वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10

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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता भाग्यप्रणेतारः अनन्तश्री विभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजांः ११-१५ अध्यायात्मको भाग: प्रकाशकः श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता वृंदावनम् • ·

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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता [ ११-१५ अध्यायात्मको भागः ] भाष्यप्रणेतारः अनन्तश्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः सम्पादको भाष्य निष्कर्षलेखकश्च पं ० व्रजवल्लभ द्विवेदी दर्शनाचार्यः सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागमविभागाध्यक्षचर आचार्यश्च प्रकाशक: श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावन प्रथम संस्करणम् र

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प्रकाशक-श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता वृन्दावन मूल्य: ११०.०० रूप्यकाणि अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकारा राजकीय नियमानुसारेण सुरक्षिताः पुस्तकप्राप्तिस्थानम् -१. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड नं ० ४ लार्ड सिन्हा रोड, कलकत्ता- ७०००७१ २. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५ / १८ नारद घाट वाराणसी ( उ ० प्र ० ) ३ श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान धर्मसंघ विद्यालय रमणरेती, वृन्दावन मथुरा ( उ ० प्र ० ) ४. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ५. C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ४०१/४०४ राहेजा सेन्टर २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ई ० ४ / २४, ईस्ट पटेल नगर दिल्ली – ८ मुद्रक— केशव मुद्रणालय खजुरी, वाराणसी

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॥ श्रीहरिः ॥ प्रकाशकीय वक्तव्य अनन्तश्री विभूषित पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज द्वारा विरचित यजुर्वेद संहिता के ११-१५ अध्यायों के भाष्य को मन्त्रार्थ और भाष्यनिष्कर्ष के साथ प्रकाशित करते हुए हमें बहुत हर्ष का अनुभव हो रहा है । इससे पूर्व प्रथम तीन अध्यायों का और चालीसवें अध्याय ( ईशावास्योपनिषद् ) का भाष्य अनुवाद सहित प्रकाशित हो चुका है, यह आप लोगों को विदित ही है । प्रकाशन कार्य विस्तृत है । कई कठिनाइयों के कारण प्रकाशन का कार्य त्वरित गति से नहीं हो पा रहा था । अब चतुर्थ और पश्चम अध्याय वाला भाग और छठे से दसवें अध्याय तक का भाग अलग - अलग प्रेसों में छप रहा है । इसी तरह से १५ से २० अध्याय का और २१ से २५ अध्याय का भाग भी प्रेसों में दे दिया गया है । प्रगति समुचित है । यथाशीघ्र आप लोगों को ये दोनों भाग प्राप्त हो सकेंगे । हम इस प्रयत्न में हैं कि विक्रम संवत् २०४८ के अन्त तक पूरा भाष्य विज्ञ पाठकों के करकमलों तक पहुँचा दिया जाय । विदित हो, पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज की अद्वितीय कृति देश के जिन सन्तों, विद्वानों, उच्च शिक्षाविदों और अधिकारियों के पास पहुँचती है, वे अत्यन्त प्रभावित होकर हम लोगों को शेष भाग शीघ्र प्रकाशित करने की सत्प्रेरणा प्रदान करते हैं । भाग्यभूमिका के लेखक, अनुवादक, समय - समय पर उचित परामर्शदाता, प्रूफ पुनरीक्षक, प्रेसकापी साधक, अनुच्छेद ( पैराग्राफ ) के निर्धारक के रूप में और प्रकाशन सम्बन्धी सभी साज - सज्जा को तैयार कर इस अमूल्य ग्रन्थरत्न को सबके सम्मुख प्रस्तुत करने वालों के रूप में जिन - जिन महानुभावों ने अपनी अहैतुको कृपा से इस कार्य को सम्पन्न किया है, उन सभी परम सम्माननीय, आत्मीय, पूज्य आचार्य, विद्वन्मूर्धन्यों के चरणकमलों में धन्यवाद और अभिनन्दनस्वरूप नतमस्तक होकर हम सदा ही कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों में धन्यवाद प्रस्तुत करते हैं, वे हैं— ( १ ) अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज ( २ ) स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ( ३ ) पण्डित श्री मार्कण्डेय ब्रह्मचारीजी ( ४ ) पण्डित श्री व्रजवल्लभ द्विवेदीजी ( ५ ) पण्डित श्री जनार्दन पाण्डेयजी ( ६ ) पण्डित श्री राजवंशी द्विवेदीजी केशव मुद्रणालय के सुयोग्य प्रबन्धक तथा सहृदय कर्मचारियों के स्नेहपूर्ण सौजन्यभरे मुद्रणादि कार्यों के सम्पादन को स्मरण कर इन्हें बहुत धन्यवाद देते हैं । वृन्दावन धाम रामनवमी २०४८ वि ० सं ० निवेदक हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष

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( 0 16 परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज

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पंचाध्यायी ( ११-१५ ) भाष्यनिष्कर्ष

करपात्रमहाभागान् पुरीपीठाधिपांस्तथा ।

नमस्कृत्य विचारोऽयं प्रस्तुतो भाष्यसंश्रयः ॥

अनन्तश्री विभूषित स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा रचित ' वेदार्थपारिजात ' नामक ग्रन्थ का दो खण्डों में प्रकाशन हो चुका है । सायण की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की पद्धति से यह ग्रन्थ लिखा गया है, । पण्डित ९ ०८ ब्रह्मदत्त पृष्ठों के जिज्ञासु इसके प्रथम खण्ड में नैयायिक, बौद्ध, जैन आदि प्राचीन दार्शनिकों के मतों के साथ स्वामी दयानन्द है और ९ ० ९ से और पण्डित भगवद्दत्त जैसे आधुनिक आर्यसमाजी विद्वानों के वेदविषयक विचारों का खण्डन किया गया की समीक्षा के बाद २२७४ पृष्ठों के द्वितीय खण्ड में बेवर, मैकडानल जैसे पाश्चात्य वैदिक विद्वानों के सिद्धान्तों के स्वामी दयानन्द को ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में प्रतिपादित विषयों का और पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा ग्रन्थ पूर्वमीमांसा एक प्रकार से शावर भाष्य के भाष्यानुवाद में वर्णित मतवादों का अतिविस्तार से खण्डन किया गया है । यह विशाल रखा था । स्वामीजी महाराज के यजुर्वेद भाष्य की भूमिका है । भाष्य का नाम भी उन्होंने ' वेदार्थपारिजात ' ही उक्त विशाल भूमिका के दो खण्डों के अतिरिक्त अब तक यजुर्वेद भाष्य के प्रथम और अन्तिम भी अध्याय दिया तथा गया २- ३ अध्याय भी प्रकाश में आ चुके हैं । इनमें मन्त्रार्थं के अतिरिक्त संक्षेप अथवा विस्तार से भाष्यसार कार्य प्रायः है । इसी पद्धति से चौथे - पाँचवें अध्याय वाले खण्ड का तथा ६-१० अध्यायों का भी अनुवाद और है । सम्पादन इसी शिथिलता को पूरा हो गया है, किन्तु एक अथवा दूसरे कारणों से उसका मुद्रण अत्यन्त शिथिल गति से चल रहा । इसको इसलिये भी रोकना देखते हुए दसवें अध्याय से आगे भाष्यसार देने की योजना को स्थगित कर दिया गया है परिचित नहीं हो पड़ा है कि इसमें स्वामीजी महाराज के भाष्य के उत्कृष्टतम अंशों से हिन्दी पाठक पूरी तरह से करने की योजना पाते थे । अब पाँच - पाँच अध्याय के प्रत्येक खण्ड के साथ इस तरह की महत्त्वपूर्ण सामग्री को संकलित बनाई गई है, किन्तु प्रथम दस अध्यायों का मुद्रण अभी पूरा नहीं हो पाया है, अतः ११ से वाले भाग का प्रथमतः इसके महत्त्वपूर्ण अंशों का निष्कर्ष याज्ञिक प्रक्रिया के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है भी ४-५ विशिष्ट अध्यायों सामग्री का याज्ञिक मुद्रण पूरा हो जाने पर प्रथम पाँच अध्यायों का तथा ६-१० अध्यायों वाले भाग में इनकी हिन्दी प्रक्रिया के साथ संक्षिप्त परिचय देने का प्रयत्न किया जायगा, ताँकि पूरी संहिता और उसके भाग्य का आस्वाद पाठक भी ले सकें । भाष्यरचना की सामान्य पद्धति । १५ अध्यायों के इस खण्ड में आधार प्रस्तुत भाष्य की सामान्य विशेषता यह है कि यहाँ प्रारम्भ में कात्यायन श्रौतसूत्र और उसके भाष्य ब्राह्मण के आदि के पर मन्त्रों का विनियोग बताया गया है और इस प्रसंग में आपस्तम्ब श्रीतसूत्र, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय और भी प्रमाण दिये गये हैं । इसके बाद कात्यायन की सर्वानुक्रमणी के आधार पर प्रत्येक मन्त्र के ऋषि प्रमाण , देवता के रूप में छन्द का निरूपण किया गया है । छन्दों के प्रसंग में पिंगल छन्दः शास्त्र को भी आवश्यकता के अनुसार को यथावसर प्रस्तुत किया गया है । मन्त्रार्थ का निरूपण करते समय उव्वट, सायण और महीधर के भाष्य वचनों और उद्धृत किया गया है । स्तोम की आवृत्ति के प्रकार को जानने के लिये सामसूत्र का उल्लेख है । विशिष्ट वैदिक लौकिक शब्दों की व्याख्या के प्रसंग में निघण्टु, निरुक्त और दुर्गाचार्य के निरुक्त भाष्य के अतिरिक्त देवराज यज्वा और स्कन्द स्वामी के व्याख्यानों को भी प्रस्तुत किया गया है । अमरकोश, विश्वप्रकाश, मेदिनीकोश, कल्पद्रुम, अनेकार्थसंग्रह, हमकोश जैसे कोश - ग्रन्थों को भी यहाँ यथावसर उद्धृत किया गया है ।

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( ६ ) मन्त्रार्थ का निरूपण करने के बाद उस अर्थ की पुष्टि के लिये शतपथ ब्राह्मण को और उसके हरि स्वामी एवं सायण कृत भाष्यों को भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है । प्रधानतः यहाँ माध्यन्दिन शाखा के ब्राह्मण को ही उद्धृत किया गया है, किन्तु इसकी पुष्टि के लिये कभी - कभी काण्व शाखा के शतपथ ब्राह्मण को भी प्रस्तुत किया गया है । शतपथ ब्राह्मण को हम इन शाखाओं का प्रथम भाष्य मान सकते हैं । यहाँ मन्त्रों का विनियोग भी बताया गया है और इसी के आधार पर कात्यायन श्रौतसूत्र की रचना हुई, ऐसा हम मान सकते हैं । उव्वट आदि के भाष्यों का भी प्रधान आधार शतपथ ब्राह्मण ही है । इस प्रकार श्रुति - सूत्र - भाष्य सम्मत मन्त्रार्थ को दिखाने के बाद प्रायः प्रत्येक मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ भी दिखाया गया है और ऐसा करते समय विभिन्न उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता के अतिरिक्त वाल्मीकि रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, भागवत महापुराण, अध्यात्म रामायण, भुशुण्डि रामायण, संक्षेपशारीरक, भक्तिरसायन जैसे महनीय ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य अनेक पुराणों के और आचार्य नरहरि के भी वचन प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं | अन्त में स्वामी दयानन्द कृत मन्त्रार्थं की निःसारता को प्रबल युक्तियों के सहारे दिखाया गया है । प्रत्येक मन्त्र का भाष्य करते समय यहाँ प्रायः यही क्रम स्वीकार किया गया है । कहीं - कहीं इस क्रम में कुछ बदलाव देखने को मिलता है । जैसे कि कहीं - कहीं मन्त्र का आध्यात्मिक अथवा दयानन्दीय व्याख्यान नहीं दिया है अथवा उसको देने में विपर्यय कर दिया गया है । भाष्य का सम्पादन करते समय उस क्रम को ज्यों का त्यों रहने दिया गया है । हम यहाँ पूरे भाष्य को इन्हीं चार विभागों में बाँट कर प्रथमतः याज्ञिक प्रक्रिया के, ततः शतपथ ब्राह्मण के, तब आध्यात्मिक प्रक्रिया के और अन्ततः स्वामी दयानन्द के व्याख्यान की समालोचना के प्रसंग में आये विशेष अवधेय प्रसंगों के निष्कर्ष को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं । अग्निचयन जिस याग में विशेष विधान से इष्टकाओं ( ईटों ) को जमाकर चिति बनाई जाती है, वह अग्निचयन याग है | इस याग में आहवनीय- स्थानीय उत्तरवेदि न बना कर तत्स्थानीय चिति बनाई जाती है । अग्निचयन के मन्त्र माध्यन्दिन संहिता के ११ से १८ अध्याय पर्यन्त उपलब्ध हैं, किन्तु इस अध्याय में ११-१५ अध्याय तक के विषयों का ही विवरण दिया जा रहा है । इन अध्यायों में क्रमशः उखा - संभरण उखा - धारण और प्रथम से लेकर पंचम चिति तक के टोपधान के मन्त्र वर्णित हैं । प्रथम चिति के द्रष्टा प्रजापति, द्वितीय के देवगण, तृतीय के इन्द्राग्नी और विश्वकर्मा, चतुर्थ के ऋषिगण और पंचम चिति के द्रष्टा परमेष्ठी हैं । यतः प्रथम चिति के द्रष्टा प्रजापति हैं, अतः भाष्यकार ने प्रथमतः यहाँ शतपथ ब्राह्मण के षष्ठ काण्ड के प्रथम तीन अध्यायों में वर्णित प्रजापतिकृत शुष्क और आर्द्र मृत्तिका, सिकता, शर्करा, अश्म, लोह, सुवर्ण, ओषधि और वनस्पति की सृष्टि का वर्णन किया है । हम आगे देखेंगे कि ये पदार्थं चयन याग के मुख्य उपादान हैं । अग्नि पद से इस प्रकरण में इष्टकाओं से बनाये गये अग्नि के आधार स्थान ' स्थण्डिल का १. अमरकोश ( २।७।१८ ) में यज्ञ के लिये परिष्कृत की गई भूमि के अर्थ में स्थण्डिल और चत्वर शब्द प्रयुक्त हैं । चत्वर चबूतरे को कहते हैं | ' सती माई का चौरा ' यहाँ चौरा शब्द चत्वर के अर्थ में प्रयुक्त है । इस तरह से यज्ञ - याग आदि के लिये परिष्कृत की गई भूमि ही स्थण्डिल है । अभिनवगुप्त ने बाह्य पूजा के प्रसंग में मण्डल, स्थण्डिल, पट, अक्षसूत्र, पुस्तक, लिंग, तूर, पट, पुस्त, प्रतिमा और मूर्ति - इन ११ स्थानों का विधान बताया है ( तन्त्रालोक, ६।२-४ ) । यहाँ जयरथ ने स्थण्डिल का अर्थ याग के लिये परिगृहीत भूप्रदेश तूर का अर्थ पात्र आदि में उत्कीर्ण आधारविशेष, पुस्त का अर्थ लेप आदि से बनाई गई आकृति और मूर्ति का अर्थ गुरु आदि की आकृति किया है । स्पष्ट है कि प्रतिमा शब्द से यहाँ देवमूर्ति का तथा मूर्ति शब्द से गुरु आदि को प्रतिकृति का ग्रहण किया गया है । इन स्थानों में अपने इष्टदेव का अर्चन ही याग है । यज्ञ शब्द होम या हवन का वाचक है । इसमें प्रधानतया अग्नि में आहुति दी जाती है ।

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( ७ ) ग्रहण किया जाता है । चयन याग की प्रक्रिया को बताते हुए यहाँ संक्षेप में उखा - संभरण की विधि भी वर्णित है जौर प्रसंगवश बताया गया है कि यजुर्वेद में पठित छन्दोबद्ध ऋचाओं को ' छत्रिन्याय से यजुः शब्द से ही अभिहित किया जाता है । हम यहाँ अध्याय विभाग से इन सभी विषयों का भाष्य को पद्धति से निरूपण करने जा रहे हैं । एकादश अध्याय: उखा - सम्भरण अग्नि को रखने के लिये मिट्टी की बनी मंजूषा को उखा कहते हैं । इसका विधिपूर्वक निर्माण ही उखा सम्भरण है, शब्द से कहा जाता है । एकादश अध्याय में यह विधि मन्त्रों के साथ वर्णित है । जो व्यक्ति चयन याग करना चाहता पाँच वह पहले फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा के दिन पौर्णमासेष्टि करके पुरुष, अश्व, गाय, अवि ( भेड़ ) और अज - इन करने के पशुओं का आलभन कर उनके सिर पर घृत का लेप कर आगे बताई गई विधि से इसका प्रथम चिति जल पर में उपधान छोड़ देता है । लिये किसी सुरक्षित स्थान में रख देता है । तब इनके घड़ों और यज्ञशेष सामग्री को तालाब के इसी तालाब से वह उखा और इष्टकाओं के निर्माण के लिये मिट्टी और जल भी ले लेता है । तब फाल्गुन कृष्ण अष्टमी के दिन उखा- सम्भरण किया जाता है । इसके लिये आहवनोयाग्नि और दक्षिणाग्नि को स्थापना कर आहवनीयाग्नि की पूर्व दिशा में पहले से बनाये हुए चतुष्कोण गर्त में तालाब से लाई मिट्टी का एक पिण्ड बनाकर रखा जाता है, इस मृत्पिण्ड दक्षिण में अश्व, गर्दभ और आहवनीयाग्नि के बीच में वल्मीक ( बांबी ) की मिट्टी रखी जाती है । आहवनीय स्थान से और अज के सिरों को पूर्वाभिमुख मूंज की रस्सी से बाँधकर रखा जाता है । आहवनीय स्थान से उत्तर दिशा में बाँस की बनी हुई दोनों तरफ से तीखी अभि को स्थापित किया जाता है । यह अभि सुवर्ण की बनी हुई भी हो सकती है । तब गार्हपत्य अग्नि में घृत का संस्कार कर जुहू और ख़ुवा का संमार्जन कर खुवा में आठ बार घृत लेकर आहवनीय अग्नि में परिस्तरण और समिदाधान पूर्वक अध्वर्यु निरन्तर आहुतियाँ देता है । आहुति देते समय ' युञ्जान: ' ( ११।१ - ८ ) इत्यादि आठ मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है । इन मन्त्रों में सविता देवता की स्तुति की गई है । इन मन्त्रों का अर्थ यहाँ ग्रन्थ में हो दे दिया गया है । यहाँ स्मरण रखने की बात यह है कि जो मन्त्र जिस कार्य में विनयुक्त है, उस विधि विधि के में अनुष्ठान के समय उस मन्त्र का उच्चारण आवश्यक है । मन्त्र उस विधि का स्मारक माना जाता है । ऐसा करने से किसी प्रकार के विपर्यय की सम्भावना नहीं रह जाती । प्रस्तुत अध्याय की प्रथम आठ कण्डिकाओं से सविता देवता के निमित्त आहुति समर्पित करने के बाद अध्वर्यु ९ -१० कण्डिकाओं से बाँस या सुवर्ण की बनी अभ्रि को हाथ में लेता है और ११ वीं कण्डिका से उसे अभिमन्त्रित करता है । बाँस अथवा सोने से बनी दोनों तरफ से तीखी यह अभ्रि यज्ञीय कार्य के लिये गर्त ( गड्ढा ) के खनन में विनियुक्त है । इसके बाद की तीन ( १२-१४ ) कण्डिकाओं से अध्वर्यु उस अभ्रि को हाथ में लिये हुए ही एक - एक कण्डिका का उच्चारण करता हुआ क्रमशः अश्व, गर्दभ और अज का तृण से स्पर्श करता है और आगे के दो ( १५-१६ की ओर ) मन्त्रों से एक - एक कर इनका स्पर्श किये बिना ही हाथ से मारने का डर दिखा कर इनको पूर्व दिशा हाँ देता है । १. ग्रीष्म अथवा वर्षा ऋतु में अनेक मनुष्य जब एक साथ चलते हैं, तो कुछ लोगों के हाथ में छतरी रहती है, कुछ बिना छाते के ही होते हैं । इन सबके लिये ' छत्रिणो यान्ति ' यह औपचारिक प्रयोग किया जाता है । ठीक उसी तरह से यजुर्वेद में यजुर्मंन्त्रों के साथ ऋचाएँ भी पठित हैं । यजुमन्त्रों के साथ पठित इन ऋचाओं को भी उसी पद्धति से ' यजुष ' शब्द से ही अभिहित किया जाता है ।

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( ८ ) इतना कार्य कर लेने के बाद ' वल्मीकवपा, अर्थात् बाँबी के ऊपरी हिस्से की छिद्र वाली मिट्टी को लेकर, जिसे कि पहले से ही मृत्पिण्ड और आहवनीय स्थान के बीच में रखा हुआ है, उसके छिद्रों में से मृत्पिण्ड का निरीक्षण करता है | ऐसा करते समय ' अन्वग्नि ' ( ११।१७ ) इत्यादि मन्त्र का उच्चारण किया जाता । तब ' आगत्य ' ( ११।१८ ) इत्यादि मन्त्र से अश्व का अभिमन्त्रण कर ' आक्रम्य ' ( ११ / १ ९ ) इत्यादि मन्त्र से मृत्पिण्ड के ऊपर अश्व के बायें पैर को रखा जाता है । तब ' द्यौस्ते ' ( ११।२० ) कण्डिका को पढ़ते हुए अध्वर्यु अपना दाहिना हाथ अश्व की पीठ पर रखता है | इस विधि को यहाँ उन्मर्शन ' नाम दिया गया है । इसके बाद ' उत्क्राम ' ( ११ / २१ ) मन्त्र से उसको मृत्पिण्ड से अलग कर देता है और ' उदक्रमीत् ' ( ११/२२ ) मन्त्र से अश्व को पुनः अभिमन्त्रित कर रासभ और अज के साथ खड़ा देता है । अब अध्वर्यु मृत्पिण्ड के समीप बैठकर ' आ त्वा जिधर्मि ' ( ११।२३-२४ ) इत्यादि दो मन्त्रों से मृत्पिण्ड पर बने अश्व-पद पर दो आहुतियाँ देता है और ' परि वाजपतिः ' ( ११।२५-२७ ) इत्यादि तीन कण्डिकाओं का पाठ करता हुआ अनि से मृत्पिण्ड पर तीन रेखायें खींचता है । तब अत्रि से ही ' देवस्य त्वा ' ( १११२८ ) मन्त्र से मृत्पिण्ड के चारों तरफ की भूमि को खोदता है और ' अपां पृष्ठम् ' ( ११।२ ९ ) मन्त्र से मृत्पिण्ड के उत्तर भाग में कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण ( पद्मपत्र ) बिछाता है | यहाँ शतपथ ब्राह्मण ( ६ | ४ | ११ ९ ) में कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण का उत्तराधरभाव पृथिवी और आकाश के दृष्टान्त से समझाया गया है । पुष्करपणं को स्वच्छ कर लेने के उपरान्त आगे के दो मन्त्रों से ( ११।३०-३१ ) कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण को छूकर ' पुरीष्योऽसि ' ( ११।३२ ) मन्त्र से मूलिण्ड का भी स्पर्श करता है और अपने दोनों हाथों से उसे उठाकर ' त्वामग्ने ' ( १११३२ - ३७ ) इत्यादि छः ऋचाओं से कृष्णाजिन पर बिछाये पुष्करपर्ण पर रख देता है । तब ' अपो देवीः ' ( १११३८ ) मन्त्र से मृत्पिण्ड के गर्त में जल डालता है और ' सं ते ' ( ११।३ ९ ) मन्त्र से उस गर्त में वायु प्रेरित करता है । इतना कर लेने के बाद अध्वर्यु ' सुजात: ' ( ११०४० ) मन्त्र से बिछाये गये कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण के चारों कोनों को पकड़ कर दोनों हाथों से ऊपर उठाते हुए ' उदुत्तिष्ठ ' ( ११ ४१ ) मन्त्र का उच्चारण करता है । तब चुपचाप अपने भी उठ खड़ा होता है और ' ऊर्ध्वं ऊषुण ' ( ११।४२ ) मन्त्र से दोनों हाथों को पूर्व दिशा की तरफ कर मृत्पिण्ड को उधर झुका देता है । इस तरह से अध्वर्यु उस मृत्पिण्ड को अपनी नाभि तक ले जाकर उसे हाथों में उठाये हुए ही क्रमशः अश्व, गर्दभ और अज को ' स जातः, स्थिरो भव, शिवो भव ' ( ११।४३ - ४५ ) इन तीन मन्त्रों से अभिमन्त्रित करता है और इनका स्पर्श किये बिना इनके ऊपर मृत्पिण्ड को उठाकर ' प्रेतु वाजी, वृषाग्निम्, ऋतं सत्यम् ( ११।४६-४७ ) इन at aurat ओं में स्थित तीन मन्त्रों का क्रमशः जप करता है । इतना कर लेने के उपरान्त वह देवकार्य एवं पितृकार्य से विमुख उच्छृङ्खल अनद्धापुरुष का निरीक्षण करता है । तब ' ओषधयः ' ( ११।४८ ) इस मन्त्र से उखा - संभरण के लिये ' आहवनीय स्थान की उत्तर दिशा में पाँच हाथ के गृह का निर्माण कर आच्छादित प्रदेश में उस मृत्पिण्ड को रख देता है । सायणाचार्य यहां ( ११।४७ ) उद्धनन कर्म का भी निर्देश करते हैं । मृत्पिण्ड को जिस स्थान पर रखा जाता है, वह कहीं उच्छिष्ट स्थल न हो, इस आशंका की निवृत्ति के लिये वहाँ की ऊपर की मिट्टी, घास आदि को साफ कर दिया जाता है । वैदिक परिभाषा में इसी को उद्धनन कहा जाता है । उद्धनन करने के बाद उस स्थान पर जल का छिड़काव कर वहाँ बालू बिछा कर और चारों तरफ से ढँक कर पूर्व दिशा की ओर द्वार बना दिया जाता है और वहीं मृत्पिण्डको ' ओषधय: ' ( ११ | ४८ ) मन्त्र से स्थापित किया जाता है । इतना करने के बाद अध्वर्यु कृष्णाजिन में मूंज की १. " वल्मीकस्योन्नतत्वेनाभिवृद्धोऽवयवो वपा " ( पृ ० २१ का भाष्य देखिये ) । २. " उन्मर्शनं नाम अश्वपृष्ठस्योपरि पाणिधारणम् " ( पृ ० २५ ) । ३. “ देवपितृकार्यविमुखमनद्धापुरुषम्, उच्छृङ्खलमिति यावत् " ( पृ ० ५ ९ ) ।

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( ९ ) रस्सी से बँधे हुए मृत्पिण्ड को वहाँ बिखेर देता है और ' वाजमा ' ( ११०४ ९ ) मन्त्र से अज के रोयों को लेकर उक्त तीनों पशुओं को ईशान दिशा की ओर हांक देता है । इतना सब कर लेने के बाद अध्वर्यु दक्षिणाग्नि में पलाश की छाल के साथ पकाये जल में से ऊपर के फेन को निकाल कर दूसरे पात्र में रख लेता है और उससे ' आपो हि ष्ठा ' ( ११ / ५० - ५२ ) इत्यादि तीन मन्त्रों का पाठ करते हुए लिण्ड का सेवन करता है । तब ' मित्रः संसृज्य ' ( ११।५३ ) मन्त्र से पूर्वगृहीत अज के लोगों को और ' रुद्राः संसृज्य ' ( ११।५४ ) मन्त्र से शर्करा, लोहचूर्ण और पाषाणचूर्ण को उस बिखरे हुए मृत्पिण्ड पर डाल कर ' संसृष्टाम् ' ( ११।५५-५७ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से इन सब वस्तुओं को मृत्पिण्ड के साथ भलीभाँति मिला देता है । अब इसी सामग्री से पहले यजमान की प्रथम परिणीता पत्नी ( महिषी ) बारह अंगुल की अषाढासंज्ञक इष्टका का निर्माण करती हैं और तब यजमान स्वयं ही उखा का निर्माण करता है । एकपशु पक्ष और पंचपशु पक्ष में उखा का परिमाण भिन्न - भिन्न होता है । एकपशु पक्ष में यह प्रादेशमात्र चतुरस्र और उतनी ही ऊँची होती है । पंचपशु पक्ष में पांच प्रादेश के नाप की चतुरस्र बनाई जाती है । ' वसवस्त्वा ' ( ११।५८ ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान उखातल को बनाता है और जल मिली मिट्टी के लेग से उसे चिकनी कर देता है । तब उद्धि ' की सहायता से उखा का निर्माण करता है । इस प्रकार बनी उखा की ऊँचाई भाग में मेखला बनाई जाती है । मेखला के ऊपर चारों दिशाओं में ' अदित्यै आकार बनाया जाता है । इस प्रकार उखा का निर्माण कर उसे भूमि पर इष्टकाओं का निर्माण भो यजमान हो करता है । को तीन हिस्सों में बांट कर ऊपर के तीसरे रास्नासि ( ११ / ५ ९ ) मन्त्र से स्तन का रख दिया जाता है । विश्वज्योति नामक तीन तब अध्र्यु ' वसवरत्वा ' ( ११/६० ) इत्यादि कण्डिका के सात यजुमंन्त्रों से दक्षिणाग्नि से जलाई गई अश्व की सात लीदों से उखा को धूपित करता है । इसके बाद ' अदितिष्ठा ' ( ११६१ ) इत्यादि यजुर्मन्त्रों से अषाढा, उखा और विश्वज्योति इष्टकाओं को पकाने के लिये अभ्रि से चौकोर गड्ढा खोदता है । इनको पकाने लायक पर्याप्त इन्धन उस गड्ढे में भर कर उन तीनों को एक - एक कर गड्ढे में रख उनके ऊपर भी इन्धन रख देता है और दक्षिणाग्नि से लाई अग्नि से उसे प्रज्वलित कर देता है । उखा आदि का पाक हो जाने पर दण्ड आदि से ऊपर के इन्धन में छिद्र बना कर उसमें से उखा को देखता हुआ ' वरूत्री ' ( १११६१ ) आदि तीन यजुमंन्त्रों का पाठ करता है । ' मित्रस्य ' ( ११/६२ ) मन्त्र से पालाश इन्धन का प्रक्षेप करता है और ' देवस्त्वा ' ( ११।६३ ) से पाकानन्तर भस्मीभूत इन्धन को हटा देता है । पहले अषाढा को निकाल कर उखा का मुँह ऊपर करता है । ' उत्थाय ' ( ११ ६४ ) प्रभृति मन्त्र से उखा को दोनों हाथों से ऊपर उठा कर गड्ढे के बाहर निकाल लेता । इसके बाद बिना मन्त्र का उच्चारण किये विश्वज्योति टाओं को बाहर निकालता है | अब ' वसवस्त्वा ' ( ११।६५ ) इत्यादि कण्डिका के चार यजुर्मंन्त्रों से उखा में चार बार बकरी का दूध भरता है । इस प्रकार उखा संभरण की विधि सम्पन्न होती है । इसके बाद अन्य इष्टकाओं का निर्माण कर पांच औद्ग्रमण संज्ञक आहुतियाँ दी जाती हैं । औद्ग्रभण होम के बाद कृष्णाजिन दीक्षा से लेकर दण्डोच्छ्रयण पर्यन्त कर्म का अनुष्ठान कर ईशानाभिमुख अध्वर्यु अथवा यजमान मुंजकुलाय . अथवा शणकुलाय को उखा में डाल कर उसे प्रदीप्त आहवनीय अग्नि में तपाता है । अग्नि के प्रज्वलित हो जाने पर ‘ द्र्वन्नः ' ( ११।७०-८२ ) इत्यादि तेरह मन्त्रों से उसमें घृताक्त प्रादेशप्रमाण तेरह समिधाओं की आहुतियाँ दी जाती हैं । पाँच समिधाएँ धमन, विकंकत उदुम्बर, अपरशुवृक्त्र वृक्ष अर्थात् ' दीमक आदि के लग जाने से और अपने आप १. " उद्धिशब्दो मृत्पिण्ड प्रदेशवाची " ( पृ ०७३ ) । २. " उपवापोऽवटे प्रक्षेपः, उद्वापस्तत ऊर्ध्वं नयनम् " ( पृ ० ८४ ) । • ३. “ कुमुको धमनः, धनुरुपादानभूतो वृक्षविशेषः " ( पृ ० ९ ५ ) । ४. “ उपजिह्निका उपदीपका " ( पृ ० १०० ), " वम्रशब्दः पिपीलिकासदृशं क्षुद्रजीवमाचष्टे ” ( पृ ० १०० ) ।