वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20

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( १० ) नवेग आदि से गिरे वृक्षों की होती हैं तथा बाकी बची आठ समिधाएँ पलाश की ली जाती हैं । उक्त तेरह ऋचाओं में से बारहवीं क्षत्रिय यजमान के लिये और तेरहवीं पुरोहित यजमान के लिये दी जाती हैं । अन्त में अध्वर्यु ' अन्नपतेऽन्नस्य ' ( ११।८३ ) मन्त्र से यजमान को व्रतनिर्वाहार्थं दूध देता है । उस समय यजमान उख्य अग्नि में समिधा का आधान करता है । द्वादश अध्याय: उखा - धारण ग्यारहवें अध्याय की उखा सम्भरण की विधि का निरूपण करने के बाद अब बारहवें अध्याय की उखा धारण की विधि बताई जा रही है । शतपथ ब्राह्मण ( ६ | ७ | १ | २३ ) में उखा के विषय में कहा गया है कि स्थाली ही उखा का नाम धारण कर लेती है । उखा, कुम्भी, स्थाली - ये पर्यायवाची शब्द है । तीनों में मिलकर छः अक्षर होते हैं और इस प्रकार ये छ: ऋतुओं के बोधक हैं । छः ऋतुओं से ही संवत्सर बनता है । यहाँ सर्वप्रथम यजमान अपने कण्ठ में सोने के गोल २१ दानों के हार को ' दुशानो रुक्म ' ( १२1१ ) मन्त्र से धारण करता है । इसमें शुक्ल और कृष्ण रोम वाले कृष्ण मृगचर्म के टुकड़े शणसूत्र से गुंथे रहते हैं । यहाँ शतपथ ब्राह्मण ( ६।७।१।९ -११ ) में बताया गया है कि सुवर्ण को नाभि से ऊपर के अंग में ही धारण किया जाता । तब यजमान गरम उखा को दो गोल इण्ड्वाओं ( ईंडुणी - - गेडुरी ) से ' नकोषासा ' ( १२/२ ) मन्त्र का उच्चारण करता हुआ पकड़ता है । यहाँ शतपथ ब्राह्मण उखा की सूर्य के रूप में और आदित्य के आगे - पीछे चलते रात - दिन की इण्ड्वाओं के रूप में कल्पना की गई है । इसी मन्त्र के उत्तरार्ध से आहवनीय अग्नि के ऊपर स्थित उखा को उठा कर अध्वर्यु आसन्दी की तरफ ले जाता है और उद्गाता आहवनीय की पूर्व दिशा में भूमि पर स्थापित ३ प्रादेशप्रमाण ( १० अंगुल ) चार पायों वाली औदुम्बरी आसन्दी ( प्रतिष्ठा ) पर अरत्नि प्रमाण मूंज की रस्सी से बने चार कोनों वाले शिवय ( सिकहर ) पर उस उखा को रखता है । यहाँ दोनों गेंडुरियों में सन की डोरी बाँध कर सिकहर बना दिया जाता है और इसकी डोरियों में मिट्टी पोत दी जाती है । अन्यथा आग की गरमी से डोरी जल सकती है । तब छः " रस्सियों के सहारे लटक रहे उस शिक्य- पाश को यजमान ' विश्वा रूपाणि ( १२/३ ) मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अपने कण्ठ में लटकाता है । भाष्यकार के अनुसार ग्रामीण भाषा में शिक्य के आधार काष्ठ को ' बिठयी ' कहा जाता है । संस्कृत में १. " रुक्म आभरणविशेष: ' ( पृ ० १११ ) । २. " इण्ड्वे इति ततोखाधारण साधनभूती परिमण्डलो पदार्थविशेषौ " ( पृ ० ११५ ) । ३. फैलाये गये अँगूठे और तर्जनी के मध्य भाग के प्रमाण को प्रादेश कहते हैं । यह दस अंगुल के बराबर होता है । देखिये अमरकोश – “ प्रादेशतालगोकर्णास्तर्जन्यादियुते तते " ( २६।८३ ) । ४. कोहनी से कनिष्ठा ( कानी ) अंगुली के छोर तक का माप, लम्बाई नापने का पैमाना | देखिये अमरकोश ----" अरत्निस्तु निष्कनिष्ठेन मुष्टिना " ( २२६।८६ ) । ५. यहाँ भाष्य में प्रतिष्ठा, आसञ्जन और उद्याम शब्द प्रयुक्त हैं । इनके अर्थ वहाँ इस तरह से बताये गये हैं - शिक्यस्य अधस्ताद्वर्ती उद्यामाधारः पाशरचितोऽवयवविशेषो ग्रामीणभाषायां ' बिठयी ' इति । स एवात्र प्रतिष्ठाशब्देनोक्तः । आसज्यते बध्यतेऽस्मिन्नित्यासञ्जनं शिक्याधारः काष्ठविशेषः " ( पृ ० ११० ), " उद्यामशब्देन शिक्यदामान्युच्यन्ते " ( पृ ० ११८ ) । इसी मन्त्र ( १२/३ ) के भाष्य में उख्य अग्नि की प्रशंसा के प्रसंग में उखा के विषय में यह कहा गया है - " सा स्थाली यदुखा नाम धृतवती । उखा, कुम्भी, स्थाली - इति तस्या नाम । मिलित्वा षडक्षराणि -भवन्ति । षड् वा ऋतवः । षड् ऋतवः संवत्सर इति " ( पृ ० ११ ९ ) ।

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( ११ ) इसके लिये प्रतिष्ठा शब्द है । तब ' सुपर्णोऽसि ' ( १२1४ ) मन्त्र से दोनों हाथों से शिक्य के साथ उख्य अग्नि को मृत्पिण्ड के समान उठाये हुए यजमान पूर्व दिशा की ओर चलता है । वह त्रिविक्रम विष्णु की तरह ' विष्णोः क्रमोऽसि ' ( १२/५ कण्डिका में स्थित तीन यजुमंन्त्रों से तीन डग भरता है । ऐसा करते समय दाहिने पैर को पहले उठाता है और उख्य अग्नि को प्रत्येक पदक्रम के समय नाभि से ऊपर रखता है । तब मृत्पिण्ड के समान ही ' अक्रन्ददग्निः ' ( १२ / ६ ) मन्त्र से ऊबाहु यजमान उख्याग्नि को पूर्व दिशा की ओर कुछ झुकाता है । फिर आगे के चार मन्त्रों ( १२/७ - १० ) से चार बार में उस उख्याग्नि को क्रमशः धीरे - धीरे नीचे उतारता है । उसे नाभि तक उतार लेने के बाद ' आ त्वाहार्षम् ' ( १ २ ।११ ) मन्त्र से अभिमन्त्रित करता है । तब ' उदुत्तमम् ' ( १२।१२ ) मन्त्र से शिक्यपाश और रुक्मपाश को उखा के ऊपर से उतार लेता है और ' अग्रे बृहन् ' ( १२।१३ ) मन्त्र से बाहुओं को ऊपर उठाये आग्नेय दिशा की ओर उख्याग्नि को ले जाता है । वहाँ ' हंसः शुचिषद् ' ( १२।१४ ) मन्त्र से अग्नि को उतार कर आसन्दी पर रख देता है । तब यजमान ' सीद त्वम् ' ( १२ / १५-१७ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से अग्नि का उपस्थान करता है । इसके बाद एकादश ऋचा वाले ( १२।१८ - ०८ ) वात्सप्र अनुवाक से भी अग्नि का उपस्थान किया जाता है । यहाँ कुछ आचार्य आसन्दी के ऊपर स्थित अग्नि का ११ ऋचाओं से तथा अन्य आचार्यं १२ ऋचाओं ( १२ / १८-२९ ) से उपस्थान ( प्रार्थना ) का विधान करते हैं । अग्नि का उपस्थान करने के उपरान्त ' वनीवाहन ' नामक कर्म का अनुष्ठान किया जाता है । उख्याग्नि को उत्तर दिशा में गाड़ी की ईपा ( फड़ ) को पूर्वाभिमुख कर यजमान वहाँ स्थापित उपाग्नि में बनीवाहन नामक समिधा का ' समिधाऽग्निम् ' ( १२।३० ) मन्त्र से आधान करता है । इस पूरे कर्म का अनुष्ठान यजमान को ही करना है, अध्वर्यु को नहीं | तब ईषादण्ड के दक्षिण में खड़ा यजमान आसन्दी सहित उख्याग्नि को उठा कर ' उदुत्वा ' ( १२।३१ ) मन्त्र से पदण्ड के पूर्व भाग में स्थापित कर देता है । इसके बाद गाहत्य के पश्चिम भाग में स्थित गाड़ी में चुपचाप बैलों को जोत कर ' प्रेग्ने ' ( १२/३२ ) मन्त्र से पहले प्राची दिशा में चल कर तब अभीष्ट स्थान की ओर प्रस्थान करता है । चलते समय अक्ष ( पहियों में लगी धुरी ) के आवाज करने पर ' अक्रन्ददग्निः ' ( १२।३३ ) मन्त्र का पाठ किया जाता है । इसके बाद उत्तर दिशा में पाँच भूसंस्कारों से संस्कृत स्थान पर अग्नि को शकट से उतार कर स्थापित किया जाता है और ' प्र प्रायम् ' ( १२।३४ ) मन्त्र से उख्य अग्नि में समिधा दी जाती है । इस प्रकार वनीवाहन कर्म की समाप्ति के बाद तालाब आदि के पास जाकर यजमान पलाश आदि के पत्तों से सायंकाल और प्रातःकाल उखा के पास से हटाई गई भस्म को ' आपो देवी: ' ( १२/३५ ) मन्त्र से जल में प्रवाहित कर देता है । तब दुबारा दो मन्त्रों ( १२।३६-३७ ) से भस्माभ्यवहरण करता है । आगे की चार ऋचाओं ( १२ / ३८-४१ ) से जल में प्रक्षिप्त भस्म में से थोड़ी भस्म अनामिका अंगुलि से ग्रहण करता है । तालाब से वापस आकर यजमान नमक से गृहीत भस्म को बिना किसी मन्त्र का उच्चारण किये उखा में डाल कर ' बोधा में ' ( १२।४२-४३ ) इत्यादि दो मन्त्रों से अग्नि का उपस्थान करता है । तब प्रायश्चित्त के रूप में समिधा को ही सुका मान कर उसे घी में डुबो कर उख्याग्नि में घृत की आहुति देता है । इसे प्रायश्चित्ति कर्म कहा जाता है । घृत की आहुति देने के उपरान्त ' पुनस्त्वा ' ( १२१४४ ) मन्त्र से उस समिधा की भी उख्याग्नि में आहुति दे दी जाती है । इसके उपरान्त गार्हपत्य अग्नि का चयन किया जाता है । पहले पलाश की शाखा से गार्हपत्य स्थान की चारों दिशाओं का ' अपेत वीत ' ( १२२४५ ) कण्डिका के चार यजुर्मन्त्रों व्युहन ( संमार्जन ) किया जाता है । यहाँ गार्हपत्य शब्द से शालाद्वार्यं का ग्रहण किया जाता है । चिति का स्थान भी गार्हपत्य शब्द से ही उक्त है । इस स्थान में गिरे पड़े तृण - पत्र आदि को बुहार देना ही बंदिक भाषा में व्यूहन अथवा व्युद्वहन तथा लौकिक भाषा में संमार्जन कहा जाता है ।

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१ ( १२ ) . जिस पलाश की शाखा से व्युहन किया गया, उसे उत्तर दिशा की ओर फेंक दिया जाता है और गार्हपत्य के चितिस्थान में ऊपर भूमि से लाई गई मिट्टी ' संज्ञानमसि ' ( १२।४६ ) मन्त्र से डाली जाती है । जिस भूमि को सूंघकर पशु चाटने लगे, समझ लेना चाहिये कि यह ऊषर भूमि है । इसमें फसल नहीं उगती । अध्वर्यु इस मिट्टी से बनाये मण्डल की दक्षिण दिशा में उत्तराभिमुख बैठ कर मण्डल के बीच में अर्धबृहती संज्ञक छ: अंगुल ऊँची, बारह् अँगुल चौड़ी और चौबीस अँगुल लम्बी चार इष्टकाओं को दक्षिण - उत्तर दिशाओं की ओर ' अयं सो ' ( १२१४७-५० ) इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण करते हुए रखता है । तब अध्वर्यु अर्धबृहती इष्टकाओं की परिक्रमा कर उत्तर दिशा में जाकर दक्षिणाभिमुख हो पश्चिम में पश्चिमाभिमुख पादप्रमाण पद्या नामक दो इष्टकाओं का दो मन्त्रों ( ११५१-५२ ) से दक्षिण और उत्तर दिशाओं में उपधान करता है । तब उत्तर दिशा से घूम कर दक्षिण दिशा में आ जाता है और उत्तराभिमुख हो पूर्व में तिरछी ( तिरश्ची = वक्रा ) इष्टकाओं को ' चिदसि ' ( १२/५३ ) कण्डिका के दो यजुर्मन्त्रों से उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर रखता है । इसके बाद तीन लोकम्पृणा इष्टकाओं का चुपचाप तथा बाकी दस का ' लोकं पूण ' ( १२।५४ ) इत्यादि मन्त्र के उच्चारण के साथ उपधान किया जाता है अथवा पहले दो इष्टकाओं का, तब दस तथा अन्त में एक लोकम्पूणा इष्टका का उपधान करते समय तीन बार इस मन्त्र की आवृत्ति की जाती है । इस तरह से गार्हपत्याग्नि की इक्कीस इष्टकाओं का उपधान पूरा हो जाता है । इष्टकाओं के उपधान के समय साइन और सूददोहसाभिवदन नामक दो क्रियाओं को अवश्य तब करना चाहिये । ' चिदसि ' ( १२१५३ ) इत्यादि मन्त्र से इष्टकाओं को स्थापित किया जाता है । यहीं सादन कर्म है । इष्टकाओं के ऊपर हाथ रख कर ' ता अस्य ' ( १२।५५ ) इत्यादि मन्त्र से उनको दृढ़ता से स्थिर किया जाता है हैं, । दबाया जाता है । इसे ही सूददोहसाभिवदन कहते हैं । ये दोनों संस्कार प्रत्येक इष्टकाओं के अनिवार्य रूप से किये जाते इसके बाद चात्वाल प्रदेश से मिट्टी लाकर उसे ' इन्द्रं विश्वा ( १२।५६ ) मन्त्र से गार्हपत्य चिति के ऊपर के बराबर डाला जाता है । इसकी पुरीष संज्ञा है । इस पुरीष के निवपन द्वारा गार्हपत्य चिति को यहाँ स्थापित इष्टकाओं को स्थापित किया ऊँचा कर ' समितम् ' ( १२।५०-६० ) इत्यादि चार मन्त्रों से गार्हपत्य चिति के बीच में उख्याग्नि से अलग कर जाता है । तब उस खाली उखा में ऊपर तक सिकता ( बालू ) भर दी जाती है और उसको शिक्य ऊपर ' मातेव ' ( १२ / ६१ ) मन्त्र से अत्रि के समान स्थापित उपाग्नि के उत्तर में अरलिमात्र दूर गार्हपत्य चिति के रख कर सिकता से भरी हुई उखा पर बिना ही मन्त्रोचार के चुपचाप दूध का सेवन किया जाता है । तब अध्वर्यु ) इत्यादि नैर्ऋत्य दिशा में राजसूय प्रकरण में हविष्यासन्न होम में प्रदर्शित स्थल पर जाकर ' असुन्वन्तम् ' ( १२।६२-६४ को तीन ऋचाओं से निर्ऋति देवता वाली, पकाते समय काली पड़ी, तुषों से पकाई गई लक्षणहीन पादमात्री दिशा में तीन स्थापित इष्टकाओं करता स्वयं दक्षिणाभिमुख होकर पहली इष्टका को उत्तर दिशा में और अन्य दो इष्टकाओं को दक्षिण ' यं ते ’ है । इन इष्टकाओं के उपस्पर्शन, सादन और सुददोहसाभिवदन नामक संस्कार नहीं किये जाते । इसके उपरान्त और ( १२।६५ ) इत्यादि मन्त्र से शिक्य ( सिकहर ), शण से बना रुक्मपाश, दोनों इंडवाएं ( ईंडुणी = गेंडुरी के बीच ) में आसन्दी – इन सबको नैर्ऋत्य इष्टकाओं के पीछे फेंक दिया जाता है । तब आत्मा और नैर्ऋती इष्टकाओं होते हैं चुपचाप जल छिड़क कर ब्रह्मा यजमान और अध्वर्यु ' नमः ' ( १२/६५ ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए उठ खड़े और वहाँ से बिना उस ओर देखे ' निवेशन: ' ( १२/६६ ) मन्त्र का पाठ करते हुए यज्ञशाला में आ जाते हैं । १. “ उपहितानामिष्टकानां स्थिरीकरणं सादनम्, उपहितानामिष्टकानामुपरि हस्तं निधाय ' अस्य ' इति मन्त्रपठनं सुददोहसाभि- हस्तं वदनम् ” ( पृ ० १६७ ) । " उपहितानामिष्टकानां ' चिदसि ' इति मन्त्रेण स्थिरीकरणं सादनम् इष्टकानामुपरि निधाय ' ता अस्य ' इति कण्डिकापठनं सूददोहसाभिवदनम् " ( पृ ० १७४- १७५, १८० ) । २. “ इष्टका सन्धिषु छिद्रपूरणार्थाः पांसवः पुरीषम् " ( पृ ० १८२ ) | पहले ( ११।७२ ) इस शब्द की प्रकरण के अनुसार भिन्न व्याख्या की गई है ---- - " पुरीषशब्देन बहुपुरीषाः पशव उच्यन्ते " ( पृ ० ९ ८ ) ।

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( १३ ) है और ' सीरा अब अध्वर्यु शालाद्वायं अर्थात् यज्ञशाला के द्वार पर प्रज्वलित गार्हपत्य पास अग्नि पश्चिमाभिमुख के पास जाता खड़ा हो छः, दस युञ्जन्ति ' ( १२।६७-६८ ) इत्यादि दो मन्त्रों से चित्याग्नि की दक्षिण श्रोणि के है । यहाँ छः बैल छः ऋतुओं से, अथवा चौबीस बैलों से जुते हुए उदुम्बर काष्ठ के बने हल को ' अभिमन्त्रित करता की सम्पत्ति के द्योतक हैं । इसके बाद हल के बारह बैल बारह मासों से और चौबीस बैल चौबीस पक्षों से संयुक्त संवत्सर है । बैल अग्निशाला से बाहर आगे लम्बी मूंज की रस्सी बांध कर उसको बैलों के कन्धों पर रखे जुए से कस दिया नियुक्त जाता हलवाहे उठाते हैं । चिति स्थान में ही रहते हैं । यज्ञस्थल का कर्षण करते समय उस हल को अध्वर्यु के द्वारा ' शुनम् ' ( १२ / ६ ९ -७५२ ) इत्यादि चार परिश्रित् के पास चार ऋत्विक् दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और पूर्व दिशा के में पूरा हो जाने के बाद अध्वर्यु बैलों को मन्त्रों का उच्चारण करते हुए चार रेखाएं खींचते हैं । कर्षण संस्कार उसी तरह हाँक देता है, जैसे कि पूर्व प्रकरण में हल से अलग कर ईशान दिशा की ओर ' विमुच्यध्वम् ' ( १२।७३ ) मन्त्र से अज, अश्व आदि पशुओं को हाँक दिया गया था । बाद में सुत्या कर्म की समाप्ति के अवसर पर यजमान इन बैलों को हल के साथ अध्वर्यु को दान कर देता है । पर स्रुवा को अब संस्कृत जुहू को पाँच बार घृत से भर कर कृष्ट भूमि की आत्मा के मध्य में स्थापित शाखाओं कुशस्तम्ब वाली कुशा को ऊपर कर ' सजू. ' ( १२ । ७४ ) मन्त्र से आहुति देता है । एक इत्यादि जड़ पन्द्रह से निकली ऋचाओं अनेक से चमसपात्र से सर्वोषधियों का कुशस्तम्ब कहा जाता है । तब ' या ओषधीः ' ( १२ / ७५-८९ ) पाठ किया जाता है । धान्यवपन भी वपन और जलसेचन किया जाता है । एक - एक चमस के साथ एक - एक ऋचा का है । ' या ओषधीः ' इत्यादि चमस से ही किया जाता है, खाली हाथ से नहीं । चमस उदुम्बर काष्ठ का बनाया जाता ओषधियों की स्तुति की जाती है । पन्द्रह ऋचाओं के बाद की ' मुञ्चन्तु ' ( १२।९ ० - १०१ ) इत्यादि बारह ऋचाओं किया से जाता है । वस्तुतः इन मन्त्रों में ये बारह मन्त्र अनारभ्याधीत कहलाते हैं । लिंग के अनुसार ही इनका विनियोग वपन, जलसेचन एवं स्तवन करने के ओषधियों की स्तुति की गई है । इस प्रकार इन सत्ताईस मन्त्रों से ओषधियों का चारों दिशाओं में स्पय की सहायता से बाद अव्र्यु ' मा मा हिंसी: ' ( १२१०२-१०५ ) इत्यादि चार मन्त्रों से पूर्व आदि ' अग्ने तव ' ( १२११०६१-११ ) वेदि के बाहर अनूकान्तों में पद्याप्रमाण चार लोकेष्टकाओं को स्थापित करता है । को फिर छोड़ कर चिति के मध्य भाग को . इत्यादि छः ऋचाओं से उत्तर वेदि पर मिकता ( बालू ) बिछा कर पक्ष और पुच्छ चिति के मध्य भाग, आत्मा पूरी तरह से ढंक देता है और ' आप्यायस्व ' ( १२१११२-११३ ) इत्यादि दो ऋचाओं ११४ से ) का विनियोग कात्यायन पर बिछाई गई सिकता का स्पर्श करता है । यहाँ के तीसरे मन्त्र ' आप्यायस्व ' ( १२ / है । इस समय पूर्व दिशा में श्वेत श्रौतसूत्र में वर्णित नहीं है । इस प्रकार यहाँ उखाधारण की प्रक्रिया समाप्त होती उपस्थिति में अग्नि की स्तुति के अश्व,, उसके अभाव में अश्वेत अश्व और इन दोनों के अभाव में अनड्वान् ( बैल ) को स्तुति करता है । लिये प्रेरित होता ' आ ' ते वत्सः ' ( १२।११५ ११७ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से अग्नि की मन्त्रमुच्चारयन्नेव मन्त्रार्थत्वेन १. " अभिमन्त्रणं नाम मन्त्रेण स्मर्यमाणस्यार्थस्य ईक्षणपूर्वकमनुसन्धानम् । उक्तं हि – “ । " ( पृ ० २०० ) । संस्मरेत् । सेक्षणं तन्मना भूत्वा स्यादेतदनुमन्त्रणम् ॥ एतदेवाभिमन्त्रणलक्षणं चेक्षणावधि ( पृ ० २० ९ ), २. “ एकमूलोऽनेकशाखः स्तम्ब इत्युच्यते । दर्भाणां स्तम्बो दर्भस्तम्बः " ( पृ ० २७५ ) । " काण्डशब्दः स्तम्बवाची " पादभागा, पादोनपद्या, बृहती, ३. अध्यर्धा, अर्धपद्या, अर्धपादभागा, अर्धबृहती, अर्धोत्सेधा, पचा, चतुर्भागा, जंघामात्री, २ ९९ -३०१ ) में देखिये । वा आदि इष्टकाओं के परिमाण का सचित्र विवरण " कात्यायन यज्ञपद्धति विमर्श " ( पृ ०

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( १४ ) त्रयोदश अध्याय: प्रथम चित्याधान अब बारहवें अध्याय में उखाधारण, गार्हपत्यचयन, क्षेत्रकर्षण, औषधवपन आदि की विधियां बताई रही गई हैं । हैं यजमान । तेरहवें अध्याय में प्रथम चिति के उपधान से सम्बद्ध पुष्करपणं आदि के उपधान की प्रक्रिया बताई जा हो उत्तरवेदि के प्रोक्षण से पुरीषादि संभारनिवपनान्त कर्म का सम्पादन कर तदुपरान्त उत्तरवेदि के पीछे खड़ा ) का ' मयि गृह्णामि ' ( १३ | १ ) मन्त्र का जप करता है । इसके बाद अध्वर्यु कुशस्तम्ब के ऊपर पुष्करपणं ( कमलिनीपत्र पर उखासंभरण में बताई गई पद्धति से ' अपां पृष्ठमसि ' ( १३ ।२ ) मन्त्र से स्थापन शौर मार्जन करता है । उस पुष्करपर्ण पहले कण्ठ में पहने गये सौवर्णं स्वम ( स्वर्णाभूषण ) को ' ब्रह्म जज्ञानम् ' ( १३०३ ) मन्त्र का पाठ करते हुए पूर्वाभिमुख में अध्वर्यु मृत्पिण्ड के नीचे रखता है और ' हिरण्यगर्भः ' ( १३।४-५ ) आदि दो ऋचाओं से पूर्वाभिमुख हो उत्तान योग से स्थिति बनाई " सुवर्णमय पुरुष ( हिरण्यगर्भ ) की प्रतिमा को स्थापित करता है । द्वितीय मन्त्र में अन्य धातु के आकाश, गई इस सुवर्ण प्रतिमा को ' द्रप्स ' नाम दिया गया है । जब इसके लिये अग्नि में आहुति दी जाती है, तो का यह उपस्थान अन्तरिक्ष और पृथिवी J इन तीनों स्थानों में व्याप्त हो जाता है । इसके बाद यजमान उस स्वर्णप्रतिमा संस्कृत घृत करता हुआ ' नमो s स्तु ' ( १३।६-८ ) इत्यादि तीन ऋचाओं का पाठ करता है । अध्वर्यु पाँच चार बार और जुहू में पाँचवीं ऊर्ध्वं भर कर चिति के मध्य भाग में जाकर वहाँ स्थापित हिरण्यपुरुष के पास बैठ कर पूर्वादि एक - एक दिशा में ' कृणुष्व पाजः ' ( १३ ।९ - १३ ) इत्यादि पाँच मन्त्रों से प्रत्येक दिशा में हिरण्यपुरुष के ऊपर इनके आहुति देता है । प्रतिसर शब्द से यहाँ राक्षसों के नाशक अग्निदेवता वाले मन्त्रों का ग्रहण किया अगले जाता है दो । मन्त्रों अतिरिक्त यहाँ 3 श्रीपर्णी, औदुम्बरी आदि समिधाओं की भी आहुतियाँ दी जाती हैं । तब ( १३ । १४-१५ ) से उत्तर दिशा में दधि से भरे स्रुक् का उपधान किया जाता है । इसके बाद सुवर्णमय पुरुष के ऊपर पाषाणमयी सच्छिद्र स्वयमातृष्णा " नामक इष्टका का आधान ' धुवा ' ( १३।१६-१९ इत्यादि चार मन्त्रों से किया जाता है । पुरुष के प्रयत्न के बिना ही जिस पाषाण में छिद्र बन गये हों, उसे स्वयमातृष्णा कहा जाता है । इसके बाद अध्वर्यु उत्तराभिमुख हो स्वयमातृष्णा के ऊपर ' काण्डात् ' ( १३।२०- २१ ) इत्यादि दो मन्त्रों से दूर्वेष्टका का उपधान करता है । इष्टकाएँ तो मिट्टी की ही बनती हैं, तो भी यहाँ दूर्वा में इष्टका शब्द का प्रयोग गौण रूप से किया गया है । दूर्वा पशुओं की पुष्टि का सावन है, अतः गौण रूप से उसे भी पशु मान कर स्वयमातृष्णा के ऊपर उसका उपधान किया जाता है । इस दूर्वेष्टका के आगे द्वितीय पद्यालोक में ' यास्ते ' ( १३।२२-२३ ) इत्यादि दो ऋचाओं से द्वियजुः संज्ञक पद्याप्रमाण इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । इसके बाद विराट् स्वराट् आदि दो यजुमंन्त्रों ( १३ | २४ ) से द्वियजुः संज्ञक इष्टकाओं से अव्यवहित पूर्व भाग में रेतः सिग् १. " एष हिरण्यपुरुषः सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्यगर्भः । अपञ्चीकृतभूततत्कार्याभिमानी परमेश्वरो हिरण्यगर्भः " ( पृ ० २५५ ) । २. " राक्षसान् प्रति अस्त्ररूपेण सरन्ति गच्छन्तीति प्रतिसरा: " ' कृणुष्व पाजः ' ( १३४ ९ - १३ ) इत्याद्याः ( गञ्च ) मन्त्राः ” ( पृ ० २६१ ) । ' विन्यस्त मङ्गल महौषधिरीश्वरायाः स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणि: " ( ५।३३ ) इस किरातार्जुनीय के

श्लोक में वैवाहिक कङ्कण के लिये यह प्रयुक्त है । कोशग्रन्थों में अश्वों के कण्ठ में ओषधियुक्त प्रतिसर के बाँधने का

उल्लेख मिलता है । ३. " काश्मर्यः, काश्मरी, श्रीपर्णी, गम्भारिरिति समानार्थाः । कुम्भेर, खम्भारी इति लोके प्रसिद्धो वृक्षविशेषः " ( पृ ० २६५ ) । ४. इन्द्रस्य स्वकीयो रसः सानाय्यम् । वृत्रत्रधानन्तरमिन्द्रशरीरान्निर्गतस्य पृथिव्यामोषधिवीरुदात्मना परिणतस्य पशुभि -क्षणेनात्मन्याहृतस्येन्द्रसम्बन्धिनो वीर्यस्यैव पयोरूपेण परिणामात् तद्विकारभूतं दध्यपि परम्परया इन्द्रस्य स्वकीयो रसः ' ( पृ ० २६७ ) । ५. पुरुष प्रयत्नमन्तरेण स्वत एव छिद्रयुक्ता शर्करा क्षुद्रपाषाणविशेषः, सा स्वयमातृष्णा " ( पृ ० २६ ९ ) ।

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( १५ ) नामक दो पद्याप्रमाण इष्टकाओं का उपधान अनूक की उत्तर और दक्षिण दिशाओं में किया जाता है और इनके भी पूर्व भाग में ' प्रजापतिष्ट्रा ' ( १३।२४ ) इस यजुर्मंन्त्र से विश्वज्योति नामक प्रथम पद्याप्रमाण इष्टका का, जिसका कि निर्माण स्वयं यजमान ने किया है, उपधान अध्वर्यु उदङ्मुख होकर अनूक में करता है । इस विश्वज्योति इष्टका के सामने इसी से लगी हुई दो ऋतव्या पद्याप्रमाण इष्टकाओं को ' मधुश्च ' ( १३।२५ ) इत्यादि यजुर्मंन्त्र से अनूक की दोनों और स्थापित करता है । इसके बाद पत्नी द्वारा बनाई गई अषाढासंज्ञक पद्याप्रमाण इष्टका को ऋतव्या इष्टकाओं के आगे अनूक स्थान में ' अषाढासि ' ( १२/२६ ) मन्त्र से स्थापित किया जाता है । इस प्रकार इष्टकाओं का उपधान कर लेने के बाद ' मधुव्वाता ' ( १३।२७ - २ ९ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से कूर्म पर दधि, मधु और घृत का लेप किया जाता है । इसके बाद के ' अपां गम्भन् ' ( १३ / ३०-३२ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से अषाढा से दक्षिण दिशा में अरत्नि प्रमाण दूर स्थान में दो ' पद्यालोकों को छोड़ कर तीसरे पद्यालोक में पहले से स्थापित अवका ( शेवाल ) में पुरुष के सामने कूर्म का उपधान करता है । इन तीन ऋचाओं में से बीच की ' त्रीन् समुद्रान् ' ( १३।३१ ) ऋचा से कूर्म को हिलाया जाता है । तीसरी ऋचा के पाठ के साथ कूर्म का उपधान कर उसे अवका से ढँक दिया जाता है । स्वयमातृष्णा के उत्तर में एक अरत्नि - प्रमाण दूर स्थान में स्थित तृतीय पद्यालोक में उदुम्बर की लकड़ी से बने प्रादेशमात्र प्रमाण ऊखल और मुषल को ' विष्णोः कर्माणि ' ( १३/३३ ) मन्त्र से रखा जाता है । इसमें ऊखल चतुःस्रक्ति ( चौकोर ) और बीच में से सिकुड़ा हुआ रहता है । इसको उत्तर दिशा में और गोल मुषल को दक्षिण दिशा में स्थापित किया जाता है । यहाँ शतपथ ब्राह्मण में उदुम्बर और ' उलूखल शब्दों की प्रवृत्ति का निमित्त बताया गया है । अब ऊखल के ऊपर बिना किसी मन्त्र का उच्चारण किये उखा को स्थापित किया जाता है और " उपशया नामक मिट्टी को पीस कर उखा के सामने जमीन पर फैला कर उस पर ' ध्रुवाऽसि ' ( १३१३४-३५ ) इत्यादि दो मन्त्रों का उच्चारण करते हुए उखा को रख दिया जाता है । तब आगे की दो ऋचाओं से ( १३।३६-३७ ) उखा के मध्य में दो आहुतियाँ दी जाती हैं । ऊपर पाँच पशुओं की चर्चा हो चुकी है । इनमें से प्रत्येक पशु के शिर पर स्थित सात छिद्रों में सात - सात सुवर्ण खण्डों को ' सम्यक् स्रवन्ति ' १३।३८-४० ) इत्यादि तीन मन्त्रों का यथाक्रम से उच्चारण करते हुए रखा जाता है । एक मुख, दो नासिका, दो आँख और दो कान -- इन सात स्थानों में ये सात सुवर्ण - खण्ड रखे जाते हैं । पाँच पशुओं में से हिरण्यपुरुष का उखा के मध्य में, अश्व का ईशान कोण में, अवि ( भेड़ ) का वायव्य कोण में, गाय का आग्नेय कोण में और अज का नैर्ऋत्य कोण में शिर स्थापित किया जाता है । प्रत्येक पशु के शिर को स्थापित करते समय क्रमशः ' आदित्यं गर्भम् ' ( १३ । ४१-४५ ) इत्यादि पाँच मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है । अब ' चित्रम् ' ( १३।४६ ) इत्यादि ऋचा के आधे - आधे भाग का उच्चारण कर पुरुष के शिर पर दो आहुतियाँ दी जाती है । आगे के ' इमं मा ' ( १३।४७-५१ ) इत्यादि पाँच मन्त्र उत्सर्गं संज्ञक हैं । अध्वर्यु चित्याग्नि से उत्तर वेदि के बाहर दाहिनी ओर खड़ा होकर उत्तर की १. पद्याप्रमाण इष्टकाओं का जहाँ उपधान किया जाता है, उस स्थान को पद्यालोक कहते हैं । २. " चतस्रः स्रक्तयः कोणा यस्य तत् चतुःस्रक्ति " ( पृ ० २ ९ ५ ) । ३. " तस्मादुदुम्भर उदुम्भरो ह वै तमुदुम्बर इत्याचक्षते परोक्षं परोक्षकामा हि देवा ' ' ' ' तमेव देवा उदुम्बर इति परोक्ष-माचक्षते ' ( पृ ० २ ९ ६ ) । ४. " मे उरू अधिकमकरद् अकार्षीदिति यदब्रवीत्, तस्मादुरूकरं देवा उलूखलमिति परोक्षमाचक्षते " ( पृ ० २ ९ ६ ) । ५. " उपशया नाम उखाभेदे सति तत्प्रतिसन्धानार्थं प्रागवशेषिता मन्त्रसंस्कृता मृत् ” ( पृ ० २ ९ ८ ) ।

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( १६ ) तरफ मुख कर इन पाँच मन्त्रों से क्रमशः पुरुष आदि के शिर का उपस्थान करता है । + एक ही पशु - शीर्ष का उपस्थान किया जाता है । पशु पक्ष में पांचों मन्त्रों से अब वैदि के बाहर से अग्नि के पास आकर अर्धचित अग्नि का ' स्वं यविष्ठ ' ( १३५२ ) इत्यादि मन्त्र अध्वर्यु उपस्थान करता है । तब ' अपां त्वेमन् ' ( १३१५३ ) इत्यादि कण्डिका में स्थित बीस यजुर्मन्त्रों का उच्चारण से हुए अध्वर्यु अग्नि के पास आता है । वहाँ स्वयमातृष्णा के अपर भाग से पूर्वानुकान्त के पास आकर चारों दिशाओं करते अनूकान्तों में क्रमशः पाँच - पाँच कर पन्द्रह अपस्यासंज्ञक और पाँच छन्दस्यासंज्ञक इष्टकाओं का उपधान के बाद ‘ अयं पुरः ' ( १३।५४ - ५७ ) इत्यादि चार मन्त्रों से चारों दिशाओं में क्रमशः दस - दस प्राणभृत् संज्ञक इष्टकाओं करे । इसके ' इयमुपरि ' ( १३1५८ ) मन्त्र से मध्य भाग में लोकम्पूणा इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । का और मध्य में स्वयमातृष्णा के ऊपर चात्वाल से पुरीष का ग्रहण कर उसका नित्रपन किया जाता है, छिद्रों में उसे भर कर बराबर कर दिया जाता है । इस प्रकार भूलोक रूप इस प्रथम चिति के पूरी होती है । चतुर्दश अध्याय: द्वितीय तृतीय - चतुर्थ चित्याधान अन्त में आत्मा के अर्थात् इष्टकाओं के उपधान की प्रक्रिया इस अध्याय में द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चितियों के उपधान के मन्त्र और विधियाँ उपदिष्ट हैं । इनमें से द्वितीय चिति की आश्विनी संज्ञक इष्टकाओं का ' ध्रुवक्षिति ' ( १४११-५ ) आदि पाँच मन्त्रों से रेतः सिग् वेला में उपधान किया जाता है । तत्र ' शुक्रश्च शुचिश्व ' ( १४/६ ) मन्त्र से उत्तराभिमुख अध्वर्यु प्रथम चिति में उपहित ऋतव्या इष्टकाओं के ऊपर अनुक के दोनों तरफ दो ऋतव्या पद्याप्रमाण इष्टकाओं का उपधान करता है । इसके बाद ' सजूऋतुभिः ' १४/७ ) इस कण्डिका में स्थित पांच यजुर्मन्त्रों से वैश्वदेवीसंज्ञक पाँच इष्टकाओं का पूर्व आदि चारों दिशाओं और मध्य में उपधान करना चाहिये | इसी तरह से ' प्राणं मे पाहि ' ( १४०८ ) इस कण्डिका के पाँच यजुर्मन्त्रों से प्राणभृत् नाम की पाँच इष्टकाओं का भी इसी क्रम से पूर्व आदि चारों दिशाओं में और मध्य में उपधान किया जाता है । इसी कण्डिका के ' अप: पिन्व ' ( १४४८ ) इत्यादि पाँच यजुर्मन्त्रों से अपस्यासंज्ञक पाँच इष्टकाओं का भी इसी क्रम से उपधान निहित है । तब ' मूर्धा वय: ' ( १४१ ९ ) और ' अनड्वान् वम: ' ( १४/१० ) इन दो कण्डिकाओं के १ ९ यजुमंन्त्रों से दक्षिण, उत्तर और पश्चिम अनुकान्तों में पाँच - पाँच तथा पूर्व दिशा में चार 3 वयस्यासंज्ञक इष्टकाओं का उपधान किया जाता है | मन्त्रों में वयः शब्द के जुड़े होने से इनका नाम वयस्या है । इन्हीं को छन्दस्या भी कहा जाता है । इतनी इष्टकाओं का उपवान कर लेने के बाद प्रथम चिति के समान ही यहाँ भी दक्षिण श्रोणि से प्रारम्भ कर पहले दो तथा बाद में दस - दस लोकम्पूणा इष्टकाओं का प्रदक्षिणा क्रम से उपधान कर पक्षपुच्छचयन, पुरीषनिवाप और " सात ऋचाओं द्वारा इस द्वितीय चिति का उपस्थान किया जाता है । १. चिति के मध्य के चतुरस्र भाग को चिति की आत्मा कहते हैं । आत्मा की दोनों तरफ दक्षिण और उत्तर भाग में दो पक्ष तथा पश्चिम भाग में पुच्छ की स्थिति मानी जाती 1 २. रेतः सिग् वेला, ऋतव्या वेला इत्यादि स्थलों पर प्रयुक्त वेला शब्द का अर्थ किनारा है । इन इष्टकाओं के किनारे-किनारे, अर्थात् इनसे सटा कर इन स्थानों में विहित इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । ३. “ वयः शब्दोपेतैर्मन्त्रैरुपधेया इष्टका वयस्या इत्युच्यन्ते " ( पृ ० ३५६ ) । ४. ऊपर १ संख्या की टिप्पणी देखिये । ५. अठारहवें अध्याय की ६८ से ७४ संख्या तक की सात ऋचाओं से अग्नि का उपस्थान किया जाता है ।

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( १७ ) इस प्रकार चतुर्दश अध्याय के प्रारम्भ की दस कण्डिकाओं में द्वितीय चिति की उपधान विधि को बताने के उपरान्त ११ वीं कण्डिका से लेकर २२ वीं तक तृतीय चिति की उपधानविधि वर्णित है । तृतीय चिति में पहले ' इन्द्राग्नी ' ( १४ | ११ ) और ' विश्वकर्मा त्वा ' ( १४।१२ ) इन ' मन्त्रों से चिति के मध्य भाग आत्मा में स्वयमातृष्णा का उपधान और स्तवन किया जाता है । इसके बाद वैश्वदेवी इष्टकाओं के समान प्रत्येक दिशा में रेतः सिग् वेला में अनूकों के ऊपर पाँच दिश्या इष्टकाओं का उपधान होता है । ' राज्यसि ' ( १४ । १३ ) मन्त्र में दिशाओं के नाम होने से इस मन्त्र से उपहित इष्टकाओं को भी दिश्या ' कहा जाता है । तब ' विश्वकर्मा त्वा ' ( १४/१४ ) मन्त्र से प्रथम चिति में उपहित विश्वज्योति नामक इष्टका के ऊपर यजमान द्वारा बनाई गई द्वितीय विश्वज्योति नामक पद्या इष्टका का उत्तराभिमुख अध्वर्यु उपधान करता है । इसके बाद ' नभश्च नभस्यश्च ' ( १४ । १५ ) मन्त्र से पूर्व स्थापित पुरीषाच्छन्न ऋतव्या इष्टकाओं के ऊपर अवका ( शेवाल ) को स्थापित कर उसके ऊपर पूर्व प्रदर्शित अर्धोत्सेध पद्याप्रमाण दो ऋतव्या इष्टकाओं के अनूक के उभय पार्श्व में उत्तराभिमुख ध्वर्यु अउपधान करता है । इसी तरह की अन्य दो ऋतव्या इष्टकाओं का ' इषश्च ' ( १४ | १६ ) इत्यादि afusar से अधान होता है । इस तरह से तृतीय चिति में ऋतव्या इष्टकाओं की संख्या चार होती है, जब कि अन्य चितियों में ये दो - दो ही होती हैं । अब आत्मा के पूर्व भाग में ' आयुर्वे ' ( १४।१७ ) इत्यादि कण्डिका से प्राणभृत् नाम की दस इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । ' मा छन्द: ' ( १४/१८ - २० ) इत्यादि तीन कण्डिकाओं से तीनों अप्ययों में अर्थात् पक्ष, पुच्छ और आत्मा के सन्धि - स्थानों में अनूक की दोनों तरफ बारह - बारह छन्दस्या संज्ञक इष्टकाओं का उपधान विहित है | इसके बाद ' मूर्धासि ' ( १४ २१ ) इस कण्डिका के सात यजुर्मन्त्रों से सात वालखिल्य इष्टकाओं का प्राणभृत् संज्ञक इष्टकाओं के आस - पास उपधान करे और ' यन्त्री राट् ' ( १४ । २२ ) कण्डिका के सात यजुर्मन्त्रों से बारह छन्दस्या इष्टकाओं के अपर भाग में अन्य सात वालखिल्य इष्टकाओं का उपधान विहित है । ' आशुस्त्रिवृत् ' से लेकर अध्याय समाप्ति पर्यन्त चतुर्थं चिति के उपधान मन्त्र सविधि वर्णित हैं । प्रथम कण्डिका में १८ यजुर्मन्त्र हैं । इनमें से चार का मृत्युमोहिनी के उपधान में और बाकी १४ मन्त्रों का अर्धपद्या इष्टकाओं के उपधान में विनियोग विहित है । पूर्वानुकान्तों में विहित दक्षिणोत्तर दिशा के मध्य में उत्तराभिमुख जंघामात्री उत्तरेष्टका का उत्तराभिमुख अध्वर्यु उपधान करता है । तब ' अग्नेर्भागोऽसि ' ( १४।२४ ) मन्त्र से पूर्वानुकान्त में विहित जंघा और नाभि के मध्य में जंघामात्री दक्षिणेष्टका का उपधान किया जाता है । उत्तरेष्टका का उपधान पहले हो चुका है । इस कण्डिका में दस यजुर्मंन्त्र हैं । इनमें से चार मृत्युमोहिनी और छः पद्याप्रमाण इष्टकाओं के उपधान में विनियुक्त हैं । ये दस इष्टकाएँ ' स्मृत ' नाम से प्रसिद्ध हैं । अब उत्तराभिमुख अध्वर्यु उत्तर दिशा से लेकर दक्षिण पर्यन्त विस्तृत छः पद्या इष्टकाओं का ' वसूनां भाग: ' ( १४ / २५ - २६ ) इत्यादि दो कण्डिकाओं के छः यजुर्मन्त्रों से उपधान करता है । तब ' सहश्च सहस्यश्व ' ( १४/२७ ) मन्त्र से अनूक के दोनों भागों में दो पद्या इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । अन्त में ' एकया s स्तुवत ' ( १४।२८-३१ ) इत्यादि चार मन्त्रों में स्थित १७ यजुर्मन्त्रों से सभी दिशाओं में रेतः सिग् वेला में सृष्टिसंज्ञक सत्रह इष्टकाओं का उपधान विहित है । इनमें से अनूक के दक्षिण में ९ और उत्तर में ८ का उपधान किया जाता है । इस पद्धति से प्रत्येक तीन दिशाओं में चार - चार तथा दक्षिण दिशा में पांच इष्टकाओं का आधान सम्पन्न होता है और इस तरह से यह तृतीय चिति में आधेय इष्टकाओं की विधि पूरी होती है । पुरीषनिवपन और सात ऋचाओं से प्रस्तुत चिति का उपस्थान पूर्ववत् किया जाता है । १. " दिक्शब्दोपेतैर्मन्त्रैरुपधेयत्वादासामिष्टकानां दिश्या इति संज्ञा " ( पृ ० ३६६-३६७ ) । २. “ सृष्टिशब्दोपेतमन्त्रैरुपधेयत्वात् सृष्टिशब्दवाच्यता ' ( पृ ० ३ ९ ४ ) ।

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( १८ ) पंचदश अध्याय: पंचम चिति का आधान चौदहवें अध्याय में द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चिति के उपधान की विधि और मन्त्रों को बताने के बाद पन्द्रहवें अध्याय में पंचम चिति के उपधान की विधि बताई गई है । पंचम चिति में प्रत्येक दिशा में आत्मा के प्रान्त भागों में आश्विनी संज्ञक इष्टकाओं के समान असपत्न संज्ञक पाँच पद्याप्रमाण इष्टकाओं का उपधान ' अग्ने जातान् ' ( १५।१-३ ) इत्यादि तीन कण्डिकाओं के ' अग्ने जातान् सहसा जातान् षोडशी, चतुश्चत्वारिंशः, अग्ने पुरीषम् ' इन पाँच यजुर्मन्त्रों से किया जाता है । इसके बाद ' एवच्छन्द: ' ( १५।४ - ५ ) इत्यादि दो कण्डिकाओं में विद्यमान ४० यजुर्मन्त्रों से चारों दिशाओं में उक्त इष्टकाओं से संलग्न दस - दस विराट् संज्ञक पद्याप्रमाण इष्टकाओं का उपधान अनूक के उभय भाग में किया जाता है । इसके बाद अषाढा वेला की सभी दिशाओं में स्तोमभाग नाम की २ ९ इष्टकाओं का उपधान ' रश्मिना सत्याय ' ( १५/६ - ९ ) इत्यादि चार कण्डिकाओं में स्थित २ ९ मन्त्रों से किया जाता है । इनमें से पूर्वानुक के दक्षिण में १५ और उत्तर में १४ स्तोमभाग इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । इन इष्टकाओं का उपधान करने से पूर्वानुक में स्थान का अभाव हो जाता है, अतः पूर्वानूक को छोड़कर बाकी तीन दिशाओं के अनूकों पर ऋतव्या वेला में ' राज्यसि ' ( १५ / १०-१४ ) इत्यादि पाँच मन्त्रों से आश्विनी इष्टकाओं के समान ही नाकसद् नामक पाँच इष्टकाओं का आधान करे । उपधान के अनन्तर इन इष्टकाओं के ऊपर चात्वाल की मिट्टी डाल कर उनके ऊपर चारों दिशाओं में और मध्य में पंचचूडा नाम की पाँच इष्टकाओं का उपधान ' अयं पुर: ' ( १५ / १५-१९ ) इत्यादि पाँच मन्त्रों से करे । इसके बाद ' अग्निर्मूर्धा ' ( १५/२० - २२ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से गायत्री आदि नामों वाली छन्दस्या संज्ञक तीन-तीन इष्टकाओं का आधान किया जाता है । इनमें से मध्यमा पद्या अनूक पर और उसकी दोनों तरफ दो अर्धपद्या इष्टकाएँ रहती हैं | छन्दस्था इष्टकाओं में सबसे पहले पूर्व दिशा के अनूकान्त में उदङ्मुख अध्वर्यु तीन गायत्री संज्ञक इष्टकाओं का उपधान करता है । तब पूर्व दिशा में रेतः सिग् वेला में त्रिष्टुप्संज्ञक तीन इष्टकाओं को उत्तराभिमुख रखते समय ' भुवो यज्ञस्य ' ( ८५।२३-२५ ) इत्यादि त्रिष्टुप् छन्दस्का तीन ऋचाओं का पाठ किया जाता है । इसके पीछे रेतः सिग् वेला में तीन जगती छन्दस्का इष्टकाओं का दक्षिणाभिमुख उपधान किया जाता है । इस समय ' अयमिह ' ( १५।२६ - २८ ) इत्यादि जगती छन्द की तीन ऋचाओं का पाठ किया जाता है । इसके बाद अनुष्टुप् संज्ञक इष्टकाओं का उपधान इसी पद्धति से ' सखायः ' ( १५।२ ९ -३१ ) इत्यादि अनुष्टुप् छन्द के तीन मन्त्रों से किया जाता है । तब अषाढा इष्टका के आगे उत्तराभिमुख अध्वर्यु बृहतो नामक तीन इष्टकाओं का उपधान ' एना व: ' ( १५ । ३२-३४ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से करता है | यहाँ भाष्यकार ने प्रगाथ का लक्षण बताया है । दो ऋचाओं का शास्त्रीय विधि से प्रग्रथन कर जब तीन ऋचाएँ बना दो जाती हैं, तो उसे प्रगाथ कहते हैं । भाष्यकार ने यहाँ ( १५ । ३२ ) उदाहरण देकर इस विषय को समझाया है । इसके आगे ' अग्ने वाजस्य ' ( १५।३५-३७ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से उष्णिक् नामक तीन अर्धपद्या इष्टकाओं का उत्तराभिमुख अध्वर्यु उपधान करता है । तब ' भद्री नः ' ( १५।३८-४० ) इत्यादि तीन मन्त्रों से बृहती इष्टकाओं के आगे ककुप्संज्ञक इष्टकाओं का उपधान करता है । अब दक्षिण दिशा के अनूकान्त में पंक्तिसंज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान ' अग्नि तम् ' ( १५ / ४१-४३ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से पश्चिम दिशा में प्राङ्मुख खड़ा अध्वर्यु करता है । इसी तरह से उत्तर के अनूकान्त में उत्तराभिमुख तीन पदपंक्ति नामक इष्टकाओं का उपधान पूर्वाभिमुख अध्वर्यु ' अग्ने तम् ' ( १५।४४-४६ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से करता है । पुरीष शब्द वाले मन्त्र ( १५ । ३ ) से उपहित असपत्ना नाम वाली पांचवीं इष्टका पुरीषवती कहलाती है । उसके सामने अतिच्छन्दस नाम की पद्याप्रमाण इष्टका का ' अग्नि होतारम् ' ( १५/४७ ) मन्त्र से प्राङ्मुख हो उपधान किया. ' जाता है । इसके बाद अनूकान्त में तीन द्विपदा संज्ञक इष्टकाओं का आधान ' अग्ने त्वम् ' ( १५।४८ ) इस कण्डिका के तीन जुर्मन्त्रों से दक्षिणाभिमुख हो किया जाता है । तब मध्योपहित इष्टका वाले गार्हपत्य के ऊपर ' येन ऋषयः ' ( १५।४ ९ -५६ ) इत्यादि आठ ऋचाओं से गार्हपत्य की पद्धति से ही चिति का पुनः आधान किया जाता है ।

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( १ ९ ) इस प्रकार चिति का पुनः उपधान करने के बाद पंचम चिति की शेष इष्टकाओं का आधान इस प्रकार किया जाता है - पहले अनूक के उभय पार्श्व में उदङ्मुख हो दो ऋतव्या पद्येष्टकाओं का अध्वर्यु ' तपश्च ' ( १५/५७ ) इत्यादि मन्त्र से उपधान करता है । फिर यजमान निर्मित विश्वज्योति इष्टका का उपधान पूर्वोपहित तृतीय विश्वज्योति इष्टका के ऊपर ' परमेष्ठी ' ( १५।५८ ) इत्यादि मन्त्र से करता है । इसके बाद आत्मा की दाहिनी तरफ आग्नेय कोण के पश्चिम में अरत्निमात्र दूर के दो लोकों को छोड़कर तृतीय लोक से आरम्भ कर प्रथम चिति के समान लोकम्पूणा इष्टकाओं का आधान ' लोकम्पूण ' ( १५ । ५ ९ -६१ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से करे । इसके बाद पंचम चिति को पुरीष से ढककर शर्करामयी परस्पर जुड़ी हुई छिद्रवाली विकर्णी स्वयमातृष्णा नामक दो इष्टकाओं का दक्षिणोत्तर दिशाओं में उत्तराभिमुख अध्वर्यु उपधान करे और उत्तर दिशा में अनूक की रेखा के बीच में ' प्रोथदश्व ' ( १५/६२ ) इत्यादि मन्त्र से विकर्णी इष्टका का उपधान करे । तब ' आयोष्ट्रा ' ( १५ / ६३-६४ ) इत्यादि दो मन्त्रों से विकर्णी इष्टका के दक्षिण में स्वयमातृष्णा का उपधान करे । अन्त में इष्टकाचित सपक्षपुच्छ अग्नि का पश्चिम, उत्तर पूर्वं दक्षिण और पुन: पश्चिम दिशाओं में स्थापित जल से भरे हुए एक - एक पात्र में सुवर्ण के एक हजार टुकड़ों को डाल कर उनसे प्रोक्षण करे । अग्नि के पश्चिम में पूर्वाभिमुख, उत्तर में दक्षिणाभिमुख, पूर्व में पश्चिमाभिमुख, दक्षिण में उत्तराभिमुख और पुनः पश्चिम में पूर्वाभिमुख हो प्रोक्षण विधि सम्पन्न की जाती है । प्रत्येक बार प्रोक्षण करते समय सुवर्ण के • २०० टुकड़े डाले जाते हैं । इस अध्याय की अन्तिम कण्डिका ' सहस्रस्य ' ( १५/६५ ) के पाँच यजुमंन्त्रों से यह विधि सम्पन्न की जाती है । शतपथ ब्राह्मण के अवधेय अंश ११ से १५ अध्यायों के मन्त्रों का यह विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र के १६-१७ अध्यायों के आधार पर दिया गया है । भाष्यकार ने कात्यायन के उक्त विनियोगों का समर्थन शतपथ ब्राह्मण के ६-८ काण्डों के वचनों को विस्तार से उद्धृत कर किया है । साथ ही मन्त्रों की विशिष्ट शब्दावली की व्याख्या भी शतपथ ब्राह्मण के वचनों के आधार पर प्रस्तुत की है । भाष्यकार ने ११ वें अध्याय का आरम्भ शतपथ के षष्ठ काण्ड के प्रथम दो अध्यायों के विषयों को अतिसंक्षेप में दिखाते हुए किया है । मिट्टी खोदने के लिये काठ की अभ्रि बनाई जाती है । ११ वें अध्याय के ११ वें मन्त्र में हिरण्मयी शब्द को देखकर कुछ आचार्यों का कहना है कि यह अभि सुवर्ण की बनाई जानी चाहिये, किन्तु शतपथ में इस मत का खण्डन कर इस शब्द की व्याख्या भिन्न प्रकार से की गई है । ' आपोहिष्ठा ' ( ११।५० ) मन्त्र के भाष्य में शतपथ को उद्धृत करते हुए बताया गया है कि उखा के निर्माण के लिये उपयोग में लाई जाने वाली मिट्टी में पलाश की छाल का उबला हुआ पानी इस लिये मिलाया जाता है कि वह मजबूत बने, अनायास ही टूट न जाय । इस मन्त्र की व्याख्या में उद्धृत शतपथ ब्राह्मण की नौ ( ६ । १ । ३ । १० -१८ ) कण्डकाओं में कुमार अग्नि के रुद्र, शर्व, पशुपति, उग्र, अशनि, भव, महादेव और ईशान - इन आठ नामों की चर्चा की गई है और बताया गया है कि उखा संभरण में प्रयुक्त होने वाले अग्नि, जल, औषधि, वायु, विद्युत्, पर्जन्य, चन्द्रमा और आदित्य इन्हीं के रूप हैं । यहाँ औषधि शब्द पृथिवी का और पर्जन्य प्रजापति रूप यजमान का सूचक है । इस प्रकार हमें यहाँ पुराणों में वर्णित अष्टमूर्ति शिव के दर्शन होते हैं । अथर्ववेद के व्रात्य सूक्त में रुद्र के सात ही नाम मिलते हैं । वहाँ अनि नाम नहीं । पुराणों में और पुष्पदन्त के शिवमहिम्नस्तव में अशनि के स्थान पर भीम नाम मिलता है । ' अदित्यै रास्नासि ' ( ११ / ५ ९ ) मन्त्र के भाष्य में शतपथ ब्राह्मण को बहुत विस्तार से उद्धृत किया गया है और सोदाहरण समझाया गया है कि उखा के चार ही स्तन क्यों बनाने चाहिये, दो अथवा आठ क्यों नहीं । गाय के चार स्तन होते हैं । दो स्तन वाले अजा, वडवा आदि तथा आठ स्तन वाले शुनी, शूकरी आदि पशु गाय की अपेक्षा हीन कोटि के माने जाने जाते हैं । इसीलिये दो स्तन अथवा आठ स्तन वाले पशु को यहाँ मान्यता नहीं दी गई है । इसी