वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - २ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - २ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता भाष्यप्रणेतारः अनन्तश्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः द्वितीय - तृतीयाध्यायात्मको भागः प्रकाशकः श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावनम्
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता [ द्वितीय तृतीयाध्यायात्मको भागः ] भाष्य प्रणेतारः अनन्तश्री विभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः भाषानुवादकः डॉ ० प ० गजाननशास्त्री मुसलगांवकरः भीमांसा वेदान्त - साहित्याचार्य:, एम ० ए ०, पी - एच ० डी ० सम्पादकः प ० व्रजवल्लभद्विवेदी दर्शनाचार्यः सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागम विभागाध्यक्षचर आचार्यश्च प्रकाशकः श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावन ' प्रथमसंस्करणम् र
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प्रकाशक-श्रीराधाकृष्ण धानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावन मूल्य: साठ रुपये मात्र अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकारा राजकीयनियमानुसारेण सुरक्षिताः पुस्तकप्राप्तिस्थानम्--१. २. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ११३, पार्क स्ट्रीट, साततल्ला, कलकत्ता राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५/१८ नारदघाट वाराणसी ( उ ० प्र ० ) ३. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ४. ५. धर्मसंघ विद्यालय रमणरेती, बृन्दावन मथुरा ( उ ० प्र ० ) कृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल लिमिटेड ४०१/४०४ राहेजा सेन्टर २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मंसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ई ० ४ / २४, ईस्ट पटेल नगर दिल्ली-मुद्रक-तारा प्रिंटिंग वक्र्स कमच्छा, वाराणसी
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परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
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भूमिका अनन्तीविभूषित- जगद्गुरुशङ्कराचार्य - पूर्वाम्नाय गोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्व • स्वामी श्रीनिरञ्जनदेवजी तीर्थ महाराज वेदं वेदनिधि विद्यां ब्रह्मविद्यां गणाधिपम् । सरस्वतीं गुरून् सर्वान् प्रणमामि भूमिका स्वामिपदानां भाष्यस्येयं सारभूतैकविंशत्या विदुषां स्वस्वरूपस्थितिर्मोक्षो वेदस्यैकं भगवद्भक्तियोगश्च द्वितीयं अत्रावतारवादोऽपि बहुधा मुहुर्मुहुः ॥ १ ॥
निगद्यते ।
प्रीतिहेतवे ॥ २ ॥
प्रयोजनम् ।
तत्प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
सम्प्रकीर्तितः ।
मन्त्रोऽयं स्पष्टमेवाह ' इदं विष्णुर्विचक्रमे ' ॥ ४ ॥
शक्या एतादृशा मन्त्राः समुद्धतुं सहस्रशः ।
सगुणत्वं भगवतः साकारत्वं च साधितुम् ॥ ५ ॥
कर्मकाण्डप्रवृत्तिश्च वेदोद्देश्यं तृतीयकम् ।
कर्मणामननुष्ठानात् चित्तशुद्धिः कथं भवेत् ॥ ६ ॥
कर्मोपासनबोधाख्यं त्रयं वे
बोध्यते ।
कर्मभिश्चित्तशुद्धिः स्याद् भक्त्या चैकाग्रता भवेत् ॥ ७ ॥
ततो ज्ञानेन मुक्तिः स्यादेष वेदस्य डिण्डिमः ।
सायणाचार्य पादेन महीधर बुधेन च ॥ ८ ॥
विदुषा चोव्वटेनापि तथा व्याख्यानमीरितम् ।
परं प्रयोजनं मोक्षो वेदस्यास्तीति निश्चितम् ॥ ९ ॥
अवान्तरं तथाप्यस्ति कर्मज्ञानं प्रयोजनम् ।
यज्ञादीनि च कर्माणि प्रशस्तानि बुधैः सदा ॥ १० ॥
अन्तःकरणशुद्धयर्थं श्रुति स्मृतिमतानि हि ।
' तमेतं ब्राह्मणा ' नूनं ' ' यज्ञेने'त्यादि वेदवाक् ॥ ११ ॥
ज्ञानेच्छायां नियोगं तु यज्ञादीनां ब्रवीति हि । अत एव महाभागैः सायणाद्यैः प्रकीर्तिताः ॥ १२ ॥
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वेदार्थास्ते समीचीना नान्यैरुक्ताः कथञ्चन ।
इतिहासपुराणैश्च सूत्रवाक्यैस्तथैव च ॥ १३ ॥
निरुक्तः प्रातिशाख्यैश्च शिक्षाव्याकृतिभिस्तथा ।
मन्वादिस्मृतिकारैश्च याज्ञिकार्थाः सुसम्मताः ॥ १४ ॥
इदानीन्तन विद्वद्भिर्दयानन्दादिभिस्तु यैः ।
पाश्चात्त्यैरपि यः कैश्चिद् भारतीयैस्तदाश्रितैः ॥ १५ ॥
वेदार्था ये कृतास्ते वै न सत्या इति दर्शितम् । करपात्रमहाभागैस्ततो भाष्यं अत्र सर्वोऽपि वेदार्थ: समीचीन शिक्षाव्याकृतिकल्पादिसम्मतोऽथ प्रकीर्तितम् ॥ १६ ॥
उदीरितः ।
निरुक्तगः ॥ १७ ॥
इतिहासपुराणगः । • सर्वथानुमतः सत्य पूर्वेराचार्यवर्यैश्च मन्वादिस्मृतिभिस्तथा ॥ १८ ॥
अनुमोदित एवार्थः स्वामिपादैः प्रकीर्तितः ।
एतेषां सर्वशास्त्राणां ज्ञानं येषां न विद्यते ॥ १ ९ ॥
अज्ञात्वा भाष्यमेतत् ते खण्डनं कर्तुमुद्यताः ।
एतेनैव परास्तास्ते नोत्तरं तेषु विद्यते ॥ २० ॥
व्यर्थं ते खण्डनं कस्मात् कुर्वन्त्य विधिनोदिताः ।
इदं ते किं न जानन्ति स्यात्तु मोदकखण्डिका ॥ २१ ॥
- श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थः वेद, वेदनिधि परमात्मा, वेद का ज्ञान कराने वाली अपरा विद्या, परब्रह्म का ज्ञान कराने वाली परा विद्या-ब्रह्मविद्या, विघ्नविनायक गणेश, सम्पूर्ण विद्याओं की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती और सर्वविध ज्ञानों के स्रोत अपने सभी गुरुजनों को बार - बार प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥
विद्वानों को प्रसन्नता के लिये अनन्तश्री धर्मसम्राट् ब्रह्मलीन स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज द्वारा विरचित वेदभाष्य की सारभूता ' भूमिका ' इक्कीस श्लोकों में लिख रहा हूँ ॥ २ ॥
' स्वरूप स्थिति मोक्ष का स्वरूप है ' - जहाँ से कभी लौटकर नहीं आना पड़ता वही ' मोक्ष ' वेदों का परम प्रयोजन, अर्थात् प्रधान प्रयोजन है । ' मोक्षोपयोगी भगवद्भक्ति का लाभ ' भी वेदों का अवान्तर प्रयोजन है ॥ ३ ॥
इसी प्रसंग में वेदों के मन्त्र और ब्राह्मण भाग में भगवद्भक्ति के अत्यन्त उपयोगी भगवान् के सगुण - साकार विग्रह और अवतारवाद का भी निरूपण है । ' इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पा ७ सुरे स्वाहा ' ( शुक्लयजुर्वेदसंहिता ५.१५ ) इत्यादि अनेक मन्त्रों में भगवान् के वामन अवतार का स्पष्ट प्रतिपादन उपलब्ध है ॥ ४ ॥
ऐसे और भी हजारों मन्त्र उद्धृत किये जा सकते हैं, जिनसे भगवान् का सगुण - साकार रूप स्वतः स्पष्ट सिद्ध हो जाता है ॥ ५ ॥
sers के बिना भगवान् की भक्ति हो ही नहीं सकती, अतः कर्मकाण्ड में प्रवृत्ति कराना भी वेद का गौण उद्देश्य है | कर्मकाण्ड के बिना चित्त - शुद्धि नहीं हो सकती, चित्त - शुद्धि के बिना ज्ञान नहीं हो सकता । ' ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां
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( ५ ) क्षयात् पापस्य कर्मणः । यथाऽऽदर्श तले प्रश्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ ' ( महा ० शान्ति ० २०४.८ ), ' नाविरतो दुश्चरितप्राशन्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनंनमाप्नुयात् ॥ ' ( कठो ० १.२.२५ ) इत्यादि वचन - समूह से यह बात स्पष्ट सिद्ध हो जाती है । ' कर्मकाण्ड का चित्त शुद्धि द्वारा ब्रह्मजिज्ञासा में विनियोग है ' इस बात में ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन ' ( बृहदारण्यको ० ४.४.२२ ) इत्यादि श्रुति तथा ' स्वाध्यायेन व्रतैर्होमंस्त्रविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञंश्च यज्ञेश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ ' ( मनु ० २.२८ ) इत्यादि स्मृति वचन -प्रमाण हैं । ' कर्मकाण्ड से चित्तशुद्धि और भगवान् की भक्ति से चित्त की एकाग्रता होने पर ज्ञान से मोक्ष होता है ' यही वेद का डिण्डिम घोष है । इसीलिये कर्म, उपासना और ज्ञान -- इन तीनों का प्रतिपादन ' वेद ' करते हैं ॥ ६-११2 ) ॥ इस अभिप्राय से चतुर्वेद भाष्यकार सर्वदर्शन - पारावारपारीण सायणाचार्य, उव्वट - महीधर, वेंकटमाधव आदि प्राचीन प्रामाणिक आचार्यों ने भक्ति और मोक्ष को वेद का परम प्रयोजन मानते हुए भी कर्मकाण्ड के ज्ञान को वेद का अवान्तर प्रयोजन मानकर अधिकांश मन्त्रों का कर्मकाण्डपरक भाष्य किया है । भगवत्पाद आद्यशङ्कराचार्य, श्रीरामानु-जाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य, श्रीवल्लभाचार्य आदि सभी पावन साम्प्रदायिक आचार्यों का कर्मकाण्ड के सम्बन्ध में कहीं मतभेद नहीं, जब कि ज्ञानकाण्ड में अद्वेत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत और द्वैत आदि मतभेदों की भरमार है ॥ १२ ॥
वेद मन्त्रों के प्राचीन आचार्यों द्वारा किये गये यज्ञादि कर्मकाण्डपरक अर्थ ही वास्तविक अर्थ हैं । दयानन्द आदि आधुनिक विद्वानों तथा पाश्चात्त्य विद्वानों एवं उनकी लकीर के फकीर कुछ भारतीय विद्वानों द्वारा किये अर्थ ठीक नहीं हैं, क्योंकि सायण, उव्वट, महीधर, वेंकटमाधव आदि आचार्यों के अर्थ शिक्षा, कल्पसूत्र, व्याकरण ( प्रातिशाख्य ), निरुक्त, छन्द, ज्योतिषशास्त्र - इन वेदाङ्गों के सम्मत हैं । इतिहास, पुराण, पूर्वोत्तर मीमांसा आदि सभी दर्शनशास्त्र और मन्वादि स्मृतिकार भी इन्हीं अर्थों का समर्थन करते हैं । इसी बात को स्पष्ट करने के लिये ब्रह्मलीन धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रस्वामीजी महाराज ने ' वेदार्थपारिजात ' नामक वेदभाष्यभूमिका और वेदभाष्यरूप ग्रन्थ लिखा । इसमें जो वेद के अर्थ किये गये हैं, वे शिक्षा, कल्पसूत्र, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, प्रातिशाख्य ( वैदिक - व्याकरण ) और इतिहास, पुराण, मन्वादि स्मृतियों से पूर्णरूपेण समर्थित हैं ॥ १३-१८३ ॥ इन सभी शास्त्रों का जिन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं है और स्वामिचरणों के वेदार्थपरिजात भाष्य की भूमिका को समझने में भी जो असमर्थ हैं, ऐसे कुछ लोग ग्रन्थ के खण्डन में प्रवृत्त हुए हैं, उनका खण्डन इसी से हो गया कि उन्हें किसी भी पूर्वाचार्य का समर्थन प्राप्त नहीं है, प्रत्युत उनका सिद्धान्त सर्वाचार्यविरुद्ध है । फिर भी दुर्दैव की प्रेरणा से वे खण्डन करने का दुस्साहस कर रहे हैं, क्या वे नहीं जानते कि उनके खण्डन की ' मोदक खण्डिका ' हो जायगी ॥ १ ९ -२१ ॥ श्री. निरंजनदेव तीर्थ
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॥ श्रीहरिः ॥ प्रकाशकीय वक्तव्य अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज द्वारा विरचित यजुर्वेद संहिता के द्वितीय तृतीय अध्याय के भाष्य को सानुवाद प्रकाशित करने हुए हमें बहुत हर्ष हो रहा है । इससे पूर्व प्रथम और चालीसवें अध्याय ( ईशावास्योपनिषद् ) का भाष्य अनुवाद सहित प्रकाशित हो चुका है, यह आप लोगों को विदित ही है । प्रकाशन कार्य विस्तृत है । कई कठिनाइयों के कारण द्वितीय तृतीय अध्याय का प्रकाशन शीघ्र नहीं हो पाया -देर हो गयी । चतुर्थ और पञ्चम अध्याय छप रहे हैं । प्रगति समुचित है । यथाशीघ्र आप लोगों को ये दोनों भाग प्राप्त हो सकेंगे । विदित हो, पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज की अद्वितीय कृति देश के जिन सन्तों, विद्वानों, उच्च शिक्षाविदों और अधिकारियों के पास पहुँचती है, वे अत्यन्त प्रभावित होकर हम लोगों को शेष भाग शीघ्र प्रकाशित करने की सत्प्रेरणा प्रदान करते हैं । भाष्यभूमिका के लेखक, अनुवादक, समय - समय पर उचित परामर्शदाता, प्रूफ पुनरीक्षक, प्रेसकापी साधक, अनुच्छेद ( पैराग्राफ ) के निर्धारक के रूप में और प्रकाशन सम्बन्धी सभी साज - सज्जा को तैयार कर इस अमूल्य ग्रन्थरत्न को सबके सम्मुख प्रस्तुत करने वाले के रूप में जिन - जिन महानुभावों ने अपनी अहैतुकी कृपा से इस कार्य को सम्पन्न किया है, उन सभी परम सम्माननीय, आत्मीय, पूज्य आचार्य, विद्वन्मूर्धन्यों के चरणकमलों में धन्यवाद और अभिनन्दनस्वरूप नतमस्तक होकर हम सदा ही कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों में धन्यवाद प्रस्तुत करते हैं, वे हैं-( १ ) अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरीपीठाधीश्वर स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज ( २ ) स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ( ३ ) पण्डित श्री गजानन मुसलगांवकरजी ( ४ ) पण्डित श्री मार्कण्डेय ब्रह्मचारीजी ( ५ ) पण्डित श्री व्रजवल्लभ द्विवेदीजी ( ६ ) पण्डित श्री रमावंशी द्विवेदीजी तारा प्रेस के सुयोग्य विद्वान् प्रबन्धक तथा सहृदय कर्मचारियों के स्नेहपूर्ण सौजन्यभरे मुद्रणादि कार्यों के सम्पादन को स्मरण कर इन्हें बहुत धन्यवाद देते हैं । वृन्दावन धाम गोवर्धन प्रतिपदा २०४६ वि ० सं ० निवेदक हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष
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१. इम, वेदि और कुशा का प्रोक्षण विषय - सूची प्रतिपाद्य विषय द्वितीय अध्याय २. प्रोक्षणावशिष्ट जल का विनियोग तथा परिधि के बाहर गिरे हविर्द्रव्य की आहुति ३. मध्यम, दक्षिण और उत्तर परिधियों की स्थापना ४. आहवनीय में इध्म काष्ठ की स्थापना ५. प्रस्तर की स्थापना और उसका दोनों हाथों से स्पर्श ६. जुहू, उपभृत्, ध्रुवा और हविर्द्रव्य को यथास्थान रखना ७. अग्निदेव, अन्य देवों और पितरों को प्रणामांजलि एवं जुहू और उपभृत् पात्रों का ग्रहण ८. पात्रों की एवं अग्नि और पृथ्वी की प्रार्थना एवं आहुति दान ९. अग्निदेवता की प्रार्थना तथा जुहू और ध्रुवा पात्र का एकत्रीकरण १०. यजमान की समृद्धि की कामना तथा अग्नीध्र द्वारा पुरोडाश भक्षण ११. अग्नीध्र द्वारा बिना दाँत लगाये प्राशित्र का भक्षण १२. यज्ञ और यजमान की समृद्धि के लिये प्रार्थना १३. सविता देवता की प्रार्थना और उनके द्वारा प्रयाण की अनुज्ञा १४. अग्निदेव की प्रार्थना, संमार्जन और परिक्रमण १५. जुहू और उपभृत् का परस्पर विपरीत दिशा में व्यूहन १६. परिधि पर घृतलेपन, प्रस्तर ग्रहण, दर्भ का अग्नि में प्रक्षेप और आत्मस्पर्श १७. अग्निदेव की प्रार्थना के साथ तीनों परिधियों का अग्नि में प्रक्षेप १. विश्वेदेवों की प्रार्थना और उनके लिये संस्रव भाग की आहुति १ ९. जुहू और उपभृत् पात्र का शकट की धुरा पर स्थापन एवं वेदी का स्पर्श २०. गार्हपत्य अग्नि से संवेश रक्षा की प्रार्थना एवं दक्षिणाग्नि में हवन २१. कुशमुष्टिनिर्मित वेद की प्रार्थना और ध्रुवा पात्र से हवन २२. घृत से दर्भ का अंजन कर उसकी आहुति देना २३. प्रणीता पात्र की स्थापना तथा मृत्कणों का भूमि पर प्रक्षेप २४. आहवनीय अग्नि की प्रदक्षिणा, पूर्णपात्रग्रहण और मुखमार्जन २५. विष्णुपद द्वारा तीनों लोकों के अतिक्रमण की भावना एवं सूर्य आदि का अवलोकन २६. सूर्यदेव की प्रार्थना, अवलोकन एवं प्रदक्षिणा २७. गृहपालक अग्नि से गृहस्थी की गाड़ी को सकुशल चलाते रहने की प्रार्थना २८. व्रतपति अग्नि की प्रार्थना के साथ व्रत का विसर्जन
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afusaricar ( ८ ) प्रतिपाद्य विषय २ ९. कव्याग्नि में पितरों के लिये मेक्षण से अग्नि और सोम के निमित्त आहुति ३०. असुरों और राक्षसों के अपसारण के लिये उल्मुक प्रक्षेप ३१. पितृगणों की प्रार्थना के साथ श्वासनिरोधपूर्वक मन्त्रजप ३२. पितृगणों के निमित्त प्रदत्त पिण्डों पर ऊर्णातन्तु आदि का प्रदान ३३. यजमानपत्नी द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिये मध्यम पिण्ड का भक्षण ३४. पिण्ड के मूल प्रदेश में जलसिंचन तृतीय अध्याय १. अग्न्याधान के प्रसंग में घृतसिक्त तीन समिधाओं की आहुति २- ४. यजमान द्वारा ऋत्विजों को आहुति देने की अनुमति ५. भूः भुवः स्वः नामक तीन व्याहृतियों की प्रार्थना के साथ अग्निस्थापन ६. आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि का प्रार्थनापूर्वक आधान ७. प्राणापानरूपी वायु के रूप में अग्नि की स्तुति ८. अहोरात्र में व्यवहृत होने वाली वाणी के रूप में अग्नि की स्तुति [ भाष्य में अग्नि के विविध धाम और नाम ] ९ - १०. अग्निहोत्री के लिये सायंकालीन और प्रातः कालीन हवन मन्त्र ११- ४०. आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि का उपस्थान ( प्रार्थना ) ४१-४३. अग्न्याधान के बाद अग्निहोत्री की गृह सम्बन्धी प्रार्थना [ भाष्य में चातुर्मास्य के चार पर्वों तथा वेदियों पर विचार ] ४४. प्रघासी मन्त्र का यजमानपत्नी द्वारा उच्चारण ४५. पत्नीसहित यजमान द्वारा करम्भ पात्रों का दक्षिणाग्नि में हवन ४६. यजमान द्वारा ' मोषण ' मन्त्र का जप ४७. यजमानपत्नी द्वारा ' अक्रन् कर्म ' मन्त्र का जप ४८. पत्नीसहित यजमान का अवभृथ स्नान ४ ९. दर्वी द्वारा स्थाली में से ओदन का ग्रहण ५०. ' देहि मे ' मन्त्र द्वारा ओदन का हवन ५१-५२ पितृयज्ञसंज्ञक कर्म में आहवनीय अग्नि का उपस्थान ५३-५५. पितृयज्ञ में गार्हपत्य अग्नि का उपस्थान ५६–६२. साकमेघ पर्व के त्र्यम्बकवि सम्बन्धी मन्त्र और रुद्र की प्रार्थना [ भाष्य में कालमान का निरूपण ] ६३. क्षुर की प्रार्थना एवं यजमान का वपन