वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 651–660

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 651–660

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वेदार्थपारिजात १५४९ सुभास्वरा बर्हिषद अग्निष्वात्तास्तथैव च । क्रव्यादाश्चोपहूताश्च आज्यपाश्च सुकालिन | मूर्तिहीनास्त्रयश्चैषा चत्वारश्च समूर्तय ॥ ' इति । सुभास्वरा, बर्हिषद, अग्निष्वात्ता एते त्रयो मूर्तिविहीना, शेषा मूर्तिमन्त । अत एव पितृकन्या सूक्ष्मान् पितॄनपश्यत् । तदुक्त ब्रह्माण्डादिपुराणेषु -'सा तेन व्यभिचारेण मनसा कामरूपिणी । पितर प्रार्थयित्वान्यं योगभ्रष्टा पपात च । त्रीण्यपश्यद्विमानानि पतन्ती सा दिवश्च्युता । त्रसरेणुप्रमाणानि तेष्वपश्यच्च तान् पितृन् ॥ सुसूक्ष्मानपरित्यक्ता- नग्नीनग्निष्विवाहितान् ॥ ' इति । वायुपुराणे -' देवाना पितरो देवा पितरा लौकिकास्तथा । देवा. सौम्याश्च यज्वानो ह्ययज्वानोऽथ योनिजा || देवास्ते पितरः सर्वे देवास्तान् भावयन्त्युत' । 'ऋतुरूपा पितरः' इति हेमाद्रिसमुद्धृतेन शतपथ- ' • वचनेन ज्ञायते । महाहविषा ह वै वृत्र जघ्नु यानेवैषा तस्मिन् सग्रामेऽघ्नस्तान् पितृयज्ञेन समैरयन्त । पितरो वे त आसन् । तस्मात् पितृयज्ञो नाम तद्वसन्तो ग्रीष्मो वर्षा एते ते ये व्यजयन्त शरद्धेमन्तः शिशिरस्त उ ते यान् पुनः समैरयन्त तद्ये सोमेनेजानास्ते पितरः सोमवन्तोऽथ ये दत्तेन पक्वेन लोक जयन्ति ते पितरो बर्हिषदः, ये ततो नान्यतरच न यानग्निरेव दहन् स्वदयति ते पिनरोऽग्निष्वात्ता. । एत उ ते पितरः ।' ( हेमादिपरिशिष्टखण्डे, अ० १ ) | ब्रह्मपुराणे पितृ- सृष्टिमुक्त्वोक्तम्-'तान् दृष्ट्वा प्राह स ब्रह्मा तिर्यक्सस्थान् अधोमुखान् । भवन्त पितर सन्तु सर्वेषा गृहमेधिनाम् || ऊर्ध्ववक्त्रास्तु ये तत्र ते नान्दीमुखसज्ञिता । ' इति । नन्दिपुराणे- निर्मिता पितरो नाम पञ्च वै देवयोनय | ब्रह्मणा तपसा वत्स अर्थज्ञा. शुद्धमूर्तय ॥ अग्नि- स्वात्ता बर्हिषद काव्याश्चापि सुकालिन | याम्याश्च योनयो ह्येते पञ्चोक्ता पितृयाजिनाम् ॥ ' नागरखण्डे -' अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपा स्मृता । रश्मिपा उपहूताश्च तथैवायन्तु न परे ॥ तथा स्वादुषदश्चान्ये स्मृता नान्दीमुखा नृप । -- विष्णुधर्मोत्तर पुराण मे पितरो के सात गणो का उल्लेख हैं और उनके नाम इस प्रकार बताये गये है - सुभास्वर, बर्हिषद्, अग्निष्वात्त क्रव्याद, उपहूत, आज्यपा और सुकाली । इनमें से तीन मूर्तिहीन और चार मूर्तिमान् पितर माने जाते है । सुभास्वर, बर्हिषद और अग्नि- ष्वात्त ये तीन पितर मूर्तिहीन है और शेष चार मूर्तिमान् है ॥ इसीलिये पितृकन्या के द्वारा देखे गये सूक्ष्म पितरो का वर्णन ब्रह्माण्ड प्रभृति पुराणो में मिलता है -यह पितृकन्या इस व्यभिचार के कारण योगभ्रष्ट होकर गिर पडी, यद्यपि उसमे मन को कल्पना के अनुसार रूप बदल लेने की सामर्थ्य थी । ऐसा होते समय उसने अन्य पितरो से प्रार्थना की तो आकाश से गिरते समय त्रसरेणु ( अत्यन्त सूक्ष्म) प्रमाण के तीन विमानो को देखा और उनमें बैठे हुए पितरो को भी देखा, जो कि अत्यन्त सूक्ष्म आकार वाले थे और अग्नि के समान प्रकाश- मान् थे, मानो अग्नि में ही इनका निवास हो । वायुपुराण में कहा गया है कि देवताओ के पितृगण, लौकिक पितृगण, सौम्य देव, याजक, अयाजक और अयोनिज देवगण ये सब प्रकार के पितृगण देवता हो है । इनको सदा देवता के रूप में ही भावना करे । 'ऋतुरूपा पितर, इस वचन की व्याख्या के प्रसंग मे हेमाद्रि में शतपथ ब्राह्मण का एक वचन उद्धृत है, जिसका कि अभिप्राय यह है -बडे बडे यज्ञो को करने के कारण शक्ति सम्पन्न देवताओ ने वृत्रासुर का वध कर दिया । इस युद्ध में उन्होने जिन असुरो का नाश किया, उनको पितृयज्ञ करके सन्तुष्ट किया, क्योकि उन्होने पितृलोक को प्राप्त किया था । यह पितृयज्ञ वसन्त, श्रीष्म और वर्षा ऋतु में व्यक्त होता है और शरद्, हेमन्त और शिशिर में उन पितरो को सप्रेरित करता है । इनमें से सोमरस से जिनकी तृप्ति होती है, वे पितर सोमवान्, पके हुए अन्न से जिनकी तृप्ति होती है, वे बर्हिषद् और जो प्रत्यक्षत इन दोनो को ग्रहण नहीं करते, किन्तु जिनके निमित्त अग्नि ही इन पदार्थों को ग्रहण करती है, वे अग्निष्वात्त पितर कहलाते है । ब्रह्म पुराण में पितरो की सृष्टि का वर्णन करने के बाद बताया गया है कि उन तिरछे लटके हुए, नीचे मुँहवाले प्राणियो को देखकर ब्रह्मा ने कहा कि आप लोग सारे गृहस्थो के पितर बनिये | इनमे से जिनका मुँह ऊपर की तरफ है, वे नान्दीमुख नामके पितर कहलाते है । नन्दिपुराण में बताया गया है कि हे वत्स, ब्रह्मा ने तपस्या करके पाँच प्रकार की देवयोनियो को पितरो के नाम से निर्मित किया । ये पितर सभी विषयों के जानकार तथा पवित्र मूर्ति वाले हैं । इनके नाम अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, काव्य, सुकाली और याम्य ह । पितृयज्ञ करने वाले इन्ही पांच में से किसी योनि को प्राप्त करते हैं । स्कन्दपुराण के नागरखण्ड में बताया गया है कि है नृप, अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यपा, सोमपा, रश्मिपा, उपहूत, स्वादुषद् और नान्दीमुख ये सब विभिन्न प्रकार के पितृगण है । इन सबकी

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१५५० वेदार्थपारिजात एते पितृगणा ख्यातास्ते च देवसमुद्भवा ॥ आदित्या वसवो रुद्रा नास्त्यावश्विनावपि । सन्तर्पयन्ति ते चैतान् मुक्त्वा नान्दी- मासश्राद्धभुजश्च ये । सोमो यमोऽङ्गिराश्चैव सोमपा पितरस्तथा । मुखान् पितॄन ।' हारीतस्मृती -' अत पर प्रवक्ष्यामि|| बर्हिषदोऽग्निष्वात्ताश्च हुताद वधो गण चन्द्रमा ऋतवश्चैव मृत योऽग्निर्दहत्यपि । सोमोपहूता प्राक्सोमा " अनीजानाश्च ब्राह्मणा ॥ ' वायुपुराणे - 'देवानां पितरो देवा पितरौ लौकिकास्तथा । देवा सौम्याश्च यज्ज्वानो.... योनिजा । देवांस्ते पिनर सर्वे देवास्तान् भावयन्त्युत || मनुष्या पितरश्चैव तेभ्योऽये लौकिकाः स्मृताः । पिता पिता- महश्चैव तथैव प्रपितामहः । यज्वानो ये तु मोमेन सोमवन्तस्तु ते स्मृताः । ये यज्वानः स्मृतास्तेषा ते वै बर्हिषदः स्मृताः । कर्मस्वेतेषु युक्ता ये भवन्त्यादेहसम्प्लवात् ॥ अग्निष्वात्ताः स्मृतास्तेषा होमिनोऽयाज्ययाजिनः । ' इति । दुष्कर्मभिरधोगति प्राप्ता मनुष्याः पितरोऽभिधीयन्ते । 'सेभ्योऽपरे तु येऽप्यन्ये सङ्कीर्णाः कर्मयोनिषु । भ्रष्टाश्चा- श्रमधर्मभ्यः स्वधास्वाहाविवर्जिताः । भिन्नदेहा दुरात्मान प्रेतभूता यमक्षये ॥ स्वकर्माण्येव शोचन्ति यातनास्थानभागिनः ॥ दीर्घायुषोऽति शुष्काश्च श्मश्रुलाश्च दिवाससः । क्षुत्पिपासापरीताश्च विद्रवन्ति ततस्ततः । परान्नानि च लिप्सन्ते काम- मानास्ततस्तत । स्थानेषु पच्यमानाश्च यातनानिरयेषु च । शाल्मली वैतरण्या च कुम्भीपाकेषु तेषु च । करम्भवालुकायां च असिपत्रवनेषु च । शिलासम्पेषणे चैव पात्यमानाः स्वकर्मभिः । अप्राप्ता यातनःस्थान श्रेष्ठा ये भुवि पञ्चधा । पश्चात्तु ये स्थावरान्ते भूताना केषु कर्मसु । नानारूपास्तु याता ये तिर्यग्योन्यादियोनिषु । बाह्लीकारचीष्मपाश्चैव दिवाकीर्त्याश्च ते स्मृताः । कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषा शुक्लः स्वापाय शर्वरी । ' इति । उत्पत्ति देवताओ मे होती है । आदित्य, वसु, रुद्र, नासत्य अश्विनोकुमार ये सब देवगण नान्दीमुख नाम के पितरो को छोडकर इन सबको सन्तुष्ट करते हैं । हारीत स्मृति में बताया गया है कि इसके आगे मासिक श्राद्ध में भोजन करने वाले पितरो के नाम गिनाये जा रहे हैं - सोम, यम, अगिरा, सोमपा, बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, हुताद नाम का षड्विध गण, चन्द्रमा, ऋतु, मृत व्यक्ति का दाहक अग्नि, सोमोपहूत, प्राक्सोम और अनीजान ब्राह्मण । बायुपुराण में बताया गया है कि पितरो को दो कोटियाँ है -एक देवताओ के सिर और दूसरे लौकिक पिता, अर्थात् मनुष्यो के पितर । सौम्य, यज्वा ( विधिपूर्वक यज्ञ करने वाले ) और अयोनिज इन तीनो प्रकार के पितरो की देवगण विधिपूर्वक सेवा करते हैं । लौकिक पितर इनसे भिन्न होते हैं, जो कि मनुष्य योनि से आते है । ये पिता, पितामह, प्रपिता- मह प्रभृति नामो से अभिहित होते है । सोमरस की आहुति ग्रहण करने वाले पितर सोमवान् और कुशा पर कव्य ग्रहण करने वाले बहि- षद् कहलाते हैं । देह का त्याग करते समय तक जो यज्ञ-याग आदि शुभ कर्मों के सपादन में लगे रहते हैं, वे पितर अग्निष्वात्त कहलाते हैं । इनके निमित्त हवन करने वाले व्यक्ति यज्ञ करने के लिये अयोग्य व्यक्ति माने जाते हैं । अपने बुरे कर्मों के कारण जिनको अधोगति प्राप्त हुई है, वे भी पितर कहे जाते है । जैसा कि निम्न श्लोको में बताया गया है -इनसे भिन्न भी पितरो के अनेक भेद है, जो कि नाना प्रकार की कर्मयोनियो में भी जन्म लेते रहते हैं, आश्रम घर्मो से भ्रष्ट हो गये है, स्वधाकार और स्वाहाकार से जो दर्जित हैं, अर्थात् जिन्होंने देवकार्य और पितृकार्य करना बन्द कर दिया है, दुरात्मा है, आत्मघात करने वाले है, मृत्यु के उपरान्त जो प्रेत बन गये हैं, यातनास्थान अर्थात् विभिन्न दुःखदायी नरको में पड़कर जो अपने बुरे कर्मों के लिये पछताते रहते है, जहाँ वे लम्बी आयु पाते है, सूखकर कांटा हो जाते है, डाढी-मूछ के बाल बढे रहते हैं और पहनने के लिये वस्त्र भी नही मिलता, भूख और प्यास से पीडित होकर मारे मारे फिरते रहते हैं, जो सदा दूसरे के अन्न पर पलते रहते है और सदा दूसरे से कुछ न कुछ पाने की आस लगाये रहते हैं, ये सब दुःखदायी नरको में पड़कर सदा अपने दुष्कर्मो का फल भोगने रहते है । ये अपने अपने दुष्कर्मों के अनुसार शाल्मली, वैतरणी, कुंभीपाक, तप्तबालुका, असिपत्रवन, शिलासंपेषण प्रभृति नरको में अपने किये का फल भोगते है । जो इन दुःखदायी नरको मे नही पडते, वे श्रेष्ठ पितर है । पृथिवी पर उनके पाँच प्रकार अभिदिष्ट है । इनमें से कुछ स्थावर योनि में जन्म लेते हैं, कुछ नाना प्रकार की पशु-पक्षी आदि की योनियों में जन्मते है । कुछ बाह्वीक, ऊष्मपा और दिवाकीर्त्य कहलाते हैं । इन पितरों का दिन कृष्ण पक्ष में और रात्रि शुक्ल पक्ष में होती है, जब कि ये सो जाते है ।

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वेदार्थपारिजातः १५.१ नागरखण्डे -– ' अथ ये पितरो मर्त्या निवसन्ति त्रिविष्टपे ॥ द्विविधास्ते प्रदृश्यन्ते सुखिनोऽखिन परे ॥ येभ्यः I श्राद्धानि यच्छन्ति मर्त्यलोके स्ववंशजाः । ते सर्वे तत्र संसृष्टा देववन्मुदिताः स्थिताः येषा प्रयच्छते नैव किञ्चित् रचित् स्ववंशजः । क्षुत्पिणमाकुलास्ते च दृश्यन्ते ते च दुःखिताः । इति । मनुस्मृती -'य एते तु गणा मुख्याः पितॄणा परि- - कीर्तिताः । तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तम् ॥ ' याज्ञवल्क्यस्मृती –' वसुरुद्रादितिसुना पितरः श्राद्धदेवता ' । नन्दिपुराणे गुह्या पितर उन्का । 'विष्णु पितास्य जगतो दिव्यो यज्ञः स एव च । ब्रह्मा पितामहो ज्ञेगो ह्यहं च प्रपितामह ।' पितृ- पितामहाद्यधिष्ठानभूताग्निष्वात्ता अधिष्ठातृत्वेन श्राद्धे पितरो देवतारूपास्तद्रूपेणानुमन्धीयमानाः श्राद्धस्य कामप्यपूर्वा- मैहिकामुष्मिकफलोत्पादिका शक्ति जनयन्ति । सर्वेषु श्राद्धकल्पेषु गोपितत्वेन श्राद्धोपदेशोपनिषन्निरूपया । अग्निष्वात्तादिवत् पितृत्वेनाप्रसिद्धाश्चेति गुह्या; । 'उद्दिश्य विष्णुर्यैरिष्टः पितरस्तैस्तु तर्पिता । ब्रह्मा समिष्ट: प्रोणाति पुस सर्वपितामहान् ॥ प्रपितामहानुद्दिश्य त्विष्टोऽह यैर्महात्मभि । नयन्ति नरके घोरे तेषां वै प्रपितामहाः ॥ लोकानि दिव्यानि मनोरमाणि प्रयान्ति सर्वे प्रसभं गणेश । पिता च तेषा तु पितामहश्च ये वैष्णव ज्ञानविदोऽर्च्चयन्ति ॥ विष्णु समभ्यर्च्य च सर्वभावैर्भजन्ति तेषा पितरस्तु तुष्टिम् ।... निकृष्टजातीश्च परित्यजन्ति ॥ ' वराहपुराणे पितॄन् प्रति वराहवचनम् - 'यमोऽधिदेवो भवता सौम्यः स्वाध्यात्म ईरितः । अधियज्ञस्ततस्त्वग्नि- भवतां कल्पना त्वियम् ॥ अग्निर्वायुश्च सूर्यश्च स्थान च भवतामिति । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च भवतामधिपूरुषाः ॥ योगिनो योगदेहाश्च योगाधाराश्च सुव्रता । कामतो विचरिष्यध्वं फलदा सर्वजन्तुषु ॥' इति । स्कन्दपुराण नागरखण्ड में बताया गया है कि अब जो मनुष्य पितर स्वर्ग मे जाकर के निवास करते है, वे दो तरह के दिखाई पडते हैं । उनमे से कुछ सुखी रहते है और कुछ दुखी । जिन पितरो के निमित्त मृत्यु लोक में उनके वंशज श्राद्ध करते रहते हैं, वे सब उस स्वर्गस्थान मे पहुँच कर देवता के समान सुख भोगते रहते है और जिनको उनके वशज कुछ भी नही देते, वे भूख और प्यास से व्याकुल होकर अत्यन्त दुखी रहते है । मनुस्मृति में जागे किखा गया है कि ऊपर जिन पितरो के मुख्य गणो का वर्णन किया गया है. उनके अतिरिक्त भी उनके पुत्रो और पौत्रो आदि के रूप मे पितरो की अनन्त मख्या है । याज्ञवल्क्य स्मृति में इसीलिये वसु, रुद्र और आदित्य स्वरूप पितरो को श्राद्ध कर्म का देवता माना है । नन्दिपुराण में पितरो को गुह्य नाम दिया है । इस जगत् का दिव्य पिता विष्णु है, वही यज्ञ के नाम से भी प्रसिद्ध है । ब्रह्मा को पितामह जानना चाहिये और मैं ( रुद्र ) इस जगत् का प्रपितामह हूँ । पिता पितामह आदि के रूप मे विद्यमान अग्निष्वात्त नाम के पितर श्राद्ध के अधिष्ठाता के रूप मे देवता माने जाते है । श्राद्ध मे इनकी देवरूप मे ही भावना और अर्चना करने पर ये किसी अपूर्व ऐहिक और पारलौकिक फल को देने वाली शक्ति को पैदा करते हैं । सभी श्राद्ध कल्पो ( विधियो ) मे श्राद्ध के कुछ रहस्य गुप्त रखे जाते है, अग्निष्वात्त प्रभृति की तरह कुछ पितर प्रसिद्ध नही है, उनका रहस्य अत्यन्त गुप्त रखा गया है । विष्णु को निमित्त बनाकर जो यजन करता है, वह पितरो को तृप्त कर देता है । इसी तरह से ब्रह्मा को निमित्त बनाकर पितरो को तृप्त करने वाला पुरुष पितामहो को तृप्त कर देता है । मुझे ( रुद्र को ) निमित्त बनाकर श्राद्ध करने वाला व्यक्ति प्रपितामहो को सन्तुष्ट करता है । इसके प्रपितामह कभी नरक में नही जा सकते । हे गणेश, इस प्रकार से पितरो की पूजा करने वालो के सभी पूर्वपुरुष दिव्य मनोरम लोको को प्राप्त करते है । जो ज्ञानी पुरुष वैष्णव ( बिष्णु भक्त ) की पूजा करते हैं, उनके पिता और पितामह तथा विष्णु की उपासना करने वालो के पितर सभी तरह से सब प्रकार की तुष्टि प्राप्त करते है और कभी भी निकृष्ट जाति में पैदा नही होते । वराहपुराण में पितरो को संबोधित कर कहा गया है कि आप लोगो के अधिपति यमराज है, सोम अध्यात्म तत्त्व है और अग्नि आप लोगो का अधियज्ञ तत्त्व है । अग्नि, वायु और सूर्यलोक आप लोगों के रहने के स्थान है । ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र ये आपके अधिपुरुष है | आप लोग योगी है, योगमय आप लोगो का शरीर है, आप लोग ही योगशास्त्र के आधार हैं, क्योकि नियमपूर्वक आप लोग योगशास्त्र के सभी व्रतों का पालन करते हैं । आप सभी प्राणियों का कल्याण करते हुए इस त्रिलोकी में इच्छानुसार, विचरण कीजिये | 3

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वेदार्थपारिजात १५५२ } भविष्यपुराणे - अनिरुद्धः स्वयं देवः प्रद्युम्नस्तु पिता स्मृत । सर्षणस्तज्जनको वासुदेवस्तु तत्पिता || स्वय श्राद्धकर्ताऽनिरुद्धः । कर्तुः पिता प्रद्युम्नः । श्राद्धकर्तृपितृजनकः सकर्षण । तत्पिता श्राद्धकर्तृपितृजनकपिता वासुदेव. । स्मृतिषु पिण्डानां वरुणादिरूपत्वमुक्तम्-' प्रथमो वरुणो देव. प्राजापत्यस्तथापरः । तृतीयोऽग्नि स्मृत. पिण्ड एष पिण्डविधिः स्मृत ' ॥ ' विष्णुधर्मोत्तरे - ' सुभास्वरा ब्रह्मसुता सोममाप्याययन्ति ते । ब्रह्मलोकचरा राजन् नित्य मूर्ति- विवर्जिताः ॥ तथा बर्हिषदो राजन् स्मृताः पुत्रा मरीचितः । आप्याययन्ति ते देवलोके तिष्ठन्ति पूजिता ॥ विम्राजलोके तिष्ठन्ति अग्निष्वात्ता नराधिप । पुलस्त्यस्य ऋषे पुत्रा भावयन्ति जनानिमे ॥ क्रव्यादाश्त्रोपहूताश्च आज्यपाश्च सुकालिन । } कवेरङ्गिरसश्चैव कर्दमस्य प्रजापतेः ॥ वशिष्ठस्य तथा पुत्राः क्रमेणेते प्रकीर्तिता । ज्योतिष्मन्त स्मृता लोका ये च लोका मरीचिन ॥ तेजस्विनो मानसाश्च क्रमेणैषा प्रकीर्तिताः ।" इति । मत्स्यपाद्मादिषु - ' मरीचिगर्भा नाम्ना तु लोका मार्तण्डमण्डले । पितरो यत्र तिष्ठन्ति हविष्मन्तोऽङ्गिरः- सुताः ॥ राज्ञा तु पितरस्ते वै स्वर्गमोक्षफलप्रदा । सुस्वधानाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति ते सुताः ॥ आज्यपा नाम लोकेषु कर्दमस्य प्रजापते. ।' इति । ब्रह्माण्डपुराणे -लोकाः सनातना ये वे तत्र तिष्ठन्ति भास्वराः । श्रय पितृगणास्ते वै पुत्राः पुण्या. प्रजापते. ॥ विराजस्य प्रजाः श्रेष्ठा वैराजा इति विश्रुता ।' इति । वराहपुराणे -' सुकाला नाम पितरो वशिष्ठस्य प्रजापतेः । तेऽपि याज्यास्त्रिभिर्वर्णैर्न शूद्रेण पृथक् श्रुतेः ॥ वर्णोत्तमाभ्यनुज्ञातः शूद्रः सर्वान् पितॄन् यजेत् ।' अर्थात् 'शूद्राणा सुकालिनः ' इति पृथक्श्रुते शूद्राणामेव सुकालिन इति विशेषो न ग्राह्य, किन्तु ब्राह्मणादीनामपि सुकालिनः पितरो भवन्ति, भविष्यपुराण में बताया गया है कि श्राद्ध करने वाला व्यक्ति स्वय अनिरुद्ध का प्रतिनिधि है । श्राद्धकर्ता का पिता प्रद्युम्न, पितामह सकर्षण और प्रपितामह वासुदेव का प्रतिनिधित्व करते है । स्मृतियों में प्रथम पिण्ड को वरुण का, दूसरे को प्रजापति का, तीसरे को अग्नि का प्रतिनिधि माना है । विष्णुधर्मोत्तर पुराण में पितरो का वर्णन इस तरह से किया गया है— है राजन् । सोमपा नामक पितर अत्यन्त प्रकाशमान ब्रह्मा के पुत्र है । इनकी कोई मूर्ति नही होती और ये सदा ब्रह्मलोक में विचरण करते रहते हैं । हे राजन्, बर्हिषद् नामक पितर मरीचि के पुत्र है । वे देवलोक में रहते है और पूजा करने वाले की सभी कामनाएँ पूरी करते है । अग्निष्वात्त नामक पितृगण प्रकाशमय लोक मे रहते है । ये पुलस्त्य ऋषि के पुत्र है और मनुष्यो की सदा श्रीवृद्धि करते रहते है । क्रव्याद, उपहूत, आज्यपा और सुकाली नाम के पितृगण क्रमश शुक्र, अंगिरा, कर्दम प्रजापति और वसिष्ठ के पुत्र है । ये क्रमश. ज्योतिष्मान्, मरीचि, तेजस्वी और मानस लोक में निवास करते हैं । मत्स्यपुराण और पद्मपुराण में बताया गया है कि मरीचि ऋषि से उत्पन्न पितरो का निवास स्थान सूर्यमण्डल है, जहाँ पर कि अंगिरा के पुत्र हविष्मान् नामक पितृगण निवास करते हैं । ये राजाओ के पूजनीय पितृगण है । ये स्वर्ग और मोक्ष दोनो को देने वाले है । सुस्वधा नामक पितृगण कर्दम प्रजापति के पुत्र है । ये आाज्यपा पितृगणों के लोक में निवास करते हैं । ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि वे सनातन, कभी नष्ट न होने वाले लोक कहे जाते है, जिनमे कि भास्वर नाम के पितृगण निवास करते है । प्रजापति के पुत्र तीन पितृगणो मे विभक्त है और विराज की श्रेष्ठ प्रजा वैराज के नाम से प्रसिद्ध है । वराहपुराण में बताया गया है कि वसिष्ठ प्रजापति के पुत्र सुकाल नामक पितृगण कहलाते है । इनकी पूजा तीन वर्णों को भी करनी चाहिये, केवल शूद्र को ही नही । क्योकि शूद्र के लिये वितृपूजा का विधान अलग से भी किया गया है कि उत्तम वर्ण की आज्ञा लेकर शूद्र सभी पितरों की पूजा कर सकता है । अभि-प्राय यह है कि सुकाल नाम के पितरो की पूजा शूद्र करे, इस श्रुति के आधार पर यह अर्थ नही निकाला जा सकता कि ये केवल शूद्रो के ही पूजनीय पितृगण है, किन्तु ब्राह्मण प्रभृति के भी ये पूज्य होते हैं और ब्राह्मणो की आज्ञा लेकर शूद्र इनसे भिन्न पितृगणों की भी पूजा कर सकते है । वराहपुराण में आगे बताया गया है कि शूद्र के लिये शूद्र जाति के पितरों की अलग से कोई सत्ता नहीं है, केवल उसके पितृ-पितामह प्रभृति ही इस जाति के होते है । पुराणो के उदाहरणो के आधार पर ही उनमे कही कही कुछ विशेषता देखने में आती है | हेमाद्रि ग्रन्थ और अन्य पुराणो में पितृगणों के अनेक भेदो का वर्णन मिलता है । इसीलिये कहा जाता है कि वेद के अर्थ का

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वेदार्थपारिजात १५५३ अन्येऽपि शूद्राणां ब्राह्मणाभ्यनुज्ञयेति ज्ञातव्यम् । न तु मन्ति पृथक् तस्य पितर शूद्रजातय । मुक्त्वा स्वजनकान् ब्रह्मन् न तु दिव्येषु दृश्यते । विशेष शास्त्रदृष्ट्या तु पुराणाना निदर्शनात्' । दिव्येषु पितृषु शूद्रत्वादिरूपो विशेषो न ग्राह्यः । हेमाद्री पुराणेषु च बहवः पितृभेदा उक्ता । 'इतिहासपुराणाभ्या वेदार्थमुपबृहयेत्' । यद्यपि मेधातिथिनाऽन्यैश्चार्थवादत्वादेवाग्निष्वात्तादिप्रतिपादकवाक्याना न तेषा देवतात्वविधाने तात्पर्य- मित्युक्तम् । ' यद्यपि च 'वसून् वदन्ति वै पितॄन् रुद्राश्चैव पितामहान् । प्रपितामहास्तथादित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी ॥ ' नन्दिपुराणे- विष्णु: पितास्य जगतो दिव्यो यज्ञेश एव च । ब्रह्मा पितामहो ज्ञेयो ह्यह च प्रपितामह ॥ मासाश्च पितरो ज्ञेया ऋतवश्च पितामहाः । संवत्सर प्रजाना वे सुमेकः प्रपितामहः ॥ ' इति वस्वादिविष्ण्वादिमासादीना पित्रादिभिः सहाभेदाभिधानं दृश्यते, तथापि तद्रीत्या ' आदित्यो यूप:' इतिवत् प्राशस्त्यमात्रपरतया विधिकल्पना न युक्ता । अग्निष्वात्तादीना श्राद्धदेवतात्वस्यापि विधयो न दृश्यन्ते । 'न पुत्रः पितर यस्तु जीवन्तमनुवर्तते । संस्थित तर्पयेद् भक्त्या श्राद्धेन विविधेन च ॥ ' इत्यादिश्राद्धविधीना मृतमनुष्यतृप्त्यर्थमेव दर्शनादित्यादिक बहूक्त हेमाद्री पूर्वपक्षे, तथापि सिद्धान्तरीत्या तत्रैवाग्निष्वात्तादीना देवतात्व समर्थितम् । यद्यपि मनुवाक्यैर्विस्पष्टमग्निष्वातादीना श्राद्धे देवतात्वस्य विधिर्न दृश्यते, तथापीतिहासपुराणेषु चतुर्थ्यन्तैः शब्दैः श्राद्धेन सहैषा सम्प्रयोगस्य दर्शनात् तेषा देवतात्व सिद्धयत्येव । पाद्म- मात्स्ययोर्यथा — 'तेभ्यः सर्वे तु मनवः प्रजाः सर्गे तु निर्मिताः । ज्ञात्वा श्राद्धानि कुर्वन्ति धर्ममेवेति सर्वदा ॥ ' अनुवाद- मात्रस्यानर्थकत्वान्न मनुभिरनुष्ठितस्य श्राद्धस्यानुवादोऽयमिति वक्तु युक्तम्, न च प्रशसार्थोऽनुवादो युक्तः, विधेयस्यैव प्रशस्यत्वात् । अतो ब्राह्मणादिकर्तृकाग्निष्वात्तादिदेवताकश्राद्ध विध्यर्थमेवानुवादो युक्त ' । उपबृंहण इतिहास और पुराण की सहायता से करना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि बहुत सी बाते वेदो मे अत्यन्त संक्षेप में मिलती है । उनको विस्तार से समझना हो तो इसके लिये रामायण, महाभारत, पुराण प्रभृति ग्रन्थो की सहायता लेना आवश्यक है, क्योंकि वेद में संक्षेप में कही बात को ही इनमें विस्तार से समझाया गया है । यद्यपि मेघातिथि तथा अन्य व्याख्याकारो और निबन्धकारो ने यह निर्णय दिया है कि अग्निष्वात्त प्रभृति पितरो के देवतात्व का प्रतिपादन करने वाले वाक्य अर्थवाद मात्र हैं, अतः उनका तात्पर्य उनको देवता मान लेने में नही है । पितृस्थानीय पितरों को वसु देवताओं का, पितामहो का रुद्र का और प्रपितामहो का आदित्य को प्रतिनिधि मानने वाले सनातन श्रुति के वचन मिलते है । नन्दिपुराण में भी यज्ञ के स्वामी विष्णु को पिता का,, ब्रह्मा को पितामह का और रुद्र को प्रपितामह का स्वरूप माना है । इस तरह से इन देवताओ से पितरो को अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । इसका समाधान इस तरह से करना चाहिये कि जैसे 'आदित्यो यूप:' इस वाक्य मे यूप को आदित्य का प्रतिनिधि इसलिये कहा गया है कि जिससे यूप की प्रशसा हो, उसी तरह से पितरों की प्रशंसा के लिये उनमें देवतात्व का आरोप किया जाता है । अत इन वाक्यों को विधि वाक्य न मानकर अर्थवाद वाक्य मानना ही ठीक है । यद्यपि अग्निष्वात्त प्रभृति पितरो की श्राद्ध देवता के रूप में पूजा को बताने वाले विधि वाक्य मिलते नहीं, क्योंकि 'न पुत्र पितरं इत्यादि में प्रतिपादित श्राद्धविधि के अनुसार मृत मनुष्य की तृप्ति के लिये ही यह श्राद्ध विधि की जाती है और अग्निष्वात्त प्रभृति पितृगण उस कोटि में नही आते । इस तरह की अनेक बातें हेमाद्रि ग्रन्थ में पूर्वपक्ष के रूप में उठाई गई है । तथापि इतिहास, पुराण प्रभृति ग्रन्थो मे चतुर्थी विभक्ति के साथ बताई गई श्राद्ध विधियो में इन सबका भी समावेश देखा जाता है, इससे इनका भी श्राद्ध देवताओ में समावेश मानना ही पड़ता है । पद्म और मत्स्य पुराण में बताया गया है कि इन सब पितरो मे ही सृष्टि के प्रारंभ मे मनु प्रभृति प्रजा की उत्पत्ति हुई है । अत उन सब पितरों को सभी प्रकार से जान- समझकर ही मनु प्रभृति भी धर्म का पालन करने के अभिप्राय से श्राद्ध मे देवता के रूप में पूजते है । इस वचन को अनुवादक वाक्य नही माना जा सकता, क्योकि तब इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नही हो सकता । मनु प्रभृति ने इन पितरो की पूजा की, इससे इस अनुवाद वाक्य का प्रयोजन पितरो की प्रशंसा में माना जायगा, किन्तु इस प्रसंग में यह स्मरणीय है कि प्रशंसा विधेय को ही की जाती है, अनूद्य की नही । अत ब्राह्मण प्रभृति के द्वारा भी अग्निष्वात्त प्रभृति श्राद्ध देवताओं की पूजा करनी चाहिये, इस विधि वाक्य की पुष्टि में ही अनुवाद वाक्य की सार्थकता मानी जा सकती है । १ ९५

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वेदार्थपारिजातः १५५४ हग्विशे प्रत्यक्षविधानं च दृश्यते - तेषामथाभ्युपगममनुमृते युगे युगे । प्रवर्तयति श्राद्धानि नष्टे धर्मे प्रजा-पतिः ॥ पितृणामादिसर्गं तु सर्वेषा द्विजसत्तम । तस्मादेवं स्वधर्मेण श्राद्ध देयं वदन्ति हि ॥ ' अत्राग्निष्वात्तादीनुद्दिश्य ब्राह्मणादिभि श्राद्ध देयमिति स्पष्टं विधानं दृश्यते । स्वधर्मेणेति ब्राह्मणादिभि पक्वान्नेन शूद्रेणामान्नेनेति प्रकारभेदेन्त्यर्थं । विष्णुधर्मोत्तरादिषु त्वग्निष्वात्तादीनामेव साक्षात् श्राद्धभोक्तृत्वम् । मनुष्याणां तु तद्द्वारकस्तृप्तियोग उक्तः । 'एते श्राद्धस्य भोक्तारो विश्वेदेवैः सदा मह । एते श्राद्धं सदा भुक्त्वा पितॄन् मन्तर्पयन्त्युत ॥ ' 'तृप्त्या तथैते विनियोजयन्ति दातु पितॄन् सर्व-गणान् महीपते । ' न चात्रापि स्तुतिमात्रम्, विश्वेदेवैः महेति हवि. प्रत्युद्देश्यैविश्वेदेवैः सह समानभोक्तृत्वस्याभिधानात् । 'अमूर्त मूर्तिमन्तश्च पितरो द्विविधाः स्मृता । नान्दीमुखा पार्वणाश्च एकोद्दिष्टाशिनस्तथा ॥ उद्दिष्ट एव मूर्तानां पितॄणां निर्णयस्त्रिधा । नान्दीमुखा वृद्धिश्राद्धित । यथाऽपूर्वद्रव्यदेवताश्रवणेन विधिप्रत्ययाश्रवणेऽपि विधि परिकल्प्यते ' प्रतितिष्ठन्ति ह वै ते य एता रात्रीरुपयन्ति तथैवापूर्वद्रव्यदेवताफलश्रवणाद् विध्यभावेऽपि विधिः कल्पयिनुं शक्य एव । अत्र तु विधिरुक्त एव । यदपि च देवताना कर्मस्वनधिकार उक्त इति, तदपि न देवतान्तराभावात् कर्मस्वनधिकारेऽपि तत्पितॄणा पृथक्सत्त्वस्य प्रतिपादनात् पित्र्यकर्मानधिकारे हेत्वभावात् । 'पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चन्द्रक्षयेऽग्निमान् । कृत्वान्वाहार्या-दिकं श्राद्ध कुर्यान्मासानुमासिकम् ॥ ' अनेकेषु श्राद्धकल्पेषु पितृभ्यो दद्यादित्युत्पत्तिविधिर्दृश्यते । अग्निष्वात्तादयोऽपि पितृ-शब्दवाच्या इत्यग्निष्वात्तादीनामुत्पत्तिशिष्टत्वान्नोत्पत्तिशिष्टगुणावरोधविरोध । यानि पुनरेकोद्दिष्टानि प्रेतश्राद्धानि सपिण्डीकरणे सावत्सरिके, अपि च पार्वणविकृतिभूते, तत्रोत्पत्तिशिष्टमृत मनुष्यदेवतात्वविरोधान्मा भूदग्निष्वात्तादीनां देवतात्वम्, अन्यत्र नित्यनैमित्तिककाम्येष्वग्निष्वात्तादोना देवतात्वे न बाधा | वसुरुद्रादित्याना श्राद्धे देवतात्वम्य विधि- ' तेषामथा० ' प्रभृति श्लोको में हरिवश में अग्निष्वात्त प्रभृति पितरो को उद्दिष्ट कर ब्राह्मण प्रभृति को श्राद्ध करना चाहिये, इसका स्पष्ट विधान किया है । यहाँ माये 'स्वधर्मेण' पद का अर्थ यह है कि ब्राह्मण प्रभृति पके हुए अन्न से और शूद्र सूखे अन्न से पितरो को तृप्त करे । विष्णुधर्मोत्तर प्रभृति पुराणा मे तो अग्निष्वात्त प्रभृति देवताओ को ही साक्षात् श्राद्धान्न का भोक्ता माना गया है, मनुष्यो की तृप्ति तो उन्ही की सहायता से होती है । वहाँ कहा गया है कि अग्निष्वात्त प्रभृति पितृगण विश्वेदेवो के साथ श्राद्ध में प्रदत्त अन्न को ग्रहण करते है । 1 ये सब श्राद्ध में प्रदत्त अन्न से तृप्त होकर अन्य पितरो को भी तृप्त करते है । यहाँ भी केवल स्तुति-परक ही इस वाक्य को नही माना जा सकता, क्योकि यहाँ स्पष्ट बताया गया है कि विश्वेदेवो के साथ इन पितरो को भी समान रूप से हवि दी जाती है और उनके साथ अग्निष्वात्त प्रभृति पितृगण भो उससे तृप्त होते है । अमूर्त और मूर्त के भेद से पितृगण दो प्रकार के हैं । इनमें से मूर्त पितृगण नान्दीमुख, पार्वण और एकोद्दिष्ट के भेद से तीन प्रकार के होते है । जैसे अपूर्व द्रव्य और देवता के सुनाई पड़ने पर विधि प्रत्यय की अविद्यमानता में भी विधि वाक्य की कल्पना कर लो जाती है, उसो तरह से 'प्रतितिष्ठन्ति' इस श्रुति वाक्य की तरह जहाँ पर अपूर्व द्रव्य अथवा देवता विषयक फलश्रुति सुनाई पडती है, वहाँ पर भो विधि वाक्य के न रहने पर भी विधि की कल्पना की ही जा सकती है । प्रस्तुत कथन में तो स्पष्ट ही विधि दिखाई गई है । देवताओ का यज्ञ आदि कर्मों मे अधिकार नही माना गया है । वह इसलिये है कि इन्द्र प्रभृति देवता का यदि यज्ञ में अधिकार माना जाय, तो वे दूसरे किस इन्द्र प्रभृति देवता को अपने यज्ञ में बुलावेंगे । किन्तु यह नियम पितरो के प्रति लागू नही हो सकता, क्योकि पितरो की देवताओ से अलग सत्ता मानो गई है । देवताओं को जिस कारण से अधिकार नही दिया गया, वह कारण पितरो के पक्ष में लागू भी नही होता, क्योकि पितृगणों की अनन्त परम्परा है । ब्राह्मणो के लिये प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष में पितृयज्ञ, अन्वाहार्य श्राद्ध आदि का विधान है । श्राद्धकल्प की अनेक पुस्तको में 'पितृभ्यो दद्यात्' इस वाक्य में उत्पत्ति विधि मानी गई हैं । अग्निष्वात प्रभृति भी पितृगणों के अन्तर्गत ही है, अत उक्त उत्पत्ति विधि इन सब पर लागू होगी ही । इस तरह से पितृ देवताओं में इनकी गिनती होन में कोई बाधा नही उपस्थित होगी । इसके अतिरिक्त एकोद्दिष्ट प्रभृति प्रेतश्राद्ध और सपिण्डीकरण, सावत्सरिक प्रभृति पार्वण श्राद्ध के विविध रूप है, उनमें तो मृत मनुष्य का हो उक्त उत्पत्ति विधि के आधार पर श्राद्ध किया जाता है, इसके साथ

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वेदार्थपारिजात १" I ' '.' -' रस्त्येव वसुरुद्रादितिसुता पितर श्राद्धदेवता इति याज्ञवल्क्यस्मरणात् । पैठीनसिश्च य एव विद्वान् पितॄन् वसवो रुद्र दत्याश्चास्य प्रीता भवन्ति । क एते पितरो नाम? येभ्यो दत्तमिहाक्षय भवति । वसव पितर, रुद्रा पिताम आदित्याः प्रपितामहा, तेभ्यो दतमिहाक्षय भवति । देवलस्मृती च- 'सर्वत्र पितर पूज्या देवताना च देवता । शु . " निर्मलाः शुद्धा दक्षिणां दिशमाश्रिता ॥ तथा च त्रि प्रकाराः पितरः एके पितृपितामहादयोऽपरे मरीच्यादीनामृषं पुत्राः सोमपादय', अपरे वस्वादय • । 'अभेददृष्टिविधयो वैतै । अय तु पक्ष सिद्धान्ततयाऽभ्युपगन्तु न्याय्य ' इति हेमा रीत्या पित्रादिषु वस्वाद्यभेददृष्ट्यो विधीयन्ते । तद्रीत्या अयमेव पक्ष सर्वेषा विश्वरूपादीना सम्मत । अयमेव ह्यनवद्य पक्ष न्याय्य हि स्तावकत्वाद्विधिपरत्वम् । यत्तु केनचिदुक्त यत् श्राद्ध न प्राचीनं वैदिक स्मार्तं वा कर्म । वराहपुराणानुसारेण मोहवशादेव निि तदनुष्ठानात् । तेन व स्वयमेवोक्तम्—' शोकस्य तु प्रभावेण एतत्कर्म मया कृतम् । नष्टबुद्धिस्मृतिसत्त्वो ह्यज्ञानेन विमोहित न च श्रुतं मया पूर्वं न देवैर्ऋषिभि कृतम् । ' इति, तच्च पौर्वापर्याज्ञानविजृम्भितम् तादृशवचनानामस्मिन् श्राद्धाविर्भावार्थवादरूपत्वेन श्राद्धविधान एव तात्पर्यात् । यथा सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन प्रजापत्यादीना पूर्वकल्पीयवेदा माविर्भावो भवति, तथैव शोकव्याकुलस्य निमे प्राक्तनेभ्यः सस्कारेभ्यः श्राद्धकर्म संविधानमाविर्भूतम् । जब अग्निष्वात्त प्रभृति पितृगणों की अभिन्नता रहेगी, तब उनमें देवतात्व बुद्धि भले न रहे, किन्तु इनसे भिन्न नित्य, नैमित्तिक, क कर्मो के प्रसंग में अग्निष्वात्त प्रभृति को देवता मानने मे कोई बाधा नही उपस्थित हो सकती । वसु, रुद्र और आदित्य ये श्राद्ध दे माने ही जाते हैं, इनको याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट ही ' श्राद्ध देवता' कहा है । पैठीनसि भी कहते हे —'जा विद्वान् विधिपूर्वक पितरो श्राद्ध करता है, उस पर बसु, रुद्र और आदित्य नामक देवता प्रसन्न हो जाते है । वे पितृगण कोन है? जिनको कि दिया गया उ अक्षय हो जाता है? वे है - पितृस्थानीय वसु, रुद्रस्थानीय पितामह और आदित्यस्थानीय प्रपितामह । इनको दिया गया अन्न अ हो जाता है । देवल स्मृति भी कहती है--'देवताओ की पूजा सब जगह सदा करनी चाहिये । ये दवताओ के भी देवता है, पि निर्मल और शुद्ध है । ये दक्षिण दिशा में निवास करते है । इस पूरे प्रकरण का अवलोकन करने से यह निकलता है कि पितृगण ह प्रकार के होते है - एक तो पिता, पितामह प्रभृति, दूसरे मरीचि प्रभृति ऋषियों के पुत्र सोमपा प्रभृति और तामरे वसुप्रभृति हेमाद्रि का कहना है कि पिता, पितामह प्रभृति मे वसु, रुद्र आदि देवताओ के साथ अभेद दृष्टि का विधान किया गया है, अत इ पक्ष को सिद्धान्त के रूप में स्वीकार करना चाहिये । इनके कथन के अनुसार पिता प्रभृति में वसु आदि स अभेद बुद्धि रखी जा | हेमाद्रि के कथनानुसार विश्वरूप प्रभृति सभी व्याख्याकारो और निबन्धकारो ने इसो पक्ष को माना है । यही निर्दोष उचित पक्ष है भी । स्तुति के आधार पर यहाँ विधि वाक्य की कल्पना कर ली जाती है । कुछ लोगो का कहना है कि श्राद्ध कोई प्राचीन वैदिक या स्मार्त कर्म नही है, किन्तु वराहपुराण प्रभृति ग्रन्थो से. ज्ञात होता है कि राजा निमि ने अज्ञानवश ही श्राद्ध का प्रचलन कर दिया । राजा निमि स्वयं कहता है कि शोक से अभिभूत हो- मैंने यह कार्य किया । मेरी बुद्धि, स्मृति शक्ति और समझ-बूझ उस समय सब समाप्त हो गई थी । मैं उस समय अज्ञान के अन्धकार इससे डूबा हुआ था । श्राद्ध के विषय में इससे पहले मैने कुछ भी नही सुना था । इसका अनुष्ठान न देवताओ ने और न ऋषियों ने ही पह कभी किया था । किन्तु यह सारा कथन पूरे ग्रन्थ का सावधानी से अध्ययन न करने के कारण भ्रमपूर्ण हैं । वस्तुन इस तरह के स वचन इस कल्प में श्राद्ध के आविर्भाव को अर्थवाद वाक्यों के माध्यम से बताने वाले है । इन सबका तात्पर्य श्राद्ध की विधि और उन स्तुति में माना जाता है । जैसे कोई आदमी सोकर जागता है, तो उसको पहले सब बातें याद पड जाती है, उसी तरह से प्रजाप प्रभृति को भी पूर्व कल्प में विद्यमान वेदो की इस कल्प मे जागने पर स्मृति जाग उठती है । उसी पद्धति से यहाँ वराहपुराण के वच में यह प्रतिपादित किया गया है कि शोक से व्याकुल निमि राजा के हृदय में पुराने सस्कारों के कारण श्राद्ध कर्म का सारा विधि विधान आविर्भूत हो गया ।

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वेदार्थपारिजात ' १५५६ स्वर्गो मनुष्यलोकाद्भिन्नः स्वामिदयानन्द स्वर्गादिलोक नोपगच्छति, तदपि वेदविरुद्धम्, निम्नोद्धृतमन्त्रैस्नत्सिद्धेः । 'अनस्थाः पूताः पवनेन शुद्धाः शुचय शुचिमपि यन्ति लोकम् । नैषा शिश्न प्रदहति जातवेदाः स्वर्गे लोके बहुस्त्रेणमेषाम् || ' ( अथर्व ० ४।३४।२ ), ' घृतह्रदा मधुकूला: सुरोदका क्षीरेण पूर्णा उदकेन दध्ना । एतास्त्वा धारा उपयन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधु-मन्पिन्वमानाः ॥ ' ( अथर्व० ४।३४।६ ) । न विद्यते अस्थ्युपलक्षित षाट्कौशिक शरीर येषा ते अनस्था:, 'छन्दस्यपि दृश्यते ' ( ), पा० सू० ७ १/७६ इत्य स्थिशब्दस्यानडादेशः । दिव्यशरीरा अत एव पवनेन वायुना पूताः पवित्रीकृताः शुद्धा निर्मला शुचयो दीप्यमाना एवविधा सवस्व यज्ञस्य कर्तारः शुचि दीप्यमान लोक ज्योतिर्मय लोकम् अपियन्ति देहावसाने प्राप्नुवन्ति । एषा स्वर्गे लोके स्थिताना शिश्नं भोगसाधनमिन्द्रिय जातवेदा अग्निर्न दहति निर्वीर्यं न करोति । बहुस्त्रैणत्वेऽपि सुकृतफलभोगम्याने स्त्रीणा समूहो भोगार्थं विद्यते । एव स्त्रीसमूह भुञ्जानानामपि निर्वीर्यत्वशङ्का न भवतीत्यर्थः । दधिमधुघृतादिलक्षणस्य दिश्यासु कुल्यासु पूर्यमाणस्य रसस्य एता सर्वा धाराः प्रवाहा फलभूते स्वर्गे मधुमद् माधुर्योपेत वा पिन्वमाना सिञ्चन्त्यस्त्वा त्वाम् उपगच्छन्तु । तथा समन्ताः पर्यन्तवर्तिन्य. पुष्करिणी पुष्करिण्यः सरस्यस्त्वा त्वामुपतिष्ठन्तु । कीदृश्यस्ताः? घृतह्रदाः घृतपूर्णह्रदयुक्ताः, मधुकूलाः मधुना माक्षिकेण युक्तानि कूलानि यासां ताः, सुरोदकाः सुरा वोदकं यासा ताः, क्षीरेण उदकेन दध्ना च पूर्णाः, एतेषु घृतादिद्रव्येषु यद्यत्कामयसे तेन तेन पूर्णा बहुविधा पुष्करिण्यस्त्वां सेवन्तामित्यर्थः । 'स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न यत्र त्व न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गे लोके ॥ ' स्वर्गे लोके किञ्चन भय न भवति त्व मृत्युरपि यत्र नास्ति, यत्र कश्चनापि जरया वार्धकेन न बिभेति, अश-नायापिपासे उभे तीर्त्वाऽतिक्रम्य शोकातिगो मोदते । 'सहस्राश्वीने वा इतः स्वर्गो लोकः' ( ऐ ० ब्रा० ७७ ) । वायुवेगाः स्वर्गलोक मनुष्यलोक से भिन्न है स्वामी दयानन्द स्वर्ग प्रभृति लोको को स्वीकार नही करते, उनकी यह बात भी वेदशास्त्र के विरुद्ध है । निम्न मन्त्रो से स्वर्ग की स्थिति स्पष्ट ज्ञात होती है । ' अनस्था:' इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्र मे बताया गया है कि 'अनस्था " उन्हें कहा जाता है, जिनके कि अस्थि शब्द से जाना जाने वाला षाट्कौशिक शरीर नही है । अस्थि शब्द को पाणिनि सूत्र के आधार पर वेद मे अनड, आदेश हो जाता है । अर्थात् जो दिव्य शरीर वाले है, इसीलिये पवन से जो पवित्र, शुद्ध, निर्मल हो गये है और अत एव देदीप्यमान हैं, इस तरह के यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले लोग मृत्यु के उपरान्त पवित्र, तेजोमय लोक को प्राप्त करते है । स्वर्गलोक मे स्थित इन दिव्य देहधारियो की भोग का साधन बनने वाली इन्द्रियो को अग्नि जलाता नही है, वीर्यहीन नहीं करता । उस पुण्य कर्मो के उपभोग स्थान स्वर्ग में उसके उपभोग के लिये अनेक स्त्रियों के रहने पर भी वह सुकृती इस लोक की भाति कभी वीर्यहीन नही होता । सारी दिशाओ मे दही, मधु ( शहत), घृत आदि की नहरो के रूप मे बहती हुई धाराएँ उस स्वर्ग मे अत्यन्त माधुर्य को भरकर तुम्हारे पास आवे । चारो तरफ इनसे भरी बावलिया तुम्हारी सेवा करने के लिये उपस्थित रहे । घृत के अथाह सरोवर, जिनके कि किनारे शहत से भरे हैं, जिनका जल सुरा के समान मादक है और जो दूध और दही से लबालब भरे हुए हैं, इनमे से तुम जिनको चाहते हो, वे सब पदार्थ उन नाना प्रकार की बावलियो से तुमको उस स्वर्ग लोक में प्राप्त होते रहे, तुम्हारी सेवा करते रहे । 'स्वर्गे लोके ' इत्यादि उपनिषद् मन्त्र में बताया गया है कि स्वर्गलोक में किसी का भी भय नही है । यमराज का भी भय वहां नही है । वहाँ जरा ( वृद्धावस्था ) से भी किसी को भय नही है । वहीं भूख और प्यास का भी भय नही है । उस स्वर्गलोक में इन सब भयो से ऊपर उठकर, सभी चिन्ताओ से मुक्त होकर प्राणो आनन्द मनाता है । ऐतरेय ब्राह्मण मे बताया गया है कि इस पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक सहस्रश्वाधीन है, अर्थात् वायु की सी गति वाले और शक्तिशाली एक हजार घोडे एक दिन में जितना मार्ग पार

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वेदार्थपारिजातः १५५७ शक्तिशालिन सहस्रसख्याका अश्वा एकेनाह्ना यावन्तं मागं गन्तुं शक्नुवन्ति इतस्तावन्मार्गगम्यः स्वर्गो भवति । अर्थाद् एकेनाह्रा वायुवेगोऽश्वो यावद् दूर गन्तु शक्नोति, ततः सहस्रगुणिते दूरदेशे स्वर्गो विद्यते । एतावता ' सुग्वमेव स्वर्ग' दुःखमेव नरक.' इति सत्यार्थप्रकाशोक्तिरपास्ता वेदितव्या । बलिवैश्वदेवप्रसङ्गोऽपि दयानन्दस्य प्रमाणशून्यः, तद्बोधक मन्त्रादर्शनात् । अन्येषा ग्रन्थाना प्रामाण्या- नभ्युपगमात् । यदुक्तम् –'अहरहर्बलिमित्ते हरन्तोऽश्वायावतिष्ठते घासमग्ने । रायस्पोषेण समिवा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम | ' ( अथर्व० १ ९/ ७/ ७ ), 'पुनन्तु मा देवजना पुनन्तु मनसा धियः । पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा ॥ ' ( वा ० सं १ ९ ।३ ९ ) । हे परमेश्वर, ते तुभ्य त्वदाज्ञापालनार्थम् इत् एव तिष्ठतेऽश्वाय घासं यथाश्वस्याग्रे पुष्कल पदार्थ स्थाप्यते, तथैव अहरहो नित्य प्रति बलि हरन्तो भौतिकमग्निमतिथीश्च समिषा सम्यगिष्यते या सा ममिट् तया, श्रद्धया रायस्पोषेण चक्रवर्तिराज्यलक्ष्म्या मदन्तो हर्षन्तो वयमग्ने हे परमात्मन्, ते तव प्रतिवेषा प्रतिकूला भूत्वा सृष्टिस्थान् प्राणिन. मा रिषामो मा पीडयेम, किन्तु भवत्कृपया सर्वे जीवा अस्माकं मित्राणि सन्तु सर्वेषा वय सखाय. स्म इति ज्ञात्वा परस्पर नित्यमुपकारं कुर्याम' ( पृ० ३०५ - ३०६ ) इति, तदेतत्सर्वं सर्वथा वेदबाह्यमेव व्याख्यानम्, भौतिकमग्निमतिथीश्चेत्यस्य कपोलकल्पितत्वात् । नहि बेदे भौतिकायाग्नये वल्युपहार क्रियते, किन्तु देवताविशेषस्य तदन्त- र्यामिणश्चैव तत्तत्कर्मभिः समर्हणीयत्वात् । द्वितीयो मन्त्रस्तु पूर्वं व्याख्यात इति तेनापि न बलिवैश्वकर्मसिद्धिर्भवति । इतः परम् -'ॐ अग्नये स्वाहा' इत्यादि दश मन्त्रैर्होमा उक्ताः । तदभिमतेषु वेदेषु मन्त्रा एव कोपलभ्यन्त इति तु नोक्तम् । मन्त्राणामर्था अपि तत्कपोलकल्पिता एव । यदि परमेश्वर एव मन्त्राणामर्थस्तढा अग्नये स्वाहेत्यनेनैव गतार्थताऽन्यमन्त्राणाम् । पुनश्च सोमपदेन तस्मै बगदुत्पादकाय किमर्थं होमः क्रियते? किञ्च त्वद्रीत्या होमस्य वायु- कर सकते है, स्वर्ग का मार्ग इतनी ही दूर है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि वायु की गति वाला घोडा एक दिन में जितनी दूर जा सकता है, उससे हजार गुना दूर स्वर्गलोक हैं । इन सब मन्त्रो के प्रमाण से स्वर्गलोक की स्पष्ट ही पृथक् स्थिति सिद्ध होती है । इसके उपरान्त भी 'सुख ही स्वर्ग है और दुख ही नरक है' इस तरह की सत्यार्थप्रकाश में प्रतिपादित दयानन्द की बात सर्वथा निराधार सिद्ध हो जाती है । पिण्ड पितृयज्ञ की ही तरह इस पञ्च महायज्ञ प्रकरण में दयानन्द का बलि -वैश्वदेव का विवेचन भी निराधार है । उसके लिये वे किसी वेदमन्त्र का प्रमाण नही दे सकते और वेद के सिवाय अन्य किसी ग्रन्थ को वे प्रमाण नही मानते । उन्होने ' अहरह०' -- इत्यादि मन्त्रो को प्रमाण रूप मे उद्धृत किया है और उनका अर्थ इस प्रकार किया है - 'हे परमेश्वर, जैसे खाने योग्य पुष्कल पदार्थ घोडे के आगे रखते है, वैसे ही आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये प्रतिदिन भौतिक अग्नि में होम करते और अतिथियों को बलि, अर्थात् भोजन देते हुए हम लोग अच्छी प्रकार वांछित चक्रवर्ती राज्य की लक्ष्मी से आनन्दित होकर हे परमात्मन्, आपकी आज्ञा से उलटे होकर आपके उत्पन्न किये हुए प्राणियों को अन्याय से दुःख कभी न देवें । किन्तु आपकी कृपा से सब जीव हमारे मित्र और हम सब जीवों के मित्र रहे, ऐसा जानकर परस्पर सदा उपकार करते रहे' ( पृ० ३०६ ), किन्तु यह सारी व्याख्या वेदो के विपरीत है । इस मन्त्र में भौतिक अग्नि और अतिथियो का उल्लेख मानना उनकी निरी कपोलकल्पना है । वेद में भौतिक अग्नि के लिये कही भी बलि का विधान नहीं है, किन्तु अग्नि नामक एक विशेष देवता और उन सबमे निवास करने वाले परमेश्वर को ही प्रसन्न करने के लिये इन कर्मों का विधान है । 'पुनन्तु मा० ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है । अत: उसके आधार पर भी बलि वैश्वदेव कर्म के आपके प्रदर्शित स्वरूप की सिद्धि नहीं की जा सकती । इसके आगे स्वामी दयानन्द ने 'ॐ अग्नये स्वाहा' इत्यादि दस होम मन्त्र उद्धृत किये है । आपके द्वारा स्वीकृत चारो वेदो की संहिताओं में ये मन्त्र कहाँ है? यह आपने बताया नही । इन मन्त्रो का अर्थ भी मनगढन्त है । यदि इन सब शब्दों से परमेश्वर का ही बोध होता है, तो ' अग्नये स्वाहा' इस एक मन्त्र से भी काम चल जायगा, तब अन्य मन्त्रो की क्या आवश्यकता है? फिर सोम पद से उस जगत् के उपकारक के लिये होम क्यो किया जाता है? जब आपके मत से होम का प्रयोजन वायु, जल आदि की शुद्धि ही

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 660 का मूल पृष्ठ
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1 वेदार्थपारिजात १५५८ " जलादिशुद्धिरेव प्रयोजनम्, तदा मन्त्रार्थैश्च कि प्रयोजनं सिद्धयतीत्यपि वक्तव्यम् । यदुक्तम्- 'विश्वप्रकाशका ईश्वरगुणाः सब 1 विद्वासो वा तेभ्यो नमः' । ईश्वरस्तु गुगविशिष्ट एव भवति । तस्याहुतिप्रदानेनैव गुणा अपि समर्थिता एवेति पृथगुपादानं व्यर्थमेव स्यात् । धन्वन्तरिरपि परमेश्वर एव, तदा तत्प्रयोगोऽपि व्यर्थं एव । कथञ्च सर्वरोगनाशक ईश्वरो धन्वन्तरिपदार्थ इति नोक्तमिति न्यूनतैव । एव कुहूपदेन दर्शेष्टिग्रहणमपि निर्मूलमेव ॥ दर्शेष्टिस्तु स्वयं होमादिरूपैव ॥ तथा च होमाय होमकरणं कथ मङ्गच्छेत? ईश्वरेण प्रकृष्टगुणे सहोत्पादिताभ्यामग्निभूमिभ्या सर्वोपकारा ग्राह्याश्वेद् गृह्यन्ताम्, तैर्मन्त्र- हमः किमर्थम्? अतः पर बलिप्रदानमन्त्रा उक्ताः --सानुगायेन्द्राय स्वाहा, सानुगाय यमाय स्वाहा' - इत्येवमादिभिः, एतेऽपि मन्त्रास्तदभिमते वेदे नोपलभ्यन्ते । सत्यार्थप्रकाशानुसारेण सानुगायेन्द्राय एको ग्रासः पूर्वस्या दिशि रक्षणीयः । सर्वेषामेकैक- ग्रासेन कथमुदरपूर्तिर्भविष्यति । सानुगाय यमाय स्वाहेति दक्षिणस्या दिशि ग्रासो देयः, किमर्थं यमाय दक्षिणस्यां दिशि भागो देयः? यदीन्द्रयमवरुणादिशब्देरीश्वर एव गृह्यते चेदेकेनैव मन्त्रेण गतार्थता । देवतास्तु युष्माभिर्नाभ्युपगम्यन्ते । :?, मूर्तिपूजाखण्डनाय बद्धपरिकरे सामाजिकै किमर्थमिन्द्रादिनामभिर्नैवेद्यं निवेद्यते मरुद्भ्यः अद्भयश्वापि बलिदान विहितम्, वनस्पतिभ्यो नम इति मुसलोलूखलाभ्या च बलिदानमुक्तम्, किमेतेषां जडानां कृते ग्रासदान मूर्तिपूजा न भवति ततः पर भद्रकाल्यै नम इत्यप्युक्तम् । किञ्चैषा मन्त्राणा प्रसिद्धार्थतामपहायार्थान्तरोपवर्णनमुपस्थित परित्यज्यानुपस्थित- परिकल्पनमेवानुसरति । एतेनेत्थं प्रतीयते यद्रूढिर्योगमपहरतीति न्यायमपि नानुशीलितवान् दयानन्दः । इन्द्रपदेन परमैश्वर्य- वत ईश्वरस्य ग्रहणेऽपि तस्य सानुगत्व कस्य? यमपदेनापि न्यायकारित्वादियुक्तः परमात्मैव गृह्यते । किं परमेश्वरभेदेन है, तब मन्त्रो का अर्थ करने और होम के साथ उनके उच्चारण करने का क्या प्रयोजन है? 'सारे संसार के प्रकाश करने वाले ईश्वर के गुण अथवा विद्वान् लोग' ( पृ० ३०७ ) ऐसा अर्थ कर उनके लिये आहुति देने का क्या प्रयोजन है? ईश्वर तो गुणो से युक्त ही होता है । उसको आहुति देने से ही उसके गुणो का समर्थन हो जाता है । तब उनका अलग से उल्लेख किसलिये किया जाता है? धन्वन्तरि भी जब परमेश्वर ही है, तब अलग से उनका उल्लेख करना भी व्यर्थ है । धन्वन्तरि पद का अर्थ सभी प्रकार के रोगो का नाशक परमेश्वर किस प्रमाण से होगा, यह भी आपने नही बताया । यह आपकी व्याख्या की एक कमी ही मानी जायगी । कुहू पद से दर्श इष्टि का ग्रहण भी निराधार है । दर्श इष्टि स्वयं होम रूप ही है । तब होम के लिये होम करने का क्या तुक है? ईश्वर के द्वारा सभी उत्कृष्ट गुणो के साथ उत्पन्न किये गये अग्नि और भूमि से सभी तरह के उपकार स्वीकार करने चाहिये, तो ऐसा किया जाय, किन्तु इसके लिये मन्त्रो से होम करने की क्या आवश्यकता है? इसके आगे बलिप्रदान के मन्त्र लिखे गये है- 'सानुगायेन्द्राय स्वाहा' इत्यादि । ये मन्त्र भी आपके अभिमत वेद में उपलब्ध नही हैं | सत्यार्थप्रकाश के अनुसार सानुग इन्द्र के लिये एक ग्रास पूर्व दिशा में रखना चाहिये । इन सबका पेट एक ही ग्रास से कैसे भर जायगा? 'सानुगाय यमाय स्वाहा' इस मन्त्र से दक्षिण दिशा मे ग्रास देना चाहिये । यम को दक्षिण दिशा में क्यों ग्रास दिया जायगा? यदि इन्द्र, यम, वरुण प्रभृति शब्दो से ईश्वर का ही ग्रहण करना है, तो एक ही मन्त्र से यह कार्य हो जायगा । इन नामो के भिन्न-भिन्न देवताओ को आप स्वीकार नही करते । मूर्तिपूजा का खण्डन करने के लिये तत्पर आर्यसमाजी किसलिये इन्द्र प्रभृति का नाम लेकर उनके लिये नैवेद्य अर्पित करते है? मरुद्गण और जल देवताओ के निमित्त भी बलि दी गई है और ' वनस्पतिभ्यो नम:' इसका उच्चारण कर मुसल और ऊखल के निमित्त भी बलि दी जाती है । इन जड पदार्थो के लिये बलि देना क्या मूर्तिपूजा नहीं हुई? इन मन्त्रो मे भद्रकाली के निमित्त भो बलि दो गई है । इन सब मन्त्रों में आये शब्दों के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़कर दूसरा अर्थ करना उपस्थित को छोड़ कर अनुपस्थित की कल्पना वाले न्याय का अनुसरण करना हुआ, जो कि गलत माना जाता है । इससे यही सिद्ध होता है कि स्वामी दयानन्द मीमांसादर्शन के इस प्रसिद्ध न्याय को भी देख नहीं पाये कि 'रूढि यौगिक अर्थ से अधिक बलवान् होती है' । इन्द्रपद से जब आप परम ऐश्वर्यवान् ईश्वर का ग्रहण करते हैं, तब उसके अनुचर कौन होगे? इसी तरह यम पद से भी जब आप न्यायकारी परमात्मा का ही ग्रहण करते है, तब क्या आप परमेश्वर के साथ उनके अनुचरों का भी भेद स्वीकार करते है? 'जो