वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 71–80

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 71–80

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वेदार्थपारिजातः ६७१ यदपि -'अनुपदसूत्रे ब्राह्मणी कर्मकाण्डीयेतिहासस्योत्तमभाण्डागारो विद्यते, यतोऽत्र विभिन्नग्रन्थाना- मुल्लेखा उद्धरणानि च सन्ति । अत्राने कामामृग्वेदीयशाखानामुद्धरगानि । एतस्याध्ययनमपेक्षितम्' इत्यादि, तदपि यत्किञ्चित्, तादृशाध्ययनस्य तदीयाभिप्रायावेदकत्वाभावात् । ईदृशान्यन्यान्यपि तदीयान्यध्ययनानि दुरुद्देश्यपूर्णानि । यजुर्वेदसम्बन्धी तदीयविचारोऽपि तादृश एव । अय कृष्णशुक्लभेदेन तस्य द्वैविध्य मनुते । सामाजि- कास्तु तदनुयायिनोऽपि सन्तः कृष्णयजुर्वेदस्य वेदत्वमेव न मन्वते । ब्राह्मणानामवेदत्व पाश्चात्त्याः सामाजिकाश्च मन्यन्ते । पाश्चात्त्यास्तु ब्राह्मणानामपेक्षया मन्त्रसहिताना प्राचीनत्व तात्कालिकजननिर्मितत्व चाहुः । यच्च शुक्ल- यजुर्वेदीयब्राह्मणेऽध्वर्युनामनिर्देश: शुक्लयजुःशाखिनामेव कृते । तेषा दृष्ट्या चरकाध्वर्यवो निन्द्या एवेति, तत्त्वज्ञान-, विजृम्भितमेव स्वपक्षदाढ निन्दायास्तात्पर्यात् । यत्तु शुक्लयजुर्वेदिनामेकस्मिन्ननुच्छेदे पुरुषमेधस्य बलिरूपेण दुष्कृताय चरकाचार्यार्पणमुक्तम्, तद्विलक्षणमेव, यतोऽन्यत्र पर्यटनशीलेषु विद्वत्स्वेवाय शब्द प्रयुक्त इति व्याख्यानात् । 'एतेन विज्ञायते यदेतेषु कृष्णशुक्ल शाखीयेषु प्रत्यक्षमेव शात्रवम्' इति, तदव्यज्ञानमूलकमेव, दुष्कृताय चरकाचार्यम्’ ( वा० स ० ३०| १८ ) इत्यस्य चरकाणा कुष्ठरोगाक्रान्तानामाचार्य याजक गुरुमुपकल्पयेदित्यर्थत्वेन विरोधात् । यत्तु तित्तिरिणा प्रोक्तत्वात्तैत्तिरीयकमिति वैशम्यायन शिष्येषु यदा केनचिदेकेन गुरोः क्रोधेन यजुर्मन्त्रा भक्षयित्वोद्वान्तास्तदान्यैः शिष्यैस्तित्तिरिभूतैर्भक्षिता इत्यादिकथनम्, तदप्यज्ञानमूलकम्, ब्राह्मणेषु पुराणेषु कथाया अन्यथा वर्णनात् । तत्र हि कदाचित् कस्यचिदहसः क्षालनाय व्रतचरणाय गुरुणा वैशम्यायनेनोक्तषु शिष्येषु निन्दापरक वाक्यों का तात्पर्य किसी विधि की स्तुति के लिये ही होता है । पाश्र्वात्य विद्वान् इस बात को बिना जाने ऊटपटांग विचार प्रकट करते रहते है और शास्त्रों में परस्पर विरोध को दिखाने मे ही अपने को कृतार्थ मानते है । 'अनुपदसूत्र ब्राह्मणीय कर्मकाण्ड के इतिहास का उत्तम भण्डार सिद्ध होगा, क्योकि यह अनेक विभिन्न ग्रन्थो का उल्लेख करता है और उनके उद्धरण भी देता है । उदाहरण के लिये ॠग्वेदीय शाखाओ मे यह अनेक शाखाओ का उद्धरण प्रस्तुत करता है । इसका अधिक अध्ययन करने की आवश्यकता है' ( पृ० ७१ ) यह कथन भी कुछ ऐसा ही है, क्योकि इसका अध्ययन करन से उन लोगो का अभिप्राय नही सिद्ध होने वाला है । इसी तरह के अन्य ग्रन्थो के अध्ययन भी उनके बुरी नीयत से भरे हुए ही है । इसी तरह से बेवर के यजुर्वेद सबन्धी विचार ( पृ० ७६- १३१ ) भी प्रमाणो से रहित है । बेवर कृष्ण और शुक्ल के नाम से यजुर्वेद को दो भागो विभक्त मानता है । पाश्चात्य विद्वानो का अनुसरण करने वाले आर्यसमाजी विद्वान् तो यहाँ कृष्ण यजुर्वेद को वेद मानते ही नही । ब्राह्मणो को वेद न मानने मे आर्यसमाजी और पाश्चात्य विद्वान् एकमत है । पाश्चात्य विद्वान् ब्राह्मणो की ---- अपेक्षा मन्त्रसंहिताओ को प्राचीन मानते हैं और यह मानते है कि यह उस समय के मनुष्यो की रचना है । बेवर ने यह भी कहा है-' शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मण में अध्वर्यु नाम का प्रयोग उसी ब्राह्मण के अनुयायियो के लिये हुआ है तथा चरकाध्वर्यु को निन्दित एवं अध्वर्यु लोगो का विरोधी बताया गया है ' (पृ० ७७ ), किन्तु यह कथन उनके अज्ञान को ही उजागर करता है, क्योकि यहां निन्दा का तात्पर्य अपने पक्ष मे दृढतामात्र के प्रदर्शन में है । इसी तरह से - 'इस प्रकार की शत्रुता शुक्ल यजुर्वेदीय संहिता के भी एक अनुच्छेद से प्राट होती है, जिसमें पुरुषमेध की एक बलि के रूप में 'चरकाचार्य' को दुष्कृत या बुरे कर्म को अर्पित किया गया है । यह बात बड़ी विलक्षण प्रतीत होती है, क्योकि इसके अतिरिक्त अन्य स्थलो पर चरक पद का प्रयोग अच्छे अर्थ मे 'पर्यटनशील विद्वान्' के लिये हुआ है । इससे यही प्रतीत होता है कि चरकों और शुक्ल यजुर्वेद के अनुयायियों में सीधी शत्रुता थी ' ( पृ० ७७ ), यह कथन भी बेवर के अज्ञान को ही उजागर करता है, क्योकि उक्त स्थल में चरक शब्द का अर्थ कुष्ठ रोगी को यजन कराने वाला आचार्य है । अतः आपकी सारी कल्पना व्यर्थ हो जाती है । 'कृष्ण यजुर्वेद का दूसरा नाम तैत्तिरीय है । जब वैशम्यायन के शिष्यो मे से एक ने अपने गुरु से क्रुद्ध होकर यजुम् मन्त्रो को निगल लिया और फिर उगल दिया, तब शेष शिष्यों ने 'तित्तिर' बन कर उसे चुन लिया था या एकत्र किया था' (पृ० ७७) यह कथन भी बेवर के अज्ञान का ही द्योतकहै, क्योकि ब्राह्मण ग्रन्थो और पुराणों में यह कथा दूसरी तरह से वर्णित है । वहाँ बताया

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९७२ वेदार्थपारिजातः किमेभिरल्पसारंरहमेव व्रतं चरिष्यामीत्युक्तवति याज्ञवल्क्ये विप्रावमाननाद् गुरुः क्रुद्धः सन्नुक्तवान् मदधीतानि यजूषि त्यक्त्वा गच्छेति । तच्छ्रुत्वा याज्ञवल्क्यस्तानि यजूष्युद्गीर्णवान् । वैशम्पायन शिष्यास्तु तित्तिरयो भूत्वा तानि जगृहु: । तेन तित्तिरिरूपंऋषिभिगृहीतत्वात् तैत्तिरीयकं नाम सम्पन्नम् । याज्ञवल्क्यस्तु त्रयीमय भगवन्त-मादित्यमाराध्यायातयामानि यजूषि प्राप्तवान् । तान्येव पञ्चदशशाखोपबृंहितानि शुक्लयजूव्याख्यायन्ते । तत्र मन्त्र-ब्राह्मणभेदस्य विविक्तत्वात् शुक्लत्वम्, कृष्णयजुर्वेदे तयोर्भागयोरविविक्तत्वात् कृष्णत्वमिति । यत्तु - खण्डैनिर्मितत्वात् खाण्डिकीयेत्यस्याः शाखाया नामेति, तदप्यशुद्धम्, पाणिनिविरुद्धत्वात् । खण्डिकर्षिणा दृष्टत्वात् एतच्छाखानामोपपत्तेः । -काठक- हारिद्रविक आपस्तम्ब मैत्रायणीप्रभृतयः कृष्णयजु शाखा अपि नित्यत्वादपौरुषेयत्वान्नेतिवृत्तनिर्णायका भवितुमर्हन्ति । यदुक्तम्- -'श्वेताश्वतरोपनिषदि साख्यसिद्धान्तोऽद्वैतवादिना योगदर्शनेन योजितः । अत्र यजु संहितादिभ्यः समाहृतानामनेकेषामप्रासङ्गिकानामशाना विलक्षणो दुरुपयोगः कृतः । तत एवात्मनो यजुःसम्बद्धत्वम् अभिमन्यतेऽयं ग्रन्थः । साख्यप्रवर्तकः कपिलोऽत्र देवतापदे स्थापितः । वादरायणस्य ब्रह्मसूत्रेऽप्ययमुद्धृतः ॥ शङ्कराचार्येणात्र भाष्यमपि कृतम् 1। शङ्कराचार्यात् किञ्चित्कालपूर्वमेवास्या निर्माणमिति त्वस्य महासाहसम् । बादरायणस्य सूत्रेऽपि यस्योद्धरणम्, शङ्कराचार्यादिभिराचार्यैर्यस्योपनिषत्त्वं वेदत्व चाङ्गीकृतम्, तस्य सम्बन्धेऽनर्गलं प्रलपतस्तस्य सर्वथा वेदस्पर्शानधिकारित्वमेव साधयति । तस्या आधुनिकत्वसाधकं प्रमाण तु नोपस्थापितम् । कपिलस्तु भगवदवतारत्वेन '.' श्रीमद्भागवतेऽपि वर्णितः । विष्णुसहस्रनामपाठेऽपि कपिलः कपिरव्यय इति पाठो विद्यते । यस्यातिप्राचीनत्वं रामायणमीमासाया साधितम् । गया है कि किसी पाप का प्रायश्चित करने के लिये, किसी व्रत का अनुष्ठान करने के लिये शिष्यो को वैशम्यापन का निर्देश मिलने पर उनके एक शिष्य याज्ञवल्क्य ने कहा कि इतने सारे प्रभावहीन शिष्यो को आप इस कार्य में क्यो लगाते हैं 3, मैं अकेला ही इस कार्य को कर सकूँगा । याज्ञवल्क्य के द्वारा इस तरह से उन ब्राह्मण शिष्यों का अपमान हुआ देख गुरु वैशम्यापन ने क्रुद्ध होकर याज्ञवल्क्य से कहा कि तुम मेरे पढाये यजुर्मन्त्रो को छोड दो और मेरे यहाँ से चले जाओ । यह सुनकर याज्ञवल्कन ने उन यजुर्मन्त्रो को उगल दिया और वैशम्यापन के अन्य शिष्यो ने तित्तिरि बन कर उसको निगल लिया । ऋषियों ने तित्तिरि का रूप धारण कर इनको निगल लिया, इसलिये ये मन्त्र ' तैत्तिरीयक' नाम से प्रसिद्ध हो गये । इसके बाद याज्ञवल्क्य ने त्रयी स्वरूप भगवान् आदित्य ( सूर्य ) की आराधना करके नये यजुर्वेद को प्राप्त किया । पन्द्रह शाखाओ में विभक्त यह वेद शुक्ल यजुर्वेद के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इनमें शुक्ल यजुर्वेद में मन्त्र और ब्राह्मण भाग अलग- अलग है और कृष्ण यजुर्वेद मे ये मिले हुए है । यह कहना कि -'कृष्ण यजुर्वेद खण्डो में बना है, अतः इसकी एक प्रमुख शाखा का नाम खाण्डिकीय है' ( पृ ० ७७ ), इसलिये गलत है कि यह बात पाणिनि व्याकरण के विरुद्ध है, क्योंकि तदनुसार खण्डिक ऋषि के द्वारा दृष्ट होने से इसका यह नाम पड़ा है । काठक, हारिद्रविक, आपस्तम्ब, मैत्रायणी प्रभृति कृष्ण यजुर्वेद की शाखाएं भी नित्य और अपौरुषेय है, अतः उनकी सहायता से भी कोई इतिहास नहीं निकाला जा सकता । आगे चलकर बेवर ने लिखा है- 'श्वेताश्वतर उपनिषद् में साख्य सिद्धान्त अद्वैतवादी योगदर्शन के साथ मिला दिया गया है । इस प्रकार इसमें यजुस् की संहिता आदि के नितान्त अप्रासंगिक अनुच्छेदो का विलक्षण दुरुपयोग किया गया है और इस आधार पर ही यह यजुस् से संबद्ध होने का दावा करता है । साख्य दर्शन के प्रवर्तक स्वयं कपिल को इसमें देवताओ के स्थान तक पहुँचा दिया गया है और यह स्पष्टत. एक बहुत बाद के काल की रचना है । यद्यपि यह बादरायण के ब्रह्मसूत्र में उद्धृत है और शंकराचार्य ने इस पर भाष्य भी किया है, किन्तु शंकराचार्य से कुछ पहले ही इसका निर्माण हुआ होगा ( पृ० ८६), किन्तु उसका यह पूरा कथन दुःसाहस मात्र हैं । बादरायण के ब्रह्मसूत्र में जो उद्धृत है और आचार्य शकर प्रभूति ने जिसको उपनिषद् और वेद माना है,, उसके संबन्ध में इस तरह की अनर्गल बात कहते हुए यह सिद्ध कर देता है कि ऐसे व्यक्तियो को वेदो को छूने का अधिकार भी नहीं होना चाहिये । इसकी आधुनिकता को सिद्ध करने के लिए यहां कोई प्रमाण नहीं दिया गया है । कपिल भगवान् के अवतार है, यह बात तो श्रीमद्भागवत में भी वर्णित है । विष्णु के सहस्रनाम में भी कपिल नाम आता है । इसकी प्राचीनता 'रामायण मीमासा' में सिद्ध की गई है ।

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वेदार्थपारिजातः ९७३ एवमेव मंत्रायण्युपनिषत्सम्बन्धे ब्राह्मणस्य भाषानो भेद उक्त । ईदृशदीर्घमनामानपदानि महाकाव्येषू- दन्तेन ब्राह्मणेष्विति, तदपि निर्मूलमेव, पारम्पर्येण तस्या उपनिषत्त्वे सिद्धेऽन्यहेतोरतन्त्रत्वात् प्रसङ्गानुसारेण भाषाभेदस्य सर्वत्रोपलब्धे । एव 'यक्षोरगभूतगणग्रहध्रुवताराप्रचलनादिवर्णनमपि तादृशस्य युगम्य सकेत ददातीति : यो ब्राह्मणेभ्योऽतिप्राक्कालिक । मगवदेश एव शाक्यमुनेवौद्धधर्मस्य च स्वागतं वृत्तम् । बौद्धाना त्या मैत्रेयो भावी बुद्धो वर्णितः । तस्मादस्या उपनिषदो बौद्ध सार्धं गम्भीरः सम्बन्धोऽस्ति ' इत्यादि, तदपि न युक्तम्, मुक्तिको- पनिषदादावस्या अपि उपनिषत्त्वेन वर्णनात्, वैदिकसम्प्रदाये तदादराच्च । छान्दोग्यादौ 'असद्वा इदमग्र आसीत्' इत्यमद्वादस्य वर्णनान्नासदीय सूक्तेऽसद्वादस्य निषेधात् तताऽपि पूर्वमसद्वादापरपर्याय: शून्यवाद आसीदित्यस्य वक् शक्यत्वेऽपि ' भूत भव्यं भविष्यच्च सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति' इति मनुस्मृतिरीत्या वेदेष्वतीतानागतवर्तमानवर्णनेऽपि ततः कालनिर्धारणायोगात् । तथैव प्रकृतेऽपि वक्तुं शक्यत्वात् । यदपि -- ' कृष्णयजुर्वेदीय प्रातिशाख्यसूत्रे आत्रेयकौण्डिन्यादिनामनिर्देशो महत्त्वपूर्ण, वाल्मीकिनामनिर्देशो- ऽप्यत्राश्चर्यपूर्णः । अग्निवेश्यः, अग्निवेश्यायनः, पौष्करसादिरिति तुल्यानि नामानि बौद्धरचनासु वौद्धशिष्याणां सम्बन्धे लभ्यन्ते' इति, तदपि तुच्छम्, वैदिकनाम्ना पूर्ववर्तित्वेन परवर्तिबुद्धकाले समुपलम्भस्यानाश्चर्यत्वात् । बौद्धशिष्येषु कात्यायनादिनाम्नामपि दशनात् । अत एव शुक्लयजुःप्रातिशाख्ये काण्वमाध्यन्दिनभेदो दृश्यते । बेवरदृष्ट्या काण्वपाठोऽधिकप्राचीनः । यतः काण्वस्य नाम ऋग्वेदीयासु प्राचीनविशाखास्वेकस्याः शाखाया नाम । शुक्लयजुर्वेदस्य सम्पूर्ण साहित्यं माध्यन्दिन- इसी तरह से ---'मैत्रायणी उपनिषद् की भाषा भी ब्राह्मणो की भाषा से स्पष्टतः भिन्न है, कारण इसमें पर्याप्त दीर्घ समासो का प्रयोग है, जिनका कि प्रयोग केवल महाकाव्य काल की भाषा में ही पाया जाता है, ब्राह्मणो की भाषा मे नही ' ( पृ० ८७) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि परम्परा से जब यह सिद्ध हो गया कि यह उपनिषद् ग्रन्थ है, तो फिर अन्य किसी हेतु से इसकी सकर्तृकता आदि नही सिद्ध हो सकते । प्रसङ्ग के अनुसार भाषा मे भिन्नता आ जाती है, यह बात क्या वेद और क्या लोक सभी जगह समान रूप से लागू होती है । इसी प्रकार का— 'सुर, यक्ष, उरग, भूतगण इत्यादि का, ग्रहो का और ध्रुवतारा का उल्लेख भी ऐसे युग का सङ्केत देता है, जो ब्राह्मणो से बहुत पहले का है । मगध देश में ही शाक्यमुनि के उपदेश बौद्ध धर्म का स्वागत हुआ था । बौद्धधर्मावलम्बियों में मैत्रेय भावी बुद्ध का नाम है । इसलिये इस उपनिषद् का दर्शन भी बोद्धो के मतो से गहरा सम्पर्क रखना है' (पृ० ८७-८८ ), किन्तु यह कथन भी युक्तियुक्त नही है, क्योकि मुक्तिकोपनिषद् में इसकी गणना उपनिषदो मे की गई है और वैदिक सम्प्रदाय मे उसका आदर भी है । छान्दोग्य उपनिषद् आदि में असद्वाद का वर्णन मिलता है, नासदीय सूक्त में असद्वाद का निषेध है, अत: यह असद्वाद के नाम से प्रसिद्ध शून्यवाद बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है, ऐसा भी कहा जा सकता है, किन्तु 'जो कुछ हो चुका है, जो होने वाला है । अथवा जो हो रहा है, यह सब कुछ वेद से ही सिद्ध हो जाता है' इस मनुस्मृति के वचन के अनुसार वेद में अतीत, अनागत और वर्तमान सभी वस्तुओं का वर्णन हो सकता है, अतः उसके आधार पर काल का निर्धारण नही किया जा सकता । यही बात प्रकृत प्रसङ्ग मे भी लागू होती है ॥ इसी प्रकार - कृष्ण यजुर्वेद के प्रातिशाख्य सूत्र में आत्रेय, कौण्डिन्य आदि का नाम निर्देश विशेष महत्त्व का है । वाल्मीकि का भी नाम आया है, जो इस सम्बन्ध में विशेष आश्र्चर्यजनक है । अग्निवेश्यायन, पौष्करमादि सरीखे नाम बौद्ध रचनाओ में बुद्धके शिष्यों या उनके समकालीन व्यक्तियों के है' ( पृ० ९ २ ) यह कथन भी व्यर्थ की बकवास मात्र है, क्योकि ये वैदिक नाम बहुत पहले से चले आ रहे हैं, इन्ही के अनुकरण कर रक्खे गये ये नाम बुद्धकालीन व्यक्तियों के भी हो सकते है । इसमे आश्चर्य की क्या बात है । बोद्ध के शिष्यो के तो कात्यायन आदि नाम भी मिलते है । 'शुक्लयजुः संहिता और ब्राह्मण समग्र रूप से दो विभिन्न पाठों में उपलब्ध होते है । इसमे एक पाठ का नाम है काण्व और दूसरे का माध्यन्दिन । सबसे पहले शुक्लयजु.प्रातिशाख्य में इनका उल्लेख है । इनमें काण्व पाठ को अधिक प्राचीन मानना सम्भव

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III वेदार्थपारिजातः शाखापेक्षया काण्वशाखयैव सम्बद्धं दृश्यते ( पृ ० ९ ५ ) | सामाजिकास्तु माध्यन्दिनीया शाखामेव वेद मन्वते, न काण्व-शाखाम् । बेवरदृष्टयोभयो. शाखयोः साम्येऽपि भौगोलिको भेदोऽस्ति । वस्तुतस्तु पाश्चात्त्यानां सामाजिकाना च मतमनर्गलमेव । महाभाष्यकारादिदृष्ट्या एकशतमध्वर्युशाखा अपि इतरवेदशाखावदनादिवेदरूपा एव । यत्तु ' मेगस्थनीजस्योद्धरणेन एरियन महाशयेन 'मादिआन्दिनोई' ( ग्रीक ) ( यस्य देशे अन्धोमती नदी वहति) तादृशी जनताभ्युपगता । एते माध्यन्दिना ज्ञातव्या इति मया परामर्शो दत्त:, तेषा नाम्नैव माध्यन्दिनी शाखा प्रचलति । तत इयं शाखा तदानीमस्तित्वमुपगताऽथवा तदनन्तरमेवोदिता । तथापि नायमसन्दिग्धो विषयः । माध्यन्दिननाम- प्रयोगो दक्षिणादिग्भवाया जनतायां तादृश्यां शाखाया वा सम्भाव्यते । परन्तु माध्यन्दिन कौथुमा दक्षिणकौथुमा इत्यादीना- मुल्लेखो लभ्यते । यथा विनायकेन स्वीयकौषीतकिब्राह्मणभाष्य माध्यन्दिनकौथुमानुगमिति नाम्नोक्तम्' इति, तदपि , ' ', ' ' निर्मूलम् माडिआण्डिनोई मादिआन्दिनोई इति पाठयोः क्वचिदपि माध्यन्दिनशाखायामनुपलम्भात् । न चान्यस्थलीयेन नाम्ना माध्यन्दिननाम्नः साम्य कल्पयितव्यम्, प्रत्यासत्त्यभावात् । अन्यथा यथा 'ईशावास्यम्' (वा० सं ० ४०1१ ) इत्यनेन ईसामहानुभावस्य सम्बन्धः कल्पित' स्यात्, 'अहमन्नाद' इत्यनेन ' अहमद' इत्यस्य च सम्बन्धः कल्पितः स्यात्, तादृगेवोपहासास्पदमेतत् । यदुक्तम्- 'माध्यन्दिनपाठः ३०३ अनुवाकः १ ९ ७५ कण्डिकाभिश्च विभक्तः । प्रथमतः पञ्चविंशत्यध्यायेषु ( ), ( ),, ( ), १-२ पौर्णमास्ययज्ञस्य ३ प्रातः सायंहोमस्य चातुर्मास्यारम्भे क्रियमाणस्य यज्ञस्य ४-८ सोमयज्ञस्य ( ९ -१० ) सोमपरिष्कारयो, ( ११-१८ ) यज्ञाग्न्यर्थं वेदिविधानस्य, ( १ ९ - २१ ) सौत्रामण्या, ( २२-२५ ) अश्वमेध - यज्ञस्य च विधान वणितम् । तत्रापि प्राक्तनैरष्टादशाध्यायै · सहान्तिमाः सप्ताध्याया पश्चाद्योजिताः । तत. पर है, कारण काण्व नाम ऋग्वेद की प्राचीन ऋषि शाखाओ मे एक शाखा का नाम है । शुक्ल यजुर्वेद का शेष सम्पूर्ण साहित्य माध्यन्दिन शाखा की अपेक्षा काण्व शाखा से सम्बद्ध प्रतीत होता है' (पू० ९४- ९ ५ ) बेवर का यह कथन है । इसके विपरीत आर्यसमाजी माध्यन्दिन शाखा को ही वेद मानते है, काण्व शाखा को नही । बेवर के मत से इन दोनो शाखाओ में समानता होते हुए भी भौगोलिक भेद है । वास्तव में तो यह पाश्चात्यो और आर्यसमाजियो का मत निराधार है । महाभाष्यकार की दृष्टि में यजुर्वेद की सभी १०१ शाखाए अन्य वेदो की शाखाओ के समान अनादि वेद रूप है । बेवर आगे लिखते हैं ---' मेगस्थनीज का उद्धरण देते हुए एरियन ने मादिआन्दिनोई ( ग्रीक ) 'जिनके देश से अन्धोमती नदी बहती है' नाम की जनता का उल्लेख किया है और मैंने यह सुझाव देने का साहस किया है कि हमें उन्हें माध्यन्दिन समझना चाहिये, जिनके नाम पर इन शाखाओ में से एक शाखा का नाम पड़ा है । अत एव यह शाखा या तो उस समय अस्तित्व मे आ चुकी थी, या उसी समय में अथवा उसके तत्काल बाद ही उसका उदय हुआ । निश्चय ही इस विषय को असंदिग्ध नही माना जा सकता, कारण माध्यन्दिन नाम का प्रयोग सामान्यतः किसी दक्षिणी जनता या दक्षिणी शाखा के लिये हो सकता है और वस्तुतः हम माध्यन्दिन कौथुम और दक्षिणी कौथुमो का उल्लेख पाते भी है । जैसे कि विनायक ने अपने कौषीतकि ब्राह्मण भाष्य को ' माध्यन्दिन -कौथुमानुगम्? कहा है' ( १० ९ ५ - ९ ६ टि० भी ) यह सारा कथन भी निर्मूल है, क्योकि 'माडिमण्डिनोई' और ' मादिआन्दिनोई ये पाठ माध्यन्दिन शाखा में कही नही मिलते । दूसरी जगहो में प्रसिद्ध नामो से माध्यन्दिन नाम की तुलना करना ठीक नही है, क्योकि इनमे परस्पर कोई सम्बन्ध नही है । अन्यथा जैसे कोई ' ईशावास्य' इस मन्त्र में आये ईशा शब्द की ईसामसीह से तुलना करने लगे और 'अहमन्नाद' यहाँ अहमद का सम्बन्ध खोजने लगे, वह व्यक्ति उपहासास्पद बनेगा, उसी तरह से यह कल्पना भी उपहासास्पद क्यो न होगी? बेवर आगे लिखते हैं-'माध्यन्दिन पाठ में ये ४० अध्याय ३०३ अनुत्राकों तथा १ ९ ७५ काण्डिकाओं में विभक्त है । प्रथमतः २५ अध्यायों में सामान्यतः यज्ञो के लिये मन्त्र और विधियों है- पहले ( १-२ ) पौर्णमास्य यज्ञ, तब ( ३) प्रातः और साय अग्नि में किये जाने वाले होम और प्रत्येक चातुर्मास्य के आरम्भ में किये जाने वाले यज्ञ, तब ( ४-८ ) सामान्य सोम यज्ञ और ( ९-१० ) उसके दो परिष्कार, फिर ( ११-१८ ) यज्ञाग्नि के लिये वेदि का निर्माण, तब ( १ ९ -२१ ) सौत्रामणी और अन्त में ( २२-२५ ) अश्वमेघ यज्ञ के विधान दिये गये हैं । इनमें अन्तिम सात अध्यायो को पहले के अठारह अध्यायों के साथ बाद में जोड़ा गया माना जा सकता है । किसी

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वार्थपारिजातः ६७२ पञ्चदशाध्यायास्तु बहोः कालादनन्तर योजिता । शुक्लयजुषोऽनुक्रनण्या महीधरभाष्ये ( २६-३५ ) षड्विशमध्याय- मारम्न पञ्चत्रिंशदध्याय यावत् खिलत्वेनोक्ताः । पश्वाद्योजिता अशा खिला उच्यन्ते । षट्त्रिंशमध्यायमारम्यैकोन- चत्वारिशमध्याय यावत् चत्वारोऽध्यायाः शुक्रियपदव्यपदेश्याः । तत्रापि ( २६ - २ ९ ) चतुर्ध्वध्यायेषु तानि यजूपि सन्ति येषा पूर्वोक्तेर्यज्ञे सम्बन्ध । तानि च यथास्थान प्रयोक्तव्यानि । इतः पर ( ३० - ३ ९ ) पर्यन्त दशस्त्रध्यायेषु नितान्तनवीनेर्यज्ञः सम्बद्धानि यजूंषि । ते च पुरुषमेव सर्वमेध पितृमेध -प्रवर्ग्य (प्रायश्चित्तकर्म ) रूपा । अन्तिमाध्या- यस्य कथञ्चिदपि यज्ञसम्बन्धो नास्ति । अत्र चिन्तनस्य पर्याप्तविकसितावस्योपलभ्यते । अत्र विश्वस्य स्वामी ईशो- उभ्युपगम्यते' इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, कात्यायनानुक्रमविरोधात् । ' मण्डलं दक्षिणमक्षि हृदयं चाविष्ठित येत शुक्लानि यजूषि भगवान् याज्ञवल्क्यो यतः प्राप त विवस्वन्तं त्रयीमयमचिष्मन्तमभिध्याय माध्यन्दिनीये वाजसनेयके यजुर्वेदाम्नाये सर्वे सखिले सशुक्रिय ऋषिदेवत छन्दास्यनुक्रमिष्याम ' इत्यारम्भ एव सर्वेषा शुक्लयजुषा सूर्यात्प्राप्तत्व- ' ' ( ) कथनेन सर्वेषामपौरुषेयत्वोक्ते । इषेत्वादि ब्रह्मान्तं विवस्वानपश्यत्तन २ इति तत्रैव इषेत्वादि ब्रह्मान्तस्य सर्वस्यैव माध्यन्दिनपाठस्य विवस्वद्दृष्टत्वोक्तेश्च । ततश्च केषाञ्चिदध्यायाना मन्त्राणा च पश्चाद्यजितत्वादिकथन प्रमाणविरुद्धमेव । नह्यपौरुषेया वेदा पर्यनुयोक्तु शक्यास्तेषामनुरुषतन्त्रत्वात् । अभिप्रायस्तु वैदिकपारम्पर्यैरुपक्रमोप- सहारादिभिश्च तेषामवगन्तुं शक्यः । मन्त्रेषु खिला ब्राह्मणेषु परिशिष्टा न पश्चान्निक्षिप्तत्वाभिप्रायेण, किन्तु -', ( ), ':' ( भागविशेषाभिप्रायेणैव मन्तव्याः । यथा शेषे यजुः शब्दः मी ० सू० शेषे ब्राह्मणशब्द मी ० सू० इति । इषे त्वेति प्रारभ्य दर्शपौर्णमासपितृयज्ञाग्निहोत्रोपस्थानपशुचातुर्मास्याग्निष्टोमवाजपेयराजसूयसौत्रामण्यश्व- मेधमम्वद्धा मन्त्रा व्याख्याताः । इदानी खिलान्युच्यन्ते । कुतः खिलत्वमित्यपेक्षायामुक्तम् क्वचिद्विनियोगानुक्तेः । तत्रैव तेा विवस्वानपिरुक्त | आदित्यानामनि यजूषि व्याख्यायते' ( बृ० ५।५।३३ ) इति श्रुतेः । याज्ञवल्क्यो भी स्थिति में यह निश्चित है कि अन्तिम पन्द्रह अध्याय जो उनके बाद आने है बाद के और संभवतः बहुत बाद के काल के है । शुक्ल यजुस् की अनुक्रमणी में, जिसके साथ कात्यायन का नाम जुडा है, तथा इसके परिशिष्ट मे एवं आगे चलकर संहिता पर महोधर के भाष्य में भी अध्याय २६-३५ को स्पष्टत. 'खिल' या बाद मे जोडा गया अश कहा है । अध्याय ३६ -४० को 'शुक्रिय' कहा गया है । बाद मे जोडे गये इन अध्यायों में प्रथम चार मे ( २६-२९ ) ऐसे यजुस् है, जो पूर्व के अध्यायों में विवेचित यज्ञो से सम्बन्ध रखते हैं और उन्हें उनमे यथास्थान प्रयुक्त कर लेना चाहिये । इसके आगे के दस अध्यायो ( ३० - ३ ९ ) मे नितान्त नवीन यज्ञो के यजुस् है । ये ,, ( ) यज्ञ है पुरुषमेध सर्वमेध पितृमेध और प्रवग्य प्रायश्चित कर्म । अन्तिम अध्याय यज्ञो से किसी भी प्रकार का सीधा सम्बन्ध नही रखता । यह चिन्तन की एक पर्याप्त विकसित अवस्था से सम्बद्ध है, क्योकि यहाँ विश्व का एक स्वामी ( ईश) मान्य है' ( पृ० ९ ६ - ९ ७ ), किन्तु यह सारा कथन जब तक इसको तर्क की कसौटी पर नही कसा जाता, तभी तक अच्छा लगता है और कात्यायन की अनुक्रमणी से यहाँ बताये गये क्रम का स्पष्ट विरोध भी है । कात्यायन की सर्वानुक्रमणी के प्रारम्भ में ही शुक्ल यजुर्वेद की सभी शाखाओं की प्राप्ति भगवान् सूर्य से बताई गई है, अतः ये सभी शाखाएँ अपौरुषेय घोषित की गई है । बाद मे वही 'इषे त्वा' से लेकर 'खं ब्रह्म ' पर्यन्त पूरा माध्यन्दिन शाखा का पाठ भगवान् सूर्य के द्वारा परिदृष्ट बताया गया है । इस स्थिति में कुछ अध्यायों और मन्त्रो को बाद का बताना सर्वथा प्रमाण-विरुद्ध है । अपौरुषेय वेद के सम्बन्ध में यह तर्क नही दिया जा सकता कि ऐसा क्यों हुआ, ऐसा क्यो नही हुआ, क्योकि वे पुरुषो के पराधीन नही है । इनका अभिप्राय भी उपक्रम, उपसंहार प्रभूति षड्विध लिङ्गो के आधार पर ही समझा जा सकता है । मन्त्रो में खिल भाग और ब्राह्मणों में परिशिष्ट भाग बाद मे जोडे गये हो, ऐसी बात इन शब्दो से प्रकट नही होती, किन्तु ये उनके विशिष्ट भाग है, इतना ही इनका अभिप्राय है । जैसे ' शेषे यजु. शब्दः, शेषे ब्राह्मण शब्द:' इत्यादि सूत्रों में यजुस अथवा ब्राह्मण परिशिष्ट या परवर्ती के रूप में न होकर वेद के भागविशेष का ही द्योतक है । ' इषे त्वा' इम प्रथम मन्त्र से प्रारम्भ पर इस संहिता में दर्श- पूर्णमास, पितृयज्ञ, अग्निहोत्र, उपस्थान, पशुयाग, चातुर्मास्य याग, अग्निष्टोम वाजपेय, राजमूय, सोत्रामणी और अश्वमेघ से सम्बद्ध मन्त्रो का विधान है । इसके बाद कहा गया है कि अब खिलो का वर्णन किया जाता है । इनको खिल क्यो कहा जाता है? इस प्रश्न के उत्तर में बताया गया है कि इनको खिल इसलिये कहा गया है कि इनका कही विनियोग नही बताया गया है ।

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वेदार्थ पारिजातः६७६ :, ' ',वा ऋषि याज्ञवल्क्येन व्याख्यायन्ते इति श्रुतेः । शुकाध्याया अपि न प्रक्षिप्ता न वा पश्चाद् योजिता 'दध्यङ् ह वाथर्वणः एतं शुक्रमेतं यज्ञ विदाचकार' ( श०१४ | १ | १ | २० ) इति श्रुतेः । पाप्मभिरसस्पृष्ट शोचिष्मत शुक्ल शुक्रमुच्यते । अत एव प्रायश्चित्तकर्मविवेचकत्वात् शोधकत्वात् प्रकाशकत्वाच्च शुक्रियत्वमेतेषामध्यायानां , नासङ्गतम् । न तावतापि तेषामर्वाचीनत्व सिद्धयति । महावीरसम्भरणरूप प्रवर्ग्य द्वितीयादिसामानामङ्गमेव प्रथमसोमे तन्निषेधात् । तथैवान्तिमाध्यायस्य विश्वस्वामिप्रतिपादकत्वेऽपि नाधुनिकत्व सिद्धयति । न च चिन्तनस्य विकसितावस्थायामेकेश्वरवादस्य सत्त्वेनाधुनिकत्वं सम्भवतीति विकासवादस्यासिद्धे । सर्वेशितु शास्तुर्वचनं शास्त्र- मिति सिद्धान्तस्यैव वेदे सर्वत्र दर्शनात् । यदपि- 'यजुर्मन्त्राणां स्वब्राह्मणसम्बन्धेनैतत्तथ्य प्रमीयते 1। तैत्तिरीयसहिताया तान्येव यजूषि लभ्यन्ते याम्यष्टादशाध्यायेषु लभ्यन्ते । केचिदश्वमेधीयमन्त्रा अपि । अश्वमेधयज्ञसम्बन्धिनः शेषमन्त्रा. सौत्रामणीपुरुषमेध- मन्त्रैः सार्धं तैत्तिरीयब्राह्मणेन विवेचिताः । सर्वमेधयज्ञस्य प्रायश्चित्तकर्मणा पितृयज्ञानां च मन्त्रास्तैत्तिरीयारण्यके समायान्ति । तथैव शुक्लयजुर्ब्राह्मणे प्रथमाध्यायमारभ्याष्टादशाध्यायपर्यन्त समागताना मन्त्राणां पूर्णरूपेण समुद्धरणं शब्दशो व्याख्या च दृश्यते, किन्तु सोत्रामण्यश्वमेध पुरुषमेधसर्वमेध पितृयज्ञानां ( १ ९ -३५ ) षोडशाध्यायगताः कति- चिन्मन्त्राः शतपथब्राह्मणस्य द्वादशत्रयोदशकाण्डयोरुद्धृता दृश्यन्ते । तत्रापि व्याख्यामन्तरैव मन्त्राणामनुवाकाना वारम्भिकशब्दे रेवोद्धरणं दृश्यते । अन्तिमाध्यायात् पूर्वतनानाम् ( ३७-३९ ) त्र्यध्यायानां व्याख्या चतुर्दशकाण्डस्यारम्भे कृता दृश्यते । येपा मन्त्राणामारम्भिकशब्देरेव निर्देश कृतः, येपा च व्याख्या न कृताः, ते मन्त्राः सामान्यबोधगम्या यही इनका ऋषि विवस्वान् ( सूर्य ) ही बताया गया है । बृहदारण्यक श्रुति मे स्पष्ट बताया गया है कि ये यजुस् आदित्य ( सूर्य) से प्राप्त है । अथवा इनका ऋषि याज्ञवल्क्य है, क्योकि श्रुति में यह भी बताया गया है कि इनका व्याख्यान याज्ञवल्क्य करते हैं । शुक्राध्याय भी न तो प्रक्षिप्त है और न बाद में ही जोड़े गये हैं । इसमे 'दव्यड्' इत्यादि शतपथ श्रुति प्रमाण है । सभी तरह के कलुषो से असयुक्त प्रकाशयुक्त शुक्ल यजुस् यहाँ 'शुक्र' नाम से अभिहित है । इसीलिये प्रायश्चित्त कर्मों के विवेचक, पापो के शोधक, ज्ञान के प्रकाशक इन अध्यायो का नाम शुक्रिय रखना कोई असंगत बात नही है और न इतने से इनकी अर्वाचीनता ही सिद्ध हो सकती है । महावीर सभरण रूप प्रवर्ग्य द्वितीयादि सोमो का अङ्ग ही है, क्योकि प्रथम सोम में वह निषिद्ध है । इसी तरह से अन्तिम अध्याय विश्व के एक स्वामी का प्रतिपादक होते हुए भी आधुनिक ( नवीन ) नही सिद्ध किया जा सकता । चिन्तन की विकसित अवस्था मे ही एकेश्वर वाद आता है, यह बात भी ठीक नही है, क्योकि स्वयं विकासवाद ही एक असिद्ध कल्पना मात्र है । सबके स्वामी सबके शासक एक भगवान् का वचन ही शास्त्र है, यह एकेश्वर वाद का सिद्धान्त ही सदा से वेद के द्वारा प्रतिपादित है और सर्वत्र मान्य है । इसके बाद बेवर ने लिखा है- ' इन पन्द्रह अध्यायों के परवर्ती काल की रचना होने के ऊपर उल्लिखित बाह्य प्रमाण के अतिरिक्त भी उनको उत्तरकालीनता उनके कृष्ण यजुस् तथा स्वयं अपने ब्राह्मण के साथ संबन्ध द्वारा और स्वयं इन्ही में पाये जाने वाले तथ्यों से पर्याप्त रूप से प्रमाणित है । तैत्तिरीय संहिता मे केवल वे ही यजुस् मन्त्र आते है, जो पहले १८ अध्यायो मे पाये जाते है । उनके साथ कुछ मन्त्र अश्वमेघ यज्ञ के भी है । अश्वमेध यज्ञ के शेष मन्त्रो का सोत्रामणी और पुरुषमेध यज्ञ के मन्त्रो के साथ केवल तैत्तिरीय ब्राह्मण ने विवेचन किया है तथा सर्वमेघ यज्ञ एवं प्रायश्चित्त कर्मों तथा पितृयज्ञो के मन्त्र केवल तैत्तिरीय आरण्यक में आते हैं । इसी प्रकार शुक्ल यजुस् के ब्राह्मण मे प्रथम अठारह अध्यायो का पूर्ण रूप से उद्धरण दिया गया है और उनकी व्याख्या शब्दश: की गई है, किन्तु सोत्रामणी, अश्वमेध, पुरुषमेध, सर्वमेव और पितृयज्ञो के कुछ ही मन्त्रो ( १ ९-३५ ) का उल्लेख बारहवें और तेरहवें अध्यायो में हुआ है और वह भी अधिकांशतः केवल आरम्भिक शब्दो द्वारा अथवा केवल अनुवाको के प्राथमिक शब्द द्वारा बिना किसी व्याख्या के उनको उद्धरण दिया गया है । केवल अन्तिम अध्याय के पहले के तीन अध्यायों ( ३७-३९ ) की ही चौदहवें अध्याय के आरम्भ में पुनः व्याख्या हुई है । जिन मन्त्रो का केवल आरंभिक शब्दो द्वारा निर्देश कर दिया गया है, उनकी व्याख्या अनावश्यक समझी गई है । संभवतः इसका कारण यह है कि उस समय ये सामान्यतः बोधगम्य मे । अत एव हमें इस बात

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वेदार्थपारिजातः ९७७ मताः । अतो ब्राह्मणरचनाकाले ते मन्त्रास्तेनैव रूपेणासन् यथेदानीमुपलभ्यन्त इत्यत्र किमपि प्रमाणं नोपलभ्यते । येषां च मन्त्राणा ब्राह्मणेषूल्लेखो नास्ति ते ब्राह्मणरचनाकाले मन्त्रसहिताया न युक्ता आसन्निति कल्पना स्वतः समुदेति - एतादृशा मन्त्रा ऋग्वेदीया अन्ये च ब्राह्मणस्वरूपा । यथा कृष्णयजुर्वेदीयानि ब्राह्मणानि यानि मन्त्राणां व्याख्या न कुर्वन्ति यथैकोनविशेऽध्यायेऽनेकेऽनुच्छेदा, चतुर्विशेऽध्याये वाश्वमेधीयबलिपशुसूचकाः, अष्टादशेऽध्यायेऽपि कानिचिद्यजूषि तादृशानि सन्ति यानि ब्राह्मण नोल्लिखति, येषा मन्त्राणामनुवाकाना वारम्भिकशब्दानुद्धरति । एवं षोडशे सप्तदशेऽष्टादशे चाध्याये ब्राह्मणानि दृश्यन्ते' इति । तदपि वैदिकस्वरूपाज्ञानमूलकमेव, अनेकभेदभिन्नाना शाखानामन्यशाखाभि. सर्वथा सारूप्यासम्भवात् । तस्मान्नावश्यं तैत्तिरीयपाठमध्यन्दिनपाठाना मारूप्यमावश्यकम् । मन्त्रा ब्राह्मणानि च वेदा एव । तेन ब्राह्मण न मन्नाणा भाष्यं व्याख्यान वा, किन्तु यथा कर्माङ्गत्वेन व्रीह्यादीनि द्रव्याणि विधाय तत्सस्कार विधत्ते तथैव कर्माङ्ग- त्वेन मन्त्रान् विधाय सस्काररूपेण तद्व्याख्यान विधत्ते । यज्ञादिकर्मणां विधानं ब्राह्मणेष्वेव विद्यते ॥ तत्र मन्त्राणा द्रव्यदेवतास्मारकत्वेनादृष्टविशेपायैव विधान भवति । कुत्र केषा विधान स्यादित्यत्र श्रुतिलिङ्गवाक्य प्रकरणस्थान- समाख्या एव प्रमाणानि । अत एव क्वचिद् ब्राह्मणमन्तरापि मन्त्रलिङ्गबलादपि मन्त्रविनियोगो भवति ॥ ब्राह्मण श्रुतित्वात् स्वतः प्रमाणमतोऽपर्यनुयोज्यम् । यथावचनं तु तात्पर्यमवगन्तव्यम् । अन्यथाग्निहोत्रादिकमपि कथ विधीयेत? पाश्चात्त्या अन्ये च प्रत्यक्षानुमानमूलकत्वाच्छब्दानां प्रामाण्यमुपयन्ति न स्वातन्त्र्येण? वैदिकानां तु प्रत्यक्षानुमानमूल- कत्व शब्दानामप्रामाण्यप्रयोजकम्, अनुवादकत्वेनानधिगतगन्तृत्वाभावात् । अज्ञातज्ञापकत्वेनैव प्रमाणाना प्रामाण्यात् । का कोई प्रमाण नही मिलता कि ब्राह्मण के रचयिता के समय में वे मन्त्र उसी रूप मे थे, जिस रूप में वे इस समय उपलब्ध होते है । इसके विपरीत जहाँ तक ऐसे मन्त्रो का प्रश्न है, जिनका उल्लेख बिलकुल नही किया गया है, यह कल्पना स्वत. ही उत्पन्न होती हैं कि वे उस समय तक ब्राह्मणो की रचना के समय जो संहिता थी, उसमे जोडे नही गये थे । ऐसे मन्त्र या तो ऋग्वेद से लिये गये थे या ब्राह्मण स्वरूप वाले थे, जो कृष्ण यजुर्वेद के समान अपने पूर्व आने वाले मन्त्रो की व्याख्या नही करते । उदाहरण के लिये उन्नीसवें अध्याय के अनेक अनुच्छेद और चौबीसवें अध्याय में अश्वमेध के समय बलिरूप में मारे जाने वाले अनेक पशुओ की सूची । प्रथम अठारह अध्यायो में भी कुछ ऐसे यजुर्मन्त्र है, जिनका या तो ब्राह्मण उल्लेख नही करता अथवा केवल उनके आरंभिक शब्दो का उद्धरण देता है या केवल अनुवाक के प्रथम शब्द का ही निर्देश देकर उल्लेख करता है, किन्तु ऐसी बात केवल सोलहवें, सत्रहवें, और अठारहवें अध्यायों में देखी जाती है' ( पृ० ९ ७ - ९ ८ ) । किन्तु यह पूरा कथन भी वैदिक वाड्मय के स्वरूप को न समझ पाने के कारण ही है, क्योकि वैदिक शाखाओ मे परस्पर अनेक भिन्नतायें है, इनकी एक दूसरी शाखा से परस्पर सर्वात्मना कोई समानता नही रह सकती । इसलिए यह आवश्यक नही है कि तैत्तिरीय शाखा का पाठ माध्यन्दिन शाखा के पाठ से मिलता-जुलता ही हो । मन्त्र और ब्राह्मण दोनों वेद है । इसलिये ब्राह्मण मन्त्रो के भाष्य या व्याख्यान नहीं है । किन्तु जैसे ये कर्म के अग के रूप में व्रीहि प्रभृति द्रव्यों का विधान कर उनका संस्कार करते हैं, उसी तरह से कर्म के अंग के रूप मे मन्त्रो का विधान कर उनकी व्याख्या भी उनके सस्कार के रूप में ही करते हैं । यज्ञादि कर्मों का विधान ब्राह्मण ग्रन्थो मे ही मिलता है । यहाँ मन्त्रो का विनियोग द्रव्य और देवता के स्मारक के रूप मे अदृष्ट विशेष की उत्पत्ति के लिये ही होता है । किसका कहीं विधान होगा, इस विषय में श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या स्वरूप षड्विध लिंग ही प्रमाण है । इसीलिये कभी-कभी ब्राह्मण वाक्यों के अभाव मे भी मन्त्र रूपी लिङ्ग की सामर्थ्य से मन्त्रो का विनियोग किया जाता है । ब्राह्मण स्वयं श्रुति है, अत: वह भी स्वतन्त्र रूप से प्रमाण है । उन पर किसी तरह का आक्षेप नही किया जा सकता । उनका तात्पर्य उन्हीं के वचनो के अनुसार समझना चाहिये । अन्यथा अग्निहोत्र प्रभृति कर्मों का विधान कैसे हो सकेगा? पाश्चात्य तथा अन्य विद्वान् प्रत्यक्ष और अनुमान के आधार पर ही शब्दों को प्रमाण मानते है, स्वतन्त्र रूप से नही । इसके विपरीत वैदिक विद्वान् शब्दो की प्रत्यक्ष और अनुमान पर आधारित मान्यता को प्रमाण नही मानते, क्योंकि इस परिस्थिति में शब्द १२३

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६७८ वेदार्थपारिजातः अनधिगतावाधितार्थविषयज्ञानत्वं प्रमात्वमित्येव प्रमालक्षणम् । अत एव श्रोत्राद्यनुपलब्धरूपज्ञापकत्वेनैव चक्षुष उपयोगः । अन्यथा तद्वैयर्थ्यापत्ते । तदुक्तम् -'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धयते । एन विदन्ति वेदेन ' ( )तस्माद्वेदस्य वेदता ॥ श्लो० वा ० इति । न च मनुष्याः प्रत्यक्षानुमानागम्य वस्तु विदन्ति स्वातन्त्र्येण 1। तस्माच्छोत्रादिव्यतिरिक्तचक्षुरादिवत् प्रत्यक्षानुमानादिव्यतिरिक्त शब्दप्रमाणमभ्युपेयते । शब्दानां प्रामाण्य सर्वैरुपेयते । वक्तृदोषादप्रामाण्यं वक्तृगुणाच्च प्रामाण्यम् । वैदिकैस्त्वपौरुषेयत्वात् पुरुषाश्रितदोषदूषितत्वासम्भवेन वैदिकशब्दानां चक्षुरादिवत् स्वतन्त्र स्वतः प्रामा-ण्यमुपेयते । अत एव ब्राह्मणरचनाकाले केचिन्मन्त्रा न रचिताः केचिद्रचिता इत्यादिवचन वैदिकान् प्रति सर्वथा रिक्तमेव, तैर्ब्राह्मणाना मन्त्राणा च रचनानभ्युपगमात्, साध्यहेत्वप्रसिद्धेश्च । न च सर्वे मन्त्रा. कर्मार्था एव, येन सर्वेषा-मवश्य विनियोगो भवेत् । यतो ह्यकर्मशेषा ब्रह्मपरा अपि मन्त्राः । उपासनाशेषा ब्रह्मयज्ञाद्यर्थाश्चान्ये । तस्मादग्नि-होत्रादिषु ब्राह्मणविहितेषु कर्मषु येषा विनियोगो व्याख्यान चापेक्षितम्, तेषामुद्धरणं व्याख्यान च ब्राह्मणे युक्तम् । येषां यज्ञेषु विनियोगो नापेक्षितस्तेषा नोद्धरणम् । येषा व्याख्यान संस्कारनैरपेक्ष्येणैव विधान तेषा मन्त्राणामनुवाकानां च प्रतोकोद्धरणम् । मन्त्राणां ब्राह्मणेष्वनुद्धरणेऽपि सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वमभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा ब्राह्मणसत्त्वेऽपि किं प्रमाणमिति पर्यनुयोगोऽपि तुल्य एव । यजुर्वेदीयमन्त्रेषु केषाञ्चनार्थवशान्नियताक्ष रावसानत्वेन ऋक्त्वेऽपि यजुर्धर्मेण पाठाद् यजुर्वेदत्वमेव । के मन्त्राः कानि ब्राह्मणानीत्यत्र सम्प्रदाय एव शरणम् । अन्यथा त्वदभि- प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा ज्ञात अर्थ के अनुवादक मात्र रह जाते है, अतः उनमे अज्ञात अर्थ की ज्ञापकता रूप प्रामाण्य का बोधक चिह्न नही रह जाता । प्रमाणो की प्रामाणिकता यही है कि वे किसी अन्य प्रमाण से अज्ञात वस्तु के बोधक हो । अनधिगत और अबाधित वस्तुविषयक ज्ञान को ही प्रमाण कहा जाता है । इसीलिए श्रोत्र आदि से उपलब्ध न होने वाले रूप के ग्रहण मे चक्षुरिन्द्रिय का उपयोग माना जाता है । अन्यथा वह व्यर्थ हो जायगा । जैसा कि कहा गया है-'प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाण से जिन स्वर्गादि के साधक उपायो का ज्ञान नही हो सकता, उसको वेद से जाना जाता है । इसी में ' वेद' शब्द की सार्थकता है' । मनुष्य प्रत्यक्ष और अनुमान से प्रतीत न होने वाली वस्तु का ज्ञान बिना किसी प्रमाण की सहायता के स्वतन्त्र रूप से नही प्राप्त कर सकते । इसलिये जैसे श्रोत्र प्रभृति इन्द्रियो से अतिरिक्त रूप को ग्रहण करने वाली चक्षुरिन्द्रिय का अस्तित्व है, उसी तरह से प्रत्यक्ष और अनुमानादि से अतिरिक्त शब्द प्रमाण का भी अस्तित्व स्वीकार करना पडता है । शब्दो का प्रामाण्य सभी को अभिप्रेत है । वक्ता के दोष से इनमे अप्रामाण्य और वक्ता के गुण के आधार पर ये प्रमाण माने जाते है । वेद तो अपौरुषेय है । ये पुरुष मे रहने वाले दोषों से दूषित नही हो सकते । अत • वैदिक शब्द रूप के ग्रहण में चक्षुरिन्द्रिय के समान स्वतन्त्र रूप से स्वतः प्रमाण माने जाते है । इसीलिए ब्राह्मण ग्रन्थो की रचना के समय कुछ मन्त्र निर्मित हो चुके थे और कुछ नही, इस तरह की बातें वैदिकों की दृष्टि से सर्वथा व्यर्थ है, क्योकि वे ब्राह्मणो और मन्त्रो की रचना की बात मानते ही नही । न तो यहाँ साध्य ही सिद्ध , जिससे कि सभी का विनियोग अवश्य हो, क्योकि हो पाता है और न हेतु ही । सभी मन्त्र केवल क्रियाकाण्ड के लिये है भी नही कुछ मन्त्र ब्रह्मपरक भी है, जो कि कर्माग किसी भी तरह नही बनते । इसके अतिरिक्त कुछ मन्त्र उपासना और ब्रह्मयज्ञ आदि के भी विनियोग होता है, या जिनकी व्याख्या अपेक्षित रहती है, " अंग है । इमलिये ब्राह्मण विहित अग्निहोत्र प्रभूति कर्मों में जिन मन्त्रो का उनका उद्धरण और व्याख्यान ब्राह्मण ग्रन्थो में मिले यह तो ठीक है, किन्तु जिसका यज्ञों में विनियोग अपेक्षित नही है, उनका उद्धरण न मिले इसमे क्या अनौचित्य है? जिनका विधान बिना व्याख्या रूपी संस्कार के ही हो सकता है, उन मन्त्रो और अनुवाको को प्रतीक रूप में ही उद्धृत कर दिया गया है । जो मन्त्र ब्राह्मणो में उद्धृत नही है, उनकी भी अविच्छिन्न साम्प्रदायिक परम्परा माननी पडेगी और यह भी मानना पड़ेगा कि इनका कर्ता कौन है? इसका अविच्छिन्न परम्परा के रहते भी किसी को ज्ञान नहीं हैं । अन्यथा यह भी आक्षेप किया जा सकता है कि ब्राह्मण की सत्ता में भी क्या प्रमाण है? यजुर्वेद मे आये मन्त्रों में से कुछ का अर्थ के अनुसार नियत अक्षरो में बंधान होने से उनमें ऋक् के लक्षण घटते हैं, तो भी यहाँ उनका पाठ यजुस् की तरह ही होगा और इसलिये ये मन्त्र यजुर्वेद के ही कहे जायेंगे । मन्त्र किसको कहते हैं और ब्राह्मण किसको? इसमें साम्प्रदायिक परम्परा ही प्रमाण

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वेदार्थपारिजातः III मतमन्त्राणामेव कुतो मन्त्रत्वमिति पर्यनुयोगे तवैव किमुत्तरम्? इमानि वायविलवाक्यानीत्यत्रापि किं प्रमाणमिति प्रश्नस्य तुल्यत्वात् । विभिन्नशाखीया मन्त्रा स्वतन्त्रा एव अशत प्रत्यभिज्ञानेऽप्यशतो वैरूप्योपलब्धेः । क्वचित् सारूप्येऽपि सम्प्रदायभेदेन भिन्नत्वात् । 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ' इति मन्त्रे दृष्ट एवात्मनीश्वरे इत्यन्तिमपदभेदेनैव मन्त्रभिन्नत्वाभ्युपगमात् । अत एवान्यतोऽन्यत्रोद्धरणं नाभ्युपेयते, समेषा सम्प्रदायानामनादित्वात् स्वतन्त्रत्वाच्च । यदप्युक्तम् —' माध्यन्दिनपाठस्य षोडशाध्याये प्रथम प्रज्वलिताग्नेर्देवतारूपेण रुद्रस्यानेकानि विशेषणानि । - ततः पर तान्येव शिवस्य विशेषणत्वेनोक्तानि तथापीशान महादेवेत्येते महत्त्वपूर्ण विशेषणे शिवे न प्रयुक्त । तयो पुनरेकोनचत्वारिंशेऽध्याये संकरवर्णने या संख्या दृश्यते, सा षोडशाध्यायगतसख्याया अप्यधिका दृश्यते । तेनेद ज्ञायते यत् त्रिशेऽध्याये या वर्णिता सङ्करजातयस्तासा सत्त्व षोडशाध्यायरचनाकाले नासीदिति । सहितायाः : षोडशत्रिंशाध्याययो रचनाकालस्य प्रभाव सर्वाधिको दृश्यते । तैत्तिरीयसहितागतषोडशाध्यायस्य परवर्तिकाल उपनिषत्सज्ञा जाता । शैवाना प्रधानतया नैकविधचौराणा पाटच्चराणां इत्यादिकर्मनिरताना रात्रौ बम्भ्रम्यमाणानां रुद्रसेवकत्वेन तत्र वर्णनं दृश्यते, तत्राराजकताया हिंसाप्रचुरायाश्चित्र दृश्यते, भारतीयवर्णसङ्कराणा विवेचनस्य वर्णव्यवस्थाया राजव्यवस्थायाश्च पूर्णविकासकालः सङ्केत्यते । ये बलान्निम्नवर्गेषु पातितास्तेषा प्रबलविरोध- प्रतिरोधमन्तरा वर्णव्यवस्थादीनां संस्थापन न सम्भाव्यते स्म । एते विरोधाः प्रत्यक्षेण शोषिताना शोषकः सह प्रकटिताः । सङ्घर्षेण वा व्यक्ताः । तेनैव निश्चिनुमो यद् रुद्राध्यायस्य तदानीमुत्पत्तिर्जाता यदा आदिवासिभिर्ब्रात्ये- श्च ब्राह्मणधर्मानङ्गीकर्तृभिरार्थैश्च ब्राह्मणधर्मविरोधे प्रत्यक्षमान्दोलन कृतम् । पश्चाच्च तेषां विरोध: पदाक्रान्त्या मानी जायगी । अन्यथा आप जिनको मन्त्र मानते है, उनको मन्त्र क्यो कहा जाता है? इस प्रश्न का आपके पास भी क्या उत्तर है? ये वाक्य बाइबिल के है, इसमे क्या प्रमाण है? इस प्रश्न को भी उसी तरह से उठाया जा सकता है । विभिन्न शाखाओ के मन्त्र स्वतन्त्र है । किसी अंश मे ये समान होते हुये भी इनमे पर्याप्त असमानता भी दिखाई पडती है | कही कही समानता है भी, तो वहाँ भी संप्रदाय की भिन्नता रहती है । 'भिद्यते हृदयग्रन्थि० ' इत्यादि मन्त्र मे अन्तिम पाद मे भेद होने से हो मन्त्र की भिन्नता मानी गई है । इसीलिये वैदिक परम्परा मे यह मत मान्य नही है कि एक जगह का मन्त्र दूसरी जगह उद्धृत किया गया है, क्योकि सभी संप्रदाय अनादि भी है और एक दूसरे से सर्वथा स्वतन्त्र भी है । 'बेवर आगे लिखते है - ' माध्यन्दिन पाठ के सोलहवें अध्याय मे प्रज्वलित अग्नि के देवता के रूप मे रुद्र को अनेक विशेषण दिये गये है, जो आगे चलकर शिव के लिये प्रयुक्त हुए है । इनमे दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विशेषणो, ईशान और महादेव, का प्रयोग शिव के लिये नही हुआ है । तीसवें अध्याय में संकर वर्णों की जो सख्या दी गई है, वह सोलहवें अध्याय मे दी गई संख्या से काफी अधिक है । इससे ज्ञात होता है कि तीसवें अध्याय में जिन सकर वर्णों का उल्लेख किया गया है, उन सभी वर्गों का सोलहवें अध्याय के समय मे अस्तित्व नही रहा होगा । संहिता के चालीस अध्यायो में सोलहवें और तीसवें अध्यायो पर रचना काल की छाप सर्वाधिक स्पष्ट रूप में पडी है । सोलहवा अध्याय, जिसके तैत्तिरीय पाठ को आगे चलकर उपनिषद् कहलाने का तथा शैव धर्म का प्रधान ग्रन्थ होने का सम्मान मिला, रुद्र की स्तुति का विवेचन करता है और अनेक प्रकार के चोरो, लुटेरों, हत्यारों, रात्रि में घूमने वालो और बटमारो की गणना कर, जिन्हे रुद्र का सेवक माना जाता है, यह हमारे संमुख अराजकता और हिंसा के काल का चित्र प्रस्तुत करता है । इसमें उपलब्ध विविध वर्णसंकरो का विवेचन भी यह संकेत देता है कि भारतीय वर्ण तथा राजव्यवस्था का पूर्णतः विकास हो चुका था । इनकी स्थापना उन लोगों के उग्र विरोध का सामना किये बिना नही हुई, जिन्हें निम्न कोटि के वर्गों में बलात् ढकेल दिया गया था । ये विरोध प्रत्यक्षतः शोषकों के साथ हुए होगे या सङ्घर्षो से प्रकट हो चुके होंगे । अतः एव मैं यही मानूंगा कि यह रुद्राध्याय उस समय का है, जब विजित आदिम जातियो तथा व्रात्यो या ब्राह्मण धर्म को न स्वीकार करने वाले आर्यों के आन्दोलन

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
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६८० वेदार्थपारिजातः चूर्णितः । एवविधस्यातङ्कस्योपद्रवस्य मूर्तरूपायाः प्रत्यक्षदेवतायाः पूजा नितरां स्वाभाविकोति । पुरुषमेधे बलिरूपेण ये विभिन्नवर्गीयाः पुरुषा समर्प्यत्वेन परिगणितास्ते प्रायेण भारतीयमङ्करजातीया एव । एतेन स्पष्टमिदं ज्ञायते यत्तदानी ब्राह्मणीया राज्यव्यवस्था पूर्णरूपेण परिपुष्टिमगासीदिति । तत्र कानिचिन्नामान्यतीव रोचकानि । यथा मागधस्य बलिरतिक्रुष्टाय दत्ता । अत्र महीधररीत्या घोरकोलाहलोऽतिक्रुष्ट । मागधशब्दस्य महाकाव्यीयदृष्ट्या चारणोऽर्थो गृह्यते, यश्च क्षत्रियस्त्रियां वंश्याज्जायते । नृत्याय शैलूषमित्यन्तरेण मङ्गतिश्च सङ्गच्छते । यद्यपि तत्पूर्व भाविभि. क्लीब- अयोग-पुश्चलूनां तादृशी सङ्गतिर्नास्ति । यद्यपि भरतसङ्गीतविदा नर्तकानां सर्वोच्चसम्मान कदाचिदपि नासीत्, तथापि मागधशब्दस्यान्यथापि व्याख्यान सम्भवति । यथाऽथर्वसंहिताया व्रात्यकाण्डे श्रद्धा पुंश्चली मित्रो मागध उक्तः । तथा च निन्दिताचरणस्य चारणस्यैव मागधशब्देन ग्रहण स्यात् । एवंविधासु स्थितिष्वपि लाट्यायनद्राह्यायणादिसामसूत्रादिरीत्या व्रात्याना मागधदेशीय ब्रह्मबन्धूना यः सम्बन्ध आसीत् तस्मात्, अथर्वसहितायां च मगधाना यथाऽनादरेणोल्लेखस्तस्माच्चेद विज्ञातु शक्यते यद् व्रात्यकाण्डीयमागधशब्दस्य विधर्मी नास्तिकाचार्योऽर्थः । ' (एतेन मागधपुंश्चलीद्यूतकारादयो न शूद्रा न ब्राह्मणा आसन् । मागधामागधा नास्तिकानास्तिका बौद्धाबौद्धा इत्यर्थ पृ ० ९९ -१०६ ) इत्यादिकम् । , तत्सर्वमपि वेदार्थाज्ञान- भारतीयशास्त्र धर्म विद्वेषमूलकम् उभयोरध्याययोविषयभेदेन तद्वर्णनभेदस्य युक्तत्वात् । षोडशाध्याये शतरुद्रियाख्यहोममन्त्रा उक्ताः । अथात शतरुद्रियं जुहोतीत्युपक्रम्य स एषोऽत्राग्निश्चितो बुभुक्षमाणो रुद्ररूपेणावतिष्ठते । तस्य देवंस्तर्पण कृतम् । अत्र रुद्रपदाभिधेयस्य परमेश्वरस्य सार्वात्म्यं विवक्षितम्, सर्वरूपेण तस्यैव नमस्करणीयत्वात् । त्वदाविष्कृतकुकल्पनाबोधकं त्वेकमपि पद रुद्राध्याये न दृश्यते, व्रात्यादिभिर्ब्राह्मण- उनके खुले आम विरोध के उपरान्त कुचल दिये गये थे । ऐसे समय मे आतक और उपद्रव के मूर्तरूप मे प्रसिद्ध देवता की पूजा नितान्त स्वाभाविक है । पुरुषमेष में बलि के रूप में अर्पित किये जाने वाले विभिन्न वर्गों के पुरुषों को गिनाते हुए तीसवें अध्याय में अधिकाश भारतीय संकर वर्णों के नाम दे दिये गये है, जिससे हम स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते है कि उस समय ब्राह्मणीय राजव्यवस्था पूर्णरूप से पुष्ट हो चुकी थी । इनमें दिये गये कुछ नाम विशेष रोचक है । उदाहरण के लिये ' मागध' की बलि ' अतिक्रुष्ट ' के लिये दी गई है । यदि हम अतिक्रुष्ट का अर्थ ' घोर कोलाहल' लें तो महीधर के अनुसार ' मागध' का महाकाव्यीय अर्थ के सन्दर्भ में 'चारण ' अर्थ होगा, जो क्षत्रिया स्त्री से उत्पन्न वैश्य का पुत्र होता था । इसकी पूर्ण संगति इसके तत्काल बाद आने वाली नृत्य के लिये शैलूष की बलि से बैठती है । यद्यपि इसकी सङ्गति इतने उत्तम ढङ्ग से इसके पूर्व आने वाली क्लीब ( नपुसक ), अयोगू ( जुआडी ) और पुश्चालू ( वेश्या ) की बलियो से नही बैठती । यद्यपि भारत मे भी संगीतविशे, नर्तकों और गायको (शैलूष ) को कभी भी सर्वोच्च सम्मान नही प्राप्त हुआ था, तथापि मागध शब्द को दूसरी व्याख्या भी सम्भव है । अथर्वसहिता के पन्द्रहवें काण्ड में, जिसे व्रात्यकाण्ड कहते हैं, व्रात्यो का पुश्चली और मागघ के साथ विशेष सम्बन्ध दिखाया गया है । श्रद्धा को पुश्चली और मित्र का उसका मागध कहा गया है । यहाँ मागध शब्द से निन्दित जीवन व्यतीत करने वाले चारण को ही अभिहित किया गया है । इन सभी स्थितियों के होते हुए भी लाट्यायन और द्राह्मायण के साम-सूत्रो एवं अथर्वसंहिता आदि में मगधो का जिस प्रकार अनादर के साथ उल्लेख किया गया है, इनसे हमें व्रात्यकाण्ड के 'मागध' का विधर्मी या नास्तिक आचार्य का अर्थ लेना होगा । इससे यह स्पष्ट होता है कि मागघ, पुंश्चली, द्यूतकार प्रभूति न तो शूद्र थे और न ब्राह्मण ही । 'मागध' शब्द का अर्थ हम नास्तिक ( बौद्ध ) ले सकते है' (पृ० ९९ -१०१ ) । यह सारा कथन वेदो का अर्थ ठीक से न समझ पाने के कारण और जान- बूझकर भारतीय शास्त्र और धर्म का विरोध करने की प्रवृत्ति के कारण है, क्योंकि उक्त दोनो अध्यायो का विषय भिन्न है, अतः इनका वर्णन भी भिन्न प्रकार का हो, यह उचित ही हैं । सोलहवें अध्याय में शतरुद्रिय होम के मन्त्र बताये गये हैं । ' अब शतरुद्रिय होम का अनुष्ठान करता है' इस तरह से उपक्रम करके आगे बताया गया है कि यहाँ जिस अग्नि का चयन किया गया है, वह भूखा होने से रौद्र रूप धारण किये हुए है । उसको देवगण तृप्त करते है । यहाँ 'रुद्र' पद से प्रतीत हो रहे परमेश्वर को सर्वात्मकता विवक्षित है, सभी रूपो में केवल वही वन्दनीय है । आपके द्वारा