वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 621–630

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 621 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १५१ ९ दृश्यन्ते । अत्र मनुष्याः सम्बोधनीयाः । ऊर्जं वहन्तीरप आदीन्निवेद्य प्रसन्नान् कुर्याद् इति कस्य शब्दस्यार्थः? वस्तुतस्तु अब्देवत्या विराट्, तस्मादाप एवात्र सम्बोध्या । ' आयन्तु' इत्यादयश्चतत्र ऋचोऽग्निष्वात्ताना पितॄणाम् । नोऽस्माक पितरो देवयानैर्मार्गेरायन्तु आगच्छन्तु । देवेसह यन्ति पितरो येषु ते देवयाना मार्गास्तैः । कीदृशा पितर? सोम्यास सोमपानार्हा, अग्निष्वात्ता अग्निना स्वात्ताः स्वादिताः, अग्निर्यान् दहन् स्वादयति । श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठायिना येषा पुत्रादिभिरेतत्कर्मानुष्ठीयते । ' पुत्रेण लोकान् जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम्॥' किञ्च पितर आगत्यास्मिन् यज्ञे स्वधयानेन मदन्त . तृप्यन्तस्तुष्टाःसन्तो नोऽस्मानधिनोऽस्मानधिब्रुवन्तुब्रुवन्तु अधिकान् वदन्तु । तद्वाक्यात्तथैवाधिका स्यामेत्यर्थः । ते पितरोऽस्मानवन्तुः पालयन्तु ।' 'द्वे सृती अशृण्वं पितॄणामह देवानामुत मर्त्याना ताभ्यामिद " ( वा० स ० १ ९।४७ ) । ' अन्वारब्धेषु पयो जुहोति द्वे सृती इति' ( का० श्री सू० १ ९/ ३/ २५ ) । ऋत्विग्यजमानेषु कृतान्वारम्भेषु अध्वर्यु. पयो जुहोति । नहि जीवतां पितॄणां सन्तोषाय पयोहोमविधानं युक्त स्यात् । मन्त्रार्थस्तु — मर्त्याना मरणधर्मिणा द्वे सृती द्वो मार्गों अहमशृण्वन् श्रुत- वानस्मि श्रुतिभ्य: ' स एव देवयानो वा पितृयाणो वा पन्थाः' इति श्रुतेः । देवाना मार्ग एक, उतापि पितृमार्गश्चान्यः । पितर मातरं 'द्यौः पिता पृथिवी माता, असो वा पितेय माता' ( श० १२२८| १| २१ ) | पितर मातर चान्तरा भूलोक- द्युलोकयोर्मध्ये तदेजत्कम्पमान विश्व सर्वमिद ताभ्या सृतिभ्या समेति सङ्गच्छते ताभ्या सृतिभ्या सुहुतमस्तु । अनेन मर्त्येभ्यो भिन्नाना देवाना पितॄणा च विशिष्टौ द्वौ मार्गों उत्तरायणदक्षिणायननाम्ना प्रसिद्धी । वास्तव में बिराट् छन्द में निबद्ध इस मन्त्र का देवता जल है, अत जल को ही यहाँ सबोधित किया जाना उचित माना जायगा, मनुष्यो को नही । ' आयन्तु' इत्यादि चार ऋचाएँ अग्निष्वात्त नाम के पितृगणों को संबोधित है । हमारे पितृगण देवयान नामक मार्ग से आवें । पितृगण जिस मार्ग पर देवताओ के साथ जाते है, वह मार्ग देवयान कहलाते है । ये हमारे पितृगण सोमपान करने योग्य हैं अग्नि इनका स्वाद लेता है, अर्थात् मृत्यु के उपरान्त जब इनके पार्थिव शरीर को जला दिया जाता है, ये हमारे पितृगण अग्निष्वात्त अर्थात् अग्नि के द्वारा भलीभांति खाये गये कहलाते है । ये अग्निष्वात्त पितृगण उनके होते है, जिनके पुत्र -पौत्र आदि श्रोत और स्मार्त कर्मों का विधिवत् अनुष्ठान करते रहते है ॥ जैसा कि कहा गया है - "यह अग्निष्वात्त पुरुष पुत्र के सत्कर्मो मे सभी लोको को जीतता है, पौत्र के सत्कर्म से आनन्त्य ( अमृतत्व ) को प्राप्त होता है और प्रपौत्र के सत्कर्म से सूर्यलोक में प्रविष्ट हो जाता है । ये पितृगण हमारे इस यज्ञ में आकर हमारे द्वारा स्वधाकार के साथ दिये गये अन्न से तृप्त होकर हमारे लिये आशीर्वाद दें कि हमारे यहाँ सब प्रकार की सुख-सम्पत्ति बढे । इनके आशीर्वचनो से हमारे यहाँ सब कुछ ऐश्वर्य बढ जाय । इस तरह से ये पितृगण हमारा पालन करें । 'द्वे सूती०' इत्यादि मन्त्र इसी से सम्बद्ध है । कात्यायन श्रौतसूत्र में इसका विनियोग बताया गया है कि इस मन्त्र से अध्वर्यु तब दुग्ध का होम करता है, जब कि ऋत्विक् और यजमान अम्वारम्भ करने लगते है । जीवित पितृगणों के सन्तोष के लिये दुग्ध के होम की कोई आवश्यकता नही रहती । इस मन्त्र का अर्थ यह है - मरणशील मनुष्यों की दो प्रकार गति होती है, ऐसा मैने श्रुतिवचनो में सुना है । इनके नाम वहाँ पर देवयान और पितृयाण बताये गये है । एक देवताओं का मार्ग है, दूसरा पितरो का । 'आकाश पिता और पृथिवी माता है' ऐसा श्रुतियो मे प्रतिपादित है । इन पिता और माता के, द्युलोक और पृथिवीलोक के बीच में यह सारी सृष्टि निरन्तर इन्ही दो मार्गों से होकर गुजरती रहती है । इन दोनों मार्गों के लिये भी हम यह शोभन आहुति प्रदान करते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्यों से भिन्न देवताओं और पितरों के दो विशिष्ट मार्ग है, जो कि उत्तरायण और दक्षिणायन के नाम से जाने जाते हैं ।1

पृष्ठ 622

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 622 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १५२० ' ' - यत्तु आयन्तु इत्यस्य व्याख्यायामुक्तम् ये सोम्यासः सोमगुणाः शान्ताः सोमवल्ल्यादिरसनिष्पादने चतुरा अग्निष्वात्ता अग्निः परमेश्वरोऽभ्युदयाय सुष्ठुतयाऽतो गृहीतो यैस्ते अग्निष्वात्ताः । तथा होमकरणार्थं शिल्प- विद्यासिद्धये च भौतिकोऽग्निरातो गृहीतो यैस्ते पितरो विज्ञानवन्तः पालकाः सन्ति । आयन्तु नः तेऽस्मत्समीप- मागच्छन्तु । वय च तत्सामीप्यं नित्यं गच्छेम । पथिभिस्तान् विद्वन्मार्गैर्दृष्टिपथमागतान् दृष्ट्वाऽभ्युत्थाय हे पितरो भवन्त आयन्तु इत्युक्त्वा आसनादिकं निवेद्य नित्यं सत्कुर्याम । | हे पितरोऽस्मिन् सत्काररूपे यज्ञे स्वधयाऽमृतरूपया सेवया मदन्तो हर्षन्तोऽस्मान् रक्षितारः सन्त• सत्यविद्यामधिब्रुवन्तु उपदिशन्तु' ( पृ० २ ९२ ) इति, तत्तु सर्वथा कपोलकल्पितं प्रमाणविरुद्धमेव, अनुपपत्तेः । तथाहि —- तद्दृष्ट्यास्मिन् मन्त्रे वैज्ञानिका एव पितर उक्ताः । पूर्वं तु पितृपिता-महादय एव पितरः, ते च सोम्यासः सोमवल्ल्यादिरमनिष्पादनचतुराः । अस्य सम्बोधनस्य प्रकृते कि प्रयोजनम् इति पदकृत्यं वक्तव्यमासीत् । अग्निपदेनैव प्रकृते परमेश्वरः किमर्थमुक्तः, तस्यापरिच्छिन्नत्वात् कथमादानं सम्भवति? तस्य सौष्ठवं च कीदृक्? पथिदेवमार्गस्त्वद्दृष्ट्या कः कीदृश:? नहि विदुषामविदुषा मार्गभेद: सामाजिके. स्वसस्थास्वपि कल्पितः । दृष्टिपथमागतानिति कस्य शब्दस्य कथमर्थ.? दृष्ट्वाऽभ्युत्थाय भवन्त आयन्तु इत्युक्त्वाऽऽसनादिकं निवेद्येत्यादिकं शाब्दन्याये स्वैरचारित्वमेव व्यञ्जितम् । यज्ञशब्दस्य प्रसिद्धार्थमपहाय सत्कारार्थंकल्पनमपि निर्मूलमेव, तावतापि जीवता पितृपितामहादीनां पितृत्वं न सिद्ध्यति । सिद्धान्तानुसारी त्वर्थं उक्त एव । ' अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम् । अमी मदन्त पितरो यथाभाग मावृषायिषत ||' ( वा० स ० २।३१ ), 'नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शोषाय, नमो व पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधाये, नमो वः ' आयन्तु' इत्यादि मन्त्र की दयानन्द ने यह व्याख्या की है- 'हे परमेश्वर, आपके अनुग्रह से जो शान्त स्वभाव और सबको सुख देनेवाले विद्वान् लोग अग्नि नाम परमेश्वर और रूप गुणवाले भौतिक अग्नि की अलग अलग करनेवाली विद्युद् रूप विद्या को यथावत् जानने वाले है, वे इस विद्या और सेवा यज्ञ मे अपनी शिक्षा विद्या के ज्ञान और प्रकाश से अत्यन्त हर्षित होकर हमारी सदा रक्षा करें । तथा उन विद्यार्थियों और सेवको के लिये भी ईश्वर की आज्ञा है कि जब जब वे आयें", तब तब उनको उत्थान, नमस्कार और प्रियवचन आदि से संतुष्ट रखें । वे लोग भी अपने सत्य भाषण से निर्वैरता और अनुग्रह आदि सद्गुणो से युक्त होकर अन्य मनुष्यों को उसी मार्ग से चलायें और आप भी दृढता के साथ उसी मे चलें । ऐसे सब लोग छल और लोभ आदि से रहित होकर परोपकार के लिये अपना सत्य व्यवहार रखें । उक्त भेद से विद्वानो के दो मार्ग होते है - एक देवयान और पितृयान । अर्थात् जो विद्यामार्ग है, वह देवयान और जो कर्मोपासना मार्ग है, वह पितृयान कहलाता है । सब लोग इन दोनो प्रकार के पुरुषार्थ को सदा करते रहे ' (पृ० २ ९ ३ ), किन्तु यह अर्थ सर्वथा उनकी कल्पना पर आधृत है और प्रमाण के विरुद्ध है, क्योकि हमारे तर्कों के आगे यह टिक नहीं पाता । दयानन्द के अनुसार इस मन्त्र मे वैज्ञानिको को ही पितृगण माना गया है । पहले पिता, पितामह आदि को पितर कहा गया था और यह भी बताया गया था कि वे सोमलता का रस निकालने मे प्रवीण हैं । अब इस मन्त्र मे वैज्ञानिको को पितृनाम से संबोधित करने का अभिप्राय क्या है, इस बात को दयानन्द को पदकृत्य (पदो के विश्लेषण) के द्वारा स्पष्ट करना चाहिये था । प्रस्तुत मन्त्र में परमेश्वर को 'अग्नि' पद से ही क्यो संबोधित किया गया? वह तो अपरिच्छिन्न हैं, उसका आदान ( ग्रहण) कैसे किया जा सकता है? उसकी अच्छाई का क्या तात्पर्य है? सामान्य मार्ग में और देवमार्ग या पितृमार्ग में आप क्या फरक मानते है? आर्यसमाजी विद्वान् और मूर्ख लोगो के लिये अलग-अलग मार्ग अपने संस्थाओं मे बनाते देखे नही गये है । ' देखने मे आये' यह अर्थ किस पद का है? यज्ञ शब्द के भी प्रसिद्ध अर्थ को छोडकर 'सत्कार' अर्थ करना निराधार है । इतना सब कर लेने के बाद भी जीवित पिता, पितामह आदि के लिये पितर शब्द का प्रयोग कही भी नही देखा गया है । अतः इन मन्त्रों का हमारा बताया गया परम्परागत अर्थ ही सही माना जायगा । इसी विषय के प्रसंग मे आपने ' अत्र पितरों' इत्यादि मन्त्रों को उद्धृत किया है, किन्तु ये भी आपके अभीष्ट मत के साधक नहीं है, क्योंकि ' अग्नये कव्यवाहनाय इत्यादि पिण्ड पितृयज्ञ के मन्त्रो का प्रसंग प्रस्तुत है । कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार

पृष्ठ 623

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 623 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १५२१ पितरो घोराय, नमो वः पितरो मन्यवे । नमो वः पितर. पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतोवः पितरो देष्मैन्द्वः पितरो वासः || ' ( वा० स० २।३२ ), 'आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् । यथेह पुरुषाऽसत् | ' ( वा० स० २।३३ ) । इमे त्वदुद्धृता मन्त्रा अपि न त्वदभीष्टसाधका । यतो हि-' अग्नये कव्यवाहनाय' इत्यादिभि. पिण्डपितृयज्ञमन्त्राः कृता । अत्र पितर इत्युक्त्वोदड्डास्त आतननादावृत्त्यामीमदन्तेति जपति' ( का० श्री० सू० ४११/ १३-१४ । 1 इति कात्यायनवचन नुसारेण आतमनात् श्वासनिरोधेन ग्लानिपर्यन्तमुदङ्मुख आस्ते ॥ आवृत्याऽमीमदन्नेतिआवृत्या मीमदन्नेति जपतात मन्त्रार्थम् -हे पितर, यूयमत्रा- स्मिन् यज्ञे मादयध्व हृष्टा भवत: ततो हविषि यथाभाग स्व स्व भागमनतिक्रम्य आवृषायध्व समन्ताद् वृषभवदाचरत । यथा वृष स्वाभीष्ट घाम प्राप्य तृप्तिपर्यन्त तत्स्वीकरोति तद्वत् स्वीकुरुत । यान् पितॄन प्रति मादयध्वमित्युक्तम्, तेऽमीमदन्त हृष्टा यथाभागमा वृषायिषत स्वस्वभागानुसारेण वृषवत् स्वाभीष्टं प्राप्य स्वीचकु । अत्र सभाया पाठशालायामित्यर्थस्तु निर्मूल: । पूर्वार्थस्तु पिण्डपितृयज्ञप्रकरणानुसारीति विशेषः । यथाभागमित्यस्यापि विद्यारूप भागमिति प्रकरणविरुद्ध एवार्थ' । आवृषायध्वमित्यस्य विद्वत्स्वीकृत्येत्यपि निर्मूलमस्पष्ट च । हिन्दीभाषाव्याख्याने तु न किञ्चिदप्यस्यार्थो लिखित. ॥ 'नमो व इत्यञ्जलि करोतीति' ( का० श्री० सू० ४| १ | १५ ), षट्कृत्वो नमस्करोति षड्वा ऋतव पितरः इति श्रुतेः । रसादिशब्देन वसन्तादय ऋतव उच्यन्ते ॥ हे पितर, वो युष्माकं सम्बन्धिने रसाय रसात्मकाय वसन्ताय नमः । वसन्ते मध्वादिरसाना सम्भवात् । शोषाय शुष्यन्त्योषधयो यत्र स ग्रीष्मस्तद्रूपाय नमः । जीवाय जीवनहेतवे जलमयाय वर्षर्तवे नमः । स्वधायै शरदे, 'स्वधा वै पितॄणामन्नम्' इति श्रुतेः, शर्राद ब्रीह्याद्यन्नाना सम्भवाच्च ॥ घोराय विषमाय हेमन्ताय नमः, शीतप्रचुरत्वेन दुःखदत्वात् । मन्यवे क्रोधरूपाय शिशिराय, नर्वौषधिदाहजनकत्वात् । हे पितरः, एवंविधऋतुरूपेभ्यो वो युष्मभ्यं नमः, वो नम इत्यभ्यास आदरार्थ । हे पितरः, नोsस्मभ्य गृहान् दत्त । भार्यापुत्रपौत्रा- उतराभिमुख होकर श्वास को सरलता से जब तक रोका जा सके, तब तक इस मन्त्र का जप करने का विधान है । मन्त्र का अर्थ यह है—हे पितृगण, आप लोग इस यज्ञ में आकर प्रसन्न होइये और यहाँ दी जा रही हवि का अपना अपना भाग लेकर आप लोग बैल की तरह आचरण कीजिये, जैसे बैल अपने मन का घास पाकर पेट भर जाने तक उसकी जुगाली करता रहता है, वैसे ही तृप्ति पर्यन्त आप अपने भाग को स्वीकार कीजिये । मन्त्र के द्वितीय चरण में बताया गया है कि जिन पितृगणों को उनका भाग अर्पित किया गया था, वे उसको प्राप्त कर प्रसन्न हुए है और तृप्ति पर्यन्त उन्होंने अपने भाग को स्वीकार कर लिया है । यहाँ पर सभा या पाठशाला का अर्थ करना बिना प्रमाण का है । हमारा किया गया अर्थ पिण्डपितृयज्ञ प्रकरण के अनुकूल है । यथाभाग का अर्थ विद्यारूप भाग करना भी प्रकरण के विरुद्ध है । 'आवृषायध्वम्' इस पद का अर्थ 'विद्वानो की तरह स्वीकार कर' करना निराधार एवं अस्पष्ट भी है । हिन्दी भाषा की व्याख्या तो अपने मूल संस्कृत के भी विपरीत है । 'नमो व ' इत्यादि द्वितीय मन्त्र का विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र मे नमस्कार के लिये किया गया है । श्रुति का कहना है कि छ ऋतुएं भी पितर कहलाती है, अत उन पितृगणो को छ बार नमस्कार किया जाता है । रस प्रभृति मन्त्र गत शब्दों से इन छः वसन्त आदि ऋतुओ का हो ग्रहण किया जाता है । है पितृगण, हम आपसे संबद्ध रक्षात्मक बसन्त ऋतु को नमस्कार करते बसन्त ऋतु मे मधु आदि रसों की सृष्टि होती है, अत वसन्त को रसात्मक कहा गया है । शोष अर्थात् ओषधियो को सुखा देने वाले, पका देने वाले आप लोगो के ग्रीष्म स्वरूप को हम नमस्कार करते हैं । जीवन हेतु जलमय वर्षा ऋतु के लिये हम नमस्कार करते है । स्वधा स्वरूप शरद् ऋतु को हम नमस्कार करते है । पितरों के अन्त का नाम स्वधा है । शरद् ऋतु में व्रीहि आदि की उत्पत्ति भी होती है । घोर भयानक हेमन्त ऋतु को हमारा नमस्कार है । इस ऋतु में शीत अधिक पडने से यह दुःखप्रद हो जाता है । मन्यु अर्थात् क्रोधस्वरूप शिशिर ऋतु को हम नमस्कार करते हैं । इस ऋतु मे सारी औषधियो को पाला मार जाता है, अत इसको क्रोष स्वरूप कहा गया है । हे पितृगण, इस तरह से सब ऋतुओं के रूप में विद्यमान आप लोगों को हम नमस्कार करते है । आदर प्रदर्शित करने के लिये नमः पद की दो बार आवृत्ति की गई है । हे पितृगण, आप लोग हमें रहने के लिये घर दीजिये । यहाँ भार्या, पुत्र, पौत्र, १ ९ १

पृष्ठ 624

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 624 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १५२२ दयो गृहा । हे पितर, वो युष्मभ्यं यथा नो गृहे सतो विद्यमानान् पदार्थान् वो युष्मभ्य दद्मः । सतो विद्यमानाद्वादद्यो ददामः । ददतामस्माकं कदाचिद् द्रव्यक्षयो मा भूदित्यर्थः । 'एतद्व इत्युयास्यति सूत्राणि प्रति पिण्डमूर्णा दशां वावयस्युत्तरे यजमानलोमानि वेति' ( का० श्री० सू० ४ ७ १६-१८ ) । हे पितरो युष्मभ्यमेतद्वास. सूत्रमेव परिधानमस्तु ' | ' ' ( ) आधत्तेति मध्यमं पिण्डं पत्नी प्राश्नाति पुत्रकामेति का० ० सू० ४ १ । २२ । हे पितरः यथेहास्मिन्नृतो पुरुष: असत् पुरुषो देवपितृमनुष्याणामपेक्षितस्यार्थस्य पूरयिता भूयात्, तथा कुमारं गर्भं पुत्ररूप गर्भं यूयमाधत्त सम्पादयत । कीदृशं कुमारं पुष्करस्रजम् । येन प्रकारेण पुष्करणा पद्माना स्रग माला ययोस्ती अश्विनी अश्विनीकुमारी तत्तुल्यम् । कुमारं रोगहीनं सुन्दर कुमारं पुत्रमाधत्तेत्यर्थ । --',, यदुक्तम् हे पितरः रमाय सोमलतादिरसविज्ञानानन्दग्रहणाय शोषायाग्निवायुविद्याप्राप्तये जीवनार्थं जीविकाविद्याप्राप्तये मोक्षविद्याप्राप्तये, आपत्कालनिवारणाय सर्वविद्याप्राप्तये च' ( पृ० २९ ३ २९४ ) इत्यादिकम् तत्तु निर्मूलमेव, तत्तत्पदाना तदर्थकत्वे मानाभावात् । सिद्धान्तानुसारिव्याख्यानं तु श्रुतिप्रमाणसिद्धमेव । ' घोराय मन्यवे ' इत्यादिभिस्तत्तदृतु रूपेभ्य पितृभ्यो नमस्कारस्तु सम्भवति, परन्तु मन्योर्घोरस्य च प्राप्त्यर्थं नमनं न सम्भवति । —', यच्चोक्तम् हे पितरः यूय मनुष्येषु विद्यागर्भमाधत्त धारयत तथा विद्यादानार्थं पुष्करस्रज पुष्पमाला- धारिणं कुमारं ब्रह्मचारिणं यूय धारयत येन प्रकारेणेहास्मिन् संसारे विद्यासुशिक्षायुक्त. पुरुषोऽसत् । येन च मनुष्ये- प्रभृति पदार्थ गृह शब्द से कहे गये हैं । हे पितृगण, हमलोग अपने घर मे विद्यमान पदार्थो को आप लोगों के लिये भेंट करते है, तो आप लोग ऐसा करे कि हमारे ये पदार्थ कभी घटें नही और हम निरन्तर इसी तरह से आप लोगो की पूजा आदि करते रहे । इस आगे के मन्त्र खण्ड से पितरो को ऊन का गुच्छा भेंट किया जाता है कि हे पितृगण, इस ऊर्णखण्ड को, ऊन के सूत्र को, आप अपने पहनने के वस्त्र के रूप में स्वीकार कीजिये । 'आषत्त' इत्यादि तृतीय मन्त्र का विनियोग कात्यायन ने बताया है कि पिण्डदान आदि कर चुकने के बाद इस मन्त्र का उच्चारण उस समय किया जाता है, जब कि यजमान की पत्नी उन पिण्डो मे से बीच के पिण्ड को नैवेद्य के रूप में स्वीकार करती है । मन्त्र का अर्थ यह है-हे पितृगण, इस प्रस्तुत ऋतुकाल मे देव, पितृ और मनुष्यों के अपेक्षित प्रयोजन को पूरा करने वाला पुरुष पैदा हो, इसके लिये आप लोग कुमार ( बालक ) के रूप में इस यजमान पत्नी मे गर्भ का सपादन कीजिये । यह कुमार अश्विनीकुमारों की तरह सुन्दर हो, अश्विनीकुमार पुष्कर अर्थात् कमल पुष्पो की माला धारण किये रहते है, इसी तरह यह कुमार भी कमल पुष्प की तरह सुकोमल, सुन्दर हो और साथ हो सब तरह के रोगों से मुक्त हो । इस यजमान पत्नी के गर्भ में इस तरह के बालक की उत्पत्ति का आशीर्वाद आप लोग दीजिये । स्वामी दयानन्द ने ' नमो वः' इत्यादि का अर्थ यह किया है---'हे पितर लोगों, हम लोग आपको नमस्कार करते हैं कि आपके द्वारा हमको रस अर्थात् विद्यानन्द, औषधि और जलविद्या का यथावत् ज्ञान हो । तथा शोष अर्थात् अग्नि और वायु की विद्या, जिससे कि ओषधि और जल सूख जाते हैं, उसके बोध के लिये भी हम आपको नमस्कार करते है । हे पितर लोगों, आपकी सत्य शिक्षा से हम लोग प्रमादरहित और जितेन्द्रिय होकर पूर्ण आयु भोगे, इसलिये हम आपको नमस्कार करते है । हे विद्वान् लोगों, अमृत रूप Hafar की प्राप्ति के लिये हम आपको नमस्कार करते है । हे पितरों, घोर विपत् अर्थात् आपत्काल में निर्वाह करने की विद्याओं को जानने की इच्छा से दुःखों के पार उतरने के लियेहम लोग आपकी सेवा करते है ॥ हे पितरों, दुष्ट जीव और दुष्ट कर्मों पर नित्य अप्रोति करने की विद्या सीखने के लिये हम आपको नमस्कार करते हैं " ( पृ० २ ९ ४ ) । किन्तु यह सारा अर्थ निराधार है शब्दों का आपका किया अर्थ सही नही है, इसमे मनमानी के सिवाय कोई शास्त्रीय प्रमाण नही है, हमारा किया हुआ अर्थ, उनतो श्रुतिउन प्रमाण के आधार पर है । ' ' ', ' आधत्त पितरो ० इत्यादि का अर्थ यह किया गया है- है विद्या के देने वाले पितर लोगों इस, मनुष्य शोभा को प्राप्तकी गर्भ के समान रक्षा करके उत्तम विद्या दीजिये कि जिससे वह विद्वान् होकर जैसे पुष्पों की माला धारण कर कुमार ब्रह्मचारी

पृष्ठ 625

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 625 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात १५२३ षूत्तमविद्योन्नतिर्भवेत् तथैव प्रयतध्वम्' ( पृ० २ ९ ४ ) इति, तदपि निर्मूलम् अक्षरबाह्यत्वात् । युष्मद्रीत्या पितरः पितृ- पितामहादयो भवन्ति, ते चाविद्वासोऽपि भवन्ति । तथा च ते विद्यागभं कथ धारयितुं समर्था भविष्यन्ति? किञ्च, गर्भ कुमारमिति समानविभक्तिकत्वेन सामानाधिकरण्यम् । तथा च यदि गर्भपदस्य विद्यागर्भोऽर्थस्तदा तस्य कुमारपदेन कथ सम्बन्धः? कथञ्चित् कुमारपदस्य ब्रह्मचारिपरत्वेऽभ्युपगम्यमानेऽपि पुष्करस्रजमिति विशेषण कथ योक्ष्यते? ब्रह्मचारिण: स्रगादिधारणनिषेधात् । तस्माद्यत्किञ्चिदेतत् । 'ये समानाः समनसो जीवा जीवेषु मामकाः । तेषा श्रोर्मयि कल्पतामस्मिल्लाके शत सम्म ॥ ' ( य ० १ ९/ ४६ ) । 'उत्तरे यज्ञोपवीत्युत्तग्या' ( का० श्री० सू० १ ९| ३ | २४ ) | पारम्पय्र्येण शास्त्रेण च देव्ये कर्मणि सव्ये पित्र्य कर्मण्यप- सव्ये यज्ञोपवीतधारण भवति । यदि लौकिकाः पितृपितामहादय एव पितरस्तदा तथा यज्ञोपवीतधारणस्य कि प्रयोजनं स्यात्? सूत्रार्थस्तु -उत्तरे उत्तरवेद्याहवनीये कृनसव्यो यजमान उत्तरयाग्रिमया ऋचाऽऽज्य जुहोति । मन्त्रार्थस्तु - जोवन्तीति 1 जीवास्तेषु प्राणिषु मध्ये ये समानाः समनस समनस्का मामका मदीया. प्राणिनः समनस्का. सपिण्डा अस्मिल्लांके भूलोके शत समाः शतवर्षपर्यन्तं तेषा मामकाना जीवाना श्रीमयि कल्पता त्यक्त्वा तान् मयि क्लृप्ता भवतु मामाश्रयता- मित्यर्थः । गोत्रिणो हि पापात्मानः सहजा शत्रवोऽत एव प्रार्थ्यते । यत्तु 'जीवा विद्यमानजीवना. ' इति, तन्न, तथात्वे जीवेष्वित्यत्रापि तथैव वक्तव्यत्वापत्तेः । यत्तु समनस इति ' धमेश्वर सर्वमनुष्यहितकरणैकनिष्ठा. ' इति, तदपि निर्मूलम्, तत्र तादृशशक्त्यभावात् ॥ कर्मानुसारेण पूर्वजा गोत्रिणः केचिदमनस्का अपि भवन्ति । तान् व्यावर्तयितुं समनस्का इति विशे- षण युक्तम् । एवं जीवेषूपदेश्येषु शिष्येषु ' सत्यविद्यादानार्थं छलादिदोषराहित्येन वर्तमाना विद्वास:, तेषा या श्री. सत्य- करता है, वैसे ही यह भी विद्या पाकर सुन्दरता युक्त होवे । जिस प्रकार इस संसार में मनुष्यो की विद्या आदि सद्गुणो से उत्तम कोति और सब मनुष्यो को सुख प्राप्त हो वैसा ही प्रयत्न सब लोग सदा कीजिये । यह ईश्वर की आज्ञा विद्वानो के प्रति है । इसलिये मनुष्यों को उचित है कि इसका पालन सदा करते रहे' ( पृ० २ ९ ५ ), किन्तु यह कथन भी निराधार है, क्योंकि मूल मन्त्र के अक्षरो से इसका कोई सम्बन्ध नही है । आपके मत से पिता, पितामह प्रभृति पितर कहलाते हैं । ये तो विद्वान् हो हो, ऐसा जरूरी नहीं है । वे विद्यागर्भ को धारण करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं । अपि च, गर्भ और कुमार की एक ही विभक्ति होने से इनका अधिकरण एक ही है, अब यदि गर्भ पद का अर्थ विद्यागर्भ किया जाय तो उसका कुमार पद से सम्बन्ध कैसे होगा? किसी तरह से कुमार पद का अर्थ ब्रह्मचारी कर भी दिया जाय तो उसका पुष्करस्रज विशेषण से सम्बन्ध कैसे होगा, ब्रह्मचारी को तो माला आदि का धारण करना निषिद्ध है । 'ये समाना ' इत्यादि मन्त्र का विनियोग भी कात्यायन श्रौतसूत्र मे दिया गया है । परम्परा और शास्त्रवचन के अनुसार देव संबन्धी कार्यो में सभ्य और पितृसंबन्धी कार्यों मे अपसव्य यज्ञोपवीत धारण की जाती हैं । यदि लौकिक पिता, पितामह आदि ही पितर हैं, तो यज्ञोपवीत की इन विविध धारण विधियो का क्या उपयोग है? उक्त विनियोगबोधक कात्यायन सूत्र का अर्थ यह है कि उत्तरवेदि आहवनीय मे सव्य यज्ञोपवीत धारण कर यजमान आगे के मन्त्र से घृत की आहुति देता है । मन्त्र का अर्थ यह है --प्राणियो के बीच में जो हमारे मन का अनुवर्तन करने वाले अपने सगे-सम्बन्धी, सगोत्र जीव है, इस भूलोक में सौ वर्ष तक उनकी सद्भावना, समृद्धि मेरे पास आ जाय । सगे-सम्बन्धी, सगोत्र प्राणी साधारणतया महज स्वाभाविक रूप से शत्रु हुआ करते हैं, अत: इस तरह की प्रार्थना की जाती है । दयानन्द ने जीवपद का अर्थ 'विद्यमान जीवनवाले' किया है, जो कि गलत है । ऐसा करने पर 'जीवेषु' पद का भी वही अर्थ करना पडेगा । इसी तरह से दयानन्द ने 'समनसः' पद का अर्थ ' धर्म, ईश्वर और सर्व-हित करने में उद्यत' (पु ० २ ९ ६) किया है, यह भी निराधार है, इस शब्द का यह अर्थ हो ही नहीं सकता । कर्म के अनुसार अपने सगोत्र पूर्वज अपने विपरीत स्वभाव के भी होते हैं, उनका निवारण करने के लिये यहाँ 'समनसः' यह जीवात्मा का विशेषण दिया गया गया है । इसी तरह से 'उपदेश करने योग्य शिष्यों में सर्वविद्यादान के लिये छल-कपट आदि दोषों से रहित होकर प्रीति करने वाले

पृष्ठ 626

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 626 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५२४ वेदार्थपारिजातः विद्यादिगुणाढ्या शोभा सामयिकी लक्ष्मीः शतवर्पपर्य्यन्तं कल्पता स्थिरा भवतु, यतो वयं नित्यं सुखिनः स्याम' ( पृ० २ ९ ५ ), इत्यपि निर्मूल्म्, जोबेष्विति गब्दे तथार्थबोधक शक्त्यसंभवात् । तथाविधेषु जीवेषु शिष्येषु सत्यविद्यादानाय छलादिराहित्येन वर्तमाना ये विद्वास इत्यस्याशस्य किमूलमिति वक्तुमशक्यम् । स्वतन्त्रव्याख्यानमन्यत्, वेदव्याख्यानेन तु वेदानुसारिणैव भाव्यम् । ' मयि' इत्यंगम्य तु व्याख्यानमेव न कृतम् । तस्मात्पूर्वोक्त एवार्थ इति नानेन जीवता पितृ- पितामहादीना श्रद्धया सेवादिकमेव श्राद्ध पदाभिधेयस् । नहीदानी पित्रादिसेवाकर्तृषु श्राद्धकारित्वमुच्यते ।

उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितर. सोम्यासः ।

असु य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥

अङ्गिरसो न पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः 1। तेषा वय सुमतो यज्ञियानामपि भद्रे सोमनसे स्याम || ( यजु० १ ९| ४ ९-५०) 'सोमवता बहिषदामग्निष्वात्ताना च' ( का० श्री० सू० १ ९/ ३/ २१ ) | अवरे अस्मिन् लोकेऽवस्थिताःपितरः, उदीरताम् ऊर्ध्वं लोक गच्छन्तु ( ईर कम्पने ) । परासः पराः परस्मिल्लोके स्थिताः पितर उदीरता तस्मादपि स्थानात् परं स्थानं गच्छन्तु । उन्मध्यमामध्ये भव" मध्यमा पितर उदीरताम् । पितरः सोम्यासः सोम सम्पादयन्तीति सोम्याः । ये च असु प्राणमीयुः वातात्मानो वातरूपं प्राप्तास्ते पितरो हवेषु आह्वानेषु नोस्मान् रक्षन्तु । कीदृशा.? अवृका नास्ति शत्रुर्येषा ते उदासीनाः, ऋतज्ञाः सत्यज्ञा, यज्ञज्ञाः स्वाध्यायनिष्ठा वा । एतेन जीवत्पित्रादिभ्यो भिन्ना विविधलोकेषु स्थितावृक: वातात्मानश्च श्राद्धादिभिरूध्वं लोक गच्छन्तीति सिद्धयति । ' ये पितरोऽवकृष्टगुणा., उत्परास,, यत्तु उत्कृष्टगुणाः ये च मध्यस्थगुणाः सोम्यासस्ते हवेषु देयग्राह्यव्यवहारेषु विज्ञानदानेन नोऽवन्तु ' ( पृ ० २९५ ) इति तत्तुच्छम् हवेषु आह्वानेष्वित्यर्थस्यैव यज्ञादिप्रसङ्गे युक्तत्वात् । किञ्व ? यत्तु दातुं शक्ष्यन्ति, त्वद्रीत्या विदुषा देवाना कार्यम् । त्वद्रीत्यापि येऽवरगुणा मध्यमगुणाश्च ते कथं देयग्राह्यव्यवहारेषु ज्ञानं ज्ञानदानं करने वाले विद्वान्, है, उनकी जी श्री अर्थात् सत्यविद्या आदि श्रेष्ठगुण युक्त शोभा ' और( राज्यलक्ष्मी, वर्ष तक स्थिर रहे जिससे हमलोग नित्य सुखसंयुक्त होकर पुरुषार्थ करते रहे पृ० २ ९ ६ है सो मेरे लिये इस लोक मे सौ ' ' '... ),, जीवेषु इस पद मे इस तरह का अर्थ बताने की शक्ति नही है । उपदेश करने योग्य यह व्याख्या भी निराधार है क्योकि है, यह नहीं बताया गया । अपनी स्वतन्त्र व्याख्या मनमानी पद्धति से की जा सकती विद्वान् है' व्याख्या के इस अंश में क्या प्रमाण ' ', विधि से ही की जानी चाहिये । आपकी व्याख्या में माय इस पद का कोई अर्थ नही है किन्तु वेद की व्याख्या तो उसमें बताई गई किया गया है । अत यह कहना गलत है कि, मन्त्र में जीवित पिता पितामह आदि की श्रद्धापूर्वक सेवा करना ही श्राद्ध के नाम से कही गई है । इस 'उदीरताम् ' इत्यादि मन्त्रो का उपयोग कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार प्रार्थना मे किया गया है । इसका अर्थ यह है - इस अवर ( अधो ) लोक में अवस्थितसोमवान्, बर्हिषद्, अग्निष्वात्त नामक पितरो की परलोक में अवस्थित पितृगण भी उत्कृष्ट स्थान को प्राप्त करे । मध्यम लोक में विद्यमानपितृगण ऊर्ध्व लोक को प्राप्त करें । इसी तरह से सोमरस के सम्पादक पितृगण और वायु का सहारा लेकर चलने वाले पितृगण पितृगण भी ऊर्ध्व स्थान को प्राप्त करें । हमारे,,पितृगण किसी को किसी प्रकार की हानि नही पहुँचाते सत्य आचरण है वे हमारे बुलाने पर हमारी रक्षा करें । हमारे येजाता है कि जीवित पिता आदि से भिन्न, विविध लोको मे रहने वाले, वालेपवन और निरन्तर स्वाध्यायशील हैं । इस व्यर्थ से यह स्पष्ट हो या प्राण के रूप में रहने वाले पितृगणऊर्ध्व लोको मे जाते है । श्राद्ध आदि करने से इस मन्त्र का स्वामी दयानन्द कृत अर्थ यह है- 'जो विद्वान् प्रजाओं को आनन्द बढाने वाले, प्राण विद्या के खजाने, शत्रुरहित अर्थात् लोग कनिष्ठ मध्यम और उत्तम" चन्द्रमा के समान सब ,,,ऋत अर्थात् ब्रह्म यथार्थ धर्म और सत्य विद्या के जानने वाले हैं वे सबके प्रिय पक्षपात छोड़कर सत्य मार्ग में चलने वाले तथा अपनी विद्या देकर हमारी रक्षा करें ( पृ० २ ९ ६ - २ ९ ७ ), किन्तु यह गलतपितरहै,लोगक्योंकियुद्ध आदि व्यवहारों में हमारे साथ होकर अथवा यज्ञ के प्रसंग में हव शब्द का अर्थ आह्वान

पृष्ठ 627

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 627 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १५२५ असुमीयुरित्यस्य प्राणरूप वातमापन्ना इति मरलमर्थमपहाय ' द्वाभ्या जन्मभ्या विद्वासो भूत्वा विद्यमानजीवनाः स्युस्त एव सर्वैः सेवनीया. 'पृ० २ ९ ५ - २९६) इत्यादि तत्तु निर्मूलार्थकल्पनमसगतमेव, वेदार्थबाह्यत्वात् । असुमीयुरित्यस्मिन् वाक्ये तादृशार्थबोधनमामर्थ्याभावात् ॥ यदुक्तम्-' विद्यमानजीवनाः स्युस्न एव सर्वे मेवनीयाः, नैव मृताश्चेति । कुत:? तेषा देशान्तरप्राप्या सन्निकर्षाभावात्, सेवाग्रहणेऽसमर्था सेवितुमशक्याश्च' ( पृ० २९५- २९ ६ ) इति, तदेतद्वालभाषितम्, देहातिरिक्तात्मास्तित्व संदेहवतामेव तादृक्सदेहोत्थानसम्भवात् । वैदिकाना दृष्ट्या तु मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव ' इत्यादिभिर्वचनै. पितृदेवाचार्याणा जीवता रेव्यत्वेऽपि मरणानन्तरमपि वैदिकश्राद्धादिविधानात् मन्त्रैः श्राद्धैश्च मृताना पितृदेवलोकादिवासिना तत्तद्योनिषु जन्मवतामन तृप्त्यादिसपादनसम्भवेन तादृशशङ्का कलङ्कस्पर्शाभावात् । नहि स्थूलदेहमम्बन्धेनैव सेवादिसम्बन्ध, ईश्वरस्य देहाभावेऽपि स्तुत्यादिभि: सेवादिसभवात् । ' अङ्गिरम ' इति ये नोऽस्माक पितरः तेषा सुमती शोभनबुद्धो वय स्याम । अस्तेलिड् । तेषा भद्रे कल्याण- कारिणि सौमनसे शोभनमनस्त्वेऽपि वयं स्याम । सुमनमो भाव सोमनसस्: अस्मासु कल्याण मन कुर्वन्त्वित्यर्थ. । कीदृशाना यज्ञियानां यज्ञे हिताना यज्ञसम्पादिनाम् । कीदृशः पितर? अङ्गिरस, अङ्गिरसो बहून्यपत्यानि । बहुत्वे तद्धितलोपः । नवा नूतना ग्वा गतिर्येषा ते नवा नवनीया स्तोतव्या ग्वा गतिर्येषामिति वा । अथर्वाण अथर्वणो मुनेर्बहून्यपत्यानि । भृगवः भृगोरपत्यानि । सोम्यामः सोममर्हन्ति सोममम्पादिन' यत्तु ' येऽङ्गेषु रसभूतस्य प्राणाख्यस्य परमेश्वरस्य ज्ञातार, नवग्वाः सर्वासु विद्यासूत्तमकर्मसु च नवीना गतयो येषां तेऽथर्ववेदविदो धनुर्वेदविदश्च भृगवः परिपक्वज्ञानाः शुद्धा सोम्यास शान्ता सन्ति तेषा सुमती वयं स्याम यज्ञियाना ( बुलाना ) ही हो सकता है । दूसरी बात, आपके मत से ज्ञान का दान करना विद्वानो का ( उत्तम गुण वालो का ) कार्य है । तदनुसार अबर और मध्यम गुण वाले इस कार्य को कैसे कर सकते है । 'असुमीयु ' इन पदो का भी 'प्राण रूप पवन का स्वरूप धारण किये' यह सरल अर्थ न कर 'दो जीवन धारण कर, अब विद्वान् बन कर जो जीवन- यापन कर रहे है, उनकी सेवा सबको करनी चाहिये ' ऐसा अर्थ करना भी निराधार और असगत कल्पना है, क्योंकि वैदिक पदों से यह अर्थ सर्वथा विपरीत है । आगे आपने लिखा है कि ' जीवित व्यक्तियो की ही सेवा करनी चाहिये, मरे हुए की नही । क्योकि वे दूसरे लोक में चले जाते हैं, अतः उनकी सन्निचि नही रहती । न तो वे सेवा ग्रहण करने में ही समर्थ होते है और न उनकी सेवा ही की जा सकती है' ( पृ० २ ९ ६ ), ये सारी बच्चों की सी बाते हैं । देह ( शरीर के अतिरिक्त आत्मा को सत्ता मे जिनको संदेह है, ऐसे ही व्यक्तियो को इस तरह का संदेह हो सकता है । वैदिको को दृष्टि में तो ' मातृदेवो भव ' इत्यादि वचनो के अनुसार जीवित माता, पिता, आचार्य प्रभृति की सेवा के साथ ही मृत्यु के बाद भी उनकी वैदिक श्राद्ध आदि कर्मों के सम्पादन के द्वारा सेवा विहित है । मन्त्रो के उच्चारण से और श्राद्ध करने से मृत पितरो की, जो कि पितृ" लोक, देवलोक आदि में निवास करते है, अथवा उन उन नाना योनियो मे जन्म लेते है, तृप्ति होती है । स्थूल शरीर का सम्बन्ध हो, तभी सेवा हो सकेगी, ऐसी कोई बात नही हैं, क्योकि ईश्वर के शरीर के न रहने पर भी स्तुति आदि के द्वारा उसकी सेवा की जाती है । ' अङ्गिरसः ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है-'जो हमारे पितृगण है, उनकी कल्याणकारिणी बुद्धि में हम रहे, अर्थात् उनकी यह बुद्धि सदा हमारी रक्षा करती रहे । उनके कल्याणकारी प्रसन्न मन मे हम बस जाँय1 अर्थात् उनके मन में सदा हमारा कल्याण करने की भावना बनी रहे । हम उनके लिये सदा यज्ञ सम्पादन मे लगे रहने वाले है । इन पितरो के हमारी ही जैसी बहुविध प्रजा है । वे सबका पालन करने वाले है । इनकी गति बड़ी अनोखी है, अथवा इनकी स्तुति करने की पद्धति भी बडी अनोखी है । ये पितृ-गण अथर्वा और भृगु ऋषि के वंश के हैं और सोमरस का सम्पादन करना भलीभांति जानते है । स्वामी दयानन्द ने इस मन्त्र का अर्थ यह किया है-' जो पितृगण ब्रह्माण्ड भर के पृथिवी आदि सब अंगों की मर्मविद्या के जानने वाले, नवीन-नवीन विद्याओं के ग्रहण करने और कराने वाले है, जिसमें कि निरुक्तकार का भी प्रमाण है, तथा जो अथर्ववेद

पृष्ठ 628

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 628 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५२६ वेदार्थपारिजातः ,,, यज्ञादिसत्कर्मसु कुशलानाम् अपीति निश्चयेन सुमतो विद्यादिशुभगुणग्रहणे भद्रे कल्याणकरे व्यवहारे सौमनसे यत्र विद्यानन्दयुक्त मनो भवति तस्मिन् स्याम, भवता सकाशादुपदेशं गृहीत्वा धर्मार्थकाममोक्षप्राप्ता भवेम' ( पृ० २९६ ) इति, तत्तु महीधराद्यनुकारित्वेऽपि विकृतमेव, स्वाभ्यूहितत्वात् । यतोऽङ्गेषु रसभूतोऽपि प्राणो न परमेश्वरः, ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र ' इत्यादिश्रुते । तस्य ज्ञातार इत्यपि क्लिष्टकल्पनैव । किञ्च; तावत एव विवक्षित्वे ब्रह्मविद् इति प्रसिद्धमुपेक्ष्या- प्रसिद्धार्थपदेन तद्बोधे मानाभावात् । एवमेवाथर्वपदेन धनुर्वेदग्रहणमप्य प्रामाणिकमेव । 'भृगवः ' इत्यत्रापि प्रसिद्धार्थत्वत्यागः प्रमाद एव, शुद्धा. सुज्ञाना इत्येव वक्तु युक्तत्वात् । यदि मन्त्रप्रभावेणैव धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तिस्तदा तदर्थमीश्वर एव प्रार्थनीयः, यतो जीवन्तः पितृपितामहादयो जीवा लौकिका एव P तान् प्रतीय प्रार्थना व्यर्थेव स्यात् । सिद्धान्ते तु देवा इव पितरोऽपि विशिष्टशक्तयः सम्भवन्ति । तत एव तान् प्रति प्रार्थना, तेषामाशोर्वादिश्चाभीष्टसिद्धिरपि भवत्येव 1। त्वद्रीत्योपदे- शोऽपि विदुषामेव युक्तो न तद्भिन्नेभ्यो मूर्खमनुष्यरूपेभ्यः पितृभ्यस्तत्सभवति । ' ये समाना. समनसः पितरो यमराज्ये । तेषा लोक. स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पताम् ॥ ' ( यजु० १ ९/ ४५ ) 'ये समाना इति यजमानो जुहोति' ( का० श्री० सू० १ ९ | ३ | २३ ) इति कात्यायनानुसारेण सकृद्गृहीत माज्य दणिणेऽग्नी प्राचीनावीती दक्षिणामुखो यजमानो जुह्वा जुहोति । पितृदेवत्याऽनुष्टुप् । यमराज्ये यमस्य राज्य यस्मिन् तत्र यमलोके ये पितरो वर्तन्ते, ‘ धर्मराज पितृपति ' इत्यभिधानात् । समाना जातिरूपादिभिस्तुल्याः समनसः समान मनो येषा ते तुल्यमनस्काः । 'समानस्य छन्दसि' ( पा ० ६| ३ | ८४ ) इति समानस्य सादेश । तेषां पितॄणा लोकः, विभक्तिव्यत्ययेन लोके, स्वधा नमः स्वधाशब्दोपलक्षित नमोऽन्नमिदमस्तु । यद्वान्नं नमस्कारश्चास्तु । यज्ञस्तु देवेषु कल्पताम् । देवास्तपेयितुं समर्थो भववित्वत्यर्थः । और धनुर्वेदविद्या मे चतुर, दुष्ट शत्रु और दोषो के निवारण करने मे प्रवीण, परिपक्व ज्ञाना और तेजस्वी है, जो परमेश्वर की उपासना और अपनी विद्या के गुणो मे शान्तिस्वरूप है, यज्ञ के जानने वाले और करने वाले है, ऐसो पितरों को जिस कल्याणकारक विद्या से सुमति, कल्याण और मन की शुद्धि होती है, उनमें हम लोग भी स्थिर हो, जिससे कि हम व्यवहार और परमार्थ के सुखो को प्राप्त होकर सदा आनन्दित रहे' ( पृ० २ ९ ७ ) । इस अर्थ के करने मे यद्यपि महीधर प्रभृति के भाष्य का अनुकरण किया गया है, किन्तु साथ ही उसको मनमानी पद्धति से बिगाड भी दिया है । प्राण शरीर के सभी अगो का भार होते हुए भी स्वयं परमेश्वर नही है, क्योकि श्रुति मे ब्रह्म को, परमेश्वर को, प्राण और मन से भिन्न बताया गया है । उस प्राणरूपी परमेश्वर को जानने वाले, ऐसा अर्थ करने मे तो बड़ी कठिनाई होती है । फिर यदि आपको प्राणरूपी परमेश्वर का ज्ञाता, यही अर्थ करना है तो उसको ब्रह्मवेत्ता इस प्रसिद्ध शब्द से ही बताना चाहिये । इस प्रसिद्ध अर्थ को क्यो छोडा गया, इसके उत्तर. मे आपके पास कोई प्रमाण नही है । अथर्व पद से धनुर्वेद का ग्रहण करने में भी कोई प्रमाण नही है । 'भृगव ' इस शब्द के भी प्रसिद्ध अर्थ को आप किस प्रमाण के आधार पर छोड़ रहे है । शुद्ध शब्द का अर्थ शुद्ध ज्ञानवाले होना चाहिये । यदि मन्त्र के प्रभाव से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है, तो इसके लिये ईश्वर से ही प्रार्थना करना उचित है । जीवित पिता, पितामह प्रभृति तो लौकिक प्राणी हैं । उनके प्रति इस तरह की प्रार्थना व्यर्थ जायगी, क्योकि वे इनको देने में असमर्थ हैं । हमारे सिद्धान्त के अनुसार तो देवताओ के समान पितृगण भी विशिष्ट सामर्थ्य वाले होते हैं । अतः उनके प्रति इस तरह की प्रार्थना उचित ही है और उनके आशीर्वाद से प्रार्थना करने वाले की मनोकामना पूरी होती भी है । कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार ' ये समाना:' इस मन्त्र से यजमान अपसव्य होकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके दक्षिणाग्नि में एक बार घृत लेकर आहुति देता है । इस मन्त्र का अनुष्टुप् छन्द है और इसके देवता पितृगण है । यमराज्य, अर्थात् यमलोक में", जो पितर रहते है, धर्मराज अर्थात् यमराज को पितरो का स्वामी माना गया है, अतः उनका निवास यमराज्य में ही माना जाता है । जाति, रूप आदि में ही समान नही, अपितु जिनका मन भी समान है, उन पितरों के निमित्त हम स्वधा शब्द के उच्चारण के साथ यह अन्न समर्पित करते है । अथवा अन्न के साथ हम उनको नमस्कार भी करते है । हमारे द्वारा सम्पादित यज्ञ देवताओं को तृस करने में समर्थ हो ।

पृष्ठ 629

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 629 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १५२७ यत्तु 'ये यमराज्ये राजसभाया न्यायाधीशत्वेनाधिकृताः पितरो विद्वासः सन्ति, तेषां लोको न्यायदर्शनं स्वधा अमृतात्मको लोको भवतीति यश्च प्रजापालनाख्यो राजधर्मव्यवहारो देवेषु विद्वत्सु प्रसिद्धोऽस्ति, सोऽस्माक मध्ये कल्पता समर्थता प्रसिद्धो भवतु । य एव सत्यन्यायकारिण. सन्ति तेभ्यो नमोऽस्तु । अर्थाद् ये सत्यन्याया- ' ( ), वीशास्ते सदैवास्माक मध्ये तिष्ठन्तु पृ० २९ ६ इति तत्तु कपोलकल्पितमेव व्याख्यानम् वेदाक्षरबाह्यत्वात् । यमराज्यशब्दस्य पुराणादिप्रसिद्धसयमनीपुरीरूपार्थत्यागेनाप्रसिद्ध राज्य समानार्थकत्वे मानाभावात् । पूर्वं तु पितृपितामहाचार्याः पितृपदार्थत्वेनाङ्गीकृताः, इदानी तु विद्वास इत्ययमर्थोऽपि पूर्वविरुद्ध एव । तेषा लोक इत्यस्य न्यायदर्शनमर्थोऽपि निर्मूल • । तस्य च स्वधारूपत्वमपि कथ सम्भवति? यश्च प्रजापालनाख्यो राजधर्मव्यवहारो देवेषु प्रसिद्धः सोऽस्मासु प्रसिद्धो भवत्वित्यपि दशहस्ता हरीतकीत्याभाणकमेवानुहरति । यथा कश्चिद् घटशब्दस्य चेष्टार्थक घटधात्वनुसारेण चेष्टारूपमर्थं कुर्वन्नुप- हास्यो भवति, तथैव लोकशब्देन न्यायदर्शनग्रहणमपि । तथैव यज्ञशब्देन व्यवहारसामान्यार्थकेन यजिना प्रजापालनाख्यराज- धर्मरूपव्यवहारग्रहणमपि निर्मूलमेव । देवतोद्देश्येन द्रव्यत्यागलक्षणयागस्य प्रथमयज्यर्थस्य त्यागेन व्यवहारसामान्यार्थकेन यजिना विशिष्टव्यवहारपरत्वायोगात् ।

ये न पूर्वे पितर सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथ वसिष्ठा ।

. तेभिर्यम सरराणो हवोष्युशनुशद्ध प्रतिकाममत्तु ॥

बर्हिषदः पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकुमा जुषध्वम् । त आ गतावसा शतमेनाथा न · श योररपो दधात || ' आहं पतृन्त्सुविदत्रा अवित्सि नपात च विक्रमणं च विष्णोः । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठा ॥ ( य ० १ ९/ ५१, ५५-५६ ) इमे मन्त्रा अपि न जीवतामेव पित्रादीना पिण्डपितृयज्ञादिगतपितृपदवाच्यतां साधयन्ति । मन्त्रार्थस्त्वेवम् - ये नः अस्माकं पूर्वे पितरः सोम्यासः सोमसम्पादिनो वसिष्ठा वसिष्ठगोत्रापत्यानि सोमपीथं सोमपानमूहिरे अनुवहन्ति स्म देवान् दयानन्द का किया अर्थ यह है -'जो पितर अर्थात् विद्वान् लोग परमेश्वर के इस राज्य मे सभासद् या न्यायाधीश होकर न्याय करनेवाले और सब सृष्टि के हित करने में समान बुद्धि है, जिनका लोक अर्थात् देश सत्य न्याय को प्राप्त होकर सुखी रहता है, उनको हम लोग नमस्कार करते है, क्योंकि वे पक्षपातरहित होकर सत्य व्यवस्था में चलकर अपने दृष्टान्त से दूसरो को भी उसी मार्ग से चलाने वाले है । यह सत्यधर्मसम्बन्धी प्रजापालन रूप जो अश्वमेध यज्ञ है, वह परमात्मा की कृपा से विद्वानो के बीच मे सत्य व्यवस्था की उन्नति के लिये सदा समर्थ अर्थात् प्रकाशमान बना रहे' ( पृ० २ ९ ७ ), किन्तु यह सब कपोलकल्पना मात्र है, वेद के अक्षरो से इसका कोई सम्बन्ध नही है । यमराज्य शब्द का पुराण आदि में प्रसिद्ध संयमनी नाम की यमराज की नगरी का अर्थ छोड कर राज्यसभा अर्थ करने मे कोई प्रमाण नही है । पहले आपने पिता, पितामह, आचार्य प्रभृति को पितर माना, अब यहाँ पर आप पितृ आदि शब्दो से विद्वान् अर्थ करते हैं, यह स्पष्ट ही पूर्वापरविरोध है । पितृलोक का अर्थ न्यायदर्शन करना भी निराधार है 1। यह न्यायदर्शन स्वधा रूप कैसे हो सकता है? जो प्रजापालन नामक राजधर्म व्यवहार विद्वानो में प्रसिद्ध है, वह हमारे बीच भी प्रसिद्ध हो, इस तरह का अर्थ भी 'दशहस्ता हरीतकी ' ( हरड दस हाथ की होती है ) इस लोकोक्ति की तरह निराधार ही माना जायगा । कोई घट शब्द का अर्थं चेष्टा करने लगे और कहे कि चेष्टा अर्थ वाली घट धातु से यह शब्द बना है, तो जैसे लोग उसकी हँसी उडावेंगे, उसी तरह से लोक शब्द का अर्थ न्यायदर्शन करना भी सर्वथा हँसी की ही बात मानी जायगी । यह बात प्रसिद्ध है कि यज् धातु से बने याग शब्द का प्रयोग देवता के निमित्त अग्नि में छोडे गये द्रव्य सामान्य के लिये लिया जाता है, तब व्यवहार सामान्य के बोधक इस धातु का प्रयोग विशिष्ट राजव्यवहार के लिये कैसे किया जा सकता है? इसके आगे स्वामी दयानन्द ने ' ये न. पूर्वे ' इत्यादि तीन मन्त्रों को उद्धृत किया है । ये मन्त्र भी जीवित पिता, पितामह आदि को हो पिण्डपितृयज्ञ के प्रसंग में पितर नाम से सम्बोधित कराने में असमर्थ है । मन्त्रों का सही अर्थ यह है जो हमारे पुरातन F

पृष्ठ 630

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 630 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात ' १५२८ प्रापितवन्तः, यमो धर्मराजः, तेभिस्तै पितृभि संरराणः संप्रीयमाणः सन् प्रतिकाम हवीषि अत्तु भक्षयतु । कीदृशो यम.? उशन् वष्टि कामयते इत्युशन् । कोदृशैः पितृभि? उशद्भि कामयमाने ( वश कान्तौ ) वसिष्ठपदस्य सर्वविद्याद्युत्तमगुणेषु रममाणः ' इत्याद्यर्थंकरण निर्मूलम् । सोमपीथमित्यस्यापि ' सोमविद्यारक्षणम्' इत्यर्थो निमूल एव । यमपदस्यापि परमेश्वरो धर्मो वार्थं इत्यपि प्रसिद्धार्थापलाप एव । स च परमेश्वरो लौकिकपितृपितामहादिभी रममाणो भवतीत्यपि निर्मूलमेव । सर्वो जन एवमाचरन् सर्वान् कामानत्तु ॥ पूर्वं तु यम. प्रकृत । सर्वजनोऽत्र कुत समागत? ' बर्हिषद:' बर्हिषि दर्भे सोदन्तीति बर्हिषद । पृषोदरादित्वादन्त्यलोपः । हे बर्हिषदः पितर, यूय भूत्या अवनेन निमित्तेन अर्वाग् निम्न प्रदेशमागच्छत, अस्मद्रक्षणमेव भवतामर्वागागमनस्य निमित्तम् । वो युष्माकमिमा इमानि हव्या हव्यानि वयं चकुम कृतवन्तः । तानि यूय जुषध्व सेवध्वम् । अथानन्तर शंतमेन सुखयितृतमेन अवसान्नेन तर्पिताः सन्तो नोऽस्माक श सुख रोगशमनम्, यो भयपृथक्करणमरपः पापाभावं पापरहितमन्यच्छुभं वा दधात् धत्त स्थापयत । 'बर्हिषि सर्वोत्तमे ब्रह्मणि ब्रह्मविद्याया च ये निषष्णाः ' इति यदुक्तम्, तन्निर्मूलम् दर्भकुशादिबोधकस्य बर्हिष्पदस्य तदर्थत्वाभावात् । अर्वागित्यस्याधस्तादित्येवार्थो न पश्चात् । अन्यत् सर्वं तु महोधरानुकरणमेव कृतम् । आहमिति । अह पितॄन् आवित्सि, आ अवित्सि, आभिमुख्येन वेद्मि विदितवान् । विदेर्लुङि आत्मनेपदे उत्तमैकवचनम् । कीदृगान् पितॄन्? सुविदत्रान् सुष्ठु विशेषेण ददतांति सुविदत्रास्तान् कल्याणदातॄन्, विष्णोर्व्यापनशीलस्य यज्ञस्य, 'यज्ञो वै विष्णुः' इति श्रुतेः । नपातं नास्ति पातो यत्र स नपातो देवयानपथः । यत्र गतानां पातो न भवतीत्यर्थः । तं तादृशं नपातं विक्रमणं विविधं क्रम गमनागमनं यत्र स विक्रमणः पितृयानपथ । यत्र गतानां पुनर्भोगान्ते पतनं तावुभौ यज्ञसम्बन्धिनौ पन्थानी वेद्मीत्यर्थः । तद्गताश्च पितुश्च वेद्मि । यत एवमतो ये बर्हिषदः पितरः स्वधया सेव- पूर्वज है, वे सोमरस का सम्पादन करने वाले है, वसिष्ठ गोत्र मे उत्पन्न हुए हैं । ये देवताओ के लिये सोमरस की आहुति पहुँचाने मे समर्थ है । यमराज भी इनसे प्रसन्न होकर इनके द्वारा दी गई हवि को स्वीकार करें । यह धर्मराज यम हमारे उन पूर्वपुरुषों को चाहता है और हमारे वे पूर्वज भी उसको चाहते है । वसिष्ठ पद का अर्थ 'सब विद्या में रमण करने वाले' ( पृ० २ ९ ८ ) करना सर्वथा निराधार है । इसी तरह से ' सोमपीथ' शब्द का अर्थ 'सोमविद्या की रक्षा' भी सर्वथा गलत है । यम पद का अर्थ यमगज न कर परमेश्वर अथवा धर्म करना भी 4 लोकप्रसिद्धि को न मानना ही हुआ । सभी मनुष्य इस तरह का आचरण करके अपनी सब कामनाओं को प्राप्त करें, यह कहना भी इसलिये असंगत है कि पहले आपने यहाँ यम के प्रसग में व्याख्या की है, तो अब यह बीच में हो जन-साधारण की बात कहाँ से आई? हे कुशा के आसन पर बैठने वाले पितरो, आप लोग हमारी रक्षा के लिये नीचे आइये । इस भूलोक पर आपका आगमन हमारी रक्षा के लिये ही हो सकता है । हम आपके लिये यह हवि प्रदान करते हैं, उसको आप स्वीकार कीजिये । इस अत्यन्त सुख-कारक हवि रूप अन्न से तृप्त होकर आप लोग हमे सब प्रकार की सुख-सुविधा से सम्पन्न कीजिये, हमारे रोगों को दूर कीजिये, हमको सब तरह के पापों से मुक्त कर हमारा कल्याण कीजिये । दयानन्द ने 'बर्हिषद:' शब्द का अर्थ 'ब्रह्म और ब्रह्मविद्या में स्थित पितृगण ' ( पृ० २ ९९ ) किया है, यह सर्वथा निराधार है । बहि पद का अर्थ दर्भ, कुशा ही प्रसिद्ध है, अतः यह नया अर्थ बिना प्रमाण का है । अर्वाक् पद का अर्थ भी नीचे ही होता है, पश्चात् ( बाद मे ) नही । 'आहं. ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है - मैने पितरो को भलीभाँति सब तरह से जान लिया है । ये पितृगण विशेष रूप से कल्याण को देने वाले है, सर्वत्र व्यास विष्णु, अर्थात् यज्ञ के कभी न नष्ट होने वाले देवयान मार्ग को भी मैने जान लिया है और साथ ही उस पितृयाण मार्ग को भी मैंने जान लिया है, जहाँ पर जाने-आने वाले निरन्तर आवागमन के चक्कर मे पड़े रहते है । ये दोनों हो मार्ग यज्ञ से ही प्राप्त होते है, अत इनको विष्णु =यज्ञ का ही पदक्रम = विविध फल माना जाता है । इस तरह से मैं देवयान में स्थित देवगण और पितृयाण मे स्थित पितृगणों को भी जानता हूँ । इसलिये कुशा पर बैठने वाले पितृगण स्वधा शब्द के साथ निकाली गईं सोमरस की हवि का पान करने के लिये इस यज्ञ मे आवे । यहाँ लुङ् लकार का प्रयोग लोट् लकार के अर्थ में हुआ है और