वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 791–800
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 791–800
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वेदार्थपारिजात १६८९ ऋत्विग्यजमानाः । एतत्सज्ञपनकरणेन अथो धुवते ( धूञ् कम्पने ) धवित्रैर्व्यजनैरुपबीजयन्ति राजानमिव व्यजनैरेतत् । त्रिः पुनः परियन्ति पत्न्यः । प्रियाणा त्वा प्रियेति । त्रिः परियन्तित्यत्रोपपत्तिः --त्रयो वा इमे लोकाः । एभिरेवैनं तल्लोके- धुंवते । त्रिः पुनः परियन्ति निधोना वेति । तेन षट् सम्पद्यन्ते । षड्वाऋतवो भवनि ऋतुभिरेवैनं धुवते । अर्थान्मही- धरोक्तरीत्या सर्वाः पत्न्योऽश्व प्रजापतिरूपं प्रजापतिबुद्धयैव त्रिभिर्मन्त्रैस्त्रिस्त्रिरर्थान्नवत् परियन्ति पर्ययणकाले धवित्रैरेन- मुपवीजयन्ति । प्रथमपर्ययण के त्रिभिर्लोकैर्धुवनं द्वाभ्यामपराभ्या पर्ययण त्रिकाभ्यामृतुभिर्धुवनमिति कल्पनया तत्प्रशंसनम् । •. अथवा एतेभ्यः प्राणाः क्रामन्ति ये यज्ञे धुवनं तन्वते ऋत्विग्यजमाना पत्नी कर्तृकाश्वपर्ययणद्वारेण यज्ञे वीजितेन प्राणा अपक्रामन्ति प्राणाना वाय्वात्मकत्वात् । पत्न्यो नवकृत्व परियन्ति । तस्मान्नभ्य ऋत्विग्यजमानेभ्यः प्राणा अपक्रामन्ति । पत्नीष्वेवं परियन्तीषु तस्मान्नवकृत्व पर्ययणं युक्तमेव । नव वै प्राणा, नवकुत्व. पर्य्ययणेन प्राणानेवात्मनि सन्दधते । आहमजानि गर्भधम् आ त्वमजासि गर्भधमित्यस्याभिप्रायमाह --प्रजा. पशव एव गर्भः प्रजापतिरूपस्याश्वस्य तेजोरूपगर्भधारणेन प्रजोत्पद्यते । प्रजा च पशव एव । तस्मात्तेनात्मनि प्रजापश्वादिधारण सम्पद्यते । महीधररीत्या आहमजानोति महिषी अश्वमुपसंविशति । ता उभी चतुरः पदः सम्प्रमारयावेति मिथुनस्यावरुद्धये इति ता उभी चतुरः पदः प्रसारयाव स्वर्गे लोके प्रोर्णवाथा वृषा वाजी रेतो दधातु (चा० स ० २३ | २० ) पूर्वं मन्त्रशेषोऽयं मन्त्र! तो त्वं चाहं नोभो चतुरः परः पादानावां प्रमारयाव तव द्वौ मम च द्वो एव संवेशनप्रकार, मिथुनस्यावरुद्धये । एतावतापि ,, ' ' नाश्वस्य पशुत्वमत्र विवक्षितम् किन्तु प्रजापतित्वमेव अन्यथा षट्पदत्वापत्तेः अधोवामेन प्रच्छादयति स्वर्गे लोके ( का० श्री० सू० २०१६ | १४ ) इति कात्यायनसूत्रम् । अधीवामेनाश्वमहिष्यों छादयति । जध उपरिष्टाच्चाच्छादनक्षमं वासोऽ-धिवासः । अध्वर्युर्वदति - -हे अश्वमहिष्यौ, युवा स्वर्गे लोके, अस्या यज्ञभूमौ प्रोर्णवाथा वास आच्छादयत्तम्, (ऊर्णुञ् आच्छादने ) 'एष वै स्वर्गो लोको यत्र पशुं संज्ञपयन्ति' ( श ० १३/२/८/५ ) इति श्रुतेः । 'अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुने वृषा वाजीति' (का० श्री० सू० २०।६।१६ ) महिषी स्वयमेवाश्व शिश्नमाकृष्य स्वयोनी स्थापयति वाजो अश्वो वृषा वर्षणगोलो रेतोधा वीर्यस्य धारयिता की विस्मृति न होने पर भी कुछ देर के लिये उसको छिपा देते हैं और इस तरह से इनसे क्षमा माँगते है । इसके बाद ये यजमान पत्नियाँ राजा की तरह उस अश्व पर पंखा डुलाती है । तब पुनः तीन परिक्रमाएँ करती है और 'प्रियाणा त्वा' इस मन्त्र का उच्चारण करती है । तीन परिक्रमा इसलिये करती हैं कि ये लोक तीन ही हैं । इन तीन परिक्रमाओ से वे इन तीनो लोको को पंखे की हवा से शीतल कर देती हैं । 'निधीना त्वा' इस मन्त्र का उच्चारण कर वे पुनः तीन परिक्रमाएं करती है । इस तरह से ये छ: परिक्रमाएँ हो जाती हैं । ऋतुएँ भी छः ही होती है । इस तरह से वे पत्नियों इस अश्व को एक प्रकार से छ ऋतुओ से पवित्र बना देती हैं । इस तरह से महीधर की पद्धति से सब पत्नियाँ प्रजापति रूप अश्व में प्रजापति की बुद्धि रख कर इन तीन मन्त्रो से तीन तीन बार अर्थात् नौ बार परिक्रमा करती है और ऐसा करते समय उस पर पंखा डुलाती रहती है । प्रथम परिक्रमा में तीन लोको की तथा द्वितीय परिक्रमा में ऋतुओ की चर्चा इस कार्य की प्रशंसा के लिये है । कुल मिलाकर यजमान पत्नियाँ नो बार परिक्रमा करती है, इससे ऋत्विक् और यजमान के प्राणों की रक्षा होती है । प्राणों की संख्या नौ होती है । नौ परिक्रमा करने से इन सब प्राणों की रक्षा हो जाती है । इस तरह से वे पत्नियाँ अपने मे प्राणों का आधान करती है । 'आहमजानि' इत्यादि वाक्य का अभिप्राय यह है कि प्रजा और पशु को ही गर्भ माना जाता है । प्रजापति रूप अश्व जब तेजोमय गर्भ धारण करता है, तो प्रजा की उत्पत्ति होती है । इस तरह से प्रजापति के प्रभाव से ही ये पत्नियाँ प्रजा और पशु आदि सम्पत्ति से सम्पन्न होती हैं । महीघर के अनुसार ' आहमजानि' इस मन्त्र का उच्चारण कर यजमान पत्नी अश्व के पास बैठ जाती है और सब 'ता उभो' इस मन्त्र का उच्चारण करती है । तू और में, हम दोनो मिलकर चार पैर फैलाते है । इस तरह से बैठने से मिथुनभाव की सृष्टि होती है । इस कथन से स्पष्ट है कि यहाँ पशुरूपी अश्व की विवक्षा न होकर प्रजापति रूप अश्व ही विवक्षित है । यदि पशु विवक्षित होता, तो दोनो के मिलकर छः पैर हो जाते । इसके आगे कात्यायन सूत्र के अनुसार अश्व और महिषी को कपड़े से ढँक दिया जाता है । नीचे से ऊपर तक किसी वस्तु को ढँक देने वाला वस्त्र अधिवास कहलाता है । ऐसा करने के बाद अध्वर्यु कहता है कि हे अश्व २१२
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वेदार्थपारिजात. १६९० रेतो दधातु मयि वीर्यं स्थापयतु मिथुनस्यावरुद्ध्यै । एवं हि मिथुनस्यानुसरणं भवति । वृषा वाजी रेतोधा वीर्यस्य धारयिता रेतो दधातु इत्यनेन अजानीत्यत्र क्षेपणार्थं एवाजतिर्ज्ञातव्यो न गत्यर्थं इति । ' यश्च पशूनां प्रजानां मध्ये विज्ञानवान् भवति स इमा सर्वा प्रजाम् अतति सर्वत्र व्याप्नोति' ( पृ० ३७० ) इत्यादिकं दयानन्दोक्तं मन्त्रब्राह्मणसूत्रः सर्वथा विरुद्ध्यत एव । 'सत्योऽर्थं ' इत्युक्त्वा 'ता उभा' ( श० १३२| ८| ५ ) इति ब्राह्मणवचनमुद्धृत्योक्तम्-'आवां राज्यप्रजे धर्मार्थकाममोक्षात् चतुरः पदानि मिलिते भूत्वा सम्यग् विस्तारयेवहि । कस्मै प्रयोजनाय स्वर्गे सुखविशेषे लोके द्रष्टव्ये भोक्तव्ये प्रियानन्दस्य स्थिरत्वाय । येन सर्वान् प्राणिन सुखैराच्छादयेवहि । यस्मिन् राज्ये पशुं पशुस्वभावमन्यायेन परपदार्थाना द्रष्टारं जीवं विद्योपदेशदण्डदानेन सम्यगवबोधयन्ति, स एव सुखयुक्तो देशो हि स्वर्गो भवति । तस्मात् कारणादुभयस्य सुखायोभये विद्यादिसद्गुणानामभिवर्षकं वाजिनं विज्ञानवन्तं जनं प्रति विद्याबले सततमेव दधातु इत्याहायं मन्त्र: ' ( पृ०३७२ ) इति, तदसम्बद्धमेव, निर्मूलत्वात् । यतो हि नात्र राजप्रजे प्रकृते । पूर्वोक्तब्राह्मणसूत्रानु- सारेणाश्वमहिष्यौ तु प्रकृती अश्वमेधे मुख्यः पशुरश्व इति । ' अश्वं तूपरं गोमृगम्' ( श० १३।२।२२ ) इति, 'चतस्रो जायाः' ( श० १३| ५| २| १ ) पत्न्यः परियन्तीत्यादिभिः । पद इत्यस्यापि मुख्यार्थमपहाय धर्मार्थकाममोक्षग्रहणे मानाभाव एव । To त्वद्रीत्या ब्राह्मणं मन्त्र व्याख्यानमेव । यद्यत्र पद इत्यस्य त्वदुक्तोऽर्थस्तदा तथैव ब्राह्मणेन वक्तव्यम् । एवं 'स्वर्गे लोके ' इत्यस्य व्याख्या ब्राह्मणेनैवोच्यते - 'एष वै स्वर्गो लोको यत्र पशुं संज्ञपयन्ति' ( श० १३/२/८५ ) । तस्यायमेव स्पष्टोऽर्थः - यत्र यज्ञे पशुं देवतोद्देश्येन संज्ञपयन्ति हिंसन्ति स यज्ञ एव स्वर्गसाधनत्वात् स्वर्गोऽभिधीयते । पशुमित्यस्य पशुस्वभाव जनं संज्ञपयन्तीत्यस्य विद्यादण्डादिभिः सम्यगवबोधनमिति नार्थः, निष्प्रमाणत्वात् । पशुस्वभावमिति लाक्षणिकोऽर्थः । न च सम्भवति मुख्यार्थे तद्युक्तम्, अन्वयानुपपत्त्याद्यभावात् । एवमश्वमेधप्रसङ्गे ब्राह्मणे प्रधानपशुत्वेनाश्वः प्रकृतः । तद्बोधक एव और महिषी, तुम दोनों इस स्वर्गलोक सदृश यज्ञभूमि में वस्त्र से अपने को ढँक लो । श्रुति में उस यज्ञभूमि को स्वर्ग माना है, जहाँ पर कि यज्ञीय पशु का संज्ञपन किया जाता है । 'प्रजा के बीच में रहने वाला ज्ञानी पुरुष सब पर छा जाता है' ( पृ० ३७० ) इस तरह की दयानन्द की व्याख्या मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र प्रभृति सभी परम्परागत ग्रन्थों के विपरीत है । इसके आगे इस मन्त्र का सही अर्थ बताने की गरज से 'ता उभौ० ' इस शतपथ ब्राह्मण के वचन को उद्धृत कर दयानन्द कहते हैं -' राजा और प्रजा हम दोनो मिलकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के प्रचार करने में सदा प्रवृत्त रहे । किस प्रयोजन के लिये? दोनों की अत्यन्त सुखरूप स्वर्गलोक में प्रिय आनन्द की स्थिति के लिये । जिससे हम दोनों परस्पर तथा सब प्राणियों को सुख से परिपूर्ण कर देवे । जिस राज्य में मनुष्य लोग अच्छी प्रकार ईश्वर को जानते है, वही देश सुखयुक्त होता है । इससे राजा और प्रजा परस्पर सुख के लिये सद्गुणों के उपदेशक पुरुष की सदा सेवा करें और विद्या तथा बल को सदा बढावें । इस अर्थ का कहने वाला 'ता उभौ० ' यह मन्त्र है । इस अर्थ से महीधर का अर्थ अत्यन्त विरुद्ध है' ( पृ ० ३७२ ), किन्तु यह सारा कथन भी असंबद्ध और निराधार है । राजा और प्रजा का यहाँ कोई प्रसंग नहीं है, पूर्वोक्त ब्राह्मण और सूत्र के अनुसार प्रसंग यहाँ पर अश्व और महिषी का है । अश्वमेध का मुख्य पशु अश्व है । इसके अतिरिक्त तूपर, मृग आदि का तथा राजा की चार रानियों की प्रदक्षिणा आदि का ही यहाँ प्रसंग है । पद शब्द का पुरुष अर्थ पैर होता है, इसको छोडकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चार चरणों का ग्रहण करने में कोई प्रमाण नही है । आप भी ब्राह्मणों को मन्त्र का व्याख्यानात्मक ग्रन्थ मानते हैं । यदि पद शब्द का अर्थ ब्राह्मण को यह अभीष्ट होता, तो उसमें उसका स्पष्ट उल्लेख मिलता । स्वर्गलोक का अर्थ ब्राह्मण ने पशु के संज्ञपन स्थान को माना है । पशु पद का अर्थ पशु के स्वभाव का मनुष्य तथा ' संज्ञपयन्ति' इस क्रिया पद का अर्थ विद्या तथा दण्ड आदि देकर भली भाँति समझाते हैं, ऐसा अर्थ बिना प्रमाण के नही किया जा सकता, क्योंकि इस तरह का अर्थ लाक्षणिक ही माना जायगा, जो कि मुख्यार्थ के रहते उचित नही माना जाता | मुख्यार्थ का बाघ तभी होता है, जब कि परस्पर पदों का सही तरीके से अन्वय ( सम्बन्ध ) न बैठता हो । यहाँ अश्वमेध के प्रसंग में उसका प्रधान पशु अश्व ही बोषित होता है । वाजी शब्द उसी
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वेदार्थपारिजातः १६ ९ १ वाजो शब्द. । तन्मुख्यार्थमुपेक्ष्य ज्ञान वानित्यप्यर्थोऽसङ्गत एव ॥ मिथुनस्यावरुध्ये इत्यस्यापि व्याख्यानं न कृत तेन । किञ्चात्र तु वाजी रेतोधा उक्तः । स चेत् कर्मत्वमुपगच्छेत्, तदा कोऽन्यो दधात्विति क्रियायाः कर्ता स्यात् । ' यकासको ' ( वा ० सं ० २३।२२ ) इत्यत्र दयानन्देन सत्यार्थतया -' विड्वै शकुन्तिका हलगिति वञ्चतीति । विशो वै राष्ट्राय वञ्चन्त्याहन्ति गभे पसो निगल्गलीति धारकेति । विड् वै गभो राष्ट्रं पसो राष्ट्रमेव विश्याहन्ति, तस्माद्राष्ट्री विशं घातुक ' ( श० १३/ २/ ९/ ६ ) इत्युद्धृत्य युदुक्तम् - यथा श्येनस्य समीपेऽल्पपक्षिणी निर्बला भवति राजानो विश. प्रजा ( वे ) इति निश्चयेन राष्ट्राय राष्ट्रसुखप्रयोजनाय सदैव वञ्चन्तीति । विशो गभसंज्ञा पसाख्य राष्ट्र राज्यं प्रजया स्पर्शनीयम् यस्मा- द्राष्ट्रं तां प्रजां प्रविश्याहन्ति समन्ताद् हननं पीडां करोति यस्माद्राष्ट्री एको राजा मत्तश्चेत्तर्हि विश प्रजा घातुको भवति, तस्माटेको मनुष्यो राजा कदाचिन्नैव मन्तव्यः, किन्तु सभाध्यक्षः सभाधीनो यः सदाचारी शुभलक्षणान्वितो विद्वान् स राजा मन्तव्य:' ( पृ० ३७३ ) इति, तत्तु निराधारमेव निर्मूलत्वात् । यकासको, आहलगिति, निगलगलीति, धारकेत्यादि- पदानामव्याख्यानाच्च । निरुक्तादिरीत्या गभपसशब्दयोभंगलिङ्गपरत्वेन व्याख्यानाच्च । राष्ट्रं विशः, पसाख्यं राष्ट्र विशो गभसंज्ञेति संज्ञाविधानस्य प्रयोजनं वक्तव्यम् । तथात्वे ' वै' इति प्रयोगानापत्तेश्व | 'आयुर्वै घृतम्' इत्यादी संज्ञाविधानाभावाच्च । ‘ सभाधीनो राजा कार्यः' इत्यस्य च नीतिशास्त्रविरुद्धत्वाच्च । मूले तादृशार्थबोधकपदाभावाच्च । तस्मान्महीधरादिभाष्योक्त एव मन्त्रार्थो मन्तव्यः । किञ्च, स्वाम्यमात्य सुहृत्कोष राष्ट्रदुर्गबलानि च ' ( अमरकोषे ) इति सप्ताङ्गं राज्यं भवति । तत्र भार तोयशास्त्रेषु सप्ताङ्गान्तर्गत स्वामिपदेन राजैव ग्राह्यो भवति । राज्ञ. सत्त्वे वेद: ( मन्त्रा ब्राह्मणानि च ) प्रमाणम् । अश्वमेध - यज्ञोऽपि न सभया क्रियते, किन्त्वेकेनैव राज्ञा । राजैव यजमानो भवति । तत्फलमपि मुख्ययजमानगामि भवति । सभाधीनो राजा भवतीत्यत्र तु न किमपि प्रमाणम् । एवमेव माता च ते पिता च ते' इत्यत्र -'इयं वै माताऽसौ पिताभ्यामेवैनं स्वर्गं लोकं गमयत्यग्रं वृक्षस्य रोहत का बोधक है । इस मुख्यार्थ की उपेक्षा कर उसका अर्थ ज्ञानवान् करना भी गलत है । 'मिथुनस्याबरुद्धयै' इसकी तो स्वामी दयानन्द ने व्याख्या की ही नही । आप यह बतायें कि जब आप 'वाजी' शब्द की व्याख्या कर्मपरक करते है, तब 'दधातु' इस क्रिया का कर्ता कौन होगा? 'arent' इस मन्त्र का सही अर्थ करने के अभिप्राय से स्वामी दयानन्द शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर लिखते हैं- 'प्रजा का नाम शकुन्तिका है । जैसे बाज के सामने छोटी -छोटी चिडियाओ की दुर्दशा होती है, वैसे ही राजा के सामने प्रजा की । जहाँ एक मनुष्य राजा होता है, वहाँ प्रजा ठगी जाती है । यहाँ प्रजा का नाम 'गर्भ' और राज्य का नाम 'पस' है । जहाँ एक मनुष्य राजा होता है, वहीं वह अपने लोभ से प्रजा के पदार्थों की हानि ही करता चला जाता है । इसलिये राजा को प्रजा का धातुक अर्थात् कभी नहीं मानना चाहिये, किन्तु धार्मिक विद्वानो की सभा के अधीन ही हनन करने वाला भी कहते है । इस कारण से एक कोराजा ' ' । यकासकौ ० इत्यादि मन्त्रों के शतपथ प्रतिपादित अर्थ से महीधर आदि अल्पज्ञ लोगों के बताये अर्थों राज्यप्रबन्ध होना चाहिये I हुए का अन्यत्र विरोध है' ( पृ० ३७४ ), किन्तु यह सारा कथन भी निराधार ही है । यहाँ यकासको महलग्, निगलगलीति, धारक इत्यादि पदो का अर्थ भी नहीं बताया गया है । राजा को सभा के अधीन रहना चाहिये । यह बात नीतिशास्त्र के विरुद्ध भी है । साथ ही मूल में इस अर्थ का बोधक वाक्य भी विद्यमान नही है । इस तरह से आपके ही अर्थ के असंगत होने से महीधर संमत अर्थ ही यहाँ मान्य होगा । स्वामी, अमात्य ( मन्त्री ), सुहत् ( मित्र ), कोष, राष्ट्र, दुर्ग और बल ये सात राज्य के अंग माने जाते हैं । भारतीय शास्त्रों में इस सप्तांग के अन्तर्गत स्वामी पद से राजा का ही ग्रहण होता है । राजा की सत्ता में मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद प्रमाण है । अश्वमेघ यज्ञ किसी सभा के द्वारा नही किया जाता, किन्तु कोई एक राजा ही उसका अनुष्ठान करता है । राजा ही उसका यजमान होता है । उसका फल भी मुख्य यजमान को ही मिलता है । राजा सभा के अधीन रहता है, इसमें तो आपको कोई प्रमाण नहीं मिल सकेगा । ' माता च ते पिता च' इस मन्त्र का सही अर्थ बताने की गरज से शतपथ ब्राह्मण को उद्धत कर स्वामी1 इसी तरह से
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वेदार्थपारिजातः १६ ९ २ इति 1॥ श्रीर्वे राष्ट्रस्याग्र श्रियमेवैनं राष्ट्रस्याग्र गमयति । प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमतसयदिति । विड्वे गभो राष्ट्रं मुष्टी राष्ट्रमेवाविश्याहन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं घातुक ' ( श०१३| २| ९ | ७ ) इत्यत्रापि यदुक्तम् - हे' मनुष्य, इयं पृथिवी विद्या च ते तव मातृवदस्ति, ओषध्याद्यनेकपदार्थदानेन विज्ञानोत्पत्त्या च मान्यहेतुत्वात् । असो द्योः प्रकाशो विद्वानीश्वरश्च तव पितृवदस्ति, सर्वपुरुषार्थानुष्ठानस्य सर्वसुखप्रदानस्य च हेतुत्वेन पालकत्वात् । विद्वान् ताभ्यामेवैन जीवं स्वगं सुखरूपं लोकं गमयति । या श्रीविद्या शुभगुणरत्नादिशोभान्विता च लक्ष्मीः सा राष्ट्रस्याग्रमुत्तमाङ्ग भवति । सैवैनं जीव शोभा गमयति । यद्राष्ट्रस्याग्रमग्र्यं सुख च । ( प्रतिलामीति) विट् प्रजा गभाख्याऽर्थादैश्वर्यप्रदा ( राष्ट्र मुष्टी ) राजकर्म मुष्टिः, यथा मुष्टिना मनुष्यो धन गृह्णाति तथैवैको राजा चेत् तर्हि पक्षपातेन प्रजाभ्यः स्वसुखाय सर्वां श्रेष्ठा श्रिय हरत्येव । यस्माद्राष्ट्रं विशि प्रजाया प्रविश्याहन्ति' ( पृ० ३७४-३७५ ) इत्यादिपूर्ववत्, तद मूलाक्षरासम्बद्धमेव । प्रतिलामीत्यस्य तु व्याख्यानमेव न कृतम् । किञ्चाश्वमेधप्रकरणमिदम् । तत्रैवेमे मन्त्रा विनियुक्ताः । शतपथब्राह्मणस्य त्रयोदश काण्डं च तन्निरूपण एव प्रवृत्तम् । सूत्रकारादिदृष्ट्या तु·ऋत्विजां यजमानपत्नीभिः कुमारीभिर्दासीभिश्चाभिमेथन कर्म प्रचलति 1। किमत्राप्रकृत- प्रक्रिया? हे मनुष्य, इति सम्बोधनं च न प्रामाणिकम् । अध्वर्युब्रह्मोद्गातृसत्तारः कुमारीपत्नीभिः सवदन्ते! 'यकासका- विति दशर्चस्य द्वाभ्यामाहाभ्या हये ह्ये असावित्यानन्त्र्यामन्त्र्य' ( का० २०| १| १८ ) इति महर्षिकात्यायनवचनविरोधात् । मन्त्रब्राह्मणवचनं तु व्याख्यातमेव । यदपि — ' ऊर्ध्वामेनामुच्छ्रापयेति' इत्यत्रोक्तम्— ' हे नर, त्व श्रोर्वै राष्ट्रमश्वमेध यज्ञश्चास्मै राष्ट्राय श्रियमुच्छ्रापय । सेव्या- मुत्कृष्टा कुरु । एवं सभया राज्यपालने कृते राष्ट्रं राज्यमूध्वं सर्वोत्कृष्टगुणमुच्छ्रयितुं शक्यम् ॥ कस्मिन् किमिव? गिरिशिखरे प्राप्त्यर्थं भारवद्वस्तूपस्थापयन्निव ॥ कोऽस्ति राष्ट्रस्य भार इत्यत्राह - श्रीर्वै राष्ट्रस्य भारः' इति ॥ सभाव्यवस्थाsस्मै राष्ट्राय दयानन्द ने लिखा है-'सब प्राणियों की पृथिवी और विद्या माता के समान सब प्रकार से मान्य कराने वाली और सूर्यलोक विद्वान् तथा परमेश्वर पिता के समान है । सूर्यलोक पृथिवी के पदार्थों का प्रकाशक और विज्ञान दान से पण्डित तथा परमात्मा सबका पालन करने वाला है । इन्हीं दोनों कारणो से विद्वान् लोग जीवो को नाना प्रकार का सुख प्राप्त करा देते है । श्री जो लक्ष्मी है, वही राज्य का अग्रभाग अर्थात् सिर के समान है, क्योकि विद्या और घम ये दोनों मिलकर ही जीव को शोभा और राज्य के सुख को प्राप्त करा देते है 1। फिर प्रजा का नाम 'गर्भ ' अर्थात ऐश्वर्य की देने वाली और राज्य का नाम ' मुष्टि' है । क्योकि राजा अपनी प्रजा के पदार्थों को मुष्टि से ऐसे हर लेता है, जैसे कि कोई बल करके किसी दूसरे के पदार्थ को अपना बना लेवें । इसी तरह से जहाँ अकेला मनुष्य राजा होता है, वहाँ वह पक्षपात से अपने सुख के लिये जो जो प्रजा की श्रेष्ठ गुण देने वाली लक्ष्मी है, उसको ले लेता है, अर्थात् वह राजा अपने राजकर्म में प्रवृत्त होकर प्रजा को पीडा देने लगता है । इसलिये एक को राजा कभी न मानना चाहिये, किन्तु सब लोगों को उचित है कि अध्यक्ष सहित सभा की आज्ञा में ही रहना चाहिये । इस अर्थ से भी महीधर का अर्थ अत्यन्त विरुद्ध है' ( पृ० ३७५ ) किन्तु यह सारा कथन भी पहले की ही तरह मन्त्र के मूलवचनों से पूरी तरह से असम्बद्ध है । फिर यहाँ 'प्रतिलामि' शब्द का तो कोई अर्थ किया ही नही गया है । वास्तव में देखा जाय तो यह अश्वमेध यज्ञ का प्रकरण है । उसी में इन सब मन्त्रो का विनियोग है । सूत्रकार के मत के अनुसार इस प्रकरण में ऋत्विजो का यजमान की पत्नियों, कुमारियों और दासियो के द्वारा अभिमेथन नामक कर्म चलता है । इस तरह से अप्रकृत राजा और सभा की चर्चा का यहाँ क्या उपयोग हो सकता है? 'हे मनुष्य' यह संबोधन भी यहाँ किसी प्रमाण से नहीं बन सकता | 'अध्वर्यु०' प्रभृति सूत्र से कात्यायन ने उक्त अभिमेथन कर्म मे ही इसका विनियोग बताया है । मन्त्र और ब्राह्मण भाग की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है । 'ऊध्वमिता ' इस मन्त्र का सही अर्थ बताने के लिये शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर स्वामी दयानन्द ने उसकी व्याख्या इस तरह से की है- 'हे मनुष्य, श्री नाम विद्या और धन का तथा राष्ट्रपालन का नाम अश्वमेध है । ये ही श्री और राज्य की उन्नति कराते हैं । राज्य का भार श्री है, क्योंकि इसी से राज्य की वृद्धि होती है । इसलिये राज्य में विद्या और धन की अच्छी प्रकार वृद्धि
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वेदार्थपारिजातः १६ ९ ३ श्रियं सन्नह्य सम्बद्धय राष्ट्रमनुत्तम कुर्यात् । अथो अनन्तरमेवं कुर्वन् जनोऽस्मिन् संसारे राष्ट्रं श्रीयुक्तमधिनिदधाति सर्वोपरि नित्यं धारयति । किमस्य राष्ट्रस्य मध्यमित्याकाङ्क्षायामुच्यते -' श्रीर्वे राष्ट्रस्य मध्यम्' । तस्मादिमा पूर्वोक्तां श्रियमन्नाद्यं भोक्तव्यं वस्तु च राष्ट्र राज्ये महतो राज्यस्याभ्यन्तरे दधाति सुसभ्या सर्वा प्रजां सुभोगयुक्ता करोति, कस्मिन् किं कुर्वन्निव राष्ट्रस्य क्षेमो रक्षण शीतं भवत्यस्मै राष्ट्राय क्षेम सुरभया रक्षण कुर्यात्' ( पृ० ३७६ ) इति, तदपि प्रकरणविरुद्धमेव, नरस्यासम्बोध्यत्वेनोच्छ्रयणकर्तृत्वासम्भवात् । सभापि नात्र प्रकृता, तेन सभया राज्यपालने कृते राष्ट्रमुच्छ्रयितुं शक्यमित्यपि निर्मूलम्, सभाव्यवस्थयाऽस्मै राष्ट्राय श्रिय सन्ना सम्बध्य राष्ट्रमनुत्तम कुर्यादिति विधानमपि नैवात्र दृश्यते, तस्मा- दुव्वटमहीधराद्याचार्यकृतव्याख्यानमेव वेदानुकूलम् । किच, ' यदस्या अभेद्या. कृधु स्थूलमुपातसत् । मुष्काविदस्या एजतो गोशफे शकुलाविव ॥ ' ( वा० सं ० २३।२८ ) अस्य मन्त्रस्य सत्यार्थस्तु नैव प्रदर्शितो दयानन्देन । पूर्वोक्तब्राह्मण तु ऊर्ध्वामेनामुच्छ्रापयेत्यस्यैव व्याख्यानम् । 'यद्देवासो ललामनुं प्रविष्ठीमिनमाविषुः । सक्थ्ना देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा ॥ ' ( वा० स० २३।२९) अत्र यदुक्तम्- 'यथा देवा विद्वासः प्रत्यक्षोद्भवस्य सत्यज्ञानस्य प्राप्ति कृत्वेमं विष्टीमिनं विविधतया आर्द्रीभाव गुणवन्तं ललामगुं सुखप्रापकं विद्यानन्दं प्राविशुः प्रकृष्टतयासमन्ताद् व्याप्नुवन्ति तथैव तैस्तेन वर्तमानेय प्रजा देदिश्यते । यथा नारी वस्त्रैराच्छाद्यमानेन सक्थना वर्तते J तथैव विद्वद्भि सुखेरियं प्रजा सम्यगाच्छादनीयेति ' ( पृ० ३७७ ) इति, तदप्यक्षर- बाह्यमेव, यथा कश्चन पिशाचः स्वकीयखट्वाया शयनयोग्यत्वाय प्रलम्बमान पुरुषं छित्वा मध्यम करोति मध्यमायाम- होने के अर्थ उसका भार अर्थात् प्रबन्ध श्रेष्ठ पुरुषो की सभा के ऊपर घरना चाहिये कि श्री राज्य का आधार है और वही राज्य में शोभा को धारण करके उत्तम पदार्थों को प्राप्त करा देती है । इसमें दृष्टान्त यह है कि राज्य की रक्षा करने का नाम 'शीत' है, क्योकि जब सभा से राज्य की रक्षा होती है, तभी उसकी उन्नति होती है । प्रश्न - राज्य का भार कौन है? उत्तर-श्री, क्योकि वही धन के भार से युक्त करके राज्य को उत्तमता की ओर पहुँचाती है । इसके अनन्तर उक्त प्रकार से राज्य करते हुए पुरुष देश अथवा संसार में श्रीयुक्त राज्य के प्रबन्ध को सब मे स्थापन कर देते है । प्रश्न - उस राज्य का मध्य क्या है? उत्तर -प्रजा की ठीक ठोक रक्षा, अर्थात् उसका नियमपूर्वक पालन करना, यही उसकी रक्षा में मध्यस्थ है । जैसे कोई मनुष्य बोझ उठाकर पर्वत पर ले जाता है, वैसे ही सभा भी राज्य को उत्तम सुख प्राप्त करा देती है' ( पृ० ३७६-३७७ ), किन्तु यह सारा कथन भी प्रकरण के विपरीत है | मनुष्य को संबोधित करने वाला कोई पद मन्त्र मे विद्यमान नहीं है, अत ऊपर उठाने की क्रिया का यहाँ कोई कर्ता नही मिल सकता । सभा का भी यहाँ कोई प्रसंग नही है, इसलिये सभा के द्वारा राज्य का ठोक से पालन होने से राष्ट्र की उन्नति की बात भी यहाँ बन नही सकती । इस तरह से स्वामी दयानन्द का यह अर्थ प्रस्तुत प्रकरण से पूरी तरह से असंबद्ध हैं । इसलिये उन्वट, महीधर प्रभृति के द्वारा किया गया अर्थ ही यहाँ सही माना जायगा । ' यदस्था' इस मन्त्र को भी स्वामी दयानन्द ने उद्धृत तो किया है, किन्तु इसका सही अर्थ बताने के लिये न तो किसी ब्राह्मण वाक्य को ही उद्धृत किया है और न अपना हो कुछ अर्थ लिखा है, जिस ब्राह्मण वाक्य को उद्धृत किया है और जो अर्थ लिखा है उसका सम्बन्ध 'ऊमिना' इस मन्त्र से है, न कि प्रस्तुत मन्त्र से । ' यद्देवासो ० ' इस मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग में स्वामी दयानन्द ने कहा है- 'जैसे विद्वान् लोग प्रत्यक्ष ज्ञान को प्राप्त होकर जिस शुभ गुणयुक्त सुखदायक विद्या के आनन्द में प्रवेश करते है J, वैसे ही उसी आनन्द से प्रजा को भी युक्त करते हैं । विद्वान् लोगों को चाहिये कि जैसे स्त्री अपने जंघा आदि अंगों को वस्त्रो से सदा ढाप रखती हैं, इसी प्रकार अपने सत्य उपदेश, विद्या, धर्म और सुखों से प्रजा को सदा आच्छादित करें' ( पृ० ३७८ ), किन्तु यह सारा कथन भी मन्त्र में विद्यमान अक्षरो से बाहर का है । जैसे कोई पिशाच अपनी खटिया में सुलाने के लिये लम्बे आदमी को दबाकर नाटा बना देता है और नाटे आदमी को खीच-तान कर लम्बा बना देता है, उसी तरह से स्वामी दयानन्द भी अपने अभिप्राय को वेद मन्त्रों से निकालने के लिये वैदिक पदों को तोड़ -मरोह कर, उनका शिर काटकर और हृदय को भी चीरकर जबरदस्ती से मनमाना अर्थ करते रहते हैं । देवता पद का अर्थ विद्वान् कभी नहीं होगा, इस बात 1
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१६ ९ ४ वेदार्थपारिजातः पुरुषमाकर्षणविकर्षणाभ्या प्रलम्बं करोति, तथैव दयानन्दोऽपि स्वाभिप्रायेण वेदस्य सम्यगर्थत्वाय वेदपदानि तदक्षराणि चान्यथा कृत्वा वेदस्य शिरश्छित्वा हृदयमाविध्य बलात्कारेणैवार्थं करोति । तथाहि -देवा विद्वास इत्यप्यनर्थः, महता सन्दर्भेण मनुष्यभिनाया देवजातेः पूर्वं साधितत्वात् । विद्यानन्द क.? विद्यया जनितानन्द इति चेत्तदपि न, विद्यायाः सुखप्रापकत्वेऽपि तज्जनितानन्दस्य सुखान्तराजनकत्वात् । तथा च सुखप्रापकं विद्यानन्दमिति रिक्तं वचः । किञ्च तस्मिन् कीदृश आर्द्रभावो गुण? स्नेहरूपश्चेत्, तन्न सम्भवति, विद्यानन्दस्याभौतिकत्वे तदनास्पदत्वात् । नाप्यन्त करणनिष्ठद्रवी- भावरूपः, वृत्तिरूपाया विद्याया तज्जन्ये सुखे च तदसम्भवात् । किञ्च त्वद्रीत्या जीवा अणुपरिमाणास्ते कथं व्याप्स्यन्ति । किञ्च, सुखमात्माश्रय भवतीति नात्मा सुखाश्रयः सम्भवति । न तत्प्रवेशः सम्भवति । तेन ( विद्यानन्देन ) इयं प्रजा कथं देदिश्यते? विद्वद्भिः सुखैराच्छादनीयेति कस्य शब्दस्यार्थः? सिद्धान्ते तु श्रौतसूत्ररीत्या यजमानपत्नीनां कुमारीणां च ऋत्विग्भिरुपहासः प्रकृतः । यदप्युक्तम् - विट् प्रजेव यवोऽस्ति । राज्यसम्बन्ध्येको राजा हरिण इव उत्तमपदार्थहर्ता भवति । यथा मृगः क्षेत्रस्थं सस्यं भुक्त्वा प्रसन्नो भवति, तथैवैको राजापि नित्य स्वकीयमेव सुखमिच्छति । अतः स्वसुखप्रयोजनाय विशं प्रजा- माद्यां भक्ष्यमिव करोति । यथा मांसाहारी पुष्ट पशु कृत्वा तन्मासभक्षणेच्छां करोति, नैव स पुष्टं पशुं वर्धयितुं वा मन्यते, तथैव सुखसम्पादनाय प्रजायां कश्चिन्मत्तोऽधिको न भवेदितीच्छां सदैव रक्षति । तस्मादेको राजा प्रजां न पुष्यति नैव रक्षितु समर्थो भवति । यथा च यदा शूद्रा अयंजारा भवति, तदा न स शूद्रः पोषाय धनायति पुष्टो न भवति ॥ तथैको राजापि प्रजा यदा न पुष्यति तदा सा नैव पोषाय धनायति, पुष्टा न भवति । तस्मात् कारणाद वेशीपुत्रं भीरुं शूद्रीपुत्रं मूर्ख च नाभिषिञ्चन्ति ॥ नैवैतं राज्याधिकारे स्थापयतीत्यर्थः' ( पृ० ३७८ - ३७९ ) इति, तदपि न मनोज्ञम्, अक्षरबाह्यत्वात् । को हम पहले ही विस्तार से सिद्ध कर चुके है और यह भी बता चुके हैं कि देव एक पृथक योनि है । यह विद्यानन्द क्या बला है? यदि आप कहे कि विद्या से पैदा किया गया आनन्द, किन्तु ऐसा हो नही सकता, क्योकि विद्या सुख की प्राप्ति तो अवश्य कराती है, किन्तु विद्या से जनित यह आनन्द किसी दूसरे आनन्द की प्राप्ति में कारण नही बन सकता । इस तरह से विद्यानन्द को सुख का प्रापक बताना गलत हो जाता है । इस विद्यानन्द में आर्द्रता ( पिघलाना ) का गुण किस तरह का है? यह स्नेह रूप तो नही हो सकता, क्योंकि विद्यानन्द भौतिक सुख नही है, अत उसमें भौतिक पदार्थों में रहने वाला स्नेह (चिकनापन ) गुण नही रह सकता । अन्तःकरण ( मन ) को द्रवित कर देने वाला स्नेह ( प्रेम ) भी यह नही हो सकता,2 क्योकि विद्या तो चित्त की एक वृत्ति है, अतः उस वृत्ति में उत्पन्न सुख में यह कैसे रह सकता है? फिर आपके मत में तो जीव अणु परिमाण है, इनक्री सर्वत्र व्याप्ति कैसे मानो जा सकती है? सुख ही आत्मा में रहता + आत्मा सुख मे रहता हो, 'ऐसा तो माना नही जाता । आत्मा का सुख मे प्रवेश भी नही होगा । तब इस विद्याजनित आनन्द से प्रजा कैसे सम्पन्न होगी? विद्वान् लोग प्रजा को सुख से आच्छादित कर दे, यह अर्थ किस शब्द या वाक्य का होगा? हमारे मत के अनुसार तो श्रौतसूत्र में बताये गये विनियोग के अनुसार इन मन्त्रों में यजमान की पत्नी तथा कुमारियो के साथ ऋत्विग् गणों के परस्पर उपहास का वर्णन किया गया है । ' यद्धरिणो० ' इस मन्त्र का सही अर्थ बतलाने के लिये स्वामी दयानन्द ने शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर उसका अर्थ इस तरह से लिखा है- ' यहाँ प्रजा का यव और राष्ट्र का नाम हरिण है, क्योकि जैसे मृग ( पशु ) पराये खेत में यवो को खाकर आनन्दित होता है, वैसे ही स्वतन्त्र एक पुरुष राजा होने से प्रजा के उत्तम पदार्थो को ग्रहण कर लेता है । अथवा जैसे मासाहारी मनुष्य पुष्ट पशु को मार कर उसका मांस खा जाता है, वैसे ही एक मनुष्य राजा होकर प्रजा का नाश करने वाला होता है, क्योंकि वह सदा अपनी ही उन्नति चाहता रहता है । शूद्र और वैश्य का अभिषेक करने से व्यभिचार और प्रजा का घन हरण अधिक होता है । इस-लिये किसी एक मूर्ख या लोभी को कभी सभाध्यक्ष आदि उत्तम अधिकार न देना चाहिये । इस सत्य अर्थ से महीधर का अर्थ एक दम उलटा हो चला है' (पृ० ३७९ ), किन्तु यह अर्थ भी ठीक नही है, क्योंकि इसका मन्त्र में विद्यमान पदों से कोई सम्बन्ध नही है । ए राजी की बात केवल आपके मन को कल्पना है । इसलिये राजा किसी पृष्ठ पशु को देखकर उसका मांस खाना चाहता है, यह भी
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वेदार्थपारिजात. १६ ९५ एको राजेत्यर्थोऽपि त्वत्कपोलकल्पित एव । तस्माद्राजा पुष्ट पशुं दृष्ट्रा तन्मासभक्षणेच्छा करोतीत्यपि त्वत्कपोलकल्पितम् । मूले तु न पुष्टं पशुं मन्यत इति मन्त्रप्रतीकस्यैवोद्धरणम् । तस्माद्राजा पशून्न पुष्यति । वैश्य एव पशुपालको भवति । यद्येको राजा निन्द्यो भवेद् वैश्याना भक्षकस्तदा पशुपालकस्य वैश्यस्यैवाभिषेको युक्तः । तदा वैशीपुत्र नाभिषिञ्चन्तीति वेशीपुत्रस्या- भिषेकः कथं निषिद्धः १ वैशीपुत्र भीरुं शूद्रापुत्रं मूखं च नाभिषिञ्चन्तीति वैशीपुत्रस्य भोरुरिति कुतोऽर्थं? शूद्रापुः इति च कुत आयातम्? यदि तु कर्मणा वर्ण इति त्वद्रीत्या भीरुत्व वैश्यस्य मूर्खत्व शूद्रस्य च लक्षणम्, तदा वैश्यं शूद्रं चेत्येव वदेत्, वेशीपुत्र इति प्रयोगस्य किं स्वारस्यम्? 'उत्मकथ्या अव गुदं धेहि समज चारया वृषन् । यः स्त्रीणा जीवभोजनः ॥ ' ( वा ० सं ० २३।२१ ) अत्र यदुक्तम्—'है वृषभ सर्वकामाना वर्षयितः प्रापक ससभाध्यक्ष विद्वन् त्वमस्या प्रजायामञ्जि ज्ञानसुखन्यायप्रकाशं सञ्चारय सम्यक् प्रकाशय, यः स्त्रीणा जीवभोजनः कामुक सन् नाशमाचरति तं त्वमवगुदमध. शिरसं कृत्वा ताडयित्वा कारागृहे धेहि । यथा स्त्रीणा मध्ये या काचित् उत्सवथा व्यभिचारिणी स्त्री भवति, तस्यै दण्ड ददाति, तथैव त्वं तं जीवभोजनं परप्राणनाशकं दुष्ट दस्युं दण्डेन समुच्चारय' ( पृ ० ३८० ) इति, तदपि वेदबाह्यमेव, पदवाक्यार्थाननुगतत्वात् । तथाहि- वृषन् ससभाध्यक्ष विद्वन्, इति सम्बोधनं न सङ्गतम्, श्रुतिसूत्रविरुद्धत्वात् । तदेव च स्पष्टं गणानां त्वेति मन्त्रव्याख्याने सायणादिभिरुक्तम्, मया च तत्स्पष्टीकृतम् । दयानन्दीये चार्थे न प्रश्नपरम्परा विरमति । तथा हि- कथञ्च कामानां ससभा- ध्यक्षो वर्षयिता भवति? स्वकर्मभिरेवेष्टकामसिद्धेः । अस्या प्रजायामिति कस्य शब्दस्यार्थः? तत्र च किं बीनम्? अञ्जि - शब्दस्य ज्ञानसुखन्याया कथमर्थः? 'कामुकः सन् नाशमाचरति 2 त त्वमवगुदमधःशिरसं कृत्वा ताडयित्वा कारागृहे घेहि ' इति कस्य पदस्य वाक्यस्य वार्थः? कामुकः कस्य शब्दस्यार्थः? स नाशं चरतीति कस्य पदस्यार्थः । अवगुदमित्यस्याधः- कोरी आपकी कल्पना ही है । शतपथ ब्राह्मण में 'न पुष्टं पशु मन्यते ' इस मन्त्र के एक अंश की व्याख्या की गई है कि राजा पशु का पालन नही करता । पशुपालन वैश्य का कार्य है, इसको क्षत्रिय राजा नही करता । यदि एक राजा इसलिये निन्द्य है कि वह वैश्यो का भक्षक है, तो उस स्थिति में पशु को रक्षा करने वाले वैश्य का राज्य पद पर अभिषेक हो जाना चाहिये । तब यहाँ पर उसके अभिषेक का निषेध क्यों किया गया है? वैशीपुत्र का अर्थ डरपोक कैसे होगा? शूद्रा के पुत्र की चर्चा यहाँ कहाँ से आ गई? कर्मवैश्यके अनुसार वर्ण मानने पर तो आपके मत के अनुसार डरपोकपन वैश्य का और मूर्खता शूद्र का लक्षण होगा । ऐसी स्थिति मे यहाँ और शूद्र शब्दों का ही स्पष्ट उल्लेख क्यों नही किया गया । आपके अभीष्ट अर्थ को प्रकट करने के लिये यहाँ पर 'वैशीपुत्र' इस शब्द को रखने का क्या प्रयोजन हो सकता है? इसके आगे ' उत्सवथ्या० ' इस मन्त्र का सही अर्थ बताने की गरज से स्वामी दयानन्द ने लिखा है-संमति'परमेश्वरहोकरकहताइस है कि हे कामना की वृष्टि करने वाले और उसको प्राप्त कराने वाले सभाध्यक्ष सहित विद्वान् लोगो! तुमकरनेसबवालाएक, चोरों में चोर, ठगों प्रजा मे ज्ञान को बढा कर न्यायपूर्वक सब को सुख दिया करो तथा जो कोई दृष्ट, स्त्रियो में व्यभिचार इस तरह के दोषों से युक्त पुरुष तथा व्यभिचार आदि दोषो से युक्त स्त्री,,, 'कोमें ठगऊपरडाकुओंपैर औरमें डाकूनीचे सिरदूसरोकरकेकोटागबुरे देनाकाम जैसीसिखानेदुर्दशावालाकरके मार डालना चाहिये क्योकि इससे अत्यन्त सुख का लाभ प्रजा में होगा का उक्त मन्त्र के किसी शब्द या वाक्य ( पृ० ३८० ), किन्तु यह सारा अर्थ भी वेद के बाहर का अपना मनमाना है, क्योंकि इस अर्थअर्थ करना भी गलत है, क्योकि ऐसा करना - से कोई सम्बन्ध नही है । वृषन् शब्द को संबोधन मान कर उसका सभाध्यक्ष और विद्वान् प्रभृति ने अपने अपने भाष्यों में की । शतपथ श्रुति और कात्यायन श्रौतसूत्र के विपरीत पडता है । इन मन्त्रो की स्पष्ट व्याख्या सायण अन्त ही नही होता । हमने भी उन्हीं का अनुसरण किया है । दयानन्द के किये गये अर्थ के प्रति उठने वाली प्रश्नपरम्परा का तोकीकहीअभीष्ट कामना पूरी हो जैसे कि वह सभाध्यक्ष सभी कामनाओं की पूर्ति कैसे करता है? अपने कर्म से ही किसी मनुष्यज्ञान, सुख और न्याय कैसे होगा? सकती है | इस प्रजा में, यह अर्थ किस शब्द का है? और इसमें प्रमाण क्या है? अंजि शब्द का अर्थ में डाल दो, यह अर्थ किस पद या-कामुक बनकर दुराचरण करने वाले को नीचे मुँह ऊपर टांग करके कठोर दण्ड दो और उसको जेल
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१६ ९ ६ वेदार्थपारिजात शिरस्त्वं कथमर्थः? अवशब्दस्याधोऽर्थत्वेऽपि न गुदशब्दस्य शिरोऽर्थः । उद्गुदशब्दो यदि स्यात्तदा कथञ्चित् तदर्थः स्यादपि । ताडनं कारागृहनिवेशनमित्यादिकं तु सर्वं निर्मूलमेव । उत्सवथीत्यस्य व्यभिचारिणी स्त्री कथमर्थः? किञ्च, प्रथमान्तोऽय शब्दः । कथं तस्य कर्मत्व कुतश्च दण्डेन समुच्चारयेति तस्य योजनम्? कथं च समुच्चारणशब्दस्यापि हिन्दी- भाषायां दुर्दशया मारणमर्थः? महीधरस्य निन्दनं कृत्वा स्वमेव पातकिनं करोषि वेदार्थ तु शुद्ध कर्तुं न पारयस्यहो धाष्टर्यम् । वस्तुतस्तु दयानन्दः श्रुतिसूत्रसम्मतं सायणोव्वटमहीधराद्यर्थमपलपति, स्वयं च न वेदार्थमवगन्तुं व्याख्यातु च शक्नोति स्म । केवलं मूर्खजनप्रतारणाय सर्वथा वेदपदवाक्यतदर्थविरुद्धमेव किमपि वेदव्याख्याननाम्ना जल्पितवान् । ' यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाक महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः || ' ( वा० सं ० ३१।१६ ) ' ' ( ) यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः गो० सू० इति वात्स्यायनभाष्यादिभिर्मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्य यज्ञो मुख्यो विषयः । यज्ञेषु चाश्वमेध यज्ञसम्राट् । तदधिकारी च सम्राडेव भवति । यथा चक्षुषैव रूपमुपलभ्यते नान्येन श्रोत्रादिना, आलोकादिसहकारिसहकृतेन दोषरहितेन मनःसंयुक्तेन चक्षुषा रूपमुपलभ्यत एव न नोपलभ्यते, तथैव शास्त्रैकसमधिगम्यो धर्मो भवति । शास्त्रेणैव धर्मज्ञानं नान्येन प्रत्यक्षादिना । उपक्रमोपसहारा दिभिर्विचार्यमाणेनापोरुषेयवेदात्मकशास्त्रेण धर्मो- ऽधिगम्यत एव न नाधिगम्यते । यथा शास्त्रप्रामाण्यमाश्रित्य स्वीयदुहितृभगिन्यादयोऽन्येभ्यो दीयन्ते, अन्यतश्च पत्यर्थ कन्या आनीयन्ते, तत्र तर्कस्यावकाशो नास्ति, तथैव शास्त्रोक्तानि कृत्यान्यप्यनाशङ्कनीयानि । शास्त्रमाश्रित्येव गङ्गास्नानेन पापं क्षीयते, कर्मनाशाजलस्पर्शाश्च तुण्यं क्षीयते, तथैवाश्वमेधिके राजपत्नीनां महिष्यादीनां मृताश्वेन सह शयने मृताश्वस्य पृथक्कृतेषु संस्कृतेष्वङ्गेषु तदीयशिश्नस्य स्पर्शः स्वोपस्थोपरि स्थापनादिकमृत्विजा यजमान-कुमारी- पत्नी दासीना चाश्लील- वाक्य से निकलेगा? 'कामुक' यहाँ किस शब्द का अर्थ है? वह नाश करने वाला है, यह भी किस पद का अर्थ है? अवगुद शब्द का अर्थ नीचे सिर वाला कैसे होगा? अब शब्द का अर्थ नीचा किया जा सकता है, किन्तु गुद शब्द का अर्थ तो सिर होगा नहीं । उद्गुद शब्द होता तो आपका अर्थ उससे निकल सकता था, किन्तु ऐसा तो है नही । ताडना देना, जेल मे डालना जैसी सभी बातें यहाँ निराधार व्याख्यात हैं । 'उत्सवथी' शब्द का अर्थ व्यभिचारिणी स्त्री कैसे किया जा सकता है । फिर यह शब्द तो प्रथमान्त है, उसकी कर्मपरक व्याख्या कैसे की जा सकती है? और इसके साथ दण्ड से मारने की बात कहाँ से जोड़ी गई है । समुच्चारण शब्द का अर्थ दुर्दशा से मारना कैसे होगा? इस तरह से आपकी इस व्याख्या में जो प्रश्नों की झडी लगती है, उसका कही अन्त ही नही होता । स्वामी दयानन्द श्रुति और सूत्र ग्रन्थो के आधार पर व्याख्यात सायण, उव्वट, महीधर प्रभृति आचार्यों के अर्थ का खण्डन तो करते हैं, किन्तु वे स्वयं वेद का अर्थ न तो समझ ही पाये हैं और न उनकी सही व्याख्या ही कर पाये हैं । केवल लोगों को मूर्ख बनाने के लिये वे वेद के पद-पदार्थ से सर्वथा विपरीत मनमाना अर्थ करने लगते हैं । ' यज्ञेन यज्ञ० ' इत्यादि श्रुति और 'यत मन्त्र और ब्राह्मणात्मक वेद का विषय है' न्यायभाष्य की इस वात्स्यायन की उक्ति के अनुसार मन्त्र और ब्राह्मणभागात्मक वेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय यज्ञ है । इन यज्ञो में अश्वमेघ यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है । इसके अनुष्ठान का अधिकारी कोई सम्राट् ही होता है । जैसे आँख से ही रूप का ज्ञान होता है, श्रोत्र ( कान ) आदि से नही, जैसे प्रकाश की सहायता से सभी दोषो से रहित मन का संयोग होने पर आंख से ही रूप अवश्य दिखाई पडता है, उसी तरह से धर्म का ज्ञान भी केवल एक शास्त्र की सहायता से ही हो सकता है । धर्म का ज्ञान शास्त्र से ही हो सकता है, किसी दूसरे प्रमाण से नहीं । उपक्रम, उपसंहार प्रभृति छः प्रमाणो के सहारे अपौरुषेय वेदशास्त्र का अध्ययन करने पर धर्म का ज्ञान अवश्य होगा, इसमें कोई संदेह की बात नही है । जैसे शास्त्र के प्रमाण के आधार पर अपनी पुत्री, बहिन आदि का किसी के साथ विवाह किया जाता है और पत्नी बनाने के लिये दूसरो से कन्या लाई जाती है, इसमें तर्क का कोई सहारा नहीं लिया जाता, उसी तरह से शास्त्र उपदिष्ट अन्य कार्यों के प्रति भी शंका उठाने की कोई आवश्यकता नही है । शास्त्र के कथनानुसार ही गंगास्नान से पाप का और कर्मनाशा में स्नान करने से पुण्य का नाश होता है, इसीलिये मन्त्र मोर ब्राह्मण
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वेदार्थपारिजातः १६ ९७ भाषणं सर्वमपि कृत्यं पुण्यायैव, शास्त्रचोदितत्वात् । अत एव मन्त्राणां ब्राह्मणानाच यो वस्तुभूतोऽर्थः, स एव ज्ञातव्यो वक्तव्यश्च 1 न तदन्यथाकरण वास्तविकार्थगोपानं वा युक्तम् । 'तत्र संज्ञप्तेषु पशुषु पत्न्यः पान्नेजनैरुदायन्ति । चतस्रश्च जायाः कुमारी पञ्चमी चत्वारि च शतान्यनुचरी-णाम्' ( श ० १३।५।२।१ ) इति, 'निष्ठितेषु पान्नेजनेषु महिषामश्वायोपनिपादयन्त्ययेन वाधिवासेन सम्प्रोर्गुवन्ति स्वर्गे लोके प्रोर्णुवाथामित्येष वै स्वर्गो लोको यत्र पशुं सज्ञपयन्ति निरायुत्याश्वस्य शिश्न महिष्युपस्थे निधत्ते वृषा वाजी रेतोधा दधात्विति मिथुनस्य सर्वत्वाय' ( श ० १३/५/२/२ ) इत्यादिभिः स्पष्टमेवाश्वमेधीयेषु पशुषु सज्ञप्तेषु पत्न्यः पान्नेजनैरुदायन्ति प्रोक्षणी-रश्वास्ये उपगृह्य संस्कुर्वन्ति । 'वाच यतीर्नयन्नमस्तेऽन्व इति' ( का० श्री० सू० २० ६ १२ ) सर्वाः पत्नीः पशुशोधनाय पान्ने-जनीहस्ताः परान् प्रति ययन्नमस्ते आततानेति प्रातनम् अम्बे अम्बालिके इत्याश्वमेधिक च वाचयत्यध्वर्युरिति सूत्रार्थः । तत्समीपे शाययन्ति । निष्ठितेषु पान्नेजनेषु संस्कारकरणानन्तरमुपरतव्यापारेषु महिषीमश्वाय प्रजापतिरूपाय उपनिपादयन्ति २३।२) इति मन्त्रेणे- अथानन्तरं महिष्यश्वौ अधिवासे सम्प्रोर्णुवन्ति वस्त्रेणाच्छादयन्ति, 'स्वर्गे लोके प्रोर्णुवायाम्' ( वा० सं ० स्वर्गलोक इति । त्यर्थः । कोऽयं स्वर्गो लोक इत्याकाङ्क्षाया ब्राह्मणं तद् व्याचष्टे । यत्र पशुं सज्ञपयन्तिवृषातद् वाजीयज्ञस्थानमेवरेतोधा इत्यादि मन्त्रेणेति निरायत्य बहिरायम्य अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे स्त्रीप्रजननप्रदेशे निधत्ते स्थापयति । तेन तु वृषत्रित्यस्यपूर्वोतशतपथीय( १३/५/२/२ ) वाक्येन स्पष्टं विज्ञायते । कथमेतन्न दृष्टं दयानन्देनेत्याश्चर्यम्यजमानोऽभिमेथयत्युत्सवथ्या अवगुर्द ससभाध्यक्षविद्वन्नित्यर्थः कृतः, स च शतपथं विरुणद्धि । तथाहि- 'तयोः शयानयोरख ) | यजमानोऽश्वमेधस्य राजा धेहीति, तन्न कश्चिदभिमेथयति नेद्यजमानप्रतिप्रतिः कश्चिदसदिति' ( श० १३५/२/३ ' इति मन्त्रेण क्रियते । तं यजमानं न कश्चिद- ' अश्वमभिमेथयति । सोपहासमश्लीलवचनमेवाभिमेथनम् । उत्सवध्यावगुदं धेहि कात्यायनेन सूत्रितम्-'उत्सक्थ्या इत्यश्वं 'भिमेथयति यतस्तस्य प्रतिप्रतिः प्रतिस्पर्धी कश्चिदपि नास्ति । शतपथानुसारेणैव इत्युव्वटः । हे वृषन् ' ( | | ) | ' यजमानोऽभिमन्त्रयते का० श्री० सू० २० ६ १७ अश्वदेवत्य गायत्र्याश्वंअवाचीनंयजमानोऽभिमन्त्रयतेगुदं गुदमवगुदोपरि वा धेहि रेतः सिञ्चे-,, सेक्तः अश्व उत् ऊर्ध्वे सक्थिनी ऊरू यस्याः सा उत्सवयी महिषी तस्या पुंस्त्वमित्यञ्जिः पुंस्प्रजननम् तं चारया,, सति स्त्रियो जीवन्ति । जीवयतीति त्यर्थः क्रियया योग्यस्य कर्मणोऽध्याहारात् । कथमिति चेत् अञ्जिः अनक्ति व्यनक्ति जीवः भोजयतीति,, सञ्चारय योनाविति शेषः । योऽञ्जिः स्त्रीणा जीवभोजनः । यस्मिन् सर्वोत्पत्तिकारण अश्व प्रजापते उत्सवथ्या:, –, भोजन जीवश्चासौ भोजनश्चेति जीवभोजनः । परमार्थस्तु हे वृषन् सेक्तः सञ्चारय तत एव चक्र- महिष्याः प्रजननस्थाने धेहि रेतः स्वतेजो वीर्यं सामर्थ्यं वा तत्र अञ्जि चारया स्वपुंस्प्रजननशक्ति करने का प्रयत्न होना चाहिये, उसको बदल देना अथवा वाक्यों का जो सही अर्थ है, उसको जानने का और तदनुसार उसकी व्याख्या छिपा देना उचित नही होगा । का संज्ञपन हो जाने के उपरान्त यजमान की यह पहले ही बताया जा चुका है कि अश्वमेघ यज्ञकीमें निर्दिष्टपत्नियाँ,पशुओंएक कुमारी और चार सौ दासियाँ रहती हैं । ये पत्नियाँ आदि हाथ में पंखा लेकर आती है । इनमें चार यजमान जाने के उपरान्त यजमान की पटरानी को प्रजापति रूप अश्व के आकर पहले अश्व का संस्कार करती हैं । इस संस्कार के पूरा हो स्थल को ही स्वर्गलोक माना गया है । मूल में उद्धृत पास सुलाया जाता है । तब उसको वस्त्र से ढक दिया जातामिलताहै । है यहाँ। स्वामीयज्ञीयदयानन्द इस प्रकरण को नही देख पाये, यह एक आश्चर्य शतपथ ब्राह्मण के वाक्यों में इन सब बातों का पूरा विवरण ब्राह्मण के विपरीत पडता है । शतपथ के अनुसार ही की बात हैं । उन्होंने 'वृषन्' पद का अर्थ विद्वान् सभाध्यक्ष किया हैइस, जोमन्त्रकिकाशतपथविनियोग बताते हुए लिखा है कि अश्व देवता की जिसमें कात्यायन ने भी इस मन्त्र का विनियोग बताया है । उव्वट ने करता है । इसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि हे स्तुति की गई है, ऐसे गायत्री छन्द वाले इस मन्त्र से यजमानमहिषीअश्वके कोप्रजननअभिमन्त्रितस्थान में आप अपने तेज और वीर्य का आधान कीजिये, सब प्राणियों के उत्पादक अस्वप्रतिनिधिभूत प्रजापते, इस २१३
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वेदार्थपारिजात. १६९८ वतिपुत्रोत्पत्तिसम्भवात् । कीदृशोऽञ्जिः? यः स्त्रीणां सर्वासां जीवनसाधनम्, भोजनवत्तृप्तिसाधनं च । सम्भोगो योग्यप्रजो- त्पादनं च स्त्रीणां जीवनतर्पणसाधनम् । ' कामको शकुन्तिका' ( वा० सं० २३ २२ ), 'यकासको शकुन्तक' ( वा० सं ० २३ २३ ) इति मन्त्रयो, 'विड्वे शकुन्तिका हलगिति वञ्चति विशेो वै राष्ट्राय वञ्चन्त्याहन्ति गभे पसो निगलगलीति धारकेति विड्वै गभो राष्ट्रं पसो राष्ट्रमेव विश्याहन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं धातुकः' ( ० १३| २| ९ | ६ ) इति शथपथवचनस्य चाध्वर्युकुमारीकर्तृकं परस्पराभि- मेथनरूपत्वमेव, ' अथाध्वर्युः कुमारमभिमेथयति । कुमारि हये हये कुमारि यकासको शकुन्तिकेति तं कुमारी प्रत्यभिमेथयति । अध्वर्यो हये हये अध्वर्यो यकासको शकुन्तक' ( श० १३/५/५१४ ) इति श्रुतेः । श्रुत्यनुसारेणैव कात्यायनेनापि सूत्रितम्- ' अध्वर्युब्रह्मोद्गातृहोतृक्षत्तारः कुमारीपत्नीभि संवदन्ते यकासकाविति दशर्यस्य द्वाभ्या द्वाभ्यां हये हयेऽसावित्यामन्त्र्या- मन्त्र्य ' ( का० श्री० सू० २०११: १८ ) । अध्वय्र्वादयः पञ्च हये हयेऽसावसाविति सम्बुद्धयन्तनामोच्चारणपूर्वकं सम्मुखी- कृत्य यकासकाविति दशर्चसम्बन्धिनीभ्यामृगुभ्यां कुमारीपत्नीभि सह सोपहास संवदन्त इति सूत्रार्थः । श्रुतिसूत्रानुसारे- जैवोव्वटसायणमहीधराचार्यैर्मन्त्रा व्याख्याता । न मनागपि तत्र तेषामभिप्रायनिवेशः । प्रसङ्गान्तरेंऽशतो व्याख्याता अपि सामस्त्येन पुनरिह व्याख्यायन्ते । तत्र प्रथममध्वर्युः कुमारीमाह - हये हये कुमारि, यकासको या असो इति स्थिते साकच्कम् । ' अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे:' ( पा० सू० ५ १३/७१ ) । अल्पा शकुन्तिः शकुन्तिका ' अल्प' ( पा० सू० ५/३/८५ ) इति कनि शकुन्तिकेति रूपम् । या असो अल्पपक्षिणीव योनिः हले हले इति शब्दायमाना वञ्चति गच्छति, स्त्रीणां शीघ्रगमने योनी हलहलेति शब्दोत्पत्तेः । गभे भगे ( वर्णविपर्यासः ) योनी शकुन्तिका दृश्याम् । यदा पसः पुंस्प्रजननेन्द्रियम् आहन्ति आगच्छति तदाधारका धरति लिङ्गमिति धारका योर्निर्निगलगलीति नितरां गलति वीयं क्षरति । यद्वाऽनुकरणं गलगलेति शब्द करोति । ' यकोऽसको शकुन्तक आहलगिति वञ्चति । विवक्षत इत्र ते मुखमध्वर्यो नस्त्वमभिभाषथाः । ' ( वा० सं० २३ २३ ) इति मन्त्रेण कुमारी अध्वर्युं प्रत्यभिमेथति । अङ्गुल्या शिश्नं सङ्केतयन्ती यकः यः असको असौ शकुन्तकः पक्षीव विवक्षतो वक्तुमिच्छतस्तव मुखमिव आहलगिति वञ्चति इतस्ततश्चलति अग्रभागे सच्छिद्रं । लिङ्गं तव मुखमिव भासते मतो मा नो-स्मान् त्वमभिभाषथा मा वद, तुल्यत्वात् । दयानन्दीये व्याख्याने यकासको यासो यकोऽसको योऽसौ इत्यादिपदानामभिप्रायो नोक्तः, धारका विवक्षत इव ते मुखमित्यादीनामपि व्याख्यान नास्ति, तद्रीत्या तदसम्भवात् । 'माता च ते पिता च तेऽग्रं वृक्षस्य रोहतः । प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमतंसयत् ॥ ' ( वा० सं ० २३ २४ ) जिससे कि इसमें पुत्र पैदा करने की सामर्थ्य प्राप्त हो, क्योंकि इसी पटरानी के गर्भ से चक्रवर्ती सम्राट् बनने की सामर्थ्य वाले पुत्र की उत्पत्ति होगी । ' यकासको शकुन्तिका' मोर ' यकासको शकुन्तक' ये दोनों मन्त्र भी 'विड् वै शकुन्तिका' तथा 'अथाध्वर्यु.' इन शतपथ ब्राह्मण के वचनो के अनुसार अध्वर्यु और राजकुमारी के परस्पर अभिमेथन कर्म मे विनियुक्त हैं । इन श्रुतियो का अनुसरण करते हुए हो कात्यायन ने भी 'अध्वर्यु ०' इत्यादि सूत्र में इनका विनियोग बताया है कि अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, होता और क्षत्ता ये पाँचों चार रानियों और कुमारी का नाम लेकर उनको सम्बोधित करते हुए ' यकासको' इन दस ऋचाओं में से उक्त दो मन्त्रो से इनके साथ परस्पर उपहास करे । इन श्रुतिवचनों और तदनुसारी सूत्रवचन के अनुसार ही उव्वट, सायण, महीधर प्रभृति ने इन मन्त्रों की व्याख्या की है । इसमें उन्होंने अपना अभिप्राय थोड़ा सा भी नहीं जोड़ा है । दूसरे प्रसंग में संक्षेप में हम इनकी व्याख्या कर चुके हैं । दयानन्द की व्याख्या में 'यकासको' प्रभृति पदों का अर्थ नहीं बताया गया है, इसी तरह से 'धारका विवक्षत इव ते मुखम् इत्यादि पदों का भी अर्थ वहीं नहीं दिया गया है, क्योंकि आपके मत के अनुसार इनका उस तरह का अर्थ निकाला ही नही जा सकता । 'माता च ते' इस मन्त्र का विनियोग कात्यायन के श्रौतसूत्र के अनुसार ब्रह्मा के द्वारा महिषी के उपहास में है । ब्रह्मा