विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 81–90

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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विज्ञानविद्यत ७५ अध्यात्मं पुरुषश्यनिर्णचनोपसंहारः तानेताँस्त्रीनपि पुरुषान् भगवानुपस्तौति--

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

यस्मात् क्षरमतीतोह मक्षरादपि चोत्तमः ।

तोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

अव्यक्त व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाया समावृतः ।

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥

त्रिभिर्गुणमयेर्भागैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।

मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥

श्रुतिरप्याह-- " पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्चाभाव्यम्" --इति । इति आध्यात्मिको द्योतश्चतुर्थः प्रकाशः । अध्यात्म में तीन पुरुषों के निर्वचन का उपसंहार इन तीनों पुरुषों का निरूपण ( गीतों में ) भगवान् ने किया है- -- " लोक में ये दो क्षर और अक्षर पुरुष हैं, इनमें सभी भूत क्षर कहलाते हैं, जो कूटस्थ है, वह अक्षर कहलाता है " - - "उत्तम पुरुष तो इनसे भिन्न है जिसे परमात्मा कहा गया है । वह तीन लोकों का उनमें प्रविष्टहोकर धारण करता है" --

पृष्ठ 82

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७.६ विज्ञानविद्य.त् - " मैं क्षर से अतीत हूं तथा अक्षर से भी अतीत हूँ, इसलिए लोक और वेद में पुरुषोत्तम कहा गया है " - --" निर्बुद्धि लोग ऐसा मानते हैं कि मैं अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आ 1 गया क्योंकि ये लोग मेरे परम अव्यय भाव को नहीं जानते" -- -- " योगमाया से समावृत होता हुआ मैं सबके लिए प्रकाशित नहीं हूं, यह मूढ़ लोक अज, अव्यय मुझे नहीं जानता " - --"गुणमय तीन ( सत्व, रज, तम ) भावों से यह समस्त जगत् मोहित है अतः यह इन (गुणों) से परे स्थित मुझे नहीं जानता" -- -- श्रुति ने भी कहा है- - "जो भूत (हो चुका है और जो भव्य ( होने वाला) है वह सब पुरुष ही है ” - इस प्रकार आध्यात्मिक उद्योत चतुर्थ प्रकाश पूर्ण हुआ - पंचमः प्रकाशः चतुष्पाद्ब्रह्मणः प्रथम द्वितीयपादयोरध्यात्मनिर्वचनानन्तरं तृतीयपादस्य परात्परस्य निरुक्तिः । ब्रह्मणश्चतुर्षु पादेषु भूतग्रामरूपं पुरमात्मग्रामरूपः पुरुषश्चेति द्वौ पादौ व्या- ख्याती । अथ तृतीयपादः परात्परो नाम व्याख्यायते । उक्त पूर्व क्षरपुरुषोऽवरब्रह्म । अक्षरपुरुषः परावरब्रह्म । श्रव्ययपुरुषः परब्रह्म । श्रथैतस्मात् परतोऽव्ययात्परं किञ्चिदन्यद ब्रह्म भवतीति कृत्वा तद् ब्रह्म परात्परमित्युच्यते । परत्वमभिव्यापकत्त्वम् । सर्वान् स्ववि- कारसंघान् क्षरपुरुषोऽभिव्याप्नोति । क्षरपुरुषानक्षरपुरुषः । अक्षरपुरुषांश्च पुरुषेषूत्तमो- sourपुरुषोऽभिव्याप्नोतीति स परपुरुष इत्युच्यते । यस्तु तमपि पुरुषमभिव्याप्नोति स परात्परो नाम । पुरुषोत्तमो हि अक्षरपुरुषापेक्षया व्यापकोs पि मायबल वैशिष्ट्यान्मितो भत्वा दिग्देशकाल संख्याभिः परिच्छेदकधमैरव च्छिद्यते । किन्तु यत्र रसे तादृशान्यनन्तानि मायाबलान्युपलभ्यन्ते स रसस्तस्य रसस्यानन्त्यात् सत्यपि मायाबले परिच्छेत न

पृष्ठ 83

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विज्ञानविद्युत् ७७ शक्यते । यथा चित्रपटे परिच्छिन्नाऽनेकविधरूपमयचित्रसत्वादेकेन केनचित् परिच्छिन्न चित्ररूपेण परिच्छिन्नस्य पटदेशस्य तच्चित्ररूपावच्छेदेन परिच्छेदसम्भवेऽपि तावता परि च्छेदेन सर्वविधचित्रमयस्य पटस्य परिच्छिनत्वं वक्त नोपपद्यते । तथैतेषु रसेषु परात्परो नाम रसो दिग्देशकालाद्यनवच्छिन्नत्वादनन्तोऽसीमः प्रतिपद्यते । - "न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यशः" इत्यादिभिः श्रुतिभिरेष एव परात्पर श्रात्मा परिष्ट्यते । तत्राऽसीमत्वादेवा- स्याप्रतिमत्वं भवति । "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" इत्यादिभिः श्रुतिभिरपीदमेव परात्परं परिष्ट्यते । अधिदेवतमध्यात्ममधिभूत- मित्यधिकरणभेदेनाव्ययपुरुषाणां मायाबल वैशिष्टयात् परिच्छिन्नशरीराणां नानात्वोपप- तावयस्य परात्परस्य दिग्देशकालानवच्छिन्नत्वादद्वितीयस बैंकत्वोपपत्तः । पंचम प्रकाश परात्पर ब्रह्म की स्वरूप निरुक्ति ब्रह्म के चार पादों में भूतसमूह रूप पुर तथा आत्म समूह रूप पुरुष इन दो पादों की व्याख्या की गई । अब परात्पर नाम के तृतीय पाद की व्याख्या की जाती है । यह पहिले कहा गया है कि क्षर पुरुष अवर ब्रह्म है । अक्षर पुरुष परावर ब्रह्म है । अव्यय पुरुष परब्रह्म है । अब इस पर ब्रह्म रूप अव्यय 'पर कोई अन्य ब्रह्म है इसलिए उस ब्रह्म की संज्ञा परात्पर कही जाती है । यहां पर शब्द से अभिप्राय उसके व्यापक होने से है । अपने समस्त विकार समूह में क्षर पुरुष अभिव्याप्त है । क्षर पुरुषों में अक्षर पुरुष अभि- व्याप्त है और अक्षर पुरुषों में पुरुषों में उत्तम अव्यय पुरुष अभिव्याप्त है, इसलिए वह अव्यय पर पुरुष शब्द से कहा जाता है । और जो उस अव्यय पुरुष में भी अभिव्याप्त है उसका नाम परात्पर है । जो पुरुषोत्तम है ( अव्यय पुरुष) वह अक्षर पुरुष की अपेक्षा से व्यापक होता हुआ भी मायाबल की विशिष्टता के कारण परिमित होता हुआ दिशा, देश, काल, संख्या के सीमा में बांधने वाले धर्मों से सीमित किया जाता है । किन्तु जहां रस में वैसे अनन्त बल उपलब्ध होते हैं, वह रस अपनी अनन्तता के कारण मायाबल के रहने पर भी सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता । उदाहरण के लिए जैसे चित्रपट पर सीमित अनेक

पृष्ठ 84

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195 विज्ञानविद्युक् प्रकार के रूपों वाले चित्र के रहने पर किसी एक सीमित स्थान का अवरोध होने पर भी पूरा चित्रपट अवरुद्ध नहीं होता, वैसे ही इन रसों में परात्पर नाम का रस दिशा, देश, काल आदि से सीमित न होने के कारण अनन्त असीम समझा जाता है । “ जिसका महान् यश है उसकी कोई प्रतिमा (तुलना ) नहीं है " इत्यादि श्रति सन्दर्भों के द्वारा इस परात्पर आत्मा की स्तुति की गई है । यहां इसकी जो अप्रतमता या तुलना रहितता बतलाई गई है उसका कारण उसकी असीमता है । -"ब्रह्म एक अद्वितीय ही है " इत्यादितियों के द्वारा भी इस परात्पर की ही स्तुति की गई है । अधिदैवत, अध्यात्म, अधिभूत इन आधारों के भेद से मायाबल की विशिष्टिता के कारण सीमित शंरीरों वाले अव्यय पुरुषों के नाना भावापन्न होने पर भी इस परात्पर के दिशा, देश, काल से सीमित न होने के कारण यह अद्वितीय है अतः सब कुछ एक वही है इसकी संगति बैठ जाती है । "परात्परपुरुषयोर्वैधर्म्यनिरुक्तिः' अपरिच्छिन्नत्वादेव च नायं परात्परः पुरुष इत्युच्यते । पुरवासितया पुरावच्छेदेन पुरुषाणां परिनित्वात् । परात्परस्य तु पुरानभिमानिनोऽनवच्छिन्नतया पुरुषत्वाऽस- म्भवात् । ननु परात्परस्य पुरुषाद्भिन्नत्वे श्रभ्युपगम्यमाने श्रुतिविरोधः प्राप्नोति- “यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् । " इति श्रुतौ पुरुषस्यापि परात्परत्वम् परात्परस्यापि वा पुरुषत्वमाख्यायते । युक्तञ्चैतत्पुरुषस्यैव परात्परत्वम् ईश्वरपुरुषस्य सर्वेभ्यः परत्वोपपत्तेः । पुरुषेम्यः परा- त्परस्य भिन्नत्वाभ्युपपत्तौ तु 'पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम्' इति मन्त्र तिर्व्याप्येत, इति चेन्न । " परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्"

पृष्ठ 85

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विज्ञानविद्युत् ७६ इति श्रुतेरर्थावगमात् । तत्र हि द्विविधः स परः पुरुषोऽभिप्रयते जीवाव्ययः, ईश्वराव्ययश्च । तथा हि तत्र - "गताः कला पञ्चदश प्रतिष्ठां देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च श्रात्मा परेऽन्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ” इति पूर्वेण श्रुतिवाक्येन जीवशरीरगतानां सर्वविधविकाराणां तत्कारणे क्षरपुरुषे तस्याप्यक्षरपुरुषे तस्याप्यव्ययपुरुषे क्रमेण विलयनं प्रतिपाद्यते । "परात्पर तथा पुरुष का भेद " असीम होने के कारण ही यह परात्पर पुरुष नहीं कहा जाता । क्योंकि पुर में निवास के कारण पुर की सीमा से सीमाबद्ध हो जाने पर पुरुष सीमित हो जाता है । जो परात्पर है वह तो किसी पुर को अपना नहीं समझता अतः वह पुर से सीमित नहीं है और इसीलिए उसे पुरुष कहना असम्भव है । प्रश्न होता है कि परात्पर को पुरुष से भिन्न मानने पर श्रुति वाक्य से विरोध प्राप्त होता है । -- "जैसे बहती हुई नदियाँ नाम और रूप को छोड़कर समुद्र में अस्त हो जाती हैं वैसे ही ज्ञानी पुरुष नाम और रूप से विमुक्त होकर दिव्य परात्पर पुरुष को प्राप्त करता है ". इति वाक्य में पुरुष को भी परात्पर कहा गया है, अथवा परात्पर को भी पुरुष शब्द से ही सम्बोधित किया गया है । और यह पुरुष को परात्पर कहना युक्तियुक्त है क्योंकि ईश्वर पुरुष सबसे पर है । पुरुष से परात्पर को भिन्न मानने पर तो-- - " जो कुछ भूत है तथा जो आगे होने को है वह सब पुरुष ही है " - इस मन्त्र से बिरोध होगा यह शंका नहीं होनी चाहिए -- — " दिव्य परात्पर पुरुष को प्राप्त करता है" - इस श्रुति के अर्थ को ठीक से न 'समझने के कारण यह शंका उपस्थित होती है । वहाँ वह पर पुरुष दो प्रकार का अभीष्ट है एक जीवाव्यय तथा दूसरा ईश्वराव्यय । जैसे वहाँ -- --"पन्द्रह कलाएं प्रतिष्ठा को प्राप्त हैं प्रत्येक देवताओं में देवता प्रतिष्ठा को - प्राप्त हैं, कर्म तथा विज्ञानमय आत्मा ये सब परम अव्यय में एक हो जाते हैं" - इस पहिले के श्रुति वाक्य के द्वारा जीव के शरीर में स्थित सभी विकारों का उसके कारणभूत क्षर पुरुष में तथा उस क्षर पुरुष का भी अक्षर पुरुष में और उसका भी अव्यय पुरुष में क्रमशः विलीन होना प्रतिपादित किया गया है ।

पृष्ठ 86

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विज्ञानविद्यत ५० एवमेकीभूतस्य जीवशरीरस्थस्य परस्याव्ययस्य पुनरीश्वरशरीरस्थे महाध्यये सायुज्यमाख्यायते । ईश्वरशरीरस्थाव्ययपुरुषापेक्षया जीवशरीरस्थाऽव्यय पुरुषस्य पञ्चद- शकलादिनानाविधक्षुद्रधर्मसंयोगात् स्वल्पमात्रोपपत्त्या कथञ्चिद् भेदोपपत्तावपि तेषां पञ्चदशकलादिसर्वविधक्षुद्रधर्माणां व्यपगमे भेदोपाधिराहित्यादस्य जीवाव्ययस्येश्वराव्यये- नैकत्वं स्वत एवोपपद्यते । सोऽयमेवार्थोऽनया श्रुत्या प्रतिपाद्यते । नामरूपाद्विमुक्तो विद्वान् प्रथमं जैवे परेऽव्यये पश्चादैश्वरे सर्वेकीभावात् पराव्ययमात्रो भवति । तेन तथा त्या पुरुषस्य परात्परत्वं परात्परस्य वा पुरुषत्वं नाक्षेप्तुं शक्यते तथा चासीमत्वससीमत्वाभ्यां पुरुषपरात्परयोर्भेदः प्रतिपत्तव्यः । मायाबलरूपोपाधिविगमे तु परात्परपुरुषयोरपि भेदो नास्तीत्यर्थे- "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ” "नेह नानास्ति किञ्चन " इत्याद्यर्द्धतश्रुतीनां तात्पर्य स्यादित्यन्यत् । श्रस्य भेदोपपादकशास्त्रस्य व्यावहा- रिकावस्थोपपादकतया तश्रुतीनां तु पारमार्थिकभावोपपादकतया तयोः प्रकरणयोविष- यभेदादविरोधः सिद्धः । इस प्रकार एकीभूत जीव के शरीर में स्थित परम अव्यय का फिर ईश्वर स्थित महा अव्यय में सायुज्य होता है यह बतलाया गया । ईश्वर के शरीर में स्थित अव्यय पुरुष की अपेक्षा जीव के शरीर में स्थित अव्यय पुरुष में पन्द्रह कला आदि अनेक प्रकार क्षुद्र धर्मों का सयोग होने के कारण थोड़ी मात्रा मे कुछ भेद होने पर भी उन पन्द्रह कला आदि सब प्रकार के क्षुद्र धर्मों के हट जाने पर ( ईश्वर और जीव की ) भेद उत्पन्न करने वाली उपाधिया के हट जाने से इस जीव अव्यय का ईश्वर अव्यय के साथ एकत्व स्वतः जाता है । उक्त श्रुति वाक्य के द्वारा इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है । जो नाम और रूप से विमुक्त ज्ञानवान् है वह पहिले जीव में स्थित परम अव्यय के साथ एकीभावापन्न होता है और उसके अनन्तर ईश्वर में सबका एकीभाव करके पर अव्यय मात्र हो जाता है । इसलिए उस श्रुति के आधार पर पुरुष का परात्परत्व अथवा परात्पर का पुरुषत्व आक्षेप के योग्य नहीं रह जाता । और इस प्रकार पुरुष और परात्पर का भेद उनके असीमत्व और ससीमत्व के आधार पर ही समझने योग्य है ।

पृष्ठ 87

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विज्ञानविद्युत् ८१ मायाबल रूप उपाधि के हट जाने पर तो परात्पर और पुरुष में भी भेद नहीं रह जाता । यही, --- " ब्रह्म एक अद्वितीय ही है " - - " यहाँ कुछ भी भिन्न भिन्न नहीं है" इत्यादि अत प्रतिपादक श्रुति वाक्यों का तात्पर्य है यह अन्य विषय है । भेद को बताने वाले इस शास्त्र का व्यावहारिक अवस्था को तर्क सिद्ध रूप से समझानें में तात्पर्य है तथा अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियों का तात्पर्य पारमार्थिक रूप को समझाना है । यह इन दोनों प्रकरणों का विषयगत भेद है अतः इनमें विरोध का अवकाश नहीं है । पुरुषस्य चितिसम्बन्धात् सृष्टिहेतुत्वम् परात्परस्य पुरुषस्य च सर्वविधबल वैशिष्ट्य साम्येऽपि पुरुषे तावच्चितिसम्बन्धेन सर्वविधबलानि परस्परतः सम्बध्नन्ति । चयनाच्च बलसम्पन्नं रूपं जगत्सृष्टिमधिकुरुते । चितिरेव हि सृष्टिः । एकस्य बलस्य अन्यबलोपरि चयनाद यस्तयोः संसर्गः परस्परसम्ब- न्धात्मकः स एव बन्धो बल संसृष्ट्यात्मकत्वात् संसृष्टिरित्युच्यते । तत्र हि सृष्टी ठकचिद्- बलानां हृदयेऽन्योन्यबन्धनं ग्रन्थिरूपं जायते । स हृदयग्रन्थि ग्रन्थिरित्युच्यते । हृद्ग्रन्थि- सम्पादनमेव चयनमित्युच्यते । बले बलचपतेत यो हृदुग्रन्थिस्तेन बनानां परस्परबत परस्परोपसृष्ट्योर्यदपर्वमेकं सम्पद्यते सा सृष्टिः । तदेवरूपं विश्वं जगन्नामाख्यायते । सर्वे होमे परिश्यमाना विकारसंघा बहूनां बलानां बन्धरूपाः सृष्टयो द्रष्टव्याः । पुरुष का चिति सम्बन्ध से सृष्टि हेतुत्व परात्पर तथा पुरुष का सब प्रकार के बलों की विशिष्टता के आधार पर साम्य होने पर भी पुरुष में चिति के सम्बन्ध से सब प्रकार के बल परस्पर सम्बद्ध हो जाते हैं । और इस प्रकार के चयन से बल से सम्पन्न रूप जगत् की सृष्टि का अधिकारी हो जाता है । चिति या चयन ही सृष्टि है । एक बल के अन्य बल पर चयन होने से जो उनका परस्पर

पृष्ठ 88

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८२ विज्ञान विद्युत् सम्बन्धात्मक चयन होता है वही बन्धन होकर बलों की संसृष्टि का स्वरूप होने से संसृष्टि कही जाती है । इस प्रकार की सृष्टि में कभी बलों के हृदय में एक दूसरे का बन्धन ग्रन्थि के रूप में हो जाता है । वह हृदयग्रन्थि कहलाती है । हृद् ग्रन्थि का सम्पादन ही चयन कह- लाता है । बल पर बल का चयन होने पर जो हृद ग्रन्थि होती है उससे बलों का परस्पर बन्धन हो जाने के कारण एक दूसरे से मिलने पर जो एक रूप बनता है उसी का नाम सृष्टि है इसी विश्व का नाम जगत् होता है । दिखाई देने वाले ये सारे विकारों के समूह बहुत से बलों की बन्धन रूप सृष्टि ही समझने चाहिए । सृष्टिप्रतिसृष्टिकारणबल निरुक्तिः द्विविधानीमानि बलानि - संसर्जकान्यन्यानि, व्यवच्छेदकानि चान्यानि । तत्र संसर्जकबलानामुदये स्वभावत एवतानि बलानि परस्परतः संस्त्रष्टुमुपक्रमन्ते । उत्तरोत्तर- मधिकाधिकं च संसृज्यमानानि बलानि पुनर्ग्रन्थि पुनरन्यं ग्रन्थिमुत्पाद्योपाद्य क्रमेण सूक्ष्मात्स्थूलं स्थूलं रूपं जनयन्तीति सृष्टिक्रमो भवति । प्रथैतस्मिन्नेव बन्धव्यवच्छेदक - बलोदयात् क्रमेण तेषां बलानामुद्बन्धनं जायते । हृद्ग्रन्थिविभेदनाद्बलबन्धविमोक्षः । ततश्च सृष्टि बिच्छेदः इत्येवं प्रतिसंच रोपपत्तौ क्रमेण स्थूलात्सूक्ष्मं सूक्ष्मं रूपं संपद्यते । संषा प्रति- सृष्टिद्विविधा संपद्यते- नित्या साध्या च । स्वत एवं प्रकृत्या जायमाना नित्या । तत्र कदाचिदवश्यमेषां सर्वेषां सृष्टिरूपाणामुद्बन्धनान्मोक्षो भवतीति मन्यामहे । किन्तु नेता- वता सृष्टिविच्छेदः संभाव्यते । श्रासां सृष्टीनामुद्बन्धनेऽपि तत्कालमेवान्येषां बलानां प्रकृ- त्यैवोदयसंभवात् सृष्टिक्रमस्य धारावाहिकतया प्रवाहरूपेण नित्यवात् सृष्टिऔर प्रलय के कारण बलों का परिचय ये बल दो प्रकार के हैं, एक हैं संसर्जक, दूसरे हैं व्यवच्छेदका वहां जब संसर्जक बलों का उदय होता है तब स्वभाव से ही ये बल एक दूसरे से मिलने का उपक्रम करते हैं । उत्तरो- त्तर अधिक से अधिक एक दूसरे से मिलते हुए ये बल ग्रन्थि पर ग्रन्थि उत्पन्न करते हुए क्रम -से सूक्ष्म से स्थूल फिर स्थूल रूपों को उत्पन्न करते हैं अतः यह सृष्टिक्रम कहलाता है । अब इसी बन्धन में व्यवच्छेदक बल का उदय हो जाता है, तब क्रम से उन बलों की ग्रन्थियां

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विज्ञानविद्युत् ८३ खुलने लगती हैं । जब हृद् ग्रन्थि का विभेदन हो जाता है तब बलों का बन्धन छूट जाता है और तब सृष्टि का विच्छेद हो जाता है । इस प्रकार प्रतिसंचर में क्रमशः स्थूल सूक्ष्म रूप सम्पन्न होता है ।यह प्रति सृष्टि दो प्रकार से होती है । एक है नित्य दूसरी है साध्य ।जो स्वयमेव प्रकृति के द्वारा की जाती है वह नित्य है । कदाचित् अवश्य ही इन सभी सृष्टि के रूपों का उद्बन्धन होने से मोक्ष हो जाता है ऐसा हम मानते हैं । किन्तु इससे सृष्टि के बिच्छेद होने की सम्भावना नहीं है । इन सृष्टियों के उद्बन्धन या बन्धन रहित होने पर भी तत्काल ही अन्य बलों का प्रकृति के द्वारा ही उदय होने की सम्भावना हो जाती है । क्योंकि सृष्टि का क्रम धारावाहिक रूप से प्रवाह के रूप में नित्य माना है । यथा खल्वयुतवर्षेभ्यः प्रागुत्पन्नानां पृथिवीपृष्ठ यत्र तत्र प्रतिष्ठितानां वृक्षविशेषा- णामिदानीं काले कुत्रापि स्थितिर्नास्ति । तथाप्यस्मिन् कालेऽपि पृथिवीपृष्ठ यत्र तत्रैते- S संख्या वृक्ष विशेषा न न सन्ति निर्मूलमुत्सन्नानामपि तेषां प्रातिनिध्येनान्येषामन्येषां वृक्षाणां यत्र तत्र पुनरुत्पन्नत्वात् । एवमेव ये यावन्तो वृक्षा इदानों काले यत्र तत्रोपलभ्यन्ते, सर्वेऽप्येतेऽयुतवर्षोत्तरमुत्सन्नाः सन्तः कचिदपि न स्थास्यन्तीति मन्यामहे । किन्तु तदानीम- व्यन्येऽन्ये वृक्षा उत्पद्य प्राग्वत् पृथिव्यामवश्यं स्थास्यन्तीति विश्वसिमः । दृष्टान्तोऽयं सृष्टिपरिवर्तन वन्मोक्षस्याप्युपपाद को द्रष्टव्यः । परः सहस्राब्देभ्यः प्राकालिका बलानां बन्धाः सर्वेऽप्युद्द्बन्धनाद्विमुक्ताः प्रत्येतव्या। प्रपरेचापरे च बलानां बन्धा इदानीं सृष्टिहेतवो विद्यन्ते । तेषामपि कदाचिन्मुक्तिर्भविष्यति । अपरे च बन्धा उत्पत्स्यन्ते । इत्येष बन्धfa- मुक्तिक्रमो धारावाहिकप्रवाहेऽस्मिन्संसारेऽनुवर्तमानो द्रवः । स एव प्रतिसृष्टौ मुक्ति- क्रमो नित्यः प्राकृतिकत्वात् । एवमेव स कृत्रिमोऽपि संपाद्यते । तत्र कमेकान्तनिवृत्या निष्कामकर्मणा वा प्रवर्तमानो विद्वान् विशुद्धात्मज्ञानेन सर्वविधानि सुकृतदुष्कृतानि कर्मा- णि निस्तीर्य विमुक्तो भवतीति ज्ञानिनः प्रतिजानते । तथा चेत्थं द्विविधा बन्धमुक्तिर्भव- तीति सिद्धम् । इत्थं द्विविधोऽपि प्रतिसृष्टिक्रमः सृष्टिक्रमो वा रसे बलानामन्योन्यचयना-- त्संपद्यत इति बोध्यम् । जैसे दस हजार वर्षों से पहले पृथ्वी पर जहां तहां उत्पन्न विशेष प्रकार के प्रति-- ष्ठित वृक्षों की इस समय कहीं भी स्थिति नहीं है तथापि इस काल में भी पृथ्वी के पृष्ठ पर जहां जहां असंख्य वृक्ष हैं, पहले के वृक्षों के मूल सहित नष्ट हो जाने पर भी उनके

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६४ विज्ञानविद्युत् प्रतिनिधि के रूप में अन्य अन्य वृक्ष जहां तहां फिर उत्पन्न हो गए । इसी प्रकार इस काल जितने प्रकार के वृक्ष यत्र तत्र हैं ये भी हजारों वर्षों के उपरान्त कहीं भी नहीं रहेंगे । किन्तु उस समय भी अन्य अन्य वृक्ष उत्पन्न होकर पृथ्वी पर अवश्य रहेंगे ऐसा विश्वास है । यह दृष्टान्त सृष्टि के परिवर्तन की तरह मोक्ष का भी समझाने वाला दिखाई देता है । हजारों वर्षों से पहले बलों के जो बन्धन थे उनका बन्धन खुलकर वे सब विमुक्त हो गए यह समझना चाहिए । दूसरे दूसरे बलों के बन्धन इस समय सृष्टि का संचालन कर रहे हैं । उनकी भी कभी मुक्ति हो जाएगी तथा अन्य बन्धन उत्पन्न हो जाएँगे । इस प्रकार बन्धन और विमुक्ति का यह क्रम धारावाहिक रूप से प्रवाह के स्वरूप में इस संसार में अनुवर्तमान दिखाई देता है । प्रतिसृष्टि में प्राकृतिक होने से यह मुक्ति का नित्य क्रम है । इसी प्रकार मुक्ति का कृत्रिम क्रम भी है । कर्मों का पूर्णतया परित्याग करके अथवा निष्काम कर्म से प्रवृत्त होता हुआ विद्वान् पुरुष विशुद्ध आत्मज्ञान के द्वारा सभी प्रकार के पाप और पुण्य कर्मों को पार करके विमुक्त हो जाता है ऐसी ज्ञानमार्गियों की प्रतिज्ञा है । इस प्रकार बन्धन से मुक्ति दो प्रकार से सिद्ध हुई । दोनों प्रकार का सृष्टि और प्रलय का क्रम रस में बलों के एक दूसरे पर चयन से सम्पन्न होता है यह सिद्ध हुआ । श्रात्मनि मुक्तिकाले कर्मात्यन्तनिवृत्तिमतखण्डनम् स चैष रसे बलानां चितिसबन्धात् सिद्धो भावः पुरुष इत्युच्यते । यत्र तु बलानां ari नास्ति किन्तु सहचरभावेन सर्वाण्यपि बलानि रसे क्वचिद् उत्थायोत्थाय प्रति- तिष्ठन्ति वितिष्ठन्ते वा स एष बलविशिष्टो रसः परात्पर इत्युच्यते । एष च सहचर- भावेन बलानामन्योन्य संबन्धो सुक्तिकालेऽपि द्रष्टव्यः । यत्तु कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्ष इति शङ्कराचार्योमास्वामिप्रभृतयो दार्शनिकाः प्रतिजानते, तदेतदश्रद्धयं मन्यामहे । मात्मनोऽव्ययस्य विद्याकर्मोभयरूपतया ज्ञानकर्मात्यिन्तनिवृत्त रवैज्ञानिकत्वात् । श्रथवा तेषां हृद्ग्रन्थिबन्धनौपयिक चितिसंबन्धापगमे एव तात्पर्यमस्तीत्यध्यवसेयम् । नित्योत्पन्न- विनष्टक्रमरूपाणां बलानां प्रवाहनित्यताया श्रभ्युपगम्यमानत्वात् । न हि रसोऽयमन्तरेण बलानि कदाचिदुपपद्यते । उभयोरप्यनयोः सदसतोरमृतमृत्युसंज्ञयो रसबलयोः परस्परेणा-