वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 611–620

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 611–620

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वेदार्थपारिजात. १५०६ सन्ति । आहुतिस्तु आधानसिद्ध आहवनीयेनौ प्रक्षिप्यते । तस्मात् प्रसिद्धाग्निसूर्यादितत्तदधिष्ठातृदैवतपरमेव व्याख्यानं युक्तम् । तत्प्रतिपादनेऽपि परमात्मप्रतिपादनमेव पर्यवस्यति तेषामपि तदशत्वेन तदात्मकत्वात् । ' ' ( ). सजूर्देवेनेति सजूरिति वा का० श्री० सू० ४ १४ ९ पूर्वोक्ताभ्यामग्निर्ज्योति सूर्योज्योतिरिति मन्त्राभ्या मजूरित्यादिमन्त्रद्वयं विकल्पितमिति सूत्रार्थं । द्योतनात्मकेन स्वप्रकाशेन सवित्रा प्रेरकेण परमेश्वरेण सजू सह जोषणं समाना प्रीतिर्यस्यासौ सजूरग्नि । 'जुषी प्रीतिसेवनयो ' । परमैश्वर्यवता परमेश्वरेणेन्द्रेण देवनोपेतया रात्र्या रात्रिदेवतया सजू समानप्रीतिरस्मासु वा जुषाण प्रीतियुक्तो हविर्वा जुषाण आस्वादयन् अग्निर्हृयमानं हविर्वेतु भक्षयतु | 'वी प्रजननकान्त्य- वसादनेषु ' । य एव गुणोऽग्निस्तस्मै स्वाहा सुहुतमस्तु | अग्निहोत्रमन्त्रोऽयमनेनाग्नये हविर्दीयते । अग्निश्चैश्वर्यवान् देव । स च स्वप्रकाशसर्वप्रकाशसर्वप्रेरकपरमेश्वरस्य प्रीतिपात्र त प्रति प्रीतिमाश्च । तयो. परस्पर समाना प्रीति । इन्द्रश्च परमैश्व- र्यवान् परमेश्वरः, तद्वती रात्रिः साधिष्ठाना प्रकृतिदेवता तयेन्द्रवत्या रात्र्या च सोऽग्नि प्रीतिमान् तत्प्रीतिपात्र च । देवराजो वा इन्द्र, रात्रिस्तत्पूज्या सर्वप्रपञ्चस्वामिनी महाशक्ति: । स्वापोन्मुखायास्तस्या रात्रिपदव्यपदेश्यता, प्रबोधोन्मुखायाश्चो- षस्पदव्यपदेश्यता । तदशभूता देवराजशक्तिर्वा रात्रि ॥ इन्द्रस्याग्नेश्च समानप्रीतिमत्त्व वेदेषु पुराणेषु बहुधा वर्णितम् ॥ एव विशिष्टगुणोऽग्निरस्मासु प्रीतिमान् भूत्वाऽस्मद्दत्तामाहुति वेतु प्राप्नोतु आस्वादयतु भक्षयतु वा । एवमेव सूर्योऽप्यैश्वर्यवान् दिव्यो देवः । तन्मण्डले हिरण्यश्मश्रुहिरण्यकेशो हिरण्यवर्ण परमात्मा देवस्तेन जुषमाण आस्ते । इन्द्रवत्योषसा परमैश्वर्यवत्या च सूर्यस्यानुग्राह्यानुग्राहकसम्बन्धोऽस्ति । इन्द्रवत्या उषस प्रीतिपात्र प्रीतिमाश्च । तत्प्रीतिमांश्च सूर्योऽस्मासु प्रीतिमान् अस्मदाहुतिमास्वादयतु भक्षयतु वा । सूर्यस्यैव विष्णुरुद्रेन्द्ररूपत्वमप्युक्तम् । तेषा तेषा समानप्रीतिमत्त्व युज्यते । 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' (ऋ ० स० ) इति मन्त्रेऽप्यग्निमित्रेन्द्रादीनामभेद उक्त । तो इस तरह के पद है नही, आहुति भी आधान संस्कार से निष्पादित आहवनीय अग्नि में दी जाती है । इसलिये प्रस्तुत मन्त्र मे प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य का अधिष्ठाता आधिदैविक स्वरूप ही यहा व्याख्या का विषय होना चाहिये । इसका प्रतिपादन करने से भी अन्ततः परमात्मा का प्रतिपादन अपने आप हो जाता है, क्योकि सूर्य, चन्द्र प्रभृति का यह आधिदैविक स्वरूप भी उस परमात्मा का ही अंश माना जाता है । ' सजूर्देवेन ' इत्यादि मन्त्र के संबन्ध में कात्यायन श्रौतसूत्र में बताया गया है कि 'अग्निर्ज्योति० ' और ' सूर्यो ज्योति० ' इत्यादि मन्त्रो के साथ इनका विकल्प से पाठ होता है । इसका अर्थ यह है - यह अग्निदेव द्योतनात्मक अर्थात् स्वयंप्रकाश, सबके प्रेरक, परमेश्वर के साथ समान प्रीति रखने वाले और परम ऐश्वर्य संपन्न इन्द्रदेव के साथ विद्यमान रात्रि देवता के साथ भी समान प्रीति वाले है । यह अग्निदेव हमारे ऊपर प्रीतियुक्त होकर हवि का आस्वादन करते हुए प्रसन्न हो । इस प्रकार के अग्नि के लिये दी गई यह आहुति हमारे कल्याण के लिये हो । यह अग्निहोत्र का मन्त्र है । इसके द्वारा अग्नि को हवि दी जाती है । अग्नि ऐश्वर्यशाली देव हैं । यह स्वयंप्रकाश और सबको प्रकाशित करने वाले, सबके प्रेरक, परमेश्वर के प्ररम प्रिय देव हैं । इनकी परमेश्वर में भक्ति भी अनोखी है । इन दोनो की एक दूसरे पर समान प्रीति है । इन्द्र ( परमेश्वर ) भी परम ऐश्वर्यशाली देव है । इन्द्रवती रात्रि का अर्थ है इन्द्र मे ( परमेश्वरे ) अधिष्ठित रात्रि, अर्थात् प्रकृति देवता । इस इन्द्रवती रात्रि से भी अग्नि की, उसी प्रकार परमेश्वर की भी प्रीति है । अथवा इन्द्र पद से देवराज इन्द्र का ग्रहण किया जायगा । इन्द्र की रात्रि इन्द्र की पूज्य सारे प्रपच की स्वामिनी महाशक्ति है, क्योकि यह महाशक्ति जब सोने लगती है, उस अवस्था को रात्रि कहा जाता है और जब यह जगती है, तो उसको उषःकाल कहा जाता है । इसी की अंशभूत देवराज की शक्ति को भी रात्रि कहा जा सकता है । इन्द्र और अग्नि की परस्पर प्रीति का वर्णन वेदो और पुराणो में विस्तार से वर्णित है । इस तरह के गुणों से विशिष्ट अग्नि हमारे ऊपर प्रसन्न होकर हमारी दी गई आहुति को स्वीकार करे और उसका स्वाद ले । इसी तरह से सूर्य भी ऐश्वर्यवान् दिव्य देवता है । उस सूर्य के मण्डल मे हिरण्यवर्ण के डाढ़ी मूछ और केशवाला हिरण्यवर्ण का परमात्मा सदा उससे सेवित हो विद्यमान है । इन्द्रवती उषा से, जो कि परम ऐश्वर्य से संपन्न है, सूर्य का अनुग्राह्य और अनुग्राहक संबन्ध है । इससे सूर्य की परस्पर परम प्रीति है । इस उषा }, 1मे प्रीतिमान इन्द्र हमारे ऊपर भी प्रसन्न हो और हमारे द्वारा दी गई आहुति को स्वीकार कर उसका आस्वादन करे । को ही

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१५१० वेदार्थपारिजात। यत्तु-'यो देवेन द्योतकेन सवित्रा सूर्यलोकेन जीवेन च सह, तथेन्द्रवत्या सूर्यप्रकाशवत्योषसाऽथवा जीववत्या मानसवृत्त्या सजू सह वर्तमान परमेश्वरोऽस्ति, स जुषाण. सम्प्रीत्या वर्तमान. सन् सर्वात्मा कृपाकटाक्षेणास्मान् वेतु विद्यादि- सद्गुणेषु जातविज्ञानान् करोतु तस्मै स्वाहा' ( पृ ० २८५) इति, तदपि मन्दम् तादृशार्थस्य निष्प्रमाणत्वात् । निराकारस्य त्वत्परमेश्वरस्य चक्षुराद्यभावेन कटाक्षाभावेन कृपाकटाक्षस्याप्यसम्भवात् । सूर्यलोकस्य जीवस्य सूर्यपदेन कथ बोध इत्यनुक्त- त्वाच्च । एवमेवेन्द्रवत्या वायुचन्द्रवत्या रात्र्या सह वर्तते सोऽग्नि सम्प्रीतोऽस्मान् नित्यानन्दमोक्षसुखाय स्वकृपया कामयतु ? तस्मै स्वाहेत्यपि यत्किञ्चित् निर्मूलत्वात् । आप्तकामोऽस्मान् कामयतु इत्युक्तिः कथमनुन्मत्तस्य सम्भवति वस्तुतस्तु दयानन्दोऽन्ये च तदीया एभिर्मन्त्रैरग्निहोत्रस्य विडम्बनामेव कुर्वन्ति । सर्वथाप्यग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यज्योतिष्टोमादि- ज्ञानशून्यानामेव वायुजलादिशुद्धयर्थं तद्रीत्याऽग्निहोत्रादिकम् । 'ॐ भूरग्नये प्राणाय स्वाहा, ॐ भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा, ॐ स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा, ॐ भूर्भुव.- स्वरग्निवाय्वादित्येभ्य. प्राणापानव्यानेभ्य स्वाहा । ॐ आपो ज्योतीरसोऽमृत ब्रह्म भूर्भुव स्व ॐ स्वाहा । ॐ सर्वं वै पूर्ण स्वाहा' यदत्रोक्तम् — ' इति सर्वे मन्त्रास्तैत्तिरीयोपनिषदाशयेनैकीकृता ' इति, तत्तु मूढजनप्रतारणमेव, यतो हि मन्त्रा निगदोक्ता भवन्ति । न केषाञ्चिदाशयेन मन्त्रा निर्मीयन्ते । तथैवानेन दयानन्देन वैदिकसन्ध्याया वाग् वागित्यादयोऽपि स्वाभ्यूहिता मन्त्रा उपन्यस्ताः । एवमेव 'जलवायुशुद्धिकरणाय होत्रं हवन दानं यस्मिन् कर्मणि क्रियते तदग्निहोत्रम्' ( पृ० २८७) इत्यपि निर्मूलम् जलवायुशुद्धिकरणायेत्यस्य तत्कपोलकल्पितत्वात् । 'सुगन्धिपुष्टिमिष्टबुद्धिवृद्धिशौर्यधैर्यबलरोगनाशक रैर्गुणैर्युक्ताना द्रव्याणा होमकरणेन वायुवृष्टिजलयोः शुद्धया पृथिवीस्थपदार्थाना. सर्वेषा शुद्धवायुजलयोगात् सर्वेषा जीवाना परमसुखं भवति' विष्णु, रुद्र, इन्द्र रूप भी माना गया है । इन सबकी सब में समान प्रीति है । 'विद्वान् ब्राह्मण एक हो परमात्मा को अनेक रूपो में वर्णित करते हैं ' इस श्रुति में भी अग्नि, मित्र, इन्द्र प्रभृति को अभिन्नता बताई गई है । 'जो परमेश्वर सूर्य आदि लोको मे व्याप्त है, वायु और दिन के साथ संसार का परम हितकारक है, वह हम लोगो को विदित होकर हमारे किये हुए होम को ग्रहण करे' (पृ० २८६ ) | दयानन्द की दी गई उक्त मन्त्र की यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि यह अर्थ प्रमाणो से एकदम शून्य है । आपका परमेश्वर तो निराकार है । उसके जब आँखें नही है, तो कटाक्ष कहा से रहेंगे । इस तरह उस निराकार परमेश्वर के कृपाकटाक्ष का कोई प्रसग ही नही उठ सकता । सूर्य पद से सूर्यलोक का ग्रहण किस आधार पर होगा, यह भी आपने नही बताया है । इस तरह से इन्द्रवती अर्थात् वायु और चन्द्रमा वाली रात्रि के साथ रहने वाला अग्नि हम पर प्रसन्न हो हमें नित्य आनन्द, अर्थात् मोक्ष सुख प्रदान करने की कामना करे, उसके लिये हम हवि प्रदान करते है, ऐसा अर्थ करना भी निर्मूल है । आप्तकाम परमेश्वर हमारे लिये कामना करे, इस तरह की बात कोई पागल ही कह सकता है । वास्तव मे तो दयानन्द और उनके अनुयायी इन मन्त्रों से अग्निहोत्र करके इन पवित्र कृत्यों के साथ मजाक ही करते है । अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम आदि पवित्र वैदिक कृत्यों का इनको कुछ भी ज्ञान नही है, अतः यह उचित ही है कि ये लोग इन कृत्यों का उपयोग केवल वातावरण की शुद्धि के लिये ही मानें । इसके आगे दयानन्द ने 'ॐ भूग्नये ० ' इत्यादि वाक्यों को उद्धृत कर कहा है कि 'ये सब मन्त्र तैत्तिरीय उपनिषद् के आशय को देखकर एकत्रित किये गये हैं' (१० २८७) । यह बात मूढ व्यक्तियों को ठगने के लिये है । ' वेद मे प्रत्यक्षतः जो पढ़े गये है, ये ही मन्त्र कहलाते है । कुछ मन्त्रो का आशय लेकर नये मन्त्र बनाये नही जा सकते । स्वामी दयानन्द ·ने इसी तरह से वैदिक सन्ध्या ' ' में वाक् वाक्० इत्यादि मनमाने मन्त्र गढ़ कर रखे हैं । इसी तरह से उनका यह कहना भी गलत है कि जिस कर्म में अग्नि का परमेश्वर के लिये जल और पवन की शुद्धि या ईश्वर की आज्ञा का पालन करने के लिये जो होत्र हवन अर्थात् दान करते है, उसको अग्निहोत्र कहते हैं ', क्योकि जल और पवन की शुद्धि उनको कपोल कल्पना है । 'जो जो केशर कस्तुरी आदि सुगन्धि, पुष्टि गुड शर्करा आदि मिष्ट, बुद्धि, बल तथा धैर्यवर्धक और रोगनाशक पदार्थ हैं, उनका होम करने से पवन और वर्षा घृत दुग्ध आदि पृथिवो के सब पदार्थों की जो अत्यन्त उत्तमता होती है, उसी से सब जीवों को परम सुख होता है' ( पू० २८८ ) । यह जलकथनकीभीशुद्धि से सर्वथा

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वेदार्थपारिजातः १५११ ( पृ ० २८७-२८८ ) इत्यादिकमपि निर्मलमशुद्ध च । सुगन्धीत्यादयो गुणाश्चेत् कथ सुगन्धिपदनिष्पत्ति? मिष्टपद च कथ गुणपरमित्यपि चिन्त्यम् । यत्तु —' तृतीयस्य पितृयज्ञस्य तर्पणभाद्धरूपेण प्रकारद्वयमुक्त्वा किमपि जल्पितम्, तत्तु विचित्रमेव । 'तत्र येन कर्मणा विदुषो देवान् ऋषीन् पितृश्व तर्पयन्ति सुखयन्ति तत्तर्पणम्' ( पृ ० २८८ ) इति, तदपि तुच्छम् तर्पणशब्दस्य योग-रूढत्वात् । अन्यथा मनुष्यपश्वादिसुखकराणामन्नघासादिदानस्यापि तर्पणशब्दवाच्यत्वापत्ते । देवर्षिपितृजातीना मनुष्यजाते- भिन्नत्वेन मन्वादिभिरुक्तत्वाच्च । यच्च–' यत्तेषा श्रद्धया सेवन क्रियते तच्छ्राद्धम्' (पृ ० २८८ ) इत्यपि मन्दम् तर्पणस्यापि श्राद्धत्वाविशेषात् । तर्पणमपि श्रद्धयैव क्रियते नाश्रद्धया, अश्रद्धया कृतस्य नैष्फल्योक्ते । ' अश्रद्धया हुत दत्त तपस्तप्त कृत च यत् । असदित्युच्यते पार्थं न च तत्प्रेत्य नो इह || ' (भ० गी० १७ २८) इति गीतोक्ते । यदुक्तम्-'विद्वत्सु विद्यमानेष्वेतत्कर्म ?सघट्यते नैव मृतकेषु । कुतस्तेषा प्राप्त्यभावेन सेवनाशक्यत्वात् । तदर्थंकृतकर्मण प्राप्त्यभाव इति व्यर्थतापत्तेश्च । ' ( ),,तस्माद्विद्यमानाभिप्रायेणैतत् कर्मोपदिश्यते । सेव्यसेवकसन्निकर्षात् सर्वमेतत्कर्तुं शक्यते पृ० २८८ इति तदपि तुच्छम् 'सङ्घटते' इत्येतावतैव कार्यनिर्वाहे भावार्थकप्रत्ययस्य नैरर्थक्यापातात् । किञ्च, नहि चार्वाकवद्देहात्मवादिनो यूय येन मरणानन्तर मृतानामविद्यमानताभ्युपगमः स्यात् । मृतानामपि जीवानामिहलोककृताना कर्मणा फलभोक्तृत्व जन्मान्तरेषूपगम्यत एव, अन्यथेह कृताना परोपकाराणामपि वैयर्थ्यापत्ते । नैरात्म्यानभ्युपगमेनैव सेव्यसेवकसन्निकर्षोऽपि नासम्भवी । ननु तथापि कथमन्यकृताना कर्मणामन्यभोग्यत्वम्, कर्तृत्वभोक्तृत्वयो- निराधार और गलत है । सुगन्धि प्रभृति को यदि गुण माना जायगा, तो इन पदो की निष्पत्ति कैसे होगी? अर्थात् व्याकरण के किन नियमो से ये पद बनेंगे? मिष्ट पद गुण का वाचक कैसे होगा? यह भी विचारणीय है । पाँच महायज्ञो में से ब्रह्मयज्ञ और अग्निहोत्र का निरूपण करने के बाद स्वामी दयानन्द ने पितृयज्ञ का निरूपण करते हुए उसके दो भेद बताये है— एक तर्पण और दूसरा श्राद्ध ( १० २८८) । उनका यह विभाग बडा विचित्र है । तर्पण का लक्षण उन्होने इस प्रकार किया है – 'उनमे से जिन कर्मों से विद्वान् रूप देव, ऋषि और पितरो को सुखयुक्त करते है, सो तर्पण कहाता है' (पृ० २ ९ ० ) । तर्पण शब्द की यह व्याख्या भी गलत है । सर्पण शब्द योगरूढ माना जाता है । अन्यथा मनुष्य, पशु आदि को सुख देने वाला अन्न, घास आदि का दान भी तर्पण कहा जाने लगेगा । देव, ऋषि, पितृगण ये सब मनुष्य जाति से भिन्न है, इसका वर्णन मनुस्मृति आदि में स्पष्ट रूप से मिलता है । 'तथा जो उन लोगो की श्रद्धापूर्वक सेवा करना है, उसी को धाद्ध जानना चाहिये' ( पृ ० २ ९ ० ) यह व्याख्या भी गलत है, इस तरह से तो तर्पण भी श्राद्ध हो जायगा । तर्पण भी श्रद्धापूर्वक ही किया जाता है, विना श्रद्धा के नही । अश्रद्धा से -करने पर तो वह निष्फल हो जायगा । भगवद्गीता में स्पष्ट कहा है –' अश्रद्धा से किया गया हवन, तप अथवा अन्य कुछ भी कार्य असत् कहलाता है । हे अर्जुन उसका फल न तो मृत्यु के उपरान्त मिलता है और न इस जन्म मे ही' । दयानन्द ने आगे लिखा है-' यह तर्पण आदि कर्म विद्यमान अर्थात् जीते हुए जो प्रत्यक्ष है, उन्ही में घटता है, मरे हुओ में नहीं ।' क्योकि मृतकों का प्रत्यक्ष होना असंभव है । इसलिये उनकी सेवा नही हो सकती । तथा जो उनके लिये कोई पदार्थ दिया चाहे, वह भी उनको नही मिल सकता | इससे केवल विद्यमानो की ही श्रद्धापूर्वक सेवा करने का नाम तर्पण और श्राद्ध वेद में कहा है, क्योकि सेवा करने के योग्य और सेवा के ही प्रत्यक्ष होने से यह सब काम हो सकतासकता है, दूसरे प्रकार से ' ( ),करने वाले इन दोनो नही पृ० २ ९ ० किन्तु यह सारा कथन भीगलत है | आपने यहा पर 'सघटयते' क्रियापद का प्रयोग किया है, जो कि गलत है । आप जिस अर्थ को प्रकट करना चाहते हैं, वह तो ' संघटते' इस क्रिया पद से भी प्रकट हो जाता है, तब भावार्थक प्रत्यय का प्रयोग करना व्यर्थ है । आप चार्वाक के समान शरीर को ही आत्मा मानने वाले तो हैं नहीं, जिससे कि मरने के बाद मृत पितरो की अविद्य-मानता आपके मत में मानना जरूरी हो । मृत व्यक्तियो के इस लोक मे किये गये कर्मों के फल का उपभोग बाप दूसरे जन्म में मानते ही है । ऐसा न माना जाय तो इस जन्म में किये गये परोपकार ध्यर्थ जायेंगे । आप नैरात्म्यवादी नही है, अर्थात् आत्मा की सत्ता स्वीकार करते हैं.., इसीलिये सेव्य और सेवक का सनिकर्ष हो ही सकता है । इस पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि दूसरे के द्वारा , क्योंकि कर्ता कोई दूसरा होगा और उसके फल का भोक्ता कोई और ।किये गये कर्मों का फल दूसरा कैसे भोग सकता है

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१५१२ वेदार्थपारिजातः व्यधिकरण्यापातादिति चेन्त्र, अग्निहोत्रकर्मणा त्वयाऽनुपदमेव सर्वेषा परमसुखकरत्वाभ्युपगमात् । लोके शासकीयनिधानेषु (बैड ) स्वनाम्ना निहितद्रव्याणा यथाऽन्यनाम्ना समर्पणे नैव काठिन्यम्, तथैव स्वकृत कर्मणामप्यन्येभ्य समर्पणे बाधानुपपत्ते । अत एव पितृकृताया वैश्वानरीयाया इष्टेर्भोक्ता पुत्रो भवति, पुत्रकृताया. श्राद्धेष्टे पितरो भोक्तारो भवन्त्येव । यत्तु सत्कर्तव्येषु देवाना सत्त्वे प्रमाणमुपन्यस्तम् - 'पुनन्तु मा देवजना पुनन्तु मनसा धिय । पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेद पुनीहि मा! ' ( वा० स० १ ९। ३९ ) इति, तदपि निर्मूलम्, मन्त्रस्यार्थान्तरत्वात् । तथाहि- देवजना देवानु- गामिनो जना मा पुनन्तु मनसा सह धिय बुद्धय कर्माणि पुनन्तु । विश्वा विश्वानि सर्वाणि भूतानि मा पुनन्तु । हे जातवेद., जातो वेदो यस्मात्स तथोक्त., त्वमपि मा मा पुनीहि । यत्तु - 'देवजना भवदाज्ञापालिनो विद्वासो ज्ञानिनो विद्यादानेन मा पुनन्तु' इति, तत्तु न समीचीनम्, मनुष्यव्यतिरिक्ताना देवाना साधितत्वात् । किञ्च विद्यादानाय विद्वास प्रार्थनीया न भगवान्, अन्यथा गुरुशुश्रुषादिभिस्तत्प्रसादप्राप्त्यर्थं प्रयत्नानुपपत्ते । तथैव सर्वेऽप्युद्योगपतयो महायन्त्राधिपतयोऽपि परमेश्वरमेव प्रार्थयेरन्, हे भँगवन् | सर्वेऽपि कर्मकरा श्रमिका मम कार्याणि कृत्वा मा प्रसादयन्तु । तथा सति वेतनलाभाशविशेष- भोजनबोनसभत्तादिनैरपेक्ष्येणैव परमेश्वरप्रार्थनयेव सर्व साधयेयुः । किञ्च विद्यादानेन विद्वासो विद्वत्त्व सम्पादयितु शक्नुवन्ति पर ते पावित्र्य सम्पादयितुं कथ प्रभविष्यन्ति? यदपि भगवद्दत्त आह- 'विज्ञानेनास्माक बुद्धय पुनन्तु पवित्रा भवन्तु' इति, तदपि मन्दम्, सकर्मकस्य पुनातेरकर्मकत्वायोगात् । विवक्षाया युक्तहेत्वभावात् । मनसेत्यस्य ज्ञानपरत्वमपि -- भाक्तमेव । यदपि - 'सर्वाणि ससारस्थानानि भूतानि भवत्कृपया सुखानन्दयुक्तानि पवित्राणि भवन्तु' इति, तदपि मन्दम्, श्राद्ध आदि कर्मों में यही दोष है कि इनको करते तो पुत्र आदि है, किन्तु आप मानते है कि इनका फल उनके पितरो को मिलता है । आपके इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर यह है कि अभी आपने अग्निहोत्र आदि कर्मों को सबका उपकारक माना है कि इनसे सारी प्रजा का कल्याण होता है । लोक व्यवहार मे भी देखा जाता है कि बैंको में अपने नाम से जमा धनराशि में से दूसरे व्यक्ति के नाम चेक काट कर उसका कुछ अंश दे देने मे कोई कठिनाई नही होती । इसी तरह से अपने किये कर्मों में से कुछ का फल दूसरो को समर्पित कर दिया जाय, इसमें भी कोई बाधा नही रहती । इसीलिये पिता के द्वारा की गई वैश्वानरी इष्टि के फल का भागी पुत्र होता है और पुत्र के द्वारा की गई श्राद्ध नामक इष्टि के फल के भोक्ता पितृगण होते है । आगे दयानन्द ने लिखा है कि ' तर्पण आदि कर्म से सत्कार करने योग्य तीन है - देव, ऋषि और पितर' ( पृ ० २ ९० ) । इनमें देवों के प्रमाण के रूप में ' पुनन्तु मा० ' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत किया है । यह भी गलत है, क्योकि मन्त्र का अर्थ उनके किये अर्थ से भिन्न है, जो कि इस प्रकार से है - देवताओ के अनुगामी जन मुझे पवित्र करे, मन के साथ मेरी बुद्धि को और कर्म को भी पवित्र रखें । सभी प्राणी मुझे पवित्र बनावें । हे जातवेदा, वेद को प्रकट करने वाले अग्निदेव, आप भी मुझे पवित्र कीजिये । दयानन्द ने देवजन का अर्थ किया है 'जो आपके उपासक आपकी आज्ञा मानते है, अथवा जो विद्वान् ज्ञानी पुरुष है, वे मुझे विद्यादान से पवित्र करें' ( १० २ ९ ० ), किन्तु यह व्याख्या सही नही है, यह हम अनेक बार कह चुके है कि देवगण मनुष्यो से सर्वथा भिन्न जाति के है । दूसरी बात विद्यादान के लिये विद्वानो से प्रार्थना की जायगी, भगवान् से नही, ऐसा न माना जाय तो गुरु की सेवा सुश्रूषा करने की, गुरु को प्रसन्न करने के लिये नाना प्रकार के प्रयत्नो की क्या आवश्यकता रह जायगी, जब कि इसके लिये भी भगवान् से ही प्रार्थना करना है । इसी तरह से सारे उद्योगपति और बडे-बडे कल-कारखानों के मालिक परमेश्वर से ही प्रार्थना करेंगे कि हे भगवन् | सभी कर्मचारी और मजदूर मेरा कार्य पूरा कर मुझे प्रसन्न रक्खें । ऐसा करने से वे अतिरिक्त वेतन, बोनस आदि की माँग किये बिना ही केवल परमात्मा की प्रार्थना के आधार पर ही सब कुछ उनके मन-माफिक करने लगेंगे । दूसरी बात विद्या दानकर विद्वद्गण दूसरे व्यक्ति को विद्वान् बना सकते हैं, किन्तु वे दूसरे व्यक्ति को पवित्र कैसे बना सकते है । यहाँ भगवदत्त व्याख्या करते हैं कि ' विज्ञान के द्वारा हमारी बुद्धि पवित्र होती है' किन्तु यह व्याख्या भी इसलिये गलत है कि 'पुनानि' धातु सकर्मक है । इसका अकर्मक में प्रयोग हेतु में विवक्षा होने पर ही हो सकता है, जो कि यहाँ नहीं है । मन का अर्थ ज्ञानपरक करना भी लाक्षणिक ही माना जायगा, जो कि तभी किया जा सकता है, जब कि मुख्य अर्थ की उपपत्ति न बनती हो । 'सब संसारी जीव आपकी कृपा से पवित्र होकर आनन्द में रहें

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वेदार्थपारिजाता १११३ पुनातेः सुखानन्दादियुक्तार्थत्वे मानाभावात् । तथात्वे वा सुखकारकत्वमेव पावनत्वं स्यात् । तेन मद्यमासाशिना सुखकरत्वे मद्यमासादीनामपि पवित्रत्व स्यादेव । 'द्वय वा इद न तृतीयमस्ति । सत्यं चैवानृत च । सत्यमेव देवा अनृत मनुष्या । इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि । इति तन्मनुष्येभ्यो देवानुपैति । स वै सत्यमेव वदेत् । एतद्ध वै देवा व्रत चरन्ति यत्मत्यम् । तस्मात्ते यश यशो ह भवति । य एव विद्वान् सत्य वदति । ' ( श० १| १| १| ४-५ ), 'विद्वासो हि देवा.' ( श० ३| ७| ३| १० ) । तदेतत्सर्व चर्चित र्बणम्, उक्तोत्तर- त्वात् । वस्तुतस्तु — ' अपरेणाहवनीय प्रानिष्ठमग्निमीक्षमाणोऽप उपस्पृश्य व्रतमुपैत्यग्ने व्रतपत इदमहमिति वा (श० २| १ | ११ ) इति शतपथरीत्या व्रतग्रहणस्यार्थवादोऽयम् । 'अग्ने व्रतपते व्रत चरिष्यामि तच्छकेय तन्मे राध्यताम्, इदमहमनृतात् सत्य- मुपैमि' ( वा ० स ० १ ५ ) । तदर्थस्तु –हे अग्ने व्रतपते व्रतपालक, त्वदनुज्ञया व्रतमनुष्ठातु व्रत चरिष्यामि । प्रकृतमग्निहोत्र वा चातुर्मास्य वा कर्मानुष्ठास्यामि तच्छकेय तत्कर्मानुष्ठातु शक्तो भूयासम् । तन्मे मदीय कर्म राध्यता त्वत्प्रसादाद् निर्विघ्न फलपर्यन्तं सिद्धयतु । अह यजमान इदमस्मादनृतान्मनुष्यजन्मन उद्गत्य सत्य देवताशरीरमुपैमि प्राप्नोमि । सत्यमनुष्ठाय कर्मरूपेण प्रत्यक्षमिति मन्वान इदमिति विशिनष्टि । अनृत मनुष्यजन्म, शीघ्रविनाशित्वात् । यथा स्वप्नगजादयो बोधमात्रेण शीघ्रं निवर्तमाना अनृता उच्यन्ते । सत्य देवजन्म, बहुकालस्थायित्वात् । यथा जागरणगजादय । इद सत्यवदन कर्माङ्गत्वात् कर्मकाले पालनीयम् । स्मार्तोऽनृतवदननिषेधस्तु पुरुषार्थ एव, न कर्माङ्गम् । 'अग्ने व्रतपते व्रतमचारिष तदशकम् । तन्मे राधोदयमहं य एवास्मि सोऽस्मि' ( वा० सं० २१२८) अय व्रतविसर्गमन्त्रः । व्रतं विसृजते येनोपेयात्' ( का० श्री० सू० ३।८।२९) । व्रतग्रहणे मन्त्रद्वयमुक्तम् । येन प्रथमेन द्वितीयेन वा व्रतादानं तेनैव व्रत विसृजेदिति सूत्रार्थः । मन्त्रार्थस्तु–हे अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं कर्मानुष्ठितवानस्मि तदशक ( पृ० २ ९ ० ) यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि पुनाति धातु का अर्थ सुख और आनन्द से युक्त हो, इसमें कोई प्रमाण नही है । ऐसा मानने पर पवित्र वही माना जायगा, जो कि सुखकारक हो । इस तरह से तो मद्य और मास के प्रेमियो के लिये ये द्रव्य भी सुख कर होते ही हैं, तब तो मद्य और मास को भी पवित्र मानना पडेगा । इसी तरह से दयानन्द ने ' द्वयं वा इदं' तथा 'विद्वासो हि देवा:' शतपथ श्रुति के इन वचनो को देवताओ अर्थात् विद्वान् मनुष्यो की सत्ता मे प्रमाण माना है, वस्तुतः यह सब चबित चर्बण है, इनका उत्तर अनेक बार दिया जा चुका है । वस्तुतस्तु शतपथ- ब्राह्मण के वचन के अनुसार ही इस वाक्य का उपयोग व्रत को स्वीकार करते समय अर्थवाद वाक्य के रूप में किया जाता है । 'अग्ने व्रतपते ' यह वाजसनेय मन्त्र है । इसका अर्थ यह है-'हे व्रत के पालक अग्ने, तुम्हारी आज्ञा से मैं इस व्रत का अनुष्ठान करने जा रहा हूँ । आपकी आज्ञा मिल जाने पर हो मैं अग्निहोत्र, चातुर्मास्य आदि किसी कर्म का अनुष्ठान प्रारम्भ करूँगा, उस कर्म को पूरा करने में मैं समर्थ होऊँ, मेरा वह कर्म आपकी कृपा से निर्विघ्न पूरा होकर फल देने में समर्थ हो, इसके लिये यह मैं यजमान मनुष्य देह से उठ कर देवता के शरीर को प्राप्त करता हूँ । सत्य कर्म का अनुष्ठान करने पर मानो उसका प्रत्यक्ष फल प्रतीत हो रहा हो, इस अभिप्राय से ' इदं ' ( यह ) शब्द से उसका निर्देश किया गया है । मनुष्य का जन्म अनृत इसलिये कहा जाता है कि यह शीघ्र नष्ट हो जाता है । जैसे कि स्वप्न में देखे गये हाथी -घोडा आदि पदार्थ क्षण स्थायी होते हैं, क्योकि जगने के साथ ही इनकी सत्ता लुप्त हो जाती है । देव योनि का जन्म बहुत समय तक स्थिर रहता है, जैसे कि जाग्रत अवस्था के हाथी-घोड़ा आदि पदार्थ स्वप्न दशा की अपेक्षा चिरस्थायी होते हैं । यहाँ सत्य बोलने का यह नियम प्रस्तुत कर्म का अंग है, इसलिये कर्माग के रूप में ही कर्म करते समय इसका पालन किया जाता है । स्मृतियो में असत्य बोलवे का निषेध पुरुषार्थ के रूप में विहित है, वह कर्म का अंग नहीं होता । , ' ' ऊपर के मन्त्र का विनियोग जैसे व्रत को स्वीकार करते समय किया जाता है उसी तरह से अग्ने व्रतमचारिषम् इत्यादि मन्त्र का विनियोग व्रत के विसर्जन में किया जाता है । कात्यायन श्रौतसूत्र में प्रतिपादित है कि व्रत के ग्रहण के लिये दो मन्त्रों का विनियोग बताया गया है । जिस मन्त्र से व्रत का ग्रहण करे, व्रत का विसर्जन भी भूत काल की क्रिया के द्वारा उसी मन्त्र से करे । इस मन्त्र का अर्थ यह है - हे व्रतपालक अग्ने, मैंने इस कर्म का अनुष्ठान भलीभांति पूरा कर लिया है, आपकी कृपा से ही मैं इसमें १९०

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वेदार्थपारिजातः १५१४ भवदनुग्रहेणानुष्ठातु शक्तोऽभवम् । तन्मे कर्म अराधि साधितम् । द्वितीयो मन्त्र -अग्ने इद कर्म समाप्य योऽह कर्मणः पुरा अस्मि स एव मनुष्योऽस्मि । अस्यैव मन्त्रस्यार्थवादभूतमिद वचनम् । अत्र देवाना दीर्घकालस्थायित्वादेव सत्यत्वमुक्तम् । अन्यादृशस्य सत्यस्यान्यस्य च देवेन मनुष्येण चाभेदासम्भवान् । व्रतग्रहणेन च 'इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि' इत्यस्याभिप्रायं स्वयमेव व्यक्ति श्रुति । 'तन्मनुष्येभ्यो देवानुपैति' । देवाश्च नित्य सत्यवादिनस्तस्मादयमपि व्रतपालनेन देवत्वमापन्नः सत्यमेव वदेत् ॥ तेन देववद्यशस्वी च भवति ॥ देवा नित्यं सत्य वदन्ति, मनुष्यास्तु सत्यमपि वदन्त्यनृतमपि । देवाना सत्यमेव व्रतं भवति । तस्माद्देवत्वमापन्नेन मनुष्येणापि सत्यमेव वक्तव्यम् । अत एव व्रतत्यागात् कर्माङ्गसत्यवदनस्यापि त्यागो भवति, स्मार्तपुरुषार्थानृतवदननिषेधपालनपरायणत्वे सत्यपि । अत एव य एवास्मि सोऽस्मीति मन्त्रवचन श्लिष्यते । नह्य- विद्वान् कस्मैचित् कालाय विद्वान् भवति विद्वान् भूत्वा पुनरप्यविद्वान् भवतीति सङ्गच्छते । तस्मादेभिर्वचनैर्विदुषा देवत्वसाधनं कुशकाशावलम्बनमेव । यत्तु — ' मनुष्याणा द्वाभ्या लक्षणाभ्या द्वे एव सज्ञे भवतः - देवो मनुष्यश्चेति । तत्र सत्य चैवानृतं च द्वे कारणे स्त· । यत्सत्यवचन सत्यमान सत्यकर्म तदेव देवा आश्रयन्ति तथैवानृतवचनमनृतमानमनृत कर्म चेति मनुष्याश्चेति ॥ योऽनृत त्यक्त्वा सत्यमुपैति स देव. परिगण्यते । यश्च सत्य त्यक्त्वाऽनृतमुपैति स मनुष्यश्च । य सत्यव्रत स यशस्विना मध्ये यशस्वी भवति' इति, तत्तु सर्वथा कुविचाररमणीयम्, जातिभेदस्य साधितत्वात् । किञ्चैव मनुष्या. प्रायेण सत्यमनृत समर्थ रहा हूं । इसीलिये मेरा यह कर्म पूरा होकर फलदायक बन सका है । दूसरे मन्त्र का अर्थ यह है कि इस कर्म को पूरा करके मैं पुनः वही बन गया हूं, जो कि इस कर्म के प्रारंभ करने से पहले था । इसी मन्त्र का अर्थवाद वाक्य आपके द्वारा उद्धृत यह शतपथ श्रुति का वचन है । यहाँ देवताओ की दीर्घकाल तक स्थिति रहने से ही उसको सत्य कहा गया है, क्योंकि इसके सिवाय सत्य या असत्य के दूसरे रूप की मनुष्य और देवो से कोई तुलना नही हो सकती । व्रत का ग्रहण कर लेने पर ' यह मै अनृत से सत्य को प्राप्त करता हूं' इस श्रुति के अभिप्राय को शतपथ श्रुति से इस तरह से व्यक्त किया है कि वह मनुष्यों की स्थिति से उठकर देवो की स्थिति मे पहुंच जाता है । देवता सदा सच बोलते है । व्रत का आचरण करते समय यजमान भी देवता बन गया है, अतः वह भी उस समय सच बोले । ऐसा करने पर वह देवताओ के समान यशस्वी हो जाता है । देवगण सदा सच ही बोलते हैं । मनुष्य तो सच भी बोलते है और झूठ भी । सच बोलना ही देवताओ का व्रत है, अतः देवभाव को स्वीकार करने पर मनुष्य को भी सच ही बोलना चाहिये । इस व्रत के समाप्त हो जाने पर कर्म के अगभूत सत्य बोलने का भी परित्याग कर दिया जाता है, किन्तु साथ ही पुरुषार्थ के रूप में स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित असत्य भाषण के निषेध का तो पालन करना ही चाहिये, अर्थात् श्रुति का यह अभिप्राय नही है कि बाद में उसको असत्य भाषण की अबाध छूट मिल जाती है, किन्तु सामान्यतः झूठ न बोलने के व्रत का तो पालन उसे पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिये निरन्तर करते ही रहना चाहिये । इसी मे इस अन्तिम मन्त्र की संगति बैठ सकती है कि जैसा मैं व्रत स्वीकार करने के पहले था, वैसा ही व्रत समाप्त करने के बाद भी हो गया हूं । मूर्ख व्यक्ति कुछ समय के लिये विद्वान् नही बन सकता और न विद्वान् बनकर पुनः मूर्ख हो सकता है । इसलिये इन वचनो के आधार पर विद्वान् मनुष्यो को देवता सिद्ध करने की बात कुश और काश का (तिनके का) सहारा लेते सरीखी है । दयानन्द ने इस शतपथ श्रुति का अर्थ इस तरह से किया है - 'दो लक्षणो के पाये जाने से मनुष्यो की दो संज्ञाएँ होती हैं, अर्थात् एक देव और दूसरी मनुष्य । उनमें भेद होने के सत्य और झूठ दो कारण हैं । जो कोई सत्य भाषण, सत्य स्वीकार और सत्य कर्म करते हैं, वे देव तथा जो झूठ बोलते झूठ मानते और झूठ कर्म करते हैं, वे मनुष्य कहे जाते हैं । इसलिये झूठ को छोड़कर सत्य को प्राप्त करना सबके लिये उचित है । इस कारण से बुद्धिमान् लोग निरन्तर सत्य ही कहें, मानें और करे । क्योकि सत्यव्रत आचरण करने वाले जो देव है, वे तो कीर्तिमानों में कीर्तिमान् होकर सदा आनन्द में रहते है, परन्तु उनसे विपरीत चलने वाले मनुष्य दुःख को प्राप्त होकर सब दिन पीडित ही रहते हैं । इससे सत्यवादी विद्वान् ही देव कहलाते है' ( पृ० २ ९ ० २ ९ १ ), किन्तु यह सारा कथन बहुत ही गलत है, देव और मनुष्य जाति की भिन्नता हम सिद्ध कर चुके हैं । अपिच, मनुष्य प्रायः सच और झूठ बोलते ही रहते हैं । इस तरह

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वेदार्थपारिजातः १५१४ च वदन्ति । तथात्वे सदैव देवत्व मनुष्यत्व च तत्र भविष्यत । किञ्च, शास्त्रेण कदाचिदप्यनृतवदनं न विधीयते, तस्य रागप्राप्तत्वात् । प्रकृते तु यज्ञेषु व्रतग्रहणनिबन्धना देवत्वावाप्तिस्तन्निबन्धन च सत्यवदनरूप कर्माङ्गानुष्ठानम् । किञ्चान्यत्र सत्यवदनमनृतवदन च मनुष्यकर्तृक शुभमशुभ च वाचिक कर्म भवति, प्रकृते तु मनुष्यस्यानृतत्व देवस्य मत्यत्वं चिरकाल-, स्थायित्वास्थायित्वाभ्यामेवोक्तम् ॥ अपि च त्वद्रीत्या विद्वासोऽप्यनृतवादिनो भवन्ति मूर्खाश्च सत्यवादिनो भवन्ति । तथा चैकत्रैव देवत्वमनुष्यत्वयो साङ्कमनि स्यात् । सिद्धान्ते तु स्मार्नानृतवदनत्यागिन सत्यवादिमनुष्यत्वं श्रौतकर्माङ्ग- रूपसत्यव्रताचरणशीलस्य व्रतकालपर्यन्तं देवत्वमन्यदा मनुष्यत्वमिति नासमञ्जसम् | त्वद्रीत्या तु पूर्वोक्तमन्त्रसूत्रोकव्रत- ग्रहणतत्परित्यागजनितदेवत्वमनुष्यत्वोद्गमनादिक सर्वथासङ्गतमेव स्यात् । त्वद्रीत्या मनुष्याणामनृतवादित्व स्वाभाविक- मेवेति मनुष्येष्वनृतवादिमनुष्यानिन्द्यत्वमेव स्यात् । सिद्धान्ते तु तदपि दूषण नास्ति । सत्यवादिमनुष्यापेक्षयाऽनृतवादि- मनुष्यस्य निन्द्यत्वमस्त्येव । देवास्तु मनुष्यजातिभिन्ना एव । ऋषिप्रमाणत्त्रेन यदुक्तम्—'तं यज्ञ बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुपं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये । ' ( वा ० सं ० ३१।९ ), ' अथ यदेवानुब्रवीत । तेनर्षिभ्य ऋणं जायते तद्ध्येभ्य एतत् करोत्यृषीणा निधिगोप इति ह्यनूचानमाहुः I।' ( श० १| ७| २| ३ ), ' अथार्षेय प्रवृणीते । ऋषिभ्यश्चैवैनमेतद्देवेभ्यश्च निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञ प्रापदिति । तस्मादार्षेय प्रवृणीते ।' (श० १ |४| २ २) इति, तदपि मन्दम् उक्तमन्त्रेषु ऋषिशब्दसत्त्वेऽपि तत्र तल्लक्षणानुक्ते । मन्त्रार्थस्तु—त यज्ञ- साधनभूतं पुरुष यज्ञ पशुत्वेन विभाव्य यूपे बद्ध बर्हिषि मानसे यज्ञे प्रौक्षन् प्रोक्षणादिभि: संस्कारैः संस्कृतवन्तः । कीदृशम्,, '. ' ( ) अग्रतः स्थूलसृष्टेः पूर्वं जात पुरुषत्वेनोत्पन्नम् तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुष । वा० सं ० इति मन्त्र- वर्णात् । तेन पुरुषरूपेण पशुना देवा अयजन्त मानसं यज्ञ कृतवन्तः । के ते? ये साध्याः सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापतिप्रभृतयो देवा ये च तदनुकूला ऋषयो मन्त्रद्रष्टारस्ते सर्वेऽप्ययजन्त । नह्यत्रर्षीणा किञ्चिल्लक्षणमुक्तम् । से वे देवता और मनुष्य सदा साथ साथ बने रहेगे । शास्त्र कभी भी झूठ बोलने का विधान नही करता, क्योकि वह तो राग से प्राप्त है, मनुष्य अपने स्वार्थ के लिये असत्य बोलता रहता है । प्रकृत स्थल मे यज्ञ में व्रत का ग्रहण करते समय देवत्व की स्वीकृति और सच बुरा बोलवे का नियम कर्म के अंग के रूप में मान्य है । सामान्य स्थिति में सत्य बोलना या झूठ बोलना मनुष्य का भला और माना जाने वाला वाणी का कर्म है, प्रकृत याज्ञिक स्थिति मे मनुष्य की अनूतता और देवता की सत्यता उनके चिर काल तक रहने और न रहने पर आधृत है । आपके मत के अनुसार भी विद्वान् अनृतभाषी और मूर्ख सत्यभाषी होते हैं । इस तरह से आपके मत से एक ही मनुष्य मे देवत्व और मनुष्यत्व जाति का साकर्य दोष आवेगा । हमारे मत में तो यह दोष नही है, क्योकि स्मृतियों द्वारा उपदिष्ट असत्य भाषण का त्याग करने वाला मनुष्य सत्यभाषी कहलावेगा और श्रीत कर्म के अंगभूत सत्यव्रत का आचरण करने वाला मनुष्य व्रत की अवधि तक देवता और बाद में मनुष्य कहलावेगा । इसमें परस्पर कोई असामजस्य नही है । आपके मत से पूर्वोक्त मन्त्र और ब्राह्मण के अनुसार व्रत का ग्रहण और त्याग करने से देवत्व और मनुष्यत्व का उद्गम और निर्गम सर्वथा असंगत हो जायया । आपके मत के अनुसार मनुष्यो का झूठ बोलना स्वभाव है, अतः मनुष्यो में अनृतवादी मनुष्य निन्द्य नही माना जायगा । हमारे मत में तो यह दूषण भी नही लग सकता, क्योकि हमारे मत में तो सत्यवादी पुरुष की अपेक्षा असत्यवादी पुरुष की निन्दा की ही जाती है । देवता तो मनुष्य जाति से सर्वथा भिन्न है । ऋषियों की चर्चा प्रारंभ करते हुए दयानन्द ने ' तं यज्ञं ० ' इत्यादि वेदमन्त्रो को उद्धृत किया है, किन्तु यह उचित नही है, क्योकि इन मन्त्रों में ऋषि शब्द के रहने पर भी इनमें ऋषि का लक्षण नही बताया गया है । प्रथम मन्त्र का सीधा-सादा अर्थ इस प्रकार है— उस यज्ञ के प्रथम साधनभूत पुरुष रूपी यज्ञ को पशु के रूप में कल्पित करके, यूप में बाघकर देवताओं ने उस प्रथम याग में मानस प्रक्रिया से ही बहि के द्वारा प्रोक्षण कर आहुति देने के लिये संस्कृत किया । वह देवताओं के द्वारा प्रथम पशु के रूप में कल्पित यज्ञपुरुष स्थूल सृष्टि के पहिले ही उत्पन्न हो गया था, विराट् की उत्पति वाले मन्त्र में ही यह बताया गया है कि यह पुरुष विराट् से उत्पन्न हुआ । उस पुरुष रूप पशु से देवताओं ने प्रथम मानस याग का अनुष्ठान किया । इन यज्ञ करने वालो में सृष्टि के उत्पन्न करने में समर्थ प्रजापति प्रभृति देवगण, इनका अनुवर्तन करने वाले देवर्षि गण, जो कि मन्त्रो के द्रष्टा थे, संमिलित थे । इस मन्त्र में इतनी ही बात बताई गई है, यहाँ ऋषियों का कोई लक्षण नही बताया गया है ।

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वेदार्थपारिजातः १५१६ यदुक्तम् —'सर्वविद्या पठित्वा यदनुवचनमध्यापन कर्मानुष्ठानमस्ति तदृषिकृत्यं विज्ञायते । तेनाध्ययनाध्यापन- कर्मणैवर्षयः सेवनीया जायन्ते । यत्तेषा प्रियमाचरन्ति तदेतत्तेभ्य: सेवाकर्तृभ्य एव सुखकारी भवति । यः सर्वविद्या- विभूत्वाऽध्यापयति तमेवानूचानमृषिमाह । अथार्षेयमिति -यो मनुष्यः पाठन कर्म प्रवृणीते तदार्षेय कर्म कथ्यते । य ऋषिभ्यो देवेभ्यो विद्यार्थिभ्यश्च प्रिय वस्तु निवेदयित्वा नित्यं विद्यामधीते, स विद्वान् महावीर्यो भूत्वा यज्ञ विज्ञानाख्यं प्रापत् प्राप्नोति । तस्मादिदमार्षेय कर्म सर्वैर्मनुष्यै स्वीकार्यम्' ( पृ ० २९० ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, अध्यापनस्यैवर्षित्व- प्रयोजकत्वे समेषामध्यापकानामृषित्वव्यवहारापत्ते । मन्वादिभिस्तु – 'उपनीय तु यः शिष्य वेदमध्यापयेद् द्विज । सरहस्यं सकल्प च तमाचार्य प्रचक्षते || ' ( म० २ १४० ) इति वृत्तिनिरपेक्षस्याचार्यत्व वृत्तिसापेक्षस्य चोपाध्यायत्वमुक्तम् । निरुक्त- कारेस्तु —'ऋषिर्दर्शनात् ', 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः' इत्यादिभिर्मन्त्रद्रष्टृणामृषित्वमुक्तम् । 'ऋषिषूत्क्रामत्सु' (नि० १३| १२ ) इत्यादिवचनैर्ऋषीणा कालविशेषोऽपि सूचितः । अत एवोत्क्रामत्सु तेषु मनुष्या देवानब्रुवन् को न ऋषिर्भविष्यतीति । ततो देवास्तर्कमृषि प्रायच्छन् । त्वद्रीत्या नु विद्वासो देवा भवन्ति त एव चाध्यापयितार इति । अनेन देवानामेवर्षित्वं समायातमिति देवेभ्यस्तेषा भेद. किमूलकः? किञ्चैतेषा वचनाना नायमर्थः 'य प्रवक्ति स ऋषिर्भवति' इति, तत्र त्वनुवचनेन ऋणापाकरण विज्ञायते । 'ऋणं ह वै जायते योऽस्ति स जायमान एव देवेभ्य ऋषिभ्यः पितृभ्यो मनुष्येभ्यः' ( श० १।५।१ ) । अवदानस्वरूपविवक्षया- अख्यायिकामाह-यो द्विजातिः स जायमान एव देवादिभ्यश्चतुभ्र्भ्योऽपि ऋणम् ऋणवान् अधर्माणिको जायते । ऋणित्वेन जननमेव यागादिनिमित्तम् । स यदेव यजेत तेन देवेभ्य ऋण जायते । तदुद्ध्येभ्य एतत्करोति यदेनान् यजते यदेभ्यो जुहोति यदेव यजते तेन कारणेन यागेन निमित्तेन देवेभ्यस्तदृणं जायते हि यस्माद्यागकर्मभ्य एभ्य एतद् इदानी करोति, अतस्तेभ्य- स्तदृणमित्यर्थः । यदेनान् यागहोमावुभावपि नियमेन देवार्थमेव यतः क्रियते, अतस्तेषा तौ तस्यावश्यकप्रदानत्वाद् ऋणी जायत इत्यर्थः । 'यदेवानुब्रुवीतेति' (रा ० १/७/२/३ ) यदेवानुवचन कुर्यात् अधीयीतेत्यर्थः । तेन ऋषिभ्य ऋण जायते हि आगे के दो ब्राह्मण वाक्यों को दयानन्द ने इस तरह से व्याख्या की है-'जो सब विद्याओ को पढकर दूसरो को पढाता है, वह ऋषि कर्म कहलाता है । उससे जितना भी मनुष्यो पर ऋषियों का ऋण हो, उस सबकी निवृत्ति उनकी सेवा करने से हो जाती है | इससे जो नित्य विद्यावान ग्रहण और सेवा कर्म करना है, वही परस्पर आनन्दकारक है और यही व्यवहार ( निविगोप) अर्थात् विद्याकोष का रक्षक है । विद्या पढकर सबको पढाने वाले ऋषियो और देवो की प्रिय पदार्थों से सेवा करने वाला विद्वान् बहु पराक्रमयुक्त होकर विशेष ज्ञान को प्राप्त करता है । इससे आर्षेय, अर्थात् ऋषिकर्म को सब मनुष्य स्वीकार करें ( ० २ ९ १ ), किन्तु यह सारा कथन गलत है, क्योंकि यदि अध्ययन को ही ऋषि बनने का प्रयोजक ( कारण) माना जाय, तो सभी अध्यापक ऋषि लगेंगे । मनु प्रभृति ने तो बिना वृत्ति की आकाक्षा के जो विद्याध्ययन कराता है, उसको आचार्य तथा जो वृत्ति लेकर विद्याध्ययनकहलाने कराता है, उसको उपाध्याय कहा है । निरुक्तकार ने मन्त्र के द्रष्टा को ऋषि माना है । निरुक्तकार ने ही यह भी बताया है कि इन मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की उत्पत्ति भी किसी कालविशेष मे हुई थी । इसीलिये ऋषियों की उत्पत्ति के काल के बीत जाने पर मनुष्यों से कि अब हमारे? ने देवताओ पूछा लिये कौन ऋषि होगा तब देवताओ ने मनुष्य को उसकी तर्कशक्ति को ऋषियों की जगह प्रदान किया । आपके कथन के अनुसार तो विद्वान् मनुष्य ही देवता होते है और वे ही अध्यापक भी होते है । इस तरह से तो देवता ही ऋषि हुए,तब इनमें परस्पर भेद आप किस आधार पर करेंगे? वास्तव में इन ब्राह्मणवचनो का यह अर्थ होता ही नही कि जो अध्यापन करता है, वह ऋषि होता इतना कहा गया है कि अध्यापन करने से ऋषि ऋण चुकाया जाता है । शतपथ ब्राह्मण में बताया गया है कि मनुष्यहै । यहां केवल,, साथ ही देवता ऋषि पितृगण और मनुष्यों का ऋणी रहता है । इस बात को वहीं आख्यायिका के रूप में उत्पन्न होने के द्विजाति उत्पन्न होने के साथ ही देवप्रभृति का ऋणी हो जाता है । इसीलिये उसको याग आदि करना चाहियेस्पष्ट किया गया है कि देवताओं के ऋण से मुक्त हो जाता है । अध्यापन करने से वह ऋषियों के ऋण से मुक्त हो जाता है । जिसका । याग करने से वह-, नष्ट न हो उसको निधि कहा जाता है । अध्यापक विद्यारूपी निधि का रक्षक होता है क्योंकि वह वेद उपयोग करने पर भी बढाता है । तैत्तिरीय संहिता में भी इसी अभिप्राय की श्रुति मिलती है कि 'उत्पन्न होने के साथ ही ब्राह्मणकी अध्ययनपरम्परा को आगे तीन ऋणों से ग्रस्त रहता

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वेदार्थपारिजातः १५१७ यस्मादध्ययनकर्मण ऋषिभ्य एतत्करोति, अतस्तेभ्यस्तद्णमित्यर्थः । उपभुज्यमानोऽपि यो न विनश्यति स निधिः । तस्य गोपायितेति वेदमनूच्यमानमाह । एतदभिप्रायेणैव 'जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिणवान् जायते । ब्रह्मचर्येणषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः । एष वा अनृणो य. पुत्री यज्वा ब्रह्मचारिवासी' (तै ० सं० ६| ३| ११ ) 'अथेति सर्वविद्यां पठित्वा यदनुवचनमध्यापन तदृषिकृत्यम्' ( पृ ० २ ९ ० ) इत्यप्यशुद्धम्, अथेत्यस्य पूर्ववृत्तयाग- निमित्तऋणनिरूपणानन्तरमित्येवार्थ, सर्वविद्यापठनस्याप्रकृतत्वात् । अनुवचन खलु गुरोर्मुखादध्ययनम् । अध्यापनमृषि- कृत्यम् ब्रह्मचर्येण स्वाध्यायाध्ययनेनष्यृ णापाकरणं जायते । अथार्षेय प्रवृणीते त ऋषिभिश्चैवैनमेतद्देवेभ्यश्च निवेदयति । अयं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदिति' ( श० ११४/२/२) यजमानस्यार्षेयवरण विधत्ते । अत्राप्यथगब्दस्य देवहोतृवरणानन्तरम् । 'आर्षेयमृषीणा सम्बन्धिनमध्वर्युर्वृणीते वरणं कुर्याद् अमुवदमुवदिति' (का० श्र० सू० ३।२६ ) | अमुवदिति सर्वनामस्थाने यजमानसम्बन्धीनि पूर्वजभूतानि परस्तात् पितृस्थानीयाद् अर्वाश्चि पितृतत्पुत्रतत्पौत्ररूपाणि त्रीण्यार्षेयाणि ऋषेरपत्यानि --- वृणीत इति देवयाज्ञिकभाष्यम् । तत्प्रयोजनमाह—ऋषिभ्यश्चेति । यो यष्टुमुपक्रान्तवान् अय यजमान शरीरश्रुताध्ययन- सम्पत्त्या हि महासामर्थ्यवान् इत्येतत् अमुवदिति पुरातनप्रसिद्धऋषिदृष्टान्तेन गम्यते । अतस्तेभ्योऽस्य यजमानस्य सामर्थ्यं विदितं भवति । अत्रान्वाधाने देवतापरिग्रहात् तत्सन्निधान सिद्धमित्यभिप्रेत्य ऋषिभ्यश्चैवैनमेतद्देवेभ्यश्चेति । ' यो मनुष्यः पाठन कर्म प्रवृणीते तदार्षेय कर्म कथ्यते' इत्यपि निर्मूलमक्षरबाह्यत्वाद्विरुद्धत्वात् । 'य ऋषिभ्यो देवेभ्यो विद्याभिभ्यश्च प्रियं वस्तु निवेदयित्वा नित्य विद्यामधीते स विद्वान् महावीर्यो भूत्वा यज्ञ विज्ञानाख्य प्राप्नोति' ( पृ० २९०) इति, तदपि काल्पनिक-मेव व्याख्यानम्, विद्यामधीते इत्यंशस्य मूलेऽभावात् । वस्तुतस्तु पञ्चसु महायज्ञेषु यानि यानि कर्माणि प्रसिद्धानि तेषामज्ञाना- ध्वश्रद्धया वा तान्युपेक्ष्य मन्त्रान् ब्राह्मणानि च चार्वाकपथे नेतुमेव परम्पराविरुद्धं श्रुतिविरुद्ध च यकिञ्चिज्जल्पितवान् । है । वह ब्रह्मचर्य के पालन और वेदाध्ययन से ऋषि ऋण से, यज्ञ का अनुष्ठान कर देव ऋण से और प्रजा को उत्पन्न कर पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है । वह मनुष्य ऋणमुक्त माना जाता है जिसने कि पुत्र उत्पन्न किया है, यज्ञ का अनुष्ठान किया है और विधिपूर्वक गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन किया है । ' अपने सब विद्याओ को पढने के बाद उनको दूसरो को पढाना ऋषि का काम है' यह व्याख्या तो सर्वथा अशुद्ध है । ' अर्थ' शब्द पूर्व प्रकरण का बोधक होता है । यहाँ सब विद्याओ को पढने और उनके अध्यापन का कोई प्रसग नही है, किन्तु प्रकरण यहीं याग निमित्तक ऋण के अपाकरण का है ॥ अनुवचन का अर्थ गुरु के मुख से अध्ययन करना है । अध्यापन ऋषिकृत्य है, इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य के पालन से और वेद के अध्ययन से ऋषि ऋण दूर हो जाता है । शतपथ ब्राह्मण के मूल मे उद्धृत वचन में भी यजमान के ऋषिवरण की बात कही गई है । यहाँ भी ' अथ' शब्द से यह बताया गया है कि देवताओ के निमित्त हवन करने वाले के वरण कर चुकने के बाद ऋषि सम्बन्धी कार्य के संपादक अध्वर्यु का वरण करना चाहिये । कात्यायन श्रौतसूत्र के वचन से भी इस बात की पुष्टि होती है । देवयाशिक ने यहाँ अपने भाग्य में बताया है कि ' अमुवत्' इस सर्वनाम शब्द के स्थान पर यजमान से संबद्ध पूर्वजो को छोड़कर उस यजमान से प्रारम्भ कर पिता, पुत्र और पौत्र के रूप मे तीन पुश्त का यहाँ वरण अभिप्रेत है । 'ऋषिभ्यश्च०' इत्यादि वचन से इसका प्रयोजन बताया गया है । यह यजमान जो याग आदि के अनुष्ठान करने में प्रवृत्त हुआ है, वह शरीर और वेदाध्ययन की संपत्ति से भरपूर है, यह बात पुराने प्रसिद्ध ऋषियों के उदाहरण से जानी जाती है । अतः उनके दृष्टान्त के इस यजमान की सामर्थ्य जान ली जाती है । यहां पर अन्वाधान प्रकरण मे देवताओ का पाठ होने से उनकी सनिधि अपने आप सिद्ध है, इसी अभिप्राय से इस ब्राह्मण वाक्य में ऋषियो के प्रति और देवताओ के प्रति निवेदन की बात स्वीकार की गई है । 'जो मनुष्य अध्यापक का कार्य स्वीकार करता है, उसका यह कार्य ऋषिकर्म कहलाता है' यह व्याख्या भी गलत है, क्योकि मूल ब्राह्मणवाक्य में इस अर्थ के बोधक पद नही है । 'जो ऋषियों को देवताओ को और विद्यार्थियो को प्रिय वस्तु देकर नित्य विद्या पढता है, यह महान् बलशाली विद्वान् बनकर विशेष ज्ञान को प्राप्त करता है यह व्याख्या भी कोरी कल्पना पर आधारित है । 'विद्यामधीते ' यह अंश मूल वाक्य में है ही नहीं । वास्तव में तो पाँच महायज्ञो में जिन जिन प्रसिद्ध अनुष्ठानों का विधान है, उनको ठीक से न जान पाने के कारण, अथवा अश्रद्धा के कारण जानबूझ कर उनकी उपेक्षा करके दयानन्द ने मूल मन्त्रो और ब्राह्मण वाक्यों की व्याख्या इस तरह से की है, जिसको पढकर कि मनुष्य चार्वाक जैसा नास्तिक बन जाय । यह बात श्रुति और परम्परा दोनों के ही विरुद्ध है । 1

पृष्ठ 620

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 620 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थ पारिजातः १५१८ यत्तु पितृप्रमाणत्वेन - ' ऊर्जं वहन्तीरमृतं पयः कीलालं परिस्रुतम् । स्वधा स्थ तर्पयत मे पितृन् ॥ ' ( वा० सं ० २।३४ ), ‘ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ ' ( वा० स० १ ९/ ५८ ) इति मन्त्रद्वयमुद्धृतम्, तदप्यसङ्गतम्, मन्त्रार्थानवबोधात् । तथाहि -' ऊर्जमित्यपो निषिञ्चति' ( का० श्री० सू० ४| १ | १ ९ ) इति रीत्या ऊर्जं वहन्तीति मन्त्रस्यापा निषेचने विनियोग उक्तः । मन्त्रार्थस्तु–हे आपः, यूयं स्वधास्य पित्र्यहविःस्वरूपा भवथ, अतो मे पितृ स्तर्पयत । कथंभूता आपः? परिस्रुतं वहन्तीः पुरुषेभ्यो निसृतं सारं वहन्त्यः । तञ्च त्रिविधम् - ऊर्जशब्देन घृतशब्देन पयः शब्देन चाभिधेयम् । ऊर्जशब्दोऽन्नगतं स्वादुत्वमभिधत्ते । घृतपयसी प्रसिद्धे । तत् त्रिविधमप्यमृत सर्वरोगविनाशकं मृत्युनाशकम् पुनः कोदृश कीलालं कीलनं कीलो बन्धस्तमलति वारयतीति ‘ ' कोलालम् । अल वारणपर्याप्तोः । सर्वबन्धनिवर्तकम् ॥ त्रिविधस्य सारस्य वहनादपां पितृतर्पकत्वमुपपन्नम् ॥ नात्र पितृपदार्थः पितृपरिभाषा वोक्ता । यत्तु — ' सर्वे मनुष्याः सर्वान् प्रत्येवं जानीयुश्चाज्ञापयेयुः । ये पितॄन् मम पितृपितामहानाचार्याढीश्च सर्वे यूयं तर्पयत स्वधा स्थ सत्यविद्याभक्तिस्वपदार्थधारिणो भवत । केन केन पदार्थेन ते सेवनीयास्तानाह - ( ऊर्ज ) पराक्रमं प्रापिकाः सुगन्धिताः प्रिया हृद्या आप; अमृतात्मकमनेकविधं रसं घृतमाज्यं पयो दुग्धं कीलालं संस्कारै सम्पादितमनेक- विधम्, परिस्रुतं माक्षिकं मधु कालपक्वं फलादिकं च निवेद्य पितृन् प्रसन्नान् कुर्यात्' ( पृ० २ ९१-२९ २ ) इति तत्तु कपोलकल्पितवेदबाह्यमेव व्याख्यानम्, ' सर्वे मनुष्या एवं जानीयुश्चाज्ञापयेयुः ' इति कथं कुतो वार्थं? मे पितॄन् यूयं तर्पयतेति कुतोऽर्थः सर्वैरेव स्वस्वपितरः स्वयमेव कुतो न तर्पणीयाः २ व्यवहारबाधितं चैतत् नहि लोकेऽन्यपितरस्तर्प्यमाणा इसके आगे दयानन्द ने पितृगण की सत्ता के प्रमाण के रूप मे दो वेद मन्त्रों को उद्धृत किया है, किन्तु यह भी असगत है, क्योंकि वे मन्त्र के अर्थ को ठीक से नही समझ सके है । कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार ' ऊर्जं वहन्ति' इस मन्त्र का विनियोग जल से सिंचन करने मे बताया गया है । मन्त्र का अर्थ यह है- हे जल की अधिष्ठातृ देवताओ, आप लोग हमारे पितृगण के लिये हबि पहुँचाकर उनको तृप्त कीजिये । हे जल देवताओं, आप लोग पुरुषो से निकलने वाले त्रिविध सार को वहन करने वाली है । यह त्रिविध सार ऊर्ज, घृत और पय ( दुग्ध ) शब्द से जाना जाता है । अन्न मे विद्यमान स्वाद को ऊर्ज के नाम से जाना जाता है । घी औरदुध तो लोक में प्रसिद्ध ही है । यह तीनो तरह का सार अमृत है, सभी तरह के रोगो का और मृत्यु का भी नाश करने वाला है । साथ ही यह कीलाल हैं । कोल शब्द बन्ध के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, उस बन्धन का जो निवारण करता है, उसको कीलाल कहा जाता है । अलं शब्द के दो अर्थ होते हैं, एक तो निवारण करना और दूसरा पर्याप्त । अभिप्राय यह हुआ कि आप लोग जिस त्रिविध सार को वहन करते हैं, वह सभी तरह के बन्धनो से मुक्ति दिलाने वाला है । इस त्रिविध सार के वाहक होने से जल देवता पितरों को भी अवश्य ही तृप्त कर देंगे । इस तरह से इस मन्त्र मे न तो पितृ पद का कोई अर्थ ही बताया गया है और न उसकी कोई परिभाषा हो दी गई है | स्वामी दयानन्द ने इसका अर्थ यह किया है- 'पिता या स्वामी अपने पुत्र, पौत्र, स्त्री और नोकरो को इस प्रकार आज्ञा देवे कि जो जो हमारे मान्य पिता, पितामह आदि, माता, मातामह आदि और आचार्य इनसे भिन्न भी विद्वान् लोग, जो अवस्था या ज्ञान मे बडे और मान्य हैं, तुम लोग उनका उत्तम उत्तम जल, रोगनाश करने वाले उत्तम अन्न, सब प्रकार के उत्तम फलों के रस आदि पदार्थों से नित्य सेवा किया करो कि जिससे वे प्रसन्न होकर तुम लोगों को सदा विद्या देते रहे, क्योंकि ऐसा करने से तुम लोग भी सदा प्रसन्न रहोगे,' ( पृ० २९ २ ), किन्तु सारा अर्थ कपोल कल्पित है और वेद के अक्षरों से इसका कुछ भी सम्बन्ध नही है । 'सभी मनुष्य जाने और आज्ञा दें यह अर्थ कहाँ से निकलेगा? मेरे पिता, पितामह आदि को तुम लोग तृप्त करो, यह अर्थ भी कैसे निकलेगा? सभी अपने अपने पिता, पितामह आदि को स्वयं ही तृप्त क्यों न करें? यह बात व्यवहार के विपरीत भी लगती है । लोक में ऐसा नही देखा जाता कि कोई व्यक्ति दूसरे के पितरो को तृप्त करता हो । मनुष्यों का संबोधन वाचक शब्द भी यहीं विद्यमान नही है । 'ऊजं वहन्ती' आदि शब्दो का जल आदि देकर प्रसन्न करे, यह अर्थ किस प्रमाण के आधार पर होगा ।"