वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ३ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ३ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
पृष्ठ 1
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजात भाष्य समन्विता भाव्य प्रणेतारः अनन्त श्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः ४ - ६ अध्यायात्मको भागः प्रकाशकः श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता * वृन्दावनम्
पृष्ठ 2
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजात भाष्यसमन्विता ( ४-६ अध्यायात्मको भागः ) भाष्यप्रणेतारः अनन्तश्री विभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः सम्पादको भाष्यनिष्कर्षलेखकश्च प. व्रजवल्लभद्विवेदो दर्शनाचार्यः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागमविभागाध्यक्षचर आचार्यश्च भाष्यसार - निबन्धकः श्री श्रीकिशोरमिश्रो वेदाचार्य: काशी हिन्दू विश्वविद्यालये संस्कृतविभागे उपाचार्यः प्रकाशकः श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता वृन्दावन प्रथमसंस्करणम्
पृष्ठ 3
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रकाशक-श्रीराधाकृष्णधानुका- प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता वृन्दावन • मूल्यम् ९ ०.०० रूप्यकाणि अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकारा राजकीयनियमानुसारेण सुरक्षिताः पुस्तकप्राप्तिस्थानम्-१. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ११३ पार्क स्ट्रीट, पोद्दार पाइन्ट, कलकत्ता - ७०००१६ २. श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी. २५ / १८ नारद घाट वाराणसी ( उ.प्र. ) ३. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान धर्मसंघ विद्यालय, रमणरेती, वृन्दावन मथुरा ( उ. प्र. ) ४. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ४० १/४०४ राहेजा सेन्टर २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई - ४०००२१ ५. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ई. ४ / २४, ईस्ट पटेल नगर दिल्ली - ८ मुद्रक-अध्याय ४-५ - तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी । अध्याय ६ - आनन्द मुद्रणालय, जगतगंज, वाराणसी ।
पृष्ठ 4
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ श्रीहरिः ॥ प्रकाशकीय वक्तव्य अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज द्वारा विरचित यजुर्वेदसंहिता के ४-६ अध्यायों के भाष्य को मन्त्रार्थ और भाष्यसार के साथ प्रकाशित करते हुए हमें बहुत हर्ष का अनुभव हो रहा है । इससे पूर्व तीन अध्यायों का और चालीसवें अध्याय ( ईशावास्योपनिषद् ) का भाष्य अनुवाद सहित और ११-१५ अध्यायों का भाष्य भाष्यनिष्कर्ष के साथ प्रकाशित हो चुका है, यह आप लोगों विदित ही है । प्रकाशन कार्य विस्तृत है । कई कठिनाइयों के कारण प्रकाशन का कार्य त्वरित गति से नहीं हो पा रहा था । अब १६-२० अध्याय वाला भाग और २१-३९ अध्याय तक का भाग अलग - अलग प्रेसों में छप चुका है । जिल्दबन्दी का कार्य बस बचा है । इसी तरह से ७-१० अध्यायों का भाग भी प्रेस में दे दिया गया है । प्रगति समुचित है । यथाशीघ्र आप लोगों को ये सभी भाग प्राप्त हो सकेंगे । हम इस प्रयत्न है कि आगामी दो चार महीनों में पूरा भाष्य विज्ञ पाठकों के करकमलों तक पहुँचा दिया जाय । विदित हो, पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज की अद्वितीय कृति देश के जिन सन्तों, विद्वानों, उच्च शिक्षाविदों और अधिकारियों के पास पहुँचती है, वे अत्यन्त प्रभावित होकर हम लोगों शेष भाग शीघ्र प्रकाशित करने की सत्प्रेरणा प्रदान करते हैं । भाष्यभूमिका के लेखक, अनुवादक, समय - समय पर उचित परामर्शदाता, प्रूफ पुनरीक्षक, प्रेसकापी साधक, अनुच्छेद ( पैराग्राफ ) के निर्धारक के रूप में और प्रकाशन सम्बन्धी सभी साज - सज्जा को तैयार कर इस अमूल्य ग्रन्थरत्न को सबके सम्मुख प्रस्तुत करने वालों के रूप में जिन - जिन महानुभावों ने अपनी अहैतुकी कृपा से इस कार्य को सम्पन्न किया है, उन सभी परम सम्माननीय, आत्मीय, पूज्य आचार्य, विद्वन्मूर्धन्यों के चरणकमलों में धन्यवाद और अभिनन्दनस्वरूप नतमस्तक होकर हम सदा ही कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों में धन्यवाद प्रस्तुत करते हैं, वे है-( १ ) अन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज ( २ ) स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ( ३ ) पण्डित श्री मार्कण्डेय ब्रह्मचारी जी ( ४ ) पण्डित श्री व्रजवल्लभ द्विवेदीजी ( ५ ) पण्डित श्री जनार्दन पाण्डेयजी ( ६ ) पण्डित श्री जनार्दन चतुर्वेदी जी ( ७ ) पण्डित श्री राजवंशी द्विवेदी जी ( ८ ) पण्डित श्री श्रीकिशोर मिश्र जी • तारा प्रेस और आनन्द मुद्रणालय के सुयोग्य प्रबन्धक तथा सहृदय कर्मचारियों के सौजन्य भरे मुद्रणादि कार्यों के सम्पादन को स्मरण कर हम इन्हें बहुत धन्यवाद देते हैं । वृन्दावन धाम अक्षय तृतीया २०४ ९ वि. सं. निवेदक हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष
पृष्ठ 5
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
पृष्ठ 6
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
-कंण्डिकासंख्या ( भाष्य में सोमयाग का संक्षिप्त निरूपण ) विषय - सूची प्रतिपाद्य विषय चतुर्थ अध्याय १. देवयजन स्थान में यजमान का प्रवेश, कुशतरुण और क्षुर के अधिष्ठात्री देवताओं से यजमान को पीडा न पहुँचाने की प्रार्थना २. केशवपन के बाद यजमान का स्नान एवं नूतन वस्त्रधारण ३. यजमान के मस्तक पर नवनीत का लेपन तथा आँखों में अंजन ४. सात कुशाओं के बनाये पवित्र से अध्वर्यु द्वारा यजमान का शोधन ५. अर्ध्वयु- प्रेरित यजमान द्वारा इस मन्त्र का वाचन ६. मन्त्रोच्चार के साथ यजमान का मुट्ठी बांध कर स्वाहाकार करना और मौन होकर मुट्ठी को खोलना ७. यजमान द्वारा यज्ञारंभसूचक आहुतियों का प्रदान ८. ध्रुवा स्थित घृत का जुहू में ग्रहण कर औद्मभण होम करना ९. कृष्ण मृगचर्म के सन्धिस्थल का स्पर्श तथा उस पर आरोहण १०. यजमान द्वारा मेखला बन्धन और उष्णीष, दण्ड आदि का धारण --११: यजमान द्वारा वाग् विसर्जन कर ऋत्विजों को यज्ञारंभ के लिये कहना १२. यजमान द्वारा अपनी नाभि का स्पर्श १३. यजमान द्वारा मृग के श्रृंग से मिट्टी या तृण के खोद कर अपवित्र भूमि पर डालना १४. यजमान का आहवनीय अग्नि के दक्षिण में उत्तर या पूर्व की तरफ सिर करके अग्नि की अपेक्षा नीची भूमि पर शयन १५. जागने के बाद पुनः न सोने की स्थिति में यजमान द्वारा मन्त्रपाठ १६. यजमान के क्रोधाभिभूत होने या अश्लील आचरण करने पर प्रायश्चित्तस्वरूप मन्त्र का पाठ, यज्ञ के निमित्त लाये गये द्रव्यों का स्पर्श १७. ध्रुवा से जुहू में लिये गये घृत में सुवर्ण खण्ड का प्रक्षेप तथा उसकी आहवनीय अग्नि में आहुति १८. घृत से सुवर्ण खण्ड को निकाल कर तृणबद्ध सुवर्ण को वेदि पर रखना १ ९- २०. सोमक्रयणी गौ की वाणी के रूप में स्तुति २१. अध्वर्यु एवं प्रतिप्रस्थाता द्वारा सोमक्रयणी गौ का अनुगमन २२.सोमक्रयणी गौँ के सातवें पादप्रक्षेप पर हवन, रेखाकरण, पदधूलिग्रहण, यजमान और यजमान पत्नी को उसका प्रदान २३. सोमक्रयणी गौ को देखती हुई यजमानपत्नी का मन्त्रवाचन २४. यजमान का सोम की तरफ जाते हुए मन्त्रवाचन, सोमस्पर्श २५. कपड़े को दुहरा - तिहरा कर उसमें सोम को बाँधना २६. स्वर्ण तथा गौ, अजा आदि से सोमविक्रेता को प्रलोभित करना २७. बांये हाथ से सोमविक्रेता को आज्ञा देकर दाहिने हाथ से सोम का ग्रहण, यजमान की गोद में उसको रखना तथा रक्षा के लिये प्रार्थना २८. क्रीत सोम को लेकर मन्त्रोच्चार के साथ उठ कर यजमान का शकट की ओर प्रस्थान का उद्यम 1
पृष्ठ 7
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( च ) ३१. यजमान का सोम को वस्त्र में बाँध कर रखना उसके ग्रीवा की ओर के भाग को शकट पर लगाना ३३. शकट में बैलों को जोत कर उनको हांकना ३४. सोम को लेकर यज्ञशाला की तरफ जाते हुए यजमान का मन्त्रोच्चार पंचम अध्याय १. हविर्द्धव्य का निर्वाप ( ग्रहण ) ६. आहवनीय अग्नि में समिधा की आहुति कंकड़ आदि को दूर करना १८. दक्षिण शकट का प्रतिष्ठापन तथा स्थूणास्तम्भ का निखनन २०. हविर्धान मण्डप की मध्यम छदि का स्पर्श ८६-८८ ८८-११ ९ १ - ९ ३ ९ ३ - ९ ५ १५-१७ ९७-१०० १००-१०३ १०३-१०७ १०७-१०९. ११०-११५ ११५-११८ ११८-१२० १२०-१२३ १२३-१२९ १२ ९ -१३१ १३१-१३६ १३६-१३९ १४३-१४५ १४५-१४७ १४७-१४९ १४ ९ - १५१ १५१ - ९ ५४ १५४-१५५ १५५-१५७ १५७-१६० १६०-१६२ १६२-१६४ १६४-१६५ २ ९. गृहीत सोम को सिर पर रख कर उस पर हाथ धरे हुए यजमान का शकट की तरफ गमन ३०. शकट पर मृगचर्म बिछा कर यजमान द्वारा उस पर सोम का स्थापन और स्पर्श ३२. आसन के लिये बिछाये गये दो मृगचर्मों में से एक को शकट पर ध्वजा की भांति लगाना, मृगचर्म के एक होने पर ३५. प्रतिप्रस्थाता द्वारा यज्ञशाला के पूर्व भाग में कृष्ण अथवा लोहित सारंग का आलमन ३६. यज्ञशाला के समीप शकट को खड़ा कर बैलों को जुएं से अगल करना, मृगचर्म बिछाकर उस पर सोमवल्ली की गांठ को रखना ३७. अध्वर्यु आदि ऋत्विक गणों का यजमान को यज्ञशाला में ले जाना, यजमान द्वारा मन्त्रोच्चार २. वेद पर काष्ठखण्ड और दो कुशाओं की स्थापना, अधरारणि और उत्तराणि की स्थापना तथा अग्निमन्थन ३. अरणि - मन्थन से उत्पन्न अग्नि को आहवनीय अग्नि से संयोजित कर मझ और यज्ञपति के कल्याण की प्रार्थना ४. अध्वर्यु का आज्यस्थाली में घृत लेकर स्रुवे से इस संयोजित अग्नि में आहुति देना ५. तानून आज्य का स्रुवे से दो बार ग्रहण, वेदि के नैर्ऋत्य कोण पर आज्यपात्र का स्थापन, ऋत्विक और यजमान द्वारा पात्र का स्पर्श ७. पांचों ऋत्विजों और यजमान द्वारा जल से सोम का सिंचन एवं रक्षा के लिये हाथ उठा कर सोम की प्रार्थना ८. जुहू आदि में प्रस्तर को लगा कर परिधि - स्थापन पूर्वक खुबे से उपसद् अग्नि में आहुति देना ९. चारों दिशाओं में शम्या गाड़ कर सत्य से चौकोर रेखाएं खींचना और उन पर चात्वाल बनाना, देवताओं की प्रार्थना १३ ९ -१४३ १०. बेदि को शम्या से ठोक कर चारों ओर तथा मध्य भाग में समान करना, मन्त्रोच्चार के साथ प्रोक्षण कर वेदि के ११. वेदि की चारों दिशाओं का मन्त्रोच्चार के साथ जल से मार्जन, बचे हुए जल का बाहर प्रक्षेप १२. वेदि की दोनों श्रोणियों, दोनों आँखों तथा नाभि में कुछ सुवर्ण रख कर अध्वर्यु का जुहू में आज्य लेकर पाँच आहुतियां देना १३. परिधियों का परिधान तथा गुग्गुलु आदि का वेदि के नाभिदेश में निधान १४. हविर्धान मण्डप बना कर अध्वर्यु का शाला में प्रवेश, आज्य का संस्कार कर चार बार ग्रहण और परिस्तरण-समिदाधान पूर्वक अग्नि में आहुति १५. चतुर्गृहीत आज्य की दक्षिण शकट के दक्षिण चक्र के मार्ग में हिरण्यनिधान पूर्वक आहुति १६. आहवनीय अग्नि के ईशान कोण में रक्षित उत्तर हविर्धान ( शकट ) के दक्षिण चक्र मार्ग सुवर्ण रख कर यजमान का आहुति देना १७. यजमानपत्नी द्वारा आज्य से अक्षधुरा का अंजन और शकट के चलने के साथ यजमान द्वारा मन्त्र का वाचन १ ९. प्रतिप्रस्थाता द्वारा उत्तर शकट का प्रतिष्ठापन तथा स्थूणास्तम्भ का निखनन
पृष्ठ 8
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( छ ) २४. प्रस्तुत कण्डिका के चार मन्त्रों से उक्त गर्तों का यजमान द्वारा स्पर्श ३१. अध्वर्यु द्वारा धिष्ण्य नामक स्थण्डिलों का निर्माण ३६. आग्नीध्र के प्रति जाते हुए यजमान के लिये अध्वर्युकृत प्रार्थना ३ ९. कृष्णाजिन पर सोम की स्थापना, उपस्थान तथा निष्क्रमण षष्ठ अध्याय १६५-१६७ १६८-१७० १७०-१७३ १७३-१७५ १७५-१७७ १७८-१८१ १८१-१८३ १८३-१८६ १८६-१८७ १८७-१८९ १८ ९ -१ ९ १ १ ९२-१९ ४ १ ९४-१९ ६ १ ९६-१९ ७ १ ९७-१९९ २००-२०१ २०२-२०३ २०३ - २०४ २०५-२०७ २०७-२०१ २० ९ २१०-२१२ २१२-२१५ १-२ २-६ ६.८ ९ -१० १०-११ २१. हविर्धान मण्डप के पूर्व द्वार के स्तंभों के बीच गूंथी गई दर्भ की माला और तृणनिर्मित छदियों का स्पर्श, काठ की सुई से रज्जु के द्वारा द्वार - शाखाओं का बन्धन तथा सुनिर्मित हविर्धान मण्डप का स्पर्श २२. अभ्रि से दक्षिण हविर्धान शकट के नीचे की भूमि को नियमानुसार विभक्त कर उपरव नाम के चार गर्तों का खनन २३. उपरव से मिट्टी निकाल कर उसे बाहर फेंकना २५. इन गर्तों का जल से प्रोक्षण, शेष जल का प्रक्षेप, कुशाओं को बिछाना, अधिषवण फलक की स्थापना, मृत्तिका द्वारा दृढीकरण, चर्मास्तरण और उस पर सोम को कूटने के लिये पांच पाषाणों की स्थापना २६. गूलर की शाखा को गाड़ने के लिये अभि का उपादान, जलपात्र में यवप्रक्षेप, जल से प्रोक्षण, शेष जल का गर्त में प्रक्षेप तथा कुशाओं का आस्तरण २७. गूलर की डाल को गड्ढे में डाल कर, उसे जल और मिट्टी से भर कर मैत्रावरुण दण्ड से कूट कर दृढ करना २८. गूलर की शाखा का स्पर्श करते हुए मन्त्रवाचन, शाखा के मूल में घृत की आहुति, मण्डप बना कर उसका तृण व चटाई से छान २ ९. सदोमण्डप का आच्छादन कर हविर्धान मण्डप की विधि से ग्रन्थिस्पर्श आदि विधियों का अनुष्ठान ३०. मण्डप के चारों तरफ रस्सी बाँधना, सभा को संबोधित करना और हविर्धान मण्डप के वायव्य कोण के उत्तर भाग में अग्नीध्र नामक अग्नि का स्थान बना कर उसका स्पर्श ३२. आठ धिष्ण्यों के निर्माण के बाद उन पर अधिष्ठित अग्नियों का अवलोकन ३३. विभिन्न अग्न्यालयों को संबोधित करने के बाद सदोमण्डप के द्वारास्तंभों का स्पर्श तथा अभिमन्त्रण ३४. यजमान द्वारा ऋत्विजों का अभिमन्त्रण तथा अध्वर्यु द्वारा आठों धिष्ण्यों की प्रार्थना ३५. प्रज्वलित समिधा के ऊपर दधिमिश्रित घृत की आहुति तथा सोम से प्रार्थना ३७. आग्नीध्रीय धिष्ण्य में अग्निस्थापन के अनन्तर प्रचरणी स्रुक् से घृत की आहुति ३८. उत्तरवेदि के आहवनीय अग्नि के कुण्ड में वैसर्जन होम के निमित्त आहुति ४०. आहवनीय अग्नि में समिदाधान करने के बाद यजमान के द्वारा मुष्टिविसर्जन ४१. यूपनिर्माण के लिये वृक्षछेदन हेतु वन में जाते हुए यजमान द्वारा आहवनीय अग्नि में घृत की आहुति ४२. यजमान का हुतशेष घृत को लेकर बढई के साथ वन में जाना, यूपयोग्य वृक्ष का अभिमर्शन, हुतशेष घृत को वृक्ष पर लगाना, वहाँ कुशतरुण को रख कुठार चलाना ४३. छेदन से गिरने पर यूपवृक्ष का अभिमन्त्रण तथा शोधन, आज्यस्थाली से जुहू में घृत लेकर काटने के स्थान पर आहुति देन १. अभि हाथ में लेकर आहवनीय के पूर्व भाग में यूप गाड़ने के लिये स्थान का खोदना, उसमें जल भरना २. गर्त में शकलप्रक्षेप, प्रथम शकल की स्थापना, चषाल का रखना, यूप पर घृतलेपन तथा यूप तथा कुशाप्रक्षेप का उच्छ्रयण १३. यूप के पंचमांश को भूमि में गाड़ना, घृतलिप्त भाग का आहवनीय के समक्ष निधान, यूप मैत्ररुणदण्ड से मिट्टी को दबाना के गर्त को मिट्टी से भरना तथा ४. यूप के गर्त को समतल कर उसमें जलसेचन, यूप का स्पर्श करते समय अध्वर्यु- प्रेरित यजमान का मन्त्रवाचन ५. अध्वर्यु- प्रेरित यजमान द्वारा प्रस्तुत द्वितीय मन्त्र का भी वाचन
पृष्ठ 9
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( ज ) ६. यूप में लपेटने के लिये त्रिगुणित तीन व्याम परिमाण वाली कुशा की बनी रस्सी का ग्रहण ७. दर्भतृण से पशु का स्पर्श ८. कुशा की रस्सी से पशु के दाहिने पैर को बांधना ९. पशु का यूप में नियोजन तथा प्रोक्षणीजल से उसका प्रोक्षण १०. पशु को जल पिलाने के बाद उसका प्रोक्षण तथा लेपन आदि ११. पशु के ललाट का स्पर्श, यजमान द्वारा मन्त्रवाचन तथा आहुति १२. पशु को बाँधने वाली रस्सी का अग्नि में प्रक्षेप तथा पत्नी द्वारा मन्त्रवाचन १३. पशु के प्रोक्षण के लिये जल का संस्कार १४. यजमानपत्नी द्वारा पशु के मुख, नासिका आदि अंगों को जल से शुद्ध करना १५. यजमान द्वारा पशु के अंगों का प्रोक्षण १६. कुशा के मूल और अग्र भाग का छेदन कर उसका उत्कर में प्रक्षेप १७. सपत्नीक यजमान तथा ऋत्विकगण द्वारा अपने- अपने शरीर का जल से प्रोक्षण १८. हविर्द्रव्य का अभिघारण तथा हविर्ग्रहण १ ९. हविः प्रदान पूर्वक दिशाओं का व्याधारण २०. अवदानीय द्रव्य का स्पर्श २१. प्रतिप्रस्थाता द्वारा आहुति प्रदान, मुखस्पर्श तथा स्वरु होम का जलस्पर्श २२. जलाशय के किनारे अध्वर्यु द्वारा शूल को गाड़ कर छिपाना तथा यजमान एवं ऋत्विग्गण २३. वसतीवरी नामक जल का ग्रहण २४. वसतीवरी जल की विविध स्थानों में स्थापना २५. तृतीय सवन के लिये सोमलता को प्रस्तरखण्ड पर रखना २६. सोम का उपस्थान कर घृत की आहुति देना २७. प्रेषपूर्वक जल के पास जाकर जल में आज्याहुति देना उसको मिलाना २८. हुत आज्य का दूरीकरण, मैत्रावरुण चमस से जलग्रहण और वसतीवरी जल के साथ रराटी का स्पर्श २ ९.. अग्निष्टोम संस्था वाले यज्ञ में घृत की आहुति, उक्थ्यसंस्थ यज्ञ में प्रथम परिधि का स्पर्श, षोडशी में और अतिरात्र में छदि का स्पर्श ३०. अध्वर्यु का मौन धारण कर सोमाभिषव के लिये पाषाण का प्रहण तथा यजमान का मन्त्रवाचन ३१. निग्राभ्या नामक जल से अधिष्ठातृ देवताओं की प्रार्थना नाम पर रखना ३२. प्रस्तुत कण्डिका के पांच मन्त्रों से अध्वर्यु द्वारा उपांशुसवन पर पांच बार सोमलता को मुष्टि से ३३. रखे गये सोम का अध्वर्यु द्वारा स्पर्श ३४. अध्वर्यु द्वारा निप्राभ्या जल से सोम का उपसेचन ३५. सोम का रस निकालने के लिये सोमलता को कूटना ३६-३७. निग्राभ नामक प्रस्तुत दो कण्डिकाओं का अध्वर्यु- प्रेरित यजमान द्वारा पाठ
पृष्ठ 10
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः सोमयागनिरूपणम् अत्र कल्पद्वयम्— यदा सोमेन यियक्षति तदा वसन्तेऽग्नीनाधाय समनन्तरमेव सोमेनेष्ट्वा दर्शपूर्णमासादि-कमनुतिष्ठेदित्येकः पक्षः । आधानानन्तरं दर्शपूर्णमासादिकमिष्ट्वैव सोमेन यजेदित्यपरः । साम्प्रतं सोमलतानुपलम्भात् पूतिकालतायामेव सर्वे सोमसंस्काराः क्रियन्ते । यद्यप्येकदिनसाध्योऽयं यज्ञस्तथापि स्वाङ्गैः सहितः पञ्चभिर्दिनैरनुष्ठीयते । तत्र षोडशसंख्याका ऋत्विजो भवन्ति । अध्वर्युः प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा, उन्नेतेत्यध्वर्युगणः । ब्रह्म, ब्राह्मणाच्छंसी, आग्नीधः, पोतेति ब्रह्मगणः । होता, मैत्रावरुण, अच्छावाकः, ग्रावस्तुद् इति होतृगणः । उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्ता, सुब्रह्मण्य इत्यु-द्गातृगणः । यावत्यो गोरूपा दक्षिणा देयत्वेनोक्तास्ताः समशश्चतुर्धा विभज्य एकैकस्मै गणाय एकैकं भागं दद्यात् । तत्राप्येकैकभागस्य विषमशो विभज्य दानम्, यथा – अध्वयोरर्थं प्रतिप्रस्थातुस्तृतीयो नेष्टुश्चतुर्थो भाग उन्नेतुश्चतुर्थो भागः । अत एवैषामर्धिनस्तृतीयिनः पादिन इत्यपि संज्ञा । ‘ यज्ञं व्याख्यास्यामः स त्रिभिर्वेदैः ' ( आप श्रौ. २४.१.१.२ ) । वेदत्रयसाध्योऽयं यज्ञः । अग्निहोत्रं तु युजवेंदेनैव साध्यते । दर्शपूर्णमासाद्या इष्टयः कैश्चिदृग्वेदयजुर्वेदाभ्यां कैश्चिद्यजुवेंदेनैवानुष्ठीयन्ते । पशुयाग ऋग्वेदयजुर्वेदाभ्यां सर्वैरेव क्रियते । सोमयागात्प्रभृत्येव वेदत्रयसम्बन्धः । तत्र याजुषकर्मण्यध्वर्युगणः, हौत्रानुष्ठानाय होतृगणः, सामानुष्ठानाय उद्गातृगणः, गणत्रयेणानुष्ठीयमानकर्मावेक्षणाय ब्रह्मगण उपयुज्यते । तत्र सोमयागस्य येन साम्ना समाप्तिर्भवति तन्नाम्ना व्यवहारः । अग्निष्टोमसाम्ना यस्य समाप्तिस्तस्याग्निष्टोमेति संज्ञा । उक्थ्येन समाप्यमानत्वाद् उक्थ्यः । षोडशिसाम-स्तोत्रेण समाप्यमानत्वात् षोडशी । अतिरात्रसामस्तोत्रेण समाप्यमानत्वाद् अतिरात्रसंज्ञो यागो भवति । संख्याचतु-ष्टयविशिष्टस्य क्रतोर्ज्योतिष्टोमेति संज्ञा भवति । त्रिवृत्, पञ्चदशः, सप्तदशः, एकविंश इति चत्वारः स्तोमा ज्योतिः-पदेनाभिधीयन्ते । ज्योतींषि स्तोमा यस्य स ज्योतिष्टोमः । तत्राप्यग्निष्टोमादिवत् षोडशी न स्वतन्त्रः, किन्तु पृष्ठ्य-षडहचतुर्थेऽहनि प्रयुज्यते । एतासामेव चतसृणां संस्थानां क्वचिदावापोद्वापादिना अपरास्तिस्रः संस्था अत्यग्निष्टोमः, वाजपेयः, आप्तोर्यामश्च सम्पद्यन्ते । तत्र सोमयागः सर्वसोमयागप्रकृतिभूतः । स च वसन्ते प्रायशः शुक्लैकादश्यां प्रारभ्य पूर्णिमायां समाप्यते । आभ्युदयिकानन्तरमृत्विग्वरणम् । तत्र प्रवाकनामानमृत्विजं प्रथमं वृणुयात् । स वृतोऽध्वर्य्यादीनां गृहं गत्वा तान् भाष्यसार - चतुर्थ अध्याय से सोमयाग का निरूपण है । यद्यपि यह एक दिन साध्य यज्ञ है, तथापि समस्त अंगों के साथ पांच दिनों में अनुष्ठित होता है । इसमें सोलह ऋत्विक् होते हैं । ' यज्ञं व्याख्यास्यामः स त्रिभिर्वेदैः ' ( आप. श्रौ. २४.१.१.२ ) इस