वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 81–90

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 81–90

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वार्थपारिजातः ६८१ धर्ममर्षस्य तत्रानुल्लेखात् । न खलु चौरादिनामनिर्देश मात्रेणाराजकता कल्पयितु शक्या, समेषां रुद्ररूपत्वेन नमस्करणीयत्वेन वर्णनात् । नहि शोषका शासका विरोधिनामान्दोलनकारिणामातङ्कवादिनानान्दोलनविरोधादि- -, सञ्चूर्णनानन्तर तेभ्यो नमन्ति वा नमस्करणीय वेन स्तुवन्ति । त्रिशेऽध्याये तु पुरुषमेधसज्ञको यज्ञ उक्त ब्राह्मण- क्षत्रिययोरतिष्ठाकामयोस्तद्विधानात् । सर्वभूतान्यतिक्रम्य स्थितिरतिष्ठा । अत्र त्रयोविंशतिर्दीक्षा भवन्ति द्वादशोपसदः पच सुत्या इति चत्वारिंशद्दिने पुरुषमेध सम्पद्यते । यूपैकादशिनीपक्षे एकदशाग्नीषोमोया. पशवो भवन्ति तेषा च प्रतियूप मध्यमे वा यूपे यथेच्छं नियोजनम् । आज्येन सकृद्गृहीनेन देवपक्तिरिति च तिल आहुतीराहवनीये जुहोति । ब्रह्मणे ब्राह्मणमित्यारभ्याध्यायसमाप्तिपर्यन्त ब्राह्मणादीनष्टचत्वारिंशत्सख्यान् पुरुषान् यूपे नियुनक्ति । अत्र समेषामुत्सर्गो भवति । चतुर्थ्यन्त देवतापदम् । नात्र सङ्करजातीयानामेव नियोजनम्, ब्रह्मणे ब्राह्मण क्षेत्राय राजन्य मरुद्भ्यो वैश्य तपसे शूद्रमिति ब्राह्मणादिवर्णानामपि नियोजनदर्शनात् । तत्र ब्रह्मणे देवाय जुष्टमभिरुचित ब्राह्मण नियुनज्मि, तथैव क्षत्राय क्षत्रसज्ञाय देवविशेषाय राजन्य क्षत्रियम्, मरुद्द्भ्यो देवेभ्यो वैश्यम् । एवं तपस्नमोनारकपाप्मा-ऽक्रयकामातिक्रुष्टादयोऽपि देवविशेषा एव, तदुद्देश्येनैव तत्तत्पुरुषाणा नियोजनात् ॥ न च तेषा देवत्वे मानाभाव:, ,प्रकृतमन्त्राणामेत्र तत्र मानत्वात् । नह्यत्र जातिगणना विवक्षिता अविहितत्वादप्रकृतत्वान्निरर्थकत्वाच्च । यथा षोडशाध्याये मन्त्राणा प्रामाण्यादेव रुद्ररूपेभ्यस्तद्भावापन्नेभ्यस्तेभ्यस्तेभ्यो रुद्रमन्य्विषुबाहुशिवाघोरतनुबाह्वादिभ्यो वञ्चक-स्नायु तस्करादिभ्यश्च नमनम्, तथैव त्रिशेऽध्याये तत्तद्देवतोद्देश्येन तेषां तेषा पुरुषाणां नियोजनम् । तत्र वर्ग-सङ्घर्षविरोधप्रतिरोधादिकल्पनं सर्वथा निर्मूलमेव । यथा ब्राह्मणादिशब्दाना प्रसिद्धा एवार्था गृह्यन्ते तथैव मागधादि- शब्दानामपि लोकशास्त्रप्रसिद्धा एवार्था ग्राह्याः । ततो महीधरेण सम्यगेवोक्तम्--मागघ मगधदेशजं क्षत्रियाया वैश्य- उठाई गई व्यर्थ की कल्पनाओ का समर्थक तो एक भी पद रुद्राध्याय मे नही दिखाई पड़ता, क्योकि वहाँ व्रात्य आदि से ब्राह्मणो के धार्मिक संघर्ष का कोई उल्लेख नहीं है । केवल चोर आदि का नाम आ जाने मात्र से अराजकता की कल्पना नही की जा सकती, क्योकि ये सब रूद्र के ही रूप है, अत एव वन्दनीय है, इतनी ही बात वहाँ बताई गई है । शोषण करने वाले शासक विरोधी आन्दोलन करने वालो और आतंक फैलाने वालो के आन्दोलन और विरोध को दबा देने के बाद उनके सामने न तो झुकते है और न वन्दनीय के रूप मे उनकी स्तुति ही करते है । तीसवे अध्याय में पुरुषमेध नामक यज्ञ का वर्णन है, जिसका कि विधान अविष्ठा की कामना वाले ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिये है । अतिष्ठा शब्द का अर्थ सभी प्राणियो के ऊपर की स्थिति है । २३ दिन की दीक्षा १२ दिन का उपसद और ५ दिन की सुत्या, इस तरह से वह पुरुषमेध ४० दिन में सम्पन्न होता है । एकादश यूप ( यज्ञ स्तम्भ ) के पक्ष में ग्यारह अग्नीषोमीय शु होते है । इनमे से प्रत्येक का एक-एक यूप मे अथवा बीच के यूप में इच्छानुसार नियोजन होता है । एक बार घृत लेकर ' देव सवित ' इस मन्त्र से तीन आहुतियाँ आहवनीय अग्नि में दो जाती है । ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम्' यहाँ से लेकर अध्याय की समाप्ति तक ब्राह्मण प्रभृति अडतालीस पुरुषो का यूप में नियोजन किया जाता है । यहाँ बाद में उन सबको छोड़ दिया जाता है । चतुर्थ्यन्त पद देवता का बोधक है । यहाँ केवल सकर जातियो का ही नियोजन नही किया जाता, अपि तु ब्रह्म के लिये ब्राह्मण का, क्षत्र के लिये राजन्य का, मरुतो के लिये वैश्य का और तप के लिये शूद्र का भी नियोजन विहित है । यहाँ वर्णित तप, तम, पाप्मा आदि भी देवविशेष हो हैं, क्योकि उन्ही को उद्दिष्ट कर यहां उन-उन पुरुषो का नियोजन विहित है । ये देवता है, इसमे कोई प्रमाण नही है, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योकि प्रकृत मन्त्र ही इस बात में प्रमाण है । यहाँ जातियो की गणना नही की गई है, क्योंकि उनका यहाँ न तो कोई विधान है, न प्रकृत मे कोई उपयोग ही है और यहाँ उनको कोई प्रयोजन ही है । जैसे सोलहवें अध्याय में मन्त्रों के प्रभाग पर ही रुद्रस्वरूप एव उन-उन मन्यु ( क्रोध), इषु ( बाण ), बाहु, शिव तनु ( शरीर ), अघोर तनु, बाहु आदि शिव के विभिन्न भावों और अवयव आदि को तथा वंचक, चौर, तस्कर आदि को नमस्कार किया गया है, उसी तरह से तीसवें अध्याय में भी उस उस देवता को उद्दिष्ट कर उन -उन पुरुषों का वियोजन किया गया है । यहाँ वर्गों के परस्पर संघर्ष, विरोध, प्रतिरोध आदि की कल्पनाएं सर्वथा निराधार हैं । जैसे ब्राह्मण प्रभृति शब्दों का प्रसिद्ध अर्थ हो यहाँ गृहीत है, उसी तरह से मागघ प्रभृति शब्दो का भी लोक और शास्त्र में प्रसिद्ध अर्थ हो किया

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वेदार्थपारिजातः ९८२ पुंसो जातं वा । सङ्गतयोऽप्यत्र मन्त्रानुसारेण ज्ञेयाः, यज्ञादिकर्मणां शास्त्रकगम्यत्वात् । 'ईशानं मन्युनाकश्चिन्नियमो-' ( वा ० स ० ३ ९ ८ ), 'महादेवस्य यकृत् (वा० सं ० ३ ९।९ ) इतीशान महादेवशब्दयोरपि रुद्रस्यैव वोधकत्वात् । नात्र ऽस्ति, येन सर्वैविशेषणैः सर्वसङ्करनामभिश्चैकत्रैव भाव्यम, तस्मादेतैर्हेतुभिस्तत्तदध्याय रचनाकाल निर्धारणेनोत्पत्ति-साधन निरालम्बनमेव, इषेत्वादि खंब्रह्मान्तस्य सर्वस्यैव विवस्वद्दृष्टत्वेनापौरुषेयत्वोक्तः । यदपि –'अथर्वणे वन्ध्याया वलिः' इत्यादिकम्, तदपि मोहमूलक मेव, प्रकृते सर्वेषा पशूनामुत्सर्गविधानात्, वधाऽविधानाच्च । त्रिंशाध्यायनिर्माणकालेऽथर्वसूक्ताना विद्यमानत्वसाधन तु सिद्धसाधनमेव, वैदिकै. समस्तवेदानामपि नित्यत्वेन सर्वदा सत्त्वाम्युपगमात् ॥ माध्यन्दिनपाठे ' इमं देवा असपत्न सुवध्व महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय सर्वनाम्ना निर्देश. । ' ( ) इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा ॥ वा० स० १७ १८ इति राज्ञोऽभिषेककाले मन्त्राणा काण्वपाठे तु ( १ ९।३-३ ) हे कुरवः हे पश्चाला अयं ते राजा इत्युक्तम् । एतेन कुरुप वालसमृद्धिकाल एवैषा निर्माणकालो ज्ञायते । तथैवाश्वमेधयज्ञप्रसङ्गे महिषी काम्पीलवासिन्याः कस्याश्चित्सुभद्राया नाम गृह्णाति - 'सुभद्रिकां काचित्तदीय- काम्पीलवासिनीम्' ( वा० स० २३ | १८ ) इति । काम्पील इति पश्चालदेशीयस्य नगरस्य नाम । सुभद्रानाम्नी जनपदराज्ञो राज्ञी आसीत् । अश्वमेधकर्तुः पट्टमहिषी कथयति - यद्यहमस्याश्वस्य शयनं नागच्छामि, तदाश्वमेधफल काम्पीलजनपदराज्ञो भविष्यति । तेन पट्टमहिषी कुरुदेशीयराज्ञः पत्नीति निर्धार्यते । तत्रैवाम्विकाम्बालिकानामनिर्दे- शोऽपि विधीयते । यदि ते कुरुराज्ञः पत्न्यौ स्याता तदा महाभारतीयाना धृतराष्ट्रपाण्डवादीना मातरौ भवेताम् । हुआ अथवा क्षत्रिया स्त्री मे वैश्य जायगा । इस तरह से महीधर ने ठीक ही लिखा है कि मागध शब्द का अर्थ मगध देश मे उत्पन्नयज्ञ यागादि की पद्धति केवल शास्त्र पुरुष से पैदा हुआ व्यक्ति है । मन्त्र के अनुसार ही इस प्रकरण की सद्धति बैठानी चाहिये, कोईक्योकिनियम नही है कि किसी देवता के सभी से ही जानी जा सकती है । ईशान और महादेव शब्द भी केवल रुद्र के ही बोधक है । यह से उन उन अध्यायो की विशेषण या संकर जातियो के सभी नाम एक साथ ही रहने चाहिये । इसलिये इस तरह के हेतुओ की सहायता'खं ब्रह्म' पर्यन्त सभी मन्त्र रचना का समय निर्धारण करना सर्वथा निरर्थक है, क्योकि माध्यन्दिन सहिता के ' इषे त्वा ' से लेकर सूर्य के द्वारा परिदृष्ट होने से अपौरुषेय ही माने जाते है । 'वन्ध्या स्त्री की बलि अथर्वन् के लिये बताई गई है' ( पृ० १०१ ) यह कथन भी अज्ञानमूलक ही है, क्योकि प्रकृत प्रकरण सूक्तो की सत्ता थी' में किसी की बलि नहीं दी जाती, सभी का उत्सर्ग कर दिया जाता है । 'तीसवें अध्याय की रचना के समय अथर्व पर उनकी सदा ही (पृ० १०२) इस कथन मे भी सिद्धसाधन दोष है, क्योकि वैदिको को दृष्टि से तो समस्त वेदो को नित्यता के आधार सत्ता मानी जाती है । 'आरंभ के अध्यायो में विशेषतः दो ऐसे अंश है ", जो उनकी रचनाकाल का संकेत करते है । इनमे से पहला केवल काण्व पाठ में पाया जाता है और उसमें राजा के अभिषेक के समय का विवेचन है । माध्यन्दिन पाठ में उसका मूल पाठ इस प्रकार है- में इस प्रकार कहा गया हे अमुकनामा, यह तुम्हारा राजा है । यहाँ सर्वनाम 'अमी ' का ही प्रयोग किया गया है, किन्तु काण्व पाठकर्म को करने वाली महिषी,,, हे कुरुओ हे पंचालो यह तुम्हारा राजा है । दूसरा अंश अश्वमेध यज्ञ के संबन्ध में आता है । इस रहा है या राजा को पटरानी कहती है- हे अम्बा, हे अम्बिका, हे अम्बालिका, मुझे बलात् कोई ( इस अश्व के पास) नही ले जाके साथ ( किन्तु यदि मैं अपनी इच्छा से न जाऊं) तो यह अश्व काम्पील में निवास करने वाली सुभद्रा जैसी किसी दूसरी दुष्ट स्त्री सोवेगा । काम्पील, पंचाल में एक नगर है । अत एव सुभद्रा उस जनपद के राजा की रानी रही होगी और रानी इस कर्म को करने के लिये प्रस्तुत नही होती, तो ऐसा माना गया है कि अश्वमेघ का फल काम्पील जनपद के राजा को मिलेगा । यदि हम महिषी को कुरु देश के राजा की पत्नी मानें - और अम्बिका तथा अम्बालिका नाम इस संबन्ध में वस्तुतः महाभारत में धृतराष्ट्र और पाण्डु

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वेदार्थपारिजातः ६८३ कुरवः पञ्चाविरुद्धयन्ते स्म । तद्वैमनस्यमेव महाभारतीययुद्धरूपेण परिणतम् । तेनाय मन्त्रोऽव्यायो वा तैत्तिरीय- ब्राह्मणसमकालं पञ्चालदेशे निर्मितः । राजसूययज्ञप्रसङ्गे माध्यन्दिनपाठे ( वा० स ० १० | २१ ) अर्जुनशब्दो लभ्यते, काण्त्रपाठे फाल्गुनशब्दः । एतेनानि कुरुपाञ्चालेषु प्रसिद्धस्य वीरस्य पार्थस्यैव सूचकावेतौ शब्दाविति विज्ञायते 1। इन्द्रावतारभूतोऽर्जुन इति मन्त्रयोरनयो पश्चालदेशेऽर्जुनोत्पत्त्यनन्तरमेव समुत्पत्तिः कल्पयितुं शक्यते । ( पृ० १०२- १०४ ) इति । तदेतत्सर्वमपि कुशकाशावलम्बनमेव, मन्त्रार्थानवगमात् दुर्भावनामूलत्वाच्च । तथाहि -अभिषेकमन्त्राणा समेषामास्तिकानां क्षत्रियाणां राज्ञामभिषेक उपयुक्तत्वात् सर्वनाम्ना निर्देशो युक्त एव । काण्वपाठे ' कुरव:' इत्यादि- प्रजाविशेषनिर्देशस्तूपलक्षणमेव ज्ञातव्यम् । यथा बालकाना बुद्धौ गणिताद्यवताराय आख्यायिकारूपेण व्यक्तिविशेषो बोध्यते, रामनगरनिवासिना रामदत्तेन पञ्चरूप्यकैः सेटकत्रयमन्न क्रीतं तर्हि लक्षरूप्यकेः कियदन्नं लप्स्यते । अत्र सुखावबोधार्थाख्यायिका न व्यक्तिविशेषबोघपर्यवसायिनीति, तद्वत् प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । तथैव अम्बे अम्बिके अम्बालिके इति सम्बोधनान्यपि पट्टमहिष्यादीना परस्परकर्तृकाणि, अश्वमेघस्य तत्तदधिकारिकर्तृकत्वेन देशकालव्यक्तिविशेष- निष्ठत्वाभावात् । सुभद्रापदमपि न व्यक्तिविशेषपर्यवसायि, किन्तु सुलक्षणानारीपर्यवसायि । काम्पीलवासिनीपदेनापि सुभगाः सुरूपा विदग्धा विनीता नार्यो लक्ष्यन्ते, तथैवोव्वटमहीघराम्या व्याख्यातत्वात् । तथा च हे अम्बे अम्बिके अम्बालिके, न कश्चन मामश्व प्रति नयति । तर्हि किमर्थं गम्यत इति तत्राह - अश्वकः कुत्सितोऽश्वः प्रजापतिरूपत्वा- दकुत्सितोऽप्यश्व ईर्ष्यया कुत्सित उच्यते । कुत्सिता सुभद्रा सुभद्रिका सापीर्ष्यया कुत्स्यते । मदगमने तामादाय स सप्तिः की माताओ के नाम के रूप में आये भी है- तो हम संभवत: यह अनुमान कर सकते हैं कि कुरु लोग पंचालों से वैमनस्य रखते थे । संभवत यह वैमनस्य को भावना उस समय धुआं रही थी, किन्तु महाभारत के महाकाव्यीय आख्यान मे युद्ध के रूप में प्रज्वलित होकर भडक उठी । जो कुछ हो काम्पील का उल्लेख यह प्रदर्शित करता है कि यह मन्त्र या सम्पूर्ण अध्याय ( तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण का समरूप अश) पंचालो के देश मे रचा गया । राजसूय यज्ञ के प्रसंग में माध्यन्दिन पाठ मे 'अर्जुन' शब्द तथा काण्व पाठ में 'फाल्गुन' शब्द मिलता है । इससे भी कुरु- पंचालो में प्रसिद्ध वीर के सूचक ही ये शब्द है, ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है । यह संबन्ध इस तथ्य से भी सिद्ध है कि आख्यान में इन्द्र के इन नामो का प्रयोग पाण्डवो के प्रधान वीर के लिये किया गया है, जिसे प्रमुख रूप से इन्द्र का अंश माना गया है । अत: यह कहा जा सकता है कि पचाल देश में अर्जुन की उत्पत्ति के बाद ही इन मन्त्रो की रचना हुई' (पृ० १०२-१०४ ) । यह सारा कथन भी कुश और काश का सहारा लेने के समान है, क्योकि बेवर न तो मन्त्रो का अर्थ ही ठीक से समझ पाये है और साथ ही भारतीय शास्त्रो के प्रति द्वेष की भावना भी इसकी जड में है । अभिषेक.मन्त्रो का सभी आस्तिक क्षत्रिय राजाओ के अभिषेक के समय उपयोग होता है, अतः यहाँ सर्वनाम शब्द का प्रयोग उचित ही है । काण्व पाठ में कुरु देश की प्रजा का विशेष रूप से उल्लेख विषय को सरलता से समझाने के लिये है । जैसे बच्चो को गणित समझाने के लिए व्यक्तिविशेष से संबद्ध कहानी गढ़ ली जाती है कि रामनगर के रहने वाले रामदत ने पाँच रुपये से तोन सेर अन्न खरीदा तो बताओ कि एक लाख रुपये से कितना अन्न खरीदा जायगा । यहाँ यह कहानी विषय को सरलता से समझाने के लिये है, इससे रामनगर या रामदत्त की सत्ता , |,,नही मानी जाती उसी तरह से प्रकृत मे भी समझना चाहिये अम्बे अम्बिके अम्बालिके ये संबोधन भी राजाओ की पटरानियो के लिए परस्पर वार्तालाप के लिये प्रयुक्त है । अश्वमेध यज्ञ को अधिकारी राजा करते रहे है, अतः इनका भी किसी देश या काल के व्यक्ति से कोई संबन्ध नही बन पाता । सुभद्रा पद भी यहाँ किसी व्यक्तिविशेष का बोधक न होकर सुलक्षणा नारी के लिये प्रयुक्त है । 'काम्पील वासिनी' इस पद से भी सौभाग्यशालिनी, सुन्दर, चतुर और विनयशील नारी का बोध होता है । उच्चट और महीधर ने यही व्याख्या की है । ऊपर उद्धृत मन्त्र का वास्तविक अभिप्राय यह है -हे अम्बे, हे अम्बिके, हे अम्बालिके, मुझे कोई जबर-दस्ती घोडे के पास नही ले जाता । तब तुम क्यो उसके पास जाती हो? इसीलिये कि यह कुत्सित घोडा, घोड़ा यद्यपि प्रजापति का प्रतीक हैं, तो भी ईर्ष्या से भरा होने से वह कुत्सित कहलाता है, और कुत्सित सुभद्रा, इसको भी ईर्ष्या से भरी हाने से कुत्सित कहा गया

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वेदार्थपारिजातः II तत्रत्यानां नारीणा वैदग्ध्य-: शेते शयिष्यते । कीदृशी काम्पीलवासिनीम् । काम्पीलनगरे वसतीति काम्पीलवासिनी ता.,,सौरूप्यसौभाग्यविनम्रत्वादिभि प्राशस्त्यप्रसिद्धे । यथा शिक्षाया रङ्गप्रयोगे सौराष्ट्रनारी उदाह्रियतेयथा शालग्रामोकविता कामिन्यश्च काश्मीरत्वेन प्रशस्यन्ते तद्वत् । अश्वमेत्रीयः प्रजापतिरूपोऽश्व पतिरूपेणोपास्यते न विष्णुर्बुद्धयते, अनुरागातिशयेन स सेव्य इति बहुवल्लभत्वकल्पनया स च सा च कुत्स्यते राज्ञो। सर्वमेतद्भावनामयमहिषी कुरुराजपत्नी , बाह्यम् अश्वस्य वाह्यदृष्ट्या मृतत्वात् । अत पश्चालदेशीया सुभद्रिका तज्जनपदीयस्यैकस्य तदसम्भवात् ।, 'च पट्टमहिषी कुरुपञ्चालानां-- च विरोध इत्यादिकल्पन मौर्यमेव यज्ञफलस्य यजमानगामित्वेन यदप्युक्तम् — ' सुभद्रा पञ्चालानां प्रतिनिधिभूतस्यार्जुनस्य पत्नी, यस्या अपहरणकारणान्महायुद्धमेकमभूत्न वा इत्यादिक तदपि निर्मूलम्, अर्जुनस्य कुरुवशीयत्वे पञ्चालप्रतिनिधित्वासिद्धे । सुभद्रापि न पञ्चालसम्बद्धा द्रौपद्याः पाञ्चाली-,, काम्पीलसम्बन्धिनी किन्तु वृष्णिवशीययोर्हरिहलध रयोर्भगिनी । न च तत्सम्बन्धे महायुद्धमासीत् शोभनवस्त्रावृता त्वेऽपि न सुभद्रेति नाम । काम्पीलशब्देन श्लक्ष्णो वस्त्रविशेष उच्यत इति सायणोक्तिरपि युक्त व । तेन काण्वस हितासायण- सुभगा सुरूपा विदग्धा विनीता नारी काम्पीलवासिनी सुभद्रेति व्याख्यान युक्तमेव । महीधरस्तु भाष्यमनुसृत्यैव भाष्य करोति । - ' यत्तु राजसूयप्रसङ्गे माध्यन्दिनकाण्वपाठयोरर्जुन फाल्गुननामनिर्देशादर्जुनादर्वाचीनत्वमस्य मन्त्रस्य स्थानवाचकत्वेन ',, ' सिद्धयति इति तदपि तुच्छम् वशिष्ठविश्वामित्रादिवदर्जुन फाल्गुनादिपदस्यापि जातिवाचकत्वेन वै इत्यादि- वा वेदानादित्वाक्षतेः । अत एव- 'अर्जुनो ह वै नामेन्द्र ' ( श० ५ | ४| ३ | ७ ) इति श्रुतो 'पारीक्षितो ह । काम्पील नगर मे निवास करने वाली ।,? है मेरे न जाने पर उस सुभद्रा को लेकर सो जायगा । कैसी सुभद्रा काम्पीलवासिनी । विनम्र होती है । जैसे कि शिक्षा,,, इस नगर की स्त्रियो के लिए यह प्रसिद्ध है कि वे बडी चतुर सुन्दर सौभाग्यशालिनी और देश की बहुत प्रसिद्ध है और अभिनय के प्रसंग मे सौराष्ट्र देश की नारियो की प्रशंसा की जाती है, कविता और कामिनी काश्मीर उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । अश्वमेध यज्ञ का घोडा प्रजापति का स्वरूप है, उसकी यहाँ पति के रूप मे उपासना की जाती है, जैसे कि शालग्राम को विष्णु का प्रतिनिधि मान उसकी उपासना की जाती है । अत्यन्त अनुराग के साथ उसकी सेवा करनी चाहिये । यहाँ अनेक प्रेमियो की कल्पना कर उस अश्व की और महारानी की निन्दा भी की जाती है, किन्तु यह सब भावनामय है, तरह से व्याख्या करने पर पाश्चात्यों की ऊपरी दिखावा मात्र है, क्योकि बाह्य दृष्टि से यह घोडा बलि दे देने से मर चुका होता है । इस उसका उल्लेख कर रही है, इससे, यह कल्पना कि सुभद्रिका पंचाल देश की रानी का नाम है कुरु जनपद के किसी राजा को पट्टमहिषी है । यज्ञ का फल तो यजमान यह प्रतीत होता है कुरुओं और पंचालो मे परस्पर विरोध था, सर्वथा उनकी मूर्खता को उजागर करती को मिलता है, अतः यहाँ यह कल्पना ही नही उठ सकती कि अश्वमेघ का फल दूसरे जनपद के राजा को मिल जायगा । यह भी कहा गया है कि - 'महाभारत में सुभद्रा पंचालो के प्रतिनिधि अर्जुन की पत्नी है, एक सुभद्रा के कारण , किन्तु यह कथन भी सर्वथा (:? ) ' ( ) संभवत महाभारत में वर्णित उसके अपहरण के कारण एक महायुद्ध हुआ पृ० १०३ टिप्रतिनिधि० था । सुभद्रा भी न तो,, निर्मूल है क्योकि अर्जुन कुरुवंश का है यह किसी तरह सिद्ध नही हो सकता कि यह पंचालो का बलदेव की बहिन है । सुभद्रा पंचालो से संबद्ध है और न काम्पील नगर की रहने वाली ही है, क्योकि वह तो वृष्णिवश के कृष्ण और को लेकर कोई महायुद्ध हुआ भी नही था । द्रौपदी यद्यपि पचाल देश की है, किन्तु उसका नाम सुभद्रा नही है । काम्पील शब्द से चिकने वस्त्र का बोध होता है । सायण की यह व्याख्या ठीक ही हैं । अतः सुन्दर वस्त्र पहिने हुए सौभाग्यशालिनी सुन्दर रूप वाली चतुर नारी को काम्पीलवासिनी सुभद्रा कहा जाय, यह उचित ही है । महीवर ने भी काण्वसंहिता के सायण भाष्य की सहायता से ही अपने भाष्य की रचना की है । है, अतः यह मन्त्र 'राजसूय यज्ञ के एक मन्त्र में माध्यन्दिन पाठ में अर्जुन शब्द तथा काण्व पाठ में फाल्गुन शब्द मिलता विश्वामित्र प्रभृति शब्दो की तरह अर्जुन से अर्वाचीन काल का सिद्ध होता है' ( पृ० १०३ ) यह कथन भी तुच्छ है, क्योकिअनादितावसिष्ठ,के ऊपर कोई आक्षेप नही उठाया जा अर्जुन, फाल्गुन प्रभूति शब्द भी या तो जाति के वाचक है या स्थान के, अत वेदो की

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वेदार्थपारिजातः ६८५ - श्रुतौ च पारीक्षितजनमेजयस्यापि जातिस्थानवाचकत्वेन न क्षति । अन्यथा इन्द्रवरुणादिनामभिरपि व्यक्ति- विशेषवोध्यत्वेऽनादित्वभङ्गप्रसङ्गेन 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्ध. ( मी० सू० १ | १ | ५) इति न्यायविरोधापत्ते । सम्पूर्णोऽय मन्त्रः — 'इन्द्रस्य वज्रोऽसि मित्रावरुणयोस्त्वा प्रशाखो प्रशिषा युनज्मि । अभ्यथायै त्वा स्वधाये त्वारिष्टो अर्जुनो मरुता प्रसवेन जयापाम मनसा समिन्द्रियेण || ' ( वा० सं ० १० २१ ) इति । हे रथ! त्वमिन्द्रस्य वज्रोऽसि । युनक्ति रथदेवत्यं प्रशास्त्रोमित्रावरुणयोर्देवयो. प्रशिषा प्रशासनेन हे रथ त्वा युनज्मि योजयामि । अरिष्टोऽनुपहिंसितः, अर्जुनोऽर्जुनतुल्य इन्द्र इत्यर्थः । अर्जुनो ह वै नामेन्द्रः । एवं भूतोऽह हे रथ, त्वा त्वामव्यथायै अभयाय अचलनाय स्वधायै अन्नरसाय च त्वामधितिष्ठामि । - यत्तु — ' शतपथसम्बन्धे पाणिनिकात्यायनाभ्यामुल्लेखेन कालनिर्धारणम्, तदप्यसङ्गतम्, मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद- नामधेयमिति कात्यायनोक्तरीत्या शतपथब्राह्मणस्यापि नित्यत्वाभ्युपगमात् । शताध्यायात्मकत्वेन शतपथत्वं माध्य- - न्दिनकाण्वसम्बन्धिनोरुभयोरपि । यदपि प्रथमनवकाण्डाना प्राचीनत्वमन्तिमपञ्चकाण्डानां पश्चाद्भावित्वम् । महाभारते ( १२।११७।३४ ) शतपथे एक रहस्य ( १० ) काण्डम्, एक: सङ्ग्रह. ( ११ ) एकः परिशेषः ( १२।१३ | १४ ) इत्युल्लेखात् शतपथसम्बन्धे कात्यायनवार्त्तिके षष्टिपथनामोल्लेखाच्च षष्टिपथप्रयोगो नवकाण्डाभिप्रायेणैव द्रष्टव्यः, तत्र षष्टयध्यायोपलब्धेः । द्वादशस्य काण्डस्य मध्यमेतिनामनिर्देशान्मध्यमपदं तदेव स्वारस्य भजेत यद्यस्य मध्य- वर्तित्वं स्यात्, यदि वान्तिमात् पूर्वेषां त्रयाणां मध्यवर्तित्वं स्यात् पञ्चकाण्डमध्यवर्तित्व वा स्यात्' (पृ ० १०७ ) इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, तथात्वेऽपि पञ्चकाण्डानामर्वाचीनत्वानुपपत्तेः । कयाचिद् व्यपेक्षया कस्यचित् काण्डस्य मन्त्रस्य वा मध्यवतित्वेऽपि येषामपेक्षया मध्यमत्वं तेषा पाश्चात्त्यत्वानुपपत्तेः । सकता । इसी तरह से शतपथ श्रुति मे भी अर्जुन, पारीक्षित जनमेजय प्रभूति नाम भी जातिवाचक अथवा स्थानवाचक ही है । ऐसा न मानने पर इन्द्र, वरुण प्रभृति नामो को भी व्यक्तिपरक मानना पड जायगा और वेदो की अनादिता का तथा शब्द और अर्थ के सबन्ध को नित्य मानने वाले मीमासक मत का भी विरोध हो जायगा । ' इन्द्रस्य' इत्यादि मन्त्र का शास्त्रममत अर्थ इस तरह से है - हे रथ! तुम इन्द्र के वज्र हो । इतना कह कर देवताबुद्धि से उसको जोतता है - मित्र और वरुण नामक सब प्राणियो के प्रशासक देवताओ की आज्ञा के अनुसार हे रथ! मै तुमको जोतता हूँ, तुम मुझे किसी तरह की हानि मत पहुँचाओ और अर्जुन अर्थात् इन्द्र के समान अर्थात् इन्द्र के वज्र के समान तुम दृढ रहो । यहाँ अर्जुन इन्द्र का पर्यायवाची है । हे रथ! मै भी इन्द्र के तुल्य बनकर, तुमको किसी तरह का कष्ट न हो, तुमसे किसी तरह का भय न हो और अन्न और रस की प्राप्ति निरन्तर होती रहे, इस अभिप्राय से तुम पर चढता हूँ । आगे पाणिनि और कात्यायन के आधार पर शतपथ ब्राह्मण के रचनाकाल के निर्धारण का प्रयत्न किया गया है ( पृ० १०५ ), किन्तु यह भी असंगत कल्पना है, क्योकि कात्यायन के मत के अनुसार मन्त्र और ब्राह्मण दोनो ही वेद हैं, अतः शतपथ ब्राह्मण भी वेद होने के नाते नित्य एवं अनादि है । माध्यन्दिन और काण्व शाखा के ब्राह्मण मे सौ अध्याय होने से इन दोनों को ही शतपथ कहा जाता है । यह भी कहा गया है कि-' इसके प्रथम नौ काण्ड सर्वाधिक प्राचीन है और इसके विपरीत अन्तिम पाँच काण्डो की उत्पत्ति बाद के समय की है । महाभारत के एक उल्लेख में यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण शतपंथ में एक रहस्य (दसवीं काण्ड ) एक संग्रह ( ग्यारहवाँ काण्ड ) और एक परिशेष ( १२-१४ काण्ड) है । शतपथ नाम के संबन्ध में ऊपर उद्धृत वात्तिक में भी हम एक रचना का नाम ' षष्टिपथ' पाते है और मुझे इस विषय में कोई सन्देह नही है कि यह नाम प्रथम नौ काण्डों के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिनमें कुल मिलाकर ६० अध्याय हैं । यहाँ बारहवें काण्ड का ' मध्यम' नाम तभी सार्थक कहा जा सकता है, जब हम इसे अन्तिम काड के पहले के तीन काडो का या सभी पांचो काडों का मध्यवर्ती माने ' ( पृ० १०७ ), किन्तु यह कथन भी अकिंचित्कर है, क्योंकि ऐसा होने पर भी पांच काण्डो की अर्वाचीनता नही सिद्ध होती । किसी दृष्टि से किसी काण्ड या मन्त्र के मध्यवर्ती होने पर भी जिनकी अपेक्षा से इनमें मध्यम होने की बात कही जाती है, उनको बाद का नही माना जा सकता । १२४ 1

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६८६ वेदार्थपारिजातः — यत्तु पञ्चस्वपि काण्डेषु क्रमेण पूर्ववर्तिकाण्डापेक्षयोत्तरवर्तिनामल्पप्राचीनत्व दशमस्य काण्डस्य पूर्ववर्तिभिः काण्डैर्घनिष्ट सम्बन्धः, यतोऽत्राग्निचयनसम्बन्धिप्रमुखाचार्यस्य शाण्डिल्यस्य वहु सम्मानं प्रदर्शितम् । ( १,५ ) इत्यादिषु ततः पूर्वतनेषु काण्डेषु प्रदर्शिताना यज्ञानामुचितक्रमेण परिगणन कृत तेषा चाग्निचयनक्रियानु-रूपतोक्ता । तेषु येषामाचार्याणा नामोल्लेखस्तेषा नाम्नामन्ते 'आयन' शब्दो योजितः । एतादृशोदाहरण सप्तमे अष्टमे नवमे च काण्डे एकवारमेव केवलमायाति' ( पृ० १०८ ) इत्यादिकम्, तदपि न क्षोदक्षमम्, सर्वत्रापि ग्रन्थेषु पौर्वापर्यस्य धनिष्ठसम्बन्धस्याभ्युपगमात् । अपौरुषेयेष्वपि ग्रन्थेषु व्याख्यान व्याख्येयभावो न विरुद्धयते । तथैव पौर्वा-,पर्यविरोधात् । यथा नित्येष्वपि द्रव्येषु द्रव्यत्वस्य गुणप्रयुक्तत्व न विरुध्यते तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । केन केन पुरुषेण कस्मिन् युगे कस्मिन् कल्पे कस्मिन् मासे कस्या तिथौ के ग्रन्थाः का मन्त्रसहिताः कानि ब्राह्मणानि रचितानि केश्च साक्षिभिस्तत्सर्वं दृष्ट त्वया च तत्कथ ज्ञातमित्येतेषा प्रश्नाना समाधानमन्तरा सम्भावनामात्रेण रचनाकालासिद्धेः । ( ) -नानाविधानि चाख्यानानि सुखावबोधार्थानि सम्भवन्ति । तत्र काल्पनिक गल्प कथासु नानाविधानि देशकाल वस्तून्यतीतानागतवर्तमानानि चीयन्ते । कश्चित्तद्ग्रन्थस्य निर्माणकालनिर्धारकाणि मन्यते, अपरस्तु तेषामाख्यानानां .काल्पनिकत्वेन तानि तदक्षमाणि मन्यते । कानिचिदैतिहासिकान्यव्याख्यानान्यनैतिहासिकानि मन्यते । पाश्चात्त्या स्वार्थसिद्धयेऽनंतिहासिकान्यप्येतिहासिकत्वेन वर्णयन्ति । वेदादिग्रन्थेषु वेदाना नित्यत्वानादित्वबोधकानि वचनानि सन्ति, तान्यसम्भवान्नाभ्युपगच्छन्ति । अन्यत्र सम्भावनयापि हेत्वाभासै रचनाकालमनुमिन्वन्ति । तेन शाण्डिल्य प्रति -सम्मान प्रदर्शनं रोहिणायन सामका यन- वामकक्षायण राजस्तम्बायन-शाण्डिल्यायन-शाट्यायनिप्रभृतिनामग्रहण च न शतपथीयकाण्डानां कालभेदसाधक सम्भवति । 'पाचो काण्डो में से प्रत्येक काण्ड क्रमानुसार अपने पूर्ववर्ती काण्ड से कम प्राचीन है । दसवा काण्ड अब भी अपने पूर्ववर्ती काण्डो से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है । विशेषतः इसलिये कि इसमें अग्निचयन कर्म के प्रमुख मान्य आचार्य शाण्डिल्य के प्रति बहुत सम्मान दिखाया गया है | १/५/१ इत्यादि में इसके पूर्व के काण्डो में विवेचित सभी यज्ञो को उनके उचित क्रम मे गिनाया गया है और उन्हे अग्निचयन की अनेक क्रियाओं के अनुरूप बनाया गया है । इसमें जिन आचार्यों के नामो का उल्लेख किया गया है, उनमे अनेक नामों के अन्त में ' आयन' आता है । इस प्रकार के प्रत्यय का उदाहरण हम सातवें, आठवें और नवे काण्डो मे क्रमशः केवल एक बार पाते हैं ' ( पू० १०८ ) यह सारा कथन भी तर्क की कसौटी पर ठीक नही उतरता, क्योकि सभी ग्रन्थो मे पूर्वापर प्रकरणो का घनिष्ठ सम्बन्ध माना जाता है । अपौरुषेय ग्रन्थो में भी कुछ अंश व्याख्यानात्मक हो और कुछ अश व्याख्येय हो, इसमे कोई विरोध नही हो सकता । इसी तरह से पौर्वापर्य भाव में भी कोई विरोध क्यों होगा? जैसे नित्य द्रव्यो में भी द्रव्यत्व गुणो के कारण होने में भी कोई विरोध नही है, उसी तरह से प्रकृत में भी समझना चाहिये । किन किन पुरुषो ने किस-किस युग में, किस कल्प, किस मास, किस तिथि में किन किन ग्रन्थो को, मन्त्र संहिताओ को, ब्राह्मण ग्रन्थों को बनाया, किन्होने उनको बनाते हुए देखा और आपको यह कैसे मालूम हुआ, इन प्रश्नो का समाधान किये बिना केवल सम्भावना मात्र से रचना काल का निर्णय नही किया जा सकता । सरलता से किसी विषय को समझाने के लिये कथाएं होती है । यहाँ गल्प-कथाओ मे भी भाति भाति की विभिन्न देश और काल की वस्तुओं का वर्णन मिलता है । इनको कोई उस ग्रन्थ के निर्माण का समय निश्चित करने में सहायक मानता है, इसके विपरीत दूसरे के मत से ये अपनी काल्पनिकता के कारण असमर्थ माने जाते है | कुछ स्पष्ट रूप से ऐतिहासिक प्रतीत हो रहे आख्यान अनैतिहासिक माने जाते हैं । पाश्चात्य विद्वान् अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिये इन सबके विपरोत अनैतिहासिक स्थलो को भी ऐतिहासिक सिद्ध करने लगते है । वेद प्रभृति ग्रन्थो में वेद की नित्यता, अनादिता को बताने वाले वचन उपलब्ध है । उनको ये पाश्चात्य लोग असंभव बात कह कर अस्वीकार कर देते है । इसके विपरीत केवल संभावना के आधार पर कुतर्कों से वेदो की रचना का समय निश्चित करने लगते हैं । इस तरह से शाण्डिल्य के प्रति सम्मान दिखाने मात्र से और रोहिणायन, सामकायन, वामकक्षायण, राजस्तम्बायन, शाण्डिल्यायन और शाठ्यायनि प्रभृति नामों के आ जाने से शतपथब्राह्मण के काण्डों की रचना भिन्न - भिन्न समय में हुई, यह नही सिद्ध किया जा सकता

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वेदार्थ पारिजात. ६८७ यदप्यस्य ग्रन्थस्य याज्ञवल्क्येन सम्बन्ध योजयित्वा शाण्डिल्येन तुरकावषेयेण सम्बन्धो योजित: ( यस्य पूर्वज कवष सरस्वत्यास्तटे यज्ञ कुर्वन्नुल्लिखित ऐनरेये ), 'अत्र यासा जातीनामुल्लेखस्ता सल्वा केकया. सन्ति ॥ विशेषतो यासां राजाश्वपति । एतासां पाश्चात्त्यजातीनामित पूर्व ब्राह्मणेषूल्लेखो नासीत् । अस्मिन् काण्डे परस्ताच्च काण्डेष्वाख्यानान्यधिकाशत ऐतिहासिकानि' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, तत्र कानिचिदनैतिहासिकान्याख्यानानीति , त्वयाप्यभ्युपगमात् । अस्माभिस्तु सर्वाणि तान्यनैतिहासिकान्येवाङ्गीक्रियन्ते अनादिवेदघटनापूर्वकस्याख्यानस्यो- ल्लेखासम्भवात् । क्वचिदनुल्लेखस्तु न तदानीमसत्त्वे तन्त्रम्, अनुपयोगादपि तत्सम्भवात् । - ' यदपि कानिचिदाख्यानानि तादृशैराचायें सम्बद्धानि ये चाख्यानसमयान्नातिप्राग्भवाः । पूर्वेषु काण्डेषु कल्पनाप्रधानानि पुराकथोपेतानि प्रायेणाख्यानानि लभ्यन्ते यद्वाऽतिप्राचीनकालिकीर्घटनाः सङ्केतयन्ति' इति, तत्तु न नः प्रतिकूलम् समेषामाख्यानानामस्माभिस्तथैवाभिप्रायाभ्युपगमात् । काश्चिद् घटनास्तु वैदिकशब्दानुसारं घटमाना अपि न निवार्यन्ते । यदपि - 'अत्रैव ऋक्सामयजुषामपि बहुधा विवेचनम् अध्वर्यु-ववृच-छन्दोगोपनिषद्- मीमांसादीनां सर्वप्रथमोल्लेख:' इति, तदपि न किञ्चित्, कालनिर्धारणमन्तरापि प्राथम्याप्राथम्यनिर्णयासम्भवात् । यदपि -' एकादशं काण्डं नवकाण्डानां परिशिष्टरूपम्' इति, तदपि तथैव समासव्यासाभ्या वर्णनस्यानादी वेदेऽपि सम्भवात् । यथा महाभारतस्य खिलाशो हरिवंश, यथा वा ऋग्वेदे ऋपरिशिष्टा यजुर्वेदे च खिलाध्यायास्तथैव ब्राह्मणेष्वपि परिशिष्टानां सम्भवात् । यथा आधुनिकेषु ग्रन्थेषु मूलानि परिशिष्टानि चैकस्मिन्नेव वर्षे एकेनैव पुरुषेण निर्मातुं शक्यन्ते तथैवानादिषु वेदेष्वपि मूलानि परिशिष्टानि च न न सम्भाव्यन्ते । यह भी कहा गया है - 'इस ग्रन्थ का सम्बन्ध याज्ञवल्क्य से न जोडकर शाण्डिल्य और तुरकावषेय से जोडा गया (जिसके पूर्वज कवष को हम ऐतरेय ब्राह्मण मे सरस्वती के तट पर यज्ञ करते हुए उल्लिखित पाते है ) । एक मात्र जिन जातियो का उल्लेख किया गया है, वे है सत्व और केकय (विशेषतः उनके राजा अश्वपति केकय ) । ये दोनो ऐसी पश्चिमी जातियाँ है, जिनका उल्लेख अन्यत्र ब्राह्मणो मे नही हुआ है । इस काण्ड में तथा आगे के चार काण्डो में आख्यान प्राय. अधिकाशत. ऐतिहासिक है' (पृ० १० ९ ) । किन्तु यह भी कुछ सिद्ध नही कर पाता, क्योकि यह आपने भी मान लिया है कि इनमें से कुछ आख्यानो का ऐतिहासिक महत्त्व नही है । हम तो सभी आख्यानो को अनैतिहासिक ही मानते है, क्योकि अनादि वेद मे किसी घटी हुई घटना के आधार पर बना हुआ कोई आख्यान विद्यमान हो, ऐसा माना ही नही जा सकता । कही किसी बात का उल्लेख न हो तो उस समय उसकी सत्ता का अभाव नही सिद्ध किया जा सकता । ऐसा इस लिये भी हो सकता है कि यहाँ उसका कोई उपयोग न हो । आगे कहा गया है- कुछ आख्यान ऐसे आचार्यों से सम्बद्ध है, जो स्वय आख्यानों के समय से बहुत पहले नही हुए होगे । इसके विपरीत इसके पहले के काण्डो में आख्यान अधिकांशत. कल्पना प्रधान पुरा कथा के रूप मे है या यदि ऐतिहासिक है तो वे प्रमुख रूप से बहुत प्राचीन काल की घटना का सङ्केत करते है' ( पृ० १० ९ ) । यह कथन हमारे मत से अधिक प्रतिकूल नही है, क्योंकि इन आख्यानों का अभिप्राय हमारे मत से यही है । कुछ घटनाएं वैदिक साहित्य में वर्णित घटनाओ के समान घटित हुई हो, इसमें क्या आपत्ति हो सकती? किन्तु यह जो कहा गया है- 'यही त्रयी विद्या (ऋक्, साम और यजुस्) का अनेकशः विशेष ढङ्ग से विवेचन किया ,,गया है । इसी में सर्वप्रथम अध्वर्यु बह्वच और छन्दोग नाम एक साथ आते है और उपनिषद् मीमासा प्रभृति शब्द भी सर्वप्रथम पाये जाते है' ( पृ० १० ९) । यह बात एकदम व्यर्थ है, क्योकि काल का निर्धारण हुए बिना क्या पहले का है और क्या बाद का, यह नही जाना जा सकता । ' ग्यारहवीं काड प्रथम नौ काण्डो का परिशिष्ट है' ( पृ० १० ९ ) यह कथन भी उसी तरह का है, क्योंकि वेद भी किसी विषय का एक जगह संक्षेप में और दूसरी जगह विस्तार से वर्णन हो सकता है । जैसे महाभारत का खिल भाग हरिवंश है, ऋग्वेद मे परिशिष्ट है और यजुर्वेद मे भी खिल अध्याय है, उसी तरह से ब्राह्मणो मे भी परिशिष्ट भाग हो, इसमें क्या आपत्ति है? जैसे आजकल के ग्रन्थों में मूल और परिशिष्टो का निर्माण एक ही समय में एक ही व्यक्ति करता है, उसी तरह से अनादि वेद में भी मूल और परिशिष्ट दोनो की सत्ता अवश्य मानी जा सकती है ।

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६८८ वेदार्थपारिजातः -: यदपि च ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽनुशासनं विद्या वाकोवाक्यमितिहास पुराणं नाराशसी गाथा अत्रोपदिष्टाः । चतुर्दशे काण्डे ईदृशा विषया उपलभ्यन्ते । वाकोवाक्यमित्येकवार सप्तमे काण्डे इतिहासशब्द एकधा एकादशे काण्डे । तत्र पुराणनाराशंसीशब्दौ नोपलभ्येते । तत्स्थाने तत्राख्यानव्याख्यानशब्दा उपलभ्यन्ते । एतत्कथनानीदं प्रमाणयन्ति यदेकादशकाण्डरचनासमये विविधवेदानामनेकाः सहिता ब्राह्मणानि अथर्वसहिता च विद्यमानान्यासन्निति, तदपि पिष्टपेषणप्रायम्, दत्तोत्तरत्वात् । नित्यसिद्धस्य शतपथस्य याज्ञवल्क्येन सूर्यादुपलब्धत्वात्तत्र पूर्वोक्तनाम्नामुप- लब्धी बाधाभावात् । सर्वज्ञकल्पा ऋषयस्ते च ऋतम्भरायाः प्रज्ञाया वैशारद्यादतीतानागतादि सर्वं ज्ञातु वर्णयितु च ? प्रभवन्ति । ईश्वरे तद्विज्ञानानुविद्धेषु वेदेषु चातीतानागतादिवर्णने का नामासम्भावना योगिनां ज्ञानापेक्षया ज्ञेयमात्रमल्पं सम्पद्यते । तथात्वेऽपि च न केषाञ्चिद्वर्णने तेषामविज्ञान तेषा वस्तूनां वाऽविद्यमानत्व सिद्ध्यति, वस्तूनां सत्त्वेऽपि ज्ञातॄणां तज्ज्ञानसत्त्वेऽपि हेत्वन्तरैरवर्ण नोपपत्तेः । यदपि - ' प्रथमकाण्डेषु तदेतदृषिणाभ्यनूक्तमिति तत्तद्विषयप्रकाशनाय मन्त्रा उद्धियन्ते, एकादशे च तत्, एतत्, उक्तम्, प्रत्युक्तम्, पञ्चदशर्चम्, बह्वृचाः प्राहु: -इति विशिष्टोद्धरणमुपलभ्यते । इदमुद्धरणमेकस्य अन्यस्य : सूक्तस्य यस्यैभिः शब्दः प्रारम्भो भवति तद् एतत् उक्त प्रत्युक्तं पञ्चदशचं बहुवृचा प्राहु । आलोचकाना कृते ( ) रोचकमिदं तथ्य यदस्मदीये ऋग्वेदपाठेऽस्मिन् सूक्त १०१५ न पञ्चदश मन्त्राः किन्त्वष्टादश । पुष्ट्यर्थमेकः

श्लोक उद्भियते — यथा जनमेजयस्य प्रासादेऽश्वेषु दीयमानं विशेषध्यानं लोकोक्तिविषयत्वमुपगतम् । अस्य राज्ञः सर्वप्रथ- मोल्लेखोऽप्यत्रैव दृश्यते । अत्र सर्वप्रथमं रुद्रे महादेवशब्दः प्रयुक्तः । ( ५ ३३५, ३।३।२ ) । प्रथमवार ब्रह्मचारिभिक्षाया

विशेषनियमाः । अस्याः प्रथाया अतिरिक्तोल्लेख: । ( ५।१८ ) सहितायामुल्लेखः । अस्य काण्डस्य रचनाकालप्रकाशक- इसी तरह से — 'ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस्, अनुशासन, विद्या, वाकोवाक्य, इतिहास- पुराण, नाराशसी और गाथा यहाँ उपदिष्ट है । इसी प्रकार की गणना चौदहवें काण्ड में भी मिलती है । इसी प्रकार शास्त्रीय विवाद के अर्थ मे ' वाकोवाक्य ' सातवें काण्ड में आया है और इतिहास शब्द कम से कम एक बार स्वयं ग्यारहवें काण्ड में आया है । पुराण और नाराशंसी शब्द नही मिलते, जनके स्थान पर कथा के अर्थ में आख्यान, व्याख्यान, अनुव्याख्यान, उपाख्यान शब्द आये है । इन कथनो से हमें यह प्रमाण मिलता है कि इस ग्यारहवें काण्ड की रचना के समय विविध वेदो की कतिपय संहिताएं और ब्राह्मण तथा स्वयं अथर्वसहिता भी विद्यमान थी' (पृ० १० ९ -११० ) यह कथन भी पिष्टपेषण मात्र है । इसका उत्तर दिया जा चुका है । नित्य सिद्ध शतपथ ब्राह्मण को याज्ञवल्क्य ने सूर्य से प्राप्त किया था । इसमें इस तरह के नाम विद्यमान हो, इसमें आपत्ति की क्या बात है? ऋषि सर्वज्ञ ईश्वर के तुल्य होते है । अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा की सहायता से ये अतीत और अनागत की सभी घटनाओ का वर्णन कर सकते है । तब ईश्वर और ईश्वर के विज्ञान से भरे वेदो में अतीत और अनागत घटनाओ का वर्णन हो तो इसमे क्या आश्चर्य की बात हो सकती हैं? योगियों के ज्ञान की अपेक्षा ज्ञेय पदार्थों की ही कमी पड़ जाती है । ऐसा होने पर भी यदि उन्होने कुछ का वर्णन नही किया तो इससे वे अज्ञानी नही माने जा सकते, अथवा न उन वस्तुओं का अभाव ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योकि वस्तुओ की सत्ता के रहते हुए भी, उनका ज्ञान रहते हुए भी, एक या दूसरे कारण से उनका वर्णन न किया जाय, इसमें कोई बेतुकापन नही दिखाई पडता । ' यहाँ भी पहले के काण्डो की तरह ही कई बार ' तदेतदृषिणाम्युक्तम्' इस वाक्य के बाद उस- उस विषय के प्रकाशक मन्त्रउद्धृत किये गये है । ग्यारहवें काण्ड में एक विशिष्ट उद्धरण भी मिलता है । यह उद्धरण एक दूसरे सूक्त का है और इन शब्दो से प्रारम्भ होता है— 'तदेतदुक्तप्रत्युक्तं पञ्चदशचं बह्वृचाः प्राहुः' । आलोचक के लिये यह एक रोचक तथ्य है कि हमारे ॠग्वेद के पाठ में इस सूक्त में पन्द्रह नहीं, अपि तु अठारह मन्त्र है । पुष्टि के लिये अकेले श्लोको का भी प्रायः उद्धरण दिया गया है । इनमें एक श्लोक से यह पता चलता है कि जनमेजय के प्रासाद में घोड़ो पर जो विशेष ध्यान दिया जाता था, वह एक लोकोक्ति बन गया था । इस राजा का सर्वप्रथम उल्लेख भी यही पाया जाता है । इसी में सर्वप्रथम रुद्र को महादेव नाम दिया गया है । यहीं पहली बार 'ब्रह्मचारिन्' f आदि की भिक्षा के विषय में विशेष नियम दिये गये है । इस प्रथा का उल्लेख संहिता के ३० वें अध्याय में किया गया है । किन्तु

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः III मत्रेदं तथ्यं याज्ञवल्क्याश्रयदातृत्वेन विदेहसम्राजो जनकस्य सर्वप्रथमवर्णनम्' इति, तदेतदपि न किञ्चित्, दत्तोत्तर- ' ': ' त्वात् । वेदे कुत्रापि प्राथम्याप्राथम्यवर्णनासम्भवात् । तद् एतत् पञ्चदशचं बहुवृचा प्राहु इत्युद्धरणमपि नास्यार्वाचीनत्वसाघकम् । यथा लौकिकेषु ग्रन्थेषु क्वचिदन्यादृशं क्वचित्तद्विलक्षणं चोद्धरणमेकवारमनेकवार वाऽनियतं दृश्यते, तथैव वेदेऽपि तत्सत्त्वे तदनादित्वाव्याघातात् । यदि शाकलीसहितायामेतत्सूक्तमष्टादशर्च न पञ्चदशचं तदान्यस्यां वाहवुच्यां सहितायामीदृशं पञ्चदशचं सूक्त भविष्यतीति कल्पयितुं शक्यते, महाभाष्यकारै: 'एकविंशतिधा वाह्वृच्यम्' इति प्रोक्तत्वात् । कात्यायनसूत्रेष्वनुपलब्धशाखीयमन्त्राणामपि सूचनात् । जैमिनिनापि विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्' ( मी० सू० १।३।५ ) इति प्रत्यक्षश्रुत्यविरोधे स्मृतीनामनुमितश्रुतिमूलकत्वाभ्युपगमात् । यदपि -' द्वादशे काण्डे सृञ्जयाना राज्यविनाशोल्लेखो द्वितीये च सृञ्जयाना समृद्धिदशायां कुरुभि: सम्बन्ध उक्तः, इहापि स सम्बन्धो दृश्यते । कौरव्य बाहूलीक- प्रातिपेयंस्तदीयशत्रोश्चरकस्य विरोधेन तदीयः पक्षो जिघृक्षित, किन्तु तत्प्रयत्नो वैफल्यमगात्' इति, तदपि न किञ्चित् कथञ्च तद्वर्णनेऽपि न ग्रम्यस्य तदनन्तरभावित्व , -' सिद्ध्यति लौकिकदृष्ट्या कथञ्चिदैतिहासिकवर्णनस्यापि वेददृष्ट्या आख्यायिकामात्रत्वात् । यदपि वार्कलि नाकमौद्गल्ययोरुल्लेखोऽपि समयसूचक, बृहदारण्यकतैत्तिरीयोपनिषद्द्भ्यामन्यत्रानुपलम्भात्' इति, तदपि नोचितम्, - ',तस्यातन्त्रत्वात् । यदपि वासिष्ठेभ्यः कस्याश्चित्क्रियायाः रहस्यमिन्द्रेणोपदिष्टमासीत् तेन तस्याः सम्पादने वासिष्ठानामेव ब्रह्मत्व भवति स्म । पश्चात् कश्चिदपि तदधीत्य ब्रह्मत्व कर्तुं क्षमो भवति स्म' इति, तदपि न किञ्चित्, ग्यारहवें काण्ड के समय पर जो बात विशेष प्रकाश डालती है, वह है पहली बार और अनेक बार विदेह के सम्राट् जनक का याज्ञवल्क्य के आश्रयदाता के रूप मे उल्लेख' । ( पृ० ११०-१११ ) । यह सब भो व्यर्थ की बातें है, इन सबका उत्तर दिया जा चुका है । वेद में कभी यह पहले का है और यह बाद का, इस तरह का वर्णन नही हो सकना । बह्वच ( ऋग्वेदी ) के मत से पन्द्रह ऋचाओ के सूक्त की बात भी इसकी अर्वाचीनता को नही सिद्ध कर पाते । जैसे लौकिक ग्रन्थो में कही एकमा और कही उससे विलक्षण उद्धरण एक बार या अनेक बार किसी नियम के बिना उपलब्ध हो जाता है,, उसी तरह से वेद मे भी इस तरह की स्थिति रहने पर भी उसकी अनादिता में कोई बाधा नही पहुँचती । यदि शाकली संहिता मे यह सूक्त १८ ऋचाओ का है, पन्द्रह का नही है, तो इससे यह कल्पना करने मे कोई बाधा नही है कि ऋग्वेद कि किसी दूसरो शाखा में यह सूक्त १५ ऋचाओ का रहा होगा । महाभाष्यकार ने ऋग्वेद की इक्कीस शाखाओ का उल्लेख किया है । कात्यायन श्रौतसूत्र में अनुपलब्ध शाखाओ के मन्त्रो की भी सूचना मिलती है । जैमिनि ने भी ' विरोधे ' इत्यादि सूत्र में यह प्रदर्शित किया है कि किसी स्मृतिवचन का प्रत्यक्ष श्रुति से विरोध प्रतीत हो तो उसकी आधारभूत श्रुति की अनुमान के सहारे कल्पना करनी पडती है । यह कथन भी ' बारहवें काण्ड में सृञ्जयो के राज्य के विनाश का उल्लेख किया गया है । दूसरे काण्ड में सृञ्जयों को समृद्धि की चोटी पर तथा कुरुओ से सम्बद्ध बताया गया है । यह सम्बन्ध यहाँ भी देखा जा सकता है, क्योकि ऐसा प्रतीत होता है कि कौरव्य वाह्लीक प्रातिपेय ने उनका पक्ष उनके शत्रु चरक के विरुद्ध लेना चाहा था जो रेवा के उत्तर के देश का निवासी और दशपुरुष राज्य के राजा दुष्टरीतु का पुरोहित था, किन्तु उनके प्रयत्न विफल हो गये थे' ( पृ० १११ ), व्यर्थ की बकवास मात्र है, क्योकि यहाँ इन सबका वर्णन हुआ है, ऐसा मान लेने पर भी उक्त ग्रन्थ इन वर्णित घटनाओ के बाद का है, यह सिद्ध नहीं हो सकता । लौकिक दृष्टि से 1किसी तरह से ऐसे स्थलो में इतिहासात्मक वर्णन मान भी लिया जा सकता है, किन्तु वैदिक दृष्टि से तो इन तरह की घटनाएं कल्पित आख्यायिकाओं के समान ही मानी जाती है । इसी तरह से ' वार्कलि ( अर्थात् वाष्कलि ) और नाक मौद्गल्य नाम भी संभवतः एक बाद के समय की आर सकेत करते है । नाक मौद्गल्य नाम बृहदारण्यक और तैत्तिरीयोपनिषद् के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं मिलता' ( पृ० १११) यह कथन भी उचित नही है, क्योकि कहीं किसी का नाम होने न होने से कुछ सिद्ध नही हो सकता । 'इन्द्र द्वारा एक बार वासिष्ठों को बताई गई एक क्रिया पहले केवल वासिष्ठों को ज्ञात थी, जिसके कारण पहले इस यज्ञ क्रिया के संपादन के समय केवल वासिष्ठ ही ब्रह्मन् हो सकता था, अब इच्छानुसार कोई भी उसका अध्ययन कर सकता था और उसके संपादन 1 के समय 'ब्रह्मन्’

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः६६० यथा पञ्चाग्निविद्या पूर्वं क्षत्रियाणामेवासीत् पश्चादुद्दालकोऽश्वपतेस्ता जग्राहेतिवत्तथा सत्त्वेऽपि विद्याया नित्यत्वे बाघाभावात् । ब्राह्मणे तु दौर्लभ्यसूचनद्वारा तत्प्रशसार्थमर्थवादरूपेण वर्णनात् । यदपि---'पुरुषनारायणस्यात्र प्रथमं नामोपलम्भ । प्रीतिकौशाम्बेय कौसुरिविन्दिनामनिर्देशात् पाञ्चा-लाना कौशाम्बीनगरस्य ततः पूर्वं निर्माणं कल्प्यते । त्रयोदशे काण्डे पुरुषनारायणस्योल्लेख., ऋचा सूक्तानि यजुषा-मनुवाकाः साम्ना दशतानि अथर्वाङ्गिरसा पर्वाणि सर्पविद्या देवजनविद्या प्रथमोल्लिखितास्तेनेय भिन्ना रचना' इति, तदपि तथाविधमेव 1 वेदेऽतीतानागतवर्तमानवस्तूना वर्णनस्य सुखावबोधार्थाख्यायिकारूपेण वर्णनेऽपि रचनाकाल- विशेषयोरसिद्धेः । ' तस्योक्तो बन्धु.', 'तस्योक्त' ब्राह्मणम्' इत्यादिनिर्देशवैलक्षण्येनापि न किश्वित्सिद्धयति | आधुनिक- लेखेष्वपि लेखकेच्छ्या लेखानां सालक्षण्यवैलक्षण्ययोरुपलम्भेन कर्तृ -काल - भेदव्यभिचारात् । - यदपि — 'अत्रैतिहासिकमहत्त्वपूर्णा गाथा. सर्वाधिक सख्ययोपलभ्यन्ते । यै पूर्वमश्वमेघयज्ञा अनुष्ठिता- स्तेषां राज्ञामश्वमेधवर्णनान्ते नामान्युक्तानि । तेष्वेका- ' अस्माकमत्र पितरस्त आसन् सप्त ऋषयो दौर्ग्रहे वध्यमाने । त आयजन्त त्रसदस्युमस्या इन्द्रं न वृत्रतुरमर्धदेवम् ॥ ' (ऋ० स० ४।४२।८ ), ' पुरुकुत्स्य महिषी दौग्रहे बन्धनस्थिते । पत्यावराजकं दृष्ट्वा राष्ट्रं पुत्रस्य लिप्सया || यदृच्छया समायातान् सप्तर्षीन् पर्यंपूजयत् । ते च प्रीताः पुनः प्रोचु- येजेन्द्रावरुणौ भृशम् । सा चेन्द्रावरुणाविष्ट्वा त्रसदस्युमजीजनत् । इतिहासमिम जाननृषिव्रतऋचाविह । ' अस्माकमत्रा- राजके देशेऽस्यां पृथिव्यां पितरः पालका उत्पादका ते अभवन् ( ये ) एते सप्त ऋषयः प्रसिद्धा । दुर्ग्रहस्य पुत्रे दोहे ऋत्विक् का कार्य कर सकता था' ( पृ० १११ ) यह कथन भी कुछ सिद्ध नही कर पाता, क्योकि जैसे पंचाग्निविद्या पहले क्षत्रियो के ही पास थी, बाद में अश्वपति से उद्दालक ने उसको प्राप्त किया, ऐसा माने जाने पर भी विद्या की नित्यता में कोई बाधा नही उपस्थित होती, वैसी ही स्थिति यहां भी समझनी चाहिये । ब्राह्मण मे इस बात का उल्लेख इसकी दुर्लभता का बताने और इस तरह अर्थवाद द्वारा उसकी प्रशंसा करने के लिये किया गया है । बेवर ने आगे लिखा है- 'यहाँ पुरुष नारायण का पहली बार नाम आया है । प्रीति कौशाम्बेय कौसुकविन्दि के नाम से भी संभवतः पंचालों की नगरी कौशाम्बी के इसके पहले बसे होने का सकेत मिलता है । तेरहवाँ काण्ड ' पुरुषनारायण' का अनेकशः उल्लेख करता है । इसमें ऋक् के सूक्तो, यजुस् के अनुवाको, सामन् के दशतो और आथर्वण तथा अङ्गिरस के पर्वों का पहली बार नाम पाते है | सर्पविद्या और देवयजनविद्या के संबन्ध में भी पर्वो के विभाजन का वर्णन है । इसलिये किसी भी दशा में इन नामों द्वारा एक भिन्न रचना समझनी चाहिये ( पृ० १११ ) यह कथन भी वैसा ही है, क्योंकि वेद में अतीत, अनागत और वर्तमान वस्तुओ का वर्णन विषय को सरलता से समझाने के लिये कल्पित कथाओ के समान होने से इससे इनकी रचना का कोई विशेष काल निर्धारित नहीं किया 1 जा सकता । 'तस्योक्तो बन्धु ', ' तस्योक्तं ब्राह्मणम्' ( पृ० ११२ ) इस तरह से विलक्षण उल्लेखो से भी कुछ सिद्ध नही हो पाता, क्योकि आधुनिक लेखो में भी लेखक की इच्छा के अनुसार कही समानता और कही विलक्षणता रहती है, इससे उसके कर्ता और समय की भिन्नता नहीं मान ली जाती । 'इस काण्ड की एक अनोखी विशेषता यह है कि इसमें ऐतिहासिक महत्त्व की गाथायें सबसे अधिक संख्या में आई है । ये गाथाएँ अश्वमेध वर्णन के अन्त में उद्धृत है और उनमें उन राजाओ के नाम दिये हैं, जिन्होने प्राचीन काल में अश्वमेध यज्ञ किया था । इनमें से केवल एक गाथा ऋक् संहिता मे मिलती है । ' अस्माकमत्र' इस ऋचा का प्रसंग और अर्थ इस प्रकार है- दोर्ग्रही पुरुकुत्स की महिषी ने अपने पति को जब पाशों में बंधा हुआ देखा और देखा कि इससे राष्ट्र में अराजकता फैल रही है तो उसने पुत्र प्राप्ति की कामना से अकस्मात् चले आये सप्तर्षियों का पूजन किया । इस सत्कार से प्रसन्न हो सप्तर्षियो ने उससे कहा कि तुम इन्द्र और वरुण का यजन करो । तब इन्द्र और वरुण का यजन कर उसने त्रसदस्यु नामक पुत्र प्राप्त किया । इस इतिहास के जानकार व्रत इस ऋचा के ऋषि है । इस मन्त्र में महिषी कहती है- हमारे इस अराजकता से भरे राष्ट्र में इस पृथ्वी को उत्पन्न करने वाले और पालन करने वाले के रूप में सप्तर्षिगण प्रसिद्ध है । दुर्ग्रह के पुत्र पुरुकुत्स के पाशों से मजबूती से बंध जाने पर उन्होंने