वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 891–900
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 891–900
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वेदार्थपारिजातः १७८९ ' ', यत्तु प्रथमस्य पतित्वाभावे पतिरन्यो वधोयते इत्यत्रान्यपतित्वोक्तिरनर्थिका स्यात् इति तन्न अपतौ इति छेदेऽपि न नत्रो निषेधार्थकता, किन्तु अपूर्णपतित्वम् अल्पपतित्व वेत्यर्थस्याङ्गीकृतत्वात्, ' तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्व तदल्पता । अप्राशस्त्य विरोधश्च नत्रर्था षट् प्रकीर्तिता । इत्युक्ते । तस्माद् द्वितीयपतो अन्यत्व नानुपपन्नम् । तस्य मरणे पराशररीत्या कलौ अन्यपत्यभ्यनुज्ञा क्रियते । 'यस्या स्त्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवर: ।' ( म ० ९ ६ ९ ) इति मनुवचने नियोगविधान मेवोक्तम् । तत्र ' सप्त पौनर्भवा कन्या वर्जनीया कुलाधमाः॥ वाचा दत्ता मनोदत्ता कृतकौतुकमङ्गला ॥ ' इत्यादिवचनैर्वाग्दत्तादीनामन्ययुगे नियोगो भवतिस्म । पुनर्भूत्वेन निन्दितत्व च । कलियुगे पराशरवचनस्य तद्बाधकत्वेनान्यपतिविधानमेव । पुनर्भूत्वञ्च न भवति । पूर्वपक्षिरीत्या तु वाग्दानकालि- कस्य पत्युर्मरणे विवाहे पुनर्भूत्वेन निन्दितत्वं मनु -याज्ञवल्क्यरीत्या नियोग एत्र वा स्यात् । 'यस्था म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।' इति मनुवचने तु वाग्दानकालिकोsपूर्णपतिरेव पतिरुक्तः । तस्य मरणे देवरेण नियोग एव स्यात् । तत्र देवरस्य द्वितीयवरत्वमपि पूर्वपक्षिणामिष्टम् । पूर्वपक्षिरीत्या तस्य कथ द्वितीयवरत्वमपि स्याद्, वाग्दानकालिकस्य पत्युर पूर्णपतित्वात् । सिद्धान्ते तु तथैव पतिरन्यो विधीयते ' इत्यत्रापि पूर्वापूर्णपत्यपेक्षयापि द्वितीयस्यान्यपतित्व नाभवि । पराशरवचनस्य मूलम् 'या पूर्वं पति वित्त्वाथान्य विन्दते परम् । पञ्चोदन तावज ददातो न विपोषते । ' ( अथर्व ९।५।२७) अत्र या इत्यनेन कन्या ( कुमारी ) विवक्षिता । वित्त्वा पूर्व पति मिति वाग्दानकालिकः पतिरिष्ट । अन्यपतिमिति भाविवेवा- हिकः पतिरिष्ट । पराशरवचने पतो अपतो इत्युभयपाठेऽपि वाग्दत्तापतिरेवाभीष्टः । यत्तु - 'सीतायाः पतये नमः', 'जारेण जनयेत्', ' मृते त्यागे गते पतौ', इत्यादावार्षमन्तरेण न निर्वाह' इति तदपि न, द्वितीये पद्ये अपतो इति छेदस्य सम्भवेन आर्षत्वाश्रयणमन्तरापि निर्वाहसम्भवात् । स्वैरिण्याः पूर्वस्य पत्युरल्पत्वं यदि पहला पति नही है, तो 'पतिरन्यो विधीयते' इस वाक्य से अन्य पति के विधान की बात कैसे सगत होती? इस शंका का समाधान इस तरह से किया जाता है कि 'अपती' ऐसा पदच्छेद करने पर भी नञ निषेधार्थक न होकर अल्पार्थक ही माना जायगा, अत अल्प पति उसका अर्थ होगा । नत्र के षड्विध अर्थो का प्रतिपादन किया जा चुका है । इस तरह से प्रथम पति में अल्प पतित्व के रहने से द्वितीय पति में अन्यता का विधान सार्थक हो जायगा । प्रथम अल्प पति की मृत्यु आदि हो जाने पर पराशर के मत के अनुसार कलियुग में अन्य पति किया जा सकता है । 'यस्या म्रियेत' इस मनु वचन में नियोग का विधान है । 'सप्त पौनर्भवा.' इत्यादि शास्त्रीय वचनो के आधार पर सात प्रकार की पुनर्भू कन्याओ का अन्य युगो में नियोग विहित तो था, किन्तु वह निन्दित माना जाता था । कलियुग में तो पराशर का वचन नियोग का बाधक है, अतः यहाँ दूसरे पति का विधान है । इसकी पुनर्भू" संज्ञा भी नही होती । पूर्वपक्षी के अनुसार तो वाग्दान कालिक पति की मृत्यु के उपरान्त विवाह होने पर उसकी पुनभू" संज्ञा और निन्द्यता रह ही जायगी, अथवा उनको मनु और याज्ञवल्क्य की पद्धति से नियोग को स्वीकार करना पड़ेगा । 'यस्या स्त्रियेत' इस मनु वचन में वाग्दान काल के अपूर्ण पति को ही पति कहा गया है । उसकी मृत्यु हो जाने पर देवर के साथ नियोग ही होगा । यहाँ पर पूर्वपक्षी देवर को द्वितीय वर मानते हैं । यह उनके मत के अनुसार कैसे सम्भव होगा? क्योकि वाग्दान के समय का पति तो पूरा पति है हो नही । हमारे मत में तो 'पतिरन्यो विधीयते ' इस वचन मे पूर्व के अपूर्ण पति की दृष्टि से भी दूसरे में अन्यता आ ही जायगी । पराशर वचन का मुख्य आधार 'या पूर्व पति वित्वा' यह अथर्ववेद का मन्त्र है । यहाँ पर 'या' पद से कुमारी कन्या कही गई है । ' पूर्व पति वित्त्वा' यहाँ पर पूर्व पति का तात्पर्य वाग्दान के समय के पति में है । अन्य पति का तात्पर्य भावी पति में है, जिसके साथ भविष्य में उसका विवाह हाने वाला है । इन सब वचनों का निष्कर्ष यही निकलता है कि पराशर के वचन में 'पती' पाठ माना जाय या 'अपती', दोनों ही स्थितियों में वाग्दान कालिक पति का ही ग्रहण यहाँ अभीष्ट है । कुछ लोगो का कहना है कि ' सीतायाः पतयेनमः ' प्रभृति वाक्यों में आर्ष प्रयोग माने बिना दूसरी कोई गति नहीं है, किन्तु उनकी यह उक्ति इसलिये ठीक नही है कि 'अपतौ' इस विग्रह को मान लेने पर प्रयोग की आर्षता को माने बिना भी काम चल जाता है । स्वैरिणी का पूर्व पति नाममात्र का ही तो रहता है । 'सीतायाः पतये नमः' यहाँ पर राम परब्रह्मस्वरूप है, अतः वह I
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वेदार्थपारिजात. १७९० युक्तमेव । 'सीतायाः पतये नमः' परब्रह्मरूपस्य रामस्य लोकविलक्षणत्वेन पतिरित्याख्यातः पति इत्यर्थत्वात् । तेन तत्त्व- बोधिनीरीत्या ' पतिः समास एव' ( पा० सू० १२४१८ ) इति नियमस्य तत्र न प्रवृत्तिः, तस्य लाक्षणिकत्वात् । तत्त्वबोधिनी- कारैरलौकिकपतित्ववशालाक्षणिकत्वमेवाङ्गीकृतम् । छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति, यथा महाकवे कालिदासस्य प्रयोग ---- ' त्रियम्बकं सयमिनं ददर्श' इति कुमारसम्भवे । अथवा 'षष्ठीयुक्तश्छन्दसि वा' ( पा० सू० १२४ ९ ) इति धिसंज्ञा वा कर्त्तव्या । ' तत्पुरुषे कृति बहुलम् ' ( पा० सू० ६| ३| १४ ) इति बहुलग्रहणस्य सर्वोपाधिव्यभिचारकतां मत्वा वाचस्पतिवत् सीतायाः पतये इत्यत्र षष्ठ्या अलुक्, तथा सति घिसज्ञा सुलभा स्यात् । 'षष्ठ्याः पतिपुत्रपृष्ठपारपदपयस्योषेषु ' ( पा० सू० ८| ३ | ५३ ) इति सूत्रेण तु न कार्यं सेत्स्यति, अस्य छन्दोमात्रविषयत्वात् । सीतायाः पतये इति तु लौकिकः प्रयोगः । 'न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूताना निवृत्तिस्तु महाफला || ' ( म० ५/५६ ), लोके-.... ( ) व्यवायामिषमद्यसेवा भा० पु० ११।५।११ इत्यादिष्वेकवचनेषु चतुर्थपादे पादत्रयस्य बाध्यता सम्भवति । न तथा पराशरवचने तत्सम्भवति, तस्य भिन्नवाक्यत्वात् । किञ्च नान्यस्मिन् विधवा नारी' ( म० ९ ६४ ) इत्यनेन तन्निषेधस्य -':' ( | | ) नियोगविषयत्वे विवाहविषयक निषेधासम्भवात् । न्यायदर्शने तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेम्य २ १ ५७ इत्युक्त्वा 'न कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात्' ( २।१।५८ ) इति न शब्देन पूर्वपक्षेस्य खण्डनं कृतम् । पराशरवचने तन्न घटते, तत्र निषेधवाचकपदाभावात् । वस्तुतस्तु 'मृते भर्तरि' इति पद्यं पत्यो मृते पत्न्या ब्रह्मचर्यं विदधाति । 'तिस्रः कोट्य ' इति तु सहमरणं विदधाति 1॥ नैताभ्यां पद्याभ्यां ' नष्टे मृते' इत्यनेन पूर्वपक्षोत्तरपक्षभावः, ' नष्टेमृते इत्यस्य स्वतन्त्रत्वात् ॥ तेन तु सप्तपदीसमाप्तेः पूर्वं पतिमरणेऽन्यपतिविधानमुक्तम् । वचनं चेदं कलियुगार्थं व्यवस्थितम् । तेन मनूपपादितवचनेन तस्या पुनर्भूत्वं न भविष्यति । मनुरीत्या वाग्दत्ताया नियोगपारतन्त्र्यं च न भविष्यति । तथाऽ नभ्युपगमे वाग्दत्तायाः पतिमरणेऽपि विवाहो न स्यात् । लोकविलक्षण पति है । अतः तत्वबोधिनी की पद्धति से 'पतिः समास एव' यह नियम यहाँ नहीं प्रवृत्त होगा । तत्त्ववोधिनीकार ने अलौकिक पति राम में भी इस शब्द का प्रयोग लाक्षणिक हो माना है । कवि भी वेद के समान ही कभी -कभी शब्दो का प्रयोग करने लगते हैं । जैसे कि कुमार सभव में महाकवि कालिदास ने 'त्रियम्बक' शब्द का प्रयोग किया है अथवा ' षष्ठीयुक्तश्छन्दसि वा' इस सूत्र से विकल्प से घिसंज्ञा का विधान माना जा सकता है । 'तत्पुरुषे कृति बहुलम्' इस सूत्र मे बहुल ग्रहण सभी बाधाओ को दूर कर देता है । अतः वाचस्पति के समान ही 'सीतायाः पतये' यहाँ पर षष्ठी का लोप नही होगा, और घि संज्ञा भी सरलता से हो जायगी । 'षष्ठ्याः पति:' इत्यादि सूत्र से यह कार्य नही सिद्ध होगा, क्योंकि इस सूत्र की प्रवृत्ति केवल वेद में ही होती है और 'सीतायाः पतये ' यह लौकिक प्रयोग है | ' न मांसभक्षणे ',, 'लोके व्यवायामिष० ' इत्यादि वचनो में एक वचन के द्वारा उद्दिष्ट मासभक्षण, मद्यपान; मैथुन आदि का चतुर्थ पाद से बाघ हो जाता है । पराशर वचन में इस तरह का बाघ नही हो सकता, क्योकि इसमें वाक्य भिन्न हो जाता है । 'नान्य-स्मिन् विधवा नारी' इस वचन में मनु ने नियोग का निषेध किया है, अतः इससे विवाह का निषेध नही किया जा सकता । न्याय-दर्शन के 'तदप्रामाण्य०' प्रभृति सूत्र मे वेद का अप्रामाण्य सिद्ध किया है, किन्तु 'न कर्तृकर्म० ' इत्यादि अग्रिम सूत्र में 'न' शब्द के द्वारा पूर्व पक्ष का खण्डन कर दिया गया है । वही पद्धति पराशर वचन में नही लग सकती, क्योंकि यहाँ पर कोई निषेधक वचन नही है । वास्तव में देखा जाय तो 'मृते भर्त्तरि' यह पद्य पति के मर जाने पर पत्नी के लिये ब्रह्मचर्य का विधान करता है । 'तिस्रः कोटय ' यह वचन पति के साथ सती होने का विधायक है । इन दोनो पद्यो में और ' नष्टे मृते ' प्रभृति श्लोक मे पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष भी नही बन सकता, क्योकि 'नष्टे मृते ' प्रभृति श्लोक एकदम स्वतन्त्र है । यह वचन सप्तपदी की समाप्ति के पहले पति की मृत्यु हो जाने पर अन्ये पति का विधान करता है और यह वचन केवल कलियुग से ही संबद्ध है । इसलिये मनु के द्वारा प्रतिपादित पुनर्भूव दोष यहा नहीं लगेगा । वाग्दत्ता का विनियोग और उसके लिये उपदिष्ट परतन्त्रता भी इस पक्ष में नही होगी । यदि ऐसा नही माना जायगा, तो पति की मृत्यु हो जाने पर भी वाग्दत्ता का विवाह नही हो सकेगा ।
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वेदार्थपारिजातः १७९१ किञ्च, नारदादिस्मृतिष्वपि ' नष्टे मृते' इत्यादि वचनं तेनैव रूपेणागतम् । तदनन्तरं च ' मृते भर्तरि' इत्यादि- वचनानि च न सन्ति । तथा च बाध्यत्वमपि न भविष्यति । विधवाविवाहापेक्षया विधवाया ब्रह्मचर्यस्य श्रेष्ठत्व सुधारकैरपि स्वीक्रियते । परन्तु पत्यौ नष्टे मृते विवाहेऽपि नरकपातो न भविष्यतीत्येव तेषामभिप्राय । स्वर्गं न गच्छेद्यद्यपि तथापि नर- केऽपि न गच्छतीत्येव तेषामभिप्रायः । वाग्दानकालिकस्य पत्युरपूर्णपतित्वेऽपि पतित्व भवत्येव । तत एव वाग्दत्ताया मरणे तस्या: कुले दिनत्रय यावन्मरणाशौचं भवति । 'स्त्रीणामसंस्कृतानां तु त्र्यहात् शुद्धयन्ति बान्धवा. ' (म० ५।७२) । 'स्त्रीणाम- कृतविवाहाना वाग्दत्ताना मरणे बान्धवा भर्त्रादयस्त्रयहेण शुद्धयन्ति' इति कुल्लूकभट्टः । तथा सति तदपेक्षया विवाहपत्यन्त- रस्यान्प्रपतित्वमनिवार्यमेव । दयानन्देन सत्यार्थप्रकाशे ४ समुल्लासे नष्टे मृते इति पद्यस्य स्त्रिया नियोग. कर्त्तव्य इत्यर्थः कृतः । तद्रीत्या पुन: ' पतिरन्यो विधीयते ' इति पद्यस्य कथं सङ्गतिः?१ नियुक्तस्य तेन पूर्णपतित्वानङ्गीकारात् विवाहितस्यैव पूर्णपतित्वाङ्गी- काराच्च । किञ्चार्यसमाजरीत्या पराशरस्मृतिनं वेदः, किन्तु पुराणरूपः । कथ तदा आर्षत्वेन पती इत्यस्य समाधानम्? यत्तु— 'क्लोबे च पतिते पतौ' इत्याप्रयोग एव, विवाहितपतिवाचकश्च नारदीयमनुसंहिताया ' पत्यौ प्रव्रजिते नष्टे क्लोबे च पतिते मृते । पश्ञ्चस्वापत्सु नारीणा पतिरन्यो विधीयते । ( १२ ९९ ) इत्यत्र पत्यौ इति पाठस्यैव सत्त्वात् । तस्य च विवाहितपति- बोधकत्वमेव । तथा च पतौ इत्यत्र व्याकरणसम्बन्धि क्टिकल्पन व्यर्थमेव । तस्मात् पराशरवचनस्थस्य पती इत्यस्यापि स एवार्थो मन्तव्यः । अग्निपुराणेऽपि तथैव पाठः । वृद्धमनुस्मृती ( ९ | १११ ) स्मृतिचन्द्रिकायां गौतमधर्मसूत्रस्य मस्करिभाष्ये च सोऽयंश्लोक उद्धृत । एवं बहुभिनिबन्धकारैर्यं स्योद्धरणं कृतं तस्य पराशरवचनस्य नान्यथाकरण युक्तमिति केनचित् समाजिनोक्तम्, तदपि न क्षोदक्षमम्, तेन पराशरस्मृतेर्मूलस्मृतित्वेनाऽङ्गीकारात् । यदि तेन पराशरस्मृतेः प्रामाण्यमङ्गीक्रियते तदा --- फिर नारद स्मृति प्रभृति ग्रन्थो में भी 'नष्टे मृते' इत्यादि वचन उसी रूप मे आये है । इसके बाद के 'मृते भर्तरि' प्रभृति वचन वहाँ नहीं हैं । इसीलिये इनमें परस्पर बाध्यबाधक भाव भी नही होगा । विधवा के विवाह की अपेक्षा विधवा के ब्रह्मचर्य की श्रेष्ठता सुधारक भी मानते हैं । उनका केवल इतना ही कहना है कि पति के खो जाने पर अथवा मर जाने पर विवाह कर लेने पर भी नरक की प्राप्ति नही होती । इसका तात्पर्य यही है कि यद्यपि वह स्वर्ग में नही पहुँचेगी, तो साथ ही वह नरक में भी नही पडेगी । वाग्दान के समय का पति अपूर्ण रहते हुए भी पति तो हो ही जाता है । इसीलिये वाग्दत्ता की मृत्यु हो जाने पर उसके कुल में तीन दिन का मरणाशौच माना जाता है कि स्त्री का विवाह न होने पर और उसका वाग्दान हो जाने पर भी यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसके बन्धु बान्धव और पति आदि तीन दिन बाद शुद्ध होते हैं । कुल्लूक भट्ट ने मनु के वचन का यही अर्थ किया है । ऐसी स्थिति में इस प्रथम पति की अपेक्षा विवाहित पति को दूसरा पति मानना अनिवार्य है । दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के चौथे समुल्लास में ' नष्टे मृते' प्रभृति पद्य का अर्थ नियोगपरक किया है । इनके मत से 'पतिरन्यो विधीयते ' इस अंश की संगति कैसे बैठेगी? वे नियोग प्राप्त पति को पूर्ण पति नही मानते, वे तो विवाहित पुरुष को ही पूर्ण पति मानते है । आर्यसमाजी के मत से पराशर स्मृति वेद नही है, यह तो पुराण की कोटि में जाती है । फिर उसको आर्ष प्रयोग मान कर कैसे समाधान किया जा सकता है? कुछ लोग 'क्वीबे च पतिते पती' यहाँ पर आर्ष प्रयोग ही मानते हैं, क्योकि नारदीय स्मृति और मनुस्मृति में विवाहित पति के वाचक पति शब्द की सप्तमी के एकवचन में ' पत्यों' यही रूप मिलता है । 'पती' शब्द के लिये व्याकरण सम्बन्धी क्लिष्ट कल्पना करने में कोई लाभ नही है । सीधे आर्ष प्रयोग मानकर पराशर स्मृति में आये 'पती' शब्द का भी वही अर्थ माना जायगा, जो कि 'पत्यो' शब्द का होता है | अग्निपुराण में भी ऐसा ही पाठ है । वृद्ध मनुस्मृति, स्मृति-चन्द्रिका और गौतमधर्मसूत्र के मस्करी भाष्य में भी यह श्लोक इसी रूप में उद्धृत है । इस तरह से बहुत से निबन्धकारो ने जिसको उद्धृत किया है, उस पराशर के वचन का अन्यथा अर्थ करना कभी भी युक्तिसंगत नही माना जायगा, ऐसा किसी आर्यसमाजी का कहना है, किन्तु उनका यह कथन परीक्षा में टिक नही पाता, क्योंकि वे परा-
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वेदार्थपारिजातः १७९ २ 'स्त्रीणामुद्वाह एको वे वेदात: पावनो विधि ' इत्यादिवचनाभ्युपगमे आर्यसमाजसिद्धान्तहानिः । 'जीवन् वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभु स्त्रियाम्' ( बृहत्पराशरे ४| ४८ ) इति रीत्या मृतकस्यैवाऽव्याहतस्वामित्व मन्तव्यमिति कुतो विधवाविवाह. स्यात्? तत एव 'नैकस्या बहव. सहपतय:' ( ऐ ० ब्रा ० ३।२३ गो ० ब्रा० २/३/२० ) इत्यस्य कुतो न विरोध? ' अष्टवर्षा भवेद्गौरी' इत्यादि वचनानि च तन्मतबाधकान्येव सन्ति । एवविधा समाजिन सुधारकाश्च स्वमनोरथसाधनाय पुराणस्यापि वेदवत् प्रामाण्यमङ्गीकुर्वन्ति प्रक्षिप्तमप्यप्रक्षिप्त मन्यन्ते, स्वविरुद्ध तु वेदवचनमप्यपलपन्ति । तत एव दयानन्देन ' नष्टे मृते..इत्यादिवचनस्य कपोलकल्पितत्वमेवाङ्गीकृतम् । तदनुयायिनापि समाजिना हिन्दुकोडसाधनाय तत्प्रामाण्यमङ्गीकृतम् । वस्तुत: 'नष्टे मृते इति पराशरवचनं विधवाविवाहं विवाहविच्छेद वा न विदधाति । 'पती' 'अपती उभयथापि तेन वाग्दत्ताविवाह एव बोधितः । वाग्दत्ताया पतिरपि पतिशब्देन व्यपदिश्यते इति तेनैव प्रतिपाद्यते । नारदीयमनु-सहितायाः 'पत्यो प्रव्रजिते नष्टे ' इति पत्यो शब्दस्योपपत्ति. । मनुनापि 'यस्था म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पति.' इति पद्ये वाग्दत्तायाः स्वामिनि पतिशब्दस्य प्रयुक्तत्वात् । वोरमित्रोदयेऽपि पराशर. -नष्टे मृते इत्यादि । वशिष्ठबोधायनावपि— 'बलादपहृता कन्या' । याज्ञवल्क्योऽपि -'दत्तामपि हरेत्पूर्वं श्रेयांश्चेवर आव्रजेत् । ' एतच्च वाग्दत्ताविषयम् । वाग्दत्तावरदोषे ज्ञाते गुणवतेऽन्यस्मै देयेत्यर्थं इति सस्कारप्रकाशे ७३९ पृष्ठे । भट्टोजिदीक्षितेनापि चतुर्विंशतिमतसग्रहे —' दुष्टे तु पूर्ववरे वाग्दत्तापि वरान्तराय देया । तथा च पराशरः -नष्टे मृते इत्यादि । अस्यार्थ - वाग्दानानन्तर पाणिग्रहणात् प्राक् पतौ सम्भावितोत्पत्तिकत्वे पूर्वस्मिन् वरे नष्टे परदेशगमनेऽपरिज्ञातवृत्तान्ते सति इत्यादि । ( पृ० ८७ ) म० म० शिवदत्तेन सिद्धान्तकौमुद्या तत्त्वबोधिन्यां पतिशब्दोपरि टिप्पणी कृता । वस्तुतस्तु पराशरस्मृतौ -अपतो इत्येव च्छेद । तथा च शर स्मृति को मौलिक ग्रन्थ नही मानते । वे केवल मनुस्मृति को जिस किसी तरह प्रमाण मान लेते है । यदि उनके मत के अनुसार पराशर स्मृति भी प्रमाण मानी जाती हैं, तब पराशर के ही एक दूसरे वचन के अनुसार स्त्रियों का पवित्र विवाह सस्कार एक बार ही होता है, आर्यसमाजी सिद्धान्त का खण्डन हो जायगा । जीवित या मृत एक पति ही स्त्री का स्वामी माना जाता है, इस वचन के अनुसार भी मृतक पति ही स्त्री का स्वामी माना जाता है । इस स्थिति में विधवा विवाह कैसे सम्भव हो सकता है । 'एक स्त्री के अनेक सह-पति नही होते, यह ऐतरेय ति भी उनके सिद्धान्त के विपरीत है । ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी' इत्यादि वचन भी उनके मत के बाघक है । इस तरह के आर्यसमाजी और सुधारक अपने मत की बात सिद्ध करने के लिये पुराणों को भी वेद के समान प्रमाण मान लेते हैं, प्रक्षिप्त को भी अप्रक्षिप्त मान लेते हैं और अपने मत के विरुद्ध होने पर वेद को भी प्रमाण नही मानते । इसीलिये दयानन्द ने ' नष्टे मृते ' प्रभृति वचन को कपोल कल्पित माना है और उनके अनुयायियो ने हिन्दू कोड बिल का समर्थन करने के लिये उसको प्रमाण मान लिया है । वास्तव में देखा जाय तो 'नष्टे मृते' प्रभुति पराशर वचन विधवा-विवाह अथवा विवाह विच्छेद का विधायक नही है । 'पती' पाठ हो या 'अपतो' दोनो पाठो से वाग्दत्ता के विवाह का ही बोध होता है । वाग्दत्ता के पति को उन्होने भी पति ही माना है । नारदीय मनुसंहिता के 'पत्यौ' पाठ की भी इसी तरह संगति बैठती है । मनु ने भी यस्या म्रियेत, ' इस पद्य में वाग्दत्ता के स्वामी के लिये ही पति शब्द का प्रयोग किया है । वीरमित्रोदय में उद्धृत पराशर वचन और वसिष्ट, बोधायन और याज्ञवल्क्य के वचन भी वाग्दत्ता का ही निर्देश करते है । इन सब का यही अभिप्राय है कि वाग्दत्ता के वर के दोष का ज्ञान हो जाने पर अन्य गुणवान व्यक्ति को कन्या देनी चाहिये । संस्कार प्रकाश (पृ० ७३ ९ ) मे इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है । भट्टोजीदीक्षितने चतुर्विंशतिमत संग्रह में भी इसी का प्रति- पादन किया है । वहाँ पर ' नष्टे मृते ' इस पराशर वचन का यह अर्थ किया गया है कि वाग्दान के बाद और पाणिग्रहण संस्कार से पहले , उस सम्भावित वर के नष्ट हो जाने पर परदेश गमन के बाद कोई खबर न मिलने पर इत्यादि । म ० म० शिवदत्त ने सिद्धान्त कौमुद्री की तत्त्वबोधिनी टीका का सम्पादन करते हुए 'पति' शब्द पर टिप्पणी की है कि वस्तुत पराशर स्मृति मे 'अपतो' ऐसा पदच्छेद मानना
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वेदार्थपारिजात १७९ ३ ईषदर्थकेन नत्रा सह समासे घिसंज्ञा निर्बाधेव । सप्तपदोतः प्राक् ईषत्पत्तित्वस्यैव सत्त्वेन ' न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यो प्रेते परस्य च । ' ( म० ५।१५७ ), ' पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियत दारलक्षणम् । तेण निष्ठा तु विज्ञेया विवाहात्सप्तमे पदे ॥ ' ( म० ८ २२७), न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुन:' ( म० ९६५-६६-६७-६८ ) इति मनुक्त्या 'अद्भिर्वाचा च दत्ताया म्रियेोध्वं वरो यदि । न च मन्त्रोपनीता स्यात् कुमारी पितुरेव सा ॥' इति स्मृत्यर्थंसारेण सह न विरोध इति दिक् । सन्तुष्यतु दुर्जनन्यायेन पूर्वपक्षिव्याख्यानेऽपि नष्टे सूते इति पद्यात् परस्ताद्विद्यमानाभ्या विधवाया ब्रह्मचर्य- पालन सहमरणविधायकाभ्या वचनाभ्या पूर्वमतस्य बाध एव सिद्धयति । ' सत्यमुत्तरपक्षः ( तै० उ० २।४ ) इत्युत्तर- " पक्षस्यैव सत्यत्वोक्तः । अत एव 'तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः' ( गो० सू० २०११५७ ) इतिपूर्वपक्षत्वान्न सिद्धान्तत्वम् । केचित्तु शास्त्रप्रामाण्यमुपेक्ष्य नगण्यतर्कादिभिर्विधवाविवाहं साधयितुं प्रयतन्ते । तदप्ययुक्तमेव । मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः॥ ' इत्यभियुक्तोक्तिरीत्या सनातनतत्त्व- बोधने शास्त्रस्येव परमादरणीयत्वात् । तर्कमात्रं तु तर्कान्तरेण खण्ड्यत एव । 'यत्नेनानुमितोऽप्यर्यः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्येरन्यथैवोपपाद्यते ॥ इत्यभियुक्तोक्तेः । शास्त्रपारतन्त्र्यस्य अग्रेविषवद् भासमानत्वेऽपि परिणामेऽमृतोपमत्वमेव भवति । उच्छृङ्खलताया अग्रे अमृतवत्प्रतीतावपि परिणामे विषोपमत्वमेव भवतीति । शास्त्रविरुद्धबुद्धिवादेन शुष्कतर्कवादेन तत्त्वज्ञानस्याशापि न भवति, अचिन्त्यभावेषु तर्काऽप्रवेशाच्च । ' अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ ' इति महाभारतवचनात् ( म० मा० भी ० प ० ५।१२) । तस्मात् कार्याकार्यंव्यवस्थितौ शास्त्रस्येव श्रामाण्य मन्तव्यम् । किञ्च, न बुद्धिमात्रस्यादरो युक्तः, भ्रमात्मिकायाः शुक्तो रजतबुद्धेरपि बुद्धित्वाविशेषात् । तस्मात् प्रमात्मि- काया एव बुद्धेरादरो युक्तः । प्रमाणं च यथा रूपबुद्धी नेत्रं, शब्दबुद्धी श्रोत्रं, रमबुद्धो रसना, तथैव धर्मब्रह्मबुद्धौ शास्त्र मेव | चाहिये । इस तरह से ' ईषत्' ( कुछ ) अर्थ वाले नन् के साथ समास होने से बिना बाधा के 'घि' सज्ञा हो जाती है । सप्तपदी से पहले वर पूरा पति नही माना जाता, अतः, न तु नामापि', ' पाणिग्रहणिका,' ' न विवाहविधा० ' इत्यादि पूर्व व्याख्यात मनु वचनो के साथ और ' अद्भिर्घाचा च' प्रभृति स्मृत्यर्थसार के श्लोक के साथ कोई विरोध नही उपस्थित होगा । 'तुष्यतु दुर्जनः' न्याय से कुछ देर के लिये पूर्वपक्षी की बात मान लेने पर भी 'नष्टे मृते' इस पद्य से आगे विद्यमान विधवा के ब्रह्मचर्य के पालन और सहमरण के विधायक दोनो वचनों से पूर्वमत का बाघ ही सिद्ध होता है । तैत्तिरीय श्रुति में उत्तरपक्ष को सही माना गया है । इसीलिये 'तदप्रामाण्य' प्रभृति गोतम सूत्र को पूर्वपक्ष सूत्र होने के कारण ही प्रमाण नही माना जाता । कुछ लोग शास्त्रों की उपेक्षा कर निराधार तर्कों के आधार पर विधवा विवाह का समर्थन करते हैं । यह प्रयास भी सही नहीं माना जा सकता । किसी आचार्य ने बुद्धि के अनुसार चलने वालों को वानर और शास्त्र का अनुसरण करने वालों को नर बताया है । सनातन तत्त्व को जानने में शास्त्र ही सहायक हो सकता है । एक तर्क ( युक्ति ) का दूसरी युक्ति से खण्डन हो जाता है । वाक्य- पदीयकार भर्तृहरि का कहना है कि एक कुशल अनुमाता बड़े प्रयत्न के साथ किसी तर्क की प्रतिष्ठा करता है और दूसरा विद्वान् बड़ी सरलता से उसका खण्डन कर देता है । शास्त्र की मर्यादा पहले विष के समान असा प्रतीत होती है, किन्तु परिणाम में उसका फल के समान सुखदायी मिलता है । इसके विपरीत उच्छृङ्खलता पहले बड़ी सुखदायी लगती है, किन्तु परिणाम में उसका फल बड़ा अमृत दुःखदायी रहता है । शास्त्र के विपरीत कोरा बुद्धिवाद शुष्क तर्कों की ही सृष्टि कर सकता है, तत्वज्ञान की तो उससे आशा ही नही रखी जा सकती । अचिन्त्य भावों में तर्क की प्रवृत्ति ही कैसे हो सकती है? महाभारत में बताया गया है कि अचिन्त्यभावों को जानते के लिये तर्क का सहारा नहीं लेना चाहिये । अचिन्त्य उसे कहते हैं, जो कि प्रकृति के साम्राज्य से ऊपर है । अतः कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्रों के आधार पर ही होना चाहिये । केवल बुद्धि का सहारा इस लिये नहीं लिया जा सकता कि शुक्ति में रजत बुद्धि की तरह तर्क का सहारा लेने वाली बुद्धि भी भ्रम से भरी हो सकती है । अतः प्रामाणिक ( प्रमात्मक ) बुद्धि का ही आदर होना चाहिये । रूप को देखने में नेत्र, शब्द को सुनने में २२५
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वेदार्थपारिजात १७ ९४ पुरुषबुद्धेरनित्यत्वाद् वेदे धर्मब्रह्मज्ञानाय मन्त्र आदरणीयः । पुरुषविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे' ( नि० ११२ ) इति निरुक्तरीत्या देशकालानुसारेण निर्मितस्य सत्यार्थप्रकाशस्याद्यत्वे तदनुयायिभिरेवोल्लङ्घनं क्रियते । स्मृतयस्तु वेदानुसारिण्यो न देशकालानुसारेण स्वबुद्धया कैश्चिन्निर्मिताः, ' श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्' इति कालिदासोक्तेः । अत एव 'विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्' ( जे ० सू ० १।३।३ ) इति जैमिनिना श्रुतिविरुद्धायाः स्मृतेरनपेक्षत्व ( अप्रामाण्य ) मेवोक्तम् । विधवाविवाहश्च शास्त्रे निषिद्ध एव । ' दूषितं धर्मशास्त्रज्ञः परदाराभिमर्शनम्' ( म. भा. अनुशा० १० १९/ ८९ ) इति रीत्या परस्त्रीणामभिमर्शनं धर्मशास्त्रैर्दूषणत्वेनैवाङ्गीकृतम् । साधारणजनैरपि तथैवाभ्युपगम्यते । विधवाया अपि परस्त्रीत्व सर्वसम्मतमेव । शास्त्रेषु 'यथा भ्रूणहत्यादिक दूषणमुक्तम्, तथैव विधवाविवाहोऽपि निषिद्ध एव । विधवाना कामपूर्त्यर्थं तथाभ्युपगमे सधवानामपि स्वपत्यतृप्तानां विवाहान्तरापत्तेः । पूर्वमार्यसमाजेनाक्षतयोन्या बालविधवाया विवाहः समर्थ्यते स्म, साम्प्रतं तु पुत्रवतीनामपि क्षतयोनीनामपि विवाहः समर्थ्यते कार्यते च । अद्यत्वे विवाहविच्छेदेनापि विवाहान्तरं कार्यंते । कुरूपतावशात् पारिबर्हाल्पत्वादिकारणाद- न्यै र्वा लोभक्रोधादिहेतुभिविवाहविच्छेदाय यत्न आस्थीयते । तथा च विवाहप्रथाभङ्गप्रसङ्गेन भगिनीगमनादिप्रथापि समापत्स्यते । विधवाविवाहप्रचारोऽसंयममूलकव्यभिचारप्रथाविषयतृष्णावृद्धिहेतुत्वमेव यास्यति । न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ ' इति ययातिगीतेनं भोगेनापि विषयतृष्णा क्षीयते । अहङ्कारो मैथुननिद्रासेवनात्तु विवर्धते । अवैधविवाहेनाधर्मादपि भयमपनुद्यते । परिणामे विधर्मिणामिव हिन्दूधर्मेऽपि तथैवो- च्छृङ्खलतावृद्धिर्भविष्यतीति । किञ्चैवं विधवायाः पूर्वोत्पन्नपुत्रीषु पुत्रीबुद्ध्यभावेन तत्र वर्तमानसम्बन्धिना कामुकत्वापत्त्यनाचारविवाहा- श्रोत्र, रसका स्वाद लेने में रसना (जिह्वा ) के समान धर्म और ब्रह्म को जानने मे शास्त्र को ही प्रमाण माना जाता है । पुरुष की बुद्धि अस्थिर होती है, अतः धर्म और ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिये शास्त्र का ही सहारा लेना चाहिये । निरुक्तकार पुरुष की विद्या ( मनुष्य के द्वारा निर्मित शास्त्र ) को अस्थिर मानते है । देश और काल की परिस्थिति के अनुसार उसका निर्माण होता है | सत्यार्थ प्रकाश को आज दयानन्द के अनुयायी भी सर्वात्मना प्रमाण नही मानते । इसके विपरीत स्मृतियो का निर्माण वेदों के आधार पर हुआ है, देश खोर काल की परिस्थिति के अनुसार किसी मनुष्य ने अपनी बुद्धि से इनका निर्माण नही किया है | महाकवि कालिदास कहते है कि स्मृतियां श्रुति का अनुगमन करती है । इसीलिये आचार्य जैमिनि ने श्रुति के विरुद्ध जाने वाली स्मृति को प्रमाण नही माना है । विधवा-विवाह शास्त्र में स्पष्ट रूप से निषिद्ध है । महाभारत के वचन के अनुसार धर्मशास्त्रकारो ने पर-स्त्री के साथ सम्पर्क को दूषित माना है । सामान्य जनता भी ऐसा ही मानती है । विधवा भी दूसरे की ही स्त्री है । शास्त्रो में जैसे गर्भपात आदि कार्यों को दूषित माना है, उसी तरह से विधवा-विवाह को भी सदोष घोषित किया है । विधवाओ की काम भावना की पूर्ति के लिये यदि इसको स्वीकार किया जाता है, तो सधवा स्त्रियों का भी अपने पति से कामभाव की पूर्ति न होने पर दूसरे विवाह की आपत्ति उठ खड़ी होगी । पहले आर्यसमाजी अक्षत योनि बाल विधवा के ही विवाह का समर्थन करते थे । अब तो वे क्षत योनि, पुत्रवती स्त्रियों के भी विवाह का समर्थन करने लगे हैं । आज तो विवाह का विच्छेद ओर विवाहान्तर भी होने लगा है । कुरूपता के कारण, ठीक से । दहेज आदि न मिलने से अथवा लोभ मोर क्रोध के कारण भी विवाह का विच्छेद (तलाक ) कराने का प्रयत्न किया जाता है । यही क्रम यदि चलता रहे तो एक दिन विवाह की प्रथा भी समाप्त हो सकती है और क्रमशः भागिनी (बहिन ) आदि के साथ भी रहने की प्रथा चल सकती है । विधवा-विवाह का प्रचार असंयम को बढ़ावा देगा, फलतः विषयों से वैराग्य के स्थान पर यह व्यभिचार को ही वढावेगा । महाभारत में ययाति ने बताया है कि कामो के उपभोग से कामनाएँ शान्त नही होती, ये तो उसी तरह बढ़ती जाती है, जैसे कि आहुति देने से आग बढ़ती है । मैथुन, निद्रा आदि के सेवन से अहंकार बढता है । अवैध विवाह करने से अधर्म से भय दूर हो जाता है । इसका परिणाम यह होगा कि अन्य धर्मों के समान हिन्दू धर्म में भी उच्छृङ्खलता बढ़ने लगेगी । विधवा की पहले विवाह से उत्पन्न पुत्रियों में पवित्र बुद्धि न रहने पर वर्तमान सम्बन्धियों की उनके प्रति कामुकता
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वेदार्थपारिजात १७९५ दिप्रसङ्गापत्तेः । यदि च सन्तानवतीनां विधवानां विवाहोऽवरोत्स्यते, तदा कामाक्रान्तमनस्कानां विवाहलोभात् सन्तानघा- तप्रसङ्गोऽप्यापद्येत । तथा सति भ्रूणहत्याबालहत्याद्यापत्तिः स्यात् । किञ्चैवं पूर्वपतिमरणेन पत्यन्तरविधाने तथैवोत्तरपति- मरणे तदुत्तरपतिविधाने निःसीमपत्यन्तरवरणत्वापत्तिः क्वचिन्निरोधे हेत्वभावात् । किञ्च विधवाविवाहेषु प्रचलितेषु सतीनामपि विकारापत्त्या परमश्लाघ्यपतिव्रतधर्मंलोपापत्तिश्च स्यात् । सधवानां चैकपत्यसन्तोषात्तत्तोषाय विवाहविच्छेदा- द्यापत्तिश्च स्यात् । तदा चाविद्यमाननपुंसकत्वादिदोषारोपेणापि विवाहविच्छेदादि. स्यात् । तथात्वे च लज्जाद्यपगमे स्त्रीणा स्वाभाविकाष्टगुणिताया. कामवृत्तेरुद्दीपनेऽनेकार्थसृष्टिः स्यात् । शास्त्रश्रद्धापगमे च यथेष्टं स्वैरं सामाजिकनियमपरिवर्तने विशृङ्खलतैव स्यात् । तथात्वे बहूनां सम्बन्धे कामुकेषु प्रचण्डसङ्घर्षेणाप्यनर्थापत्तिः स्यात् । विवाहविधिषु च मन्वादिभिः स्पष्टमुक्तम्--'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः' (म० ८ २२६ ) इति । न विवाहविधी विवाहो नियोगो वा प्रकीर्तित | ' अर्यमण नु देवं कन्या अग्निमयक्षत स नो अर्यमा देवः प्र इतो (पितृगृहात्) मुञ्चतु मा पते:' ( पारस्करगृह्यसूत्रे ११६१२ ) इति पूर्वोक्तमन्त्रेण कन्या परमात्मानं प्रार्थयते यदह पितृगृहाद् वियुक्ता स्या, न पति- गृहात्' । इति काठकगृह्यसूत्रे -' अर्यमा इतो मुञ्चतु मा अमुष्य गृहेभ्यः' ( २५/३० ) । तथा सति कुतो विवाहानन्तरं विवाह- विच्छेदप्रसक्ति:? ' अश्मेव त्वं स्थिरा भव' ( पारस्करगृह्यसूत्रे १७११ ), 'ध्रु वाहं पतिकूले भूयासम्' (गोमिलगृह्मसूत्रे २| ३| ८), 'ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम्' ( गोभिलगृह्यसूत्रे २/३| ११ ), 'सकृत्कन्या प्रदीयते ' ( म० ९१४७ ), न दत्त्वा कस्यचित्कन्या पुनर्दद्याद्विचक्षणः' ( म० ९।७१ ) इत्यादिवचनैः कन्याया विवाह्यमानेन सुदृढ सम्बन्धो बोध्यते । किञ्च, विवाहे कन्याया गोत्रपरिवर्तनं भवति । विधवाया सत्यां पुनर्विवाहे पूर्वप्रतिज्ञाया भ्रंशः । यस्य तत्र स्वत्वं स्यात् स एव दानाधिकारी, सकृद्दानेन पितु श्वशुरस्यान्यस्य वा तत्र स्वत्वाऽ भावात् कथं दान स्यात्? 'अग्निर्मह्यमथो जाग सकती है और इस तरह से गलत विवाहो की परम्परा चल सकती है । यदि सन्तान वाली विधवाओं के विवाह पर रोक लगाई जायगी, तो काम से आक्रान्त होकर विवाह करने के लोभ में ये अपनी सन्तान की ही हत्या पर उतारू हो जायेंगी । इस तरह से भ्रूण हत्या, बाल हत्या आदि पातक बढ जायेंगे । पूर्व पति के मरने पर दूसरे पति की अनुमति मिलने पर उस दूसरे पति के मरने पर तीसरे और इस तरह अनन्त पति के वरण की छूट देनी पडेगी, क्योकि बीच में रोक लगाने का कोई कारण नही है । फिर विधवा- विवाह के प्रचलित हो जाने पर सती स्त्रियों के मन में भी विकार उत्पन्न हो सकता है और इस तरह से परम श्लाघनीय पतिव्रता धर्म के लोप की आशंका उठ सकती है । सधवा स्त्रियों का एक पति से सन्तोष न होने पर अपनी तुष्टि के लिये विवाह का विच्छेद संभव हो सकता है । ऐसी स्थिति में वे अपने पति पर उसमे अविद्यमान नपुंसकत्व आदि दोषों का भी मिथ्या आरोप कर सकती है और उसको तलाक दे सकती हैं । ऐसा होने पर स्त्रियों में लज्जा कहाँ रह जायगी और तब उनकी आठ गुनी कामवृत्ति के उद्दीप्त हो जाने पर अनेक अनर्थों की सृष्टि होने लगेगी । शास्त्रों पर से श्रद्धा के हट जाने पर और मनमाने तरीके से सामाजिक नियमो में परिवर्तन करने पर उच्छृङ्खलता बढ जायगी । अनेक स्त्रियों के लिये कामुक पुरुषो में परस्पर प्रचंड संघर्ष होने पर समाज में महान् अनर्थ की सृष्टि, फलतः अव्यवस्था फैल जायगी । विवाह विधि के प्रसंग में मनु प्रभृति ने स्पष्ट कहा है कि पाणिग्रहण के मन्त्रों का पाठ कन्या के विवाह के अवसर पर हो किया जाता है । विवाह विधि में पुनर्विवाह और नियोग का समावेश नही है । पारस्कर गृह्यसूत्र मे पठित मन्त्र में कन्या परमात्मा से प्रार्थना करती है कि मैं पिता के घर से अलग होऊँ, पति के घर से नही । काठक गृह्यसूत्र में भी इसी अभिप्राय का मन्त्र है । ऐसी स्थिति में दूसरे विवाह की अथवा विवाह के विच्छेद ( तलाक) की बात ही कैसे उठ सकती है? पारस्कर गृह्यसूत्र, गोभिल गृह्यसूत्र, मनुस्मृति प्रभृति के वचन भी कन्या का विवाह्यमान पुरुष से सुदृढ सम्बन्ध बताते है । विवाह हो जाने पर कन्या का गोत्र बदल जाता है । विधवा हो जाने पर पुनर्विवाह करने से पूर्व प्रतिज्ञात गोत्र नष्ट हो जायगा | जिसका जिस वस्तु में स्वत्व होगा, वही उसको दूसरे को दे सकता है । एक बार दान कर देने से पति के सिवाय पिता, श्वर अथवा अन्य किसी भी व्यक्ति का उस पर स्वत्व नहीं रह जाता, तब उस पति की मृत्यु हो जाने पर अन्य किसी को उसका दान
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वेदार्थपारिजातः १७९ ६ इमाम्' ( ऋ० सं ० १०/८५/४१ ) इत्यग्निना स्वस्वत्वस्य प्रथमवराय दत्तत्वात् । तन्मरणेऽग्नेरप्यधिकाराभावेन सोऽपि नान्यस्मै दातुं शक्नोति । तत एव मनुनोक्तम्—'नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् । न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ||' ( म० ९ ६५ ) इति । श्रीरामेण च वनवासावसरे सीतामुद्दिश्योक्तम्-'याते च मयि कल्याणि वनं मुनिनिषेवितम् । व्रतोपवासपरया भवितव्यं त्वयानधे ॥ ' ( वा ० रा ० अयो० २६।२९ ) पत्युर्महायात्राया तु सुतरां विधवया व्रतोपवासपरयैव भवितव्यम् । ' •... अवेद्यावेदनेन च । जायन्ते वर्णसङ्कराः ॥ यत्र त्वेते ह्यपध्वंसा जायन्ते वर्णदूषकाः । राष्ट्रियैः सह तद्राष्ट्र क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ( म० १० २४, ६१ ) इति मनुना, 'स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः । सङ्करो नरकायैव कुलध्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ( भ० गी० ११४२ ) इति तत्र तत्र शास्त्रेषु साङ्कयंस्य निन्दितत्वमुक्तम् । सनातनधर्मनियमेनैव स्त्रियः क्विश्यन्ते इत्याक्षेपोऽपि निरर्थक एव, प्रकृतिप्राप्तकष्टानां सहनेनैव कल्याणसम्भवात् । गर्भधारण-प्रसवपीडा-सन्तानपोषणादिकष्टानां भोगस्त्वनिवार्य एव । स्त्रीजातेः पातिव्रत्येनैव देशोद्धारः, स्त्रीरक्षयैव कुल- गोत्रादिरक्षा सम्भवति । तथा च मनुः-'स्वां प्रसूति चरित्रं च कुलमात्मानमेव च । स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जाया रक्षन् हि रक्षति । ( म० ९/७ ) । यथा पत्यौ यात्रादिगते तदन्यसम्बन्धो व्यभिचार एव, तथैव मरणेऽप्यन्यसम्बन्धो व्यभिचार एव । 'इहलोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल । अद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य सा ॥ ' ( वा० रा ० २।२९ ) इति रामाय- णोक्तेः । 'न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः । नानाहिताग्निर्नाऽयज्या न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥ ' ( छा० उ० ५। १११५ ) इति रीत्या पुरुष एव स्वैरी भूत्वा स्त्रियं स्वैरिणी करोति । 'असम्भोगो जरा स्त्रीणाम्' ( म ० भा० उ० प ० २९१७८ ) इति करने का कैसे अधिकार मिल सकता है? अग्नि अपने स्वत्व को वर मे अर्पित कर देता है । उस बर की मृत्यु हो जाने पर अग्नि का भी उस पर स्वत्व न रहने से अग्नि की साक्षी मे भी दूसरा विवाह नही सम्पन्न हो सकता । इसीलिये मनु ने विवाह के अवसर पर पढ़े गये मन्त्रों का नियोग में और विधवा-विवाह में विनियोग वर्जित माना है । श्रीराम ने वनवास के लिये जाते समय सीता से कहा है कि हे कल्याणी, मुनियों के द्वारा सेवित वन में मेरे जाने के बाद तुम व्रत उपवास आदि करते हुए समय बिताना | इस पृष्ठभूमि में पति की महायात्रा हो जाने पर तो निश्चित ही विधवा को व्रत-उपवास करते हुए ही समय बिताना चाहिये । 'अनुचित विवाह आदि दोषों के कारण वर्णों में साकर्य पैदा होता है । जिस देश में वर्णों के दूषित करने वाले ये वर्णसंकर उत्पन्न होते है, वह देश शीघ्र ही प्रजासहित नष्ट हो जाता है' इस तरह से मनु ने और 'हे अर्जुन, स्त्रियों के सदोष हो जाने पर वर्णसंकर पैदा होने लगते हैं और यह वर्ण साकर्यं सारे कुल को नरक में गिरा देता है । पिण्डदान और तिलोदक- दान के अभाव मे उनके पितर पतित हो जाते है' इस तरह से गीता ने और अन्य शास्त्रों ने भी वर्ण सांकर्य की सब तरह से निन्दा की है । सनातन धर्म के कड़े नियमो के ही कारण स्त्रियाँ कष्ट पाती है, इस तरह का आक्षेप भी निरर्थक है, क्योकि स्वभावतः प्राप्त होने वाले कष्टों को सह लेने में ही कल्याण है । गभधारण, प्रसव पीडा, सन्तान का पालन-पोषण का कष्ट स्त्रियो को अनिवार्य रूप से भोगना पड़ता है । स्त्री जाति के पातिव्रत्य के कारण ही देश की रक्षा होती है । स्त्री जाति की रक्षा से ही कुल और गोत्र की रक्षा हो पाती है । मनु ने स्पष्ट कहा है कि अपनी स्त्री की रक्षा करने वाले अपनी सन्तान, चरित्र, कुल, अपनी आत्मा और अपने धर्म की भी रक्षा करते हैं 1। जैसे पति के यात्रा आदि पर चले जाने पर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध को व्यभिचार माना जाता है, उसी तरह से 'पति की मृत्यु हो जाने पर दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करना भी व्यभिचार ही है । वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट उक्ति है कि इस लोक में पिता आदि जिस पुरुष को स्त्री ( कन्या ) अर्पित कर देते हैं, मरने के बाद भी वह उसी की रहती है । छान्दोग्य उपनिषद् में बताया कि मेरे राज्य में कोई चोर, कायर, शराबी नही है । सभी अग्निहोत्री हैं । कोई व्यभिचारी नही है, तो व्यभिचारिणी कहाँ से आवेगी ।
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वेदार्थपारिजातः १७९७ स्त्रीणामसम्भोगात् स्वयमेव कामक्षयस्मरणात् । स्त्रीणाममेथुन जरा' ( कौटल्य २८५ ) इति च । ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्तु विवर्धते' उत्तेजनाधिक्यात् कामवृद्धिर्भवति । सम्पर्काच्चोत्तेजना वर्धते । तस्मात् सम्पर्क एव शास्त्रकारैर्निषिद्धः । ' (, घृतकुम्भसमा नारी तप्ताङ्गारसमः पुमान् । तस्माद् घृतं च वह्नि च नैकत्र स्थापयेद् बुध ॥ पद्मपुराणे सृष्टिखण्डे ४९।२१ इत्युक्तेः । यत्तु - ' बाल्यावस्थायां बालिकाना विवाहो मुस्लिमाक्रमणकाले प्रारब्धः । तदैव - ' अष्टवर्षा भवेद् गोरी नववर्षा च रोहिणी' इत्यादयः श्लोका निर्मिता:' इति, तदपि निर्मूलमेव, सीताया उत्तरायाश्च बाल्यावस्थायामेव विवाहस्मरणात् । मुस्लिमादिभिस्तु विवाहितानामप्यपहरणादिकं क्रियत एवेति । पद्मिनीप्रभृतीनां सामूहिकरूपेणाग्निप्रवेश. प्रसिद्ध एव । जन्मान्तरीयदुरदृष्टवशाद् वैधव्यमित्यपि न विस्मर्तव्यम् । ननु यथा स्त्रिया मरणे पुरुषस्य विवाहान्तरं सम्भवति, तथैव पत्यु- मरणे पत्न्या अपि कुतो न विवाहान्तरमिति चेन्न दुरवस्थापातात् । तथाहि-स्त्रिया मरणे पुरुषस्य विवाहान्तरेऽपि तत्सन्त- तीनां तद्गोत्रत्वात् तत्राधिकारो भवति, तत्रैव स्थित्वा पित्रा रक्षितत्वाद् दायभागित्वाच्च सुरक्षा सम्भवति, पत्युर्मरणे पत्न्याः पत्यन्तरकरणे तु तत्सन्ततीना तत्रैव स्थितावनाथत्वमेव स्यात्, तासा पालनपोषणादौ बाधासम्भवात् । मात्रा सहगमने पैतृकधनालाभे तथैव दुःस्थितत्वं स्यात् । नवीनपतिगृहे सन्ततीनामनादर एव स्यात् । तत्र दायभागित्वमपि न भवति, विवाहादिकाठिन्य च स्यात् । तत्रानानुकूल्ये पुनः पत्यन्तरकरणे ततोऽपि महती दुरवस्था स्यात् । वस्तुतस्तु पुरुषाणां विवाहान्तरविधायक वचनबलाद् विवाह । स्त्रीणां च कृते तादृशवचनासत्त्वादेव वैषम्यम् । गर्भधारणस्य अपि च स्त्रीणा पुरुषाणां च शक्ति -स्वभाव-कार्यभेदाद् एषोऽधिकारभेदः । एकस्मिन् वर्षे स्त्रिया एकस्यैव पर स्त्री का कामभाव अपने आप इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यभिचारी पुरुष ही स्त्री को व्यभिचारिणी बनाता है । सभोग न मिलने के सेवन से इनकी वृद्धि होती नष्ट हो जाता है । महाभारत और कोटिल्य के अर्थशास्त्र में इसकी चर्चा है । आहार, मैथुन। इसीलियेऔर निद्राशास्त्रकारो ने संपर्क को निषिद्ध है । उत्तेजना के बढ़ने पर ही कामभाव में वृद्धि होती है । उत्तेजना सपर्क के कारण बढ़ती है के समान है और पुरुष तपते हुए अंगारे माना है । पद्मपुराण सृष्टि खण्ड, मनुस्मृति प्रभृति ग्रन्थो में बताया गया है कि नारी घी के घड़े के समान । इसलिये घृत और अग्नि को कभी एक जगह नही रखना चाहिये ॥ तभी, से 'आठ वर्ष की गौरी यह कहा जाता है कि मुसलमानो के आक्रमण के समय से बचपन मे विवाह की प्रथा चली है क्योकि शास्त्रों में सीता और नौ वर्ष की रोहिणी' आदि संज्ञाओं के विधायक श्लोक चल पड़े । किन्तु यह कथन भी एकदम निराधारकर लेते थे । पद्मिनी प्रभृति और उत्तरा का विवाह छोटी अवस्था मे ही वर्णित है । मुसलमान तो विवाहित स्त्रियों का भीइस बातअपहरणको नही भूलना चाहिये । स्त्री के का सामूहिक चिताप्रवेश (जौहर ) प्रसिद्ध है । दूसरे जन्म के दुरदृष्ट से वैधव्य प्राप्त होता है, स्त्री का भी दूसरा विवाह क्यों न हो? मर जाने पर जैसे पुरुष का दूसरा विवाह हो सकता है, उसी तरह से पति के मर जाने पर उसकी सन्तति का वही गोत्र रहता है, इस प्रश्न का समाधान यह है कि स्त्री के मर जाने पर पुरुष का दूसरा विवाह होने पर । भीउससे विघटित पति की मृत्यु के उपरान्त पिता वही रहता हुआ उनकी रक्षा करता है और उनका दायभाग भी सुरक्षित रहता है जायेंगी । उनके पालन पोषण में भी बाधा पत्नी के दूसरा विवाह करने पर उसकी सन्तति वही नही रह सकती, फलतः वे अनाथ हो जायेंगीं । नये पति के घर में बच्चो का उपस्थित होगी । माता के साथ चले जाने पर पिता का घन न मिलने से वे दुरवस्था में पड़ अनादर होगा, उनको दायभाग नही मिलेगा । उनके विवाह आदि होने में कठिनाई होगी । वहां अनुकूलता न मिलने पर पुनः दूसरा पति करना पड़ेगा और इस तरह से उस स्त्री की महान् दुर्दशा होगी । के सम्बन्ध वास्तव में देखा जाय तो पुरुषों के दूसरे विवाह के विधायक शास्त्रवचन उपलब्ध होने से ऐसा होता है । स्त्री के आधार पर ही इन वचनों का विधान में ऐसे वचन कही उपलब्ध नही है । स्त्री और पुरुष के शक्ति, स्वभाव और कार्य कीस्त्रियोंभिन्नतामें गर्भ स्थापित कर सकता है । मनु ने भी है । एक वर्ष में स्त्री एक बार ही गर्भधारण कर सकती है, किन्तु पुरुष तो अनेक
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वेदार्थपारिजात: १७९८ सम्भवः, पुरुषस्त्वनेकासु गर्भं धारयितुं शक्नोति । 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाकन्यासु क्वचिन्नृणां लुप्तधर्मक्रिया हिताः ॥ ' ( म० ८२२६ ) इति मनूक्तेः । पुरुषाणामग्निहोत्रादिकमंचालनार्थं विवाहान्तरम् । न तथा स्त्रीणां पतिमरणेऽग्निहोत्रादिचालनं विहितम् । तस्यास्तु सहमरणब्रह्मचर्याभ्यां वैधव्यपालनमेव विहितम् । कन्यात्वं कदापगच्छतीत्यत्र 'यमो जातः.... जारः कनीनाम्' ( ऋ० सं ० १/६६ ४ ) अत्र सायणाचार्य: - अग्निरेव ' ' ' ' ' ' ' ' 'कनीनां कन्यकानां जारो जरयिता यतो विवाहसमयेऽग्नौ लाजादिद्रव्यहोमे सति तासां कन्यात्वं निवर्तते, अतो जरयितेत्युच्यते । निरुक्तेऽपि - 'जरयिता कन्यानां पतिर्जनीनां पालयिता जायानाम् । तत्प्रधाना हि यज्ञसंयोगेन भवन्ति । 'तृतीयो अग्निष्टे पतिः इत्यपि निगमो भवति' (नि० १०/२० ) | दुर्गाचार्योऽपि स एवाग्निर्जरयिता कन्याभावस्य । यदा हि ता अग्निसन्निधा ऊढा भवन्ति, अथ तासां कन्याभावो जीर्णो भवति' इति । तथा सति विधवाया अकन्यात्वेन कथं विवाहः स्यात्? अत एव ' पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः' ( म० ८ २२६ ) इति मनूक्तिः । विधवाविवाह इति शब्दोऽपि न सम्भवति, पाणिग्रहणमन्त्राणां कन्यासु प्रतिष्ठितत्वात् । ' कन्यायाः कनीन च' ( पा० सू० ४| १ | ११६ ) इत्यस्य महाभाष्यम्–' कन्याशब्दोऽयं पुसाभिसम्बन्धपूर्वके सम्प्रयोगे वर्तते' इति । अत्र कैयट: -शास्त्रोक्तविवाहोऽभिसम्बन्धः । या चेदानी प्रागभिसम्बन्धात् पुंसा सह सम्प्रयोगं गच्छति तस्यां कन्याशब्दो वर्तते । या तु शास्त्रोक्तेन विवाहसंस्कारेण विना पुरुषं युनक्ति सा कन्यात्वं न जहाति, कन्यैव साऽभिमता स्मृतिकाराणाम्' इति रीत्या शास्त्रोक्तविवाहेनैव कन्यात्वनिवृत्तिर्न तु पुरुषसंयोगमात्रेण । तस्मादक्षतयोन्या विवाहिताया अपि कन्यात्वमेवेत्यपास्तम्, पतञ्जलिवचनविरोधात् । न चैवं क्षतयोन्या अविवाहितायाः कन्यात्वेन विवाहः स्यादिति वाच्यम्, क्षतयोन्याः कन्याया विवाहस्य 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ।' ( म ० ८२२६ ) इत्यत्र कुल्लूकभट्टेन स्पष्ट कहा है किं पाणिग्रहण संस्कार के मन्त्र कन्या के विवाह के अवसर पर ही पढे जाते है । पुरुषों को अग्निहोत्र प्रभृति धार्मिक कृत्यों के संपादन के लिये दूसरा विवाह करना पडता है । पति की मृत्यु के उपरान्त इस तरह के किसी धार्मिक कृत्य का विधान स्त्री के लिये नही है । उसके लिये तो पति के साथ चिता मे जल मरना ब्रह्मचर्य के साथ वैधव्य धर्म का पालन करना ही विहित है । स्त्री का कन्याभाव कब हट जाता है, इसके लिये हमें ' यमो जातः प्रभृति ऋड्मन्त्र का अवलोकन करना चाहिये । इस पर सायणाचार्य कहते हैं कि अग्नि ही कन्याओ का जार है, क्योकि विवाह के अवसर पर अग्नि में लाजा होम करने पर ही उनका कन्याभाव समाप्त हो जाता है । निरुक्त में भी अग्नि को कन्याओ का जार और पत्नियों का पालक बताया है । पत्नी का पत्नीत्व यज्ञीय अग्नि के संपर्क से ही पुष्ट होता है । शास्त्र में अग्नि को तृतीय पति बताया है । इस निरुक्त वचन की व्याख्या करते हुए दुर्गाचार्य कहते हैं कि वह अग्नि ही स्त्री के कन्याभाव को हटाता है । जब अग्नि की सन्निधि मे उनका विवाह होता है, तब उनका कन्याभाव जीर्ण हो जाता है । इस स्थिति में विधवा का, जो कि अब कन्या नही रही है, कैसे विवाह हो सकता है । इसीलिये मनु ने यह स्पष्ट विधान किया है कि पाणिग्रहण संस्कार के मन्त्र कन्या के विवाह मे हो विनियुक्त है । विधवा के विवाह के लिये विवाह शब्द का प्रयोग भी लाक्षणिक ही माना जायगा, क्योकि पाणिग्रहण संस्कार के मन्त्र यहीं नहीं पढ़े जायेंगे । 'कन्यायाः कनी न च' इस सूत्र के महाभाष्य मे बताया गया है कि कन्या शब्द का प्रयोग यहाँ पर पुरुष के साथ शास्त्रीय संबन्ध के पहिले ही संपर्क करने के अर्थ में है । कैयट ने इसको स्पष्ट करते हुए लिखा है कि अभिसंबन्ध शब्द का अर्थ शास्त्रोक्त विवाह है | जो कन्या इस विवाह संबन्ध से पहले हो पुरुष के संपर्क मे आ जाती हैं, यहाँ पर कन्या शब्द उसी के लिये प्रयुक्त है । शास्त्रोक्त विवाह संस्कार के बिना ही जिसका पुरुष से संपर्क हो जाता है, उसके लिये कन्या शब्द का ही प्रयोग होता है । इससे यह बात स्पष्ट' होती है कि शास्त्रोक्त विवाह विधि के संपन्न होने के उपरान्त ही कन्या शब्द की निवृत्ति होती है, पुरुष का संपर्क होने मात्र से नहीं । अक्षतयोनि विवाहिता स्त्री को भी कन्या मानने वालों का पक्ष इससे निरस्त हो जाता है, क्योंकि ऐसा कथन स्पष्ट ही " के उक्त प्रतिपादन के विपरीत है । यदि आप यह कहें कि क्षतयोनि अविवाहिता केमहाभाष्य कन्या के सुरक्षित रहने से ऐसाविवाह धर्मानुमोदित माना जायगा, तो इसका उत्तर यह है कि 'पाणिग्रहणिका' प्रभृति मनुश्लोक की व्याख्या करते हुए कुल्लूकभट्ट