वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 561–570

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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वेदार्थपारिजात १४५९ बलम् । इन्द्रियं चक्षुरादिपाटवम् । राजन्य ओजःप्रभृतीना स्वरूपभूत क्षत्र क्षत्रियजातियुक्तत्वम् । वीर्यं शरीरादिबलमेव च राजयज्ञे तत्तेन त्रिष्टुप्छन्दस्कसूक्तपाठेनैवं राजानमोजः क्षत्रवीर्ये. समृद्धं करोति । किञ्चैतत्सूक्त गौरवीताख्येन महर्षिणा दृष्टत्वाद् गौरवीताख्य यस्मादेतत् गौरवीत तस्मादेतद् मरुत्वतीयशस्त्र समृद्धं सम्पूर्ण भवति । नस्य सूक्तस्य ब्राह्मणम् । सम्पूर्णो मन्त्र: - 'जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय मन्द्र ओजिष्ठो बहुलाभिमान । अवर्धन्निन्द्र मरुतश्चिदत्र माता यद्वोर दधन- ( ) ' निष्ठा ॥ वा० स० ३३ । ६४ जनिष्ठेत्येकादशचं सूक्त शक्तिपुत्रस्य गौरवीतेरापं मारुत श्रेष्टुभम् जनिष्ठा एकादश गौरवीतिः ' इत्यनुक्रमणीवचनात् । अग्निष्टोमे मरुत्वतीयशस्त्रे निविद्धानमिदं सूक्तम् । 'जनिष्ठा उग्र इत्येके भूयसी शस्त्वा मरुत्वतीया निविद दध्यात् ( आ ० श्री० सू० ५।१४ ) । ' सौमिकचातुर्मास्येषु वैश्वदेवेऽप्येतन्मरुत्वतोयनिबद्धानम् ( आ० श्री० सू० ९ २ ) । ' महाव्रतेऽपि निष्केवल्य एतत्सूक्ते जनिष्ठा उग्र सहसे तुरायेति निविद्धानम्' ( ऐ० आ ० ५| १ | १ ) । हे इन्द्र, सहसे बलाय तुराय शत्रूणा हिंसनाय त्वमुग्रः उद्गूर्णबल. जनिष्टा अजायथा । कीदृशस्त्व मन्द्र स्तुत्य. ओजिष्ठ अतिशयेन शरीरबलवान् बहुलाभिमानः भूयिष्ठाभिमानी ईदृश महानुभावमिन्द्रमत्र वृत्रवधे मरुतश्चिद् महनोऽपि अवर्धन् स्तुत्या साहाय्येन वा वर्धितवन्तः । यद् यदा धनिष्ठा धारयित्री इन्द्रमाता वीर दधनत् अधारयत् । ' बृहत्पृष्ठम्' इत्यत्र यदुक्तम्—' यत् क्षत्र कर्म तत् सर्वेभ्य. कृत्येभ्यो बृहन्महदस्ति । तथा पृष्ठमर्थान्निबलाना रक्षकं सत् पुनरुत्तमसुखकारकम् । एतेनोक्तेन क्षत्रराजकर्मणा मनुष्यो राजकर्म वर्धयति । नातोऽन्यथा क्षत्रधर्मस्य वृद्धि- भवितुमर्हति । तस्मात् क्षत्रं सर्वस्मात् कर्मणो बृहत् । यजमानस्य प्रजास्थस्य जनस्य राजपुरुषस्य वात्मात्मवदानन्दप्रद भवति । तथा सर्वस्य ससारस्य निष्कैवल्य निरन्तर केवल सुखं सम्पादयितु यत. समर्थं भवति तस्मात्तत्क्षत्र कर्म सर्वेभ्यो महत्तरं भवति' ( पृ० २६१ ) इति, तदप्यतीव साहसं धाष्ट्यं च पौर्वापर्यावधारणशून्यत्वात् । आश्चर्यमेतद्यदनेन 'ब्रह्म वे रथन्तरम्' इति रथन्तरशब्दसान्निध्यादपि बृहच्छन्दस्यार्थो नावगतः । 'त्वामिद्धि हवामह ' इति भागोऽपि नावधृतः । आठवाँ धातु माना जाता है । वीर्य शारीरिक बल को कहते है । चक्षु प्रभृति इन्द्रियो की कुशलता का यहाँ इन्द्रिय शब्द से अभिप्राय है । अत. राजन्य का अर्थ होता है कि इसमें ओज प्रभृति की सत्ता रहती है और यह क्षत्रिय जाति का होता है । यह अपने शारीरिक बल के सहारे राजसूय यज्ञ करने में समर्थ होता है । इस राजसूय यज्ञ मे त्रिष्टुप् छन्द वाले सूक्तो का पाठ कर इस राजा को क्षत्रिय के गुणों से संपन्न किया जाता है । यह सूक्त गौरवीत नाम के महर्षि के द्वारा परिदृष्ट है, इसलिये इसको गोरबीत सूक्त कहा जाता है । प्रस्तुत ब्राह्मण मे जिस मन्त्र की व्याख्या की गई है, उसको मूल मे उद्धृत कर दिया गया है । 'जनिष्ठा' इत्यादि ग्यारह मन्त्रो वाले सूक्त का ऋषि शक्ति का पुत्र गौरवीति है । इसका देवता मरुत् और छन्द त्रिष्टुप् है । यह विनियोग सर्वानुक्रमणी मे प्रदर्शित है । ऐतरेय बारण्यक में बताया गया है कि महाव्रत निष्कैवल्य प्रकरण में भी इस सूक्त का विनियोग किया जाता है । इस पृष्ठभूमि मे ब्राह्मण वाक्य का संक्षिप्त अर्थ यह होगा कि हे इन्द्र, बल के लिये, शत्रुओ के नाश के लिये तुम उम्र बलशाली होकर उत्पन्न होवो । हे इन्द्र, आप स्तुति करने लायक, अतिशय शारीरिक बलवाले, महान् अभिमानी है । इस तरह के गुणो से विशिष्ट महानुभाव इन्द्र की वृत्र का वध करने के लिये जाते समय मरुद्देवता भी स्तुति अर्थात् प्रशसा करके उसका उत्साह बढाते है और साथ ही इन्द्र की सहायता भी करते हैं, जब कि इन्द्र की माता उसको धारण किये रहती है । 'बृहत्पृष्ठ ' इत्यादि ब्राह्मणवाक्य की व्याख्या करते हुए लिखा गया है- 'यह राजव्यवहार सबसे बडा है । यह दुर्बलो का रक्षक होकर उनको सुख पहुँचाता है । इसलिये शूरवीर आदि गुणों से युक्त पुरुषो की सभा और सेना रखकर अच्छी प्रकार राज्य को बढाना चाहिये | इसके सिवाय राज्य की वृद्धि नही हो सकती । इसलिये राजव्यवहार चलाना सबसे बडा काम है | भली प्रकार चलाया गया यह राजव्यवहार प्रजा और राजपुरुष दोनों के ही लिये आनन्द देने वाला है और यह सारे संसार को निरन्तर सुम्बी बनाये रखने में समर्थ है । इसलिये यह प्रजापालन का राजव्यवहार सबसे महान् कार्य है' ( पृ ० २६२ ), किन्तु यह सारा कथन दुःसाहस से भरा हुआ है, क्योंकि आगे पोछे आये प्रसंगों को थोडा सा भी नही देखा गया है । यह आश्चर्य की ही बात है कि दयानन्द ने रथन्तर शब्द के साहचर्य के होने पर भी बृहत् शब्द का सही अर्थ नही समझा । 'खामिद्धि हवामहे ' इस वाक्य पर भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया 1

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वेदार्थपारिजात. १४६० क्षत्रेण क्षत्रसमृद्धि कथमित्यत्रापि मौनमेवावलम्बितम् । निष्केवल्यमित्यस्य सुखं कथमर्थ इत्यपि नोक्तम् । मन्ये शस्त्र- स्तोत्रादेरप्यपरिचितोऽय येन निष्केवल्यशस्त्रमपि नावगतम् । सम्पूर्णकण्डिकामनुल्लिख्य कुतश्चित्किञ्चिद् गृहीत्वा ब्राह्मणग्रन्थेषु पाण्डित्य प्रकटयन् विरुद्ध यत्किञ्चित् प्रपन् कथ न जिह्रेतीत्याश्चर्यमेव । बृहत्पृष्टं भवतीत्यपि वचनमपूर्णम्, सम्पूर्ण चेदम्- 'त्वामिद्धि हवामह इति बृहत्पृष्ठं भवति क्षत्रं वै बृहत् क्षत्रेणैव तत्क्षत्रं समर्धयति । अथो क्षत्र वेव बृहदात्मा यजमानस्य निष्केवल्य तद्यत्पृष्टं भवति क्षत्र वे बृहत् क्षत्र णैवैनं तत्समर्ध- यत्यथो ज्यैष्ठ्य वे बृहत् ज्येष्ठ्येनैवनं तत्समर्धयत्यथो श्रेष्ठ्य वे बृहच्छ्रेष्ठ्येनैवैनं तत्समर्धयति ।' इति निष्केवल्यशस्त्रस्य वर्णनम् | त्वामिद्धीत्यादिकस्तृचो निष्केवल्यशस्त्रस्य स्तोत्रियप्रतिपत् पादबृहत्साम्न आधारत्वात् वृहद्रूप । तेन च साम्ना पृष्ठस्तोत्रस्य निष्पाद्यत्वात् पृष्ठस्वरूपश्च भवति । त्वामिद्धीत्यस्यामृचि उत्पन्न बृहत्साम क्षत्र वा क्षत्रियजातिरूपमेव, अत: क्षत्रेणैव त्वामिद्धीति तृचरूपेण तत् क्षत्र यजमानरूपं समृद्ध करोति । अथोऽपि चोक्तरीत्या क्षत्रमेव बृहद्रूप निष्केवल्यशस्त्रं यजमानस्यात्मा देहभूत । तत्तथा सति यद्यदि बृहत्पृष्ठशब्दवाच्यं त्वामिद्धीत्यादिकं निष्केवल्यं भवेत्तेन निष्केवल्येन क्षत्र वै बृहदिति, । तस्माद् बृहद्रूपेण निष्केवल्येनैनं यजमान समृद्धं करोति । अथोऽपि च त्वामिद्धीत्यादिक बृहद्रूप ज्येष्ठ्य वयोवृद्धेः स्वरूपम् अतो ज्येष्ठेनैव राजानं समृद्धं करोति बृहद्रूपं श्रेष्ठ्य वै गुणोत्कर्ष एव । तथा सति गुणोत्कर्षेणैव यजमानं - ' समृद्ध करोति । त्वामिद्धीति सम्पूर्णो मन्त्र इत्यम् स्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारव । त्वा वृत्रेष्विन्द्र सत्पति नरस्त्वा काष्ठा स्वर्तत ||' ( वा० स० २७/३७; ऋ० सं० ६४६| १ ) । त्वामिद्धीति चतुर्दशचं सूक्तं बृहस्पतिपुत्रस्य शंयोरार्षमैन्द्रम् | त्वामिद्धि षडूना प्रागाथ' इत्यनुक्रमणी । यदि ज्योतिष्टोमो बृहत्पृष्ठः स्यात्तदानी निष्केवल्यस्याद्यः प्रगाथः स्तोत्रियः । तथा च सूत्रितम्—' यद्यु वै बृहत्त्वामिद्धि हवामहे' ( आ ० श्री० सू० ५।१५ ) महाव्रतेऽपि निष्केवल्येऽय प्रगाथ. शंसनीयः । तथैव पञ्चमारण्यकेऽपि सूत्रितम् -त्वामिद्धि हवामहे है । क्षत्र से क्षेत्र की समृद्धि कैसे होगी, इस पर भी उन्होने मौन साध लिया है । निष्केवल्य शब्द का अर्थ सुख कैसे होगा, यह भी उन्होने नही बताया । लगता है दयानन्द को शस्त्र, स्तोत्र आदि शब्दो के अर्थ का भी सही ज्ञान नही था, जिससे कि निष्केवल्य शब्द को नही जान पाये । सम्पूर्ण कण्डिका का बिना उल्लेख किये कही से कुछ लेकर यह ब्राह्मण ग्रन्थो मे अपनी पंडिताई छाटने लगते हैं । इससे बढकर आश्चर्य क्या होगा? 'बृहत्पृष्ठ भवति ० ' इत्यादि मन्त्रभाग भी यहाँ अधूरा ही उद्धृत किया गया है । इसी को बताने के लिये मूल मे सम्पूर्ण suser उदधृत कर दी गई है । इसमे निष्केवल्य शस्त्र का वर्णन है । ' त्वामिद्धि' इत्यादि तीन ऋचाएँ बृहत्साम की बाधारभूत होने से बृहत् कहलाती है । बृहत्साम से ही पृष्ठ स्तोत्र भी निष्पन्न होता है, अतः इसको पृष्ठस्वरूप भी माना जाता है । ' स्वमिद्धि ० ' इस ॠषा में उत्पन्न बृहत्साम अथवा क्षत्र क्षत्रिय जाति का ही बोधक है । अत: इन तीन ऋचाओ से यजमानरूप क्षत्रिय की ही समृद्धि की बात कही गई है । साथ ही इसी तरह से यह बृहद्रूप क्षत्र हो निष्केवल्य शस्त्र के रूप मे यजमान का शरीर बनता है । ऐसा होने पर यदि बृहत्पृष्ठ शब्द से अभिहित 'त्वामिद्धि' इत्यादि तृच सूक्त से यदि निष्केवल्य शस्त्र बनता है, तो इससे क्षेत्र की वृद्धि होती है । इसलिये वृहद्रूप निष्केवल्य शस्त्र का पाठ करने से यजमान की समृद्धि होती है । इसी तरह से 'स्वामिद्धि० ' इत्यादि का वृहद्रूप ज्येष्ठ साम आयु की वृद्धि करने वाला है । इसलिये इसका पाठ कर राजा की समृद्धि की कामना की जाती है । बृहद्रूप श्रेष्ठता गुण के उत्कर्ष को कहते हैं, अत' इस गुण के उत्कर्ष का वर्णन कर यजमान के उत्कर्ष की कामना की जाती है । 'त्वामिद्धि० ' इत्यादि पूरा मन्त्र मूल में उद्धृत कर दिया गया है । 'स्वामिद्धि० ' इत्यादि चौदह ऋचाओं वाले सूक्त का ऋषि बृहस्पति का पुत्र शंकु है । इन्द्र इसका देवता है । यह विवरण सर्वानुक्रमणी में दिया गया है । यदि ज्योतिष्टोम बृहत्पृष्ठ हो तो उस समय निष्केवल्य शस्त्र का पहला प्रगाथ स्तोत्रिय होता है, जैसा कि आश्वलायन श्रौतसूत्र मे बताया गया है । ऐतरेय आरण्यक के अनुसार इसका विनियोग महाव्रत मे भी निष्केवल्य शस्त्र के पहले प्रगाथ का शंसन करने में किया गया है । मन्त्र का अर्थ यह है-हे इन्द्र, हम स्तुति करने वाले ऋत्विग्गण अन्न के संविभाग के प्रश्न के

पृष्ठ 563

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वेदार्थपारिजात १४६१ त्व ह्येव चेरव इति बृहत स्तोत्रियानुरूपी' ( ऐ० आ ० ५/२/२ ) । मन्त्रार्थस्तु —- कारव स्तोतारो वयं वाजस्यान्नस्य साता सातौ संभजने संविभागे ( ष्टन् सभक्तौ ) निमित्तभूते सति हे इन्द्र, त्वामिद्धि त्वामेव हवामहे स्तुतिभिराह्वयामः । हे इन्द्र, सत्पतिं सता पालयितारं श्रेष्ठं त्वा नर बहुवचनम् अन्येऽपि मनुष्या, वृत्रेषु आवरकेषु शत्रुषु सत्सु तज्जयाथं हवन्ते आह्वयन्ति । अपि च, अर्वतः अश्वस्य सम्बन्धिनीषु काष्ठासु यत्राश्व क्रान्त्वा तिष्ठति तासु काष्ठासु संग्रामेषु युद्धकामाश्च त्वामे- वाह्वयन्ति, अनो वय त्वामेवाह्वयाम इत्यर्थ. । ' ब्रह्म वै रथन्तरम्' ( ऐ ० ब्रा० ८ ११ ३) इत्यत्र यदुक्तम् - 'ब्रह्मशब्देन सर्वविद्यायुक्तो ब्राह्मणवर्णो गृह्यते, तस्मिन् खलु क्षत्रधर्मः प्रतिष्ठितो भवति नैव कदाचित् सत्यविद्यया विना क्षत्रधर्मस्य वृद्धिरक्षणे भवतः । तथा ' क्ष ब्रह्म, राजन्ये ब्रह्मार्थात् क्षत्रविद्या प्रतिष्ठिता भवति ॥ नैवास्माद्विना कदाचिद् विद्याया वृद्धिरक्षणे भवतः । तस्माद्विद्याराज- व्यवहारौ मिलित्वेव राष्ट्रसुखोन्नति कर्तुं शक्नुत ' ( पृ० २६१ ) इति, तदपि न किञ्चिद, सम्पूर्णमहावाक्यविरुद्धत्वात् ॥ समुद्धृतेऽशेऽपि रथन्तरमित्यनेन ब्रह्मशब्दस्य के सम्बन्ध? को वा रथन्तरशब्दार्थ? किञ्च ब्रह्मशब्दस्य सर्वविद्यायुक्तो ब्राह्मणवर्णश्चेदर्थस्तदा तु तस्मिन् वर्णे कथ क्षत्रधर्म प्रतिष्ठित स्यात्, क्षत्रधर्मोऽपि तत्र चेत्प्रतिष्ठितस्तदा तस्यैव राजन्यत्व- मपि सम्पन्नमिति कुतो न त्वद्रीत्या वर्णसाङ्कय्यं स्यात्? कि सप्तम्यन्तयो. ब्रह्मक्षत्रशब्दयो. प्रथमान्तयोश्च तयोः समान एवार्थो विषयो वा? नान्त्य, बीजाभावात् । नाद्य तथात्वे ब्राह्मणवर्णे क्षत्रवर्णस्य प्रतिष्ठा क्षत्रवर्णे ब्राह्मणवर्णस्य प्रतिष्ठा चोक्ता स्यात् । तच्च न सम्भवति, प्रत्यक्षविरुद्धत्वादसम्भवाच्च । नह्येकस्मिन् व्यक्तिविशेषे व्यक्तिविशेषान्तरस्य प्रतिष्ठानं सम्भवति, ब्राह्मण्यमूलत्वात् । सत्यविद्यैव ब्रह्मपदार्थश्चेत् तदापि तस्य राजन्यं सत्त्वेन तस्य ब्राह्मण्यमेव कि न स्यात्? ब्रह्म वै रथन्तरमित्यप्यपूर्णमेव, सम्पूर्णं चेत्थ वचनम्-' अभि त्वा शूर नो तुम इति रथन्तरमनुरूप उपस्थित होने पर स्तुति के द्वारा तुम्हारा ही आह्वान करते है । हे सज्जनो की रक्षा करने वालो मे श्रेष्ठ इन्द्र, हमारे सिवाय अन्य मनुष्य भी उस समय आपको ही याद करते है, जब कि उनके सामने शत्रुओ पर विजय प्राप्त करने का प्रश्न उठ खडा होता है । युद्ध की एक ऐसी भी स्थिति होती हैं, जब कि घोडो की उपस्थिति कुछ नही कर पाती । इस अवस्था मे भी योद्धा लोग आपको ही याद करते हैं । 'ब्रह्मवै रथन्तरम्० ' 'इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने लिखा है-'ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर और वेदविद्या से युक्त जो पूर्ण विद्वान् है, वह ब्राह्मण वर्ण कहलाता है । इसमें क्षत्रिय धर्म प्रतिष्ठित रहता है । अर्थात् वही राज्य के प्रबन्धो में सुख की प्राप्ति का कारण होता है । इसी तरह क्षत्र मे ब्रह्म, अर्थात् राजन्य मे विद्या प्रतिष्ठित रहती है, क्षत्रिय के संरक्षण पाये बिना विद्या की वृद्धि और रक्षा नही हो सकती । इसलिये अच्छे राज्य के होने से ही सत्यविद्या प्रकाश को प्राप्त होती है । इस तरह से विद्या और राजव्यवहार दोनो मिल कर ही राष्ट्र के सुख और उन्नति में सहायक हो सकते हैं ' ( पृ ० २६२ ), किन्तु यह भी गलत है, क्योकि यह अर्थ पूरी वाक्यावली के विपरीत पडता है । जितना अश उद्धृत किया है, उसमें भी रथन्तर शब्द का ब्रह्म से क्या सम्बन्ध है? अथवा रथन्तर शब्द का अर्थ क्या है? ब्रह्म शब्द का अर्थ यदि सभी विद्याओ से युक्त ब्राह्मण वर्ण किया जाता है, तो उसमें क्षत्रिय धर्म की प्रतिष्ठा कैसे होगी? यदि यह माना जाय कि उसमें क्षत्रिय का धर्म भी रहता है, तो ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय भी हुआ, इस तरह से आपके मत में तो यह वर्णों की संकरता हो गई? सप्तम्यन्त ब्रह्म और क्षत्र शब्द का और प्रथमान्त ब्रह्म और क्षत्र शब्द का एक ही अर्थ है या भिन्न? भिन्न अर्थ होने में कोई प्रमाण नही है और पहला पक्ष इसलिये नही बनेगा कि ऐसा मानने पर ब्राह्मण वर्ण में क्षत्रिय वर्ण की और क्षत्रिय वर्ण मे ब्राह्मण की प्रतिष्ठा माननी पडेगी । किन्तु ऐसा होता नही । यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण के तो विपरीत है ही, ऐसा होना सम्भव भी नही है । किसी एक व्यक्ति मे दूसरे व्यक्ति की स्थिति रह नही सकती । ब्राह्मण्यमूलक सत्यविद्या ही यदि ब्रह्म पद का अर्थ है, तो इसकी राजन्य में स्थिति होने पर वह भी ब्राह्मण क्यो न कहलावेगा? अर्थात् ऐसा मानने पर तो क्षत्रिय भी ब्राह्मण ही माना जायगा । ' ब्रह्म व रथन्तरं० ' यह भी अधूरा ही वाक्य है । ऐतरेय ब्राह्मण का यह सम्पूर्ण वचन मूल मे दे दिया गया है । 1

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वेदार्थपारिजात १४६२ कुर्वन्त्यय वे लोको रथन्तरमसौ लोको बृहदस्य वै लोकस्यासौ लोकोऽनुरूपोऽमुष्य लोकस्याय लोकोऽनुरूपस्तद्यद्रथन्तर- मनुरूपं कुर्वन्यभावेव तल्लोको यजमानाय सम्भोगिनो कुर्तन्त्यथो ब्रह्म रथन्तरं क्षत्रं बृहद् ब्रह्मणि खलु क्षत्रं प्रतिष्ठितं क्षत्रे ब्रह्माथो साम्न एव सयोनिताये' इति ( ऐ० ब्रा० ८| १ | ३ ) | अथ त्वा शूरेत्येष तृचो निष्कैवल्यशस्त्रस्यानुरूपः कार्यः । यद्यपि ' त्वामिद्धयभि त्वा' इत्येतो प्रगाथावृग्वयात्मकौ, तथापि प्रग्रथनेन तृचत्व सम्पाद्य प्रतिपदनुचरत्वं द्रष्टव्यम् 1। अभि त्वे- त्ययं तृचो रथन्तरसाम्न आधारत्वाद् रथन्तरमित्युचरते । बृहद्रथन्तरशब्दाभ्या विवक्षितं त्वमिद्धयभि त्वेति तृचद्वय मिलित्वा प्रशस्यते । भूलोको रथन्तरस्वरूप, स्वर्गलोको बृहत्स्वरूपः, तावेतौ लोको परस्परानुरूपौ । अस्मिल्लोके दत्तेन हविषा देवा: स्वर्गे जीवन्ति, स्वर्गादागतया वृष्ट्या मनुष्या जीवन्ति । एतदेव परस्परानुरूपत्वम् । तथा च बृहद्रथन्तर- रूपाभ्यां प्रतिपदनुचराभ्यामुभावेव लोको यजमानार्थं समीचीनभोगयुक्तौ कुर्वन्ति । अथोऽपि प्रजापतिमुखजत्वसाम्येन रथन्तरस्य ब्राह्मणरूपत्वात् तदीयबाहुजत्वसाम्येन बृहत क्षत्रियरूपत्वाच्च बृहद्रथन्तराभिधानयोस्तृचयोरनुष्ठानेन ब्रह्म- क्षत्रयो परस्पर प्रतिष्ठा भवति । अथोऽपि तृचद्वयानुष्ठानं निष्केवल्यशस्त्रस्य तृचद्वयाश्रितसाम्नश्च सयोनित्वाय समान- स्थानत्वाय सम्पद्यते । वेदपारम्पर्यज्ञो बृहद्रथन्तरशब्दाभ्या तन्नामको सामविशेषो जानाति । प्रजापतिमुखजत्वाविशेषाद् ब्राह्मणस्य रथन्तरसाम्नश्वक्यविवक्षयैव ब्रह्म वैरथन्तरमिति सामानाधिकरण्यम् ॥ बृहत्साम्नः क्षत्रस्य च प्रजापतिप्रजापतिबाहुजत्वात्बाहुजत्वात् क्षत्रं बृहदिति सामानाधिकरण्यम् । ब्राह्मणो ब्रह्मबलेन क्षत्रमुपबृंहयति । ब्राह्मबलोपबृहतं क्षत्र क्षत्रबलेन तप स्वाध्यायविरोधि- निषूदनेन दानसम्मानाभ्या च ब्राह्मण रक्षतीति ब्रह्मक्षत्रयोः परस्पर प्रतिष्ठितत्वमपि प्रसिद्धमेव । जन्मना वर्णः, तदनुगुण- कर्मणोत्कर्षं इत्येव शास्त्रीय' पक्ष । कर्मणा वर्ण इति पक्षस्तु चातुर्वर्ण्यसस्कृतिविमर्शग्रन्थे बहुधा खण्डित एव । 'अभि त्वा शूर नोनुम ' इत्ययमंशस्तु दुर्गंम इति मत्वेव दयानन्देनोपेक्षित । वस्तुतस्तमशमन्तरा ब्राह्मणवचनमेवाकिञ्चित्करं स्यात् । सम्पूर्णश्चाय मन्त्रस्तु -' अभि त्वा शूर नोनुमोदुग्धा इव धेनव | ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषे ॥ ' ( ऋ ० सं ० ७।३२।२२ ) । एतदर्थस्तु -हे शूर, अस्य जगतः जङ्गमस्य ईशानमीश्वरम्, तस्थुषः स्थावरस्य च 'अथ त्वा शूर' यह तृच का विनियोग भी निष्केवल्य शस्त्र की भाँति ही करना चाहिये । 'अभि त्वा' यह तृच रथन्तर साम का आधार होने से रथन्तर कहलाता है । बृहत्साम और रथन्तर साम के नाम से विवक्षित ' त्वमिद्धि ' और ' अभि त्वा' इन दोनो तृचो की प्रशसा की जाती है । भूलोक रथन्तर साम का और स्वर्गलोक बृहत्साम का स्वरूप है । इस तरह से ये दोनो परस्पर अनुस्यूत है । इस लोक में दी गंई हवि से स्वर्गलोक में देवता तृप्त होते हैं और स्वर्ग से आने वाली वृष्टि से मनुष्य जीवन तृप्त होता है । यही इनकी परस्पर अनुस्यूतता है । इस तरह से बृहत्साम और रथन्तर साम से, जो कि प्रतिपद और अनुचर रूप है, यजमान के लिये दोनो लोक समीचीन लोगों के साधक बनाये जाते है । इसी तरह से प्रजापति के मुख से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण और रथन्तर साम की समानता है और इसी तरह से प्रजापति के बाहु से उत्पन्न होने के कारण बृहत्साम और क्षत्रिय की समानता है । इम तरह से बृहत् और रथन्तर नाम के तृचो के अनुष्ठान से ब्रह्म और क्षेत्र को परस्पर प्रतिष्ठा होती है । साथ ही इन दोनो तृचो का अनुष्ठान निष्केवल्य शस्त्र और दोनो तुत्रों के आश्रित साम की समानस्थानता के लिये किया जाता है । वेद की परम्परा को जानने वाला बृहत् और रथन्तर शब्दो से इस नाम के सामों से परिचित है । प्रजापति के सुख मे उत्पन्न होने से ब्राह्मण और रथन्तर साम की एकता प्रदर्शित करने के लिये हो यहाँ ब्रह्म और रथन्तर का सामानाधिकरण्य बताया गया है । इसी तरह से बृहत्साम और क्षत्रिय प्रजापति की बाहु से उत्पन्न है, इसलिये इन दोनो का भी सामानाधिकरण्य उचित ही है । ब्राह्मण ब्रह्मबल से क्षत्र को बढाता है और ब्राह्मबल से उपबृंहित क्षत्रबल तप और स्वाध्याय के विरोधियो को नष्ट करके ब्राह्मण की दान और सम्मान के द्वारा रक्षा करता है । इस तरह से इनकी परस्पर प्रतिष्ठा उचित हो है । वर्ण जन्म से ही माने जाते हैं, वर्ण के अनुगुण कर्मों का आचरण करने से इनमे उत्कर्ष होता है, यही शास्त्रीय पक्ष है । कर्म से वर्णव्यवस्था वाले पक्ष का खण्डन 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृतिविमर्श' नामक ग्रन्थ मे हमने अनेक प्रकार से किया है । ' अभि त्वा' इत्यादि अंश को दुर्बोध जानकर दयानन्द ने उसकी उपेक्षा कर दी हैं । इस अंश के बिना यह पूरा ब्राह्मणवचन अर्थ को समझने की दृष्टि से अधूरा ही रह जाता है । इस सम्पूर्ण मन्त्र को ऊपर मूल में उद्धृत किया गया है, जिसका कि अर्थ यह होगा --हे शूर, इस जंगम जगत्

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वेदार्थपारिजातः १४६३ ईशानम्, ईशानपदस्यावृत्तिगदरार्था । स्वर्दृशं सर्वदृश त्वा त्वाम् अदुग्धा इव धेनवः, यथा अदुग्धा धेनव. क्षीरपूर्णोधस्त्वेन वर्तन्ते, तद्वत्सोमपूर्णचमसत्वेन वर्तमाना वयम् अभिनोनुमः भृशमभिष्टुम । 'ओजो वा इन्द्रियं वीर्यमित्यत्र यदुक्तम्- ' राजपुरुषैर्बलपराक्रमवन्तीन्द्रियाणि सदैव रक्षणीयानि, अर्था- ज्जितेन्द्रियतयैव सदैव वर्तितव्यम्, कुत.? ओज एव क्षत्र वीर्यमेव राजन्य इत्युक्तत्वात् । तस्मादोजसा क्षत्रेण वीर्येण राजन्येनैनं राजधर्मं मनुष्यः समर्धयति सर्वसुखैरेधमान करोति । इदमेव भारद्वाज भरणीय बृहदर्थान्महत्कर्मास्ति ' ( पृ० २६९ ) इनि, तदपि धाष्टयमेव, प्रकरणविरुद्धत्वाद् अक्षरबाह्यत्वाच्च । राजपुरुषेरिति कुत समानीतम्? मूले तादृश- पदाभावात् । ' इन्द्रियाणि रक्षणीयानि' इत्यपि निर्मूलम् । किञ्चेन्द्रियजये ओज एव क्षत्रं वीर्यमेव राजन्य इति केन किं श्लिष्यते? राजधर्मस्तु राज्ञा वर्धनीयः, मनुष्ये. स वर्धनीय इति कुत केन सम्बन्धेन लभ्यते? ओजो वा इन्द्रिय वीर्यमित्यपि न पर्यवसायि वचनम्, तदिद सम्पूर्णं वचनम्- तत्पञ्चदशचं भवत्योजो वा इन्द्रिय वीर्यं पञ्चदश ओज• क्षत्र वीयं राजन्यस्तदेनमोजसा क्षत्रेण वीर्येण समर्धयति 1। निविद्धानीयसूक्तगतामृक्सख्या दर्शयति पञ्चदशस्तोमप्रशसावाक्य इन्द्रियमपि ज्ञानेन्द्रियपञ्चक कर्मेन्द्रियपञ्चक वृत्तिचतुष्टय वृत्तिवृत्तिमद्भेदेनान्त: - करणपञ्चकमिति पञ्चदशसख्याकम् ओजोमूलत्वादिन्द्रियसामर्थ्यस्य तदिन्द्रियमोजोरूपम् । पञ्चदशर्चस्तोमोऽपि तद्रूप एव । ओजश्च क्षत्रम् । तेन पञ्चदशर्चेन स्तोमेनोजसा क्षत्रेण वीर्येणैनं यजमानं समर्धयति । ऋषिद्वारासूक्त प्रशसति — तद्भार- द्वाज भवति । भारद्वाजं वै बृहदार्षेयेण सलोमाभरद्वाजेन दृष्टत्वादिद सूक्तं भारद्वाज भवति, बृहत्सामापि तथा भारद्वाजम् । तादृशबृहद्योगाद् अय क्रतुः सलोमा | आर्षेयभरद्वाजमुनिसम्बन्ध | लोमशब्देन केशयुक्तो मूर्खोपलक्ष्यते । सलोमा सशिरस्क: और स्थावर जगत् के स्वामी आप ही है । यहाँ ईशान पद की आवृत्ति इनमे आदरभाव के प्रदर्शन के लिये है । आप सबको समान दृष्टि से देखते है | बिना दुही हुई गाये जैसे थनो मे दूध भरे रहती है, उसी तरह से हम भी चमस पात्रो मे सोम रस को भरकर आपकी स्तुति के लिये उपस्थित है । 'ओजो वा इन्द्रियम्' इत्यादि ब्राह्मणवाक्य की व्याख्या मे दयानन्द ने कहा है-'राजपुरुषो को बल और पराक्रम युक्त इन्द्रियों को सदा रक्षा करनी चाहिये, अर्थात् उनको सदा जितेन्द्रिय होना चाहिये । उत्तम विद्या और न्याययुक्त राज्य का नाम ओज है । जिसको दण्ड के भय से कोई उल्लघन अथवा अन्यथा कोई नही कर सकता । क्योकि मोज अर्थात् बल का नाम क्षत्र और पराक्रम का नाम राजन्य है । ये दोनो जब परस्पर मिलते है, तभी संसार की उन्नति होती है ” ( पृ ० २६२ ), किन्तु यह सारी व्याख्या घृष्टता से भरी है, प्रकरण के विरुद्ध है और मन्त्राक्षरो से भी विपरीत है । ' राजपुरुष' शब्द आप कहाँ से लाये, मूल में तो यह है नही । इन्द्रियो की रक्षा करने की बात भी मूल मे नही है । साथ ही इन्द्रियों का विजय कर लेने पर ओज ही क्षेत्र है और वीर्य ही राजन्य है, इस वाक्य में किसका किसके साथ सम्बन्ध रहेगा? राजधर्म की वृद्धि राजा तो कर सकता है, किन्तु मनुष्य उसको बढावे, यह बात कहाँ से ' किस तरह से निकलेगी? ' ओजो वा इन्द्रियम्' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य भी दयानन्द ने पूरा उद्धृत नही किया है । सम्पूर्ण वचन ऊपर मूल मे उद्धृत कर दिया गया है । इससे पचदश स्तोम की प्रशंसा व्यक्त होती है । पाँच ज्ञानेन्द्रियां, पाँच कर्मेन्द्रियों, चार अन्तकरण की वृत्तियाँ और एक वृत्तिमान् अन्तःकरण इस तरह से वृत्ति और वृत्तिमान् के भेद से पांच अन्तःकरण ये सब मिलकर पन्द्रह इन्द्रियाँ हुई । इसी तरह से इस सूक्त में भी पन्द्रह ऋचाएँ है । सभी इन्द्रियो को शक्ति ओज धातु से ही प्राप्त होती है, तब ये सब इन्द्रियाँ मज रूप मानी जाती है । यह पंचदश ऋचाओ वाला स्तोम भी भोज रूप है । ओज ही क्षत्र है । अत इस पन्द्रह ऋचाओ वाले सूक्त रूप ओज से और क्षात्र वीर्य से इस यजमान को समृद्ध करता है । ऋषि के द्वारा भी इस सूक्त की प्रशंसा की जाती है कि यह सूक्त भारद्वाज ऋषि के द्वारा परिदृष्ट है । बृहदार्षेय सलोम भारद्वाज के 1 द्वारा दृष्ट होने से यह सूक्त भारद्वाज कहलाता है । यहाँ लोम शब्द से केशों भरे मस्तक

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वेदार्थपारिजातः १४६४ सम्पूर्ण इत्यर्थः । भरद्वाज मुनिदृष्टस्य बृहतः सम्पूर्णत्वाद् बृहद्वारा भरद्वाजमुनिसम्बन्धे सति क्रतोरपि सम्पूर्णत्व द्रष्टव्यम् । एवम् ' अथो ब्रह्म वै रथन्तरम् क्षत्र' बृहदित्याद्यनेकानि वचनानि तत्रारण्यके कर्मसमृद्धयर्थान्युक्तानि । 'तानहमनुराज्याय ' इत्यत्रापि यदुक्तम्-' सर्वे मनुष्या एवमिच्छा कृत्वा पुरुषार्थं कुर्युः --परमेश्वरानुग्रहेणाहमनु- राज्याय सभाध्यक्षत्वप्राप्तये तथा माण्डलिकाना राज्ञामुपरि राजसत्ताप्राप्तये साम्राज्याय सार्वभौम राज्यकरणाय भौज्याय धर्मन्यायेन राज्यपालनायोत्तमभोगाय च स्वाराज्याय स्वस्मै राज्यप्राप्तये वैराज्याय विविधाना राज्ञा मध्ये महत्त्वेन प्रकाशाय पारमेष्ठ्याय परमराज्यस्थितये माहाराज्याय महाराज्यसुखभोगाय तथा आधिपत्याय अधिपतित्वकरणाय स्वावश्याय स्वार्थं प्रजावशत्वकरणाय च अतिष्ठायाम् अत्युत्तमा विद्वासस्तिष्ठन्ति यस्या सा अतिष्ठा सभा तस्याम्, सर्वैर्गुणै. सुखैश्च रोहामि वर्ध मानो भवामि' ( पृ० २६२ ) इति, तदपि तुच्छम्, अक्षरार्थबाह्यत्वात् । एवमिच्छा कृत्वा पुरुषार्थं कुर्युरिति विधिबोधकपदा-भावात् । अनुराज्यपदेन सभाध्यक्षत्वप्राप्तिरिति कुतो लब्धम्? नहि प्रमाणमन्तरा किमपि कल्पयितुं शक्यते? भौज्यपदेन धर्मन्यायेन राज्यपालनमर्थं इत्यत्र कि बीजम्? एवमेव माहाराज्यपारमेष्ठ्यादि पदार्थवर्णनमपि निमूलमेव । ' तानहमनुराज्याय' इत्यपि न पर्यवस्यति वाक्यम्, अग्निष्ट्वा गायत्र्या सयुक्छन्दसा रोहतु सवितोष्णिहा सोमोऽनुष्टुभा बृहस्पतिबृहत्या मित्रावरुणौ पङ्क्त्येन्द्रस्त्रिष्टुभा विश्वेदेवा जगत्या तानहमनुराज्याय सामाज्याय भौज्याय स्वा- राज्याय वैराज्याय पारमेष्ठ्याय राज्याय माहाराज्यायाधिपत्याय स्वावश्याऽतिष्ठाया रोहामि । तदर्थस्तु-व्याघ्रचर्मणाऽऽस्तु-ताया आसन्द्याः प्रतिष्ठितायाः पश्चाद्भागे यजमान प्राड्मुख उपविश्य दक्षिणं यज्जान्वस्ति तद्भूमिस्पृष्टं यथा भवति तथा न्यग्भूतं कृत्वा सव्यं जानूर्ध्वमुखमेवावस्थाप्योभाभ्या पाणिभ्यामासन्दीमालभ्योक्तमन्त्र णाभिमन्त्रयेत । मन्त्रार्थस्तु--हे आसन्दि, त्वा त्वा गायत्र्या छन्दसा सयुक् सहितोऽग्निरारोहतु । उष्णिहा छन्दसा सहितः सवितारोहतु । एवं सोम बृहस्पतिवरुणेन्द्र- का बोध होता है, अतः सलोमा का अर्थ हुआ शिर के साथ, अर्थात् सम्पूर्ण । भारद्वाज मुनि के द्वारा दृष्ट होने से यह बृहत्साम सम्पूर्ण है | इसी तरह के अन्य अनेक वचन कर्म की समृद्धि के लिये जहाँ तहाँ आरण्यको मे एवं ब्राह्मण ग्रन्थो मे उल्लिखित हैं । 'तानहमनुराज्याय ० ' इस पर दयानन्द ने कहा है कि------- सभी मनुष्य इस तरह की इच्छा रख कर पुरुषार्थ करें कि परमेश्वर की कृपा से मै अनुराज्य अर्थात् सभाध्यक्ष का पद पाने के लिये तथा माण्डलिक राजाओ के ऊपर शासन करने के लिये, सार्व-भौम राज्य की प्राप्ति के लिये, धर्म और न्याय से राज्य का पालन करने तथा उत्तम भोगो की प्राप्ति के लिये, स्वाराज्य को प्राप्ति के लिये, विविध राजाओ के बीच में अपना महत्त्व प्रकाशित करने के लिये, परम राज्य की स्थिति के लिये, महाराज्य के सुख का उपभोग करने के लिये तथा सब पर अपना आधिपत्य जमाने और अपने वश मे करने के लिये इस अत्युत्तम विद्वानो से भरी सभा मे सभी प्रकार के गुणो और सुखों से भरपूर होकर दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहूँ' ( पृ ० २६२ ), किन्तु यह सारा प्रयास व्यर्थ है, मूल अक्षरों से इनका कोई सम्बन्ध नही है । इस तरह की इच्छा रखकर पुरुषार्थ करे, इस विधि का बोधक प्रत्यय भी यहाँ नही है । अनुराज्य शब्द का अर्थ सभाध्यक्ष पद की प्राप्ति कहाँ से निकलेगा । बिना प्रमाण के मनमाने तरीके से कोई कल्पना नही की जा सकती । भौज्य शब्द का अर्थ भी धर्म और न्याय से राज्य का पालन करना, यह किस आधार पर होगा । इसी तरह से माहाराज्य, पारमेष्ठ्य आदि शब्दों का अर्थ भी निराधार है । ' तानहमनुराज्याय ० ' यह वाक्य भी पूरा नही हैं । पूरा वाक्य ऊपर मूल में उद्धृत है | इसका वास्तविक अर्थ इस तरह से किया जायगा -याघ्रचर्म से आच्छादित आसन्दी के पिछले भाग में यजमान पूर्व की ओर मुँह करके बैठे । दाहिने घुटने को मोड़ कर इतना तिरछा करे कि वह भूमि को छूने लगे और बाँधा घुटना ऊपर ही रहे । इस स्थिति में दोनों हाथो से आसन्दी को छूकर उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित करे -हे आसन्दि, तुम्हारे ऊपर गायत्री छन्द के साथ अग्नि बैठे । उष्णिक् छन्द के साथ सविता बैठे । इसी तरह से सोम, बृहस्पति, वरुण, इन्द्र, विश्वेदेव अनुष्टुप् आदि छन्दो के साथ तुम्हारे ऊपर बैठे । उनके बैठ जाने के बाद मैं भी इस पर बैठूं । किसलिये? राज्य आदि की सिद्धि के लिये । राज्य देश पर अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिये, साम्राज्य धर्मपूर्वक प्रजा का पालन

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वेदार्थपारिजात १४६५ विश्वेदेवा अनुष्टुबादिछन्दोभिः सहिताम्स्वामारोहन्तु । तानग्न्यादीन् देवाननु पश्चादहमारोहामि । किमर्थं राज्यादिसिद्ध्यर्थम् । राज्यं देशाधिपत्यर्थं साम्राज्य धर्मेण पालनाथं भोज्य भोगसमृद्धि स्वाराज्यमपराधानत्वम् । स्वेनैव राजते दीप्यत इति स्वराट् स्वराजो भाव स्वाराज्यम्, तस्मै स्वाराज्याय, वैराज्यमितरेभ्यो भूपतिभ्यो वैशेष्यम् । एतदुक्तमैहिकम् । अथामुष्मिकम् । पारमेष्ठ्य प्रजापतिलोकप्राप्ति । तत्र राज्यमैश्वर्यं मानुराज्य तत्रत्येभ्य इतरेभ्य आधिक्यम् आधिपत्यम् प्रति स्वामित्वं स्वावश्यभपारतन्त्र्यम् अतिष्ठ्य चिरकालवास्त्विम् इत्यनेन मन्त्रेणाभिमन्त्रणादूर्ध्वमारोह विधत्ते ( ऐ० ब्रा० ८२५ ) यदपि -'नमो ब्रह्मण' ( ऐ० ब्रा० ८ २२६ ) इत्यत्रोक्तम्- परमेश्वराय त्रिवार चतुर्वार वा नमस्कृत्य राजकर्मारम्भ कुर्यात् । यत्क्षत्र ब्रह्मण. परमेश्वरस्य वशमेति तद्राष्ट्र समृद्ध सम्यग् ऋद्धियुक्त वीरवद् भवति । तस्मिन्नेव राष्ट्रे वीरपुरुषी- जायते नान्यत्रेत्याह परमेश्वर:, ( पृ० २६२ ) इति, तदपि तुच्छम् परमेश्वर आहेत्यस्य बोधकपदाभावात् । वस्तुतस्तु सम्पूर्णवाक्यमित्थम् --नमस्कारमन्त्र प्रशसति -' स यन्नमो ब्रह्मणे नमो ब्रह्मणे नमो ब्रह्मण इति त्रिष्कृत्वो ब्रह्मणे नमस्करोति ब्रह्मण एव तत्क्षत्र वशमेति, तद्यत्र वै ब्रह्मण क्षत्रं वशमेति तद्राष्ट्र समृद्धं द्वीरवदाहास्मिन् वीरो जायते' ( ऐ० ब्रा० ८२२६ अर्थात् ३७| ५ ) । स क्षत्रियो मन्त्रेण नमस्करोताति यदस्ति तेन ब्रह्मणो ब्राह्मणस्यैव क्षत्रियजातिर्वशमेति । तेन ब्राह्मणाधीन- त्वेन तद्राष्ट्रं सर्ववस्तुसमृद्ध वीरपुरुषोपेत च भवति । अस्मिन् क्षत्रिये वीर पुरुष आजायते । अत्र ब्रह्मपदेन ब्राह्मणत्वजाति- विशिष्टः पुरुषोऽभिधीयते, ब्रह्मक्षत्रपदाभ्या पूर्वं त्वयापि ब्राह्मणक्षत्रिययोर्गृहीतत्वात् । परमात्मरूपाय ब्रह्मणे स्वसंख्याता एव नमस्कारा. कर्तव्या । तदधीनं तु सर्वमेव जगद्वर्तते । क्षत्रमेव तद्वशमेतीति वचनमनर्थकमेव स्यात् । विद्यातपोविशिष्टाय ब्राह्मतेजोमयाय ब्राह्मणायात्र त्रिष्कृत्वो नमस्कार उक्तः । तथा सति ब्रह्म वशीभूतं ब्राह्मतेजसा सुरक्षितं सत् समृद्धयते वीरवच्च भवति । करने के लिये भोज्य भोग की समृद्धि के लिये, स्वाराज्य दूसरे के पराधीन न होने के लिये होता है । स्वयं अपने आप जो प्रकाशित होता है, उसको स्वराट् कहते हैं, स्वराट् का भाव स्वाराज्य कहलाता है, इस स्वाराज्य के लिये । वैराज्य अन्य राजाओ से अपना वैशिष्ट्य कहलाता है । यह ऐहिक वैशिष्ट्य है । आमुष्मिक ( पारलौकिक ) वैशिष्ट्य पारमेष्ट्य अर्थात् प्रजापति के लोक की प्राप्ति है । ऐतरेय ब्राह्मण मे बताया गया है कि यहाँ राज्य ऐश्वर्य, महाराज्य अन्य राज्यो की अपेक्षा अधिक्य, आधिपत्य प्रत्येक का स्वामित्व, अपने हो वश में रहना दूसरे के अधीन न होना, चिरकालपर्यन्त इन पर स्थिर रहना, इत्यादि प्रार्थनाएँ करता हुआ इस मन्त्र का उच्चारण कर आसन्दी पर बैठता है । ' नमो ब्रह्मणे' इत्यादि की व्याख्या करते हुए लिखा गया है- परमेश्वर को तीन बार या चार बार नमस्कार करके राज-काज को प्रारम्भ करे । जो क्षत्र ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर के वश मे रहता है तो वह राष्ट्र भली भाँति ऐश्वर्य से भरा और बलवान् व्यक्तियों से समृद्ध रहता है । उसी राष्ट्र मे वीर पुरुष पैदा होते है, अन्यत्र नही, ऐसा परमात्मा का कहना है । इसीलिये उस परमात्मा को मेरा बारबार नमस्कार है कि जिसके अनुग्रह से हम लोग इन राज्यो के अधिकारी होते है ' ( पृ ० २६३ ), यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि परमात्मा कहता है, इस अर्थ का बोधक कोई पद वहाँ नहीं है । वस्तुत इस नमस्कार मन्त्र का पूरा स्वरूप ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार यहाँ दिया जाता है । इसका सही अर्थ इस प्रकार है- वह क्षत्रिय इस मन्त्र का उच्चारण कर जो नमस्कार करता है, इससे क्षत्रिय जाति ब्राह्मण के नियन्त्रण में रहती है । ब्राह्मण के अधीन रहने से वह राष्ट्र और उसकी सभी वस्तुएँ समृद्धि को प्राप्त करती हैं और वीरपुरुषो से यह राष्ट्र भरा रहता है । इस क्षत्रिय कुल मे वीर पुरुष पैदा होता है । यहाँ ब्रह्म पद से ब्राह्मण जाति का पुरुष अभिप्रेत है । ब्रह्म और क्षत्र शब्दो से पहले आपने भी ब्राह्मण और क्षत्रिय का ग्रहण किया है । परमात्मस्वरूप ब्रह्म को तो असंख्य बार नमस्कार किया जाता है । सारा जगत् उसी के अधीन है । केवल क्षत्रिय ही उसके वश में हैं, ऐसा कहना व्यर्थ है । विद्या और तप से विशिष्ट ब्राह्म तेज से परिपूर्ण ब्राह्मण को तीन बार नमस्कार करने का विधान है । ऐसा करने से ब्रह्म वशीभूत हो जाता है, इस वशीभूत ब्रह्म तेज से सुरक्षित होकर राष्ट्र समृद्ध और बलशाली बनता है । II

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वेदार्थपारिजातः { II I सप्रजापतिका' इत्यत्र यदुक्तम्– ' सर्वे सभासद प्रजास्यमनुष्या. स्वामिनेष्टेन पूज्यतमेन परमेश्वरेणैव सह वर्तमाना भवेयु । सर्वे मिलित्वैव विचार कुर्युर्यतो न कदाचिद् सुखहानिपराजयौ म्याताम् । यो देवानां विदुषा मध्ये ओजिष्ठः पराक्रमवत्तम, बलिष्ठः सर्वात्कृष्टबलसहितः, सहिष्ठः अतिशयेन सहनशीलः, सत्तम. सर्वेर्गुणैरत्यन्तश्रेष्ठ. पारयिष्णु-तम सर्वेभ्यो युद्धदु खेभ्योऽतिशयेन सर्वास्तारयितृतमोऽस्माक मध्ये श्रेष्ठतमोऽस्तीति वय निश्चित्य तमेव पुरुषमभिषिञ्चाम इतीच्छेयुः । तथैव खल्वस्त्विति सर्वे प्रतिजानीयु । एवभूतस्योत्तमपुरुषस्याभिषेककरण सर्वेश्वर्यप्रापकत्वादिन्द्रमित्याहु: ' ( पृ ० २६३ ) इति, तदपि तुच्छम्, पौर्वापर्यविचारशून्यत्वात् दिवप्रजापत्यादिशब्दाना प्रसिद्धार्थपरित्यागेन विद्वत्परमेश्वरयो-ग्रहणे मानाभावात् । सर्वे मिलित्वंद विचार कुर्युरित्यादिकमपि निर्मूलम्, मूले तादृक्पदाभावात् । अन्येषामपि पदाना विशृङ्खल एवार्थ । अभिषेककरणमेवेन्द्र इत्यपि निर्मूलम्, मानुषाभिषेकातिरिक्तस्येन्द्राभिषेकस्य वर्णितत्वात् । वेदमय्या आसन्द्या मानुष्या आसन्द्या भिन्नत्वाच्च । पूर्वस्मिन्नध्याये उक्तमानुषक्षत्रियाभिषेकपर्यन्तं क्षत्रिययागमुदाहरणमुखेन प्रशसति -एतद्ध स्म वै विद्वान् आह जनमेजय पारीक्षित एवविद हि वै मामेवविदो याजयन्ति तस्मादह जयाम्यभीत्वरी सेना जयाम्यभित्वर्या सेनया न मा दिव्या न मानुष्य इषव ऋच्छन्त्येष्यामि सर्वमायु सर्वभूमिर्भविष्यामीति । न हवा एन दिव्या न मानुष्य इषव ऋच्छन्त्येति सर्वमायुः सर्वभूमिर्भवति यमेवंविदो याजयन्ति' ( ऐ० ब्रा० ८ । अर्थात् ३७।७ ) । 'सप्रजापतिका' ( ऐ० ब्रा० ) इतीदमपि वचनं कपट भिक्षुणा मध्यत एवोद्धृतम् । तञ्च गोपनाय भ्रमोत्पादनाय वा । तस्य वाक्यस्य पूर्णरूप तु —'ते देवा अब्रुवन् सप्रजा-पतिकाः । अयं वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठ सहिष्ठ सत्तम पारयिष्णुतम इममेवाभिषिञ्चामहा इति तथेति तद्वै तदिन्द्रमेव ' ( ऐ ० ब्रा० ८| ३| १२ अर्थात् ३८1१ ) इति । अथात ऐन्द्रोऽभिषेको मानुषक्षत्रियाभिषेकोक्तयनन्तर यतो देवोऽभिषेको बुभुत्सितो भवत्यत इन्द्रसम्बन्धी महाभिषेकः कथ्यते । आरोहणोत्क्रोशनाभिमन्त्रणादिभिरस्य महाभिषेकस्य महत्त्वम् । तत्राभिषेकार्थं 'सप्रजापतिका' इत्यादि वाक्य की व्याख्या यहाँ की गई है -'जो क्षत्र अर्थात् राज्य परमेश्वर के अधीन तथा विद्वानो के प्रबन्ध मे होता है, वह सब सुखदायक पदार्थ और वीर पुरुषो से अत्यन्त प्रकाशित होता है । वे विद्वान् एक अद्वितीय परमेश्वर के ही उपासक होते है । जो सब देवों विद्वानो के बीच में अनन्त विद्यायुक्त और अपार बलवान् है तथा अत्यन्त सहन स्वभाव और सबसे उत्तम है, वही हमको सब दुखो के पार उतार कर सब सुखो को प्राप्त कराने वाला है । उसी श्रेष्ठतम पुरुष को हम लोग अपने राज्य और सभा में अभिषेक करके अपना न्यायकारी राजा सदा के लिये मानते है तथा उसे हो सब ऐश्वर्यों के प्रापक होने से इन्द्र नाम से कहते है ' ( पृ० २६४ ), किन्तु यह व्याख्या भी निसार है । इसमे पूर्वापर का कोई विचार नही किया गया है । देव, प्रजापति आदि शब्द का प्रसिद्ध अर्थ छोडकर विद्वान् और परमेश्वर अर्थ करने मे कोई प्रमाण नही है । सब मिलकर विचार करे, इस तरह की उक्ति भी निराधार है, क्योकि मूल में इस तरह का कोई पद नहीं है । दूसरे पदों का अर्थ भी यहाँ उलटा ही किया गया है । इन्द्रत्व अभिषेक करने से ही होता हो, सो बात नही है, क्योकि मनुष्य के अभिषेक के अतिरिक्त शास्त्रों में इन्द्र का अभिषेक भी अलग से वर्णित है । वेदमयी आसन्दी और मनुष्य को आसन्दी दोनो अलग अलग है । दयानन्द ने जहाँ से यह वचन उद्धृत किया है, उससे पहले के अध्याय में ऐतरेय ब्राह्मण में बताया गया है कि विद्वान् पारीक्षित जनमेजय ने कहा है कि ब्राह्मणो के द्वारा अभिषिक्त होकर में इन यज्ञों का अनुष्ठान करता हूँ, इसीलिये मै सब युद्धो भं जीतता । मेरे ऊपर, मेरी सेना के ऊपर दिव्य अथवा मानुष कोई भी अस्त्र- शस्त्र नही चल पाते । मै पूरी आयु इसी तरह से अजेय बना रहूँगा । मेरे ही जैसे किसी अन्य राजा को भी यदि ब्राह्मण यज्ञ कराते है, जो यह भी इसी प्रकार मेरी तरह विजय प्राप्त करता है | दयानन्द ने इस प्रकरण से सम्बद्ध उक्त वचन को भी अपनी आदत के अनुसार बीच में से निकाल कर उद्धृत किया है । इसका पूरा स्वरूप ऊपर मूल मे दिया गया है । अब इन्द्र के अभिषेक की विधि बताते है । क्षत्रिय मनुष्य के अभिषेक के बाद देवता के अभिषेक को भी जानने की इच्छा होती है । इसलिये इन्द्र के अभिषेक की विधि बनाई जाती है । आरोहण, उत्क्रोशन और अभि-

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वेदार्थपारिजातः १४६७ देवविचारं दर्शयति- सप्रजापतिका इति, प्रजापतिना सह वर्तन्ते सप्रजापतिकास्तेऽग्न्यादयो देवा परस्परमब्रुवन् हस्तेनेन्द्रं प्रदर्शयन्त कथयन्ति - अयमिन्द्रो देवाना पध्ये ओजिष्टोऽतिशयेनाष्ट्रनधातुयुक्त, बलिष्ठोऽतिशयेन शरीरबलयुक्त, मष्ठिोऽतिशयेन शत्र्वभिभवनशील, सत्तमोऽतिशयेन स्वभक्तेषु नाधु, पारयिष्णुतम अतिशयेन प्रक्रान्तस्य कार्यस्य समाप्तिकृत् । तस्मादिम- मेव सर्वे वयमभिषिञ्चामहा इति कैश्चिदुक्ते सति सर्वेऽप्यन्ये तथेत्यङ्गाकृत्य तद्वै तदानीमेव तदिन्द्रमेत सर्वैरनुमतमिन्द्र- मेवाभ्यषिञ्चन्निति शेष | अत एव तादृशपुरुषस्याभिषेककरणमेव सर्वप्रापकत्वादिन्द्रमित्युक्तिः परास्ता वेदितव्या, ऐन्द्राभिषेकस्योपपत्ते । तत एव तस्मै वेदमयीमासन्दो समभरन् । ऋच नामेत्यासन्द्या विशेषणम् । ऋगुरूपामेतन्नामिकाम् । तस्या ऋभ्रूपाया आसन्द्या बृहदादीन्यष्टमामानि पूर्वपादा अष्टावयवानकुर्वन् | आसन्द्या शयानस्येन्द्रस्य शिरोदेश फलक शीर्षण्यम्, तच्च पाददेशाविष्कृतस्य फलकस्याप्युपलक्षणम् । अत एव शीर्षण्ये इति द्विवचनम् । अनूच्ये पार्श्वद्वयवर्तिनी फलके ऋश्रूपा ये मन्त्रा सन्ति तान् प्राचीनातानान् प्राक्प्रत्यगायतनत्वेन विस्तारितान् दार्घतन्तुविशेषानकुर्वन् । गीयमानानि सामानि तिरश्चीनवायास्तिर्यक्त्वे वयनहेतून् रज्जुविशेषानकुर्वन् । यजूष्यतीकागान् रज्ज्वन्तरालछिद्रविशेषान् अकुर्वन् । यद्यश: कीर्तिदेवतारूपं तदासन्द्या उपर्यास्तरणम् । या तु श्रोः सा पदाभिमानिनी देवता । तामुपबर्हण शिरस उपधान- मकुर्वन् । तस्या आसन्द्या पादादीनष्टावयवान् सवित्रादयोऽष्टौ देवा अधारयन् । इन्द्र एता वेदमयीमासन्दी वक्ष्यमाणे- मन्त्रैरारोहत इति तदाह-तस्था एतामसन्दी समभरन्तृचं नाम तस्यै बृहच्च रथन्तर च पूर्वौ पादावकुर्वन् वैरूप वैराज चापरी शाक्वररैवते शीर्षण्ये नौधस च कालेय चानूच्ये ऋचः प्राचीनातानान् सामानि तिरश्चीनवायान् यजूष्यतीकाशान् यश मन्त्रण की दृष्टि से महाभिषेक का महत्त्व है । पहले अभिषेक के लिये देवता का विचार किया है । 'सप्रजापतिका ' का अर्थ प्रजापति के साथ रहने वाले अग्नि प्रभृति देवगण है । ये देवगण हाथ मे इन्द की तरफ इशारा करते हुए कहते है कि यह इन्द्र देवताओ के बीच में सबसे अधिक ओजस्वी है, अर्थात् इसकी ओज नामक आठवी धातु सबसे बढ कर है । यह शारीरिक बल की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ है । यह शत्रुओ को अभिभूत कर देने में भी सर्वश्रेष्ठ है । यह अपने भक्तो का अतिशय कल्याण करने वाला है । साथ ही यह प्रारम्भ किये गये कार्य को भलीभात पूरा कराने मे भी सहायक होता है । इसलिये हम इसी का अभिषेक करे । कुछ देवताओ के ऐसा कहने पर बाकी सबने भी इसको मान लिया और उसी समय सबकी समति से इन्द्र का अभिषेक किया गया । इसलिये 'इस तरह के पुरुष का अभिषेक करने से ही सारे अभीष्ट सिद्ध होते हैं, अत यह सब कामनाओ का प्रापक होने से इन्द्र कहलाता है' इस तरह की व्याख्या गलत सिद्ध हो जाती है, क्योकि पुरुष के अभिषेक के अतिरिक्त इन्द्र का अभिषेक भी शास्त्रसिद्ध है । इसीलिये यहाँ इन्द के लिये वेदमयी आसन्दी का विधान है । 'ऋच नाम' यह आसन्दी का विशेषण है अर्थात् यह आसन्दी ऋग्रूप है, यही इसका नाम है । इस ऋक् नाम की आसन्दी के बृहत् आदि आठ साम पूर्व दिशा के पाये बनाये गये हैं । इस आसन्दी में विश्राम कर रहे इन्द्र के शिर की तरफ का फलक शीर्षण्य कहलाता है । इसमे पैरो की तरफ के फलक का बोध होता है । इसीलिये 'शीर्षण्य' पद में द्विवचन है । ' अनूच्ये ' शब्द से अगल-बगल के दो फलको का बोध होता है । इन्द्र की इस आसन्दी में ऋग् रूप मन्त्रो की पूर्व और पश्चिम की ओर ताने गये लम्बे -लम्बे तन्तुओं के रूप में परिकल्पना की गई है । गीयमान सामो को आड़े- तिरछे बीने जाने वाले तन्तुओ के रूप मे स्वीकार किया है । इस तरह से ऋग् मन्त्र और गीयमान सामी के ताने-बाने से यह इन्द्र की आसन्दी बुनी जाती है । इन तानों बानों के बीच छिद्रो के रूप में यजुर्मन्त्रो की परिकल्पना की गई है । यश अर्थात् देव-रूपधारी कीर्ति का आसन्दी के ऊपर बिछौने का रूप दिया गया है । श्री जिसकी अभिमानिनी देवता है, वह उपबर्हण शिर का तकिया बनाया गया है । उस1 आसन्दी के आठ पायों को सविता प्रभूति आठ देवता धारण करते है । इस प्रकार बनी इस आसन्दी पर इन्द्र आगे दिये गये मन्त्रों का उच्चारण करते हुए चढते है । ऐतरेय ब्राह्मण में इस विषय को इस तरह से स्पष्ट किया गया है -'इस ऋग् रूप आसन्दी को इस तरह से बुना गया । बृहत् और रथन्तर इससे पूर्व के पाद, बैरूप और बैराज पश्चिम के पाद, शाक्वर और रैवत शीर्षण्य पाद और नौवस और कालेय इसके अनुच्य पाद बने । इस तरह से आठ प्रकार के सामो से इसके आठ पाद बनाये गये । ऋग्वेद और सामवेद मे इसके ताने-बाने, यजुर्वेद से तानो बानो के बीच के अवकाश, यश से आस्तरण, श्री से उपबर्हण बनाये गये । 1

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थ पारिजातः १४६८ आस्तरण श्रियमुपबर्हण तस्यै सविता च बृहस्पतिश्च पूर्वौ पादावधारयनाम् । वायुश्च पूषा चापरी । मित्रावरुणौ शीर्षण्ये अश्विनावनूच्ये । स एतामासन्दीमारोश्त इति' ( ऐ ० ब्रा० ८ | ३ | १४ अर्थात् ३८1१ ) । सम्राज साम्राज्यम् । यदुक्तम्- 'एवभूत सार्वभौमराजान साम्राज्य सार्वभोमराज्य भोज्यमुपभोगसाधक भोगपितरम् उत्तमभोगाना साधकं स्वराज सर्वकर्मसु प्रकाशमान सद्विद्यादिगुणे. स्वहृदये देदीप्यमान स्वाराज्य स्वकीय- राज्यपालकं विविधाना राज्ञा प्रकाशकं बेराज्य विविधराज्यप्राप्तिकर राजान श्रेष्ठैश्वर्येण प्रकाशमानं राज्ञा रक्षक परमेष्ठिन परमोत्कृष्टे राज्ये स्थापयितुं योग्य पारमेष्ठ्य परमेष्टिसम्पादित सर्वोत्कृष्ट पुरुषं वयमभिषिञ्चामहै । एवमभिषिक्तस्य पुरुषस्य सुखयुक्त क्षत्रमजनि प्रादुर्भवति तथा क्षत्रियो वीरपुरुषोऽजनि विश्वस्य प्राणिमात्रस्याधिपति सभाध्यक्षो विशा दुष्टप्रजाना- 1 है 1 मत्ता विनाशकः पुरा भेत्ता दुष्टाना हन्ता वेदस्य रक्षको धर्मस्य रक्षकोऽजनि ॥ स परमेष्ठी राजधर्मः सभाध्यक्षादिमनुष्यैः प्राजापत्य. परमेश्वर इष्ट करणीयः, न तद्भिन्नोऽर्थं केनचिन्मनुष्येणेष्टः कर्तुं योग्योऽस्त्यत सर्वे मनुष्या. परमेश्वरपूजका } १ भवेयु ' ( पृ० २६३ -२६४ ) इति, तदपि यत्किञ्चित् विशृङ्खलत्वात् पूर्वापरविरुद्धत्वाच्च । सम्राज साम्राज्यमित्यादीना सङ्गतिरपि नोक्ता । यदि लोकिकस्यैव राज्ञ एतद्वर्णनम्, तदा पूर्ववणितेभ्यो वैशिष्ट्य दर्शनीयम्, अन्यथा पौनरुक्त्यव्यर्थ- विशेषणत्वादिक दुर्वार स्यात् । किञ्च विशाभिति दुष्टप्रजाग्रहणेन व्यर्थमेव लक्षणाश्रयणम् । अत्तेति पदेनापि भाक्तेत्येवार्थ, 1 शेषित्वमेव भोक्तृत्व भवति, न नाशक्त्वमिति । सम्राज साम्राज्यमित्यपि भ्रामकमेव । सम्पूर्ण वाक्यं तु — ' तमेतस्यामासन्द्यामासोन विश्वेदेवा अब्रुवन् न वा है अनभ्युत्कृष्ट इन्द्रो वीर्य कर्तुमर्हति । अभ्येनमुत्क्रोशामेति 1। तथेति त विश्वेदेवा अभ्युदक्राशन्निम देवा अभ्युत्कक्रोशन् सम्राज साम्राज्य भोज भोजपितर स्वराजं स्वाराज्य विराज वैराज्य राजान राजपित र परमेष्ठिन पारमेष्ठ्यं क्षत्रमजनि क्षत्रियोऽजनि सविता और बृहस्पति ने पूर्व के पादो को, वायु और वृषा ने पश्चिम के पादो को, मित्रावरुण ने शीर्षण्य पादो को और अश्विनी-कुमारो ने अनूच्य पादो को धारण किया है । इस आसन्दी पर इन्द्र वैठता है " । { ' सम्राजं साम्राज्य० ' इस वचन की दयानन्द ने यह व्याख्या की है-'वही हमारा सम्राट् अर्थात् चक्रवर्ती राजा 1 और वही हमको भी चक्रवर्ती राज्य देने वाला है । जो पिता के सदृश सब प्रकार से हमारा पालन करने वाला, स्वराट् अर्थात् स्वयप्रकाशस्वरूप और प्रकाश रूप राज्य को देने वाला है । तथा जो विराट् अर्थात् सबका प्रकाशक विविध राज्य का देने वाला है । उसी को हम राजा और सब राजाओं का पिता मानते है । क्योकि वही परमेष्ठी सर्वोत्तम राज्य को भी देने वाला है । उसी की कृपा से मैने राज्य को प्रसिद्ध किया, अर्थात् मै क्षत्रिय और सब प्राणियो का अधिकारी हुआ तथा प्रजाओ का संग्रह, दुष्टो के नगरो का भेदन, अपुर अर्थात् चोर-डाकुओ का ताडन, ब्रह्म अर्थात् वेद विद्या का पालन और धर्म की रक्षा करने वाला हुआ हैं' ( पृ० २६४- २६५ ) । किन्तु यह व्याख्या भी गलत है । इसमें न तो कोई अनुस्यूतता है और न आगे-पीछे से ही इसका कुछ सम्बन्ध है । सम्राज, साम्राज्य आदि की कोई संगति भी नही बताई गई । यदि लौकिक राजा का हो वह वर्णन है, तो पूर्ववर्णित से इसकी विशिष्टता बतानी पडेगी, अन्यथा पुनरुक्ति के साथ इन सब विशेषणो की व्यर्थता भी होगी । विश् शब्द का अर्थ दुष्ट प्रजा लक्षणा के सहारे ही किया जा सकता है । अत पद का अर्थ भोक्ता ही हो सकता है । भोक्ता शेषी ही हो सकता है । वह उसका नाशक नही हो सकता । अधूरा उद्धृत होने से 'सम्राजं साम्राज्य' इस वाक्य से भी भ्रम पैदा होता है, अत पहले इस पूरे वाक्य को मूल में उद्धृत किया गया है । इसका सही अर्थ यह होगा -आसन्दी पर बैठने के बाद इन्द्र का अभिषेक हो जाने पर देवगण इस तरह से उसका गुणगान करते है । इस वेदमयी आसन्दी पर बैठे हुए उस इन्द्र के विषय मे सभी देवगण परस्पर इस तरह से कहने लगे । जैसे लोक में बन्दीगण राजा का गुणगान कर उसकी कीर्ति का विस्तार करते हैं, उसी तरह से यहाँ इन्द्र का किया गया गुणगान ही