वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता 5 भाष्य प्रणेतारः अनन्त श्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः ७- १० अध्यायात्मको भागः प्रकाशकः श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता * वृन्दावनम्
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्य समन्विता [ ७-१० अध्यायात्मको भागः ] भाष्यप्रणेतारः अनन्तश्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्र महाराजाः सम्पादको भाष्य निष्कर्षलेखश्च पं ० व्रजवल्लभद्विवेदी दर्शनाचार्यः राष्ट्रपतिपुरस्कृतो राष्ट्रियपण्डितः सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागम विभागाध्यक्षचर आचार्यश्च भाष्यसारनिबन्धकः -श्री श्रीकिशोर मिश्री वेदाचार्यः काशी हिन्दू विश्वविद्यालये संस्कृतविभागे उपाचार्यः प्रकाशकः श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावन प्रथमसंस्करणम्
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प्रकाशक: ---श्री राधाकृष्ण धानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावन मूल्य: १३०.०० रूप्यकाणि एक सौ तीस रुपया अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकारा राजकीय नियमानुसारेण सुरक्षिताः पुस्तकप्राप्तिस्थानम् -१. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ११३ पार्क स्ट्रीट, पोद्दार पोइन्ट, कलकत्ता - ७०००१६ २. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५/१८ नारद घाट वाराणसी ( उ ० प्र ० ) ३. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान धर्मसंघ विद्यालय रमणरेती, वृन्दावन मथुरा ( उ ० प्र ० ) ४. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ४०१/४०४ राहेजा सेन्टर ५. २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ई ० ४ / २४, ईस्ट पटेल नगर दिल्ली - 211008 मुद्रक -केशव मुद्रणालय खजुरी, वाराणसी
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परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
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॥ श्री हरिः ॥ प्रकाशकीय वक्तव्य अनन्तश्री विभूषित पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज द्वारा विरचित यजुर्वेदसंहिता के ७-१० अध्यायों के भाष्य को मन्त्रार्थं, मन्त्रसार और भाष्य निष्कर्ष के साथ प्रकाशित करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है । इससे पूर्वं सबसे पहले पहिले और चालीसवें अध्याय ( ईशावास्योपनिषद् ) को भाषानुवाद के साथ हमने प्रकाशित कराया है, यह आप लोगों को विदित ही है । प्रकाशन कार्य विस्तृत है । कई कठिनाइयों के कारण प्रकाशन का कार्य त्वरित गति से नहीं हो पा रहा था । भगवत्कृपा से अब द्वितीय तृतीय और चतुर्थ षष्ठ अध्याय वाले भाग भाष्यसार के साथ तथा ११ - १५ अध्याय १६–२० अध्याय और २१ - ३० एवं ३१ - ३ ९ अध्याय वाले भाग भी भाष्यनिष्कर्ष के साथ प्रकाशित हो चुके हैं । इस प्रकार आठ जिल्दों में प्रकाशित हुए इस पूरे भाष्य को विज्ञ पाठकों के शुभ करकमलों में समर्पित कर रहे हैं । सौभाग्य से पूर्व पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थजी महाराज ने भाष्य के इस भाग पर सिंहावलोकन लिख कर प्रस्तुत भाष्य के गरिमामय अंशों की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है । विदित हो, पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज की अद्वितीय कृति देश के जिन सन्तों, विद्वानों उच्च शिक्षाविदों और अधिकारियों के पास पहुँचती है, वे अत्यन्त प्रभावित होकर हम लोगों को शेष भाग शीघ्र प्रकाशित करने की सत्प्रेरणा सदा देते रहे हैं, आज हम इस पुण्यपावन कार्य को पूरा कर अपने आपको कृतकृत्य समझ रहे हैं । यह सब अनन्तश्री परमश्रद्धास्पद स्वामी जी महाराज के शुभाशीर्वादों का फल है । भाष्यभूमिका के लेखक, अनुवादक, समय - समय पर उचित परामर्शदाता, प्रूफ पुनरीक्षक, प्रेसकापी साधक, अनुच्छेद ( पैराग्राफ ) के निर्धारक के रूप में और प्रकाशन सम्बन्धी सभी साज - सज्जा को तैयार कर इस अमूल्य ग्रन्थरत्न को सबके सम्मुख प्रस्तुत करने वालों के रूप में जिन - जिन महानुभावों ने अपनी अहेतुकी कृपा से इस कार्य को सम्पन्न किया है, उन सभी परम सम्माननीय, अत्मीय, पूज्य आचार्य, विद्वन्मूर्धन्यों के चरणकमलों में धन्यवाद और अभिनन्दनस्वरूप नतमस्तक होकर हम सदा ही कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों में धन्यवाद प्रस्तुत करते हैं, वे हैं - -( १ ) अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य पूर्व पुरीपीठाधीश्वर स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज ( २ ) स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज वर्तमान जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरी पीठाधीश्वर ( ३ ) पण्डित श्री मार्कण्डेय ब्रह्मचारीजी ( ४ ) पण्डित श्री व्रजवल्लभ द्विवेदीजी ( ५ ) पण्डित श्री जनार्दन चतुर्वेदीजी ( ६ ) पण्डित श्री राजवंशीजी ( ७ ) पण्डित श्री श्रीकिशोर मिश्रजी केशव मुद्रणालय के सुयोग्य प्रबन्धक श्री मोहनलाल जी के तथा सहृदयकर्मचारियों के स्नेहपूर्ण सौजन्यभरे मुद्रणादि कार्यों के सम्पादन को स्मरण कर इन्हें बहुत धन्यवाद देते हैं । वृन्दावन धाम शिवरात्रि २०४ ९ वि ० सं ० निवेदक हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष
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सिंहावलोकन अनन्त श्रीविभूषित - जगद्गुरुशङ्कराचार्य - पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठपुरी - पूर्वपीठाधीश्वर स्वामी श्री निरञ्जन देवजी तीर्थ महाराज अनन्तश्री परमश्रद्धास्पद स्वामी करपात्रीजी महाराज ने संस्कृत और हिन्दी में अनेक ग्रन्थ - रत्नों की रचना की है । उनमें अतिविस्तृत भूमिका के साथ अब सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा की संहिता के वेदार्थं पारिजात नामक भाष्य का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है । इसका भूमिका भाग दो जिल्दों ( लगभग २३०० पृष्ठों ) में हिन्दी भाषान्तर के साथ संवत् २०३६ और २०३७ में वाराणसी से मुद्रित हो प्रकाशित हुआ था । बाद में पहला और ४० वाँ अध्याय भी भाषान्तर के साथ संवत् २०४३ में वृन्दावन से मुद्रित और प्रकाशित हुआ । पुनः इस कार्य को मुद्रण की सुविधा की दृष्टि से वाराणसी ले आया गया और सर्वप्रथम द्वितीय तृतीय अध्याय वाला भाग हिन्दी भाष्यसार के साथ प्रकाशित हुआ । भाष्य के इन तीनों खण्डों पर हमारी संक्षिप्त भूमिका प्रकाशित हो चुकी है । इस महनीय और विशाल ग्रन्थ के प्रकाशन के लिये कटिबद्ध दानवीर सेठ श्रीमान् हनुमानप्रसाद जी धानुका का विचार इस पूरे भाष्य को भाषान्तर अथवा भाष्यसार के साथ प्रकाशित कराने का था, किन्तु ऐसा प्रतीत हुआ कि इस तरह से तो इस विशाल ग्रन्थ के प्रकाशन में अत्यधिक विलम्ब हो जायगा । भाष्य-सार लिखवाने का उपक्रम भी किया गया, किन्तु वह १० अध्याय से आगे न बढ़ सका । अन्ततः भगवान् काल की गति का स्मरण करते हुए, कालघुण से ग्रन्थ को बचाने के लिये, आगे के ११ से ३ ९ अध्याय तक के भाष्य को हिन्दी पाठकों को भी भाष्य का किंचित् रसास्वादन कराने के लिये, भाष्य निष्कर्ष के साथ निकालने का निर्णय लिया गया । इसको भी काल की महिमा ही कहा जायगा कि भाष्यनिष्कर्ष के साथ ये अध्याय ( ११ - ३ ९ ) पहले मुद्रित हो गये और ४ से १० अध्याय तक का भाष्य भाष्यसार के साथ सबके अन्त में - प्रकाशित हो रहा है । ७ से १० अध्याय तक के इस अन्तिम खण्ड में संक्षेप में हम पूरे भाष्य का सामान्य • परिचय देते हुए इसके महत्वपूर्ण अंशों पर प्रकाश डालना चाहते हैं । आजकल शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता को वाजसनेय संहिता का नाम दे दिया जाता है, किन्तु यह नाम अतिव्याप्त है । यहीं प्रथम अध्याय के भाष्य ( पृ ० ४ - ५ ) में वाजसनेय याज्ञवल्क्य के द्वारा अपने शिष्यों को उपदिष्ट १५ संहिताओं की नामावली मिलती है । इनमें से " महर्षि मध्यन्दिन को उपदिष्ट शाखा उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध होकर माध्यन्दिन कहलाती है । कण्व आदि की संहिताएँ इससे भिन्न हैं । इस प्रकार भगवान् वाजसनेय याज्ञवल्क्य द्वारा उपदिष्ट सारी संहिताएँ वाजसनेय कहलाती हैं, किन्तु माध्यन्दिन संहिता तो इस नाम के महर्षि के द्वारा अधिगत संहिता ही मानी जायगी । वेदार्थपारिजातभाष्य इसी संहिता पर किया गया है । उव्वट और महीधर का भाष्य भी इसी संहिता पर है, जब कि सायण का भाष्य काण्व संहिता पर किया गया है । भाष्यरचना की सामान्य पद्धति पर भाष्यनिष्कर्ष के लेखक ने ११-१५ अध्याय के प्रारम्भ में पर्याप्त प्रकाश डाल दिया है । पूरी संहिता के प्रतिपाद्य विषयों की सूचना भाष्यकार ने स्वयं प्रारम्भ में दे दी है ( पृ ० १२-१३ ) । दर्शपूर्णमास आदि सभी प्रकृति और विकृति यागों के अनुष्ठान का मुख्य आधार यजुर्वेद को ही माना जाता है । इसी लिये स्वामी जी ने भाष्यरचना के लिये सर्वप्रथम इसी संहिता को चुना भू०-२
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( ) और इन सब यागों का विस्तृत और प्रामाणिक स्वरूप दिखाने के लिये कात्यायन श्रौतसूत्र और शतपथ ब्राह्मण के सभी सम्बद्ध प्रकरणों को उद्धृत कर उनकी भी स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की । अभी ऊपर उब्व्वट, महीधर और सायण के भाष्यों की चर्चा की गई है, किन्तु उनमें इतने विस्तार से ये सब विषय निर्दिष्ट नहीं हो पाये हैं । प्रस्तुत भाष्य में उक्त तीनों भाष्यों के पर्यवेक्षण के साथ यथास्थान तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, ताण्ड्य महाब्राह्मण, आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, सत्याषाढ श्रौतसूत्र, निरुक्त- निघण्टु एवं उनके भाष्यों और हरिस्वामी, स्कन्दस्वामी, दुर्गाचार्य, भट्ट भास्कर आदि प्राचीन भाष्यकारों को अपने मत के समर्थन में उद्धृत किया है । आवश्यकता के अनुसार इनकी समालोचना करने में भी हमारे भाष्यकार ने कोई संकोच नहीं किया है, जो कि भारतीय भाष्यकारों की परम्परा के अनुकूल ही है । वेदार्थपारिजातभाष्य केवल मन्त्रों की व्याख्या ही नहीं है, किन्तु एक विस्तृत प्रयोग - पद्धति भी है, जिसमें कि विस्तार से संहिता में प्रतिपादित सभी प्रकार के अनुष्ठानों का क्रम भी निर्दिष्ट है । भाष्य निष्कर्ष में इन सब विषयों पर यथास्थान प्रकाश डाल दिया गया है । वैदिक मन्त्रों के विनियोग के लिये ऋषि, देवता और छन्द का ज्ञान आवश्यक है । यहाँ कात्यायन की सर्वानुक्रमणी के आधार पर प्रत्येक मन्त्र के ऋषि, देवता, छन्द और विनियोग का भी उल्लेख किया गया है और उसके लिये आवश्यकता के अनुसार षड्गुरुशिष्य आदि के व्याख्यानों का भी सहारा लिया गया है । छन्दों के लक्षणों के प्रसंग में पिंगलाचार्य के छन्दः शास्त्र के अतिरिक्त प्रातिशाख्य ग्रन्थों में निर्दिष्ट लक्षणों को भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है । महीधर द्वारा प्रदत्त लक्षणों की कहीं - कहीं स्वामी दयानन्द ने आलोचना की है । प्रस्तुत भाष्य में ऐसे सभी स्थलों पर शास्त्रीय प्रमाणों की झड़ी लगा कर प्रौढ युक्तियों के सहा महीधर के पक्ष को प्रबल समर्थन दिया गया है । प्रत्येक मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ देना, इस भाष्य की अपनी विशेषता है । इस आध्यात्मिक अर्थ में मन्त्रगत पदों की संगति के अनुसार साकार अथवा निराकार रूप में उपास्य देवता को संबोधित कर मन्त्र की संगति बैठाई गई है, जिससे कि मन्त्र के पदों के साथ पूरा सामंजस्य बैठाया जा सके । अन्य कुछ आधुनिक आचार्यों ने भी इस तरह के प्रयत्न किये हैं, किन्तु वे इस कार्य में सफल नहीं हो पाये हैं, यह-बात इस भाष्य के तृतीय अध्याय में उद्धृत मत - मतान्तरों से स्पष्ट हो जाती है । इन सबकी एक बड़ी • कमी यह भी है कि ये सारे प्रयत्न पूरी संहिता पर न होकर उसके कुछ अंशों तक ही सीमित रह गये हैं । आध्यात्मिक अर्थ के प्रसंग में उपनिषदों, भगवद्गीता, बादरायण ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भागवत की प्रस्थान चतुष्टयी के अतिरिक्त श्रौत स्मार्त और आगम साहित्य के महनीय ग्रन्थों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है । शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वल्लभ को यहाँ ( १७।४४ ) आदर के साथ याद किया गया है और इस सम्प्रदाय में प्रचलित छप्पन भोग की भी चर्चा भाष्यकार ने की है ( ११।७५ ) । आचार्य नरहरि के अनेक वचन यहाँ उद्धृत हैं । इनकी रामणीयकता अतीव मनोहारिणी है । उनके इस श्लोक को देखा जाय --द्वैतं मोहाय बोधात् प्राग् जाते बोधे मनीषया । • भक्त्यर्थं भावितं द्वैतमद्वैतादतिसुन्दरम् ॥ इसका अभिप्राय यह है कि द्वैत दृष्टि तभी तक मोह को पैदा करती है, जब तक कि मनुष्य को अद्वैत ब्रह्म का बोध नहीं होता । एक बार अद्वैत का बोध हो जाने पर तो द्वैत दृष्टि के भी भक्ति में पर्यवसित हो
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( ७ ) जाने के कारण वह अद्वैत दृष्टि से भी बढ़ कर फलदायिनी हो उठती है । इस प्रकार यहाँ भक्तियोग शिव- की सविशेष महिमा वर्णित है । इस भक्तियोग के महत्त्व को काश्मीर के आचार्य उत्पलदेव ने अपनी स्तोत्रावली में अनोखी भंगिमा से इस प्रकार दर्शाया है-निजनिजेषु पदेषु पतन्त्विमाः करणवृत्तय उल्लसिता मम । क्षणमपीश मनागपि मैव भूत् त्वदविभेदरसक्षतिसाहसम् ॥ अर्थात् हे भगवन्! ये मेरी उल्लास और आनन्द से भरी हुई इन्द्रियों की सारी वृत्तियाँ अपने - अपने लिये विषयों में भले ही लगी रहें, किन्तु मुझे आपके अद्वयानन्द रस से वंचित होने का साहस क्षण भर के भी और जरा सा भी न हो । इसका अभिप्राय यह है कि भक्त द्वैत दशा में भी भगवान् से कभी अलग होना नहीं चाहता, वह उनके वियोग को कभी सहन नहीं कर सकता । इस भाष्य की दूसरी बड़ी विशेषता स्वामी दयानन्द के प्रत्येक मन्त्र के भाष्य को उद्धृत कर स्वामी उसका तिलशः खण्डन करना है । विदेशी एकेश्वरवाद और उनकी सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित दयानन्द ने बहुदेववाद को अस्वीकार करते हुए और लोकायत ( चार्वाक ) दृष्टि का अनुसरण दिया है करते । श्रौत हुए -इन्द्र, वरुण आदि देवताओं की, पितृगणों की तथा स्वर्ग आदि की सत्ता को ही नकार सकती है । सूत्रों को वे प्रमाण नहीं मानते, तब स्मृति, पुराण और आगम वाङ्मय की कथा ही कैसे की अंशों जा की विचित्र शतपथ ब्राह्मण, मनुस्मृति आदि को प्रमाण मानते हुए भी वे या तो अपने मत के विरोधी की एक व्याख्या करते हैं अथवा उन्हें प्रक्षिप्त मान लेते हैं । इस प्रकार वे भारतीय साहित्य और संस्कृति लम्बी परम्परा को आँखों से ओझल कर डालना चाहते हैं । इसीलिये इनके भाष्य में अनेक प्रकार की विसंगतियाँ आ गई हैं । ऊपर से तुर्रा यह है कि वे वायुयान की निर्माणविधि से लेकर दुनिया के सारे ज्ञान - विज्ञान को वेदों से निकालने का हास्यास्पद प्रयत्न करने में किसी प्रकार के संकोच का अनुभव नहीं करते । इस प्रकार स्वामी दयानन्द ने विकल्प के सहारे एक लम्बी भारतीय परम्परा के प्रति उपेक्षा भाव है G को जगा कर भारतीय समाज में नास्तिकता के ही नहीं, विभेद के बीच भी बोये हैं । हमें बताया गया " कि पंजाब में दो सम्प्रदायों में अलगाव को बढाने के लिये सर्वप्रथम सत्यार्थप्रकाश के उस अंश की लाखों प्रतियाँ वितरित की गई, जिसमें सिख सम्प्रदाय की अनावश्यक आलोचना की गई थी । स्वामी करपात्री जी महाराज ने भाष्य में दयानन्दीय भाष्य की अनेक त्रुटियों का उल्लेख किया हैं | बिना प्रयोजन के मुख्यार्थं का ' बाध, मुख्यार्थं से सम्बन्ध और रूढि अथवा प्रयोजन के न होते हुए है भी । गार्थ का आश्रयण घोर अन्याय और समस्त दार्शनिक एवं साहित्यिक आचार्यों की परम्परा के विरुद्ध मुख्यार्थं का बाध होने पर ही लक्षणा वृत्ति का सहारा लिया जा सकता है, इस विषय पर भाष्यकार ने आगे ( १५ ४२ ) सप्रमाण विचार प्रस्तुत किया है । वहाँ बताया गया है कि शाब्दनय में मुख्यार्थ और गौणार्थ का विचार अतीव महत्त्वपूर्ण माना जाता है । उत्तरमीमांसा ( ब्रह्मसूत्र ) के आनन्दमयाधिकरण के पूर्व पक्ष और सिद्धान्त पक्ष को दिखाते हुए वहाँ स्पष्ट रूप से बताया गया है कि यहाँ किस प्रकार मुख्यार्थ का बाध होने पर ही गौणार्थ का ग्रहण किया गया है । मुख्यार्थ को छोड़कर गौणार्थ का ग्रहण किन - किन परिस्थितियों
१. मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् ।
अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपितक्रिया ॥
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( " ) में किया जाता है, इस विषय का विशद विवेचन भाष्यकार ने आगे भी ३१-३९ अध्याय वाले भाग में अनेक स्थलों पर ( पृ ० १३४, १८७-१८८, १ ९१-१९ २, १ ९ ३ ) किया है । इस प्रकार हम कह सकते हैं दयानन्दीय अर्थ का खण्डन करते समय भाष्यकार ने स्थान - स्थान पर मुख्यार्थ और गौणार्थ की समस्या पर बड़ा गम्भीर दार्शनिक विचार प्रस्तुत किया है । विभक्ति - वचन आदि का व्यत्यय, निष्प्रयोजन अध्याहार जैसे दोष यहाँ प्रायः दिखाई पड़ते हैं । वेद का लोकायतीकरण, लोक का प्रतारण, आत्मप्रवंचना, ' दशहस्ता हरीतकी ' जैसे आभाणकों को चरितार्थ करने वाले बढ - चढ कर कहे गये वायुयान निर्माण आदि के प्रतिपादक व्याख्यान, अपनी पूरी परम्परा को छोड़ कर देवलोक, पितृलोक, देवगण, पितृगण आदि की अस्वीकृति इनकी प्रमुख विसंगतियाँ हैं । परम्परा से च्युत होने के कारण ही साम, स्तोम, न्यूंख, निधन, प्रगाथ जैसे वैदिक पदों का अर्थ इनकी समझ में नहीं आया है और बिना प्रमाण के ऐसे पदों का इन्होंने मनमाना अर्थ किया है । त्वष्टा, सविता, अर्यमा, भग आदि शब्द वैदिक देवताओं के बोधक हैं । एकेश्वरवाद के व्यामोह ने इनको इन सब शब्दों का अर्थ मनुष्य-परक करने के लिये बाध्य कर दिया है । देवतापरक मित्र शब्द का पुल्लिंग में और सुहृत् के वाचक मित्र शब्द का नपुंसक लिंग में प्रयोग किया जाता है । इस परम्परा को तिलांजलि देकर इन्होंने पुल्लिंग में प्रयुक्त मित्र शब्द को भी सुहृत् अर्थ में प्रयुक्त माना है । अग्नि, वायु, सूर्य, वरुण, रुद्र, विष्णु आदि प्रसिद्ध देवताओं के बोधक पदों का भी इन्होंने सेनापति, सभाध्यक्ष आदि के रूप में मनुष्यपरक अर्थ किया है । ऐसे सब प्रसंगों में वे " एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” ( १२१६४ । ४६ ) इस प्रसिद्ध ऋग्वेदीय मन्त्र को भी भुला बैठे हैं । व्याकरण, काव्य, कोश, आप्तवाक्य आदि के द्वारा निश्चित अर्थ में ही शब्दों का प्रयोग किया जाता है । इस विषय की स्वामी दयानन्द ने पूरी तरह से उपेक्षा कर दी है । अनेक स्थानों पर तो इन्होंने मन्त्र के पदों को ही बदल दिया है । नवें अध्याय के ३४ वें मन्त्र की व्याख्या में ये सप्तदश स्तोम के विवरण में चार वर्ण, चार आश्रम, श्रवण आदि कर्म, चार पुरुषार्थ और मोक्ष की गणना करते हैं । चार पुरुषार्थों में ये अलब्ध की लिप्सा, लब्ध की रक्षा, रक्षित की वृद्धिऔर रक्षित द्रव्य का सत्कर्म में व्यय - - इनकी गणना करते हैं । शास्त्रों में योगक्षेम के अन्तर्गत इनका अन्तर्भाव कर लिया गया है । चार पुरुषार्थ के रूप में तो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की ही सर्वत्र गणना की जाती है । स्वामी दयानन्द ने बिना प्रसंग के अलंकारों की चर्चा की है । छन्दः शास्त्र, निरुक्त, व्याकरण और वैदिक स्वरप्रक्रिया के प्रसंग में अपने को अति विशेषज्ञ मानते हुए इन्होंने और इनके अनुयायियों ने सायण, महीधर आदि के भाष्यों के अनेक स्थलों पर व्यर्थ के आक्षेप किये हैं । वेदार्थपारिजातकार ने इनकी सारी युक्तियों का खण्डन करते हुए सायण और महीधर की प्रक्रिया का जिस प्रकार समर्थन किया है, उससे उनको इन सब विषयों का कितना ज्ञान है, इसकी कलई खुल जाती है । पूरे भाष्य में इस तरह के अनेक प्रसंग देखे जा सकते हैं । यहाँ स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मन्त्रगत पदों से कोई समझदार व्यक्ति भी वायुयान का निर्माण नहीं कर सकता और न बिजली ही पैदा कर सकता है । भाष्य के पहले अध्याय ( पहली जिल्द ) में दर्शपूर्णमास की पूरी पद्धति को समझाने के अतिरिक्त अन्य भी अनेक महत्त्वपूर्ण विषय प्रतिपादित हैं । इनको प्रबुद्ध पाठक विस्तृत भाषानुवाद की सहायता से जान सकते हैं ।
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९ ) द्वितीय तृतीय अध्याय वाले भाग ( जिल्द ) में ( पृ ० १ ९ ३३ - १३४ बताये ) विधानपारिजात गये हैं । यहाँ ये के पर्यायवाची प्रमाण से अग्नि के पावक, मारुत ( मरुत्त ), चमस, शोभन, अनल आदि २७ नाम विहित हैं । जैसे कि लौकिक शब्द नहीं हैं, किन्तु विभिन्न कर्मों के सम्पादक होने से इसके ये नाम शास्त्रों में मारुत ( मरुत्त ) कार्यों का सम्पादन पावक नाम के अग्नि में करना चाहिये । गर्भाधान संस्कार के लिये आवाहन अग्नि का आवाहन करना चाहिये । पुंसवन के लिये चमस तथा शुभ कर्म में शोभन है कि अग्नि जिस का कर्म के लिये किया जाता है । यहाँ इस तरह से सत्ताईस अग्नियों ने नाम बता कर कहा गया आदित्य जिस अग्नि का विधान है, उसी का आवाहन कर अग्नि में आहुति देनी चाहिये । इसके बाद यहाँ गुरुदेव पद्धति आदि नवग्रहों की अग्नियों के भी नाम गिनाये गये हैं । त्रिवेन्द्रं संस्कृत सिरीज से ईशान शिव ४ भागों में प्रकाशित हुई है । अग्नि के बत्तीस नाम कुछ पाठभेदों के साथ वहाँ ( १1१४/६ ग्रन्थ प्रपंचसार - १४ ) उपलब्ध से भी हैं । इस ग्रन्थ की रचना में भगवान् आद्य शंकराचार्य के स्मार्त धर्म के प्रतिष्ठापक सहायता ली गई है । यह एक प्राचीन ग्रन्थ है । , इसी भाग ( पृ ० २०४ - २०६ ) में वैश्वदेवाख्य चातुर्मास्य के चार मासों में सम्पन्न भी विस्तार होने से वाले वर्णित वैश्वदेव है । वरुणप्रघास, साकमेध और शुनासीरीय नामक चार पर्वों के अनुष्ठान की विधि गणनापद्धति पर प्रकाश अन्त में ( पृ ० २४०-२४२ ) मनुस्मृति आदि ग्रन्थों के आधार पर कालविभाग की आधार पर १७।२ के डाला गया है । महाभारत के प्रमाण से १४ । २३ में तथा वाल्मीकि रामायण के भाष्य में भी यह विषय संक्षेप में चर्चित है । ४-६ अध्याय वाले भाष्य के तीसरे भाग ( जिल्द ) में सर्वप्रथम सोम याग की पद्धति पर में प्रकाश सोलह डाला गया है ( पृ ० १-३ ) । वैदिक अनुष्ठान में, विशेष कर सोम याग और उसके विकृति बताया यागों गया है कि प्रकार के ऋत्विजों की आवश्यकता पड़ती है । इन सबका परिचय देने के बाद यहाँ होती है । किसको कितनी दक्षिणा दी जाय । तदनुसार ही इनकी संज्ञा अधिनः, तृतीयिनः और पादिन: में ( पृ ० १ ) । सोम याग के अनुष्ठान के लिये सर्वप्रथम सोमलता को खरीदना पड़ता गाय है । से गाय हमें के प्रतिधुक् रूप उसका मूल्य चुकाया जाता है । गाय के महत्त्व को दिखाते हुए यहाँ कहा गया है कि ( पृ ० ७ ९ ) । शृत, शर, दधि, मस्तु, आतंचन, नवनीत, घृत, आमिक्षा और वाजिन अर्थ की स्पष्ट प्राप्ति किया होती है है । ' सब दूध की ही विभिन्न अवस्थाएँ हैं । भाष्यकार ने इन सब शब्दों का पांचवें अध्याय में ज्योतिष्टोम की पद्धति को बताते हुए सोम राजा के अग्नि, सोम, अतिथि अग्नि , श्येन में और रायस्पोषद अग्नि नाम के पाँच अनुचरों का वर्णन किया गया है । अग्नि और रायस्पोषद लिये अरणि का क्या अन्तर है? इसको भी भाष्यकार ने स्पष्ट किया है ( पृ ० १११ ) । वैदिक यज्ञ के यहाँ पृ ० ११५ मन्थन कर अग्नि प्राप्त की जाती है । अग्निमन्थन के समय अनुष्ठेय षट्कर्मों का निरूपण पर किया गया है । ७- १० अध्याय वाले भाष्य के चौथे भाग ( जिल्द ) में धाराग्रह और अधाराग्रह का उल्लेख जाता कर है । बताया गया है कि ग्रह उस दारुमय पात्र को कहते हैं, जिसमें कि सोम रस का ग्रहण किया पुरुष की १६ ( पृ ० १-२ ) । षोडशी ग्रह की व्याख्या करते समय प्रश्नोपनिषत् के प्रमाण पर षोडशकल रस की विभिन्न कलाओं को गिनाया गया है ( पृ ० १८४ ) | आठवें अध्याय के ५४-५९ मन्त्रों में सोम । घर्मभेदजन्य ३४ अवस्थाओं के अनुसार उसके ३४ नाम देकर उनके लिये आहुतियों का विधान है प्रायश्चित्ताहुतियों का विधान आगे ३ ९ वें अध्याय में भी है ।