विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 1–10

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 1–10

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विज्ञानविद्युत् (हिन्दी अनुवाद सहित) रचयिता समीक्षा चक्रवर्ती विद्यावाचस्पति पं. मधुसूदन प्रोझा जो हिन्दी अनुवादक डा. शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी रीडर, साहित्य विभाग १.काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी राजस्थान पत्रिका, प्रकाशन

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प्रकाशक:- राजस्थान पत्रिका लीमिटेड केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरु मार्ग, जयपुर । संस्करण - सन् १ ९ ६० मूल्य - २० रुपया मात्र मुद्रक:- कन्हैया हवा महल बाजार खवास जी का रास्ता, जयपुर ।

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प्रकाशकीय " राजस्थान पत्रिका प्रकाशन" के द्वारा संचालित "वैदिक विज्ञान " ग्रन्थ प्रकाशन आयोजन के अन्तर्गत स्वनाम धन्य स्वर्गीय "विद्यावाचस्पति पं. मधुसूदन ओझा" का यह "विज्ञान विद्यत" नाम का ग्रन्थ हिंदी अनुवाद के साथ प्रकाशित हो रहा है । यह "वैदिकं विज्ञान" के प्रेमियों एवं अध्येताओं के लिए प्रसन्नता का विषय है । इस आयोजन का लक्ष्य विश्व के महान विभूति श्रीमान् ओझा जी के यथा संभव सभी ग्रन्थों को अनुवाद आदि के सहित प्रकाशित कर देना है । इस उपक्रम में श्री ओझा जी के अब तक अनेक ग्रंथ छुपकर तैयार हो चुके हैं तथा अनेक ग्रंथों का मुद्रण चल रहा है । यह एक ऐसा विलक्षण विषय है । जिसकी चर्चा फैलने पर ज्ञान विज्ञान के जगत् में एक नया प्रकाश व्याप्त होगा । अब तक न समझे गये बहुत से संदर्भ स्पष्ट रूप से समझ में आएंगे । तथा हमारे देश की प्रतिष्ठा पुनः ऊंची उठेगी । प्रसन्नता की बात है अग्रेजी, मराठी, गुजराती आदि विभिन्न भाषाओं में भी इस विषय पर अनेक ग्रन्थ लिखे' गये हैं और लिखे जा रहै हैं । इस प्रकाशन का आयोजन इस विषय के अभिज्ञ विद्वानों की कमी एक निराशा का विषय है । हमारे आह्वान पर डॉ. शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी जो कि काशी हिंदू विश्व - विद्यालय में " साहित्य विभाग " के " रीडर" हैं उन्होंने सेवाकार्य से कुछ दिन का अवकाश लेकर श्री ओझा जी के ग्रंथों के हिंदी अनुवाद के कार्य को आगे बढ़ाया है । उनके द्वारा अनुदित "शारीरिक विज्ञानम्" ग्रंथ का प्रथम भाग प्रकाशित किया जा चुका हैं । यह "विज्ञान विद्यत" ग्रंथ भी उन्हीं से अनुदित हैं । आशा है कि वैदिक विज्ञान में अभिरूचि रखने वाले विद्वानों को इससे आनंद प्राप्त होगा । हस्ताक्षर क. च. कुलिश

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पुरोवाक वेद समुद्र, समीक्षाचक्रवर्ती, विद्यावाचस्पति श्री मधुसूदन ओझा जी वैदिक विस्तृत वाङ्मय का मन्थन कर अनुपम ग्रन्थ राशि प्रकट की थी । दुदैववश आज स्थिति यह आ गई कि उनके लिखे हुए मुद्रित ग्रन्थों का मिलना भी दुष्कर कार्य हो गया । सौभाग्य से “ राजस्थान पत्रिका प्रकाशन" यह बीड़ा उठाया कि भारत की ज्ञान विधि रूप इस ग्रन्थमाला को पुनः प्रकाशित कर सर्वसाधारण के लिए हिन्दी, अंग्रेजी तथा प्रान्तीय भाषाओं में अनुवाद सहित सुलभ करा दिया जाय । उसी महान् अनुष्ठान के अन्तर्गत, ब्रह्म सिद्धांत, शारीरिक विज्ञान, जगद् गुरु वैभव ग्रन्थों का अनुवाद प्रकाशन कार्य सम्पन्न हो चुका है । प्रस्तुत ग्रंथ ' विज्ञान विद्युत्' भी उसी अनुष्ठान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है | आदरणीय श्रीमान् कर्पूरचन्द जी कुलिश महोदय की प्रेरणा से मैंने इस ग्रंथ के हिंदी अनुवाद का कार्य किया । इस संदर्भ में विस्तार से विवेचन की जो पाठकों की आकांक्षा हो सकती है, उसकी परिपूर्ति तो इस कार्य से नहीं हो सकेगी, उनके लिए अन्य प्रयत्न चल रहे हैं । प्रस्तुत कार्य तो मूल ग्रन्थ और उसला हिन्दी अनुवाद मात्र प्रस्तुत करने के उद्देश्य से ही हाथ में लिया गया था । श्री ओझा जी महाराज ने अपने ग्रन्थों के रहस्यभूत विलुप्त प्रायः जिन वैज्ञानिक विषयों को अपनी विवेचना का आधार बनाया, उनका अत्यन्त सक्षेप में दिग्दर्शन कराने के उद्दे श्य से संभवतः इस 'विज्ञान विद्युत्' नामक ग्रन्थ की रचना हुई । इस दृष्टि से इस ग्रन्थ का महत्व समझा जा सकता है । इस ग्रन्थ में वैदिकं परिभाषाओं का स्पष्टीकरण और उनका परिचय प्राप्त होता है और अन्य उनके विस्तृत साहित्य के अध्ययन करने की ओर इस ग्रन्थ के मनन से प्रेरणा प्राप्त होती है । श्री ओझा जी के अन्य ग्रन्थ भी क्रमः से अनूदित होकर प्रकाश में आने को हैं । इत जनवाद कार्य में जो त्रुटियाँ रह गई हैं, उनके लिए मै अवनत शिरसा क्षमा -- प्रार्थी हूं' । इस कार्य में मेरे शिष्य कलाधर का पूर्ण सहयोग रहा है । विनीत- शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी

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विषयावली विषय पृष्ट सं- मङ्गलम् १ चतुष्पाद्ब्रह्मणः पुरमिति प्रथमः पादः २ IIII४ पुरुष द्वितीय: पाद: gus परात्परस्तृतीयः पादः ५ निर्विशेषस्तुरीयः पादः ७ पुरुषत्रै विध्येक्षर पुरुषनिरुक्तिः ८ क्षरपुरुपाञ्चविध्यम् अक्षरपुरुष निरुक्तिः १० हृदद्याक्षरत्रय-प-पृष्ठ्याक्षरद्वय विमर्शः १० पञ्चाक्षरविवर्त्ताः वेद, यज्ञ,प्रजा,लोकधर्मा: १६ अव्यय पुरुष निरुक्तिः २७ अव्ययस्य पुचधातुकत्वम् ३० अव्ययस्यसृष्टिसाक्षित्वमुक्तिर्माक्षित्व विवेक: ३२ अव्ययस्याधिकरणत्र यानुगतौ तावदधिदैवतनिरुक्ति:- ३३ प्राणमयः स्वयम्भूर्ब्रह्म ३४ आपोमयः परमेष्ठी विष्णु: ३६ वाग्ब्रह्ममयः सूर्य इन्द्रो अक्षर: ४२ अन्नादब्रह्ममयी पृथिवी अग्निरक्षर: ४४ अन्नब्रह्ममयश्चन्द्रमाः सोमोअक्षरः II सप्तलोक विभाग: II सप्तलोकानामेकाव्ययपुरुषोदरवर्तित्वम् ४६ अथ आधिभौतिकनिरुक्तिः ५० अथ आध्यात्मिकनिरुक्तिः ५१ अथ सर्वात्मनाथाधारश्चिदात्मा ५२ प्रथमः प्राणमयः शान्तात्मा ब्रह्मा ५३ अथ द्वितीय आपोमयो महानात्मा विष्णु: II वाग्ब्रह्ममयस्तृतीयो विज्ञानात्मा इन्द्र: ५७ अन्नब्रह्ममयश्चतुर्थः प्रज्ञानात्मा सोम: ५६

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पंचमी अन्नादमयो भूतात्मा शरीरात्मा-अग्नि: ६३* द्वितीय भूतात्मा हंसात्मा मर्त्यवायु: ६३* अथ तृतीयो भूतात्मा दिव्यात्मा प्राण: ६४* कर्मात्मत्रं विध्यनिरुक्ति: ६६w आत्मगतिविवेक: ६६w अध्यात्मं पचाक्षरपुरुषोपसंहार: ६६w अव्ययधातूनामध्यात्मं विनियोग: ७०3 अव्ययकलानामध्यात्मं पंचकोशत्वम् ७२3 अध्यात्मं पुरुष त्रयनिर्वचनोपसंहार: ७५3 चतुष्पाद्ब्रह्मणः प्रथम द्वितीय पादयोरध्यात्म निर्वचनानन्तरं ७६ तृतीयपादस्य परात्परस्थ निरुक्ति: ७६ परात्परपुरुषवो धर्म्य निरुक्तिः ७८ पुरुषस्य चितिसम्बन्धात् सृष्टिहेतुत्वम् ८१ सृष्टिप्रतिसृष्टिकारणवलनिरुक्ति: ८२ आत्मनि मुक्तिकाले कर्मात्यन्त निवृत्तिमतखण्डनम् ६४ ब्रह्मपादचतुष्टये द्वाभ्यां द्वाभ्यां संसारनिस्तारयोर्व्यवस्था ८६ अथ निर्विशेषनिरुक्ति: ८७ ग्रन्थोपसंहार:

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तत्सत् -समीक्षाचक्रवर्ति - विद्यावाचस्पतिश्रीमधुसूदनओझाविरचिता-

विज्ञानविद्युत् ।

विज्ञान विद्युत्संचारादज्ञानतिमिरात्ययः ॥

क्षणिकोपि सुखाय स्याद् वेदमार्गे विचारिणाम् ॥१ ॥

गहने ब्रह्मविज्ञाने प्रवेशावोपकारकः ॥

विज्ञानविद्यदुद्योतः कस्य न स्यात् सुखावहः ॥ २॥

हिन्दी व्याख्या-"पारणा" -- श्रीः गुरु गणेश: -ओं तत्सत्- " वेद मार्ग में विचरण करने वालों के लिए विज्ञान रूपी विद्युत् का प्रकाश अज्ञान के अन्धकार को नष्ट करता हुआ क्षण भर के लिए भी सुख प्रदान करने वाला होगा । " [इस ग्रन्थ का नाम 'विज्ञान विद्युत्' है । यह इस ग्रन्थ की अन्वर्थ संज्ञा है । इस की ओर इस प्रथम मंगलाचरण पद्य में संकेत किया गया है । अन्धकार में विचरण करते हुए पथिक को बिजली की क्षण भर की चमक भी रास्ता दिखाकर आनन्द प्रदान करती है । वेद का मार्ग भी अनेक विघ्नों के अन्धकार से भर गया है । ऐसे अन्धकाराच्छन्न वेद मार्ग में जो जिज्ञासा से भरे हुए विचारक रूपी पथिक चल पड़ते हैं, उन्हें यह ' विज्ञान विद्युत ' नाम का छोटा ग्रन्थ मार्ग दिखाता हुआ अवश्य आनन्दित करेगा । ] "गहन ब्रह्मविज्ञान शास्त्र में प्रवेश कराने के लिए उपकार पहुंचाने वाला विज्ञान रूपी विद्युत् का यह प्रकाश किसके लिए सुखकारक नहीं होगा" । [ ब्रह्म का विज्ञान बड़ा गहन गम्भीर है, उसमें प्रवेश के लिए विद्युत के प्रकाश के समान यह विज्ञानविद्युत् ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी एवं आनन्द की वृद्धि करने वाला सिद्ध होगा ]

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२ विज्ञाविद्युत प्रथमः प्रकाशः "एकं वा इदं विबभूव सर्वम्" । "सर्व खल्विदं ब्रह्म" । "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" । "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्" - इत्यादिभ्यो मन्त्रब्राह्मण तिवचनेभ्यो ब्रह्म वेदमेकमेव सन्नाना व्यपदिश्यते इत्यवगम्यते । तत्र चेयमेकैका व्यक्तिः-- - - "चतुष्टयं वा इदं सर्वम्" - इति कौषीत त्या चतुर्धा चतुर्धा कृत्वा विभक्ता भवति-- पुरम्- पुरुषः- परात्परः- निविशेष इति । प्रथम प्रकाश -- - " यह समस्त ( चराचर का विस्तार ) एक ही का विस्तार है " - - - " यह सब कुछ निश्चय पूर्वक ब्रह्म ही है " -"ब्रह्म एक अद्वितीय ही है " " इस समस्त (प्रपंच ) की आत्मा यही है " इन मन्त्र ब्राह्मण तथा श्रुति के वाक्यों से यह ब्रह्म एक ही होता हुआ नाना भाव को प्राप्त कर रहा है, यह ज्ञात हो रहा है । वहां यह एक-एक व्यक्ति (व्यष्टि) - "यह सब चार हैं ” इस कौषीतक श्रुति वाक्य के द्वारा चार-चार रूपों में विभक्त बतलाए जा रहे हैं, वे हैं— पुर, पुरुष, परात्पर और निर्विशेष | चतुष्पाद्ब्रह्मणः पुरमिति प्रथमः पादः तथा हीदं सर्वं यावदिह किञ्चद् बहिर्धा दृश्यते स सर्वोऽयं विकारसंघो भूतग्राम- त्वादात्मग्रामत्त्वाच्च पुरमित्यभिधीयते । विकारकूटानामेषामात्मना विगृहीतत्त्वादात्मनो

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विज्ञानविद्यत् ३ वैविध्येन ग्राहकत्वाच्चेदं पुरं विग्रह इत्युच्यते । तत्रैते विकारकूटास्त्रेधा विभज्यन्ते-- श्रपपादिकाः । पसर्गाः । श्रपजनिकाश्चेति । तत्र दिग् देशः कालः - संख्या परिमाणम् -पृथक्त्वम् संयोगः - विभागः परत्वम्- इत्येते दशधर्माः केवलभातिसिद्धाः स्वत एवोपपद्यन्ते । तस्मादोपपादिका एते भावनामया उपनामा: श्रपनामिका वोच्यन्ते । अथ शुक्रशोणिते अन्नजलौषधानि - पृथ्वीरसाः अन्तरिक्षरसा:- सूर्यच द्रादिद्य रसाः- इतर संसर्गजाश्च सर्वे धर्माः पाष्टिकाः परतः स्वस्मिन् संसृष्टा उपसर्ग औपसगिका वोच्यन्ते । अथ प्रतिव्यक्तिस्वस्मादात्मन एव लोहकिट्टवज्जल फेनवद् दुग्धशरवत् स्वभावत उत्पद्यमानाः कतिपये विकारा उपजना औपजनिका वोच्यन्ते । इत्थमेतेषां त्रिधा विभक्तानां विकाराणां संघः ईश्वरपुरुषापेक्षया विश्वमित्युच्यते, जीवपुरुषापेक्षा तु शरीरमित्युच्यते । तत्रेदं विश्वं त्रिधा विभक्त श्राधिदैविकम्, आधिभौतिक, आध्यात्मिकं च अथेदं शरीरं त्रिधा विभक्तम् कारणशरीरम् सूक्ष्मशरी रम्, स्थूलशरीरं चेति । तच्च शरीरं पुरुषोपकरणतया बहिर्धाऽस्मिन् पुरुषे संसज्जते । स एष त्रिविधविकारसंघो ब्रह्मण एकः पादः । चतुष्पाद् ब्रह्म का, प्रथम पाद -पुर यह जो जड़ चेतनात्मक विविध प्रपंच बाहर दिखाई दे रहा है, यह सारा विकारसंघ है, यह भूतग्राम होने से तथा आत्मग्राम होने से ' पुर' कहलाता है । इसे विग्रह भी कहते हैं क्योंकि इन विकार समूहों को आत्मा के द्वारा विगृहीत किया जाता है अथवा यह ( पुर ) विग्रह शब्द से बोध्य इसलिए भी है क्योंकि यह आत्मा को अनेक प्रकार से ग्रहण करता है । [विविधता से ग्रहण करना ही विग्रह है] वहाँ इन विकार समूहों को तीन प्रकार से विभाजित करना होगा-- औपपादिक विकार, औपसर्गिक विकार, औपजनिक विकार, इनमें औपपादिक विकारों में देश धर्म गृहीत हैं, वे हैं; दिशा, देश, काल, संख्या, परिमाण, पृथक्ता, संयोग, विभाग, परत्व तथा अपरत्व । ये देश धर्म केवल भाति सिद्ध हैं । क्योंकि ये स्वयं ही उत्पन्न होते हैं, इसलिए ये भावनामय उपनाम हैं, इन्हें औपपादिक अथवा औपनामिक शब्द से भी कहा जाता है ।

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४ विज्ञानविद्युत् दूसरे वे विकार हैं जिन्हें औपसर्गिक कहा गया है वे धर्म है, शुक्रशोणित, अन्न, जल, ओषधियाँ, पृथ्वी के रस, अन्तरिक्ष के रस, सूर्य, चन्द्र, लोक के रस तथा वे सभी धर्म औपसर्गिक विकार हैं जो अन्य के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं । ये धर्म दूसरे के द्वारा अपने में संसृष्ट किए जाते हैं इनकी दूसरी संज्ञायें हैं पाष्टिक तथा उपसर्ग । तीसरे विकार औपजनिक हैं । वे प्रत्येक व्यक्ति में अपने भीतर से ही, स्वभावतः वैसे ही उत्पन्न होते हैं, जैसे -लोहे में किट्ट, जल में फेन, दूध में मलाई स्वभाव से उत्पन्न होते हैं । इन कतिपय विकारों को उपजन या औपजनिक भी कहा जाता है । इस प्रकार तीन भेदों में विभक्त विकारों का जो समूह है वह ईश्वर और पुरुष की अपेक्षा के कारण विश्व कहा जाता है तथा जीव और पुरुष की अपेक्षा के कारण उसे ही शरीर भी कहा जाता है । यह विश्व तीन प्रकार से विभक्त होता है, आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक । अब यह शरीर भी तीन प्रकार से विभक्त किया जाता है, कारण शरीर सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल शरीर । शरीर पुरुष के साधन के रूप में बाहर से उस पुरुष में संसक्त होता है । यह तीन प्रकार के विकारों का समूह ब्रह्म का एकपाद हुआ । पुरुषो द्वितीय: पाद: इदमेव शरीरं पुरम् । तत् त्रिविधम्- आत्ममयम्, दैवत म् भूतमयं चेति । त्रिष्वेतेष्वधिकरणेष्वन्तः प्राणविशेषः पुरवासित्वात् पुरुषो भवति । स त्रिविध: - क्षरः, अक्षरः, अव्ययश्च । एते त्रयः क्रमेण अवरः, परावर:, परः, इत्युच्ाते । तत्र क्षरपुरुषः सर्वेषां विकारसंघानामुपादानकारणं भवति । स हि प्रभवप्रतिष्ठा- परायणत्वाद् विकाराणामात्मा । सर्वे विकाराः क्षरपुरुषाधारेण तिष्ठन्ति । यथा घटो मृत्तिकायाम्, पटस्ततुषु, एवं क्षरपुरुषे विकाराः । तदन्तर्गतोऽक्षरपुरुषः । स हि सर्वेषां विकाराणां जनको निमित्तकारणम् । स हि कार्ये समन्वितोsपि विकुर्वाणस्तिष्ठति । ततोऽप्यन्तर्गतोऽव्ययपुरुषः । स च यद्यपि कार्यत्त्वकारणत्वाभ्यां शून्यो विशुद्ध श्राश्रयमात्रम्, तथापि चक्षुः-साध्यायां सृष्टौ सूर्यप्रतापादिवत् स्वरूपसत्कारणं भवत्येव । सोऽयं त्रिपुरुषभेदोऽयमात्मग्रामो ब्रह्मणो द्वितीयः पादः ।