, तभी वे शीतल भी होती हैं । क्योंकि आकाश के जिस-जिस देश में सूर्य के प्रकाश को पृथिवी की छाया रोकती है, उस-उस देश में शीत भी अधिक होता है । जिस-जिस देश में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, उस उस देश में गर्मी भी कम होती है । फिर

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वेदार्थपारिजातः १३०९ प्रकाशन सोमाद्योषध्यादिना च पृथिवी मही बलवती पुष्टा भवति । अथो अनन्तरमेषां नक्षत्राणामुपस्थे समीपे चन्द्रमा आहितः स्थापितः सन् वर्तत इति विज्ञेयम्' ( पृ० १६० ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् ॥ ,, तदपि न विचारचारु मन्त्राक्षराननुगमात् । सत्येन ब्रह्मणा भूमिर्धारिता इत्युक्तिरपार्थैव सर्वस्यैव प्रपञ्चस्य ब्रह्मणा वारितत्वात् । वायुना सूर्येण धारितेति न मन्त्रार्थः, तादृशपदाप्रयोगात् । द्यौः सर्वः प्रकाशः सूर्येणो- तभित इत्यपि नार्थः, प्रकाशात्मकस्य सूर्यस्य तदात्मकत्वेन धारकत्वायोगात् । किञ्च वेदेषु द्यावापृथिव्या इत्यादि- स्थलेषु पृथिवीवदेव द्यौरपि लोकविशेष एव न प्रकाशमात्रम् । ऋतेन कालेनेत्यपि न सङ्गतम्, कालस्यादित्यात्म- कत्वात्, सूर्येणंव दिनमाससंवत्सरादिव्यवहारात् । मासरूपा आदित्या अपि कालात्मका एव । किरणास्त्रसरेणवः कथमादित्यपदवाच्याः? कथ वा ते कालेन बलवन्त इति तु लेखक एवं विजानातु । दिवि सूर्यप्रकाशे इत्यपि नार्थः, पूर्वोक्तविरोधात् । अधिश्रित इत्यस्य प्रकाशितो भवतीत्यपि नार्थः, निर्मूलत्वात् । शुद्धमन्त्रार्थस्तु - सत्येन परिनिष्ठितेन यथार्थभाषणेन भूमिरुत्तभिता धारितास्ति, 'गोभिविश्व वेदेश्व सतीभिः सत्यवादिभिः । अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही । ' इति स्मरणात् । सूर्येणादित्येन द्यौर्चुलोको धार्यते । आदित्योदये देवादितृप्तिहेतुयागादिप्रवृत्तेः । आदित्या द्वादशादित्या मासा वा ऋतेन यथाप्रमाणावगतवस्तुचिन्तनेन गर्मी के कम होने और शीतलता के अधिक होने से सब मूर्तिमान् पदार्थों के परमाणु जम जाते है । उनके जमने से पुष्टि होती है । जब उनके बीच मे सूर्य की तेज रूप किरण पड़ती है, तब उनमें से भाफ उठती है । उनके योग से किरण भी बलशाली होती है । जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब अत्यन्त चमकता है । चन्द्रमा के प्रकाश और वायु से सोमलता आदि औषधियाँ भी पुष्ट होती है, तब उनसे पृथिवी पुष्ट होती है । इसीलिये ईश्वर ने नक्षत्र लोको के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया है । - (क: स्वित्) इस मन्त्र में चार प्रश्न है । उनके बीच मे से पहला प्रश्न – कौन एकाकी अर्थात् अकेला विचरता और अपने प्रकाश से प्रकाश वाला है? दूसरा -कौन दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होता है? तीसरा - शीत का औषध क्या है? और चौथा — कौन बडा क्षेत्र अर्थात् स्थूल पदार्थ रखने का स्थान है? इन चारो प्रश्नो का क्रम से उत्तर देते है. -( सूर्य एकाकी० ) । १. इस संसार में सूर्य ही एकाकी अर्थात् अकेला विचरता और अपनी ही कील पर घूमता है तथा प्रकाश स्वरूप होकर सब लोकों का प्रकाश करने वाली है । २. उसी सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा प्रकाशित होता है । ३. शीत का औषध अग्नि है । ४. और चौथा यह है -पृथिवी साकार बीजो के रखने का स्थान तथा सब बीज बोने का बड़ा खेत है । वेदो में इस विषय के सिद्ध करने वाले मन्त्र बहुत है । उनमें से यहाँ एक देश मात्र लिख दिया है । वेद भाष्य में सब विषय विस्तार पूर्वक आ सकेंगे' (पृ० १६१-१६२) । यह अर्थ भी विचार करने पर ठीक नही मालूम पडता, क्योकि मन्त्राक्षरो से इसका कोई मेल नही है । सत्य और ब्रह्म से भूमि धारित है, इस तरह का अर्थ करना व्यर्थ है, क्योकि पृथिवी हो क्यो यह सारा प्रपच ही ब्रह्म से धारित है । वायु और सूर्य के द्वारा यह धारित है, यह अर्थ भी गलत है, क्योकि मन्त्र में इन पदो का अभाव है । द्यौ अर्थात् सारा प्रकाश सूर्य से धारित है, यह अर्थ भी नही हो सकता, क्योकि प्रकाशात्मक सूर्य प्रकाश स्वरूप ही है, अतः इसमें उसकी धारकता कैसे बनेगी? अपि च, वेद मे 'द्यावापृथिवी' इत्यादि स्थलो में पृथिवी के समान ही द्यो भी एक विशेष लोक है, केवल प्रकाश नही । ऋत का अर्थ काल करना भी सही नही है, क्योंकि काल तो आदित्य का स्वरूप माना जाता है । सूर्य के कारण ही दिन, मास, वर्ष आदि व्यवहार निष्पन्न होते हैं । प्रत्येक मास के अधिपति स्वरूप आदित्य भी कालात्मक ही हैं । किरण यदि त्रसरेणु है, तब वे आदित्य पद से कैसे बोषित हो सकते हैं और वे काल की सहायता से बलवान् कैसे होगे, इस बात को यह व्याख्याकार ही जान सकते है । दिवि पद का अर्थ सूर्य के प्रकाश में, यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि 'द्यो' एक लोकविशेष है, केवल प्रकाश नही, यह बात पहले ही कही जा चुकी है । ' अविश्रित' पद का अर्थ 'प्रकाशित होता है' यह नहीं किया जा सकता, क्योकि ऐसा अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है । मन्त्र का सही अर्थ यह है ---सत्य अर्थात् परिनिष्ठित यथार्थ भाषण से यह भूमि धारित है । 'गाय, ब्राह्मण, वेद, पतिव्रता, सत्यवादी, निर्लोभी, दानी इन सात वस्तुओं एवं व्यक्तियो की सत्ता के कारण ही यह पृथ्वी टिकी हुई है ' यह स्मृतिवचन उपलब्ध है । सूर्य अर्थात् आदित्य से चुलोक धारित है, क्योंकि सूर्य का उदय होने पर देवता आदि की तृप्ति करने वाले यज्ञ-याग आदि प्रवृत्त होते | आदित्य अर्थात् बारह आदित्य अथवा बारह मास, ऋत अर्थात् प्रमाण से जो जैसा जाना जाय उसको उसी रूप में देखने वाली

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१३१० वेदार्थपारिजातः तिष्ठन्ति, दिवि द्युलोके सामश्वापि ऋतेनैव श्रितः स्थितः । कौशिकसूत्रे दशमेऽध्याये मन्त्राणामेषां विनियोगा उक्ताः । 'कुमार्याः पितृगृहे सत्येनोत्तभितेति षोडश पूर्वापरमिति' ( १।२३-२४ ) इत्यष्टादशभिराज्यहोमः । सत्येनर्तेन च विवाहो दृढो भवति । सत्यप्रतिज्ञाभ्यां वरवधूभ्यामेव विवाहसाफल्यं भवतीति सत्यमहिमेवात्र विवक्षितः । ' सोमेनादित्या बलिनः ' इत्यपि यत्किञ्चित् । सोमेन चन्द्रलोकेन सहादित्याः किरणाः सयुज्य ततो निवृत्य भूमि प्राप्य बलं कर्तुं शीला इति कस्य शब्दस्यार्थः? आदित्यपदेन किरणाः केन प्रमाणेन गृहीताः? तद्रीत्या किरणानां बलवत्वे च किं मानम्? किश्व तेषां बलवत्त्वम्? पृथिव्यावृतान्तरिक्षप्रदेशे सूर्यकिरणपतनाभावात् तस्य अन्तरिक्षस्य शीतलत्वमस्तु, तदभावात्तत्रोष्णत्वाभावोऽप्यस्तु तावता किरणानां कुतो बलवत्त्वम्? नोष्णत्वाभावस्तद्बलवत्स्व- प्रयोजक:, तेषां स्वयमेवोष्णत्वात् । ----- मन्त्रार्थस्तु –सोमेनादितेः पुत्रा इन्द्रादयो बलिनो भवन्ति, ऐन्द्रवायवादिग्रहपरिग्रहादिति भावः । तथा सोमेनाहुत्यात्मना अग्नौ हुतेन पृथिवी मही महती भवति, आहुत्या वृष्ट्यादिद्वारेण सस्यादिसम्पत्तेः । अथोऽपि चायं सोमः, नक्षत्राणामेषां स्वर्गो न क्षीयते येन सः । स नक्षः सोमः, 'अपाम सोमममृता अभूम' इति मन्त्रवर्णात् । नक्षं सोमं त्रायन्ते नक्षत्रा ग्रहचमसादय:, तेषामुपस्थे सोमो रसात्मक आहितः । यद्वा प्रसिद्धानामेव नक्षत्राणामुपस्थे उपस्थाने द्युलोके सोम आहितः, 'तृतीयस्यामितो दिवि सोम आसीत्तं गायत्र्याहरत् ( तै ० ब्रा० ३।२।१।१ ) इत्यादिश्रुतेः । देवतारूपसोमपक्षे आदित्या देवा बलिनो बलवन्तो भवन्ति, तस्यैकैककलास्वादनात् 'प्रथमां पिबते वह्निद्वितीयां पिबते रविः' इत्यादिस्मृतेः । सोमेन पृथ्वी मही, अमृतसेकेन ओषध्यादिवद्धया वा पृथिव्या महत्त्वं सम्भवत्येव । नक्षत्राणा- मुपस्थाने चन्द्रस्थितिरपि प्रसिद्धैव । चिन्तन शक्ति से धारित होते है और द्युलोक मे सोम भी ऋत की सहायता से ही धारित है । कौशिक सूत्र के दसवें अध्याय में इन मन्त्रो का विनियोग बताया गया है । सत्य और ऋत के मार्ग से चलने पर विवाह दृढ होता है । अर्थात् विवाह के अवसर पर की गई अपनी प्रतिज्ञा का सही तरीके से पालन करने वाले वर-वधू का ही विवाह सफल होता है, इस बात को बताते हुए यह मन्त्र सत्य की महिमा का प्रतिपादन करता है । सोम के कारण आदित्य बलवान् होते है, यह अर्थ भी निराधार है । मोम से अर्थात् चन्द्रलोक से मिलकर सूर्य की किरणें वहां से लौट कर पृथ्वी पर आती है और उसमें बल का आधान करती है, यह अर्थ किन शब्दो से निकलेगा? आदित्य पद से किरणो का ग्रहण किस प्रमाण से होगा? इस तरह से किरणें बलवती होती है, इसमें भी क्या प्रमाण है? किरणें बलवती होती हैं, इसका क्या अभिप्राय हुआ? पृथिवी से ढके हुए अन्तरिक्ष प्रदेश में सूर्य की किरणों के न पड़ पाने के कारण उतना अन्तरिक्ष शीतल हो सकता है और शीतलता के कारण वहां गर्मी न रहे यह भी मान लिया जा सकता है, किन्तु इन बातो से किरणों के बलवती होने का कोई प्रमाण या कारण उपलब्ध नही होता । सूर्य की किरणों का उष्ण न होना उनकी बलवत्ता का कारण नही बन सकता, क्योकि वे तो स्वतः सदा उष्ण ही रहेगी । इस मन्त्र का भी सही अर्थ यह है - सोम लता की आहुति पाकर अदिति के पुत्र इन्द्र आदि देवता बलवान् होते है । तथा इस सोमलता के हृदन से ही यह पृथिवी समृद्ध होती है, क्योकि आहुति से वृष्टि आदि प्रक्रिया के संपन्न होने पर पृथ्वी धन- धान्य से भर जाती है । सोम को नक्ष भी कहा जाता है, क्योंकि यह जहाँ रहता है वहाँ स्वर्ग का क्षय कभी नहीं होता, सोम पान से अमृत पद की प्राप्ति की बात श्रुति में प्रसिद्ध है । इस नक्ष अर्थात् सोम की रक्षा करने वाले चमस प्रभूति मात्र नक्षत्र कहे जाते हैं । इन पात्रो में सोम रस बड़ी सावधानी से सुरक्षित रखा जाता है । अथवा आकाश मे विचरण करने वाले प्रसिद्ध नक्षत्रो के निवास स्थान चुलोक में सोम निवास करता है । श्रुति में यह बताया गया है कि यह सोमलता पहले स्वर्ग में थी । गायत्री मन्त्र की सहायता से उसको पृथिवी पर लाया गया । सोम पद से यदि यहा देवता रूप सोम का ग्रहण करना है, तो मन्त्र का अर्थ यह होगा कि आदित्य अर्थात् देवगण सोम की एक-एक कला का पान कर बलवान् होते हैं । स्मृति में बताया गया है कि चन्द्र की पहली कला का पान वह्नि करता है, दूसरी का सूर्ये । इसी तरह से इनका अन्य कलाओ का पान भी निर्दिष्ट देवता करते है और ये सब उससे पुष्ट होते हैं ।