वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 881–890
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 881–890
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वेदार्थपारिजातः १७७९ 'आशंसायां भूतवञ्च' ( पा० सू० ३।३।१३२ ) इतिरीत्या भूतकालिकः क्तप्रत्ययो भविष्यत्कालेऽपि भवति । तदुदाहरणं तु मुद्राराक्षसस्यारम्भे ' मुक्तां शिखां परिमृशन्' इति चाणक्यसम्बन्ध उक्तम् । सप्तमेऽङ्के - 'मया पूर्णप्रतिज्ञेन केवलं ' बद्ध्यते शिखा इत्युपान्तिके पद्ये प्रतिज्ञां पूरयित्वा शिखाबन्धनमुक्तम् । ततः पूर्वं तृतीये चन्द्रगुप्तेन काल्पनिकविवादे- 'शिखां मोक्तुं बद्धामपि.. पुनर्धावति करः' इत्यत्र यद्यपि शिखा न बद्धा, तथापि भूतकालिकः क्तप्रत्ययः प्रयुक्तः । अत्र बद्धामित्यस्य यथा बद्धमिष्टामित्यर्थः । अत्राशंसायां भविष्यत्कालिकेऽपि भूतवत् क्त प्रत्ययो भवति । तथैवोद्वाहितापीत्यत्राप्यु- द्वाहयितुमिष्टेति भविष्यत्यर्थे क्त प्रत्ययो बोध्यः । तथैव किरातार्जुनीये ' भवत्कृतां भूतिमपेक्षमाणा' इत्यत्रापि करिष्यमाणा- मित्यर्थे प्रत्ययस्य भविष्यत्काल एवार्थः । अन्यच्च - ' प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव. ।' ( भ० गी० ११२१ ) इत्यत्र शस्त्रसम्पातस्य प्रवृत्तौ गीताया आरम्भ उक्तः । अत्रापि क्त प्रत्ययस्य न भूतकालोऽर्थः, अन्यथा ' योत्स्यमानानवेक्षेऽहम्' ( भ० गी० १।२३ ) इत्यर्जुनवाक्ये भविष्यत्प्रयोगविरोधापत्तेः । शस्त्रसम्पातप्रवृत्त्यनन्तरं सप्तशतश्लोकात्मिकाया गीतायाः श्रवणं कथं स्यात्? अतो निकट- भविष्यत्यर्थं एव क्तप्रत्ययः । तथैवोद्वाहिताऽपीत्यस्य कन्याविवाहस्योद्योगे प्रारब्धेऽपीत्यर्थः । तथैवोत्तररामचरिते सप्तमेऽडू- 'प्रिये लोकान्तरं गतासि' इत्यत्र गमिष्यन्तीत्यर्थे क्त प्रत्ययः । तथैव पञ्चतन्त्र मित्रसम्प्राप्ती - भो मित्र सञ्जातोऽय तावन्मम मृत्युः' इति चित्राङ्गदवाक्ये सञ्जनिष्यमाण इत्यर्थः । अत एव स्मृतिषु मनोदत्ताया वाग्दत्ताया विवाहमिष्यमाणाया विवाहारम्भवत्या अपि पुनर्भूत्वेन विवाहे वर्जनीयतोक्ता । तदपवादत्वेनात्र तादृश्या कन्यात्वं मत्वा विवाहसंस्कारः कार्यं इत्युक्तम् ॥ ' नचेत्सम्प्राप्तमैथुना' इत्यस्यापि न समाप्तविवाहेत्येवार्थ:, मिथुनशब्दस्यविवाहार्थत्वात् । विवाहेनैव मिथुनं 'आशंसाया भूतवच्च' इस सूत्र के द्वारा भूतकालिक क्त प्रत्यय भविष्यकाल मे भी होता है । इसका उदाहरण मुद्रा- राक्षस के प्रारंभ में दिया गया है । चाणक्य आगे चलकर बंधी शिखा ( चोटी ) को खोलेगा, किन्तु यहाँ प्रारंभ में ही उसकी चर्चा कर दी गई है । सप्तम अंक में प्रतिज्ञा पूर्ण हो जाने पर वह पुनः शिखा बांध लेता है । बीच में तृतीय अंक में चन्द्रगुप्त के साथ नकली विवाद के अवसर पर चाणक्य कहता है कि बंधी हुई चोटी को खोल देने की मेरी फिर इच्छा हो रही है । यद्यपि इस अवसर पर उसकी शिखा बंधी हुई नही है, तो भी भूतकालिक क्त प्रत्यय का प्रयोग यहाँ किया गया है । यहाँ बद्ध का अर्थ होगा, जिसको बांधना अभीष्ट है । इस प्रकार यहाँ आशंसा मे भविष्यत् काल में भी भूतकाल के समान जैसे क प्रत्यय होता है, उसी तरह से 'उद्वाहितापि' इसका अर्थ भी जिसका विवाह किया जाना अभीष्ट है, इस तरह से बाशसा में भविष्यत् काल में क्त प्रत्यय माना जाना चाहिये । किरातार्जुनीय काव्य में भी 'भवत्कृताम्' यहाँ पर ' करिष्यमाणाम्' इस भविष्यकालीन अर्थ में क्त प्रत्यय हमा एक और बात है, भगवद्गीता में शस्त्र सम्पात की प्रवृत्ति होने पर गीता के उपदेश की बात कही गई है । यहाँ पर भी क्त प्रत्यय भूतकाल की अपेक्षा भविष्यत्काल में ही संगत हो सकता है । अर्जुन कहता है कि मै लडते हुए योद्धाओं को देखना चाहता हूँ । इसकी संगति भूतकालीन शस्त्रसंपात से कैसे बैठ सकती है । अतः यहाँ पर क्त प्रत्यय निकट भविष्य का ही द्योतक माना जायगा, क्योंकि युद्ध प्रारम्भ हो जाने के उपरान्त ७०० श्लोकों की गीता के श्रवण की संगति नही बैठ सकती । इसी तरह से 'उद्वाहितापि' इसका अर्थ होगा कि कन्या के विवाह का उद्योग प्रारंभ हो जाने पर भी । इसी तरह से उत्तर रामचरित नाटक के सातवें अंक मे 'प्रिये लोकान्तरं गतासि' यहाँ पर 'जाने वाली हो' इस अर्थ में क्तप्रत्यय हुआ है । पंचतन्त्र के मित्र सम्प्राप्ति प्रकरण में भी 'भो मित्र, संजातोऽयं तावन्मम मृत्यु:' इस चित्रागद के वाक्य में मृत्यु होने वाली हैं । इस अर्थ में ' संजातः' पद का प्रयोग हुआ है । इसीलिये स्मृतियों में मनोदत्ता अथवा वाग्दत्ता कन्या का, जिसका कि विवाह होने वाला है, विवाह संस्कार का आरंभ मान किये जाने के कारण { ही पुनर्भू दोष को निवृत्ति के लिए विवाह वर्जित माना गया है । उस वचन के अपवाद के रूप में इस प्रस्तुत वचन की प्रवृत्ति है कि ऐसी कन्या का विवाह संस्कार कर देना चाहिये । 'न चेत् सानाप्तमैथुना' इस वचन का भी विवाह की समाप्ति न होने में ही तात्पर्य है, क्योंकि मिथुन शब्द का अर्थ |
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वेदार्थपारिजातः १७८० द्वन्द्वमुपपद्यते । 'द्वन्द्वाद्वैरमैथुनिकयो:' ( पा ० सू० ४| ३| १२५ ) इति सूत्रे मैथुनिकपदस्य विवाहोऽर्थः । मिथुनं हि दम्पतीकर्म- क्रियानिष्पादनम् । मनोज्ञादिगणपाठत्वाद् वुञ्प्रत्ययः । एतदुदाहरणं कुत्सकुशिकिका | तत्त्वबोधिन्यां कुत्सकुशिकिकयोर्विवाह- रूपः सम्बन्धोऽर्थं उक्तः । तथा शातातपवचने ' न चेत्सम्प्राप्तमैथुना' इत्यस्याप्राप्तविवाहसम्बन्धवतीत्यर्थः । विवाहसम्बन्धः सप्तपदीं यावत् पूर्यते । तदा कन्याशब्दोऽपगच्छति । भार्याजायादिशब्दास्तत्र प्रयुज्यन्ते । अमरकोषानुसारेण 'मैथुनं सङ्गतं रते ' ( अमरकोषे ) इत्यसम्बन्धेऽपि मैथुनशब्दः । सम्बन्धो विवाहादारभ्यते सप्तमे पदे च पूर्यते । सप्तमात्पदात्पूर्वं कन्यात्वं भवति । तदा कारणवशात् कलो पराशराद्यनुसारेण सम्भवति विवाहसंस्कारः । मुहूर्त मार्तण्डेऽप्युक्तम्- 'पूर्वं सप्तपदीविघेर- धिगते दोषे, वरे वा मृते देयाऽन्यत्र विवाहितापि च बलाद् यब्धा च योनिनंचेत् ॥ ' न चेत् सम्प्राप्तमैथुनेत्यस्य मिथुनीभावात्पत्युः पूर्णपत्नीत्वात् सप्तपदीसम्पत्तेः पूर्वमसम्प्राप्तपूर्णपत्नीत्वभावाया असमाप्तसप्तमपदाया इत्येवार्थः । यथोक्त कुल्लूकभट्टेन- 'एवं च सप्तपदीदानात् प्राग् भार्यात्वानिष्पत्तेरनुशये जह्यान्न ऊर्ध्वम् ' ( म० ८ २२७ ) नारदस्मृती तु तादृश्या अपि पुनर्भू- त्वमुक्तम् । 'कन्यैवाक्षतयोनिर्या पाणिग्रहणदूषिता । पुनर्भूः प्रथमा पुनः संस्कारकर्मणि ॥ ' अतोनारदवचनेन विधवाविवाहः कथमपि न सिद्धयति-। ' ' ' ( ) यदपि स तु यद्यन्यजातीय ऊढापि देया सान्यस्मै कात्यायनस्मृती इत्यस्मिन् वचने विवाहस्य ------ चर्चा नास्ति, सधवाविवाहस्तु सम्भाव्यते..... । वस्तुतस्तु —तत्रापि ऊठाशब्दः पूर्ववद्विवाहादिकर्मणि ( विवाहप्रारम्भे ) वाग्दानादावेव मन्तव्यः । विवाहयितुमारब्धापि सान्यस्मै देया इत्येवार्थः क्रियाया आरम्भे क्त प्रत्ययविधानस्य पूर्वमुप- पादितत्वात् । यथा - 'अनुत्तमो रसो ह्येष प्रमीतमपि ( मृतमपि ) चेतयेत्' अत्र प्रमीतपदघटकक्तप्रत्ययो न सर्वथा मरणक्रिया- समाप्ती, किन्तु मृतप्रायमप्यय रसश्चेतयेदित्येवार्थः, तथैव ऊढापि विवाहितप्रायाप्यन्यस्मै देया इत्यर्थः । पूर्णविवाहितायां विवाहमन्त्राणां नैरर्थक्यात्, कन्यास्वेव तेषां प्रतिष्ठितत्वात् । यहाँ विवाह है । विवाह के बाद ही मिथुनभाव की प्रवृत्ति होती है । पाणिनि सूत्र ( ४| ३ | १२५ ) के मैथुनिक पद का अर्थ विवाह ही है । दम्पती द्वारा किये जाने वाले कार्य को मिथुनभाव कहते है । मनोज्ञादि गण में पाठ होने से बुन, प्रत्यय होता है 1। कुत्स- कुशिकिका का विवाह किया गया है । 'न चेत् सम्प्राप्त मैथुना' इस शास्त्रवचन का अर्थ भी 'जिसका विवाह सम्बन्ध अभी नहीं हुआ है' ऐसा होता है । सप्तपदी हो जाने पर ही विवाह संस्कार पूरा होता है । इसके बाद ही कन्या शब्द की निवृत्ति हो जाती है और उसके लिये भार्या, जाया प्रभुति शब्दों का प्रयोग होने लगता है । अमरकोश के अनुसार मैथुन शब्द का अर्थ रति के लिये सहवास किया जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि मैथुन शब्द की प्रवृत्ति क्रियानिष्यति में ही, रति के अभिप्राय से साथ साथ रहने में भी होती है । ऐसा संबन्ध सप्तपदी हो जाने पर सम्पूर्ण माना जाता है । इससे पहले वह कन्या ही मानी जाती है । इस अवस्था में पराशर प्रभृति के मत से उसका विवाह संस्कार हो सकता है । मुहूर्तमार्तण्ड मे भी इसी अभिप्राय को स्पष्ट किया गया है । ' न चेत् सम्प्राप्त- मैथुना' इसका सही अर्थ यह है कि मिथुनीभाव के बाद ही स्त्री पति की पूर्ण पत्नी बनती है, अतः सप्तपदी के पूर्व, जब तक कि उसका पत्नीत्व पूर्ण नही होता, उसका विवाह किया जा सकता है । इसीलिये कुल्लूक भट्ट ने कहा है कि सप्तपदी पूरी हो जाने के पहले वह पत्नी नही होती, अतः इससे पहले ही यदि वर की मृत्यु हो जाय, तो उस दशा में दूसरे के साथ विवाह किया जा सकता है, सप्तपदी पूरी हो जाने के बाद नही । नारद स्मृति में तो ऐसी दशा में भी उसको पुनर्भू ही माना गया है । अत नारद के मत के अनुसार विधवा विवाह का समर्थन किसी भी तरह नही किया जा सकता । कुछ लोगो के कथनानुसार ' सत् यद्यन्य ० ' इस कात्यायन वचन में विवाह की चर्चा नही है । सधवा विवाह की संभावना हो सकती है । किन्तु वास्तव में देखा जाय, तो यहाँ पर भी ऊढा शब्द ऊपर बताई पद्धति से विवाह कर्म की प्रारम्भिक दशा वाग्दान आदि के लिये ही प्रयुक्त माना जायगा । जैसे ' अनुत्तमो रसो ह्येष' इस घचन में प्रमीत शब्द का क्तप्रत्यय मरे हुए व्यक्ति का बोधक न होकर मरणोन्मुख व्यक्ति का बोध कराता है, उसी तरह से 'ऊढा' शब्द भी विवाहित कन्या के लिये प्रयुक्त माना जायगा, , उसके लिये पुन विवाह मन्त्रों का प्रयोग नही हो सकता । कन्या के लिये ही विवाह7 क्योंकि जिसका विवाह संस्कार पूरा हो चुका है मन्त्रों का उपयोग हो सकता है ।
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१७८१ वेदार्थपारिजातः किञ्च, उक्तपद्ये -'विकर्मस्थ. सगोत्रो वा दासो दीर्घामयोऽपि वा' इत्यादीनि पदान्यपि सन्ति । तथा सति पालयेज्जननीमिव'सगोत्राया अपि विवाहे जाते पुनर्विवाहः कर्त्तव्यः स्यात् । तच्च सर्वथा विरुद्धमेव 'भोगतस्तां परित्यज्य इति वचनविरोधात् । उक्तपद्यस्य प्राचीनेष्टीकारैर्निबन्धकारैश्च वाग्दानकालिकत्वमेवोक्तम् । भट्टोजिदीक्षितेन। अन्यथाचतुर्विंशतिसगोत्रो-, मतसंग्रहे ऊढापि इत्यत्रापिशब्देन कैमुतिकन्यायेन वाग्दत्ताया एव पुनर्दानमुक्तम् न पूर्णविवाहितायाः वाग्दत्तादानपर-ढायाः पुनर्विवाहे ' मातृवत्पालयेत् इति शास्त्रीयवचनं व्याकुप्येत । पराशरस्मृतेविद्वन्मनोहराटीकायामपि। ' कुलशीलविहीनस्य षण्ढादि-त्वमेवास्य वचनस्योक्तम् । वीरमित्रोदयस्यसंस्कारप्रकरणेऽपि तादृशमेव वशिष्ठवचनमुपलभ्यते सगोत्रोढा तथैव च । ' अत्रापि दत्तापदस्य ||,पतितस्य च । अपस्मारिविधर्मस्य रोगिणां वेषधारिणाम् दत्तामपि हरेत्कन्या पारस्करगृह्यसूत्र- वाग्दत्तेत्येवार्थः । उक्तवशिष्ठवचनस्य वाग्दत्तापरत्वं शब्दकल्पद्रुमकोषे, स्मृतितत्त्वे, अपरार्कटीकायाम् गदाधरटीकायाम्, वीरमित्रोदये चोक्तम् । न विधवाविवाहोऽर्थः, ' ' ( ), 'प्रदानं) स्वाम्यकारणम्' ( म० ५ १५२ ) दत्तामपि हरेत्पूर्वात् श्रेयांश्चेद्वर आव्रजेत् याज्ञवल्क्यस्मृति १६५ इति पद्यस्यापि इत्यत्र ' ' (किन्तु वाग्दत्ताया एव विवाह उक्तः । सकृत् कन्याप्रदीयते म० ९ ४७ । ततश्च वाग्दानादारभ्य स्त्री भर्तृपरतन्त्रा । --' कुल्लूकभट्टः यत्पुनः प्रथमं प्रदानं वाग्दानात्मकं तदेव भर्त्तु स्वाम्यजनकम् दत्तापदं वाग्दानार्थकमेव प्रसिद्धम् ।' अन्यदत्ता तु या कन्या पुनरन्यस्य दीयते ' ( अङ्गिर. स्मृती ६५ ) इत्यादिस्मृतिपद्येषुमिताक्षरा । तथैवापराया स्मृतितत्त्वे पारस्कर तदा दत्तामपि हरेत्' एतच्च सप्तमपदात् प्राग्द्रष्टव्यम्' इति याज्ञवल्क्यस्मृती, ' नदत्त्वा' ( म० ९१७१ ) इति पद्यस्य राघवानन्दटीकायामपि ( ), गदाधरभाष्ये शब्दकल्पद्रुमे म० ८ २२७ मेधातिथिटीकायाम् प्रशस्ततरो लभ्यते ततस्तस्मै देया न तु ' ' वाग्दत्तादानपरत्वमेवोक्तम् । पराशरमाधवेपि यस्मै वाचा दत्ता ततोऽन्यश्चेत्। 'सकृत्कन्या प्रदीयते, कन्या हरस्ता चौरदण्डभाक् दुष्टाय पूर्वस्मै' इति विवेचनेन नात्र विधवाविवाह उक्त इति सिद्धयति दीर्घ रोगी शब्द भी आते है । ऐसा मान लेने पर सगोत्रा,, फिर उक्त पद्य में बुरा कार्य करने वाला सगोत्र दासइसऔरवचन के विपरीत पडेगा कि सगोत्रा के साथ विवाह हो जाते का विबाह हो जाने पर भी पुनविवाह करना पडेगा । ऐसापालनकरनाकरे । प्राचीन टीकाकारो और निबन्धकारो ने उक्त पद्य में वाग्दान के पर उसके साथ भोग न करे और माता के समान उसका 'ऊढापि' यहाँ पर अपि शब्द से वाग्दत्ता के पुनर्दान का ही समय का ही उल्लेख माना है । भट्टोजि दीक्षित ने चतुर्विंशतिमतविवाहितसंग्रहस्त्रीमेंका पुनविवाह मानने पर उसका माता के समान पालन करने, विधान माना है पूर्ण विवाहिता का नही । अन्यथा सगोत्र स्मृति की विद्वन्मनोहरा टीका मे भी इस वचन को वाग्दान विष- का उपदेश करने वाला शास्त्रीय वचन बाधित हो जायगा । पराशरअभिप्राय का वशिष्ठ स्मृति का वचन मिलता है, जिसका यह अर्थ है- यक ही बताया है । वीरमित्रोदय के संस्कार प्रकरण में भी इसी तथा सगोत्री के साथ विवाहित कन्या को भी वापस ले लेना चाहिये । ,,,, कुल और शील से रहित नपुंसक पतित अपस्मार रोग से ग्रस्त स्मृति के इस वचन की इसी अर्थ की चर्चा शब्दकल्पद्रुम स्मृति- ' ' तथा वीरमित्रोदय में भी की यहाँ पर भी दत्ता पद का अर्थं वाग्दत्ता ही किया जाता है । वसिष्ठ गई है । तत्व, अपरार्क टीका, पारस्करगृह्य सूत्र की गदाधर टीका चाहिये' इस अभिप्राय के याज्ञवल्क्य स्मृति के वचन में ' ', ' श्रेष्ठ वर के मिल जाने पर दी गई कन्या कोकाभीहीवापसउल्लेखले हैलेना। कन्या एक ही बार दी जाती है प्रदान का अर्थ स्वामी भो विधवा विवाह का उल्लेख न होकर वाग्दत्ता के विवाह भट्ट कहते हैं कि वाग्दान हो पति के लिये स्त्री का प्रथम अर्पण है, तभी से बनना है' इत्यादि मनु वचनों की व्याख्या करते हुए कुल्लूकसमय से ही स्त्री पति के अधीन हो जाती है । अंगिरा स्मृति में भी दत्ता पद ' ' पति उसका स्वामी हो जाता है । इस तरह से वाग्दान के टीका में दत्ता का अर्थ सप्तपदी से पहले किया गया वाग्दान माना वाग्दान के अर्थ में ही प्रयुक्त है । याज्ञवल्क्य स्मृति की मिताक्षरागृह्यसूत्र के गदाधरभाष्य, शब्दकल्पद्रुम और मनु की मेधातिथि टीका में,, गया है । यही अर्थ अपरार्क टोका स्मृतितत्त्व पारस्कर भी वाग्दत्ता के दान का ही उल्लेख माना गया है । पराशर स्मृति भी किया गया है । मनुस्मृति ( ९।७१ ) की राघवानन्दगयाकी हैटीका, यदिमें उससे अच्छा वर मिल जाता है, तो उसी को कन्या देनी चाहिये, की माधवकृत टीका में भी 'जिसके लिये वाग्दान किया
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वेदार्थपारिजातः १७८२ इति विरोधाद् वाग्दानपरत्वमेव सिद्धयति । तदेव 'न दत्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद्विचक्षणः दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषानृतम् ॥ ' ( म ० ९।७१ ) इति वाग्दानं न परिवर्तनीयमिति मनुवचनं सङ्गच्छते । पराशरादिवचनंत्वपवाद- भूतमेव कलौ । 'प्रतिश्रुत्याप्यधर्मसंयुक्ताय न दद्यात्' ( गौतमसूत्र १/५/२१ ) इति गौतमसूत्रस्थवचनमपि स्मृतितत्त्वे पराशरमाधवीये च वाग्दानपरमेवैतदिति स्वीकृतम् । नारदस्मृतौ च ' दत्तां न्यायेन यो कन्यां वराय न ददाति ताम् । अदुष्टश्चेद्वरो राज्ञा स दण्ड्यस्तत्र चोरवत् ॥ ' ( नारदस्मृति १२।३३ ) इत्यदुष्टशब्दो दुष्टस्यापवादत्वं बोधयति, वाग्दत्ता दुष्टाय न देया इति । तस्मात् स्मृतिषु दत्तापदं प्रारम्भिकदानपरं, न पूर्णकन्यादानपरस्, क्रियायाः प्रारम्भेऽपि निष्ठाया उपपादितत्वात् । - " ', यत्तु ऊढायाः पुनरुद्वाहं कलौ पञ्च न कुर्वीरन् इति वचनेनान्ययुगे विधवाविवाहस्य न्याय्यत्वमुक्तम् तन्न प्रत्यक्ष परोक्षकल्पनाया अन्याय्यत्वात् । न च युगविशेषे निषेधेन युगान्तरे तस्य कर्त्तव्यता सिद्धयति । 'स्त्रीणां पुनर्विवा- हस्तु.........स्वातन्त्र्यं वा कलियुगे न कर्त्तव्यं कदाचन' इति ब्रह्मपुराणवचने कलौ स्वातन्त्र्यनिषेधेऽपि युगान्तरे तदभावा- सिद्धेः । 'न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्' ( म० ५।१४८ ), ' न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' (म ० ९ ३ ) इत्यादिवचनानां वैयर्थ्यापत्तेः । 'कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गीतमाः स्मृताः । द्वापरे शङ्खलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः ॥ ' (पराशरस्मृति १/२४) नै- तद्वचनेनापि मनुप्रोक्तधर्माणां कलियुगेऽमान्यता पाराशराणां वा कृते मान्यता स्यात् । निबन्धग्रन्थेष्वादित्यपुराणस्य बृहन्नारदीयपुराणनाम्ना कलिवर्ज्यप्रकरणे कन्यानामसवर्णानां विवाहश्च द्विजा-तिभिः । द्विजानामसवर्णासु कन्यासूपयमस्तथा ।' इत्यादिनाऽसवर्ण कन्या विवाहो निषिद्धोऽस्ति 1। नैतावता कलावेवैतेषां निषे- पहले वाला यदि दुष्ट हैं, तो उसको नही' ऐसा अर्थ किया गया है । तदनुसार यहाँ पर विधवा विवाह का उल्लेख नही सिद्ध होता । ' कन्या एक बार ही दी जाती है ' इस वचन से भी वाग्दान का हो उल्लेख सिद्ध हो पाता है । तभी मनु वचन की सार्थकता सिद्ध हो पाती है कि दी गईं कन्या को पुनः दूसरे को न दे । ऐसा करने पर पुरुष पापभागी होता है । इस मनुवचन का अभिप्राय यही है कि वाग्दान को लौटाना नही चाहिये । पराशर का वचन तो कलियुग के लिये अपवाद माना जायगा । ' बात पक्की हो जाने पर अधर्मी व्यक्ति को कन्या न दे । इस गौतम वचन का तात्पर्य पराशर माधवीय और स्मृतितत्त्व में वाग्दान मे ही माना गया है । नारद स्मृति ( १२/३३ ) में आया अदुष्ट शब्द यह सिद्ध करता है कि जिसको वाग्दान किया गया वह यदि दुष्ट है, तो उसको कन्या नही देनी चाहिये । इस पूरे प्रकरण से यही सिद्ध होता है कि स्मृतियों में आया ' दत्ता' पद प्रारंभिक वाग्दान से ही संबद्ध है, पूर्ण कन्यादान का बोधक नहीं । यह बताया जा चुका है कि क्रिया के प्रारंभ हो जाने पर भी निष्ठा प्रत्यय हो सकता है । कुछ लोगों ने विवाहिता का पुनर्विवाह प्रभृति पाँच कार्यों को कलियुग में निषिद्ध घोषित करने वाले वचन के आधार पर अन्य गुगो में विधवा -विवाह का औचित्य सिद्ध किया है । उनके इस कथन का यह अभिप्राय निकाला जाता है कि जब अन्य युगो मे यह सब कुछ होता था, तो अब भी होने में क्या हानि है? किन्तु उनका यह कथन इसलिये गलत है कि प्रत्यक्ष बात में परोक्ष की कल्पना अनुचित है, अर्थात् विधवा विवाह का निषेधक प्रत्यक्ष वचन जब सामने है, उस अवस्था में अनुमान के आधार पर उस प्रत्यक्ष वचन के विपरीत बात सिद्ध करना किसी भी अवस्था में मान्य नही हो सकता । फिर किसी एक युग में निषिद्ध वस्तु युगान्तर में कर्तव्यता कोटि में बाती हो, ऐसा है भी नही । ब्रह्मपुराण के एक वचन में कलियुग में स्त्री की स्वतन्त्रता मान्य नही है, इसका अभिप्राय यह नही है कि अन्य युगों में स्त्री की स्वतन्त्रता मान्य है । क्योंकि मनुस्मृति में इसका स्पष्ट निषेध किया गया है । पराशर स्मृति कृतयुग में मनु. को, त्रेता में गौतम को, द्वापर में शंखलिखित को और कलियुग में पराशर स्मृति को मान्यता देती है, किन्तु इसका अभिप्राय यह नही है कि मनु प्रोक्त धर्म कलियुग में मान्य नहीं होंगे, अथवा पराशर प्रोक्त धर्म ही कलियुग में मान्य होंगे । निबन्ध ग्रंथों के कलिवर्ज्य प्रकरण में बृहन्नारदीय पुराण के नाम से आदित्यपुराण का एक वचन उद्धृत हैं । उसके अनु- सार सवर्ण कन्या का विवाह निषिद्ध माना गया है । यह निषेष कलियुग विषयक होने से अन्य युगों में असवर्ण विवाह कर्तव्यता- J
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वेदार्थपारिजात! १७८३ धादन्ययुगे कर्त्तव्यता भवति । सत्ययुगे नियमेन मान्यायां मनुस्मृती 'उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णा लक्षणान्विताम्' ( म० ३।४ ) 'हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः । कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम्' ( म० ३| १५ ) इत्यादिवचनानां सत्ययुगेऽमान्यतापत्तेः । अतोऽयमभिप्रायोबोद्धव्यः --यद्यपि स्त्रीस्वातन्त्र्यं सर्वेष्वेव युगेषु निषिद्धम्, तथापि सत्ययुगादो धर्मप्राधान्यात् स्वातन्त्र्येऽपि सम्भवत्येव चारित्र्यरक्षणम् । कलियुगे त्वधर्मरुचित्वात् स्वातन्त्र्यादत्यन्तानर्थसम्भावना भवतीति विशेषरूपेण तन्निषेध: 'स्वातन्त्र्यं वा कलियुगे न कर्त्तव्यं कदाचन' इति । यथा लोके प्रातः प्रातरसत्यं न वक्तव्य मित्युक्तावपि न तद्भिन्न- कालेऽसत्यं वक्तव्यं भवति । तथा च स्मृतिकाराणां रीत्या या स्त्री विधवा भूत्वाऽत्येन सम्बन्धं कामयते सा चेदक्षतयोनिः -- स्यात् तदाऽन्यपुरुषेण संस्कृतत्वात् सा पुनर्भू रित्युच्यते । अन्य युगेषु – 'कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः । न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ॥ ' ( म० ५।१५७) इत्येवंरीत्या सत्ययुगे नियततया मनुस्मृत्या विधवाविवाहस्य निषेधेऽपि यदि कलौ तस्य विशेषेण निषेधो न स्यात्तदा सत्ययुगे तु धर्मप्रधानतावशात् क्वचित्पुनर्भूत्वेऽपि मर्यादाया मुख्यव्यवस्थाया अतिक्रमणं नाशङ्कयेत । कलियुगे त्वधर्मंप्राधान्यान्महाननर्थो धर्मनाशस्तु स्यादेव । कलियुगे तु विधवाविवाहनिषेधाभावेऽ- क्षतयोनित्वमर्यादापि रक्षितुमशक्यैव स्यात् । पुनभूत्व निन्दितमेव । तस्याः पतिः पुत्रश्च निन्दितो भवतः । कलियुगे पतिव्रताया विधवाया उपहास एव भवति, स्वतन्त्रायास्तु सम्मानम् प्रत्यक्षमिदमद्यत्वे । पूर्वकाले विधवानामक्षतयोनीनामेव विवाहो भवेदिति नेतॄणां घोषणासीत् । इदानी तु युवतीना पुत्रवतीना सधवानामपि पुनर्विवाहाः प्रचार्यन्ते समर्थ्यन्ते च तैरेव तदा पातिव्रत्यस्य वराकस्य क्वास्त्यवकाशः । इदानी न केवलमसवर्णविवाह:, किन्तु प्रतिलोम-विवाहोऽपि प्रचार्यते । सिविलमेरेज विवाहकर्तृभिरेवं लेख्यं भवति - यदह न हिन्दु नं मुसलिमो न क्रिश्चियन, किन्तु जाति- कोटि में नही आजायेंगी । सत्ययुग मे नियमतः मान्य होने वाली मनुस्मृति में सवर्ण विवाह को ही मान्यता दी गई है और होन जाति की स्त्री से विवाह करने पर कुल और सन्तान के पतित होने की बात कही है । उपर्युक्त मत को मान लेने पर मनुस्मृति के वचन अमान्य हो जायेंगे । अतः उक्त कथन का यह अभिप्राय माना जाना चाहिये - यद्यपि स्त्री की स्वतन्त्रता सभी युगो मे निषिद्ध है, किन्तु सत्ययुग में धर्म की प्रधानता के कारण स्वतन्त्रता के रहते भी स्त्री अपने चरित्र की रक्षा में समर्थ हो सकती है । कलियुग में तो प्रजा हो सकती है, अतः विशेष रूप से उसका निषेध किया जाता है कि की अधर्म में रुचि रहने से स्त्री की स्वतंत्रता महान् अनर्थकारी कलियुग में कभी भी स्त्री को स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहिये । जैसे लोक मे प्रात काल असत्य नही बोलना चाहिये, ऐसा कहने का यह अभिप्राय नही होता कि बाकी समय मे झूठ बोलना चाहिये । स्मृतिकारो के मत से जो स्त्री विधवा होकर दूसरे पुरुष से संबंध चाहती है, वह यदि अक्षतयोनि है, तो दूसरे पुरुष के साथ विवाहित होने पर भी पुनर्भू कहलावेगी । मनुस्मृति के अनुसार यद्यपि अन्य युगो में भी विधवा विवाह निषिद्ध हैं, किन्तु कलियुग के लिये यदि विशेष रूप से निषिद्ध घोषित न किया जाय, तो सत्ययुग में धर्म की प्रधा-, नता के कारण पुन अवस्था में भी मर्यादा की रक्षा की जा सकती है किन्तु कलियुग में तो अधर्म को प्रधानता के कारण महान् अनर्थ हो सकता है । कलियुग में विधवा विवाह को निषिद्ध न माना जाय, तो अक्षतयोनि की मर्यादा रख पाना भी कठिन हो जायगा । पुनर्भू स्त्री की सब जगह निन्दा की गई है । उसके पति और पुत्र निन्दित ही माने जाते हैं । कलियुग में पतिव्रता विधवा की हंसी उड़ाई जाती है और स्वतन्त्र विचरण करने वाली को संमान मिलता है । आज कल यह स्थिति सबके सामने है । पुराने समय में अक्षतयोनि विधवा का ही विवाह किया जाय, ऐसी मान्यता थी । आज कल तो पुत्र- वती सधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का भी प्रचार और समर्थन किया जाता है । ऐसी स्थिति में गरीब पातिव्रत्य धर्म कहाँ शरण पावेगा । प्रतिलोम विवाह का भी समर्थन और प्रचार किया जा रहा है । सिविल मेरिज करने वाले को आजकल असवर्ण विवाह का ही नही,,यह लिखना पड़ता है न हिन्दू है न मुसलमान और न क्रिश्चियन । मैं जाति से रहित हूँ । ऐसी स्थिति की कल्पना करके ही दूर-
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वेदार्थपारिजातः १७८४ ॥ 'होनोऽस्मि । अत एव दूरदर्शिभिः 'ऊढाया: पुनरुद्वाहं ज्येष्ठाशं गोवधं तथा । कलो पञ्च न कुर्वीत भ्रातृजायां कमण्डलुम् इत्यादि निषिद्धम् । प्राचीनकालें आवरणप्रथासीत् । सुधारकैस्तत्र शैथिल्यमानीतम् । इदानी नग्नतैव संवृत्ता । - ' यत्तु नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीबे च पतिते पती । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥ इति पराशर-स्मृत्या पूर्वस्मिन् पत्यौ मृते नष्टे प्रव्रजिते क्लीबे पतिते वा स्पष्टमेवान्यपतिविधानमार्षमेवे' ति; तन्न, एतद्वचनस्यापि सप्तपदीसमाप्तेः पूर्वस्मिन्नेव काले पत्युर्मरणादो पत्यन्तरविधानार्थकत्वात् । आर्यसमाजोऽत्र ' पतौ ' इति पाठं मनुते । सनातनधर्मे तु ' अपतो' इति पाठ: स्वीक्रियते 'पतिते अपताविति पाठे 'एड: पदान्तादति' ( पा० सू० ) इति सूत्रेण पूर्वरूपेकृते पतितेऽपतो इति रूपं स्यादिति । एकलस्य पतिशब्दस्य घिसंज्ञाभावेन सप्तम्या पत्यो इति रूपापत्तेः । नत्रा समासेतु 'पति समास एव' ( पा० सू० १/४/८) इति घिसंज्ञाया भूपती इतिवत् अपतो इति रूपसिद्धिः । तस्माद् धर्मशास्त्रानुगुण्याय ' अपतो' इत्येव पाठो युक्तः । यत्तु 's' इति चिह्नाभावान्न ' अपती' इति पाठ इति तन्न तादृशचिह्नस्याधुनिकत्वात् । ' भ्यसोभ्यम्' ( पा० सू० ७| १।३० ) इति सूत्रे तथैव प्रश्नोत्तरदर्शनात् ॥ किमयं भ्यं शब्द आहोस्वित् अभ्यमिति? तत्र वादिनोक्तम्- 'कुतः सन्देह? प्रतिवादिनोक्तम् ' समानो निर्देश' इति । उभयस्मिन्नपि पक्षे भ्यसोभ्यमिति रूपत्वाविशेषात् । यदि '5' इति रूपं प्राचीनं स्यात्तदा तादृशप्र- ' ' ( )श्नोत्तरानुपपत्तिरेव स्यात् । भट्टोजिदीक्षितेनापि समुदाङ भ्यो ग्रन्थे पा ० सू० १।३।७५ इति सूत्रमात्मनपदप्रक्रियायां लिखित्वा ' अग्रन्थे ' इति च्छेद उक्तः । यदिऽग्रन्थे इति लेखनपरिपाटी स्यात्तदा तन्न स्यात् । तस्मात्पतिशब्दस्य सप्तम्येकवचने पत्य इत्येव रूप भवति, ' 'त्यो' (४।१७ २४ ) इति मुख्यपतिशब्दस्य पराशरस्मृतावपि तादृशरूपस्यैव दर्शनात् । तस्मादौपचा- रिकपतिबोधनायैव समासे अपताविति रूपम् । ' इत्य- नञश्च -' तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्य विरोधश्च नत्रर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ॥ नुसारं क्रमेण अब्राह्मणः १, अपापम्, अतश्वः, अनुदरा कन्या, " अपशवो वा अन्ये गो अश्वेभ्यः, अधर्मः --एतान्युदाहर- परदे की प्रथा थी । दर्शी आचार्यों ने विधवा विवाह प्रभृति पाच वस्तुओं को कलियुग मे वर्जित घोषित कर दिया है । प्राचीन समय में मिलता है । सुधारको ने उसमें शिथिलता दी । उसी का यह परिणाम है कि आजकल चारों तरफ नग्नता का ताण्डव देखने को , कुछ लोगों का कहना है कि पराशर स्मृति के वचन के अनुसार पहले पति के मर जाने,वचननष्ट काहो जानेभी तात्पर्य, संन्यासीसप्तपदीहो जानेकी,, ' पतित अथवा नपुंसक होने पर अन्य पति का स्पष्ट विधान है किन्तु ऐसी बात है नही क्योकि इस पती यह पाठ मानते हैं ' ' समाप्ति के पहले ही पति को मृत्यु आदि हो जाने पर दूसरे पति के विधान में है । आर्यसमाजी इस श्लोक मे सन्धि होने पर पतितेऽ- और सनातनधर्मी 'अपतौ' । 'पतिते 'अपती' इन दो पदों में 'एङः पदान्तादति' इस पाणिनि सूत्र से पूर्वरूप' रूप होना चाहिये । नत्र - पतौ' ऐसा भाव बनता है । अकेले पति शब्द की घी संज्ञा नही हो सकती । ऐसी स्थिति में सप्तमी में 'पत्योंबन सकता है । अतः धर्म- समास हो जाने पर तो उसकी घी संज्ञा हो जाती है । इस दशा में ' भूपती' की तरह 'अपती' भीनही माना जा सकता कि उक्त शास्त्र की व्याख्या के अनुरूप 'अपती' यह पाठ ही माना जायगा । कुछ लोगो का यह कहनाहै?उचितक्योकि अवग्रह चिन्ह आधुनिक है । ( 5 ) ' ' ' ' '? श्लोक में अवग्रह का चिन्ह न होने से अपती यह पाठ कैसे माना जा सकता शब्द है या अभ्यम् ऐसा 'भ्यसोम्यम्' इस सूत्र के भाष्य में इसी अभिप्राय के प्रश्मोत्तर देखने को मिलते हैं कि यहाँ पर 'भ्यम्है । यदि प्राचीन काल में भी अव- संदेह किसलिये होता है? समान निर्देश होने से । दोनो पक्षों में सूत्र का स्वरूप एक सा ही रहतापक्षो में समान रूप न रह कर भिन्न ,, ' ' ग्रह चिन्ह लगता होता तो इस तरह प्रश्नोत्तर नही हो सकते थे क्योंकि उस परिस्थिति में दोचों अग्रन्थे ऐसा पदच्छेद् किया है । ' ' ' ' रूप रहताI । भट्टोजिदीक्षित ने भी समुदाङ भ्यो प्रन्थे इस सूत्र का आत्मनेपदप्रक्रिया में उल्लेख कर में पत्यों यही यदि 's ग्रन्थे' ऐसी लेखन की परिपाटी हो तो ऐसा न करना पड़ता । इसलिये पति शब्द के सप्तमीस्थलके मेंएकऔपचारिकवचन पति का बोधन रूप होता है । मुख्य पति शब्द का पराशर स्मृति में भी वैसा ही रूप माना गया है । इसलिये प्रस्तुत कराने के लिये ही समास में 'अपती' रूप का उल्लेख माना जायगा । 'नत्र के छः अर्थ होते है -तत्सदृश, तदभाव, तदन्यत्व, तदल्पता, अप्राशस्त्य और विरोध । इनके क्रमशः ये उदाहरण
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वेदार्थपारिजात १७८५ णानि । अपतिरित्यत्र अनुदरावत् अल्पार्थको नत्र । अत ईषत्पतिरेवार्थ । सप्तपदम्म्पत्तेः पूर्वमरूपपतित्वमेव भवति, न पूर्ण-पतित्वमिति केषाञ्चिद्रीत्या चतुर्थीकर्मत पूर्वमपूर्णपतित्वमेव । तदानी त्वस्यात्पपते रीषत्पतेर्वा मृत्यो नाशादी वा पत्यन्तर-विधानमित्येव तदाशय । अतस्तादृशो विवाहो न विधवाविवाह । तत एव 'अद्भिर्वावा च दत्ताया म्रियेतोर्ध्वं वरो यदि । न च मन्त्रोपनीता च कुमारी पितुरेव सा । ( वशिष्ठस्मृति १७ ६४ ) इत्यादिरीत्या सा पितुरेव भवति, न पत्युर्भार्या भवति सप्तपदीपूर्तावेव भार्यात्वोपपत्ति. 1 'अपतो' इति व्याकरणविरोधो न भवति । 'न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यो प्रेते परस्य तु ||' ( म० ५| १५७) इति मन्वादिविरोधोऽपि न भवति । मनुवाक्ये ' पत्यो' इत्येव पाठ । तत्र पतौ अपतौ वा न पाठः । पतौ इति पाठाङ्गीकारेपि पतिशब्देनात्र न पूर्ण पतिग्रह्म । अत एव भट्टोजिदीक्षितेन चतुर्विंशतिमतसङ्ग्रहे विवाहप्रकरणे उक्त-वचने पतौ सम्भावितोत्पत्तिकपतित्वे पूर्वस्मिन् वरे नष्टे इति व्याख्यातम् । न च तथात्वे समासाभावात् घिसज्ञानुपपत्तो कथ पतौ इति प्रयोग इति वाच्यम्, तत्त्वबोधिनीका रेणास्योपपादितत्वात् । तथाहि-'तत्करोति तदाचष्टे' ( पा० स्० ) इति णिचि टिलोपे, अथवा ' अच इ ' (उ० ) इत्यौणादिक इ प्रत्यये ' णेरनिटि' ( पा० सू० ) इति णिलोपे च निष्पन्नोऽय पतिशब्दः । स च ' पति समास एव' ( पा० सू० ) इत्यत्र न गृह्यते लक्षणप्रतिपदोक्तयो प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणात् । इह पतिशब्दस्य लाक्ष-णिकत्वात् ' अस्य लाक्षणिकस्य पतिशब्दस्य गौण्यावृत्त्या पतिपदव्यपदेश्यता । ' क्लीबे च पतितेऽपती ' इह तु पतिरित्याख्यातः पतिः । वस्तुतस्तु अपतिरेव । मनुनापि ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पति । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवर. ॥ ' ( म० ९ ६९ ) इत्यत्र वाग्दानकालिकस्य वरस्य पतिरिति व्यपदेशः कृतः । अन्यैस्तु 'पतिरन्योऽविधीयते ' इत्यत्र अविधीयते इति च्छेद इष्यते । ननु लोके सुप. सुपा समासो भवति; न तिडेति चेन्न, यथा पूर्वपक्षिणा व्याकरणरीत्या पत्यौ इत्यस्यैव सम्भवेन आर्षत्वात् पतो इति रूपं स्वीक्रियते, तथैव ' छन्दोव- है - अब्राह्मण, अपाप, अनश्व, अनुदरा कन्या, अपशव, अधर्म 'अपति' यहाँ पर अनुदरा कन्या के समान अल्पार्थक नव् है । अत इसका अर्थ ' ईषत्पति' होगा । सप्तपदी की समाप्ति के पहले पतित्व पूर्णता को प्राप्त नहीं करता । इसीलिये कुछ आचार्यों के मत से चतुर्थी कर्म से पहले ऐसी ही स्थिति मानी जाती है । उस दशा मे इस ईषत्पति की मृत्यु आदि के हो जाने पर दूसरा पति किया जा सकता है । अतः इस तरह का विवाह विधवा- विवाह नही माना जायगा । इसीलिये ' अद्भिर्वाचा' इत्यादि वसिष्ठ स्मृति के वचन के अनुसार उस पर पिता का ही अधिकार माना जाता है, क्योकि उसमे अभी भार्यात्व धर्म नही आया है । सप्तपदी पूर्ण हो जाने पर ही भार्यात्व प्राप्त होता है । 'अपतौ' पद न तो व्याकरण से विरुद्ध है और यहां पर न मनुस्मृति से ही कोई विरोध है । मनु के वाक्य में 'पत्यो' पाठ है, ' पत्यै ' अथवा ' अपत्यै' पाठ नही है । यदि 'पती' पाठ ही मनुस्मृति में भी माना जाता है, तब भी यहाँ पर पति शब्द से पूर्ण पति का ग्रहण नही माना जायगा । इसीलिये भट्टोजिदीक्षित ने चतुविशति मत संग्रह के विवाह प्रकरण में इस वचन की व्याख्या संभावित पति के मर जाने अथवा नष्ट हो जाने पर आदि की है । तब यहाँ पर समास के अभाव में घिसंज्ञा न होने पर 'पती' यह प्रयोग कैसे बनेगा? इस प्रश्न का समाधान तत्त्वबोधिनीकार ने किया है । जैसे कि 'तत्करोति' इस सूत्र से णिच् प्रत्यय के बाद टिलोप होता है, अथवा 'अत्र इ:' इस उणादि सूत्र से इ प्रत्यय होता है । तब 'णेरनिटि' इस सूत्र से णि का लोप होने पर पति शब्द बनेगा । इस तरह से बने पति शब्द का ग्रहण 'पति' समास एव' इस सूत्र में नही होगा, क्योंकि लक्षण और प्रतिपदोक्त मे प्रतिपदोक्त का ही ग्रहण हुआ करता है | तत्त्वबोधिनीकार की पद्धति से बना पति शब्द लाक्षणिक है, अतः उक्त सूत्र मे इसका ग्रहण नही होगा | यह लाक्षणिक पति शब्द गौणी वृत्ति से पति शब्द को बोधित करेगा । 'क्लोबे च पतितेऽपतौ' इस स्थल पर सभावित पति का उल्लेख है, जो कि वास्तव मे पति नही है । मनु ने भी 'यस्या स्त्रियेत ' इस श्लोक में वाग्दान के समय के दर का ही पति शब्द से निर्देश किया है । अन्य लोग ' पतिरन्योऽविधीयते' ऐसा पाठ मानते है । लोक में सुप् का सुप् से समास किया जाता है, लिडु के साथ नहीं । इसका समाधान यह किया जाता है कि पूर्वपक्षी व्याकरण की पद्धति से 'पत्यो' यही रूप बनेगा, ऐसा मानकर ' पती' इसको आर्ष प्रयोग मानते हैं, उसी तरह से नदी सज्ञा के विधायक सूत्र के महाभाष्य में पठित इस परिभाषा के अनुसार कि कविगण वेद २२४
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वेदार्थपारिजातः १७८६ त्वय. कुर्वन्ति इति नदीसंज्ञासूत्रस्थमहाभाष्यस्थपरिभाषानुसारेण ' सहसुपा' ( पा ० सू० २१११४ ) इत्यत्र सह इत्यस्य योगवि-भागाभ्युपगमेन पर्यभूषयत्, अनुव्यचलत् प्रभृति छान्दसप्रयोगवल्लोकेऽपि तिङासह सुप समासाभ्युपगमे बाधाभावात् । छान्दसत्वानाश्रयणेऽपि अन्यः अविधीयते इति छेदः सम्भवत्येव । नञ्समासाभावेऽपि नत्रो नलोपस्तिडि क्षेपे, ( पा० सू० ) इति पूर्वरूपे सिद्धि. । नलोपस्तु क्षेपार्थे भवति, अपचसि जाल्म इतिवत् निन्दार्थे भविष्यति । पत्युर्मंरणेऽन्यपतिविधानस्य निन्दितत्वं कुत्सितत्वं धर्मविरुद्धत्व च सूच्यते । तेन विधवाविवाहो न धर्म इत्येव प्रतिफलति । क्वचित् ' पत्यो' इति पाठस्य सत्त्वेऽपि तत्र वाग्दानकालिक एव पतिरिष्टः । यथा --'यस्या स्त्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पति ' ( म ० ९ ६९ ) इत्यत्र पतिशब्दस्य सत्त्वेऽपि वाग्दानकालिकस्य पत्युरपूर्णत्वेपि पतिप्रयोगो भवति । 'प्रदानं स्वाम्यकारणम्' ( म ० ५ १५२ ) यत्पुनः प्रथमं दानं वाग्दानात्मकं तदेव भर्तुः स्वाम्यजनकम् । कुल्लूकभट्टरीत्या वाग्दानेनैव वरस्य पतित्वव्यपदेश । तन्मरणे आपत्कालिको विवाहोऽङ्गीक्रियते । प्राचीनटीकाकारैर्वचनमिदं पराशरस्य वाग्दत्तापरमित्युक्तम् । माधवाचार्यसायणाचार्यादिभि पूर्णपति-परत्वाङ्गीकारेऽपि ' कलो पश्च न कुर्वीत ' इत्यनेन कलौ तस्याकर्त्तव्यत्वमेवोक्तम् । अन्ये तु 'नष्टे मृते प्रव्रजिते ( पराशरस्मृ० ४।३२ ) इत्यस्य पद्यस्य परस्तादेव ' मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्य- व्रते स्थिता । सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः || ३३|| तिस्रः कोट्योऽधंकोटी च यानि लोमानि मानवे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति ॥ ३४॥ व्यालग्राही यथा व्यालं बिलादुद्धरते बलात् । एव स्त्री पतिमुद्धृत्य तेनैव सह मोदते
|| ३५|| ' ( इतिचतुर्थेऽध्याये ) इत्यादिवचनेषु सतीनां ब्रह्मचर्यं पत्या सार्धं चितान्वारोहणेन दिव्यलोकप्राप्तिश्च स्मयेंते, तेन पत्यन्तरविधानं शूद्रापरमभ्युपगच्छन्ति । केचित्तु 'पतिरन्यो विधीयते ' ( परा ० स्मृ० ४।३२ ) इत्यत्राऽन्यः पतिः, अर्थात मुख्यः पतिः, किन्तु पालकत्वात् पतिः, अर्थात् तथा कर्मकरीभावमासाद्य जीवनं यापनीयमित्याहुः । अपरे तु शूद्रे प्रव्रज्याद्यसम्भवाद् द्विज- के समान शब्दो का प्रयोग करते है, 'सह सुपा' इस सूत्र में सह का योग विभाग कर पर्यभूषयत्, अनुव्यचलत् प्रभृति छान्दस ( वैदिक ) प्रयोग के अनुसार लोक मे भी तिड् का सुप् के साथ समास करने मे कोई वाधा नही है । छान्दस प्रयोग न मानें, तो भी 'अन्यो अविधीयते' ऐसा पदच्छेद मानने में कोई बाधा नही है | नव् समास के अभाव में भी 'नञो न लोप ० ' प्रभृति वार्तिक से न का लोप हो जाता है । 'अ' बचा रहता है । इसका 'एङ: पदान्तादति' से पूर्व रूप हो जायगा । न का लोप निन्दा ( तिरस्कार ) के अर्थ में उसी तरह से होगा कि जैसा कि ' अपचसि जाल्म' इस प्रयोग में होता है । इसका अर्थ है -- अरे दुष्ट, तुझे भोजन बनाना नही आता । इमसे यह सूचित होता है कि पति के मरण के उपरान्त दूसरा विवाह करना निन्दित है, धर्म के विरुद्ध है । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि विधवा-विवाह धर्म संगत नहीं है । कही पर 'पत्यो' इस पाठ के रहने पर भी उसका तात्पर्य वाग्दान के समय के पति में ही माना जायगा । जैसे ' यस्यात्रियेत' इस मनु वचन में पति शब्द के रहने पर भी उसका तात्पर्य वाग्दान काल के अपूर्ण पति में ही माना जाता है । मनु ने प्रदान का अर्थ स्वामित्व संपादन किया है । प्रथम वाग्दान के समय ही उसको स्वामी बना दिया जाता है । कुल्लूक भट्ट का कहना है कि वाग्दान के द्वारा वर को पति बना दिया जाता है । इस परिस्थिति में उसकी मृत्यु हो जाने पर आपत्ति-कालीन विवाह स्वीकार कर लिया जाता है । प्राचीन टीकाकारो ने पराशर के इस वचन को वाग्दान से जोडा है । माधवाचार्य सायण प्रभृति इस वचन को सम्पूर्ण पति से जोड़ते हैं, किन्तु वचनान्तर से वे कलियुग में अन्य बातो के साथ इसको भी निषिद्ध मानते हैं । अन्य आचार्य 'नष्टे मृते ' प्रभृति पराशर वचन के साथ के अन्य तीन श्लोको में सती स्त्रियो के ब्रह्मचर्य से रहने का, पति के साथ चिता मे भस्म हो जाने पर स्त्री के दिव्य लोक प्राप्ति का और ऐसी सती स्त्रियो के द्वारा पतित पतियों के भी उद्धार का वर्णन देखकर इस निश्चय पर पहुँचते हैं कि प्रस्तुत वचन में दूसरे पति का वरण करने की बात केवल शूद्रा के लिये कही गई है । -कुछ लोग 'पतिरन्यो विधीयते' यहाँ पर अन्य पति का अभिप्राय मुख्य पति से भिन्न केवल पालन करने वाला पुरुष निकालते हैं । अर्थात् ऐसे पालक पति का काम धन्धा करके उसको अपना जीवन-यापन करना चाहिये । अन्य आचार्यो का मत है कि ६
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वेदार्थपारिजातः १७८७ परमेवोक्तवचनम्, तथापि तद्वाग्दत्ताविवाहपरम्, श्रुतिस्मृतिवचनाना पराशरवचनाना च सामञ्जस्याय पराशरवचनस्य पूर्वोक्तव्याख्यानान्येव युक्तानीत्याहुः । ' यदेकस्मिन् ' द्वे रशने परिव्ययति तस्मादेको द्वे जाये विन्दते यत्रेका रशनां द्वयोर्यूपयोर्न परिव्ययति तस्मान्नेका द्वौ पती विन्दते' ( तै ० स० ६ ६ ४ ३ ) एकस्मिन् यज्ञे परिवीताया रशनाया अन्ययज्ञे कालान्तरेऽपि न परिव्ययनं भवति, प्रथमयज्ञ उपयोगेन तस्या उच्छिष्टत्वात् तथैव स्त्रिया अन्येन पत्या विवाहो न युक्त । 'नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोग || ' ( / ) कीर्त्यते क्वचित् । न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुन म० ९ ६५ इत्यादिवादिप्रतिवादिसम्मतमनुवचनान्यपि पूर्वोक्तसिद्धान्तानुकूलान्येव । ' श्रुतेरिवाथं स्मृतिरन्वगच्छत्' ( २० म० का० २ । ) इति रघुवंशरीत्यापि श्रुत्यनुगुणा एव स्मृतयो भवन्ति । पराशरवचनान्यपि तदनुगुणान्येव । 'जारेण जनयेद् गर्भं मृते त्यक्ते गते पती । तां त्यजेदपरे राष्ट्रे ' ( ) पतितां पापकारिणीम् । परा० स्मृ० १० व ३१ इति तद्वचनविरोधो यथा न स्यात् तथैव नष्टे मृते इत्यस्य व्याख्यानं युक्तम् । यत्तु — 'अपि माषं मषं कुर्याच्छन्दोभङ्ग न कारयेत्' इति कारणात् पतौ इति, पाठ इति, तन्न, पतिते धवे ', 'पत्यो त्यक्ते मृते गते' आदिशुद्ध पाठस्य छन्दोभङ्गमन्तरापि सम्भवात् माष मषमिति छन्दोभङ्ग्राकरणन्त्व अर्थवाद एव । तस्मात् अपतौ पतो, अन्यो विधीयते इति व्याख्यानमेव युक्तम्, 'न द्वितीयश्च साध्वीना क्वचिद् भर्तोपदिश्यते ' ( म ० ५ | १६२ ) इत्युक्तेः । केचित्तु नारीणामिति पाठात् कन्यानामित्यपाठात् प्रत्यवतिष्ठन्ते, तदपि यत्किञ्चित्, 'शार्ङ्गरवाद्यत्रोङीन्' ( पा० सू० ४ १।७३ ) इति सूत्रस्थितेन 'नृनरयोर्वृद्धिश्च' इति गणसूत्रेण जात्यर्थे डोन् प्रत्यये वृद्धो च रूपम् । तेन नारीशब्दस्य कन्यैवार्थः । अत एव 'पुराकल्पे तु नारीणा मौजीबन्धनमिष्यते' इत्यत्र | | कन्यार्थे नारीशब्दः प्रयुक्त नारीशब्दस्य पर्यायः स्त्रीशब्दोऽपि भवति । स्त्रीशब्दस्य कन्यार्थं इत्यप्युक्तमेव प्रस्तुत वचन में प्रव्रज्या का भी निषेध है । प्रव्रज्या शूद्र की नही होती । अतः इस वचन मे द्विज का ही ग्रहण माना जायगा । तो भी उसका संबन्ध वाग्दत्ता के विवाह से ही जुडेगा । श्रुति स्मृति और पराशर के वचनो में परस्पर सामंजस्य बैठाने के लिये पराशर के वचनो की पूर्वोक्त व्याख्या ही सही मानी जायगी । जैसे एक यज्ञ में प्रयुक्त रशना ( रज्जु-रस्सी ) का कालान्तर मे होने वाले दूसरे यूप में उपयोग इसलिये नही किया जाता कि वह पहले यज्ञ में प्रयुक्त होने के कारण उच्छिष्ट हो चुकी है, उसी तरह से स्त्री का भी एक पति से विवाह हो जाने पर फिर दुबारा विवाह नही किया जाता, इस तैत्तिरीय सहिता के वचन के आधार पर ही 'नौद्वाहिकेषु ० ' प्रभृति वादी और प्रतिवादी उभय संमत मनुवचन भी पूर्वोक्त सिद्धान्त का ही समर्थन करते हैं । रघुवंश महाकाव्य में महाकवि कालिदास ने कहा है कि स्मृतियाँ श्रुति का ही अनुसरण करती है । पराशर स्मृति भी उक्त श्रुति का ही अनुसरण करेगी । पराशर का ही एक दूसरा वचन है कि पति के मर जाने पर अथवा कही चले जाने पर जो स्त्री जार से गर्भ धारण करे, उस पतिता को दूसरे राष्ट्र में छोड़ देना चाहिये । इस वचन से पूर्वोक्त वचन का विरोध न हो, ऐसी ही व्याख्या हमें करनी चाहिये । कुछ लोगों का कहना है कि भाष को मष भले ही बना दें, किन्तु छन्दोभंग न करे, इस उक्ति के अनुसार प्रस्तुत श्लोक में 'पती' ऐसा पाठ बना दिया गया है, किन्तु उनका ऐसा कहना इसलिये उचित नही है कि बिना छन्दोभंग किये भी 'पतिते धवे', ' पत्यी त्यक्ते मृते गते ' इस तरह का शुद्ध पाठ बनाया जा सकता है । माष को भष बनाने वाली उक्ति अर्थवाद मात्र है । इसलिये उक्त
श्लोक में 'अपती' ऐसा विग्रह करके की गई व्याख्या ही सही है । मनुस्मृति में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि साध्वी स्त्री का कोई
दूसरा भर्ता ( पति ) नही होता । कुछ लोगों का कहना है कि उक्त श्लोक मे 'नारीणाम्' ऐसा पाठ हैं, 'कन्यानाम्' यह नहीं, अतः यह वचन विधवा-विवाह का समर्थक है । किन्तु उनका यह कथन निराधार है । 'शाङ्ग' वाद्यनो ङीन्' इस सूत्र में स्थित 'नृनरयो- वृद्धिश्र्व' इस सूत्र से जाति के अर्थ में डोन् प्रत्यय और वृद्धि होने पर नारी शब्द बनता है । इस तरह से नारी शब्द का अर्थ भी कन्या
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वेदार्थपारिजाता १७८८ नि० ३।२१ ) इति निर्वचनात् स्त्रीति ' ( )यद्यपि स्त्यायत शुक्रशोणिते यस्या सा स्त्री । स्त्रियस्त्यायतेरपत्र णकर्मण म० २/३३ इत्यत्र स्त्री शब्द, ' ' (विवाहिताया एव नामेति प्रतीयते तथापि कन्यार्थेऽपि मनुना स्त्रीणा सुखोद्यम् एकादशदिनाया बालिकाया प्रयुक्त । आश्वलायनगृह्यसूत्रे १४१५१९, पारस्करगृह्यसूत्रे १ १७/३, नामकरणप्रसङ्गे वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता'स्त्रीशब्द प्रयुक्तः । मनुना च 'स्त्रीणा धर्मान्निबोधत' इति प्रतिज्ञाय 'बालया बालानामपि ग्रहणं कृतमेव ।( म० ५११४७ ), 'बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्' ( म० ५। १४८ ) इत्यादिस्यलेषु स्त्रोशब्देन अपि बालिकाया स्त्रीत्वमुक्तम् ।'युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ' ( म० ३।४८ ) अत्र तेन जातमात्राया तथैव स्त्रीपर्यायवाचकस्य नारीशब्दस्यापि तथैवार्थो बोद्धव्यः, अपतौ इति लिङ्गात् । , । यथा किञ्च स्मृतिकाराणामेव रीतिर्यत् पूर्वं लोकसम्भावितमर्थं कथयित्वा पश्चात् तन्निराकुर्वन्तिदोषो न मद्ये -' मनुस्मृतौ पूर्वं नियोगरीति दर्शयित्वा पश्चात्तन्निराकरणं स्वमतेन दर्शितम् । एव प्रथमम् न मासभक्षणे निवृत्ति- ' ( / )न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूताना निवृत्तिस्तु महाफला । म०५ ५६ इति रागप्राप्ता लोकप्रवृत्ति मनूद्यान्ते ' रुक्ता । श्रीमद्भागवते लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्नहि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञ- सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिधा । ( ११।५।११ ) इति निवृत्तिरुक्ता । सर्वं वाक्यं सावधारण भवतीति न्यायेन निवृत्तिरेव धर्मं इत्युक्तम् । तथैव पराशरोऽपि पञ्चस्वापत्सु नारीणा द्वितीयपतिसम्बन्धमुक्त्वा या नारी पत्यो मृते ब्रह्मचर्येण जीवन याप- यति सा स्वर्गं गच्छतीत्युक्त्वा तस्यैव धर्मत्वमुक्तवान् । यदि द्वितीयपतिवरण धर्मःस्यात् तदा ब्रह्मचर्यस्य महत्त्वमेव लुप्येत । या स्त्री फ्त्या सह म्रियते तस्याः सार्धं त्रितयकोटिवर्षपर्यन्तं स्वर्गनिवासोक्त्या ब्रह्मचर्यं पत्यनुगमन च सकलशास्त्र सम्मतो विधवाना धर्मः । ही होता है । इसीलिये 'पुराकल्पे नु नारोणा' इस श्लोक मे कन्या के अर्थ मे ही नारी शब्द प्रयुक्त हुआ है । नारी शब्द का पर्यायके स्त्री शब्द भी होता है और स्त्री शब्द का प्रयोग कन्या के अर्थ में भी होता है, यह पहले ही बताया जा चुका है । यद्यपि निरुक्त निर्वचन के अनुसार विवाहित स्त्री मे ही इस शब्द का प्रयोग होना चाहिये, क्योकि शुक्र और शोणित की बालक हैके । रूपआश्वलायनमें वृद्धि विवाहित स्त्री के ही गर्भ मे होती है, तथापि कन्या के अर्थ में भी मनु ने इस शब्द का प्रयोग कई स्थलों पर किया का प्रयोग किया गया है । गृह्यसूत्र और पारस्कर गृह्यसूत्र में नामकरण सस्कार के प्रकरण मे ११ दिन की बालिका के लिये स्त्री शब्द ने स्त्रियों के धर्मो के वर्णन की प्रतिज्ञा कर विभिन्न स्थलो में स्त्री शब्द से बालिका का भी ग्रहण किया है । 'स्त्रियोऽयुग्सासु रात्रिषु इस वचन में मनु ने अभी हाल में उत्पन्न हुई बालिका को भी स्त्री शब्द से संबोधित किया है । स्त्री शब्द मनु के समान ही इसके पर्याय के रूप में प्रयुक्त होने वाले नारी शब्द का भी ऐसा ही अर्थ मानना पडेगा, क्योकि ' अपतौ' इस अवग्रहयुक्त पद की संगति तभी बैठ सकती है । स्मृतिकारी की यह परिपाटी है कि पहले वे लौकिक संभावनाओं पर विचार करते हैं और बाद में उनका निराकरण करते हैं से। जैसे कि मनुस्मृति में पहले नियोग की पद्धति को बताकर बाद में अपने मत के अनुसार उसका निराकरण किया है । इसी तरह मासभक्षण, मद्य और मैथुन में स्वाभाविक मानव प्रवृत्ति निरूपण कर बाद में उससे निवृत्ति को महान् फलदायक बताया है । श्रीमद्भा- किया है । सभी वाक्य किसी गवत में भी इसी तरह से स्वाभाविक प्रवृत्ति का निरूपण कर अन्त में इनसे मन को हटाने का उपदेश से परा-, निश्चित लक्ष्य का निर्देश करते हैं इस न्याय के अनुसार सासारिक प्रवृत्तियो से निवृत्ति ही वास्तविक धर्म है । इसी अभिप्राय के शर ने भी पांच आपत्तियों के उपस्थित होने पर भी स्त्री को दूसरा पति कर लेने की बात कह कर लिखा है कि जो नारी पति सिद्ध होती,, मर जाने पर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए जीवन यापन करती हैं वह स्वर्ग में जाती है । इससे अन्तिम पक्ष की ही श्रेष्ठता है है । यदि द्वितीय वर का वरण भी धर्म माना जाता, तो ब्रह्मचर्य की महत्ता ही समाप्त हो जाती । जो स्त्री पति के साथ मर जाती वह उसके साथ साढ़े तीन करोड वर्ष पर्यन्त स्वर्ग में निवास करती है, इस कथन से ब्रह्मचर्य का पालन और पति का अनुगमन ये ही दो मार्ग विधवा स्त्री के लिये सभी शास्त्रो में निर्विवाद रूप से माने गये हैं ।