वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 641–650
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 641–650
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वेदार्थपारिजातः १५३ ९ क्षीरादिरसेन पिन्वमानोऽभिवर्धमान माक्षेष्ट न क्षयं प्राप्नोतु । ' क्षि क्षये ', ' माडि लुड्', ' पिवि 'मवि णिवि सेचने ' इदित्वान्नुमि पिन्वमान इति रूपम् । अपि तुस ओदन, विश्वरूपा नानाविधफलप्रदरूना धेनु सती मम कामदुधा अभिलषितफलस्य दोग्ध्री दोग्धीति I। अस्तु भवतु । कामान् कामदुघा मनुश्च –' यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितर कि भूतमधिकं तनः ॥ ' ( १।९ ५ ) यस्य ब्राह्मणस्यास्येन मुखेन त्रिदिवौकसो हव्यानि हवीषि अश्नन्ति पितरश्च कव्यानि अश्नन्ति ततो ब्राह्मणादन्यत् कि भूतमधिकं भवितुमर्हति न किमपीत्यर्थः । जीवन्तश्च पितरः स्वमुखेनैवाश्नन्ति न ब्राह्मणमुखेनेति मृतपितृणामेव तृप्त्यर्थं ब्राह्मणभोजनम् । 'पिता प्रेतः स्यात् पितामहो जीवेत् पित्रे पिण्डं निधाय पितामहात् पराभ्या द्वाभ्या दद्यात्' ( का० श्री० सू० ), 'पिता यस्य निवृत्तः स्याज्जोवेच्चापि पितामहः । पितु स नाम सङ्कीर्त्य कीर्तयेत् प्रपितामहम् ॥ ' ( मनु० ३।२२१ ) । यस्य पिता मृतः स्यात्पितामहश्चेद् जीवेत् स पित्रे पिण्डं निधाय पितामहात्वराभ्या द्वाभ्या पिण्ड दद्यात् पितुर्नाम संकीर्त्य पितामह त्यक्त्वा प्रपितामह कीर्तयेत् । एतावता स्पष्टं मृतकश्राद्धमेव सिद्धयति । ' अद्यामृता पितृषु सम्भवन्तु ' । 'ये सोमे जगदीश्वरे पदार्थंविद्याया च सीदन्ति ते सोमसद, येरग्ने- विद्युतो विद्यागृहीता ते अग्निष्वात्ताः, ये बर्हिषि उत्तमे व्यवहारे सीदन्ति ते बर्हिषद, ये सोमैश्वर्यमोषधीरस वा पिबन्ति ते सोमपाः, ये हविर्होतुमर्हन्ति भुञ्जते भोजयन्ति वा ते हविर्भुज, य आज्यं ज्ञातु प्राप्तुं वा योग्यं रक्षन्ति पिबन्ति ' 1, वा ते आज्यपाः शोभनः कालो येषा ते सुकालिनः ये दुष्टान् यच्छन्ति निगृह्णन्ति ते यमा न्यायाधीशाः यः पाति स पिता, पितुः पिता पितामहः, पितामहस्य पिता प्रपितामहः, या मानयति सा माता या पितुर्माता सा पितामही, पिता- महस्य माता प्रपितामही, पत्न्याः, भगिन्यास्तथा गोत्रसङ्घ भद्रस्त्रीपुरुषेभ्योऽत्यन्तश्रद्धया त्तमवस्त्रान्नयानादिदान श्राद्धमुच्यते ( सत्यार्थप्रकाशे, चतुर्थ समुल्लासे, पृष्ठ ९ ) । तदेतत् सर्वं पूर्वोक्तश्रुतिस्मृतिसूत्रादिविरुद्धमेव । पाश्चात्त्याः पदार्थविद्याया वाला, स्वर्गसुख को देने वाला है । यह भात उस स्वर्गलोक मे स्वधा अर्थात् पितृनिमित्त दी गई खीर आदि से नदा बढता ही रहे, कभी कम न हो | यह ओदन नाना प्रकार के अभिलषित फलो को देनेवाली कामधेनु के समान हमारे लिये अभीष्ट फल का देने वाला हो । दूध की तरह सब कामनाओ को देने वाली गौ कामदुधा कही जाती है । मनुस्मृति में भी बताया गया है कि 'जिस ब्राह्मण के मुँह से देवतागण हव्य और पितृगण कव्य आहुति को ग्रहण करते है, उससे बढकर कौन प्राणी यहाँ हो सकता है । ' अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण से बढकर इस संसार मे कोई प्राणी उत्कृष्ट नही है । जीवित पिता, पितामह आदि तो अपने मुँह से भोजन करते हैं, ब्राह्मण के मुंह से नही । अत ब्राह्मण भोजन मृत पितरो के ही निमित्त किया जाता है । कात्यायन श्रौतसूत्र और मनुस्मृति मे बताया गया है कि जिसके पिता भर गये हैं, किन्तु पितामह जीवित है, तो वह व्यक्ति अपने पिता को पिण्ड देकर पितामह से आगे के प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह के नाम से पिण्ड दे । यहाँ जीवित पितामह को पिण्ड न देने का विधान है, अतः स्पष्ट है कि श्राद्ध, पिण्डदान आदि मृत व्यक्ति का ही किया जाता है । 'जो सोम, अर्थात् जगदीश्वर के स्वरूप और पदार्थविद्या के स्वरूप को समझने में निरन्तर लगे रहते है, वे पितृगण सोमसद् कहलाते हैं । जिन्होने अग्नि अर्थात् विद्युच्छक्ति को नियन्त्रित करने की विद्या सीखी है, वे अग्निष्वात्त कहे जाते है । जो उत्तम व्यवहार में रहते है, अर्थात् सबके साथ भला व्यवहार करते हैं, वे बर्हिषद् कहलाते है । जो सोम के ऐश्वर्य को अथवा औषधी के रस को पीते है, वे सोमपा कहे जाते है । जो हवि का भोजन स्वयं करते है और दूसरों को भी कराते हैं, वे हविर्भुज् कहलाते है । आज्यपा नाम के पितृगण वे हैं, जो कि घृत को प्राप्त करने वाले, जानने वाले तथा उसकी रक्षा करके पीने वाले हैं । जिनका समय बड़े बाराम से बीतता है, वे सुकालिन् कहे जाते हैं । जो दुष्टों को दण्ड देते हैं, वे न्यायाधीश यम कहे जाते हैं । जो रक्षा करता है, वह पिता, पिता का पिता पितामह और पितामह के पिता प्रपितामह कहे जाते हैं । जो मान करती है, वह माता है । पिता को माता पितामही और पितामह की माता प्रपितामही कही जाती है । इसी तरह से पत्नी, बहिन आदि जो भी अपने बन्धुबान्धवों में पूजनीय स्त्री-
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वेदार्थपारिजातः १५४० निपुणा सन्ति । दयानन्दरीत्या तेषा श्राद्धमायाति । अग्निविद्यानिपुणास्तद्रीत्या अग्निष्वात्ता भवन्ति । तत्र स्वर्णकार- लौहकारादयो भवन्ति । बर्हिषदो व्यवहारविदः के भवन्तीति तु नोक्तम् । सोमपास्त्वद्य विविधजातीया एलोपैथचिकित्सका भवन्ति । ये मादकद्रव्याणि हिसोत्पादितानि चापहाय भुञ्जते ते सोमपाः । तादृशाः के सामाजिकानां पितरः? तादृशास्तु गोऽजहरिणादयः शाकाहारिणो वा । तेषामेव श्राद्धतर्पणादिकं तैः क्रियते किम्? आज्यपाः" ये घृतमेव पिबन्ति ते के? इति तु न स्पष्टम् । मनुना तु विशिष्टानां तेषा तेषा पितॄणा निर्देशः कृत एव । 'यमाय सोमः पवते यमाय क्रियते हविः । यमं ह यज्ञा गच्छति अग्निदूतो अरं कृतः ॥ ' ( अथर्व० १८।२1१ ) यमाय देवाय सोमः पवते पूयते अभिषूयते । सोमसाधनो ज्योतिष्टोमादिर्नानुष्ठीयेत चेद् यमो न सुखी स्यादिति यमप्रीतये सोमोऽभिषूयते ॥ अथवा पितॄणा सोमसम्बन्धेन यमस्यापि सोमोऽस्त्येव ॥ यमाय हविराज्यादिलक्षणं क्रियते सस्क्रियते ॥ किञ्च, यममेव कृत्स्नो ज्योतिष्टोमादिर्गच्छति । कीदृशो यज्ञः? अग्निदूतः । दूतो यथा स्वामिना दत्तं धनादिकं दातव्याय प्रयच्छति, एवमग्निरपि यजमानेन दत्त हविस्तस्मै तस्मै देवाय प्रयच्छतीत्यग्निर्दूत उच्यते । पुनः कथंभूतो यज्ञः? अरं कृतः, स्तोत्रशस्त्रादिभिर्भूषितः । यद्वा अलमत्यर्थं निष्पादितसाङ्गोपाङ्गो यज्ञ इत्यर्थः । यद्यपि सोमो हविर्यज्ञश्च सर्वदेवार्था भवन्ति, तथापि यमस्य सर्वप्राणिसंहर्तृत्वेन सर्वेषा पितृलोकप्रापकत्वेन वा प्राधान्याद् यमायैव सोमादिक क्रियत इत्युपचर्यते । दयानन्दस्तु यनपदेन न्यायाधीशो मण्डलाधीशो ( मजिस्ट्रेट ) यम उच्यत इति तद्रात्या तदर्थमेव सोमादयः क्रियन्ते । परं तदर्थमग्नेर्दोत्य कथमुपयुज्यत इत्यस्य समाधानं तु तैर्न कर्तुं शक्यते । वेदे तु –' यो ममार प्रथमो मर्त्यानां पुरुष है, उनको अत्यन्त श्रद्धा के साथ उत्तम, वस्त्र, अन्न, पान आदि का दान करना ही श्राद्ध कहलाता है' । स्वामी दयानन्द ने श्राद्ध की यह परिभाषा सत्यार्थप्रकाश के चतुर्थ समुल्लास मे की है । उनकी यह सारी बात पूर्व उद्धृत श्रुति, स्मृति, सूत्र आदि के वचनों के विपरीत है । पाश्चात्य विद्वान् पदार्थ विद्या में परम प्रवीण होते है । दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाजियो को उन्ही का श्राद्ध करना चाहिये । उनके मत से अग्नि विद्या में निपुण पितर अग्निष्वात्त कहे जाते हैं । तदनुसार सुनार, लोहार आदि का श्राद्ध उनको करना चाहिये । व्यवहारवेत्ता बर्हिषद् कौन है? यह उन्होने स्पष्ट बताया नही । उनकी व्याख्या के अनुसार आजकल के एलोपैथ चिकित्सक सोमपा कहे जायेंगे । अथवा मादक द्रव्यो को और हिंसा से उत्पन्न मास आदि को न खाने वाले प्राणी सोमपा कहे जायंगे । सामाजिकों के ये ' सोमपा' नाम के पितर गाय, बकरी, हरिण आदि अथवा शाकाहारी मनुष्य माने जायेंगे । क्या वे लोग उन्ही का श्राद्ध, तर्पण आदि करते है? जो खाली घी ही पीते हैं, ऐसे व्यक्ति कौन है? यह स्पष्ट नही किया गया है । इसके विपरीत मनुस्मृति आदि ग्रन्थो मे इन सभी तरह के पितरो के स्वरूप को स्पष्ट व्याख्या की गई है । ' यमाय सोम० ' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्र का, अर्थ यह है - यम देवता के लिये सोमरस की आहुति अभिप्राय यह है कि जिसमे सोमरस की आहुति दी जाती है ऐसे ज्योतिष्टोम आदि यज्ञो का अनुष्ठान न किया जाय दी, जातीतो यमराजहै । इसकाप्रसन्न न रहेगे, अतः उनको प्रसन्न रखने के लिये सोमरस की आहुति दी जाती है । अथवा पितरो का सम्बन्ध सोम से सम्बन्ध सोम से माना जाता है । यमराज को घृत आदि को भी आहुति दी जाती है । ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञ होने से यम का भी , प्रसन्नता के लिये ही किये जाते है । इस यज्ञ का दूत अग्नि है अर्थात् लोकव्यवहार मे सेवक जैसे स्वामी की दी वस्तुतः यमराज की जिसको देता है, उसके पास पहुँचाता है, उसी तरह से यह अग्नि भी यजमान जिस देवता के निमित्त हवि हुई वस्तु को यथास्थान हवि को पहुँचा देता है, इसके लिये यहाँ अग्नि को दूत कहा गया है । पुनः यह यज्ञ स्तोत्र, शस्त्र आदि देता है, उसके पास उस साम मन्त्रों के उच्चारण से भूषित है । अथवा यह यज्ञ पूरी तरह से सावधानी से सागोपाग पूरा किया गया है । यद्यपि सोम, हवि और यज्ञ सभी,, को पितृलोक तक पहुँचाने प्रसन्नता के लिये किये जाते हैं तो भी यमराज सब प्राणियों का नाश करने वाले हैं अथवा सभी प्राणियों देवताओं की वाले है, अतः यम को प्रधान मानकर प्रायः उन्ही की पूजा सोम आदि से की जाती है । स्वामी दयानन्द यम पद से न्यायाधीश, मण्डलाधीश ( मजिस्ट्रेट ) आदि का ग्रहण करते सोम आदि की आहूति उनके मत से दी जायगी? इसके लिये अग्नि को दूत किस तरह बनाया जायगा हैं, तब क्या इन्ही के लिये , इसका समाधान तो कुछ हो
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वेदार्थपारिजातः १५४१ यः प्रेयाय प्रथमो लोकमेतम् । वैवस्वतं सङ्गमनं जनाना यम राजानं हविषा सपर्यंत ||' ( अथर्व० १८| ३| ३ ) | यो यमो राजा मर्त्याना मनुष्याणा मध्ये स्वयमप्येकः सन् प्रथमः प्रथमभूतो ममार मरणं प्राप्तवान् । ( मृड् प्राणत्यागे ) एत लोकं यो यमो राजा प्रथमः प्रथमभूतः प्रेयाय प्रगतवान् प्रथम पश्चात् लोकान्तरप्राप्तिरित्युभय प्रथमयमो यज्ञमासीत् । अत एव यमस्य मनुष्यवत् कामयितृत्वादिक यागाद्राज्यप्राप्तिश्च आम्नायते । ' यमो वा अकामयत पितॄणा राज्यमभिजयेय- मिति स एत यमायापभरणीभ्यश्चरु निरवपत् ( तै० ब्रा ० ३| १ | ५ ) । इत्थ यमो राजा मरणपूर्वक प्रथम प्रेयाय । त वैवस्वत विवस्वानादित्य, तस्य पुत्र जनाना जनिमता प्राणिना संगमन सङ्गच्छन्ते जना अस्मिन्निति, अधिकरणे लुट् । सर्वैर्जनि- मद्भिः सम्प्राप्यमित्यर्थः । एवगुणविशिष्ट राजानमीश्वर प्राणिकृतसुकृतदुष्कृतानुरूपेण दण्डधर हविषा आज्यपुरो- डाशादिना सपर्यंत पूजयत, हे ऋत्विज इति शेषः । 'सपर पूजायाम्', कण्ड्वादिभ्यो यक् ( पा० सू० ३।१।२७ ) | अथवा प्रथमः कल्पादौ प्रथमभावी यो जनो ममार, यश्च जनः प्रथमः कल्पादी वर्तमान एत लोक यमस्य स्वभूत प्रेयाय तदा प्रभृति वर्तमानानां सर्वेषा जनाना संगमन सम्प्राप्य राजान सपर्यंत । सर्वथापि न लौकिको न्यायाधीशो यम, किन्तु विशिष्टः पितृलोकाधिपतिः श्राद्धादिषु पूज्य इज्यश्च पिण्डपितृयज्ञादिभिः । कौशिकसूत्रेषु प्रेतकर्मसु पिण्डपितृयज्ञादी विनियोग उक्तोऽनेकेषा मन्त्राणाम् । 'इदं पितृभ्य ' इत्यृचा गर्ते दर्भान् स्तृणीयात् । पितृमेधे परेयिवासम् इति द्वाभ्या कनिष्ठपुत्रेण अन्यत्र विवस्वता सार्धं पितृभि सह यमस्य यज्ञ आवाहनमुक्तम् । ' अङ्गिरोभिर्यज्ञियै रागहीह यम वैरूपेरिह मादयस्व । विवस्वन्त हुवे य पिता तेऽस्मिन् बर्हिष्यानिषद्य ॥ ' ( अथर्व० १८| १ |९ ) | है यम, इह कर्मणि अजिरोनामके पितृभि सह आगहि आगच्छ । कीदृशैर्यज्ञियैर्यज्ञाहै: । एव वैरूपै. विरूपाख्यस्य महर्षेर्गोत्रजे. सहागच्छ । आगत्येह मादयस्व तर्पयस्व । न केवल त्वामेव, किन्तु तव पितरं विवस्वन्तमप्याह्वयामहे । अस्मिन् नही सकता । वेद मे तो 'यो ममार' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्र के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि 'यह यमराज मनुष्यो के बीच में स्वयं अकेला है । सबले पहले मरने वाला प्राणी है । यमराज स्वयं सबसे पहले मर कर बाद मे इस जगत् के सभी प्राणियो को भी मार कर दूसरे लोक में पहुँचा देता है । इसलिये सारे यज्ञ उसी की प्रसन्नता के लिये किये जाते है । इसीलिये यमराज की राज्यप्राप्ति आदि की इच्छा की बात ब्राह्मण ग्रन्थो में वर्णित है कि वह यमराज मनुष्य के समान ही तरह तरह की कामनाओ वाला है और वह भी यज्ञ का अनुष्ठान कर राज्य को प्राप्त करता है —' यमराज ने इच्छा की कि मैं पितरो के राज्य को जीत लू, उसने यज्ञ किया' | इस तरह स्पष्ट हैं कि यमराज सबसे पहले पितर बने । उक्त विवस्वान् ( आदित्य ) के पुत्र यमराज को, जो कि सभी उत्पन्न हुए प्राणियो को अपने राज्य मे एक साथ जुटा देता है, सभी प्राणियों का जिस यमराज्य मे जाना अनिवार्य है, उस राजा यमराज की, जो प्राणियो के भले और बुरे कर्मों के अनुसार उनको दण्ड या पुरस्कार देता है, हम घृत, पुरोडाश आदि प्रदान कर पूजा करते है । इस मन्त्र में ऋषियो को संबोधित किया गया है । अथवा इस मन्त्र का दूसरा अर्थ इस तरह से किया जा सकता है - कल्प के आदि मे पहले उत्पन्न हुआ जो मनुष्य मर गया और जो मानव इस कल्प के प्रारंभ में वर्तमान इस यमलोक में पहुंचा, तब से लेकर के अबतक के सभी मनुष्यों को जहाँ जाकर जिस राजा की सपर्या ( सेवा ) मे लगना है, यह यमराज है । कुछ भी अर्थ किया जाय, लौकिक न्याया-atr को यम किसी प्रकार सिद्ध नही किया जा सकता, किन्तु विशिष्ट पितृलोक के स्वामी को ही हम यमराज कहेंगे, जिसकी कि श्राद्ध आदि में पूजा की जाती है । पिण्ड, पितृयज्ञ आदि भी इसी के निमित्त किये जाते हैं । कौशिक सूत्र मे अनेक मन्त्रों का विनियोग पिण्ड-दान, पितृयज्ञ आदि प्रेतो के निमित्त किये जाने वाले अनुष्ठानों के लिये बताया गया है । जैसे कि 'इद पितृभ्यः' इत्यादि मन्त्र में 'पितृ-मेघः ' यज्ञ में पितरों के निमित्त गड्ढे में कुशा रखे । 'परेयिवासम्' इत्यादि दो मन्त्रो से कनिष्ठ पुत्र के साथ अथवा विवस्वान् ( सूर्य ) के साथ और पितरों के साथ यम का यज्ञ में आवाहन बताया गया है । ' अङ्गिरोभि० ' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्र का अर्थ यह है - हे यम, इस कर्म मे अंगिरा नाम के पितरों के साथ आप यहाँ पधारिये । विरूप नामक महर्षि के यज्ञार्ह गोत्रज के साथ आप यहाँ पधारिये । यहाँ पधार कर आप तृप्ति का अनुभव कीजिये । हम केवल आपको ही नहीं, किन्तु आपके पिता विवस्वान ( सूर्य) को भी बुलाते हैं । आपके साथ वे भी आकर इस बिछाये गये
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वेदार्थपारिजात १ ९ ४२ बर्हिष्यास्तीर्णे निषद्य यथा हवि स्वीकरोति तथा ह्वयामि । 'यमाय घृतवत् पयो राज्ञे हविर्जुहोतन' ( अथर्व० १८| २| ३ ) इत्यनेनापि यमो विशिष्टो राजा । ' अवसृज पुनरग्ने पितृभ्यो बहुतश्चरति स्वधावान् । वायुर्वसान उपयातु शेषः सङ्गच्छतां तन्वा सुवर्चाः ( अथर्व ० १८।२।१० ) | ' हे अग्ने, त्वमेन मृत हविष्टुन कल्पित पितृभ्यः पुनरवसृज पितृलोकस्थानाय त्यज । नहि मृतो लौकिकपितृपितामहादिभ्योऽग्निना प्रदीयते । तस्मात् पितृलोकस्थाः पितरो मनुष्येभ्यो भिन्ना एव । शेषोऽपत्यं पुत्र आयुर्वसान आयुष्मान् स्वगृहं गच्छतु । प्रेतः शोभनेन वर्चसा युक्तः तन्वा पितृलोके स्थितेन शरीरेण सङ्गच्छताम् । 'ह्वयामि ते मनसा मन इहेमान् गृहाँ उपजुषाण एहि । सङ्गच्छस्व पितृभि सयमेन स्योनात्स्वा वाता उपवान्तु || ' ( अथर्व० १८| २| १ ) अस्मिन् मन्त्रे पितॄणामाह्वानसंस्कारोत्तरकालं पितृभि सङ्गच्छस्व यमेन पितृराजेन च सङ्गतो भव । पितृलोक- गमनसमये स्योना सुसेवितं योग्या शग्माः सुखकरा वाता उपवान्तु । ' ये च जीवा ये च मृता न जाता ये च जज्ञिया 1। तेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु मधुधारा व्यन्दती || ' ( अथर्व० १८| ४| ७ ) । ये जीवा', ये च मृताः, ये च जाता } ये च जनिष्यमाणा, तेभ्यः सर्वेभ्यो घृतस्य कुल्या कृत्रिमा सरित् मधुधारा व्युन्दती विशेषेण सिञ्चन्ती, एतु तत्प्रीणनायागच्छतु । पिण्डपितृयज्ञे विनियोग एषा मन्त्राणाम् । ' येऽग्निदग्धा येऽनग्निदग्धा मध्ये दिव स्वधया मादयन्ते । त्वं तान् वेत्थ यदि ते जातवेद स्वधया यज्ञ स्वधितमजुषन्ताम् ॥ ' ( अथर्व० १८/२/५ ) | ये पितर, अग्निदग्धा अग्निना सस्कृताः, ये चानग्निदग्धाः, दिवो द्युलोकस्य मध्ये स्वधया ( अन्ननामैतत् ) पुत्रादिभिर्दत्तेन पिण्डरूपेण हविषाः, यद्वा स्वधाकारोपलक्षितेन पिण्डपितृयज्ञादिकर्मणा, मादयन्ते हृष्टास्तृप्ता वर्तन्ते । हे जातवेदः, जाताना वेदितरग्ने, तान् सर्वान् पितॄन् यदि त्ववेत्थ, यदि वेदा. प्रमाण स्युरितिवद् निश्चयार्थंकोऽत्र यदिशब्दः । त्वमेव तान् निश्चयेन जानासीत्यर्थं । ते सर्वे स्वधाया सम्बन्धिनमस्मदीयं यज्ञं स्वधितं स्वधासञ्जाता यस्य तम्, यद्वा स्वैर्ज्ञातिभि पुत्रपौत्रादिभिहितम्, विहितम्, ईदृश यज्ञं जुषन्ताम् । एवमृग्यजुरथर्वादिसहितासु सहस्रशो मन्त्रा मृतपितृपितामहादिश्राद्धपिण्डपितृयज्ञादिपरा दृश्यन्ते । कुशाओ के आसन पर बैठकर हवि स्वीकार करे, इसीलिये मैं आप लोगो को बुला रहा हूँ ॥ इसी तरह से 'यमाय घृतवत्' इस अथर्व- वेदीय मन्त्र में भी यम का एक विशिष्ट राजा के रूप में वर्णन है । ' अवसृज पुनरग्ने ० ' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्र का अर्थ यह है—– हे अग्ने, तुम इस मृत प्रेत को हवि के रूप मे स्वीकार कर पुन इसको पितृलोक मे पहुँचा दो । लौकिक पिता, पितामह आदि को जीवित अवस्था में कोई अग्नि को नहीं सौंपता । इसलिये पितृलोक मे स्थित पितर मनुष्यों से सर्वथा भिन्न ही है । बचा हुआ पुत्र आयुष्मान् बनकर पुन. अपने घर लौट जाय और प्रेत सुन्दर तेजस्वी शरीर को प्राप्त कर पितृलोक में प्रवेश करे । इसी तरह से 'ह्वयामि ते ० ' इस अथर्ववेदीय मन्त्र में पितरो का आह्वान और सस्कार करने के उपरान्त प्रेत के लिये प्रार्थना की गई है कि वह पितरो से और यमराज से मिल सके, जब वह पितृलोक की तरफ जा रहा हो, तब सुखदायक पवन बहता रहे । ' ये च जीवा ' इत्यादि मन्त्र में बताया गया है कि जो जीवित हैं, जो मर गये हैं, जो पुन उत्पन्न हुए हैं या होनेवाले है, घृत की नहरें, शहत की धाराएँ उनके सारे जाने के रास्ते को सोचती हुई उनकी तृप्ति के लिये उपस्थित रहे । इन मन्त्रों का विनियोग पिण्डपितृयज्ञ में बताया गया है । ' येऽग्निदग्धा० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ है -जो पितर अग्नि के द्वारा संस्कृत है, अथवा जिनका अग्नि सस्कार नहीं हुआ है, किन्तु जो पुत्र आदि के द्वारा दिये गये पिण्डरूप हवि के कारण स्वर्गलोक में प्रसन्न होकर विचरण कर रहे है, अथवा स्वधा शब्द के उच्चारण के साथ पिण्डपितृयज्ञ आदि कर्मों के अनुष्ठान से सन्तुष्ट होकर, तृप्त होकर विचरण कर रहे है, हे जातवेद (सभी उत्पन्न प्राणियो को जानने वाला ) अग्ने, उन सब पितरो को यदि तुम जानते हो, यहाँ यदि शब्द निश्चय के अर्थ में है, जैसे कि 'यदि वेदाः' इत्यादि वाक्य में वेदो के निश्चित प्रामाण्य का उल्लेख माना जाता है । अतः अर्थ यह हुआ कि हे अग्ने, तुम ही उन सबको निश्चित रूप से जानते हो, दूसरा कोई नहीं जानता । वे सब पितृगण स्वधा शब्द के उच्चारण के साथ किये जाने वाले इस पिण्ड-पितृयज्ञ में अपना अपना भाग ग्रहण करें । अथवा अपने बन्धु बान्धव, पुत्र-पौत्र आदि के द्वारा सम्पादित इस पिण्डपितृयज्ञ में आकर अपना भाग स्वीकार करें । इसी तरह के अन्य अनेक मन्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद की संहिताओ मे उपलब्ध हैं, जिनमें कि मृत ताप -पितामह आदि के ही श्राद्ध अथवा पिण्डपितृयज्ञ आदि का वर्णन मिलता है, जीवित पिता आदि का नहीं ।
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वेदार्थपारिजात १५४३ श्राद्धविचारः इत्थमत्र निष्कर्ष -स ददाति । असावेतत्त इत्येव यजमानस्य पित्रे ये च त्वा मन्वित्यु हैक आहुस्तदु तथा न ब्रूयात् । स्वय वै तेषा सह तस्मादु ब्रूयात् । असावेतत्त इत्येव यजमानस्य पित्रे असावेतत्त इति पितामहाय असावेतत्त इति प्रपितामहाय तत् यदितः परान् ददाति सकृदु ह्येव पराञ्च पितर ' ( श ० ब्रा० २/४/ २/ १ ९ ), 'तानि दक्षिणोपस्तृणाति ॥ तत्र ददाति । स वा इति ददातीतीव वै देवेभ्यो जुह्वत्युद्धरन्ति मनुष्येभ्योऽथैव पितॄणा तस्मादिति ददाति' ( श० ब्रा० २।४।२।१८ ) । अत्र भाष्यम्-' दक्षिणा दक्षिणत उल्लिखितप्रदेशे तानि बहषि उपस्तृणाति तत्र तस्मिन् बर्हिषास्तीर्णे देशे पिण्डान् दद्यात् । तत्र प्रकारविशेषमभिनयेन विधत्ते -स वा इतीति । अनेन प्रकारेण अङ्गुष्ठतर्जन्योर्मध्येन पित्र्येण तीर्थे- नेत्यर्थ । देवमनुष्यसम्प्रदानकं दानं तद्वैपरीत्यकथनेनोपपादयति-इतीव वेति । इतीव अनेन खलु प्रकारेण अङ्गुल्यग्रेण देवतीर्थेन देवेभ्यो हवीषि जुह्वति । मनुष्येभ्यस्तु यथायोग्य भोक्तव्यमन्नमुद्धरति । उद्धृत्य पात्रान्तरे स्थापयति । न तु तत्र देवपित्रादितीर्थविशेषोऽपेक्षितः । शाखान्तराभिमतमन्त्रशेषनिरासार्थमेव कार | पित्रनन्तरभाविना यच्छब्दनिर्दिष्टाना तेषा स्वय पिण्डदाता सहभावी भवति । तथा च एव एषा ( येषा ) स्वय ( सह ) भावी तेभ्यः पिण्डदाने स्वात्मने पिण्डं दत्तवान् भवति । 'तत् परितः' इत्यादि । अनेन हि क्रमेण पितृत्व प्राप्ताः प्रथम प्रपितामहः पश्चात् पितामहः तत पितेति । इत्थ क्रमं परित्यज्य पिण्डदाने इत पितृत आरभ्य प्रपितामहान्त पराक् पराचीनं पिण्डान् दद्यात् । यतस्ते पितर सकृत्त्वपरात्वधर्मयुक्ताः । पितर के? इत्यपेक्षाया मनुः -' मनोहिरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादय सुता । तेषामृषोणां सर्वेषा पुत्राः पितृगणा श्राद्धविचार पिण्डपितृयज्ञ प्रकरण का वैदिक दृष्टि मे यह निष्कर्ष है -'स ददाति० ' इत्यादि प्रकरण में शतपथ ब्राह्मण मे बताया गया है कि यजमान के पिता के लिये वह पुरोहित 'असावेतत्ते ' कह कर पिण्ड समर्पित करे । कुछ आचार्यों का मत है कि इस प्रसग मे ' ये च त्वामनु' इस वाक्य का उच्चारण करना चाहिये, किन्तु यह मत उचित नही है, क्योकि पिता, पितामह प्रभृति सभी तो उस पितृलोक मे एक साथ ही रहते हैं । इसलिये यजमान के पिता, पितामह, प्रपितामह सभी के लिये ' असावेतत्ते' इसी वाक्य का उच्चारण करे, क्योकि इन सबको एक साथ ही स्वधाकार के द्वारा अन्न समर्पित किया जाता है । ये सभी पितृगण एक साथ ही पूर्वज ( पुरखे ) के नाम से अभिहित होते है । 'तानि दक्षिणोपस्तृणाति० ' इत्यादि शतपथ वाक्य का भाष्य इस तरह से किया गया है --दक्षिण दिशा में खोदी गई जगह पर कुशा बिछाई जाती है । उस कुशा बिछाये गये स्थल पर पिण्डदान किया जाता है । यह पिण्डदान किस पद्धति से किया जाय इस विषय को अभिनय के द्वारा समझाया गया है कि उस पिण्ड को अंगुष्ठ और तर्जनी अंगुली के मध्य मे स्थित पित्र्य तीर्थ से देना चाहिये । देवता और मनुष्य के निमित्त दान करने की पद्धति इसके विपरीत है । वह यह कि इनके निमित्त अंगुली के अग्रभाग में स्थित देव तीर्थ से देवताओ के निमित्त हवि दी जाती है । मनुष्यो के लिये तो जिसके लिये जो उचित है, उस विधि से भोजन परोसा जाता है । इसके लिये देव तीर्थ या पितृ तीर्थ की आवश्यकता नही रहती । शतपथ ब्राह्मण के प्रथम वाक्य मे एवकार इसलिये लगाया गया है कि शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अन्य शाखा में प्रदर्शित मन्त्र शेष का उच्चारण उचित नही हैं । पिता के अनन्तर आने वाले ' यत्' शब्द से निर्दिष्ट सभी पितृगणों का पिण्डदाता सहभावी है । इस तरह से जिनका वह सहभावी है, उनको पिण्ड देने से एक प्रकार से स्वयं अपने लिये ही पिण्डदान हो जाता है । इसलिये यद्यपि -पितृत्व प्राप्ति का क्रम यह है कि पहले प्रपितामह, बाद में पितामह और अन्त में पिता, किन्तु उक्त पद्धति से यह पिण्ड एक तरह से स्वयं अपने लिये ही होता है, अतः उस पिण्डदान का क्रम भी अपने से आरम्भ कर पहले पिता, बाद में पितामह और अन्त मे प्रपितामह को दिया जाता है । इसी को पिण्डदान का पराचीन, उलटा क्रम कहा जाता है, क्योंकि ये पितृगण एक के बाद एक पुरातन पडते जाते हैं । ये पितृगण कौन है? इस प्रश्न का उत्तर मनुस्मृति में विस्तार से दिया गया है- “हिरण्यगर्भं ब्रह्मा के पुत्र है और उनके I
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वेदाथपारिजात. १५४४ स्मृताः ॥ ' (म० ३।१८४ ) । ' 'विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः । अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः ॥ ' विराजः सुताः सोमसदः साध्याना पितरः । अग्नौ पक्वं चरुपुरोडाशादिकं स्वदन्ते ते अग्निष्वात्ताः, देवानामिन्द्रादीनां पितरः । ते च मरीचेर्जातित्वान्मारीचा इति विश्रुताः । ' देवदानवयक्षाणा गन्धर्वोरगरक्षसाम् । सुपर्णकिन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोऽत्रिजाः || ' ( म ० ३।१८६ ) दैत्यादीनां पितरो बर्हिषदो भवन्ति ते चात्रिपुत्राः । 'सोमपा नाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः । वैश्यानामाज्यपा नाम शूद्राणा तु सुकालिनः ॥ ' ( ३| १८७ ) विप्राणां सोमपा ज्योतिष्टोमदेवता इन्द्रादयः पितरः । क्षत्रियाणा हविर्भुजः चरुपुरोडाशादिदेवताः । वैश्याना पितर आज्यपा आघाराज्यभागप्रयाजादिदेवताः । शूद्राणां सुकालिनः पितर । कालयन्ति अपवर्जयन्ति कर्मेति सुकालिन कर्मापवर्गहोमदेवता । पूर्वश्लोकोक्तानामेव परिचय - ' ' ( ( ) ' ' सोमपास्तु कवे पुत्रा हविष्मन्तोऽङ्गिर सुता । पुलस्त्यस्याज्यपा पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः ॥ ३ १८८ अग्निदग्धा- नग्निदग्धान् काव्यान् बर्हिषदस्तथा । अग्निष्वात्तांश्च सौम्याश्च विप्राणामेव निर्दिशेत् ॥ ' ( म० ३| १ ९९ ), 'ऋषिभ्यः पितरो जाता पितृभ्यो देवमानवा | देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चर स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ ' ( म० ३।१ ९ १ ) न पित्र्यं कर्म दैवात्कर्मणो न्यूनम् अपि तु पित्र्यमेव प्रधानतमम् । यतो जन्मज्येष्ठा पितरो देवानाम् । ऋषिभ्य. पितर उत्पन्नाः पितृभ्यो देवमानवा । देवेभ्योऽन्यत्सर्वं जगदुत्पन्नमित्याद्यर्थकेभ्य उद्धृतस्मृतिवचनेभ्यः । ‘ अपसव्य- मग्नौ कृत्वा सर्वमावृत्परिक्रमम् । अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदुदक भुवि ॥ ' ( म० ३।२०४ ) । अग्नौ यत्कर्तव्यम् ' अग्नये स्वधा' इति । तदपसव्य दणिणेन हस्तेन कर्तव्यम्, न सव्येन नोभाभ्याम् । 'देवकार्याद् द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते । देवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं स्मृतम् || ' ( म० ३ २०३ ) इति पित्र्यकर्माङ्गत्वेन देवकार्यानुष्ठानं भवति । 'तेषामारक्षभूत तु पूर्वं दैवं नियोजयेत् । रक्षासि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ||' ( ३| १ ९ ४ ) । अतस्तेभ्यो रक्षाथं ब्राह्मणनिमन्त्रणासनोप- जो मरीचि आदि पुत्र है, उन सब ऋषियों के पुत्र ( सोमपा आदि ) पितृगण कहे गये है । विराट् के पुत्र सोमसद् साध्यो के पितर और hलोक में विख्यात मरीचि के पुत्र अग्निष्वात्त देवताओ के पितर कहे गये है । अग्नि में पके हुए चरु, पुरोडाश आदि का स्वाद लेने वाले पितर 'अग्निष्वात्त' कहे जाते है । ये इन्द्र प्रभृति देवताओ के पितर है और मरीचि से उत्पन्न होने के कारण ' मारीच' नाम से भी प्रसिद्ध है । देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व 2, सर्प, राक्षस, सुपर्ण और किन्नरो के पितर बर्हिषद् कहे गये हैं । ये अत्रि ऋषि की सन्तान हैं । ब्राह्मणों के सोमपा, क्षत्रियों के हविर्भुज, वैश्यो के आज्यपा और शूद्रो के सुकाली पितर होते हैं, इसका अभिप्राय यह है कि ब्राह्मणों के ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञों में सोमपान करने वाले इन्द्र प्रभृति देवता पितर कहे जाते है, क्षत्रियों के चरु, पुरोडाश प्रभृति हवि को ग्रहण करने वाले देवता पितर होते है, वैश्यों के आधार, आज्यभाग, प्रयाज प्रभृति अवान्तर यज्ञीय कर्मों के देवता पितर होते है और शूद्रों के सुकाली देवता पितर होते हैं, जो कि समय से यज्ञ आदि पवित्र कार्यों को पूरा करने में सहायक होते हैं । इनमें से सोमपा भृगु ऋषि की सन्तानें हैं, हविर्भुज अंगिरा के पुत्र, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुकाली वसिष्ठ के पुत्र है । अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद, अग्निष्वात्त और सौम्य ये भी ब्राह्मणो के ही पितृगण है । मरीचि प्रभृति ऋषियों से पितर उत्पन्न हुए है, पितरों से देवता और मनुष्य उत्पन्न हुए है । देवताओं से यह सारा चराचर जगत् क्रमशः उत्पन्न हुआ है । देवताओ से पहले पितरो की उत्पत्ति हुई है, अतः पितरो से संबद्ध कर्म देवसम्बन्धी कृत्य से किसी भी तरह से निम्न कोटि के नहीं माने जाते, किन्तु पित्र्य कर्म ही प्रधान माने जाते हैं, क्योंकि पितृगण देवताओं की अपेक्षा जन्म की दृष्टि से ज्येष्ठ है । अभी जो मनुस्मृति का वचन उद्धृत किया गया है, उससे यह स्पष्ट है कि ऋषियों से पितर उत्पन्न हुए और पितरों से देवताओं की उत्पत्ति हुई । बाद में यह सारा स्थावर-जंगम जगत् देवताओं से उत्पन्न हुआ । इस पित्र्य कर्म के निमित्त अग्नि में स्वधा शब्द का उच्चारण कर आहुति देनी हो या पिण्डदान एवं जलदान करना हो, तो यजमान को इस कर्म का सम्पादन अपसव्य होकर दाहिने हाथ से करना चाहिये, बायें हाथ से अथवा दोनों हाथों से यह पित्र्य कार्य नही किया जाता । द्विजातियों के लिये देव कार्य की अपेक्षा पित्र्य कार्य को अधिक महत्त्व का माना गया है, क्योंकि देवकार्य पहले होने से पित्र्य कार्य की पूर्णता मानी जाती है, अर्थात् द्विजाति के लिये
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देवार्थपारिजात १५४५ वेशनादिक कुर्यात् । अत एव ' देवाद्यन्त तदेत पित्राद्यन्तं न तद् भवेत्' । लोकिकपित्रादीनामेव पितृत्वे 'तेषामुदकमानीय सपवित्रास्तिलानपि । अग्नी कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणे सह । (म० ३।२०० ) । इति तिलकुशादिप्रयोगो निरर्थक एव स्यात् । 'अग्नेः सोमयमाभ्या च कृलाप्य यनमादित । हविर्दानेन विधिवत् पश्चात् सन्तर्पयेत् पितृन् ॥ ' ( म० ३।२११ ), 'अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् । यो ह्यग्नि न द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥ ' ( म० ३।२१२ ) लौकिकपितृ- सत्कारस्यैव श्राद्धत्वे सर्वमप्येतत्रोपपद्यते । किञ्च, 'त्रीस्तु तम्माद्धविशेषात् पिण्डान् कृत्वा समाहित | औदकेनैव विधिना निर्वपेद् दक्षिणामुखः ॥ ' ( म० ३।२१५ ), 'न्युप्य पिण्डास्ततस्तास्तु प्रयतो विधिपूर्वकन् । तेषु दर्भेषु त हस्त निमृज्याल्लेपभागिनाम् ॥ ' ( म० ३।२१६ ) इति दक्षिणाभिपुखेनापसव्येन कुशेषु पिण्डदान कि लौकिकपितृभ्य उपयुज्यते? किञ्च, प्रियमाणे पितरि पूर्वेषामेव निर्वा कुर्यादित्येतेन मृतानामेव श्राद्ध विज्ञायते । 'ध्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् । विप्रवद्वापि त श्राद्ध स्वक पितर- माशयेत् || ' ( म ० ३२२० ) । सुमन्तु --‘ श्राद्धात्परतर नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम् । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्ध कुर्याद्विचक्षण. ॥ ' ब्रह्मवैवर्ते- ' देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते । देवनाभ्यः पितॄणा हि पूर्वमाप्यायन शुभम् ||' सर्वेषु दैवतकर्मसु कर्माङ्गनान्दी- श्राद्धस्य पूर्वमनुष्ठानात् । यमः-' ये यजन्ति पितॄन् देवान् ब्राह्मणाश्च हुताशनान् । सर्वभूतान्तरात्मानं विष्णुमेव यजन्ति ते ॥ ' पित्र्य कार्य के अग के रूप से हो देव कार्य के सम्पादन का विधान है । इसलिये द्विजाति को चाहिये कि व पहले पित्र्य कार्य की रक्षा के लिये अंगभूत देव कार्य का सम्पादन करे । ऐसा न करने पर रक्षाविहीन श्राद्ध का राक्षस लोप कर देते है । इस पित्र्य कार्य की रक्षा के लिये ब्राह्मणो को निमन्त्रित करना और उनको आसन पर बैठाना आदि कार्यों को भी करना पडता है । इसीलिये श्राद्ध के आदि मे आवाहन और अन्त में विसर्जन देव कार्य के रूप में ही किया जाता है । इन सब स्थलो मे लौकिक पिता, पितामह प्रभृति को ही यदि पिलर माना जाता है, तो उस अवस्था मे मनुस्मृति में प्रतिपादित वह सारा क्रियाकाण्ड व्यर्थ हो जायगा, जिसमे कि बताया गया है कि श्राद्ध करने वाला ब्राह्मण उन निमन्त्रित ब्राह्मणो के लिये जल में पवित्रियो सहित तिलो को मिलाकर ब्राह्मणो की आज्ञा से अग्नि में हवन करे । पहले अग्नि, सोम और यम को विधिपूर्वक तृप्त करके, अर्थात् उनको हवि देकर पीछे अन्न आदि के दान से पितरो को तृप्त करे ॥ अग्नि न हो तो ब्राह्मणो के हाथ में आहुति दे क्योकिजो अग्नि है, वही ब्राह्मण है ऐसा वेदज्ञात' ब्राह्मणो ने कहा है । यदि लौकिक पिता, पितामह प्रभृति का सत्कार करता ही श्राद्ध माना जाता है, तो फिर इस तरह के क्रियाकाण्ड की क्या उपयोगिता हो सकती है? अपि च, 'उस अग्निहोम से बची हवि के तीन पिण्ड बना कर दक्षिण की ओर मुँह करके सावधानी से जल देने की विधि से कुशाओ के ऊपर वह तीन पिण्ड दे । फिर सावधान होकर अपनी शाखा के गृह्यसूत्र मे बताई गई विवि से उन कुशाओ के ऊपर उन पिण्डो को विधिपूर्वक रख कर उन्ही कुजाओ की जड़ पर लेप कर भोक्ताओं के लिये अपने हाथो का मार्जन करे' इस प्रकार मनुस्मृति मे बताई विधि से दक्षिण दिशा की ओर मुह करके यज्ञोपवीत को अपसव्य कर कुशाओ के ऊपर पिण्डदान करने का तब क्या आवश्यकता रह जायगी, जब कि जीवित पिता, पितामह आदि का ही सत्कार करना श्राद्ध कहा जायगा । मनुस्मृति में ही बताया गया है कि पिता यदि जीवित हो तो पूर्व अर्थात् पितामह, प्रपितामह आदि का ही श्राद्ध करे अथवा श्राद्ध में अपने पिता को भी ब्राह्मणो के समान भोजन करावे । इससे स्पष्ट होता है कि पिता के जीवित रहने पर उसका श्राद्ध नही किया जाता, अर्थात् श्राद्ध जीवित व्यक्ति का न होकर मृत व्यक्ति का ही किया जाता है । सुमन्तु का वचन मिलता है कि इस लोक मे श्राद्ध से बढ कर कोई श्रेयस्कर ( कल्याणकारक ) कार्य नहीं है, अत. समझदार आदमी को चाहिये कि वह श्राद्ध करने से कभी न चूके । ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि देव कार्य से भी अधिक महत्त्व का पित्र्य कार्य है । देव कार्य से पित्र्य कार्य की सागोपागता सिद्ध होती है । इसीलिये सभी देवकार्यों में कर्माग नान्दी श्राद्ध का सर्वप्रथम अनुष्ठान होता है । यम स्मृति में कहा गया है कि जो व्यक्ति पितरो की, देवताओ की, ब्राह्मणो की और अग्नियो की पूजा करते हैं, १ ९ ४
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वेदार्थपारिजात १५४६ ब्रह्मपुराणे -'यो वा विधानत श्राद्ध कुर्यात् स्वविभवोचितम् । आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त जगत्प्रीणाति मानव ॥ ' नागरखण्डे - ' श्राद्धे तु क्रियमाणे वे न किञ्चिद् व्यर्थता व्रजेत् । उच्छिमपि राजेन्द्र तस्माच्छाद्ध समाचरेत् ॥ ' ब्रह्मपुराणे - ' तस्माच्छ्राद्ध नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि । कुर्वीत श्रद्धया तस्य कुले कश्चिन्न सीदति ॥ ' है श्राद्धस्वरूप चाह आपस्तम्ब: --' 'अथैतन्मनु श्राद्धशब्द कर्म प्रोवाच प्रजानि श्रेयसार्थम् । तत्र पितरो देवताः, ब्राह्मणस्त्वाहवनीयार्थे |। मासि मासि कार्यम् ॥ अपर पक्षस्यापरा. श्रेयान्' इति । श्राद्धशब्द श्राद्धमिति शब्दो वाचको यस्य तत्तथा । त्यक्तद्रव्यप्रतिपत्त्यधिकरणत्वेनाहवनीयकार्यार्थत्व ब्राह्मणस्य । अपरपक्षस्य कृष्णपक्षस्य । बृहस्पतिः –'संस्कृत व्यञ्जनाद्यं च पयोमधुघृतान्वितम् । श्रद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं तेन निगद्यते ॥ ' ब्रह्मपुराणे - 'देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत् ॥ पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ॥ ' मरोचि. - 'प्रेतान् पितृनप्युद्दिश्य भोज्य यत्प्रिय- मात्मनः । श्रद्धया दीयते यत्तु तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम् ॥ ' प्रेतान् अकृतसपिण्डनान् पितॄन् कृतसा पण्डनान् । उपर्युक्तैर्वचने प्रतीयते यत् प्रमीतमात्रोद्देश्यकान्नत्यागविशेषो ब्राह्मणाद्यधिकरणक प्रतिपत्त्यङ्गकः श्राद्धपदार्थः । नृसिंहपुराणे - 'दिव्यपितृभ्यो देवेभ्यः स्वपितृभ्यस्तथैव च । दत्त्वा श्राद्धमृषिभ्यश्च मनुष्येभ्यस्तथात्मनः ॥ अग्नौ हुतेन देवस्थाः पितृस्था द्विजतर्पणैः । नरकस्थाश्च तृप्यन्ति पिण्डैर्दत्तैस्त्रिभिर्भुवि ॥ " 'प्रमीतस्य पितुः पुत्रैः श्राद्धं वे सभी प्राणियो की अन्तरात्मा मे विद्यमान भगवान् विष्णु की हो आराधना करते है । ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि जो व्यक्ति fafaपूर्व अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप श्राद्ध करता है, वह ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियो को तृप्त कर देता है । स्कन्द-पुराण के नागरखण्ड में भी बताया गया है कि श्राद्ध करते समय उसमे प्रयुक्त किमो भी वस्तु का कोई भी अश, भले ही वह उच्छिष्ट क्यो न हो गया हो, कभी व्यर्थ नही जाता । इसलिये हे राजन् श्राद्ध अवश्य करना चाहिये । ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि पावन-सम्पन्नता न रहने पर व्यक्ति श्रद्धापूर्वक शाक -भाजी से भी सविधि अपने पितरो का श्राद्ध करे । ऐसा करने से उसके परिवार मे कोई दुःखी नही रहता । श्राद्ध का स्वरूप आचार्य आपस्तम्ब ने इस प्रकार बताया है -' भगवान् मनु ने श्राद्ध शब्द को एक कर्मविशेष का वाचक माना है । इस कर्म के करने से प्रजा का कल्याण होता है । इस कर्म के देवता पितर है । इसमे ब्राह्मण आहवनीय अग्नि का कार्य करते है, जैसे देवताओं तक हवि को पहुँचाने के लिये उसको अग्नि में अर्पित किया गया है, उसी प्रकार पितरो को कव्य पहुँचाने के लिये उसको ब्राह्मणो को समर्पित किया जाता है, अर्थात् श्राद्ध में ब्राह्मणभोजन कराया जाता है । यह श्राद्ध प्रत्येक मास में करना चाहिये । कृष्ण पक्ष और अपराह्न काल इस कार्य के लिये उत्तम माना जाता है । इस प्रसंग में बृहस्पति ने भी बताया है कि दूध, घी, शहद यादि के साथ नाना प्रकार के पक्वान्न, व्यंजन आदि बनाकर श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणभोजन कराना ही श्राद्ध नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि उचित देश, काल और पात्र के मिलने पर श्रद्धापूर्वक विधिविधान मे पितरो के निमित्त ब्राह्मणभोजन कराना ही श्राद्ध कहलाता है । मरीचि ने बताया है कि प्रेत, अर्थात् जिनका सपिण्डीकरण श्राद्ध अभी नही हुआ है, उनको और पितरो को, जिनका कि सपिण्डीकरण श्राद्ध हो चुका है, निमित्त बनाकर अपने को प्रिय लगने वाला भोजन श्रद्धापूर्वक दिया जाता है, उसी को श्राद्ध कहते है । इन सब प्रमाणो से यह प्रतीत होता है कि केवल मृत व्यक्ति को निमित्त बनाकर ब्राह्मणो को भोजन कराना ही श्राद्ध पद का अर्थ है । इसका जीवित पिता, पितामह प्रभृति को आदरपूर्वक भोजन कराने से किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नही है । नृसिंहपुराण में भी बताया गया है कि दिव्य पितरों का, देवताओ का अपने पितरों का, ऋषियों का और मनुष्यो का हव्यकव्य आदि के द्वारा श्राद्ध करना चाहिये । अग्नि में हवन करने से देवताओं को और ब्राह्मणो को भोजन कराने से पितरो को हव्य- कव्य प्राप्त होता है । नरक में स्थित पितरों का उद्धार पृथ्वी पर तीन पिण्डों का दान करने से होता है । अन्यत्र भी बताया गया है कि अपने मृत पिता का श्राद्ध पुत्रों को प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये । इनके साथ श्राद्धकर्ता का क्या सम्बन्ध है, उनका नाम और गोत्र क्या है,
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वेदार्थपारिजात १५४७ देयं प्रयत्नत.॥ ', ' सम्वन्धनामगोत्राणि यथावत् परिकीर्तयेत्', ' रामगोत्र पितॄणा हि प्रापक हव्यकव्ययोः', 'अपुत्रा ये मृताः केचित्स्त्रियो वा पुरुषाश्च ये । तेषामपि च देय स्यादेको द्दष्ट न पार्वणम् ॥ ' इति । -- नतु र जनकादीनां श्राद्धे देवतात्वम्, किन्तु वसुरुद्रादित्यादीना पित्रादिपदोपनीतानाम्, यथाह मनु.-' वसून् वदन्ति तु पितॄन् रुद्राश्चैव पितामहान् । प्रपितामास्तथादित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी ॥ ' ( ३३२८४ ) तथा च याज्ञवल्क्य.- 'वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः । प्रीणयन्ति मनुष्याणा पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः ॥ ' इति । तथा च महाभारते शान्ति- पर्वणि नारायणीये -- पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामह । अहमेवात्र विज्ञेयस्त्रिषु पिण्डेषु सस्थित ||' ( ३४५| २१ ) इति चेत्, अत्रावधीयताम्— ' यजमानस्य पित्र' इत्याद्युदाहृतश्रुते ' 'एतत्तेऽसो ये च त्वामत्रान्विति तस्मै तस्मै य एषा प्रेता स्युः' इत्यादिकल्पसूत्रैश्च मृताना जनकादीना देवतात्वावगमात् । तथा च - ' वसून् वदन्ति' ( ३३३८४ ) इति मनुश्लोके कुल्लूकभट्ट.- 'यस्मात् पित्रादयो वस्वादय इत्येषाऽनादिभूता श्रुतिर्थस्त, अन पितॄन् वस्वाख्यदेवान् पितामहान् रुद्रान् प्रपितामहानादि- त्यान् मन्वादयो वदन्ति । ततश्च सिद्धबोधनवैयर्थ्यात् पित्रादयो वस्वादिरूपेण ध्येया इति विधिः कल्प्यते । अत एव पैठीनसिः-:- य एवं विद्वान पितॄन् यजते वसवो रुद्रा आदित्याश्च प्रीता भवन्ति' इति । मेधातिथिगोविन्दराजी तु--' पितृ- द्वेषान्नास्तिक्याद्वा यः पितृकर्मणि न प्रवर्तते त प्रत्येतत्प्रवर्तनार्थं देवतात्वाध्यारोपेण पितॄणा स्तुतिवचनम्' इत्यूचतुः । याज्ञवल्क्यवचने च मिताक्षरा -'नात्र देवदत्तादय एन श्राद्धकर्मणि सम्प्रदानभूताः पित्रादिशब्दैरुच्यन्ते, किन्त्वधिष्ठातृ- वस्वादिदेवतासहिता एव । यथा देवदत्तादिशब्दैर्न शरीरमात्र नाप्यात्ममात्रम्, किन्तु शरीरविशिष्टा आत्मान उच्यन्ते, पिण्डदान आदि करते समय इनका विधिवत् उच्चारण होना चाहिये । पितरो के नाम गोत्र का उच्चारण करने पर ही उनको हव्यकव्य आदि की प्राप्ति होती है । बिना पुत्र के जा मर गये है, वे स्त्री हो या पुरुष, एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अधिकारी है, उनका पार्वण श्राद्ध नही होता । यहाँ का उठायी जा सकती है कि श्राद्ध मे पिता प्रभृति को देवता नही माना जाता, किन्तु पिता, पितामह प्रभृति पद से वहाँ पर वसु, रुद्र, आदित्य प्रभृति देवताओ का ग्रहण किया जाता है । जैसा कि मनुस्मृति मे बताया गया है -' वसुगण पितर, रुद्रगण पितामह और आदित्यगण प्रपितामह कहे जाते हैं, यह बात सनातन काल से चली खा रही हैं । याज्ञवल्क्य स्मृति में भी बताया गया है कि वसु, रुद्र बौर बादित्य इन तीन वर्गो में बँटे हुए पितृगण ही श्राद्ध के देवता है । श्राद्ध में इनक तृप्त होने पर ये श्राद्ध करने वालो के पितरो को भी तृप्त कर देते हैं । महाभारत के शान्तिपर्व मे आये नारायणीय उपाख्यान में वर्णित है कि पिता, पितामह और प्रपितामह् इन तीनो के निमित्त दिये जाने वाले पिण्ड में में ही विद्यमान रहता हूँ, अर्थात् अन्तर्यामी वासुदेव के निमित्त ही यह सब कुछ समर्पित होता है । किन्तु इस पूरी शंका का समाधान यह है कि पूर्व उदाहृत ' यजमानस्य पित्रे प्रभृति श्रुतियो तथा 'एतत्ते' प्रभृति कल्पसूत्रो मे मृत पिता, पितामह प्रभृति को देवतास्वरूप माना गया है । इस बात को 'वसून् वर्षान्त ' इत्यादि मनुश्लोक की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट ने इस तरह से स्पष्ट किया है कि पिता प्रभृति वसु प्रभृति देवताओ के स्वरूप है, यह श्रुति अनादि काल से चली आ रही है, इसलिये पितर वसु देवताओ के पितामह रुद्र देवता और प्रपितामह आदित्य देवताओं के रूप में मनु प्रभृति के द्वारा स्वीकृत हैं । सिद्ध वस्तु का ज्ञान कराना वैदिक विधि का कार्य नही है, किन्तु यहाँ इस विधि की कल्पना की जाती है कि पिता प्रभृति का वसु प्रभृति देवताओं के रूप में ध्यान करना चाहिये | इसीलिये पैठीनसि का यह वचन मिलता है कि इस प्रकार जो विद्वान् पुरुष पितरो का श्राद्ध करता है, उससे वसु, रुद्र और आदित्य नाम के देवगण प्रसन्न होते हैं । मेधातिथि और गोविन्दराज ने तो इस प्रकरण की व्याख्या इस तरह से की है कि पितरो के द्वेष के कारण अथवा नास्तिकतावश जो मनुष्य पितरो के निमित्त किये जाने वाले श्राद्ध कर्म में प्रवृत्त नही होता, उसको इस कार्य मे प्रवृत्त कराने के लिये पितरो पर देवतात्व का आरोप कर उनको स्तुति करने में प्रस्तुत वाक्य का अभिप्राय है । याज्ञवल्क्य स्मृति के वचन की मिताक्षराकार ने इस प्रकार व्याख्या की है- 'श्राद्ध कर्म में पिता, पितामह प्रभृति शब्दो से केवल देवदत्त प्रभृति ही कव्य के भागी नही होते, किन्तु इनके अधिष्ठातृ देवता वसु प्रभृति देवताओं के साथ ही वे इसके ग्रहण के अधिकारी होते है । जैसे देवदत्त प्रभृति शब्द शरीरमात्र या आत्ममात्र का वाचक न होकर शरीर विशिष्ट आत्मा का वाचक होता है, उसी तरह से अधिष्ठातृ देवता ही देवदत्त
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वेदार्थपारिजाता १५४८ एवमधिष्ठातृदेवतामहिता एव देवदत्तादय पित्रादिशब्दैरुच्यन्ते । अतश्चाधिष्ठातृदेवता वस्वादयः पुत्रादिभिर्दत्तेनान्न- पानादिना तृप्ताः सन्तस्तानपि देवदत्तादीस्तर्पयन्ति कर्तृश्च पुत्रादीन् फलेन सयोजयन्ति' इत्यादि । 'गोत्रनामभिरामन्त्रय पितॄनध्यं प्रदापयेत् ', 'ध्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् ॥ ' इति छन्दोगपरिशिष्ट- मनु-विष्णु- स्मृतिषु पितॄणा नामगोत्रादिभिरामन्त्रणादिविधानाद् वसुरुद्रादीना च तदभावाज्जनकादीनामेव देवतात्वम्' इति हेमाद्रिरीत्या पितॄणा द्वेधोत्पत्ति. पुराणेषूक्ता - साक्षाद् ब्रह्मणः सकाशादेका, ब्रह्मोत्पन्नर्ष्यादिक्रमेण चापरा । तत्र प्रथम- प्रकारो विष्णुपुराणे - ' सत्यमात्रात्मिकामेव ततोऽन्या जगृहे तनुम् । पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे || उत्ससर्ज पितॄन् दृष्ट्वा ततस्तामपि स प्रभुः ।' वराहपुराणे च - 'तस्यात्मनि तदा योग गतस्य परमेष्ठिनः ॥ तन्मात्रा निर्ययुर्देहाद् धूमवर्ण- कृतत्विषः || पिबाम इति भाषन्त खादाम इति चासकृत् । ऊर्ध्वं जिगमिषन्तो वै वियत्सस्थास्तपस्विनः ॥ तान् दृष्ट्वा सहसोवाच ब्रह्मा विश्वपितामहः । भवन्तः पितरः सन्तु सर्वेषां गृहमेधिनाम् ॥ ' वायुपुराणे तु—'ऋतमग्निस्तु य. प्रोक्तः स तु संवत्सरो मतः । जज्ञिरे ऋतवस्तस्माद् ऋतुभ्यश्चार्तवास्तथा ॥ ऋतु पितामहा मासा आर्तवाश्चास्य सूनवः । प्रपिता- महाश्च वै देवाः पञ्चाब्दा ब्रह्मणः स्मृताः ॥ ' अत्र सवत्सराभिमानिनीषु देवतासु लाक्षणिकाः । संवत्सरः प्रजापतिरग्नि- र्ऋतमुच्यते, तस्मादृतवः, तेभ्यः सर्वं जगत्, ऋषिभ्य पितरो भवन्तीत्युक्तमेव । ब्रह्मवैवर्तब्रह्माण्डपुराणयोस्तु या ब्रह्मशरीरात् पितृणामुत्पत्तिरुक्ता सा मरीच्यादीना पितृत्वमपेक्ष्य । या तु ब्रह्मशरीराव्यवधानेन सा मगेच्यादिपुत्राणां पितृत्वमपेक्ष्य । विष्णुधर्मोत्तरे -' पितॄणां हि गणा. सप्त नामतस्तु निबोध मे ॥ प्रभृति पिता प्रभृति शब्दो से गृहीत होते हैं । अत इस प्रकरण का अभिप्रान यह है कि वसुगण प्रभृति अधिष्ठातृ देवता पुत्रादि के द्वारा दिये गये अन्न से तृप्त होकर उनके पिता देवदत्त प्रभृति को भी तृप्त करते है और श्राद्धकर्ता पुत्र प्रभृति को भी इस पुण्य कर्म के फल को प्रदान करते है । गोत्र और नाम से पुकार कर पितरो को अर्घ्य देना चाहिये । पिता के जीवित रहने पर पितामह प्रभृति को ही हव्य प्रदान करना चाहिये । इस अभिप्राय के छन्दोगपरिशिष्ट, एव मनु, विष्णु प्रभृति स्मृतियों के वचनो मे पितरो को नाम और गोत्र से बुलाने का विधान है 1 वसु प्रभृति देवताओ का इस प्रकार का नाम या गोत्र होता नहीं, अतः इस प्रकरण में पिता प्रभृति को ही देवता के रूप में स्वीकार किया जाता है । इस विषय पर पूरी तरह से विचार-विमर्श करके हेमाद्रि प्रभृति निबन्धकारो ने यह निष्कर्ष निकाला है कि पुराणो मे पितरो की दो तरह की उत्पत्ति वर्णित है--साक्षात् ब्रह्मा से उत्पन्न हुए पितृगण प्रथम कोटि मे आते है और ब्रह्मा से उत्पन्न ऋषि प्रभृति के क्रम से दूसरी कोटि बनती है । इनमे से प्रथम कोटि के पितरो का वर्णन विष्णुपुराण में इस प्रकार किया गया है--' इसके बाद ब्रह्मा ने आशिक सत्त्वगुणमय अन्य शरीर ग्रहण किया और अपने को पितृवत् मानते हुए पितृगण की रचना की । पितृगण की रचना कर उन्होंने उस शरीर को भी छोड़ दिया' । वराहपुराण में भी बताया गया है कि वह परमेष्ठो ब्रह्मा जब आत्मयोग में लीन थे तो उनके शरीर से धूम वर्ण की कान्तिवाली तन्मात्राएँ निकली । इन्होने उन तपस्वियों का आकार ग्रहण कर लिया, जो कि ऊपर जाकर आकाश में यह कहते हुए विचरण करने लगे कि हम क्या खायें तथा क्या पियें? इन तपस्वियों को एकाएक देखकर सारे ब्रह्माण्ड के पितामह ब्रह्मा ने उनसे कहा कि आप लोग सभी गृहस्थो के पितर होइये । वायुपुराण में बताया गया है कि ऋत यह अग्नि का नाम है । इसी को संवत्सर कहते है । इस ऋत अग्नि से ऋतु पैदा होती है और ऋतु से आर्तव नामक पितर पैदा होते है । ऋतु पिता-मह और मास का प्रतिनिधि है | आर्तव इनके पुत्र है । इन्हीं को प्रपितामह कहा जाता है । ये पाँच वर्ष के देवता ब्रह्मा से ही उत्पन्न होते हैं । इस वायुपुराण के वचन मे सवत्सर प्रभृति शब्द इनके अभिमानी देवताओ के बोधक माने जाते है । संवत्सर प्रजापति अग्नि या ऋत कहलाता है । ऋत से ऋतु और ऋतु से सारे जगत् को सृष्टि होती हैं । ऋषियो से पितरो की उत्पत्ति होती है, इस बात को तो पहले ही बताया जा चुका है । ब्रह्मवैवर्त और ब्रह्माण्डपुराण में ब्रह्मा के शरीर से जो पितरों की उत्पत्ति बताई गई है, वह मरीचि प्रभृति ऋषियो को पितर मान कर है और जो ब्रह्मा के शरीर के अव्यवधान से पितरो की स्थिति स्वीकार की गई है, वह मरीचि प्रभृति के पुत्रों से संबद्ध है ।