वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 531–540
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 531–540
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वेदार्थपारिजात! १४२६ ' इहैव स्तं मा वियौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् 1। क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानी स्वे गृहे ॥ ' इहैवास्मिल्लोके स्तं भवतम्, मा वियौष्टं पृथग्भूत विश्वमायुर्व्यनुत प्राप्नुतम् । पुत्रैर्नप्तृभिः पौत्रः सह स्वे गृहे मोदमानौ भवतमितिविशेष । यदुक्तम्— 'स्त्रिया एक एव पतिर्भवतु, एकस्य पुरुषस्यैकैव स्त्री चेति, अर्थादनेकस्त्रीभि सह विवाहनिषेधो नरस्य तथानेकैः पुरुष. ,, ' सहैकस्या स्त्रियश्चेति वेदमन्त्रेष्वेकवचनस्यैव निर्देशात् इति तत्तुच्छम् निषेधकवेदवाक्यानुपलम्भात् । यद्यप्येकस्या स्त्रियोऽनेकपुरुषसम्बन्धनिषेधकवचनमुपलभ्यते । यथैकस्मिन् यूपे बह्वयो रशना सश्लिष्यन्ते तथैवैकस्मिन् पुरुषेऽनेका भार्या सम्भवन्ति । यथैका रज्जुर्नानेकैर्यूपैः सश्लिष्यते, तथैकायोषितानेकै पुरुषै. सश्लिष्यते । प्रकृतमन्त्रे तु निपेधक वचन किमपि नास्त्येव । 'यदेकस्मिन् यूपे द्वे राने परिव्ययति तस्मादेको द्वे जाये विन्दते, यन्नैका रशना द्वयोर्यूपयो परिव्ययति तस्मान्नेका द्वौ पती विन्दते ' ( तै ० स० ६ ६ ४ ३ ), ' एकस्य बयो जाया भवन्ति नैकस्यै बह्वय सहपतय. ' (ऐ० ब्रा० २।२३ ), ' एकस्य पुसो बह्वयो जाया भवन्ति' ( श० ९| ४| १ | ६) इत्यादिपु विधेयगतसख्याया विवक्षितत्वेऽप्युद्देश्यगतसख्याया अविक्षितत्वेनैक- वचननिर्देशस्य ' ग्रह समष्टि' इत्यादादिवाकिञ्चित्करत्वात् । प्रकृते च विवाहो विधेयो न त्वेकत्वादिकम् । अग्निहोत्रादि- रक्षणार्थं कल्पसूत्रेषु पत्न्प्रन्तरविधानाच्च पुरुषस्य पुनर्विवाह उक्त । स्त्रियास्तु तदविधानादेव न पुनर्विवाहसम्भवः । नियोगविचार. यदुक्तम् — 'कुहस्विद्दोषा कुह वस्तोऽश्विना कुहाभिषित्त्व करत. कुहोषतु । को वा शत्रा विधवेव देवर मर्य न योषा कृणुते सवस्थ आ ||' (ऋ ० स० १०/४०/२) इति मन्त्रेण विधवेव देवर द्वितीय वर नियोगेन प्राप्तं विधवेव विधवाया देवरेण नियोगो (मैथुनादिसम्बन्ध ) सिद्धयति, इति, तन्न, मन्त्रस्यान्यार्थत्वात् वेदे तादृशार्थे नियोगशब्दस्या- 'इहैव स्त मा०' इत्यादि मन्त्र का अर्थ है- हम दोनो एक साथ यही, इसी लोक में रहे, हम लोग कभी अलग न हो और इसी तरह से पूरी आयु का उपभोग करें । हम लोग अपने घर मे नाती-पोतो के बीच सुखपूर्वक रहें । दयानन्द ने इस मन्त्र की व्याख्या करने के बाद कहा है कि-'एक स्त्री का एक ही पति हो और एक पुरुष की एक ही पत्नी हो । अर्थात् वर के लिये अनेक स्त्रियों के साथ विवाह निषिद्ध है, उसी तरह से अनेक पुरुषो के साथ एक स्त्री का भी विवाह निषिद्ध माना गया है, क्योकि वेद मन्त्रो में सब जगह वधू और वर के लिये एकवचन ही प्रयुक्त हुआ है ' ( पृ० २४१ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि पुरुष के लिये अनेक स्त्रियों से विवाह का निषेध करने वाला वेदवाक्य उपलब्ध नहीं है । इसके विपरीत एक स्त्री के लिये अनेक पुरुषो को वरण करना निषिद्ध घोषित किया गया है । जैसे कि एक यूप में बहुत सी रशनाएँ बाँधी जा सकती है उसी तरह से एक पुरुष की अनेक पत्नियों हो सकती है । जैसे एक रज्जु अनेक यूपो मे नही बाँधी जा सकती, उसी तरह से एक स्त्री अनेक पुरुषो के साथ नहीं रह सकती । प्रकृत मन्त्र में आपकी बात का समर्थक अर्थात् निषेधक वचन नहीं उपलब्ध है । किन्तु हमारी बात के समर्थक वचन तैत्तिरीय और ऐतरेय श्रुति में उपलब्ध होते है, जो कि ऊपर उद्धृत किये गये है । शतपथ ब्राह्मण मे भी ऐसा स्पष्ट वचन मिलता है कि एक पुरुष की अनेक पत्निया होती है । विधेयगत संख्या की विवक्षा रहने पर भी उद्देश्यगत संख्या की विवक्षा न होने से यहाँ एक वचन का उल्लेख उसी तरह बाधक नही होगा, जैसे कि 'ग्रह संमाष्टि ' इस वाक्य मे एक वचन का निर्देश अनेक ग्रहो के संमार्जन का निषेधक नही माना जाता । प्रकृत मन्त्र का प्रतिपाद्य विवाह ही है, उसका एकत्व नही, जैसे कि उक्त वाक्य में ग्रह का संमार्जन ही विहित है, उसका एकत्य नहीं । अग्निहोत्र प्रभृति धार्मिक कृत्यों की रक्षा के लिये कल्पसूत्रों में पुरुष के लिये दूसरी पत्नी करने का विधान मिलता है । स्त्री के लिये इस तरह का कोई विधान नही मिलता, अतः स्त्री का पुनर्विवाह नही हो सकता । २१. नियोगविषयक विचार 'कुहस्विद्० ' इत्यादि मन्त्र में आये 'विषवेव देवरम्' इन पदो से दयानन्द ने यह अभिप्राय निकाला है कि जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ सन्तानोत्पत्ति करती है, वैसे तुम भी करो, इस बात से वेद मन्त्रो से विधवा विवाह सिद्ध होता है ( पृ ० २४५गया) है। किन्तु। वस्तुतःयह कहना गलत है, क्योकि मन्त्र का कुछ दूसरा ही अर्थ हैं । वेद में इस अर्थ में नियोग शब्द का कही प्रयोग किया भी नही
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वेदार्थपारिजातः १४३० दर्शनाच्च । मन्त्रार्थस्तु –आश्विनमिद सूक्तम् । काक्षीवत्या घोपाया आर्षम् । प्रातरनुवाकाश्विनयो. शस्यते ' (आ ० श्रौ० सू० ४।१५) इति । हे अश्विनौ, कुहस्वित् नु दोषा रात्री भवथ इति शेष । कुह वस्तो दिवा वा क भवथ । कुह क वा अभिषित्वम् अभिप्राप्ति स्नानभोजनाद्यर्थ करन कुरुथ । कुह क वा ऊषथु वसथ । किञ्च वा युवा क यजमान सधस्थे वेधाख्ये आकृणुते आकुरुते परिचरणार्थमभिमुखी करोति । अत्र दृष्टान्तो विधवेव मृतभर्तृका नारी यथा देवर भर्तृभ्रातरमभिमुखी-करोति पालनार्थ देवग्माश्रयते यथा वा योषा सर्वा नारी शयुत्रा शयने मयं मनुष्य पुमाम भोगकालेऽभिमुखीकरोति । सम्भोगाभिमुख्यस्यैव विवक्षितत्वे ' मयं न योषा' इत्येकेनैव दृष्टान्तेनोद्देश्यसिद्धौ विधवेवेत्यस्य वैयर्थ्यापातात् । तस्मात्पत्यभावे रक्षणार्थं भ्रातृभार्या भर्तृभ्रानर देवरमाश्रयत इत्येवार्थ । नाभिमुख्य सम्भोगाभिमुख्यमेव, दान्तिके तदयोगात् । नहि यजमान सम्भोगायाश्विनावभिमुखीकरोति । यदुक्तम्—'देवर कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते' (नि० ३।१५ ) इति वचनाद् विधवायाद्वितीयवरेण नियोगकरणे आज्ञास्ति, तथा पुरुषस्य विधवया सह । विधवा स्त्री मृतकस्त्रीकपुरुपेण सहैव सन्तानार्थं नियोग कुर्यात्, न कुमारेण महेत्यादिकम्, तदपि मूढजनजल्पितमेव, मन्त्रे निरुक्ते वा विधिप्रत्ययाभावेनाज्ञाद्यसिद्धे । किञ्चाप्रवृत्तप्रवर्तनायैव विधिराज्ञा वा भवति, विधिरत्यन्नमप्राप्ताविति मीमासकसिद्धान्तात् । मन्त्रे दृष्टान्तरूपेण कथञ्चिद् विधवादेवरयो सम्भोगाभिमुख्याभ्यु-पगमेऽपि न तस्त्र वैधत्व निश्चीयते, रागप्राप्तस्यापि दृष्टान्तत्वसम्भवान् । दृष्टान्तस्य दाष्टन्तिकार्थप्रतिपादन एव तात्पर्य भवति, न दृष्टान्तस्य वैधत्वबोधने । अतत्पर च विधिवचनमपि न विधातु शक्नोति किमुताङ्ग दृष्टान्तमात्रम्, 'जतिल-यवाग्वा वा जुहुयाद् गवेधुकयवाग्वा वा जुहुयात् इत्यर्थवादगतत्वाद् विधिप्रत्यययुतमपि वाक्यं न जर्तिलादियवागूहोम विदधाति, अजाक्षीरेण जुहुयादिति विधिशेषत्वेनातत्प्रधानत्वात् । अस्यामृचि कनीयमा देवरेण ज्यायासावश्विना उपमीयेते मन्त्र का अर्थ यह है -हे अश्विनीकुमारो, आप लोग रात मे कहा रहते है और दिन में कहा रहते है? आप लोग स्नान, भोजन आदि कहा करते है? आप लोग रहते कहा है? आप लोगो को कौन यजमान सत्कार आदि करने के लिये बुलाता है? विधवेव देवरम् 2 यहा दृष्टान्त के रूप में दिया गया है । जैसे विधवा नारी अपने पति के भाई देवर का अपना गुजर-बसर चलाने के लिये सहारा लेती है । यदि ' विषवेव देवरम्' इस वाक्य में भी विधवा सभोग के लिये ही देवर का सहारा लेती है, ऐसा अर्थ माना जाय तो इस अर्थ की प्राप्ति तो ' मत्यं न योषा' इस उदाहरण से ही हो जाता है, तब इस दूसरे उदाहरण की व्यर्थता हो जायगी । इसलिये पति के अभाव में अपनी रक्षा के लिये भौजाई देवर का सहारा लेती है, यही अर्थ करना ठीक होगा । ' इसको देवर इसलिये कहते है कि यह द्वितीय वर माना जाता है' इस निरुक्त के वचन के आधार पर विधवा को दूसरे कर के साथ नियोग करन की आज्ञा वेद से प्राप्त है और इसी तरह से पुरुष भी विधवा स्त्री से विवाह कर सकता है । विधवा स्त्री मृत व्यक्ति के संबन्धी पुरुष से ही सन्तान के लिये नियोग करे, कुवारे के साथ नही 'यह सारी बातें मूढ आग्रह से भरी है, क्योकि मन्त्र में और निरुक्त के वचन मे भी आज्ञासूचक विधि वचन नहीं है । मीमासा सिद्धान्त के अनुसार अन्य किसी भी प्रमाण से अप्राप्त वस्तु मे विधिवाक्य का प्रयोग किया जाता है, अर्थात् जिसमे किसी भी प्रमाण से प्रवृत्ति न होती हो, उसमे प्रवृत्त कराने के लिये विधि अर्थात् आज्ञा सूचक लकार का प्रयोग होता है । मन्त्र में दृष्टान्त रूप में दिये गये विधवा और देवर की अभिमुखता संभोग परक हो भी जाय, तो भी उसको वैध नही सिद्ध किया जा सकता । दृष्टान्त का तात्पर्य केवल दान्तिक अर्थ के उपपादन में ही किया जा सकता है. दृष्टान्त वैध है या नहीं, इससे उसका कोई संबन्ध नही रहता । तात्पर्य के अभाव में विधिवचन भी किसो का विधान नही कर सकता, तब भला दृष्टान्त वाक्य से किसी आज्ञा का विधान कैसे संभव हो सकता है? 'जतिल की यवागू से हवन करे अथवा गेहूं की यवागू से' इस अर्थवाद वाक्य में विधि प्रत्यय के रहने पर भी जैसे यह जतिल यवागू आदि का विधायक नही माना जाता, क्योंकि अजाक्षीर से हवन करने का विधान करने वाला वाक्य प्रधान है और यवागू आदि का विधान करने वाला वाक्य उसी का अंग होने से प्रधान नही माना जा सकता । इस ऋचा में भी छोटे देवर के साथ जेष्ठ अश्विनी कुमारो की ओर विधवा के साथ यजमान की तुलना की गई है । 'हे विवाहित स्त्री -पुरुषो ' ऐसा संबोधन परक अर्थ कहना सर्वथा गलत है, क्योकि इसका मूल में आये 'अश्विनी' पद से
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वेदार्थ पारिजातः १४३१ विधवया च यजमान । हे विवाहितौ स्त्रीपुरुषौ इति सम्बोधनन्तु सर्वथाऽशुद्धमेव, अश्विना इति मूलोक्तसम्बोधनविरुद्धत्वात् । यजमानस्तु स्वोपास्यौ प्रति तददर्शनाद् एव प्रश्नान् कर्तुमर्हति । विवाहित स्त्रीपुरुषौ प्रति को वा पृच्छक? न परमेश्वरः सम्भवति, तस्य सर्वज्ञत्वात् दृष्टान्तदाष्टन्तिकयो. क्व साम्यमिति तु मन्त्रानुसारेण नोक्त दयानन्देन । हिन्दीव्याख्याने तु लिखितम् ' जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ सन्तानोत्पत्ति करती है, वैसे ही तुम भी करो । ' ,एतच्च सर्वथा वेदमन्त्रार्थबाह्यम् असङ्गत च । यथेतरे विवाहितस्त्रीपुरुषा सन्तानमुत्पादयन्ति तथैव युवाभ्यामपि कार्यमित्येव सात्येन सम्भवत्युपदेशेऽस्वाभाविकविधवादेव रोदाहरणमसङ्गतमेव स्यात् । मूलं तु सन्तानोत्पादनस्य चर्चाऽपि नास्ति, किन्तु तत्र को वा सधस्थ आकृणुते इति दाष्टन्ति । तदर्थस्तु दयानन्देन न ज्ञातो न वालिखित नियोगसाधनाभि-निविष्टचेतस्त्वात् । सिद्धान्ते तु स्पष्ट मुक्तम्, उपासका यजमानोऽश्विनोर्दर्शनाभावात् पृच्छति - वा युवा को वा यजमान. सधस्थे वेद्यादो आकृणुते युवा परिचरणार्थमभिमुखीकरोति । तत्रैव यत्नातिशयेन सरागपरिचरणे विधवादृष्टान्त । स्वपतिस्तथा न दुर्ग्रहचित्तो यथा परकीयोऽतो यथा विधवा यत्नातिशयेन देवर परिचरणाय तदाभिमुख्य कुरुते तद्वत् को वा यजमान इत्यन्वग 1। कुनारपो स्त्रीपुरुषयोरेकवारमेव विवाह । नेव द्विजेषु द्वितीयवार विवाहो विधीयते । पुनर्विवाहस्तु खलु शूद्रवर्ण एव विधीयत इति दयानन्दतदनुयायिन । सामाजिकास्तु विधवाविवाहायैव बद्धपरिकरा दृश्यन्ते । नियोगोऽपि दयानन्दस्य न देवरेण, किन्तु केनचिदपि विधुरेण सम्भवति । स ब्राह्मणो वा स्यात् शूद्रो वा स्यात् आङ्गलो वा स्यात् यवनो वा स्यात् तद्रा तु कर्मणैव वर्णव्यवस्थाभ्युपगमात् ॥ 'इय नारी पतिलोक वृणाना निपद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम् । धर्म पुराणमनुपालयन्ती तस्ये प्रजा द्रविण चेह ) मन्त्रार्थस्तु - इय पुरोवर्तिनी नारी पतिलोक पत्यानुष्ठिताना यागदानहोमादिकर्मणा फलभूतघेहि || ' ( अथर्व साधा विरोध है. यजमान अपने उपास्य देवता के प्रति इस तरह के प्रश्न कर सकता है, किन्तु विवाहित स्त्री पुरुषों से ऐसे प्रश्न करने का क्या नुक है और उनको पूछनेवाला कौन होगा? वह परमेश्वर नही हो सकता, क्योंकि वह तो सर्वज्ञ है, उसको सब बाते मालूम ही है । दयानन्द ने इस मन्त्र मे दृष्टान्त और दान्तिक की समानता भी नहीं बताई है । हिन्दी व्याख्या में दयानन्द ने लिखा है - जैस विधवा स्त्री देवर के साथ सन्तानोत्पत्ति करती है, वैसे ही तुम भी करो ' ( पृ० २४५ ) यह बात इस मन्त्र के सर्वथा विपरीत और असंगत हैं ( जैसे दूसरे विवाहित स्त्री-पुरुष सन्तान उत्पन्न करते है, देवरवैसे काही तुम लोगों को भी करना चाहिये, सरलता से यही उपदेश होना चाहिये । इसके विपरीत अस्वाभाविक रूप से विधवा और मे तो सन्तान उत्पति की कोई चर्चा नहीं है, किन्तु तुम लोगो का वेदि मे आह्वानकौनउदाहरणकरतादेताहै, असंगतयही बातहीवहामानाभीजायगाकही गई। हैमूलमन्त्र। इसका अथ न तो दयानन्द को ज्ञात ही था और न उन्होने कुछ अर्थ किया ही है । उनके मत मे तो वेद से नियोग को सिद्ध करने की बात बैठी है । वही उन्होने किया है । हमारे मत से तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उपासक केयजमान को अश्विनीकुमारो का दर्शन न होने से वह पूछता है कि कौन यजमान आप लोगो को वेदि स्थान में आपकी सेवा करने के दृष्टान्त के रूप में विधवा का दृष्टान्त दियालिये बुलाता है । इसी विषय मे अतिशय प्रयत्न पूर्वक अनुरक्त चित्त से सेवा करने गया है । अपना पति स्त्री के लिये उतना दुराराध्य नहीं है, जितना कि दूसरे का पति । अत: विधवा अपने देवर को अपने अनुकूल बनाये रखने के लिये बडो तत्परता से लगी रहती है, उसी तरह से वह कौन यजमान है । यही इस दृष्टान्त का तात्पर्य है | प्रचलितकुवारे स्त्री और पुरुष का विवाह एक बार ही होता है । द्विजो में दुबारा विवाह नही किया जाता । पुनर्विवाह केवल शूद्र वर्ण भीमे विधुर के है । आर्यसमाजी विधवा विवाह के लिये कमर कसे रहते है । दयानन्द के मत से नियोग केवल करतेदेवर से। उनकेही नहींमत, किसीसे तो वर्ण व्यवस्था साथ हो सकता है । वह ब्राह्मण हो, शूद्र हो, अंग्रेज हो या मुसलमान, इसका कोई विचार वे नही का आधार व्यर्थ ही हैं । 'इय नारी ० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है - यह सामने उपस्थित नारी पति के द्वारा अनुष्ठित याग, दान, होम आदि से प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि स्थानों में इन कर्मों के अनुष्ठान में साथ साथ रहने के कारण हे मनुष्य, यह मृत्यु के उपरान्त दूसरे लोक में
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१४३२ वेदार्थपारिजातः स्वर्गस्थानं वृणाना सहधर्मचारिणीत्वेन सम्भजमाना ' वृञ् सम्भक्तौ' एवभूता नारी हे मर्त्य मरणधर्मन् । मनुष्य प्रेतं प्रकर्षेणा- स्माल्लोकाद्गत त्वामुपनिपद्यते, उपसमीपे नितरा गच्छति, अनुमरण प्राप्नोतीत्यर्थ: । पुराण पुरातनमनादिशिष्टाचारसिद्धं स्मृतिपुराणादिप्रसिद्ध वा धर्म मुकृतमनुपालयन्ती आनुपूर्व्येण सम्प्रदायाविच्छेदेन पालनमनुपालनम्, तत्कुर्वती तदनुपालनाद्- धेतोः, ‘ लक्षणहेत्वो' क्रियाया:' ( पा० सू० ३ | २| १२६ ) इति हेतौ शतृस्मरणात् 1। तस्यै तथाविधायै अनुमरण कृतवत्यै इह भूलोके जन्मान्तरे लोकान्तरे च प्रजा पुत्रपौत्रादिलक्षणा द्रविण धनं देहि प्रयच्छ । अनुमरणप्रभावाज्जन्मान्तरेऽपि स एव तस्या: पति- र्भवति सर्वाभीष्टप्रापकरच, पतिदेवताया नार्या पत्यैव सर्वकामपूर्तिसम्भवात् । यत्तु— 'इय नारी विधवा प्रेत मृत पति विहाय पतिलोक पतिसुख वृणाना स्वीकर्तुमिच्छन्ती हे मर्त्य त्वामु- पनिपद्यते त्वा पति प्राप्नोति तव समीप नियोगविधानेनागच्छति ता त्व गृहाणास्या सन्तानमुत्पादय । कथभूता सा पुराणं वेदप्रतिपाद्य सनातन धर्ममनुपालयन्ती सती त्वा नियोगेन पति वृणुते त्वमपीमा वृणु । तस्यै इहास्मिन् समये लोके वा प्रजा धेहि । त्वमस्या प्रजोत्पत्ति कुरु । द्रविण द्रव्य बीर्यमस्या धेहि, गर्भाधान कुरु' ( पृ ० २४४), इति । तत्तु सर्वथाऽशुद्ध प्रजावञ्चन च, वेदाक्षरबाह्यत्वात् । तथाहि मन्त्रेऽस्मिन् ' विहाय' पद नास्त्येव । एवमध्याहारस्वातन्त्र्ये कस्यापि वाक्यस्य कोऽप्यर्थः कर्तुं शक्येत । एवं नियोगविधानेन तव समीपमागच्छतीत्यपि निर्मूलम्, नियोगविधानस्य कापि मन्त्रेष्वदर्शनात् । पुराणधर्मपालन नियोगश्चेति परम्पर विप्रतिषिद्धयते । इयं नियोगेन त्वां पति वृणुते त्वमपीमा वृणु इति विधान दयानन्दीयविकृतमस्तिष्क- परिणाम एव । नात्र विषये मन्त्रो मन्त्रपद मन्त्राक्षर वा प्रमाणम् । मृतं पति विहाय त्वा निपद्यत इति निर्मूलम्, मूले विहाय- पदाभावात् । त्वमस्या प्रजा धेहि द्रविण धेहि वीर्य धेहीत्यपि निराधारमेव, प्रजाधानेनैव गतार्थताया वीर्यार्थकद्रविणाधानोक्ति- स्त्वद्रीत्यापि व्यर्थेव । तस्माद् उपर्युक्त इय नारी पतिलोक पत्युर्लोक पतिपुण्यार्जित स्वर्गादिस्थान वृणाना सभजमाना हे भी तुम्हारे पास पहुच जायगी । पुरातन अनादि शिष्टाचार से चले जाये अथवा स्मृति-पुराण आदि मे प्रसिद्ध सुकृत ( धर्म ) का पालन करती हुई यह नारी मृत्यु के उपरान्त तुम्हारे पास चली आवेगी । अतः इसको तुम इस लोक और दूसरे लोक में भी पुत्र-पौत्र आदि प्रजा और धन- धान्य से संपन्न कर दो । इसका अभिप्राय यह है कि पति के मरण के उपरान्त सती हो जाने पर उसके प्रभाव से जन्मान्तर में भी उसको वही पति मिलता है और वही उसकी सारी कामनाओ को पूर्ति करता है । यह ठीक भी है कि पति को देवता मानने वाली सती स्त्री की सारी कामनाओ की पूर्ति उसी से हो । दयानन्द ने इसका यह अर्थ किया है -'जो विधवा नारी पतिलोक अर्थात् पतिसुख की इच्छा करके नियोग करना चाहे, तो वह अपने पति के मर जाने पर दूसरे पति को प्राप्त हो । इस मन्त्र में स्त्री और पुरुष को परमेश्वर आज्ञा देता है कि हे पुरुष, जो इस सनातन नियोग धर्म की रक्षा करने वाली स्त्री है, उसके सन्तानोत्पत्ति के लिये धर्म से वीर्यदान कर, जिससे वह प्रजा से युक्त होकर आनन्द मे रहे । तथा स्त्री के लिये भी आज्ञा है कि जब किसी पुरुष की स्त्री मर जाय और वह सन्तानोत्पत्ति करना चाहे, तब स्त्री भी उस पुरुष के साथ नियोग करके उसको प्रजा से युक्त कर दे । इसलिये मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम मन, कर्म और शरीर से व्यभिचार कभी मत करो, किन्तु धर्मपूर्वक विवाह और नियोग से सन्तानोत्पत्ति करते रहो' ( पृ० २४५ ), किन्तु यह अर्थ सरासर गलत और ठगी से तो भरा ही है, साथ ही वेदाक्षरो से इसका कोई संबन्ध भी नही है । इस मन्त्र मे 'विहाय' पद नही है । अध्याहार मे मनमानी की जाय तो उसकी सहायता से तो किसी भी वाक्य का कोई भी मनमाना अर्थ किया जा सकता है । इस तरह के नियोग का विधान होने से तुम्हारे पास आती है, यह कहना भी निराधार है, क्योकि मन्त्रो में कही भी नियोग का विधान नहीं किया गया है । पुरातन धर्म का पालन और नियोग में दोनो परस्पर विरोधी बातें हैं । इस नियोग के आधार पर तुम्हें पति के रूप में स्वीकार करती है, तुम भी इसको स्वीकार करो, इस तरह का विधान दयानन्द के बिगडे दिमाग की उपज है । इस विषय में कोई मन्त्र, उसका कोई पद या अक्षर प्रमाण के रूप में उद्धृत नही किया जा सकता । मृत पति को छोड़कर तुम्हारे पास आती है, ऐसा अर्थ करना निराधार है, क्योंकि मूल मन्त्र में 'विहाय' पद नही है, ऐसा हम अभी बता ही चुके है । तुम इसमें प्रजा, द्रविण और वीर्य का आधान करो, यह कथन भी निराधार है, क्योंकि प्रजा के आधान से ही वीर्य का भी आधान आ ही जाता है और
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वेदार्थपारिजातः १४३३ मर्त्य मरणधर्मन् मनुष्य प्रेतमस्माल्लोकात्परलोक गतं त्वामियमुपनिपद्यते तव समीपे नितरा गच्छति, तवानुगमनेनानुमरणेन त्वामनुगच्छतीत्यर्थं । एवमनुगमनं सहगमनानुमरणलक्षण पुराण धर्ममनुपालयन्त्यै तस्यै इह भृलोके लोकान्तरे वा प्रजा पुत्र-पौत्रादिलक्षणं धेहीति व्याख्यानमेव युक्तम् ॥ 'उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोक गतासुमेतमुप शेष एहि । हस्तग्राभस्य दिविषोस्तवेद पत्युर्जनित्वमभि सम्बभूथ ||' (ऋ० स० १०।१८।८ ) । अस्य मन्त्रस्यापि व्याख्याने दयानन्देन यदुक्तम् -'हे विधवे नारि एत गतासु गतप्राण मृत विवाहित पति त्यक्त्वा अभिजीवलोक जीवन्त द्वितीयवर पति एहि प्राप्नुहि । उपशेषे सन्तानोत्पादनाय वर्तस्व । तत्सन्तान हस्तग्राभस्य विवाहे सङ्गृहीतहस्तस्य पत्यु स्यात्, यदि नियुक्तपत्यर्थी नियोग कृतस्तर्हि दिविषोस्तस्यैव सन्तान भवति । हे विधवे, विगतविवाहितस्त्रीकस्य पत्युश्चैतन्नियोगकरणार्थ त्वम् उदीर्ष्व विवाहितपतिमरणानन्तरमिम नियोगमिच्छ । तथा अभिसम्बभूव सन्तानोत्पत्ति कृत्वा सुखसयुक्ता भव' ( पृ० २४४ ) इति, अहो अस्मिन् कलिहतके भद्रमुखे यतौ दानव्या ,. वृत्ते प्राखर्यम् यत्पत्युर्मरणाव्यवहितोत्तरकालमेव दाहादिसत्कारादपि पूर्व विधवाया पुरुषान्तरेण नियोगविधानेन सन्तानोत्पत्ति विदधाति । तादृशे भीषणे विपत्तिकाले देवरम्य भ्रातृजाया प्रति तथा कथन गर्ह्यतामेव दयानन्दमनोगतस्य विशदयति । अन्यथा को वा कुलीनो मृतस्य भ्रातुरौर्ध्वदैहिकादिक्रियाया अपि प्राक् तथा वक्तुं शक्नुयात् । न केवल भारते, किन्तु कापि तादृशी नारी नोपलब्धु शक्या । पतिमरणानन्तरमेव गतासु देह त्यक्वा पुरुषान्तरसंयोग कामयते । मन्ये लज्जावशादेव हिन्दीभाषायामन्यथोक्तम् — 'जो तेरी इच्छा है, दूसरे पुरुष के साथ नियोग करके सन्तानो को प्राप्त कर, नही तो ब्रह्मचर्याश्रम मे स्थित होकर कन्याओं और स्त्रियो को पढाया कर । ' सायणादिसम्मतस्त्वयमर्थ –हे नारि, मृतस्य पत्नि अपक्रान्तप्राणम् एतं पतिमुपशेषे तस्य समीपे स्वपिषि । जीवलोकं जीवाना पुत्रपौत्रादीना लोकं गृहमभिलक्ष्य उदीर्ष्व अस्मात्स्थानादुत्तिष्ठ । ( ईर गतौ ) तस्मात्त्वमेहि आगच्छ । द्रविण का अर्थ भी आपने वीर्याधान ही किया है । ऐसी स्थिति में जब एक शब्द से हो यह अर्थ गतार्थ हो गया तो इन तीन शब्दो का अलग-अलग प्रयोग किस प्रयोजन से किया गया है? इसलिये हमारा ऊपर बताया गया अर्थ ही ठीक है । तदनुसार अनुमरण अर्थात् तुम्हारे साथ जाने के लिये सती होकर पुरातन धर्म का अनुपालन करने वाली इस स्त्री को तुम इस भूलोक मे अथवा लोकान्तर मे पुत्र पौत्र आदि प्रजा से और रत्न आदि धन से परिपूर्ण कर दो, यही अर्थ करना ठीक प्रतीत होता है । 'उदीर्ष्व० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने लिखा है- 'हे स्त्री, अपने मृतक पति को छोड़कर इस लोक में जो तेरी इच्छा हो तो दूसरे पुरुष के साथ नियोग करके सन्तानो को प्राप्त करो । जब तक मरण न हो तब तक ईश्वर का ध्यान और सत्य धर्म के अनुष्ठान मे प्रवृत्त होकर जो कि तेरा हस्तग्रहण करने वाला दूसरा पति है, उसकी सेवा किया करो, वह तुम्हारी सेवा किया करे । उसका नाम 'दिधिषु' है । वह तेरे सन्तान की उत्पत्ति करने वाला हो । जो तेरे लिये नियोग किया गया हो तो वह तेरा सन्तान हो और जो नियुक्त पति के लिये नियोग हुआ हो, तो वह सन्तान पुरुष का हो | इस प्रकार नियोग से अपने रहो' ( पृ ० २४५ - २४६ ) | यह भयंकर कलिकाल का ही प्रभाव माना जायगा कि अपने सन्तानो को उत्पन्न करके दोनो सदा सुखी होने से पहले ही विधवा दूसरे पति से नियोग करके सन्तान उत्पन्न करने लगे । पति के मरने के तुरन्त बाद पति के दाह संस्कार इस तरह के भीषण विपत्ति के समय मे देवर के साथ भौजाई के नियोग की बात करना दयानन्द के मन की कलुषता को प्रकट करता है । अन्यथा कोन कुलीन व्यक्ति ऐसा होगा जो अपने भाई का दाह संस्कार करने से पहले अपनी भौजाई से इस तरह की बात करे । केवल भारत में ही नही, किन्तु संसार में कही भी इस तरह की नारी नही मिल सकती, जो कि पति के मरने के तुरन्त बाद उसके शव का संस्कार होने से पहले ही दूसरे पुरुष के साथ सहवास करना चाहती हो । लगता है इसी लज्जा के कारण हिन्दी भाषा में कर, नही तो अर्थ करते समय उन्होंने कुछ बदल दिया है—'जो तेरी इच्छा है, दूसरे पुरुष के साथ नियोग करके सन्तानो को प्राप्त ब्रह्मचर्याश्रम में स्थित होकर कन्याओं और स्त्रियो को पढाया कर' (१० २४५ ) । १८०
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वेदार्थपारिजातः १४३४ यस्मात्त्वं हस्तग्राभस्य पाणिग्राह कुर्वन दिधिषो गर्भस्य निधातुस्तवास्य पत्यु सम्बन्धादागतमिदं जनित्व जायात्वमभिलक्ष्य बभूथ सम्भूतासि अनुमरणनिश्चयमकार्षी । तस्मादागच्छ । वस्तुतस्तु 'पर मृत्योरिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य आद्याश्चतस्रो मृत्युदेवत्या सप्तम्याद्या. पितृमेधाभिधायिन्य. । ' सूत्रित च-' इमे जीवा विमृतैरिति सव्यावृतो व्रजन्ति (आ ० श्र ० सू० ४ ४ ( ९) । तत्र प्रथमा - 'इमा नारीरविधवा सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सविशन्तु । अनश्रवोऽनमीवा सुरत्ना आरोहन्तु जनयो योनिमग्रे || ' (ऋ०स० १०।१८।७) अत्राप्युपर्युक्ता- यामृचि गतासु मृत विवाहितपति त्यक्त्वेति कस्य पदस्यार्थ? मूले त्यक्त्वेत्यर्थकस्य पदस्य सर्वथाऽभावात् । एवमेव सर्वत्रापि वेदव्याख्यानेऽस्य स्वैरचारित्वम् । तस्यैव सन्तान भवेदिति सन्तानगव्दस्य पुल्लिङ्गत्वेऽपि नपुसकलिङ्गप्रयोग प्रमाद एव । उदीर्ष्वतिक्रियापदस्य कथमिच्छार्थकत्वम्? गत्यर्थस्येरधातोरुत्पूर्वकस्येच्छार्थत्वे मानाभावात् । तस्मात् सर्वथाऽसङ्गतमेवेद व्याख्यानम् । 'आरोहतायुर्जरस वृणाना अनुपूर्व यतमाना यतिष्ठ । इह त्वष्टा सुजनिमा सजोषा दीर्घमायु करति जीवसे व ॥ ' (ऋ ० स० १०।१८/ ६ ) | हे मृतस्वजना पुत्रपौत्रादय जरस जरा वृणाना सभजमाना यूयम् आयु जीवनमारोहत अधितिष्ठत । अनुपूर्वम् ( आनुपूर्व्येण ) ( अव्ययीभावः) पूर्वो ज्येष्ठ. ज्येष्ठानुपूर्व्या यतमाना प्रयत्नं कुर्वन्तो यतिस्थ यत्सख्याका भवथ । यच्छब्दाच्छादसो डतिः 1। सर्वेऽपि आयु आरोहत । सुजनिमा शोभनजनन, त्वष्टा देव. सजोषा भवद्भि सङ्गत. सन् इहास्मिन् कर्मणि प्रवृत्ताना व युष्माक जीवसे जीवनाय दीर्घ प्रभूतमायुः करति करोतु ॥ अयमर्थ. -अविधवा जीवद्भर्तृका. सुपत्नी शोभनपतिका इमा नारी: नार्य. आञ्जनेन सर्वतोऽञ्जनसाधनेन घृतेन अक्तनेत्राः सत्यः सविशन्तु स्वगृहान् तथा अनश्रव अश्रुवर्जिता अरुदत्य अनमीवा रोगरहिता मानसदु खवर्जिता सुरत्ना. शोभनरत्नधारिण्य, जनय. जनय- न्त्यपत्यमिति जनय भार्या. ता अग्रे सर्वेषा प्रथमं ता एव योनि गृह आरोहन्तु आगच्छन्तु । अर्थात् प्रथम प्रेतपुत्रपौत्रादिभ्य आशिषो वितीर्यं जीवद्भर्तृका अरुदत्यो भार्या एव तस्योपान्तेवासिन्य आगच्छन्तु । ततः प्रेतसमीपे शयिता प्रेतपत्नी इस मन्त्र का सायणसंमत अर्थ यह है -हे मृत पुरुष की पत्नि, तुम इस निष्प्राण पति के पास सो रही हो । अपने पुत्र- पौत्र आदि का, इस लोक के सगे - संबन्धियों का खयाल कर तुम इस स्थान से उठी । हमारे साथ आओ । तुमने अपना हाथ पकडने वाले अपने में गर्भ का आधान करने वाले इस पति के संबन्ध मे उत्पन्न पत्नीधर्म का पालन करने के लिये उसके माथ मरने का निश्चय किया है । यह ठीक होते हुए भी तुम अपने पुत्र-पौत्रो का पालन करने के लिये हमारे माथ घर चलो । वास्तव मे 'पर मृत्योः' इत्यादि चौदह ऋचाओ वाले इस सूक्त की पहली चार ऋचाएँ मृत्यु देवता से संबद्ध है । सातवी से लेकर आगे के मन्त्र पितृमेव कर्म से सबद्ध है । आश्वलायन श्रौतसूत्र में तदनुसार ही इन मन्त्रो को विनियुक्त किया गया । ' इमा नारी:' इनमें से पहला मन्त्र है । इसमें भी 'गतप्राण विवाहित पति को छोडकर' इस अर्थ को बताने वाला 'विहाय' पद नही है । इसी तरह से दयानन्द सर्वत्र वेद की व्याख्या करते समय मनमानी करते है । सन्तान शब्द पुलिंग है, किन्तु दयानन्द ने इस पद का नपुंसक लिंग में प्रयोग किया है, जो कि गलत है । 'उदीव' क्रिया पद का अर्थ इच्छा कैसे हो सकता है । उत् उपसर्ग पूर्वक हुई घातु का प्रयोग गति अर्थ में होता है इच्छा के अर्थ मे इसका प्रयोग कही नही हुआ है और न इसमे कोई प्रमाण हो है । इसलिये इस मन्त्र की दयानन्द की व्याख्या सर्वथा असंगत है । ' आरोहतायु ० ' इस मन्त्र का अर्थ यह हैं -हे मृत व्यक्ति के स्वजनो, पुत्र -पौत्रो, वृद्धावस्थापर्यन्त आप सब लोग जीवित रहें । अपने से बड़े का सम्मान प्रयत्नपूर्वक आप लोग करे । आप लोग जितनी संख्या मे है, वे सब पूर्ण आयु प्राप्त करें । जीवन को सुन्दर बनाने वाला स्वष्टा देव आप लोगों से मिलकर इस शुभ कर्म में प्रवृत्त हुए आप सभी को दीर्घायु करे । पूर्व उद्धृत ' इमा नारी ० ' इत्यादि मन्त्र का भावार्थ यह है - सौभाग्यवती सुन्दर पतियो से युक्त ये नारियों अपनी आँखों में घृत का अजन लगाकर अपने -अपने घर बिना आँसू बहाये और सभी शारीरिक एवं मानसिक दुःखो से रहित होकर सुन्दर सुन्दर रत्नो के आभूषण धारण किये और पुत्र- पौत्रों से संपन्न हो, वे हो पहले इस घर मे प्रवेश करें । अर्थात् पहले पुत्र- पौत्रो को आशीर्वाद देकर सौभाग्यवती प्रसन्न वदन
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वेदार्थपारिजात: १४३५ देवरादिक कश्चित् ' उदीर्ष्व नारि' (ऋ ० स० १०।१८।८ ) इत्यनया ऋचा भर्तृसकाशादुत्थापयेत् । 'तामुत्थापयेद्देवर पतिस्थानी- योऽन्तेवासी वा जरद्दासो वोदीव नार्यभिजीवलोकम्' (आश्व ० गृ० सू० ४।२।१८ ) | सिद्धान्तानुसारि व्याख्यान तु कृतमेव । 'इमा त्वमिन्द्र मीढ्व सुपुत्रा सुभगा कृणु । दशास्या पुत्रानाचेहि पतिमेकादश कृधि || सोम. प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तर. । तृतीयोऽग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजा ॥ ' (ऋ ० स ० ) । अत्र व्याख्याने यदुक्तम्— ' इदानी नियोगस्य सन्तानोत्पत्तेश्च परिगणन क्रियते । कतिवार नियोग. कर्त्तव्य, कियन्ति च सन्तानानि चोत्पाद्यानि । हे इन्द्र, विवाहितपते मीढ्व हे वीर्यदानकर्तस्त्वमिमा विवाहितस्त्रिय वीर्यसेकेन गर्भयुक्ता कुरु । ता सुपुत्रा श्रेष्ठपुत्रवती सुभगा अनुत्तमसुखयुक्ता कुरु । अस्या स्त्रिया दशपुत्रानाधेहि दशपुत्रानुत्पादय नातोऽधिकमिति । ईश्वरेण दशसन्तानोत्पादनस्यैवाज्ञा दत्ता । तथा 'पतिमेकादश कृधि' ( ऋ० स० ), हे खि, त्व विवाहितपति त्यक्त्वा एकादशपतिपर्यन्त नियोग कुरु ॥ कस्याञ्चिदापत्कालावस्थाया प्राप्तायामेकैकस्याभावे सन्तानोत्पत्त्यर्थं दशमपुरुषपर्यन्त नियोगं कुर्यात् ( पृ० २४६ ) । अथोत्तर पतीना सज्ञा विधीयते सोम । हे खि, यस्त्वा प्रथम विविदे विवाहितस्त्वा प्राप्नोति स सौकुमार्यादि- गुणयुक्तत्वात् सोमसज्ञो भवति । यस्तूत्तरो द्वितीयो नियुक्त पतिविधवा त्वा विविदे स गन्धर्वसज्ञा लभते । कुतस्तस्य भोगाभिज्ञत्वात् । येन सह तृतीयवार नियोग करोषि सोऽग्निसज्ञो भवति कुतो द्वाभ्या भुक्तभोगया त्वया सह नियुक्तत्वाद् अग्निदाहवत् तस्य शरीरस्थधातवो दह्यन्त इत्यत । तुरीयस्ते मनुष्यजा । चतुर्थमारभ्य दशमपर्यन्तास्तव पतय साधारण- बलवीर्यत्वान्मनुष्यसज्ञा भवन्ति । तथैव स्त्रीणामपि सोम्या गन्धर्व्याग्नायी मनुष्यजा सज्ञा भवन्ति ( पृ० २४६ ) । ' अदेवृघ्न्यपतिघ्नी हैधि शिवा पशुभ्य. सुयमा सुवर्चा । प्रजावतीर्वीरसूर्देवृकामा स्योनेममग्न गार्हपत्य सपर्य || ' ( अथर्व स० १४।२।१८) । हे अदेवृध्नि, देवरसेविके, अपतिघ्नि विवाहितपतिसेविके, त्व शिवा कल्याणगुणयुक्ता गृहकृत्येषु नारियाँ उनके घर में आवें, यह मन्त्रो मे शुभाशंसा प्रकट की गई है । इसके बाद प्रेत के समीप सोई हुई प्रेत की पत्नी को कोई देवर आदि उसके संबन्धी ' उदोर्ध्व नारि० ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए पति के पास से उसे उठावे, जैसा कि आश्वलायन गृह्यसूत्र में इसका विनियोग बताया गया है । इसके अनुसार मन्त्र की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है । इसके आगे तीन मन्त्रो को उद्धृत कर दयानन्द ने उनका अर्थ इस तरह से किया है— ' ईश्वर मनुष्यो को आज्ञा देता है कि हे इन्द्र, पते, ऐश्वर्ययुक्त, तू इस स्त्री को वीर्य दान देकर सुपुत्र और सोभाग्ययुक्त कर । हे वीर्यप्रद, तुम्हारे लिये वेद की यह आज्ञा हैं कि इस विवाहित या नियोजित स्त्री में दस सन्तान तक उत्पन्न कर अधिक नही । तथा हे स्त्री, तु नियोग में ग्यारह पति तक कर । अर्थात् एक तो उनमें प्रथम विवाहित और दस पर्यन्त नियोग के पति कर, अधिक नही । इसको व्यवस्था यह है कि विवाहित पति के मरने या रोगी होने से दूसरे पुरुष या स्त्री के साथ सन्तानो के अभाव में नियोग करे । दूसरे के भी मरण या रोगी होने के अनन्तर तीसरे के साथ कर ले । इसी प्रकार दसवें तक करने की आज्ञा है । परन्तु एक काल में एक ही वीर्यदाता पति रहे, दूसरा नही । इसी प्रकार पुरुष के लिये भी विवाहित स्त्री के मर जाने पर विधवा के माथ नियोग करने की आज्ञा है । वह जब रोगी हो या मर जाय तो सन्तानोत्पत्ति के लिये दूसरी स्त्री तक नियोग कर लेवे । अब पतियों की सज्ञा कहते है -उनमें जो विवाहित होता है, उसकी सोम सज्ञा है, क्योकि वह सुकुमार होने से मृदु आदि गुणों से युक्त होता है । दूसरा पति जो नियोग से होता है, वह गन्धर्व संज्ञक अर्थात् भोग से अभिज्ञ होता है । तीसरा पति जो नियोग से होता है, वह अग्निज्ञक अर्थात् तेजस्वी, अधिक उमर वाला होता है । चौथे से लेकर दशम पर्यन्त जो नियुक्त पति होते है, ये सब मनुष्य संज्ञक कहलाते हैं, क्योंकि वे मध्यम होते हैं । इसी तरह से स्त्रियो की भी सोम्या, गन्धर्वी, आग्नायी, मनुष्यजा मंज्ञा उन्ही गुणों के आधार पर होती है । हे विधवा स्त्री, तू देवर और विवाहित पति को सुख देने वाली हो, उनका अप्रिय किसी प्रकार से मत कर और वे भी तेरा कभी अप्रिय न करें । इसी प्रकार मंगल कार्यों को करके सदा सुख बढाते रहो । घर के पशु आदि सब प्राणियों की रक्षा करके, जितेन्द्रिय होकर कर्मयुक्त श्रेष्ठ कार्यों को करती रहो तथा सब प्रकार के विद्या रूप उत्तम तेज को बढ़ातो चनो । तू श्रेष्ठ प्रजायुक्त हो
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वेदार्थपारिजातः १४३६ शोभननियमयुक्ता गृहसम्बन्धिपशुभ्यो हिता श्रेष्ठकान्तिविद्यासहिता तथा प्रजावती वीरसूः प्रजापालनतत्परा वीरसन्तानोत्पादका देवूकामा नियोगेन द्वितीयवरन्य कामनावती स्योना सुखयुक्ता सुखकारिणी सती इममग्नि गार्हपत्यं गृहसम्बन्धिनमाहवनीय- मग्नि सर्वं गृहसम्बन्धिव्यवहार च सपर्य सम्यक् सेवय । अत्र स्त्रियाः पुरुषस्य चापत्काले नियोगव्यवस्थाप्रतिपादिता (पृ० २४६ - २४७ ), अहो धाष्टर्यमस्यकलिहतकस्य धर्मध्वजस्य । यस्य नियोगस्य समर्थनमेतैर्मन्त्र. करोति स नियोगः कि लक्षण क च प्रोक्त इति तु नोक्तम् । न केवल पतिमरण एव, किन्तु पत्युर्विदेशादिगमनकालेऽप्यय नियोग विदधाति । तत एबोच्छृङ्खलेष्वस्य महर्षित्वं प्रसिद्धम् । किञ्च यदि नियोग शास्त्रीय स्यात्, मन्त्राणा च तद्बोधकत्व स्यात्, तदा कथ न आश्वलायनकात्यायनाद- यस्तथा सूत्रयेरन्? किञ्चात्र मन्त्रे इन्द्रेतिसम्बोधनपद स्पष्टमस्ति, तदपहाय पतिमेकादश कृधीत्यत्र स्त्रीति सम्बोधनपद कुतो लब्धम् १ मन्त्रे स्त्रीतिपदाभावात् । प्रथमद्वितीयादिशदनियुक्ता गृह्यन्त इत्यपि निर्मूलम् अत्र नियोगस्याप्रकृतत्वात् । प्रसिद्ध- सोमगन्धर्वादिदेवानपहाय नियुक्ताना सज्ञाबोधकास्ते शब्दा इत्यपि निर्मूलम् । अदेवृघ्नीति मन्त्रे वापि नास्ति नियोगचर्चा | सिद्धान्ते तु —'गृभ्णामि ते सौभगत्वाय' ऋ( ० स० १० ८५/३६) इत्यारभ्येवास्मिन् प्रकरणे पाणिग्रहणादि- मन्त्रा. सन्ति । 'गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तमित्यङ्गुष्ठमेव गृह्णीयात्' (आ ० श्र ० सू० १/७/३) | वेदोऽयमास्तिकाना ग्रन्थो न नास्तिकाना देवपित्राद्यनभ्युपगन्तृणाम् । मनुष्येभ्यो भिन्ना देवा इति तु पूर्वमेव स्पष्टीकृतम् । तद्रीत्या गन्धर्वा अग्नयं प्रायच्छन् ता कन्यामग्नि. सोमाय दत्तवान् । स एवाग्निर्मनुष्येभ्यस्ता ददातीति । 'तुभ्यमग्ने पर्यवहन् सूर्या वहतु ना सहापुन. पतिभ्यो जाया दो अग्ने प्रजया सह ॥' बडे-बडे वीर पुरुषों को उत्पन्न कर । जो तू देवर की कामना करने वाली है, तो जब तेरा विवाहित पति न रहे अथवा वह रोगी या नपुंसक हो जाय, तब तू दूसरे पुरुष से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर और तू इस अग्निहोत्र प्रभृति घर के कामों को सुचारु रूप से सदा प्रीतिपूर्वक प्रसन्नचित्त से पूरा कर । इसी प्रकार से विधवा और मृत स्त्रीक पुरुष तुम दोनो आपत्काल में धर्म करके सन्तानोत्पत्ति करो और उत्तम व्यवहारो को सिद्ध करते जाओ । गर्भहत्या या व्यभिचार कभी मत करो, किन्तु नियोग हो कर लो, यही व्यवस्था सबसे उत्तम है' (पू० २४७-२४८ ) कलियुग के इस यति की घृष्टता देखने लायक है । इन मन्त्रो से जिस नियोग का समर्थन स्वामी दयानन्द करते हैं, उस नियोग का स्वरूप क्या है और उसका प्रतिपादन कहाँ किया गया है, इस बात को उन्होने बताया नही है । पति के मर जाने पर ही नही विदेश आदि मे चले जाने पर भी यह नियोग का विधान करते है । इसीलिये उच्छृङ्खल व्यक्तियो के बीच में ये महर्षि के नाम से प्रसिद्ध है । यदि यह नियोग शास्त्रसंमत होता और मन्त्रो में उसका उल्लेख होता तो आश्वलायन, कात्यायन पभूति श्रौतसूत्रकार उसका उल्लेख क्यो न करते? प्रथम मन्त्र में इन्द्र पद स्पष्ट हो संबोधन का सूचक है, उसको छोडकर अपने पति को ग्यारहवा बताओ, ऐसा अर्थ करते समय स्त्री को संबोधन किस प्रमाण के आधार यह किया गया है? मन्त्र तो ऐसा पद है नही । प्रथम, द्वितीय आदि यद से नियोग द्वारा गृहीत पतियो का ग्रहण होता है, यह बात भी निराधार है, क्योकि यहाँ नियोग का कोई प्रसङ्ग नही है । प्रसिद्ध सोम, गन्धर्व आदि देवताओ को छोडकर इन शब्दो को नियोग द्वारा गृहीत पतियो के वाचक मानने में भी कोई प्रमाण नही है । 'अदेवृती ' प्रभृति मन्त्र में भी नियोग की चर्चा नही है । सिद्धान्त मे तो 'गृभ्णामि ते सौभगत्वाय ' इत्यादि मन्त्र से लेकर इस प्रकरण के अन्य सभी मन्त्र भी विवाह से सम्बद्ध पाणिग्रहण करते समय बोले जाते है । आश्वलायन श्रौतसूत्र में बताया गया है कि इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए वधू के अंगूठे को पकडे । यह वेद आस्तिकों का ग्रंथ है, देवता, पितृगण आदि को न मानने वाले नास्तिको का नही । देवगण मनुष्यों से भिन्न है, इस बात की पुष्टि पहले ही कर दी गई है । इसके अनुसार इस वधू को गन्धर्व अग्नि को समर्पित करते है । वह अग्नि इस कन्या को सोम को देता है और वही अग्नि इसको मनुष्यो को समर्पित कर देता है । यही बात 'तुभ्यमग्ने० ' इत्यादि मन्त्र में बताई गई है ।
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पारिजाता १४३७ जातां कन्या सोमः प्रथमभावी सन् विविदे लब्धवान् तेन स एव प्रथमः पालक पतिः । गन्धर्व उत्तर ' सन् 'विविदे लब्धवान्, गन्धर्वस्यापि पालकत्वात् पतित्वम् । हे कन्ये, अग्निस्तव तृतीय पति पश्चान्मनुष्यजास्ते तुरीय. पति । अत्र जन्मारभ्याष्टवर्षपर्यन्त सोमगन्धर्वाग्नयस्तत्पोषका क्रमेण भवन्ति, मनुष्यजास्तु तुरीयो लौकिक. पतिर्भवति । 'सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये । रयि च पुत्राश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम् ||' (ऋ० स० १० ८५।४१ ) सोम गन्धर्वाय प्रथम ददत् प्रादात् । गन्धर्वोऽग्नये प्रादात् । अथोऽपि च अग्नि इमा कन्या रयि धन पुत्राश्च मह्यमदात् । अर्थात् सोम स्वाधिपत्यकाले स्वगुणै सौकुमार्यादिभिस्तस्या पोषण करोति । अनन्तर गन्धर्वाणामधिकारकाले सोमस्तेभ्यो ददाति । गन्धर्वाश्च स्वाधिकारकाले ता पुष्णन्ति सोस्वर्यादिगुणै, ते च स्वाधिपत्यकालसमाप्तौ अग्नये प्रयच्छन्ति, अग्निश्च ता स्वगुणै परिपोष्य मह्य मनुष्याय वराय ता कन्या रयि धन पुत्राश्व अदात् । धनपुत्राद्यैश्वर्यवती तामदादित्यर्थं । अत्र नहि दयानन्दीया नियोगिनोऽन्येभ्यो नियोगिभ्यो विधवा प्रयच्छन्ति । न वा सा कन्या भवति । किञ्चेमे मन्त्रा विवाहसम्बन्धिन | त्वद्रोत्यापि न विधवाविवाहो भवति । तथा गन्धर्वादयो नियोगिना सज्ञेत्यप्यपास्तम् त्वद्रीत्या सोमो विवाहित प्रथम पति । स कि नियोगिने स्वभार्या प्रयच्छति? भवत्येव सामाजिकाना क्षेत्रेषु किम्? 'इमा त्व' हे इन्द्र, त्वमिमा वधू सुपुत्रा सुभगा च कृणु कृधि । अस्या वध्वा दशपुत्रानाधेहि । पतिमेकादश कृधि । दशपुत्रा पतिरेकादशो यथा स्यात् तथा कृणु । अनेन्द्रो देव प्रार्थ्यते परमेश्वरो वा, तस्यैव पुत्रदानसामर्थ्यात् ॥ अत्र नैकादशसख्याका पतयो विहिता, किन्तु दशपुत्रानपेक्ष्य पत्युरेकादशसख्यापूरकत्वेन ग्रहणम् । नैकादशसख्याकपति- विधानम्, पूरणार्थप्रत्ययविरोधात् । न च सजातीयस्येव सख्यापूरकत्वम्, यजमानपञ्चमा इडा भक्षयन्ति' इति, ' वेदानध्या- ' ( ) पयामास महाभारतपञ्चमान् म ० भा० इत्यादौ विजातीयेनापि सख्यापूरणदर्शनात् । सर्वथापि दयानन्दी- 'सोमः प्रथमो विविदे ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है— कन्या के उत्पन्न होने पर सबसे पहले सोम ने उसे प्राप्त किया । इसलिये वही उसका पहना पालक अर्थात् पति है । इसके बाद गन्धर्व ने उसे प्राप्त किया, अत. गन्धर्व भी इसका पालक पति है । हे कन्ये, तेरा तीसरा पति अग्नि और इसके बाद चौथा पति मनुष्य है । यहाँ जन्म से लेकर आठवें वर्ष तक सोम, गन्धर्व और अग्नि क्रम मे उस कन्या के पालक होते हैं और अन्त मे मनुष्य उसका चौथा लौकिक पति बनता है । 'सोमो ददत्० ' इत्यादि मन्त्र का यह अर्थ है -इस कन्या को सोम ने गन्धर्व को दिया । गन्धर्व ने अग्नि को दिया और इस अग्नि ने इस कन्या के साथ धन और पुत्रो को भी मुझे दिया । इसका अभिप्राय यह है कि सोम जब इसको अपने संरक्षण में रखता है, तो उसको अपने सौकुमार्य आदि गुण देता है । इसके बाद वह गन्धर्वों के सरक्षण में इसे सौप देता है । गन्धर्व अपने सरक्षण काल मे इसको मधुर स्वर आदि से संपन्न करते है और इसके बाद इसे अग्नि के संरक्षण में सौंप देते हैं ॥ अन्त में अग्नि इसको अपने तेज आदि गुणों से विभूषित कर मुझ मनुष्य रूपी वर को सौप देते हैं साथ ही वह अग्नि मुझे घन और पुत्र-पौत्रो से भी सपन्न कर देते हैं । अर्थात् घन और पुत्र आदि ऐश्वर्य से संपन्न उस कन्या को मुझे सौंप देते है । इस मन्त्र में दयानन्द के द्वारा कल्पित नियोगी किसी अन्य नियोगी को विधवा को देते हो, ऐसी कोई बात नही है । विधवा को कोई कन्या नही कहता । ये सब मन्त्र विवाह से संबद्ध है | आपके मत से भी विधवा का विवाह नही होता, नियोग होता है । इस तरह से गन्धर्व प्रभृति नाम नियोग से संबद्ध व्यक्तियो के नही माने जा सकते । आपके मत से सोम विवाहित पहला पति है, क्या वह किसी दूसरे नियोगी को अपनी पत्नी दे देता है? क्या ऐसा आर्यसमाजियो मे होता है? ' इमां त्वम्० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है -- हे इन्द्र, तुम इस वधू को पुत्र-पौत्रवाली और सौभाग्यशालिनी बनाओ | इस वधू को दस पुत्र दो और पति को ग्यारहवां बनाओ । अर्थात् इस वधू के दस पुत्र होने से घर में पति को लेकर ग्यारह प्राणी हो जाय । यहां या तो इन्द्र से प्रार्थना की जायगी अथवा परमेश्वर से, क्योंकि वे ही पुत्र देने में समर्थ हैं । यहा किसी वधू के ग्यारह पतियों का विधान नही है, किन्तु दस पुत्रों को लेकर पति ग्यारह संख्या की पूर्ति कर सके, इसी में इसका अभिप्राय है । ग्यारह पतियो का विधान मानने में पूरणार्थक प्रत्यय का विरोध होगा । संख्या की पूर्ति सजातीय पदार्थ से ही हो, ऐसा नही है, क्योकि ' यजमान को पांचवां व्यक्ति बनाकर चार ऋत्विक ' इडा' का भक्षण करते है', 'महाभारत को पाचवा बनाकर चार वेद पढायें' इत्यादि स्थलों में विजातीय यजमान,
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वेदार्यपारिजातः १४३८ योऽर्थोऽनर्गल एव । ‘इहैव स्तं' इति मन्त्रेण ' मावियौष्टम्' इति दम्पत्यो. सहावस्थानमुक्तम् । 'सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्वा भव, ननान्दरि सम्राज्ञी भव, सम्राज्ञी अधिदेवृणु ॥ ' इत्यादिमन्त्रैस्तस्या श्वशुरकुलसम्राज्ञीत्वमुक्तम् । तत्रैव माङ्गलिके प्रसङ्गोऽपि पनिमरणमेकादशपतिविधानमित्यादि सर्वमसम्बद्धमनर्गल च । अदेवृध्नीति मन्त्रव्याख्याने अदेवृघ्नी देवरसेविके अपतिघ्नी विवाहितपतिसेविके इति यद् व्याख्यात तदप्यप-व्याख्यानमेव, मन्त्राक्षरविरुद्धत्वात् । देवकामा नियोगेन द्वितीयवरस्य कामनावतीत्यपि स्वहृदयकालुष्यप्रकटनमेव, कामशब्द- स्येच्छामात्रपरत्वेन यथा भ्रातरो भ्रातर कामयन्त इत्यादाविव नियोगपरत्वाभावात् । मन्त्रार्थस्त्वेवम् — देवरमक्षपयन्ती अपतिघ्नी पति चाक्षपयन्ती देवरपतिघातकदौर्लक्षण्यरहिता सौलक्षण्योपेता पशुभ्यो हितकारिणी सुकान्तिमती सुयमा पातिव्रत्यादिनियमोपेता प्रशस्तपुत्रपौत्रादिप्रजायुक्ता वीरसू स्योना सुखदायिनी देवरहितकामा सती हे वधु, त्वमपतिघ्नी एधि भव, अदेवृघ्नी भव । किञ्चिद्भेदेनाय मन्त्र ऋक्सहितायामपि विद्यते 'अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्य. सुमना. सुवर्चा. । वीरसूर्देवृकामा स्योना शन्नो भव द्विपदे चतुष्पदे || (ऋ० स० १० ८५/४४) । तत्र चेत्थ सायणेन व्याख्यातम् - 'हे वधु, त्वमघोरचक्षु एधि भव । तथा अपतिघ्नी भव । तथा पशुभ्य. शिवा हितकरी भव । सुमना. सुवर्चा. भव । वीरसू. वीर-पुत्राणामेव प्रसवित्री देवृकामा स्योना सुखकरी भव । सर्वथापि वेदे नियोगकथा दयानन्दकपोलकल्पितैव । राजप्रजाधर्मविचार' 'त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भूषथ । सदासि अपश्यमत्र मनसा जगन्वान् व्रते गन्धर्वा अपि वायुकेशात्| ' (ऋ ० स० ३| ३८| ६) 'क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसि मा त्वा हिसीन् मा मा हिसी ।' (वा० स० २०1१) और महाभारत पाच संख्या की पूर्ति करते है । सभी दृष्टियों से इन मन्त्रो का दयानन्द का किया गया अर्थ अनर्गल, निराधार ही सिद्ध होता है । 'यही रहो', ' कभी जुदा मन होओ' इन वचनों से दम्पती के सदा साथ रहने की बात सिद्ध होती है । 'सम्राज्ञी श्वसुरे भव ' इत्यादि मन्त्र में सास-ससुर, ननद, देवर आदि पर सम्राट् के समान शासन करने की शुभाशंसा वधू के प्रति व्यक्त की गई है । इस पवित्र मागलिक अवसर पर पति के मरने की ओर ग्यारह खशम करने की बात सर्वथा असंबद्ध और अनर्गल ही मानी जायगी । 'अदेवृघ्नी ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग मे देवर की सेवा करने वाली और विवाहित पति की सेवा करने वाली, अर्थ नियोग के द्वारा द्वितीय वर कीयह कहना भी सर्वथा असंगत है, क्योंकि यह व्याख्या मन्त्राक्षरों से विपरीत है । देवकामा का कामना करने वाली, यह करना भी अपने मन की कालिमा को ही प्रकट करना है । काम शब्द इच्छामात्र का वाचक है, जैसे कि भाई भाई को चाहता है । इसमें नियोग को चर्चा का कोई प्रसंग नही है । मन्त्र का सही अर्थ यह है— देवर के और पति के अपघात f का कारण न बनती हुई अर्थात् इस तरह के बुरे लक्षणो से रहित सुलक्षणा 1 पशुओ का हित करने वाली, सुन्दर कान्तिबाली, तेजस्विनी, पातिव्रत्य आदि यम-नियमो से युक्त, गुणवान् पुत्र -पौत्र आदि सन्तति से परिपूर्ण, वीरप्रसू, सुख देनेवाली, देवर का हित } करने वाली हे वधू, तुम पति और देवर को किसी प्रकार की हानि न पहुंचावो । थोडे अन्तर से यह मन्त्र ऋक् संहिता में भी मिलता है । सायण ने उसका अर्थ इस तरह से किया है - हे वधु, तुम्हारी 1 1 4 दृष्टि किसी के लिये भयकारक न हो, तुम पति का नाश करने वाली न बनो, तुम पशुओ का हित करो । तुम्हारा मन तेजस्वी बने । तुम वीर पुत्रों को पैदा करो और देवर की शुभकामना करनेवाली और सुख देने वाली बनो । इस तरह से वेद मे नियोग की बात केवल दयानन्द की कपोल कल्पना है । मनु ने विधवा के विवाह का स्पष्ट निषेत्र किया है । शास्त्रों में इसको पशु व्यवहार बताया गया है कि पति के मर जाने पर विधवा को अन्य पुरुष का नाम भी नही लेना चाहिये । २२. राजा और प्रजा के धर्म का विचार 'त्रीणि राजाना०' इत्यादि मन्त्रों को उद्धृत कर दयानन्द ने लिखा है कि इनमें राजा के कर्तव्यों का विधान है । प्रथम मन्त्र की व्याख्या में दयानन्द कहते है-' तीन प्रकार की सभा को ही राजा मानना चाहिये, एक मनुष्य को कभी नहीं । वे तीनों ये