वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 571–580

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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वेदार्थपारिजातः १४६ ९ विश्वस्य भूतस्याधिपतिरजनि विशामत्ताऽजनि पुरा भेत्ताऽजनि असुराणा हन्ताऽजनि ब्रह्मणो गोप्ता ऽजनि धर्मस्य गोप्ताऽ- ष्ठायजनोति ( ऐ० ब्रा० ८ ३ १४, अर्थात् ३८| २ | तदर्थस्त्वेवम् -इन्द्रारोहणादूर्ध्वं देवानामभ्युत्क्रोशन दर्शयति- एतस्या वेदमय्यामासन्द्यामासीनं तमिन्द्र प्रति विश्वेदेवा सर्वे देवा परस्परमिदमब्रुवन् । यथा लोके वन्दिनो गुणकथनेन राज्ञः कीर्ति कुर्वन्ति, एवमत्रापि गुणकीर्तनमभ्युत्क्रोशनम् तेन रहितोऽनभ्युत्कृष्ट इन्द्रो युद्धादौ वीर्य क्तुं नैवार्हति, कीर्तिमन्तरेण परेषा भीत्यनुदयात् । तस्मादभित एनमिन्द्रमभ्युत्कोशामोद्घोषयामेति विचार्य तथैवाङ्गीकृत्य तमिन्द्र सर्वे देवा अभ्युदक्रोशन् । इममित्यादिग्भ्युत्क्रोशनप्रकार । हे देवा इममिन्द्रममित उष्क्रोशयत । कीदृशमिन्द्र सम्राज मम्राट्स्वरूपमत एव साम्राज्य कर्तुमहं भोज भोक्तारमत एव भोजयितार भोजपालक स्वरारूपत्वात् स्वाराज्य कर्तुमहं राजरूपत्वाद्राजपितर सर्वेषा राज्ञा पालकम्, परमेष्ठिरूपत्वात् पारमेष्ठ्यं पदमनुभवितुं योग्य क्षत्रमजनि । ईदृशी क्षत्रियजातिर्लोके उत्पन्ना । सर्वस्य प्राणिजातस्याधिपतिरुत्पन्न । विशा प्रजानामत्ता भोक्ता पुरा परकीयाणा भेत्ता असुराणा हन्ता ब्रह्मणो वेदस्य गोप्ता धर्मस्य गोप्ता इत्ययमभ्युत्कोशनमन्त्रः । एव पौर्वापर्यमविज्ञायैव दयानन्देन यत्किञ्चित्प्रलपितम् । ' स एतेन ' इत्यत्रापि यदुक्तम्—'या मनुष्यो राज्य कर्तुमिच्छेत् स एतेनैन्द्रेण पूर्वोक्तेन सर्वेश्वर्यप्राप्तिनिमित्तेन महाभिषेकेणाभिषिक्तः स्वीकृतः क्षत्रिय. क्षत्रधर्मवान् सर्वेषु युद्धेषु जयति सर्वत्र विजयं तथा सर्वोत्तमाल्लोकाश्च विन्दति । सर्वेषा राज्ञा मध्ये श्रेष्ठ्य सर्वोत्तमत्व पूर्वोक्तामनिष्ठा या परेषु शत्रुषु विजयेन हर्षनिमित्ता तथा परेषा शत्रूणा दीनत्वनिमित्ता या परमता सभा ता वा गच्छति प्राप्नोति । तया सभया पूर्वोक्त माम्राज्य भौज्य वैराज्यं माहाराज्यमाधिपत्य स्वाराज्य राज्य च जित्वाऽस्मिल्लोके चक्रवर्ती सार्वभौमो महाराजाधिराजो भवति । तथा शरीरं त्यक्त्वाऽमुष्मिन् स्वर्गे सुखस्वरूपे परब्रह्मणि स्वयंभू स्वाधीन. स्वराट् स्वप्रकाशः अमृत प्राप्तमोक्षसुख सन् सर्वान् कामानवाप्नोति । आप्त्वा पूर्णकामोऽ-जरामर सम्भवति, यमेतेनैन्द्रेण सर्वैश्वर्येण शाययित्वा प्रतिज्ञा कारयित्वा य सकलगुणोत्कृष्ट क्षत्रिय महाभिषेकेणाभिषिञ्चन्ति सभासदः सभायां स्वीकुर्वन्ति तस्य राष्ट्रे कदाचिदनिष्टं न पसज्यत इति विज्ञेयम्' ( पृ ० २६४ ) इति, तदपि तुच्छम्, पूर्वापर- अभ्युत्क्रोशन शब्द से कहा गया है । इस तरह का गुणगान सुने बिना इन्द्र युद्ध आदि मे पराक्रम नही कर सकता, क्योकि किसी भी राजा की कीर्ति का विस्तार हुए बिना दूसरो को उससे भय पैदा नहीं हो सकता । इस लिये चारो तरफ इसका गुणगान करे, ऐसा विचार कर और इस बात को सही मानकर उस इन्द्र का सब देवगण गुणगान करने लगे ।' 'इमम्' इत्यादि से इसी का प्रकार बता रहे है कि हे देवताओ, इस इन्द्र का सब तरह से गुणगान करो । यह इन्द्र सम्राट् स्वरूप है । इसी लिये साम्राज्य की स्थापना करने में समर्थ है । यह भोक्ता है, इसीलिये यह सबका पालक है । स्वराट् रूप होने से स्वाराज्य स्थापित करने में समर्थ है । राज रूप होने से यह सब राजाओ का पिता, पालक है । परमेष्ठी रूप होने से इसने पारमेष्ठ्य पद का अनुभव करने मे समर्थ क्षत्रिय जाति को पैदा किया है । ऐसी जाति इन्द्र की कृपा से ही यहाँ पैदा हुई है । यह सब प्राणियो का स्वामी बनकर उत्पन्न हुआ । यह सारी प्रजा का भोक्ता है और शत्रुओ के नगरो को नष्ट कर देने वाला है । यह असुरो को मार डालता है । वेद और धर्म की रक्षा करता है । इस तरह से इस ब्राह्मण वाक्य में इन्द्र का गुणगान किया गया है । इस पर पूर्वापर का विचार किये बिना ही दयानन्द ने मनमानी बकवास की है । '. ' ' } स एतेन इत्यादि ब्राह्मण वाक्य की व्याख्या भी दयानन्द ने इस तरह से की है— जो क्षत्रिय इस प्रकार के गुण और सत्य कर्मों से अभिषिक्त अर्थात् युक्त होता है, वह सब युद्धों को जीत लेता है, तथा सब उत्तम सुख और लोको का अधिकारी बनकर सब राजाओ के बीच में अत्यन्त उत्तमता को प्राप्त होता है । जिससे इस लोक में चक्रवर्ती राज्य और लक्ष्मी को भोगकर मरणानन्तर परमेश्वर के समीप सब सुखों को भोगता है । क्योकि ऐन्द्र अर्थात् महान् ऐश्वर्य युक्त अभिषेक से क्षत्रिय को प्रतिज्ञापूर्वक राज्याधिकार मिलता है । इसलिये जिस देश में इस प्रकार का राज्य प्रबन्ध किया जाता है, वह देश अत्यन्त सुख को प्राप्त होता है' ( पृ० २६५ ), किन्तु यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि इसमें पूर्वापर का विरोध है | सभा की कल्पना मनमानी है, 1 1

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वेदार्थपारिजातः १४७० 1 विरुद्धत्वादेव |। सभाकल्पना तु वेदवाह्यंव, मूले तद्बोधकपदाभावात् ॥ यो मनुष्यो राज्य कर्तुमिच्छेद् इत्यादिक व्यर्थमेव, यमेतेनैन्द्रेण महाभिषेकेण क्षत्रिय शाययित्वाऽभिषिञ्चति स एतेनैन्द्रेणेति सम्बन्धोपपत्ते । स एतेनैन्द्रेण ' ( ऐ० ब्रा० ८| ४| १६, 1 1 / ). अर्थात् ३९ ५ इति महाभिषेकमुपसंहरति । य क्षत्रियमाचार्य स्वद्रोहराहित्याय शपथ कारयित्या इन्द्रसम्बन्धिना महाभिषेकेण भिषिञ्चति सोऽभिषिक्त क्षत्रिय इन्द्रवत्वं जयादिफल प्राप्नोति । तस्मात् सायणप्रोक्त एवार्थ. सर्वत्र विजयने । स एव सर्वरास्तिकै प्रज्ञावद्भिश्च ग्राह्य । सोत्रामणिप्रसङ्गे– ' क्षत्र वै स्विष्टकृत्' ( श० १२| ८| ३| १ ९ ) । अत्र तु पुरस्तात् स्विष्टकृत आयतनाच्चो- त्तरत उपेत्याद् इति वीर्येण स्विष्टकृतो भागः कल्पित इति क्षत्रमुच्यते क्षत्रियराज्ञा अभिषिक्तो भवति पूर्वो हि राजैव वृद्ध: कुमारं चाभिषिञ्चति । ' क्षत्र वै साम " साम्राज्य वै साम' ( श० १२२८| ३ | २३ ) साम गायति क्षत्र वै साम क्षत्रणेवेन- मभिषिञ्चति । साम्राज्यं वे साम साम्राज्येनैवैन साम्राज्य गायति । सुक्षत्र तस्मादु ह एतद्य सर्वः कृत्स्नो मन्यते गायति वैव, गीते य रमते इति वचनात् । साम्राज्यमेकैश्वर्यरूपम् । सम्राडेव कृत्स्नमात्मान मन्यते । न तस्य परतन्त्र राज्यमित्यभिप्राय । अश्वमेधधर्मविधिप्रसङ्गे– ' ब्रह्म वै ब्राह्मणः क्षत्र राजन्य:' ( श० १३| १५| ३ ) । तत्र पूर्वमुक्त यदुभौ ब्राह्मणी गायेताम् अपास्मात् क्षत्र कामेत् । ब्रह्मणो वा एतद्रूप यद् ब्राह्मणः । न वै ब्रह्मणि क्षत्र रमते । यदुभो राजन्यो क्योकि मूल मे इसको बताने वाले शब्द नही है । जो मनुष्य राज्य करना चाहे, यह कथन भी व्यर्थ ही है, क्योकि जो आचार्य इस ऐन्द्र ( इन्द्र सम्बन्धी ) अभिषेक की पद्धति से क्षत्रिय का अभिषेक करता है और उससे यह प्रतिज्ञा करा लेता है कि वह उसके साथ विरोध नही करेगा, तो वह इस इन्द्र सम्बन्धी महाभिषेक से अभिषिक्त क्षत्रिय इन्द्र के समान ही सब तरह के ऊपर वर्णित पराक्रम आदि गुणो को प्राप्त कर लेता है और साथ ही सब जगह विजय भी प्राप्त करता है, वही अर्थ इस वाक्य से निकलेगा । इस तरह से सायण द्वारा किया गया अर्थ ही सही माना जा सकता है । सौत्रामणी याग के प्रसंग मे ' क्षत्रं वै स्विष्टकृत् ०' इत्यादि वाक्य आया है । यहाँ पर स्विष्टकृत् के आगे और आयतन के उत्तर में स्थित होकर स्विष्टकृत् भाग की कल्पना का विधान है । इसको क्षत्र कर्म इस लिये कहा जाता है कि क्षत्रिय राजा के द्वारा ही अभिषेक किया जाता है । पहले का वृद्ध राजा ही कुमार का अभिषेक करता है । आगे क्षत्र और साम्राज्य को साम बताया गया है । साम का गान इसलिये किया जाता है कि वह क्षत्र का प्रतिनिधित्व करता है । साम का गान क्षेत्र पद पर अभिषेक करने के अभिप्राय से ही किया जाता है । साम साम्राज्य है । अत सामरूपी साम्राज्य से इस क्षत्र के साम्राज्य की ही स्तुति गाता है । वही सही क्षत्र माना जाता है, जो कि सब कुछ अपना ही मानता है और उसी के गीत गाता है । साम्राज्य उसको कहते है, जिसका कि एक ही अधिपति हो । अश्वमेघ यज्ञ के विधान के प्रसंग में बताया गया है कि ब्रह्म ब्राह्मण को और क्षत्र राजन्य को कहा जाता है । इस वाक्य के पहले यह बताया गया है कि दोनों ब्राह्मण इसका गान करें, जिससे कि क्षत्रिय इससे दूर ही रहे, अर्थात् इसके कार्य में किसो तरह का हस्तक्षेप न करे । यह ब्राह्मण ब्रह्म का ही स्वरूप है । ब्रह्म में क्षत्रिय रमता नही । इसी तरह से दो क्षत्रिय भी इसी का गान करें, जिससे कि ब्रह्म तेज इसका विरोधी न हो । यह क्षत्रिय क्षत्र का ही प्रतिनिधि हैं । यह ब्रह्म तेज क्षत्र में नही रमता । जब ब्राह्मण किसी अन्य साम का और क्षत्रिय किसी अन्य साम का गान करते है, तब ब्रह्म ब्राह्मण और क्षत्र राजन्य कहा जाता है । क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनो को ही इससे श्रीवृद्धि होती है । युद्ध क्षत्रिय का बल है । यदि क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनो दिन में इनका गान करेंगे तो उनकी श्री नष्ट हो जायगी । यदि दोनों रात्रि में गान करते हैं, तो इनसे ब्रह्म तेज दूर हो जायगा । इसलिये व्यवस्था यह है कि दिन में ब्राह्मण गान करता है और रात्रि में क्षत्रिय । इस तरह दोनो तरफ से अर्थात् क्षत्र और ब्रह्म दोनो ही रूपो से श्री प्राप्त होती है । इसी तरह से यज्ञ किया, दान दिया यह सब ब्राह्मण के गान का विषय होना चाहिये, क्योंकि इष्टापूर्त ब्राह्मण का धर्म है | ऐसा करके ब्राह्मण अपने को इन कार्यों से समृद्ध बनाता है । यह युद्ध किया गया, यह संग्राम जीता गया, इस भावना से क्षत्रिय को सदा गोतप्रोत रहना चाहिये । ऐसा करके हो राजन्य अपने को वीर्य से समृद्ध बनाता है । ब्राह्मण तीन गाथा गाता है ।

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वेदार्थपारिजातः १४७१ अपास्माद् ब्रह्मवर्चस क्रामेत् । क्षत्रस्य वा एतद्रूप यद्राजन्य । न वै क्षत्र ब्रह्मवचन रमते । यद्वा ब्राह्मगोऽन्यो गायति राजन्योऽन्य । तदानी ब्रह्म वै ब्राह्मण क्षत्र वै राजन्यः । तदस्य ब्राह्मणा च क्षत्रियेण चोभयत श्रीः परिगृहीता भवति । 'युद्ध वै राजन्यस्य वीर्यम्' । एवमेव यदुभौ दिवा गायेता प्रभ्रशुकास्माच्छी स्यात् । यदुभी नक्तम् अपास्माद् ब्रह्मवर्चसं क्रामेद् दिवा ब्राह्मणो गायति नक्त राजन्यस्तथो हास्य ब्रह्मणा च क्षत्रियेण चोभयत श्री परिगृहीना भवति । एवमेव अयजतेत्यददादिति ब्राह्मणो गायतीष्टापूर्तं वै ब्राह्मणस्येष्टापूर्तेनैवेन समर्धयति । अयुध्यतेत्ययु मग्राममजयदिति राजन्यो युद्ध वै राजन्यस्य वीर्य वीर्येणैवैन समर्धयति । तिस्रोऽन्यो गाथा गायति तिस्रोऽन्य. षट् सम्पन्ते । षड़तवः सवत्सर ऋतुष्वेव सवत्सरे प्रतितिष्ठति । ताभ्यां शतं ददाति । शतायुर्वे पुरुष । शतेन्द्रियायुरेवेन्द्रियं वीर्यमात्मन् धत्ते । राष्ट्रं वा अश्वमेध | राष्ट्र एते व्यायच्छन्ति ये अश्वं रक्षन्ति । राष्ट्र जनपदम् अश्वमेधकारणम् । कथं यस्माद् राष्ट्रे एते त्रिविध आरच्छन्ते व्याप्रियन्ते तेषा ये राजपुत्रादयो राजन्यादय उदृचं समाप्ति गच्छन्ति अश्व- मात्राद्रक्षन्ति ते राष्ट्रेणैवाश्वमेधेन हेतुना राष्ट्रं राष्ट्रात् स्वं रक्षन्ति राजपुत्रादयो भवन्ति । तयैव सेवया देशा आप्ताश्च प्राप्नु- वन्ति । तस्माद्राष्ट्री राष्ट्रपतिः अश्वमेधेन यजेतेति विधि. । स्वामिदयानन्दस्तु --' राष्ट्रपालनमेव क्षत्रियाणामश्वमेधाख्यो यज्ञो भवति । नाश्व हत्वा तदङ्गाना होमकरणं च' ( पृ ० २६६ ) इत्युक्तवान्, तत्तुच्छम् तथात्वेऽश्वक्रतु विधानवैयर्थ्यापातात् । किञ्च, राष्ट्रमिति पदं जनपदबोधकम् राष्ट्र- पालनबोधकं वा । लक्षणाया तु न किमपि बीजम् । यथेष्टलक्षणास्वीकारे तु त्वद्वाक्याना त्वदभिप्रायखण्डनेऽपि प्रयोगः' सम्भवतीति नैकधोक्तम् । एवमेव-- ' क्षेत्रमर्थाद् राजसभा प्रबन्धेन यद् यथावत्प्रजापालन क्रियते तदेव स्विष्टकृत् अर्थादिष्टसुखकारि । यद्वै साम दुष्टकर्मणामन्तकारि तथा सर्वस्याः प्रजायाः सान्त्वप्रयोगकर्तृ च भवति, तदेव श्रेष्ठ राज्य वर्णयन्ति ' (पृ० २६५ ) और क्षत्रिय इससे भिन्न तीन अलग गाथा गाता है । इस तरह से ये छ.' हो जाती है । छ: ऋतुएँ ही सवत्सर की पूर्ति करती है । इन ऋतुओ मे ही संवत्सर प्रतिष्ठित है । इन ऋतुओ और सवत्सरो की शत संख्या का दान करने से ही पुरुष सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है । सौ वर्ष तक इसकी इन्द्रियाँ सबल रहती है । राष्ट्र हो अश्वमेघ यज्ञ है । जो अश्व की रक्षा करते है, वे राष्ट्र मे प्रसिद्ध हो जाते हैं । राष्ट्र की, जनपद की समृद्धि का कारण अश्वमेध होता है, क्योकि अश्व की रक्षा करते समय क्षत्रिय सारे जनपद में घूमते हैं । उनके पुत्र और राजन्य वर्ग अपना जीवन देकर भी अवमेघ के अश्व की रक्षा करते है, वे अश्वमेघ की रक्षा कर एक प्रकार से अपने राष्ट्र की ही रक्षा करते हैं, क्योकि इसी तरह से वे राजपुत्र कहे जाने के अधिकारी होते हैं । अपनी इसी सेवा के आधार पर वे देश के अधिकारी बनते है । इसलिये जो राष्ट्र का स्वामी होना चाहता है, उसको अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये, इस तरह की विधि यहाँ सिद्ध होती है । स्वामी दयानन्द ने तो कहा है कि 'न्याय से राज्य का पालन करना ही क्षत्रियो का अश्वमेध कहाता है । घोडे को मार कर उसके अगो को होम करना अश्वमेध नही है ' ( पृ० २६६ ), किन्तु उनका यह कहना ठीक नही है, क्योकि ऐसा मानने पर अश्व- मेघ यज्ञ का विधान व्यर्थ हो जायगा । राष्ट्र पद या तो जनपद का बोधक हो सकता है या जनपद के पालन के अर्थ में प्रयुक्त हो सकता है । जब जनपद अर्थ उसका प्रसंग प्राप्त है तो उसकी जनपद के पालन के अर्थ में लक्षणा करने की आवश्यकता क्या है? मनमाने तरीके से लक्षणा करने पर तो आपके ही वाक्यो का प्रयोग आपकी बात के खण्डन में भी किया जा सकता है, यह बात हम अनेक बार कह चुके है । इसी तरह से ' राजसभा के प्रबन्ध से जो यथावत् प्रजा का पालन किया जाता है, वही स्विष्टकृत् अर्थात् अच्छी प्रकार चाहे हुए सुख का करने वाला होता है । जो t राजकर्म दुष्टों का नाश और श्रेष्ठों का पालन करने वाला है, वही साम्राज्यकारी,

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वेदार्थपारिजातः १४७२ इत्याह स्वामी दयानन्द । तच्च सर्वथा प्रकृतपरित्यागऽप्रकृतप्रक्रियारूपमेव, क्षत्रशब्दस्य तथार्थकरणं चाप्रामाणिकमेव, अभिषेकप्रसङ्गे क्षत्रशब्दस्य क्षत्रियजातीयगासकपरत्वस्यैवोचित्यात् । स्विष्टकृच्छन्दोऽपि यज्ञस्याङ्गभूते कर्मविशेषे रूढ येनेष्टि सुष्ठु कृता भवति । प्रकृते तु 'योषा वाव गौतमाग्नि ' इति योषायामग्निबुद्धिरिव क्षत्रे क्षत्रियजाती स्विष्टकृद् बुद्धि. किन्ते । अत एवोत्तरत्र क्षत्रेणैवैनमेतदभिषिञ्चत्यन्तरा वनस्पति च स्विकृत चाभिषिञ्चति । सोमो वै वनस्पति । अग्नि स्विष्टकृत् । अग्नीषोमाभ्यामेवैनमेतत्परिगृह्याभिषिञ्चति । ये चैतद्विदुर्ये च न न आहु क्षत्रियो वाव क्षत्रियस्याभिषेकेति । अत्र वनस्पती सोमत्वभावताया क्षत्ररूपे स्विष्टकृत्यग्निभावनण क्षत्रवनस्पतिभ्यामभिषेके कृतेऽग्नीषोमाभ्यामभिषेकः कृतो भवतीति । राजन्य एवेत्यत्रापि यदुक्तम्- पुरा पूर्वोक्तैर्गुणैर्युक्तो राजन्यो यदा गौर्य महिमान दधाति तदा सार्वभौम राज्य कर्तुं समर्थो भवति । तस्मात् कारणाद् राजन्य शूरो युद्धोत्सुको निर्भय इषव्यः शस्त्रास्त्रप्रक्षेपणे कुशलः, आति- व्याधी अत्यन्ता व्याधा: शत्रूणा हिंसका योद्धारो यस्य महारथ महान्तो भूजलान्तरिक्षगमनाय दक्षा रथा यस्येति यस्मिन् राष्ट्र ईदृशो राजन्यो जज्ञे जात, नैव कदाचित्तस्मिन् भयदु खे भवत ' ( प ० २६६ ) इति । तदपि यत्कि- ञ्चित्, 'आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्' ( वा० स० ) इति मन्तविवरणप्रसङ्गेन ब्राह्मण इव राजन्यस्यापि तदङ्गत्वेन वर्णनस्येष्टत्वात् । सर्वमप्येतद्यज्ञफलमेवात एवोपसंहारे प्रोक्तम्-'यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते क्लृप्त प्रजाना योगक्षेमो भवति' ( १३ १ ९ ) । यदपि चोक्तम् -'ब्रह्मार्थाद् वेदं परमेश्वर च वेत्ति स एव ब्राह्मणो भवितुमर्हति क्षत्रं यो जितेन्द्रियो विद्वान् शौर्यादिगुणयुक्तो महावीरपुरुषः क्षत्र धर्मं स्वीकरोति स राजन्यो भवितुमर्हति । तदस्य तादृशैर्ब्राह्मणे राजन्यैश्च सहास्य राष्ट्रस्य सकाशादुभयतः श्रीः राज्यलक्ष्मी परित सर्वतो गृहीता भवति । नैवं राजधर्मानुष्ठानेनास्य श्रियः कदाचिद् -,: प्रासान्यथात्वे भवतः । अत्रेदं बोध्यम् युद्धकरणमेव राजन्यस्य वीर्यं बलं भवति नानेन बिना महाधनसुखयो अर्थात् राजसुखकारक होता है' ( पृ० २६६ ) । स्वामी दयानन्द ने 'क्षत्र वै स्विष्टकृत्' इत्यादि की व्याख्या की है, यह व्याख्या सर्वथा प्रकृत प्रसंग का परित्याग और अप्रकृत बातो की चर्चा के समान असंगत है । क्षत्र शब्द का इस तरह का अर्थ करना सर्वथा प्रमाणहीन है । अभिषेक के प्रसंग मे क्षत्र शब्द का अर्थ क्षत्रियजातीय शासक ही किया जा सकता है । स्विष्टकृत् शब्द का अर्थ भी यहाँ के अगभूत एक विशिष्ट कर्म मे रूढ है, जिससे कि दृष्टि सर्वागपूर्ण बनती है । प्रकृत में योषा ( स्त्री ) में अग्नि की बुद्धि की तरह क्षत्रिय जाति में स्विष्टकृत् की बुद्धि की जाती है । इसलिये इससे आगे के ब्राह्मणवाक्य में वनस्पति मे सोम की भावना और क्षत्र में स्विष्टकृत् अग्नि की भावना कर क्षत्र और वनस्पति से अभिषेक के सम्पन्न होने पर माना जाता है कि यह अग्नि और सोम देवताओ के द्वारा सम्पन्न किया गया है । 'राजन्य एव' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य की व्याख्या करते हुए कहा गया है--' पूर्वोक्त राजा जब शूरतारूप कीर्ति को धारण करता है, तभी सम्पूर्ण पृथिवी के राज्य करने को समर्थ होता है । इसलिये जिस देश मे युद्ध को अत्यन्त चाहने वाला, निर्भय, शस्त्र- अस्त्र चलाने में अति चतुर और जिसका रथ पृथिवी, समुद्र और अन्तरिक्ष मे जाने वाला हो, ऐसा राजा होता है, वहाँ भय और दुख नहीं होते' ( पृ ० २६६ L- २६७ ), किन्तु यह व्याख्या भी ठीक नही है, क्योकि ' आब्रह्मन्' इत्यादि मन्त्र का विवरण करते समय ब्राह्मण की तरह क्षत्रिय का भी उसके अग के रूप में वर्णन अभीष्ट है । यह सब यज्ञ का ही फल हैं, प्रसाद है । इसीलिये उपसहार में बताया गया है कि जहाँ इस यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है, वहीं प्रजा का योग और क्षेम बराबर बना रहता है । ' ब्रह्म वै' इत्यादि ब्राह्मण, वाक्य की व्याख्या इस तरह से की गई है— 'जो मनुष्य ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर और वेद का जानने वाला है, वही ब्राह्मण होने के योग्य है । जो इन्द्रियो को जीतने वाला, पण्डित, शूरतादि गुण युक्त, श्रेष्ठ, वीर पुरुष क्षत्र धर्म को स्वीकार करता है, वह क्षत्रिय होने के योग्य है । ऐसे ब्राह्मण और क्षत्रियों के साथ न्यायपालक राजा को अनेक प्रकार से लक्ष्मी प्राप्त होती है और उसके बजाने को हानि कभी नही होती । यहाँ इस बात को जानना चाहिये कि जो राजा को युद्ध करना है, वही

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वेदार्थपारिजातः १४७३ ( ) कदाचित्प्राप्तिर्भवति । निघण्टौ २।१७ । सग्रामस्यैव महाधनसज्ञत्वात्महान्ति धनानि प्राप्तानि भवन्ति यस्मिन् स महाधनः संग्राम | नास्माद्विना कदाचिन्महती प्रतिष्ठा महाधन च प्राप्नुत, ( पृ०२६५-२६६ ) इति, तदेतदपि शब्दार्थाविवेकपौर्वापर्यानवधारणमूलकम्, शाब्दन्यायविरुद्धत्वात् । म्ले ब्रह्मद्दिश्य ब्राह्मणत्व विहितम्, न तु यो ब्रह्म जानाति स ब्राह्मण इति विधान दृश्यते, तथैव क्षत्रमुद्दिश्य राजत्वविधान न तु क्षत्रधर्म य. स्वीकरोति स राजन्य इति विधानम् ॥ अत एवोत्तरत्र ब्रह्मणो वा एतद्रूप यद् ब्राह्मण । न वै ब्रह्मणि क्षत्र रमते । क्षत्रस्य वा एतद्रूप यद्राजन्यः । न वै क्षत्रे ब्रह्मवर्चस रमते इति ब्रह्मणो रूप ब्राह्मण क्षत्रस्य रूप राजन्य उक्त ब्रह्मणि क्षत्र न रमते ॥ क्षत्रे ब्रह्मवचस न रमत इत्युक्तम् । ' | श्री राष्ट्रम् श्रीवें राष्ट्रस्य भारः । श्रीर्वै राष्ट्रस्य मध्यम् ॥ क्षेमो वे राष्ट्रत्य गोतम् । विड्वै गभो राष्ट्र पसो राष्ट्रमेव विश्याहन्ति तस्माद्राष्ट्री विश घातुकः । विशमेव राष्ट्रायाद्या करोति । तस्माद्राष्ट्री विशमत्ति न पुष्ट पशु मन्यत इति' ( १३।२०।१ ९ ) । यच्चात्रोक्तम्--'या विद्याद्युत्तमगुणरूपा नीति सैव राष्ट्रं भवति । श्रीवं राष्ट्रस्य भारः । सैव राज्यश्री राष्ट्रस्य सभारो भवति । राष्ट्रस्य मध्यभागोऽपि श्रीरेवास्ति । क्षेमो यद्रक्षण तदेव राष्ट्रस्य शीत शयनवन्निरुपद्रव सुख भवति । विड् वै गभ. । विड्या प्रजा सा गभाख्याऽस्ति । यद्राष्ट्र तत्पसाख्यं भवति । तस्माद्यद्राष्ट्रसंबन्धि कर्म तद्विशि प्रजायामाविश्य तामाहन्त्यासमन्तात् करग्रहणेन प्रजाया उत्तमपदार्थाना हरण करोति । तस्माद्राष्ट्री विश घातुकः । यस्मात् सभया विनैकाकी पुरुषो राजा भवति, तत्र प्रजा सदा पीडिता भवति । तस्मादेक पुरुषो राजा नैव कर्तव्यः । नेकस्य पुरुषस्य राजधर्मानुष्ठाने सामथ्यं भवति । तस्मात् सभयैव राज्यप्रबन्ध कर्तुं गक्योऽस्ति । विगमेव राष्ट्रायाद्या करोति । यत्र को राजास्ति तत्र राष्ट्राय विश प्रजामाद्यां भक्षणीया भोज्यवत्ताडिता करोति । यस्मात् स्वसुखार्थं प्रजाया उत्तमान् पदार्थान् गृह्णन् सन् प्रजायै पीडा ददाति । तस्मादेको राष्ट्री विशमत्ति । न पुष्टं पशु मन्यते यथा मासाहारी पुष्ट पशु दृष्ट्वा उसका बल होता है । उसके बिना बहुत धन और सुख की प्राप्ति कभी नही होती । क्योकि निघण्टु में संग्राम का ही नाम ' महावन' है । उसको महाधन इसलिये कहते हैं कि उससे बडे-बडे उत्तम पदार्थ प्राप्त होते है, क्योकि विना सग्राम के अत्यन्त प्रतिष्ठा और धन कभी नही प्राप्त होता' ( पृ० २६६ ), किन्तु यह सारी व्याख्या भी शब्द का ओर अर्थ का विवेक न कर पाने से पूर्वापर प्रसग को ठीक से समझा नही सकी हैं और शाब्द प्रक्रिया के विपरीत है । मूल मे ब्रह्म को उद्दिष्ट कर बाह्मणत्व का विधान है, ऐसा विधान यहाँ नही है कि जो ब्रह्म को जानता हो, वह ब्राह्मण है । इसी तरह से क्षत्र को उद्दिष्टकर राजत्व का विधान किया गया है, न कि जो क्षत्र धर्म को स्वीकार करता है, वह राजन्य है, इस अर्थ को जान कर । इसीलिये आगे यह वाक्य मिलते है कि यह ब्राह्मण ब्रह्म का हो रूप है, ब्रह्म मे क्षत्र रमता नही । यह राजन्य ही क्षत्र का स्वरूप है, इस क्षत्र में ब्रह्मतेज नही रमता । इसीलिये ब्राह्मण ब्रह्म का और क्षत्रिय क्षत्र का रूप माना गया है और यह भी कहा गया है कि ब्रह्म के क्षेत्र नही रमता और क्षत्र में ब्रह्मतेज नही रमता । इसके आगे ' श्रीवें राष्ट्रम्' इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के वाक्य को उद्धृत कर उसकी इस तरह से व्याख्या की गई है—-'श्री का अर्थ है लक्ष्मी, वही राज्य का स्वरूप, सामग्री और मध्य है । तथा राज्य का जो रक्षण करता है, वही शोभा अर्थात् श्रेष्ठभाग कहाता है । राज्य के लिये एक को राजा कभी नही मानना चाहिये, क्योकि जहाँ एक को राजा मानते है, वहाँ सब प्रजा दुखी और उसके उत्तम पदार्थों का अभाव हो जाता है । इसीलिये किसी की उन्नति नही होती' ( पृ० २६७ ) । इसके आगे हिन्दी व्याख्या मे लिखा गया है- ' इसी प्रकार सभा करके राज्य का प्रबन्ध आर्यों में श्रीमन्महाराज युधिष्ठिर पर्यन्त बराबर चला आया है, जिसकी साक्षी महाभारत के राजधर्म आदि ग्रन्थ तथा मनुस्मृत्यादि धर्मशास्त्रो मे यथावत् लिखी है । उसमे जो कुछ प्रक्षिप्त किया है, उसको छोड के बाकी सब अच्छा है, क्योकि दह वेदो के अनुकूल है । आर्यो की यह एक बात बडी उत्तम थी कि जिस सभा या न्यायाधीश के सामने अन्याय हो, वह प्रजा का दोष नही मानते थे, किन्तु वह दोष सभाध्यक्ष, सभासद् और न्यायाधीश का ही गिना जाता था । इसलिये वे लोग सत्य-न्याय करने में अत्यन्त पुरुषार्थ करते थे, जिससे कि आर्यावर्त के न्यायघर में कभी अन्याय नही होता था और जहाँ होता था, वहाँ उन्ही न्यायाधीशो को दोष देते थे । यही सब आर्यों का सिद्धान्त है । अर्थात् इन्ही वेदादि शास्त्रों की रीति में १८५

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वेदार्थपारिजातः १४७४ हन्तुमिच्छति, तथैको राजा न मत्तः कश्चिदधिको भवेदितीर्ष्यया नैव प्रजास्थस्य कस्यचिन्मनुष्यस्योत्कर्षं सहते । तस्मात् सभाप्रबन्धयुक्तेन राज्यव्यवहारेणैव भद्रमिति' (पृ० २६७ ) | हिन्दीभाषाव्याख्याने त्वन्यदपि बहु जल्पितं यत् शतपथीयवचनात् तद्वयाख्यानाच्च सर्वथाऽसश्लिष्टम् । तत्सर्वमसंगतम्, शतपथवचनार्थबहिर्भूतत्वादेव । श्रीपदस्य समृद्धिरर्थं इति प्रसिद्धं लोके । तदपहाय विद्याद्युत्तमगुणरूपा नीतिरिति ग्रहण निर्मूलमेव ॥ किञ्च, विद्याद्युत्तमगुणा अन्ये, नीतिस्तु सन्धिविग्रहादिरूपाऽन्या भवति । सा च श्री. कथ राष्ट्रस्य भारः? नहि भारशब्दस्य सभारोऽर्थ क्वचित् प्रसिद्धः । नहि कचिदपि भिन्नशब्दस्य सभिन्नोऽर्थो ग्रहीतु शक्य, उपसर्गेन धात्वर्थभेदस्य प्रसिद्धत्वात् । अत एव नहि - -, हार विहार-प्रहाराहार संहाराणामेकार्थ्यं संभवति । श्रीश्व कथं राष्ट्रस्य मध्य भवति श्री राष्ट्रमित्यनेन विरुद्धत्वात् । यदा श्रीरेव राष्ट्रं तदा कथ सा मध्यम्, श्रीरूपस्य राष्ट्रस्यादिरन्तश्च कथ न श्री । शीतशब्दस्य शयनवन्निरुपद्रव सुखं कथमर्थः, नहि शयन निरुपद्रवं सुखमेव भवति, रोगमृत्युशय्याया शयनस्य सोपद्रवदु खरूपत्वात् । प्रजाया गभाख्याया राष्ट्रस्य पसाख्यायाश्च किं प्रयोजनम्? प्रकृते किं तस्या. समाख्याया उपयोग? राष्ट्रशब्दस्य तत्सबन्धिकर्मार्थ इत्यत्र कि बीजम् नहि दयानन्दशब्देन दयानन्दकर्म ग्रहीतुं शब्दम् । किञ्च, नहि राष्ट्रस्य कर्म भवति, तस्य जडत्वात् । सप्ताङ्ग राज्य भवति । तत्र राष्ट्रमप्येकमङ्गमेव । न करग्रहणमनर्थः, तस्य विहितत्वात् । तस्य कोषरूपाङ्गपूरकत्वात् । न चोत्तमपदार्थग्रहणमेव करग्रहण भवति । अत एव राष्ट्र विश्याविश्य प्रजामाहन्तीति रिक्त वच । अत्र प्रसङ्गे सभायाश्चर्चापि नास्ति, तस्मात् सभया विनैकाकी पुरुषो भवति, तत्र प्रजा सदा पीडिता भवतीति निरर्थक वच । यदि यत्र सभया विनैकाकी पुरुषो राजा भवति, तत्र प्रजा सदा पीडिता भवतीत्यर्थस्तदापि स्वोक्तवाक्यस्य नैरर्थक्यमभ्युपगन्तव्यमिति निग्रहस्थानमेव । एकाकी पुरुषो राजा नैव कर्तव्य इत्यपि निर्मूलम्, मूले तद्बोधकपदाभावात् । स्वाभिप्रायप्रकाशनाय ग्रन्थान्तर लेख्यम् । न तु श्रुत्यर्थ- आर्यों ने भूगोल मे करोड । वर्ष राज्य किया है, इसमे कुछ सन्देह नहीं' ( पृ ० २६७ - २६८ ), किन्तु यह सारा व्याख्यान शतपथ ब्राह्मण के ही नही, स्वय उनकी व्याख्या से भी तनिक भी सम्बद्ध नही है । यह सारा कथन असंगत है, क्योकि इसका शतपथ ब्राह्मण के वचनो से कुछ भी सम्बन्ध नही है । । श्री पद का समृद्धि अर्थ लोक मे प्रसिद्ध है । उसको छोड कर विद्या यदि उत्तम गुणरूप नीति यह अर्थ करना सर्वथा निर्मूल है । इस अर्थ मे यह भी विसंगति है कि विद्या आदि उत्तम गुण अलग है और सन्धिविग्रहरूप नीति अलग है । यह भी राष्ट्र का भार कैसे हो सकती है? भार शब्द का अर्थ कही भी संभार प्रसिद्ध नही है | कही भी भिन्न शब्द का अर्थ संभिन्न नहीं किया जा सकता । यह बात प्रसिद्ध है कि उपसर्ग लग जाने पर धातु का अर्थ बदल जाता है । इसीलिये हार, बिहार, प्रहार, आहार, संहार इन सब का एक अर्थ नही होता । श्री राष्ट्र का मध्य भी कैसे हो सकता है? यह बात ' श्री राष्ट्र है' इस वचन के विरुद्ध है । जब श्री ही राष्ट्र है, तब वह मध्य कैसे हो सकती है । श्रीरूप राष्ट्र का यह श्री मध्य ही क्यो होगा, यह आदि और अन्त क्यों नही होगा । शीत शब्द का शयन के समान निरुपद्रव सुख अर्थ कैसे होगा? शयन केवल निरुपद्रव सुख ही नही होता, क्योकि रोग और मृत्युशय्या पर शयन उपद्रव ही नही, दुःखरूप भी है । प्रजा को गभ और राष्ट्र को पस कहने का क्या अभिप्राय है । प्रकृत में इन नामो का क्या उपयोग है । राष्ट्र शब्द का अर्थ राष्ट्रसम्बन्धी कर्म कैसे होगा? दयानन्द शब्द से दयानन्द का कर्म कही गृहीत नही होता । फिर राष्ट्र का कोई कर्म नही हो सकता, क्योकि वह तो जड है । राज्य सात अंगों वाला होता है । इनमें राष्ट्र भी एक अंग है । कर वसूल करना भी इसका अर्थ हो सकता है और यह विहित भी है, क्योकि कोष रूप अंग की पूर्ति उसी से होती है । उत्तम पदार्थों का ग्रहण करना ही कर ग्रहण नहीं होता । इसीलिये यह राष्ट्र सम्बन्धी कर्म प्रजा में प्रविष्ट होकर उससे उत्तम पदार्थों का ग्रहण करता है, इस तरह की बात सर्वथा व्यर्थ है । इस प्रसंग में सभा की कही चर्चा नही है । इसीलिये सभा के बिना राजा एकाकी ( अकेला ) पड जाता है । जहाँ अकेला राजा शासन चलाता है, वहाँ की प्रजा सदा पीडित रहती है, इस तरह का अर्थ करना सर्वथा निरर्गल है । यदि यहाँ यह अर्थ किया जाय कि जहाँ सभा के बिना अकेला आदमी राजा होता है, वहाँ की प्रजा सदा पीडित होती है, तो उस परिस्थिति में अपने ही वाक्य की निरर्थकता माननी पड़ेगी । इस तरह से तो आप निग्रहस्थान में पकड़ जायँगे । अकेले आदमी को राजा नही ही बनाना

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वेदार्थपारिजातः १४७५ व्याख्याने स्वाभिप्रायो योजनीयः । किञ्च, राजा तु सदैव एकाक्येव भवति, नह्येकस्मिन् राष्ट्रे राजानैक्य श्रुतं दृष्ट वा । राजधर्मानुष्ठाने राज्ञ एवाधिकारो नान्येषाम् । राजा त्वेक एव भवति । अमात्यादय अमात्यपर्षद्वा परामर्शदातारो भवन्ति न तु राजानः, मनुशुक्रादिधर्मनीतिग्रन्थविरुद्धत्वात् । यत्रैको राजास्ति तत्र राष्ट्राय विश प्रजामाद्या भक्षणीया करोतीत्यप्य- शुद्धमेव, मूले यत्रको राजास्तीति वाक्याभावात् । एको राष्ट्री विशमत्तीत्यप्यशुद्धम्, मूल एकशब्दप्रयोगाभावात् । यस्मात् स्वसुखार्थमुत्तमपदार्थान् गृह्णन् स प्रजायै पीडां ददातीत्यपि निर्मूलमेव, उदक्षरत्वात् । अन्यदपि निरर्गलप्रलाप एव, शतपथवचनासबद्धत्वात् । ' यद्धरिणो यवमत्तीति । विड् वै यवा राष्ट्र हरिणो विशमेव राष्ट्रायाद्या कराति । तस्माद्वा राष्ट्र विशमत्ति न पुष्ट बहु मन्यत इति तस्माद्राजा पशून्न पुष्यति' ( श० १३| २| ३| ८ ) इत्यादी यथा विशि यवत्वारोप, राष्ट्रे हरिणत्वारोपस्तेनैव हरिणे भोक्तृत्व विशि भोग्यत्वमुक्तम्, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । नात्रैकस्य राज्ञ शासन निषिद्धं न वा सभासापेक्षत्वविधानम्, तादृशवचनाभावादेव । वस्तुत - 'ऊध्वमिनामुच्छ्रापय गिरी भार हरन्निव । अथास्यै मध्यमेधता शीते वाते पुनन्निवा ॥ ' इत्यस्य ':' ( / / / ), ' ' ( ), ' ( ) मन्त्रस्य व्याख्यानप्रसङ्गे श्री राष्ट्रमश्वमेध शत ० १३ २ ९ २ श्री राष्ट्रस्य भार ३ क्षेमो वै राष्ट्रस्य शीतम् ५ इत्यध्वर्व्वादयो यजमानकुमारीभार्य्यादिभि सोपहासं सवदन्ते, ' अथाध्वर्युं कुमारमभिमेथयति' ( श० १३| ५| २ | ४ ) इति श्रुतेः । एनामूर्ध्वामुच्छ्रापय उच्छ्रिता कुरु इति मन्त्रस्य बाह्योऽर्थः । तत्र गूढ दर्शनमुच्यते ब्राह्मणेन । अपक्रामति वै एतस्मा- द्राष्ट्रात्मिका श्रीः", ऋत्विग्भ्यो दक्षिणादिरूपेण दीयमाना । ते सोपहामसवादवचने श्रियोऽपक्रमण प्रतिसमाधीयते । तत्र श्री राष्ट्रमश्वमेधः । तत्र श्रोः समृद्धिरेव राष्ट्रम् । राज्यश्रिय एवाश्वमेधहेतुत्वात् तस्याश्वमेधरूपत्वमुक्तम् । एनां वावाताम् ऊर्ध्वामुच्छ्रापय उच्छ्रिता कुरु इति बाह्य एवार्थ । आन्तरस्तु अश्वमेधश्रिय कारणं राष्ट्रपेवास्मै यजमानायोच्छा- चाहिये, यह बात भी निर्मूल है, क्योंकि मूल मे इस अर्थ के बोधक पदो का अभाव है । अपनी मनमानी बात का प्रतिपादन करना हो तो व्यक्ति को अलग से ग्रन्थ का निर्माण करना चाहिये । यह उचित नहीं है कि श्रुति का अर्थ करते समय उसने अपने अभिप्राय को गोड न सुने ही गये है । राजधर्म केदिया जाय । राजा ता सब जगह अकेला ही होता है । एक राष्ट्र में अनेक राजा न तो देखे गये हैऔर अनुष्ठान मे राजा का ही अधिकार माना जाता है, दूसरो का नही । यह राजा अकेला ही होता है । मन्त्री प्रभृति अथवा मन्त्री परिषद् केवल परामर्श देने वाले होते हैं, ये राजा नही कहलाते । ऐसा मानना स्पष्ट ही मनु, शुक्र प्रभृति के धर्मग्रन्थो के विपरीत होगा । जहाँ एक राजा होता है, वहाँ वह राष्ट्र के नाम पर प्रजा को खा जाना चाहता है, यह अर्थ भी गलत है, क्योकि मूल मे जहाँ एक राजा है, इस तरह का कोई वाक्य नही है । अकेला राजा प्रजा को खा जाता है, यह अर्थ भी गलत है, क्योकि मूल मे एक शब्द नहीं है । क्योकि अपने सुख के लिये वह प्रजा से उत्तम पदार्थों को छीन लेता है और इस तरह से प्रजा को पीडा पहुँचाता है, यह अर्थ भी गलत है, मन्त्राक्षरो के विपरीत है । ' यद्धरिणो यवमत्ति' इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के वचन का अभिप्राय यह है कि हरिण यब खाता है, यहाँ प्रजा को यव और राष्ट्र को हरिण बताया गया है । हरिण भोक्ता और यव भोग्य है, उसी तरह से यहाँ भी राष्ट्र भोक्ता और प्रजा भोग्य है । इसमें किसी एक राजा के शासन का न तो निषेध किया गया है और न सभा की आवश्यकता ही बताई गई है, क्योकि ऐसा कोई वाक्य यहाँ है नहीं । वास्तव में तो यहाँ 'ऊमिना० ' इस मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग में शतपथ ब्राह्मण में 'श्रीवें राष्ट्रम्' इत्यादि वाक्य पठित है | इनमे अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग का विवरण दिया गया है । ब्राह्मण वाक्य इस वचन के अभिप्राय को प्रकट करते हैं कि ऋत्विजों को दी जाने वाली दक्षिणा के रूप में राज्य का खजाना घटने लगता है । यहां राष्ट्र की समृद्धि हो श्री के नाम से अभिहित है, क्योकि इस राज्य की श्री (लक्ष्मी ) के रहते हो अश्वमेघ आदि यज्ञ किये जा सकते है । इसीलिये इसको अश्वमेध स्वरूप माना गया है । इसका वास्तविक अभिप्राय यह है कि यह अश्वमेध रूपी श्री के कारण हो राष्ट्र और यजमान को उन्नति होती है । 'गिरी भारं हरन्निव मन्त्र

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वेदार्थपारिजात. II पयति, तथा सवदनेनेत्यर्थं । 'गिरी भारं हरन्निव' इत्यस्य मन्त्रभागस्याय बाह्योऽर्थः - यथा कश्चिद् गिरी पर्वते भारं हरन् पर्वतोपरि भारमारोपयन् तमुच्छ्रापयति, तथैनामूर्ध्वा कुरु इति । आन्तरस्त्वयमर्थः - श्री राष्ट्रस्य भारः । तथा च भारोन्नमनकथनेन राष्ट्रम्य श्रियमवास्मै यजमानाय सन्नह्यति । ' अथास्ये मध्यमेधताम्' इत्यस्य मन्त्राशस्यायं बाह्योऽर्थः - यथाऽस्या वावाताया मध्यमेधना वृद्धि यायात् तथा कुरु इति । आन्तरस्तु - श्रीर्वे राष्ट्रस्य मध्य श्रियमेवास्मै मध्यतोऽन्नाद्यं दधाति तथा सोपहाससवदनेन यजमानाय राज्यश्रियमेवान्नाद्या भोग्यत्वेनोपस्थापयति । 'शीते वाते पुनन्निव ' इत्यशस्यायं -यथा शीते वाते वाति पुन पुनर्धान्यवपन कुर्वाण कृषीवलः धान्यपात्र यथा ऊध्वं ----- बाह्योऽर्थ करोति तथैवैतामुच्छ्रापयेति । आन्तरं त्वयं ब्राह्मणं वक्ति -क्षेमो राष्ट्रस्य शीत क्षेममेवास्मै कगति तथा संवदनेनेति । तथा च दयानन्दोक्तरीत्या भारः सभारः शीतं शयनवान्निरुपद्रव सुखमित्यादिकोऽर्थं सर्वथा मन्त्राक्षरविरुद्ध एव । एवमेव - 'यकासको शकुन्तिकाऽहलगिति वञ्चति । आहन्ति गभे पसो निगालीति धारका ॥ ' इत्यप्यश्व- प्रसङ्गीय एव मन्त्र' । तदीयोऽय बाह्योऽर्थः - अध्वर्यु कुमारीमङ्गुल्या गुप्ताङ्गं सकेतयन्नाह - हये ये कुमारि यका या असका असौ शकुन्तिका अल्पपक्षिणीव | आहलगिति शब्दानुकरणम् । हले हले शब्दयन्ती वञ्चति गच्छति चपला योनि । तत्र गभे वर्णविपर्य्ययः, भगे योनौ शकुनिसदृश्या यदा पसो पुस्प्रजनन लिङ्गमाहन्ति आगच्छति, पस इति पसते. स्पृशति- कर्मण । तदाधारका योनि निगलगलीति नितरा गलति वीर्य्यं क्षरति यद्वा गलगलेतिशब्द करोति । गूढार्थस्त्वयमस्य मन्त्रस्य - 'विड् वै शकुन्तिकाऽहलगिति वञ्चतीति विशेो वै राष्ट्राय वञ्चत्याहन्ति । गभे पसो निगलगलीति धारके विड्वे गभो राष्ट्र पसो राष्ट्रमेव विव्याहन्ति । तस्माद्राष्ट्री विश घातुक. । अर्थादत्र मन्त्रे परोक्षया भाषया विडेव शकुन्तिका विड्वै गभः राष्ट्रं पसो राष्ट्रमेव विश्याहन्ति । तस्माद्राष्ट्री राष्ट्रपति विशा घातुक विशा दण्डधरो भवति । यथा -'मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूताना ततो भवति भारत ॥ ' ( गी० १४१३ ) इत्यत्र नहि लौकिक- स्त्रीयोनौ सामान्य पुरुषकर्तृकं गर्भाधानम्, किन्तु महद्ब्रह्म प्रकृतिरेव योनिः त्रिगुणमयत्रिकोणत्वात् । सा च परमात्मपुरुष- प्रतिबिम्बमन्तरा न महदादिक्रमेण प्रपञ्चमुत्पादयितु क्षमते । तस्मात् परमेश्वर: स्वप्रतिबिम्बमयं चैतन्यात्मक तेजस्तत्र के इस द्वितीय चरण का वास्तविक अभिप्राय ' श्रीर्वे राष्ट्रस्य भार:' इस वाक्य से समझाया गया है । यहाँ जो भार की तरह उठाने की बात की गई है, इससे राष्ट्र की लक्ष्मी को इस राजा को उठाकर देने की बात निकलती है । 'श्रीर्वे राष्ट्रस्य मध्यम्' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य में ' अथास्मै मध्यमेघताम्' मन्त्र के इस तृतीय चरण के छिपे अभिप्राय को प्रकट किया गया है कि श्री राष्ट्र का मध्य है । राष्ट्र के मध्य में ही अन्न का भण्डार बनाया जाता है । 'शीते वाते पुनन्निव' इस चतुर्थ चरण का भी अभिप्राय ब्राह्मण में इस तरह से स्पष्ट किया गया है कि यहाँ क्षेम ही राष्ट्र का शोत माना जाता है । इस तरह से यहाँ दयानन्द के द्वारा किया गया भार शब्द का अर्थ संभार और शीत शब्द का अर्थ उपद्रव रहित सुख सर्वथा मन्त्राक्षरों के विपरीत है । इसी तरह से ' यकासको' इत्यादि मन्त्र भी अश्वमेघ से ही सम्बद्ध है । इसका वास्तविक अभिप्राय ब्राह्मण में इस तरह से स्पष्ट किया गया है - यहां प्रजा को पक्षी माना गया है । राष्ट्र के कल्याण के लिये प्रजा को बलिदान करना पडता है । प्रजा को यहां गभ और राष्ट्र को पस कहा गया है । राष्ट्र के लिये ही प्रजा का विनियोग किया जाता है । इसलिये माना जाता है कि राष्ट्र प्रजा का धातुक है । अर्थात् इस मन्त्र में परोक्ष पद्धति से यह बताया गया है कि प्रजा चिडिया की तरह है और प्रजा ही योनि की तरह है । राष्ट्र पस स्थानीय है । राष्ट्र को ही प्रजा में विनियुक्त कर दिया जाता है । इसलिये राष्ट्र का स्वामी प्रजा का कल्याण करने के अभि-प्राय से सदा दण्ड धारण करता है । जैसे कि गीता में बताया गया है—' महद्ब्रह्म अर्थात् प्रकृति ही योनि है, उसमें में गर्भ स्थापित करता हूँ । हे अर्जुन, इसी से सारे प्राणियो की उत्पत्ति होती है ।" यहाँ उस तरह का गर्भाधान नही किया जाता, जैसे कि लौकिक स्त्री की योनि में सामान्य पुरुष करता है, किन्तु यहाँ प्रकृति ही योनि मानी जाती है, क्योंकि वह त्रिगुणात्मक त्रिकोण वाली है । यह प्रकृति परमात्मा के प्रतिबिम्व के बिना महत्तत्त्व आदि के क्रम से इस जागतिक प्रपच का विस्तार नही कर सकती । अतः परमेश्वर अपने प्रति-

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वेदार्थपारिजातः १४७७ 'निःक्षिपति । तेन माधिष्ठाना सचैतन्या प्रकृति प्रपञ्चमुत्पादयति । तथैव प्रकृतेऽपि तज्जन्येनादृष्टेन च यजमानाय राष्ट्रश्रिय उच्छ्रापणम्, भाररूपाया राष्ट्रचिय ऊर्ध्वोन्नहनम्, मध्यरूपाया राष्ट्रश्रियोऽभिवर्धनम्, शीतरूप राष्ट्रममेवास्मै यजमानाय कुर्वन्ति, तथा सोपहाससवदनेनाध्वर्य्यादय । एवमेव शकुन्तिकासदृशे गभरूपे स्त्रीप्रजनने पसरूपपुप्रजननस्य यदागमन- मुक्तम्, तेन तत्र परोक्षभाषया विडेव गभ., राष्ट्रमेव पसो ज्ञातव्यः । राष्ट्रपते प्रजाया. यच्छासकत्वरूप दण्डधरत्वम्, तदेव राष्ट्रस्य प्रजाया गमनरूप सनिवेशो मन्तव्यः । यद्यपि स्त्रीपुरुषयोरुभयोरपि चेतनात्मरूपत्वेन भोक्तृत्वमेव, तथापि स्त्रीदेहस्य प्रकृतिप्राधान्याभिप्रायेण भोग्यत्वम्, पुरुषदेहस्य पुरुषप्राधान्येन भोक्तृत्वम् । कयाचित्तु व्यपेक्षया पुरुषेऽपि भोग्यत्व स्त्रिया च भोक्तृत्वमपि सपद्यते, तथैव यद्यपि चैतन्याभिप्रायेण राजविशोरुभयोरपि भोक्तृत्वमेव, तथापि विशा नियम्यत्वेन भोग्यत्वम् राज्ञश्च नियन्तृत्वेन दण्डधरत्वेन भोक्तृत्व व्यवह्रियते । भोग्यत्वाभिप्रायेण विशि गभत्वारोपः । भोक्तृत्वेन च राष्ट्रपती पसत्वारोप । प्रकृतौ भोग्यत्व पुरुषे च भोक्तृत्वं पर्य्यवरयति । तत एव भोवतु. पसस्य भोग्यरूपे प्रकृतिगभे सनिवेश, सर्वान्तर्य्यामित्वेनैव मुख्यनियन्तृत्वभोक्तृत्वाद्युपपत्ते । वर्णाश्रमधर्मविचार 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्' इति मन्त्रे ब्राह्मणादिवर्णा निरूपिता । यदुक्तम् 'वर्णो वृणाते:' ( नि० २( ३ ), ' ब्रह्म हि ब्राह्मण, क्षत्र हीन्द्र, क्षत्र राजन्य.' ( श ० ५ | ३| १ | १ ), ' बाहू वै मित्रावरुणी । पुरुषो गतं., वीयं वा एतद्राजन्यस्य यद्वाहू | वीय्यं वा एतदपा रसः' ( श० ५०४/३ ), ' दूषवो वै दिद्यव. ' ( श० का ५। ४१४ ) । इत्यादिरीत्या वरणीया वरोतुमर्हा गुणकर्माणि च दृष्ट्वा यथायोग्यं द्रियन्ते ये ते वर्णाः । ब्रह्म हि ब्राह्मण । ब्रह्मणा वेदेन परमेश्वरस्योपासनेन च सह वर्तमानो विद्याद्युत्तम- बिम्ब स्वरूप चैतन्यात्मक तेज का प्रकृति में आधान करता है । इससे अधिष्ठान और चैतन्य बाली प्रकृति प्रपंच को उत्पन्न करती है । इसी तरह से प्रकृत स्थल मे भी इस अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान के द्वारा उत्पन्न अदृष्ट से यजमान के लिये राज्यलक्ष्मी को ऊपर उठाना, भाररूप राज्यलक्ष्मी का ऊपर ले जाना, मध्यरूप राजलक्ष्मी को बढाना और शीत रूप राष्ट्र के कल्याण को इस यजमान के हित मे नियोजित करना है । परोक्ष भाषा मे गभ का अर्थ प्रजा और पस का अर्थ राष्ट्र किया गया है । प्रजा का शासन चलाने के लिये राष्ट्र का अधिपति राजा दण्ड धारण करता है । यही राष्ट्र का प्रजा में अभिगमन रूप कार्य माना जाता है । यद्यपि स्त्री और पुरुष दोनो हो चेतन है, अत एव ये भोक्ता ही माने जायगें, तो भी स्त्री के शरीर को प्रधानत. प्रकृति का प्रतीक मानकर भोग्य तथा पुरुष के शरीर को प्रधानत. पुरुष का प्रतिनिधि मानकर भोक्ता माना जाता है । कुछ अर्थों में पुरुष को भोग्य और स्त्री को भोक्ता भी माना जा सकता है । इसी तरह से यद्यपि चैतन्य स्वभाव को लेकर राजा और प्रजा दोनो भोक्ता ही माने जायँगे, किन्तु प्रजा राजा के द्वारा नियन्त्रित की जाती है, अत भोग्य है । राजा दण्ड धारण कर इनका नियमन करता है, अत भोक्ता कहा जाता है । भोग्य होने से हो प्रजा को गभ और भोक्ता होने से ही राष्ट्र के स्वामी राजा को पस कहा जाता है । इस तरह से प्रकृति मे भोग्यता और पुरुष में भोक्तृत्व अन्तत स्थिर हो जाता है । इसीलिये पस रूप भोक्ता का गम रूप भोग्य मे संनिवेश उचित ही माना जायगा । परम पुरुष परमात्मा सबका अन्तर्यामी है, अत. मुख्य नियन्ता और भोका ईश्वर भी माना जाता है । राजा में औपचारिक ईश्वरत्व का आरोप किया जाता है । वर्णाश्रम धर्म विचार इस प्रकरण को प्रारम्भ करते हुए दयानन्द लिखते है - 'अब वर्णाश्रम विषय लिखा जाता है । इसमे यह विशेष जानना चाहिये कि प्रथम मनुष्य जाति सबकी एक है, सो भी वेदों से सिद्ध है । इस विषय का प्रमाण सृष्टिविषय मे लिख दिया है । 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्' यह मन्त्र सृष्टिविषय में लिख चुके है । वर्णों के प्रतिपादन करने वाले वेद मन्त्रो की जो व्याख्या ब्राह्मण और निरुक्त आदि ग्रन्थों में लिखी है, वह कुछ यहाँ भी लिखते हैं' ( पृ० २६ ९ ) । इसके बाद निरुक्त आदि के वचनो को उद्धृत करके उनकी व्याख्या इस तरह से करते हैं -' मनुष्य जाति के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये वर्ण कहलाते है । वेद की रीति से इनके दो भेद हैं-एक आर्य

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 580 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः १४७८ गुणयुक्तः पुरुषो ब्राह्मणो भवितुमर्हति । तथैव क्षत्र हीन्द्र क्षत्र क्षत्रियकुलम् यः पुरुष इन्द्रः परमेश्वर्य्यवान् शत्रूणा क्षय- करणाद् युद्धोत्सुकत्वाच्च प्रजापालनतत्पर. स राजन्यो भवितुमर्हति । मित्रः सर्वेभ्यः सुखदाता, वरुण उत्तमगुणकर्मधारणेन श्रेष्ठ', इमावेव क्षत्रियस्य द्वौ बाहुवद्भवेताम् | अथवा वीय्यं पराक्रमो बलं चेतदुभय राजन्यस्य बाहू भवत । अपा प्राणाना यो रस आनन्दस्तं प्रजाभ्य प्रपच्छत | क्षत्रियस्य वीय्यं वर्धते तस्य इषवो बाणा. शस्त्राणि दिद्यवः प्रकाशका भवेयु.' ( पृ० २६ ९ ) इति, तदपि तुच्छम् 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासोद् बाहू राजन्य कृतः । ऊरू तदस्य यद्वेश्य पद्भथा शूद्रो अजायत । ' इति मन्त्रेण विराट्पुरुषस्य परमेश्वरस्य मुखाद् ब्राह्मणस्य बाहुभ्या राजन्यस्योरुभ्या वैश्यस्य पद्भ्या शूद्रस्योत्पत्तिवर्णनेन जन्मनैव वर्णोत्पत्तिनिर्धारणात् । वृक्षाणा वृक्षत्वेन रूपेण साम्येऽपि यथा निम्बत्वाश्वत्थत्वादिरूपेण वैषम्यमपि दृश्यते, तथा मनुष्यत्वेन रूपेण मनुष्याणा साम्येऽपि ब्राह्मणत्वक्षत्रियत्वादिरूपेण वैषम्येऽपि बाधाभावात् । न चात्र ज्ञानादिगुणकत्वेन ब्राह्मणस्य प्राधान्याद् ब्राह्मणे विरारूपस्य समाजस्य मुखत्वारोप, बलसम्पन्ने क्षत्रिये विराड्भुजत्वारोप । तत एव ब्राह्मणो मुखमिति मामानाधिकरण्यप्रयोग इति वाच्यम्, पद्भ्यां शूद्रो अजायतेति वाक्यशेषविरोधात् । अत्र कण्ठरवेणैव शूद्रस्य पज्जत्वं बोध्यते । तदनुरोधेन मुखजत्वादेव ब्राह्मणो मुखमिति सामानाधिकरण्यम् । मृदो जातत्वान्मृद्धट इति सामानाधिकरण्यवदिति मन्तव्यम् । तथा च जन्मना वर्णो गुणकर्मादिभिरुत्कर्ष इत्येव सिद्धान्त' । न च वर्णो वृणोतेरिति विरोधः, तत्र वर्णशब्दस्य शुक्लरूपादिपरत्वेन रूपमाश्रय वृणोतीति रूपमेव वर्णपदव्यप- और दूसरा दस्यु | इस विषय में यह प्रमाण है कि 'विजानीह्यार्यान् ये च दस्यवो० ' । अर्थात् इस मन्त्र से परमेश्वर उपदेश करता है कि हे जीव, तू आर्य अर्थात् श्रेष्ठ और दस्यु अर्थात् दुष्ट स्वभाव युक्त डाकू आदि नामो से प्रसिद्ध मनुष्य के ये दो भेद जान ले । तथा 'उत शूद्रे उत आर्ये' इस मन्त्र से भी आर्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अनार्य अर्थात् अनाडी, जो कि शूद्र कहलाते है, ये दो भेद माने गये हैं । तथा 'असुर्या नाम ते लोका० ' इस मन्त्र से भी देव और असुर अर्थात् विद्वान् और मूर्ख ये दो ही भेद माने जाते है । इन्ही दोनो के विरोध को देवासुर संग्राम कहते हैं । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार भेद गुण और कर्मों से किये गये है । इनका नाम वर्णं इसलिये है कि जैसे जिसके गुण और कर्म हों, वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिये । ब्रह्म अर्थात् उत्तम कर्म करने से उत्तम विद्वान् ब्राह्मण वर्ण होता है । परम ऐश्वर्य, बल वीर्य के होने से मनुष्य क्षत्रिय वर्ण होता है, जैसा कि राजधर्म में अभी लिख आये है । मित्र और वरुण अर्थात् सबको सुख देना और उत्तम गुण-कर्म का धारण करना ये दो क्षत्रिय की भुजाएँ है । अथवा वीर्य और बल ये दोनो क्षत्रिय की भुजाएँ है । प्राणों के इस आनन्द ( सुख-सुविधा ) को प्रजा के लिये देने से क्षत्रिय का बल बढता है । उसके बाण अर्थात् शस्त्रास्त्र सदा प्रकाशित होते रहते है, अर्थात् वह सदा शत्रुओ पर विजय प्राप्त करता है' ( पृ० २६ ९ - २७० ), किन्तु यह सारा प्रति-पादन सारहीन है | 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्' इस मन्त्र से यह ज्ञात होता है कि विराट् पुरुष परमेश्वर के मुख से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति होती है । इससे स्पष्ट है कि वर्णव्यवस्था जन्म के आधार पर ही निर्धारित की गई हैं । वृक्ष के रूप मे सभी वृक्ष एक होते हुए भी जैसे निम्ब, अश्वत्य आदि के रूप मे भिन्न भी है, उसी तरह से मनुष्य के रूप मे सब मनुष्य एक होते हुए भी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के रूप में भिन्न भी हों, इसमें क्या बाधा उठ सकती है? यहाँ यह शंका नही उठाई जा सकती कि 'ज्ञान आदि गुणो के आधार पर ब्राह्मण की प्रधानता होने से विराट् रूप समाज का मुख उसको माना जाता है और बल- वीर्य से सम्पन्न क्षत्रिय में विराट्र की भुजा का आरोप किया जाता है । इसीलिये ब्राह्मण का और मुख का यहाँ सामानाधिकरण्य माना गया है ।' क्योकि ऐसा मानने पर 'पैरो से शूद्र उत्पन्न हुआ' इस चतुर्थ चरण के अर्थ से विरोध पड जायगा । इस विरोध के परिहार के लिये यह मानना पड़ेगा कि ब्राह्मण आदि की भी उत्पत्ति उन उन अंगो से मानी जाय । सामानाधिकरण्य की संगति तो इस तरह से भी बन सकती है कि मुख से उत्पन्न होने से ही ब्राह्मण को विराट् का मुख माना जाता है, जैसे कि मिट्टी से उत्पन्न होने के कारण 'मृद्धट:' यहाँ पर सामानाधिकरण्य का प्रयोग बनता है । इस तरह से पूरे प्रकरण पर विचार करने के उपरान्त यही निष्कर्ष निकलता है कि वर्णव्यवस्था जन्म के आधार पर ही स्थिर है, गुण-कर्म आदि के आधार पर उसमे उत्कर्ष होता है । 'वर्णो वृणोतेः' इस निरुक्त वचन से इस निष्कर्ष का कोई विरोध भी नही है, क्योंकि वहां वर्ण शब्द शुक्ल आदि रूपों के अर्थ में प्रयुक्त है, रूप को ही आश्रय अर्थात् द्रव्य की आवश्यकता पड़ती है । अतः यहाँ रूप गुण ही वर्ण पद से बोधित होगा । निरुक्त