विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 11–20
विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 11–20
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विज्ञानविद्यत् ५ "ब्रह्म का पुरुष नाम का द्वितीय पाद" यह शरीर ही पुर कहलाता है । वह शरीर या पुर तीन प्रकार का है - आत्ममय, दैवतमय, तथा भूतमय, इन तीनों आधारों के भीतर प्रविष्ट होने वाला विशेष प्रकार का प्राण पुर का वासी होने के कारण पुरुष कहा जाता है । वह तीन प्रकार का है, क्षर, अक्षर, अव्यय । इन्हीं तीनों के कहीं कहीं दूसरे नाम भी मिलते हैं जो है क्रमशः अवर, परावर तथा पर हैं । इनमें क्षर पुरुष समस्त विकार समूहों का उपादान कारण बनता है और वही समस्त विकारों का आत्मा है, क्योंकि उसी में सम्पूर्ण विकार उत्पन्न होते, स्थित होते, तथा लीन होते हैं । सारांश यह है कि समस्त विकार क्षर पुरुष के आधार पर ही सत्तावान हैं । जैसे -मृत्तिका में घट की स्थिति है अथवा तन्तुओं में पट की स्थितिहै, वही स्थिति विकारों की क्षर पुरुष में है । उस क्षर पुरुष के भीतर विद्यमान अक्षर पुरुष है, वह समस्त विकारों का निमित्त कारण रूप से जनक बनता है । वह कार्य पदार्थ में समन्वित होता हुआ भी अविकृत ही बना रहता है । उसके भी अन्दर प्रविष्ट अव्यय पुरुष बतलाया गया है । वह यद्यपि कार्यत्व और कारणत्व से शून्य है और विशुद्ध रूप से आश्रय मात्र है तो भी वह वैसे ही कारण भाव को प्राप्त करता है जैसे- नेत्र से साध्य ज्ञान में सूर्य का प्रकाश अपने स्वरूप के अस्तित्व मात्र से कारण बना हुआ है । यह तीन पुरुषों के भेद वाला आत्मग्राम ब्रह्म का एक पृथक् पाद है । परात्परस्तृतीयः पादः विनाभूतैरेभिस्त्रिभिः पुरुषैः कश्चिदेकः पुरुष उपपद्यते गूढोत्मा प्रजापतिर्नाम । मायाबलोपाधिकमात्रा निमित्तेऽव्ययपुरुषेऽक्षरपुरुषस्य, तत्र पुनः क्षरपुरुषस्य निगूढ तया त्रयाणामप्यन्यूनानतिरिक्तं कायतनत्वेन प्रतिपन्नत्वशत् । 'ब्रह्म का तीसरा पाद-परात्पर' ऊपर क्षर, अक्षर, अव्यय नामक जिन तीन पुरुषों का उल्लेख हुआ है वे परस्पर अविनाभूत हैं अर्थात् एक दूसरे के बिना नहीं रहता । इनसे मिलकर कोई एक पुरुष निष्पन्न होता है, जिसको गूढात्मा प्रजापति कहते हैं । माया बल के उपाधि की मात्राओं के निमित्त स्वरूप इस अव्यय पुरुष में अक्षर पुरुष के, और उसमें फिर क्षर पुरुष के निगूढ़ होने के कारण तीनों के समान रूप से एक आयतन के रूप में गूढात्मा प्रजापति को माना जाता है । स एष एक एवाविभक्तो गूढोत्मा पुरुषो विभक्तेषु तत्तद्भूतेषु प्रत्येकं परिव्याप्त्या तत्तदवच्छेदाद् विभक्तवत् स्थितः प्रतिव्यक्ति भिद्यते । अनन्ताश्चैते प्रतिव्यक्तिभिन्ना-
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६ विज्ञानविद्युत् स्त्रिपुरुषैक पुरुषरूपा योगमायोपाधिपरिच्छिन्नाः प्रजापतयः । तेषामनन्तानामुत्पद्यत्पद्य वाले समवलीयमानानां प्रजापतीनामन्यः कश्चिदसीमो निरुपाधिकः प्रभवप्रतिष्ठाप रायणभूतोऽवलम्बः सम्भाव्यते । श्रवश्यञ्चापां समुद्र बुद्बुद्दत् सर्वेऽप्येते तत्तदुपाधि परिच्छिन्ना बलवन्तो भावाः कस्मिश्चिदपरिच्छिन्न बलसमुद्र ब्रह्मण्यबलम्बन्ते । सोऽयं दिग्देशकालाद्यनवच्छिन्नः कश्चिदसीमो बलसमुद्रात्मा ब्रह्मभा: परात्पर इत्युच्यते । यह एक ही अविभक्त रूप में स्थित गूढात्मा पुरुष पृथक्- पृथक् विभक्त भूतों में एक- एक में परिव्याप्त होने के कारण उनसे घिरा हुआ होकर विभक्त के समान स्थित होता हुआ प्रत्येक व्यक्ति में भिन्नता की प्रतीति को प्राप्त करता है और ये प्रति व्यक्ति में भिन्न -भिन्न रूप से अवस्थित तीन पुरुष, तथा एक पुरुष रूप वाले योग माया की उपाधि से घिरे हुए अनन्त प्रजापति हैं । उन अनन्त उत्पन्न हो होकर समय आने पर विलीन होने वाले प्रजापतियों का उत्पादक, स्थापक, नथा विलयन कर्त्ता कोई अन्य उपाधि की सीमा से रहित अवलम्ब संभावित है । अवश्य ही जल के समुद्र में बुद्बुदों की तरह ये उपाधियों से घिरे हुए बल युक्त पदार्थ किसी सीमाहीन बल के समुद्र ब्रह्म में अवलम्बित हैं । और वही कहलाता है परात्पर ब्रह्म जो दिशा, देश, काल आदि से सीमित नहीं है, जो असीम है, जो बल का समुद्र है । क्षराक्षरपुरुष प्रतिष्ठा इत्वादव्ययः पुरुषेषु परो भावः । ततोऽप्ययमनवच्छिन्नो भावः परो भवति, अपरिच्छिन्नस्य सर्वपरिचिन्नातिष्ठावत्त्वोपपत्तेः । तस्मादनन्तबलसमुद्रोऽय- मसीमो ब्रह्मभावः परात्पर इत्युच्यते । स चानन्तानन्तबलोत्थान विलयनाश्रयभूतो रस्ता सर्वविधबलविशिष्टः प्रतिपत्तव्यः । विनश्वरस्वभावतया प्रतिक्षणोत्पन्न- विनष्टान्यपीमान्यशेषाणि भिन्नभिन्नलक्षणानि बलानि कस्मिश्चिदेकस्मिन्नविनाशिनि रसे नित्यं संनिहितानि भवन्ति । तेन सर्वविधबलविशिष्टमेनं नित्ये करसं परात्परभाव- मभयशब्देनाप्याहुः । सोयमे कोऽद्वितीयः परात्परो ब्रह्मण एकः पादः । क्षर तथा अक्षर पुरुषों की स्थिति को प्रदान करने वाला अव्यय पुरुष पुरुषों में परम उच्चतम या सूक्ष्मतम स्थान पर विद्यमान है । उससे भी अधिक विशाल और असीम जो तत्व है वह उससे भी पर या श्रेष्ठ है, क्यों कि जो सीमा रहित है, वही समस्त सीमा युक्तों का आधार बन सकता है । यह अनन्त बलों के समुद्र के रूप में विद्यमान सीमा रहित ब्रह्म का स्वरूप या भाव परात्पर कहा जाता है । और वह अनन्त अनन्त बलों के उत्थान और विलयन का आधार भूत रस उन सभी प्रकार के बलों की विशेषताओं को धारण करता हुआ समझा जा सकता है । विनष्ट होने का स्वभाव धारण करने के कारण क्षण- क्षण में उत्पन्न और विनष्ट होने वाले भी ये समस्त भिन्न-भिन्न लक्षण या स्वरूपों वाले
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विज्ञानविद्यत् ७ बल किसी एक नित्य अविनाशी रस में सर्वदा संनिहित रहते हैं । इसलिए सभी बलों की विशेषताओं से समन्वित इस नित्य एक रस परात्पर ब्रह्म भाव को ' अभय ' शब्द से भी कहा जाता है । यह अद्वितीय परात्परनाम का ब्रह्म का एक तीसरा पाद हुआ । निर्विशेषस्तुरीयः पादः यद्यपि रसबलयोरनयोरमृत मृत्युरूपयोर्मध्ये नैकमप्यन्येन विनाकृतं भवति, उभ- योरतसिद्धत्वात्, तथापि यदि बुद्ध या बलोपाधिकं विशुद्ध रसमात्र पृथग्भाव्यते, तदा स रसो निर्विशेष इत्युच्यते । यथा परातरः सर्वधर्मोपपन्नो ब्रह्मभाव श्राख्यातः, तथाsनिर्वचनीयश्च वेदे श्रूयते । तस्य निर्लक्षणतथा विशिष्यज्ञानाभावादज्ञयत्वात् । सा- मान्यतस्तु सत्तामात्रेण रसः सवविधविकारात्पृथग्भूतः परिज्ञायत एव । सोऽयं निवि- शेष विशुद्ध करस ब्रह्मणस्तुरीयः पादः । - ब्रह्म का निर्विशेष – चौथा पाद यद्यपि इन अमृत और मृत्यु का स्वरूप धारण करने वाले रस और बल के मध्य कोई भी एक कभी भी दूसरे के बिना नहीं रहता क्योंकि ये दोनों रस और बल अयुतसिद्ध रूप से पहिचाने जाते हैं । [ युत सिद्ध का तात्पर्य है कि वे दो पदार्थ अयुतसिद्ध शब्द से सम्बोधत होते हैं जिनमें से एक सर्वदा दूसरे के आधार पर ही स्थित रहता है । ] तथापि यदि हम अपनी बुद्धि में बल की उपाधि वाले रस को बल की उपाधि से अलग करके विशुद्ध रस मात्र को भावित करें या जानने का प्रयत्न करें तब वह रस निर्विशेष कहा जायगा । जैसे परात्पर को समस्त धर्मों से सम्पन्न ब्रह्म भाव के रूप में बतलाया गया उस शैली में इस चतुर्थ ब्रह्म भाव को सर्वधर्म शून्य या निर्धर्मक रूप में समझना चाहिए । और यह निर्विशेष वेदों में सर्वथा मन की पहुंच के परे( अचित्य) बुद्धि की पहुंच के परे ( अपरिमेय ) तथा शब्दों की पहुंच से परे ( अनिर्वचनीय ) संकेतित हुआ है । इसका कारण निर्विशेष ब्रह्म का गुणों तथा धर्मों से शून्य होने के कारण लक्षण लक्षित न होना, उसमें किसी भी विशेषता की पहिचान का न होना, तथा उसका ज्ञान की सीमा में भी न आना ( अज्ञ' यता ) है । किन्तु सामान्य रूप से वह "है " मात्र से या सत्ता
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८ विज्ञानविद्य त मात्र के भाव से समस्त प्रकार के विकारों से पृथक के रूप में ज्ञान में लिया ही जाता है । विशुद्ध एक रसवाला यह निर्विशेष ही ब्रह्म का चौथा चरण या पाद है । इस प्रकार चतुष्पाद ब्रह्म का विवरण हुआ । यह ब्रह्म के पादतुष्टयोद्योत नाम का प्रथम प्रकाश पूर्ण हुआ । इति प्रथमः प्रकाशः द्वितीयः प्रकाशः पुरुषत्रैविध्ये क्षर पुरुषनिरुक्तिः क्षरपुरुषाश्रितोऽयं विकारसंघः शरीरमुच्यते इत्युक्तम् । तच्च क्षरात्मकत्वात्, क्षरपुरुषेऽन्तर्भूतमिति त्रिपुरुषान्नातिरिच्यते किञ्चित् । तथा चेदं पुरुषत्रयं पृथक्कृत्य व्याख्यायते । - द्वितीय प्रकाश- त्रिपुरुषों में क्षर पुरुष हम कह आये हैं कि क्षर पुरुष के आश्रय में स्थित यह विकारों का समूह शरीर कहलाता है । और वह शरीर क्षरात्मक होने के कारण क्षर पुरुष में अन्तर्भूत है, इसलिए उस शरीर का कोई भी अंश त्रिपुरुष से बाहर नहीं जाता । अतः ( शरीर के भी स्वरूप से स्पष्टीकरण के लिए तथा विज्ञान के विस्तार में प्रवेश करने के लिए ) उक्त क्षर, अक्षर, तथा अव्यय इन तीन पुरुषों की पृथक् पृथक् व्याख्या प्रस्तुत कीजाती है । क्षर पुरुषपाञ्चविध्यम् तत्र तावदात्मनानुगम्यमानः क्षरपुरुषः पञ्चधा । कारणशरीरम् - । सूक्ष्मशरीरम् - । स्थूलशरीरम् । प्रजावर्गः । वित्तवर्गश्च । विद्या- विधा इति द्व, श्रविद्येव वा बलविशेषः कारणशरीरम् । सर्वाणीन्द्रिया-
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विज्ञानविद्यत् ६ धिष्ठातृदेवता शरीरे प्रवर्त्तमानाः श्रग्निवायु- सूर्य- भास्वरसोम-दिक्सोमाः सूक्ष्मशरीरम् । पृथिव्युत्पन्नानि पञ्च महाभूतानि सविकाराणि स्थूलशरीरम् । शरीराद् बहिर्भूतानि तु योनिसम्बं धानुग्रहणान्नित्यसम्बद्धानि स्त्रीपुरुषादीनि चेतनानि प्रकाशब्देन विवक्ष्यन्ते । यानि तु कृत्रिमत्वादनित्यसम्बन्धानि परतः सड गृहीतानि भोग्यजातानि तानि वित्तशब्देन विवक्ष्यन्ते । तानि द्वेधा श्रचेतनानि गृहवस्त्रादीनि, चेतनानि वा पुरुषाश्वग वाव्यजादिपशुरूपाणि । तदित्थं शरोरत्रयं प्रजा वित्तञ्चेति पञ्चलक्षणः क्षरपुरुषो व्याख्यातः । क्षर पुरुष के पांच भेद क्षर पुरुष आत्मा के साथ अनुगत है, वह एक साथ पांच रूपों में प्रभावी हो रहा है, वे पांच रूप हैं- कारण शरीर- सूक्ष्म शरोर-- स्थूल शरीर- प्रजावर्ग -- और- वित्तवर्ग -1 क्षर पुरुष का प्रथम रूप है कारण शरीर । वह विद्या तथा अविद्या इन दो भेदों में से विशेष प्रकार के बल के रूप में पहिचाने गए अविद्या के स्वरूप से विनिर्मित या तद्रूप ही है । क्षर पुरुष का दूसरा रूप है सूक्ष्म शरीर । इन्द्रियों के समस्त देव गण [या शक्ति समूह ) जो सूक्ष्म शरीर में सर्वदा विद्यमान हैं, वे हैं. अग्नि, वायु, सूर्य, भास्वर सोम (सूक्ष्म प्रकाश ) तथा दिक् सोम । ( इन्हीं का सम्मिलित स्वरूप है सूक्ष्म शरीर ) | अपने विकारों सहित पृथिवीजल, तेज, वायु, आकाश, ये पांच महाभूत स्थूल शरीर है । (क्षर पुरुष का चतुर्थ भेद है प्रजा उसका विवरण है ) कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर, तथा स्थूल शरीर से बाहर रहते हुए भी योनि सम्बन्ध से सर्वदा शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्त्री पुरुष आदि चेतनों को प्रजा शब्द से कहा जाता है । (क्षर पुरुष का पांचवां भेद है वित्त ) जो कृत्रिम होने के कारण अनित्य रूप से (क्षणिक या अल्प समय के लिए) सम्बन्ध में आते हैं, जो भोग्य पदार्थ के समूह के रूप में गृहीत होते हैं, उन्हें वित्त शब्द से सम्बोधित किया जाता है । ये वित्त दो भागों में विभक्त हैं । एक हैं अचेतन घर, वस्त्र आदि तथा दूसरे हैं चेतन, नौकर, पुरुष तथा घोडे, गाय, भेड़, बकरी, आदि पशु वर्ग ।
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१० विज्ञानविद्युत् इस प्रकार कारण, सूक्ष्म, तथा स्थूल शरीर, प्रजा, और वित्त, इन भेदों वाला क्षर पुरुष बतलाया गया है । अक्षर पुरुषनिरुक्तिः प्रथैतेषां क्षरपुरुषविकाराणां नियन्ता तेष्वेवानुस्यूतोऽक्षरपुरुषो भवति । सोऽपि पंचलक्षणो द्रष्टव्त्रः-- ब्रह्मा इन्द्रः अग्निः सोमः इति भेदात् । श्राद्यास्त्रयोऽक्षरा हृद्याः । प्रत्यौ द्वौ पृष्ठ यौ । अक्षर पुरुष की पाहिचान इन्हीं क्षर पुरुष के विकारों का नियमन करने वाला उन सबके भीतर अनु- स्थूत रहकर विद्यमान रहने वाला कहलाता है अक्षर पुरुष । उसे भी पांच ही भेदों वाला समझिये । उसके भेदों के नाम हैं-- ब्रह्मा-- विष्णु -- इन्द्र– अग्नि- सोम-- इनमें प्रारम्भ के तीन भेद ब्रह्मा, विष्णु, तथा इन्द्र को (हृदय स्थित होने के कारण या केन्द्र में विराजित रहने के कारण ) हृद्य कहा जाता है । अन्तिम दोनों अग्नि और सोम को (पृष्ठ भाग में प्रतिष्ठित होने के कारण) पृष्ठ्य कहा जाता है । हृद्याक्षरत्रय - पृष्ठ्याक्षरद्वय विमर्शः तत्र हृद्याक्षरत्रये प्रतिष्ठामयो ब्रह्मा । यज्ञमयो विष्णुः । वीर्यं तय इन्द्रः । सङ्कोचमयः सोमः । विकासमयोऽग्निः । तेषु प्रतिष्ठातः स्थितिरात्मध तिः पशुविध तिश्च यज्ञतोऽर्वाग्गतिराकर्षणमशनाया च । श्रतिशक्तिभागुत्साहो वीर्यम् । वीर्यात्वराग्गतिर्वित्र नमुत्साहो नोदना च । अथ प्रतिष्ठासहितेयमर्वाग्गतिः सङ्कोचः । प्रतिष्ठासहिता च पराग्गति विकासः । तेऽमी पंचाप्यक्षराः प्रतिव्यक्तितरीरे नियम्यावस्थितास्तांस्तान् प्राणान् प्रयोजयन्ति ।
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विज्ञानविद्यत् ११ हृदय स्थित तीन अक्षर पुरुष के रूप हृदय में स्थित जो ब्रह्मा, विष्णु, और इन्द्र बतलाए गए उनमें ब्रह्मा का स्वरूप प्रतिष्ठामय, विष्णु का स्वरूप यज्ञ मय तथा इन्द्र का स्वरूप वीर्यमय है पृष्ठ स्थित अग्नि और सोम में सोम का स्वरूप संकुचित होने वाला है और अग्नि का स्वरूप विकास- मय है । (ब्रह्मा का स्वरूप जो प्रतिष्ठा है उस) प्रतिष्ठा से धारित होना आत्मा का धारण और पशुओं का धारण है । ( विष्णु के स्वरूप ) यज्ञ से तिरछी गति, आकर्षण तथा अशनाया (क्षुधा ) होती है । इन्द्र का स्वरूप वीर्य, अतिशक्ति वाला उत्साह है । वीर्य से होती है आगे की ओर गति विस्रसन ( खिसकना) उत्साद तथा नोदना या प्रेरणा । (ब्रह्मा और विष्णु या ) प्रतिष्ठा और यज्ञ से होने वाली अर्वाक् गति के मिलने पर ( सोम रूपी ) संकोच होता है । ( ब्रह्मा और इन्द्र या ) प्रतिष्ठा और अर्वाक् गति के मिलने पर ( अग्नि रूपी ) विकास होता है । ये पांचों अक्षर (ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, और सोम) प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में नियमन करते हुए नियम से रह कर उन-उन प्राणों का संचालन करते हैं । इन्द्रप्रयुक्त नोत्क्षेपणप्राणेन कृशे बुभुक्षितेऽस्मिन् प्रजापतौ प्रत्युद्बुद्धः प्रवर्त्तमानः सन्नशनायाप्राणः प्रतिक्षण मन्योऽन्यतः किञ्चित् किञ्चित् परकीयान् रसान् स्वस्मिन्नकर्षति तांञ्च रसानेष प्रजापतिः प्रतिष्ठाप्राणेनात्मनि प्रतिष्ठाप्य स्वीयां न्यूनतां परिपूरयति । अत एवोत्क्षेपणप्राणवशात् प्रतिक्षणमुत्क्षिप्तेऽपि शरीररसे शरीरं पूर्ववत् प्रतिष्ठितमवतिष्ठते । यत्र चेदमुत्क्षेपण पशनायावशादाकर्षणञ्च विनिमयेन भवतः स प्रतिष्ठा प्राणः । प्रतिष्ठाप्राणेन प्रतिष्ठिते शरीरे तावाकर्षण विक्षेपणप्राणौ स्वस्वव्यापारे प्रभवतः । यत्रापि शब्दादौ ववचित् प्रतिष्ठाप्राणो न दृश्यते तत्रापि स्वल्पमात्रयाऽवश्यं प्रतिष्ठा प्राणोऽभ्युपगन्तव्यः । अन्यथा कस्मादिदं शब्दोत्क्रमणं सम्भवेत् । इन्द्र के द्वारा प्रेरित उत्क्षेपण प्राण के द्वारा जब यह प्रजापति कृश तथा भूखा हो जाता है तब अशनाया प्राण ( विष्णु) उबुद्ध होकर प्रवृत्त होता है और वह अन्य स्थानों से कुछ-कुछ दूसरे रसों को अपने में खींचता है । उन रसों को यह प्रजापति प्रतिष्ठा प्राण के द्वारा अपने भीतर संस्थित करता हुआ अपनी कमी को पूर्ण करता है । यही कारण है कि उत्क्षेपण प्राण के द्वारा शरीर के रस के प्रतिक्षण बाहर की ओर फेंके जाने पर भी (अशनाया प्राण के द्वारा अन्यत्र से खींच कर लाये गए तथा प्रतिष्ठा प्राण के द्वारा यथा स्थान शरीर में स्थापित किये गए रसों से ) यह शरीर पहिले के स्वरूप के समान प्रतिष्ठित दिखाई देता रहता है ।
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१२ विज्ञानविद्युत् वह प्रतिष्ठा प्राण ही है ( ब्रह्मा ) जहां उत्क्षेपण ( इन्द्र) तथा अशनाया के कारण आकर्षण ( विष्णु) विनिमय से होते रहते हैं । प्रतिष्ठाप्राण के द्वारा (ब्रह्मा के द्वारा) प्रति- ष्टित शरीर में वे आकर्षण तथा विक्षेपण प्राण ( विष्णु तथा इन्द्र) अपने -अपने कार्य में गति- शील रहते हैं । अब शब्द आदि कुछ व्यक्ति ( इकाइयां ) हैं जिनमें प्रतिष्ठा प्राण दिखाई नहीं देता । परन्तु उनमें भी अल्प मात्रा में प्रतिष्ठाप्राण को अवश्य स्वीकार करना होता है । क्योंकि प्रतिष्ठा प्राण के बिना शब्द का बाहर निकालना ही कहां से होगा । किन्तु यथा प्रदीपेsचिषो रसस्योत्क्रमणेऽपि प्रतिक्षणं तैलाकर्षणात् प्रतिष्ठिता सैकरूपा दीपाचिर्भवति, तथास्मिन् शब्दे प्रतिष्ठा न दृश्यते । एतेषामेव त्रयाणां प्राणानां मध्ये विक्षेपणकार्षणयोन्यू नाधिकतारतम्याद् " बाल्यतारुण्यवाद्ध क्यानि" अवस्थाविशेषाः सम्भवन्ति । बाल्ये शरीररसानामुत्क्षेपणं स्वल्पम्, रसाकर्षणन्तु अधिकम् तस्माच्छरीरवृद्धिः । अथ यौवने श्राकर्षणविक्षेपणे समाने भवत इति वृद्धिहासौ न भवतः । वार्द्धक्येत्वाकर्षण मल्पम्, उत्क्षेपणमधिकम् । तस्माच्छ- रीररसानां ह्रासः । अथ प्रतिष्ठाप्राणस्योत्क्रमणे तु सा व्यक्तिम्रियते विनश्यति । तदित्थमेतेषामेव त्रयाणां प्राणानां परस्परं सहयोगात् प्रत्यभिघाततप्रजनना- च्चैतस्मिन् शरीरे जरामृत्यू, बुभुक्षापिपासे, शोकमोहौ चेति षडूर्मयः सम्भवन्तो दृश्यन्ते । एवं पृथिव्याः सूर्यस्य सम्पूर्णब्रह्माण्डस्त्र चोत्पत्तिस्थितिविनाशा द्रष्टव्याः । अन्ये च सर्वे विकारा एभ्य एव त्रिभ्योऽक्षरेवः सम्भवन्ति । श्राकर्षणादुत्पत्तिः, प्रतिष्ठातः स्थितिः, विक्षेपणान्नाश इति । (शब्द में प्रतिष्ठा के विषय में सन्देह इसलिए होता है कि) जैसे दीपक की अर्चि (लौ ) के द्वारा रस के बाहर जाने पर प्रतिक्षण तैल के खिंचाव से दीपक की वह लौया अचि प्रतिष्ठा या एक रूप वाली दिखाई देती है, वैसी प्रतिष्ठा या स्थिति उच्चारण शब्द में दिखाई नहीं देती | ( परन्तु परोक्ष रूप से उक्त युक्ति से शब्द आदि में भी प्रतिष्ठा है) इन्हीं तीन प्राणों के मध्य विकर्षण तथा आकर्षण के कम और अधिक के तरतम भाव से बाल्य तारुण्य तथा वार्धक्य नाम की विशेष अवस्थाएं संभव होती हैं । बाल्यावस्था में शरीर के रसों का उत्क्षेपण कम होता है तथा रस का आकर्षण अधिक होता है, इसलिए शरीर में वृद्धि या बढ़ाव का अनुभव होता है । अब यौवन काल में आक- र्षण और विक्षेपण समान रूप से होते हैं इसलिए वृद्धि भी होती है और ह्रास भी । वार्धक्य में तो आकर्षण [ बाहर से रस ग्रहण ] अल्प हो जाता है तथा उत्क्षेपण ( बाहर निकालना तत्वों का) बढ़ जाता है । अतः वार्धक्य में शरीर के रसों का ह्रासं होता है । तदनन्तर जब प्रतिष्ठा प्राण का उत्क्रमण या शरीर से बाहर निर्गमन हो जाता है तब व्यक्ति मर जाता है, नष्ट हो जाता है ।
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विज्ञानविद्यत् १३ इस प्रकार इन्हीं (ब्रह्मा विष्णु इन्द्र से प्रेरित उक्त प्रतिष्ठा मादि) तीनों के परस्पर सहयोग, आघात, प्रत्याधातं, तथा प्रजनन से इस शरीर में बुढ़ापा और मौत भूख और प्यास, अफसोस ( शोक ) और बेवकूफी (जड़ता ) ये छ तरह की लहरें ( उर्मियां ) निकलती दिखाई देती हैं । (पैदाइश और विलीन होने की जो प्रक्रिया ऊपर कही गई ) इस प्रक्रिया से पृथ्वी, सूर्य आदि महान् पिण्डों तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ( चराचर ) के उत्पत्ति और विनाश को ध्यान लिया जा सकेगा । अन्य जितने भी विकार हैं वे सब अक्षर पुरुष के प्राणप्रद इन्हीं तीन ( ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ) रूपों से समुत्पन्न समझने होगें । आकर्षण से ( विष्णु से प्रभावित प्राण ) होती है वस्तु की उत्पत्ति, प्रतिष्ठा से (ब्रह्मा प्रेरित प्राण से ) बनती है वस्तु की स्थिति, विक्षेपण से ( इन्द्र प्रेरित प्राण से ) हो जाता है वस्तु का नाश । अथ पृष्ठ्याक्षरद्वयमत्रैवान्याभक्त भवति । श्रग्निसोमाभ्यां ह्यन्येऽन्ये सर्वे परिवर्तनविकारा जायन्ते । तौ चाग्निसोमौ प्रतिष्ठाप्राणस्यैवोत्क्षेपणप्राणेन, आकर्षणप्रा- न च समायोगात् सम्पद्यते । उत्क्षिप्तः प्रतिष्ठितोऽक्ष र विशेषोऽग्निरुच्यते । प्राकृष्टस्तु प्रतिष्ठितोऽक्षरविशेषः सोम इत्युच्यते । तथा चैते पञ्चाक्षरा अखिलजगन्नियन्तारो विश्वेश्वरा द्रष्टव्याः । वस्तु के पृष्ठ भाग में अक्षर पुरुष के जो दो भेद अग्नि और सोम बतलाये गए उनकी यहीं स्थिति स्पष्ट हो उठती है । क्योंकि अग्नि और सोम ही अक्षर पुरुष की वे कलाएं है, जिनसे बहुविध सभी परिवर्तन तथा विकार जन्म ग्रहण करते हैं । ये अग्नि और सोम उस स्थिति में उत्पन्न हो उठते हैं जब प्रतिष्ठा प्राण का उत्क्षेपण प्राण तथा आकर्षण प्राण के साथ समायोग, संयोग या समान परिमाण का योग संगठित हो जाता है । वह विशेष प्रकार का अक्षर पुरुष अग्नि कहा जाता है जो उत्क्षेपण अर्थात् ऊपर की ओर उठ कर फिर प्रतिष्ठा या संस्थिति या अगति को प्राप्त कर लेता है । तथा आकर्षण के द्वारा प्रतिष्ठित होने वाला अक्षर पुरूष का जो भेद है वह सोम संज्ञा को प्राप्त करता है । इस प्रकार वर्णित हुए ये अक्षर पुरुष के पांच स्वरूप और इन भेदों में व्याप्त यह अक्षर पुरुष समस्त संसार का नियमन करने वाले विश्वेश्वर के रूप में दिखाई दिया जाना उचित हैं । अथैतयोरग्निसोभयोरपि प्रतिष्ठाप्राणस्यैवावस्थाविशेषरूपतया त्रय एव प्राणा मुख्याः सिध्यन्ति । तत्र पतिष्ठाप्राणं ब्रह्माणमाहुः । श्राकर्षणप्राणं विष्णुमाहुः । उत्क्षेप- प्राणं त्विन्द्रमाहुः। एतमेवेन्द्रमग्नोसोमाव्यभिचारिणं अक्षरभक्ताः पौराणिका अद्यत्वे शिव- शब्देन व्यवहरन्ति इन्द्रशित्रयोभिनत्वेऽपि उभयो रोदसीदैवतत्वेन वृत्तिसाम्येन च नाति-
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१४ विज्ञानविद्युत् विशेषात् । वेदे तु सर्वत्रेन्द्रप्राणस्यैवोत्क्षेपण कर्तृत्वं ब्रह्मविष्णु सहचारित्वञ्च दृश्यत । वेदसिद्धान्तेऽपीश्वरस्यैकस्य त्र्यैविध्योपपत्तिरुत्तरत्र वक्ष्यते । इह तु- "यदक्षरं पञ्चविधं समेतो" ति श्रुत्या पञ्चाक्षर संस्थाक्रमो द्रष्टव्यः- प्रतिष्ठा प्राण की ही अवस्था विशेष रूप जो अग्नि और सोम हैं, उनको प्रतिष्ठा प्राण के ही अन्तर्गत समझ लेने पर तीन ही प्राण मुख्य सिद्ध हो रहे हैं । (ऊपर संकेत कर चुके हैं कि) प्रतिष्ठा प्राण का ही नाम ब्रह्मा हुआ, श्राकर्षण प्राण को विष्णु कहा गया तथा उत्क्षेपण प्राण का नाम इन्द्र रक्खा गया । तीन अक्षरों का तीन आराध्य देव स्वरूपों के रूप में ध्यान करने के रसिक भक्त पुराण प्रेमियों ने अग्नि और सोम से पल भर को भी अलग न होने वाले इन्द्र की संज्ञा शिव रखी है । (उनके अनुसार अक्षर पुरुष के तीन स्वरूपों या भेदों के नाम ब्रह्मा, विष्णु, शिव हो जाते हैं जो ( त्रिदेव के रूप में उपास्यतया पुराण प्रसिद्ध हैं यद्यपि तत्व चिन्ता के हिसाब से इन्द्र और शिव भिन्न हैं तो भी दोनों ही रोदसी लोक के या रोदसी नामक आन्तरिक्ष के अधीश्वर हैं, इस साम्य के कारण दोनों में कोई विशेष भेदक तत्व नहीं है । वेद में तो सर्वत्र उत्क्षेपण कर्ता तथा ब्रह्मा और विष्णु के सहचारी को इन्द्र शब्द से ही कहा गया है । वेद सिद्धान्त में भी एक ही ईश्वर की विविध रूपों में प्राप्त होने की बात बत- लाई गई है, इस का आगे विस्तार होगा । यहां तो अक्षर पुरुष की पांच अवस्थाओं का क्रम (ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम) "जो पांच प्रकार का अक्षर आता है ' इस श्रुति के अनुसार देखा गया । ब्रह्मा-विष्णुः-इन्द्रः-इत्येते त्रयोऽक्षराः अग्निः सोम इति द्वावक्षरौ चेति कृत्वा पञ्चैव देवताः सिद्धाः । एभ्य एव पञ्चभ्यो दैवतेभ्यः सर्वमिदं जगद्यथायथमुत्पाद्यते, प्रतिष्ठाप्यते, उपसंह्रियते विकारैश्चाने विध: संप्रचीयते इत्यवगन्तव्यम् । raft पञ्चाक्षरेषु ब्रह्मा मुख्यः । तदनुगतो विष्विन्द्रौ भवतः । विष्विन्द्रसह- कारात् सिद्ध ब्रह्मण एव रूपान्तरमग्निश्च सोमञ्च । विक्षेपणधर्ता होन्द्रेण विक्षिप्य- माण शुद्ध वा विष्णुयुग्वा ब्रह्म दमग्नित्वेनोपचर्यते । तथा हि- " द्ध वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदद्ध ममृतम्” - इति याज्ञवल्क्यादयः प्रति जानते । ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र ये तीन अक्षर पुरुष तथा अग्नि और सोम ये दो अक्षर पुरुष मिला कर पांच ही देवता शब्द से भी प्रसिद्ध हैं । समझ रखना होगा कि इन्हीं ब्रह्मा,