वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता भाष्य प्रणेतारः अनन्त श्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः १६–२० अध्यायात्मको भागः प्रकाशक: श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता * वृन्दावनम्
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता [ १६-२० अध्यायात्मको भागः ] भाष्यप्रणेतारः अनन्तश्री विभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः भाषानुवादकः डॉ ० प ० गजाननशास्त्री मुसलगांवकरः मीमांसा वेदान्त - साहित्याचार्य:, एम ० ए ०, पी ० एच ० डी ० सम्पादकः प ० व्रजवल्लभद्विवेदो दर्शनाचार्य: सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागमविभागाध्यक्षचरः प्रकाशक: श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता D वृन्दावन इ प्रथम संस्करणम्
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प्रकाशक--श्रीराधाकृष्णानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता ० वृन्दावन मूल्य: ११०.०० रूप्यकाणि अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकारा राजकीय नियमानुसारेण सुरक्षिताः पुस्तकप्राप्तिस्थानम् -१. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान २. C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ११३ पार्क स्ट्रीट, पोद्दार पोइन्ट, कलकत्ता - ७०००१६ श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५ / १८ नारद घाट ३. ४. वाराणसी ( उ ० प्र ० ) श्री राधाकृष्ण घानुका प्रकाशन संस्थान संघ विद्यालय रमणरेती, वृन्दावन मथुरा ( उ ० प्र ० ) श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पैट्रो केमिकल्स लिमिटेड ४०१/४०४ राहेजा सेन्टर २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान Clo मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ई ० ४ / २४, ईस्ट पटेल नगर दिल्ली – ८ मुद्रक-रत्ना प्रिंटिंग वर्क्स कमच्छा, वाराणसी
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परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जो महाराज
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पंचाध्यायी ( १६-२० ) - भाष्य निष्कर्ष ११-१५ अध्याय के भाष्यनिष्कर्ष के प्रारम्भ में भाष्यरचना की पद्धति पर प्रकाश डालते हुए बताया गया था कि अग्निचयन के मन्त्र इस माध्यन्दिन संहिता के ११-१८ अध्याय पर्यन्त वर्णित हैं । अग्निचयन सम्बन्धी उस भाग में ११-१५ अध्यायों में वर्णित उदयसंभरण आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया था । शेष तीन अध्यायों के अग्निचयन संबन्धी विषयों को तथा १ ९ -२१ अध्यायों के सौत्रामणी याग सम्बन्धी विषयों में से केवल १ ९ -२० अध्यायों के विषयों को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है । साथ ही शतपथ ब्राह्मण के, मन्त्रों के आध्यात्मिक अर्थ के और स्वामी दयानन्द के भाष्य hrase अंशों को भी दिखाया जा रहा है । षोडश अध्याय: शतरुद्रिय होम प्रस्तुत अध्याय में शतरुद्र होम सम्बन्धी मन्त्रों का वर्णन है । सुत्र के टुकड़ों से अग्नि का प्रोक्षण करने के उपरान्त शतरुद्र सम्बन्धी इस यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है । बुभुक्षित अग्नि रुद्र का स्वरूप धारण कर लेती है । उसकी शान्ति के लिये ये आहुतियां दी जाती हैं । ये आहुतियां आहवनीयाग्नि में नहीं दी जातीं, किन्तु चित्याग्नि के उत्तर पक्ष के नैर्ऋत्य कोण में पहले से खोदी गई जंघाप्रमाण परिश्रित् भूमि में यह शतरुद्रिय होम किया जाता है । यहाँ जतिल मिश्रित वेक के सत्तू को उत्तराभिमुख अध्वर्यु जुहूस्थानीय दाहिने हाथ में लेकर बायें हाथ में स्थित अर्ककाष्ठ से उसकी परिश्रित् स्थान में आहुति देता है । कुछ आचार्यो का मानना है कि जतिलमिश्रित गवेधुक - सक्तु के स्थान पर अजाक्षीर की आहुति दी जाती है । ' वन में पैदा हुए तिल जतिल और गेहूँ गवेधुक कहलाते हैं । ' नमस्ते ' आदि सोलह ऋचाओं का पहला अनुवाक और बाद के पाँच - पाँच ऋचाओं के अन्य दो अनुवाक इन तीन अनुवाक की २६ कण्डिकाओं से जानुप्रमाण परिचित् स्थान में आहुतियां दी जाती हैं । इसके बाद पांच - पांच afornia के चतुर्थं और पंचम अनुवाकों से नाभिप्रमाण परिश्चित् स्थान में स्वाहाकार किया जाता है । इस asara की अन्तिम तीन कण्डिकाएँ प्रत्यवरोह संज्ञक हैं । इनसे पहले की ३७-६३ कण्डिकाओं से मुखपरिमाण परिश्रित्स्थान आहुतियां दी जाती हैं । ' नमो s स्तु ' ( १६।६४-६६ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से प्रतिलोम होम किया जाता है, अर्थात् पहले मन्त्र से मुखप्रमाण, दूसरे से नाभिप्रमाण और तीसरे मन्त्र से जानुप्रमाण परिश्रित्स्थान में होम सम्पन्न किया जाता है । १७-४६ संख्या तक की सभी कण्डिकाएँ " शेषे यजुः शब्दः " इस मीमांसा सूत्र में वर्णित लक्षण के अनुसार यजुर्मंन्त्र । इनमें से ' नमो हिरण्यबाहवे ' ( १६/१७ ) से लेकर ' धनुष्कुद्भय ' ( १६४४६ ) पर्यन्त कण्डिकाओं के २४० यजुमंत्रों में इतनी ही संख्या के रुद्र देव । हैं । ४६ वीं कण्डिका के शेष चार मन्त्रों के देवता अग्नि, वायु और सूर्य हैं । ये तीनों देवता रुद्र के हृदयस्थानीय हैं । यहाँ चार ही नमः शब्द आये हैं । इसलिये यहाँ इन तीन देवताओं के ये चार मन्त्र माने गये हैं । इन रुद्रों के मध्य में कुछ के उभयतः नमस्कार मन्त्र हैं, अर्थात् रुद्र के दो - दो नामों के पहले और बाद में भी नमः पद संयुक्त हैं । १७ वीं कण्डिका से लेकर ' श्वपतिभ्यश्च ' ( १६ २८ ) पर्यन्त उभयतः नमस्कार मन्त्र हैं । इसके उपरान्त ' नमो भवाय च ' ( १६ ) २८ ) से लेकर ' प्रखिदते च ' ( १६/४६ ) पर्यन्त कण्डिकाओं में अन्यतरतः नमस्कार - मन्त्र हैं, अर्थात् यहाँ प्रत्येक दो यजुर्मन्त्रों के प्रारम्भ में नमः पद संयोजित है । इसके बाद ' नम इषुकूद्भयः ' ( १६०४६ ) इत्यादि कण्डिकाओं के शेष यजुर्मंन्त्र उभयतः नमस्कार हैं । ' नमः समाम्यः ' ( १६/२४ ) इत्यादि कण्डिकाओं में आतसंज्ञक १. “ जतिला आरण्यतिलाः । गवेधुका आरण्यगोधूमाः " ( भाष्य, पृ ० १ ) ।
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( ६ ) वाले हैं । अन्यतरतः नमस्कार रुद्र वर्णित हैं । इनमें से उभयतः नमस्कार वाले रुद्र अत्यन्त घोर, अत्यन्त अशान्त स्वभाव की में मानी गई है । सर्वत्र रुद्राद्वैत सिद्धान्त वाले रुद्र अत्यन्त शान्त स्वभाव के हैं । जातसंज्ञक रुद्रों की स्थिति रुद्रलोक स्थापना के लिये यहाँ उनका वर्णन किया गया है । नहीं, क्योंकि यहाँ ' नम इषुमद्भयः ' ( १६।२२ ) इत्यादि छ: मन्त्रों में प्रयुक्त ' वः ' शब्द पूजार्थक है, युष्मदर्थक गति, वय ( अवस्था ), वर्णं ( रंग ) आदि के सम्बोधन विवक्षित नहीं है । ' नमो ह्रस्वाय ' ( १६ । ३० ) इत्यादि मन्त्र स्वरूप, के नाम पूरे हो जाते हैं । इनसे रुद्र की सूचक हैं । ४६ वीं कण्डिका तक रुद्रों की तीन अशीतियां, अर्थात् कुल २४० रुद्रों वायु और सूर्यात्मक देवताओं का प्रतिपादन सर्वात्मकता व्यक्त होती है । इसी के साथ रुद्रों में प्रधानभूत रुद्रहृदयरूप अग्नि, में एक - एक रुद्र देवता का माहात्म्य पूरा हो जाता है । ४७ वीं से लेकर ५३ वीं कण्डिका तक की ७ ऋचाओं में से प्रत्येक अनेक रुद्र हैं । यहाँ पृथिवी, अन्तरिक्ष, वर्णित है । इसके बाद के दस ( १६।५४-६३ ) अवतानसंज्ञक अनुष्टुप् मन्त्रों के जाता देवता है । अन्तिम तीन कण्डिकाओं ( १६ ) ६४-लोक, पाताल आदि में स्थित रुद्रों को नमनपूर्वक स्वाहाकार समर्पित किया रुद्रों को विपरीत क्रम ( धु अन्तरिक्ष-६६ ) में प्रत्यवरोह संज्ञक तीन यजुमंन्त्रों का विधान है । इनसे तीनों लोकों में स्थित । प्रस्तुत खण्ड में इस अध्याय के पृथिवी ) से आहुतियां दी जाती हैं । इस प्रकार यह शतरुद्रिय होमविधि समाप्त होती है भाष्य का विस्तृत भाषानुवाद भी समाविष्ट है । सप्तदश अध्याय: चित्याग्निपरिषेक ' अग्नीत् ' नामक ऋत्विक् सपक्षपुच्छात्मा स्थापित हाथ में जल लेकर उस स्थापित कर, जलकुम्भ सर्वप्रथम यहीं चित्याग्नि के परिषेक का विधान है । चित्याग्नि के दक्षिण पक्ष से जुड़े हुए आत्मभाग के नीचे पाषाण को उच्चारण करते हुए पाषाण खण्ड से प्रारम्भ कर सपक्षपुच्छ चित्याग्नि को प्रदक्षिण क्रम से ' अश्मन्त्रजंम् ' ( १७।१ ) मन्त्र हुआ का पाषाण पर कुम्भ को जलधारा से चारों तरफ से सींचता है । तदुपरान्त मन्त्र के अपर भाग का उच्चारण करता के उपरान्त अग्नीत् इस जलकुम्भ रखता है । वहाँ से पुनः कुम्भ को उठा कर पूर्ववत् दुबारा परिषेक करता है । इतना करने के पास ईशानाभिमुख को यज्ञशाला से बाहर कर देता है और बिना पीछे देखे यज्ञशाला में आकर दक्षिणवेदि के मध्यभाग मध्यभाग का स्पर्श करते हुए खड़ा होकर चित्याग्नि के आत्मभाग के ऊपर अपने हाथों को पूरी तरह । से इसके फैला बाद कर वह उसके मण्डूक, शैवाल और वेतसशाखा ' इमा में ' ( १७१२ - ३ ) इत्यादि दो कण्डिकाओं का सस्वर पाठ करता है ऋचाओं ( १७१४ - १० ) का पाठ करते को एक बांस में बाँधकर उसे दाहिने हाथ से पकड़ कर, उस बांस से आगे की सात दक्षिणांस पर्यन्त भाग का, द्वितीय से हुए अग्निक्षेत्र का कर्षण करता है । इसका क्रम यह है - प्रथम ऋचा से दक्षिण श्रोणि से भाग का चतुर्थ से उत्तरांस से लेकर दक्षिण श्रोणि से उत्तर श्रोणि पर्यन्त भाग का, तृतीय से उत्तरश्रोणि से उत्तरांस पर्यन्त तथा सप्तम से उत्तर पक्ष का कर्षण दक्षिणांस पर्यन्त भाग का, पंचम से आत्मा के सम्मुख दक्षिण पक्ष का, षष्ठ से पुच्छ का किया जाता है । के इसके उपरान्त अध्वर्यु सुवर्ण खण्ड सहित घृत से भरी त्रुवा को और दही, मधु, घृत के पात्र को कुशमुष्टि यजमान साथ लेकर ' नमस्ते ' ( १७।११ ) इत्यादि मन्त्र का पाठ करता हुआ चित्याग्नि स्थल पर बैठता है, साथ ही ब्रह्मा ' नुषदे और ( १७।१२ ) अग्नि के दक्षिण भाग में बैठते हैं । इसके बाद अध्वर्यु स्वयमातृष्णा इष्टका के ऊपर पंचगृहीत आज्य पाँच की द्रव्यों की आहुतियां इत्यादि कण्डिका के पाँच मन्त्रों आज्य का व्याधारण तथा हिरण्यशकल को छोड़ श्रोणि कर में पूर्वगृहीत , दक्षिण श्रोणि में, उत्तर अंस में देता है । इनका क्रम इस प्रकार है- पहले नाभि के दक्षिण अंस में, तब उत्तर का निरन्तर क्षारण और अन्तिम आहुति मध्य भाग में दो जाती है । ' एक कोण से लेकर दूसरे कोण तक घृत की धारा १. " व्याधारणं नाम एकस्मात् कोणात् कोणान्तरं प्रति आज्यधाराक्षारणम् । तच्च व्याधारणं पञ्चगृहीतेनाज्येन क्रियते " ( भा ०, पृ ० ९ ३ ) ।
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' ७ > ही आज्य का व्याघारण कहा जाता है । पंचगृहीत आज्य से इस क्रिया को पूरा किया जाता है । इसके उपरान्त अध्वर्यु पात्र अवशिष्ट दही, मधु और घृत को कुशा से लेकर परिधित् के साथ सपक्षपुच्छ अग्नि का मध्य में और बाहर दो ऋचाओं ( १७११३-१४ ) से प्रोक्षण करता है । तब ' प्राणदा ' ( १७११५ ) इत्यादि मन्त्र के पाठ के साथ चित्याग्नि स्थान से उत्तर जाता है । वह प्रवर्ग्य के उत्सादन के बाद यज्ञशाला में आकर पंचगृहोत आज्य की शालाद्वार पर ' अग्निस्तिग्मेन ( १७/१६ ) मन्त्र से आहुति देता है । इसके उपरान्त षोडशगृहीत आज्य को जुहू में भर कर उसके आधे भाग की ' य इमा ' ( १७।१७-२४ ) इत्यादि मन्त्रों में शालाद्वायं अग्नि में ही आहुति दी जाती है । षोडशगृहीत आज्य के बचे आधे भाग की ' चक्षुषः पिता ' ( १७१२५ - ३२ ) इत्यादि आठ मन्त्रों से आहुति दी जाती है । इसके उपरान्त अग्निचयन के इस प्रकरण में चित्याग्नि के प्रति आहवनीय अग्नि का प्रणयन करते समय अध्वर्यु से संप्रेषित ब्रह्मा दक्षिण दिशा में चलता हुआ ' आशुः शिशान: ' ( १७१३३-४४ ) इत्यादि अप्रतिरथ सूक्त की बारह ऋचाओं का पाठ करता है । अन्य शाखाओं में बताया गया है कि सभी ऋतुओं में, चाहे वे साग्निक हों अथवा अनग्निक, अप्रतिरथ सूक्त को इन बारह ऋचाओं का पाठ करता हुआ अध्वर्यु भी ब्रह्मा का अनुवर्तन करे । ४५ से ४८ संख्या की चार ऋचाओं का विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र में नहीं बताया गया । ४ ९ वें मन्त्र में प्रदर्शित विनियोग की पद्धति से इनका लेंगिक विनियोग महाव्रत याग में अध्वर्यु द्वारा योद्धा को इषु ( बाण ) ' प्रदान करने में तथा योद्धा एवं मरुद्देवता की स्तुति में किया जा सकता है । ' मर्माणि ते ' ( १७१४ ९ ) मन्त्र से महाव्रत याग में अध्वर्यु क्षत्रिय योद्धा को पहनने के लिये कवच प्रदान करता है । तब उदुम्बर ( गूलर ) की गीली, रातभर घृत में डुबाई गई, प्रादेश-प्रमाण तीन समिधाओं की ' उदेनम् ' ( १७१५० -५२ ) इत्यादि तीन ऋचाओं से शालाद्वार्य पर आहुति दी जाती है । इसके are afrat प्रज्वलित किया जाता है । ' उदु त्वा ' ( १७/५३ ) मन्त्र को होता तीन बार पढ़ता है । तब अध्वर्युं प्रदीप्त काष्ठ को शालाद्वार्य से उठाता है और ' पञ्च दिश: ' ( १७१५४-५८ ) इत्यादि पाँच ऋचाओं का पाठ करते हुए ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता और यजमान चित्य स्थान की ओर बढ़ते हैं । इन मन्त्रों का पाठ सभी को करना चाहिये, यह कर्काचार्य का मत है । हरिस्वामी के अनुसार केवल अध्वर्यु इनका पाठ करे । इसके उपरान्त अध्वर्यु आग्नीध्र प्रदेश को दक्षिण दिशा में पृष्ठया से संलग्न पृश्नि संज्ञक पाषाण को ' विमानः ' ( १७।५ ९ -६० ) इत्यादि दो ऋचाओं से रखता है । यहाँ इस पाषाण की आदित्य के रूप में स्तुति की जाती है । तदुपरान्त इस पाषाण को किसी गुप्त स्थान में छिपा कर ' इन्द्रं विश्वा ' ( १७१६१-६४ ) इत्यादि चार ऋचाओं का पाठ करते हुए सभी चयन - स्थान की ओर बढ़ते हैं और ऋत्विकगण ' क्रमध्वम् ' ( १७६५ - ६ ९ ) इत्यादि पांच ऋचाओं का उच्चारण करते हुए तीर्थ मार्ग से चिति - स्थान पर चढ़ते हैं । यहाँ अध्वर्यु स्वयमातृष्णा इष्टका के स्थान से थोड़ा ऊपर कृष्ण वर्णं १. इस प्रसंग में कात्यायनयज्ञपद्धतिविमर्श ( पृ ० ४०१ ) में बताया गया है कि गवामयन सत्र के अन्त में महाव्रत का अनुष्ठान किया जाता हैं । इसमें पृष्ठसंज्ञक स्तोत्र का उपाकरण सौ तार वाली ' बाण ' नामक महावीणा के वादन से किया जाता है । वहाँ कात्यायन श्रौतसूत्र ( १३।२।२५ ) और ताण्ड्य महाब्राह्मण के सायण भाष्य ( ५।६।१२ ) को भी उद्धृत किया गया है । २. " तादृशसूत्रस्य आधारभूतत्वेनोपलक्षिता भूमिगता रेखा ' पृष्ठ्या ' इति व्यवह्रियते " ( श्रौतपदार्थनिर्वचन, पृ ० ४ ) । इसका विशेष विकरण वहीं देखिये । ३. तीर्थं पद के अर्थ के लिये देखिये श्रौतपदार्थनिर्वचन - ' आहवनीयायतनस्योत्तरतः प्रागग्रेषु दर्भेषु प्रणीता-प्रणय प्रणीता नाम आप आसाद्यन्ते । तासां पश्चिमदेश उत्करस्य तु पूर्वदेशो विहारप्रवेशनिर्गमयोर्मास्तीर्थ-संज्ञकः । प्रणीताभाववति कर्मणि आहवनीयोत्तरदेशे आसादितस्येध्मस्य पश्चिमभाग उत्करस्य पूर्वदेशस्तीथं -मित्युच्यते । चात्वालवत्सु कर्मसु चात्वालपश्चिमदेश उत्करपूर्वदेश एव तीर्थंपदवाच्यः " ( पृ ० ११ ) ।
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I हुए इध्मस्थ अग्नि में ' नक्तोषासा ' ( १७१७०-७१ ) की श्वेत वत्स वाली गाय के जुहूस्थानीय मृण्मय पात्र में भरे दूध समय से प्रतिप्रस्थाता सोंचते प्रज्वलित काष्ठ को हाथ में लिये रहता इत्यादि दो मन्त्रों से आहुति देता है । अध्वर्यु के ऐसा करते प्रवृत्ति होती है । दोहनपात्र में दोहन से सम्बद्ध सारे संस्कार है । यहाँ बिना मन्त्र का उच्चारण किये ' सान्नाय्य धर्मों की लिया जाता है । सम्पन्न किये जाते हैं, क्योंकि यहाँ दोहनपात्र से जुहू का कार्य इत्यादि दो वषट्कारान्त मन्त्रों से अग्नि इस प्रकार दुग्ध से सिंचित इस स्थान पर ' सुपर्णोऽसि ' ( १७ / ७२-७३ उस ) अग्नि में तीन मन्त्रों से ( १७।७४-७६ ) की स्थापना की जाती है । चित्याग्नि में उख्याग्नि के निधान के बाद अध्वर्युं विकंकत की और तृतीय से औदुम्बरी समिधा से तीन समिधाओं का आधान करता है । प्रथम मन्त्र से शमी की, द्वितीय से । ' कर्णक ' लकड़ी का एक प्रकार का रोग स्थापित की जाती है । इनमें से तृतीय औदुम्बरी समिधा सकर्णक होनी चाहिये ' अग्ने त्वम् ' ( १७१७७-७८ ) इत्यादि दो ऋचाओं है, जिससे लकड़ी फट जाती है । इन तीन समिधाओं के आधान के बाद है । घृत से भरो स्रुचा से जो आहुति से घृत ' की दो आहुतियाँ तथा ' सप्त ( १७१७ ९ ) इत्यादि मन्त्र से पूर्णाहुति याग दी कर जाती हाथ से मारुत पुरोडाशों की ' शुक्रज्योतिश्च दी जाती है, उसे पूर्णाहुति कहते हैं । इसके बाद वैश्वानर पुरोडाश से एक अतिविपुल ( बहुत बड़ा ) वैश्वानर पुरोडाश ( १७ / ८०-८६ ) इत्यादि मन्त्रों से एक - एक आहुति दी जाती है, अथवा ( वन ) में पठनीय सप्तम मारुत पुरोडाशों की बनाकर उसी के ऊपर सभी मारुत पुरोडाशों की आहुति देनी चाहिये । अरण्य ' इमं स्तनम् ' ( १७१८७ - ९९ ) इत्यादि अध्याय आहुति विमुख संज्ञक ' उग्रश्च ' ( १७१८६ ) मन्त्र से दी जाती है । तदुपरान्त इनका स्वयं पाठ करता है । यहाँ जप और समाप्ति पर्यन्त १३ मन्त्रों का वाचन अध्वर्यु यजमान से कराता है अथवा वसोर्धारा में उपयुक्त होने वाले घृत की स्तुति वाचन का विकल्प है । तेरह ऋचाओं वाले इस अनुवाद से यज्ञ की अथवा अग्नि की स्तुति की गई है । इसी की जाती है । ८ ९ वीं कण्डिका में अन्नाध्यास से घृत की और प्राणाध्यास से अन्तिम मन्त्र ( १७१ ९९ ) में मन्त्रद्रष्टा अनुवाक में वाणी की स्तुति में विनियुक्त ' चत्वारि शृङ्गाः ' इत्यादि मन्त्र भी पठित हैं । स्तुति करता है । ऋषि ब्रह्मादि स्तम्बपर्यंन्त सारे जगत् को आहुति का ही परिणाम मान कर अग्नि की अष्टादश अध्याय: वसोर्धारा एवं राष्टभूत् आदि होम पहले इस अध्याय की प्रारम्भ की २ ९ कण्डिकाओं में वसोर्धारा नामक आहुति के मन्त्र भर कर उपदिष्ट अरण्यानूच्य हैं । यहाँ पुरोडाश यजमान घृत को संस्कृत करता है । फिर उदुम्बर वृक्ष की बहुत बड़ी स्रुवा से पाँच बार घृत पहुँच जाय, तब ' बाजश्र्व ' के ऊपर निरन्तर अविच्छिन्न धारा से वसोर्धारा संज्ञक आहुति देता है । घृत जब अग्नि ' पदों तक का संयोजन आवश्यक है । इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण प्रारंभ करना चाहिये । प्रत्येक मन्त्र के अन्त में ' वेट् स्वाहा की पूर्ति के इन २ ९ कण्डिकाओं में कुल ४०१ यजुमंन्त्र हैं और कामनाओं की संख्या ११५ है । यहाँ वर्णित कामनाओं का आश्रय लिये ये आहुतियाँ दी जाती हैं । इनका पूरा विवरण भाष्य ( पृ ० १७३ ) में ही देखना चाहिये । कामनाओं को, सब प्रकार की कोई न कोई वस्तु होती है । इन मन्त्रों में वर्णित वाज, प्रसव आदि सब वस्तुएं ही हैं । इन वस्तुओं नाम कामनाओं को प्राप्त कराने वाली मन्त्रसाध्य यह धारा वसुमयी कही गई है । वसु की यह धारा ही यहाँ है, वसोर्धारा अर्थात् इनमें से अभिहित है | इन २ ९ कण्डिकाओं में से २४ वीं अयुग्म स्तोम वाली और २५ वीं युग्म स्तोम वाली प्रवृत्ति १. दही और दूध के मिश्रण को सान्नाय्य कहा जाता है । इसके लिये किये जाने वाले सारे संस्कारों की यहाँ अमन्त्रक होती है । २. " कर्णशब्देनात्र पत्रशाखादिकं विवक्षितम् । " ' कर्णकशब्देन दारुस्फोटो रोगो विवक्षित इति केचनाचार्या आहु: " ( भा ०, पृ ० १४ ९ -१५० ) । ३. " घृतपूर्णया सुचा आहुतिः पूर्णाहुतिरित्यर्थः " ( भा ०, पृ ० १५२ ) ।
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( 3 ) स्तोत्र नामक मन्त्रों विषम संख्या और सम संख्या के मन्त्रों से आहुति दी जाती है । सामविधान हैं, ताण्ड्यमहाब्राह्मण । आदि में का स्वरूप प्रदर्शित है । अयुग्म और युग्म के भेद से इनके दो प्रकार होते विनियोग ' वयोहोम में और आगे को कण्डिका का नामग्राहहोम में है । उपदिष्ट हैं | २६-२७ संख्या की दो कण्डिकाओं का २ ९ वीं कण्डिका में कल्पहोम के मन्त्र में सर्वोषधियों अग्नि क्षेत्र में जैसे सर्वोषधियों का वपन किया जाता है, उसी तरह से यहां भी औदुम्बर चमस सात मन्त्रों से वाजपेय सम्बन्धी को भर कर चतुष्कोण औदुम्बर सुवा से पहले नवम अध्याय ( ९ १२३ - २ ९ ) में उपदिष्ट देनी चाहिये । इसके लिये ' वाजस्य ' वाजप्रसवीय आहुतियाँ दी जाती हैं । इसके बाद उसी विधि से अग्निसम्बन्धी आहुतियाँ चतुष्कोण स्रुवा को आहवनीय ( १८ | ३०-३६ ) इत्यादि सात मन्त्र विनियुक्त हैं । इस कर्म की समाप्ति पर औदुम्बर पूर्व दिशा में ग्रीवा और उत्तर अग्नि में प्रक्षिप्त कर और चित्याग्नि की पुच्छ की उत्तर दिशा में परिश्रित् से संलग्न तत्पर ब्रह्मसचं सकाम यजमान दिशा में लोम वाले कृष्ण मृगचर्म को बिछा कर उस पर बैठता है । चयन याग अभिषिक्त के लिये करता है । प्रोक्षण के लिये को अध्वर्यु ' देवस्य त्वा ' ( १८३७ ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए सर्वोषघशेष नहीं, से क्योंकि कात्यायन श्रौतसूत्र में इसो पक्ष को सर्वोषधि को दूध और जल से सिंचित किया जाता है, केवल जल से ' इत्यादि छः कण्डिकाओं स्वीकार किया गया है । इसके बाद द्वादशगृहीत घृत के बारह विभाग कर ' ऋताषाट् दी जाती हैं । इन मन्त्रों के ( १८ ३८-४३ ) में स्थित १२ मन्त्रों को स्वाहाकार से संयुक्त कर राष्ट्रभृत् संज्ञक १२ आहुतियाँ निर्माण की विधि भाष्य ( पृ ० १ ९ ४ ) में निर्दिष्ट है । लेकर प्रतिप्रस्थाता आदि रथ के राष्ट्रभृत् संज्ञक होम के अनन्तर पूर्व संस्कृत आज्य से ही पाँच बार घृत कर ' स नो भुवनस्य ' शिरोभाग के पास आहवनीय अग्नि के समक्ष खड़े रहें और अध्वर्यु उस घृत को पांच भागों में जहाँ विभक्त कि ईषा के दोनों तरफ के ( १८४४ ) मन्त्र की आवृत्ति करते हुए पाँच आहुतियाँ दे । रथ का शिरोभाग ' वह है, बाद अध्वर्यु उस रथ को अग्नि भागों में युग को बांधा जाता है । रथ के शिरोभाग में पंचगृहीत आज्य की आहुति स्थापित देने के करे और तब उसके तीन से दूर हटा कर उत्तर दिशा में वेदि के मध्य में युग, योक्त्र आदि के साथ उच्चारण करते हुए दे । स्थानों पर वातहोम नामक तीन आहुतियाँ ' समुद्रोऽसि ' ( १८०४५ ) कण्डिका स्थित तीन मन्त्रों का के नीचे तीसरी आहुति दी रथयुग की दक्षिण धुरा के नीचे पहली, उत्तर धुरा के नीचे दूसरी और युग के मध्यभाग जाती है । है और पांच वातहोम के अनन्तर पूर्व संस्कृत आज्य में से एक - एक कर नौ बार घृत का ग्रहण किया जाता होम और अर्काश्वमेघ-कण्डिकाओं ( १८।४६-५० ) में स्थित नो मन्त्रों से नौ आहुतियाँ दी जाती हैं । ये आहुतियाँ हुए रुङ्मती तीन ऋचाओं ( १८।५१-५३ ) सन्तति होम के नाम से प्रसिद्ध हैं । अब प्रातरनुवाक के मन्त्रों का पाठ ( उपाकरण ) करते के यज्ञायज्ञीय साम से उपधान के क्रम ' प्रत्येक परिधि को अग्नि से संयोजित किया जाता है । तब आग्निमारुत स्तोत्र का स्पर्श कर अग्नि से पहले ' दिवो मूर्घासि ' ( १८।५४-५५ ) आदि दो ऋचाओं से दक्षिण और उत्तर परिधि के ) सन्धिस्थलों से समष्टियजुः संज्ञक होम को का विमोचन किया जाता है । इसके बाद आठवें अध्याय के नौ मन्त्रों ( ८ / १५-२३ सम्पादित कर यहाँ के दो मन्त्रों ( १८ ५६-५७ ) से पुनः अग्नि देवता के निमित्त दो आहुतियां दी जाती हैं । तब कार्यं हृदयशूल सम्पन्न के समक्ष ‘ यदाकूतात्’४ ( १८ / ५८-६५ ) आदि आठ मन्त्रों में से प्रत्येक से सुवाहुतियाँ दी जाती हैं । इतना १८४ ) । १. " एकहायनप्रभृत्या पञ्चहायनात् पशवो वयांसीत्युच्यन्ते " ( भा ०, पृ ० २०० ) । २. " ईषाग्रयोरुपरि यत्र युगस्य बन्धनं क्रियते, तत् स्थानं रथस्य शिरः " ( भा नि ० ०,, पृ पृ ० ० १२१ ) | ३. " यस्मिन् शूले पशुहृदयं प्रोतं भवति, तद् हृदयशूलमित्युच्यते ” ( श्रोत ४. " आकूतो नाम प्राङ्मनोप्रवृत्तेरात्मनो धर्मो मनःप्रवृत्तिहेतुः " ( भा ०, पृ ० २१४ ) ।
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( १० ) में अग्नि को भावना करता है, अर्थात् अग्नि के कर अब यजमान ' अग्निरस्मि ' ( १८२६६ ) मन्त्र का पाठ करते हुए अपने मन्त्र से यजमान और अग्नि को अभिन्नता का अद्वय-साथ अपनी अभिन्नता का अनुभव करता है । इस त्रिष्टुप् छन्द के यजमान ' ऋचो नामास्मि ' ( १८६७ ) मन्त्र से चित्याग्नि दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है । अग्नि के साथ अद्वयभावापन्न सात, आठ अथवा दस ( १ ९ ८ ६८-७७ ) मन्त्रों से चिति का का उपस्थान करता है और अन्त में पुरीष - निवाप के बाद बाद प्रत्येक चिति का किया जाता है । उपस्थान करता है । यह उपस्थान पुरीष - निवाप ( मृत्पूरण ) के प्रक्रिया पूरी होती है । इस प्रकार इन आठ अध्यायों ( ११-१८ ) में यह अग्निचयन की एकोनविंश अध्याय: सौश्रामणी याग है । ऐहिक समृद्धि की कामना इसके बाद के तीन अध्यायों ( १ ९ - २१ ) में सौत्रामणी याग को विधि निरूपित देने वाले, से अथवा मुख से सोम का वमन कर घाले, अग्निचयन की विधि को पूरा कर लेने वाले, मुखेतर का अथवा छिद्र पशुकाम यजमान का इसमें अधिकार है । यहाँ अर्थात् इसको पचा सकने में असमर्थ, राज्य से च्युत नृपति जाता है कि क्या तुम सौत्रामणी याग के लिये सोम ' बेचने वाले से अथवा किसी नपुंसक से पहले पूंछ लिया सुरा और पर सीसे से शष्पों को, ऊन से तोक्म को, सूत से लाजा को उपादेय द्रव्यों को बेच सकते हो? उसकी स्वीकृति मिल जाने व्रीहि को, तोक्म अंकुरित यव को और लाजा और किसी योग्य द्रव्य से नग्नहु को खरीदा जाता है । यहाँ सर्ज की शष्प छाल अंकुरित से लेकर शष्प पर्यन्त द्रव्यों को जब एक में मिला भूंजे गये व्रीहि ( खील = धान का लावा ) को कहते हैं । लेने के बाद शब्द को हाथ में लेकर दक्षिण द्वार से दिया जाता है, तो उसे नग्नहु कहते हैं ( पृ ० २२ ९ ) । इनको का खरीद चूर्णं बना दिया जाता है । इसी तरह शष्प, तोक्म और अग्न्यागार में प्रवेश कर नग्नहु नाम से अभिहित सभी द्रव्यों को सम्पन्न कर ढेर से पात्रासादन आदि की विधि लाजा का भी चूर्ण तैयार किया जाता है । तब दर्शपूर्णमास चरु की पद्धति पकाया जाता है । इनकी मांड ( आचाम ) में गरम जल सारे पानी में व्रीहि और श्यामाक का अलग - अलग पात्र में नग्नहु का बनाया गया चूर्ण मिला दिया जाता है । मिलाकर उसे दो अलग - अलग पात्रों में भर लिया जाता है मिलाने । इनमें से बने घोल को ' मासर कहा जाता है । इस तरह से दो ऊपर वर्णित पदार्थों के चूर्ण और इस आचाम ( मांड ) को के ओदनों, व्रीहि तैयार कर लेने के बाद दोनों पात्रों तरह के आचामों और नग्नहु आदि के चूर्णों को मिलाकर के मासर चूर्ण के साथ मिला दिया जाता है । तब ' स्वाद्वीं त्वा ' और श्यामाक के चरुओं को शष्प, तोक्म, लाजा और नग्नहु हुए एक हो पात्र में चूर्णसंसृष्ट ओदनों को मासरों ( १ ९ 1१ ) और ' अंशुना ' ( २०२७ ) इन दो ऋचाओं का खोद पाठ कर करते उसमें तोन रात्रि पर्यन्त इसे रहने दे । के साथ मिला कर यज्ञशाला के नैर्ऋत्य कोण में गड्ढा अलग - अलग पका कर दो अलग - अलग पात्रों इसी प्रयोगविधि इस प्रकार है- व्रीहि और श्यामाक का चरु के अलग - अलग तीन है । तब शष्प, तोक्म और लाजा में इनके मांड को भर कर उसमें गरम पानी मिला दिया जाता भरे दो पात्रों में उन्हें मिला दिया जाता है । इसके बाद जगह बनाये गये चूर्णं के तृतीय अंश के दो भाग कर उन मांड से दो भाग कर इनको आचाम पात्रों में मिला दिया जाता है । हु के चूर्ण के दो भाग किये जाते हैं । पहले हिस्से के पुनः कहा जाता है । अब शष्प, तोक्म और लाजा चूर्ण के जैसा कि पहले कहा गया है. इस चूर्णसंसृष्ट आचाम को मासर को ओदन पात्रों में डाला जाता है । इसी तरह से द्वितीय तृतीयांश को दो भागों में विभक्त कर इनके एक - एक पात्रों भाग में डाल दिया जाता है । तब इन दोनों पात्रों के नग्न चूर्ण के द्वितीय भाग को भी द्विधा विभक्त कर इन ओदन करते हुए चूर्ण, मासर और ओदनों को हिला - डुला कर ओदनों को एक ही पात्र में भर दे और उक्त दो मन्त्रों का पाठ रात्रि तक गड्ढे में रखा जाता है । राष्प, तोक्म और लाजा एकरस कर दे । इतना कर लेने के बाद इस घोल को तीन १. “ व्रीहिश्यामाकयोश्चरू पक्त्वा तयोरोदनयोराचामौ पृथक् पात्रद्वये निषिच्य अवस्राव्य तदुदकं नग्नहुप्रभृतिभि-चूर्णैः संसृज्य निदध्यात् । ' " तस्य चूर्णसंसृष्टस्य आचामस्य मासरमिति संज्ञा " ( भा ०, पृ ० ३४८ ) ।