वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20
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( ११ ) कर सुरक्षित रख चूर्ण के अवशिष्ट तृतीयांश को प्रतिदिन उस निष्पाद्य सुरा में डालने के लिये तीन भागों में विभक्त लिया जाता है । ' अश्विम्यां इस सौत्रामणी याग के प्रारंभ में ऊपर की विधि को पूरा कर लेने के बाद सायंकालोन होम के उपरान्त मन्त्र से सुरा का पच्यस्व ' ( १ ९ ।१ ) मन्त्र से एक गाय का स्पर्श कर उसको दुहे और उसके दूध से अध्वर्यु ' परीतः ' ( २ निशान्त ९ ।२ ) ( प्रातःकाल ) में सेचन करे । बचा कर रखे गये शब्पचूर्ण के तृतीयांश को सुराभाण्ड में डाले । दूसरे दिन करे । साथ ही तोक्म ' सरस्वत्यै पच्यस्व ' ( १ ९ ११ ) मन्त्र से दो गायों का स्पर्श करे और उनको दुह कर पूर्ववत् सुरासेचन स्पर्श कर उन्हें के चूर्ण का तृतीयांश उसमें डाले । तीसरे दिन रात्रि में ' इन्द्राय सुत्राणे ' ( १ ९ ११ ) मन्त्र से तीन गायों का मिला दे । दुहे । तोनों के दूध को एक पात्र में मिला कर पुनः सुरासेचन करे तथा लाजा चूर्ण के तृतीयांश को इसमें आगे की दो कण्डिकाओं ( १ ९1३-४ ) में से पहली में दो मन्त्र हैं और दूसरी में एक ही । इन तीनों मन्त्रों का विनियोग यहाँ सुरासेचन में विपरीत क्रम से बताया गया है । इस सुरा को लेकर गाय और अश्व के है केशों । ' सत से ' शब्द निर्मित से पवित्र से छान कर सत ( पलाश ) निर्मित एक बड़े पात्र में ' पुन्गति ' ( १ ९ १४ ) मन्त्र से भर दिया जाता लिये सौत्रामणी में कुछ आचार्यं वारण पात्र का ग्रहण करते हैं । मुखेतर छिद्र से सोम का वमन करने वाले यजमान के पूर्वाध उक्त ' वाय पूतः ' ( १ ९ ३ ) कण्डिका के उत्तरार्ध से और मुख से सोमवामी के लिये ' वायोः पूतः ' कण्डिका वेतस के निर्मित पात्र में पात्र में सुराको छाना जाता है । उत्तर वेदि में अजा और मेष के लोम से निर्मित पवित्र से ' ब्रह्म क्षत्रम् ' ( १ ९ १५ ) मन्त्र से दूध डाला जाता है । इस प्रकार सुरा और दूध को मिलाने के उपरान्त ते योनि ' कुविदङ्ग ' इन दो ' ( १ ९ / ६ ) मन्त्र से तीन पयोग्रहों का ग्रहण किया जाता है । मन्त्रपाठ में ' उपयामगृहीतोऽसि ' और ' एष - अलग याजुष मन्त्रों का यद्यपि एक ही बार पाठ किया गया है, किन्तु तीन पयोग्रहों का ग्रहण करते समय इनकी अलग आवृत्ति की जाती है । ऐसा करते समय तीन मन्त्रों का जो स्वरूप बनता है, उसे भाष्य में दिखा दिया गया है ( पृ ० २३५ ) । ' नाना हि वाम् ' ( १ ९ १७ ) मन्त्र से तीनों पयोग्रहों का ग्रहण करने के उपरान्त तीन सुराग्रहों का ग्रहण इन्हीं मन्त्रों द्वारा विपरीत क्रम से किया जाता है । जैसे कि पहले आश्विन पयोग्रह का ग्रहण कर आश्विन सुराग्रह का ग्रहण करे । तब सारस्वत पयोग्रह और सारस्वत सुरा का और अन्त में ऐन्द्र पयोग्रह के साथ ऐन्द्र सुराग्रह का । भाष्य इसी स्थल पर ( ० २३६ ) पात्रों के ग्रहण के बाद उनके सादनक्रम का भी निरूपण किया गया है । ग्रहण और सादन के बाद अध्वर्यु तीनों पयो ग्रहों की उत्तराग्नि में एक साथ ' उपयाम ' ( १ ९ १८ ) मन्त्र से आहूति देता है । प्रतिप्रस्थाता दक्षिणाग्नि में एक से नहीं, क्योंकि तैत्तिरीय श्रुति ने इसको निषिद्ध माना है । अन्य आहुति पालाश के उलूखल से दे, मृण्मय स्थाली एक मूल्य शाखाओं में सौर ग्रहों का अवघाणन मात्र निर्दिष्ट है । इनका भक्षण वर्जित है । वैश्य और राजन्य में के से अंगारों कोई में परिधि से इसका क्रय कर भक्षण कर सकता है । एक अन्य पक्ष भी यहाँ बताया गया है कि दक्षिण आहवनीय के बाहर दक्षिण दिशा में होमावशिष्ट सुग्रहों की आहुति दे । इनका क्रम इस प्रकार है -- आश्विन सुराग्रह की उत्तर में, सारस्वत की बीच में और ऐन्द्र सुराग्रह की दक्षिण में आहुति दे । आश्विन ग्रह के ग्रहण के उपरान्त और सादन से पहले दो दर्भ - तृणों के अग्रभाग को पूर्व दिशा में कर पात्र के ऊपर रखा जाता है । इसके साथ ही गोधूम और कुवल के चूर्ण को भी दुग्धपात्र में डाला जाता है । कुवल बड़े बेर को कहते हैं । सारस्वत ग्रह में उपवाक और बदरी फल के चूर्ण को डाला जाता है । यवसदृश गोधूमवर्णं गोधूम ( गेहूँ ) के समान तुष से रहित इन्द्रयव नामक धान्य को यहाँ उपवाक कहा गया है । यव और कर्कन्धु ( अतिस्थूल बदरी फल ) के १. “ चातुर्मास्य याग के वरुणप्रघास पर्व में, पशुबन्ध याग में और अग्निष्टोम प्रभृति यागों में आहवनीय स्थानीय जिस अग्नि पर प्रधान याग किया जाता है, उस अग्नि के स्थान को उत्तरवेदि कहते हैं " ( कात्या ० यज्ञ ०, पु ०४७० ) ।
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( १२ ) में स्थित प्रारंभ के मन्त्रों का पाठ आवश्यक चूर्ण को ऐन्द्र पयोग्रह में मिलाया जाता है । ऐसा करते समय नवीं काण्डिका । तीन पात्रों में निक्षेप किया जाता है है | अवशिष्ट मन्त्र ( १ ९ १ ९ ) के तीन भागों से वृक आदि के रोमों का सुराग्रह के · में अवस्थित अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों मिलकर ' अन्तःपात्य स्थान ‘ या व्याघ्रम् ' ( १ ९ ।१० ) इत्यादि मन्त्र से १ ९ ।११ ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए पूर्वाभिमुख यजमान का श्येन पक्षी के पंखों से प्रोक्षण करते हैं । ' यदा पिपेष औत्तरवेदिक ' ( अग्नि का ईक्षण करता है । इसी अध्वर्यु यजमान को अग्नि देखने के लिये कहता है । तदनुसार यजमान स्थ ' ( १ ९ | ११ ) से सुराग्रहों का स्पर्श कण्डिका के ‘ सम्पृच स्थ ' ( १ ९ ।११ ) मन्त्रभाग से यजमान पयो ग्रहों का और ' विपूच करता है । नहीं बताया गया । ' देवा यज्ञम् ' ( १ ९ १२ - ३१ ) इत्यादि बीस कण्डिकाओं का कात्यायन श्रौतसूत्र में विनियोग । निदान वाले मन्त्रों का निदान बताने इनमें सोत्रामणी याग और सुरा की सोमयाग और सोम से समानता बताई गई है संबन्धो इतिहास शतपथ ब्राह्मण से अर्थ को समझने में सहायता मिलती है । इसके लिये भाष्य में ( पृ ० २४२ ) सौत्रामणी आदि द्रव्य, शस्यसम्पत्ति, न्यूंख, सवन-के आधार पर बताया गया है । यहाँ मासर, आसन्दी वेदि, हविर्घान घाना द्रव्यों से तुलना की गई है । सम्पत्ति, वायव्य पात्र, इडा, हुतोच्छिष्ट सुरा आदि की सोमयागीय इन्हीं ' सौत्रामणी याग और सोमयाग की इस समानता से परिचित अध्वर्यु तीनों पयो ग्रहों की एक साथ ' यस्ते ' ' सुरावन्तम् ( १ ९ ३३ ) ( १ ९ ३२ ) मन्त्र से आहुति देता है । इसके बाद प्रतिप्रस्थाता दक्षिणाग्नि में पलाश उलूखल अनुसार से यह सुराग्रह निषिद्ध की है । ' यमश्विना ' मन्त्र से आहुति देता है । मृण्मय स्थाली से आहुति नहीं दी जाती, क्योंकि श्रुति आश्विन के पयोग्रह को हाथ में लेकर एक बार ( १ ९ ३४ ) मन्त्र से अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता और अग्नीत् – ये तीनों मिलकर करते हैं । ' होता, " ब्रह्मा और ४ मैत्रावरुण मन्त्रोच्चार के साथ तथा दुबारा बिना मन्त्र का उच्चारण किये भक्षण १ ९ ३५ ) मन्त्र में उत्तराग्नि में पयो ग्रहों इसी क्रम से सारस्वत ग्रह का और यजमान ऐन्द्र ग्रह का भक्षण करते हैं । ' यदत्र ' ( श्रौतसूत्र ( १ ९।३।१६-२० ) की तथा दक्षिणाग्नि में सुराग्रहों की आहुति देकर भक्षण करने का विधान है । कात्यायन और अग्रीत् पयोग्रहण और का कहना है कि विहार के दक्षिण में उपविष्ट प्राचीनावीतो अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता दो बार करते हैं । यहाँ पूर्व - पूर्वं ग्रह भक्षण की इतिकर्तव्यता का बिना अतिक्रम किये सौर और आश्विन ग्रहों का भक्षण शेष का सारस्वत में और सारस्वत शेष के भक्षण से बचे अंश का उत्तर ग्रह में निक्षेप किया जाता है । जैसे कि आश्विन अन्तः-१. " अग्निष्टोम प्रभृति यागों में प्रकृतिशाला से पूर्व और महावेदि के मध्य का तीन अरत्नि का स्थान पात्य हैं " ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ४५ ९ ) । है । यह देवता का २. " यह श्रौत याग का एक प्रमुख ऋत्विक् है । इसका कृत्य ऋग्वेद के अनुसार भी होता यही करता है । वेदि के आवाहन और स्तुति करता है । याज्या और पुरोनुवाक्या के मन्त्रों का पाठ प्रमुख ऋत्विक् है पश्चिम में उत्तर श्रोणी के निकट इसके बैठने का स्थान है । सोम याग में यह अपने गण का और पूर्ण दक्षिणा का अधिकारी है ” ( कात्या ० यज्ञ ०, १० ५३१ ) । इसी पर है । ३. " यह श्रौत याग का प्रमुख ऋत्विक् है । श्रौत याग यथाविधि हो, इसे इस सम्पूर्ण बात श्रौतविधि का उत्तरदायित्व एवं समस्त ऋत्विजों याग के कर्म में वैषम्य होने पर इसे प्रायश्चित्त करना पड़ता है । आधार पर इसे अथर्ववेदी द्वारा विहित कार्यविधि की जानकारी होनी चाहिये । गोपथब्राह्मण के वचन के पड़ती हैं " ( कात्या ० होना चाहिये । यह श्रौत याग का कर्णधार है । याग के कार्यों में इससे अनुमति माँगनी यज्ञ ०, पृ ० ५०५ ) । दक्षिणा मिलती है । इसे " यह सोम याग के होतृगण का द्वितीय ऋत्विक् है । इसे होता की अपेक्षा आधी अर्धी भी कहते हैं । प्रशास्ता इसका नामान्तर है " ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ५१० ) ।
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( १३ ) का ऐन्द्र ग्रह में अवनयन किया जाता है । अन्य शाखा वालों का कहना है कि सौर ग्रहों का अवघाणन मात्र किया जाता है, मुख से भक्षण नहीं । अथवा वैश्य और राजन्य में से कोई एक मूल्य से खरीद कर सौर ग्रहों का पान कर सकता है । पूर्वं ( १ ९ ३५ ) मन्त्र में सुराग्रहों के भक्षण, अवघ्राणन अथवा पान - ये तीन पक्ष बताये गये हैं । ' पितृभ्यः आहवनीय ' ( १ ९ ।३६ के ) मन्त्र में चतुर्थ पक्ष यह बताया गया है कि परिधि के बाहर दक्षिण दिशा में स्थापित दक्षिणसंस्थ दक्षिण अंगारों में होमावशिष्ट सुराग्रहों की आहुति दी जाय । इनमें से आश्विन सुराग्रह की उत्तर में, सारस्वत ग्रह की मध्य में और ऐन्द्र ग्रह की दक्षिण में आहुति दी जाती है । ये आहुतियाँ भी अपसव्य रहते हुए ही दी जाती हैं | ' अक्षन् पितरः ' ( १ ९ / ३६ ) मन्त्र से होम के क्रम से सौर ग्रह के पात्रप्रक्षालन जल से यथाक्रम अंगारों का भी अपसेचन किया जाता है और इसी कण्डिका के ' पितरः शुन्धध्वम् ' मन्त्र का जप किया जाता है । इसके बाद चरक सौत्रामणी कुम्भ की १५ वें अध्याय की दसवीं कण्डिका में बताई गई पद्धति से शतछिद्रा कुंभी को लेकर दक्षिण आहवनीय के ऊपर सिकहर बांध कर उसमें बाल, पवित्र और हिरण्य को रख कर उसमें परिस्रुत् ' शेष का आसिंचन करे । कुंभी के छिद्रों से जब यह रिस कर अग्नि में गिरने लगे, तब ' पुनन्तु ' ( १ ९ ।३७ - ४४ ) इत्यादि मन्त्रों का पाठ करे । गोबाल से निर्मित सुरागलन बाल और अजाविलोम से निर्मित पयोगलन पवित्र कहलाता है । हिरण्य शतमान परिमित होना चाहिये । शतछिद्रा कुंभी के स्थापन की विधि यह है कि दक्षिण आहवनीय के दोनों तरफ स्थापित दो खंभों के ऊपर दक्षिणाग्र वंश को रख कर और कुंभी के तल में बाल आदि को रखकर उसमें सुराशेष का सेचन करे । अग्नि के ऊपर सुरा का स्रवण होते समय यजमान उक्त मन्त्रों का पाठ करे । यहाँ ३७ वीं कण्डिका में दो मन्त्र हैं । इस प्रकार इन मन्त्रों की संख्या नौ हो जाती है । ' ये समानाः ' ( १ ९ ।४५ ) मन्त्र से प्राचीनावीती दक्षिणामुख यजमान सकृत् गृहीत आज्य की दक्षिणाग्नि में जुह से आहुति देता है और ' ये समाना: ' ( १ ९ ।४६ ) मन्त्र से उत्तर दिशा में उत्तर वेदि की आहवनीय अग्नि में उपवीती यजमान पूर्ववत् सकृत् गृहीत आज्य की आहुति दे । यहाँ भाष्य ( पृ ० २६१ ) में वाल्मीकि रामायण के प्रमाण से बताया गया है कि सगोत्र बन्धुबान्धव सहज मात्सर्य से कैसे ग्रस्त रहते हैं । तदुपरान्त सभी ऋत्विक् जब यजमान का अनुवर्तन करते हुए चलते हैं, उस समय अध्वर्यु ' द्वे सृती ' ( १ ९ १४७ ) मन्त्र से दुग्ध की आहुति देता है और यजमान ' इदं बर्हि ' ( १ ९ ४८ ) मन्त्र से उखास्थित शेष दुग्ध को प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है । ' उदीरताम् ' ( १ ९ ।४ ९ -६१ ) इत्यादि १३ ऋचाओं वाले अनुवाक के प्रथम तीन और १३ वीं कण्डिका का विनियोग कल्पकार ने अग्निष्वात्त पितरों के लिये, इनके बीच की नौ ऋचाओं में से प्रथम तीन का सोमपा पितरों के लिये, आगे की तीन का बर्हिषद् पितरों के लिये और अन्तिम तीन का पुनः अग्निष्वात्त पितरों की स्तुति में किया है । ' पुनन्तु मा ' ( १ ९ ३ ९ - ४७ ) इत्यादि नौ ऋचाओं के पाठ के का अनन्तर पाठ सोमवत्, बर्हिषत् और अग्निष्वात्त पितृदेवताक तीन - तीन, अर्थात् ' त्वं सोम ' ( १ ९ ।५२ - ६० ) इत्यादि नौ ऋचाओं अध्वर्यु यजमान से कराता है । आगे का अनुवाक दस ऋचाओं वाला है ( १ ९ ६२ - ७१ ) । यद्यपि इसका विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र में निर्दिष्ट नहीं है, तो भी पूर्वतन १३ ऋचाओं वाले अनुवाक का और इस दस ऋचा वाले अनुवाक का ) लैंगिक इन्द्रसंबन्धी विनियोग है और श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मणभोजन के समय वाचन में किया जाता है । इनमें से अन्तिम मन्त्र ( १ ९ ७२ यह अगले ‘ सोमो राजा ' ( १ ९।७२- ७ ९ ) अनुवाक का निदानभूत है । इस आठ ऋचा वाले अनुवाक से अध्वर्यु और पयो शेष ग्रहों चार और से सुराग्रहों का एक साथ उपस्थान करता है । यहाँ दूसरा पक्ष यह है कि चार ऋचाओं से पयोग्रहों में का से प्रत्येक से दो - दो सुराग्रहों का ग्रहण किया जाता है, तदुपरान्त उपस्थान । आगे ( १ ९ ।८० - ९ ५ ) की सोलह कण्डिकाओं आहुतियाँ दी जाती हैं । इसके लिये ऋषभ के ३२ खुरों को अग्नि में तपा कर उनमें से वसा निकाल कर किसी पात्र में B १. " शिश्नाद् रसात्मना स्रुतात् सोमात् परिस्रुत् " ( भा ०, पृ ० २३० ) ।
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( १४ ) इकट्ठी की जाती है । इन्हीं से अध्वर्यु ३२ आहुतियाँ देता है । एक एक - मन्त्र से दो - दो वसाग्रहों की आहुति देकर प्रत्येक आहुति के शेष भाग को वैतस पात्र में इकट्टा करता है । भाष्य ( पृ ० ३०० ) में बताया गया है कि वृक, व्याघ्र के लोमों का भी सुराग्रह के पात्रों के लिये प्रयोग होता है । और सिंह विशाध्याय: सौत्रामणी याग ' सोमयाग की आसन्दी के समान यहाँ भी मूँज की रस्सी से बुनी गई औदुम्बर काष्ठ को अरत्नि प्रमाण के चार पायों वाली आसन्दी बनाई जाती है । इसके दो पायों को दक्षिण वेदि पर और दो को उत्तर वंदि पर घुटनों स्थापित तक किया जाता है । सोम याग ही इस याग की प्रकृति है । वहाँ नाभित्रमाण पायों वाली आसन्दी का विधान: । उसके स्थान पर यहाँ जानुप्रमाण पायों वाली आसन्दी बनती है । इस पर कृष्णाजिन बिछाया जाता । यह सारा कार्य इस अध्याय के प्रथम मन्त्र से किया जाता है । दूसरे मन्त्र का पाठ करते हुए यजमान उस पर बैठता है । इस आसन्दी बैठे यजमान के वाम पाद के पास ' मृत्योः पाहि ' ( २०१२ ) मन्त्र से और ' विद्योत्पाहि ' ( २०१२ ) से दक्षिण पर पृथ्वी पर सौवर्णं रुक्माभरण रखा जाता है । कुछ आचार्यों के मत से प्रथम मन्त्र से सिर पर पाद के समीप इनको रखा जाता है । तृतीय कण्डिका में तीन मन्त्र हैं । इनसे चन्दन, कपूर, कस्तुरी, केसर और दूसरे से दक्षिण पाद में उद्धति, आसन्दी पर बैठे यजमान के मुख पर अध्वर्यु वेतस पात्र में स्थापित वसाग्रह - शेष को चारों आदि सुगन्धित द्रव्यों से उसका अभिषेक करता है । यहाँ के तीनों मन्त्रों को ' सावित्रं देवस्य त्वा ' मन्त्र से जोड़ा जाता है । दिशाओं में बहाता हुआ भिमुख अध्वर्यु द्वारा तीनों मन्त्रों को एक साथ पढ़ कर किया जाता है । यहाँ भी सावित्र मन्त्र का चतुर्थ उपसेचन उत्तरा-है । अन्य आचार्यों के मत से चतुथं उपसेचन महाव्याहृतियों से किया जाता है । संयोजन आवश्यक प्रस्तुत कण्डिका के ' इन्द्रस्येन्द्रियेण ' ( २०१३ ) मन्त्र से किया जाता है । ( २०१४ ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान का स्पर्श करता है । एक पक्ष यह भी है कि चतुर्थ अभिषेक इतना करने के उपरान्त अध्वर्यु ' कोऽसि ' तब यजमान ' शिरो में ' ( २०१५ - ९ ) इत्यादि पाँच मन्त्रों से अपने शरीर के मन्त्र निर्दिष्ट विभिन्न करता है और आसन्दी से उतर कर ' प्रति क्षत्रे ' ( २०१० ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए नीचे कृष्णाजिन अंगों का स्पर्श पर बैठता है । शस्त्र - मन्त्र की समाप्ति पर वषट्कार का उच्चारण कर ' त्रयो देवाः ' ( २०११-१२ बिछा कर उस refuser ओं के मन्त्रों से अवशिष्ट ३३ वें वसाग्रह की आहुति दी जाती है । इस ) इत्यादि दो उपहवपूर्वक ' लोमानि ' ( २०१३ ) मन्त्र का पाठ करते हुए प्रसाद ग्रहण करता है । तदनन्तर ग्रह के अवशिष्ट भाग का यजमान ' यद्देवाः ' ( २०।१४-१८ ) इत्यादि साढे चार कण्डिकाओं से मासर कुंभ को जल में उतारता है और अवभृथेष्टि को पूरा कर भाग से उसे जल में डुबो देता है । तदनन्तर यजमान अवभृथ स्नान करने से पहले दो उग १८ वें मन्त्र के शेष उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है, ' सुमित्रिया ' ( २०१ ९ ) से जलग्रहण कर ' दुर्मित्रिया ' ( २०१ ९ ) मन्त्र से उसे उस दिशा में फेंकता है, जिसमें कि शत्रु रहता हो । अब सोमयाग की पद्धति से स्नान कर यजमानदम्पती कर्मकाल में घृत वस्त्र का जल में परित्याग उसका ( २०१२० ) । तदुपरान्त अगले मन्त्र ( २०1२१ ) से सोमपान की पद्धति से ही जल से निकल कर ये ' अपाम सोमम् कर देते हैं । इस ऋचा का पाठ करते हुए त्रिपशुस्थान पर वापस आ जाते हैं । यहाँ ' आपो अद्य ' ( २०१२२ ' ( ८१४८१३ ) आहवनीय अग्नि का उपस्थान करता है । तब ' एघोऽसि ' ( २०२३ ) मन्त्र से समिधा का ग्रहण ) मन्त्र से यजमान से अग्नि में उसकी आहुति देता है । इसके उपरान्त कण्डिका ( २०१२३ ) के शेष भाग से सकृत् कर ' समिदसि ' ( २०२३ ) दो जाती है । गृहीत आज्य की आहुति अ यजमान सौत्रामणी याग से पहले आदित्येष्टि का अनुष्ठान कर त्रिपशुओं दक्षिणाग्नि का विहरण कर अग्नि का अन्वाधान और ब्रह्मा का वरण करे । तब आहवनीय के अग्नि निमित्त आहवनीय और में तीन ( २०।२४-२६ ) १. इस योग का विशेष विवरण काव्या ० यज्ञ ० ( पृ ० १८४ - १ ९९ ) में देखिये ।
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( १५ ) मन्त्रों से तीन समिधाओं का आधान करे । आगे का मन्त्र ( २०२७ ) सुरा के संसर्जन में विनियुक्त है । तब यजमान तर से छानी गई सुरा का ' सिञ्चन्ति ' ( २०१२८ ) मन्त्र से किसी पात्र में ग्रहण करता है और दक्षिण कारो-वेद के बाहर एक गड्ढा खोद कर वहाँ गोचमं बिछा कर उस सुरा का सेवन करता है । उसके ऊपर वेदि कारोतर के खर के पास पात्र को, जो कि सुरा को छानने में समर्थ हो, रखता है । ऐसा करने से मैला पदार्थ नीचे रह जाता है और को, वंशमय कारोतर से ऊपर आ जाती है । अथवा ऐसा भी किया जा सकता है कि पहले चर्म के ऊपर कारोतर को रखे पूतं सुरा सुरा गिरावे । इससे कारोतर से छन कर पूत सुरा चर्म पर गिरेगी । ' कारोतरेण ' ( १ ९ ८२ ) मन्त्र से इसी और प्रक्रिया उस पर समर्थन मिलता है । आगे का मन्त्र ( २०१२ ९ ) श्रवणा कर्म से संबद्ध घानाहोम में विनियुक्त को पुरोडाश की पुरोनुवाक्या भी है । आगे के ' बृहदिन्द्राय ' ( २०३० ) मन्त्र से अध्वर्यु प्रेषित है । ( यही प्रेष- प्राप्त मन्त्र प्रातः सवनीय देवताक बृहती छन्द के इस मन्त्र का साम की पद्धति से गान करता है और ' अध्वर्थी ' ( २०१३१ ) मन्त्र से ) ब्रह्मा पूयमान इन्द्र-( दुध ) का अनुमन्त्रण करता है । पय १ ९वें अध्याय में ' सीसेन तन्त्रम् ' ( १ ९ ८० ) इत्यादि १६ ऋचाओं से आभ खुरों की चपा की ३२ आहुतियों का और वसाग्रहों के संस्रव से यजमान के अभिषेक का विधान किया गया था । अब यहाँ अध्वर्यु ' यो भूतानाम् ' ( २०१३२-३३ ) इत्यादि सार्धं कण्डिकात्मक मन्त्र से आरंभ खुरों के वसाशेष से निर्मित ३३ वें वसाग्रह का ग्रहण और शेष आघे मन्त्र से उसका सादन करता है । इस ३३ वें वसा ग्रह का होम करने के उपरान्त ऋत्विकगण शेष भाग को ' प्राणदा ' ( २०१३४-३५ ) इत्यादि मन्त्रों का पाठ करते हुए सूंघते हैं । सौत्रामणी से संबद्ध आध्वर्यव कर्म यहाँ पूरा हो जाता हैं । इसके बाद की ' समिद्ध: ' ( २०४३६-४६ ) इत्यादि ग्यारह कण्डिकाओं में प्रथम ऐन्द्र पशु के प्रयाज के याज्या -हैं । यहीं से सौत्रामणी याग का होत्र कर्म प्रारंभ होता है । आगे के छः मन्त्रों ( २० / ४७-५२ ) में वपा, पशु और पुरोडाश मन्त्र के याज्यानुवाक्या मन्त्र हैं । भाष्य ( पृ ० ३३५ ) में इस विषय को स्पष्ट किया गया है । पुनः आगे के दो मन्त्र ( २०१५३-५४ ) इन्द्र की स्तुति में विनियुक्त है । बाद बारह अनुष्टुप् ऋचाएँ ( २० / ५५-६६ ) त्रिपशु संबन्धी प्रयाजयाज्याओं में विनियुक्त हैं । ' अश्विना ' ( २०१६७-६९ ) इत्यादि तीन ऋचाएँ त्रिपशुसंबन्धी वपात्रों को तीन मन्त्र ( २०1७०-७२ ) पुरोडाशों की याज्यानुवाक्याएँ और बाद के तीन मन्त्र ( २०७३-७५ याज्यानुवाक्याएँ हैं । पुनः आगे के क्याएँ हैं । यहाँ भी भाष्य ( पृ ० ३५ ९ ) में इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाया गया है । ) तीन हवियों को याज्यानु-तीन पयो ग्रहों और सुराग्रहों के क्रमशः ' युवम् ' ( २०१७६ ) और ' पुत्रमिक ' याज्या मन्त्र हैं । पशुस्विष्टकृद् याग में ' यस्मिन्नश्वास: ' ( २०१७८ ) पुरोनुवाक्या ( २०१७७ ) ये दो पुरोनुवाक्या और मन्त्र हैं । ३३ वें वसाग्रह के सादन के अनन्तर अध्वर्यु प्रतिगर ( उत्साहवर्धन ) के लिये और ' अहाव्यग्ने ' ( २०।७ ९ ) याज्या होता इस अध्याय के अन्तिम ११ मन्त्रों ( २० / ८० - ९ ० ) का शस्त्र के रूप में शंसन करता होता है के सामने बैठता है । उस समय । + शतपथ ब्राह्मण के अवधेय अंश १६ से २० अध्यायों के मन्त्रों का यह विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र गया है । भाष्यकार ने यहाँ १६ से १८ अध्यायों में निर्दिष्ट मुनि कात्यायन उक्त के १८-१९ विनियोगों अध्यायों के आधार पर दिया शतपथब्राह्मण के ९ वें काण्ड और १ ९ -२० अध्यायों में निर्दिष्ट कात्यायन सूत्रों का का समर्थन स्थान - स्थान पर विस्तार अथवा संक्षेप में उद्धृत कर किया है । साथ ही मन्त्रों की विशिष्ट शब्दावली समर्थन १२ वें काण्ड के वचनों को पर की है । विशेष रूप से अवधेय बात यह है कि इस खण्ड में शतपथ के वचन की व्याख्या भी ब्राह्मणवचनों के आधार जितने कि पूर्व खण्ड ( ११-१५ अ ० ) में ये मिलते हैं । उतने विस्तार से उद्धृत नहीं मिलते, १६ वें अध्याय में शतरुद्रिय होम की प्रक्रिया को बताने वाले कुछ ही वचन संस्कृत अग्नि को ही रुद्र देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है । कुमार अग्नि के भव यहाँ मिलते है ( पृ ० ७-८ ) । यहाँ , शर्व आदि नामों को चर्चा पहले
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( १६ ) आ चुकी है । यजमान पर वह क्रूर न हो जाय, इसके लिये अन्नसंभरण किया जाता है, जतिल ( आरण्य तिल ) आदि की आहुतियाँ दी जाती हैं । आगे ( पु ० ४३ ) जातसंज्ञक रुद्रों का परिचय दिया गया है । इसके अतिरिक्त इस अध्याय में दो-चार हो छोटे - छोटे वचन शतपथ के मिलते हैं । सोलहवें अध्याय की अपेक्षा १७ वें अध्याय में शतपथ के वचन कुछ विस्तार से मिलते हैं । यहाँ ( पृ ० ८०-८१ ) बताया गया है कि वें अध्याय के पहिले ब्राह्मण में शतरुद्रिय होम संबन्धी मन्त्रों की व्याख्या प्रस्तुत की गई थी । अब दूसरे ब्राह्मण में परिषेक, धेनूकरण, विकर्षण आदि कर्मों का स्वरूप दिखाया जा रहा है । यहाँ यह भी कहा गया है कि परिषेक विधि को आग्नीध सम्पादित करता है, अध्वर्यु नहीं । धेनूकरण को विधि द्वितीय मन्त्र की व्याख्या ( पृ ० ८२-८३ ) के अवसर पर बताई गई है और विकर्षण का स्वरूप चतुर्थ से अष्टम मन्त्र की व्याख्या ( ८५-८९ ) में | बीच के तृतीय मन्त्र की व्याख्या ( १०८४ ) में अनेक प्रकार की इष्टकाओं की चर्चा आई है । ११ वें मन्त्र की व्याख्या में ओपवसथीय दिवस की इतिकर्तव्यता तथा १२ वें में स्वयमातृष्णा इष्टका पर व्याधारण की विधि प्रदर्शित है । एक कोने से दूसरे कोने तक आज्यधारा का जो क्षारण किया जाता है, उसे ही व्याधारण ' कहते हैं । यह व्याधारण पंचगृहीत आज्य से किया जाता है और स्वाहाकारपूर्वक यह क्रिया सम्पन्न होती है । यहाँ स्वाहाकार और वषट्कार का अन्तर बताया गया है और व्याधारण का क्रम भी ( पृ ० ९ ३ ) । पाँच आहुतियों क्यों दी जाती हैं, इसका प्रतिपादन १३-१६ मन्त्रों के भाष्य में मिलता है ( ० ९ ४ - ९ ८ ) | आगे ३३ वें मन्त्र के भाष्य में अग्निप्रणयन के लिये उपयोगी क्रियाओं का निरूपण आख्यायिका के साथ प्रदर्शित है । ब्रह्मा आदि के चित्याग्नि के प्रति गमन का प्रदर्शक ब्राह्मण ५४ वें मन्त्र के भाष्य में उद्धृत है । अगले मन्त्र के भाष्य में स्मृत शतपथवचन में भी यही विषय प्रदर्शित है | ५६ वें मन्त्र के भाष्य में इस मन्त्र के सारे विशेषण अग्निपरक ही हैं, इसको दिखाया गया है । ५७-५८ मन्त्रभाष्य में शतपथवचन उपलब्ध हैं, किन्तु ५ ९वें मन्त्रभाष्य में पृश्नि पाषाण, अर्थात् श्वेत पाषाण के उपधान की विधि को विस्तार से बताने वाले ब्राह्मण वचनों को दिखाया गया है । आगे के कुछ ( ६१-६३ ) मन्त्रों में पुनः संक्षेप में ब्राह्मणवचन उद्धृत हैं और बताया गया है कि ' रजस् ' शब्द का प्रयोग यहाँ ' लोक ' अर्थ में किया गया है ( पृ ० १३५ ) | आगे बताया गया है कि गार्हपत्य, आग्नीधीय और आहवनीय अग्नियां पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक का प्रतिनिधित्व करती हैं ( पृ ० १४० ) । अग्नि को चक्षु इसलिये कहा गया है कि यह प्रजा का अनेकविध उपकार करती है ( पृ ० १४२ ) । इसको सहस्राक्ष इसलिये कहा जाता है कि सहस्र संख्या के हिरण्य - शकलों ( खण्डों ) से इसका प्रोक्षण किया जाता है ( पृ ० १४३ ) । सुपर्ण शब्द में पर्णं शब्द का अर्थ पतन है ( पू ० १४५ ) । एक मत में कर्णक शब्द का पत्र, शाखा आदि अर्थं विवक्षित है, तो अन्य आचार्य दारुस्फोट नामक लकड़ी में लगने वाले रोग को कर्णक कहते हैं । ऐसी समिधा के न मिलने पर द्रप्स, अर्थात् दधि - बिन्दु का लेप कर तब समिधा की आहुति दी जाती है । ( पृ ० १४ ९ - १५० ) । आज्याहुतिकरण के प्रसंग में बताया गया है कि लोक में जैसे भोजन परोसते समय पहले शाक, दाल, भात आदि परोसे जाते हैं, जल आदि पेय पदार्थ बाद में दिये जाते हैं, उसी तरह से समिद्धोम परिवेषणस्थानीय है और आग्याहुति पेयस्थानीय ( पृ ० १५० ) । सात समिघाओं की प्राणात्मकता का प्रतिपादन काण्ड के आरंभ में ही किया गया है । वहाँ सात शीर्षण्य प्राणों को ऋषि बताया गया है । यहाँ प्राण शब्द से शरीर स्थित इन्द्रियाँ, जिह्वा शब्द से सात पुरुषात्मक इन्द्रियाँ और ऋषि शब्द से इष्टकास्थानीय इन्द्रियों का बोध कराया गया । इस प्रकार सभी शब्दों की इन्द्रियवाचकता के होते हुए भी उनमें अर्थभेद हो जाता है ( पृ ० १५२-१५३ ) । वैश्वानर शब्द यहाँ अग्नि का वाचक न होकर उसके लिये प्रदीयमान हवि के लिये प्रयुक्त है । इसकी आध्यात्मिक व्याख्या भी यहाँ शतपथ के आधार पर की गई है ( पृ ० १५४ ) । १. ऊपर पू ० ६ की टिप्पणी देखिये ।
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( १७ ) १८ वें अध्याय में वसोर्धारा मन्त्रों के प्रसंग में शतपथ के वचनों को अलग से उद्धृत न कर मन्त्रार्थं के समर्थन में मन्त्रों के उसके साथ ही दिया गया है । १, १६, १ ९, २१-२६ मन्त्रों की व्याख्या में यही विधि अपनाई गई है । २८-३० प्रजापति वाज भाष्य में ये वचन कुछ विस्तार से मिलते हैं । यहाँ ( पृ ० १८६ ) सर्वप्रथम संवत्सरात्मक त्रयोदश मासाधिपति में कल्पों की आदि नामों से अभिहित है और ऊक् शब्द से अन्न का ग्रहण किया गया है । इसी तरह से कल्पहोम के प्रसंग, यजुः, प्राणात्मकता प्रतिपादित है ( पृ ० १८७ - १८८ ) । कल्प शब्द का प्रयोग यहाँ मन्त्र के अर्थ में हुआ है । के साथ मन्त्रों ही के स्तोम साथ ' वेट् ऋक्, साम, बृहत्, रथन्तर आदि शब्दों के अर्थ दिये गये हैं और बताया गया है कि वसोर्धारा यह होम कर्म का नाम है । सर्वो स्वाहा ' शब्द जोड़े जाते हैं ( पृ ० १८८ ) । वाजप्रसवीय होम के सम्बन्ध में कहा गया है कि पर बीजवपन के प्रसंग शब्द से सात ग्राम्य और सात आरण्य धान्यों का ग्रहण किया जाता है । इसका विधान चितिस्थल किसी एक में किया गया है । यहाँ यह भी निर्दिष्ट है कि इस कर्म का अनुष्ठान करने वाले को इन १४ प्रकार के अन्नों में जाता से है, चमस का जीवनपर्यन्त परित्याग कर देना चाहिये । यह भी कहा गया है कि वाजप्रसंवीय होम स्रुव से ही किया जाता है । से नहीं । औदुम्बर चमस का प्रयोग बाद में सम्पात के अवनयन के लिये और अभिषेक के लिये किया ( पृ ० १८ ९ ) । आगे के कुछ मन्त्रों ( १८३८ - ४५ ) में विस्तार अथवा संक्षेप से कात्यायन के विनियोगों को समर्थन दिया गया है और राष्ट्रभृत् होम, रथशिरो होम, वात होम जैसे विषयों को स्पष्ट करके इन शब्दों की स्पष्ट व्युत्पत्ति दी गई है । साथ बताया गया है कि पुरुष देवता के लिये वषट्कार और स्वाहाकार से तथा स्त्री देवता के लिये केवल स्वाहाकार से आहुति दी जाती है । वाट पद वषट्कार का ही परोक्ष रूप है । यहाँ यह भी बताया गया है कि ' ऋताषाट् ' ( १८३८ ) इत्यादि छः मन्त्रों की औषधि, मरीचि इत्यादि छः देवतायें हैं । पुरुष देवताओं और स्त्री देवताओं के मन्त्रों के स्वरूप में किस प्रकार परिवर्तन कर लेना चाहिये, इसका भी निर्देश यहाँ किया गया है ( पृ ० १ ९ ५ ) और इन मन्त्रों में प्रयुक्त भुज्यु, स्तावा जैसे शब्दों का अर्थ भी । वात की आहुति किस प्रकार कहाँ कहाँ दी जाती है, इस विषय को स्पष्ट करते हुए ( १०२०१-१०२ ) आगे के मन्त्रों में ( १८४८-५१ ) रुङ्मती होम और अर्काश्विमेघसन्तति होम का विवरण इनके शब्दार्थं को स्पष्ट करते हुए दिया गया है । ' इन्दुर्दक्ष: ( १८- ५३ ) मन्त्र में आये परिदा ' शब्द की व्याख्या की गई है और तदनुसार परिदा उपयाचना का अर्थ है मनौती मानना । आगे के ( १८।५४ ) के मन्त्र में अग्नि के विमोचन की प्रक्रिया विस्तार से समझाई गई है । ' यदाकूतात् ' ( १८५८ ) इत्यादि मन्त्र में वैश्वकर्मण होम के आठ मन्त्रों की तो व्याख्या की ही गई है; आकूत, हृत् और मन शब्दों के सूक्ष्म अन्तर को भी दिखाया गया है । इस अध्याय के शेष मन्त्रों में से अधिकांश में ब्राह्मण उद्धृत नहीं है । जहाँ उद्धृत हैं, वहाँ भी वे मात्र कात्यायन के विनियोग का समर्थन करते हैं । १ ९ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में उद्धृत शतपथ- वचनों में सौत्रामणी याग की पूरी प्रक्रिया को समझाया गया है । यहाँ पहले सोत्रामणी याग की उत्पत्ति के प्रसंग में विश्वरूप की आख्यायिका वर्णित है । इन्द्र विश्वरूप को मार डालता है, तो विश्वरूप का पुत्र इन्द्र के विरुद्ध आभिचारिक याग का अनुष्ठान करता है । इन्द्र इसके यज्ञ को विनष्ट कर देता है और बलात् सोमपान करता है । यह सोम इन्द्र के सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है और इसके प्रत्येक अंग से बाहर रिसने लगता है । इन्द्र की आँख, नाक, मुख और कान ' क्रमशः तेज, वीर्य, बल और यश के रूप बहे सोम से अजा ( बकरी ), अवि ( भेड़ ), गाय, घोड़ा, खच्चर और गदहे की तथा पक्ष्म, अश्रु, श्लेष्म, स्नीहा और फेन से गोधूम, कुवल, उपवाक, बदर, यव और कर्कन्धु की उत्पत्ति होती है । इसी तरह से स्तनों से शुक्र के रूप में स्रुत सोम से दूध की, वक्षस्थल से स्विषि के रूप में स्रुतसोम से श्येन पक्षी की, नाभि से शूष के रूप में स्रुत सोम से सीस की, रेतोरूप से स्रुत सोम से हिरण्य को, शिश्न से रस के रूप में स्रुत सोम से परिस्रुत की, स्फिगी से क्रोध के रूप में स्रुत सोम से सुरा की, मूत्र से ओजोरूप में स्रुत सोम से वृक पशु की, अवन्ध्य से मन्यु के रूप में स्रुत सोम से व्याघ्र की, लोहित से सह रूप से स्रुत सोम से सिंह की, लोम से चित्त के रूप में स्रुत सोम से श्यामाक की, त्वक् से अपचिति के रूप में स्रुत सोम से अश्वत्थ वृक्ष की, मांस से ऊं के रूप
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( १८ ) की, मज्जा से सोमपीथ के रूप में स्रुत उत्पत्ति कहीं सामान्य रूप से, तो कहीं में ' सोम से उदुम्बर वृक्ष की, अस्थियों से स्वधा के रूप में स्रुत सोम से न्यग्रोध वृक्ष स्रुत सोम से व्रीहि की - इस तरह से सौत्रामणी याग के सभी उपकरणों की विशेषणों के साथ बताई गई है ॥ नमुचि ने उसे आगे कहा गया है कि किसी समय इन्द्र नमुचि नाम के असुर के साथ विचरण कर रहा था । तब इन्द्र भ्रमजाल में फंस गया । सुरा पिला कर इसकी इन्द्रियों के वीर्यं का, सोमपीथ और अन्नाद्य का अपहरण कर यह लिया किसी पाप कर्म में फँस गया है । हमें उसकी यह दशा देख देवों ने सोचा कि यह हममें अत्यन्त श्रेष्ठ था । लगता है को उपचार के लिये बुलाया और इसकी चिकित्सा करानी चाहिये । इसके लिये देवताओं ने अश्विनीकुमारों और सरस्वती इन्द्र की चिकित्सा करो । देवताओं की इनसे कहा कि तुम दोनों वैद्य हो ओर यह सरस्वती औषधि है । इसलिये के तुम बदले लोग में हमें क्या मिलेगा? इस पर देवताओं ने प्रार्थना को सुन कर इन लोगों ने देवताओं से कहा कि चिकित्सा करने किया । इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ था । इस अश्विनीकुमारों के लिये धूम्र वर्ण का अज और सरस्वती के लिपे मेष निर्धारित ने इन्द्र के शरीर का रस जिस जिस लिये इसके निमित्त ऋषभ पशु निश्चित किया गया । तब अश्विनीकुमारों और सरस्वती स्थापित कर दिया । मार्ग से बह गया था, उस सारे रस को नमुचि के पास से लाकर इन्द्र के शरीर में पुनः को बताकर सौत्रामणी इस तरह से आख्यायिका के रूप में सौत्रामणी याग के अंगभूत इसका तीन पशुओं वर्णन की कर उत्पत्ति दक्षिणा, अधिकार और विधि शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए इसको जानने से किस फल की प्राप्ति होती है, का भी यहाँ निरूपण किया गया है । है । आगे इस अध्याय द्वितीय मन्त्र के भाष्य में उद्धृत शतपथ - वचन में सोम सम्पादन की प्रक्रिया का उल्लेख है, वहाँ भी कात्यायन मुनि के बताये विनियोगों के कुछ ही मन्त्रों में शतपथ- श्रुति को उद्धृत किया गया है । जहाँ वह उद्धृत हरिस्वामी के मत का स्मरण करते हैं और काही समर्थन किया गया है । भाष्यकार एक स्थान पर ( पृ ० २५६ ) आचार्य का, यजमानाभिषेक, स्तोत्र - शस्त्र पाठ आदि का ' सोसेन तन्त्रम् ' ( १ ९ १८० ) मन्त्र में उद्धृत शतपथ- श्रुति में ३३ वसाग्रहों के मत का खण्डन करते समय विस्तार से शतपथ विवरण दिया गया है । १ ९ वें अध्याय के अन्तिम मन्त्र में स्वामी दयानन्द है । और संस्था पदों का अर्थ दिया गया ब्राह्मण के वचनों को उद्धृत किया गया है और ब्राह्मणगत आत्मा, वेदि हैं । जहाँ ये मिलते हैं, वहाँ २० वें अध्याय के बहुत ही कम मन्त्रों के भाष्य में शतपथ ब्राह्मण हैं के । वचन विशेष मिलते बात इतनी ही है कि ' यद् ग्रामे ’ भी मात्र कात्यायन की विनियोग पद्धति का समर्थन करने वाले वचन ही ' उद्वयम् ' ( २०२१ ) मन्त्र में आया ' तमः ' ( २०१७ ) मन्त्र में आये इन्द्रिय पद का अर्थ शतपथ के अनुसार देवता है और पद पाप का वाचक है । मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ है, इसका उल्लेख पूर्वं भाग ( ११ - १५ प्रस्तुत भाष्य के प्रायः प्रत्येक मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ भी किया गया, मन्त्रगत पदों से, विभक्तियों और वचनों से स्वाभाविक रूप सुचित होने वाले अ ० ) के भाष्यनिष्कर्ष में हो चुका है । प्रस्तुत किया गया है । इस प्रकार के किन - किन स्वरूपों परमात्मा के सामान्य और विशेष, विभिन्न स्वरूपों को ही यहाँ में आये इस पूर्व भाग में हो चुका है । इस भाग को यहाँ स्मरण किया गया है, सामान्य रूप से प्राय: इसका भी उल्लेख तरह के विशेष शब्दों का उल्लेख यथास्थान किया जायगा । का अर्थ स्वतः अध्यात्मपरक है, १६ वें अध्याय के लिये यहाँ बताया गया है कि इस पूरे अध्याय के मन्त्रों आध्यात्मिक व्याख्या करने की कोई आवश्य-अर्थात् पूरे अध्याय में भगवान् रुद्र की स्तुति की गई है, अतः इनकी अलग से कता नहीं है ( पृ ० ८ ) ।
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( १ ९ ) भगवदंशभूत सम्यक् दानशील देवताओं के लिये १७ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में ' मरुत् ' शब्द से मरुदुपलक्षित देवता की भावना करनी चाहिये, जड़ पदार्थों में भी उसी प्रकार प्रयुक्त है । तृतीय मन्त्र में बताया गया है कि इष्टका आदि देवत्व की भावना करते हैं । यहाँ ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' जैसे श्रुति-जैसी कि व्रीहि, यव, कुशा, समिधा आदि में वैदिकगण मन्त्रों में भक्तियोग की चर्चा है । छठे मन्त्र में राम - कृष्ण, वराह-वाक्यों को भी उद्धृत किया गया है । इससे आगे के कुछ आदि देवियों का उल्लेख है । यहाँ ' मण्डूकी ' शब्द का अर्थ नृसिंह आदि विष्णु के अवतारों और सीता, राधा, रुक्मिणी है कि श्रीराम आदि अवतारों का प्रयोजन रावण जैसे त्रिलोकी के महाशक्ति किया गया है । ८ वें मन्त्र में बताया गया के वचनों का भी स्मरण किया गया है । १३ वें मन्त्र में ' चेट् ' पद कटकों के शोधन हेतु होता है । इस प्रसंग में श्रीमद्भागवत के रूप में भगवान् को समर्पित हों, किया गया है । २१ वें मन्त्र का अर्थ हमारे द्वारा दिये जा रहे पत्र, पुष्प, फल आदि हवि प्रमाण से यहाँ बताया गया है कि भगवान् की अनुग्रह शक्ति से में विश्वकर्मन् शब्द का अर्थ विश्वस्रष्टा है । श्रीमद्भागवत के केनोपनिषद् के प्रमाण में प्रवृत्त होता है । २८ वें मन्त्र प्रेरित होकर ही जीव यज्ञ - याग आदि धार्मिक कृत्यों के अनुष्ठान ऐश्वर्यं से सम्पन्न राम ३३ वें मन्त्र में इन्द्र शब्द का निरंकुश हैं । इस प्रसंग में श्रीमद्भागवत का से असु, अर्थात् प्राण शब्द का परमात्मा अर्थं किया गया है । श्लोक भी उद्धृत है । अर्थं है, जो कि खेल - खेल में रावण जैसे शत्रुओं को जीत लेते संबोधित किया गया है । इसी तरह की सेना के योद्धाओं को अग्रिम मन्त्र में ' घः ' शब्द से राम की वानर, भालू आदि बैठा कर वाल्मीकि रामायण के चार श्लोक दिये गये हैं । आगे से ३५ वें मन्त्र की आध्यात्मिक संगति भी श्रीराम के साथ में रावण की अहंकार से ही बैठाई गई है । ४० वें मन्त्र के कुछ मन्त्रों की संगति भी श्रीराम, हनूमान् आदि के साथ, द्विविद, मन्द आदि सभी दिशाओं से , हनूमान्, अंगद, नल, नील तुलना कर बताया गया है कि श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव मन्त्र में भी कुछ इसी प्रकार का प्रसंग है । ४४ वें मन्त्र में भगवती सीता आक्रमण करते हुए इसका नाश कर देते हैं । ४१ वें को उद्धृत करते हुए यहाँ बताया गया है कि इस मन्त्र की यह से प्रार्थना की गई है । रामायण, सप्तशती आदि के मत के अनुसार की गई है । आध्यात्मिक व्याख्या श्रीवल्लभाचार्य महाराज के सिद्धान्त लेकर किस प्रकार जागरूक रहते हैं, इस विषय भगवान् भक्तों की रक्षा के लिये राम, कृष्ण आदि अवतार गया है । ५ ९वें मन्त्र में श्रीमद्भागवत के प्रमाण से किया का प्रतिपादन ५६ वें मन्त्र में भगवद्गीता, महिम्नस्तोत्र और गया है । ६२ वें मन्त्र में रावण आदि से पीडित देवताओं की आदित्य शब्द का अर्थ आदित्यमण्डल में विद्यमान पुरुष इसका किया प्रतिपादन वाल्मीकि रामायण के प्रमाण से किया गया है । प्रार्थना पर भगवान् विष्णु राम का अवतार लेते हैं, परमात्मा ही अग्नि हैं । इसी तरह से ७२ वें मन्त्र में ऋग्वेद के ७१ वें मन्त्र में बताया गया है कि सहस्राक्ष, सहस्रमूर्धा सुपर्णं को भी परमात्मस्वरूप माना गया है । ७५ वें मन्त्र में प्रमाण से अग्नि, मित्र, वरुण और इन्द्र के समान गरुत्मान् । ७६ वें मन्त्र की श्रीरामपरक व्याख्या तो की ही गई है, साथ ही श्रीराम, श्रीकृष्ण और कल्कि अवतारों की चर्चा है है । ७ ९ -८५ संख्या के मन्त्रों में शिवपरक व्याख्या भी की गई महिम्नस्तोत्र में आये यविष्ट शब्द के आधार पर इसकी के प्रमाण से सर्वत्र ब्रह्मात्मकता की भावना का निरूपण किया श्रीमद्भागवत, कठोपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता आदि शालिग्राम में विष्णु की भावना की पद्धति से की जाती है । आगे गया है । ८७ वें मन्त्र में बताया गया है कि यह भावना ९ ० वें मन्त्र में चतुःशृंग पद से ब्रह्म के विश्व, तैजस, प्राज्ञ और पुनः परमेश्वर के रूप में अग्नि की उपासना वर्णित है । तुरीय स्वरूपों का ग्रहण किया गया है । चतुःशृंग पद की यही तुरीय रूपों का अथवा विराट् हिरण्यगर्भ, अव्याकृत और यहाँ त्रयः पादा, द्वे शीर्षे सप्त हस्तासः, त्रिधा बद्धः, ऋषभः, व्याख्या ९ १ वें मन्त्र में भी दी गई है । इसके अतिरिक्त २ वें मन्त्र में ' त्रिधा हितम् ' पदों की व्याख्या में स्थूल, सूक्ष्म, रोरवीति आदि पदों की व्याख्या भी अवलोकनीय है । ९ में वाणी शब्द से वेदवाणी का ग्रहण कर भगवान् की स्तुति और कारण रूपों का अभिधान किया गया है । अगले दो मन्त्रों मन्त्रों ( ९ ५ - ९ ७ ) में बताया गया है कि भागवतों के यज्ञ में में उनका विनियोग किया गया है । इससे आगे के तीन के द्वारा भक्तिपूर्वक निवेदित उस उपहार को वे प्रेमपूर्वक अग्निस्वरूपी भगवान् को जो कुछ समर्पित किया जाता है, भक्तों
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( २० ) समर्पित घृतधारा भी, अभिषुत सोम के ग्रहण करते हैं, जैसा कि भगवद्गीता ( ९ ।२६ ) में कहा गया है । भक्तों के द्वारा पहुँच जाती है । अन्तिम दो मन्त्रों ( ९ ८ - ९९ ) समान, नवपरिणीता वधू के पति के पास पहुँचने के समान, भगवान् के पास गई है | में भगवान् के पार्षदों की और अग्निरूपी परमेश्वर की प्रार्थना की आदि को कामनाओं की पूर्ति १८ वें अध्याय के प्रारम्भ की २ ९ कण्डिकाओं में परमेश्वर से यज्ञ शब्दों के द्वारा के अर्थं वाज प्रदर्शित हैं । २८ वें मन्त्र की के लिये प्रार्थना की गई है । ५ वें मन्त्र में श्रद्धा, धन, मोद, क्रोडा आदि ही करनी चाहिये । इसी न्याय का अन्य व्याख्या में बताया गया कि इस मन्त्र की आध्यात्मिक व्याख्या भी ईश्वरपरक इसीलिये २ ९ वें मन्त्र में कहा गया है कि सिंह का मन्त्रों की आध्यात्मिक व्याख्या के लिये भी अनुकरण करना चाहिये । ही है । यहाँ ' अमृतस्य पुत्राः ' ( १० | १३ | १ ) यह शिशु जैसे सिंह ही होता है, उसी तरह से परमेश्वर का पुत्र भी परमेश्वर में बताया गया है कि सर्वात्मभूत भगवान् को ही यहाँ ऋग्वेद की ऋचा प्रमाण के रूप उद्धृत है । आगे के कुछ मन्त्रों हो अन्न है, यही भक्तों की सारी कामनाओं की पूर्ति करता मत् आदि के रूप में स्तुति की जाती है । भक्तों का भगवान् है । अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि सब उस परमात्मा के है । दान, याग, पुत्रप्राप्ति, जयप्राप्ति इसी की कृपा से होती के प्रमाण से बताया गया है कि वही ब्रह्मा, अव्याकृत, ही रूप हैं । वही ऋताषाट भी है । ४३ वें मन्त्र में वासिष्ठ रामायण है । ४४ वें मन्त्र में साकेत, गोलोक, वैकुण्ठ और हिरण्यगर्भ और विराट् है और वही भूमि, बीज, अंकुर और वृक्षस्थानीय और परलोक में स्थिति बताई गई है । अगले मन्त्र में कैलाश की तथा अयोध्या, वृन्दावन, वाराणसी आदि की इहलोक प्रपंच पर शासन करते हैं, वायुरूप में उन्हीं को स्तुति बताया गया है कि भगवान् ही हिरण्यगर्भ सूत्रात्मा के रूप में सारे की जाती है ( ० २०३ ) । ऋचा के आधार पर वरुण आदि को परमेश्वरता आगे के कुछ मन्त्रों में ' इन्द्रं मित्रम् ' ( १।१६४१४६ ) इत्यादि मन्त्र ( १८1६० ) में कर्मसमुच्चित उपासना करने वर्णित है । इसी तरह से धर्म आदि भी परमेश्वर के ही रूप हैं । एक का प्रमाण देते हुए उल्लेख किया गया है । वाले के हृदय में भगवान् निवास करते हैं, इस विषय का प्रकाशित श्वेताश्वतरोपनिषद् होती है ( १८६३ ) । पुरुहूत इन्द्र भी वही है, आदित्य, अग्नि, अर्क, चित्याग्नि आदि के रूप में भी प्रत्यगात्मा ही ) । अग्नि, इन्द्र, ब्रह्मा, बृहस्पति, विश्वेदेव ~~ ये सब स्वरूप विद्युत् आदि के रूप में भी उसी की स्तुति की जाती है ) । ( १८७३ उस प्रत्यगात्मा में अभिन्न रूप से स्थित हैं ( १८।७६ पदों का आध्यात्मिक अर्थ ब्रह्मविद्या और विवेक किया १ ९ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में आये सुरा और सोम यह सारा संसार उसके लिये नन्दन-सब कुछ मंगलमय हो जाता है । गया है । विवेक से सम्पन्न ब्रह्मविद्या की सहायता से आदि मिट्टी के मन्त्र में परमात्मा की सर्वात्मकता प्रतिपादित है । जैसे घट, शराव, उदंचन वन बन जाता है । द्वितीय में भी ब्रह्म का ही विस्तार है । आगे के मन्त्रों में साम्ब विस्तार मात्र हैं, उसी तरह याग, यागांग, द्रव्य देवता आदि प्रवृत्ति मार्ग चर्चित हैं । १० वें मन्त्र में बताया गया है कि सदाशिव से प्रार्थना की गई है । ७ वें मन्त्र में निवृत्ति और कूर्मं के अंग के समान विषयों से अपने को समेट लेता है, वह विषचिका स्वरूपिणी अविद्या की बाधा को दूर कर जो साधक रूपकालंकार की शैली से इन्द्र को अनधिकारी जोव, अश्विनी-अवश्य हो परमात्मा को प्राप्त करता है । १३ वें मन्त्र में में भगवान् की सर्वात्मकता कुमारों को प्राणापान और सरस्वती को त्रयीलक्षणा वाक् कहा गया है । यहाँ अनेक मन्त्रों अनुष्ठान से बुद्धि की शुद्धि के में वर्णन है । २६ वें मन्त्र बताया गया है कि प्रातः सवन आदि के का विविध रूपों कहा गया है । ३४ वें मन्त्र होती है । ३१ वें मन्त्र इस सारे जगत् को यज्ञात्मक विष्णु का स्वरूप द्वारा परमात्मा की प्राप्ति कि तत्त्वज्ञान के बिना इसकी निवृत्ति नहीं होती । मैं नमुचि की मोह ( अज्ञान ) के रूप में कल्पना कर कहा गया है और प्रपितामह को ३६ वें मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ विशेष रूप से अवधेय है । यहाँ पिता, पितामह प्रमाण से कहा गया है कि किस प्रकार परमात्मा का ही स्वरूप बताया गया है और महाभारत एवं भगवद्गीता के