वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 321–329

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 321–329

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अशुद्धम् दयार्थं ह्रि I रक्षसां वाशिष्ट तरन्ती पूर्ण वध एव मैं यथार्थं सो द्धय अर्थ श्वय न ष्ट्रा तृतीयं म्यस संज्ञा आसन् चादिन् ग्राह्य ग्राह्य नर धिषणासि -प्रतिदिन दृषद् पेषणाथ दृषद त स्वभि पाव वणी पर्वणे [ १२ ] शुद्धम् पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम् ढ्यर्थं | १७६ १६ त्या हि पर्व २८ रक्षसा ६ स्पष्ट १८० अवशिष्टं १३ समन्यक तपन्ती स्वामी १८१ ६ पूर्ण १२ जड़ वर्ध १८२ धान्य ७ एवं पाणिड: ८ जीवनार्थं छिनु २६ विशिष्टं दीर्घा प्रासितिः १८३ १० रसो जालं १६ द्वय १८४ १ ममु जीवन युयैव २ श्वर्य भोवतृ १४ नाष्ट्रा १५ पुण्य तृतीयं उसको स्थापन करने: २१ न्यस भाग्य ३० संज्ञाना ३१ पुण्य असन् ३२ पर चारिन् १८५ वय १ ग्राहय याद ४ ग्राहय उडेल १८ नरस्य १८६ व्या १ १० अनु future पदेन १२ पद का २६ प्रतिदिनं अचय ३५ दृषदं १८७ १ पेषणार्थ ४ तस्या ज्ञान दृषदम् ७ शून्यं ६ स्वाभि पेषण १५ पार्व वीण ३५ वाणी ताआ 13 पर्व महै ३६

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अशुद्धम् विलक्षणो तच्च सु अङ्गारै वेत् नामं जुष्ट भवति । मन्त्र यथ धि मैं प्रदि सवेश्विन } -भ्याम् ! स -भिङ मती मती ज्जन अग्नोत् प्रकाशे वा चाश्वि दृढ़ वृष्टि धयाँ लोग वै पात्र्य न्तर सृजन्य अपो औषधयः वाहि ! [ १३ ] पृष्ठम् पंक्ति शुद्धम् विलक्षण | १६५ १ तच्चक्षु अङ्गारैः 17 ६ त्वेति ८ नाम २५ भवति, २६ मन्त्र १६६ १३ यथा १८ २४ ३१ प्रति | १६७ ७ १० सवेश्व १४ -uu १६ भ्याम् || २५ ॥ स ३० १६८ ३ भिः ४ मती ६ १५ मती ३१ १३ १६६ ज्ज्वल ३३ अग्नीत् | २०० १ प्रकाशे चाश्वि २ दृढ ४ । वृष्टि १४ धियाँ १६ २४ सावे २०१ ५ ११ पात्र्या १४ न्तरा सर्जन्य १५ आपो ३० ओषधयः ३३ व्रीहि | २०२ १४ अशुद्धम् पूष्णाः किन्तु छन्दोरूपाः रेवती नत्वेन धर्मो तदन अपादान श्रुतैः दम्पत्ती यदि मेलन होग जब म थथा वार्षि प्रस्तृत अनुस्त्य चारु त्वां पूय एव कणञ्च मि मि सौ वृत्यो संवन द्वित्व नानत्वम् अष्ट्रा मर्थो द्धा अर्क मन्त्रे णक्तिः विश्ववायु ध्न

पृष्ठ 323

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अशुद्धम् द्धा ग्नि त्रो प्रवर्ग्य अर्थात् अभिलषपीय भस्रा: यितु । भि धो धानासू भिवा S ' ये न्तमान ङ्गलि ता मिति आरत्य तद लेमिरे अह लिसे न्तात्तरं न्प बैस निनयन शोधते घं णत् मीषा ऽयः ऽमि पू माग्नि मते पूर्व [ १४ ] शुद्धम् | पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम् यथेवं वा | २११ १ ग्नि वदप ५ त्रा ६ -उप प्रवर्ग्य वेषु ह अभिलषणीय जनं १० दक्षिणेन भस्त्राः १७ अप्त्यों १६ यतु त्रि उप २३ यजवे ३५ भोति धानासु २१२ २ भिवा ११ स्वा मेघो प्त्ये १३ मेघं न्दमानं १४ पहूँ गुलि १६ मेघ तात्वं ३१ मेघ रिति ३२ मेघको ३३ आप्त्य मेघ तदा 73 मेघवत् लेभिरे ३४ हिः अहं | २१३ २ थास्ति पिष्य लिये न्ततारं Am धार म्प ३ वैसे मज्जा न " 3 संपश्चत मत्वेन " " नञ्चो ह्य ते ७ निनयनं यद १६ मेघ शोध्यते १८ मेघ द्यं २० णत प्रसवेऽश्वि भीषा | २१४ १ ऽपः ऽभि भ्याम् " " वधः ३ हरणर्थ गते १० तदुभावे पूर्व "

पृष्ठ 324

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अशुद्धम् लभ्यं भृष्ट ग्नि पदार्थ दुखानां मविशिष्ट बाहु तृती यत कर भ्यां पूषाभाग-स्मा जा के यजामे सख्य तेजो परभ शतेन पाशैर्यो वज्र वज्र यसा S स्थाः जड दुष्टान्तं बाधन्ते वे निगमन व्रज पान्नेन दिनि चेति व्रज गोष्ठाने वृत्र और [ १५ ] शुद्धम् | पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम कार २२७ लभ्य ७ 9 ८ 15 गोष्ठानं भृष्टि नि पाशैर्यो पदार्थ ६ दुःखानां पाशैर्यो विशिष्ट ११ बाहु नादुद्धृतां तृतीया | २२८ ह वार १३ यत् १५ सतृण कह भ्यामश्विनाव-२४ हा कदाचितं ध्वर्यू तत्तयोरेव | २२४ मुञ्चतु मा ५ त ८ ष्ट ह ताड़ १२ कानि संख्य १३ तेजस्त्वं २३० वथा २ करनेपर २२ परम चे शतेनपाशैर्यो । २३१ ११ निसार १७ -uu त्ति व्रजं | २३२ १ य व्रजं मन्त्रक ८ यज्ञा ( १ | २ | ४ | १७ ) तित्तिरी २३ ऽस्याः २६ जड़ व्रज दुष्टानां २६ बाधन्त २३३ ब्रज ५ सर्व रे ह निगमनं २४ बल इस २७ व्रज पृथिव्यादि पृथिव्या पापन्नेन दिन | २२४ प्रत्यक्ष २ च्छेति द्रपन ७ GN त्रे व्रजं ८ गोष्ठानं उत्पादन १६ परिणाम और वृत्र के २७

पृष्ठ 325

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अशुद्धम् पूर्व भाग भू हा सूक्ष्मा जस्ब पारि सूक्ष्मा विधा पटन नेव त ष्वती सुखदा जा शक्यन्ते मेंव त्येव भूवन अचयन्तः ददम् न्देति ष्यामि यूक्त शवय ङ. गु म्ला विष्णु ते ग्राह । वत एवमत पूर्व छन्द से सूक्ष्मा अर्क [ १६ ] शुद्धम् | पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम् ग्रह्मो पूर्व | २४२ १५ भागे अक् २३ प्रशंशा २६ भू उतनी स ३१ गृह्णाति सुक्ष्मा | २४३ १ मन्येन ४ श्रतो परि ५ योषा ६ सुक्ष्मा विद्या रांसा x wwo s x w o m x पठनं १४ न्येव व्यव १६ तं व्यव स्वती सूक्ष्मा सवत्सर सुषदा २० जो स्यत् २२ रत्नी शक्यते २४ मेव २६ प्रग् वैदि न्त्येव २७ पश्चित ३३ भुवन रांसा ३५ पूजयन्तः वैदिः ददुम | २४४ १ जिहीडिरे रांति ४ न्तेति बाधक का ३० व्यन्ति । २४५ मोक्त ४ तासु १३m शक्य द्विष ङ्ग ू म्लो " Passe . विष्णुः १४ सुषदां २५ ग्रह स्थल I २४६ ७ अतएव पूर्वं समन्त्र्य ६ मिः १७ २४ छन्दसा अग्नीध्र सुक्ष्मा २४७ ऊ ३ पयित ७

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अशुद्धम् | रीत्या याग हैं क्षित्वा दिवि बह्यः करे थी मसी दत् नदधत निः जा लगे हा सपदिति मस्ति ह पुरुषोद स्तदानुः इति जीवदा सङ्गो दानुक् ग्रामां महन्नाम स्र प्यादुद्धृत्या भूतां सरांशं स्थां यज्ञय कृष्ण ब्रह्म ममं जुगु मुच्छे प्रोक्षणा त्यादिक [ १७ ] पृष्ठम् पंक्ति शुद्धम् अशुद्धम् रीत्या २५२ 67 प्राक्षत्य याग करते हैं तदश 33 जित्वा है. जुगु ति गुपू " " बह्व्यः २६ अजुगुपताम् करें | २५३ तां १ थीं ११ अ I II मसि हैव वै 11 वेन मन्त्रार्थस्तु मित्येवं १४ दय न्यदधत नि 31 जो १६ आसुस्तः लेंगे तां १८ वेद २० यदिति को, मासीत्त स्फ्य ३० ऽपि ह | २५४ १३ रस होचुः पुरुषा " 1 येज वाक्यार्थ 21 रदानुः इति जीरदानु उन न 73 न्ति १४ वाले अङ्गिरस आदि ३० सङ्गा अपने यते दानुः 33 ग्रामा ३४ महन्नामसु ३५ योद्धृत्या | २५५ १ मनुष्यानुष्यानुक्तात् रङ्गि परिषूतं माचारिष्ठ भूता सारांशं ३ 11 सा ४ मर्श यज्ञिय " कृष्णं स्तर ५ १० नष्ट ब्राह्म वर्श १२ स्तर 31 मृच्छे २३ मुक्तः प्रोक्षणी भूत 33 मांस त्यादिकं १६

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[ १८ ] अशुद्धम् शुद्धम् | पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम् शुद्धम् नखलग्नाभ्यामर्थात् र्थात् | २६१ ६ वर रङ्गि राङ्गि १५ नाह है कि १७ याय मश नाय मर्ष | २६२ १ स्पो वर नाह या ष्पो नायं LI इति इति । ऽद द 23 रोषा दोष ( पापभागि ) पापभागिता ११ मितेन मितेन द्वा द्वा २० णिक् णित आदित्यै अदित्यै " " ध्याये ध्यायै | २६३ २ गुण गुणं १५ वसि सू सूर्य " " " शिता ” " अविशितोऽसि २६४ ३ च । इन्ध्या इध्या संस्कृ राग्न विषि राम्र च संस्कृ ध्ये ध्याय ७ भूत भूतं ष्टप्त ष्टप्तं आदित्यै अदित्यै 13 ष्ट ११ त तं ष्ट १५ रिक्ष रिक्ष ताड़ ताड २६६ आदित्यै अदित्यै कत्त कर्त २६ मन्त्रा मन्त्रसे । ष्ट .4 ३० शब्द से रतयः रातयः २६७ २ हृते जयन्तु जयन्तु ३ इवे हूँ है ८ धर शब्द ह्नुते ध निशि अनिशि १० ह भूव भून् १८ इ कृत कृत्यल्युटो २१ मुञ्चो मुच्यो वार्त २८ " शिशये ” ' क्षि क्षये ' देने से उस देवपत्नी का जो बैठने का स्थान है उसे छोड़ घृणु देनेसे उस देने से उस निशिता से अविशिता | २६८ ge पद पदं कृत ६ द्रव हर इति इस हव तदाहव बार्तिक सूत्र १० र्थः । थ शिश क्षक्ष ११ दना दन्त र्थां थ १२ स्मात स्माद

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अशुद्धम् यस्यो तस्त्र नातेन चक्षषा प पत्नी श्रयण त्युप् शास्त्र हा राज्य आदित्याः से उसके लिये इसकी रसना व्याप्तो चक्षु स्थान याग 1 पुनाति स्त्वा देवै तादृशा रूप अतौ काही अवक्षेण करते वंचनम् ऽय तस्मात् देवा तीण [ १६ ] शुद्धम् पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम् जा यस्य २८६ २६ स्वीक तत्र २७ नार्तेन २८० नाम २ स्थ चक्षु ३ मिमदोष पत्ये ७ पत्नी ३४ नू यत्रात्रा श्रवण ४ माण ६ त्युप मे शास्त्रं १४ भ्रतृ १८ है आज्य २३ अदित्या २८२ २ III जुहोति I, देवय IIII III से । ६ इसके लिये इस ६ रास्ना को म्य ७ व्याप्तौ सिद्धये ह्वा ८ भेन 11 दु चक्षुष ह स्थानं ढ़ 33 यत्ते हति यागं | २८२ ६ " 1 तेजोसि ग्रहण शसति १० 11 पुनाति सवितुस्त्वा ह्ना ११ जुह्वांम १२ रहो १३ फो तादृश २३ रूपं का २७ अतो उस ३१ यजमान से ही २८३ स ' १ अवेक्षण कराते दु ६ इति र्वचनम् ८ समां ऽयं १६ ठीक है तस्मादु 33 मै २८४ दु २ देव तात्ू 6 तीर्ण त 13

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अशुद्धम् वद प्रजा घर्षण होने करना अज्य आह्व यजमानयो ह्वयति मनन्त्रा आदित्या वह अध्वर्यु. स्तनूः हवा न वर्ष वृद्धि रुप से पूर्व प्रेरयत ततोऽग्नेऽग्नि तरुण रखे ततो याज यजव्व लायं ह ० ब्रह्म ० प्रादक्षिष्येन नमू सयव पूववद्ध निमित तान रग्नीधा धि त्रिव रितं 16 दभं [ २० ] शुद्धम् पृष्ठम् पंक्ति अशुद्धम् वदं १५ याद्या पारुरु प्राजा १ २६० घर्षण प्रहरात ५ न होने क्षेपण ६ करता ततृ ५ ब्रह्मन् आज्य ६ ब्रह्माण आहव " " जमानयो तता ६ आह्वयति ११ समृ m w • 2 त्र्यङ्गलम् १२ मन्त्रा ग्नीधं अदित्या १३ अध्वर्यु ३६ मरु स्तनूः | २६१ पढा ५ ग्नि ह्वान ८ णाडिन १६ अन्वहार्य वर्षवृद्धम् २० शूर्पं से २८ भागे पूर्व २६ में में प्रेरयति ३१ अथीत् ३५ ततोधरुण | २६२ १ स्रव रखे ब्रध्ना ३ ततो देवयज ध्रुवाञ्च ६ यजंव प्रतत " लाये णा ८ माष्टि ह हब्रह्म खीचने १४ प्रदक्षिष्येन करना १६ संहित तो ३४ वेद नम् | २६३ ३ गृहात संयव | २६४ २ पूर्वव मणात् ४ प्रे " षों निर्मित १७ कात्यश्रीत तानि कात्य २५ राग्नीध्रा २६५ उच्चैः ३ आग्नीध्रा २१ मुज्ज धि-३६ हात त्रिर्वा | २६६ ममे २ रित यानि २८ दर्भ