वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 541–550
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 541–550
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बंदार्थपारिजातः १४३६ 'यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरत सह । त लोक पुव्य यज्ञेय यत्र देवा. सहाग्निना ॥ ' ( वा० स० २०/२५ ) । यत्त्वत्रोक्तम्— 'यथा सूर्यचन्द्रौ राजाना सर्वमूर्तद्रव्यप्रकाशकौ भवतः, तथा प्रकाशन्याययुक्तौ व्यवहारौ त्रीणि सदासि भूषथः भूषय- तोऽलङ्कुरुत' । विदथे ताभि. समाभिरेव युद्धे पुरुण बहूनि विजयादीनि सर्वाणि वस्तूनि प्राणिजातानि च भूषयन्ति' (पृ० २४९) इति, तत्त्वसङ्गतमेव, उदक्षरत्वात् । तथाहि— राजाना इतिपदेन कथ चन्द्रसूर्यवत्प्रकाशमानयो. सूर्यचन्द्र- शीलयोर्व्यवहारयोर्ग्रहणम्? मूले व्यवहारपदाभावात् । राजग्रहणमेव कुतो न स्यात्? इन्द्रावरुणौ राजानौ कुतो न ग्राह्यौ? लक्षणापि शक्यार्थसम्बन्धिन्येव भवति सत्यामनुपपत्तो यथाश्रुतार्थग्रहणे । न चात्रानुपपत्ति पश्याम । एवमेव सद शब्देन सवनोऽपि ग्रहीतु शक्यते यागप्रसङ्गे श्लिष्यते च । वेदेपु त्रीणि सवनानि प्रसिद्धानि न तथा सदासि प्रसिद्धानि, ताभि पुरूणि विजयादीनीत्यत्रापि कि बीजम्? 'उदु ब्रह्माणमितष्टे वे तीतरावहरह शस्ये' (आश्व० श्री० सू० ७/४) सूत्रेण माध्यन्दिने सवने अच्छावाकशस्त्र एतत्सूक्तम् । तथा चैव मन्त्रार्थ -हे राजानौ इन्द्रावरुणौ विदथेऽस्मिन् यज्ञे विश्वानि व्याप्तानि पुरूणि यजनीयै. सोमादिभि पूर्णानि त्रीणि सदासि सवनानि परिभूषथ सर्वतोऽलङ्कुरुत । हे इन्द्र त्व जगन्वान् यज्ञ प्रतिगतवानसि । अपि सम्भाव- नायाम् । यतोऽह यत्र व्रते यज्ञे वायुकेशान् वायुवत् चञ्चलरश्मीन् गन्धर्वान् सोमरक्षकान् स्वानभ्राजादीन् मनसाऽपश्यम् । ते च स्वानभ्राजादय तैत्तिरीयके स्पष्टमुक्ता । 'स्वानभ्राजा धारेवम्भारे हस्तसुहस्तकृशानवैते व सोमकृपणास्तान् रक्षध्व भावोदमन्' (तै० स ० १।२।७ ) तस्मादत्र मन्त्रे राजधर्मस्वप्नदर्शनमक्षरार्थाज्ञानमूलकमेव मन्त्राक्षरास्वारस्यात् । यदप्युक्त सभात्रय निरूपयता-' राजार्यसभा तत्र विशेषतो राजकार्याण्येव भवेयु, द्वितीयार्यविद्यासभा तत्र विशेषतो विद्याप्रचारोन्नती एव कार्ये भवत । तृतीयार्यधर्मसभा, तत्र विशेषतो धर्मोन्नतिरधर्महानिश्चोपदेशेन कर्त्तव्या । परन्त्वेतास्तिस्र. सभाः सामान्ये कार्ये मिलित्वैव सर्वानुत्तमान् व्यवहारात् प्रजासु प्रचारयेयु ' इति, यत्रैतासु धर्मात्मभि- है— प्रथम राज्य प्रबन्ध के लिये एक आर्य राजसभा, जिससे कि विशेष करके सब राज्य कार्य हो सिद्ध किये जायें । दूसरी आर्य विद्या सभा, जिससे कि सब प्रकार की विद्याओ का प्रचार होता जाय । तीसरी आर्य धर्म सभा, जिससे कि धर्म का प्रचार और अधर्म की हानि होती रहे । इन तीन सभाओ से युद्ध मे सब शत्रुओ को जीत कर नाना प्रकार के सुखो से विश्व को परिपूर्ण करना चाहिये' (पृ० २५० - २५१ ), किन्तु यह व्याख्या असंगत है, मन्त्राक्षरो मे इसका कोई सबन्ध नही है । जैसे कि ' राजाना' इस पद से चन्द्र और सूर्य के समान प्रकाशमान व्यवहारो का ग्रहण कैसे होगा? मूल में तो व्यवहार शब्द विद्यमान है नहीं । इससे राजा का ग्रहण क्यो नही होगा? इन्द्र और वरुण का यह ' राजाना', जो कि राजानो के स्थान पर वैदिक व्याकरण से सिद्ध रूप है, पद से ग्रहण क्यो नही होगा? लक्षणा भी शब्द अर्थ से संबद्ध ही हो सकती है । वह भी तब, जब कि अर्थ जैसा सुनाई पड़ता है, उसकी उपपत्ति न बनती हो । यहा कोई अनुपपत्ति नही दिखाई देती । इसी तरह से 'सद:' शब्द से सवन का भी ग्रहण हो सकता है और उसका याग से संबन्ध वैसा भी है । वेदो में तीन सवन जिस तरह से प्रसिद्ध है, उस तरह से सभाए प्रसिद्ध नही है । उनसे युद्ध में विजयी की प्राप्ति होती है, ऐसा अर्थ करने में क्या प्रमाण है? आश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार मन्त्र का अर्थ यह होगा--- हे इन्द्र और वरुण राजाओ, हमारे इस यज्ञ में यजनीय सोम आदि सामग्रियों से परिपूर्णं तीन सवनो को आपलोग अलंकृत करें । हे इन्द्र, क्या तुम यज्ञ में जाने वाले हो । मैंने उस यज्ञ मे पवन के समान चंचल गतिवाले, सोम के रक्षक स्वानभ्राज प्रभृति गन्धर्वो को जाते देखा है है । स्वानभ्राज प्रभूति गन्धर्वो का उल्लेख तैतिरीय , संहिता में मिलता है । इस तरह से इस मन्त्र में राजधर्म के वर्णन के सपने देखना मन्त्राक्षरो का ठीक परिज्ञान न होने से ही संभव हो सकता है, मन्त्र के शब्दों का इस अर्थ के बोधक में कुछ भी स्वारस्य नही । तीन सभाओ और उनके कार्यों का उल्लेख करने के बाद दयानन्द ने लिखा है कि ' इन सभाओं में धर्म को जानने वाले विद्वान् सही और गलत बात का निश्चय करके कर्तव्य का विधान और अकर्तव्य का निषेध करते हैं । ऐसा करने से प्रजा सदा -सुखी रहती है । इसके विपरीत जहाँ एक राजा रहता है, वहाँ की प्रजा दुःखी रहती है । ईश्वर का कहना है कि जहाँ सभा के
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वेदार्थपारिजाता १४४० प्रजा. सदैव सुखयुक्ता भवन्ति । यत्रैको विद्वद्भि सारासारविचारेण कर्त्तव्या कर्त्तव्यस्य प्रचारो निरोधश्च क्रियते । तत्र सर्वा यत्र सभया राजप्रबन्धो भवति तत्र सर्वाभ्य मनुष्यो राजा भवति तत्र पीडिताश्चेति निश्चय । अवश्यमत्र ईश्वरोऽभिवदति विज्ञातवान् स राजसभामर्हति प्रजाभ्यो हित जायते । ( व्रते ) यो मनुष्य सत्याचरणे मनता विज्ञानेन सत्य न्याय जगन्वान् वायुवत् दूतप्रचारेण विदित- नेतरश्च । गन्धर्वान् पूर्वोकानु सभासु पृथिवी राजपालनादिव्यवहारेषु कुशलान् अपि वायुकेशान्चिकीषून् धर्मात्मन. सभासदः. स्थापयितुमहमाज्ञापयामिसर्वव्यवहारान् सभासद कुर्यात्नेतराश्वतीश्वरोपदेशः। केशा सूर्यरश्मयसर्वैर्मन्तव्यतद्वत्सत्यन्यायप्रकाशकान्' इति । तदेतत्सर्वं तत्कपोलकल्पितमेवसर्वहित । तन्नाम्नीना सभाना श्रौतसूत्रैश्च समर्थ्यन्ते, न तथात्र व्याख्याने ब्राह्मणादिभिस्तित्रसत्त्वे प्रमाणाभावात्. सभास्तत्कार्याणि। यथा सनातनिभाष्येषुतद्विभागाश्चप्रतिपादितासमर्थ्यन्तेअर्था। ईश्वरोऽत्राभिवदतीत्यत्रापिमन्त्रैर्ब्राह्मणै मूल चिन्त्यम् । यत्र सभया राज- जगन्वानित्यस्य कर्मत्वेन सत्यस्य. प्रबन्धो भवति तत्रैव प्रजाहित भवतीत्यपि न मन्त्रस्वारस्यम् । व्रते सत्यधर्माचरणे इत्यर्थकरणेऽपि किञ्चिद्? न्यायस्य च ग्रहणे कि बीजम् इति तु नोकम् । गन्धर्वानित्यस्य पृथिवीराजपालनादिव्यवहारकुशलान् एव विनिगमनेति बीजं नोपलभ्यते । नृत्यवादित्रादिकुगला नात्रार्थ इत्यत्र विनिगमनाभावात् न च राजव्यवहारप्रसङ्ग, ब्राह्मणसूत्रानु- वाच्यम्, मन्त्राक्षरै राजव्यवहारनिर्णये सत्येव तदनुरोधेनार्थनिर्णयो युक्त । अत्र तु मन्त्राक्षरैर्न तथाऽर्थनिर्णय मार्यर्थस्तूक्त एव । , ' क्षत्रस्य योनिः' (वा० स० २०११ ) इति । यदुक्तमंत्र - 'हे परमेश्वर' त्व क्षत्रस्य राजव्यवहारस्य योनिर्निमित्तमसि क्षत्रधर्मप्रबन्धकर्तृश्व तथा क्षत्रस्य नाभिरसि, राजधर्मस्य त्व प्रबन्धकर्तासि, तथैव नोऽस्मानपि कृपया राज्यपालननिमित्तान् भवतु । तथा त्व मा मा हिसीरर्था- कुरु । ( मा त्वा ) तथास्माक मध्यात् कोऽपि जनस्त्वा मा हिसीत् भवन्तं तिरस्कृत्य नास्तिको मा व्यक्ति हो सकता है, जो कि मन से द्वारा राजकाज का प्रबन्ध होता है, वहीं सारी प्रजा का हित होता है । सभा के लायक वही सारी पृथिवी के राजकाज के संचालन सत्य आचरण और न्याय के पक्ष को स्वीकार करता है । पूर्वोक्त सभाओ मे गन्धर्वो को अर्थात् की सारी बातो की जानकारी रखने में समर्थ और पवन की तरह सर्वत्र व्याप्त अपने दूतो ( गुप्तचरो ) की सहायता से दुनियाभर वालो को सदस्य बनावें । केश शब्द सूर्य की रश्मियो का द्योतक है । जैसे सूर्य की किरणें कोचारोउस तरफ प्रकाश फैलाती है, उसी तरह सभा मे रखने के लिये मै ईश्वर,, ' से सत्य और न्याय के प्रकाशक सबका हित करने की इच्छा वाले धर्मात्मा सभासदों को मानना चाहिये आदेश देता हूँ । इनसे विपरीत स्वभाव वाले व्यक्तियो को सभासद न बनाया जाय, यह मेरा आदेश वेदसभीसे सिद्ध नही हो पाती । (१० २४ ९ -२५० ), किन्तु यह सारी दयानन्द की कपोल कल्पना है, हम नामो की सभाओ की स्थिति, उस तरह से दयानन्द की जैसे सनातनियों के भाष्यो में प्रतिपादित अर्थों की पुष्टि मन्त्र, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र आदि से भी होती है व्याख्या में प्रदर्शित तीन सभाओ की उनके कार्यों की और विभागो की पुष्टि इनसे नहीं होती । इस मन्त्र मे ऐसी बात ईश्वर कहता है, इसकी भी पुष्टि में कोई प्रमाण नही है । जहाँ से सभा द्वारा राजकाज का सचालन होता है, वही प्रजा का कल्याण होता है, यह रूप मे सत्य और ' ', भी मन्त्र का अभिप्राय नहीं है । व्रत का अर्थ सत्य धर्म का आचरण है । इसमे जगन्वात् इस क्रिया के कर्म के होगा न्याय का ग्रहण करने में प्रमाण क्या है? यह दयानन्द ने नही बताया । गन्धर्व पद का राजकाज चलाने में कुशल, यह अर्थ कैसे इसमें भी कोई प्रमाण नहीं दिया गया । गन्धर्व का अर्थ नाचने वाले मे कुशल नही होगा, इसमे क्या तर्क आप देते है । राज व्यवहार के प्रसंग में नाचने -गाने वालो का उल्लेख कैसे हो सकता है, आपकी यह बात भी यहाँ इसलिये लागू नही होगी कि इस मन्त्र में राज व्यवहार का वर्णन है, इस बात के सिद्ध हो जाने पर ही आप ऐसा कह सकते है, किन्तु मन्त्र में आये पदो से इस तरह का अर्थ नही निकलता । ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थों के आधार पर इस मन्त्र का अर्थ निकलता है, उसको हम पहले अभी मिटा चुके है । ' क्षत्रस्य योनिरसि ० ' इस मन्त्र का अर्थ यह किया गया है -' हे राज्य के देने वाले परमेश्वर, आप ही राज्यसुख के परम कारण है । आप ही राज्य के जीवन हेतु है तथा क्षत्रिय वर्ण के राज्य का कारण और जीवन सभी आप ही है । हे जगदीश्वर, सब प्रजा आपको छोड़कर किसी दूसरे को अपना राजा न माने और आप भी हम लोगो को कभी मत छोड़िये । किन्तु आप और हम
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वार्थपारिजातः १४४१ न्मम तिरस्कारं कदाचिन्मा कुर्या । यतो वय भवत्सृष्टौ राज्याधिकारे सदा भवेम' (पृ० २५० ) इति, तदपि विशृङ्खलम्, , वक्तृत्वनिर्णयस्य यथेष्टत्वेऽर्थस्यापि यथेष्टत्वापत्त्या शाब्दन्यायातिपातात् । क्षत्रपदस्यापि क्षत्रजातिरर्थ कोषादिसिद्धो राजव्यवहारस्तु लाक्षणिक । लक्षणा चानुपपत्तिमूलिका, न चेह काचिदनुपपत्तिर्दृश्यते । नाभिरित्यस्य 'प्रबन्धकर्तासि' इत्यपि निर्मूलम्, मा त्वा हिंसीत्, नहीश्वरस्य हिसा सम्भवति, तस्य शस्त्राद्यगोचरत्वेन नित्यत्वात् । त्व मा मा हिसीरित्यपि निरर्थकम्, कारणमन्तरा परमेश्वरकर्तृकहिसाया अप्राप्तत्वात् । लाक्षणिकार्थाश्रयणमन्तरा कस्यापि पदस्य यत्र व्याख्यान न कर्तुं शक्यते, तद्व्याख्यानम पव्याख्यानमेव । ' कात्यायनादिभिर्महर्षिभिरस्य मन्त्रस्यासन्द्याधाने विनियोग उक्त सोमासन्दीवदासन्दी जानुमात्रपदी वेद्योर्निदधाति क्षत्रस्य योनिरिति' (का० श्र ० सू० १९/ ४/ ८) इति वचनात् । जानुप्रमाणपादामासन्दी वेद्योर्मध्ये निदधाति, सोमासन्दीवसदिति । मुञ्जरज्जुकृताया आसन्द्या द्वौ पादौ दक्षिणवेद्या द्वावुत्तरवेद्या यथा भवेता तथेति तदर्थ । तथा चासन्दी- देवताको द्विपदागायत्रीरूपो मन्त्र । तथा च हे आसन्दि, त्व क्षत्रस्य शासकस्य राज्ञो योनिरुत्पत्तिस्थानमसि, आसन्द्यामभि- षिक्ताधिराजस्य राज्ञ क्षत्रगुणधर्मार्हत्वात् । क्षत्रनाभि नहन बन्धन चासि । राजसिहासनस्यैव क्षत्रगुणाश्रयत्वात् । सिहासन केन्द्रीकृत्य राजधर्मप्रवृत्तेः । कृष्णाजिनमस्यामास्तृणाति मा त्वेति' ( का० श्र० सू० १९ ४ ८) । अस्यामासन्द्यां कृष्णाजिन- माच्छादयन् मा त्वेति मन्त्रेणेति सूत्रार्थं । इयं कृष्णाजिनदेवत्या प्राजापत्या गायत्री । तत्र यज्ञाध्यासेन प्रार्थयते -हे कृष्णा-जिनाभिन्न यज्ञ, आसन्दी त्वा त्वा मा हिसीत् । राजसिहासनस्योग्रत्वात् हनन प्राप्त तन्न स्यात् । त्वं च मामा मा हिसी: मा जहि । ' यज्ञो वै कृष्णाजिन यज्ञस्य चैवात्मनश्च हिसायै' (श० १२२८ ३ ९ ) इति श्रुतेः । सर्वथापि दयानन्दीयोऽर्थः कपोल- कल्पित एव । सायणाद्युक्तार्थस्तु श्रुतिसूत्रानुसार्येवेति स्पष्टम् । राजधर्मस्यात्र प्रसङ्ग एव नास्ति । लोग परस्पर सदा अनुकूल वर्ताव करें' (पृ० २५१ ) यह व्याख्या भी उटपटाग ही है, वक्ता को मनमानी करने की छूट दी जाय तो वह इसी तरह से मनमाना अर्थ करेगा और इस तरह से शब्दार्थ संबन्ध को व्यवस्था में गडबडी हो जायगी । क्षत्र पद का अर्थ क्षत्रिय जाति ही होगा, कोश आदि से संपन्न राजव्यवस्था में उसका प्रयोग लाक्षणिक ही माना जायगा । लक्षणा तभी होती है, जबकि उसका शक्य अर्थ सही न बैठता हो । ऐसी कोई अनुपपत्ति क्षत्र पद का अर्थ करते समय यहा नही दिखाई पड़ती । नाभि का अर्थ प्रबन्ध करने वाला भी सही नही है । मा त्वा हिसीत् का संबन्ध परमेश्वर से नही किया जा सकता, क्योकि उसकी किसी भी प्रकार से हिंसा नहीं की जा सकती, वह तो नित्य है, उसकी शस्त्र से कुछ हानि कैसे हो सकती है? तुम मुझे मत मारो, यह भी असंगत है, क्योकि परमेश्वर बिना कारण किसी को क्यो मारेगा? कात्यायन प्रभूति महर्षियो ने इस मन्त्र का विनियोग आसन्दी के आधान में किया है । अपने घुटनो के बराबर ऊंचे पैरो वाली आसन्दी (कुडसी ) को दो वेदियों के बीच में रखा जाता है । मूंज की रस्सी से बनी इस आसन्दी के दो पैर दक्षिण वेदि पर और दो पैर उत्तर वेदि पर रखे जाते हैं । इस आसन्दी देवता के आवाहन में इस द्विपदा गायत्री छन्द वाले मन्त्र का विनियोग है । इसका अर्थ यह होगा -हे आसन्दि, तुम शासक राजा को उत्पन्न करने वाली हो, क्योंकि आसन्दी पर बैठा कर अभिषेक करने पर ही राजा राज सिंहासन का और प्रजा के पालनरूप क्षत्रगुण का भी अधिकारी होता है । तुम क्षात्र धर्म की नाभि हो, बन्धन हो, क्योकि राजसिंहासन को केन्द्रित करके ही सारी शासन व्यवस्था चलती है । 'मा त्वा' इत्यादि अंश का उच्चारण करते हुए आसन्दी पर काला मृगचर्म बिछाया जाता है । इसका कृष्णाजिन देवता और छन्द प्राजापत्या गायत्री है । इसी को यज्ञ मानकर प्रार्थना की जाती है । हे कृष्णाजिन से अभिन्न यज्ञ, आसन्दी तुम्हें कुछ नुकसान न पहुंचावे । राजसिंहासन बहुत उग्र होता है, उससे कुछ हानि की संभावना हो सकती है । साथ ही तुम मुझे भी कुछ नुकसान मत पहुंचावो । कृणाजिन मे यज्ञ का आरोप करने में और इस मन्त्र का यह अर्थ कहने में शतपथ- ब्राह्मण के वचन भी सहायक हैं । दयानन्द का अर्थ तो सर्वथा कपोलकल्पित है । सायण का अर्थ इसके विपरीत श्रुति, सूत्र आदि से समर्थित है । राजधर्म को तो यहां कोई चर्चा हो नही है ।
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वेदार्थपारिजात १४४२ 'यत्र ब्रह्म च' इति । अत्र यदुक्तम् —' यत्र देशे ब्रह्म परमेश्वरो वेदो वा ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च तत्सर्वं ब्रह्म तथा क्षत्र शौर्यधैर्यादिगुणवन्तो मनुष्याश्चैता सम्यञ्च यथावद्विज्ञाने युक्ताविरुद्धौ चरत सह त लोकं त देश पुण्ययुक्तमशेषं यज्ञकरणे- च्छाविशिष्ट जानीम । यत्र देवा महाग्निना यस्मिन् देशे विद्वासोऽग्निना परमेश्वरेणाग्निहोत्रादियज्ञानुष्ठानेन च सह वर्तन्ते, तत्रैव प्रजा सुखिन्यो भवन्तीत्यर्थं ' (पृ० २५० ) इति, तदपि यत्किञ्चित् परमेश्वरस्य सर्वव्यापकत्वेन यत्रेतिविशेषणायोगात् । वेदस्य ब्रह्मवेदनस्य चाधिकृतपुरुषाश्रयत्व न देशाश्रयत्वम्, तथैव शौर्यधैर्यादयोऽपि न देशधर्माः । तादृशब्रह्मक्षत्रयोश्च गुणरूपत्वान्न विज्ञानाश्रयत्वम् । देशो नहि यज्ञेच्छाविशिष्ट सम्भवति, इच्छाया देशस्थजनाश्रयत्वात् । अग्नि देवादि-शब्दाच प्रसिद्धार्थका एव । न तयो परमेश्वरो विद्वासश्चार्थ, प्रसिद्धार्थत्यागे हेत्वभावात् । सायणादिसम्मतोऽर्थस्तु —पुण्य पवित्र लोक प्रज्ञेष प्रज्ञयोपासनया ज्ञानेन वा इष्यत इति तथोक्तम्, जानीयामिति । लोकमप्राप्ताना लोकज्ञान न सम्भवतीत्यतस्तल्लोकगमन प्रार्थ्यते । त क यत्र लोके ब्रह्मविद्यातपोभ्या युक्ता ब्राह्मणजाति क्षत्रं शौर्याद्युपेता क्षत्रियजातिश्च सहावियोगेनान्योन्यसहयोगेन चरतस्तिष्ठतो ब्राह्मबल क्षात्रबलं च यत्र भवत । ते च ब्रह्मक्षत्रे यत्र सम्यञ्चौ । लिङ्गव्यत्यय, समीची, सम्यक् अञ्चत, उत्कर्षमुद्गतौ तत्रैव चाग्निना अग्न्याख्येन देवेन सह देवा इन्द्रादय सञ्चरन्ति । ब्राह्मणा. क्षत्रियाश्च य देश गच्छन्ति, त देवलोक प्राप्नुयामित्यर्थः । 'देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्या पूष्णो हस्ताभ्याम् । अश्विनोर्भैषज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभि- ) - ' षिञ्चामि । ' (वा० स०२०१४ यदुक्तमत्र है सभाध्यक्ष स्वप्रकाशमानस्य सर्वस्य जगत उत्पादकस्य परमेश्वरस्य प्रसवेऽस्या प्रजायाम् अश्विनोर्बाहुभ्यां सूर्याचन्द्रमसोर्बलवीर्याभ्या पूष्णो हस्ताभ्या पुष्टिकर्तुः प्राणस्य ग्रहणदानाभ्यामश्विनो-भैषज्येन पृथिव्यन्तरिक्षौषधिसमूहेन सर्वरोगनिवारकेण सह वर्तमानं त्वा तेजसे न्यायादिगुणप्रकाशाय ब्रह्मवर्चसाय 'यत्र ब्रह्म च ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या में कहा गया है -'जिस देश में उत्तम विद्वान् ब्राह्मण विद्यासभा और राजसभा विद्वान् शूरवीर क्षत्रिय लोग ये सब मिलकर राजकार्य को सिद्ध करते हैं, वही देश धर्म और शुभ क्रियाओ से संयुक्त होकर सुख को प्राप्त होता है । जिस देश में परमेश्वर की आज्ञा का पालन होता है और अग्निहोत्र आदि सत्क्रियाओं से वर्तमान विद्वान् होते है, वही देश सब उपद्रवो से रहित होकर अखण्ड राज्य को नित्य भोगता है' ( पृ० २५१ ), यह व्याख्या भी गलत है, क्योंकि परमेश्वर तो सर्वत्र व्याप्त है, इसलिये किसी एक देश में उसका उल्लेख नही बन सकता । वेद तो ब्रह्म का ज्ञान है, वह अधिकारी पुरुष में ही होगा, किसी देश विशेष में नही । इसी तरह से शौर्य, धैर्य आदि भी किसी देश के धर्म नही होगे । इस तरह के ब्रह्म और क्षत्र का स्वरूप गुण की तरह का है, अतः उनकी सत्ता विज्ञान में नही मानी जा सकती । कोई स्थान यज्ञ की इच्छा से युक्त नही हो सकता, क्योंकि इच्छा तो किसी प्रदेश में स्थित पुरुष में ही रहेगी । अग्नि देवता प्रभृति शब्द का भी प्रसिद्ध अर्थ ही हो सकता है, इन दोनो शब्दों का अर्थ परमेश्वर और विद्वान् नहीं हो सकता, क्योंकि प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ देने में कोई प्रमाण नही है । इस मन्त्र का सायण संमत अर्थ यह है - पुण्य पवित्र लोक को मैं प्रज्ञा अर्थात् उपासना या ज्ञान के द्वारा जान जाऊं । 4 जबतक उस लोक में नहीं जायेंगे, तब तक उसका ज्ञान न प्राप्त होगा, अत: उस लोक मे जाने की प्रार्थना की जाती है । उस किस लोक में? जिस लोक में कि विद्या और तप का आचरण करने वाली ब्राह्मण जाति, शौर्य आदि गुणो से युक्त क्षत्रिय जाति के साथ एक दूसरे का सहयोग करती हुई निवास करती है और जहा ब्रह्म और क्षत्र का अत्यन्त उत्कर्ष रहता है, वही इन्द्र प्रभृति देवगण भी आते जाते रहते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि जिस स्थान में ब्राह्मण और क्षत्रिय जाते है, उस देवलोक को मैं भी प्राप्त करूं । " ' देवस्य त्वा० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने कहा है- 'हे सभाध्यक्ष, आप सब जगत् को प्रकाशित और उत्पन्न करने वाले ईश्वर की सृष्टि में प्रजापालन के लिये सूर्य- चन्द्रमा के बल- वीर्य से, पुष्टि करने वाले प्राण के ग्रहण और दान के शक्तिरूप हाथो से आपको सभाध्यक्ष होने मेंस्वीकार करते हैं । परमेश्वर कहता है कि पृथिवीस्थल और शुद्ध वायु इन औषधियों से दिन- रात में सब रोगों से तुमको निवारण करके सत्य-न्याय के प्रकाश, ब्रह्म के ज्ञान और विद्या की वृद्धि के लिये तथा परमेश्वर
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वेदार्थपारिजातः १४४३ ( ),,पूर्णविद्याप्रचाराय अभिषिञ्चामि । सुगन्धिजलैर्मूनि मार्जयामि । पृ० २५१ इति तदपि न सम्यक् निर्मूलत्वात् । 'हे सभाध्यक्ष ' इत्यस्य सम्बोधनस्य मूलानुपलम्भात् । सवितृशब्दोऽपि नवितरि सूर्ये प्रसिद्ध । तत्त्यागे बीजानुक्ते । एवमेव ,प्रसवशब्देन प्रजाग्रहणम् बाहूशब्देन बलवीर्यग्रहणमपि निर्मूलमेव । पूष्ण पुष्टिकर्तुं हस्ताभ्या ग्रहणदानाभ्यामित्यपि निर्मूलमेव । 'देवस्य त्वा' इति मन्त्रो देवस्य त्वेति गृह्णात्याग्नेयमिति' (का० ०सू० २३ २० ) इति कात्यायनसूत्रानुसारेण हविरादाने विनियुक्त । हे हवि " सवितु प्रसवे प्रेरणे सति तेन प्रेरितोऽह अग्नये त्वा अग्नीषोमाभ्या व्यासक्तदेवताभ्यां ,च अश्विनोर्देवविशेषयोर्बाहुभ्या पूष्णो हस्ताभ्या त्वा जुष्ट गृह्णामि । अशमणिबन्धयोमध्यभागे दीर्घदण्डाकारो बाहु पञ्चाङ्गलियुक्ताग्रभागो हस्त । 'अश्विनौ हि देवानामध्वर्यू', 'पूषा हि देवाना भागभुक्' तेनाध्वर्युणा स्वबाह्वोरश्विनोर्बाहुभावना स्वहस्तयोश्च पूषहस्तभावना कार्येति विज्ञायते । अर्थात् सर्वात्मकस्याग्नेर्महामहिम्नो हविग्रहण न मनुष्येण स्वमानुष-बाहुभ्या कर्तुं शक्यते । अश्विनोर्बाहुभ्या पूष्णो हस्ताभ्या तद्भावनाभाविताभ्या दिव्याभ्यामेव बाहुभ्यां हस्ताभ्या च तत्कर्तुं शक्यते । अश्विनौ च देवाना भिषजौ 1। तयोर्भैषज्येन तेजसे दीप्त्यै ब्रह्मवर्चसाय ब्राह्माय तेजसेऽभिषिञ्चामीति कथञ्चिदस्य मन्त्रस्य लिङ्गबलादभिषेकेण सम्बन्ध । 'इन्द्रस्येन्द्रियेण बलाय श्रिये यशसेऽभिषिञ्चामि । कोऽसि कतमोऽसि कस्मै त्वा काय त्वा सुश्लोकं सुमङ्गल सत्यराजना । शिरो मे श्रीर्यशो मुख त्विषि केशाश्च श्मश्रूणि । राजा मे प्राणोऽमृतं सम्राट् चक्षुर्विराट् श्रोत्रम् ॥ ' अत्रापि यदुक्तम् — 'इन्द्रस्य परमेश्वरस्य इन्द्रियेण परमैश्वर्येण विज्ञानेन बलाय उत्तमबलार्थं चक्रवतिराज्यलक्ष्मीप्राप्त्यर्थं त्वा यशसेऽ-तिश्रेष्ठकीर्त्यर्थं चाभिषिञ्चामि । कोऽसि, हे परमात्मन् त्व सुखरूपोऽसि, भवानस्मानपि सुखयुक्तान् करोतु ॥ कतमोऽसि के परमैश्वर्य और राज्य के विज्ञान से उत्तम सेना, सर्वोत्तम लक्ष्मी और सर्वोत्तम कीर्ति को प्राप्ति के लिये मैं तुम लोगो को सभा करने की आज्ञा देता हूँ कि यह आज्ञा राजा और प्रजा के प्रबन्ध के अर्थ में है । इसमे सब मनुष्य लोग इसका यथावत् प्रचार करें' (पृ० २५२ ) । यह अर्थ भी निराधार होने से सही नही है । 'हे सभाध्यक्ष ' यह संबोधन मूल मे विद्यमान नही हैं । सवितृ शब्द भी सूर्य के अर्थ मे प्रसिद्ध है । इस अर्थ का त्याग करने का कोई कारण नजर नही आता । इसी तरह से प्रसव शब्द से प्रजा का, बाहू शब्द से बल-वीर्य का और पूषन् शब्द से पुष्टि के कर्ता के ग्रहण और दानरूप दो हाथों का ग्रहण करने में भी कोई प्रमाण नहीं है । वास्तव में कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार इस मन्त्र का विनियोग हवि के ग्रहण मे किया गया है । हे हवि, सविता देवता की प्रेरणा से मैं तुम्हे अग्नि देवता के लिये, आग्न और सोम इन संमिलित देवताओ के लिये अर्पित कर रहा हूँ । मै अश्विनी- कुमारो की बाहुओं और पूषा देवता के हाथो से तुमको उठा रहा हूँ । कन्धे और मणिबन्ध ( कलाई ) के बीच का दण्डाकार भाग बाहु और पाँच अंगुलियो के साथ आगे का भाग हन्त कहलाता है । ऊपर उद्धृत श्रुति के अनुसार अध्वर्युं को अपने बाहुओ में अश्विनी कुमारों की बाहुओं की और अपने हाथो में पूषा के हाथो की भावना करनी चाहिये । अर्थात् महान् महिमाशाली, सर्वात्मक, अग्नि को हवि मनुष्य अपने सामान्य हाथों से नही दे सकता, अतः अध्वर्यु अपने बाहुओ और हाथों के लिये यह भावना करता है कि ये मेरे न होकर अश्विनीकुमारों और पूषा देवता के हैं । अश्विनीकुमार देवताओ के वैद्य हैं, अतः उनकी चिकित्सा में रहकर तेज अर्थात् दीप्ति और ब्रह्मवर्चस अर्थात् ब्राह्मण के तेज की प्राप्ति के लिये मैं तुम्हे अभिषिक्त करता हूँ । इतना अर्थ किसी तरह से इस मन्त्र का लिंग को सामर्थ्य से निकाला जा सकता है । - ' इन्द्रस्येन्द्रियेण० ' इत्यादि मन्त्रो की व्याख्या इस तरह से की गई है—' इन्द्र अर्थात् परमेश्वर के परमेश्वर्य और राज्य के विज्ञान से उत्तम सेवा, सर्वोत्तम लक्ष्मी और सर्वोत्तम कीर्ति की प्राप्ति के लिये मैं तुम लोगो को सभा करने की आज्ञा देता हूँ कि यह आज्ञा राजा और प्रजा के प्रबन्ध के लिये है । इससे सब मनुष्य लोग इसका यथावत् प्रचार करें । हे महाराजेश्वर, आप सुखस्वरूप, अत्यन्त आनन्दकारक है, हम लोगो को भी सब आनन्द से युक्त कीजिये । हे सर्वोत्तम कोति के देने वाले तथा शोभन मंगल रूप आनन्द के करने वाले जगदीश्वर, सत्यस्वरूप और सत्य के प्रकाश करने वाले, हम लोगों के राजा तथा सब सुखों के देने वाले आप ही है ।
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वेदार्थपारिजातः १४४४ त्वमत्यन्तानन्दयुक्तोऽसि, अस्मानपि राजसभाप्रबन्धेनानन्दयुक्तान् सम्पादय । कस्मै नित्यसुखाय त्वामाश्रयामः । तथा काय त्वा सुखरूपराज्यप्रदाय त्वामुपास्महे । सुश्लोक सत्यकीर्ते सुमङ्गलकारक हे सत्यप्रकाशक सत्यराज्यप्रदेश्वर अस्मद्राज्य-प्रदेश्वर, अस्मद्राजसभाया भवानेव महाराजाधिराजोऽस्तीति वय मन्यामहे । सभाध्यक्ष एवं मन्येत । शिरो मे श्रीः, राज्यश्रीमंम शिरोवत्, यश उत्तमकीर्तिमुखवत् त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि सत्यन्यायदीप्तिः ममकेशश्मश्रुवत्, राजा मे प्राणः परमेश्वरः शरीरस्थो जीवनहेतुर्वायुश्च मम राजवत्, अमृत सम्राट् मोक्षाख्य सुखं ब्रह्मवेदश्च सम्राट् चक्रवर्तिराजवत्, चक्षुर्विराट् सत्यविद्यागुणाना विविधप्रकाशकरण श्रोत्र चक्षुर्वंत्, एवं सभासदोऽपि मन्येरन् । एतानि सभाध्यक्षस्य सभासदा चाङ्गानि सन्तीति सर्वे विजानीयु " ( पृ० २५१-२५२ ) इति । तदेतत्सर्वमसङ्गतं वेदार्थबाह्यमेव, वेदाक्षराननुगतत्वात् ' अध्वर्युर्यजमान स्पृशति' ( का० श्री० सू० १ ९।४ । १ ९ ) इति सूत्रविरुद्ध च । कात्यायनमहर्षिणा यजमानस्पर्शनेऽस्य विनियोग उक्तः । तस्मात् हे यजमान इत्येव सम्बोधनम् । त्व कः प्रजापतिरसि । परमात्मन्निति सम्बोधने बीजाभावात् । कतमोऽसि अतिशयेन प्रजापतिरसि । बहवः प्रजापतयस्तेषु त्वमुत्तमोऽसि । कम्मै प्रजापतिपदप्राप्तये त्वामहमभिषिक्तवानिति शेष । काय प्रजापतिभावाय त्वामभिषिक्तवान् इति शेषः । ' सुश्लोकेत्यालब्धो ह्वयति' ( का० श्रो० सू० १ ९/ ४ /२० ) | अध्वर्युणा स्पृष्टो यजमानः सुश्लोकादिसंज्ञान्नरानाह्वयति । हे सुश्लोक सुकीर्ते एहीति शेष । हे सुमङ्गल शोभनैर्मङ्गलैर्युक्त त्वमेहि, हे सत्यराजन् सत्योऽविनाशी राजा प्रभुर्यस्य सः, भवानस्मान् सुराज्येन सुखयुक्तान् करोत्विति मन्त्राक्षरबाह्यमेव, तद्बोधकपदाभावात् । त्वमानन्दयुक्तोऽसीत्यप्यनर्गलम्, सुखस्वरूपे सुखान्तरस्यासम्भवात् । राजसभाप्रबन्धेनानन्दयुक्तान् कुरु इत्यपि निर्मूलम् शब्दबाह्यत्वात् । कस्मै नित्यसुखाय त्वामाश्रयाम इत्यपि निर्मूलम्, अक्षरबाह्यत्वादेव । काय सुखरूपराज्यप्रदायेत्यपि स्वैरचारितैव, क इत्यस्य सुखार्थत्वे सत्यपि सुखप्रदार्थत्वे प्रमाणानुपलम्भात् । सत्यराजन् इत्यस्य सत्यप्रकाशक इति सत्यराज्यप्रदेश्वर इति चार्थोसङ्गत एव, उसी अत्यन्त सुख, श्रेष्ठ विचार और आनन्द के लिये हम लोगो ने आपका शरण लिया है, क्योकि इसी से हमको पूर्ण राज्य और सुख नि सन्देह होगा । सभाध्यक्ष, सभासद् और प्रजा को ऐसा निश्चय करना चाहिये कि श्री मेरा स्थिरस्थायी, उत्तम कीर्ति मेरा मुखवत्, सत्य गुणों का प्रकाश मेरे केश और डाढी-मूछ के समान तथा जो ईश्वर सबका आधार और जीवन हेतु हैं, वही प्राणप्रिय मेरा राजा; अमृत स्वरूप जो ब्रह्म और मोक्षसुख है, वही मेरा चक्रवर्ती राजा तथा जो अनेक सत्य विद्याओ से युक्त मेरा श्रोत्र है, वही मेरी भांख है ( पृ० २५२-२५३ ) । यह सारा अर्थ असंगत है और वेद से इसका कोई सम्बन्ध नही है । महर्षि कात्यायन ने यजमान को छूने से इस मन्त्र का विनियोग बताया है, इसलिये हे यजमान, यही संबोधन उचित है, न कि ऊपर दयानन्द के बताये गये संबोधन । हे यजमान, तुम प्रजापति हो । परमात्मा को संबोधित करने मे यहा कोई प्रमाण 1 ।नही है । तुम समग्र रूप से प्रजापति हो । प्रजापति अनेक हैं, इन सब मे तुम उत्तम हो । प्रजापति पद की प्राप्ति के लिये मै तुमको अभिषिक्त करता हूँ । प्रजापति भाव की प्राप्ति के लिये ही मैने तुम्हारा अभिषेक किया है । कात्यायन ने आगे विनियोग बताया है कि ' सुश्लोक' आदि का उच्चारण करते हुए यजमान अध्वर्यु ' के द्वारा इस तरह से अभिषिक्त होकर सुश्लोक आदि नाम वाले मनुष्यो को बुलाता है कि हे शोभन कीर्ति वाले तुम आओ । हे सुमंगल शोभन मंगलो से युक्त तुम भी आओ । 'हे सत्यराजन्, सत्य अर्थात् अविनाशी प्रभु आप भी हमारे इस यज्ञ में सम्मिलित होइये | आप हमको सुराज्य के द्वारा सुख युक्त करे ' ऐसा अर्थ गलत है, क्योकि इस अर्थ के बोधक पद ग्रन्थ में नही है । आप आनन्दयुक्त हैं, यह अर्थ भी अनर्गल है, क्योंकि सुखस्वरूप परमेश्वर में अन्य सुख की स्थिति नही मानी जा सकती । राजसभा का प्रबन्ध कर हमे आनन्दित कीजिये, यह अर्थ भी निर्मूल है, मन्त्र मे इस तरह के शब्द नहीं है । किसी नित्य सुख के लिये तुम्हारा सहारा लेते है, यह भी निर्मूल है, क्योकि यह भो अर्थ मन्त्र के पदों से नही निकलता । काम सुख रूप राज्य को देने वाले, ऐसा अर्थ करना भी मनमानी है, क्योकि क शब्द का अर्थ सुख तो होता है, किन्तु ' 1 सुखप्रद अर्थ करने में कोई प्रमाण नही है । सत्यराजन् शब्द का भी सत्य के प्रकाशक और सत्य राज्य को देने वाले होकर, इस तरह
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वेदार्थपारिजातः १४४५ प्रमाणाभावात् । न च ' राजू दीप्ती ' इति धातोरर्थानुसारेण सत्यप्रकाशकत्वमर्थो युक्त इति वाच्यम्, तथात्वे सत्यार्थ- प्रकाशकत्वं चक्षुरादीनामप्यस्त्येवेति तेषा ग्रहणापत्तेः । राज्यप्रदत्व तु न कथमप्यर्थः यथेष्टार्थग्रहणे इच्छाया अव्याहतप्रस- रत्वेन शब्दार्थनिर्धारणासम्भवात् । 'बाहू मे बलमिन्द्रिय हस्तौ मे कर्म वीर्यम् । आत्मा क्षत्रमुरो मम । पृष्टोमें राष्ट्रमुदरमंसो ग्रीवाश्च श्रोणी । ऊरू अरत्नी जानुनी विशो मेऽङ्गानि सर्वत. ॥ ' ( वा० सं० २०१७-८ ) अत्र यदुक्तम्— 'यदुत्तमं बलं तन्मम बाहू बाहुवदस्ति, इन्द्रियं हस्ती शुद्ध विद्यायुक्तं मनःश्रोत्रादिकं च मम ग्रहणसाधनवत् । यदुत्तमपराक्रमधारणं तत् क्षत्रम् । यद्वाष्ट्रं तन्मे पृष्ट पृष्ठभागवत् । यौ सेनाकोशौ स्तस्तन्म हस्तमूलोदरवद् ग्रीवाश्च श्रोणी यत्प्रजायाः सुखेन भूषणं पुरुषार्थीकरणं तत्कर्मं मम नितम्बवत् । यत्प्रजाया व्यापारे गणितविद्याया च निपुणीकरण तन्ममोर्वरत्यङ्गमस्ति । यत्प्रजाराजसमयोः सर्वथा मेल- रक्षणं तत्कर्म मम जानुवत् । एवं पूर्वोक्तानि सर्वाणि कर्माणि ममावयववत् सन्ति । यथा स्वाङ्गेषु प्रीतिस्तत्पालने पुरुषस्य श्रद्धा भवति तथा प्रजापालने स्वकीया बुद्धि सर्वे कार्या' ( पृ० २५३ - २५४ ) इति, तदपि विशृङ्खलमेव, यतो बलं बाह्वोर्धर्मो भवति, लोके तथैव प्रसिद्धे । तस्मान्न बलस्य बाहुतुल्यत्वम् । तुल्यार्थताबोधकशब्दाभावाच्च तन्न युक्तम् । एवमिन्द्रियपदेन शुद्ध मन. श्रोत्रादिकं चेदर्थस्तदा हस्तयोरपि तत्रैवान्तर्भाव एवेति कथ तयोरुपमानोपमेयभावः? वीयं पराक्रम एव तद्धारण कथमर्थः? कथं च तस्य कर्मतुल्यता? यन्मम हृदय तत्क्षत्रवदिति तु पूर्वविपरीतमेवायाति । पूर्वत्र स्वाङ्गान्युपमानानि, इह तु हृदयमेवोपमेयमुक्तम् । राष्ट्रस्य पृष्ठत्वे कि साधर्म्यमिति नोक्तम् । उदरमसावित्यादिनोपमेया- शोक्तिः । तथा च सेनाकोशावित्यादिकमप्यध्याहारलभ्यमेव । न च तत्र किमपि बोजमुपलभ्यते । एव प्रजायाः सुखेन भूषणम्, प्रजाया व्यापारे गणितविद्याया च निपुणीकरणमित्यादिकमपि कपोलकल्पितमेव, निर्मूलत्वात् । प्रजाराजसभयोः सर्वथा मेलरक्षणमिति कस्य शब्दस्यार्थः? तस्मात्सर्वमेतद्वेदार्थबाह्यमेव । का अर्थ प्रमाण के अभाव मे असंगत है । दीप्ति अर्थ वाली राजू धातु से शब्द को बनाकर तबनुसार सत्य का प्रकाशक ऐसा अर्थ करने मे आपत्ति यह उठेगी कि सत्य अर्थ की प्रकाशक तो सभी इन्द्रियां है, अतः उनका भी इस शब्द से ग्रहण होने लगेगा | राज्य को देने वाले, यह अर्थ तो किसी भी तरह से नही हो सकता । 'बाहू में' इत्यादि दो मन्त्रो को उद्धृत कर उनका यह अर्थ किया गया है—'जो पूर्ण बल है, वही मेरी भुजा है । जो उत्तम कर्म और पराक्रम से युक्त इन्द्रिय और मन है, वे मेरे हाथो के समान है । जो राजधर्म, शौर्य, धैर्य और हृदय का ज्ञान है, वही सब मेरे आत्मा के समान है । जो उत्तम राज्य है, सो वीर के समान है । जो राज्य, सेना और कोश है, वह मेरे हस्त का मूल और ऊपर के समान है । जो प्रजा को सुख से भूषित और पुरुषार्थी करता है, सो मेरे कण्ठ और श्रोणी अर्थात् नाभि के अधोभाग के समतुल्य है । जो प्रजा को व्यापार और गणितविद्या में निपुण करना है, सो ही अरत्नि और ऊरू अग के समान है । तथा जो प्रजा और राजसभा का मेल रखता है, यह मेरी जानु के समान है । जो इस प्रकार से प्रजा-पालन में उत्तम कर्म करते हैं, ये सब मेरे अंगो के समान है' ( पृ० २५४ ), किन्तु यह अर्थ भी निरर्गल है, क्योंकि बल बाहु का धर्म होता है । लोक में ऐसी ही प्रसिद्धि है । इसलिये बल को'बाहु के समान नही माना जा सकता । इस समानता के बोधक शब्द का अभाव होने से भी ऐसा अर्थ नही किया जा सकता । इसी तरह से इन्द्रिय पद का अर्थ शुद्ध मन और श्रोत्र आदि करना है, तो हस्त इन्द्रिय का भी उन्ही में अन्तर्भाव होने से इनका उप- मानोपमेय भाव कैसे बनेगा? वीर्य का अर्थ पराक्रम होता है । पराक्रम का धारण उसका अर्थ कैसे हो सकता है और उसको कर्म के -तुल्य कैसे माना जा सकता है? जो मेरा हृदय है, वह राजधर्म के समान है, ऐसा अर्थ करना पूर्व प्रकरण के विपरीत पडेगा । पहले अपने अंगों को उपमान कोटि में रखा गया है, अब यहा हृदय को उपमेय कोटि में रखा जा रहा है । राष्ट्र को पृष्ठ के तुल्य मानने में प्रमाण क्या है, यह नहीं बताया गया । उदर और अंश को उपमेय नहीं बताया गया है । इनका अर्थ सेना और कोश अध्याहार द्वारा ही किया जा सकता है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण नही है । इसी तरह प्रजा को सुख से भूषित करना और व्यापार तथा गणित विद्या में निपुण करना, इस तरह के अर्थ भी सर्वथा कपोल कल्पित है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नही है । प्रजा और राजसभा में मेल रखना, ? ' यह अर्थ भी किस शब्द का है इस तरह की दयानन्द की सारी बातों का वेद के अर्थ से कोई दूर का भी सम्बन्ध नही है ।
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वेदाथपारिजात १४४६ सायणमहीधरादिसम्मतोऽर्थस्तु - 'अङ्गानि चालयते यथालिङ्ग शिरो म इति प्रतिमन्त्रम्' ( का० श्री० सू० १९/ ४ / २१ ) इति कात्यायनानुसारेण यजमानो यथालिङ्गमङ्गान्यालभते । इन्द्रशरीरावयवदेवताक पश्यन्नाह पञ्चर्चम् । मन्त्रार्थस्तु -' मे बाहू बलमस्तु बलवन्तौ स्तामित्यर्थं । इन्द्रिय च बल स्वकार्यक्षममस्तु । मे हस्तो कर्म चास्तु । सत्कर्मकुशलो सामर्थ्यवन्तौ च स्ताम् । मम आत्मा अन्तरात्मा उरो हृदय क्षत्रं क्षतात् त्राणकरमस्तु । मे मम पृष्ठोः पृष्ठप्रदेशो राष्ट्र देशः, देशवत्सर्वसाधारणमस्त्वित्यर्थ. । यथाद्यत्वे कथयन्त्यस्य देहो राष्ट्रिय इति । मे मम उदरमक्षी स्कन्धौ ग्रीवा कण्ठदेशाः, श्रोणी कटिदेशो ऊरू सक्थिनी च सर्वतोऽन्यान्यङ्गानि विशः प्रजा. सन्तु, प्रजावत्पोष्याः सन्तु । यथा राष्ट्रे विशः प्रजा भवन्ति तथैव पृष्ठमाधारीकृत्य उदरास्यादयो वर्तन्ते । तथा पृष्ठे राष्ट्रदृष्टिः कार्या । उदरादी प्रजादृष्टिः कर्तव्या । सूत्रा- नुमारेणाङ्गसस्कार, समष्ट्यभिमानाधानेन व्यष्ट्याभिमाननिराकरणं च । 'नाभिर्मे चित्तं विज्ञान पायुर्मे पचितिर्भसत् । आनन्दनन्दावाण्डो मे भगः सौभाग्यं पसः । जङ्घाभ्या पद्भ्यां धर्मोऽस्मि विधि राजा प्रतिष्ठित ॥ ' ( वा० स० २०१९ ) अत्रापि यदुक्तम्- ' यच्चित्तं सदा ज्ञानरूपमस्ति तन्मम नाभि- रङ्गवदस्ति, यद्विज्ञानं तन्मम पायुर्गुह्येन्द्रियवदस्ति, या अपचितिः पूजा सत्कारोऽस्ति तत् स्त्रियाः प्रजननवत्, अर्थात् परमेश्वर- पूजात्मन्येव कार्या । ये आनन्दसमृद्धी ते मे वृषणाङ्गवत् स्त । एवमहं जङ्घाभ्या पद्भ्या युक्तो भूत्वा धर्मात्मास्मि । यो विशि प्रजाया सर्वहित करणादिगुणैः प्रतिष्ठितो भवति सोऽस्माक राजा सभाध्यक्षो भवितुमर्हति' ( पृ० २५४ ) इति, तदपि मन्दम्, ज्ञाननाभ्यो सादृश्यानिरूपणात् । एवमेव विज्ञानगुह्येन्द्रिययोरपि सादृश्य वक्तव्यम्, पूजायाः प्रजननस्य च केनांशेन सादृश्यम्? गोप्यत्वेन तु सादृश्य सम्भवति, तेन पूजादिकं स्त्रीयोनिवत् गोपनीयमिति वक्तव्यम् 1। आनन्दसमृद्धयोः वृषणाङ्गयोः कीदृश तौल्य तदपि वक्तव्यम्, एव सौभाग्यस्य लिङ्गेन्द्रियेण सादृश्यं वक्तव्यम्, तुल्यताबोधकपदं च मूले नास्त्येव । इसका सायण और महीघर समत अर्थ यह है- मेरे बाहू बलशाली हो, मेरी इन्द्रिया अपने-अपने कार्यों में समर्थ हो, मेरे हाथ कार्य करने में समर्थ हो । ये सत्कार्य को करने में समर्थ हो । मेरी आत्मा, अन्तरात्मा और हृदय सदा त्राण करने में समर्थ हों, सभी जीवो की कष्ट से रक्षा करने में समर्थ हो, मेरा पृष्ठप्रदेश राष्ट्र अर्थात् देश के समान सबके उपकार के लिये हो । जैसा कि आजकल कहते हैं कि यह इस देश का राष्ट्रिय ( निवासी ) है । मेरा उदर ( पेट ), अस ( कन्धे ); ग्रीवा ( कण्ठ ), श्रोणी ( कटि भाग ), ऊरु ( जाघे ) तथा अन्य सभी अंग प्रजा के समान पोषणीय, रमणीय होवें । जैसे राष्ट्र मे प्रजा रहती है, उसी तरह से पीठ के सहारे शरीर के पेट आदि अन्य अग है । इसलिये पीठ को राष्ट्र के समान तथा अन्य पेट आदि अगो को प्रजा के समान मानना चाहिये । उक्त सूत्र के अनुसार यहा स्पर्श के द्वारा अगो का सस्कार तो किया ही जाता है, साथ ही समष्टि अभिमान की स्थापना के द्वारा व्यष्टि के अभिमान की निवृत्ति भी यहा अभिप्रेत है । अर्थात् यह संस्कार केवल अपने शरीर का ही न होकर समष्टि भावना के आधार पर समस्त शरीरो का किया जाता है । 'नाभिर्मे चित्तम्० ' इत्यादि मन्त्र की यह व्याख्या की गई है - 'जो चित्त सदा ज्ञानरूप है, वह मेरे नाभि अग के समान है । जो विज्ञान हैं, वह मेरी गुदेन्द्रिय के समान है । जो पूजा सत्कार है, वह स्त्री जननेन्द्रिय के समान है । जो आनन्द और समृद्धि है, वह मेरे वृषणो के समान है । जो मेरा ऐश्वर्य, सौभाग्य उत्तम सुख है, वह मेरी लिंगेन्द्रिय के समान है । इस प्रकार मै जंघा और पैरो से युक्त होकर धर्मात्मा हूँ । जो प्रजा में सर्व हितकारी गुणों के कारण प्रतिष्ठित होता है, वह हमारा राजा सभाध्यक्ष हो सकता है । इस प्रकार पूर्वोक्त सब धर्म मेरे अवयवो ( अंगो ) के समान है । जैसे अपने अगो में प्रीति और उनको पालने मे पुरुष को श्रद्धा होती है, वैसी ही बुद्धि प्रजा और उसके पालन मे सबको करनी चाहिये' ( पृ० २५४ २५५ ) । किन्तु यह व्याख्या भी उचित नहीं है, क्योकि ज्ञान और नाभि को तथा इसी तरह से विज्ञान और गुह्य इन्द्रिय की कोई समानता यहा नही बताई गई है । पूजा और प्रजनन इन्द्रिय की क्या समानता हो सकती है? गुप्त रखना ही इनको समानता हो सकती है । इससे यह अर्थ निकलेगा कि स्त्री की योनि की तरह अपनी पूजा को छिपाकर रखना चाहिये । T
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वेदार्थपारिजात- १४४७ —, मायणादिसम्मतोऽर्थस्तु मे नाभि चित्त ज्ञानरूपमस्तु सर्वव्यापाराश्रयप्राणकेन्द्रत्वात् नाभेर्ज्ञानरूपत्वे , सर्वव्यापाराणा ज्ञानपूर्वकत्वेन सौष्ठव सम्पत्स्यते । पायुर्गुद मूलाधारचक्र विज्ञानमस्तु ज्ञानजनितसस्काराधारमस्तु मूलाधारस्यैव सस्काराधारत्वात् । भसत् स्त्रीप्रजननमपचिति प्रजारूपमस्तु, सुभगसुप्रजास्त्वेन सौभाग्यवदस्त्वित्यर्थः । ( यजमानपत्नीविषयकमेतत् ) यद्वा अपचिति पूजा भसत् स्त्रीप्रजननवद् गोप्यमस्त्विति यावत्, मुख्यार्थबाधे लक्षणाया औचित्यात् । तथा मे अण्डौ वृषणी आनन्दनन्दौ स्ताम् आनन्देन वैधसम्भोगजनितेन नन्दतस्तत्सुखभोक्तारो भवता- मित्यर्थ. । 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥' ( भ० गी० ७ ११ ) । भग सौभाग्य सम्पत्तिश्चास्तु । पस पसते. स्पृगतिकर्मण. सर्वदा भोगासक्तमस्त्वित्यर्थः । जङ्घाभ्या पद्भ्या चाह धर्मोऽस्मि । उपलक्षणमेतत् । सर्वाङ्गेर्धर्मरूपोऽस्मि । धर्मरूपत्वादेव विशि प्रजाया राजा प्रतिष्ठितोऽस्मि । बेदशास्त्रानुसारोणि देहहस्तजङ्घादीन्द्रियमनोबुद्धयहङ्कारकर्माण्येव धर्मशब्देनाख्यायन्ते । 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म:' ( मी० सू० १ १/२ ), 'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्त कर्म कर्तुमिहार्हसि । ' ( भ० गी० ) इति गीतोक्तेश्च । शास्त्रानुसारीणि देहादिकर्माणि शास्त्राविरुद्धानि कामोपभोगरूपाणि सुखानि च तृप्तिद्वारा वैराग्यकराणि भवन्ति । 'प्रतिक्षत्रे प्रतितिष्ठामि राष्ट्र प्रत्यश्वेषु प्रतितिष्ठामि गोषु । प्रत्यङ्गेषु प्रतितिष्ठामि आत्मनः प्रतिप्राणेषु प्रतितिष्ठामि युष्टे प्रतिद्यावापृथिव्योः प्रतितिष्ठामि यज्ञे त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र हवे हवे हव. शूरमिन्द्रम् | हवामि ----- शक्र पुरुहूतमिन्द्र स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः, ( वा० स० ) । यदप्यत्रोक्तम् -' अह परमेश्वरो धर्मेण प्रतीते क्षत्रे प्रतिष्ठितो भवामि राष्ट्रे विद्याधर्मप्रचारित देशे च प्रत्यश्व प्रतिगा च तिष्ठामि । तथा चात्मानमात्मान प्रतितिष्ठामि ( प्रतिप्राण ) प्राणं प्राण प्रत्येव पुष्ट पुष्ट पदार्थं प्रतितिष्ठामि । प्रतिद्यावा दिव दिव प्रति पृथिवी पृथिवी प्रति च तिष्ठामि । तथा यज्ञं यज्ञं प्रति- तिष्ठामि । अहमेव सर्वत्र व्यापकोऽस्मि | मामिष्टदेव समाश्रित्य ये राजधर्ममनुसरन्ति तेषां सदैव विजयाभ्युदयौ भवतः । एवं राजपुरुषैश्च प्रजापालने सर्वत्र न्यायप्रकाशो रक्षणीयो यतोऽन्यायविद्याविनाश: स्थात्' ( पृ ० २५५ ) इति, तदपि विशृङ्ख- इसका सायण समत अर्थ यह है— मेरी नाभि चित्त अर्थात् ज्ञानरूप हो । सभी शारीरिक क्रियाकलाप प्राण के सहारे ही चलते है । यह प्राण नाभि मे केन्द्रित है, अतः नाभि के ज्ञानरूप होने से सभी शारीरिक क्रियाकलाप सही तरीके से भली भांति ,-सम्पन्न होंगे । पायु गुदा अर्थात् मूलाधार चक्र विज्ञानमय हो जाय, अर्थात् ज्ञान से उत्पन्न होने वाले संस्कारो का खजाना बन जाय, क्योकि मूलाधार मे सभी संस्कार रहते है । स्त्री की जननेन्द्रिय प्रजा रूप हो, उत्तम सन्तति को उत्पन्न कर सौभाग्ययुक्त होवे । ( यह वाक्य यजमान की पत्नी से सम्बद्ध है ) । अथवा मेरे द्वारा की गई पूजा स्त्री की योनि की तरह गुप्त रहे । मुख्य अर्थ का -बाघ होने पर लक्षणा की जा सकती है । जाध और पैरो से में धर्म हूँ । यह लाक्षणिक प्रयोग है । इसका अभिप्राय यह है कि मेरा सारा शरीर धर्ममय है । धर्म रूप होने से ही मै प्रजा के हृदय में राजा के रूप में प्रतिष्ठित हूँ । वेद शास्त्र के अनुसार चलने वाले देह, हाथ, जाच आदि अवयव तथा इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार तथा वेदविहित कर्म ही धर्म शब्द से जाने जाते हैं । मीमासा सूत्र और गीता में यही बात कही गई है । शास्त्र के अनुसार चलने वाले शारीरिक आचरण तथा शास्त्र के अविरुद्ध कामोपभोग सुख मनुष्य के मन को तृप्त कर अन्त मे उसमे वैराग्य को पैदा करने में समर्थ होते हैं । 'प्रति क्षत्रे० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या यह की गई है—'जो मनुष्य इस प्रकार के उत्तम पुरुषों की सभा से न्यायपूर्वक राज्य करते हैं, उनके लिये परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि हे मनुष्यो, तुम लोग धर्मात्मा होकर न्याय से राज्य करो, क्योकि जो धर्मात्मा पुरुष है, मैं उनके क्षत्र धर्म और सव राज्य में प्रकाशित रहता हूँ और वे सदा मेरे समीप रहते है " । उनकी सेवा के अन्न और गो आदि पशुओं में भी में स्वसत्ता से प्रतिष्ठित रहता हूँ तथा सब सेना राजा के अंगों और उनके मात्माओं के बीच में भी सदा प्रतिष्ठित रहता हूँ । उनके प्राण और पुष्ट व्यवहारों में भी सदा व्यापक रहता हूँ । जितना सूर्यादि प्रकाशरूप और पृथिव्यादि मप्रकाश रूप जगत् तथा अश्वमेधादि यज्ञ है, इन सबके बीच में भी मैं सर्वदा व्यापक होने से प्रतिष्ठित रहता हूँ । इस प्रकार तुम लोग मुझको
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वेदार्थपारिजातः १४४८ लम्, अत्र मन्त्रे परमेश्वरो वक्ता स्वस्य सर्वव्यापकत्वं वक्ति इत्यत्र वीजं वक्तव्यम्, पूर्वेषु मन्त्रेषु परमेश्वरस्याप्रसङ्गात् |'नाभिर्मे चित्तम्' इत्यादिमन्त्रेषु मे नाभिरित्यादिप्रयोगो विद्यते । न च निराकारस्येशितुर्नाभ्यादिसम्बन्धः कल्पयितु शक्यः । तथा सत्यप्रकृतप्रक्रिया प्रसक्तपरित्यागश्च प्रसज्यते । उव्वट-सायण -महीधरादिसम्मतोऽस्य मन्त्रस्यायमर्थः - महर्षिकात्यायनरीत्याऽत्र यजमानो वक्ता, 'कृष्णाजिनेऽ- वरोहति प्रतिक्षत्र इति' ( का० श्री० सू० १ ९/ ४ / २३ ) इति सूत्रात् । यजमान आसन्दीतः कृष्णाजिनेऽवतरति प्रतिक्षत्र इति मन्त्रेणेति सूत्रार्थः । विश्वदेवदैवत्य यजुः, अतिशक्वरीच्छन्दः । मन्त्रार्थस्तु - अह यजमानः क्षत्र क्षत्रियजाती प्रतिष्ठायुक्तो भवामि राष्ट्रे देशे अश्वेषु गोषु च अङ्गेषु करपादाद्यवयवेषु पुष्टौ समृद्धी द्यावापृथिव्योः परलोके हलोकयोर्यज्ञे ज्योतिष्टोमादी च प्रतितिष्ठामि} प्रतितिष्ठामीति क्रियापदावृत्तिस्तत्तद्विशेषफलद्योतनार्था । क्षत्रिय देशयोर्वशीकरणरूपा प्रतिष्ठा ज्ञेया । गोश्वादिषु प्रतिष्ठा तत्तत्प्राप्तिरूपा, प्राणाङ्ग प्रति नैरुज्यरूपा आत्मप्रतिष्ठाऽऽधि राहित्यरूपा पुष्टप्रतिष्ठा धनसमृद्धिरूपा द्यावा- पृथिव्योः प्रतिष्ठोभयलोक कीर्तिरूपा यज्ञे प्रतिष्ठा तदनुष्ठानसम्पत्तिरूपा । तथा च वश्यविश्वः पशुमानाधिव्याधिरहितः श्रीमान् यज्ञकर्ता भवेयमिति यजमानस्य प्रार्थना सङ्गच्छते । एव प्रकरणानुसारी कात्यायनाद्दृषिसम्मतोऽर्थः । यदप्युक्तम् —'य विश्वस्य त्रातारं रक्षकं परमैश्वर्यवन्तं सुहृदं शोभनयुद्धकारिणमत्यन्तशूरं जगतो राजान- मनन्तबलवन्तं शक्रं शक्तिमन्त शक्तिप्रदं वा पुरुहूतं बहुभिः शूरैः सेवितम् इन्द्र न्यायराज्यपालकं हवे हवे युद्धे युद्धे स्ववि- जयार्थमिन्द्रं परमात्मानं ह्वयामि आह्वयामि आश्रयामि । स परमधनप्रदातेन्द्रः सर्वशक्तिमानीश्वरः सर्वेषु राज्यकार्येषु नोऽस्म- भ्यं स्वस्ति धातु निरन्तर विजयसुखं दधातु ' ( पृ० २५५ ) | अत्रेन्द्रशब्दः परमेश्वरपर इन्द्रदेवतापरो वेति संशये ' याज्यानुवा- क्याश्चेति' ( का० श्री० सू० १ ९/ ६/ १३ ) इति रीत्या वपापुरोडाशयागानां याज्यानुवाक्या: । ' आयात्विन्द्रः...' इति वपायाः सब स्थानो में परिपूर्ण देखो । जिन लोगो की ऐसी निष्ठा है, उनका राज्य सदा बढता रहता है' ( पृ० २५६ ) । किन्तु यह सारी व्याख्या भी ऊटपटांग ही है । इस मन्त्र का बक्ता परमेश्वर है और इसमें वह अपनी सर्वव्यापकता का वर्णन करते है, इसमे प्रमाण बताना पडेगा । इससे पहले के मन्त्रो में परमेश्वर का कोई प्रसंग नही है । ' नाभिर्मे चित्तम्० ' इत्यादि मन्त्र मे नाभि आदि अवयवो का उल्लेख हैं, किन्तु निराकार ईश्वर में इन अवयवों की सत्ता नही मानी जा सकती । उव्वट, सायण और महीधर की पद्धति से मन्त्र का अर्थ यह होगा -मै यजमान क्षत्रिय जाति मे प्रतिष्ठा पाऊँ । इसी तरह से देश में मैं प्रतिष्ठित होऊ और घोडा, गाय आदि पशुओ से तथा हाथ -पैर आदि अवयवो से भी मैं पुष्ट होऊं, समृद्ध बनूं । स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में अर्थात् इस लोक और परलोक में भी मेरी प्रतिष्ठा हो । मेरे ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञ भी समृद्ध हों । 'प्रति-तिष्ठामि' पद की आवृत्ति उस उस विशेष फल को बताती है । इनमें क्षत्रिय और देश की प्रतिष्ठा का अभिप्राय यह है कि ये मेरे कहने में रहें । जो, अश्व आदि की प्रतिष्ठा इनकी प्राप्ति में है । अंगो की प्रतिष्ठा उनकी नीरोगता में है । आत्मा की प्रतिष्ठा मन की पीडा के न होने में है । पुष्ट में प्रतिष्ठा का अभिप्राय है धन की समृद्धि । उभय लोक में कीर्ति का फैलना द्यावापृथिवी की प्रतिष्ठा है । अनुष्ठान की समृद्धि यज्ञ की प्रतिष्ठा कहलाती है । इस तरह से संक्षेप में इस मन्त्र मे यह प्रतिष्ठा को गई है कि सारा विश्व मेरे वश मे रहे, पशु सम्पत्ति से युक्त, आधि- व्याधि से रहित, श्रीमान् और यज्ञ के कर्ता के रूप में मै इस लोक और परलोक में भी प्रतिष्ठा प्राप्त करूँ यजमान इस तरह की प्रार्थना करे, यह उचित ही है । यह अर्थ प्रकरण से तो संबद्ध है ही, इस अर्थ में कात्यायन जैसे ऋषियों की संगति भी उपलब्ध है । 'त्रातारमिन्द्र ० ' इस मन्त्र का अर्थ यह किया गया है --' जिन मनुष्यों का ऐसा निश्चय है कि केवल परम ऐश्वर्यवान् परमात्मा ही हमारा रक्षक है, जो ज्ञान और आनन्द का देने वाला है, वही इन्द्र परमात्मा प्रति युद्ध में जो उत्तम युद्ध करने वाला, शूरवीर और हमारा राजा है, जो अनन्त पराक्रमयुक्त ईश्वर है, जिसका सब विद्वान् वेद आदि शास्त्रों से प्रतिपादन और दृष्ट करते हैं, वहीं हमारा सब प्रकार से राजा है । जो इन्द्र परमेश्वर मघवा अर्थात् परम विद्यारूप धनी और हमारे लिये विजय आदि सब सुखों का