वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 781–790

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 781 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात १६७९ तस्यान्यार्थत्वात् । तथाहि निरुक्ते 'कृष्ण नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति । त आववृत्रन्त्सदनाह तस्यादिद्- धूतेन पृथिवी व्युद्यते ॥ ' ( ऋ० स० १।१६४/ ४७ ) इति मन्त्रस्यार्थनिरूपणप्रसङ्गेऽग्निपदार्थविचार प्रस्तुत | मन्त्रार्थस्तु-दीर्घतमस आर्षम् | 'तत्र वृष्टिकामस्य कारीर्यामग्नये धामच्छदेऽष्टाकपालं तस्य पुरोऽनुवाक्या' इति मैत्रायणीसंहितावचने-नाग्नेर्वर्षणकर्मणा सम्बन्धो ज्ञायते । अग्नेः पुरोऽनुवाक्यारूपेणायं मन्त्रस्तत्र प्रयुज्यते । तेनाग्निपरोऽयं मन्त्रो ज्ञायते । परमयमग्निरादित्यरूपेणात्र स्तूयत इति प्रकरणादवसीयते । कृष्णं निरयण रात्रिरादित्यस्य हरयः सुपर्णा हरणा आदित्य- रश्मयस्ते यदाऽमुतोऽर्वाञ्च पर्यावर्तन्ते सदनाद् स्थानादुदकस्यादित्यादथ घृतोदकेन पृथिवी व्युद्यते, ' घृतमित्युदकनाम' ( नि ० ७२४ ), नियानं नियात्यनेनेति नियानं वर्त्यं रात्रिरादित्यस्य द्वे ह्यस्यायने शुक्लं चोत्तरं कृष्णं दक्षिण सा हि देवी रात्रिरभिप्रेता । स एष आदित्यो जगदनुग्रहाय गर्भमुदकमात्मनि धिष्णुरुत्तरायण प्रतिपद्यते । तदेते हरयो रसहरणाः मुपर्णास्तस्य रश्मयः सर्वस्माल्लोकादपो वसाना आत्मन्याच्छादयन्त आददाना दिव द्योतनवन्तमेतमादित्यं प्रत्युत्पतन्ति तदुदकं गर्भत्वेन निधित्समानाः । एवमुत्तरायणं षड्भिर्मासैराहितोदकगर्भः सम्पद्यते । स एव परिषिक्तोदकगर्भो दक्षिणवर्त्म प्रतिपद्यमानो नभस्यान्मासात्प्रभृति प्रसूयने ॥ ते रश्मयो यदा अमृत आदित्याद् ऋतस्योदकस्य सदनाद् आववृत्रन् पर्यावर्तन्ते अथ तदा घृतेनोदकेन पृथिवी व्युद्यते । घृतमित्युदकनाम, पृथिवी व्युद्यत इति सामर्थ्यात् । अत्र मन्त्रे मन्त्ररूपादादित्य. प्रकरणादग्निः 'अग्निर्वा इतो वृष्टि समीरयति धामच्छद्दिवि भूत्वा वर्षति मरुतः सृष्टां वृष्टि नयन्ति यदासावादित्योऽग्नि रश्मिभिः पर्यावर्ततेऽथ वर्षति । ' ( निरुते ७| २४ ) । धूमभूता आप ओषधिवनस्पतिभ्यो निर्वर्त्यमाना आहुतिभूताश्चामुं लोकमाविशन्ति । 'अग्नेर्वै धूमो जायते । घूमादभ्रमभ्राद् वृष्टिः' ( श० ५ | ३| ५ | १७ ) इति श्रुतेः । ता अग्निस्थानाभि- सम्पत्तिप्रनाडिकया धामच्छद् आदित्यो भूत्वा धाम्नां छादयिता रश्मिमेंघरूपैर्मध्यमस्थानमापादयति । तेन सृष्टा वृष्टि मध्यमस्थानात्तन्मरुतो मेघोदराणि विदीर्यं तेभ्यो विक्षिपन्तो वृष्टिमस्मिन् लोके नयन्ति । एवं तत्रानेकान् हेतूनुक्त्वा छान्दोमिकं सूक्तमप्यग्नेरेवेति साधितम् । तत्र ह्येतद्विशिष्टं पार्थिवाग्नेर्वाचक लिङ्गं भवति 'जमदग्निभि राहुतः ' (आश्व ० श्री० सू० ८/ ९ ) । उस वाक्य का अर्थ कुछ दूसरा ही है । निरुक्त में 'कृष्णं नियान ' इस ॠग्वेदीय मन्त्र का अर्थ करते समय अग्नि पद पर विचार करते समय यह वाक्य कहा गया है । इस मन्त्र का ऋषि दीर्घतमा है । 'तत्र वृष्टिकामस्य' इस वचन के अनुसार अग्नि का वर्षा से सम्बन्ध प्रतीत होता है । अग्नि की पुरोनुवाक्या के रूप मे यह मन्त्र पढा जाता है । इसलिये इस मन्त्र का देवता अग्नि प्रतीत होता है, किन्तु यह अग्नि आदित्य के रूप में यहाँ स्तुत है, इसका निश्चय प्रकरण से होता है । कृष्ण, निरयण काल में सूर्य की किरणें अपने साथ जल लेकर आकाश मे पहुँच जाती है । सूर्य की ये ही किरणें जब वहाँ से पुन: लौटती हैं, तो वे पृथिवी को जल से भर देते हैं । निघण्टु के अनुसार घृत उदक ( जल ) का नाम भी है । नियान शब्द आदित्य के मार्ग का सूचक है । आदित्य की गति दो मार्गों पर होती हैं, एक शुक्ल अर्थात् उत्तर और दूसरा कृष्ण अर्थात् दक्षिण । ये दिन और रात्रि के प्रतीक है । यह आदित्य जगत् के कल्याण के लिये जल के रूप में गर्भ धारण करने के लिये उत्तरायण मार्ग का अवलम्बन करता है । उस समय पृथिवी के रस को हरण कर लेने वाली इसकी सुन्दर किरणें सब जगह से रस का आहरण कर आदित्य लोक में चली जाती है । उत्तरायण के छ मांस तक उस जल को गर्भ के समान अपने भीतर इकट्ठा करती रहती हैं । दक्षिणायन काल में वे ही रश्मियाँ गर्भ के प्रसव के समान जल की वर्षा करने लगती हैं 1। ये रश्मियाँ जब उस आदित्य लोक से पुनः लौटकर आती हैं, उस समय जल से पृथिवी भर जाती है । निरुक्त का कहना है कि अग्नि के कारण वृष्टि होती है । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि से घूम की उत्पत्ति होती हैं, धूम से मेघ की और मेघ से वृष्टि होती है । यह अग्नि ही आदित्य का रूप धारण कर अपनी किरणों से सारे स्थानों पर छा जाता है और घूम से बने मेघों को जल से भर देता है । पवन जल भरे मेघों को विदीर्ण कर जल की वर्षा कराता है । इसी प्रसंग में निरुक्त में अन्य भी अनेक हेतुओं का उपन्यास करने के बाद 'जमदग्निभिराहुतः" इस वाक्य को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है कि जमदग्नि गोत्र के ऋषि भी आहुतियाँ देकर इसकी उपासना करते हैं । आहुतियाँ अग्नि में दी जाती हैं, आदित्य में नही, क्योंकि अग्नि में आहुति देने का विधान है । आदित्य में आहुति दी भी नहीं जा सकती । इस तरह से इस मन्त्र का प्रमाण देकर निरुक्तकार यह सिद्ध करते हैं कि उक्त मन्त्र का

पृष्ठ 782

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 782 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बेदार्थपारिजात' १६८० जमदग्नयो ह्येनमाहुतिभिर्जुह्वति नादित्यम्, अविधानादसम्भववाच्च । तस्मादत्रापि यद्वैश्वानरलिङ्गं तदप्येतस्य पार्थिवस्याग्ने- लिङ्गम, वृषा पावक दीदिहि वृषा वर्षिता हे वैश्वानर पावक, घुमद् दीप्तिमत् यस्त्वं जमदग्निभिराहुतः, अभिहुतः स त्वमस्माकं कर्मसु नित्यं दीदिहि दीप्यस्व । जमदग्नयः के इत्याह- नित्यप्रजमिताग्नय प्रभूताग्नय प्रज्ज्वलिताग्नय । तस्मादत्राग्नि- शब्देन पार्थिवोऽग्निर्यो होमाधिकरणभूत. स नित्यप्रज्वलिताग्निभिर्जमदग्निभिर्हयते । नात्र प्रज्वलिताग्नयः सूर्यादयो न वा तैराहुतः परमेश्वरो विवक्षितः । यदुक्तम्- ' ऐतरेयब्राह्मणे गणपतिशब्दार्थो वर्णित । अस्मिन् मन्त्रे ब्रह्मणो वेदस्य पतेर्भावो वर्णितः' इत्यादि, तदपि न युक्तम्, भिन्नत्वात् । शुक्लयजुर्वेदीयात् ' गणाना त्वा गणपति हवामहे ' इति मन्त्राद् ऋग्वेदीयोऽन्यो मन्त्र । स चेत्थम्- 'गणानां त्वा गणपति हवामहे कवि कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणा ब्रह्मणस्पत आन शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ ' ( ऋ ० सं ० २।२३ | १ | ऐतरेयब्राह्मणेऽस्यैव मन्त्रस्य सम्बन्धे 'गणाना त्वा इति ब्राह्मणस्पत्यं ब्रह्म वे बृहस्पतिः' इत्या- दिकमुक्तम् । सायणेन तत्रोक्तम् - तम्मिन् सूक्ते प्रथमाया ऋचस्तृतीयपादे ज्येष्ठराज ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते इति श्रूयमाणत्वाद् इदं सूक्तं ब्रह्मणस्पतिदेवनाकम्, ब्रह्मवै बृहस्पति, ब्रह्मणैवैनं तद्भिषज्यति । मन्त्रार्थस्तु -हे ब्रह्मणस्पते, गणाना देवादिगणानां सम्बन्धिनं गणपति स्वीयाना पति कवीनां क्रान्तदर्शिनां कवि कवित्वशक्तिप्रदातारम् उपमश्रवस्तमम् उपमीयतेऽनयेत्युपमा सर्वेषामन्नानामुपमानं श्रवोऽन्नं यस्य स अतिशयेनोपमश्रवा उपमश्रवस्तमस्तम्, सर्वाशोपमानवत्तमं सर्वोत्कृष्टसर्वश्रेष्ठभोग्य- वत्तमं ज्येष्ठाना प्रशस्यतमाना राजा ज्येष्ठराजस्तम्, ब्रह्मणा मन्त्राणा स्वामिनं त्वा त्वा हवामहे अस्मिन् कर्मण्याह्वयामः । किञ्च, नः अस्माक स्तुती: शृण्वन् त्वमूतिभिः पालनैर्हेतुभूतै. सादन सीदन्त्यस्मिन्निति सादन यज्ञगृहम् आसीद उपविश । ' प्रथश्च यस्य सप्रथश्च' इत्यंशस्तु नानेन मन्त्रेण सम्बद्धयते । अत एव सायणस्तृचात्मक सुकान्तरं विधत्ते- ' \ प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत् ॥ धातुर्युतानात् सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः ॥ ( ऋ ० सं ० १० १८१ । १ ) । अस्यायमर्थः - यस्य वसिष्ठस्य प्रथो नाम पुत्रः, यस्य भरद्वाजस्य सप्रथो नाम पुत्रः, देवता अग्नि ही है, आदित्य नही । ये जमदग्नि कौन है? इसी के उत्तर में निरुक्त का उक्त वाक्य उद्धृत किया जाता है । जमदग्नि नाम के ये ऋषि अपने घर में सदा अग्नि को प्रज्वलित रखने वाले हैं । इसलिये अग्नि शब्द से यहाँ पर पार्थिव अग्नि का ही ग्रहण किया जाता है, जिसमें कि हवि दी जाती है । इसी अग्नि में उसको नित्य प्रज्वलित रखने वाले जमदग्नि गोत्र के ऋषि हवन करते है । यह प्रज्वलित अग्नि सूर्य प्रभृति या जिस परमात्मा का यजन किया जाता है, वह भी नहीं हो सकता, इसी बात को स्पष्ट करने के लिये निरुक्त के उक्त प्रकरण मे यह वाक्य आता है, जिसकी कि स्वामी दयानन्द के अर्थ के साथ कोई संगति नही बैठती । ऐतरेय ब्राह्मण में गणपति शब्द का अर्थ बताया गया है, इत्यादि कथन भी गलत है, क्योंकि शुक्ल यजुर्वेद के मन्त्र से ॠग्वेदीय मन्त्र सर्वथा भिन्न है और यह ऐतरेय ब्राह्मण में ॠग्वेदीय मन्त्र के 'गणपति' पद की व्याख्या की गई है, शुक्ल यजुर्वेद के मन्त्र को नही । सायण ने इस प्रसंग मे कहा है कि उस सूक्त को प्रथम ऋचा के तृतीय पाद में ब्रह्मणस्पति शब्द की उपस्थिति के कारण इस सूक्त का देवता ब्रह्मणस्पति है । हे ब्रह्मणस्पते, आप सभी देवगणों के अधिपति है, सभी क्रान्तदर्शी कवियो को कवित्व शक्ति प्रदान करने वाले है, अन्न सदृश सभी भोग्य वस्तुओं में आप सर्वोत्तम हैं, वन्दनीयों में भी वन्दनीयतम है और आप ही सभी मन्त्रों के अधिपति हैं । हम आपको इस पवित्र यज्ञ में आहुति ग्रहण करने के लिये बुलाते है । हमारे द्वारा की गई इस स्तुति को सुनकर आप अपनी अनुग्रह शक्ति के साथ हमारे इस यज्ञमण्डप में आकर बैठिये । 'प्रथश्च यस्य सप्रथश्च' इतना अश इस मन्त्र से संबद्ध नही है, जैसा कि स्वामी दयानन्द ने कर दिया है । वास्तव में तौन ऋचाओं का यह एक 1 पृथक् सूक्त है, उसी का यह प्रथम मन्त्र है । पूरा मन्त्र मूल में उद्धृत कर दिया गया है । इसका अर्थ यह जिस वसिष्ठ का प्रथ नाम का पुत्र है और जिस भरद्वाज का सप्रथ नामक पुत्र है, इन वसिष्ठ और भरद्वाज के बीच में से वसिष्ठ ने

पृष्ठ 783

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 783 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदाथपारिजातः १६८१ तयोर्वसिष्ठभरद्वाजयोर्मध्ये वसिष्ठ आनुष्टुभस्य आनुष्टुप्छन्दसा युक्तस्य हविषो धर्माख्यस्य यद् हविः हविष्ट्वापादक रथन्तर रहः साधन साम रथन्तर धातु. सज्ञात् देवात् द्युतानात् द्योतमानात् सवितुश्च विष्णोश्च आजभार आजहार हृतवान्, वसिष्ठ आनुष्टुभस्य हविषो हविः हविष्ट्वापादकं रथन्तरं साम धातुदेवाद्विष्णोश्चाहृतवान् इत्यर्थं । तृचस्य सूक्तस्य वासिष्ठः प्रथसंज्ञ ऋषिः प्रथमाया, भारद्वाज सप्रथो द्वितीयायाः, सूर्यपुत्रो धर्म ऋषिस्तृतीयायाः । तथा चानुक्रान्तम् - प्रथश्चेति । प्रथो वासिष्ठः सप्रथो भारद्वाज धर्मः सौर्यो वैश्वदेवम् । सूत्रित चाश्वलायनेन -'गणानां त्वा, प्रथश्च यस्य' ( आ ० सू० ४।६ ) । विद्वासो विदाङ्कुर्वन्तु यद् दयानन्दः सर्वमेतदज्ञात्वैव ऐतरेयब्राह्मणस्याभिप्राय गणाना त्वेति याजुषमन्त्रेण सम्बन्ध योजयत्यस्य ब्राह्मणस्य । प्रथश्चेति मन्त्रं तदभिप्रायं चाज्ञात्वैव प्रथ सर्वत्र व्याप्तो विस्तृतः सप्रथः प्रकृत्याकाशादीनां प्रथेन स्वसामर्थ्येन , सहवर्तत इति सप्रथः तदिद नामद्वयं तस्यैवास्तीति स्वैर साहसपूर्वक यत्किञ्चिदुक्तवान् । इदमेवास्य पाण्डित्यम् । इत्थ सर्वत्र श्रुतिष्वस्य बलात्कार एव । तृचात्मकं सूक्तान्तर विधत्ते -'प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामेति । धर्मतन्वः सतनुमेवैनं तत्सरूप करोतीति' ( ऐ ० ब्रा० १।२१ ) । अत्र नामेत्यन्तं सूक्तप्रतीकरूपम्, तत्र सूक्ते पठिताः प्रथश्चेत्यादयस्तिस्र ऋचो घर्मतन्वः प्रवर्ग्यस्य शरीरस्थानीया । तन्मन्त्रपाठेनेनं प्रवग्यं सतनु शरीरोपेतं करोति । सतनुमित्यस्यैव व्याख्यानं सरूपमिति ॥ यद्वा तस्मिन् शरीरे शोभनरूपसहितं प्रवग्यं करोति । 'प्रजापति जमदग्नि' सोऽश्वमेध ' इति ब्राह्मणवचनेन 'जमदग्नय ' इति निरुक्तवाक्येन च परस्पर न कोऽपि सम्बन्धः । निरुक्ताभिप्रायस्तुक्त एव । प्रजापतिर्वै जमदग्निरित्यादेरयमभिप्रायः -'वस्तुतो न तथा कुर्याद् बाहंदु क्यीभिराप्रीणीयादित्यन्यमतं निषिद्धम् । जमादग्नीभिरेवाप्रीणीयात् । प्रजापतिर्वै जमदग्निः सोऽश्वमेधः स्वयैवैनं देवतया समर्धयति । तस्माज्जामदग्नीभिरेवाप्रीणीयात्' इत्येतत् पूर्णं वाक्यम् । जमदग्निदृष्टाभिर्ऋग्भिरेनं प्रीणीयात् । - " कुत एतदित्याह प्रजापतिरेव जमदग्निः प्रजापतिदैवतत्वात् । अश्वमेधोऽपि प्रजापतिरूपः । तस्मात्ताभिः प्रीणनेन स्वयैव देवतया एनं समर्धयति । जमदग्निदृष्टास्ता' | 'समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे' ( वा० सं० २९ २५ ), ' सद्योजाते अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध हवि प्रदायक रथन्तर साम को द्योतमान सविता देवता और विष्णु से प्राप्त किया था । इस तृच सूक्त की प्रथम ऋचा के ऋषि वासिष्ठ प्रथ, दूसरी के भारद्वाज सप्रथ और तीसरी के सूर्यपुत्र धर्म ऋषि है । अनुक्रमणी मे भी इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है और यही बात आश्वलायन श्रौतसूत्र मे भी बताई गई है । विद्वद्गण इस पर विचार करे कि स्वामी दयानन्द इन सब बातो को बिना समझे बुझे ही ऐतरेय ब्राह्मण के वाक्य का सम्बन्ध यजुर्वेद के मन्त्र के साथ जोड देते हैं । 'प्रथश्च' इत्यादि मन्त्र के अभिप्राय को बिना समझे-बूझे ही उन्होने प्रथ और सप्रथ शब्द का अपना मनमाना अर्थ किया है और कहा है कि ये दोनो नाम भी उस परमात्मा के ही है । इसी तरह से ये सब जगह मन्त्रो का अर्थ से मनमाने तरीके से निकालते रहते हैं । तीन ऋचाओ वाले इस सूक्त की बात 'प्रथश्च यस्य' इस ऐतरेय ब्राह्मण के वचन में भी स्वीकृत है । इसमें नाम पद पर्यन्त सूक्त का प्रतीक दिया गया है । इस सूक्त में पढी गई तीन ऋचाएँ धर्म (प्रवर्ग्य ) का शरीर बनाती है, अर्थात् इन तीन ऋचाओ के पढने से ही प्रवर्ग्य का शरीर बनता है । ब्राह्मण वाक्य में सतनु शब्द की ही व्याख्या स्वरूप शब्द से की गई है । अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि उस प्रवर्ग्य के शरीर को ये ऋचाएँ सुन्दर बना देती है । 'प्रजापतिर्वै जमदग्नि:' इस शतपथ ब्राह्मण के वाक्य का 'जमदग्नयः' इस निरुक्त वाक्य से किसी प्रकार का सम्बन्ध नही है । निरुक्त के वाक्य का अभिप्राय हम पहले बता चुके है । 'प्रजापति ० ' इत्यादि वाक्य का अभिप्राय यह है - पूरा वाक्य ऊपर उद्धृत कर दिया गया है, जिसका अर्थ होता है कि जमदग्नि ऋषि के द्वारा दृष्ट ऋचाओं से ही इसको प्रसन्न करे, क्योकि जमदग्नि स्वयं प्रजापति हो है । अश्वमेघ का देवता प्रजापति है, अतः वह भी प्रजापति रूप ही है । इसलिये अश्वमेघ की देवता को प्रसन्न करने के लिये जमदग्नि दृष्ट ऋचाओ का पाठ हो, यही - उचित है । उव्वट का कहना है कि ' समिद्धो अद्य ' से लेकर 'सद्यो जाते' इस मन्न तक की इन बारह त्रिष्टुप् छन्द वाली २११,

पृष्ठ 784

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 784 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात१६८२ व्यमिमीत' ( वा० सं ० २९/ ३६ ) इत्यन्ता: । 'समिद्धो अद्य द्वादशाप्त्यस्त्रिष्टुभो भार्गवो जमदग्निरपश्यत्' इत्युव्वटः । तदेतदपि दानन्देन नावबुद्धम् । मधैव महीधरादिदोषान्वेषणे बुद्धिः प्रवर्तिता । ' क्षत्रं वाश्वो विडितरे पशव.' इत्यत्र यदुक्तम् ---' यथाश्वस्यापेक्षयेतर इमेऽजादयः पशवो न्यूनबलवेगा भवन्ति, तथा राज्ञ. समीपे बिट् प्रजा निर्बलैव भवति, तस्य राज्यस्य यद्धिरण्यं सुवर्णादिवस्तु ज्योति प्रकाशो वा ,. 'न्यायकरणमेतत्स्वरूप भवति । यथा राजप्रजालङ्कारेण राजप्रजाध वर्णितः तथैव जीवेश्वरयो स्वस्वाभिसम्बन्धो वर्ण्यते (पृ० ३६९ ७० ) इति । एतत् सर्वथापि शाब्दनये स्वैरचारितैवास्य । 'मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ' इत्याभाणक-मेवायमनुसरति । प्रकरणं तावदनेन ज्ञातव्यम् । 'तद्वैके एतेषा पर्य्यङ्गयाणा नानायाज्यापुरोनुवाक्याः कुर्वन्ति विन्दाम एतेषा- मवित्र्येतरेषां न कुर्म इति न तथा कुर्यात् । क्षत्र वाश्वो विडितरे पशव प्रतिष्प्रतिनी ह ते प्रत्युद्यामिनी क्षत्राय विश कुर्वन्त्यथो आयुषा यजमान व्यर्धयन्ति ये तथा कुर्वन्ति तस्मात् प्राजापत्य एवाश्वो देवदेवत्या इतरे क्षत्रायैव तद्विशं कृतानुकरामनु-वमन करोत्यथो आयुषा यजमान प्रसमर्धयन्ति" ( श० १३ | २| २| १५ ) इत्येतत् पूर्णं वाक्यम् । तद्वैके एतेषामश्वादीना पर्यङ्गयाणा भिन्नदेवत्याना नाना पृथक् पृथग् याज्या. पुरोनुवाक्या कुर्वन्ति । ये तु समानदेवा अश्वतूपरगोमृगास्तेषा तन्त्रेणैव प्रदानम् । याज्यानुवाक्याभेदद्वारेण च प्रदानभेद एवायमुपन्यस्तो वेदितव्य । एष एव प्रदानभेदो पानामुपन्यस्तः । पुरोडाशानामप्यङ्गानामपीति वाच्यमविशेषाद् विन्दामो लभामहे । एतेषामश्वादीना प्राजापत्यादिका याज्यापुरोऽनु-वाक्याः । ता किमिति न पृथक्कुर्मः, इतरेषां तु रोहितादीना न विन्दाम, व्यवयो गायत्र्य इत्यादयो देवताः । तद्देवत्याश्च दुर्लभा., लक्षणोपेता याज्यानुवाक्याः । क्षत्रं वै अश्वः महत्त्वाद् बहूपकरणत्वाद् एकत्वाद्वा । विडितरे पशव, अल्पत्वा-दल्पोपकरणत्वाच्च । प्रति प्रति वर्तते प्रतिस्पर्धा सा यस्या विद्यत इति प्रतिप्रतिनी विट् प्रत्युद्यामिनी प्रत्युद्गमनशीला क्षत्राय क्षत्रस्यैव कृतानुकरामनुवर्त्मानं करोति । अयमभिप्रायः -प्राजापत्यस्याश्वादे पृथग् याज्यानुवाक्ये । इतरेषा सर्वेषा साधारण्यों ऋचाओ को भार्गव जमदग्नि ऋषि ने देखा था । स्वामी दयानन्द इन सब बातो को बिना जाने-बुझे व्यर्थ ही महीधर के भाष्य मे दोषो के अन्वेषण में लग गये हैं । ' क्षत्र वावो विडितरे पशव ' इस शतपथ वाक्य की व्याख्या करते हुए स्वामी दयानन्द ने लिखा है-' जैसे घोडे के सामने भेड बकरी आदि पशु कम वेग और बल वाले होते है, उसी तरह से क्षत्रिय के सामने सारी प्रजा निर्बल होती है । उस राज्य का हिरण्य अर्थात् सुवर्ण प्रभृति कीमती वस्तुएँ, या ज्योति अर्थात् प्रकाश ही, याने न्याय करने की सामर्थ्य ही, उसका स्वरूप अर्थात् घन होता है । जैसे राजा और प्रजा के रूपकालंकार से राजा और प्रजा का धर्म बताया गया है, वैसे ही यहाँ पर जीव और ईश्वर का स्वस्वामिभाव सम्बन्ध भी बता दिया गया है' | किन्तु दयानन्द की यह सारी व्याख्या शाब्द न्याय में मनमानी फैलाने वाली है । मुँह हैं, इसलिये कोई भी कह हो सकता है कि हरीतकी ( हरड ) दस हाथ की होती है, इसी तरह से लेखनी हाथ में हैं, तो जो मन में आया, लिखा ही जा सकता है । किन्तु समझदारी की बात यह है कि कुछ लिखने से पहले प्रकरण आदि का अनुसन्धान कर लिया जाय । 'तर्द्धके' इत्यादि शतपथ वाक्य का यह एक अंग है । उसका अभिप्राय यह है कि कुछ आचार्य भिन्न-भिन्न देवता वाले पशुओ के लिये पृथक् याज्या और पुरोनुवाक्या मन्त्रों का उच्चारण आवश्यक मानते है । जो समान देवता वाले अश्व, तूपर, गो, मृग आदि पशु है, उनकी तो एक ही मन्त्र से आहुति दे दी जाती है । याज्या और अनुवाक्या के भेद होने पर आहुति में भी भिन्नता मा जाती है । वपा के प्रदान में भी यही भेद माना जाता है तथा पुरोडाश प्रभृति अन्य अंगो में भी हम इसी का अनुसन्धान कर लेते है । इस तरह से प्रजापतिदेवताक अश्व प्रभृति पशुओं के लिये याज्या और अनुवाक्या मन्त्रो का प्रयोग नहीं किया जाता, किन्तु अन्य देवताओ के इनसे भिन्न पशुओं के लिये उनका अलग अलग उच्चारण करना पड़ता है । इसी प्रसंग में 'क्षत्र वाश्वो' इत्यादि वाक्य उद्धृत किया गया है कि प्रजा में क्षत्रिय राजा जैसे प्रधान हैं, उसी तरह से इस यज्ञ मे अश्व की प्रधानता है । इसलिये प्रजापति देवता के लिये दिये जाने वाले अश्व के लिये अलग से ही याज्या और अनुवाक्या मन्त्रो का प्रयोग होना चाहिये और बचे हुए पशुओ की एकतन्त्र से आहुति दे देनी चाहिये । इस तरह से दो ही प्रकार की आहुति देनी चाहिये । दूसरी आहुति में देवताओ का भेद हो जाने पर भी आहुति एक ही रहेगी, तदनुसार

पृष्ठ 785

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 785 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात १६८३ देवदेवत्ये द्वे एव कार्ये । ततश्च भिन्नदेवता अपि सह प्रदेयाः । 'सकृदेव प्राजापत्याभि प्रचरेयु सकृद्देवदेवत्याभि. ( श० १३| ५| ३ ६ ) इति । तत्र च मुख्यत्वाद् हविषामपि प्रदर्शनार्थं नात्र केवल क्षत्रस्य प्राबल्य दिशा दौर्बल्यं च विवक्षितम् । - यत्तु — क्षत्रस्यैतद्रूपं यद्धिरण्य ज्योतिर्व हिरण्यम्' इत्याश्रित्योक्तम्-' राज्यस्य यद्धिरण्य सुवर्णादिवस्तु ज्योति प्रकाशो वेत्यादिकम्' इति, तत्तु सर्वथोपहासास्पदम् प्रकरणानवत्रोधात् । 'हिरण्मयोऽश्वस्य शासो भवति लोहमया पर्यङ्गयाणा-मायसा इतरेषा ज्योतिर्वे हिरण्यं राष्ट्रमश्वमेधो ज्योतिरेव तद्राष्ट्रे दधाति । अथो हिरण्य ज्योतिषैव यजमानः स्वर्ग-लोकमेति । अथो अनूकाशमेव त कुरुते स्वर्गस्य लोकस्य समष्ट्यै' । अश्वस्य हिरण्मयो हिरण्यपरिष्कृत. शासो विशसन-साधनमस्यादि, पर्यङ्गयाणा ताम्रपरिष्कृता शोसा, इतरेषा रोहितादीनामायसाः 1 ननु हिरण्मय एव कुतो न स्यात् कुनो हिरण्यपरिष्कृत? इति चेत्, तथैव विगसनसामर्थ्यात् । यदि तु ताम्रहिरण्यगर्भधारा एव स्युः, ततो विशसनमेव न तैः कर्तुं शक्यते । पर्यंङ्गयाश्चाश्वव्यतिरिक्ता एव ग्राह्याः । अश्वस्य पृथग्वचनात् । आयसा अयोविकाराः, त एव तत्प-रिष्कृताः । इतरेषा ज्योतिष्मद्धिरण्यं ज्योतिरेव ॥ राष्ट्रमश्वमेध, राष्ट्रसमृद्धिहेतुत्वात् । अश्वशासस्य हिरण्यपरिष्कृतत्वेन हिरण्यस्य ज्योतिर्मयत्वेन ज्योतीरूपत्वात् । तेन हिरण्यपरिष्कृताश्वशासकरणेन राष्ट्रे ज्योतिर्दीप्ति शोभा दधाति । तेन ज्योतिषा युक्तो यजमान स्वर्गं लोक गच्छति । 'अनूकाशमालोकमनातप कुरुते स्वर्गस्य प्राप्तये । अथो क्षत्रं वा अश्व. क्षत्रस्ये- तद्रूपं यद्धिरण्यम् । क्षत्रमेव तत्क्षत्रेण समर्धयति ' । क्षत्र वाऽश्व; अभ्याहतत्वात् । हिरण्यमप्यभ्यर्हितत्वादेव क्षत्रस्य रूपम् । यथा वे राज्ञोऽराजानो राजकृता मन्त्रिपुरोहिताः स्वभूता अराजान. सूतग्रामण्यश्चोपकरणभूतास्तथैवाश्वस्थ पर्यया- एतद्रूपं यदयो, ':,स्तूपरादयः एवमेव हिरण्यस्योपकरणभूतास्ताम्रादय । अथो यदायसा इतरेषा विड्वा इतरे पशव । विशविशमेव विशा समर्धयति' । अत्राश्वमेधक्रतो. प्रधानपशोरश्वस्य हिरण्यपरिष्कृतः शासः कर्तव्यस्तेन राष्ट्रे दीप्तिर्भवतीति यजमानस्तु तेन स्वर्गमवाप्नोतीत्युक्तम् ॥ 'न वै मनुष्यः स्वर्गं लोकमञ्जसा वेद' ( श० १३ | २ | ३| १ ) इत्यत्र यदुक्तम्- 'नैव मनुष्यः केवलेन स्वसामर्थ्येन सरलतया स्वर्गं परमेश्वराख्यं लोक वेद, किन्त्वीश्वरानुग्रहेणैव जानाति, अश्वो यन ईश्वरः 'ईश्वरो वा अश्व:' ( श ० १३| याज्या और अनुवाक्या मन्त्रों का उच्चारण भी एक बार ही होगा । यहाँ पर देवता और पशु का भेद हो इसमेंजाने केवलपर भीक्षत्रियमन्त्र केकीउच्चारणप्रबलता में आवृत्ति नही की जायगी । इस तरह से यह प्रसग हवि के प्राबल्य और दौर्बल्य के प्रदर्शन के लिये है, और प्रजा की दुर्बलता मात्र का प्रतिपादन नही किया गया है । ' क्षत्रस्यैतद्रूपम्' इत्यादि की व्याख्या के प्रसंग में यह जो कहा गया है कि राज्य की शोभा धन है औरयह लिखज्योतिमाराका नामहै । ( ),,हिरण्य है पृ० ३७० वह भी अत्यन्त उपहासास्पद बात है क्योकि स्वामी दयानन्द ने विना प्रकरण को समझे ही तथा अन्य पशुनो शतपथ ब्राह्मण के इस प्रकरण में बताया गया है कि अश्व का विशसन करने वाला शस्त्र हिरण्मय, पर्यंगी का लोहमयके लिये सुवर्णमय ( सुवर्ण का आयस ( ताम्रपत्र ) होता है । इसी प्रसंग मे हिरण्य, राष्ट्र, अश्वमेध आदि की प्रशंसा की गई है । अश्वज्योतिर्मय स्वर्गलोक को प्राप्त मंडित ) शस्त्र का प्रयोग करने से राष्ट्र और अश्वमेध की भी शोभा और समृद्धि बढती है तथा यजमानहो क्षत्रिय और अश्व भी जनता,करता है । इसी प्रसंग में अश्व और क्षत्रिय की तुलना और प्रशंसा की गई है । यहाँ हिरण्य के समान है उसी तरह के लिये अभिनन्दनीय है । जैसे राजा के मन्त्री, पुरोहित आदि अपने आदमी है और सूत, ग्रामणी आदि सहायकपूरे प्रकरणहोते का यह तात्पर्य से अश्व के तूपर आदि स्ववर्गीय तथा हिरण्य के ताम्र आदि स्वर्गीय पदार्थ माने जाते हैं । इस प्रकार इस तो उससे राष्ट्र के ऐश्वर्य की -, है कि इस अश्वमेघ यज्ञ के प्रधान पशु अश्व का विशसन साधक शस्त्र यदि सुवर्ण जटित रखा जाता है प्रकरण को देखने पर यह वृद्धि होती है और यजमान ऐसा कर स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार शतपथ ब्राह्मण के इस पूरे स्पष्ट प्रतीत होता है कि दयानन्द अभिमत अर्थ यहाँ एकदम बेतुका लगता है । 'तथा 'अश्व' नाम 'न वै मनुष्यः' शतपथ ब्राह्मण के इस वाक्य की व्याख्या करते हुए स्वामी दयानन्द ने कहा है-ईश्वर ही उनके लिये परमेश्वर का भी है, क्योकि कोई मनुष्य स्वर्गलोक को अपने सहज सामर्थ्य मे नही जान सकता, किन्तु अश्व, अर्थात्

पृष्ठ 786

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 786 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६८४ वेदार्थपारिजातः ३।३।५ ) | अश्नुते व्याप्नोति सर्व जगत् सोऽश्व ईश्वर इत्युक्तत्वाद् ईश्वरस्यैवात्राश्वसंज्ञास्तीति' ( पृ० ३७० ), तदपि प्रकरण-, विरुद्धम् ईश्वरस्याश्वसंज्ञाविधानस्य निष्प्रयोजनत्वात् । वस्तुतस्तु बृहदारण्यकरीत्याऽश्वमेधोपासनायामत्रापि चाश्वस्य प्रजापतिरूपत्वेन प्रजापतिः स्वर्गं लोक जानाति न मनुष्य इत्यस्यैव विवक्षितत्वात् । एतस्यैवार्थवादोऽत्रोक्तः । 'देवा वा अश्वमेधे पवमानं स्वर्गं लोकं न प्राजानस्तमश्वः प्राजानात् । अश्वमेधेऽश्वेन पवमानाय सर्पन्ति स्वर्गलोकस्य प्रज्ञात्ये पुच्छमन्वारभन्ते स्वर्गस्येव लोकस्य समष्ट्यै' (श० १३| ३०/३/५ ) इति । एवमेव - ' राज्यमश्वमेधसंज्ञ भवति । तद्राष्ट्रे राज्य- कर्मणि ज्योतिर्दधाति तत्कर्मफलं राजपुरुषाय भवतोति । तत्र सुखायैव विश प्रजा कृतानुकरा स्ववर्तमानानुकूला करोति ॥ क्षत्रमेवाश्वमेधसज्ञकं भवति । तस्य यद्धिरण्यमेतदेव रूपं भवति । तेन हिरण्यान्वितेन क्षत्रेण राज्यमेव सम्यग्वर्धते न च प्रजा । सा तु स्वतन्त्रस्वभावान्वितया विशा वर्धते । अतो यत्रको राजा भवति तत्र प्रजा पीडिता जायते । तस्मात् प्रजा- सत्तयैव राज्यप्रबन्धः कार्यः' ( पृ० ३७० ) इत्यादिकं सर्वं निर्मूलमेव, वाक्य पद त दक्ष रबहिर्भूतत्वात् । वाक्यसमूहेभ्यो विच्छिद्य विच्छिद्य व्युत्क्रमेण वचनखण्डान्युद्धतानि, स्वैरमेव प्रकरणविरुद्धान्यसम्बद्धानि तद्व्याख्यानानि कृतानि । ( १६, १५, १७, १ ९) (,,,,, ) इत्येवं रूपेण वाक्यखण्डान्युद्धृतानि । अस्माभिस्तु १४ १५ १६ १७ १८ १९ कण्डिकाः समुद्धृत्य तद्व्याख्यानान्युप- स्थापितानि । शतपथे त्रयोदशे काण्डे द्वितीयेऽध्याये द्वितीये ब्राह्मणे संक्षेपेणायमर्थ उक्त । अश्वमेधस्य यज्ञराजत्वं यज- मानाश्वयोर्यज्ञरूपत्वेनाभिन्नत्व चोपपाद्य पशूनां यूपे नियोजनस्य प्रकृतयज्ञारम्भकत्वप्रतिपादनम् आश्वमेधिकानामश्वतूपरगो- मृगै सह कृष्णग्रीवादिवामनान्ताना पञ्चदशानां पर्यङ्गयपशूना देवतासम्बन्धस्य बन्धनस्थानस्य च सार्थवादमभिधानम् । अश्वस्य पर्यङ्गानि रराटादीनि तेषु भवाः पर्यङ्गयाः कृष्णग्रीवादय. पर्यङ्गया भवन्ति । तेषां द्वादशाना पश्चदशवज्यात्मकत्व- मुक्त्वा तद्रूपेण प्रशसनम् । मध्यमे यूप आग्नेयावेकादशिनो द्वो पर्यङ्गयाः पञ्चदश चेत्थं सप्तदशपशून् नियुज्यालभेतेति च सार्थ- स्वर्ग सुख को जनाता है और जो मनुष्य प्रेमी धर्मात्मा है, उसको सब स्वर्गसुख देता है' ( पृ ० ३७ ९ ) । किन्तु यह सारा कथन भी प्रस्तुत प्रकरण के विपरीत है । ईश्वर की ' अश्व' संज्ञा रखने का कोई प्रयोजन नही है । वास्तव में जो बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार अश्व- मेष की उपासना मे भी अश्व प्रजापति का ही एक रूप है, अतः इस वाक्य का इतना ही तात्पर्य है कि वह प्रजापति ही स्वर्गलोक को जानता है, सामान्य मनुष्य नही । 'देवा वा अश्वमेधे' इत्यादि शतपथ वाक्य में इसी बात का अर्थवाद के रूप में प्रतिपादन किया गया है । इसी तरह से ' राष्ट्रमश्वमेघो० ' इत्यादि वाक्य की व्याख्या करते हुए स्वामी दयानन्द ने लिखा है -'तथा राज्य के प्रकाश का धारण करना सभा का ही काम है और उसी सभा का नाम राजा है । वही अपनी ओर से प्रजा पर कर लगाती है, क्योंकि राजा ही से राज्य और प्रजा से ही प्रजा की वृद्धि होती है' ( पृ० ३७१ ) । किन्तु यह सारा कथन भी बेमतलब का है, उक्त वाक्य के पदों और अक्षरों से भी उसका कोई सम्बन्ध नहीं हैं । शतपथ ब्राह्मण के बड़े-बड़े प्रकरणो मे से तोड़-मरोड़ कर उलटे-सीधे वाक्यों को रखकर ये उनका मनमाना अर्थ करते है । यहाँ उन्होने शतपथ ब्राह्मण के वाक्यों को इस क्रम से रक्खा है १६, १५, १७, १ ९ । इसके विपरीत हमने ऊपर १४ से लेकर १ ९ कण्डिका तक के वाक्यों को सिलसिलेवार रखकर उनकी सही व्याख्या कर दी है । शतपथ ब्राह्मण के त्रयोदश काण्ड के द्वितीय अध्याय के द्वितीय ब्राह्मण में संक्षेप में इस बात को समझाया गया है कि अश्वमेध सभी यज्ञो का राजा है । यजमान और अश्व ये दोनों ही यज्ञ के अंग है, अत एव ये दोनो अभिन्न है । पशुओं को युप मे बांधने के साथ इस यज्ञ का आरम्भ होता है । अश्वमेध में प्रयुक्त होने वाले अरब, तूपर, गो, मृग के साथ कृष्णग्रीव से लेकर वामन पर्यन्त पन्द्रह पर्यंग्य पशुओं का उन उन देवताओं से सम्बन्ध बता कर उनको कहीं कहीं बाँधा जाय, इस बात को अर्थवाद वाक्यों के साथ यहाँ बताया गया है । इनके साथ ही अग्नि देवता के दो पशुओ को मिला देने पर इन पशुओ की संख्या सत्रह हो जाती है । कुछ आचार्यों का कहना है कि इन पशुओ का आशीणन ' समिद्धो अञ्जनम्' प्रभृति एकादश मन्त्रो से करना चाहिये । इस पक्ष का खण्डन कर यहाँ बताया है कि ' अद्य मनुषो दुरोणे ' प्रभृति एकादश मन्त्रो से इनका विनियोजन करना चाहिये । इसके आगे किसी आचार्य के इस मत को बताया गया है इन अश्व प्रभृति पर्यंग्य पशुओ के लिये अलग अलग याज्या और पुरोनुवाक्याओ का प्रयोग करना चाहिये ।

पृष्ठ 787

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 787 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १६८५ वाद कथनम्, इतरेषु तु यूपेषु षोडश षोडश पशून्नियुज्यालभेतेति च सार्थवादमभिधानम्, तानेतान् पशून् कथमाप्रीणीया- दित्याशङ्क्य ' समिद्धो अञ्जन् ' इत्यादिभिरेकादशभिर्बार्हदुक्यीभिराप्रीणीयादिति केषाञ्चिन्मतमुपन्यस्य तत्प्रतिषिद्धय 'समिद्धा अद्य मनुषो दुरोणे' इत्यादिभिरेकादशभिर्जामदग्नीभिरेवाप्रीणीयादिति सिद्धान्तप्रदर्शनम् । एतेषामश्वादिपर्यङ्गचपशूनामेके पृथक् पृथग् याज्यापुरोऽनुवाक्या कुर्वन्तीति केषाञ्चिन्मतमुपन्यस्य तत्तथा न कुर्यादिति सकारण प्राजापत्यस्याश्वादेः पृथग् याज्यानुवाक्ये कर्तव्ये, इतरेषा सर्वेषा साधारण्यो देवदेवत्ये द्वे एव कर्तव्ये इति सकारण सार्थवाद स्वमननिरूपणम् । अश्वस्य हिरण्यपरिष्कृतः शासः, ताम्रपरिष्कृता शासा इतरेषाम्, रोहितादीना त्वायसाः शासा भवन्तीति सार्थवादं कथनम् । तत्राश्वस्य हिरण्यस्य च क्षत्ररूपत्वेन प्रशसनम्, पर्यङ्गयशासपरिष्करणसाधनस्य ताम्रस्य सदृष्टान्त- मुपकरणत्वेन प्रशसनम्, इतरेषा रोहितादिपशूना तच्छासप्रकृतिद्रव्यस्यायसश्च खङ्गरूपेण प्रशसनम् ॥ अश्वस्यावदाना- नामाहवनीयोत्तरपार्श्वे वेतसशाखामये कटे निधानस्य सार्थवादमभिधानमिति स्थूलरूपेणार्थावगतावपि नैवविधोऽसङ्गतो-sर्थो निरूपयितुं शक्यते, यथा दयानन्देन एवमनर्गलप्रलापेनापि गणाना त्वेत्यस्य सम्बन्धे न किञ्चिदुक्तम् । तेन सर्वमेतद् व्यर्थमेवोक्तम् । -- यत्तु गणाना त्वेति सम्बन्धे - ' स्त्रियोऽप्येनं राज्यपालनाय विद्यामय सन्तानशिक्षाकरणयज्ञ परितः सर्वतः प्राप्नुयुः । प्राप्ताः सत्योऽस्य सिद्धये यदपह्नवाख्य कर्माचरन्ति, अत. कारणाद् एतद् एतासामन्ये विद्वासो दूरीकुर्वन्ति । अथ इत्यनन्तरं य एनं विचालयन्ति तानप्यन्ये दूरीकुर्यः । एवमस्य त्रिवार रक्षणं सदा कुर्युः । एवं प्रतिदिन मेतस्य शिक्षया रक्षणेन चात्मशरीरबलानि सम्पादयेयुः । ये नराः पूर्वोक्त गर्भध परमेश्वरं जानन्ति1 नैव तेभ्यो बलपराक्रमादयोऽपक्रामन्ति । तस्मान्मनुष्यस्तं गर्भंधं परमेश्वरमहमाबानि समन्ताज्जानीयामितोच्छेत् । ( प्रजा वै पशव • ) ईश्वरसामर्थ्याद् गर्भात् सर्वे पदार्था जायन्त इति योजनीयम् । यश्च पशूना प्रजानां मध्ये विज्ञानवान् भवति स इमां सर्वां प्रजामात्मनि, अतति सर्वत्र व्याप्नोति, तस्मिन् परमेश्वरे वर्तत इति धारयति' ( पृ ० ३७० ) इत्यर्थकरणम्, तत्सर्वं सर्वथा शाब्दन्यायविरुद्ध यत्किञ्चि-त्प्रलापमात्रम्, पदवाक्यबहिर्भूतत्वात् । सत्य त्वदीयादर्थान्महीधरस्यार्थो विरुद्ध:, । न केवलं तस्यैव, किन्तु सर्वस्यैव सचेत- साथ ही इस मत का खण्डन करते हुए यह भी कह दिया गया है कि प्राजापत्य अश्व के लिये इनका अलग से विधान करना चाहिये । बाकी सबका दो देवताओ के अन्तर्गत ही एक तन्त्र से विधान कर देना चाहिये । आगे बताया गया है कि अश्व का शस्त्र हिरण्य से परिष्कृत ( सुवर्णमंडित ) तथा बाकी पशुओ का ताम्र परिष्कृत होना चाहिये । रोहित प्रभृति का शस्त्र लोहमय होता है । इस बात को अर्थवाद के साथ बता कर यहाँ अश्व और हिरण्य की क्षत्र के रूप में प्रशंसा की गई है । पर्यंग्य पशु और उसके शस्त्र के परिष्करण के साधन ताम्र की दृष्टान्त के साथ उपकरण के रूप में प्रशंसा की गई है और रोहित प्रभूति पशु और उसके शस्त्र के प्रकृतिभूत द्रव्य लोह की खड़ग के रूप में प्रशसा की गई है । इस तरह से शतपथ ब्राह्मण के इस प्रकरण से मोटे रूप मे भी स्वामी दयानन्द को इस बात का ज्ञान हो जाता, तो वे ऐसा असंगत अर्थ इन वाक्यों का न करते । इतना सब कह लेने के बाद भी स्वामी दयानन्द ने शुक्ल यजुर्वेद के 'गणाना त्वा' इस मन्त्र के अर्थ के विषय में कुछ भी नही कहा है, इस तरह से उनकी यह सारी व्याख्या व्यर्थ 1हो गई है । 'गणानां त्वा' इस मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग में यह लिखा गया है—'स्त्री लोग भी राज्य पालन के लिये विद्या की शिक्षा सन्तानों को करती रहे । जो इस यज्ञ को प्राप्त होकर भी सन्तानोत्पत्ति आदि कर्म में मिथ्याचरण करती हैं, उनके इस कर्म को विद्वान् लोग पसन्द नही करते । जो पुरुष सन्तान आदि की शिक्षा में आलस्य करते हैं, अन्य लोग बाँध कर उनको ताडना देते हैं । इस प्रकार तीन, छ या नौ बार इसकी रक्षा में आत्मा, शरीर और घल को सिद्ध करे । जो मनुष्य परमेश्वर की उपासना करते हैं, उनके बल आदि गुण कभी नष्ट नही होते । प्रजा के कारण का नाम गर्भ है । उसके समतुल्य वह सभा प्रजा और प्रजा के पशुओ को अपनी आत्मा में धारण करे । अर्थात् जिस प्रकार अपना सुख चाहे, वैसे ही प्रजा और उसके पशुओं का भी सुख चाहे' ( पृ० ३७१ ), किन्तु इस तरह का अर्थ करना सर्वथा शाब्द न्याय के विरुद्ध थोथा प्रलापमात्र है । इसका श्रुतिगत पदो या वाक्यों से कोई भी

पृष्ठ 788

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 788 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात १६८६ सोऽर्थोऽस्मादर्थाद् विरुद्धो भविष्यति । का. पत्न्य? किञ्च पर्ययणम्? सन्तानशिक्षाकरण कस्य शब्दस्यार्थ? अपह्नवाख्यं कर्म किम्? सर्वमप्येतद् अक्षरबाह्यं प्रकरणविरुद्धमसम्बद्धं च । 'त्रयो वा लोका, एभिरेवैन धुवते, त्रि पुन परियन्ति' इत्यस्य कर्त्यस्तु पत्न्य एवान्ये वा? विद्वामो दूरीकुर्वन्तीति कुतो गृहीतम्? के ते य एन विचालयन्ति क च विचालयन्ति इत्येतत्सर्वमसमाहितमेव । हिन्दीव्याख्याने तु - 'राज्यपालनार्थं स्त्रियोऽपि सन्तानेभ्यो विद्या. शिक्षयन्ति । इमं च यज्ञ प्राप्यापि या मिथ्याचरणं कुर्वन्ति विद्वासो न ताभ्य प्रसीदन्ति । ये पुरुषा सन्तानादिशिक्षणाय अलसा भवन्ति, अन्ये ता बध्नन्ति ता उपमा एवं त्रिधा षोढा नवधा एतद्रक्षित्वा आत्मशरीरबलानि साधयेयु.' इत्युक्तम् । वस्तुतस्तु बृहदारण्यके ऽश्वमेधोपासनेऽश्व. प्रजापतिरूपेणोपास्यते । ' उषा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः | सूर्यश्चक्षुवनिः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानर संवत्सर आत्मा अश्वस्य मेध्यस्य द्यौः पृष्ठम् अन्तरिक्षमुदर पृथिवी पाजस्य दिश पार्श्वे अवान्तर- दिश पर्शवो ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहारात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीति नभो मासानि अबन्ध्य सिकता मिन्धवो गुदा यच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचन् जघनार्थो तद्विजृम्भते तद्विद्योतते द्विधुनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक्' ( बृ० उ० १ १ १ ) अत्राश्वमेध विज्ञानायाश्वविषय दर्शन- मुच्यते प्राधान्यादश्वस्य, तन्नामाङ्कितत्वात् क्रतो • । कर्माङ्गस्य पशोः संस्कर्तव्यत्वात् कालादिदृष्टयः शिरआदिषु क्षिप्यन्ते । प्राजापत्यत्व च पशो प्रजापतिदृष्टयध्यारोपणात् काललोकदेवतात्वाध्यारोपण च प्रजापतित्वकारणं पशोः । एवरूपो हि प्रजापतिः, विष्णुत्वादिकरणमिव प्रतिमादौ । सर्वमेतच्छाङ्करभाष्ये स्पष्टम् । उषा ब्राह्म मुहूर्तः, शिरःप्राधान्यात् शिरश्च प्रधान शरीरावयवानाम् । सूर्य: चक्षुः, वात. प्राणः, वैश्वानरो- ग्निर्व्यात्तम्, मुख्याग्निदेवतत्वात् । संवत्सरोऽस्य आत्मा । 'शरीरं मध्य ह्येषामङ्गानामात्मा' इति श्रुतेः । द्यौ पृष्ठमन्तरिक्ष- मुदरं पृथिवी पाजस्य पादस्यमिति वर्णव्यत्ययेन पादासनस्थानमित्यर्थः । दिशश्चतस्रः पार्श्वे, पार्श्वेन दिशा सम्बन्धात्, सम्बन्ध नही है । यह कहना तो ठीक ही है कि स्वामी दयानन्द के अर्थ से महीघर का अर्थ विपरीत है । इतना ही क्यो, किसी भी समझदार आदमी का किया अर्थ इससे विपरीत ही पड़ेगा । पत्निया कौन है और यह पर्ययण क्या है? सन्तान को शिक्षा देना किस शब्द का अर्थ है? अपह्नव नामक कर्म क्या है? ये सारी बातें प्रकरण से विरुद्ध और असबद्ध भी है । तीन बार रक्षा करने की बात आपने कही है, वह कार्य पत्निया करती है या कोई दूसरे व्यक्ति? विद्वान् उसको दूर कर देते हैं, यह बात आपने कहाँ से निकाली? विचलित कर देने वाले कौन है और वे किसको विचलित करते है? इन सबका समाधान होना कठिन है । इसकी हिन्दी व्याख्या में जो कुछ कहा गया है, उसको ऊपर लिख दिया गया है । वस्तुत: बात यह है कि बृहदारण्यक उपनिषद् में विहित अश्वमेघ उपासना में अश्व की प्रजापति के रूप में उपासना की जाती है । 'इस पवित्र अश्व का शिर उषा है' इत्यादि से इस प्रजापति स्वरूप अश्व का वर्णन वहा मिलता है । अश्वमेध को विज्ञानसमत व्याख्या प्रस्तुत करने के लिये यहाँ अश्व ( प्रजापति ) का दार्शनिक स्वरूप बताया गया है । कर्म के अंगभूत पशु के अव-यवो का संस्कार किया जाता है, उसी तरह से यहा प्रजापति के अगो की कल्पना कर उनका सस्कार किया आता है । पशुओ में काल, लोक और देवतात्व का अध्यारोप इसी प्रजापतीकरण प्रक्रिया का अग है कि यह अश्व उसी तरह से प्रजापति का प्रतिनिधि है, जैसे कि प्रतिमा प्रभृति में विष्णु, शिव आदि बुद्धि का अध्यारोप किया जाता है । ये सब बातें वहा के शाकर भाष्य में स्पष्ट रूप से बताई गई है । उषा काल को प्रजापति का शिर बताया गया है । शिर शरीर के सभी अगो मे प्रधान होता है, उसी तरह से उषा काल ( ब्राह्म मुहूर्त ) भी सारे दिन में प्रधान माना जाता है । सूर्य इसका चक्षु, पवन प्राण और वैश्वानर अग्नि इसका खुला हुआ मुँह है । सुख का अधिपति देवता अग्नि को ही माना गया है । संवत्सर इसकी आत्मा, अर्थात् श्रुति के अनुसार इसका मध्य भाग है । द्युलोक पृष्ठ भाग, अन्तरिक्ष उदर और पृथिवी इसका पैर रखने का स्थान है । चारो दिशाएँ इसके दोनों पार्श्व है । इन दोनो पावों से सभी

पृष्ठ 789

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 789 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थणरिजात १६८७ सर्वमुखत्वोपपत्त्या पार्श्वभ्या सर्वदिशा सम्बन्धात् । अवान्तरदिश आग्नेय्यादयः दर्शव पार्श्वस्थानीयानि, ऋतवोऽङ्गानि । मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाणि सन्धय । अहोरात्राणि प्रतिष्ठा, प्रतितिष्ठत्येतैरिति प्रतिष्ठा पादा: । नक्षत्राण्यस्थीनि । नभो नभःस्था मेघा मासानि, उदकरुधिरने चनसामान्यात् । अवन्ध्यमुदरस्थमजीर्णमशन सिकता, विश्लिष्टावयवत्वसामान्यात् । सिन्धवो नद्य, गुदा नाड्यो यकृच्च क्लोमानश्च हृदयस्याधस्ताद्दक्षिणात्तरी मासखण्डी पर्वता काठिन्यादुच्छ्रितत्वाच्च । ओष-धय क्षुद्रा स्थावरा. वनस्पतयोऽश्वत्यादय । लामानि केशाश्च उद्यत् उद्गच्छन् पविनाऽस्य पूर्वार्धो नाभेरूध्वं निम्लोचन्नमस्त गच्छन् अपराधः । यद्विधुनुने गात्राणि कम्पयति तत्स्तनयति गर्जति यन्महति तद्वर्षति वागेव वागित्यादिस्तत्रत्य. शाङ्करभाष्यसार । तथा चाश्वमेधीयोऽश्वोऽत्र प्रजापतिरूपत्वेन यजमानपत्नीभिः प्रार्थ्यते । न मृतेनाश्वेन संभोगादिक काम्यते, असम्भवादविहितत्वाच्च । ' अश्व त्रिस्त्रि. परियन्ति पितृवन्मध्ये गणाना प्रियाणा निधीनामिति' ( का० श्रो० सू० २०१६| १३ ) इति कात्यायनमहष्युक्तरीत्या सर्वा पत्न्य पान्नेजनहस्ताः प्राणशोधनात् प्राग अश्व त्रिवि परियन्ति । पितृवद् अप्रदक्षिणं सकृन्मन्त्रेण द्विस्तूष्णीम् ॥ तत प्रियाणा-परियन्ति त्रिस्त्रिभिर्मन्त्रैरर्थात् प्रथम गणानामिति त्रि प्रदक्षिण परियन्ति ।तत्र मित्यप्रदक्षिण त्रि, निधोनामिति प्रदक्षिणम् । एवं नवकृत्त्रोऽश्वपरिक्रमणम् । परिक्रमणं च पूजनमेव भवतीति सर्वो जानाति । त्रीणि यजुषि लिङ्गोक्तदेवत्यानि । अतोऽत्र प्रजापतिरूपोऽश्वो देवता । मन्त्रार्थस्तु -हे अश्व प्रजापते, गणपति गणाना मध्ये गणपति गणरूपेण पालकम् । नहि मृतोऽश्व. पालक. सम्भवति । गण्यन्ते ये ते गणा. स्त्रीगणा देवगणा महदादिगणा वा तेषा प्रजापति पालको भवत्येव । प्रियाणा वल्लभाना प्रेमास्पदाना मध्ये प्रियपति प्रियस्य पालक निधीना रत्नादिसुखतत्साधन-निधीना मध्ये निधिपति सुखपालकं त्वा हवामहे । नह्येतत्सर्वं मृतेऽश्वपशौ सम्भवति, किन्तु पूर्वोकश्रुत्यनुसारेण शालग्रामे दिशाओ का सम्बन्ध रहता है, क्योंकि इनका मुँह चारो दिशाओ मे फैला रहता है । आग्नेय प्रभृति विदिशाएँ इसकी पसलियाँ है, जो कि ऋतुओ का प्रतिनिधित्व करती है । मास और अर्धमास इनकी सन्धियाँ है । अहोरात्र इसके पैर है । नक्षत्र अस्थियाँ हैं । आकाश मे विद्यमान मेघ इसके मास के समान है, क्योकि मास मे जैसे रुधिर समाया रहता है, उसी तरह से मेघ मे जल समाया रहता है । पेट ,मे विद्यमान बिना पचा हुआ अन्न सिकता ( बालू ) के समान है । भिन्धु गुदा के समान है । जिगर और तिल्ली पहाडो के समान हैं क्योकि स्पर्श मे ये कठोर और उभडे हुए होते है । ओषधि और वनस्पति अर्थात् पेड- पौधे इसके लोम और केश है । उगता हुआ पूर्वा निर्माणका सूर्य इसकी नाभि से ऊपर के भाग का निर्माण करता है और अस्ताभिमुख अपराह्न का सूर्य इसके नाभि से नोचे के भाग का लगता करता है । जब यह अपने अगो को कँपाता है, तो उससे मेघगर्जना होने लगती है । जब यह लघुशंका करता है, तो पानी बरसने है । स्वय वाग्देवता ही इसकी वाणी है । उक्त बृहदारण्यक श्रुति का यह शाकर भाष्य है । इस तरह से यह अश्वमेधीय अश्व प्रजापति के रूप में ही यजमान पत्लियो के द्वारा उपासित होता है, मृत अश्व के साथ नहीं है । 'अश्वं त्रि.'संभोग आदि की बात यहां उठती हो नहीं, क्योकि एक तो यह असम्भव है, दूसरे इस तरह का विधान भी कही बार प्रदक्षिणा करती है । इत्यादि कात्यायन के वचन के अनुसार यजमान की सभी पत्नियाँ पंखा हाथ में लेकर अश्व की तीन तीन समय मन्त्र का उच्चारण अर्थात् पहले 'गणाना त्वा' इस मन्त्र का उच्चारण कर तीन प्रदक्षिणा करती हैं, इनमें से पहलो प्रदक्षिणा करतेत्वा' इन मन्त्रो का भी इसी किया जाता है और शेष दो प्रदक्षिणाएँ चुपचाप की जाती हैं । इसी तरह से 'प्रियाणा त्वा' और 'निधीना । परिक्रमा पूजन का हीतरह से उच्चारण करते हुए तीन तीन प्रदक्षिणाएं की जाती है । इस तरह से ये नौ परिक्रमाएँ पूरी होती है देवता है । पूरे मन्त्र का,एक अंग है इस बात को सब कोई जानते हैं । इस तरह से इन तीन यजुर्मन्त्रो का प्रजापति रूप अश्व ही हुआ घोडा किसी की ------ -, अर्थ इस प्रकार होगा हे प्रजापति स्वरूप अश्व गणो के मध्य में गण के रूप में आप सब के पालक है । मरा होती है । इन सब रक्षा नही कर सकता । गण शब्द गिनती के अर्थ में है । स्त्रीगण, देवगण, महदादिगण आदि में उन उन की गिनती गणो के प्रजापति पालक है । यह प्रजापति अपने परम इष्ट प्राणियों के बीच मे उनका पालक माना है और रत्न आदि नाना प्रकार के सुख-साधनो के बीच में उन सब निधियों का स्वामी माना जाता है । ऐसे प्रजापति को हम अपने इस पवित्र यज्ञ मे बुलाते है । ये सब

पृष्ठ 790

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 790 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः १६८८ विष्णुरिवाश्वमेधीयोऽश्वः प्रजापतिरेव प्रार्थ्यते सम्बोद्धयते च । हे वसो वसुरूपाश्व । बृहदारण्यकश्रुत्यनुसारेण अश्वस्य पृथिव्यादिरूपत्वात् । मम पतिस्त्व भूया. । प्रजापतिश्च सोपाधिकः परमेश्वर एवेत्यश्वद्वारा स परमेश्वर एव पतित्वेन प्रार्थ्यते । नह्यश्वस्तस्य मृतत्वात् । तदीयाङ्गानि च शोधितानि । 'प्रक्षालितेषु शोधितेषु महिष्यश्वमुपसविशन्त्याहमजानीति' ( का ० सू० २०१६ | १४ ) इति सूत्रात् प्रक्षालितेषु शोधितेषु श्री० पशूना प्राणेषु पत्नीभिरध्वर्युणा यजमानेन प्राणशोधने कृते महिषी अश्वसमीपे शेते । हे अश्व, गर्भधं गर्भधारक रेतः अहम् आ अजान आकृष्य क्षिपामि । अज गतिक्षेपणयोः । त च गर्भध रेतः आ अजासि आकृष्य क्षिपसीति महीधरभाष्याभिप्रायः । अयमेवाभिप्रायः सायणोव्वटयोरपि, अयमेव च कात्यायनमहर्षे, शतपथादिब्राह्मणानामपि च । - यत्तु —' ता उभौ चतुरः चतुरः पद ' इति मन्त्रस्य ' अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते, महिषी स्वयमेवाश्वशिश्नमाकृष्य स्वयोनौ स्थापयति ' ( पृ० ३७२) इत्युक्तम्, न केवल दयानन्देन किन्तु चार्वाकेणापि -' अश्वस्यात्र हि शिश्न तु पत्नीग्राह्यं प्रकार्तितम्' इत्युक्तम् ॥ कैश्चित्सामाजिकैस्त्वेतेन पातिव्रत्यभङ्गोऽपि शङ्कित, परन्तु नियोगेनैकादश सख्याकैः पुरुषर्यथेच्छसन्तानोत्पादनै- विधवाविवाहैश्च पातिव्रत्यं परिपाल्यते । तद्रीत्या दयानन्देन तदनुयायिभिश्च शतपथवचनानि वेदार्थनिकषतया तत्र तत्रोद्धृतानि । सायणोव्वटमहीधरैस्तु कातीयश्रौतसूत्रवचनानि शतपथवचनानि चानुसृत्यैव मन्त्रार्था लिखिताः । पत्न्यः परियन्तीत्यत्र न सामान्यत्रियो गृह्यन्ते, किन्त्वश्वमेधयजमानस्य राज्ञः पत्न्यो गृह्यन्ते । 'तस्मिन् एनमधि संज्ञपयन्ति । संज्ञप्तेषु पशुषु पत्न्यः पान्नेजनैरुदायन्ति । चतस्रश्च जायाः । कुमारी पञ्चमी । चत्वारि शतानि अनुचरीणाम्' । ( श ० १३/५/२/१ ) इति श्रुते । हरिस्वामिरीत्या गणानां त्वेति मन्त्रेण सकृदेव सर्वाः पत्न्योऽश्वं परियन्ति परिभ्रमन्ति । अपह्नवते विस्मरन्त्येवास्मै एतत्प्रदक्षिणावर्तनेन संज्ञपनमुन्नयन्तीत्यर्थः । अपि वाऽविस्मृतमपि निह्नवन्ति क्षमयन्ति च वस्तुएँ मरे हुए यज्ञीय अश्व से नही माँगी जा सकती, किन्तु पूर्वोक्त श्रुति के अनुसार अश्वमेधोय अश्व मे प्रजापति की बुद्धि रखकर उसी से प्रार्थना की जाती है, जैसे कि शालग्राम शिला में विष्णु बुद्धि रख कर उससे मनोवांछित फल माँगा जाता है । है वसुस्वरूप अश्व! बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार इस प्रजापति अश्व का स्वरूप पृथिवी से भी बना है, अतः उससे प्रार्थना की जाती है कि तू ही मेरा पति है । सोपाधिक परमेश्वर ही प्रजापति है, अत इस प्रजापति अश्व के माध्यम से परमेश्वर से ही प्रार्थना की जाती है कि आप मेरे पति होनें, अश्व से यह प्रार्थना नही की जा सकती, क्योंकि वह तो मर चुका है । उस अश्व के अंगो की वेद मन्त्रो से और जल से शुद्धि कर दी गई है । महीधर के भाष्य का इतना ही अभिप्राय है । सायण, उव्वट प्रभृति ने भी यही अर्थ किया है और यही अर्थ महर्षि कात्यायन तथा शतपथब्राह्मण समत भी है । 'ता उभी' इस मन्त्र का महीघर संमत अर्थ लिखते हुए स्वामी दयानन्द ने कहा है कि ' यजमान की स्त्री घोडे के लिंग को पकड कर आप ही अपनी योनि में डाल लेवें' ( पृ० ३७२ ) । यह बात केवल दयानन्द ने ही नही, चार्वाको ने भी कही है कि 'वेद में घोडे के लिंग को पत्नी के द्वारा पकड़ने लायक माना गया है ।' कुछ बार्यसमाजी तो इसमें पातिव्रत्य के भंग की आशंका भी व्यक्त करते हैं । ये लोग नियोग के माध्यम से ग्यारह पुरुषो से मनमानी सन्तान पैदा करके और विधवा विवाह करके पातिव्रत्य का अच्छा पालन करते है! स्वामी दयानन्द ने और उनके अनुयायियो ने इस तरह के प्रसंगो में शतपथ ब्राह्मण के वचनो को अर्थ की कसौटी के रूप मे माना है, किन्तु उनको यह बात याद रखनी चाहिये कि सायण, उब्वट, महीधर प्रभृति आचार्यों ने अपना भाष्य कात्यायन श्रीत- सूत्र और शतपथ ब्राह्मण के वचनो के आधार पर ही किया है । 'पत्न्यः परियन्ति ' इस शतपथ वाक्य मे सामान्य स्त्रियों की चर्चा न होकर अश्वमेघ यज्ञ के यजमान राजा की पत्नियों को चर्चा है । 'पशुओं का संज्ञपन हो जाने के उपरान्त पंखा हाथ में लिये यजमान पत्नियाँ परिक्रमा करती है । इनमें राजा की चार पत्नियाँ, एक कुमारी और इनके साथ चार सो दासियाँ रहती है' ऐसा शतपथ ब्राह्मण में वर्णन है । हरि स्वामी के मत के अनुसार 'गणानां त्वा' इस मन्त्र से सब पत्नियाँ एक बार ही अश्व की परिक्रमा करती है । इस प्रदक्षिणा के माध्यम से वे पत्नियाँ उस घोडे के संज्ञपन को एक प्रकार से छिपा देती है । अथवा इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि इस तरह से ऋत्विक् और यजमान इस विशसन