विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 91–100

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 91–100

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"विज्ञानविद्युत् ६५ विनाभूतत्वात् । तस्माद् हृद्ग्रन्थिभेदनाद्वलबन्धमोक्ष एव मोक्षः प्रतिपत्तव्यः । तत्र हि मोक्ष चितिसंबन्ध एव बलानां निषिध्यते । सहचरभावेनावस्थानं तु बलानां न कदाचिदपि प्रत्याख्यायते । तदित्थं चितिसंबन्धेन संबन्धिनां बलानां वैशिष्ट्येन यथा पुरुषरूपं संभ वति, तथा सहचरभावेन सम्बन्धिनां बलानां वैशिष्याट्त् परात्परं नामेदमपरं रूपं भव- तीति सिद्धम् । तस्य च परात्परस्य उपलक्षकाणि बलानि चितिसम्बन्धेन सम्बद्धानिन सन्तीत्यत एवास्य परात्परस्य सृष्टौ नाधिकारः । श्रव्ययं पुरुषमारभ्यैव सृष्टे- प्रक्रममाण- त्वात्। मुक्ति काल में आत्मा में कर्म की पूर्ण निवृत्ति के मत का खण्डन रस में बलों का चयन होने के सम्बन्ध से यह जो भाव सिद्ध होता है उसे पुरुष कहा जाता है । जहां बलों का चयन नहीं होता किन्तु सहचर के रूप में जहाँ रस में समस्त बल उठ- उठ कर इधर-उधर रहते हैं उस अवस्था में बलों से विशिष्ट एक दूसरे से यह रस परात्पर कहलाता है । सहचर के रूप में बलों का यह सम्बन्ध मुक्ति काल में भी दिखाई देता है । श्री शंकराचार्य तथा उमास्वामी आदि दार्शनिकों की जो यह प्रतिज्ञा है कि समस्त कर्मों का पूर्णतया छट जाना मोक्ष है. इसको हम श्रद्धा के योग्य नहीं समझते । क्योंकि आत्मा जो अव्यय है इसका रूप ज्ञान और कर्म दोनों हैं तब ज्ञान और कर्म को सर्वथा निवृत्ति कहना अवैज्ञानिक है । अथवा उनका तार्लय यह लिया जा सकता है कि हृदय की ग्रन्थि के बन्धन का कारण जो बलों का चयन सम्बन्ध है उसका हट जाना ही मोक्ष है । बलों का सर्वथा अभाव तो कभी होगा नहीं क्योंकि बल तो क्रम से नित्य ही उत्पन्न और विनष्ट होते रहने के कारण एकरूप से नित्य हैं । यह रस बिना बलों के कभी उपलब्ध स्वरूप वाले अमृत तथा मृत्यु संज्ञा होगा यह तर्क संगत नहीं है । सन और असत वाले इन दोनों रस और बल की स्थिति परस्पर अविनाभूत है, अर्थात् एक दूसरे के बिना नहीं रहता । इसलिए मोक्ष का स्वरूप यदी समझ में बैठाया जा सकता है । हृदय की ग्रन्थि के भेदन से बलों के बन्धन को खोल देना ही मोक्ष । मोक्ष अवस्था में बलों के आस्तित्व का सर्वथा निषेध नहीं होता अपितु रस में स्थिति उन बलों का चयन रूप जो सम्बन्ध है उसका निषेध किया जाता है । किमी भी अवस्था में सहचर के रूप में ही बलों की अव- स्थिति का निषेध तो किया ही नहीं जाता । उस प्रकार बलों के चयन के सम्बन्ध से सम्बद्ध होने पर जो विशिष्टता आती है उससे पुरुष रूप संभव हो जाता है । तथा चयन के सम्ब-

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८६ विज्ञानविद्युत् न्ध के बिना सहचारी के रूप में रस में बलों की परस्पर निरपेक्ष जो पृथक् पृथक् विशेष- प्रकार की अवस्थिति रहती है उससे परात्पर नाम का यह दूसरा रूप होता है यह सिद्ध हुआ । परात्पर अवस्था में सृष्टि नहीं होती या परात्पर को सृष्टि का अधिकार नहीं है । क्योंकि उस स्थिति में परात्पर अवस्था की सूचना देने वाले जो बल विद्यमान हैं उनका एक को दूसरे के साथ चयन नहीं हुआ है (और चिति या चयन को ही सृष्टि माना गया है) सृष्टि का आरम्भ तो अव्यय पुरुष का प्रादुर्भाव होने पर ही होता है । ब्रह्मपादचतुष्टये द्वाभ्यां द्वाभ्यां संसारनिस्तारयोर्व्यवस्था चतुष्पाद् ब्रह्मणः पुरं च पुरुषश्चेति द्वावेव पादौ जगदुच्यते । तत्र हि संसारो भवति । संसारान्निस्तारे तु परौ द्वौ पादौ परात्पर- निर्विशेषरूपौ विश्वस्माद्वहिर्भूतौ प्रत्येतव्यौ । तत्रायं तावत्परात्परो व्याख्यातः । " ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ " (गो. १४।२७ ) ईश्वराव्ययवचनोऽयमत्राहंशब्दः । चराचरस्थानास्तु चत्वारः पादाः षष्ठी निर्दि- ष्टा । तत्रापि शाश्वतो धर्मः परात्परः । ऐकाऽन्तिकोऽयमानन्दो निर्विशेषः । —ब्रह्म के चार पादों में दो दो से संसार और निस्तार की व्यवस्था-- चतुष्पाद् ब्रह्म के पुर और पुरुष ये दो पाद ही जगत् कहे जाते हैं । वहीं होता है । संसार से निस्तार होने पर ब्रह्म के दूसरे दो पाद परात्पर और निर्विशेष हैं जिन्हें विश्व से बाहर समझा जाता है । वहां इस परात्पर की व्याख्या हुई । - " मैं ब्रह्म की अमृत की अव्यय की शाश्वत धर्म की तथा पूर्ण या एकान्त सुख की प्रतिष्ठा हू"". यहां “अहं ” या “ मैं ” शब्द का प्रयोग ईश्वराव्यय के लिए हुआ है । चर और अचर में स्थित चार पाद तो श्लोक में षष्ठी विभक्ति के साथ हैं । उनमें भी शाश्वत धर्म परात्पर है । यह ऐकान्तिक आनन्द निर्विशेष है ।

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विज्ञानविद्यत् ८७ अथ निर्विशेषनिरुक्तिः श्रथ निर्विशेषो व्याख्यायते । बलविशिष्टो हि रसः परात्परशब्देनाऽख्यातः । तत्रै- तानि बलानि कस्मिश्चिद् एकस्मिन् रसे उत्थायोत्थाय प्रतितिष्ठन्ति वितिष्ठन्ते चेत्यु- 4 क्तम् । तत्रैतानि बलानि खण्डखण्डान्यनन्तानि भवन्ति । न चैतानि रसमन्तरेणात्मानं लभन्ते । श्रतएवैषां बलानां प्रभवः प्रतिष्ठा, परायणं चैष रसो बलोपहितरूपो बलात्पृथक्- त्वेनाभ्युपगम्यमानो निर्विशेष इत्युच्यते । यद्यपि न रसः कदाचिदप्यनेन बलेन निराकृतो भवति, बलस्यायुतसिद्धत्वात् । तथापि बुद्ध या बलात् पृथक्त्त्वेन शक्यते ग्रहीतुमिति । तस्य स्वरूपमात्रेण सतः सर्वविशेषशून्यस्य निर्विशेषत्वमाचक्षते । स यथा परात्परः सर्वकर्मा, सर्वधर्मा, सर्वरसः, सर्वगन्धः, सर्वगुणः, सर्वशक्तिमांश्चोपपद्यते तथायं तद्वैपरीत्येन नि- कर्मकः, निर्धर्मकः, नीरसः, निर्गन्धः, निर्गुणः, निरञ्जनः, श्रदृश्यः, श्राग्राह्यः,नेति नेतीति कृत्वा प्रत्येतव्यः । यत्किञ्चित्पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्ने पदानां शक्तिर्भवतीति कृत्वा नैको- ऽपि शब्दो निर्धर्मकं रसं वक्त क्षमते, निर्धर्मके तस्य शक्त्यलाभात् । अत एव सर्वविशेष- शून्योऽयं निर्विशेषोऽनिर्वचनीय उच्यते । सत्तामात्रेण सामान्यतो ज्ञायमानोऽपि सर्वविशेषशू- न्यतया विशेषरूपेण ज्ञातुं न शक्यते । इत्यत एवास्य निर्विशेषरसस्य विज्ञयत्वमप्या- चक्षते निर्विशेष की निरुक्ति अब निर्विशेष की व्याख्या की जाती है । बलों से विशिष्ट रस परात्पर शब्द से कहा जाता है । वहां ये बल किसी एक रस तत्व में उठ उठ कर इधर उधर रहते हैं यह कहा गया । ये बल खण्ड खण्ड अवस्था में अनन्त होते हैं । ये बल रस के बिना अपने स्वरूप को प्राप्त नहीं करते । इसीलिए इन बलों का उत्पादक, इनकी प्रतिष्ठा, और इनका लय स्थान

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८८ विज्ञानविद्युत यह जो रस है वह बल से आच्छादित रूप वाला हैं, जब उसे बल से पृथक् करके समझा जायेगा तब वह निर्विशेष शब्द से सम्बोधित होगा । यद्यपि स्थिति यह होती है कि रस कभी बल के बिना रहता नहीं, क्योंकि बल का रस के साथ अयुतसिद्ध सम्बन्ध है । बल सर्वदा रस के आधार पर ही रहता है यहाँ बल की रस, के साथ अयुतसिद्धता है । तथापि बुद्धि से विचार करके रस को बल से पृथक करके समझा जा सकता है । वह स्वरूप मात्र से सत् है, वह समस्त विशेषताओं से शून्य है इसीलिए उस अवस्था का नाम निर्विशेष कहा गया है । जैसे परात्पर सर्वकमा, समस्त धमा वाला समस्त रसो वाला सर्वगन्ध युक्त, समस्त गुणवाला तथा सर्वशक्ति सम्पन्न है, ठीक उसके विपरीत यह निविशेष ब्रह्म सर्वकर्मों से रहित, गुणों से राहत, निरञ्जन, अदृश्य, ग्रहण करने के अयोग्य, नहीं, नहीं कह कर ही बतलाया जाता हुँ । शब्दों को अर्थ की बतलान का जा शक्ति है वह पदार्थ के किसी न किसी गुणधर्म का हा बतलाता है अतः गुणधम शून्य निधमंक रस को बतलाने में कोई एक भी शब्द समय नहीं हो पाता, क्योंकि जब वहा काइ भा धर्म है ही नहीं तो किसी भी शब्द को वहां अपनी शक्ति ही नहीं मिलता । इसीलिए सब प्रकार की विशेषताओं से शून्य यह निर्विशेष ब्रह्म अनिर्वचनीय कहा जाता है । यह सामान्यतया सत्ता या अस्तित्व मात्र से जाना जाता हुआ भी सभी विशेषताओं से शून्य होने के कारण विशेष रूप से जानने की सीमा में नहीं आता । इसीलिए इस निर्विशेष रस को अविज्ञेय भी कहा जाता है । तथा चाहुर्भगवन्तो महर्षयः-

संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः ।

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ॥ १ ॥

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥२॥

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ ३ ॥ इति ।

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विज्ञानविद्यत दह इसी के वर्णन में महर्षियों ने कहा है कि " - "जिसको वेद नहीं कह पाते, जिसे विष्णु और ब्रह्मा नहीं जानते, जिसे न प्राप्त करने के कारण जहां से वाणी मन के साथ लौट आती है" -- ॥१ ॥

-"जो नहीं जानता वह जानता है ( क्योंकि नहीं जानना ही उसका जानना है) जो जानता है वह नहीं जानता । जो जानने वालों के लिए अजान है (अविज्ञात है ) जो नहीं जानने वालों के लिए विज्ञात है" - ॥ २॥

-- "मैं नहीं मानता कि वह सुखपूर्वक ज्ञातव्य है, जिसने नहीं जाना उसके लिए वह ज्ञात है । हम में से " अस्ति " या "है " रूप से जिसने जाना उसने उसे जाना, जिसने विशेष रूपों को जानने का निषेध किया, उसने भी उसे जाना" - ॥३॥

यस्तावदस्मिन् विश्वस्मिन् जगति ज्ञातव्यस्य परमसीमा भवति स परात्यरो- नाम । "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते " तमेव विदित्वा विदितवेदितव्या भवन्ति । सर्वविधकल्याणमाप्नुवन्ति । निःश्रय- समधिगच्छन्ति । तस्मादव्ययमूर्ध्वो निर्विशेषोऽयमानन्दमात्रो रसः स नात्यन्तं विशेषतो विज्ञातुं शक्यते तस्माद् विरम्यते । तदित्थं निर्विशेषः, परात्परः पुरुषः, पुरम् - इति चतुष्पाद् ब्रह्मव्याख्यातम् । इति विश्वातीतोद्योतः पंचमः प्रकाशः इस समस्त संसार में ज्ञातव्य या जानने योग्य की जो अन्तिम सीमा होता है वह परात्पर ही है । -- " जिसको जानकर और कुछ ज्ञातव्य शेष नहीं रह जाता". उसी को जानकर विदित वेदितव्य हो जाते हैं । समस्त प्रकार के कल्याणों को प्राप्त करते हैं । मोक्ष को प्राप्त करते हैं उससे भी ऊपर का यह निर्विशेष आनन्दमात्र रस है । वह अत्यधिक या विशेषरूप से ज्ञात नहीं हो सकता अतः अब हम विराम लेते हैं । इस प्रकार निर्विशेष, परात्पर, पुरुष और पुर इस चार पाद वाले ब्रह्म की व्याख्या पूर्ण हुई । यह विश्वोद्योत नाम का प्रकाश पूर्ण हुआ ।

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६० विज्ञानविद्यत ॥ ग्रन्थोपसंहारः ॥

विज्ञानविद्य द्विद्योतो हृद्यो जलधरे स्फुरन् ।

वेदमार्गस्थान्धकारं निराकुर्यान्निरन्तरम् ॥

इयं दृग्वगोचन्द्रमिते विक्रमवत्सरे । (सं. १ ९ ८२ ) विद्यदाविरभूदेषा वेदमार्गप्रदर्शिका । इति श्रीमधुसूदनविद्यावाचस्पतिप्रणीता ब्रह्मविज्ञानप्रकाशिका "विज्ञानविद्युत्' 'सम्पूर्णा । ग्रन्थ का उपसंहार जलधर में विज्ञान रूपी विद्युत का फैलने वाला हृदयग्राही प्रकाश वेद के मार्ग में स्थित अन्धकार की निरन्तर मिटाता रहे । 'यह वेद मार्ग की प्रकाशिका विज्ञान को विद्युत् ( बिजली ) विक्रम संवत्सर १६८२ प्रादुर्भूत हुई । इस प्रकार श्रीमधुसूदन विद्यावाचस्पति के द्वारा विरचित ब्रह्मविज्ञान की प्रका- शक विज्ञान विद्यत पूर्ण हुई । डा. शिवदत्त शर्मा चतुवेदी द्वारा 'पारण, नामक हिन्दी व्याख्या पूर्ण हुँ ।

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"शुद्धिपत्रम्" पृष्ठ पङ्क्तौ शुद्धपाठः शुद्धपाठ २ पुरु पुरुषः ६. ५ ब्रह्मभा ब्रह्मभावा ६ १२ नथा तथा ६ १८ दृड दृश २० कस्मिश्चि कस्मिश्च ७ ८ रसः रसः ७ सवविधविकाश सर्वाविधविकारा ७ १३ सम्बोध सम्बोधित ११ १४ तांञ्च तांश्च १२ १४ प्रत्यमिधातता प्रत्यभिधातात् १३ २३ प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा १४ १ दृश्यत दृश्यते १४ २३ तदनुगतो तदनुगतौ १४ २४ सोमच सोमश्च १५ द फेकना फेंकना १५ १३ मयं मर्त्य १५ २८ श्रयन्ती अयन्तीय १६ १२ रु रू १३ १३ विवो विष्णवो १६ १४ बहिस्थ बहिस्थ १६ w १७ विष्णु अग्नि विष्णु इन्द्र अग्नि w १६ २३ शरार शरीर ymwm2xm w १६ मर्त्ये मर्त्ये १७ ७ दूधः १८ १३ सोमि सोमः १८ २४ त्र्यस्त्रिश १८ १४ व्याख्या व्याख्या २० ३ ऋगरूपम् ऋग्रूपम्

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2 अशुद्ध शुद्ध पष्ठ २० १२ रूपानुविधाग्नित्व रूपानुविधायित्व २१ १३ वाखादित्यपा वावादित्यपा २१ १६ वाङ्मवा वाङमया २१ १६ वाड्मया वाङमया २१ I परिगृहणन् परिगृह्णन् २२ २६ ह है २३ १६ अपूर्व अपूर्व २३ २५ अपिः चाहुः अपि चाहुः २३ २६ चन्द्रामाः चन्द्रमाः २४ १ ज्योतिषीरूपे ज्योतिरूपे २४ १० प्रतिसचर प्रतिसंचर २५ १ यव व २५ & पूर्वेस्त्रिमिर्वीर्ये पूर्वेस्त्रिवीर्यः २५ १० तच्छद्र म् तच्छूद्रम् २५ १४ अर्थश्चवरोह्यमाणा, अर्थश्चावरोह्यमाणा २५ २६ समर्थादीन समर्यादानि २५ १८ है हैं २३ २० धम्म धम्मः ३६ २ प्रकृ प्रकृष्ट २.७ १२ काय काय २७ २३ व्यासज्व व्यासज्य २८ xmm2m३ करने करने में ३० १३ प्रजायतिर्वे प्रजापतिर्वे ३० १४ प्राधान्यभाष्टे प्राधान्यमाचष्टे ३१. ३ तदित्यमन्नादादि आनन्दादिवाक्तत्व वित्तभागभेदात् विभागभेदात् ३१m १७ ३३m ५ सन्निवेश सन्निवेश ३३. १८ प्ररूषन्नय पुरूषत्रय ३३ २१ तसूय तस्त्रयः

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3 अशुद्ध शुद्ध ३४ पुरूषोडवतिष्ठति पुरूषोडवतिष्ठते ३४ ४ महेश्वरी महेश्वरो नामै कः ३४ ४ विकारौ विकारो३४ ६ ३४ १६ निरुक्त निरुक्त ३४ १८ संभूतानि प्रथमोतज्ञ प्रथमोथजज्ञ३४ २० ३५ २ ३५ २ ३५ ५ वेदमयुः वेदमयः ७ अग्निवाथ्वा अग्निवाय्वा ३५ लम्बे लम्बे ३५ १७ प्रजाति प्रजापति ३५ २१ ८ पदार्थ संसक्त प्रदार्थमें संसक्त ३६ ३६ १० सहस्त्र सहस्र ३६ ११ सहस्त्र सहस्र ३६ १४ सहस्त्र सहस्र स्पर्धमान ३६ १८ स्वधमान १८ सहस्त्र सहस्त्र ३६ अथववेदस्तवेष अथर्ववेदस्तावदेस ३७ ३ ८ आदि अक्षर आदि का अक्षर ३७ परि पार्धदेव परिप्रार्धदेव ३७ १४ ३७ २१ मुगव भृगवः सर्वत्रेद सर्वत्रेद ३७ २५ ३७ २५ सत्यस्येदमृतं सत्यस्येदममृतं ततोड़गिरा ततोडाङ्कीरा ३८ ६ इत्यथर्ववेद इत्यथर्ववेदे ३८ १४ चावलम्बन चावलम्बनं ३८ १६ .३६ २ नथा तथा

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4 पृष्ठ पङक्तौ प्रशुद्ध शुद्ध ३६ ४ तैत्तिरीव तैत्तिरीय ३६ ' ' मृगु भृगु ३६ १६ मौलिक मौलिक ४० २ विच्छेदाद्विरलत्वं विच्छेदाद्विरलत्वं ४० ३ योगवर्थेषु यौगिकेष्वर्थेषु ४० a ५ आहुति ४० ६ संयुक्तार्थस्यor ४० २२ इसी बात की इसी बात को x ४० २३ उस उसे x ४१ १ विद्युन्मयम त्रिप्राणः विद्युन्मयो मन्त्रिपाणः x ४१ ३ निरुणद्धि निरुणद्धि x ४१ ४. एवायमात्रैयश्रन्द्र एवायमात्रेयश्चन्द्रः x त्रिप्राणानाभि त्रिप्राणाणानाभि ४१ ५ ४१ ७ तमेतं तमेतं ४१ द तथवाय तथैवाय ४१ १२ मिष्ठा मिष्टा ४१ o१२nmx2529 मिष्ठासु मिष्टासु ४१ भेदाश्चतुर्धा भेदांश्चतुर्धा ज्यौति पिण्ड से ज्योतिको पिण्डसे,४१ २२ ४६ २० सप्तलोकानामे सप्तलोकानमे काव्यमपुरुसोदर काव्ययपुरुषोदर ४६ २३ रश्मिमन रश्मिमण्डलेडन्तर्धत्त ५० १५ परमेष्ठ्यादि. परमेष्ठयादि- ५० १८ नानाविधेष sus ५०8898 १८