वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20

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( १० ) नवें अध्याय की ३४ वीं कण्डिका तक वाजपेय याग का विधान है । अन्न की समृद्धि के लिये इसका अनुष्ठान किया जाता है । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र और व्याकरण महाभाष्य को उद्धृत कर यहाँ ( पृ ० २६५ ) भाष्यकार ने सत्रह प्रकार के अन्नों के नाम गिनाये हैं । इस अध्याय की ३५ वीं कण्डिका से राजसूय का प्रकरण प्रारम्भ होता है । प्रारम्भ में भाष्यकार ने आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, मीमांसा सूत्र, पाणिनि स्मृति ( अष्टाध्यायी ), भामती, कल्पतरु आदि ग्रन्थों के आधार पर ' राजन् ' शब्द के अर्थ पर विस्तार से शास्त्रीय पद्धति से प्रकाश डाला है ( पृ ० २८ ९ -२८४ ) । यह प्रकरण और आगे के भी कुछ प्रकरण विद्वानों के लिये एक मननीय ज्ञानवर्धक सामग्री प्रस्तुत करते हैं । राजसूय याग की सारी प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए और इष्टि, पशु, सोम, दर्वीहोम आदि पदों का अर्थं स्पष्ट करते हुए यहाँ पंचवातीय होम और प्रतिसर, अर्थात् शत्रुओं के द्वारा प्रयुक्त आभिचारिक क्रियाओं से अपनी रक्षा के लिये अपामार्ग होम का विधान है । प्रतिसर मन्त्रों का आगे ( १३ ९ ) भी विधान है । वहाँ भाष्य में बताया गया है कि अग्नि देवता वाले रक्षोघ्न मन्त्र प्रतिसर के नाम से प्रसिद्ध हैं । इस शब्द का प्रयोग आत्मरक्षा के लिये बाँधे जाने वाले ताबीज, रक्षासूत्र, कंकण और औषधियों के लिये भी होता है । अश्व की रक्षा के लिये भी प्रतिसर कर्म का विधान शास्त्रों में बताया गया है । राजसूय प्रकरण दसवें अध्याय में अभिषेक के लिये सत्रह प्रकार के जलों के संभरण की प्रक्रिया वर्णित है । भी चलता है । यहाँ प्रारम्भ की चार कण्डिकाओं में राजा के पालाश, औदुम्बर, नैयग्रोध ( वाट ) और अश्वत्थ पात्रों में इनमें से एक जल का नाम आतपवर्ण्य है, अर्थात् आतप ( धूप ) के रहते वर्षा हुआ पानी । आज भी यह जल अतिपवित्र माना जाता है । अभिषेक के समय तत्काल इस जल की उपलब्धि नहीं हो सकती । अतः यहाँ बताया गया है कि जब भी ऐसी वृष्टि हो, उसके जल को लेकर भविष्य में होने वाले अभिषेक के लिये इसे सुरक्षित कर लेना चाहिये । अभिषेक के समय राजा की प्राची, दक्षिणा, प्रतीची, उदीची और ऊर्ध्वा दिशाओं से रक्षा की जाती है । इस कार्य के लिये यहाँ क्रमशः रथन्तर, बृहत्, वैरूप, वैराज और शाक्वर - रैवत सामों का तथा त्रिवृत्, पंचदश, सप्तदश, एकविंश और त्रिणव- त्रयस्त्रिश स्तोमों का पाठ किया जाता है । यहाँ ( पृ ० ३२२ - ३२५ ) भाष्यकार ने इन सामों और स्तोमों का विशद स्वरूप शतपथ ब्राह्मण, ताण्ड्य महाब्राह्मण और साम ब्राह्मण के वचनों को उद्धृत करते हुए प्रस्तुत किया है । जिज्ञासुजन इस विषय को वहीं देख सकते हैं । स्तोमों की चर्चा आगे ( १४ | २३; पृ ० ३८० ) भी आई है । वहाँ एकादशाध्याय के स्थान पर दशमाध्याय पढा जाना चाहिये । सृष्टिप्रक्रिया के प्रसंग में पुराणों में भी यह विषय वर्णित है, जैसा कि इस भाष्य में आये ( ३१।८ ) विष्णु पुराण के प्रमाण से दिखाया गया है, किन्तु आधुनिक समाज में यह एक दम से उपेक्षित होता जा रहा है | हमारा अज्ञान कहाँ तक बढ गया है, इसको स्वामी दयानन्द के भाष्य में देखा जा सकता है । इस तरह के अनेक अपरिचित विषयों पर स्पष्ट प्रकाश डाल कर भाष्यकार ने आधुनिक विद्वत्समाज का बड़ा उपकार किया है । राजसूय याग के अन्त में सम्पन्न होने वाले सौत्रामणी कर्म को चरक सौत्रामणी कहते हैं । दसवें अध्याय के अन्तिम चार मन्त्रों में इसका संक्षिप्त स्वरूप दिया गया है । सौत्रामणी याग का विस्तार आगे १ ९ -२१ अध्यायों में देखा जा सकता है । संहिता के ११ से १८ तक के अध्यायों में अग्निचयन के मन्त्र वर्णित हैं । ११ भाष्य में शतपथ ब्राह्मण के षष्ठ काण्ड के तीन अध्यायों में निर्दिष्ट सारे विषयों का ' अध्याय के प्रारम्भ में संक्षेप में परिचय दिया

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( ११ ) गया है, जिससे कि इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि समझ में आ सके । इष्टकाओं के विषय में अक्ताक्ष्य और ताण्ड्य नामक आचार्यों का मत भी यहाँ उद्धृत है । यज्ञीय समिधाओं का वर्णन करते समय संहिता ( ११।७०-७६ ) और भाष्य ( पृ ० ९५-१०३ ) में और पलाश की समिधा के अतिरिक्त उपजिह्विका वृक्ष की समिधा के साथ अपरशुवृक्ण समिधा की नहीं काटी गई है । इस प्रकार यहाँ स्पष्ट निर्दिष्ट है लकड़ी का समिधा के लिये उपयोग नहीं किया जा इसके सामने आज की अर्थप्रधान ( अर्थदास ) संस्कृति कृमुक ( धमन ), विकंकत ( कठेर ), उदुम्बर ( गूलर ) ( दीमक ) और वम्र ( चींटी ) के द्वारा भक्षित निःसत्त्व भी गणना है । अपरशुवृक्ण का अर्थ है, जो कुल्हाड़ी से कि हरे - भरे वृक्ष की और कुल्हाड़ी से काटे गये वृक्ष की सकता । यह है हमारी समृद्ध वैदिक यज्ञीय संस्कृति । कितनी बनी लगती है । afrat के लिये बनाई जाने वाली विविध इष्टकाओं की स्पष्ट जानकारी के लिये महाराजा संस्कृत कालेज, जयपुर के प्रिंसिपल के रूप में पूर्वाश्रम के अपने कार्यकाल में हमने इष्टकाओं के पीतल के साँचे बना कर रखवाये थे, जिनकी सहायता से आवश्यकता के अनुसार कोई भी इष्टका बनाई जा सकती है । श्रौतस्मार्त यज्ञशाला भी वहाँ बनवाई गई थी । वेदों में अनेक प्रकार की इष्टकाओं से बनाई जाने वाली विविध चितियों की निर्माणविधि प्रदर्शित है । इनमें रेखागणित के अतिसूक्ष्म सूत्रों का हमें दर्शन होता है । शुल्बसूत्रों में इस विद्या का विश्लेषण आश्चर्यचकित करने वाला है । इससे यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भारतीय विद्वान् किसी भी विषय का कितना समृद्ध अध्ययन कर उसकी तह तक पहुँचने का प्रयत्न करते थे । शुक्ल यजुर्वेद की प्रस्तुत माध्यन्दिन संहिता के ११-१८ अध्यायों में अग्निचयन के प्रसंग में मुख्य रूप से सुपर्ण चिति का विस्तार मिलता है । ' सुपर्णोऽसि गरुत्मान् ' मन्त्र के भाष्य में रूपकालंकार के माध्यम से अग्नि की सुपर्ण ( गरुड़ ) से समानता दिखाई गई है । अभी - अभी हरिद्वार - देहरादून के बीच के जंगल में प्राचीन काल की सुपर्ण चिति उसी रूप में प्राप्त हुई है । ११।२५ पर उद्धृत शतपथ ब्राह्मण में अभि द्वारा परिलिखित तीन रेखाओं की त्रिपुर से तुलना की गई है और ५८ पर उद्धृत शतपथ में स्पष्ट रूप से लोह, रजत और सुवर्ण से निर्मित पुरियों का वर्णन मिलता है । पुराणों में असुरों द्वारा निर्मित इन तीन पुरियों की और भगवान् शिव के द्वारा इनके विध्वंस की कथा विस्तार से मिलती है | यहाँ अतिसंक्षेप में उसी का उल्लेख है । अनि द्वारा उल्लिखित इन तीन रेखाओं का प्रयोजन यह है कि इन तीन रेखाओं के रूप में त्रिपुरसंहार की घटना का स्मरण कर भयभीत असुरगण इस चितिस्थान में आने का दुःसाहस नहीं करेंगे । इसी तरह से यहाँ १२५ पर विष्णु के तीन क्रमों का वर्णन है और कूर्म पुरुष ( १२।३०-३३ ) का भी । इन मन्त्रों में हमें भगवान् विष्णु के त्रिविक्रम ( वामन ) और कूर्म अवतारों की सूचना मिलती है । यहीं १२ वें अध्याय के २७ मन्त्रों ( १२७५-१०१ ) में औषधियों की स्तुति की गई है । यह प्रकरण ओषधिविज्ञान से परिपूर्ण है । १२।६५ के भाष्य में शतपथ ब्राह्मण और कात्यायन श्रौतसूत्र में प्रयुक्त ' इण्ड्वे ' पद की व्याख्या दी गई । ' इण्डवा ' पद का यहाँ द्विवचन में प्रयोग हुआ है । इसका यहाँ जो अर्थ दिया गया है, तदनुसार यह इण्डवा पद ही विकृत होकर राजस्थानी भाषा में ' ईडणी ' हो गया है ।

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( १२ ) १६ से २० अध्याय तक के छठे भाग ( जिल्द ) में १६ वाँ अध्याय शतरुद्रियाध्याय के नाम से प्रसिद्ध है । इस अध्याय के भाष्य का भाषानुवाद भी साथ में दिया गया है, जिससे कि हिन्दीभाषाभाषी जिज्ञासु भी भगवान् रुद्र की महिमा से परिचित हो सकें । यहाँ प्रारम्भ के दो मन्त्रों में अनेक ग्रन्थों की सहायता से भगवान् के निर्गुण और निराकार स्वरूप के साथ सगुण और साकार स्वरूप का भी संक्षेप में विवेचन किया है और बताया है कि इस विषय के जिज्ञासुओं को हमारी ' रामायण मीमांसा ' देखनी चाहिये | इस अध्याय के १७ वें मन्त्र में अचिरादि और धूमादि मार्ग की तथा सद्योमुक्ति और क्रममुक्ति की चर्चा कर बृहदारण्यक के प्रमाण से तृतीय गति का भी उल्लेख किया है । इसी भाष्य में अन्यत्र दयानन्दीय मत की समीक्षा करते हुए कहा गया है कि मुक्ति के दो ही मार्ग हैं । इन दोनों उक्तियों में परस्पर कोई विरोध इस लिये नहीं है कि बृहदारण्यक में जिस तृतीय गति का उल्लेख है, वह निरय गति है । मुक्ति मार्ग से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । १७ वें अध्याय के १७ वें मन्त्र में भी धूमादि मार्ग और अचिरादि मार्ग की चर्चा है | यहाँ ( पृ ० २६७- २६ ९ ) ब्रह्मसूत्र और उसके शांकर भाष्य के आधार पर इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है । साथ ही आतिवाहिक मार्ग का भी उल्लेख है । भाष्य में विवेचित प्रमुख दार्शनिक प्रसंगों में इस प्रकरण का भी अत्यन्त महत्त्व है । १७ वें अध्याय के अनेक मन्त्रों का उनमें ब्रह्मविषयक प्रश्न - प्रतिवचनों के कारण दार्शनिक महत्त्व है । १७।१७ की व्याख्या में उब्वट इस मन्त्र से ज्ञानकर्मसमुच्चयवाद को समर्थन देते हैं । पुराणों में ज्ञानकर्मसमुच्चयवाद अति विस्तार से प्रतिपादित है । अनेक प्राचीन आचार्य भी इस वाद के समर्थक रहे हैं । ७० वें मन्त्र में सात छन्दों, सात धामों ( अग्नियों ), सात होताओं और सात संस्थाओं का विवेचन अतीव ज्ञानवर्धक है । ' य इमा विश्वा ' ( १७/१७ ), ' किं स्विद्धनम् ' ( १७।२० ), ' चत्वारि शृङ्गा ' ( १७ | ९ १ ) जैसे मन्त्र भारतीय दर्शन के मौलिक स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं । इनमें से अन्तिम मन्त्र ( १७।९ १ ) में परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणियों की विवेचना निरुक्त और महाभाष्य की सहायता से की गई है । हम जानते हैं कि इन चार वाणियों का तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में सविशेष वर्णन मिलता है । १७।६८ में आहुति, दक्षिणा और अन्न को यज्ञ की धारा बताया गया है । मतान्तर से वैश्वानर, मारुत, पूर्णाहुति, वसोर्धारा और वाजप्रसवीय आहुतियों को यज्ञ की धारा कहा जाता है । १८ वें अध्याय के ३ ९ वें मन्त्र में स्वामी करपात्री जी महाराज ने निरुक्त के प्राचीन व्याख्याकार स्कन्द-स्वामी के मत की समालोचना की है । इस प्रसंग में निरुक्त और व्याकरण की अलग - अलग भूमिकाओं का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने शाकटायन व्याकरण के दृष्टिकोण को रखा है । यह प्रसंग भी विद्वानों के लिये विशेष रूप से अवधेय है । " प्रत्यक्षमप्यर्थमनुमानेन बुभुत्सन्ते तर्करसिकाः " यहाँ कहा गया है कि तार्किक जन प्रत्यक्ष अर्थ को भी अनुमान से सिद्ध करने में विशेष रुचि रखते हैं । यहाँ तार्किक दृष्टि से प्रत्यक्ष की अपेक्षा अनुमान को वरीयता दी गई है । हमारे भाष्यकार ने १७ ९ ५ में इसके विपरीत एक दूसरा न्याय उद्धृत किया है - " नहि प्रत्यक्षे करिणि चीत्कारेण हस्तिनमनुमिमतेऽनुमातारः ” । अर्थात् हाथी को सामने खड़ा देख लेने के बाद कोई चीत्कार से उसका अनुमान नहीं करता । १ ९ वें अध्याय के २५ वें मन्त्र में न्यूंख पद पर विचार किया गया है और उसके उच्चारण के क्रम की शास्त्रीय पद्धति दिखाई गई है । पाणिनि सूत्र ( १।२ ३४ ), काशिका, पदमंजरी, सायण आदि के मत को भी यहाँ दिखाया गया है ।

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( १३ ) हम पहले बता चुके हैं कि १२-२१ अध्यायों में सौत्रामणी याग का विशेष रूप से वर्णन है । यहाँ प्रारम्भ ( १ ९ | १ ) में ही इसकी पूरी प्रक्रिया पर शतपथ ब्राह्मण और कात्यायन श्रौतसूत्र के आधार पर विस्तार ( पृ ० २२१-२३१ ) से प्रकाश डाला गया है । सातवें भाग ( जिल्द ) में २१ से ३० और ३१ से ३ ९ अध्यायों का भाष्य संमिलित है । इनकी पृष्ठसंख्या अलग - अलग है । यहाँ के कुछ विशेष अंशों की ओर हम विज्ञ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं । २१।१७ के भाष्य में यह्न शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार किया गया है । निघण्टु में यह और या दोनों ही शब्द मिलते हैं । निरुक्तकार यास्क यह शब्द की व्युत्पत्ति देते हैं, जब कि दशपादी उगादि -वृत्ति में स्त्रीलिंग यह्वा शब्द निष्पादित है । भट्टोजी दीक्षित पुल्लिंग यह्न शब्द को मान्यता देते हैं । २२२५ के भाष्य में चतुरक्ष शब्द पर विचार किया गया है । पुराण, आगम और तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में यमराज के दो श्वानों का वर्णन मिलता है । " द्वौ श्वानौ श्यावशबलौ " यह श्लोक पितृक्रिया की पद्धतियों में प्रसिद्ध है । चतुरक्ष शब्द से हम इनका भी ग्रहण कर सकते हैं । इनसे प्राण और अपान का भी अर्थ गृहीत होता है । इसी अध्याय की ७-८ कण्डिकाओं में अश्व के निमित्त दक्षिणाग्नि में दी जाने वाली प्रक्रम संज्ञक ४ ९ आहुतियों का विधान है । यहाँ अश्व की ४ ९ प्रकार की चेष्टाओं का नामोल्लेख किया है और प्रत्येक चेष्टा के लिये आहुति दी जाती है । यह प्रकरण अपने आप में इसलिये महत्त्वपूर्ण है कि अश्व की चेष्टाओं का यहाँ अतिसूक्ष्म विश्लेषण मिलता है । स्वामी दयानन्द ने तथा अन्य कुछ विद्वानों ने भी " गणानां त्वा " से लेकर " यद्धरिणो यवमत्ति " पर्यन्त अभिमेथन मन्त्रों की उब्वट, सायण और महीधर द्वारा की गई व्याख्या में अश्लीलता का आरोप लगाया है । इस पूरे प्रसंग पर पारिजातकार ने यहाँ ( पृ ० १०१-१०३ ) अच्छा विचार किया है । " उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः " इस बृहदारण्यक वाक्य की भी यहाँ चर्चा है और आगे ( पृ ० १८१-१८२ ) इस वचन की विशद दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की गई है । रूपकालंकार की पद्धति से यहाँ बताया गया है कैसे यह अश्व सर्वत्र व्याप्त है, उसके अंग - प्रत्यंग में यह पूरा विश्व कैसे समाया हुआ है । यह प्रकरण भी विद्वानों के लिये गम्भीर अध्ययन - मनन की सामग्री प्रस्तुत करता है । छान्दोग्य में वर्णित ' पञ्चाहुति ' पद की व्याख्या ( पृ ० १ ९ ७ ) भी हमारे लिये अवलोकनीय है कि ये पाँच आहुतियाँ किस प्रकार सम्पादित होती हैं । पृ ० २४ ९ पर ' त्र्यवि ' शब्द का प्रयोग डेढ़ वर्ष की गाय के लिये किया गया है । इस विषय को स्पष्ट करते हुए यहाँ कहा गया है कि अजा ( बकरी ) और अवि ( भेड़ ) छः महीने में बच्चा जनती है, अतः लक्षणा वृत्ति के सहारे इस शब्द से छः मास का काल लक्षित होता है । इस तरह से त्र्यवि का अर्थ तीन छः महीने, अर्थात् डेढ वर्ष हुआ । संवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर और इद्वत्सर नामक पाँच संवत्सरों का स्वरूप यहाँ ( पृ ० ३१३ ) वराहमिहिर की बृहत्संहिता और उसकी भट्टोत्पल की व्याख्या के आधार पर दिया गया है । चरकाचार्यों के विषय में पाश्चात्त्य विद्वानों के द्वारा व्यक्त किये गये अप्रामाणिक विचारों की समालोचना भी यहाँ ( पृ ० ३१६ ) दी गई है । एक स्थान पर ( पृ ० ३१७ ) मण्डल आयोग की भी चर्चा आई है । आज यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि इस आयोग की संस्तुति इस राष्ट्र के विघटन में कितना योगदान कर रही है । उवट के भाष्य से ज्ञात होता है कि इस संहिता के ३१ वें अध्याय ( पुरुष सूक्त ) का शौनक ऋषि ने भाष्य किया था । इस पूरे भाष्य को उव्वट ने उद्धृत किया है । उव्वट की पद्धति से ही उसे यहाँ भी दे दिया गया है । सात छन्दों, सात धामों ( अग्नियों ), सात होताओं, सात संस्थाओं और सात परिधियों की भू०-३

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( १४ ) चर्चा पहले की जा चुकी है । सात परिधियों और २१ समिधाओं का स्वरूप ३१।१५ में भी देखा जा सकता है । ३१।२२ के भाष्य में " न मे भक्तः प्रणश्यति " इस गीतावाक्य की हृदयाभिराम व्याख्या की गई है । " यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् " ( ३२८ ) यह इस संहिता का विश्वजनीन संदेश है । कवीन्द्र रवीन्द्र इससे इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अपनी संस्था विश्वभारती का आदर्शवाक्य इसे ही बनाया था । " ईशा-वास्यमिदं सर्वम् ” का उपदेश भी यही संहिता देनी है । ऐसे ही स्थलों से इस संहिता की दार्शनिक गरिमा का भी पता चलता है । इस तरह के विश्वजनीन उपदेशों से भरे वाक्यों से प्रेरणा लेकर हम द्वेष और कलह से ग्रस्त पूरे आधुनिक विश्व को मानव जाति का एक पवित्र मन्दिर बना सकते हैं 1 नासदीय सूक्त ( ऋ ० १०।१२ ९ ।२ ) के प्रसिद्ध " तिरश्वीनो विततो रश्मिरेषाम् " ( ३३।७४ ) की प्रस्तुत भाष्य में की गई अधियज्ञ व्याख्या अतीव महत्त्वपूर्ण है । यहाँ बताया गया है कि अध्वर्यु उत्तर हविर्धान के नीड पर एक अभ्रण की स्थापना करता है । उसे आधवनीय कहा जाता है । प्रउग स्थान पर द्वितीय अंण की स्थापना की जाती है । उसे पूतभृत् कहते हैं । हविर्धान शकट का नाम है । बड़े मुँह वाले मिट्टी के घड़े को अंभ्रण कहा जाता है । शकट पर बैठने की जगह नीड कहलाती है । इस नीड के बाहर के भाग की प्रउग कहते हैं । मन्त्र से संस्कृत प्रादेशप्रमाण के नीचे से ऊपर तक बिना टूटे हुए दो दर्भों को मिलाकर प्रोक्षण के निमित्त पवित्र बनाया जाता है । उद्गाता ( सामगान करने वाला ) आदि के द्वारा सोम के ऋजीष, कल्क आदि को छानने के उपयोग में आने वाला वस्त्र दशापवित्र कहलाता है । ग्रह, चमस, आधवनीय आदि पात्रों में छने हुए सोम रस को स्थापित किया जाता है । कितनी मार्मिक व्याख्या है? याज्ञिक पारिभाषिक शब्दावली को समझाने की मानों झड़ी लगा दी है । हम पूरे भाष्य में इस तरह के पारिभाषिक शब्दों की व्युत्पत्तियों, प्रयोगों और उनके अर्थों को देख सकते हैं । पाणिनि के धातुपाठ में लगभग दो हजार धातुओं का निर्देश है । इन सबका प्रयोग लौकिक संस्कृत में नहीं मिलता । प्रस्तुत महनीय भाष्य के सहारे हम इन धातुओं के प्रयोग - स्थलों और उनके अर्थों पर गहन विचार कर सकते हैं । इस भाष्य के व्याकरण- प्रधान अंश इस कार्य में हमारे सहायक हो सकते हैं । ' पङ्क्तिराधसम् ' पद यहाँ अनेक स्थानों पर ( ३३।८ ९; ३७ ७, ९ ) आया है । हविष्पंक्ति, नाराशंस पंक्ति और सवन पंक्ति का स्वरूप एवं व्याख्या इन स्थलों पर देखी जा सकती है । यहाँ एक स्थान पर बताया गया है कि इन पंक्तियों का निरूपण ऐतरेय ब्राह्मण में विस्तार से किया गया है । ३३।९ १ के आध्यात्मिक अर्थ में “ देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद " ( २ | ४ | ६ ) इस बृहदारण्यक श्रुति को उद्धृत किया है । इसका अभिप्राय यह है कि देवता उसकी सहायता नहीं करते, जो व्यक्ति देवताओं को अपने से भिन्न मानता है । भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा के आधार पर आराधक स्वयं देवस्वरूप बनकर आराध्य देवता की उपासना करता है । " शिवो भूत्वा शिवं यजेत् ", " देवो भूत्वा यजेद् देवान् " जैसे वाक्य इसी सिद्धान्त को उजागर करते हैं । यहीं ( ५।६ ) के भाष्य में उद्धृत - " त्वं वै भगवो देवते! अहमस्मि, अहं वै भगवो देवते! त्वमसि ” श्रुति का भी यही तात्पर्य है । ३३।९ ३ के भाष्य में प्रदर्शित है कि मूलाधार से उठ कर वाणी तीस अंगुल का मार्ग पूरा कर मुख तक पहुँचती है । त्रिंशत्पदा शब्द के यहाँ अन्य भी अर्थ किये गये हैं । पहले १३ ३ ९ के भाष्य में भी शतपथ का यह वचन उद्धृत है - " तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति " ( १४।८।१०।१ ) । स्पष्ट है कि योगशास्त्र में वर्णित नादानुसन्धान की प्रक्रिया का यहाँ स्मरण कराया गया है ।

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( १५ ) ३४ वें अध्याय के छः शिवसंकल्प मन्त्रों की व्याख्या करते समय पृ ० ९ ५ पर शक्ति प्रथम की मन्त्र औपचारिकता में मन की अतीत, अनागत, वर्तमान, संनिकृष्ट, विप्रकृष्ट, व्यवहित पदार्थों को भी देख सकने की से उत्पन्न षड्ज का उपनिषदों के प्रमाण से वर्णन किया है । यहाँ बताया गया है कि गान्धर्व शास्त्र के अभ्यास आदि स्वरों की पहचान की तरह प्रत्यगभिन्न ब्रह्मरूप का महावाक्यजन्य प्रमात्मक दर्शनों एवं मानस विभिन्न साक्षात्कार ग्रन्थों हो के सकता है । महावाक्यजन्य प्रमा और सांख्य, वेदान्त, न्यायशास्त्र आदि विवरण दिया गया प्रमाण से मन की शक्ति एवं जागरण, स्वप्न, प्रस्वाप आदि दशाओं का यहाँ सप्रमाण है । दार्शनिकों को इस प्रसंग का अवलोकन अवश्य करना चाहिये । पृ ० ९ ८ - ९९ पर इस मत का इस उल्लेख मत का किया गया है कि मस्तक में मस्तिष्क का जो स्थान है, वहीं मन का भी निवास है । बाद में यहाँ खण्डन कर दिया गया है और हृदय - पुण्डरीक में ही मन की स्थिति मानी गई है । पितृमेध की प्रक्रिया का यहाँ ( पृ ० १३० - १३१ ) विस्तार से वर्णन है । इसी तरह से महावीर के संभरण की प्रक्रिया को भी यहाँ ( पृ ० १५६ - १६१ ) विशद रूप से देखा जा सकता है । भाष्य की महत्ता को दिखलाने के लिये उदाहरण के रूप ये कुछ प्रसंग हमने यहाँ प्रस्तुत किये और हैं । यह पूरा भाग्य इस तरह के प्रसंगों से भरा हुआ है । मनु आदि स्मृतिकारों के अनुसार लौकिक आध्यात्मिक सर्वविध ज्ञान वेद से ही प्राप्त होता है । ऊपर वर्णित सारे प्रकरण स्मृतिकारों की और हमारी इस आस्था को दृढ करने वाले हैं । संवत् २०३० तक स्वामी करपात्री जी महाराज की भाष्यभूमिका का दार्शनिक भाग पूरा लिये हो हमने चुका था । इसको भाषानुवाद के साथ प्रकाशित कराने का जब विचार हुआ, उस समय इस कार्य इस के प्रस्ताव को पं ० व्रजवल्लभ द्विवेदी का नाम प्रस्तुत किया था । स्वामी जी ने एक प्रतिबन्ध के साथ स्वीकार किया कि इस दार्शनिक भाग के पूरे अनुवाद को सुनकर आवश्यकता के अनुसार उसमें आपातकाल संशोधन के करना होगा । हमने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और संवत् २०३२ में पटना । एक में लम्बी अवधि के एकान्तवास के दो मासों में इस कार्य को सम्पन्न कर ग्रन्थ के मुद्रण की अनुमति दे दी एक अलौकिक सन्तोष की बाद ही सही, आज इस पूरे भाष्य को विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत होते देख हमें अनुभूति हो रही है । उनके इस बृहत् कार्य को पूरा करने के लिये स्वामी जी ने चार विद्वानों को नियुक्त किया था पट्टाभिराम और नामों का उल्लेख भी अपनी भाष्यभूमिका के प्रारम्भ में कर दिया था । पद्मभूषण पण्डित गये | भूमिका शास्त्री जी ने भाषानुवाद करना प्रारम्भ किया, किन्तु बाद में वे इस कार्य से विरत । पं हो ० गजानन शास्त्री भाग के प्रथम खण्ड की उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी में विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावना लिखी किया । इसके अतिरिक्त मुसलगांवकर ने भूमिका भाग के द्वितीय खण्ड के पृ ० १ ९७६-२०९ ४ तक का भाषानुवाद का भाष्यसार भी लिखा । इन्होंने पहले, सोलहवें और चालीसवें अध्याय का भाषानुवाद और २ - ३ अध्यायों में तथा उद्धरणों स्थान-भाष्यभूमिका और पूरे भाष्य की शुद्ध और स्वच्छ प्रेस कापी तैयार करने कुछ अध्यायों की निर्देश में भी यथाशक्ति पं ० मार्कण्डेय ब्रह्मचारी जी का सराहनीय सहयोग रहा है । अन्तिम ढंग से प्रेस कापी तैयार करने में एक अन्य व्यक्ति को लगाया गया था, किन्तु वे सज्जन इस जी कार्य से ही को करवानी सही पड़ी । कर न सके और अन्ततः उन अध्यायों की भी प्रेस कापी पं ० मार्कण्डेय ब्रह्मचारी भाष्य के भाषानुवाद में होते विलम्ब को देखकर अन्ततः भाष्यसार के साथ पूरी संहिता को छपाने का

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( १६ ) संकल्प लिया गया और इसके लिये काशीस्थ वैदिक विद्वानों से प्रार्थना की गई । डॉ ० श्रीकिशोर मिश्र वेदाचार्य के अतिरिक्त किसी अन्य वैदिक विद्वान् ने इसमें विशेष रुचि नहीं दिखाई । श्री मिश्र ने ४ - १० अध्यायों का भाष्यसार लिखा है । आगे के ११ से ३ ९ अध्यायों को केवल भाष्य निष्कर्ष के साथ निकालना पड़ा है, ताकि भाष्य के प्रकाशन में अनपेक्षित विलम्ब न हो । ऊपर निर्दिष्ट कार्यों के अतिरिक्त भाष्य-निष्कर्ष के लेखन के साथ अन्य सारा कार्य पं ० श्री व्रजवल्लभ द्विवेदी ने किया है । हमें सन्तोष है कि हमारे द्वारा निर्दिष्ट व्यक्ति ने इस विशाल कार्य को पूरा कर दिखाया है । हम इनके सर्वविध कल्याण की कामना करते हैं । हमारे लिये यह सन्तोष का विषय है कि इनको इस वर्ष राष्ट्रपति पुरस्कार से संमानित किया गया है । इस प्रसंग में हमें एक विसंगति देखने को मिली कि स्वामी करपात्री जी महाराज के यहाँ धर्म की रक्षा के नाम पर आने वाले अनेक व्यक्तियों की दृष्टि अर्थ के प्रति अधिक सजग रही है । पं ० व्रजवल्लभ द्विवेदी स्वामी जी के निकट अर्थ के लिये आये थे, जिसकी कि उन दिनों अपना परिवार चलाने के लिये उनको आवश्यकता थी, किन्तु इन्होंने उस समय भी धार्मिक दृष्टि को प्रधान रखा । यही कारण है कि इस कार्य से जुड़े अनेक व्यक्ति धीरे - धीरे हटते गये और इनको जब भी इस कार्य की जिम्मेदारी सौंपी गई, उससे कभी पीछे नहीं हटे । आज भारत को चरित्रसम्पन्न अर्थनिरपेक्ष व्यक्तियों की आवश्यकता है । तभी यह राष्ट्र प्रगतिपथ पर आरूढ होगा और स्वामी करपात्री जी महाराज की कल्पना साकार हो सकेगी । इस महान कार्य में आर्थिक सहयोग देने वाले श्री हनुमानप्रसाद धानुका का उल्लेख किये बिना यह वक्तव्य अधूरा रहेगा । " सर्वारम्भास्तण्डुलप्रस्थमूला: " इस सुभाषित से हम सब कोई परिचित हैं । स्वामी करपात्री जी महाराज के परम श्रद्धालु भक्त वृन्दावनवासी अपने पिता श्री राधाकृष्ण धानुका की स्मृति में श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान की स्थापना कर इन्होंने सर्वात्मना आर्थिक सहयोग न दिया होता, इस कार्य में लगे हुए विद्वानों के योगक्षेम का यथाशक्ति प्रबन्धन किया होता, तो इस महान् प्रकाशन कार्य के सम्पन्न होने में अभी और भी विलम्ब होता । श्रेष्ठिजनों की रुचियाँ आजकल बदल रही हैं । पारिवारिक विग्रह, पत्नीवियोग जैसी आपदाओं को सहते हुए भी इन्होंने अपने दृढ संकल्प को नहीं छोड़ा और इस पावन कार्य को पूरा करा कर के ही रहे । हम इनके परिवार के सर्वविध कल्याण की कामना करते हैं । इधर इन्होंने मुद्रण कार्य की देख - रेख के लिये वृन्दावन के अपने मुनीम श्री गिरिराज प्रसाद अग्रवाल को नियुक्त किया था । उनके उचित सहयोग से ही यह कार्य अनेकविध विघ्नबाधाओं को पार कर आज पूरा हो रहा

है । हम इनके लिये भी अपनी शुभ कामना व्यक्त करते हैं ।

॥ शम् ॥

शिवरात्रि, संवत् २०४ ९ वाराणसी । श्री निरंजनदेव तीर्थ

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दशाध्यायी ( १-१० ) - भाष्यनिष्कर्ष

करपात्रमहाभागान् पुरीपीठाधिपांस्तथा ।

नमस्कृत्य विचारोऽयं प्रस्तुतो भाष्यसंश्रयः ॥

यह संयोग की ही बात है कि शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन संहिता के स्वामी करपात्री जी महाराज के द्वारा विरचित लिखना वेदार्थ पारिजात भाष्य के प्रथम दस अध्यायों का भाष्यनिष्कर्षं लिखने से पहले अगले अध्यायों का भाष्यनिष्कर्षं और ३१ से ३ ९ पड़ा है । अब तक ११ से १५ अध्याय तक का, १६ से २० अ ० तक का, २१ से ३० अ ० तक का के अध्याय तक का भाष्यनिष्कर्ष तीन जिल्दों में प्रस्तुत किया जा चुका है । भाष्य के प्रकाशन में कालातिपात से बचने लिये ११ से ३ ९ अध्याय तक के भाष्य पर हिन्दी में भाष्यसार नहीं लिखवाया जा सका और उसकी पूर्ति के लिये arooftos र्ष में अतिसंक्षेप से भाष्य की विशिष्ट सामग्री का परिचय दे दिया है, जिससे कि हिन्दी भाषा के अभिज्ञ जिज्ञासु भी इस भाष्य से कतिपय विशेष अंशों से लाभान्वित हो सकें । तथा अन्यत्र भी इसके लिये पूरे भाष्य के प्रतिपाद्य विषयों को हमने चार विभागों में बाँट दिया था । अ ० ११-१५ के भाष्य-freei के प्रारम्भ में " भाष्यरचना की सामान्य पद्धति " शीर्षक से इसका परिचय दिया जा अध्याय चुका है में । श्रद्धेय स्वामीजी महाराज ने पूरे भाष्य में सामान्यतः इसी पद्धति का अनुसरण किया है, किन्तु प्रथम में प्रवृत्ति देखी गई । कहीं - कहीं याज्ञिक पद्धतिपरक मन्त्रार्थं को बताने के बाद स्वामी दयानन्द जी के मत के खण्डन संमत बताने का है । ऐसा प्रायः उन स्थलों पर हुआ है, जहाँ स्वामी दयानन्द जी अपने भाष्य को शतपथब्राह्मण समीक्षा - की गई है, प्रयत्न करते हैं । ऐसे स्थलों पर उनके भाष्य को पहले उद्धृत कर बाद में उन शतपथ वचनों की जिनको कि वे अपने भाष्य के अनुकूल मानते हैं । पहले यहाँ शतपथ श्रुति की शास्त्रसंमत व्याख्या प्रस्तुत कर अविरोधी , तब दयानन्दीय भाष्य की निःसारता प्रदर्शित कर दी गई है । स्वामी जी का अभिमत है कि मन्त्रों के श्रुति - सूत्र, १७ अनेक अर्थं किये जा सकते हैं ( ८ ९, १२ ९ ) । इसके उदाहरण के रूप में प्रथम अध्याय के ९ -११ अध्याय , १३-१४ , पृ ० ४४ ) संख्या के मन्त्र देखे जा सकते हैं, जहां इस तरह के अर्थं दिये गये हैं । स्वामी जी ने एक स्थान पर ( १ हैं । कहीं - कहीं लिखा है कि इस पद्धति से किसी विद्वान् ने श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक के १०८ अर्थ किये ब्रह्मा ) है | अतः जो अन्यत्र भी इस क्रम में विपर्यय देखा गया है । लेखक अपने लेखन - व्यापार में स्वयं बिना वेघा बदले ( उसी तरह से बनाये विषय भाष्य में जिस तरह से भाष्यकार द्वारा उपस्थापित किया गया है, उस क्रम को में स्वीकृत है । रखा गया है । किन्तु ऐसा बहुत कम स्थलों पर हुआ है । प्रायः सर्वत्र पूर्वनिर्दिष्ट क्रम ही पूरे भाष्य नहीं थी, १ - १० अध्यायों का विस्तृत भाषानुवाद अथवा भाष्यसार प्रस्तुत है, अतः भाष्यनिष्कर्ष में उसे यहाँ की भी आवश्यकता दिया जा रहा है । किन्तु पाठकों को भाष्य के विशिष्ट स्थलों की जानकारी देने के लिये अतिसंक्षेप के भाष्य का इसके लिये भाष्यनिष्कर्ष को लिखने की पद्धति में थोड़ा परिवर्तन करना पड़ा है । यहाँ पहले अध्याय में तो भाष्य की सारी विस्तृत भाषानुवाद प्रकाशित है और आगे २ - १० अध्यायों का भाष्यसार । विस्तृत भाषानुवाद खण्डनपरक अंश का अर्थ और बातें आ ही गई हैं और भाष्यसार में भी मन्त्रों के विनियोग के साथ दयानन्दीय भाष्य के कर द्विरुक्ति करने का मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ स्पष्ट कर दिया गया है । अतः भाष्यनिष्कर्ष में इन पर पुन: विषयों विचार पर ही ध्यान केन्द्रित कोई लाभ नहीं है । इसीलिये प्रस्तुत भाष्यनिष्कर्ष में भाष्य के उन विशेष प्रतिपाद्य हिन्दी पाठक वंचित किया गया है, जिनका परिचय प्राप्त करने से भाष्यसार के अतिसंक्षिप्त होने के कारण सुबुद्ध रह जाते ।

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( १८ ) ' ३ ९ अध्याय तक के प्रतिपाद्य विषयों की सूचना तत्तत् खण्ड के भाष्यनिष्कर्ष में कि इस संहिता का ४० वाँ अध्याय ईशावास्योपनिषद् के नाम से प्रसिद्ध है । प्रथम में अतिसंक्षेप में पूरी संहिता के प्रतिपाद्य विषयों को सूचित कर दिया गया है । शुक्ल यजुर्वेद के ११ से दी गई है । हम यह जानते ही हैं अध्याय के भाष्य ( पृ ० १२-१३ अन्यत्र भी भाष्य में इन विषयों की सूचना दी गई है । तदनुसार परिशोषित क्रम से प्रथम और द्वितीय अध्याय में दर्शपूर्णमास याग की पद्धति वर्णित है । यह प्रकरण दूसरे अध्याय के २८ वें मन्त्र में पूरा हो जाता है । इसके बाद २ ९ -३४ मन्त्रों में पिण्डपितृयज्ञ का अनुष्ठान निर्दिष्ट है । तृतीय अध्याय में अन्वाधान, अग्निहोत्रीय अग्नि का उपस्थापन तथा चातुर्मास्य याग का वर्णन है । चौथे अध्याय से लेकर आठवें अध्याय की ३२ वीं कण्डिका तक के मन्त्रों में अग्निष्टोम याग का विधान है । प्रथमतः चौथे अध्याय में सोम का क्रय करने के मन्त्र हैं । पाँचवें अध्याय में ज्योतिष्टोम का प्रतिपादन है । यहां सोमप्रधान आतिथ्येष्टि से लेकर यूपनिर्माण तक के मन्त्र हैं । छठे अध्याय में पशुप्रधान अग्नीषोमीय यूप के संस्कार से लेकर सोमाभिषव विधि तक के मन्त्र हैं | सातवें अध्याय में ग्रहग्रहण निर्दिष्ट है । यहाँ उपांशुग्रह से लेकर प्रातः सवन और माध्यन्दिनसवन तक की पद्धति को सम्पन्न कराने वाले एवं दक्षिणादान की विधि को बताने वाले मन्त्र हैं | आठवें अध्याय में तृतीय सायंसवनगत आदित्य ग्रहों के ग्रहण की विधि निर्दिष्ट है । इस अध्याय के ३२ वें मन्त्र तक यह प्रकरण चलता है । इसके आगे के मन्त्रों में षोडशी ग्रह, द्वादशाह विधि, अतिग्राह्य ग्रह, गवामयन, महाव्रत, विश्वकर्म, अदास्य ग्रह, सोमांशुहवन, धर्मभेद प्रायश्चित्त आदि का प्रतिपादन है । ये सब विषय भी एक प्रकार से अग्निष्टोम याग से ही संबद्ध हैं । नवें अध्याय की ३४ वीं कण्डिका तक वाजपेय याग का वर्णन है । इस अध्याय के ३५ वें मन्त्र से राजसूय याग का प्रकरण प्रारम्भ होता है और दसवें अध्याय में भी ३० वीं कण्डिका तक राजसूय याग से सम्बद्ध अभिषेक आदि के मन्त्र हैं । इस अध्याय के आगे के चार मन्त्रों ( ३१-३४ ) में चरक सौत्रामणी प्रतिपादित है । दस अध्याय अलग - अलग चार भागों में प्रकाशित हुए हैं । पहले भाग में पहला, दूसरे में दूसरा और तीसरा, तीसरे में ४-६ अध्याय और चौथे में शेष चार अध्याय प्रकाशित हुए हैं । इन सबकी पृष्ठसंख्या भिन्न - भिन्न है । यहाँ हम क्रमशः इनका विवरण दे रहे हैं । आवश्यकता के अनुसार दी गई पृष्ठसंख्या उसी भाग की समझनी चाहिये । C प्रथम अध्याय यहाँ प्रारम्भ में ही बताया गया है कि उब्वट, सायण, महीधर आदि आचार्यों ने ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थों के प्रमाण से तथा परम्परा से प्राप्त अर्थज्ञान की पद्धति से मन्त्रों की व्याख्या की है, किन्तु नास्तिक अथवा अर्धनास्तिक भारतीय तथा पाश्र्चात्त्य विद्वानों ने अनेक दुस्तर्कों को उद्भावना कर वेदार्थं को व्याकुल कर दिया है । उसका अपाकरण कर वेदार्थ की निर्मलता के लिये हमारा यह प्रयत्न है । भूमिका भाग में इस विषय को विस्तार से देखा जा सकता है । मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद की नित्यता भी वहाँ सिद्ध कर दी गई । यहाँ भाष्यकार ने बताया है कि " स्वाध्यायोऽ-ध्येतव्यः" इस श्रुति वाक्य में ऋषि, छन्द, देवता तथा विनियोग के साथ अर्थज्ञानपूर्वक अपनी शाखा का अध्ययन विहित है । चारों वेदों की सहस्राधिक शाखाएँ हैं । इन सबका अध्ययन एक व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं है । अतः कुलपरम्परा से प्राप्त अपनी शाखा का अध्ययन प्रथमतः अपेक्षित है । १. साकमेघ पर्व के अन्तर्गत भी पितृयज्ञ से संबद्ध मन्त्र ( ३।५१-५४ ) उपदिष्ट हैं और ३५ वें अध्याय में पितृमेध वर्णित है । २. धर्मभेद प्रयुक्त प्रायश्चित्ताहुतियों का विधान ३ ९ अध्याय में अधिक विस्तार से मिलता है । ३. सौत्रामणी याग का विस्तार १ ९ २१ अध्यायों में है ।

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( 15 ) है कि वाजसनेय यजुर्वेद के शुक्ल और कृष्ण विभाग कैसे हो गये, इसका विवेचन करते हुए यहाँ बताया गया जिन १५ ऋषियों को पढ़ाया, उनके नाम इस याज्ञवल्क्य ने सूर्य की उपासना के उपरान्त प्राप्त शुक्ल यजुर्वेद को, पाराशयं, वैधेय, वैनेय, प्रकार हैं - कण्व मध्यन्दिन, शापेय, स्वापायनीय, कापाल, पौण्ड्रवत्स, आवटिक, परमावटक द्वारा प्राप्त यजुर्वेद ही माध्यन्दिन औधेय, गालव, वैजत्र और कात्यायनीय ( पृ ० ४ ) । मध्यन्दिन नाम के महर्षि के से स्पष्ट हो जाता है कि शाखा के नाम से प्रसिद्ध है । इस शाखा के अध्येता माध्यन्दिन कहलाते हैं । इस विवरण नाम से प्रसिद्ध है । वाजसनेय प्रस्तुत संहिता, जिस पर वेदार्थपारिजात भाष्य लिखा गया है, माध्यन्दिन संहिता के में से माध्यन्दिन के अतिरिक्त पद से तो सभी पन्द्रह शाखाओं की संहिताएँ अभिहित होंगी । आज इन पन्द्रह शाखाओं गईं । इस प्रकार माध्यन्दिन काण्व शाखा की संहिता ही मिलती है । शेष शाखाओं की संहिताएँ कालप्रभाव से विलीन हो कात्यायन शाखा के अनुयायियों के लिये ' स्वाध्याय ' पद से यही संहिता प्रथमतः गृहीत की होगी सहायता । शतपथ से मन्त्रार्थ ब्राह्मण की और व्याख्या और सूत्र इस शाखा के अन्य प्रधान ग्रन्थ हैं । प्रस्तुत भाष्य में प्रधानतः इन्हीं विनियोग प्रदर्शित हैं । कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड को अपरा और वेद का महातात्पर्य ब्रह्म के प्रतिपादन में होना चाहिये था, किन्तु बुद्धि की शुद्धि के बिना ब्रह्मज्ञान किया गया है । विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्बन्ध कर्मकाण्ड की व्याख्या के प्रसंग में नित्य, नैमित्तिक, काम्य स्वरूप प्रदर्शित है । अध्ययन विधि की सविस्तर व्याख्या करने के बाद यहाँ वेद के पराविद्या के रूप में व्याख्या की गई है तथा बताया गया है कि अन्ततः सारे ही है । इस दृष्टि से संहिता में ब्रह्म का प्रतिपादन ही पहले असम्भव है, अतः तदर्थं पहले यहाँ कर्मकाण्ड का ही उपदेश नामक चार अनुबन्धों का निरूपण करने के उपरान्त यहाँ और प्रतिषिद्ध के भेद से चतुविध कर्मों का तथा प्रत्यवाय का यागों में भी सर्वतो निरपेक्ष इतना विवेचन कर लेने के उपरान्त इस संहिता में दर्शपूर्णमास याग का ही प्रथमतः विधान क्यों किया गया, इस विषय को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि सारे वैदिक अनुष्ठान अग्निहोत्र से, इष्टि से अथवा सोम से संबद्ध हैं । अतः इनको सारे वैदिक अनुष्ठानों की प्रकृति कहा गया है, क्योंकि यहाँ इन यागों की पूरी विधि वर्णित है । विकृति यागों के अनुष्ठान में यहाँ वर्णित विधि की सहायता लेनी पड़ती है । इन तीन प्रकृति के अनुष्ठान में यजुर्वेद की ही • दर्शपूर्णमास याग है । अतः प्रस्तुत संहिता में सर्वप्रथम इसी का विवेचन है । सूत्र धर्मकाण्ड में प्रतिपादित है, इत्यादि विषयों के प्रधानता मानी गई है, मन्त्र आदि का सामान्य लक्षण जैमिनीय मीमांसा परम्परा का विवेचन के बाद मन्त्रों की दृष्टार्थकता को बताते हुए यहाँ मन्त्र ब्राह्मणात्मक माध्यन्दिन शाखा की वंशब्राह्मणोक्त स्मरण कराया गया है ।.६ है और तब विस्तार से छन्दों के ज्ञान के प्रसंग में यहाँ सायण का और कात्यायनीय सर्वानुक्रमणी का मत प्रदर्शित है । विनियोग में पलाश की इस संहिता की प्रथम कण्डिका के छन्दों का तथा पूरे विनियोग का स्वरूप समाधान निर्दिष्ट करते हुए कहा गया है कि शाखा को देवता बताया गया है । स्थावर शाखा में यह कैसे सम्भव होगा? इसका की पूर्ति करने की शाखा की अधिष्ठात्री देवता परमेश्वर का ही अंश है, अतः उसमें यजमान की कामना सामर्थ्य विद्यमान है । के मन्त्रों से दर्शपूर्ण मास के इस संक्षिप्त विचार के साथ यहाँ मन्त्रार्थं प्रारम्भ होता है । इस पूरे अध्याय , १५५ - १६०, २८५ - २ ९ ४ ) अनुष्ठान का जो स्वरूप बनता है, उसकी प्रक्रिया यहाँ तीन स्थलों पर है ( । पृ ० प्रथम १७-१९ मन्त्र का अर्थ बताने के बाद यहाँ दी गई है, जिसको हिन्दी भाषानुवाद की सहायता से समझा जा सकता खण्डन किया गया है ( पृ ० २५-५४ ) । स्वामी दयानन्द तथा उनके अनुयायी पं ० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के मत का विस्तार से