वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 411–420
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 411–420
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वेदार्थपारिजातः १३११ यत्त केनचित् सोमेनादित्यप्रकाशाभिज्वल मित्युक्तम्, तत्त्वक्षरवाह्यमेव । तेजसा राशेरादित्यस्य तेजसैव सोमस्याप्यायनात् । यदपि कः स्विदेकाकी चरतीत्यादिव्याख्यानप्रसङ्ग उक्तम्-'को ह्येकाकी अस्मिन् संसारे चरति, स्वयं प्रकाशमानः सन् अन्यान् सर्वान् लोकान् प्रकाशयति । तस्यैव प्रकाशेन चन्द्रमाः पुनः प्रकाशितो भवति । नहि चन्द्रमसि कश्चित् स्वतः प्रकाशोऽस्ति' ( १० १६१ ) इत्यादि, तदपि वेदाक्षरबाह्यमेव एकाकी चरतीत्यस्य स्वयं प्रकाशमानः सन् अभ्यान् प्रकाशयतीति कथमर्थः? एवं चन्द्रमास्तस्यैव प्रकाशेन पुनः पुनः प्रकाशितो भवतीत्यपि न मन्त्राक्षरार्थः, निर्मूलत्वात् । कात्यायनमहर्षिरीत्याऽत्र ब्रह्मा होतारं पृच्छति -'ब्रह्मा पृच्छति होतारं यूपमभितः कः स्विदेकाकी चरतोति' ( का ० श्री ० २०।५।२० ) इति सूत्रात् । यूपस्य दक्षिणत उदङ्मुखो ब्रह्मा दक्षिणाभिमुखं होतारं पृच्छति । ब्रह्मोद्ये कर्मणि होतुर्ब्रह्मणश्च पक्षप्रतिपक्षभूताश्चतस्रोऽनुष्टुभः । स्विदिति वितर्के । एकः असहायः । कः चरति गच्छति । उः पादपूरणार्थः । कः स्विद् विनष्टः सन् पुनर्जायते उत्पद्यते? किस्विद् हिमस्य भेषजम्, किस्विद् महत् आवपनम्, आसमन्तादुप्यते यस्मिस्तद् आवपनम् आवपनस्थानम् । 'सूर्य इत्याचष्टे होता ब्रह्माणं प्रति वक्ति' (का ० श्री० २०।५।२१ ) इति । सूर्योऽसहायो गच्छति, अनेन होतृब्रह्माणी यजमाने ब्रह्मवर्चसं धत्तः । असौ वा आदित्य एकाकी चरति, 'एष ब्रह्मवर्चसं ब्रह्मवर्चसमेवास्मिस्तद् धत्ते' ( श ० १३| २ | ६ | १२) इति श्रुतेः । नहि निरर्थकप्रश्नप्रतिवचने वेदे सम्भवतः, स्वाध्यायाध्ययनगृहीतस्य वेदराशेर्मात्रामात्रस्याप्यानर्थक्यायोगात् । सूर्यस्य स्वप्रकाशत्वादिकं तु सर्वोऽपि जानात्येवेति न इस चन्द्रमा के कारण ही पृथिवी अमृत से परिपूर्ण अर्थात् नाना प्रकार की अमृत के समान गुणवती औषधियो से भरी रहती है । इसी लिये चन्द्रमा को औषधियो का स्वामी माना गया है । नक्षत्रो के समीप ही यह चन्द्रमा स्थित है, यह बात भी अति प्रसिद्ध है । कुछ विद्वानों ने यहाँ सोम पद का अर्थ सोम से सूर्य का प्रकाश उज्ज्वल होता है, ऐसा किया है । यह अर्थ , मन्त्राक्षरो से नही प्राप्त हो सकता क्योंकि प्रकाश के समुद्र सूर्य के प्रकाश से ही सोम के आध्यायित होने की बात सभी मानते । 'कः स्विदेकाकी' इस मन्त्र की व्याख्या करते समय यह जो कहा गया है कि इस संसार में कौन अकेला विचरण करता है, अर्थात् स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को भी प्रकाशित करता है? उसी के प्रकाश से चन्द्रमा भी प्रकाशित होता है । चन्द्रमा में अपना कोई प्रकाश नही है इत्यादि, किन्तु ये सारी बातें वेदाक्षरो के बाहर की हैं । 'एकाकी चरति' इन पदो का अर्थ स्वयं प्रकाशित होकर दूसरो को प्रकाशित करता है, यह कैसे हो सकता है? इसी तरह से चन्द्रमा उसीके प्रकाश से पुन. पुनः प्रकाशित होता है, यह भी मन्त्र के अक्षरो का अर्थ नही है, क्योकि इनका यह अर्थ किसी भी प्रमाण से नही निकल सकता । वस्तुतः इस मन्त्र मे कात्यायन महर्षि के द्वारा प्रतिपादित विनियोग के अनुसार ब्रह्मा होता से पूछता है, जैसा कि 'ब्रह्मा पृच्छति' इत्यादि कात्यायन श्रौत सूत्र में प्रतिपादित है । इसका अभिप्राय यह है कि यूप के दक्षिण भाग में उत्तर दिशा की ओर मुँह किये ब्रह्मा दक्षिण दिशा की ओर मुँह किये होता से पूछता है । ब्रह्मोद्य की चर्चा करते समय इन चार अनुष्टुप् छन्द के मन्त्रो में होता और ब्रह्मा का वार्तालाप निबद्ध किया गया है । स्वित् शब्द यहाँ वितर्क के अर्थ में प्रयुक्त है कि अकेला बिना किसी की सहायता के कौन चलता है? उ शब्द केवल पाद की पूर्ति के लिये है । कौन विनष्ट होकर पुन: उत्पन्न होता है? हिम (जाड़ा ) का इलाज क्या है? महान आवपन क्या है? जिसमें सब जगह बोया जाय उस क्षेत्रादि को आवपन कहा जाता है? इन सबके उत्तर में होता ब्रह्मा से कहता है कि वह सूर्य है । सूर्य बिना किसी दूसरे की सहायता के अकेला चलता है । ऐसा कह कर होता और ब्रह्मा यजमान में ब्रह्मतेज का आधान करते हैं । शतपथ श्रुतिं में भी यह बात प्रतिपादित है कि वह आदित्य ( सूर्य ) अकेला चलता है, यही ब्रह्मतेज है । ऐसा कहकर ऋत्विक यजमान में ब्रह्मतेज का आधान करते हैं । वेद के प्रश्न और प्रतिवचनात्मक संवाद निरर्थक नही हो सकते । स्वाध्याय विधि ' के द्वारा गृहीत वेदराशि की एक मात्रा भी निरर्थक नहीं हो सकती । सूर्य अपने से प्रकाशित होता है, इस बात को तो सब कोई जानते
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वेदार्थपारिजातः १३१२ तस्य मन्त्रतात्पर्यविषयता भवति । तस्माद् ब्रह्मवर्चसाधानैकप्रयोजने एव प्रस्तुतप्रश्नप्रतिवचने, ' चन्द्रमाः क्षीणः पुनर्जायते । चन्द्रमा वै जायते पुनरायुरेवास्मिस्तद्धत्ते' ( श ० १३| २ | ६| १० ) इति श्रुतेः । अग्निहिमस्य शीतस्य भेषजम्, ‘ हिमस्य भेषजमग्निः' अनेन तेजो धत्तः । 'अग्निर्वे हिमस्य भेषज तेज एवास्मिस्तद्धत्ते' ( श ० १३।२।६।१२) इति श्रुतेः । भूमिरयं लोको महदावपनम् अनेनास्मिन् प्रतिष्ठां घत्तः । ' अयं वै लोक आवपनं महत् अस्मिन्नेव लोके प्रतितिष्ठति' ( श० १३ | २| ६| १३ ) इति श्रुतेः । सर्वथाप्यस्मिन् मन्त्रे सूर्येण चन्द्रमसि प्रकाशः समायातीत्यर्थो न प्रतिपाद्यते । शब्दार्थज्ञानं शब्दाधीनमेव प्रतिपत्तव्यम् । विज्ञानसिद्धमपि वस्तु नहि बलान्मन्त्रेण प्रतिपादयितव्यमेव, स्वेच्छाचारिताया अव्याहतप्रसरत्वात् । गणितविद्याविषयः यदपि च वेदे गणितविद्यासाधनाय 'एका च मे तिस्रश्च मे " । चतस्रश्च मे ' अष्टाचत्वारिशच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्' ( वा० सं० १८ ) इति कण्डिके उद्धृत्यानयोर्मन्त्रयोमंध्ये खल्वीश्वरेणाङ्कबीजरेखागणितं प्रकाशितमित्यभिप्रायो वर्णितः, यश्च– 'एकार्थस्य या वाचिका संख्यास्ति सैकेन युक्ता द्वौ भवतः । यत्र द्वावेकेन संयुक्तौ सा त्रित्ववाचिका, द्वाभ्यां द्वौ युक्तौ चत्वारः, एवं तिसृभिस्त्रित्वसख्या युक्ता षट्, एवं चतस्रश्च मे पञ्च च मे इत्यादि परस्परसंयोगादि- क्रिययाऽनेकविधाङ्कुर्गंणितविद्या सिद्धयति, चकारबाहुल्यादन्या अप्यनेकविधा गणितविद्याः सन्तीति ' ईदृशा मन्त्रा ज्योतिषशास्त्रस्य गणितविद्याया मूलमिति विज्ञायते ' ( पृ० १६३ ) इति दयानन्दीय व्याख्यानम् । है, अतः इसमें मन्त्र का तात्पर्य नही माना जा सकता । इसलिये यजमान में ब्रह्मतेज को आहित (स्थापित करना ही इस प्रश्न-प्रतिवचनात्मक संवाद मन्त्रो का तात्पर्य हो सकता है । चन्द्रमा क्षीण होकर पुनः पैदा होता है । यह जो चन्द्रमा पुनः पुनः पैदा होता है, इसका तात्पर्य यह है कि इस मन्त्र से यजमान में आयु वृद्धि की कामना की जाती है । अग्नि हिम की औषधि है, यहाँ भी इस मन्त्र से यजमान मे तेज का आधान करना ही उसका उद्देश्य है । शतपथ में भी यही बात कही गई है । भूमि को महान् आवपन बताने वाले मन्त्र का तात्पर्य यजमान में प्रतिष्ठा के आधान में है । शतपथ श्रुति से भी इस बात की पुष्टि होती है । वहाँ भी उक्त श्रुति के आधार पर इस लोक ( पृथिवी ) को महान् आवपन बताया गया है । किसी भी तरह से यह बात सिद्ध नही हो पाती कि इस मन्त्र में सूर्य से चन्द्रमा को प्रकाश मिलने की बात कही गई हो । शब्द के अर्थ का ज्ञान शब्द के ही अधीन मानना पडेगा । विज्ञान से सिद्ध वस्तु को वेद के द्वारा भी बलात् सिद्ध किया ही जाय, यह कोई जरूरी नही है, क्योंकि स्वेच्छाचारिता का सहारा लेने पर इसको रोक पाना बड़ा कठिन हो जाता है । अतः वेदो के साथ इस तरह की स्वेच्छाचारिता कथमपि मान्य नही हो सकती । गणित विद्या पर विचार इस प्रकरण में दयानन्द ने वेद में गणित विद्या की सिद्धि के लिये 'एका च मे ०' इत्यादि दो कण्डिकामों को उद्धृत कर इनका अभिप्राय यह बताया है कि इन दोनों मन्त्रों में ईश्वर ने अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित का प्रकाशन किया है । इनका अर्थ दयानन्द ने इस तरह से किया है-' (एका च मे ० ) इन मन्त्रों में यही प्रयोजन है कि अंक, बीज और रेखा भेद से जो तीन प्रकार की गणित विद्या सिद्ध की है, उनमें से प्रथम अंक ( १ ) जो संख्या है, उसको दो बार गिनने से दो की वाचक होती है । जैसे १ = २ ऐसे ही एक के आगे एक तथा एक के आगे दो या दो के आगे एक आदि जोड़ने से भी समझ लेना । इसी प्रकार एक के साथ तीन जोडने से चार ( ४ ), तथा तीन ( ३ ) को तीन ( ३ ) के साथ जोड़ने से ( ६ ), अथवा तीन को तीन से गुणने से ३ x ३ = ९ हुए । इसी प्रकार चार के साथ चार, पाच के साथ पाच, छः के साथ छः, आठ के साथ आठ इत्यादि जोड़ने से या गुणने से तथा सब मन्त्रों के आशय को फैलाने से सब गणित विद्या निकलती है । जैसे पाच के साथ पांच ( ५५ ), वैसे हीं पाँच-पाँच, छ:-छः ( ५५ ), ( ६६ ) इत्यादि जान लेना चाहिये । ऐसे ही इन मन्त्रों के अर्थों की आगे योजना करने से अनेक प्रकार की गणित विद्या अवश्य जाननी चाहिये । यह गणित विद्या वेदांग ज्योतिष शास्त्र में प्रसिद्ध है, अतः यहाँ उसका विस्तार से उल्लेख नहीं किया जा रहा है, किन्तु उदाहरण के रूप में यहाँ यह बताया गया है कि इस तरह के वैदिक मन्त्र ज्योतिष शास्त्र में प्रतिपादित गणित विद्या के मूल स्रोत हैं' (पृ० १६४) ।
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वेदार्थपारिजातः १३१३ तदुपर्युच्यते- नानयोः कण्डिकयोरयमर्थः, मन्त्रे सयोगगुणनादिशब्दाभावात् । अत्रोक्तसख्या संख्येयनिष्ठा । मेपदावृत्तेर्यज्ञेन कल्पन्तामित्यस्य च कथ सङ्गतिः? 'यत्र द्वावेकेन सा त्रित्ववाचिका' इत्यप्यशुद्धमेव, 'ह्वे एकेन युक्ते ' इति हि भाव्यम् । किञ्च, यद्यत्र गुणनमिष्टं स्यात्तदा एका चैका च द्वे इति सङ्कलनमुक्त स्यात्, सङ्कलन हि गुणन- पर्यवसायि । एकमेकेन गुणितमेकमेव भवति । सङ्कलनान्तः पात्येव गुणन संख्यान्तरमानयति एकसंख्यायाम् । इदं सर्व विहाय मूले एका चेत्येव पाठः । तथैव तिस्रस्तिस्रः षड् इत्यपि स्यात्, न चैवं पाठ: । 'एकसख्या सैकेन युक्ता द्वो भवतः' इति वाक्यमप्यनुपपन्नम्, सैकेन युक्ता द्वे भवत इति भाव्यम् । एका संख्या एकेन युक्ता कथम्, संख्येति गुणः, एकोऽर्थो द्रव्यादिरूप । कथं तयोर्योगः? योगे च कथं संख्याया एव वृद्धिर्न द्रव्यस्य? संख्यावृद्धिदृष्ट्या तु द्वे इति वाच्यम्, अर्थयोगादेव संख्यावृद्धिदर्शनात् । चतस्रश्च मे पञ्च च मे इत्यादिसमुद्धरणं चाशुद्धमेव, तथा पाठाभावात् । यदपि च–' इयमङ्कसंख्या निश्चितेषु सख्यातपदार्थेषु प्रवर्तते । ये चाज्ञातसंख्याकाः पदार्थास्तेषां विज्ञानार्थं बोजगणितं प्रवर्तते । तदपि विधानम् 'एका च' इति मन्त्रे । अ + क इत्यादिसङ्केतेनैतन्मन्त्रादिभ्यो बीजगणित निःसरतोत्यवधेयम्' ( पृ ० १६४ ) इति दयानन्द उक्तवान् तदपि न किञ्चित्, एका चेत्यनेन अ + क इति सङ्केतो विधीयत इत्यत्र मानाभावात् । 'वसोर्धारां जुहोत्योदुम्बर्य्या पञ्चगृहीतं सन्तत यजमानोऽरण्येऽनूच्येऽग्नि प्राप्ते वाजश्च म इत्यष्टानु- वाकेन' ( का० श्रौ० ८| ५| १ ) इति रीत्या यजमान आज्य संस्कृत्यार्थपरिमाणया महत्योदुम्बर्या सुचा महता स्रुवेण पञ्चवारं गृहीतमाज्यमरण्येऽनूच्ये पुरोडाशेऽधिकरणे तदुपरि सन्ततमविच्छिन्नधार यथा स्यात्तथा वसोर्धारासंज्ञामाहुति इस पर हमारा कहना है कि इन कण्डिकाओ का यह अर्थ नही हो सकता, क्योकि मन्त्र मे जोड करने या गुणा करने जैसे शब्द नही मिलते | इसलिये इस मन्त्र के संख्यावाचक शब्द संख्येय द्रव्य के बोधक माने जाते है । इन मन्त्रो मे 'मे' पद की बार- बार आवृत्ति होती है, उसकी 'यज्ञेन कल्पन्ताम्' से संगति द्रव्यवाचकता मे ही हो सकती है, आपके अर्थ के अनुसार इन पदो की परस्पर संगति नही बन सकती । 'द्वो एकेन युक्तों' यहाँ 'हो' के स्थान पर 'हे' का प्रयोग आपको करना चाहिये था, क्योकि आप उनको संख्यावाचक मानते है और यह शब्द तब स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होगा । अपि च, यदि यहाँ गुणन अभीष्ट होता, तो उसको भी बताया जाता, क्योंकि संकलन का ही गुणन मे पर्यवसान होता है । एक को एक से गुणा करने पर एक ही होगा, संकलन करने के बाद ही किसी संख्या का गुणन करने पर दूसरी सख्या आती है । इन सबको छोडकर मूल मन्त्र में केवल 'एका च' यही पाठ है । इसी तरह से तीन और तीन मिलाकर छः होते हैं, किन्तु मन्त्र में ऐसा पाठ नही है । 'एका संख्या सैकेन युक्ता द्वो भवतः' यह वाक्य भी अशुद्ध हैं, इसके स्थान पर ' सैकेन युक्ता द्वे भवतः' ऐसा पाठ होना चाहिये । एक सख्या एक द्रव्य से कैसे संयुक्त होगी? संख्या तो गुण है और एक वस्तु द्रव्य । इन दोनों का योग कैसे हो सकता है? किसी तरह से योग मान भी लिया जाय तो संख्या की ही वृद्धि होगी, द्रव्य की नही, इसमें क्या विनिगमक है । आप यदि संख्या की वृद्धि मानते है तो उस दृष्टि से ' हे ' शब्द का प्रयोग होना चाहिये, क्योंकि अर्थ के साथ योग होने से ही संख्या की वृद्धि होती है । प्रथम कण्डिका का अर्थ करते समय 'चतस्रः ' पद का उद्धरण भी गलत है, क्योंकि यहाँ यह पाठ उपलब्ध नही है । आगे दयानन्द ने लिखा है – 'इन अङ्को से तो गणित विद्या निकलती है, वह निश्चित संख्यान पदार्थों में युक्त होती है । अज्ञात पदार्थों की संख्या जानने के लिये जो बीजगणित होती है, सो भी ' एका च मे ० ' इत्यादि मन्त्रों से ही सिद्ध होती है । जैसे ( अ ÷ क ) ( अ – क ) ( क: अ ) इत्यादि संकेत से निकलता है । यह भी वेदों से ही ऋषि-मुनियों ने निकाला है' ( पृ० १६४ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि 'एका च' इत्यादि से ( अ + क ) इत्यादि संकेतों का विधान किया गया है । वस्तुतः 'वसोर्धारा जुहोति' इत्यादि कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार यजमान आज्य ( घृत ) का संस्कार कर अपने छोटे-बड़े अभीष्ट की सिद्धि के अनुसार परिमाण वाली बड़ी-छोटी खुचा में सुव से पाच बार घृत भर कर पुरोडाश के ऊपर निरन्तर अविच्छिन्नअति घृत की धारा से, जिसको कि 'वसोर्धारा' के नाम से जाना जाता है, आहुति दे और उस समय 'वाजा' इत्यादि मन्त्रों का १६५
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वेदार्थपारिजातः १३१४ जुहोति । घृतेऽग्नि प्राप्ते वाजश्चेति होमारम्भः । चकाराः समुच्चयार्थाः । यज्ञनानेन मया कृतेन वाजादयः पदार्थाः कल्पन्तां क्लृप्ताः सम्पन्ना भवन्तु । स यज्ञो वाजादीनामस्मभ्यं दाताऽस्तु । यद्वा वाजादयो यज्ञेऽग्नि तर्पयन्तु अभिषिञ्चन्तु वा । ' अथो इदं च मे देहीद च मे ( श० ९ ३ २ ५ ) इति प्रथमार्थस्य मूलम्, ' अनेन च त्वा प्रीणामि, अनेन चानेन च त्वाभिषिञ्चामि (श० ९ ।३।२।५) इति द्वितीयार्थस्य मूलम् । 'एका च मे' अयुग्मस्तोममन्त्राः, 'अथायुज- स्तोमान् जुहोति' ( श ० ९ ।३।३।२ ) इति श्रुतेः । 'विषमसख्याकेन मन्त्रेणायुग्मान् स्तोमान् जुहुयात्' इति महीधरः । आदरातिशयार्थं पुनरुक्तिः । अयुग्मस्तोमहोमैः सर्वकामाप्तिः । 'एतद्वै देवाः सर्वकामान् आप्त्वाऽयुग्भिः स्तोमः स्वगं लोकमापन्, तथैवैतद्यजमानः सर्वान् कामानाप्त्वा अयुग्भिः स्तोमैः स्वर्गं लोकमेति' ( श ० ९ ३ | ३ | २ ) । चतस्र इत्येतां सख्यामादाय चतुरुत्तरत्वेन स्थितायुग्मान् स्तोमान् अष्टाचत्वारिंशत्पर्यन्तान् जुहुयादित्यर्थः, 'अथ युग्मतो जुहोति ' ( | | | )), ' चतस्रश्चेति श ० ९९ ।३।३।४३ ३ ४ इति श्रुतेः । तत्फल स्वर्गप्राप्तिम् एतद्वै छन्दास्यब्रुवन् यातयामा वा अयुजस्तोमाः ॥ युग्भिर्वयं स्तोमः स्वगं लोकमयामेति, तथैवैतद्यजमानो युग्मभिः स्तोमैः स्वर्गं लोकमेति' ( श० ९ | ३ | ३५) इति श्रुतेः । चतस्रश्च मेऽष्टौ च मे इति पूर्वपूर्वमुत्तरेण सम्बध्नाति, 'यथा वृक्षं रोहन्नुत्तरा शाखा समालम्भं रोहेत्तादृक्' (श० ९ । ३ । ३। ६ ) इति श्रुतिरेव द्विरुक्तेः प्रयोजन वक्ति । I - ".3 ' ' ( | यदपि च २ अग्न आयाहि वीतये गुणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥ सा० ६ प्र ०१ ख ०१ ) । यथा 'एका क्रिया द्वयर्थक्रिया प्रसिद्धा' इति न्यायेन स्वरसङ्केताङ्कर्बीजगणितमपि साध्यत इति बोध्यम् । एव गणितविद्याया रेखागणितं तृतीयो भागः सोऽप्यत्रोच्यते' ( पृ० १६४ ) इत्यादिकमपि न किञ्चित् । हेतुमन्तरा प्रतिज्ञामात्रेण समीहितासिद्धेः, कथ सामस्वरैः किं गणितविज्ञानं सिद्धयतीत्यनुक्तेः । गणितज्ञास्तुपहसन्त्येवास्य चातुर्य पाठ करे 1। मन्त्रों में पठित चकार समुच्चय को बताने वाले हैं । 'यज्ञेन कल्पन्ताम्' का अर्थ होता है कि मेरे द्वारा किये गये इस यज्ञ से 'वाज' ( अन्न ) प्रभृति पदार्थ मुझे प्राप्त हो, अर्थात् यह यज्ञ हमे अन्न प्रभृति पदार्थों से संपन्न बना दे । अथवा यह भी अर्थ हो सकता है कि ये अन्न प्रभृति पदार्थ यज्ञ में अग्नि को तृप्त करने वाले हो । यहां किये गये प्रथम अर्थ का समर्थन 'अथो इदं च' इत्यादि शतपथ श्रुति से मिलता है और दूसरे अर्थ की भी पुष्टि ' अनेन च त्वा प्रीणामि' इस वचन से मिलता है । शतपथ श्रुति के प्रमाण पर ही इन मन्त्रो का विनियोग अयुग्म स्तोम में माना जाता है । महीधर ने भी अपने भाष्य में यहाँ बताया है कि विषय संख्या वाले मन्त्रों से अयुग्म स्तोम हवि प्रदान करे । अतिशय आदर प्रदर्शित करने के लिये मन्त्र में एक ही संख्या की पुनरुक्ति की गई है । इस अयुग्म स्तोम हवन से सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं । 'एतद्वै देवाः' यह शतपथ श्रुति इसमें प्रमाण है । चार संख्या से लेकर इस संख्या को चार-चार कर बढाते हुए ४८ संख्या तक की स्तोम हवि भी इसी प्रकार दी जाती है । इससे स्वर्ग की प्राप्ति होती है । शतपथ ब्राह्मण में ही इसका भी प्रतिपादन है और युग्मवही प्रत्येक संख्या की द्विरुक्ति का प्रयोजन भी बताया गया कि जैसे मनुष्य वृक्ष की एक शाखा को पहले पकड़ता है, तब उसी के सहारे से दूसरी शाखा को भी पकड़ लेता है, उसी तरह से यहाँ भी एक संख्या के सहारे दूसरी संख्या तक पहुँचा जाता है । दयानन्द ने आगे लिखा है - "अग्न आ ' याहि " इत्यादि मन्त्रो के संकेतो से 'एक ही क्रिया दो प्रयोजनों को सिद्ध कर देती है' इस लौकिक न्याय के अनुसार स्वरों के परिज्ञान के साथ ही बीजगणित भी निकलती है । इस तरह से गणित विद्या का तीसरा भाग, जो रेखागणित है, वह भी वेदों से ही सिद्ध होता है' ( पृ ० १६५ ), किन्तु यह कथन भी निराधार है । बिना हेतु के प्रतिज्ञा मात्र से कोई बात सिद्ध नहीं होती । सामवेद के इन स्त्ररो से गणित विद्या की सिद्धि कैसे होती है? इसकी पद्धति आपने नही बताई । गणित के विद्वानों को दयानन्द की इस बात से हंसी आती है कि वाह क्या चतुराई दयानन्द ने यहाँ दिखाई है । सिद्धान्ततः इन स्वरों का उपयोग केवल साम मन्त्रों का गान करते समय ही किया जाता है । मन्त्र का अर्थ है -हे वैश्वानर रूप अग्ने, आप हमारे द्वारा
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वदार्थपारिजातः १३१५ दृष्ट्वा । सिद्धान्तरोत्या तु स्वराणां गोतिष्वेवोपयोगः । मन्त्रार्थस्तु - 'हे अग्ने वैश्वानररूपाग्ने, वीतये हविषां भक्षणाय आयाहि आगच्छ । हव्यदातये हविर्दानार्थं गुणानः स्तूयमानः, आस्तीर्णे बर्हिषि निषत्सि निषीदेत्यर्थः । 'एका च मे' इत्यादिकण्डिकाया एवमर्थो विधातुं शक्यते - एका अद्वितीया स्वप्रकाशा चितिः । तत्रैव सर्वमध्यारोप्यते । अथवा सकलजगदुपादानमेकैव प्रकृतिः पूर्वमासीत् । 'एकैवाह जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥' ( सप्तशती १०१५ ) । ततस्तिस्रः सत्त्वरजस्तमःशक्तयों मयि प्रसन्नाः सन्त्विति सर्वत्रान्वयः । ताभ्यश्च पञ्च महाभूतानि । तेभ्यश्चापञ्चीकृतेभ्यो ज्ञानेन्द्रियाणि मनोबुद्धिश्चेति सप्त । सप्त सागराः सप्त धातवो वा । पञ्चीकृतेभ्यः पञ्चमहाभूतेभ्यश्च नवद्वारोपलक्षितः स्थूलदेहः । वेदत्रयो षड् दर्शनानीति नव वा । ततो दशप्राणास्तदाधारभूता सुषुम्ना चैका - इत्येकादश । एकादश रुद्रा वा । एवमेकादशभूतसत्त्वाशेभ्यस्त्रयोदश देवताः । सप्त प्रकृतिविकृतयः पञ्च प्राणा विज्ञानात्मा च त्रयोदश । करणानां पुष्या-युगन्धरा- शङ्खिनीत्याद्याः श्रोत्रादिनाड्यश्चतुर्दश सुषुम्ना पञ्चदशीत्येवं पञ्चदश । अथवा ज्ञानेन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि प्राणाश्चेति पञ्चदश । सप्तदश लिङ्गशरीरावयवाः । पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च प्राणा अन्तःकरणचतुष्टयं चेति नवदश । यद्वा सञ्जीवनीव्रणविरोपणोव्रणघ्नी सहदेवी ब्राह्मीमुण्डीत्याद्या एकोनविंशतिर्महौषध्यो नागार्जुनतन्त्रादौ प्रसिद्धाः । षोडश विकाराः पञ्च तन्मात्राश्चैकविंशतिः । यद्वा एकविशतिर्मर्माणि वैद्यकप्रसिद्धानि । महदहङ्कारौ पञ्चतन्मात्रा: षोडशविकारास्त्रयोविंशतिः । यद्वा ज्वरातिसारपाण्डुक्षयाद्यास्त्रयोविशतिर्महारोगाः । प्रकृतिसहितैषा त्रयोविंशतिः क्षेत्रज्ञश्चेति पञ्चविंशतिः । यद्वा प्रसिद्धा पञ्चविंशतिरप्सरसः स्वर्ग इव देहेऽपि विद्यमानाः । तथाहि- 'पूर्वचित्तिश्चित्त दी जा रही हवि को ग्रहण करने के लिये यहाँ आइये । हवि देते समय आपकी स्तुति की जा रही है, उसको सुनने के लिये आप हमारे द्वारा बिछाये गये इस कुश के आसन पर बैठिये । 'एका च मे' इत्यादि कण्डिका का अर्थ इस तरह से किया जा सकता है - एक अद्वितीय स्वप्रकाश चिति मे ही सबका आरोप किया जाता है । अथवा सारे जगत् की उपादानकरण प्रकृति भी सबसे पहले अकेली थी । दुर्गा सप्तशती में देवी ने कहा है -ए दुष्ट, इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ, मेरे सिवाय यहाँ दूसरा कौन है? देख, ये सब बाहर दिखाई पड़ रही मेरी विभूतियां मेरे इस एक स्वरूप में विलीन हो रही है' । तब उसके बाद सत्त्व, रज और तम के कारण यह शक्ति त्रिगुणात्मिका हुई । इस तरह से एक संख्या वाली और तीन संख्या वाली ये शक्तियाँ मेरे ऊपर प्रसन्न हो । इस प्रकार सभी संख्याओ वाले पदार्थों के साथ सर्वत्र इस क्रिया को जोड़ना चाहिये । जैसे कि एकात्मिका और त्रिगुणात्मिका शक्तियो से पांच महाभूत उत्पन्न हुए । अपंचीकृत महाभूतो से पांच ज्ञानेन्द्रियां और मन एवं बुद्धि ये सात पदार्थ हुए अथवा सात संख्या वाले सात सागर और सात धातुओ का भी यहीं ग्रहण किया जा सकता है । पंचीकृत पंच महाभूतो से नव द्वार वाला स्थूल शरीर उत्पन्न होता है । अथवा तीन वेद और छः दर्शनो का भी नौ संख्या से उल्लेख किया जा सकता है । दस प्राण और उनकी आधारभूत सुषुम्ना नाडी को एकादश संख्या के पदार्थो में परिगणित करना चाहिये । अथवा ----इस संख्या से एकादश रुद्रो का भी ग्रहण किया जा सकता है । एकादश भूतो के सत्त्वाश से त्रयोदश देवता उत्पन्न होते है । वे हैं -प्रकृति और विकृति के नाम से परिचित सात पदार्थ, पाच प्राण और तेरहवा विज्ञानात्मा । श्रोत्र आदि करणो को पुण्या, युगन्धरा, शखिनी प्रभृति चौदह नाडियों और सुषुम्ना को लेकर पन्द्रह नाडियाँ होती है । अथवा ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और प्राणो को लेकर के भी यह संख्या बन सकती है । लिंग शरीर के सत्रह अवयव माने जाते है । पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण और चार अन्तःकरण को लेकर उन्नीस संख्या बनती है । अथवा संजीवनी, व्रणविरोपिणी •, व्रणघ्नी, सहदेवी, ब्राह्मो, मुण्डी प्रभृति उन्नीस महौषधियो का भी इस संख्या से बोध माना जा सकता है, जो कि नागार्जुनतन्त्र प्रभृति ग्रन्थो में प्रसिद्ध हैं । षोडश विकार और पाच तन्मात्राओ का इक्कीस की संख्या से बोध होता है अथवा इस संख्या से वैद्यक शास्त्र में प्रसिद्ध इक्कीस ममं स्थानो का भी बोध हो सकता है । महान्, अहङ्कार, पंचतन्मात्रा और षोडश विकार मिलकर तेईस संख्या की पूर्ति करते है । अथवा ज्वर, अतिसार, क्षय, पाण्डु आदि तेईस महारोग भी इस संख्या से गृहीत किये जा सकते है । ये तेईस तत्त्व प्रकृति और पुरुष के साथ मिलकर पचीस होते है । अथवा स्वर्ग
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१३१६ वेदार्थपारिजाता बुद्धिस्तिलोत्तमा मन उर्वशी अविद्या रम्भा परोक्षविद्या मेनका तत्कन्या गौरी अपरोक्षविद्या श्रोत्रं मञ्जुघोषा त्वगनु- म्लोचा चक्षुः प्रम्लोचा रसन सुकेशी घ्राणं सुरभिला वाग् वाग्वादिनी सपाणिर्हस्तेन्द्रिय श्यामला पादेन्द्रियं सुपेशा पायुरिन्द्रिय सुभगा' इत्यादियोगलतिकायां विस्तरः । सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि चित्रसेन -विश्वावसु- नारदाद्या गन्धर्वा वा सप्तविंशतिः, 'वातो वा मनो वेति गन्धर्वाः सप्तविंशतिः' ( श० ५| १ | ४१८) इति श्रुतेः । चतुर्विंशतितत्त्वानि, क्षेत्रज्ञः, हिरण्यगर्भ, विराट्, ईश्वरः, विभवः ( रामकृष्णादिरूपः ) इति नवविंशतिः । यद्वा ज्योतिष्मत्याद्या एकोनत्रिंशद् विद्यद्देवताः कृत्याशब्दवाच्याः श्रतिप्रसिद्धाः । तथा च श्रुतिः -'ज्योतिष्मतीं त्वासादयामि ज्योतिर्विद त्वासादयामि' - ( तै० आ ० ३।१ ९ ।१ ) इत्यादि । नवविंशतिरेव अभ्युदयनिःश्रेयसाभ्या सहिता एकत्रिंशत् । यद्वा – एकत्रिंशद् भुवनानि । तथाहि भूर्भुवरादिस्वर्गलोकान्तं सप्त, अतलादिपातालान्तं सप्त, वैकुण्ठलोकः, राधालोकः, गोलोकः मणिद्वीपम्, महाकाल- पुरम्, शिवपुरम्, गणेशलोकश्चेति सप्तोपस्वर्गाः । अयोध्या मथुरा मायेत्याद्या मोक्षदायिन्यः सप्त पुर्यः सप्त भूस्वर्गाः । कैलासो मानसं मेरुश्चेति ब्रह्मलोकावान्तरभेदाः । एवमेकत्रिंशत् । अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्या अश्विनो चेति त्रयस्त्रिशद्देवताः, यद्वा नवविंशतिरेव पुरुषार्थचतुष्टयेन युक्ता त्रयस्त्रिंशत् । एतानि यज्ञेन कल्पन्ताम् । एवं विषमार्दवच्छन्दोविस्तरशोऽभिधाय मनुष्यच्छन्दोविकल्पमाहापरया चतस्रश्चेत्यादिकण्डिकया | तथा च श्रूयते -' एका च मे तिस्रश्च म इत्याह देवच्छन्दसं वा एका च तिस्रश्च ( ५ ) मनुष्यच्छन्दसं चतस्रश्चाष्टो च' ( तै ० सं ० ५| ४|८| ६ ) इत्यादि । तत्र धर्मार्थकाममोक्षविद्याश्चतस्रः । यद्वा प्रणवस्य अकार उकारो मकारोऽर्धमात्रा चेति चतस्रः । चत्वारो वेदाश्चत्वार उपवेदाश्चेत्यष्टी, अष्टौ अणिमाद्याः सिद्धयो वा । व्यष्टिसमष्टिरूपा विश्वतैजस- प्राज्ञतुरीयपादा मात्राभिर्युक्ता द्वादश । यद्वा षडङ्गानि षड् दर्शनानीति द्वादश । एते विश्वतैजसाद्याः पुरुषार्थ- की तरह इस देह में भी पचीस अप्सराएं प्रसिद्ध है । जैसे कि योगलतिका में विस्तार से बताया गया है-' चित्त ही पूर्वचिति, बुद्धि तिलोत्तमा, मन उर्वशी, अविद्या रम्भा, परोक्षविद्या मेनका, उसकी कन्या अपरोक्षविद्या गौरी, श्रोत्र मंजुघोषा, त्वगिन्द्रिय अनुम्लोचा, चक्षु प्रम्लोचा, रसना सुकेशी, घ्राण सुरभिका, वाणी वाग्वादिनी, हस्त श्यामला, पाद सुपेशा, पायु सुभगा ' इत्यादि प्रकार से इस शरीर में भी स्वर्ग की २५ अप्सराओं की स्थिति बताई गई है । उनका भी पच्चीस संख्या से बोध माना जा सकता है । सत्ताईस संख्या से इतनी संख्या के नक्षत्रो अथवा चित्रसेन, विश्वावसु, नारद प्रभृति सत्ताईस गन्धर्वो का भी बोध हो सकता है । सत्ताईस गन्धर्वो का उल्लेख ऊपर उद्धृत शतपथ ब्राह्मण के वचन में मिलता है । चौबीस तत्त्वो के साथ क्षेत्रज्ञ, हिरण्यगर्भ, विराट् ईश्वर और राम- कृष्ण के अवताररूप विभव को लेकर उन्तीस संख्या बनेगी । अथवा ज्योतिष्मती प्रभृति उन्तीस विद्युत्स्वरूप देवता, जिनको कि कृत्या नाम से भी जाना जाता है, इस संख्या से गृहीत हो सकते है । तैत्तिरीय आरण्यक में इनका उल्लेख मिलता है । ऊपर बताये उन्तीस तत्त्वो में ही अभ्युदय और निःश्रेयस् को मिला देने पर इकतीस पदार्थ बन जाते है । अथवा इस संख्या से भुवनो का भी बोध हो सकता है । जैसे कि भूः $ भुवः आदि ऊर्ध्ववर्ती सात लोक, अतल, पाताल आदि अधोवर्ती सात लोक, वैकुण्ठलोक, राधालोक, गोलोक, मणिद्वीप, महाकालपुर, शिवपुर और गणेशलोक को मिलाकर सात उपस्वर्ग; अयोध्या, मथुरा, माया प्रभृति मोक्षदायिनी सात पुरियाँ सात भूस्वर्ग; इनके साथ मिलकर कैलास, मानस और मेरु, जो कि ब्रह्मलोक के अवान्तर भेद माने जाते है, इकतीस सख्या की पूर्ति करते है । आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य और अश्विनीकुमारयुगल मिलकर तैंतीस देवता होते हैं । अथवा ऊपर बताये उन्तीस तत्त्वो के साथ पुरुषार्थचतुष्टय को मिला देने पर भी तैंतीस की संख्या पूरी होती है । ये सब वस्तुएँ यज्ञ के द्वारा मुझे प्राप्त हों । इस तरह विषम संख्याओं से देवताओं के विस्तार का उल्लेख कर दूसरी कण्डिका में सम संख्या,, अर्थ, काम औरके विस्तार का उल्लेख किया जाता है जैसा कि तैत्तिरीय संहिता में इनका उल्लेख है । इनमें से चार संख्या से धर्मके आधार पर मनुष्यों मोक्ष का अथवा प्रणव की अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रा का उल्लेख किया जाता है । चार वेद और चार उपवेद मिलकर आठ होते हैं । अथवा अणिमा प्रभृति सिद्धियाँ भी आठ ही होती हैं । व्यष्टि और समष्टि में विभक्त विश्व, तेजस, प्राज्ञ और तुरीय पादमात्राओं से मिलकर बारह होते है । अथवा छः वेदांग और छः दर्शन मिलकर भी बारह होते है । ऊपर बताये विश्व, तैजस आदि के बारह
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वेदार्थपारिजातः १३१७ चतुष्टयेन युक्ताः षोडश । यद्वा षोडश महाविद्याः सिद्धिरूपाः । तद्यथा - दूरश्रवणदर्शनाद्याः पञ्चज्ञानेन्द्रियसिद्धयः, वाक्सिद्धघाद्याः पञ्च कर्मेन्द्रियसिद्धयः, स्थापत्यविद्या पर्जन्यविद्या ज्योतिर्विद्यायुविद्या परोक्षब्रह्मविद्या चेति पञ्च सिद्धयो द्विविधमनश्चित्तबुद्धयहङ्काराणां ज्ञेया । अपरोक्षब्रह्मविद्या तु महत्तत्त्वस्येति षोडश । महाभूतानि स्थूलसूक्ष्म- भेदेन दश, विषया अनि स्थूलसूक्ष्मभेदेन दशेति विंशतिः । चतुर्विंशतितत्त्वानि प्रसिद्धानि । अष्टाविंशतिस्तिरश्चां भेदाः ' गौरजो महिषः कृष्णः ' इत्यादिना भागवतादौ प्रसिद्धाः । अथवा दशेन्द्रियाणि प्राणापानव्यानसमानोदान नागकूर्मकूकल- देवदत्तधनञ्जयेति दश प्राणाः, एकादशं मनः, हानोपादानोपेक्षा बुद्धयश्चेत्यष्टाविंशतिः । अष्टविधो देवसर्गः, षड्विधः स्थावरसर्गः, कौमारमानुषसग द्वो, ऐन्द्रियसर्गो दशविधो ज्ञान क्रियात्मकः, अहङ्कारस्त्रिविधः, त्रयो गुणाश्चेति द्वात्रिंशत् । अथवा अलम्बुषा कुहूविश्वोदरा वारुणी हस्तिनी जिह्वा यशोवती पयस्विनी गान्धारी पूषा शङ्खिनी सरस्वती इडा पिङ्गला सुषुम्ना प्राणा इन्द्रियाणि अहङ्कारश्चेति द्वात्रिंशत् । यद्वा दन्ता द्वात्रिंशत् । प्रकृत्यहङ्कारबुद्धिमनस्त्वक्चक्षुः- श्रोत्रजिह्वा प्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाकाशवायुवह्निसलिलभूमिमायाकलाऽविद्या रागकाल नियति- पुरुष शिवशक्तिसदाशिवेश्वरशुद्ध विद्येतिश्रीविद्योपासनायां प्रसिद्धानि षट्त्रिंशत् तत्त्वानि । अथवा किमनया क्लिष्ट- कल्पनया चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री, अष्टाविंशत्यक्षरा उष्णिक्, षट्त्रिंशदक्षरा बृहती, चत्वारिंशदक्षरा पक्तिः, चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप, अष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती । शेषाणामत्रैवान्तर्भावः । एतेषा च मनोमयत्वात् तल्लये मनसोऽपि लयः स्यादिति भावः । वाजादिरयन्तरान्ता यज्ञेन कल्पन्तामित्यर्थः । यच्च रेखागणितप्रकाशनायोक्तम्-' इयं वेदिः परोऽन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि: । अयं सोमो वृष्णोऽश्वस्य रेतो ब्रह्मा यं वाचः परमे व्योमन् || ' ( वा० सं ० २२/६२ ) । ' कासीत् प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं भेद चार पुरुषार्थ से मिलकर सोलह होते है । अथवा सिद्धि के रूप में वर्णित सोलह महाविद्याएँ भी इस संस्था से बोधित हो सकती है । सोलह महासिद्धियो में दूरश्रवण, दूरदर्शन प्रभृति पाँच ज्ञानेन्द्रियो की सिद्धियाँ, वाक् सिद्धि प्रभृति पाँच कर्मेन्द्रिय की सिद्धियाँ, स्थापत्यविद्या, पर्जन्यविद्या, ज्योतिर्विद्या, आयुर्विद्या, परोक्ष ब्रह्मविद्या ये पाँच महाविद्याएँ, द्विविध मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार की मानी जाती हैं | सोलहवी अपरोक्ष ब्रह्मविद्या मह तत्व की मानी जाती है । इस तरह से ये सोलह महासिद्धियाँ बनती है । स्थूल और सूक्ष्म के भेद से पंच महाभूत दस प्रकार के हो जाते है, विषय भी स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दस होते है । इनको मिलाने से बीस संख्या पूरी हो जाती है । चौबीस संख्या के तत्व तो प्रसिद्ध ही है । अट्ठाईस संख्या से भागवत आदि पुराणो मे प्रसिद्ध गाय, बकरी, महिष प्रभृति अट्ठाईस प्रकार के प्राणियो के भेदो का ग्रहण होता है । अथवा दस इन्द्रियाँ, प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय ये दस प्राण मन के साथ मिलकर ग्यारह होते है । इनके साथ हान, उपादान और उपेक्षा बुद्धि को मिला देने पर ये भी अट्ठाईस हो जाते है । आठ प्रकार की देव सृष्टि छ प्रकार की स्थावर सृष्टि, कौमार और मानुष सृष्टि दो, ज्ञान और क्रिया रूप दस प्रकार की इन्द्रिय सृष्टि, त्रिविध अहकार और तीन गुण मिलकर बत्तीस सख्या की पूर्ति करते है । अथवा अलम्बुषा, कुहू, विश्वोदरा, वारुणी, हस्तिनी, जिह्वा, पपोवती, पयस्विनो, गान्धारी, पूषा, शंखिनी, सरस्वती, इडा पिंगला और सषुम्ना नाम की पन्द्रह नाड़ियाँ, दस प्राण, मन के साथ छः इन्द्रियाँ और अहंकार मिलकर भी बत्तीस होते है । अथवा इस संख्या से बत्तीस दातों को भी लिया जा सकता है । प्रकृति, अहकार, बुद्धि, मन, त्वक्, चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा, घ्राण, वाकू, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, माया, कला, अविद्या, राग, काल, नियति, पुरुष, शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर और शुद्धविद्या मिलकर छत्तीस तत्त्व श्रीविद्या के उपासको के संप्रदाय मे प्रसिद्ध है । अथवा अधिक क्लिष्ट कल्पना करने से क्या लाभ है? गायत्री चौबीस अक्षरो वाली होती है, उष्णिक छन्द अट्ठाइस अक्षरो का, छब्बीस अक्षरों की बृहती, चालीस अक्षरो की पंक्ति और त्रिष्टुप् छन्द चवालीस अक्षरों का तथा जगती छन्द अडतालीस अक्षरो का होता है । मन्त्र में उक्त इन संख्याओ से इन्ही -का ग्रहण किया जाना चाहिये । बाकी का भी इन्ही मे अन्तर्भाव हो जायगा । ये सब मनोमय हैं । इनका लय हो जाने पर मन भी विलीन हो जायगा । इसी बात को बताने के लिए यहाँ उनका उल्लेख किया गया है । इस पूरे प्रकरण का सरल अर्थ यही है कि वाज -से लेकर रचन्तर पर्यन्त सभी पदार्थ यज्ञ की सहायता से मुझे प्राप्त हो जायें । इसमें गणितविद्या का दूर का भी कोई सबन्ध नही है ॥
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१३१८ वेदार्थपारिजात किमासीत् परिधिः क आसीत् । छन्दः किमासीत् प्र उगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे ॥ ' (ऋ० सं ० १०।१३०।३ ) । ' इयं या वेदिस्त्रिकोणा चतुरस्रा श्येनाकारा वर्तुलाकारयुक्ता क्रियते, अस्या वेदेराकृत्या रेखागणितोपलक्षणं विज्ञायते। एवं पृथिव्याः परोऽन्तो यो भागोऽर्थात् सर्वतः सूत्रवेष्टनवदस्ति स परिधिरित्युच्यते । यश्चायं यज्ञो सङ्गमनीयो रेखागणिते मध्यो व्यासाख्यो मध्यरेखायाश्च सोऽय भुवनस्य भूगोलस्य ब्रह्माण्डस्य वा नाभिरस्ति । सोमलोकोऽप्येवमेव परिध्यादियुक्तोऽस्ति । वृष्णो वृष्टिकर्तुः सूर्यस्याग्नेर्वायोर्वा वेगहेतोरपि परिध्यादिक तथैवास्ति । रेतो वीर्यमोषघिरूपेण सामर्थ्यार्थं विस्तृतमप्यस्तीति वेद्यम् । यद् ब्रह्मास्ति तद्वाण्याः परम व्योम, अर्थात् परिधिरूपेणान्तर्बहिः स्थितमस्ति । यथार्थज्ञानं यथार्थज्ञानवान् तत्साधिका बुद्धिः कासीत्? सर्वस्येति शेषः । एव प्रतिमा प्रतिमीयतेऽनया सा प्रतिमा यया परिमाण क्रियते सा कासीत्? एवमेवास्य किं निदान कारणमस्ति ज्ञातव्यं घृतवत्सारभूतं चास्मिन् जगति किमासीत्? सर्वदुःखनिवारकमानन्देन स्निग्धं सारभूतं च तथास्य सर्वस्य विश्वस्य पृष्ठावरण किमासीत्? गोलस्य पदार्थस्योपरि सर्वतः सूत्रवेष्टनं कृत्वा यावती रेखा लभ्यते स परिधिरित्युच्युते । छन्दः स्वच्छन्द स्वतन्त्र वस्तु किमासीत्? प्र उगं ग्रहोक्थ स्तोतव्य किमासोत्? इति प्रश्नाः । एषामुत्तराणि । यद् य देव परमेश्वर विश्वेदेवाः सर्व विद्वांसः अयजन्त समपूजयन्त पूजयन्ति स एव सर्वस्य प्रमा यथार्थतया ज्ञातास्ति । प्रतिमा परिमाणकर्ता । एवमेवाग्रे योजनीयः । अत्रापि परिधिशब्देन रेखागणितोपदेशलक्षणं विज्ञायते । सेय विद्या ज्योतिषशास्त्र विस्तरश उक्तास्ति । एवमेतद्विषयप्रतिपादका अपि वेदेषु बहवो मन्त्राः सन्ति' ( पृ० १६५ ) इति दयानन्दीयं व्याख्यानम् । तत्रेदमेवोच्यते यदुक्तयोर्मन्त्रयोर्दयानन्दोक्तं नार्थेन न मनागपि सम्बन्धः । कश्चित् स्वातन्त्र्येण शिल्पविद्य प्रतिपादयन् मयाऽऽभ्यां मन्त्राभ्यामयमर्थो निष्कासित इति वदितु शक्नोति प्रमाणाभावस्योभयत्र तुल्यत्वात् । रेखादिभिर्यत्किञ्चित्तुल्यत्वमप्युभयत्रैव । आश्चर्यमिदमत्पज्ञजनप्रतारणपाटवं दयानन्दस्य । पूर्वं तु प्रमाशब्दस्य बुद्धिरर्थं इसके आगे दयानन्द ने वेदो में रेखागणित को सिद्ध करने के अभिप्राय से ' इयं वेदिः ' और 'कासीत् प्रमा' ये दो मन्त्र उद्धृत कर उनको इस तरह से व्याख्या की है— 'इन मन्त्रो में रेखागणित का प्रकाश किया है, क्योकि वेदि की रचना में रेखागणित का भी उपदेश है । जैसे तिकोन, चौकोन, श्येन पक्षी के आकार और गोल आदि वेदि का आकार किया जाता है, सो आर्यों ने रेखा- गणित ही का दृष्टान्त माना था । क्योंकि ( परो अन्त: पृ० ) पृथिवी का जो चारों ओर घेरा है, उसको परिधि तथा ऊपर से अन्त तक जो पृथिवी की रेखा है, उसको व्यास कहते है । इसी प्रकार से इन मन्त्रो में आदि, मध्य और अन्त आदि रेखाओ को भी जानना चाहिये । इसी रीति से तिर्यक्, विषुवत् रेखा आदि भी निकलती है । ( कासीत् प्र ० ) अर्थात् यथार्थ ज्ञान क्या है? ( प्रतिमा ) जिससे पदार्थों का तोल किया जाय, वह क्या चीज है? ( निदानम्) अर्थात् कारण जिससे कार्य उत्पन्न होता है, वह क्या चीज है? ( आज्यं ) जगत् में जानने के योग्य सारभूत क्या है? परिधि किसको कहते है? ( छन्दः) स्वतन्त्र वस्तु क्या है? (प्र ० उ ० ) प्रयोग और शब्दो से स्तुति करने के योग्य क्या है (परिधिः ) प्रश्नों का उत्तर यथावत् दिया जाता है - ( यद्देवा देव ० ) जिसको सब विद्वान् लोग पूजते हैं, वही परमेश्वर प्रमा आदि? इन सात ' ' ' है । इस तरह से तीनहै । इन मन्त्रों में भी प्रमा और परिधि आदि शब्दों से रेखागणित साधने का उपदेश परमात्मा ने किया नाम वाला प्रकार की गणितविद्या आर्यों ने वेदो से ही सिद्ध की है और इसी आर्यावर्त देश से सर्वत्र भूगोल में गई है' (पृ० १६६) । इस पर हमारा इतना ही कहना है कि इन दोनो मन्त्रों का दयानन्द के द्वारा किए गए अर्थ से थोड़ा सा भी संबन्ध नहीं हैं! कोई भी व्यक्ति स्वतन्त्र रूप से शिल्पविद्या का प्रतिपादन करते हुए कह सकता है कि मैंने इन्हीं है क्योंकि प्रमाण का अभाव दोनों ही स्थलो में समान है । शिल्पशास्त्र में भी इसी तरह की रेखाएँ मन्त्रों से यह अर्थ निकाला यहाँ परमात्मा प्रमा, अर्थात् यथार्थतयाठगने का दयानन्द का यह अनोखा तरीका है । पहले प्रभा शब्द का अर्थ बुद्धि किया था और अब होती है । अबोध व्यक्तियों को
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बंदाथपारिजातः १३१४ पृष्ठावरणमुक्तम् ।,,., 1 उक्तः उत्तरे तु परमात्मा प्रमा यथार्थतथा ज्ञाता प्रतिमा परिमाणकर्ता इत्यर्थः कृत परिधिश्च तत्कथ व्यापकं भवति? वेदिश्च कथ सवतः सूत्रवेष्टिता परिधिः सम्भवति । सङ्गमनीयो यज्ञः कः? वेद्यां क्रियमाणो ज्योतिष्टोमादिश्चेत् कथ स मध्ये व्यासाख्यो मध्यरेखाख्यो भवति । भूगोलस्य ब्रह्माण्डगोलस्य वा स कथ नाभिः? सर्वथापि पदवाक्यप्रमाणबहिर्भूतो गणितज्ञानामुपहासास्पदमेवास्य भाष्यमिति विद्वासो विचारयन्तु । सूत्रादिसम्मतः प्रथममन्त्रस्यायमर्थ –अत्रापि ब्रह्मोद्य ( ऋत्विजामन्येषां च ब्रह्मवादिनां यद्विहितमभीष्ट सिद्धिफलक परस्परं धर्मंब्रह्मादिसम्बन्धिप्रश्नप्रतिवचनरूपं कर्म ) प्रकृतम्, पूर्वेण मन्त्रेण यजमानोऽध्वर्युं पृच्छति - 'पृच्छामि त्वा परमन्तः पृथिव्याः पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः । पृच्छामि त्वा वृष्णोऽश्वस्य रेतः पृच्छामि वाचः परमं व्योम | ' ( वा० सं ० २३।६१ ), 'यजमानोऽध्वर्युं पृच्छामि त्वेति' ( का० श्री ० सू० २०।७।१४ ) इति कात्या- यनवचनात् । हे अध्वर्यो, पृथिव्याः परमन्तमवधिभूतं पर्यन्तं त्वामहं पृच्छामि ( द्विकर्मको धातु ) । यत्र यस्मिन् स्थले भवनस्य नाभिः कारणं तदपि त्वां पृच्छामि । वृष्ण: सेक्तुः प्रकृतस्य प्रजापतिरूपस्याश्वस्य रेतो वीयं त्वां पृच्छामि । वाचो वाण्यास्त्रयीलक्षणायाः परममुत्कृष्टं व्योमस्थानं त्वां पृच्छामि । ' इमं वेदिरित्युत्तरमाहाध्वर्युः, ' इयं वेदिरित्यध्वर्युः' ( ), का० श्र ० २०१७।१५ इति कात्यायनसूत्रात् । इयमुत्तरवेदिः पृथिव्याः परोऽन्तः वेदेः सर्वपृथ्वीरूपत्वात् । देवानां हिताय असुराणां सकाशाद् वामनो विष्णुर्मृगचर्मपरिमितं पृथिव्या भागं दानरूपेण प्रतिगृहीतवान् । स एव पृथिव्याः सारो देवयजनस्थानरूपः । तस्यापि साररूपा वेदिरिति ब्राह्मणाख्यानेषु श्रूयते । अयमश्वमेधाख्यो यज्ञः भुवनस्य प्राणिजातस्य नाभिः कारणम्, ' यज्ञाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते' ( श० १।९ | १ | ५ ) इति श्रुतेः । यज्ञादेव पर्जन्यवृष्ट्य-न्नरेतआदिपञ्चाग्निक्रमेणापः पुरुषवचसो भवन्तीति पञ्चाग्निविद्यायां सर्वप्राण्युत्पत्तिरुक्ता । वृष्णः प्रजापतिदृष्ट्यो-पास्यमानस्याश्वस्य रेतोऽयं सोमः प्रजापतिरूपस्याश्वस्य रेतसो लताविशेषरूपस्य सोमस्य जातत्वात् । अयं ब्रह्मा ज्ञाता, प्रतिमा अर्थात् परिमाणकर्ता, यह अर्थ किया जाता है । परिधि का अर्थं पृष्टावरण किया गया है । यह व्यापक कैसे हो सकती है? चारो तरफ सूत्र से वेष्टित वेदि को परिधि कैसे कह सकते हैं? सगमनीय यज्ञ क्या है? वेदि मे क्रियमाण ज्योतिष्टोम आदि यदि यह है, तो वह मध्य में व्यास अर्थात् मध्यरेखा वाला कैसे हो सकता है? यह भूगोल अथवा ब्रह्माण्डगोल का नाभि कैसे होगा? दयानन्द का यह भाष्य पद, वाक्य और प्रमाण से बहिर्भूत है और गणितज्ञो की दृष्टि से सर्वथा उपहासास्पद है, इस पर विद्वद्गण स्वयं विचार करें । प्रथम मन्त्र का सूत्रादि संमत अर्थ दूसरा ही है । यहाँ भी ब्रह्मोद्य अर्थात् ऋत्विक और अन्य ब्रह्मवादियों के बीच अभीष्ट सिद्धि देने वाला परस्पर धर्म और ब्रह्मविषयक प्रश्न-प्रतिवचनात्मक संवाद ही प्रकृत है । प्रथम मन्त्र के द्वारा यजमान अध्वर्यु से ---पूछता है । वह मन्त्र है 'पृच्छामि त्वा' । इसका यह विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र में प्रतिपादित है । इसका अर्थ यह है - हे अध्वर्यो, मैं तुमसे यह पूछता हूँ कि इस पृथिवी की परम अवधिभूत परिधि क्या है? यह धातु द्विकर्मक है । जिस स्थान में इस जगत् का कारण छिपा है, उसको भी मैं तुमसे जानना चाहता हूँ । प्रजापतिरूप अश्व का वीर्य क्या है? यह भी मैं तुमसे जानना चाहता हूँ । इस त्रयीलक्षण वेदवाणी का जो उत्कृष्ट स्थान है, उसके संबन्ध में भी मैं तुमसे पूछता हूँ । इन प्रश्नों का उत्तर 'इयं वेदिः' इत्यादि मन्त्र में दिया गया है । कात्यायन श्रौतसूत्र में इस मन्त्र का यही विनियोग बताया गया है । इसका अर्थ है - यह उत्तर वैदि इस पृथ्वी की परिषि, परम अवधि हैं, क्योंकि वेदि सारी पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती है । देवताओं का हित साधन करने के लिए वामन रूप धारी भगवान् विष्णु ने असुरों के पास से मृगचर्म के बराबर पृथ्वी के भाग को दान के रूप में प्राप्त किया था । पृथिवी का यह सार भाग ही देवताओं के भजन का उत्कृष्ट स्थान है । वेदि इस उत्कृष्ट स्थान का भी सार है । यह कथा ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रसिद्ध है । यह अश्वमेध नामक यज्ञ सारे भुवनों और उनमें रहने वाले प्राणियों का कारण है । शतपथ श्रुति में यह बताया है कि यज्ञ से प्रजा की उत्पत्ति होती है । यज्ञ से ही पर्जन्य, वृष्टि, अन्न, वीर्य आदि के क्रम से सारे प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन पंचाग्निविद्या में किया गया है । प्रजापति की दृष्टि से उपास्यमान अश्व का वीर्यस्वरूप यह सोम है, क्योकि प्रजापति रूप अश्व के वीर्यं से ही सोम
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वेदार्थपारिजातः १३२० ऋत्विग्विशेषस्त्रयीरूपाया वाचः परमं व्योमस्थानम्, ब्रह्मणस्त्रिवेदसंयोगात् । अत एव त्रिवेदविदेव ब्रह्मा भवति ॥ स्वदृष्ट्या वेदत्रयोक्तकर्मव्यङ्गतायाः समाधानकारकत्वात् । अश्वमेघप्रकरणगतोऽय मन्त्रः । तस्मात् सूत्रब्राह्मणानुसा- र्ययमेवार्थः । नात्र गणितविद्याया दूरतोऽपि सम्बन्धः । द्वितीयस्य मन्त्रस्याप्यर्थं उच्यते - इतः पूर्वस्मिन्नासदीये सूक्त सृष्टेविज्ञानत्वमुक्तम् । यो यज्ञ इति सप्तर्चे सूक्त यज्ञादीनां केषाञ्चिद् भावाना सृष्टिः प्रतिपाद्यते । तत्र प्रथमेन मन्त्रेण प्रजापतेः सकाशाद् विस्तृतस्य यज्ञस्य सृष्टिरुक्ता । द्वितीयेन मन्त्रेण विश्वसर्जनोपायत्वेन प्रजापतिना सृष्टे यज्ञे विश्वस्य स्रष्टारो विश्वसृजो देवा विश्वसर्जनाय तं यज्ञमन्वतिष्ठन्नित्युक्तम् । तस्मिन् समये जगतोऽनुत्पत्तेर्जगदन्तःपातिनो यागोपकरणभूताः पदार्थाः कथमासन्नित्यनेन मन्त्रेण प्रश्नः क्रियते । यद् यदा विश्वे सर्वे साध्या देवा देव प्रजापतिमयजन्त तदानी तस्य यज्ञस्य प्रमा प्रमाणमियत्ता का कथम्भूता आसीत्? तथा प्रतिमा हविष्प्रतियोगित्वेन मीयते निर्मीयत इति प्रतिमा देवता सा च यज्ञस्य का आसीत्? तथा निदानम् आदिकारणं यागेऽप्रवृत्तस्य प्रवृत्तिकारण प्रवर्तकं फलं किमासीत्? आज्यं घृतमेतदुपलक्षितं हविर्वा तस्य यज्ञस्य किमासीत्? तथा परिधिः परितो धीयन्त इति परिघयो बाहुमात्रा: पलाशादिवृक्षजास्त्रयः । परिपूर्वाद्दधातेः ' उपसर्गे घोः किः' ( पा ० सू० ३।३।९ २ ) इति किप्रत्ययः । जातित्वादेकवचनम् । परिधय क आसन्नित्यर्थः । तस्य यज्ञस्य गायत्र्यादिकं छन्दः किमासीत्? तथा प्रउगं उक्थं आज्यप्रउगादीना शस्त्राणामुपलक्षणमिदम् । तथा चाज्यप्र-उगादीनि शस्त्राणि कान्यासन्? प्रमापदस्य यथार्थज्ञानसाधिका बुद्धिरित्याद्यर्थस्तु पूर्वापरप्रसङ्गविधुर एव । 'विश्वेदेवा देवमयजन्नित्यनेन कथं सर्वेषां प्रश्नानामुत्तराणीति तु विद्वासो विदाङ्कुर्वन्तु । तस्माद् यदा विश्वेदेवा देव प्रजापतिमयजन्त तदानीं लता की उत्पत्ति मानी जाती है । यह ब्रह्मा नाम का ऋत्विक् त्रयीस्वरूपिणी वाणी का परम उत्कृष्ट स्थान है, क्योकि यह ब्रह्मा सभी वेदों का ज्ञाता होता है । तीनों वेदों का ज्ञाता ही ब्रह्मा बनाया जाता है, क्योकि वह अपनी ओर से तीनो वेदो के द्वारा प्रतिपादिक कर्म में कोई कमी आ जाने पर उसका समाधान प्रस्तुत करता है । यह मन्त्र अश्वमेध के प्रकरण में पठित है । अतः इसका श्रौतसूत्र और ब्राह्मण ग्रन्थों के आधार पर किया गया यह अर्थ ही सही माना जायगा । इस मन्त्र के साथ गणितविद्या का दूर का भी कोई सबन्ध नही है । दूसरे मन्त्र का अर्थ भी हम बताते है । इससे पहले नासदीय सूक्त में सृष्टि का रहस्य समझाया गया है । 'यो यज्ञ० ' इत्यादि सात ऋचा वाले इस सूक्त में यज्ञ जैसे कुछ भावों की सृष्टि का प्रतिपादन किया जाता है । इनमें से प्रथम मन्त्र में प्रजापति से विस्तृत यज्ञ की सृष्टि की बात बताई गई है । दूसरे मन्त्र में यह बताया गया है कि विश्व की सृष्टि के उपाय के रूप में प्रजापति ने जब यज्ञ की सृष्टि कर दी, तो विश्व की रचना करने वाले देवगण अपने इस कार्य की सफलता के लिये यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं । उस समय जब जगत् की उत्पत्ति नही हुई थी, तब जगत् में ही पैदा होने वाले, गिने जाने वाले यज्ञीय उपकरणों की सत्ता कैसे मानी जा सकती है? इस दूसरे मन्त्र मे इसी संबन्ध में प्रश्न उठाये गये है । जब कि अभी सृष्टि नहीं हुई थी, उस समय सभी साध्य देवों ने प्रजापति यज्ञ का अनुष्ठान किया था, तो तब उस यज्ञ की प्रमा, प्रमाण अर्थात् इयत्ता किस तरह की थी? तथा जिसके लिये हवि दी जाती है, वह प्रतिमा अर्थात् देवता उस यज्ञ की कौन थी? तथा उस यज्ञ में प्रवृत्त कराने वाला आदि कारण अर्थात् प्रवर्तक फल क्या था? आज्य ( घृत ) अथवा इससे उपलक्षित होने वाला आहुति द्रव्य उस यज्ञ का क्या था? तथा एक निश्चित परिमाण वाली पलाश वृक्ष से बनाई जाने वाली परिधियाँ उस समय किससे बनाई गई थी? परिधि शब्द की निष्पत्ति परि उपसर्गपूर्वक ' घा' धातु से ' कि' प्रत्यय के द्वारा होती है । यहाँ जाति में एक वचन है । उस यज्ञ के गायत्री प्रभूति छन्द क्या थे? ओर आज्य, प्रउग आदि शस्त्र भी क्या थे? इस मन्त्र के प्रभा पद का अर्थ ' यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करने वाली बुद्धि' करना पूर्वापर प्रसंग के सर्वदा विपरीत है । ' विश्वेदेवा: ' इस मन्त्र से उक्त सभी प्रश्नों का समाधान कैसे हो जाता है? इस बात को तो स्वयं विद्वान् ही जानने का प्रयत्न