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Prashastapada Bhashya Hindi 2
प्रशस्तपादाचार्य प्रणीतम्
प्रशस्तपादभाष्यम् [ पदार्थधर्म्मसङ्ग्रहाख्यम् ]
श्रीधर भट्टकृत
न्यायकन्दलीव्याख्योपेतम्
श्रीदुर्गाधरझाकृत-हिन्दीभाषानुवादसहितम्
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प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
रूपरसस्पर्शद्रवत्वस्नेहसङ्ख्यापरिमाणपथक्त्वसंयोग विभागपरत्वा
परत्वगुरुत्व संस्कारवत्यः । पूर्ववदेषां सिद्धिः ।
यह (जल) रूप, रस, स्पर्श, द्रवत्व, स्नेह, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व और संस्कार इन चौदह गुणों से युक्त है। पृथिवी की तरह सूत्र के वाक्यों से जल में (भी) गुणों की सिद्धि समझनी चाहिए ।
न्यायकन्दली
भावो भेदः । यदेतद् वस्तुनः प्रात्यात्मिकं स्वरूपं स एव भेदः, तच्चापरदर्शनानपेक्ष मिन्द्रिय सन्निकर्षमात्रादेव प्रतीयमानं प्रत्येकं विलक्षणमेव संवेद्यते । तथा हि गवार्थी नाश्वदर्शनात् प्रवर्त्तते, गोशब्दञ्च न स्मरति, तत्राश्वे गवि च स्वेन स्वे नात्मना गृह्यमाणेन तत्स्वरूपनिय मेनान्योन्याभावप्रतीतिर्नानुपपन्ना । न चैवं सति वाच्यं स्वरूपभेद एवास्तु किमन्योन्याभावेनेति, तस्यापि प्रतिषेधविषयस्य संवेदनात् ।
न केवलमत्वमपां वैधर्म्यं स्नेहसहचरितं चतुर्दशगुणवत्त्वमपीतरेभ्यो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह – रूपरसेति । अत्र द्वन्द्वानन्तरं मतुप्प्रत्यय: करणीयः । पूर्ववदेषां सिद्धिः । यथा पूर्व पृथिव्यां सूत्रका रवचनादेषां रूपादीनां गुणानां विवेक वस्तुतः भेद ही है। ( उ० ) इस प्रश्न के समाधान में हम यह कहते हैं कि परस्पर भिन्न दो वस्तुओं में अन्योन्याभाव रहता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि (प्रकृत) भेद और अन्योन्याभाव दोनों ( यहाँ ) एक ही वस्तु हैं। प्रत्येक वस्तु में रहनेवाला असाधारण धर्म ही यहाँ ( भेद ) है। यह भेद ( आश्रय में ) इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही और किसी के ज्ञान की अपेक्षा न करके और व्यक्तियों के असाधारण धर्म से विलक्षण रूप में प्रतिभासित होता है। गाय का प्रयोजन जिस व्यक्ति को है, वह अश्व के देखने से न प्रवृत्त होता है, न गो शब्द का स्मरण हो करता है। वहाँ गो और अदव में असाधारण रूप से ज्ञात होनेवाले नियमित तत्तत् असाधारण धर्मों से दोनों में अन्योन्याभाव की प्रतीति में कोई अन्तर नहीं आता। इस लिए यह प्रश्न भी ठीक नहीं है कि ( प्र० ) वस्तुओं के तत्तत् असाधारण धर्म से अतिरिक्त भेद मानने की आवश्यकता नहीं है। ( उ०) क्योंकि भेद की प्रतीति नज् प्रभृति निषेधार्थक शब्दघटित वाक्यों से होती है।
केवल जलत्व जाति ही इसका असाधारण धर्म नहीं है, किन्तु स्नेहादि चौदह गुणों का आश्रयत्व भी औरों से जल का वैधर्म्य है, यह उपपादन करते हुए रूप, रस, इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । यहाँ द्वन्द्व समास के बाद मतुप् प्रत्यय करना चाहिए । ‘पूर्ववदेषां सिद्धिः’ जैसे कि पहिले अर्थात् पृथिवी में सूत्रकार के वाक्यो से रूपादि गुणों की सिद्धि
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रध्ये जल
प्रशस्तपादभाष्यम्
शुक्लमधुरशीता एव रूपरसस्पर्शा: ।
रूपों में शुक्ल रूप ही जल में है, रसों में मधुर रस ही एवं स्पर्शो में
शीतस्पर्श ही है ।
न्यायकन्दली
सिद्धि प्रतिपत्तिस्तथाप्स्वपीत्यर्थः । तथा च सूत्रम् – “रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाइच” इति । सङ्ख्यादिप्रतिपादकन्तु साधारणमेव सूत्रम् | वैधर्म्यनिरूपणा वसरे पृथिव्यादिसाधारणानां रूपादीनामभिधानमयुक्तमित्याशङ्कयावान्तरभेदेनैषा मसाधारणत्वं प्रतिपादयति- शुक्लेत्यादि । शुक्लमेव रूपमपाम्, मधुर एव रसः, शीत एव स्पर्श: । अप्सु रूपान्तरप्रतीतिराश्रय रूपभेदात् । कथमेतदिति चेत् ? तासामेवोद्धृत्य वियति विक्षिप्तानां धवलिममात्रप्रतीतेः, पुर्नानपतितानामाश्रय रूपानुविधानात् । तासु न मधुरो रसो गुडादिवदप्रतिभासनादिति चेत् ? न, कटुकषायतिक्तलवणाम्लविलक्षणस्य रसस्य संवेदनात्, गुडादिवदप्रतिभासनन्तु माधुर्य्यातिशयाभावात् ।
अर्थात् ज्ञान होता है, उसी प्रकार जल में भी ( समझना चाहिए ) । जैसा कि सूत्र है— “रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाश्च ” ( २ | १ | २) । अर्थात् रूप, रस, स्पर्श, द्रवत्व और स्नेह से युक्त वस्तु हो जल है। संख्यादि नौ गुणों के लिए वही साधारण ( ‘सख्या: परिमाणानि’ इत्यादि ४ | १ | ११ ) सूत्र है | रूपादि जितने गुण पृथिवी प्रभृति और द्रव्यों में भी रहते हैं जल के वैधर्म्यं के निरूपण के प्रसङ्ग में उनका निरूपण क्यों? इस प्रकार का प्रश्न अपने मन में रखकर ये रूपादि गुण भी जिस रीति से जल के वैधर्म्य हो सकते हैं वह रीति ‘शुक्लमधुर’ इत्यादि से कहते हैं । ( रूपों में ) शुक्ल रूप ही ( जल में ) है, एवं ( रसों में ) मधुर रस ही जल में है, एवं ( स्पर्शो में ) शीत स्पर्श ही ( जल में ) है । आश्रय रूप उपाधि के भेद से ही जल में में दूसरे रूपों की प्रतीति होती है । ( प्र० ) यह कैसे समझते हैं ? ( उ०) उसी जल को आकाश की ओर उछाल कर आश्रय से विच्छिन्न कर दिया जाय तो फिर उस ( जिस जल में नील-रूप का भान होता है ) में भी शुक्ल रूप की ही प्रतीति होती है । ( प्र० ) जल में मधुर रस नहीं है, क्योंकि गुड़ प्रभृति द्रव्यों की तरह जल में मधुर रस की प्रतीति नहीं होती। ( उ० ) यह स्वीकृत सत्य है कि ‘जल में रस हैं’, किन्तु वह रस कटु, कषाय, तिक्त, लवण और अम्ल से भिन्न है, अतः जल का रस मधुर ही है, क्योंकि इनसे भिन्न कोई सातवाँ रस नहीं है। गुड़ प्रभृति द्रव्यों की तरह जल में मधुर रस का भान इसलिए नहीं होता कि इसमें गुड़ादि द्रव्यों की तरह उत्कट माधुर्थ्य नहीं है। केवल इससे जल में मधुर रस के अभाव की सिद्धि नहीं हो सकती।
प्रकरणम् ]
●भाषानुवादसहितम्
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प्रशस्तपादभाष्यम्
स्नेहोऽम्भस्येव सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वम् ।
स्नेह एवं सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) द्रवत्व केवल जल में ही रहते हैं।
न्यायकन्दली
निविशेष एव स्नेहोऽपां वैधर्म्यमिति ध्वनति- स्नेहोऽम्भस्येवेति । नन्वयं पृथिव्यामपि वर्त्तते, यथा क्षीरे तँले सपिषि च । न सर्वत्र, पाषाणेष्टकाशुष्केन्धना दिष्वसम्भवात् । यत्त क्वचित् क्षीरादिषु दर्शनं तत्संयुक्त समवायादुदक गतस्यैव, यथा सांसिद्धिकद्रवत्वस्य क्षीरतैलयोः । उदकधर्मत्वन्तु स्नेहस्य सर्वत्र तदन्वयव्यतिरेकानुविधानात् । तथा चानूपदेशप्रभवानां तरुतृणादीनां स्निग्धता, जाङ्गलप्रदेशप्रभवानाञ्च रूक्षता । तत्रापि सततं परिषिच्यमानमूलानां स्निग्धत्वं तद्विरहिणाञ्च तन्नास्तीति ।
सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वमिति । न केवलं स्नेह, स्वभावसिद्धञ्च द्रवत्व सम्भस्येवेत्यर्थः । क्षीरतैलयोस्त्वाश्रय सन्निकर्षेण तदुपलम्भः, क्वचित् तयोघनत्वो पलम्भात् ।
किसी और वस्तु को साथ में न लेकर भी स्वतन्त्र रूप से केवल स्नेह जल का असाधारण धर्म हो सकता है, यही बात ‘स्नेहोऽम्भस्येव’ इस वाक्य से सूचित करते हैं । ( प्र० ) स्नेह तो जल की तरह दूध, तेल, घी प्रभृति में भी है ? ( उ० ) नहीं, क्योंकि पत्थर, इट, सूखे काठ प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में स्नेह की उपलब्धि नहीं होती । दूध प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में जल का स्नेह हो संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्ध होता है जैसे कि दूध प्रभृति में ही स्रांसिद्धिक द्रवत्व की उपलब्धि होती है सभी जलों में स्नेह की उपलब्धि ( रूप अन्वय ) एवं जल से भिन्न सभी वस्तुओं में स्नेह की अनुपलब्धि ( रूप व्यतिरेक ) ये ही दोनों स्नेह जल के ही धर्म है इसमें प्रमाण है। अतः अनूप’ देश में उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि और तिनके स्निग्ध एवं “जाङ्गल प्रदेश में उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि रूक्ष देखे जाते हैं। जाङ्गल प्रदेश में भी बराबर सींचे जाने वाले वृक्षादि स्निग्ध देखे जाते हैं तथा बराबर न सींचे जानेवाले वृक्षादि रूक्ष देखे जाते हैं।
‘सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वम्’ अर्थात् बिना किसी की सहायता से स्वतन्त्र रूप से केवल स्नेह ही जल का बैधर्म्य नहीं है, किन्तु केवल ‘सांसिद्धिक द्रवत्व’ भी उसी रूप से जल का वैधर्म्य है, क्योंकि वह भी केवल जल में ही है। दूध और तेल में आश्रय के सम्बन्ध से सांसिद्धिक द्रवत्व की प्रतीति होती है, क्योंकि उनमें कभी काठिन्य की प्रतीति भी होती है ।
१. स्वल्पोदकतृणो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः । स ज्ञेयो जाङ्गलो देशो बहुधान्यादिसंयुतः ||
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न्यायकन्दलीसं बलित प्रशस्त पादभाष्यम्
[ द्रव्ये जल
प्रशस्तपादभाष्यम्
ताश्च पूर्ववद् द्विविधाः, नित्यानित्यभावात् । तासां तु का त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् । तत्र शरीरमयोनिजमे ब वरुणलोके, पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् ।
यह भी पृथिवी की तरह नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का ह। शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से कार्य रूप जल के तीन प्रकार हैं। जलीय शरीर अयोनिज ही होते हैं। वह शरीर केवल वरुण लोक में प्रसिद्ध है एवं पार्थिव अवयवों के सम्बन्ध से सुख और दुःख की अनुभूति की शक्ति प्राप्त करता है।
न्यायकन्दली
पृथिव्या इवापामप्यवान्तर भेदेन द्वैविध्यमित्याह – ताश्चेति ।
परमाणुस्वभावा आपो नित्याः, कार्यस्वभावास्त्वनित्याः । कार्य्यञ्च त्रिविधम् । अत्रापि पूर्ववदनुषङ्गः, यथा शरीरेन्द्रिय विषयसंज्ञितं कार्यं त्रिविधमेवमपासपीति । तत्र शरीरमयोनिजमेव, पार्थिवं शरीरं योनिजमयोनिजञ्च, आप्यं शरीरमयोनिजमेवेति विशेष इत्यर्थः । ननु मानुषं शरीरं तावत् पार्थिवं गन्धगुणोपलब्धेः, आप्यं तु क्वास्तीत्याह-वरुणलोक इति । इदं शरीरमपामागमात् प्रत्येतव्यम् । द्रवत्वैकस्वभावत्वादपां तदारब्धं शरीरं जल बुद्बुदप्रायं विशिष्टव्यवहारायोग्यं कथमुपभोगसमर्थ स्यादित्याह- पार्थिवा वयवोपष्टम्भादुपभोगसमर्थम् । पार्थिवानामवयवानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषा
‘ताश्च’ इत्यादि से लिखते हैं कि पृथिवी की तरह जल के भी अपने अवान्तर भेद दो प्रकार के हैं। परमाणुरूप जल नित्य है एवं कार्यरूप जल अनित्य है। “कार्य त्रिविधम्” इस वाक्य में ‘त्रिविधम्’ यह पद भी जोड़ देना चाहिए । ( तदनुसार इस वाक्य का यह अर्थ है कि ) जैसे पृथिवी के शरीर इन्द्रिय और विषय भेद से तीन भेद हैं, वैसे ही उसी नाम से जल के भी तीन भेद हैं। तत्र शरीरमयोनिजमेव’ अर्थात् पार्थिव शरीर से जलीय शरीर में यह अन्तर है कि पार्थिव शरीर के योनिज और अयोनिज दोनों ही प्रकार हैं, किन्तु जलीय शरीर केवल अयोनिज ही होते हैं। मनुष्य के शरीर में गन्ध की उपलब्धि होती है, अतः समझते हैं कि वह पार्थिव है। किन्तु जलीय शरीर कहाँ है? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि ‘वरुणलोके’, अर्थात् जलीय शरीर केवल वरुणलोक में प्रसिद्ध है। इस विषय को शास्त्र के द्वारा ही समझना चाहिए । जल प्रसरणशील द्रव्य हैं, इससे उत्पन्न शरीर तो जल के बुद्बुदे के समान होंगे, उनसे शरीर के प्रधान प्रयोजन उपभोग का सम्पादन असम्भव होगा। इसी असम्भावना को ‘पार्थिवावयोषष्टम्भाच्च इत्यादि से हटाते हैं। अर्थात् पार्थिव अवयवों के उपष्टम्भ
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प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली
दाप्यं शरीरसुपभोगाय समर्थ स्यात् । आप्यशरोरोत्पत्तौ पार्थिवावयवा निमित्त कारणम्, तेषां संयोगादाप्यावयवानां द्रवत्वे प्रतिरुद्धे विशिष्टमेवेदं शरीरमुत्पद्यते, न जलबुद्बुदप्रायमित्यर्थः । ये तु पञ्चभूतसमवायिकारणं शरीरमित्यास्थिषत, तेषामगन्धं शरीरं स्यात्, कारणगन्धस्यैकस्यानारम्भकत्वात्। चित्ररूपरसस्प शश्व प्राप्नोति कारणेषु नानारूपरसस्पर्शसम्भवात् । न चैवं दृष्टम्, तस्मान्न पश्च भूतप्रकृतिकम् । भूजलप्रकृतिकमप्यत एव न स्यात्, अत एव भूजलानिल प्रकृतिकमपि न स्यात्, भूवाय्वाकाश प्रकृतिकत्वेऽरूपमर समगन्धञ्च स्यात्, अनलानिलाकाश प्रकृतिकत्वे चागन्धमरसं चेत्यादि यथासम्भवं योजनीयम् । न च पश्चभूतसमवायि कारणत्वे शरीरस्यैकत्वं प्राप्नोति स्वभावभेवेन भेदोपपत्तेः । मानुषं शरीरं पृथि व्यात्मकं गन्धवत्त्वात् परमाणुलक्षणपृथिवीवत् । उदकादिधर्मोपलम्भः कथमत्रेति चेत् ? संयुक्तसमवायादित्यलम् ।
अर्थात् विलक्षण संयोग से जलीय शरीर में उपभोग की क्षमता आएगी। कहने का तात्पर्य है कि जलीय शरीर के पार्थिव अवयव भी निमित्तकारण हैं। उनके संयोग से जल का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है, अतः उसके बाद जलीव शरीर भी विशेष आकार का ही उत्पन्न होता है. जल के बुद्बुद की तरह नहीं। जो कोई ( प्र० ) पृथिवी, जल, तेल, वायु और आकाश इन पाँचों द्रव्यों को सभी शरीरों का समवायिकारण मानते हैं, उनके मत में ( उ० ) ( १ ) शरीर गन्ध से सर्वथा रहित होगा, क्योंकि समवाधिकारणों में से किसी एकमात्र में रहनेवाला केवल एक गुण कार्य के गुण को उत्पन्न नहीं कर सकता। ( २ ) एवं पाँचों महाभूतों से उत्पन्न शरीर में चित्र रूप, चित्र रस, चित्र गन्ध और चित्र स्पर्श की सत्ता माननी पड़ेगी, क्योंकि शरोर के समवायि कारणों में नाना तरह के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श हैं किन्तु चित्र रूपरसादि विशिष्ट शरीर की कहीं उपलब्धि नहीं होती। तस्मात् पाँचों महाभूत सम्मिलित होकर किसी भी एक शरीर के समवाधिकारण नहीं हैं, इसी हेतु से पृथिवी और जल ये दोनों भी किसी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं, एवं पृथिवी, जल और वायु ये तीनों भी किसी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं। पृथिवी, वायु और आकाश इन तीनों को अगर किसी एक शरीर का समवायिकारण मानें तो इनसे उत्पन्न शरीर रूप, रस और गन्ध इन तीनों से रहित होगा अगर तेज वायु और आकाश इन तीनों को एक शरीर का समवायिकारण मानें तो फिर इन तीनों कारणों से उत्पन्न शरीर गन्ध और रस से शून्य होगा। इस प्रकार और भी कल्पना करनी चाहिए। पञ्च महाभूत रूप अनेक समवायिकारणों से शरीररूप एक कार्य की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती, क्योंकि सभी के स्वभाव अलग अलग हैं। भिन्न स्वभाव के व्यक्तियों से एक स्वभाव के कार्य
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न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्ये जल
प्रशस्तपादभाष्यम्
इन्द्रियं सर्वप्राणिनां रसव्यञ्जकं विजात्यनभिभूतैर्जलावयवैरारब्धं रसनम् | विषयस्तु सरित्समुद्र हिम करकादिः ।
जिससे प्राणियों को रस का प्रत्यक्ष होता है, वही जलीय इन्द्रिय है। यह विरोधी द्रव्यों की शक्ति से अपराजित जल के अवयवों से बनती है। इस इन्द्रिय का अन्वर्थ नाम है ‘रसना’ । नदी, समृद्र पाला, बरफ इत्यादि विषय रूप जल हैं ।
न्यायकन्दली
इन्द्रियं रसव्यञ्जकं सर्वप्राणिनामिति । सर्वप्राणिनां रसव्यञ्जकं यदिन्द्रियं तज्जलावयवैरारब्धम् । तथापि कस्मात् तदेव रसव्यञ्जकं स्यात्, नान्य दुदक द्रव्यमित्याह –विजात्यनभिभूतैरिति । विजातिभि: पार्थिवावयवैर्येऽनभिभूता अप्रतिहतसामर्थ्या आप्यावयवास्तैरितरद्रव्यविलक्षणमारब्धमत इदं विशिष्टो त्पादा सव्यञ्जकमिन्द्रियं न द्रव्यान्तरम् तस्येत्थमुत्पत्त्यभावादित्यर्थः । एतच्च नियमदर्शनादेव कल्प्यते । रसनेन्द्रियसद्भावे रसोपलब्धिरेव प्रमाणम्, क्रियायाः की उत्पत्ति नहीं हो सकती। मानव शरीर पार्थिव है, क्योंकि उसमें गन्ध को उपलब्धि होती है, जैसे कि पार्थिव परमाणु ( प्र० ) मानव शरीरों में जलादि के धर्मों की उपलब्धि कैसे होती है ? ( उ० ) संयुक्त समवाय सम्बन्ध से अब इस विषय में इतना ही पर्याप्त है।
“इन्द्रियं रसव्यञ्जकं सर्वप्राणिनाम्” । यह तो ठीक है कि सभी प्राणियों के रस प्रत्यक्ष का कारण रसनेन्द्रिय जल के अवयवों से बनती है फिर भी इन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य ही क्यों रस का व्यञ्जक होगा ? कोई और जलीय द्रव्य क्यों नहीं ? ‘विजात्यनभिभूतैः’ इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं। ‘विजाति’ अर्थात् पार्थिव अवयवों से, ‘अनभि सूत’ अर्थात् जिनका बल प्रतिरुद्ध नहीं हुआ है, इस प्रकार के जलीय अवयवों से यह ( इन्द्रिय रूप ) विलक्षण द्रव्य उत्पन्न होता है। इस प्रकार और जलीय द्रव्यों से विलक्षण रूप से उत्पन्न होने के कारण यह इन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य ही रस का ब्यञ्जक है, और कोई जलीय द्रव्य नहीं। क्योंकि और जलीय द्रव्यों की उत्पत्ति इससे भिन्न रीति से होती है। “इस रसनेन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य से ही रस की अभिव्यक्ति होती है, और द्रव्यों से नहीं” इस नियम से ही उक्त कल्पना करते हैं। रस की उपलब्धि ही रसनेन्द्रिय १. पार्थिव, जलीय, तैजस और वायवीय भेद से शरीर चार प्रकार के हैं। इनमें से प्रत्येक के क्रमशः पृथिवो, जल, तेज और वायु इनमें से एक एक ही समवायिकारण हैं। चारों में से तीन और आकाश ये सभी निमित्तकारण हैं। इसीसे शरीरों में पाकि का व्यवहार होता है।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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प्रशस्तपादभाष्यम
तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेजः । रूपस्पर्श सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व
संयोगविभागपरत्वा परत्वद्रवत्वसंस्कारवत् । पूर्ववदेषां सिद्धि | शुक्लं भास्वरश्च रूपम् | उष्ण एव स्पर्शः । तत्र
तेज का व्यवहार तेजस्त्व जाति के सम्बन्ध से करना चाहिए। यह रूप, स्पर्श, सङ्ख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, द्रवत्व और संस्कार इन ग्यारह गुणों से युक्त है। इसमें भी गुणों की सिद्धि पृथिवी और जल की तरह सूत्रकार की उक्तियों से समझनी चाहिए। इसमें रूपों में से भास्वर शुक्ल रूप ही, एवं स्पर्शों में से उष्ण स्पर्श ही है।
न्यायकन्दली
करणसाध्यत्वात् । आप्यत्वं रूपादिषु मध्ये रसव्यञ्जकत्वात्, मुखशोषिणां लालादि द्रव्यवत् | विषयनिरूपणार्थमाह –विषयस्त्विति । सरित्समुद्रौ हिमं करको धनोप लमित्यादिविषयो भोग्यत्वेन भोक्तुर्भोगसाधनत्वात् ।
तेजस्त्वा भिसम्बन्धात्तेज इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । तेजस्त्वमिव रूपाद्येकादशगुणयोगोऽपि तस्य वैधर्म्यमिति दर्शयति–रूपेत्यादि । पूर्ववत्तेषां सिद्धिरिति । यथा सूत्रकारवचनाद्रूपादीनां पृथिव्यां सिद्धस्तथा तेजस्यपीत्यर्थः । तथा च सूत्रम् — “तेजोऽपि रूपस्पर्शवत्” (२-१-३) | सङ्ख्यादिप्रतिपादकन्तु की सत्ता में प्रमाण है, क्योंकि क्रिया करण से ही निष्पन्न होती है । रसनेन्द्रिय जलीय इस लिए है कि रूपादि गुणों में से वह रस को ही व्यक्त करती है, जैसे कि मुँह का तरल द्रव्य | विषयरूप जल को समझाने के लिए ‘विषयस्तु’ इत्यादि वाक्य लिखते हैं। चूँकि नदी, समुद्र, पाला, बरफ प्रभृति द्रव्य जीव के सुखदुःखानुभव के साधन हैं, अतः ये विषयरूप जल हैं।
‘पृथिवीस्वादिसम्बन्धात् पृथिवी’, अपत्वाभिसम्बन्धादापः’ इत्यादि पहिले वाक्यों की तरह तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेजः’ इस वाक्य की भी व्याख्या करनी चाहिए । ‘रूपस्पर्श’ इत्यादि पकि का तात्पर्य है कि तेजस्त्व जाति की तरह रूपादि ग्यारह गुणों का सम्बन्ध भी तेज का ‘वैधर्म्य’ अर्थात् लक्षण है। ‘पूर्ववत्तेषां सिद्धिः’ अर्थात् जैसे पृथिव्यादि द्रव्यों में सूत्ररूप वचनों से गुणों की सत्ता प्रमाणित की है, उसी प्रकार सौत्र वचनों से ही तेज में भी रूपादि ग्यारह गुणों को सिद्धि समझनी चाहिए। जैसा कि सूत्र है— “तेजोऽपि
१. अभिप्राय यह है कि छेदनादि क्रिया कुठारादि करणों से ही निष्पन्न देखी जाती हैं। इस दृष्टान्त से यह अनुमान सुलभ है कि रस प्रत्यक्षरूप क्रिया का भी कोई करण
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाव्यम्
[ द्रव्ये तेज:–
प्रशस्तपदिभाष्यम्
तदपि द्विविधमणुकार्य्यभावात् । कार्य्यश्च शरीरादित्रयम् ।
यह भी परमाणु (नित्य) और कार्य के भेद से दो प्रकार का है, एवं कार्यरूप तेज के शरीर, इन्द्रिय एवं विषय भेद से तीन प्रकार हैं । तैजस
न्यायकन्दली
साधारणमेव सूत्रम् । यादृशमस्य रूपं तद्दर्शयति- शुक्लं भास्वरञ्चेति । शुक्लं रूपं पृथिव्युदकयोरप्यस्ति, किन्तु न भास्वरं रूपम्, स्वरूपप्रकाशकं शुक्लं रूपं तेजस्येवेति वैधर्म्यम् । यत् त्वस्य लोहितं कपिलं वा रूपं क्वचित् प्रतीयते तदाश्रयोपाधिकृतम्, निराश्रयस्य सर्वत्र शुक्लतामात्रप्रतीतेः यथा प्रदीपप्रभा मण्डलस्य सौरचन्द्राद्यालोकस्य च उष्ण एव स्पर्श इति । पृथिव्युदकमरुता मनुष्णाशीतशीतानुष्णाशीतस्पर्शाः, उष्ण एव तेजसि स्पर्श इति वैधर्म्यम् ।
पृथिव्युदकवत् तेजसोऽपि द्वैविध्यमपिशब्देन सम्भावयन्नाह – तदपीति । अणु भावात् कार्य्यभावात् तेजोऽपि द्विविधमिति । कार्य्यश्च शरीरादित्रयम्, शरीरमिन्द्रियं
रूपस्पर्शवत्” (२-१-३) । ( अर्थात् भास्वर शुक्ल रूप एवं उष्ण स्पर्श से युक्त द्रव्य ही
‘तेज’ है। तेज में संख्यादि गुणों का प्रतिपादक “संख्याः परिमाणानि” (४-१-११)
इत्यादि सामान्य सूत्र ही है। तेज में किस प्रकार का रूप है ? इसका उत्तर शुक्लं
भास्वरञ्च’ इत्यादि से देते हैं। यद्यपि शुक्ल रूप पृथिवी और जल में भी है, तथापि
उनका शुक्ल रूप ‘भास्वर’ अर्थात् अपने रूप एवं पररूप दोनों का प्रकाशक नहीं है ।
इस प्रकार का शुक्ल रूप केवल तेज में ही है, अतः भास्वर शुक्ल रूप तेज का लक्षण है।
कहीं कहीं तेज में जो लाल पीले प्रभृति रूपों के दर्शन होते हैं, यह आश्रयरूप
उपाधिमूलक हैं, क्योंकि प्रदीप और सौर प्रकाश प्रभृति में सभी जगह शुक्लता की हो
प्रतीति होती है। ‘उष्ण एव स्पर्शः’ अर्थात् पृथिवी में अनुष्णाशीत स्पर्श, जल में शीत स्पर्श एवं
वायु में अनुष्णाशीत स्पर्श हैं किन्तु तेज में केवल उष्ण स्पर्श ही है, अर्थात् केवल उष्ण
स्पर्श भी तेज’ का लक्षण है।
‘तदपि’ इस वाक्य के ‘अपि’ शब्द के द्वारा सूचित करते हैं कि पृथिवी एवं जल की तरह तेज के भी दो प्रकार हैं। अर्थात् परमाणु स्वरूप एवं कार्य स्वरूप
है, क्योंकि वह भी किया है, जैसे कि छेदनादि किया। रस प्रत्यक्ष का करणत्व चक्षुरादि इन्द्रियों में बाधित है, अतः इन सभी से भिन्न कोई इस क्रिया का करण मानना पड़ेगा, जिसका अन्वर्थ नाम है ‘रसना’ ।
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प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
शरीरमयोनिजमेवादित्यलोके । पार्थिवावयवोषष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां रूपव्यञ्जकमन्यावयवानभिभूतैस्ते जोऽवय वै
रारब्धं चक्षुः ।
शरीर भी अयोनिज ही है एवं आदित्यलोक में प्रसिद्ध है। पार्थिव अवयवों के
सम्बन्ध से यह सुख दुःख के अनुभव की क्षमता प्राप्त करता है । सभी प्राणियों को रूप का प्रत्यक्ष जिससे होता है, वही तैजस इन्द्रिय है। जिनकी शक्ति विजातीय द्रव्यों की शक्ति से पराभूत नहीं हुई है, उन तैजस अवयवों से तैजस इन्द्रिय की सृष्टि होती है। इस इन्द्रिय का नाम है ‘चक्षु’ ।
न्यायकन्दली
विषय इति त्रयं तेजसश्च कार्य्यम् । शरीरमयोनिजमेवादित्यलोके । ननु दहनात्म त्वात् तेजसां तदारब्धं शरीरं वह्निपुञ्जप्रायं विशिष्टव्यवहारायोग्यत्वान्नोपभोगाय कल्प्यते तत्राह- पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च इति । पार्थिवानामवयवानां निमित्तभूतानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषात् तेजोऽवयवा उपभोगक्षमं विशिष्टमेव शरीरमारभन्ते, न वह्निपुञ्जप्रायमित्यभिप्रायः ।
इन्द्रियं रूपव्यञ्जकमिति । सर्वप्राणिनां रूपव्यञ्जकं यदिन्द्रियं तत् तेजोऽवयवैरारब्धम् । इदमेव कुतो रूपव्यञ्जकमिन्द्रियं स्याद्, नान्यत् तेजो द्रव्यमित्यत्रोपपत्तिः – अन्यावयवानभिभूतैरिति । ये पार्थिवोदकावयवैरप्रतिबद्ध
भेद से तेज के भी दो भेद हैं । “कार्यञ्च शरीरादित्रयम्” अर्थात् शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से कार्यरूप तेज के तीन भेद हैं। तैजस शरीर अयोनिज ही है, जो कि आदित्यलोक में प्रसिद्ध है। तेज है अग्नि स्वरुप, उससे उत्पन्न द्रव्य अग्नि की तरह ही होगा, अत. शरीर से होनेवाले विशेष प्रकार के व्यवहार के अनुपयुक्त होगा। फलतः यह शरीर सुखदुःखानुभवरूप अपना प्रधान कार्य ही नहीं कर सकता ? इसी प्रश्न का समाधान पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च” इस वाक्य से किया गया है। अभिप्राय यह है कि पार्थिव अवयवों के ‘उपष्टम्भ’ अर्थात् विशेष प्रकार के संयोग की सहायता से तेज के अवयव (उपभोगक्षम) एक विशेष प्रकार के शरीर को उत्पन्न करते हैं, वह्निसमूह की तरह नहीं ।
“इन्द्रिय रूपव्यञ्जकम्” सभी प्राणियों के रूप प्रत्यक्ष की कारणीभूत इन्द्रिय तेज के अवयवों से ही उत्पन्न होती है। यही इन्द्रियरूप तैजस द्रव्य रूप के प्रत्यक्ष का कारण क्यों है ? अन्य तैजस द्रव्य क्यों नहीं है ? इसी प्रश्न का उत्तर ‘अन्यानभिभूतैः’ इत्यादि से देते हैं। तेज के जिन अवयवों का सामर्थ्य पार्थिव और जलीय अवयवों
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रवास्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये तेज:
प्रशस्तपादभाष्यम
विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् — भौमं दिव्यमुदर्य्यमाकरजञ्च । तत्र भौमं काष्ठेन्धन प्रभव मृद्र्ध्वज्वलनस्वभावं पचनदहनस्वेदनादिसमर्थम्, दिव्यम
विषय नामक तेज के भौम, दिव्य, उदर्य और आकरज भेद से चार प्रकार हैं। इनमें लकड़ी प्रभृति से उत्पन्न तेज ‘भौम’ है। ऊपर की ओर प्रज्वलित होना उसका स्वभाव है। भौम तेज पाक, दाह एवं वस्तुओं के काठिन्य को दूर कर कोमल बनाने की शक्ति रखता है। जिसमें ‘अप्, अर्थात् जल ही लकड़ी का काम
न्यायकन्दली
सामर्थ्यास्तेजोऽवयवास्तै रारब्धं चक्षुः, अत इदं विशिष्टोत्पादाद्रूपाभिव्यञ्जक मिन्द्रियं नान्यत् । तादृशं तदुत्पद्यत इत्यत्रादृष्टमेव कारणम्, कार्य्यनियम एव प्रमाणम् | तेजसत्वन्तु तस्य रूपादिषु मध्ये नियमेन रूपस्याभिव्यञ्जकत्वात् प्रदी पवत् । इदं त्वदृष्टवशादनुभूतरूपस्पर्शम्, तेन न स्वाश्रयं दहति नाप्युपलभ्यते ।
विषयसंज्ञकं चतुविधम् | विषय इति संज्ञा यस्य तद्विषयसंज्ञकं तेजःकार्य्यं चतुविधम् । चातुविध्यमेव दर्शयति- भौममित्यादि । तत्रेति निर्धार णार्थ: । भूमौ भवं भौमं काष्ठेन्धनप्रभवं काष्ठस्वभावं यदिन्धनं तस्मात् प्रभवत्यु
से नष्ट नहीं हुआ है, उन तैजस अवययों से इस इन्द्रिय की सृष्टि होती है। चूंकि इसी तैजस द्रव्य की उत्पत्ति उक्त विशेष प्रकार से होती है, दूसरे तैजस द्रव्यों की नहीं, अतः यही तंजस द्रव्य रूप के प्रत्यक्ष का उत्पादक है, दूसरे तैजस द्रव्य नहीं । “उक्त विशेष प्रकार से इसी तैजस द्रव्य की उत्पत्ति क्यों होती है ?” इस प्रश्न के उत्तर में अदृष्ट को ही इसका कारण कहना पड़ेगा एवं इस प्रकार के अदृष्ट की सत्ता में इस नियम को ही प्रमाण मानना पड़ेगा कि इन्द्रिय रूप तैजस द्रव्य से हो रूप का प्रत्यक्षरूप कार्य होता है, दूसरे द्रव्यों से नहीं । ( रूप प्रत्यक्ष का उत्पादक ) यह द्रव्य तैजस इस लिए है कि रूपादि गुणों में से यह केवल रूप के ही प्रत्यक्ष का उत्पादन कर सकता है, जैसे कि प्रदीप अदृष्टवश इसके रूप और स्पर्श अनुभूत हैं, अतः ( स्पर्श के अनुभूतत्व प्रयुक्त ) अपने आश्रय में दाह को एवं ( रूप के अनुभूतत्व प्रयुक्त ) अपने प्रत्यक्ष को उत्पन्न नहीं कर सकता ।
‘विषय संज्ञकं चतुविधम्’ अर्थात् ‘विषय इति संज्ञा यस्य’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘विषय’ नाम के तेज के कार्य चार प्रकार के हैं। यहीं चारों भेद ‘भीमम्’ इत्यादि से कहते हैं। ‘त’ इस पद के सप्तमी विभक्ति का अर्थ है निद्धरण। ‘भौम’ अर्थात् पृथिवी से उत्पन्न विषयरूप तेज का नाम ‘भौम’ है। ‘काष्ठेन्धनप्रभवम्’ अर्थात् लकड़ी रूप
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
१०१
बिन्धनं सौरविद्युदादि,
भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थसुदर्थ्यम,
आकरजञ्च सुवर्णादि । संयुक्तसमवायाद्रसाद्युपलब्धिरिति । देवे, उसी विषय रूपी तेज को ‘दिव्य’ कहते हैं, इसके अन्तर्गत सौर तेज और विद्युत् प्रभृति आते हैं। खाये हुये द्रव्य को पचानेवाला उदर का तेज ही ‘उदय’ तेज है। सुवर्ण प्रभृति ‘आकरज’ तेज हैं। उनमें रस की उपलब्धि संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से होती है ।
न्यायकन्दली
त्पद्यते, निराश्रयस्यानुत्पत्तेः । काष्ठग्रहणमुपलक्षणार्थम्, तृणतुषादीनामपि कारण त्वात्, ऊर्ध्व ज्वलनं क्रियाविशेषः, तत्स्वभावकं तद्धर्मकम् । पचनस्वेदनादिसमर्थम्, पचनं पूर्वगुणविलक्षणं गुणान्तरोत्पादनम्, स्वेदनं स्तब्धत्वनाशनम्, आदिशब्दाद्वि स्फोटादिजननलक्षणं दहनं तत्र समर्थमित्यर्थक्रियोपवर्णनम् । दिव्यमबिन्धनं सौरं विद्युदादिभवं तेजोऽबिन्धनम्, आप इन्धनं यस्येति व्युत्पत्त्या तत् सौरं विद्यु दादि, आदिशब्दादुल्काया अवबोध: । भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थ मुदर्यम्, उदरे सवं तेजो भुक्तस्याहारस्य रसमलधातुभावेन परिणामप्रयोजनम् । आकरजञ्च सुवर्णादि । आकर: स्थानविशेषः तस्मिन् सुवर्णरजतादि तैजसं द्रव्यं जायते । सुवर्णादीनां तैजसत्वे तावदागमः प्रमाणम् । न्यायश्चाभिहितः । इन्धन से जिसकी उत्पत्ति हो, वही तेज काष्ठेन्धनप्रभव’ है, क्योंकि बिना आश्रय के किसी वस्तु को उत्पत्ति नहीं हो सकती। ‘काष्ठ’ पद उपलक्षण है, क्योंकि तिनके और भूसे आदि पृथिवी से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है । ‘ऊध्वंज्वलन’ ऊपर की तरफ उठनेवाली एक क्रिया है, वही ‘स्वभाव’ अर्थात् धर्म इस तेज का है। पचन स्वेदनादिसमर्थम्’ पचन शब्द का अर्थ है – द्रव्य में पहिले से विद्यमान गुणों से दूसरे प्रकार के गुणों का उत्पादन स्वेदन शब्द का अर्थ है- काठिन्य का नाश करना। ‘आदि’ शब्द से ‘विस्फोट’ आदि इसके कार्य सूचित किये गये हैं। यह ‘भौम’ तेज से होनेवाले कार्यों का विवरण है। ‘आप इन्धनं यस्य’ इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न ‘अबिन्धन’ शब्द से समझे जानेवाले सौर एवं विद्युत् प्रभृति एवं उससे उत्पन्न तेज हो ‘दिव्य’ तेज है। प्रकृत आदि शब्द से उल्का प्रभृति तेजों का परिग्रह इस दिव्य तेज के अन्तर्गत करना चाहिए । ‘भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थमुदयम्’ ‘उदरे भवं तेजः’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार उदय शब्द से खाये हुये अन्नादि को रस, मल, धातु प्रभृति रूपों में परिणत करनेवाला पेट का तेज ही अभीष्ट है। ‘आकरजं सुवर्णाद’ विशेष प्रकार के स्थान (खान) को ‘आकर ‘ कहते हैं । उसमें सोना चाँदी प्रभृति द्रब्य उत्पन्न होते हैं। सुवर्णादि के तैजस द्रव्य होने में ( “अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णम्” इत्यादि ) आगम भी प्रमाण हैं। सुवर्णादि द्रव्य के तैजस
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न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्
न्यायकन्दलो
द्रव्य तेज:
कथं तहि गन्धरसयोरनुष्णाशीतस्पशंस्य च गुणस्योपलब्धिरत आह-तत्रेति भोगिनाभदृष्टवशेन भूयसां पार्थिवानां पार्थिवावयवानामुपष्टम्भादनुद्द्भूत रूपस्पर्श पिण्डीभावयोग्यं सुवर्णादिकमारभ्यते, तत्र पार्थिवद्रव्यसमवेता इमे रसादयो गृह्यन्ते । इतिशब्द: समाप्तौ ।
अनुभूतरूपस्पर्शं सुवर्णादिकमिति न मृष्यामहे, प्रतीयमानरूपस्पर्श व्यतिरिक्तस्य द्रव्यान्तरस्याभावादिति चेन्न, स्तम्भोऽयं कुम्भोऽयमिति प्रत्येक विलक्षणसंस्थानसंवेदनाद्रूपादिस्वभावस्य सर्वत्राविशेषात् । वासना भेदात् प्रतिसञ्चयं संवित्तिभेद इति चेत् ? नीलादिसंवित्तिभेदोऽपि वासनाकृत एवास्तु नार्थो नीलादिभेदेन । असति बाह्यवस्तुनि स्वसन्तान मात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्कत्वानुपपत्तेस्तन्मात्रहेतोर्नीला दिसंवेदनस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिभेदकल्पनेति चेत् ? स्तम्भादि होने में अनुमान प्रमाण का उल्लेख कर चुके हैं । ( प्र०) फिर सुवर्णादि में गन्ध, रस एवं अनुष्णाशीत शं प्रभृति की उपलब्धि कैसे होती है ? इसी प्रश्न के उत्तर में ‘तत्र’ इत्यादि पंकि लिखी गयी है। भोग करनेवाले के अदृष्ट की सहायता से पार्थिव अवयवों के संयोग द्वारा (पार्थिव वस्तुओं की तरह) ठोस सुवर्गादि तैजस द्रव्यों की उत्पत्ति होती है। सुवर्णादि में निमित्त कारणरूप इन पार्थिव अवयवों के ही रसादि प्रतीत होते हैं । इस ‘इति’ शब्द का अर्थ है समाप्ति |
( प्र० ) हम लोगों को यह बात मान्य नहीं है कि अनुभूत रूप एवं अनुभूत स्पर्श से युक्त सुवर्ण नाम का कोई द्रव्य है, क्योंकि प्रतीत होनेवाले रूपरसादि को छोड़कर द्रव्य नाम की कोई दूसरी वस्तु नहीं है । ( उ०) नहीं क्योंकि “यह ख़ूटा है, यह घट है” इन दोनों प्रतीतियों से दो विभिन्न आकार की वस्तुओं की सत्ता जनसाधारण के अनुभव से सिद्ध है, किन्तु लूटा और घट दोनों के रूपादि गुणसमूह तो समान ही हैं। ( प्र ० ) वासना (मिथ्याज्ञा नजनित संस्कार) के भेद से प्रत्येक गुणसमूह की प्रतीतियां विभिन्न आकार की होती हैं ? ( उ० ) फिर ‘यह नील है’, ‘यह पीत है’ इत्यादि गुणविषयक प्रतीतियाँ भी वासना से ही मान ली जायँ, नीलादि गुणों की भी सत्ता मानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती ( प्र० ) अगर ( नीलादि ) किसी बाह्य वस्तु की सत्ता न मानी जाय तो फिर नीलादि प्रतीतियाँ कभी होती हैं एवं कभी नहीं। उनका यह कादाचित्कत्व अनुपपन्न हो जाएगा, क्योंकि वासना के परिपाक से तो कादाचित्कत्व सम्भव नहीं है. चूँकि वह अपने पूर्ववर्ती समूहों से ही उत्पन्न होती है, अतः नीलादि गुणों की सत्ता अवश्य माननी पड़ती है, जिससे उनकी सत्ता से नीलादि प्रतीतियाँ होती हैं और
१. अर्थात् प्रतीत होनेवाले गुणसमूह को ही द्रव्य मानें तो दोनों प्रतीतियों में विलक्षणता उत्पन्न नहीं होगी, क्योंकि विषयों के अन्तर हुए बिना ज्ञानों में अन्तर
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१०३
न्यायकन्दली
संवित्तिभेदस्यापि बाह्मवस्त्वननुरोधिनो न कादाविकत्व सुपपद्यत इति रूपादि व्यतिरिक्तः प्रतिसञ्चयं वासनाविशेषबोधहेतुविलक्षण संस्थानविशेष: कल्प नीयः, येन दर्शन स्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणमपि सिद्ध्यति । रूपादिमात्रे वस्तुन्य स्याप्यसम्भवः, तेषामेकैकेन्द्रियग्रहण नियमात् । अपि च, रूपादयः परमाणु स्वभावा: प्रत्येकमतीन्द्रियाः, तद्व्यतिरिक्तः सञ्चयो नास्तीति भवतां कोऽर्थो दर्शनस्पर्शनविषयः ? प्रत्येकमतीन्द्रिया अपि परमाणवो मनस्कारेन्द्रियादिषु सत्सु समर्थोत्पन्ना ऐन्द्रियका भवन्तीति चेन्न, समर्थोत्पादेऽपि परमसूक्ष्म स्वरूपानतिवृत्तेः, समर्थोत्पत्तिमात्रेण च चाक्षुषत्वे मनस्कारेन्द्रिययोरपि प्रत्यक्षता स्यात्, अविशेषात् । अथ मतम्, प्रत्येकमस्थूला अपि परमाणवः केशसमूहह्वत् संहताः
सत्ता न रहने से नहीं होती हैं। इस प्रकार प्रतीतियों का कादाचित्कत्व सम्भव होता है। (उ०) उक्त स्तम्भादि प्रतीतियों में भी अगर बाह्य किसी वस्तु की सत्ता की अपेक्षा न मानें तो इन प्रतीतियों का भी कादाचित्कत्व अनुपपन्न ही रहेगा, अतः (आप को यह भी ) मानना पड़ेगा कि रूपादि गुणों से भिन्न स्तम्भादि प्रत्येक समूह में विशेष प्रकार की बासना की उद्बोधक कोई विलक्षण आकार की वस्तु है । इसे मान लेने से चक्षु और त्वचा से एक हो वस्तु के ग्रहणरूप सर्वजनीन प्रतीति की भी उपपत्ति हो जाएगी। द्रव्य को रूपादि समूहरूप मान लेने में यह सम्भव नहीं है क्योंकि रूपादि प्रत्येक गुण एक-एक इन्द्रिय से ही गृहीत होते और यह बात भी है कि रूपादि प्रत्येक परमाणु-स्वभाव के हैं अतः प्रत्येक अतीन्द्रिय हैं। समूह नाम की कोई अतिरिक्त वस्तु नही है। अतः आपके मत में कौन-सी वस्तु त्वचा से गृहीत होगी ? ( प्र०) उनमें से प्रत्येक अतीन्द्रिय है, किन्तु जिस क्षण में मन से सम्बद्ध उन्मुख इन्द्रि यादि रूप प्रत्यक्ष की सामग्री का सम्बलन होता है, उससे आगे के क्षण में उस अती न्द्रिय समुदाय से भी इन्द्रिय से ज्ञात होने योग्य समुदाय की उत्पत्ति होती है, अतः इस समुदाय का इन्द्रिय से ग्रहण होता है । ( उ० ) ‘अतीन्द्रिय वस्तुएँ भी चक्षु से गृहीत होने योग्य समुदाय को उत्पन्न करती हैं यह मान लेने पर भी वह चक्षु से गृहीत हं.नेवाला रामूही अपने सूक्ष्मत्वरूप स्वभाव को छोड़ नहीं सकता। अगर समर्थ के उत्पादन करने से ही उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष हो तो फिर मनोवृत्ति और इन्द्रियों भी प्रत्यक्ष होना चाहिए, क्योंकि इनके रहने पर ही अतीन्द्रिय स्वभाव का समूह चाक्षुष प्रत्यक्ष योग्य समूह का उत्पादन करता है), क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । (प्र०) यह ठीक है कि प्रत्येक परमाणु प्रतीन्द्रिय है, किन्तु समुदायभावापन्न होने पर वह इन्द्रिय से गृहोत हो सकता है। जैसे कि एक केश दूर से नहीं देखा ताता, किन्तु उसका समूह
नहीं आ सकता। अगर उक्त दोनों प्रतीतियों के विषय गुणसमूह ही हैं, तो फिर दोनों प्रतीतियों में अन्तर करना कठिन है।
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न्यायकन्दलोसंबलित प्रशस्त पादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये तेजः –
स्थूलावभासभाजो भवन्तश्चाक्षुषा जायन्ते, निरन्तरतया चैकत्वेनाध्यवसीयन्ते, इति चेत् ? किमेतेषु बहुषु तदानीमेकः स्थूलाकारो जायते ? कि वा केशेष्वि वाविद्यमानः समारोप्य प्रतीयते ? यदि च जायते स नोऽवयवीति । अथाविद्य मान: प्रतीयते, भ्रान्तिस्तहि । भ्रान्तिश्चाभ्रान्तिप्रतियोगिनी, क्वचिदेक: स्थूल: सत्योऽभ्युपेयः । न च विज्ञाने तस्य सत्यता युक्ता, स्थूलमहमस्मीति प्रतीत्यनुदया दनेकद्रष्टृ साधारणत्वाभावप्रसङ्गाच्च । तस्माद्विषय एवायमेक: स्थूलः, सर्वदा भिन्नाकारेण प्रतिभासनादर्थक्रिया सम्पादनाच्चेत्यवयविसिद्धिः ।
दूर से भी देखा जाता है। उस समूह के बीच व्यवधान न रहने के कारण केश अनेक होने पर भी एक दीखते हैं। ( उ० ) (१) उन परमाणुओं में एक स्थूलाकार वस्तु की उत्पत्ति होती है, जिसमें वस्तुतः विद्यमान एकत्व का भान होता है ? (२) या जैसे केशसमूह में वस्तुतः अविद्यमान भ्रमज्ञान विषय के एकत्व का भान होता है, वैसे ही उक्त परमाणुसमूह के स्थल में भी होता है ? अगर पहिला पक्ष मानते हैं तो फिर वही ( परमाणुओं में उत्पन्न स्थूलाकार एक वस्तु ) हम लोगों का अभीष्ट अवयवी है। अगर दूसरा पक्ष माने तो फिर एकत्व की इन प्रतीतियों को भ्रान्तिरूप मानना पड़ेगा। भ्रान्ति अभ्रान्ति का प्रतियोगी है, इसकी प्रसिद्धि के लिए कहीं एक स्थूलाकार वस्तु की यथार्थ सत्ता को स्वीकार्य करना अनिवार्य है। सभी वस्तुओं को विज्ञानस्वरूप मान लेने पर ( यद्यपि उक्त एकत्व प्रतीति के प्रमास्व की उपपत्ति हो जाती है, किन्तु यह विज्ञानवाद इसलिए अयुक्त है कि घटादि वस्तुओं में ) ‘मैं स्थूल हूं’ इस प्रकार की प्रतीति नहीं होती। एवं घटादि वस्तुएँ अनेक ज्ञाताओं से ज्ञात न हो सकेंगी ।२
१. अगर सभी पदार्थ विज्ञान स्वरूप ही हैं तो फिर आत्मा और घटादि दोनों एक ही विज्ञान स्वभाव के हैं, अत दोनों को एक मानना पड़ेगा। फिर जैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ‘अहम्’ शब्द से होती है कि ‘मैं जानता हूँ,’ वैसे हो ‘घटादि स्थूल हैं’ इत्यादि प्रतीतियों का यह अभिलाप न होकर ‘भै स्थूल हूँ इस प्रकार का होना चाहिए। इससे दो आपत्तियाँ आ जाती हैं- (१) घटादि के लिए ‘अहम्’ शब्द के प्रयोग को, एवं ( २ ) ‘अहम्’ शब्द बोध्य में स्थूलत्व की, किन्तु जो ‘अहम्’ शब्द से समझा जाता है, वह स्थूल नहीं हो सकता, एवं जो स्थूल है वह ‘अहम्’ शब्द का अभिधेय नहीं हो सकता ।
२. ‘अनेकप्रतिपत्तसाधारणत्व’ की जो अनुपपत्ति दी गई है, उसका अभिप्राय है घटादि वस्तुएँ विज्ञान के आकार की हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि मेरे विज्ञान से गृहीत होनेवाला घटविज्ञान आपके विज्ञान से गृहीत होनेवाले घटविज्ञान से भिन्न है, क्योंकि मेरा और आपका विज्ञान अवश्य ही भिन्न है। तस्मात् ‘जिस घट को मैं देखता हूँ उसी को आप भी देखते हैं यह स्वारसिक प्रतोति नहीं हो सकेगी। अनेक ज्ञाताओं से किसी एक वस्तु का ज्ञात होना ही उस विषय का ‘अनेकप्रतिपत्त साधारणत्व’ है। यही अनुपपन्न होगा।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
न्यायकन्दली
१०५
नन्वसति बाधके प्रतीतिसिद्धस्तथेति व्यवहियते, अवयविसद्भावे तु बाधकं प्रमाणमस्ति । तथा हि- – पाणौ कम्पवति तदाश्रितं शरीरं न कम्पते, पादे वा कम्पमाने तद्गतं शरीरं न कम्पत इत्येकस्य विरुद्धधर्मताप्रसङ्गः । तदसङ्गतम्, पाणौ कम्पमाने शरीर कम्पावश्यम्भावनियमाभावात् । यदा पाणिमात्रं चाल यितुं कारणं भवति तदा तन्मात्रं चलति, न शरीरम्, कारणाभवात् । यदा तु शरीरस्यापि चलनकारणं भवेत् तदा शरीरं चलत्येव । नास्याचलनमस्तीति कुतो विरोधः, यदि हस्तश्चलति न शरीरं तदाऽवयवावयविनोर्युतसिद्धिः ? नैवम्, पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिः, न चलाचलत्वम्, द्रव्ये चलति गुणस्था तस्मात् उन प्रतीतियों के विषय गुणादि से भिन्न गुणादि के आश्रय एवं परमाणुसमूहों से भिन्न, किन्तु उनसे उत्पन्न, एवं विज्ञान से भिन्न अवयवो अवश्य ही हैं ।
( प्र० ) जिस प्रतीति का आगे किसी विरोधी प्रतीति से बाघ न हो, वह प्रतीति वस्तु को जिस रूप में उपस्थित करे, वह वस्तु उसी रूप से व्यवहृत होती है । किन्तु ‘अवयवों से भिन्न अवयवों में रहनेवाला कोई अवयवी नाम का द्रव्य है’ इस बुद्धि को बाधित करनेवाली बुद्धि है, क्योंकि हाथ में कम्पन होने पर भी उसमें रहनेवाला शरीर रूप अवयवी कम्पित नहीं होता । अथवा पैर में कम्पन होने पर भी उसमें रहनेवाला शरीररूप अवयवी कम्पित नहीं होता है। इस प्रकार एक ही अवयवी में अकम्प और कम्पत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों की सत्ता माननी पड़ेगी। ( उ० ) यह आपत्ति ठीक नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि हाथ काँपने पर शरीर अवश्य ही काँपे । जिस समय केवल हाथ में ही कम्पन के कारण रहते हैं, तब केवल वही कम्पित होता है। जब उसमें रहनेवाले शरीर में भी कम्प होने की सामग्री रहती है, उस समय शरीर में भी कम्प होता है। वह भी तो कम्पनशून्य नहीं है, फिर विरोध क्या है ? ( प्र० ) अगर हाथ के चलने पर भी शरीर में किया न हो तो अवयव और अवयवियों में ‘युतसिद्धि’ की आपत्ति होगी । ( उ० ) इससे ‘युतसिद्धि’ को आपत्ति नहीं होगी। ( क्योंकि अयुत सिद्धि उन दो वस्तुओं में होती है, जिनमें ) एक से असम्बद्ध होकर दूसरा न कहीं रहे, और न उनमें कोई रहे, यही वस्तुओं की अयुतसिद्धि है । ‘अयुतसिद्धि’ शब्द का यह अर्थ नहीं है कि एक के चलने पर दूसरा भी चले, एवं एक के न चलने पर दूसरा भी न
यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि ‘इति न मृष्यामहे इत्यादि से जो आक्षेप किया गया है कि प्रतीत होनेवाले गुणसमूह से भिन्न कोई अतिरिक्त द्रश्य नहीं है, उसका समाधान ‘भवती कोऽर्थो दर्शनस्पर्शन विषयः’ इतनी पक्तियों से ही हो जाता है। रूपादिसमूह से अतिरिक्त द्रव्य अवश्य है। उसके बाद ‘परमाणु समूह ही अवयवी है’ या ‘सभी विज्ञानस्वरूप हैं’ इत्यादि विषयों की चर्चा प्रासङ्गिक है।
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये तेजः
चलनेऽपि तयोर्युतसिद्धयभावात् । पृथगाश्रयाश्रयित्वं चावयवावयविनोभिन्नत्वेऽपि नास्तीति न युतसिद्धता । यदप्यन्यद् बाधकमुक्तम्, एकावयवावरणे तत्समवेत स्यावयविनोन ग्रहणम्, अनावृतावयवग्रहणे च ग्रहणमित्येकस्य युगपद् ग्रहण मग्रहणञ्च प्राप्नुत इति । तदप्यसारम् एकावयवावरणेऽवयव्यावरणस्याभावात् । स ह्येकोऽनेकेषु वाऽवयविषु वर्त्तमानः कतिपयावयवावरणेऽप्यनावृतेतरकति पयावयवग्रहणेन गृह्यते, तस्य सर्वत्राभिन्नत्वात् । यत्तु बहुतरावयवग्रहणवत् स्थूलप्रतीतिर्न भवति, तद्भूयोऽवयवप्रचयग्रहणस्य परिमाणप्रकर्षप्रतीतिहेतोरभा वात् । यत्र तु भूयसामवयवानामावरणमल्पतरावयवग्रहणञ्च तत्रावयविनो न ग्रहणम्, यथा जलनिमग्नस्य शिरोमात्रदर्शनात् । एकस्मिन्नवयवे रक्ते तद्देशोऽवयवी रक्तोऽवयवान्तरे चारक्त इत्येकस्य रक्तारक्तत्वप्रसङ्ग इत्य
चले, क्योंकि द्रव्य के चलने पर भी गुण नहीं चलते, किन्तु वे दोनों ‘अयुतसिद्ध’ हैं । अवयव और अवयवी इन दोनों में परस्पर भेद्र रहने पर भी एक को छोड़कर न दूसरा कहीं रहता है, न एक से असम्बद्ध एक-दूसरे में कोई रहता है। अतः इन दोनों में युतसिद्धि की आपत्ति नहीं है। ( अवयवों से भिन्न अवयवी के मानने में ) आपने जो दूसरा बाधक कहा है कि ( प्र० ) जहाँ एक अवयवी के कुछ अवयव किसी दूसरी वस्तु से ढके हुये हैं, और कुछ अवयव बिना बँके हुये हैं, वहाँ ढँके हुए अवयवों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होता है और बिना ढंके हुए अवयवों में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले अवयवों का ग्रहण होता है, दोनों प्रकार के अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक ही है । तस्मात् अवयवों से भिन्न एक अवयवी के मानने में एक ही वस्तु में एक ही समय में ग्रहणत्व और अग्रहणत्व रूप विरुद्ध दो धर्मों का समावेश मानना पड़ेगा | ( उ० ) इसमें भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि एक या कुछ अवयवों के ढँके जाने पर भी अवयवी नहीं ढँकता। यह अवयवी अनेक अवयवों में रहने के कारण कुछ अवयवों के ढँके रहने पर भी बिना ढके हुए अवयवों के ग्रहण से गृहीत होता है, क्योंकि सभी अवयवों में अवयवी तो एक ही है। यह ठीक है कि कुछ अवयवों के ग्रहण से जो अवयवी का ग्रहण होता अवयवों के ग्रहण से गृहीत होनेवाले अवयवी की प्रतीति की तरह ‘स्थूल’ विषयक नहीं वह सभी होता। उसका कारण यह है कि ‘परिमाणप्रकर्ष’ रूप ‘स्थूलता’ की प्रतीति के कारण बहुत से अवयवों की प्रतीति वहाँ नहीं है। जिस अवयवी के अधिक अवयव ढके रहते हैं और कुछ ही अवयव बिना बँके हुए रहते हैं, उस अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होता। जैसे कि पानी में डूबे हुए व्यक्ति का केवल शिर देखने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता। यह जो दूसरी आपत्ति ( अवयवी को अवयवों से अतिरिक्त मानने में बौद्ध लोग ) देते हैं कि ( प्र० ) किसी अवयवी का एक अवयव रक्त रहे और दूसरा रक्त न रहे इनमें
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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न्यायकन्दली
दूषणम्, अविरोधात् । रागद्रव्यसंयोगो रक्तत्वम्, अरक्तत्वञ्च तदभाव: । उभयं चैकत्र भवत्येव, संयोगस्याव्याप्यवृत्तिभावात् ।
इदमपरं बाधकम् अवयविनः प्रत्यवयवमेकदेशेन वृत्तिः कात्स्येंन वा ? प्रकारान्तराभावात् । न तावदेकदेशेन वृत्तिरवयवव्यतिरेकेणास्यैकदेशा भावात् । कात्स्येंन वृत्तौ वाऽवयवान्तरे वृत्यभावः, एकावयवसंसर्गावच्छिन्ने स्वरूपेऽवयवान्तराणामनवकाशात्, तत्स्वरूपव्यतिरेकेण चास्य स्वरूपान्तरा भावात् । अत्रापि निरूप्यते यद् वर्त्तते तदेकदेशेन वर्त्तते कात्स्येंन वेति ? किमिदं स्वसिद्धमभिधीयते परसिद्धं वा ? स्वयं तावत् कस्यचित् क्वचिद् वृत्ति रसिद्धा शाक्यानाम्, परस्यापि नैकदेशकार्ल्याभ्यां वृत्तिः सिद्धा, तयोरवृत्तित्वात्, वृत्ति प्रत्यकारणत्वाच्च ।
रक्त अवयवों में रहने वाले अवयवी को रक्त मानना पड़ेगा, और अरक्त अवयवों में रहने वाले अवयवी को अरक्त मानना पड़ेगा, एवं दोनों प्रकार के अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक ही है। अवयव समुदाय से भिन्न एक अवयवी के मानने में उक्त रीति से एक ही काल में एक ही वस्तु में रक्तत्व और अरक्तत्व इन दो विरुद्ध धर्मो का समावेश स्वीकार करना पड़ेगा । ( उ० ) यह भी दोष नहीं है, क्योंकि ‘रक्तत्व’ शब्द का अर्थ है लाल द्रव्य का संयोग, एवं अरक्तत्व शब्द का अर्थ है उसका अभाव | संयोग ‘अव्याप्यवृत्ति’ अर्थात् एक ही समय में अपने आश्रय के किसी अंश में रहता है, एवं किसी में नहीं। तस्मात् रक्तत्व और अरक्तत्व दोनों का एक ही समय में एक अवयवी में रहना उनके परस्पर अविरोधी होने के कारण युक्तिविरुद्ध नहीं है।
अवयवों से भिन्न अवयवी के मानने में बौद्ध लोग एक आपत्ति और करते हैं कि ( प्र० ) प्रत्येक अवयव में अवयवी अपने किसी एक अंश के द्वारा सम्बद्ध रहता है ? या अपने सम्पूर्ण रूप से ? इन दोनों से भिन्न कोई तीसरा प्रकार नहीं है। किन्तु किसी एक अंश से तो रह नहीं सकता, क्योंकि उन अवयवों को छोड़कर उसका कोई एक अंश नहीं है। उसका अवयवों में अपने सम्पूर्ण रूप से रहना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि इस प्रकार वह अपने किसी एक ही अवयव में रहेगा और अवयवों में नहीं, क्योंकि एक अवयव में अपने सम्पूर्ण रूप से सम्बद्ध अवयवी की दूसरे अवयवों में सम्बद्ध होने की सम्भावना नहीं है। जिस रूप से वह एक अवयव में सम्बद्ध होगा, उसको छोड़कर अवयवी का कोई दूसरा रूप नहीं है। किन्तु इस रूप से तो वह एक अवयव में है ही। ( उ० ) इस विषय में यह पूछना है कि अवयवी अवयवों में एक अंश से रहता है या सम्पूर्ण रूप से ? यह प्रश्न आप (बौद्ध) अपने से कर रहे हैं ? या दूसरों के सिद्धान्त के अनुसार ? बौद्धों के यहाँ किसी वस्तु की वृत्तिता किसी वस्तु में है ही नहीं। दूसरों के मत में भी ‘एक देश से या सम्पूर्ण रूप से वृत्तिता सिद्ध
१०८
न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये तेजः
न्यायकन्दली
यद् वर्त्तते तत् स्वरूपेणाश्रयाश्रितभावलक्षणया वृत्या वर्त्तते । न चैक स्यानेकसंसर्गो विरुद्धयते । दृष्टो हि चित्रज्ञाने नीलाकारावछिन्ने पीताद्याकार संसर्गः । न च तस्य प्रत्याकारं भेदः, एकस्यानेकाकारग्रहणानुपपत्तौ भवतां चित्रप्रत्ययाभावप्रसङ्गात् । नापि ज्ञानैकत्वादाकाराणामप्येकत्वम्, चित्रानुभव विरोधात् । यथैकावयवावच्छिन्ने एकावयविस्वभावेऽवयवान्तरसमावेशः प्रत्यक्षे णानेकावयवसम्बद्धस्य, तथैकस्य स्थूलात्मनः संवेदनादेकस्मिन्ननेकसंसर्गो दृष्टो नैकस्यानेकेषु संसर्ग इति च वैधर्म्यमात्रम्, एकस्यानेकसंसर्गावच्छेदस्योभयत्रा विशेषात् । एवं यदेकं तदेकत्रैव वर्त्तते, यथैकं रूपमेकश्चावयवीति तथा यदनेकवृत्ति तदनेकम्, यथानेकभाजनगततालफलान्यनेकवृत्तिश्चावयवीति प्रसङ्ग द्वयं प्रत्याख्यातम्, स्वतः परतरच व्याप्त्यसिद्धेः, स्वतस्तावदेकं विज्ञानमनेकेषु विषयेन्द्रियमनस्कारेषु स्वरूपाभेदेन तदुत्पत्त्या वर्त्तते, परस्याप्येकं सूत्रमभेदे जानेकेषु मणिषु संयोगवृत्त्या वर्त्तते, तथाऽवयव्यवयवेषु समवायवृत्या वतिष्यते
नहीं है, क्योंकि ‘एकदेश’ या ‘सम्पूर्णरूप’ इन दोनों में कोई भी ‘वृत्ति’ अर्थात् सम्बन्ध नहीं है, एवं सम्बन्ध के कारण भी नहीं हैं ।
किसी वस्तु का किसी वस्तु में रहना, उन दोनों वस्तुओं के आधाराधेयभावसम्बन्ध से ही होता है। अनेक वस्तुओं में एक वस्तु का सम्बन्ध विरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि चित्रज्ञानस्थल में नीलाकार विशिष्ट में पीताकार का सम्बन्ध सर्वजनीन अनुभव से सिद्ध है। चित्ररूप की प्रतीति में उसके आश्रय रूप से भासित होनेवाली वस्तु नीलादि आकारों के भेद से भिन्न-भिन्न भी नहीं हैं, क्योंकि फिर उसमें चित्र रूप की प्रतीति नहीं होगी। ( एक वस्तु में अनेक आकारों के रूप की प्रतीति ही चित्र की प्रतीति है) एक ज्ञान में भासित होने के कारण ( नीलादि सभी ) आकारों को एक मानना भी सम्भव नहीं है । ( प्र० ) एक वस्तु एक ही आश्रय में रह सकती है, जैसे कि एक रूप अवयवी भी एक ही है, ( तस्मात् अनेक अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक नहीं हो सकता ), एवं जो वस्तु अनेक आश्रयों में रहता है वह स्वयं भी अनेकात्मक ही है, जैसे कि अनेक पात्रों में रक्खे हुए अनेक तालफल | ( तस्मात् अनेक अवयवों में रहनेवाला अवयवी अनेकात्मक ही हो सकता है, एकात्मक नहीं ) । ( उ०) किन्तु ये दोनों ही बाधक अनुमान अनादर के पात्र हैं, क्योंकि इनमें व्याप्ति न पूर्वपक्षवादी बौद्धों के मत से सिद्ध है, न हम लोगों के मत से । बौद्धों के मत में भी एक ही विज्ञान अपने उत्पत्तिरूप सम्बन्ध से और अपने स्वरूप के अभेद से विषय, इन्द्रिय और मनोवृत्ति इन अनेक वस्तुओं में रहता है। हम लोगों के मत में भी एक डोरी अनेक मणियों में संयोग सम्बन्ध से रहती है। अतः एक अवयवी भी
मकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१०९
न्यायकन्दली
नाना च न भविष्यति । सर्वश्चायं प्रसङ्गहेतुराश्रयं निघ्नन्नात्मानमपि हन्ति, अवयव्यभावे परमाणुमात्रे जगति धर्म्मधम्मदृष्टान्तादिप्रतीत्यसिद्धौ निराश्रयस्य वृत्त्यभावात् । अतो नानेन प्रत्यक्षसिद्धोऽवयवी शक्यो निराकर्तुम्, प्रत्यक्षसापेक्षस्य तस्य ततो दुर्बलत्वात् । भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत् ? कुत एतत् ? बाधकेनापाकरणा दिति चेत्, प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वे बाधकस्य प्रमाणत्वं बाधकप्रामाण्ये च प्रत्य क्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्वम् । प्रत्यक्षे तु नायं न्यायः, तस्यानपेक्षत्वात् । न चार्थक्रियासंवादिसर्वलोकसिद्धं स्पष्टप्रतिभासं भ्रान्तमिति युक्तम्, नीलादि प्रत्यक्षस्यापि भ्रान्तत्वप्रसङ्गादिति बाधकोद्धारः । परमाणवोऽवयव्य नुमेया अपि सन्तो व्यवहर्त्तव्याः ।
षट्केन युगपद्योग एकस्य परमाणोः षडंशत्वमापादयन् परमाणु समवायसम्बन्ध से अनेक अवयवों में रहेगा, इसके लिए उसे नाना अवयवरूप मानने की आवश्यकता नहीं है। विरुद्ध अनुमानों के ये सभी हेतु अपने आश्रय का नाश करते हुए अपना भी नाश करते हैं, क्योंकि अगर अवयवी न रहे तो संसार परमाणुमात्र में परिणत हो जाय। फिर धर्म, धर्मी, दृष्टान्तादि की विलक्षण प्रतीतियों की उपपत्ति न होगी। और ये विरुद्ध अनुमान के हेतु बिना आभय के रह नहीं सकते (अपना काम भी नहीं कर सकते), अतः इससे प्रत्यक्षसिद्ध अवयवी नहीं हटाया जा सकता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षसापेक्ष है, अतः अनुमान प्रत्यक्ष से दुर्बल है । (प्र० ) प्रत्यक्ष भ्रान्त है ? (उ०) क्यों ? ( प्र०) क्योंकि वह बाधक अनुमान से हटा दिया जाता है । ( उ०) प्रत्यक्ष जब भ्रान्तिरूप से निश्चित होगा तभी बाधक होगा एवं बाधक अनुमान का प्रामाण्य जब तक निर्णीत नहीं है तब तक प्रत्यक्ष को भ्रान्ति रूप मानना सम्भव नहीं है, इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य है। प्रत्यक्ष को बाधक मानने में यह अन्योन्याश्रय दोष नहीं है, क्योंकि उसे अपने प्रामाण्य के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह कहना भी ठीक नहीं है कि प्रवृत्ति की सफलता के लिए लोक में प्रसिद्ध स्पष्ट ज्ञानरूप प्रत्यक्ष भ्रान्त है क्योंकि इस प्रकार नीलादि गुणसमूहों का प्रत्यक्ष भी भ्रान्त हो जाएगा। इस प्रकार सभी बाधकों का खण्डन हो गया।
( प्र० ) छ: ९ परमाणुओं के एक ही समय का संयोग एक एक परमाणु के छः अंशों को सिद्ध करता है, जिससे (आप के अभिमत निरंश) परमाणु की सत्ता ही उठ
१. ‘षट्केन युगपद्योगः’ इत्यादि कन्दलीकार का उठाया हुआ पूर्वपक्ष ‘विज्ञप्ति
मात्रतासिद्धि’ को इस कारिका की ओर सङ्केत करता है
षट्केन युगपद्योगात परमाणोः षडंशता । षण्णां समानदेशत्वात् पिण्डः स्यादणुमात्रकः
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न्यायकम्बलीसंवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्
[ द्रव्ये तेजः
न्यायकन्दली
सद्भावं बाधत इति चेत् ? कोऽयं युगपद्योगो नाम ? किमेकस्य परमाणो: षड्भि: परमाणुभिः सह युगपदुत्पाद: ? किं वा युगपत्संयोगः ? युगपदुत्पादस्तावत् कारणयोगपद्यादेव निरंशस्यापि यदि भवेत् को विरोधः, अथ युगपत्संयोगः, सोऽपि नानुपपन्नः, न ह्यंशविषयः संयोगो द्रव्याणाम्, निरंशस्याप्या काशस्य तद्भावात्, अंशस्याप्यंशान्तरसद्भावे परमाणुमात्रे संयोगस्थितौ तस्या
जाती है । ( उ० ) यह ‘युगपद्योग’ क्या है ? (१) छः परमाणुओं के साथ एक ही समय में एक परमाणु की उत्पत्ति ( युगपद्योग’ शब्द का अर्थ है ? ) या (२) एक परमाणु के साथ छः परमाणुओं का संयोग ? ( इनमें प्रथम विकल्प के प्रसङ्ग में यह कहना है कि) (१) अगर अंशशून्य वस्तुओं के भी कारण हों तो फिर कथित सात परमाणु रूप निरंश वस्तुओं के कारणों का अगर एक समय में सम्बलन हो सके तो एक ही समय में सात परमाणुओं की सृष्टि में क्या बाधा है ? इसमें कौन सा विरोध है ? (२) अगर प्रकृत युगपद्योग शब्द का दूसरा अर्थ है, तब भी कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि संयोग अंशशून्य द्रव्यों का ही हो, क्योंकि अंशशून्य आकाश में भी संयोग मानते ही हैं। अगर संयोग केवल अंशों में ही माना जाय तो फिर सभी अंशों का भी अंश मानना पड़ेगा, फलतः संयोग केवल परमाणु में ही सीमित
अर्थात् एक परमाणु एक ही समय में छः परमाणुओं के साथ संयुक्त होने के कारण ‘षडंश:’ अर्थात् छः अंशों से युक्त है, क्योंकि एक ही स्थान में छः संयोग नहीं हो सकते। एक वस्तु के भिन्न-भिन्न अंशों में ही विभिन्न संयोगों को उत्पत्ति होती है। अगर आग्रहवश यह मान भी लें कि एक ही परमाणु के एक ही अंश में छः परमाणुओं के छः संयोग होते हैं तो फिर ‘पिण्ड: स्वादणुमात्रकः’ अर्थात् इस प्रकार सात परमाणुओं से जिस ‘पिण्ड’ की उत्पत्ति होगी वह ‘अणुमात्र अर्थात् परमाणुस्वभाव का ही होगा । इसमें स्थूलता नहीं आ सकती। कोई भी वस्तु अपने पहिले स्वरूप से अधिक लम्बी चौड़ी या अधिक वजन को इसलिए होती है कि उसके विभिन्न अंशों में विभिन्न द्रव्यों के विभिन्न संयोग होते हैं। अतः विना अंश के परमाणुओं से उत्पन्न वस्तु स्थूल नहीं हो सकती, परमाणु के एक प्रदेश में विभिन्न परमाणुओं के भिन्न-भिन्न संयोग मान लेने पर भी नहीं । एवं एक में अनेक संयोग हो भी नहीं सकते, अतः परमाणु के अनेक प्रदेश मानने होंगे। तस्मात् एक परमाणु के चार दिशाओं के चार अंशों में चार विभिन्न परमाणुओं के चार संयोग, एवं परमाणु के नीचेवाले अंश में एक परमाणु का एक संयोग, एवं उसके ऊपर प्रदेश में एक परमाणु का एक संयोग, इस प्रकार छः दिशाओं से छः संयोग से ही स्थूल वस्तु की सृष्टि हो सकती है। फलत: एक परमाणु के उक्त छः दिशाओं से छः परमाणु आकर संयुक्त होते हैं, तभी स्थूल सृष्टि होती है। तस्मात् जिसे आप परमाणु कहते हैं, वस्तुतः वह छः अंशवाली एक वस्तु है। फलत: निरवयव परमाणु की सत्ता ही अप्रामाणिक है |
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१११
प्रशस्तपादभाष्यम्
वायुत्वामिसम्बन्धाद्वायुः ।
स्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व । स्पर्शोऽस्यानुष्णाशीतत्वे
संयोग विभागपरत्वापरत्वसंस्कारवान्
वायुत्व जाति के सम्बन्ध से वायु का व्यवहार करना चाहिए । यह स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व और संस्कार इन नौ गुणों से युक्त है। इसमें अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श ही है ये सभी
न्यायकन्दली
प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गाच्च, किन्तु स्वरूपविषयः । एवञ्चेत्, सांशद्रव्यस्येव निरंशस्यापि परमाणोरेकस्य युगपत्कारणसम्भवे सत्यनेक संयोगाधिकरणत्वमुपपद्यत एवेति न तत्प्रतिक्षेपः ।
प्रत्यक्षं पृथिव्यादित्रयं व्याख्यायाप्रत्यक्षद्रव्यव्याख्यानावसरे नित्या नित्योभयस्वभावद्रव्यनिरूपणस्य प्रकृतत्वाद्वायु व्याचष्टे – वायुत्वाभिसम्बन्धा द्वायुरिति । व्याख्यानं पूर्ववत् । तस्य गुणान् कथयति- स्पर्शेत्यादि । अत्रापि पूर्ववद् व्याख्या । यादृशः स्पर्शो वायौ वर्त्तते तं दर्शयति- स्पर्श इति । पृथिवीस्पर्श: पाकजः परमाणुषु, तत्पूर्वकश्च स्वकार्येषु । अस्य तु स्पर्शोऽपाकज हो जाएगा, जो कि केवल अंश हो है ( उसका कोई अंश नहीं है), अतः संयोग को अंश की अपेक्षा नहीं है द्रव्य के स्वरूप की अपेक्षा है। तस्मात् कारणों के रहने पर एक समय में ही अंश से युक्त द्रव्यों की तरह अंशशून्य परमाणु में भी अनेक परमाणुओं के संयोग की अधि
करणता युक्तिविरुद्ध नहीं है, अतः अंशरहित परमाणु की सत्ता में कोई विवाद नहीं हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात होनेवाले पृथिवी, जल और तेज इन तीन पदार्थों के निरूपण के बाद प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात न होनेवाले द्रव्यों के निरूपण की बारी आती है, एवं पृथियो प्रभृति कहे हुये द्रव्य नित्य और अनित्य दोनों ही प्रकार के हैं, अतः पूर्वागत होने के कारण नित्यानित्यस्वभाव के द्रव्य का ही निरूपण क्रम से प्राप्त है । अप्रत्यक्ष द्रव्यों में से नित्यानित्यस्वभाव के कारण वायु का निरूपण हो क्रमप्राप्त है । तदनुसार “वायुत्वाभिसम्बन्धाद्वायुः” इत्यादि से वायु का निरूपण करते हैं। इस वाक्य की व्याख्या “पृथिवीत्वादिसम्बन्धात् पृथिवी” इत्यादि वाक्यों की तरह करनी चाहिए। ‘स्पर्श:’ इत्यादि से वायु के गुणों का वर्णन करते हैं। इसकी भी व्याख्या पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के गुण के बोधक वाक्यों की तरह करनी चाहिए। पार्थिव परमाणुओं में पाकज स्पर्श है, अतः उन परमाणुओं के कार्य और पार्थिव द्रव्यों में भी पाकज स्पर्श ही है, क्योंकि कार्य के गुण कारण के गुणों से उत्पन्न होते हैं। इस ( वायु ) का स्पर्श भी अपाकज ही है, अतः यह स्पर्श वायु का लक्षण है। यह स्पर्श अपाकज इसलिए है कि
११२
न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
प्रशतपादभाष्यम्
[ द्रव्ये वायु
सत्यपाकजः, गुणविनिवेशात् सिद्धः । अरूपिष्वचाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । तृणकर्मवचनात् संस्कारः । स चायं द्विविधोऽणुका – गुण ( कणाद के ) गुणविनिवेशाधिकार के सूत्रों से इसमें सिद्ध समझना चाहिए | ‘अरूपिष्वचाक्षुषाणि’ (४|१|१२) ‘रूप शून्य द्रव्यों के संख्यादि सात गुण आँखों से नहीं देखे जाते’ सूत्रकार की इस उक्ति में वायु में संख्यादि सात गुणों की सत्ता समझनी चाहिए । ‘तृणे कर्म्म वायुसंयोगात्’ ( ५॥१॥१४ ) ‘वायु प्रभृति द्रव्यों के संयोग से तृण में क्रिया उत्पन्न होती है’ महर्षि कणाद की इस उक्ति से वायु में संस्कार नाम के गुण की सत्ता समझनी चाहिए। इसके भी ( १ ) अणु और ( २ )
न्यायकन्दली
इत्यती वैधर्म्यम् । अपाकजत्वञ्चास्य पृथिव्यनधिकरणत्वादुदकतेजःस्पर्शवत् । अनुष्णाशीतत्वे सतीत्युवक तेजः स्पर्शाभ्यां वैधर्म्यमुक्तम् । अयञ्च द्वितीया ध्यायात् – “वायु: स्पर्शवान्” (२११४ वै० स० ) इति सूत्रेण वायौ सिद्ध इत्याह गुणविनिवेशादिति । अरूपिष्वचाक्षुषवचनात् रूपरहितेषु द्रव्येषु सङ्ख्यादयश्चाक्षुषा सप्त न सङ्ख्यादयः । भवन्तीत्यभिधानाद रूपिषु सङख्यादीनां सद्भावः कथितः, अन्यथा तद्वतिनां तेषामप्रत्यक्षत्वाभि धानमसम्बद्धं स्यात् । तृणकर्मवचनात् संस्कार इति । “तृणे कर्म वायोः संयो गात्” ( ५।१।१४ वै० स० ) इति वचनाद् वायौ संस्कारो दर्शितः वेगरहितद्रव्य संयोगस्य कमँहेतुत्वानुपलम्भात् । तस्य भेदनिरूपणार्थमाह – स चायमिति । स चेति स्मृत्युत्थापितो बुद्धिसन्निहितः पश्चादयमिति प्रत्यक्षवत् परामृश्यते । पृथिवी में वह नहीं है, जैसे कि जल और तेज का स्पर्श अनुष्णाशीतत्वे सति’ इस पद से ( इस अनुष्णाशीत स्पर्श में ) तेज और जल के स्पर्श से ( अपाकजत्वरूप से ) समानता होने पर भी ( अनुष्णाशीत त्वरूप से ) विभिन्नता कही गई है। यह ‘स्पर्शवान् वायु:” ( २ | १ ४) इस सूत्र से सिद्ध है। यह विषय ‘गुणविनिवेशात्सिद्धः’ इस वाक्य से कहा गया है। रूप से रहित द्रव्य के संख्यादि सात गुणों को चूंकि सूत्रकार ने ‘अचाक्षुष’ कहा है (४ १११), अतः इससे ही वायु में संख्यादि सात गुणों की सत्ता भी जाननी चाहिए। अगर ऐसा न हो तो रूपशून्य द्रव्यों के संख्यादि गुणों की अचाक्षुषत्व की सूत्रकार की उक्ति असङ्गत हो जाएगी। तृणकर्मवचनात्संस्कारः’ अर्थात् सूत्रकार ने ‘तृणे कर्म वायुसंयोगात् (५।१।१४) इस सूत्र के द्वारा वायु में संस्कार नाम के गुण की सत्ता कही है, क्योंकि वेग से रहित द्रव्य का संयोग कर्म को उत्पन्न करते नहीं देखा जाता । ‘स चायम्’ इत्यादि वाक्य
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
११३
प्रशस्तपादभाष्यम्
भावात । तत्र कार्य्यलक्षणश्चतुर्विधः, शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति । तत्रायोनिजमेव शरीरं मरुतां लोके, पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चो पभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकम्, पृथिव्याद्यनभि कार्य ये दो भेद हैं। इनमें कार्यरूप वायु ( १ ) शरीर ( २ ) इन्द्रिय ( ३ ) विषय और ( ४ ) प्राण भेद से चार प्रकार के हैं। इनके शरीर अयोनिज ही हैं, जो केवल वायुलोक में ही प्रसिद्ध हैं। इस शरीर में पार्थिव अवयवों के विलक्षण संयोग से सुख और दुःख के अनुभव की क्षमता रहती है। सभी प्राणियों के स्पर्श के प्रत्यक्ष का साधन द्रव्य ही इन्द्रिय रूप वायु है। वायु के जिन अवयवों का बल पार्थिवादि
न्यायकन्दली
न केवलं पृथिव्यादयो द्विविधाः, अयमपि द्विविध इति चार्थः । कार्य्यलक्षण इचतुविध: कार्य्यस्वभाव इत्यर्थः । चातुविध्यं कथमित्यत आह – शरीरमिन्द्रियं विषय: प्राण इति । तेषां मध्ये शरीरं जात्या निर्द्धारयति-तत्र शरीरमिति अयोनिजमेव न तु पार्थिवशरीरवद् योनिजमयोनिजमपीत्यर्थः । मरुतां लोक इति स्थानसङ्कीर्त्तनम् । भूयसां पार्थिवावयवानां निमित्तकारणभूतानामुपष्ट म्भात् संयोगविशेषात् स्थिरं संहतस्वभावमुत्पन्नं पार्थिवशरीरव दुपभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकमिति । यत् सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भक वायु के प्रकारों का निरूपण करने के लिए लिखते हैं। ‘सच’ इस शब्द से स्मृति के द्वारा बुद्धि के अत्यन्त निकट ले आने के बाद वायु प्रत्यक्ष वस्तु की तरह कहा गया है। केवल पृथिव्यादि ही दो दो प्रकार के नहीं हैं किन्तु यह वायु भी उन्हीं की तरह दो प्रकार का है, यही (‘स च ‘ इस वाक्य में प्रयुक्त ) ‘च’ शब्द से सूचित होता है। ‘कार्य लक्षणश्चतुर्विधः’ इस वाक्य में आनेवाले ‘कार्यलक्षण’ शब्द का ‘कार्यस्वभाव’ अर्थ है । यह चार प्रकार का कैसे है ? इसी प्रश्न का उत्तर ‘शरीरमिन्द्रियम्’ इत्यादि वाक्य से देते हैं । अर्थात् (१) शरीर, (२) इन्द्रिय, (३) विषय, और (४) प्राण इन भेदों से कार्यरूप वायु चार प्रकार का है। उनमें ‘तत्र शरीरम्’ इत्यादि से शरीर रूप वायु को जाति के द्वारा निर्धारित करते हैं। अर्थात् वायवीय शरीर केवल अयोनिज ही है, पार्थिव शरीर की तरह योनिज और अयोनिज भेद से दो प्रकार का नहीं । ‘मरतां लोके’ यह वाक्त्र इस शरीर के स्थान का निर्देश करता है। निमित्तकारण रूप बहुत से पार्थिव अवयवों के ‘उपष्टम्भ’ अर्थात् विशेश प्रकार के संयोग से यह शरीर भी ठोस आकार का उत्पन्न होता है और इसी से पार्थिवादि शरीरों की तरह उपभोग कर सकता है। इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकम्’ अभिप्राय यह है कि सभी प्राणियों
११४
न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये वायु
प्रशस्तपादभाष्यम्
भूतैर्वाय्वयवैरारब्धं सर्वशरीरव्यापि त्वगिन्द्रियम् । विषयस्तूपलम्य
विरोधी शक्तियों से नष्ट नहीं हुआ है, उन वायवीय अवयवों से इसकी सृष्टि होती है। यह शरीर के भी सभी अंशों में रहती है। इस इन्द्रिय का नाम है त्वचा विषयरूप वायु प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात स्पर्श का आश्रय, एवं स्पर्श, शब्द, धृति और
न्यायकन्दली
मिन्द्रियं तत् पृथिव्याद्यनभिभूतैरप्रतिहतसामथ्यँर्वाय्ववयवैरारब्धम्, अतो विशिष्टो त्पादादिन्द्रयं स्यादित्यर्थः । तस्य सद्भावे तावत् स्पर्शोपलब्धिरेव प्रमाणम् । वायवीयत्वञ्चास्य रूपादिषु मध्ये स्पर्श स्यैवाभिव्यञ्जकत्वावङ्गसङ्गिसलिल शैत्याभिव्यञ्जकसमीकरणवत् । तच्च सर्वशरीरव्यापि, सर्वत्र तत्कार्य्यस्य स्पर्शो पलम्भस्य भावात् । त्वगिन्द्रियमिति समाख्या त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रिय मित्युच्यते, तत्स्थे तदुपचारात्, त्वचा सर्वेन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि, सत्यां त्वचि रूपादिग्रहणमसत्यामग्रहणमिति त्वगिन्द्रियं सर्वार्थम्, न तु स्पर्शमात्र ग्राहकमिति केचित् तदयुक्तम्, अन्धाद्यभावप्रसङ्गात्, तत्तदधिष्ठानभेदेन शक्ति भेदाभ्युपगमे प्रकारान्तरेणेन्द्रियभेदाभ्युपगमः ।
विषयव्यवस्थानियमनिरूपणार्थम् – विषयस्त्विति । स्पर्शस्याधिष्ठानभूत आश्रयो यः स विषय इति । किमस्यास्तित्वे प्रमाणम्’
उपलभ्यमान
? के प्रत्यक्ष का कारण यह इन्द्रिय पार्थिव अवयवों से अनभिभूत है, अर्थात् जिन वायवीय अवयवों की शक्ति का पार्थिवादि विरोधी शक्तियों से नाश नहीं हुआ है, उनसे बनी हुई है, अतः यह इन्द्रिय है। स्पर्श के प्रत्यक्षरूप प्रमाण से ही इस इन्द्रिय की सत्ता समझी जाती है। यह इन्द्रिय चूंकि रूपादि गुणों में से केवल स्पर्श के प्रत्यक्ष का ही उत्पादक है, अतः पसीने की शीतता को व्यञ्जित करनेवाले समीर की भाँति यह ( इन्द्रिय) भी वायवीय सिद्ध होती है। शरीर के सभी प्रदेशों में स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है, अतः यह इन्द्रिय शरीर के सभी प्रदेशों में है। चूंकि यह इन्द्रिय त्वचा में रहती है, इसलिए इसका नाम ‘स्वक्’ है। त्वचारूप अधिकरण में रहने के कारण ही लक्षणा वृत्ति के द्वारा उसके आधेयरूप इन्द्रिय में भी ‘स्वक्’ शब्द का प्रयोग होता है। ( प्र०) स्वगिन्द्रिय अगर शरीर के सभी प्रदेशों में है तो फिर उसका अन्वय और व्यतिरेक स्पर्श की तरह रूपादि गुणों में भी है, अतः त्वगिन्द्रिय मात्र एक ही इन्द्रिय मान ली जाय, इससे ही रूपादि प्रत्यक्षों का भी निर्वाह हो सकेगा ? (उ०) उक्त कथन असङ्गत है क्योंकि इससे संसार से अन्धापन का मिट जाना मानना पड़ेगा। अगर अधिष्ठान के भेद से त्वचा में ही रूपादि प्रत्यक्ष की विभिन्न शक्तियाँ मानें तो फिर वह वस्तुतः दूसरे शब्दों में अनेक इन्द्रियों की सत्ता माननी जैसी ही होगी।
करणम् ]
भावानुवादसहितम्
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प्रशस्तपादभाष्यम्
मानस्पर्शाधिष्ठानभूतः स्पर्शशब्दधृतिकम्प लिङ्ग स्तिग्गमनस्वभावो
मेघादिप्रेरणधारणादिसमर्थः । कम्प इन चार हेतुओं से अनुमेय, और कुटिल गति से चलनेवाला है | मेघ आदि वस्तुओं को इधर उधर जाने में प्रेरित करना और उनको गिरने न देना विषयरूप वायु के कार्य हैं ।
न्यायकन्दली
प्रत्यक्षमेव, त्वगिन्द्रियव्यापारेण वायुवतीत्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तेरिति कश्चित्, तत्र तु स्पर्श युवतम्, स्परांव्यतिरिक्तस्य वस्त्वन्तरस्यासंवेदनात्, अपरोक्षज्ञाने एव प्रतिभाति नान्यत्, यदपि वायुर्वातीति ज्ञानं तदभ्यास पाटवातिशयाद् व्याप्तिस्मरगाद्यनपेक्षं स्पर्शेनानुमानम्, चक्षुषेव वृक्षादि गतिक्रियोपलम्भात् । शीतोष्णस्पर्शभेदप्रतीतौ वायुप्रत्यभिज्ञानमपि तदाश्रयोपनायक द्रव्यानुमानादेव। त्वगिन्द्रियेण तु शीतोष्णस्पर्शाभ्यामन्यस्य न प्रतिभासोऽस्ति । स्पार्शनप्रत्यक्षो वायुरुपलभ्यमान स्पर्शाधिष्ठानत्वाद् घटवदित्यनुमानं शशादिषु
विषयरूप वायु इतने ही हैं, इससे अधिक नहीं, इससे कम भी नहीं इस व्यवस्था के लिए विषयस्तु’ इत्यादि लिखते हैं। अर्थात् पृथिवी, जल और तेज के स्पर्श से विलक्षण जिस स्पर्श की उपलब्धि होती है, उस स्पर्श का आश्रय ही ‘विषय’ रूप वायु है । ( प्र० ) इस स्पर्श के आश्रयरूप द्रव्य की सत्ता में प्रमाण क्या है ? ( उ० ) कोई कहते हैं कि उसके अस्तित्व में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, क्योंकि गिन्द्रिय के व्यापार से ही ‘वायु चल रही है। इस प्रकार की अपरोक्ष प्रतीति होती है। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि इस अपरोक्ष ज्ञान में त्वगिन्द्रिय के व्यापार के द्वारा स्पर्श से भिन्न कोई और पदार्थ भासित नहीं होते, अर्थात् उस अपरोक्ष ज्ञान में स्पर्श को छोड़कर ( उसके आश्रयादि ) और कोई वस्तु प्रतिभासित नहीं होती। ‘हवा चलती है यह ज्ञान भी स्पशंहेतुक अनुमिति ही है। यह और बात है कि बार बार स्पर्शहेतुक वायु की अनुमिति से उत्पन्न विशेष प्रकार की पटुता से उक्त अनुमिति में व्याप्ति की अपेक्षा नहीं होती, जैसे कि चक्षु से वृक्षादिगत क्रिया की अनुमिति में व्याप्ति को अपेक्षा नहीं होती। उस स्पर्श में शीत और उष्ण से वैलक्षण्य की प्रतीति के बाद जो यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि ‘यह स्पर्श वायु का है वह भी स्पर्श के माश्रयरूप द्रव्य के अनुमान से हो होती है । तस्मात् त्वगिन्द्रिय से शीतोष्णादि स्पर्शो से अतिरिक्त किसी और वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होता है । ‘बायु का स्पार्शन प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष स्पर्श का आश्रय है, जैसे कि
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये वायु
पशुत्वेन शृङ्गानुमानवदनुपलब्धिबाधितम् । द्रव्यस्य स्पार्शनत्वं चाक्षुषत्वेन व्याप्तमवगतं घटादिषु चाक्षुषत्वस्य च वायावभावस्तेनात्र शक्यं स्पार्शनत्व निवृत्यनुमानमेतत् अतस्तस्याप्रत्यक्षस्य सद्भावेऽनुमानमुपन्यस्यति- स्पर्शशब्द धृतिकम्पलिङ्ग इति । स्पर्शश्च शब्दश्च धृतिश्च कम्पश्चेति ते लिङ्गानि यस्येति बहुव्रीहिः ।
योऽयं रूपादिरहितः स्पर्श: प्रतीयते स क्वचिदाश्रितः, स्पर्शत्वात्, इतरस्पर्शवत् । न चास्य पृथिव्येवाश्रयो रूपविप्रयोगात् । अस्त्यत्राप्यनुद्भूतं रूपमिति चेन्न, उपलभ्यमानस्य पाथवस्य स्पर्शस्योपलभ्य मानरूपेर्णव सहाव्य भिचारोपलम्भात्, न चेह रूपस्यास्त्युपलम्भस्तस्मान्नायं पार्थिवः स्पर्शः । न चोदकतेजसोरयमाश्रितोऽनुष्णाशीतत्वाद् घटादिस्पर्शवत् । नाप्यमूर्तेष्वाकाश कालदिगात्मसु वर्त्तते, स्पर्शस्य मूर्ताव्यभिचारोपलम्भात् । मनसाञ्च स्पर्शवत्त्वे परमाणुनामिव तेषां सजातीयद्रव्यारम्भकत्वं स्यात्, न चैवम्, तस्मात् तेषामपि न भवति, अतो यत्रायमाश्रितः स वायुरिति परिशेषः ।
घटादि’ यह अनुमान शश (खरहे ) में पशुत्व हेतु से सींग के अनुमान की तरह अनु पलब्धिमूलक बाघ दोष से युक्त है। एवं त्वगिन्द्रिय द्वारा वायु के प्रत्यक्ष होने में बाधक अनुमान भी है कि ‘स्पार्शन प्रत्यक्ष उसी द्रव्य का होता है, जिसका कि चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है’ यह व्याप्ति घटादि में ज्ञात है एवं वायु में चाक्षुषत्व नहीं है, तस्मात् ‘वायु का स्पाशंन प्रत्यक्ष नहीं होता है अतः प्रत्यक्ष न होनेवाले वायु की सत्ता में “स्पर्श शब्दधृतिकम्पलिङ्गः” इत्यादि से अनुमान प्रमाण दिखलाया गया है। ‘स्पर्शश्च शब्दश्च धृतिश्च कम्पश्चेति ते लिङ्गानि यस्य इस विग्रह के अनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि स्पर्श, शब्द, धृति और कम्प ये चार जिसके शापक हैं, वही ‘वायु’ है ।
(१) (सामानाधिकरण्य सम्बन्ध से ) रूपरहितत्व विशिष्ट जिस स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है उसका कोई आश्रय अवश्य है, क्योंकि वह भी स्पर्श है, जैसे कि और वस्तुओं का स्पर्श प्रतीयमान इस स्पर्श का आश्रय पृथिवी नहीं है, क्योंकि इस स्पर्श में रूप का (सामानाधिकरण्य) सम्बन्ध नहीं है । ( प्र० ) इसमें भी रूप है ही, किन्तु अनुद्भुत है ? (उ०) नहीं, क्योंकि उपलब्धि के योग्य पृथिवी के स्पर्श का उपलब्धियोग्यरूप साथ ही नियत सम्बन्ध सभी जगहों में देखा जाता है, किन्तु इस स्पर्श के साथ रूप को उपलब्धि नहीं होती है, तस्मात् यह स्पर्श पार्थिव नहीं है। यह स्पर्श तेज और जल का भी नहीं है, क्योंकि यह अनुष्णाशीत है, जैसे कि घटादि का स्पर्श । यह स्पर्श आकाश, काल, दिकू और आत्मा इन अभूतं द्रव्यों का भी नहीं है, क्योंकि यह अव्यभिचरित नियम है कि स्पर्श मूर्त द्रव्यों में हो रहे मन में अगर स्पर्श मानें तो फिर उनमें
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
११७
न्यायकन्दली
एवं शब्दोऽप्यस्य लिङ्गम्, योऽयं पर्णादिष्वकस्माच्छुकशुकाशब्दः श्रूयते तस्याद्यः शब्द: स्पर्शवद्रव्यसंयोगजः, अविभज्यमानावयवद्रव्य सम्बन्धित्वे सत्यादि शब्दत्वाद् दण्डाहत भेरीशब्दवत्, यश्चासौ स्पर्शवान् स वायुः । आकाशादीनां स्पर्शाभावात् पृथिव्युदकतेजसां च रूपवतां तच्छन्दहेतुत्वे प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । विभागजशब्दव्यवच्छेदार्थमविभज्यमानावयवद्रव्य सम्बधित्वे सतीत्युक्तम् ।
एवमन्तरिक्ष पर्णादीनां धृतिरवस्थितिः स्पशंवद्रव्यसंयोगका प्रयत्नवेगादिकारणाभावे सति धृतित्वाज्जलोपरि स्थितपर्णादिवत् । यच्च तत् स्पर्शवद्रव्यं न तत् पृथिव्यादित्रयमप्रत्यक्षत्वादेवेति द्रव्यान्तरसिद्धिः । इषोः पक्षिणाञ्च स्थितिव्यवच्छेदार्थ प्रयत्नादिकारणाभावः ।
तथा
वृक्षादीनां
कम्पविशेषः स्पर्शवद्रव्यसंयोगजो
विशिष्ट
अपने सजातीय द्वचणुकरूप दूसरे द्रव्य की समवायिकारणता माननी पड़ेगी, किन्तु उनसे किसी द्वचणुकादि द्रव्यों की उत्पत्ति नहीं होती है। तस्मात् यह स्पर्श मन का भी गुण नहीं है, अतः परिशेषानुमान से यह सिद्ध होता है कि उक्त स्पर्श का आश्रय हो ‘वायु’ है ।
( २ ) इसी प्रकार शब्द भी वायु का ज्ञापक हेतु है। पत्तों में कभी कभी जो शुक शुक प्रभृति शब्द सुनते हैं, उनका पहिला शब्द स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से उत्पन्न होता है, क्योंकि द्रव्यों के विभाग से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है और वह पहिला शब्द है, जैसे डंडे से पिटे हुए नगाड़े का शब्द । उक्त स्पर्श का आश्रय ही वायु है। क्योंकि आकाशादि में कोई भी स्पर्श नहीं है। पृथिवी, जल और तेज में से किसी को उसका आश्रय मानने से उसके प्रत्यक्ष की आपत्ति होगी। उस शब्द-श्रवणस्थल में पृथिव्यादि किसी द्रव्य का प्रत्यक्ष नहीं होता है। विभागज शब्द में व्यभिचार के वारण के लिए (‘द्रव्यों के विभाग से इसकी उत्पत्ति नहीं होती है’ हेतु के इस अंश का बोधक) ‘अविभज्यमानावयव द्रव्यसम्बन्धित्वे सति’ यह वाक्य कहा है।
(३) इसी तरह आकाश में पत्तों का ठहरना स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से ही होता है, क्योंकि ठहरने के प्रयत्न और वेग प्रभृति कारण वहीं नहीं हैं । और वह भी ठहरना ही है, जैसे पानी के ऊपर ठहरे हुये पत्ते का ठहरना प्रभृति । इस स्पर्श का आश्रय पृथिवी, जल और तेज रूप द्रव्य भी नहीं हैं, क्योंकि कह चुके हैं कि ‘फिर उनका प्रत्यक्ष चाहिए’ किन्तु उनमें से किसी का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः पृथिव्यादि आठ द्रव्यों से भिन्न वायु नाम के द्रव्य की सिद्धि होती है। तीर और चिड़ियों की आकाश में जो स्थिति है, उसमें व्यभिचार वारण करने के लिए (‘स्थिति के वेगादि और कारणों के न रहने पर भो’ इस अर्थ के बोधक) हेतु में प्रयत्नादिकारणाभाव’ का निवेश है।
(४) वृक्षप्रभृति द्रव्यों का विशेष प्रकार का कम्प स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से उत्पन्न होता है, क्योंकि वह भी विशेष प्रकार का कम्प है, जैसे कि नदी के वेग
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न्यायकन्दलीसंवस्ति प्रस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये वायु
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्याप्रत्यक्षस्यापि नानात्वं सम्मूर्च्छनेनानुमीयते । सम्मूर्च्छनं पुनः
प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात न होने पर भी वायु में अनेकत्व का अनुमान ‘समूर्च्छन’ से होता है। विरुद्ध दो दिशाओं में गतिशील समानवेग की दो वायुओं
न्यायकन्दली
कम्पत्वाद् नदीपू राहतवेत सादिवन कम्पवत् । भूकम्पेन व्यभिचार इति चेन्न, तस्यान्य हेतुत्वावगमात्, स्पर्शबद्रव्यसंयोगजे तु विशिष्टकम्पत्वमेव प्रमाणमित्यव्यभि चारः । नतु यदेव द्रव्यं स्पर्शनानुमितं तदेव शब्दादिभिरप्यनुमीयते, न तु प्रतिलिङ्ग द्रव्यान्तरानुमिति, किमिह प्रमाणं येनैतदुच्यते स्पर्शशब्दधृतिकम्प लङ्गो वायुरिति ? इदं प्रमाणम्, स्वर्शानुमितद्रव्यकार्य्यत्वेनैव शब्दादीनामुप पत्तौ सम्भवन्त्यां द्रव्यान्तरकल्पनावैयर्थ्यामिति ।
एवं स्थिते वायौ तद्धमं दर्शयति-तिर्थ्यग्गमनस्वभाव इति । तिर्य्यग्गमनं स्वभावो यस्येति । मेधादिप्रेरण इतस्ततो नयने धारणे गुरुत्वप्रतिबन्धे । आदि शब्दाद् वर्षणे समर्थ: । मेघादीत्यादिपदेन यानपात्रादिपरिग्रहः तेषामपि वायुना प्रेमाणत्वात् ।
अनुमीयमानेष्वाकाशादिष्वेकानेकत्वोपलब्धौ संशये सति तद्व्युदा सार्थमाह –
से आहत किनारे के बेतवन का कम्पन (प्र०) यह हेतु तो भूकम्प में व्यभिचरित है ? (उ०) भूकम्प का कुछ और ही कारण समझा जाता है। भूकम्प की अपनी एक विशिष्टता है, जिससे समझा जाता है कि भूकम्प स्पर्शयुक्त किसी द्रव्य के संयोग से ही उत्पन्न होता है। तस्मात् उक्त हेतु में कोई व्यभिचार नहीं है । ( प्र०) ‘शब्द हेतु से जिस द्रव्य का अनुमान होता है, उसी द्रव्य का कम्पादि हेतुओं से भी अनुमान होता है, शब्दादि प्रत्येक हेतु से विभिन्न द्रव्य का अनुमान नहीं होता है इसमें क्या प्रमाण है ? एवं क्या प्रमाण है कि कथित शब्दादि हेतुओं में से सभी वायु के ही ज्ञापक हैं ? ( उ०) इसमें यही प्रमाण है कि स्पर्श से अनुमित वाय नाम के द्रव्य से हो उक्त शब्दादि कार्यों की उत्पत्ति होगी उसके लिए और द्रव्यों की कल्पना व्यर्थ है।
इस प्रकार वायु के सिद्ध हो जाने पर ‘तिय्यंग्गमनस्वभावः’ इत्यादि से उसका धर्म दिखलाते हैं । तिय्यंग्गमनं स्वभावो यस्य’ इस बहुव्रीहि समास से उक्त शब्द निष्पन्न है। मेघ आदि के ‘प्रेरण’ में अर्थात् इधर-उधर ले जाने में, और ‘धारण’ में, गुरुत्व के प्रतिरोध में, एवं ‘आदि’ पद से उनको बरसाने में समर्थ है। ‘मेघादि’ पद में आनेवाले ‘आदि’ पद से सवारी वर्त्तन प्रभृति द्रव्यों का सङ्ग्रह समझना चाहिए । आकाशादि द्रव्यों में एकत्व और अनेकत्व दोनों ही उपलब्ध होते हैं (इनमें आकाश,
प्रकरणम् ]
भावानुवादसहितम्
११९
प्रशस्तपादभाष्यम्
समानजवयोर्वाथ्वोर्विरुद्ध दिक क्रिययोः समिपातः, सोऽपि सावध विनोर्वायवोरूर्ध्वगमनेनानुमीयते, तदपि तृणादिगमनेनेति ।
का मेल ही ( प्रकृत में ) सम्मूर्च्छन’ शब्द का अर्थ है । अवयवयुक्त दो वायुओं के ऊपर जाने की क्रिया से समूर्च्छन का भी अनुमान ही होता है। एवं तृणादि द्रव्यों के ऊपर जाने की क्रिया से ही सावयव वायुओं की ऊपर जाने की क्रिया का भी अनुमान ही होता है।
न्यायकन्दली
तस्याप्रत्यक्षस्यापीति | सम्मूर्च्छनमपि न ज्ञायते तदर्थंमाह-सम्मूर्च्छनमिति । विरुद्धायां क्रिया ययोस्तयोः सन्निपातः परस्परगति प्रतिबन्धहेतुः संयोगविशेषः सम्मूर्च्छनम्, तेन वायोर्नानात्वमनुमीयते, एकस्य संयोगाभावात्, एकदिवप्रस्थितयो र्यथाक्रमं गच्छतोः सम्मूर्च्छनाभाव इति विरुद्ध दिविक्रययोभिन्नदिविक्रययोरित्यर्थः । असमानवेगयोः सम्मूर्च्छनं न भवति, एकेनापरस्य विजयात् तदर्थ समानजव योरिति । अप्रत्यक्षयोर्यथा नानात्वमप्रत्यक्षं तथा संयोगेऽपीति मत्वेदमाह सोऽपीति | सोऽपि सन्निपातोऽपि । सावयविनोर्वाग्वो रूद्र्ध्वगमनेनानुमीयते, वायो रुर्ध्वगमनं परस्परव्याहतिपूर्वकमन्यकारणासम्भवे सति तिर्य्यग्गतिस्वभावद्रव्यो दूर्ध्वगतित्वात् परस्पराइतजलतरङ्गोर्ध्वगमनवत् । अवयविनोरिति वक्तव्ये
काल और दिक् ये तीनों एक एक ही है एवं आत्मा और मन अनेक हैं), अतः ( प्रत्यक्ष के अविषय और अनुमान से सिद्ध ) वायु में संशय होता है कि वायु एक है। या अनेक ? इसी संशय को हटाने के लिए ‘तस्याप्रत्त्यक्षस्थापि’ इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं। यह भी नहीं समझते कि ‘संमूच्छेन’ क्या है ? इसी को समझाने के लिए ‘संमू छनम्’ इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं। अर्थात् समानवेग की जिन दो वायुओं की गति दो विरुद्ध दिशाओं में हैं, उन दोनों का संनिपात’ अर्थात् दोनों की गति को प्रतिरुद्ध करने वाला विशेष प्रकार का संयोग ही ‘संमूर्च्छन’ है। न्यूनाधिक वेग की वायुओं का संमूच्छंन नहीं हो सकता है, क्योंकि अधिक वेगवाली न्यून वेगवाली के ऊपर विजय पा जाती है, अतः लिखा है कि ‘समानजवयोः’ । आँखों से न दीखनेवाली वस्तुओं के नानात्व का भी जैसे प्रत्यक्ष नहीं होता है, उसी प्रकार उन वस्तुओं में रहनेवाले संयोग का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है। यही मानकर ‘सोऽपि’ इत्यादि ग्रन्थ लिखते हैं। ‘सो ऽपि’ अर्थात् उक्त संयोग विशेष रूप संनिपात भी अवयवों से युक्त दो वायुओं की ऊपर की गति से अनुमति होता है, अर्थात् दोनों वायुओं का ऊपर जाना उनके परस्पर संघर्ष से उत्पन्न होता है, क्योंकि उनके ऊपर जाने का कोई दूसरा कारण सम्भावित नहीं है अथ च वह गति कुटिल स्वभाव के दो द्रव्यों की है, जैसे कि परस्पर संघर्ष से
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न्यायकन्दली संवलितप्रशस्त पादभाष्यम्
[ द्रव्ये वायु
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्राणोऽन्तः शरीरे रसमलघातूनां प्रेरणादिहेतुरेकः सन् क्रियामेदाद पानादिसंज्ञां लभते ।
शरीर के अन्दर रहनेवाली एवं उसके रस मल और धातु के प्रेरणादि क्रियाओं का कारण वायु ही ‘प्राण’ है। यह एक होते हुए भी क्रियाओं की भिन्नता के कारण ‘अपान’ प्रभृति नामों से भी कही जाती है ।
न्यायकन्दली
सावयविनोरित्युक्तम् अवयवानामप्यवयवित्वविवक्षया स्थूलवायुपरिग्रहार्थम्,
अणुपरिमाणस्य तृणादिप्रेरणसामर्थ्याभावात् । ऊर्ध्वगमनमपि तयोरप्रत्यक्षमिति
तत्प्रतिपत्तावनुमानमाह- तृणादिगमनेनानुमीयत इति । लोके योगशास्त्रे च विषयवायोर्भेदेन प्रसिद्धस्य प्राणाख्यस्य स्वरूप माह – प्राणोऽन्तः शरीर इति । अन्तःशरीरे यो बायुर्वर्त्तते स प्राण इत्युच्यते । तस्या थंक्रियां कथयति – रसमलधातूनां प्रेरणादिहेतुरिति । रस इति भुक्तवतामाहारेषु पाकजोत्पत्तिक्रमेणोत्पन्नस्य द्रव्यविशेषस्य ग्रहणम् । मल इति मूत्रपुरीषयोरभि धानम् | धातवस्त्वङमांसास्थिशोणितादयः तेषां प्रेरणस्येतस्ततो नयनस्य, आदि शब्दाद् व्यूहनस्य च हेतुः । तस्यैकत्वानेकत्वसंशये सत्याह- एकः सन्निति ।
प्राप्त जल के तरङ्गों की ऊपर की गति परमाणु को छोड़कर सभी अवयव अवयवी भी हैं, इस अभिप्राय से स्थूल वायु के सङ्ग्रह के लिए अवयविनोः’ यह करने पर काम चलने की सम्भावना रहने पर भी ‘सावयविनो:’ यह पद कहा है, क्योंकि अणु परिमाणवाला द्रव्य तृणादि को इधर उधर नहीं ले जा सकता है। उन दोनों वायुओं की ऊर्ध्वं गति भी अप्रत्यक्ष ही है, अतः उसके ज्ञान के लिए अनुमान का प्रयोग ‘तृणादिगमनेनानुमीयते’ इस वाक्य से दिखलाये हैं।
जनसाधारण में और योगशास्त्र में भी विषयरूप वायु से भिन्न रूप में प्रसिद्ध, माण नाम के वायु का स्वरूप प्राणोऽन्तःशरीरे इत्यादि से दिखलाते हैं। अर्थात् शरीर के अन्दर जो वायु है, उसे ही ‘प्राण’ कहते हैं। ‘रसमलधातूनाम्’ इत्यादि से प्राण वायु का कार्य दिखलाते हैं । खाये हुए द्रव्यों में ( जाठर अग्निरूप तेज के संयोग रूप ) पाक से रूपरसादि परिवर्तित हो जाते हैं। परिवर्तित इन रूपरसादि से युक्त द्रव्य ही ‘रस’ शब्द का अर्थ है। विष्ठा और मूत्र ही यहाँ ‘मल’ शब्द के अर्थ हैं। त्वचा, मांस, शोणित प्रभृति यहाँ ‘धातु’ शब्द से इष्ट हैं । इनके ‘प्रेरण’ का अर्थात् इधर उधर ले जाने का एवं ‘आदि’ शब्दसे ‘व्यूहन’ का अर्थात् विशिष्ट प्रयोग में नियोग का भी कारण है। यह प्राण वायु एक है या अनेक ? इस संशय में कहते हैं ‘एक: सन्’ । सुना जाता है कि शरीर
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१२१
प्रशस्तपादभाष्यम्
इहेदानीं चतुर्णा महाभूतानां सृष्टिसंहारविधिरुच्यते । ब्राक्षेण
अब यहाँ पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों महाभूतों की सृष्टि और उनके संहार की रीति कहते हैं। ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में जब वर्तमान
न्यायकन्दली
ननु पञ्च वायवः शारीराः श्रूयन्ते ? तत्राह – – क्रियाभेदादिति । मूत्रपुरीषयो रधोनयनादपानः, रसस्य गर्भनाडीवितननाद् व्यानः, अन्नपानादेरूद्र्ध्व नयनादुदानः, मुखनासिकाभ्यां निष्क्रमणात् प्राणः, आहारेषु पाकार्थमुदस्य बह्नः समं सर्वत्र नयनात् समान इति न वास्तबमेतेषां पञ्चत्वमपि तु कल्पितम् । कथम् ? एकस्मिन्नाश्रये मूर्त्तानां समावेशाभावात् ।
उत्पत्तिमन्ति चत्वारि द्रव्याण्याख्याय विस्तरात् ।
तेषां कत्तू परीक्षार्थमुद्यमः क्रियतेऽधुना ॥ पृथिव्यादीनां चतुर्णामुत्पत्तिविनाशौ निरूपणीयौ। तयोश्च प्रतिप्रकरणं निरूपणे ग्रन्थविस्तरः स्यादिति समानन्यायेनैकत्र निरूपणार्थं प्रकरणमारभ्यते–चतुर्णा मिति । सृष्टिसंहारयोर् उत्पत्तिविनाशयोः, विधिः प्रकारः कथ्यते । यद्यप्येक चतुर्णामपि सृष्टिसंहारौ कथ्येते, तथापि नेदं साधर्म्याभिधानम्, प्रत्येकं विलक्षणयो
में पाँच वायु हैं (फिर एक कैसे ?), इसी माक्षेप का समाधान ‘क्रियाभेदात्’ इत्यादि से देते हैं। मूत्र और विष्ठा को नीचे ले जाने के कारण यही प्राणवायु ‘अपान’ कहलाता है । यह व्यान इसलिए कहलाता है कि इसका काम गर्भनाडी में रस का विस्तार करना भी है। खायी और पीयी हुई वस्तुओं को ऊपर ले जाने के कारण वही ‘उदान’ शब्द से भी अभिहित होता है। मुँह और नाक से निकलने के कारण ही वह प्राण कहलाता है। आहार द्रव्य को पचाने के लिए उदयं तेज को उनमें समान रूप से पहुँचाने के कारण वही प्राण वायु ‘समान’ कहलाता है। इस प्रकार पश्चत्व उसमें कल्पित है, किन्तु वस्तुतः वह एक ही है । ( प्र० ) वह एक हो क्यों है ? ( उ० ) चूँकि एक मुर्त द्रव्य में अनेक द्रव्यों का समावेश असम्भव है ।
उत्पत्तिशील चारों द्रव्यों की विस्तृत व्याख्या के बाद अब उनके कर्ता की का उद्योग करते हैं। पृथ्वी, जल, तेज और वायु इन चारों द्रव्यों की उत्पत्ति और विनाश इन दोनों का निरूपण करना है। इन दोनों का अगर प्रत्येक प्रकरण में अलग अलग निरूपण किया जाय तो ग्रन्थ का व्यर्थं विस्तार होगा। अत: संक्षेप में एक ही जगह दोनों का निरूपण करने के लिए ‘चतुर्णाम्’ इत्यादि सन्दर्भ को आरम्भ करते हैं। ‘सृष्टि संहारयोः’ अर्थात् उत्पत्ति और विनाश इन दोनों को “विधि’ अर्थात् प्रकार कहते हैं । यद्यपि चारों भूतों को सृष्टि और संहार दोनों का निरूपण साथ ही किया जाता है,
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
प्रशस्तपादभाष्यम्
मानेन वर्षशतान्ते वर्त्तमानस्य ब्रह्मणोऽपवर्गकाले संसारखिन्नानां सर्व प्राणिनां निशि विश्रामार्थं सकलभुवनपतेर्महेश्वरस्य सञ्जिहीर्षासमकालं ब्रह्मा के मोक्ष का समय होता है, उस समय कुछ काल तक प्राणियों के ( जन्म मृत्यु जनित ) खेद को मिटाने के लिए सभी भुवनों के अधिपति महेश्वर को संहार
न्यायकन्दली
रेतयोरुपवर्णनात् । महाभूतानामित्युक्ते त्रयाणामेव परिग्रहः, कपिञ्जला नाल मेतेतिवद् बहुत्वसंख्यायास्तावत्येव चरितार्थत्वात्, अतश्चतुर्णामित्युक्तम् । चतुर्णामित्युक्ते चानन्तरोक्तमेव वायुकार्य्यं शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति चतुष्टयं बुद्धौ निविशते, तन्निवृत्त्यर्थं महाभूतानामिति नन्वेवं तहि द्वयणु कानामुत्पत्तिविनाशौ न प्रतिज्ञातौ स्यातां तेषामणुत्वात् । नैवम्, विधिशब्दो पादानात् । येन प्रकारेण महाभूतानामुत्पत्तिविनाशौ स प्रकारः कथ्यत इत्युक्तम् । तेषाञ्च द्वयणुकादिप्रक्रमेणोत्पत्तिरापरमाण्वन्तश्च विनाश इति । अतो द्वयणुका नामपि सृष्टिसंहारी प्रतिज्ञातौ स्याताम्, अर्थप्रतिपादनमात्रस्य विवक्षितत्वात् । फिर भी यह चारों का साधर्म्य कथन नहीं है, क्योंकि पृथिव्यादि में से प्रत्येक की सृष्टि और संहार का वर्णन अलग-अलग है। ‘महाभूतानाम्’ केवल इतना कहने से तीन महाभूतों का ही बोध होता, क्योंकि कपिञ्जलान् आलभेत’ इत्यादि वाक्यों के बहु वचनान्त ‘कपिजलान्’ आदि पदों से त्रित्व का ही बोध होता है, बहुत्व संख्या उतने से भी चरितार्थ हो जाती है, अतः ‘चतुर्णाम्’ यह पद कहा है। केवल ‘चतुर्णाम्’ इतना मात्र कह देने से अव्यवहित पहिले कहे हुए वायु के ( शरीर, इन्द्रिय, विषय और प्राण रूप ) चारों भेद ही जल्दी से बुद्धि में आते हैं, उनको हटाने के लिए ‘महाभूता नाम्’ यह पद है। (प्र० ) तो फिर इससे द्वथणुकों की उत्पत्ति और उनका विनाश इस प्रतिज्ञा के अन्दर नहीं आते हैं। क्योंकि वे अणु हैं, (महान् नहीं) । नहीं, क्योंकि ‘विधि’ शब्द का उपादान है। ( अर्थात् ) जिस प्रकार महाभूतों की उत्पत्ति और विनाश होता है, वह प्रकार कहते हैं। उनकी उत्पत्ति द्वयणुकादिक्रम से ही होती है और विनाश भी परमाणु पर्यन्त होता है अतः द्वघणुकों की उत्पत्ति और विनाश भी उक्त प्रतिज्ञा के अन्दर आ जाते हैं।
१. श्रुति में ‘वसन्ताय कपिञ्जलान् आलभेत’ यह वाक्य है । इस वाक्य में प्रयुक्त ‘कपिञ्जलान्’ इस पद से तीन ही कपिञ्जल अभिप्रेत हैं, या तीन से लेकर आगे की संख्या में यथेच्छाचार है ? क्योंकि बहुत्व तो तीन से लेकर आगे की सभी संख्याओं में समान है। इसी संशय के समाधान से कहा है कि तीन ही कपिञ्जलों का
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली
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पश्चादुक्त अपि संहारं प्रथमं
कथयति ब्राह्मण मानेनेति ।
अस्माकं पञ्चदश पञ्चदश निमेषा: काष्ठा त्रिंशतिः काष्ठाः कला । कला नाडिका । त्रिंशत्कलो मुहूर्त्त: । त्रिशता मुहूत्तरहोरात्रः । पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः द्वौ पक्षौ मासः । द्वादश द्वौ मासावृतुः षड्ऋतवो मासा: संवत्सरः । ऋतुत्रयेणोत्तरायणम्, ॠतुत्रयेण च दक्षि णायनम् । उत्तरायणश्च देवानां दिनम्, दक्षिणायनश्च देवानां रात्रिः ।
जिस किसी प्रकार पदार्थों का प्रतिपादन मात्र ही इप्ट है अतः पीछे कहे हुए भी संहार को “ब्राह्मण मानेन इत्यादि से पहले कहते हैं। हम लोगों के १५ निमेषों की एक काष्ठा होती है । ३० काष्ठाओं की एक कला और १५ कलाओं को एक नाड़िका होती है । ३० कलाओं का एक मुहूर्त होता है। ३० मुहूर्ती से एक दिन और एक रात होती है । १५ अहोरात्रों का एक पक्ष होता है। दो पक्षों का एक मास और दो मासों की एक ऋतु होती है। छः ऋतुओं एवं बारह मासों का एक वर्ष होता है। मकर राशि में जब सूर्य आते हैं तब से लेकर मिथुन राशि में उनकी स्थिति पर्यन्त के शिशिर वसन्त और ग्रीष्म इन तीन ऋतुओं का एक उत्तरायण होता है। एवं कर्क राशि में सूर्य की स्थिति से लेकर धनु राशि में उनकी स्थिति पर्यन्त के वर्षा, शरद् और हेमन्त इन तीन ऋतुओं का दक्षिणायन होता है। उत्तरायण देवताओं का दिन है,
आलम्भन युक्त है, क्योंकि त्रित्व संख्या के ग्रहण से ही शास्त्रकृत्य सम्पन्न हो जाता है। एवं तीन संख्या से अधिक संख्या को ग्रहण करने पर भी त्रिस्व को छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि चतुष्ट्वादि के अन्दर त्रित्व अवश्य ही है। जो कोई त्रित्व को ग्रहण करेगा वह चतुष्ट्वादि को छोड़ सकता है, क्योंकि चतुष्ट्वादि त्रित्व के अन्दर नहीं है, अतः उनके लिए त्रित्व को छोड़ना असम्भव है। विश्व सब से पहिले उपस्थित है एवं उसके ग्रहण में लाघव भी है। तस्मात् त्रित्व संख्या के ग्रहण से ही शास्त्रकृत्य सम्पन्न हो जाता है, फिर उससे अधिक कपिञ्जल के वध से तो प्रत्यवाय ही होगा। तस्मात् विना विशेषण के बहुवचन का अर्थ त्रित्व ही है। ( मीमांसासूत्र अ. ११ पा. १ अधि. ८ )
१. प्रतिज्ञावाक्य के विरुद्ध इस उलटफेर को किरणावली में इस प्रकार सुल झाया गया है कि – सृष्टि और संहार इन दोनों में पहिले कौन ? इस विप्रतिपत्ति में वैशेषिकों का सिद्धान्त है कि कोई भी पहिले नहीं, क्योंकि संसार अनादि और अनन्त है। प्रत्येक सृष्टि के पहिले अनन्त संहार बीत चुके हैं, एवं हर एक संहार के पहिले अनन्त सृष्टियाँ बीत चुकी रहती हैं। इस विषय को सूचना देने के लिए ही प्रतिज्ञावाक्य में पीछे कथित भी संहार का ‘ब्राह्मण मानेन’ इत्यादि से पहिले प्रतिपादन करते हैं। देखिये किरणावली – (पृ० ८१ पं० १६ और पृ० ६० पं० ३ ) ।
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्त पावभाष्यम्
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
प्रशस्तपादभाष्यम्
शरीरेन्द्रिय महाभूतो पनिबन्धकानां सर्वात्मगतानामदृष्टानां वृ वृत्तिनिरोघे की इच्छा होती है। उसके बाद ही शरीर, इन्द्रिय एवं और सभी महाभूतों के उत्पादक सभी आत्माओं के सभी अदृष्टों के कार्यों के उत्पन्न करने की शक्ति
न्यायकन्दली
तथा भूताहोरात्रशतत्रयेण षष्टघधिकेन वर्षम् । द्वादशसहस्रंश्च वर्णैश्चतुर्युगम् । चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्मणो दिनमेकम् ।
इत्यनेन मानेन वर्षशतस्यान्तेऽवसाने, वर्तमानस्य ब्रह्मणोऽपवर्गकाले मुक्तिकाले, संसारे नानास्थानेषु भूयो भूयः शरीरादिपरिग्रहेण, खिन्नानां गर्भवासा दिविविधदुःखेन दुःखितानां प्राणिनाम्, निशि विश्रामार्थं कियत्कालं दुःखोपश मार्थम्, सकलभुवनपतेः सर्वत्राव्याहतप्रभावस्य महेश्वरस्य सञ्जिहीर्षा संहारेच्छा भवति । तत्समानकालं तदनन्तरं शरीरेन्द्रियमहाभूतोपनिबन्धकानां शरीरेन्द्रिय महाभूतारम्भकाणां सर्वात्मगतानां सर्वेष्वात्मसु समवेतानामदृष्टानां वृत्तिनिरोधः शक्तिप्रतिबन्धः स्यात् । तस्मिन् सत्यनागतानां शरोरेन्द्रियमहाभूतानामनुत्पत्तिः । उत्पन्नानाश्व विनाशार्थं महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगेभ्यः कर्माणि जायन्ते। महेश्व रेच्छा सञ्जिहीर्षालक्षणा अण्विति परमाणुपरिग्रहः । महेश्वरस्येच्छा चात्माणु एवं दक्षिणायन उनकी रात है। इस प्रकार के ३६० अहोरात्रों से उनका एक वर्ष होता है। इस वर्ष से बारह हजार ( १२००० ) वर्षों का एक चतुर्युग होता है। एक हजार (१०००) चतुर्युग से ब्रह्मा का एक दिन होता है। उतने की ही एक रात होती है। इसी अहोरात्र से ३६० दिनों का एक वर्ष और इसी वर्ष से सो वर्षों की आयु ब्रह्मा की है।
इसी ब्राह्म मान से सौ वर्ष बीत जाने पर ब्रह्मा के अपवर्ग के समय में संसार में अनेक स्थानों में बार-बार शरीरादि धारण से खिन्न’ गभवासादि अनेक दुःखों से दुःखी जीवों को रात में विश्राम देने के लिए, अर्थात् कुछ समय तक उक्त दुःखों से उन्हें छुटकारा देने के लिए ‘सकलभुवनपति’ सभी स्थानों में अबाधित शक्तिवाले महेश्वर को ‘सञ्जिहीर्षा’ अर्थात् नाश करने की इच्छा होती है। उसी के समान काल में अर्थात् उसके बाद शरीर, इन्द्रिय और महाभूतों के ‘उपनिबन्धक’ अर्थात् उत्पादक सभी जीवों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अदृष्टों का ‘वृत्तिनिरोध’ अर्थात् कार्यों को उत्पन्न करने का सामर्थ्य प्रतिरुद्ध हो जाता है। सामर्थ्य के उक्त प्रतिरोध से भविष्यत् शरीर, इन्द्रिय और अन्य महाभूतों की उत्पत्ति रुक जाती है, एवं उत्पन्न शरीरादि के विनाश के लिए महेश्वर की इच्छा, आत्मा एवं अणुओं के संयोग इन सबों से क्रियाओं की उत्पत्ति होती है। महेश्वर की यह इच्छा ‘सज्जिद्दीष’ रूप है। कथित ‘अणु’
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१२५
प्रशस्त पादभाष्यम्
सति महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगजकर्म्मभ्यः शरीररेन्द्रिय कारणाणुविभागेभ्य स्तत्संयोगनिवृत्तौ तेषामापरमाण्वन्तो विनाशः । तथा पृथिव्युदकज्वलन कुण्ठित हो जाती है। उसके बाद महेश्वर की इच्छा, और आत्मा एवं परमाणुओं के संयोग से उत्पन्न क्रिया के द्वारा शरीर और इन्द्रिय के उत्पादक परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं। उन विभागों से (शरीर और इन्द्रिय के आरम्भक परमाणुओं के ) संयोगों का नाश होता है। फिर ( शरीरादि) कार्य द्रव्यों का परमाणु पर्यन्त विनाश हो जाता है। इसी प्रकार पृथिवी, जल, तेज और वायु इनमें आगे-आगे के रहते
न्यायकन्दली
संयोगाश्चेति विग्रह । तेभ्यो जातानि तेभ्यो महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगजकर्म्मभ्यः | शरीराणामिन्द्रियाणां ये पारम्पर्येण कारणभूता अणवस्तेषु विभागा भवन्ति । विभागेभ्यस्तेषामणूनां संयोगनिवृत्तिः । संयोगनिवृत्तौ सत्यां तेषामापरमाण्वन्तो विनाशः । तेषां शरीरेन्द्रियाणां द्वयणुकादिविनाशप्रक्रमेण तावद्विनाशो यावत्पर माणुरिति ।
प्रजानामकाण्डे संहरन्नयमकारुणिको यत्किश्चनकारी च स्यादिति
यत्केनचिदुक्तं तत्रेयं प्रतिक्रिया – प्राणिनां निशि विश्रामार्थमिति । यदप्येतदुक्तम् – “अनन्तानामात्मनामनन्तेष्वदृष्टेषु क्रमेण परिपच्यमानेषु केचिददृष्टक्षयाद् भोगादुपरमन्ते भुज्यन्ते च केचित् अपरे तु भोगाभिमुखा शब्द से परमाणु समझना चाहिए । ‘महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगेभ्यः’ इस समस्त वाक्य के विग्रह का यह स्वरूप है कि “महेश्वरस्येच्छा महेश्वरेच्छा, महेश्वरेच्छा चात्माणुसंयोगाश्च महेश्वरस्येच्छात्माणुसंयोगाः, तेभ्यो जातानि कर्माणि महेश्वरेच्छात्माणुसंयोग कम्मणि, तेभ्यो महेश्वरस्येच्छात्माणुसंयोगजकम्मभ्यः” अर्थात् महेश्वर की इच्छा एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन दोनों से उत्पन्न कर्मों के द्वारा शरीर और इन्द्रियों के कारण अणुओं में परस्पर विभाग उत्पन्न होते हैं। इन विभागों से परमाणुओ के (द्वयणुका रम्भक) संयोग का नाश होता है। संयोग के नाश से शरीर और इन्द्रिय का ‘आपरमाण्वन्त’ विनाश हो जाता है। अर्थात् शरीरादिनाश की यह क्रिया द्वथणुकनाश पर्यन्त चलती है।
प्रजा के इस अकारण विनाश से कोई-कोई परमेश्वर में अकरुणा और स्वेच्छाचार का दोष लगाते हैं, उन्हीं को समझाने के लिए प्राणिनां निशि विश्रामार्थम्’ यह वाक्य है। किसी की आपत्ति थी कि संहार का उक्त क्रम ठीक नहीं है क्योंकि जीव अनन्त है, प्रत्येक जीव में अदृष्ट भी अनन्त हैं। वे सभी अदृष्ट क्रमशः ही भोगों को उत्पन्न करेंगे । अतः कोई जीव अदृष्टनाश के कारण अगर भोग से निवृत्त होगा ( अथत्रा एक ही जीव एक अदृष्ट के भोग से निरस्त होगा ), कोई जीव ( अथवा वही जीव ) वर्तमान
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्त पादभाष्यम्
[ प्रध्ये सृष्टिसंहार
प्रशस्तपादभाष्यम्
पवनानामपि महाभूतानामनेनैव क्रमेणोत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् सति पूर्वस्य पूर्वस्य विनाशः । ततः प्रविभक्ताः परमाणवोऽवतिष्ठन्ते धर्म्माधर्म संस्कारानुविद्धा आत्मानस्तावन्तमेव कालम् ।
हुए पहिले पहिले का विनाश होता है। उसके बाद उतने ही समय तक ( ब्राह्म मान से सौ वर्ष पर्यन्त ) अपने में परस्पर असम्बद्ध परमाणु एवं धर्म, अधर्म और संस्कार से युक्त जीव ही रह जाते हैं ।
न्यायकन्दली
इत्येवं सर्वत्र विषयप्रवृत्तौ न शरीरादीनां युगपदभावी घटते” इति, तदनेन परा हतम् अदृष्टानां वृत्तिप्रतिबन्ध इति ब्रह्मणोऽपवर्गकाले निशीत्युक्तम् । तत्र सर्वप्राणिनां प्रबोधप्रत्यस्तमयसाधर्म्येणोपचारात्। महाभूतानामप्येवं विनाश इत्याह — तथेति । यथा शरीरेन्द्रियाणामापरमाण्वन्तो विनाशस्तथा महाभूताना मप्यनेनैव क्रमेणेति । परमाणुक्रिया विभागादिक्रमेणोत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् सति पूर्वस्य पूर्वस्य धिनाश इति । जले तिष्ठति पूर्वं पृथिव्या विनाशः, तेजसि तिष्ठति जलस्य, वायौ तिष्ठति तेजस इत्यर्थः । ततः प्रविभक्ताः परमाणवोऽवतिष्ठन्ते धर्म्माधर्म्मभावनाख्यसंस्काररनुविद्धा उपगृहीताश्चात्मानस्तावन्तमेव कालं फल के प्रति उन्मुख अदृष्ट से भोग करता ही रहेगा, अथवा किसी अदृष्ट में आगे फल देने की उन्मुखता ही उत्पन्न होगी। इा प्रकार के सभी कालों के विषयों में प्रवृत्त रहने के कारण शरीरादि सभी विषयों का विनाश एक काल में नहीं हो सकता, किन्तु ‘अदृष्टानां वृत्तिप्रतिबन्धे’ इस वाक्य से उक्त आपत्ति का समाधान हो जाता है, क्योंकि ईश्वर की संहारेच्छा से सभी अदृष्टों की कायंजननशक्ति एक ही समय में कुण्ठित हो जाएगी। ‘निशि’ शब्द से लक्षणावृत्ति के द्वारा ब्रह्मा के मोक्ष का काल कहा गया है। जैसे कि रात में सोने पर प्राणियों के जाग्रत अवस्था के सभी सुखदुःखादि नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह उस समय भी जीवों के सभी सुख दुःखादि नष्ट हो जाते हैं, यही सादृश्य इस लक्षणावृत्ति का मूल है। शरीरों और इन्द्रियों की तरह और भी सभी भूत नष्ट होते हैं, यही ‘तथा’ इत्यादि पङ्क्ति से कहते हैं । अर्थात् जैसे शरीरों और इन्द्रियों का परमाणुपर्यन्त विनाश होता है, उसी प्रकार और उसी क्रम से अन्य महाभूतों का भी विनाश होता है। पहिले परमाणुओं में किया, फिर उनमें परस्पर विभाग इत्यादि कथित क्रम से पूर्व पूर्व का विनाश होता है, अर्थात् जल के रहते हुए पृथिवी का विनाश, एवं तेज के रहते हुए जल का विनाश और वायु के रहते हुए तेज का विनाश होता है। इसके बाद परस्पर असम्बद्ध परमाणु एवं धर्म, अधर्म भावनाख्य संस्कार इन तीन गुणों से युक्त जीव ये ही ‘उतने समय तक’ अर्थात् ब्रह्मा के
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहित म्
१२७
प्रशस्तपादभाष्यम्
ततः
प्राणिनां
भोगभूतये महेश्वर सिसृक्षानन्तरं
पुनः
सर्वात्मगतवृत्तिलब्धादृष्टापेक्षेभ्यस्तत्संयोगेभ्य:
परस्परसंयोगेभ्यो
पवनपरमाणुषु
कम्मोत्पत्तौ तेषां
द्वयणुका दि
फिर जीवों के भोग सम्पादन के लिए महेश्वर को सृष्टि करने की इच्छा उत्पन्न होती है। तब सभी आत्माओं के अदृष्ट की कुण्ठित शक्ति कार्यों के उत्पा दन के लिए फिर से उन्मुख हो जाती है। कार्य में उन्मुख अदृष्ट एवं आत्मा और पर माणुओं के संयोग से वायु के परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती है। फिर क्रिया से के
न्यायकन्दली
ब्रह्मणो वर्षशतमेवावतिष्ठन्ते । दिगादयोऽपि तिष्ठन्ति नित्यत्वात् । किन्त्वा त्मनामदृष्टवशात् परमाणव: पुनर्नारप्स्यन्त इति । प्राधान्याददृष्टवशादात्म परमाण्ववस्थानसंकीर्त्तनम् ।
एवं संहारक्रमं प्रतिपाद्य सृष्टिक्रमं प्रतिपादयन्नाह – ततः पुनरिति । यद्यपि तदा आत्मनां प्राणसम्बन्धो नास्ति, तथापि प्राणिन इत्युक्तं योग्यत्वात् । तेषां भोगभूतये सुखदुःखानुभवोत्पत्तये महेश्वरस्य सिसृक्षा सर्जनेच्छा जायते । तदनन्तरं सर्वेष्वात्मसु गता अदृष्टा वृत्ति लभन्ते । यद्यपि युगपदुत्पद्य मानासंख्येयकार्योत्पत्तौ व्याप्रियमाणा दिगादिवन्नित्यत्वादेकैवेश्वरेच्छा क्रिया शक्तिरूपा, तथाप्येषा तत्तत्कालविशेषसहकारिप्राप्ती कदाचित् संहारार्या भवति, सौ वर्षों तक रहते हैं। यद्यपि दिगादि पदार्थ भी नित्य होने के कारण उस समय रहते ही हैं, तथापि जीवों के अदृष्ट (की अक्षमता) से ही परमाणु अपने काम को नहीं करते। अतः प्रधान होने के कारण अरष्टों से युक्त जीव और परमाणुओं की अवस्थिति का ही वर्णन किया है।
इस प्रकार संहारक्रम का प्रतिपादन करने के लिए ‘ततः पुनः’ इत्यादि लिखते हैं। यद्यपि उस समय के जीवों में प्राण का सम्बन्ध नहीं है, तथापि प्राणसम्बन्ध की योग्यता के कारण ‘प्राणिनः’ पद का प्रयोग किया है। प्राणियों की ‘भोगभूति’ अर्थात् सुख और दुःख के अनुभव के लिए महेश्वर की ‘सिसृक्षा’ अर्थात् सृष्टि करने की इच्छा होती हैं। इसके बाद जीवों के सभी अदृष्टों में कार्यों को उत्पन्न करने की क्षमता आ जाती है । यद्यपि ईश्वर की असंख्य कार्यों की उत्पत्ति में व्याप्त इच्छा उनकी क्रियाशक्ति का रूप है, एवं दिगादि पदार्थों की तरह नित्य होने के कारण एक ही है, फिर भी तत्तत्काल रूप सहकारी को पाकर वही कभी संहार का कारण होती है और कभी सृष्टि का कारण होती है। जब वह सृष्टि का कारण होती है, तब जीवों
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्त पादभाष्यम्
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
प्रशस्तपादमाष्यम्
प्रक्रमेण महान् वायुः समुत्पन्नो नभसि दोधूयमान स्तिष्ठति । तदनन्तरं तस्मिन्नेव वायावाप्येभ्यः परमाणुभ्यस्तेनैव क्रमेण महान् सलिलनिधि उत्पन्न परमाणुओं के संयोगों के द्वारा द्वयणुकादि क्रम से महान् वायु उत्पन्न होकर आकाश में अत्यन्त वेग से युक्त होकर रहता है। उसके बाद उसी क्रम से उसी वायु में जलीय परमाणुओं से उत्पन्न महान् जलराशि सर्वत्र प्लावित होकर रहता है।
न्यायकन्दली
कदाचित् सृष्टचर्या भवति । यदा संहारार्था तदा तदनुरोधाददृष्टानां वृत्तिनिरोध औदासीन्यलक्षणो जायते यदा त्वसौ सृष्टघर्था भवेत् तदा वृत्तिलाभः स्वकार्य्य जननं प्रति व्यापारो भवति । वृत्तिर्लब्धा यैस्ते वृत्तिलब्धा इति । आहि ताग्न्यादित्वान्निष्ठायाः पूर्वनिपात: दन्तजात इति यथा । सर्वात्मगताश्च वृत्तिलब्धाश्चादृष्टाश्च तानपेक्षन्ते ये तत्संयोगा आत्माणुसंयोगास्तेभ्य: पवन परमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । पवनपरमाणवः समवायिकारणम् । लब्धव त्य दृष्टवदात्मपरमाणुसंयोगोऽसमवायिकारणम् । अवृष्टं निमित्तकारणम् । एवं कम्मत्पत्तौ तेषां पवनपरमाणूनां परस्परसंयोगा जायन्ते । तत्संयोगेभ्यश्च द्वघणुकान्युत्पद्यन्ते । तदनु त्र्यणुकानीत्यनेन क्रमेण महान् वायुः समुत्पद्यमानो नभसि आकाशे दोधूयमानः क्वचिदप्रतिहतत्वाद् वेगातिशययुक्तस्तिष्ठति ।
के अदृष्ट कार्यक्षम हो जाते हैं और अपने-अपने कार्यों के प्रति व्यापारशील हो जाते हैं। जब ईश्वर की इच्छा संहार का कारण होती है, तब अदृष्टों में कार्यों के प्रति उदासी नता रूप ‘वृत्तिनिरोध’ हो जाता है। ‘वृत्तिलंब्धा यैस्ते वृत्तिलब्धाः’ इसी आशय का समास ‘वृत्तिलब्ध’ पद में है। यद्यपि निष्ठाप्रत्ययान्त ‘लब्ध’ शब्द का प्रयोग पहिले चाहिए, किन्तु आहिताग्निगण 我 पठित शब्द के साथ समस्त निष्ठाप्रत्ययान्तपद का पूर्वप्रयोग विकल्प से होता है, जैसे कि ‘दन्तजातः’ इत्यादि स्थलों में, तदनुसार ही ‘वृत्तिलब्ध’ का प्रयोग भी है । ‘सर्वात्मगतवृत्तिलब्धादृष्टापेक्षेभ्य: इस समस्त महावाक्य का विग्रहवाक्य यों है कि ‘सर्वात्मगताश्च वृत्तिलब्धाश्च, अदृष्टाश्च तान पेक्षन्ते ये, तत्संयोगास्तेभ्य: । ‘तत्संयोग’ अर्थात् आत्मा और अणुओं का संयोग इन संयोगों से वायवीय परमाणुओं में किया उत्पन्न होती है। इस क्रिया के समवायिकारण हैं वायु के परमाणु असमवाधिकारण हैं वृत्तिलब्ध अदृष्ट से युक्त आत्मा और परमाणुओं का संयोग, एवं अदृष्ट निमित्तकारण है। इस प्रकार परमाणुओं में किया की उत्पत्ति हो जाने पर इन वायवीय परमाणुओं में फिर संयोगों की उत्पत्ति होती हैं। इन संयोगों से द्वथणुकों की उत्पत्ति होती है, उसके बाद त्र्यसरेणु की। इस क्रम से महान वायु उत्पन्न
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१२९
प्रशस्तपाद भाष्यम्
रुत्पन्न: पोप्लूयमानस्तिष्ठति । तदनन्तरं तस्मिन्नेव पार्थिवेभ्यः परमाणु स्यो महापृथिवी संहतावतिष्ठते । तदनन्तरं तस्मिन्नेव महोदधौ तैज सेभ्योऽणुभ्यो ढ्यणुकादिप्रक्रमेणोत्पन्नो महाँस्तेजोराशि: केनचिदनभि भूतत्वाद्देदीप्यमानस्तिष्ठति ।
एवं समृत्पन्नेषु चतुर्षु महाभूतेषु महेश्वरस्याभिध्यान तैजसेभ्योऽणुभ्यः पार्थिव परमाणुसहितेभ्यो महदण्ड मात्रात् इसके बाद इसी जलनिधि में उसी क्रम से पार्थिव परमाणुओं के द्वारा कठिन स्वभाव का पार्थिव द्रव्य उत्पन्न होकर रहता है। एवं उसी जलनिधि में तैजस परमाणुओं से महान् तेज उत्पन्न होकर किसी से प्रतिहत न होने के कारण अत्यन्त दीप्ति से युक्त होकर विद्यमान होता है।
इस प्रकार चारों महाभूतों के उत्पन्न होने पर केवल महेश्वर के संकल्प से ही पार्थिव परमाणुओं की सहायता से तंजस परमाणुओं से महान् (हिरण्मय)
न्यायकन्दली
तदनन्तरं तस्मिन्नेव वायावाप्येभ्यः परमाणुभ्य:, तेनैव क्रमेण द्वयणुकादि क्रमेण, महान् सलिलनिधिरुत्पन्नः पोप्लूयमानः प्रतिरोधकाभावात् सर्वत्र प्लवमानस्तिष्ठति । तदनन्तरं जलनिधेरुत्पत्त्यनन्तरम्, तस्मिन्नेव जलधौ पार्थिवेभ्यः परमाणुभ्यो महापृथिवी संहता स्थिरस्वभावावतिष्ठते । तद नन्तरं तस्मिन्नेव महोदधौ तैजसेभ्योऽणुभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेणात्पन्नो महाँ स्तेजोराशिः केनचिदनभिभूतत्वाद्देदीप्यमानस्तिष्ठति । यद्यपि पयःपावकयोः स्वाभाविको विरोधस्तथाप्यदृष्टव शेनाधाराधेयभावो नानुपपन्नः ।
होकर किसी से बाधित न होने के कारण अत्यन्त वेग से युक्त होकर रहता है। उसी महान् वायु में जलीय परमाणुओं से ‘उसी क्रम से अर्थात् द्वघणुकादि क्रम से जल का महान निधि उत्पन्न होकर किसी से प्रतिरुद्ध न होने के कारण सर्वत्र प्लावित रहता है। तदनन्तर अर्थात् इस जलनिधि के उत्पन्न होने पर जल के उसी समुद्र में पार्थिव परमाणुओं से कठिन स्वभाव की महापृथिवी उत्पन्न होकर स्थित रहती है। तदनन्तर उसी जलनिधि में तैजस परमाणुओं से द्वयणुकादि क्रम से महान् तेज का समूह किसी से अभिभूत न होने के कारण अतिशय दीप्ति से युक्त होकर विद्यमान रहता है। यद्यपि जल और तेज इन दोनों में स्वभावतः विरोध है, तथापि जीवों के अदृष्ट से उनमें भी आधाराधेयभाव होता है।
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
प्रशस्तपादभाष्यम्
मारभ्यते । तस्मिश्चतुर्वदनकमलं सर्वलोकपितामहं ब्रह्माणं सकलभुवन सहितमुत्पाद्य प्रजासर्गे विनियुङ्क्ते । स च महेश्वरेण विनियुक्तो ब्रह्मा तिशय ज्ञान वैराग्यैश्वय्यं सम्पन्न : प्राणिनां कम्मविपाकं विदित्वा कर्म्मा पिण्ड की उत्पत्ति होती है। उसी तैजस पिण्ड में ( महेश्वर ) कमल के सदृश चार मुँहवाले ब्रह्मा को उत्पन्न कर प्रजा की सृष्टि के लिए नियुक्त करते हैं। विलक्षण ज्ञान, उत्कट वैराग्य और अभूतपूर्व ऐश्वर्य से सम्पन्न, एवं परमेश्वर के द्वारा नियुक्त वह ब्रह्मा प्राणियों के कर्म की परिणति समझकर कर्मों के अनुरूप ज्ञान, भोग,
न्यायकन्दली
एवम् अनन्तरोषतेन प्रक्रमेणोत्पन्नेषु महाभूतेषु महेश्वरस्य अभिध्यानमात्रात् सङ्कल्पमात्रात्, तैजसेभ्य: परमाणुभ्य: पार्थिवपरमाणुसहितेभ्यो महदण्डं महद् बिम्बमारम्यते । बिम्बारम्भे पार्थिवा अयवया उपष्टम्भकाः तेनेदं वह्नि पुञ्जप्रायं नाभूत् । तस्मिन्नण्डे चत्वारि वदनकमलानि यस्य तं ब्रह्माणं सर्वलोकपितामहं सर्वेषामेव लोकानामाद्यं पुरुषं समस्तैर्भुवनः सहोत्पाद्य प्रजानां सर्गे जनने विनियुङ्क्ते त्वमिदं कुविति । स च महेश्वरेण विनि युक्तो ब्रह्मातिशयज्ञानवैराग्यैश्वर्य्य सम्पन्नो ज्ञानञ्च वैराग्यञ्चैश्वर्य्यञ्च ज्ञानवैराग्यैश्वर्थ्यांणि अतिशयेन ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि तैः सम्पन्न उपचितो ज्ञानातिशयात् प्राणिनां धर्माधिम्म यथावत् प्रत्येति । वैराग्यान्न पक्षपातेन
‘एवम्’ अर्थात् द्वषणुकादि क्रम से महाभूतों के उत्पन्न हो जानेपर महेश्वर के ‘अभिध्यान’ अर्थात् केवल संकल्प से ही पार्थिव परमाणुओं से सहारा पाये तैजस परमाणुओं से महदण्ड’ अर्थात् महान् पिण्ड की उत्पत्ति होती हुए है। इस पिण्ड (बिम्ब ) की उत्पत्ति में चूँकि पार्थिव परमाणुओं का विशेष सम्बन्ध ह अतः यह पिण्ड ( तैजस होनेपर भी ) वह्निपुञ्ज सहश नहीं होता है । उसी पिण्ड में कमल के समान चार मुखवाले ‘सर्वलोकपितामह’ अर्थात् सभी पुरुषों के आदि पुरुष ब्रह्मा को सकल भुवनों के साथ उत्पन्न कर जाओं को उत्पन्न करने के लिए नियुक्त करते हैं। कि तुम यह काम करो । महेश्वर के द्वारा सृष्टिकार्य के लिए नियुक्त वह ब्रह्मा ‘अतिशय ज्ञानवैराग्यैश्वर्य सम्पन्न:’ अर्थात् “ज्ञानञ्च वैराग्यञ्च, ऐश्वर्य ज्ञानवैराग्यैश्वर्याण, अतिशयेन ज्ञानवैश: ग्वैश्वर्थ्याणि, तैः सम्पन्नः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का अर्थ है कि वह ब्रह्मा उत्तम ज्ञान, उत्कट वैराग्य और अमित ऐश्वर्य से युक्त हैं। अपने उत्तम ज्ञान के बल से वह प्राणियों के धर्म और अधमं को ठीक से समझते हैं। उत्कट वैराग्य के प्रभाव से उनकी प्रवृत्ति पक्षपात से दूषित नहीं होती है। अपने अमित
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१३१
प्रशस्तपादभाष्यम्
नुरूपज्ञानभोगायुषः सुतान् प्रजापतीन् मानसान् मनुदेवर्षिपितृगणान् मुखचाहूरुपातश्चतुरो वर्णानन्यानि चोच्चावचानि भूतानि च सृष्ट्वा शयानुरूपैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यैः संयोजयतीति ।
और आयु से युक्त ‘सुत’ अर्थात् प्रजापतियों की एवं ‘मानस’ अर्थात् मनु, देवर्षि और पितृगणों की सृष्टि करते हैं। एवं अपने मुँह से ब्राह्मणों को, बाहु से क्षत्रियों को, जङ्घा से वैश्यों को और पैर से शूद्रों को उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार और भी छोटे बड़े अनेक प्राणियों को उत्पन्न करके सभी को कर्मों के अनुरूप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य के साथ सम्बद्ध करते हैं ।
न्यायकन्दली
प्रवर्त्तते, ऐश्वर्थ्यात् कर्म्मफलं भोजयति । प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वेति । विविधेन प्रकारेण पाको विपाकः, कर्म्मणां विपाक: कर्म्मविपाकः, तं विदि त्वा एतावदस्य कर्म्मफलं भविष्यतीति ज्ञात्वा कर्म्मानुरूपाणि ज्ञानभोगायूंषि तान् सुतान् प्रजापतीन् दक्षादीन् मानसान् मनः सङ्कल्पप्रभवान् मनु देवर्षिपितृगणान् मनून्, देवान्, ऋषीन्, पितृगणान् मुखबाहूरुपादतश्चतुरो वर्णान् मुखाद् ब्राह्मणान्, बाहुभ्यां क्षत्रियान्, ऊरुभ्यां वैश्यान्, पद्भ्यां शूद्रान्, अन्यानि चोच्चावचानि क्षुद्रक्षुद्रतराणि च भूतानि सृष्ट्वा, आशयानुरूपैः आशेते फलोपभोगकालं यावदात्मन्यवतिष्ठत इत्याशयः कर्म्म, तदनुरूपैर्धर्म्मज्ञान वैराग्यश्वय्यँः, संयोजयति यस्य यथाविधं कर्म्म तत्तदनुरूपेण ज्ञानादिना सम्यग् योजयति, मात्रयाऽप्यन्यथा न करोतीत्यर्थः ।
के बल से वह प्राणियों के कर्म का भोग सम्पन्न कर सकते हैं । ‘प्राणिनां कमविपाकं विदित्वा’, विविधेन प्रकारेण पाको विपाकः’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनेक प्रकार की परिणति ‘विपाक’ शब्द का अर्थ है। ‘कर्म्मणां विपाक: कर्म्मविपाकः’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार कर्मों की विविध परिणति ही ‘कर्मविपाक’ शब्द का अर्थ है । अतः कर्मविपाक को समझकर अर्थात् ‘इस जीव के कर्मों का फल इतना होगा’ यह समझकर ‘कर्मानुरूपज्ञानभोगायुषः’ अर्थात् कर्म के अनुरूप ज्ञान, भोग और आयु से युक्त दक्षप्रजापति प्रभृति पुत्रों को, मन मात्र से उत्पन्न अत एव मानस पुत्र रूप मनुओं, देवताओं, ऋषियों और पितरों को उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार मुख, बाहु, जङ्घा, एवं चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्ध इन चारों वर्णों को एवं और भी छोटे बड़े जीवों को उत्पन्न करते हैं। ‘आशयानुरूपैः’ अर्थात् ‘आरोते फलोपभोगकालं यावदात्मन्यवतिष्ठित इत्याशय: इस व्युत्पत्ति के अनुसार फलों के उप भोग पर्यन्त जो आत्मा रहे उसे ‘आशय’ कहते हैं। फलतः कर्म ( अदृष्ट ) ही ‘आशप’
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्त पादभाष्यम्
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
न्यायकन्दली
यत् खल केचिदेव माचचक्षिरे- प्रेक्षावत्प्रवृत्तिरिष्टार्थाधिगमा स्यादनिष्टपरिहारार्था वा न चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारावीश्वरे समस्तावाप्तकामे सम्भवतः, तेनास्य जगन्निर्माण प्रवृत्तिरनुपपन्ना। तत्रोत्तरम् — प्राणिनां भोगभूतय इति । परार्था सिसृक्षायां प्रवृत्तिर्न स्वार्थनिबन्धनेत्यभिप्रायः । नन्वेवं तर्हि सुखमयोमेव सृष्टि कुर्य्यान्न दुःखशबलां करुणाप्रवृत्तत्वादित्यत्रैष परिहार:–प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वेति । परार्थं प्रवृत्तोऽपि न सुखमयीमेव करोति, विचित्रकर्माशयसहायस्य कर्तृत्वादित्यर्थः । न चैवं सति करुणाविरोधः, दुःखोत्पादस्य वैराग्यजननद्वारेण परमपुरुषार्थहेतुत्वात् । यदि धर्म्माधर्म्माविपेक्ष्य करोति नास्य स्वाधीनं कर्त्तृत्वमित्यनीश्वरतादोष इत्यस्यायं प्रतिसमाधि :– आशयानुरूपैर्धर्म्मज्ञानवैराग्यैश्वयँ संयोजयति । स हि सर्वप्राणिनां
शब्द का अर्थ है। उसके अनुरूप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वयं से जीवों को सम्बद्ध
करते हैं। अर्थात् जिस जीव का अदृष्ट जिस प्रकार का है उसी के अनुरूप धर्म,
ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वयं इन चारों वस्तुओं से जीवों को उचित रीति से सम्बद्ध करते
हैं, इसमें थोड़ा सा भी इधर उधर नहीं करते ।
इस प्रसङ्ग में किसी की आपत्ति है कि ( १ ) इष्ट वस्तुओं की प्राप्ति एवं ( २ ) अनिष्ट वस्तुओं के परिहार इन दो भेदों से प्रवृत्ति दो ही प्रकार की है। महेश्वर को सभी वस्तुयें बराबर प्राप्त ही हैं। उनका अनिष्ट तो कोई है ही नहीं, अतः कारण की अनुपपत्ति से संसार रचना की उनकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती। इसी आपत्ति का समाधान ‘प्राणिनां भोगभूतये’ इस वाक्य से दिया है। अमिप्राय यह है कि सृष्टि कार्य में महेश्वर की प्रवृत्ति अपने लिए नहीं है ( उक्त कार्यकारणभाव स्वार्थमूलक प्रवृत्ति का है ) । ( इस पर यह आक्षेप हो सकता है कि ) तो फिर वे सुखमयी सृष्टि की ही रचना करते, दुःखबहुल सृष्टि की नहीं, क्योंकि वे करुणा से ही इसमें प्रवृत्त होते हैं। इसी आक्षेप का परिहार प्राणिनां कम्र्म्मविपाकं विदित्वा’ इस वाक्य से किया गया है। कहने का तात्पर्य है कि दूसरों के लिए प्रवृत्त होनेपर भी केवल सुखमयी सृष्टि नहीं कर सकते, क्योंकि सुख और दुःख दोनों के जनक ‘विचित्र’ कर्माशय के साहाय्य से ही उनमें सृष्टि का कर्तृत्व है। ऐसा होनेपर भी उनकी स्वाभाविक करुणा में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि वैराग्य के उत्पादन के द्वारा दुःखों का उत्पादन भी परम पुरुषार्थ ( मोक्ष ) का साधन है। अगर सृष्टिकार्य के लिए उन्हें भी जीवों के धर्म और अधर्म की अपेक्षा है तो फिर कहना पड़ेगा कि उनमें सृष्टि कार्य के प्रति स्वातन्त्र्य रूप कर्तृत्व नहीं है, फिर उनमें अनीश्वरत्व का दोष अनिवार्य है। इसी आक्षेप का समाधान ‘आशया नुरूपैधंमंज्ञान वैराग्यैश्वयँः संयोजयति’ इस वाक्य से किया है। अभिप्राय है कि
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१३३
न्यायकन्दली
कर्म्मानुरूपं फलं प्रयच्छन् कथमनीश्वरः स्यादिति भावः । नहि योग्यतानु रूप्येण भृत्यानां फल विशेषप्रदः प्रभुरप्रभुर्भवति ।
कल्पाद वुत्पन्नानां प्राणिनां सर्वशब्दार्थोष्वव्युत्पन्नानां सङ्केतस्या शक्यकरणत्वाच्छाब्दव्यवहारानुपपत्तिरिति चोदनायां प्रत्यवस्थानबीजमिदम् मानसानिति । योनिजशरीरो हि महता गर्भवासादिदुःखप्रबन्धेन विलुप्त संस्कारो जन्मान्तरानुभूतस्य सर्वस्य मनवस्तु मानसा न स्मरति । ऋषय: प्रजापतयो अयोनिजशरीर विशिष्टादृष्टसम्बन्धिनो दृष्टसंस्काराः कल्पान्तरानुभूतं सर्वमेव शब्दार्थव्यवहारं सुप्तप्रतिबुद्धवत् प्रतिसन्दधते, प्रति सन्दधानाश्च परस्परं बहवो व्यवहरन्ति । तेषां व्यवहारात् तत्कालवत्तिनां प्राणिनां व्युत्पत्तिः, तद्व्यवहाराच्चान्येषाभित्युपपद्यते व्यवहारपरम्परया शब्दार्थ व्युत्पत्तिरित्यर्थः ।
कि पुनरीश्वरसद्भावे प्रमाणम् ? आगमस्ता वदनुमानञ्च | महा भूतचतुष्टयमुपलब्धिमत्पूर्वकं कार्य्यत्वाद् यत्कार्थ्यं तदुपलब्धिमत्पूर्वकं यथा घट: कार्यन्व महाभूतचतुष्टयं तस्मादेतदप्युपलब्धिमत्पूर्वकम् । प्रमाणेन सभी जीयों को अपने कर्म के अनुसार फल देते हुए भी वह ‘अनीश्वर? क्यों होंगे ? क्योंकि योग्यता के अनुसार अपने भृत्यों को फल देते हुए भी स्वामी अप्रभु नहीं होते।
सृष्टि के आदि में उत्पन्न जीव शब्द और अर्थ के व्यवहार से अनभिज्ञ रहते हैं, अतः सृष्टि के आदि में सङ्केत के द्वारा शब्द से होनेवाले व्यवहारों की उपपत्ति नहीं होगी। इसी का समाधान मानसान इस पद में है। अभिप्राय यह है कि योनिज शरीर के जीवों के संस्कार गर्भासादिजनित बहुत बड़े दुःखों के भोगने के कारण विलुप्त हो जाते हैं, अतः उन जीवों को दूसरे जन्म में अनुभूत सभी बातों का स्मरण नहीं रहता है। ऋषि प्रजापति और मनु चूकि मानस हैं (योनिज नहीं), अतः योनिज शरीरवालों से उनका अदृष्ट विलक्षण है। एव उनके सभी संस्कार उद्बुद्ध रहते हैं। वे सोकर उठे हुए व्यक्तियों की तरह दूसरे जन्मों में किये गये शब्द और अर्थों के व्यवहारों को स्मरण कर इस जन्म में भी शब्द और अर्थ का व्यवहार करते हैं । उनके व्यवहार से ही और सभी जीव शब्द और अर्थ के सङ्केत को ग्रहण करते हैं। उन जीवों के व्यवहार से फिर अन्य जीव भी शब्दार्थ-व्यवहार को ग्रहण करते हैं। व्यवहार की इस परम्परा से शब्द और अर्थ के सङ्केत का ग्रहण होता है ।
( प्र ० ) ईश्वर को सत्ता में प्रमाण ही क्या है ? ( उ०) शब्द और अनुमान दोनों ही । (अनुमान इस प्रकार है कि ) पृथिवी प्रभृति चारों महाभूत किसी ज्ञानी कर्ता के द्वारा उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे कार्य हैं। कार्य अवश्य ही किसी ज्ञानी कर्ता
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न्यायकन्दली संबलित प्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
पूर्वकोटचनुपलब्धेरसिद्धं पृथिव्यादिषु कार्य्यत्वमिति चेत् ? तदयुक्तम्, साव यवत्वात् यत् सावयवं तत् कार्य्यं यथा घटः, सावयवश्व पृथिव्यादि, तस्मादेत. दपि कार्य्यमेव । ननु व्याप्तिग्रहणादनुमानप्रवृत्तिः, कार्य्यत्वबुद्धिमत्पूर्वकत्व योश्च व्याप्तिग्रहण मशक्यम्, घटादिषु कत्तू प्रतीतिकाले एवाङ्कुरादिषूत्पद्यमानेषु तदभाव प्रतीतेः । न चाङ्कुरत्वादीनामपि पक्षत्वमिति न्याय्यम्, गृहीतायां व्याप्ता वनुमानप्रवृत्तिकाले प्रतिवाद्यपेक्षया पक्षादिप्रविभागः, इह तु सर्वदेव प्रतिपक्ष प्रतीत्याक्रान्तत्वाद् व्याप्तिग्रहणमेव न सिद्धयतीत्युक्तम् । अत्र प्रतिविधीयते यदि चैवं द्वैतानुपलम्भाद् व्याप्तिग्रहणाभाव:, तदानीं मोमांसाभाष्यकृदभिमतं सामान्यतो दृष्टमादित्य गत्यनुमानमपि न सिद्धघति, तत्रापि देवदत्तगतिपूर्वकदेशा न्तरप्राप्तिग्रहणकाल एवं नक्षत्रादिषु देशान्तरप्राप्तिमात्रोपलम्भात् । अथ तेषु द्वारा उत्पन्न होते हैं, जैसे कि घटादि पृथिव्यादि चारों भूत भी कार्य हैं अतः वे सभी भी अवश्य ही ज्ञानी कर्ता के द्वारा उत्पन्न हैं । ( प्र०) किसी भी प्रमाण से ‘पूर्वकोटि’ अर्थात् पक्षघमंता का ज्ञान ( अर्थात् पृथिव्यादि चारों महाभूतरूप पक्ष में कार्यत्व रूप हेतु का निश्चयात्मक ज्ञान) नहीं है, उक्त पक्ष में कार्यत्व हेतु सिद्ध नहीं ( होने के कारण कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध ) है । ( उ० ) प्रकृत में कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध नहीं है, क्योंकि पक्ष रूप चारों महाभूतों के सावयव होने के कारण उक्त सावयवत्व हेतु से उनमें कार्यत्व हेतु सिद्ध है, क्योंकि जितने भी सावयव हैं वे सभी कार्य हैं जैसे घटादि । पृथिव्यादि चारो महाभूत भी सावयव हैं, अतः वे भी अवश्य ही कार्य हैं । ( प्र०) व्याप्तिज्ञान से ही अनुमान की प्रवृत्ति होती है, किन्तु उपलब्धिमत्कर्तृ जन्यत्वरूप प्रकृत साध्य की व्याप्ति का ज्ञान कार्यस्वरूप हेतु में सम्भव नहीं है, क्योंकि घटादि में उक्त साध्य और हेतु के दोनों की प्रतीति-काल में हो अङ्कुरादि में उक्त साध्य के अभाव के साथ कार्यत्व हेतु के सामानाधिकरण्य की भी अबाधित प्रतीति होती हैं। (उ०) अङ्कुर तो पक्ष के अन्तर्गत है ? ( 20 ) इस कथन कोई सार नहीं है, क्योंकि व्याप्ति के ज्ञात हो जाने के बाद अनुमान की प्रवृत्ति होती है। उस प्रवृत्तिकाल में प्रतिवादी को आकाङ्क्षा के अनुसार पक्ष-साध्यादि विभाग प्रवृत्त होते हैं। यहाँ तो हेतु में साध्याभाव के सामानाधिकरण्य के ज्ञान से व्याप्ति का ज्ञान ही असम्भव है । ( उ० ) इसके समाधान में कहना है कि अगर इस प्रकार हेतु और साध्य के सामानाधिकरण्य की अनुपलब्धि से व्याप्ति का ज्ञान न हो तो मोमांसाभाष्यकार का अभिमत सामान्यतोदृष्ट अनुमान का सूर्य की गतिवाला उदाहरण ही असङ्गत हो जाएगा, क्योंकि जिस समय यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ‘देवदत्त का दूसरे देश के १. अर्थात् नहि पक्षे पक्षसमे वा व्यभिचारो दोषाधायकः’ इस न्याय से पक्षा न्तर्गत अङ्कुर में व्यभिचार का उद्भावन अनुमिति का प्रतिरोध नहीं कर सकता ।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
न्यायकन्दली
१३५
देशविप्रकर्षेणापि गतेरनुपलब्धौ सम्भवन्त्यां न तथा व्याप्तिग्रहणहेतोनिरुपाधि प्रवृत्तस्य भूयोदर्शनस्य प्रतिरोधः, तुल्यकक्ष्यत्वाभावात् । एवञ्चेत्, अत्राशरीर त्वेनाभ्युपेतस्य कर्तु: स्वरूपविप्रकर्षेणाप्यङ्कुरादिष्वनुपलम्भसम्भवान्न तेन निरुपाधिप्रवृत्तस्य भूयोदर्शनस्य सामर्थ्यमुपहन्यत इति समानम् अपि च भोः ! किमनुमानेन कत्तु मात्रं साध्यते ? पृथिव्यादिनिर्माणसमर्थो वा ? कत्तू मात्र साधने तावदभिप्रेतासिद्धिः, नह्यस्मदादिसदृश: कर्त्ताऽभिप्रेतो भवताम्, न च तेनेदं पृथिव्यादिकार्य्यमर्वाग्दृशा शक्यनिर्माणम्, पृथिव्यादिनिर्माणसमर्थस्तु कर्त्ता न सिद्धयत्यनन्वयात्, अन्वयबलेन हि दृष्टान्तदृष्टकत्तु सदृशः सिद्धयतीति । नायं प्रसङ्गः, कर्त्तृ विशेषस्याप्रसाधनात्, व्याप्तिसामर्थ्याद् बुद्धिमत्पूर्वकत्वे सामान्ये साथ सम्बन्ध गति से उत्पन्न होता हैं, उसी समय नक्षत्रों में केवल दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध का ही ज्ञान होता है। इसके लिए अगर यह उत्तर दिया जा सकता है कि नक्षत्र चूँकि बहुत दूर है, अतः उनमें दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध का ज्ञान होने पर भी गति का ज्ञान नहीं होता है। यहाँ गति की अनुपलब्धि से व्याज्ञान के कारण रूप उपाधि से शून्य ( गति और देशान्तरसञ्चार ) के भूयोदर्शन का प्रतिरोध नहीं हो सकता, क्योंकि (प्रकृत गति की अनुपलब्धि और प्रकृत भूयोदर्शन ) दोनों समान कक्षा के नहीं हैं । ( उ० ) तो फिर प्रस्तुत विषय में भी कहा जा सकता है कि जिस कार्य का कर्ता शरीरी पुरुष होता है, उस कर्ता के शरीर में प्रत्यक्ष की योग्यता रहने के कारण उसके कार्यों में भी कर्तृ जन्यत्व की प्रतीति होती है, किन्तु प्रस्तुत महा भूतादि की सृष्टि के कर्ता महेश्वर को तो शरीर नहीं है, अतः ईश्वररूप कतृ जन्य अङ्कुरादि कार्यों में कर्तृ जन्यश्व की प्रतीति नहीं होती है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि अङ्कुरादि कार्यों में कर्तृ जन्यत्व है ही नहीं। तस्मात् कोई अनुपपत्ति नहीं है । ( प्र० ) और भी बात है— अनुमान से आप क्या साधन करना चाहते हैं ? केवल कर्ता ? या पृथिवी प्रभृति उक्त महाभूतों के निर्माण से समर्थ कर्ता ? केवल कर्ता की सिद्धि से तो आपका अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि हम लोगों के समान अल्पज्ञ कर्ता की सिद्धि आपको उस अनुमान से इष्ट नहीं है, एवं हम लोगों के समान अल्पज्ञ पुरुष पृथिव्यादि का निर्माण कर भी नहीं सकता है। उक्त अनुमान से पृथिव्यादि के निर्माण में समर्थ कर्ता की सिद्धि हो ही नहीं सकती, क्योंकि इस विशेष प्रकार का कर्तृ जन्यत्व कहीं उपलब्ध नहीं है। अन्वय ( हेतु में साध्य का सामानाधिकरण्य) के बल से दृष्टान्त में जिस प्रकार के कर्तृ जन्यत्व रूप साध्य की उपलब्धि होगी, पक्ष में भी उसी प्रकार के साध्य की सिद्धि होगी। घटादि रूप दृष्टान्तों में तो पृथिव्यादि निर्माण में समर्थ कर्ता का जन्यत्व उपलब्ध नहीं है । ( उ० ) उक्त आपत्ति ठीक नहीं है, क्योंकि विशेष प्रकार के कर्ता की सिद्धि अनुमान से इष्ट नहीं है, क्योंकि व्याप्ति के बल से पृथिव्यादि के किसी बुद्धियुक्त कर्ता को सिद्धि
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
साध्यमाने पृथिव्यादिनिर्माणसामर्थ्यलक्षणोऽपि विशेष: सिद्धयत्येव, निविशेषस्य सामान्यस्य सिद्ध्यभावात् । ननु मा सिद्धयतु सामान्यमिति चेन्न, कार्य्यत्वेन सह तद्व्याप्तेरप्रतिक्षेपत्वात् । यदि हि व्याप्तमपि न सिद्धयति, धूमादप्यग्नि सामान्यं न सिद्धयेत्, अग्निविशेषस्थानन्वितस्यासिद्धेः, निविशेषस्थानवस्थानात् ।
यमनुमानस्य स्वरूपं व्याप्तिः पक्षधर्म्मता च, तत्र व्याप्ति अथेदमुच्यते- सामर्थ्यात् सामान्य सिद्धयति, पक्षधर्म्मताबलेन चाभिप्रेतो विशेषः पर्वताद्यवच्छिन्न वहिलक्षणात्मा सिद्धयति । अन्यथा पक्षधर्म्मतायाः क्वोपयोगः, क्व चानुमानस्य गृहीतग्राहिणः प्रामाण्यम् ? एवञ्चेत्, ईश्वरानुमानेऽपि तुल्यम्, अन्यत्राभि निवेशात् । अथ मतम्, सिद्धयत्यनुमाने विशेषोऽपि यत्र प्रमाणविरोधो नास्ति । तथा हि – धूमात् पर्वतनितम्बवृत्तिवह्निविशेष सिद्धौ का नामानुपपत्तिः ? दृष्टो हि देशकालादिभेदः स्वलक्षणानाम् । ईश्वरानुमाने तु विशेषो न सिद्धयति, प्रमाणविरो धात् । तथा हि – – नात्र शरीरपूर्वकत्वं साधनीयम्, शरीरे सत्यवश्थमिन्द्रियप्राप्ता वतीन्द्रियोपादानोपकरणादिकारकशक्तिपरिज्ञानासम्भवे सति कर्तृत्वासम्भवात् ।
जाने पर पृथिव्यादि में उनके निर्माण में समर्थ कर्तृ जन्यत्वरूप विशेष की सिद्धि स्वतः हो जाएगी, क्योंकि विशेषों से रहित सामान्य की सिद्धि सम्भव नहीं है । ( प्र० ) सामान्य की भी सिद्धि न हो ? ( उ० ) नहीं, क्योंकि कार्यत्व में कर्तृ जन्यत्व की है. इसमें कोई गड़बड़ नहीं है। अगर व्याप्ति के रहने पर भी सामान्य को सिद्धि न हो तो फिर तुम से वह्नि सामान्य की भी सिद्धि नहीं होगी ।
अगर यह कहें कि अनुमान के दो रूप हैं- व्याप्ति और पक्षधमंता । इनमें व्याप्ति के बल से सामान्य की सिद्धि होती है और पक्षवर्मता के बल से विशेष की सिद्धि होती है । अगर पक्षधर्मता से विशेष का नियमन न हो तो उसका उपयोग हो क्या है ? एवं ज्ञात ज्ञापक हो जाने के कारण अनुमान में प्रामाण्य ही कैसे हो ? (उ० ) अगर यह न्याय है तो फिर ईश्वरानुमान में भी यही न्याय है, अगर आपका कोई विशेष आग्रह न हो । अनुमान से विशेषों की सिद्धि वहीं होती है, जहाँ उसके विरुद्ध कोई प्रमाण उपस्थित नहीं रहता। जैसे कि पर्वत के मूल में वह्निविशेष की सिद्धि होती है। देश और काल के भेद से विशेषों का असाधारण्य प्रत्यक्ष से सिद्ध हैं। इसमें कौनसी अनुपपत्ति है ? किन्तु उक्त अनुमान से पृथिव्यादि के निर्माण में समर्थ कर्ता की सिद्धि का तो विरोधी प्रमाण है, क्योंकि इससे पृथिव्यादि महाभूतों के शरीरी कर्ता की सिद्धि तो आपको इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे ईश्वर का शरीर एवं उनकी इन्द्रियाँ माननी पड़गी और इन सबों से सब गुड़ गोबर हो जाएगा, क्योंकि इन्द्रियादि से युक्त कर्ता में महाभूतों के अतीन्द्रिय परमाणु रूप उपादानों में कार्योत्पादन शक्ति का ज्ञान सम्भव
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
न्यायकन्दली
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अशरीरपूर्वकत्वञ्चाशक्यसाधनम्, सर्वोऽपि कर्ता कारकस्वरूपमवधारयति, तत इच्छतीदमहमनेन निर्वर्त्तयामीति, ततः प्रयतते, तदनु कार्य व्यापारयति, ततः कारणान्यधितिष्ठति, ततः करोति, अनवधारयन्ननिच्छन्नप्रयतमानः कायम व्यापारयन् न करोतीत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां बुद्धिवच्छरीरमपि कार्योत्पत्तावु पायभूतम् । निखिलोपाधिग्रहणे व्याप्तिग्राहकप्रमाणादेवावधारितं न शक्यते प्रहातुं वह्नरिवेन्धनविकारसामर्थ्य धूमानुमाने, तत्परित्यागे च बुद्धिरपि परि त्यज्यताम् । प्रभावातिशयादशरीरवदबुद्धिमानेवायमीश्वरः करिष्यति । उपादा नोपकरणादिस्वरूपानभिज्ञो न शक्नोतीति चेत् ? कुत एतत् ? तथानुपलम्भा दिति चेत् ? फलितं ममापि मनोरथद्रुमेण, न तथा यावदिच्छा प्रयत्नव्यवहिता कार्योत्पत्तावृपयुज्यते यथेदमव्यवहितव्यापारं शरीरम् ।
नहीं है, एवं उसके बिना कर्तृत्व ही असम्भव है । यह सिद्ध करना तो बिलकुल ही असम्भव है कि ये महाभूत उन कर्ता से उत्पन्न होते हैं जिनके शरीर नहीं हैं। क्योंकि कर्ताओं का यह स्वभाव है कि वे पहिले उपादानों के स्वरूप को जानते हैं। फिर यह इच्छा होती है कि इन उपादानों से अमुक कार्य को उत्पन्न करें । इसके बाद वे तदनुकूल प्रयत्न करते हैं। फिर अपने शरीर को उस कार्य के अनुसार संचालित करते हैं । इन सबों के बाद कार्य के उपकरणों को यथावत् परिचालित कर कार्य को उत्पन्न करते हैं। बिना उपादान निश्चय के उस कार्य की इच्छा न रखते हुए, उस कार्य विषयक प्रयत्न के बिना ही, शरीर को हिलाये डुलाये बिना कोई भी कर्ता किसी भी कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता। इस अन्वय और व्यतिरेक से बुद्धि की तरह शरीर में भी कारणता सिद्ध है। व्याप्ति की प्रतिबन्धक उपाधियों की खोज के बाद भी जिस हेतु में जिस साध्य की व्याप्ति गृहीत होती है, उस हेतु से साध्य के ज्ञान को कोई रोक नहीं सकता हूं। जैसे कि आन्धन प्रभव वह्निरूप उपाधि से युक्त होने के कारण धूम की सिद्धि नहीं होती हैं। इस प्रकार शरीर में सिद्ध कारणत्व का भी अगर परित्याग करे तो बुद्धि को भी छोड़िए। ईश्वर अगर अतिशय प्रभाव के कारण बिना शरीर के भी महाभूतों को उत्पन्न कर सकते हैं तो फिर बिना बुद्धि के भी उन कार्यों का सम्पादन कर सकते हैं । ( प्र० ) उपादान एवं और कारणों से अनभिज्ञ कर्ता से किसी कार्य का उत्पादन सम्भव नहीं है, ( अतः बुद्धि को भी कार्यों का कारण मानते हैं ) । ( उ० ) यह आपने कैसे समझा ? ( प्र० ) स्थूल घटादि कार्यों में यह देखा जाता है कि वे उपादानादि कारणों के ज्ञान से युक्त कर्ता से ही उत्पन्न होते हैं । ( उ० ) तो फिर हमारे मनोरथ के वृक्ष भी फल गये, क्योंकि जिस प्रकार किसी विषय की इच्छा रहने पर भी अगर उस विषय का प्रयत्न नहीं रहता हैं तो कार्य
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
एवं र्ताह का गतिरत्र बुद्धिमत्कर्तृ पूर्वकत्वसामान्यस्य ? अगतिरेव, उभ योरपि शरीरित्वाशरीरित्वविशेषयोरनुपपत्तेः, निविशेषस्य सामान्यस्य सिद्धयभा वात् । किमनुमानस्य दूषणम् ? न किञ्चित्, पुरुष एवायं विशेषाभावाच्छ्शवि षाणायमाने साधनान हें सामान्ये साधनं प्रयुञ्जानो निगृह्यते, यथा कश्चिन्नि शितं कृपाणमच्छेद्यमाकाशं प्रति व्यापारयन् । अथानुमानदूषणं विना न तुष्यति भवान्, तदिदमशरीरिपूर्वकत्वानुमानं व्याप्तिग्राहकप्रमाणबाधितत्वात् कालात्य यापदिष्टम् व्याप्तिबलेन चाभिप्रेतमशरीरित्वविशेषं विरुन्धद् विशेषविरुद्धम्, ततश्च विरुद्धावान्तर विशेष एवेति पूर्वपक्षसङ्क्षेपः ।
अत्र प्रतिसमाधिः – किं शरीरित्वमेव कर्तृत्वमुत परिदृष्टसामर्थ्यकारक प्रयोजकत्वम् ? न तावच्छरीरित्वमेव कर्तृ त्वम्, सुषुप्तस्योदासीनस्य च कर्तृत्व नहीं होता है, उसी प्रकार शरीरव्यापार के बिना केवल प्रयश्न से भी कार्य नहीं
होता ।
( प्र० ) कथित अनुमान से पृथिव्यादि महाभूतों में सिद्ध बुद्धिविशिष्ट कर्तृ जन्यश्व की क्या गति होगी ? ( उ० ) कोई भी गति नहीं, ( क्योंकि बुद्धिमत्कवृं जन्यत्वरूप ) सामान्य के विशेषभूत शारीरिकतृ जन्यत्व और अशरीरिकवृं जन्यत्व इन दोनों में से किसी भी विशेष की सिद्धि नहीं होगी। एवं विशेषों से शून्य सामान्य की सिद्धि भी सम्भव नहीं है । ( प्र० ) उस सामान्य विषयक अनुमान में दोष क्या है ? ( उ० ) कोई भी दोष नहीं है, चूँकि विशेषों में से किसी की भी सिद्धि नहीं है, अतः आकाशकुसुमप्रतिम ईश्वर ही साधन के आयोग्य है । अतः अनुमान के द्वारा ईश्वर का साधन करनेवाला पुरुष उसी प्रकार विफल होगा, जैसे कि किसी भी प्रकार से न खण्डित होनेवाले आकाश की तरफ कृपाण को उछालनेवाला व्यक्ति विफल हो जाता है। अगर आपको बिना हेत्वाभासों के सुने सन्तोष न हो तो फिर उन्हें भी सुनिये। अशरीरिकर्तृ जन्यत्व में फलित उक्त अनुमान व्याप्तिग्राहक प्रमाणों से बाधित होने के कारण ‘कालात्ययापदिष्ट’ नाम के हेत्वाभास से दूषित है । एवं व्याप्ति के बल से हो अशरीरिकर्तृ जन्त्वरूप विशेष की सिद्धि हो सकती है, किन्तु ‘कर्ता शरीरयुक्त ही होता हैं’ विशेष प्रकार की इस व्याप्ति से भी उक्त अनुमान दूषित होता है, जो वस्तुतः विरुद्ध नाम से प्रसिद्ध हेत्वाभास का ही प्रभेद है। इतना हो उक्त ईश्वरानुमान के विषय में आक्षेप करनेवाले पूर्वपक्षियों का आशय है ।
( उ० ) अब हमें इन सब आक्षेपों के समाधान में यह पूछना है कि शरीर का सम्बन्ध ही कर्तृत्व है १ या जिन कारणों में कार्य करने का सामर्थ्य ज्ञात
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प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
न्यायकन्दली
प्रसङ्गात्, किन्तु परिदृष्टसामर्थ्यकारक प्रयोजकत्वम्, तस्मिन् सति कार्योत्पत्तेः । तच्चाशरीरस्यापि निर्वहति यथा स्वशरीरप्रेरणायामात्मनः । अस्ति तत्राप्यस्य स्वकर्म्मापाजितं तदेव शरीरमिति चेत् ? सत्यमस्ति, परं प्रेरणोपायो न भवति, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । प्रेर्य्यतयाऽस्तीति चेत् ? ईश्वरस्यापि प्रेर्य्यः परमाणु रस्ति । ननु स्वशरीरे प्रेरणाया इच्छाप्रयत्नाभ्यामुत्पत्तेरिच्छाप्रयत्नयोश्च सति शरीरे भावादसत्यभावाद् अस्ति तस्य स्वप्रेरणायामिच्छा प्रयत्नजनन द्वारेणोपायत्वमिति चेन्न, तस्येच्छाप्रयत्नयोरुपजननं प्रत्येव कारकत्वात्, लब्धा त्मकयोरिच्छा प्रयत्नयोः प्रेरणाकरणकाले तु तदनुपायभूतमेव शरीरं कर्म्मत्वा दिति व्यभिचार: अनपेक्षितशरीरव्यापारस्येच्छा प्रयत्नमात्रसचिवस्यैव चेतनस्य कदाचिदचेतनव्यापारं प्रति सामर्थ्यदर्शनात्, बुद्धिमदव्यभिचारि तु कार्य्यत्व मितीश्वरसिद्धि: । इच्छाप्रयत्नोत्पत्तावपि शरीरमपेक्षणीयमिति चेत् ? अपेक्षतां
हो गया है, उन्हें उचित रूप से परिचालित करना ही कर्तृत्व है ? अगर शरीर सम्बन्ध को ही कर्तृत्व मानें तो फिर सोये हुए व्यक्ति में एवं कार्यों से उदासीन व्यक्ति में भी कर्तृत्व मानना पड़ेगा । अतः उक्त प्रकार के कारणों को परिचालित करना ही कर्तृत्व है, क्योंकि उचित रूप से उन्हें परिचालित होने पर ही कार्य की उत्पत्ति होती है। यह दूसरे प्रकार का कर्तृत्व शरीर सम्बन्ध के बिना भी सम्भव है, जैसे कि अपने शरीर के लिए जीव का । ( प्र० ) यहाँ भी अपने पूर्व कर्मों से उपाजित उसी शरीर का सम्बन्ध जीव को अपने शरीर को प्रेरित करने में सहायक है ? ( उ० ) यह ठीक है कि जीव में शरीर का सम्बन्ध है, किन्तु अपने शरीर की क्रिया से अपने शरीर में प्रेरणा नहीं हो सकती । ( प्र० ) फिर भी यहाँ प्रेरणा का आश्रय तो है ? ( उ० ) ईश्वर की प्रेरणा के लिए भी परमाणु रूप आश्रय तो है ही। ( प्र० ) इच्छा और प्रयत्न से अपने शरीर में प्रेरणा उत्पन्न होती है । इन दोनों में भी शरीर अपेक्षित है ही। इस प्रकार अपने शरीर की प्रेरणा में भी अपने शरीर की अपेक्षा होती है । ( उ० ) शरीर केवल इच्छा और प्रयत्न का ही कारण है, अपने कारणों से उत्पन्न इच्छा एवं प्रयत्न इन दोनों से प्रेरणा की उत्पत्ति होती है। प्रेरणा में शरीर कारण नहीं है, क्योंकि शरीर प्रेरणा रूप क्रिया का कर्म है। इस प्रकार यह नियम हो गलत हो जाता है कि कर्तृत्व शरीर युक्त द्रव्यों में ही रहता है, क्योंकि शरीरव्यापार की अपेक्षा न रखते हुए भी केवल इच्छा और प्रयत्न की सहायता से ही चेतन में जड़ वस्तुओं को व्याप्त करने का सामर्थ्य कहीं कहीं देखा जाता है। कार्यत्व और बुद्धिमत्कतृ जन्यत्व दोनों अव्यभिचारी हैं, अतः उक्त अनुमान से ईश्वर की सिद्धि होती है । ( प्र० ) ( महाभूतादि सृष्टि के प्रयोजक
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये सृष्टिसंहार
न्यायकन्दली
यत्र तयोरागन्तुकत्वम्, यत्र पुनरिमौ स्वाभाविकावासाते तत्रास्यापेक्षणं व्यर्थम् । न च बुद्धीच्छाप्रयत्नानां नित्यत्वे कश्चिद् विरोध: । दृष्टा हि रूपादीनां गुणाना माश्रयभेदेन द्वयी गतिः – नित्यतानित्यता च । तथा बुद्धघादीनामपि भविष्य तीति । सेयमीश्वरवादे वादिप्रतिवादिनोः पराकाष्ठा । अतः परं प्रपञ्चः ।
आत्माधिष्ठिताः परमाणवः प्रवत्तिष्यन्त इति चेन्न, तेषां स्वकम्मोंपाजितेन्द्रिय गणाधीनसंविदां शरीरोत्पत्ते: (विना) सर्वविषयावबोधविरहात् । अस्त्यात्मनामपि सर्वविषयव्यापि सहजचैतन्यमिति चेन्न, सहजं शरीरसम्बन्धभाजां तत् केन विप्लुतं येनेदं सर्वत्रापूर्ववदवभासयति । शरीरावरणतिरोधानात् तदात्मन्येव समाधीयते, न बहिर्मुखं भवतीति चेत् ? व्यापकत्वेन तस्य विषयसम्बन्धानुच्छेदेन नित्यत्वेन च विषयप्रकाशस्वभावस्थानिवृत्तौ का तिरोधानवाचोयुक्तिः ? वृत्तिप्रतिबन्ध श्चैतन्यतिरोधानमिति चेत् ? कथं तर्हि शरीरिणां विषयग्रहणम् ? क्वचिदस्य
ईश्वरीय ) इच्छा और प्रयत्न के लिए भी शरीर को आवश्यकता होगी ? ( उ० ) इच्छा और प्रयत्न जहाँ भागन्तुक गुण हैं, वहाँ शरीर को आवश्यकता भले हो हो, जहाँ ये दोनों स्वाभाविक गुण हैं, वहाँ शरीर की अपेक्षा व्यर्थ है। बुद्धि, इच्छा और प्रयत्न इन सबों का नित्यत्व भी युक्ति विरुद्ध नहीं है, क्योंकि आश्रय के भेद से रूपादि गुणों को नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों प्रकार की गति देखी जाती है। अतः बुद्धयादि भी जीव और ईश्वर रूप आश्रयों के भेद से नित्य और अनित्य दोनों प्रकार के होंगे। ईश्वर को माननेवाले और न माननेवाले दोनों की इतनी ही युक्तियाँ हैं, आगे इन्हीं का विस्तार है।
( प्र० ) जीवों की अध्यक्षता में केवल परमाणु ही पृथिव्यादि महाभूतों की सृष्टि करेंगे ? ( उ० ) उनका ज्ञान अपने कर्मों से उपाजित इन्द्रियों के अधीन है, अतः महाभूतों की सृष्टि में अपेक्षित सभी विषयों का ज्ञान जीवों में सम्भव नहीं है । ( प्र० ) जीवों में भी सभी विषयों में व्याप्त चैतन्य की सत्ता तो है ही । ( 30 ) तो •फिर शरीर से युक्त जीवों में उस सहज चैतन्य का विघटन कौन कर देता हैं ? जिससे कि सभी विषयों को विना देखी हुई वस्तुओं की तरह देखता है । ( प्र० ) शरीर रूप आवरण के कारण वह सर्वविषयक सहज चैतन्य जीवों में तिरोहित रहता है, केवल प्रकाशित मात्र नहीं होता है । ( उ० ) जीव भी व्यापक है, अतः विषयों के साथ सवंदा उसका सम्बन्ध रहेगा। जीव नित्य है, अतः विषयों को प्रकाशित करनेवाला स्वभाव भी उसमें बराबर रहेगा। फिर तत्स्वरूप सहज चैतन्य के तिरोभाव में क्या युक्ति है ? ( प्र० ) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति का नाश ही उसका तिरोभाव है ? ( उ०) फिर जीवों को विषयों का ज्ञान कैसे होता है ? ( प्र० ) कहीं उसको वृत्तियाँ निरुद्ध नही भी होती हैं ? ( उ० ) ( कहीं वह शक्ति उद्बुद्ध रहती है एवं कहीं तिरोहित ), इस
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहित मु
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न्यायकन्दली
वृत्तयो न निरुध्यन्त इति चेत् ? कुतोऽयं विशेष: ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिविशे षाद् यद्येवम्, इन्द्रियाधीनश्चैतन्यस्य विषयेषु वृत्तिलाभो न सन्निधिमात्रनिबन्धनः, सत्यपि व्यापकत्वे सर्वार्थेषु वृत्त्यभावादिन्द्रियंवैयर्थ्यप्रसङ्गाचच ( इति ) साधू क्तमशरीरिणामात्मनां न विषयावबोध इति ।
तथा चैके वदन्ति- “पराश्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्” इति । अनवबोधे च तेषां नाधिष्ठातार इति तेभ्यः परः सर्वार्थदशसहजज्ञानमयः कर्तृ स्वभावः कोऽप्यधिष्ठाता कल्पनीयः, चेतनमधिष्ठातारमन्तरेणाचेतनानां प्रवृत्त्यभावात् ।
स किमेकोऽनेको वा ? एक इति वदामः | बहूनामसर्वज्ञत्वेऽस्मदादिवद सामर्थ्यात्, सर्वज्ञत्वे त्वेकस्यैव सामर्थ्यादपरेषामनुपयोगात् । न च समप्रधानानां भूयसां सर्वदैकमत्ये हेतुरस्तीति कदाचिदनुत्पत्तिरपि कार्य्यस्य स्यात्, एकाभि प्रायानुरोधेन सर्वेषां प्रवृत्तावेकस्येश्वरत्वं नापरेषाम् मठपरिषदामिव कार्यो
विशेष में क्या युक्ति है ? अगर इन्द्रिय सम्बन्ध रूप विशेष से ऐसा होता है ? ( उ०) तो फिर विषय केवल जीवों के समीप रहने के कारण ही उसके सहज चैतन्य के द्वारा प्रतिभासित नहीं होते, क्योंकि व्यापक होने पर भी जीवों को सभी विषयों का ज्ञान नहीं होता है। अगर जीवों में इन्द्रियों से निरपेक्ष भी ज्ञान की सत्ता रहे तो किर इन्द्रियों की रचना ही व्यर्थ हो जाएगी, अतः मैंने पहिले जो कहा है कि ‘जीवों को बिना शरीर के विषयों का ज्ञान नहीं होता है वह ठीक है ।
‘पराञ्चि खानि’ इत्यादि श्रुतियों का अवलम्बन करते हुए कोई कहते हैं कि सभी विषयों का ज्ञान जीवों को नहीं है। सभी विषयों के ज्ञान के बिना सृष्टि जैसा कार्य सम्भव नहीं है। सृष्टि रचना के लिए जीवों से भिन्न सहजज्ञान से युक्त कत्तृ स्वस्वभाववाले किसी अधिष्ठाता की कल्पना करनी होगी, क्योंकि जड़ वस्तुओं को प्रवृत्ति चेतन अधिष्ठाता के बिना सम्भव ही नहीं है, अतः ईश्वररूप अधिष्ठाता अवश्य है।
किन्तु वह एक हैं या अनेक ? इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वह एक ही है, क्योंकि अगर ईश्वर अनेक हों एवं सवंश हों तो फिर हमलोगों की तरह ही सृष्टिकार्य में असमर्थ होंगे। अगर ईश्वर को अनेक मानकर सभी को सर्वज्ञ मानें, तो फिर एक ही ईश्वर के सामर्थ्य से सृष्टि कार्य की उत्पत्ति हो जाएगी, अन्य सभी ईश्वरों के सामर्थ्य व्यर्थ जाएँगे एवं एक ही प्रकार के प्राधान्य से युक्त अनेक व्यक्तियों में सर्वदा ऐकमस्य भी नहीं रहता है। अगर एक ही ईश्वर के अभिप्राय से अन्य ईश्वरों की
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रध्ये सृष्टिसंहार
त्पत्त्यनुरोधन सर्वेषामविरोधे प्रत्येकमनीश्वरत्वम् । तदेवं कार्य्यविशेषेण सिद्धस्य कर्तृ विशेषस्य सर्वज्ञत्वान्न कुत्रचिद् वस्तुनि विशेषानुपलम्भः । अतो न तन्त्रिबन्धनं मिथ्याज्ञानम्, मिथ्याज्ञानाभावे च न तन्मूलौ रागद्वेषौ, तयोरभावान्न तत्पूर्विका प्रवृत्तिः, प्रवृत्त्यभावे च न तत्साध्यौ धर्म्माधम्मौ तयोरभावात् तज्जयोरपि सुखदु:खयोरभावः, सर्वदेव चानुभवसद्भावात् स्मृतिसंस्कारावपि नासाते इत्यष्टगुणाधिकरणो भगवानीश्वर इति केचित् । अन्ये तु बुद्धिरेव तस्या व्याहता क्रियाशक्तिरित्येवं वदन्त इच्छाप्रयत्नावप्यनङ्गीकुर्वाणा: षड्गुणाधि करणोऽयमित्याहुः । स कि बद्धो मुक्तो वा ? न तावद् बद्धः, बन्धनसमाज्ञातस्य बन्धहेतोः क्लेशादेरसम्भवात् । मुक्तोऽपि न भवति, बन्धविच्छेदपर्यायत्वा न्मुक्तेः । नित्यमुक्तस्तु स्यात्, यदाह तत्रभवान् पतञ्जलि:- “क्लेशकर्म्मविपाका शयैरपरामृष्ट: पुरुष विशेष ईश्वरः” इति ।
भी प्रवृत्ति मानें तो फिर वही ईश्वरपद के मुख्यार्थ होंगे, और बाकी सर्वज्ञ ईश्वर न कहला सकेंगे। अगर कार्यसम्पादन के अनुरोध से अन्य विषयों में मतभेद रहते हुए भी मठ की परिषद् के सभासदों की तरह सृष्टिरूप एक कार्य में सभा ईश्वरों का एक मत मानें तो फिर प्रत्येक ईश्वर में अनीश्वरता की आपत्ति होगी। तस्मात् अन्य सभी कार्यों से विलक्षण कार्य द्वारा सिद्ध अन्य सभी कर्ताओं से विशिष्ट सृष्टिरूप कार्य का ईश्वररूप कर्ता एक ही है। चूकि सर्वज्ञ हैं, किसी भी विषय का कोई भी विशेष उनको अज्ञात नहीं है, अतः विषयों के विशेष के अज्ञान से उत्पन्न होने वाला मिथ्याज्ञान भी उनमें नहीं है। सुतरां मिथ्याज्ञानमूलक राग और द्वेष भी उनमें नहीं है। इसी हेतु से राग और द्वेष से होनेवाली प्रवृत्तियाँ भी उनमें नहीं हैं । फिर प्रवृत्ति, धर्म और अधर्म की उनमें सत्ता कैसी ? धर्म और अधर्म के न रहने से उनमें सुख एवं दुःख भी नहीं है। सर्वदा सभो विषयों के अनुभव के ही रहने के कारण उनमें स्मृति और संस्कार भी नहीं हैं। इस प्रकार किसी का मत है कि भगवान् परमेश्वर संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न इन आठ गुणों से युक्त हैं। किसी विषय में व्याहत न होनेवाला ज्ञान हो उनकी क्रियाशक्ति है । इस प्रकार उनमें इच्छा और प्रयत्न को भी अस्वीकार करते हुए कोई उन्हें छः गुणों का ही आधार मानते हैं। वे बद्ध हैं या मुक्त ? बद्ध तो वे नहीं हैं, क्योंकि बन्धन के कारण क्लेशकर्मादि उनमें नहीं हैं। वे मुक्त भी नहीं हो सकते, क्योंकि ‘मुक्ति’ और ‘बन्धविच्छेद’ दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। नित्यमुक्त वे हो सकते हैं, जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ‘क्लेशकर्म्मविपाकाशयैः’ इत्यादि सूत्र से कहा है |
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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प्रशस्तपादभाष्यम्
आकाशकालदिशामे कैकत्वादपरजात्यभावे
पारिभाषिक्यस्तिस्रः
संज्ञा भवन्ति, आकाशः कालो दिगिति । तत्राकाशस्य गुणाः शब्दसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः ।
आकाश, काल और दिक् इन तीनों में से प्रत्येक एक एक ही है, अतः उनमें से किसी में (द्रव्यत्व से भिन्न द्रव्यत्व व्याप्य और कोई भी अपर जाति नहीं है । तस्मात् आकाश, काल और दिक नाम की उन तीनों की तीन पारिभाषिक संज्ञायें हैं । इनमें आकाश के शब्द, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये छः गुण हैं ।
न्यायकन्दली
आकाशादीनां त्रयाणां सङ्क्षेपार्थमेकेन ग्रन्थेन वैधर्म्य कथयति आकाशकालदिशामिति । आकाशस्य कालस्य दिशश्चैकैकत्वादपरजातिन्र्न्नास्ति, तस्या व्यक्ति भेदाधिष्ठानत्वात् । अपरजात्यभावे चाकाश इति काल इति दिगिति तिस्रः संज्ञा: पारिभाषिक्यो न पृथिव्यादिसंज्ञावदपरजातिनैमित्तिक्य इत्यर्थः । संज्ञेषामितरवैधर्म्यं यस्याः संज्ञाया विना निमित्तेन शृङ्गग्राहिकया सङ्केतः सा पारिभाषिकी, यथायं देवदत्त इति यस्याः पुननिमित्तमुपादाय सङ्केतः सा नैमित्तिकीति विवेकः ।
सम्प्रति प्रत्येकं निरूपणार्थ माह- तत्राकाशस्य गुणा इति। तेषां त्रयाणां थोड़े शब्दों में ही आकाशादि तीनों द्रव्यों का लक्षण कहने के अभिप्राय से ‘आकाशकालदिशाम्’ इत्यादि एक ही वाक्य से उन सभी के असाधारण धर्म कहे गये हैं। अभिप्राय यह है कि जातियों की कल्पना आश्रयों को विभिन्नता से ही की जाती है, आकाशादि चूकि एक एक ही हैं. अतः अपर जातियाँ उनमें न रहने के कारण आकाश, काल और दिकू ये तीनों संज्ञायें पारिभाषिकी हैं। अर्थात् पृथिवीत्यादि अपर जातियों की निमित्तमूलक पृथिव्यादि संज्ञाओं की तरह आकाशादि नैमित्तिक संज्ञायें नहीं हैं। इन तीनों की ये पारिभाषिकी संज्ञायें ही औरों की अपेक्षा इनका वैधर्म्य हैं। जैसे कि शाम को गोष्ठ के सामने इकठ्ठी हुई गायों में से उनका रक्षक अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक को पकड़ कर अन्दर कर देता है, उसी प्रकार जो संज्ञा किसी निमित्तविशेष को अपेक्षा न करके किसी व्यक्ति विशेष का बोध करा देती है, वही पारिभाषिको संज्ञा है, जैसे कि देवदत्तादि संज्ञाएँ। जो संज्ञा किसी निमित्तमूलक सङ्केत से स्वार्थ विषयक बोध का उत्पादन करती है, उसे नैमित्तिकी संज्ञा कहते हैं। यही इन दोनों संज्ञाओं में अन्तर है। अब इन तीनों में से प्रत्येक का निरूपण करने के लिए तत्राकाशस्य गुणा: ‘ इत्यादि वाक्य लिखते हैं। अर्थात् इन तीनों में से आकाश में शब्द, संख्या, परिमाण,
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये आकाश –
प्रशस्तपादभाष्यम्
शब्द: प्रत्यक्षत्वे सत्यकारणगुणपूर्वकत्वादयावद्रव्यभावि त्वादाश्रयादन्यत्रोपलब्धेश्च न स्पर्शवद् विशेषगुणः | बाह्येन्द्रिय प्रत्यक्षत्वा दात्मान्तरग्राह्यत्वादात्मन्यसमवाया दहङ्कारेण विभक्तग्रहणाचच नात्म गुण: । श्रोत्रग्राह्यत्वाद् वैशेषिकगुणभावाच्च न दिक्कालमनसाम् ।
शब्द स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष का विषय होने पर भी अपने समवायिकारण के गुण से उत्पन्न नहीं होता है, एवं अपने समवायिकारण के अन्तिम समय तक वह नहीं रहता है, एवं अपने आश्रय ( स्पर्शवत् शङ्खादि द्रव्यों) से अन्यत्र श्रोत्र में उनकी उपलब्धि होती है । शब्द आत्मा का भी गुण नहीं है, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष बाह्य इन्द्रिय से होता है । एवं एक ही शब्द विभिन्न आत्माओं से गृहीत होता है। एवं शब्द का समवाय आत्मा में नहीं है। एवं अहङ्कार के साथ (‘अहं जानामि’ इत्यादि प्रतीतियों में ज्ञान की तरह ) शब्द की प्रतीति नहीं होती है । शब्द दिक्, काल और मन का भी गुण नहीं है, क्योंकि वह विशेष गुण है। इस प्रकार चूँकि शब्द गुण है, अत:
न्यायकन्दली
मध्ये आकाशस्य गुणा: शब्दसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । शब्दादिगुण योगोऽप्याकाशस्य वैधर्म्यम् ।
नन्वाकाशस्य सद्भावे किं प्रमाणम् ? प्रत्यक्षमेव, वियति पतति पतत्त्रिणि चक्षुर्व्यापारेणेहायं पक्षी प्राप्तो नेहेति नियतदेशाधिकरणा प्रतीतिरिति चेत्, तदयुक्तम्, अरूपस्य द्रव्यस्य चाक्षुषत्वाभावात् । योऽप्ययमधिकरणप्रत्ययस्तत्र विततालोकमण्डलव्य तिरेकेण न द्रव्यान्तरं प्रतिभाति, अत आकाशस्य सद्भावे
परिशेषानुमानमुपन्यस्यञ्छब्दस्था द्रव्यान्तरगुणत्वं निषेधति – शब्द इति । संयोग और विभाग ये छः गुण हैं। फलतः शब्द प्रभृति इन छ: गुणों का सम्बन्ध भी आकाश का वैधर्म्य है।
( प्र० ) आकाश की सत्ता में ही क्या प्रमाण है ? कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष ही इसमें प्रमाण है, क्योंकि आकाश में चिड़ियों के उड़ने के समय चक्षु के व्यापार इस प्रदेश में पक्षी हैं, उस प्रदेश में नहीं इस प्रकार किसी नियमित अधिकरण में पक्षियों की प्रतीति होती है, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि बिना रूप के द्रव्य आखों से नहीं देखे जाते । उक्त प्रतीति में जो अधिकरणता भासित होती है, उसके सम्बन्ध में अगत्या यही मानना पड़ेगा कि आकाश में फैला हुआ प्रकाश पुञ्ज ही अधिकरणतया भासित होता है, अतः उसकी सत्ता में परिशेषानुमान का
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प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
परिशेषाद् गुणो भूत्वा आकाशस्याधिगमे लिङ्गम् । उक्त परिशेषानुमान के द्वारा आकाश के ज्ञान का हेतु है ।
न्यायकन्दली
स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुणपूर्वः शब्दो न भवति, पटरूपादिवदाश्रयो त्पत्त्यनन्तरमनुत्पादात् । अतः सुखादिवत् स्पर्शवतो विशेषगुणो न भवति । विशेष गुणत्वप्रतिषेधे सामान्यगुणत्वं भविष्यतीति नाशङ्कनीयम्, सामान्यविशेषवतस्तस्य बाह्यैकेन्द्रियग्राह्यत्वेन रूपादिवद्विशेषगुणत्वसिद्धेः । पार्थिवपरमाणुरूपादयः स्पर्श वद्विशेषगुणा अथ चाकारणगुणपूर्वकाः परमाणोरकार्य्यत्वात् तद्वयवच्छेदार्थं प्रत्यक्षत्वे सतोति कृतम् । यावद्द्रव्यं शब्दो न भवति सत्येवाश्रये शङ्खादौ तस्य विनाशात्, अतोऽपि सुखादिवत् स्पर्शवद्विशेषगुणो न भवति । तत्रापि पार्थिव परमाणुरूपादिभिरेव व्यभिचारः, तेषां सत्येवाश्रये परमाणावग्निसंयोगेन विना प्रदर्शन करने के बाद ‘शब्द: प्रत्यक्षत्वे सति’ इत्यादि से प्रतिपादन करते हैं कि शब्द आका शादि से भिन्न पृथिव्यादि का गुण नहीं है। जिस प्रकार पट का रूप अपने समवाय कारण पट के आश्रयीभूत तन्तुओं के रूप से उत्पन्न होता है, क्योंकि पट के उत्पन्न होने के बाद ही वह उत्पन्न होता है, उसी प्रकार से शब्द अपने समवायिकारण के आश्रयो भूत द्रव्यगत गब्द से उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि आश्रय की उत्पत्ति के बाद उसकी उत्पत्ति नहीं होती है। अतः जिस प्रकार स्पशं से युक्त पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का सुख विशेषगुण नहीं है, उसी प्रकार शब्द भी रूप से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है। इससे यह शङ्का न करनी चाहिए कि “शब्द अगर उन स्पर्श युक्त द्रव्यों का विशेषगुण नहीं है, तो विशेषगुण ही नहीं है, किन्तु सामान्य गुण ही है” क्योंकि शब्द परजाति एवं अपरजाति दोनों से युक्त है, एवं श्रोत्ररूप एक ही बाह्मेन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः वह अवश्य ही विशेषगुण है। पार्थिव परमाणु के रूपादि यद्यपि स्पशंयुक्त द्रव्य के ही गुण हैं, फिर भी ‘कारणगुणपूर्वक’ नहीं हैं, अर्थात् अपने आश्रय के समवाधिकारण के गुण से उत्पन्न नहीं होते हैं, क्योंकि परमाणु कार्य नहीं है । अतः पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचार वारण के लिए प्रकृत परिशे षानुमान के प्रथम हेतु में ‘प्रत्यक्षत्वे सति’ यह विशेषण दिया गया है। शब्द कि याहूद्रव्यभावी नहीं है, अर्थात् अपने समवायिकारणीभूत द्रव्य की अवस्थिति के सभी कालों में नहीं रहता है, क्योंकि (पूर्वपक्षियों के अभिमत शब्द के आश्रय) शङ्खादि के रहते हुए भी शब्द नष्ट हो जाते हैं। इसलिए अयावद्दव्यभावित्व हेतु से भी समझते हैं कि शब्द स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है। यह हेतु भी केवल अपने इस रूप से पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचरित होगा, क्योंकि रूपादि गुणों के आश्रयीभूत
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये आकाश –
शात् तदर्थं प्रत्यक्षत्वे सतीत्यनुवर्त्तनीयम् | हेत्वन्तरञ्चाह-आश्रयादन्यत्रोप लब्धेश्च । स्पर्शवद्विशेषगुणत्वे शब्दस्य शङ्खादिराश्रयो वाच्यः । स च तस्मादन्यत्र दूरे कर्णशष्कुलीदेशे समुपलभ्यते, न चान्यगुणस्यान्यत्र ग्रहणमस्ति, तस्मान्न स्पर्शवद् विशेषगुणः । ननु शङ्खादिदेशस्थित एव शब्दो गृह्यते, इन्द्रियाणामासंसारमण्डल व्यापित्वादिति चेन्न, संनिकृष्ट विप्रकृष्टयोरविशेषेणोपलब्धि: स्यात् । व्यापकत्वे – पीन्द्रियाणां पुरुषार्थेन हेतुना क्षोभ्यमाणानां यदधिष्ठानदेशेभ्यो विषयग्रहणानु गुणवृत्तयो निर्गता विषयं विश्नुवते तदा विषयग्रहणस्य भावान्नाव्यवस्थेति चेत् ? विषयग्रहणार्थानीन्द्रियाणि, विषयग्रहणञ्च वृत्तिनिबन्धनम्, वृत्तय एवेन्द्रियाणि तदन्येषामनुपयोगान्निः प्रमाणकत्वाच्च न च श्रोत्रवृत्तिविषयदेशं गत्वाऽर्थ मुपलभते, चाक्षुषप्रतीताविव शब्देऽपि दिक्सन्देहानुपपत्तिप्रसङ्गात् । नापि
परमाणुओं के रहते हुए भी उन गुणों का नाश हो जाता है, अतः प्रथम हेतु के कथित ‘प्रत्यक्षत्वे सति’ इस विशेषण कौ अनुवृत्ति इस हेतु में भी करनी चाहिए। शब्द स्पर्शयुक्त द्रव्यों का गुण नहीं है इसकी सिद्धि के लिए ‘आश्रयादन्यत्रोपलब्धेश्च’ इत्यादि से एक और हेतु देते हैं। शब्द को अगर किसी स्पर्शयुक्त द्रव्य का गुण मानें तो जिन शङ्खादि द्रव्यों से शब्द की उत्पत्ति देखी जाती है उन द्रव्यों को शब्द का आश्रय मानना पड़ेगा, किन्तु शब्द तो उन द्रव्यों से दूर कर्णशष्कुली प्रदेश में उपलब्ध होता है। एवं एक द्रव्य का गुण दूसरे द्रव्य में उपलब्ध नहीं होता है, तस्मात् शब्द स्पर्श से युक्त शङ्खादि द्रव्यों का गुण नहीं है । ( प्र०) इन्द्रियाँ संसारमण्डलव्यापी हैं, अतः शङ्खादि देशों में विद्यमान शब्द की हो उपलब्धि होती है। ( उ०) अगर इन्द्रियाँ संसारमण्डलव्यापी हों तो फिर दूर की और समीप की वस्तुओं के ग्रहण में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए । ( प्र ० ) इन्द्रियाँ यद्यपि व्यापक हैं किन्तु पुरुषों के उपभोगजनक अदृष्ट से उनमें ‘क्षोभ’ अर्थात् कार्य करने योग्य किया उत्पन्न होती है। अतः जब अधिष्ठान देश से विषयज्ञान के अनुकूल वृत्तियाँ निकल कर विषयों से सम्बद्ध होती हैं तब इन्द्रियों से विषयों का ग्रहण होता है। अतः दूर और समीप की वस्तुओं के समान रूप से ग्रहण की आपत्ति नहीं है । ( उ०) इन्द्रियाँ विषयग्रहण के लिए हैं। विषयों का ग्रहण अगर वृत्तियों से होता है तो फिर वे ही इन्द्रियाँ हैं। उनसे भिन्न किसी का भी उपयोग विषयग्रहण में नहीं है। एवं विषय के ग्रहण में अनुपयोगी कोई भी वस्तु इन्द्रिय नहीं हो सकती है। जैसे कि रूप के प्रत्यक्ष के लिए चक्षु की वृत्ति को रूप के प्रदेश में जाना पड़ता है, धोत्र की वृत्ति को शब्दश्रवण के लिए उसके प्रदेश में जाने की आवश्यकता नहीं होती है। अगर ऐसा मानें तो रूपादि प्रतीति की तरह शब्द प्रतीति में दिक्सन्देह की उत्पत्ति नहीं होगी। ( अर्थात् यह शब्द पूर्व दिशा
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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न्यायकन्दली
स्वाश्रयं परित्यज्य गुणस्यागमनमस्ति न च शङ्खवत्तना तेनान्तराले शब्द आर ब्धव्यः, स्पर्शवद्विशेषगुणस्य स्वाश्रयारब्धे द्रव्ये विशेषगुणान्तरारम्भदर्शनात्, शङ्खा रब्धस्य च द्रव्यस्य शङ्खश्रोत्रयोरन्तरालेऽनुपलम्भात् । न चाप्राप्तस्य ग्रहणमस्ति, अतिप्रसङ्गात् । तस्माच्छादिगुणत्वे शब्दस्यानुपलब्धिरेव । अस्ति च तदुपलब्धिः, सैव तस्य द्रव्यान्तरगुणत्वं साधयति, यस्मिन्नन्तरालव्यापिनि शब्दस्य शब्दान्तरा रम्भक्रमेण श्रोत्रप्रत्यासन्नस्य ग्रहणं स्यात् ।
आत्मगुणनिषेधार्थमाह – बाह्येन्द्रिय प्रत्यक्षत्वादिति । श्रोत्रं तावद् बाह्येन्द्रियं नियमेन बाह्यार्थप्रकाशकत्वाच्चक्षुर्वत्, तद्ग्राह्यश्च शब्दस्तत्प्रतोते स्तद्भावभावित्वात् । यस्तु बाह्येन्द्रियाग्राह्यो नासावात्मगुणो यथा रूपादिः, तस्मादयमपि न तद्गुण इत्यर्थः । इतोऽपि शब्दो नात्मगुण आत्मान्तरग्राह्यत्वाद कप्रतित्साधारणत्वादित्यर्थः । या खलु वीणावेण्वादिजा शब्दव्यक्तिः सन्तति
से सुन पड़ा है या पश्चिम दिशा से ? इस सन्देह को उपपत्ति नहीं होगी) । गुण अपने आभय को छोड़कर जा भी नहीं सकता है । शङ्ख का शब्द श्रोत्र और अपने बीच के शब्दों का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के विशेष गुणों का यह स्वभाव है कि अपने आश्रय से उत्पन्न होनेवाले द्रव्यों के विशेष गुणों का ही वह उत्पादन करें। शङ्ख से उत्पन्न किसी दूसरे द्रव्य की उपलब्धि शङ्ख और श्रोत्र के बीच में नहीं होती है तथा इन्द्रियों से असम्बद्ध द्रव्यों का प्रत्यक्ष नहीं होता है, ऐसा मान लेने से चक्षुरादि से रसादि की अथवा व्यवहित या दूरस्थ घटादि के प्रत्यक्षस्व की आपत्ति होगी । तस्मात् शब्द अगर स्पर्श से युक्त द्रव्यों का विशेष गुण हो तो उसकी उपलब्धि ही नहीं होगी। लेकिन उसकी उपलब्धि होती है। यह उपलब्धि ही यह सिद्ध करती है कि शब्द ऐसे द्रव्य का विशेष गुण है जो शङ्खादि द्रव्य एवं श्रोत्ररूप इन्द्रिय के बीच में रहता है। जिससे कि एक शब्द से दूसरा शब्द दूसरे से तीसरा इस प्रकार शब्द की धारा उत्पन्न होकर उस धारा के श्रोत्र में उत्पन्न शब्द श्रोत्र के साथ सम्बद्ध होकर प्रत्यक्ष का विषय होता है।
‘शब्द आत्मा का गुण नहीं है इसका साधक हेतु ‘बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वात्’ इस वाक्य से देते हैं। अभिप्राय यह है कि श्रोत्र बाह्येन्द्रिय है, क्योंकि चक्षुरादि ब्राह्म इन्द्रियों की तरह वह केवल बाह्य वस्तु का ही प्रकाशक है। शब्द का प्रत्यक्ष श्रोत्र से ही होता है, क्योंकि शब्द प्रत्यक्ष की सत्ता श्रोत्र के अधीन है। जिस गुण का ग्रहण बाह्य इन्द्रिय से होता है वह कभी आत्मा का गुण नहीं हो सकता जैसे कि रूप, तस्मात् शब्द आत्मा का गुण नहीं है । ‘आत्मान्तरग्राह्यत्व’ हेतु से भी समझते हैं कि शब्द आत्मा का गुण नहीं है। ‘आत्मान्तरग्राह्यत्व’ शब्द का अर्थ है अनेक
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म्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये आकाश
द्वारेणैकेन पुरुषेण प्रतीयते संवापरेणापि तद्देशवत्तिना प्रतीयते, न त्वेवं सुखादि रित्यात्मगुणवैधर्म्यान्नात्मगुणः । आत्मन्यसमवायादपि शब्दो नात्मगुणः, रूपा दिवत् । आत्मन्यसमवायस्तस्यासिद्ध इति चेत् ? न, रूपादिवद् बहिर्मुखतया प्रतीतेरात्मगुणानाञ्चान्तरत्वेनावगमात् । इतश्च नायमात्मगुणः – अहङ्कारेण अहमितिप्रत्ययेन, विभक्तस्य व्यधिकरणस्य ग्रहणात्, यः खल्वात्मगुणः सोऽहङ्कार समानाधिकरणो गृह्यते, यथा सुख्यहं दुःख्यहमिति, न त्वेवं शब्दस्य ग्रहणमतो नात्मगुण: । प्रियवागहमिति व्यपदेशोऽस्तीति चेत् ? सत्यम्, किन्तु तदधिष्ठान शोलतया न तु तद्गुणाधिकरणत्वेन, मृदङ्गादिशब्देषु तथा प्रतीत्यभावात् ।
अस्तु तहि दिश: कालस्य मनसो गुणस्तत्राह- श्रोत्रग्राह्यत्वादिति । किमुक्तं स्यात् ? ये दिक्कालमनसामुभयवादिसिद्धाः संयोगादयस्ते श्रोत्रग्राह्या
पुरुषों से ( एक ही वस्तु का) गृहीत होना। वीणा, वंशी प्रभृति से उत्पन्न शब्द का शब्दान्तर की उत्पत्ति के धाराक्रम से जैसे एक पुरुष को प्रत्यक्ष होता है, उस देश में विद्यमान और पुरुषों को भी उसी शब्द का उसी क्रम से प्रत्यक्ष होता है । ( आत्मा के गुण) सुखादि में यह बात नहीं है। इस प्रकार शब्द में आत्मा के विशेष गुणों का आत्मान्तराग्राह्यत्व रूप वैधयं रहने के कारण शब्द आत्मा का गुण नहीं है। आत्मा में शब्द का समवाय न रहने के कारण भी शब्द आत्मा का गुण नहीं है, जैसे कि रूपादि । (प्र०) यही सिद्ध नहीं है कि ‘आत्मा में शब्द का समवाय नहीं है’ (उ०) रूपादि की प्रतीतियों की तरह शब्द की भी प्रतीति बहिर्मुखी होती है, किन्तु आत्मा के गुणों की प्रतीति अन्तर्मुखी होती है (तस्मात् शब्द का समवाय आत्मा में नहीं है)। अहम्’ प्रतीति में विषय न होने के कारण से भी समझते हैं कि शब्द आत्मा का गुण नहीं है। अहङ्कार’ से अर्थात् ‘अहम्’ इस प्रकार की प्रतीति से शब्द का ‘विभक्त ग्रहण’ अर्थात् व्यधिकरण ग्रहण होता है। अभिप्राय यह है कि जैसे ‘अहं सूखी’, ‘अहं दुःखी’ इत्यादि ‘अहम्’ घटित वाक्यों से सुख दुःखादि की प्रतीति आत्मा के साथ ही होती है। उस प्रकार ‘अहं शब्दवान्’ इत्यादि ‘अहम्’ पदघटित वाक्यों से शब्द की प्रतीति का अभिलाप नहीं होता है । ( प्र०) ‘मैं प्रिय बोलता हूँ’ ऐसा व्यवहार तो होता है । ( उ० ) इस प्रतीति से इतना ही सिद्ध होता है कि प्रियवाक्य का उच्चारण कर्ता मैं हैं, इससे आत्मा में प्रियशब्द की अधिकरणता सिद्ध नहीं होती है, क्योंकि मृदङ्गादि के शब्दों में प्रियत्व का व्यवहार होते हुए भी मृदङ्गादि प्रियवाक् हैं इस आकार का व्यवहार नहीं होता है।
फिर शब्द को दिक्, काल और मन इन्हीं तीनों द्रव्यों का ही गुण मान लिया जाय ? इसी प्रश्न का समाधानजनक हेतु है श्रोत्र ग्राह्यत्वात् । (प्र०) इससे क्या अभिप्राय निकला ?
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१४९
न्यायकन्दली
न भवन्ति, अयन्तु तद्ग्राह्यस्तस्मान्न तद्गुणः । दिक्कालमनसां विशेषगुणो नास्ति, अयत्तु विशेषगुण इतोऽपि तेषां न भवतीत्याह- वैशेषिकगुणभावाच्चेति । शब्दो दिक्कालमनसां गुणो न भवति विशेषगुणत्वात् सुखादिवदिति प्रयोगः ।
नन्वेकस्मिक साधनोपन्यासो व्यर्थः, एकेनैव तदर्थपरिच्छेदस्य कृतत्वा दिति चेत् ? किमेकप्रमाणावसिते प्रमाणान्तरवैयर्थ्यं फलाभावात् ? पुरुषेणान पेक्षितत्वाद्वा ? न तावत् फलं नास्ति पूर्ववदुत्तरत्रापि तदर्थप्रतीतिभावात् । नापि पुरुषस्यानपेक्षा सर्वत्र | यत्रातिशयमाधुर्य्यात् प्रत्यनुभवं सुखोत्पत्तिः, तत्र दृष्टेऽपि पुनः पुनर्दर्शनाकाङ्क्षा भवत्येव यथाऽत्यन्तप्रियपुत्रादौ । यत्र त्वनपेक्षा तत्रापि पूर्ववदुत्तरस्यापि कारणसद्भावे सति प्रवृत्तस्य न वैयर्थ्यम्, तद्विषयपरिच्छेदे नैवार्थनार्थवत्त्वात् । पिष्टपेषणे त्दशक्तभङ्गताप्राप्तौ फलमेव न भवति ।
(उ०) यही कि दिक, काल और मन इन तीनों के जो सर्वसिद्ध संयोगादि गुण हैं उनमें से किसी का भी ग्रहण श्रोत्र से नहीं होता है । शब्द का ग्रहण श्रोत्र से होता है। तस्मात् शब्द दिगादि तीनों द्रव्यों का भी गुण नहीं है । एवं दिक काल और मन इन तीनों द्रव्यों में कोई भी विशेष गुण नहीं रहता है। शब्द विशेष गुण है, इस हेतु से भी शब्द उनका गुण नहीं है। ‘वैशेषिकगुणभावाच्च’ इस हेतुवाक्य से यही न्यायप्रयोग इष्ट है।
( प्र ० ) एक ही विषय की सिद्धि के लिए अनेक हेतुओं का प्रयोग व्यर्थ है ? ( उ०) इस प्रश्न का क्या आशय है १ (१) एक प्रमाण के द्वारा ज्ञात वस्तु के लिए दूसरे प्रमाण का कथन असङ्गत है ? क्योंकि इससे कोई फल नहीं निकलेगा ? या (२) ज्ञाता को एक प्रमाण से ज्ञात वस्तु के ज्ञान के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ? अतः दूसरे हेतुओं का कथन असङ्गत है ? पहिली युक्ति इस लिए असङ्गत है कि पहिले हेतु की तरह और हेतुओं से भी साध्य के ज्ञान में कोई अन्तर नहीं होता है। दूसरी युक्ति इस लिए ठीक नहीं है कि सभी जगह एक हेतु से ज्ञात वस्तु का ज्ञान पुरुष को अनभीष्ट ही नहीं होता है, क्योंकि जहाँ अति माधुर्य के कारण विषय के प्रत्येक अनुभव में विलक्षण सुख की उत्पत्ति होती है, वहाँ उस विषय के ज्ञान के बाद भी फिर से ज्ञान होने की आकाङ्क्षा बनी ही रहती है, जैसे कि अत्यन्त प्रिय पुत्रादि के विषय में जहाँ एक हेतु से ज्ञात वस्तु का ज्ञान अनपेक्षित भी है, वहाँ भी प्रथम हेतु के समान द्वितीय हेतु में भी ज्ञापकत्व समान रूप से है ही, अतः दूसरे हेतु के प्रयोग की प्रवृत्ति भी व्यर्थ नहीं है, क्योंकि अभीष्ट विषय का ज्ञापकत्व ही प्रयोग की सार्थकता है । वह दूसरे हेतुओं के प्रयोगों में भी है ही। ( प्र०) पिसी हुई वस्तु को अगर फिर से पीसने की प्रवृत्ति ठीक हो, तो
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये आकाश
न्यायकन्दली
अन्यदपि प्रमाणविषयपरिच्छेदमात्रमेवार्थक्रियाया विषयसाध्यत्वात् । एकपरि च्छिन्ने द्वितीयस्य साधकतमत्वाभाव इति चेत् ? न, स्वकार्ये तस्यैव साधकतम त्वात् । अन्यथा धारावाहिकं ज्ञानमप्रमाणं स्यात्, विषयस्यानतिरेकात् । प्रतिज्ञा नञ्च कालक्षणानामतिसूक्ष्माणानप्रतिभासनात् । न चैवं सत्यनवस्था, उपायाभावे सति विरामादित्यलम् |
ननु यदि नाम पृथिव्यादिद्रव्याष्टकगुण: शब्दो न भवति तथाप्याकाशस्य सद्भावे किमायातम् ? तत्राह – परिशेषादिति । गुणः शब्दः, गुणश्च गुणिना बिना न भवति, न चैष पृथिव्यादीनां गुणः, द्रव्यान्तरञ्च नास्ति, तस्माद्यस्यायं गुणस्तदा काशमिति परिशेषादाकाशस्याधिगमे प्रतिपत्तौ लिङ्गमित्यर्थनिर्देशः । प्रयोगः पुनरेवं द्रव्यान्तरगुणः शब्दो गुणत्वे सति पृथिव्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वाद् यस्तु
समाप्ति कभी नहीं होगी, अत: एक हेतु से ज्ञात वस्तु के पुनर्ज्ञापन के लिए दूसरे हेतुओं का प्रयोग व्यथं है, क्योंकि अर्थविषयक ज्ञान को छोड़कर हेतु प्रयोग का कोई दूसरा फल भी नहीं है। प्रवृत्ति विषय से होती है, अतः एक प्रमाण से ज्ञात वस्तु के ज्ञान का दूसरा हेतु ‘साधकतम’ नहीं है । ( उ० ) ( उस प्रमाण से उत्पन्न तद् विषयक दूसरे ज्ञानरूप ) अपने कार्य के प्रति वही साधकतम है, अन्यथा सभी धारा वाहिक ( कुछ क्षणों तक निरन्तर उत्पन्न होनेवाले एकविषयक अनेक ) ज्ञान अप्रमा हो जायेंगे क्योंकि उन सभी ज्ञानों का विषय एक ही है। प्रत्येक ज्ञान के आश्रयीभूत प्रत्येक क्षण भी उन धारावाहिक ज्ञान में प्रतिभासित नहीं होते, क्योंकि वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं। इसी कारण से दूसरे हेतुओं के प्रयोग में अनवस्था दोष भी नहीं है, क्योंकि उपाय के समाप्त हो जानेपर हेतुप्रदर्शन की यह प्रवृत्ति भी समाप्त हो जाएगी । इस विषय में अब इतना ही बहुत है।
शब्द अगर पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों का गुण न भी हुआ, तथापि इससे यह कैसे समझा जाय कि यह आकाश का ही गुण है ? इसी प्रश्न का उत्तर ‘परिशेषात् इत्यादि से देते हैं । अभिप्राय यह है कि शब्द गुण है, गुण द्रव्य के बिना नहीं रह सकते । शब्द पृथिवो प्रभृति आठ द्रव्यों का गुण नहीं है। इनसे भिन्न कोई द्रव्य (सिद्ध) नहीं है । तस्मात् शब्दरूप गुण का आश्रय ही आकाश है । आकाश के इस परिशेषानुमान में हेतु हे ‘शब्द’। ‘प्रत्यक्षत्वे सति’ यहाँ से लेकर आकाशस्याधिगमे लिङ्गम्’ यहाँ तक के भाष्य ग्रन्थ का यही आशय है। इस विषय में अनुमान प्रयोग इस प्रकार है कि शब्द पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों से भिन्न किसी द्रव्य का गुण है, क्योंकि गुण होने पर भी वह पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में आश्रित नहीं है। जो पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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प्रशस्तपादभाष्यम्
शब्द लिङ्गा विशेशादेकत्वं सिद्धम् । तदनुविधानादेकपृथक्त्वम् । विभव वचनात् परममहत्परिमाणम् । शब्दकारणत्ववचनात् संयोगविभागा विति । अतो गुणवत्वादनाश्रितत्वाच्च द्रव्यम् । समानासमानजातीय
सर्वत्र आकाश में चूँकि शब्दरूप चिह्न समान रूप से है, अतः आकाश में एकत्व की सिद्धि होती है। चूँकि आकाश में एकत्व है, अतः एकपृथक्त्व भी है । “विभववान् महानाकाशस्तथा चात्मा” (७१११२२) इस सूत्र के द्वारा आकाश को वैभवयुक्त कहने के कारण इसमें परममहत् परिमाण भी समझना चाहिए । • संयोगाद्विभागात् शब्दाच्च शब्दनिष्पत्ति:” ( २|२|३१ ) महर्षि ने इस सूत्र के ( द्वारा चूँ कि संयोग और विभाग को शब्द का कारण कहा है, अतः उसमें संयोग
न्यायकन्दली
द्रव्यान्तरगुणो न भवति नासौ गुणत्वे सति पृथिव्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितो यथा रूपादि रिति व्यतिरेकी ।
सद्भावप्रतिपादकादेव प्रमाणादाकाशस्य शब्दगुणत्वं तावत् प्रतीतम् । सम्प्रति सङ्ख्या दिगुणत्व प्रतिपादनार्थमाह – शब्द लिङ्गाविशेषादिति । शब्दो लिङ्गमाका शस्य शब्दश्च सर्वत्राविशिष्ट एक इत्येकरूपमेवाकाशं सिद्धघति, भेदप्रतिपादक प्रमाणाभावादित्यर्थः । ननु शब्दोऽपि तारतरादिरूपेण विविध एव ? सत्यम्, न तु तेन रूपेणास्य लिङ्गता, किन्तु गुणत्वेन, तच्चाविशिष्टं नाश्रयभेदावगमाय प्रभवति, एकस्मादप्याश्रयात् कारण भेदेन तारतरादिभेदस्य शब्दस्योत्पत्त्यविरोधात् ।
का गुण नहीं है, वह पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों में अनाश्रित भी नहीं है, जैसे कि रूपादि । इस प्रकार शब्द आकाश का साधक व्यतिरेकी हेतु है। आकाश की सत्ता के ज्ञापक प्रमाण से यह भी ज्ञात हो गया कि शब्द आकाश का गुण है। ‘शब्दलिङ्गा विशेषात्’ इत्यादि वाक्य से अब यह प्रतिपादन करते हैं कि संख्यादि गुण भी आकाश में हैं। अभिप्राय यह है कि शब्द आकाश का लक्षण है। शब्द सभी स्थानों के आकाश में एक ही प्रकार से है, अतः एक रूप से हो आकाश की सिद्धि होती है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि ‘आकाश परस्पर भिन्न है और अनेक हैं’। ( प्र०) उच्च मन्दादि भेद से शब्द तो अनेक हैं । ( उ०) यह ठीक है कि उच्चमन्दादि भेद से शब्द अनेक प्रकार के हैं, किन्तु मन्दत्वादि उक्त विभिन्न रूपों से तो वह आकाश का लक्षण नहीं है, गुणत्व रूप से ही शब्द आकाश का लक्षण है। गुणत्व तो सभी शब्दों में समान रूप से ही है। तस्मात् मन्दत्वादि भेद से शब्द का अनेकत्व आकाश के अनेकत्व का ज्ञापक नहीं हो सकता, क्योकि एक ही आश्रय में उक्त अनेक प्रकार के शब्दों की उत्पत्ति हो सकती है, इसमें कोई विरोध नहीं है ।
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपावभाष्यम्
प्रशतपादभाष्यम्
[ द्रव्ये आकाश
कारणाभावाच्च नित्यम् । सर्वप्राणिनाञ्च शब्दोपलब्धौ निमित्तं श्रोत्र – भावेन । श्रोत्रं पुनः श्रवणविवरसंज्ञको नभोदेशः, शब्दनिमित्तोपभोगप्रापक धर्माधर्मोपनिबद्धः। तस्य च नित्यत्वे सत्युपनिबन्धक वै कल्याद् वाधिर्य्य मिति । और विभाग भी समझना चाहिए। गुणवत्त्व और अनातित्व (स्वातन्त्र्य ) इन दो हेतुओं से आकाश में द्रव्यत्व की सिद्धि होती है। चूंकि आकाश का समान जातीय या असमानजातीय कोई भी कारण नहीं है, अतः वह नित्य है। श्रोत्ररूप में परिणत होकर वह सभी प्राणियों के शब्द प्रत्यक्ष का कारण है। श्रवण विवर नाम का आकाश प्रदेश ही श्रोत्रेन्द्रिय है। यह श्रोत्र जीव के शब्दप्रत्यक्षमूलक उपभोग के जनक धर्म और अधर्म के साथ सम्बद्ध है, अतः आकाश रूप होने के कारण नित्य होने पर भी धर्म और अधर्म के अभाव से ही उसमें बहरापन आता है।
न्यायकन्दली
तदनुविधानादेकपृथक्त्वमिति | एकत्वानुविधानादेकपृथक्त्वम् । अस्ति चाकाशे भेदप्रतिपादकप्रमाणाभावात् सर्वसिद्ध मेकत्वम्, तेन पृथक्त्वमपि सिद्ध मित्यर्थ: । केचिद्वस्तुनो निजं स्वरूपमेवैकत्वम्, न तु सङ्ख्याविशेष इत्याहुः । तेषामेको घट इति सहप्रयोगानुपपत्तिः पर्य्यायत्वात् । येऽपि पदार्थानां स्वाभाविक मेकपृथक्त्वमित्याहुः, तेषामपि प्रतियोग्यनुसन्धान रहितस्यैकत्वविकल्पवत् पृथक्त्व विकल्पोऽपि प्राप्नोति, न चैवं स्यात्, अयमस्मात् पृथगति पृथक्त्वस्य विकल्पनात् । तस्मान्न तयोरेकत्वम् ।
आकाश में एकत्व के रहने से यह भी समझते हैं कि उसमें एव पृथक्त्व भी है। अभिप्राय यह है कि आकाश में अनेकत्व का ज्ञापक कोई प्रमाण नहीं है, अतः आकाश में एकत्व फलतः सर्वसिद्ध ही है। एवं एकत्व के रहने से आकाश में एक पृथक्त्व भी है ही। कोई कहते हैं कि (प्र०) द्रव्यों में प्रतीत होनेवाला एकत्व अपने आश्रयीभूत द्रव्य का ही स्वरूप है अतः संख्या नाम का कोई गुण नहीं है । ( उ०) किन्तु उनके मत में ‘यह एक घट है’ इस प्रकार एक वाक्य में एक साथ ‘एक’ शब्द और ‘घट शब्द का प्रयोग अनुपपन्न हो जाएगा। क्योंकि उक्त मत में ‘एक’ शब्द और ‘घट’ शब्द दोनों एक ही अर्थ के बोधक होंगे। कोई कहते हैं कि (प्र० ) पृथक्त्व नाम का कोई गुण नहीं है, जिसमें पृथक्त्व प्रतीति होती है, पृथकृत्व उस आश्रय से अभिन्न है। अतः पृथक्त्व अपने आश्रय का ही स्वरूप है। ( उ०) किन्तु पृथक्त्व की प्रतीति उसके प्रतियोगो की प्रतीति के साथ ही होती है। प्रतियोगी के ज्ञान से रहित पुरुषों को पृथक्त्व का ज्ञान नहीं होता है, अतः एकत्व के ज्ञान को तरह पृथक्त्व का ज्ञान भी बिना प्रतियोगी के ही होना चाहिए। चूंकि इससे यह पृथक् है, इस प्रकार की प्रतीति होती है, अतः पृथक्त्व और उसका आश्रय दोनों एक नहीं हैं।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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न्यायकन्दली
विभववचनात् परममहत्परिमाणमिति | द्रव्यत्वादावाकाशस्य परिमाण योगित्वे सिद्धे “विभववान् महानाकाशः” इति सूत्रकारवचनात् परममहत्त्वमाकाशे सिद्धम् । यद्विभु तत्परममहद्, यथात्मा, विभु चाकाशं, तस्मादेतदपि परममहत् । विभुत्वं सर्वगतत्वं तदाकाशस्य कुतः सिद्धमिति चेत् ? सर्वत्र शब्दोत्पादात्, यद्या काशं व्यापकं न भवति, तदा सर्वत्र शब्दोत्पत्तिर्न स्यात्, समवायिकारणाभावे कार्योत्पत्त्यभावात् । दिवि भुव्यन्तरिक्षे चोपजाता: शब्दा एकार्थसमवेताः, शब्दत्वात्, श्रूयमाणाद्यशब्दवत्, श्रूयमाणाद्यशब्दयोश्चैकार्थसमवायः कार्यकारण भावेन प्रत्येतव्यो व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् ।
शब्दकारणत्ववचनात् संयोगविभागाविति । “संयोगाद्विभागाच्छब्दाच्च शब्दस्य निष्पत्तिः” इति सूत्रेणाकाशगुणं प्रति संयोगविभागौ कारणमित्यु क्तम् । तेनाकाशे संयोगविभागौ सिद्धौ व्यधिकरणस्या समवायिकारणत्वा
“सुत्रकार ने चूकि आकाश को विभु कहा है, अतः उसमें परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है” अभिप्राय यह है कि चूंकि आकाश द्रव्य है, अतः उसमें परिमाण है। इस प्रकार परिमाण सामान्य के सिद्ध हो जाने पर “विभववान् महानाकाश:” सूत्रकार की इस उक्ति से आकाश में परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है। जो विभु है वह अवश्य ही परममहत्परिमाण से युक्त है, जैसे कि आत्मा । आकाश विभु है, अतः वह भी परममहत्परिमाण से युक्त है। (प्र०) सभी मूतं द्रव्यों के साथ संयोग ही ‘विभुत्व’ है। वह आकाश में किस हेतु से सिद्ध है ? ( उ०) सभी स्थानों में शब्दों की उत्पत्ति से। अगर आकाश व्यापक न हो तो सभी स्थानों में शब्दों की उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि समवायिकारण के न रहने से ( समवेत ) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है। स्वर्ग, मर्त्य और पाताल इन सबों में उत्पन्न सभी शब्द एक ही द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से हैं, क्योंकि सभी ‘शब्द’ हैं, जैसे कि श्रयमाण शब्द और प्रथम शब्द ‘श्रयमाण शब्द और उसको उत्पादक पहिला शब्द दोनों एक ही आश्रय में रहते हैं’ यह इसी से अनुमान करना चाहिए कि पहिला शब्द श्रूयमाण शब्द का कारण है। क्योंकि विभिन्न स्थानों में रहनेवाली एवं विभिन्न स्थानों में उत्पत्तिशील वस्तु उस स्थान में उत्पन्न होनेवाली वस्तु का असमवायिकारण नहीं हो सकती है ।
“सूत्रकार ने चूंकि आकाश को शब्द का कारण कहा है, अतः आकाश में संयोग और विभाग ये दोनों गुण भी सिद्ध होते हैं।” अर्थात् “संयोगात् विभागातू शब्दाच्च शब्दस्य निष्पत्तिः” इस सूत्र से यह कहा है कि आकाश के गुण शब्द के संयोग और विभाग असमवाधिकारण हैं। इसी से आकाश में संयोग और विभाग की भी सिद्धि होती है, क्योंकि एक आश्रय में रहनेवाली वस्तु किसी दूसरे आश्रय में २०
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये आकाश
भावात् । अतो गुणवत्त्वादनाश्रितत्वाच्च द्रव्यम् । यत आकाशं गुणवद् अतो गुणवत्त्वाद् द्रव्यं घटादिवत्, न केवलं गुणवत्त्वादाकाशं द्रव्यमनाश्रितत्वाच्च परमाणु वत् । समानासमानजातीयकारणाभावाच्च नित्यमिति । समानजातीयं सम वायिकारणमसमानजातीयमसमवायिकारणं निमित्तकारणञ्च तेषामभावान्त्रि त्यम् । सर्वप्राणिनां शब्दोपलब्धौ निमित्तमिति । नन्वेवं सर्वेषां सर्वशब्दोप लब्धिराकाशस्य सर्वत्राविशेषादत आह- श्रोत्रभावेनेति । किं पुनः श्रोत्रं तत्राह श्रोत्रं पुनरिति । श्रूयतेऽनेनेति श्रवणं, श्रवणञ्च तद्विवरञ्चेति श्रवणविवरं, तदेव संज्ञा यस्य नभोवेशस्य स नभोदेशः श्रोत्रम्, तत्पिधाने शब्दस्यानुपलम्भात् । तस्य विशेषणमाह – शब्दनिमित्तेत्यादिना । शब्दनिमित्त उपभोग सुखदःखानुभव स्तस्य प्रापकाभ्यां धर्म्माधर्म्माभ्यामुपनिबद्धः सहकृत इति । अयमर्थः – यस्य बाह्यकैकेन्द्रियग्राह्य विशेषगुणग्राहकं यदिन्द्रियं तत्तद्गुणकं यथा रूपग्राहकं चक्षु रूपाधिकरणम्, श्रोत्रञ्च तथाभूतस्य शब्दस्य ग्राहकं तस्मात्तदपि शब्दगुणकम् ।
रहनेवाली वस्तु का असमवायिकारण नहीं हो सकती । आकाश चूँकि गुणवान् है और स्वतन्त्र है, अतः द्रव्य है। आकाश में चूँकि गुण है, अतः वह द्रव्य है। केवल गुण ही आकाश में द्रव्यश्व का साधक नहीं है, यतः आकाश ‘अनाश्रित’ अर्थात् स्वतन्त्र है इसलिए भी वह द्रव्य है, जैसे कि परमाणु चूंकि उसका समानजातीय अथवा असमानजातीय कोई भी कारण नहीं है, अतः वह नित्य है ( द्रव्य का ) समवाधिकारण समानजातीय कारण है, एवं असमवायिकारण और निमित्तकारण दोनों (द्रव्य के) असमानजातीय कारण हैं। आकाश के इन दोनों में से कोई भी कारण उपलब्ध नहीं है, अतः आकाश नित्य है। वह सभी प्राणियों के शब्दप्रत्यक्ष का कारण है । ( प्र० ) इस प्रकार तो सभी शब्दों का प्रत्यक्ष चाहिए? क्योंकि आकाश तो सर्वत्र समानरूप से विद्यमान है। इसीलिए कहा है ‘श्रोत्रभावेन’, अर्थात् श्रोत्ररूप से ही आकाश शब्दप्रत्यक्ष का कारण है। धोत्र किसे कहते हैं ? इस प्रश्न का समाधान ‘श्रोत्रं पुनः’ इत्यादि से कहते हैं। ‘भवणविवरसंज्ञकम्’ इस समस्त वाक्य का विग्रह यों है कि ‘श्रवणञ्च तद्विवरञ्चेति श्रवणविवरम् तदेव संज्ञा यस्य’ अर्थात् शब्दप्रत्यक्ष का कारण विवर’ रूप आकाश हो ‘भोत्र’ है, क्योकि उस विवर के ढँक जानेपर शब्द का प्रत्यक्ष नहीं होता है। ‘शब्दनिमित्त’ इत्यादि से उसका विशेश कहते हैं । शब्दमूलक ‘उपभोग’ अर्थात् सुखदुःखानुभव के प्रापक जो धर्माधर्म हैं, उनसे युक्त होकर ही ओोत्र इन्द्रिय है। अभिप्राय यह है कि एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले जितने भी विशेष गुण हैं, उनकी ग्राहक इन्द्रियाँ भी तत्तद्विशेष गुण से युक्त हैं। जैसे रूप की ग्राहक चक्षुरिन्द्रिय रूप से युक्त है, उसी प्रकार श्रोत्र भी शब्द प्रत्यक्ष का कारण होने से शब्द से युक्त है। अतः उसमें
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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प्रशस्तपादभाष्यम्
परापरव्य तिकर यौगपद्यायौगपद्यचिरक्षिप्रप्रत्यय
कालः
विषयेषु पूर्व प्रत्यय विलक्षणानामुत्पत्तावन्यनिमित्ता
लिङ्गम् । तेषां ( एक ही वस्तु में ) परत्व और अपरत्व का वैपरीत्य, एककालिकत्व, एवं विभिन्नकालिकत्व, विलम्ब एवं शीघ्रता इन सबों की प्रतीति रूप हेतुओं से काल का अनुमान होता है। इनमें से प्रत्येक प्रतीति शेष प्रतीतियों से विलक्षण है।
न्यायकन्दली
शब्दश्चाकाशगुण इति निर्णीतम्, तेनाकाशमेव तावच्छोत्रं, तच्च व्यापकमपि न सर्वत्र शब्दमुपलम्भयति प्राणिनामदृष्टवशेन कर्णशष्कुल्यधिष्ठान नियतस्यैव तस्येन्द्रि यत्वात्, यथा सर्वगतत्वेऽप्यात्मनो देहप्रदेशे ज्ञातृत्वं नान्यत्र, शरीरस्योपभोगार्थत्वात्, अन्यथा तस्य वैयर्थ्यात् । नन्वेवमपि बधिरस्य शब्दोपलब्धि: स्यात् कर्णशष्कुली सद्भावादत्राह- तस्य चेति । तस्याकाशस्य नित्यत्वेऽप्युपनिबन्धकयोधंम्र्म्मा धर्म्मयोः सहकारिभूतयोवैंकल्यादभावाद् बाधिर्य्यम् । इतिशब्दः समाप्तौ ।
कालस्य निरूपणार्थमाह- काल इति । दिग्विशेषापेक्षया यः परस्त स्मिन्नपर इति प्रत्ययः, यश्चापरस्तस्मिन् पर इति प्रत्ययः परापरयोर्व्यतिकरो व्यत्ययः । तथा च युगपत्प्रत्ययोऽयुगपत्प्रत्ययश्च, क्षिप्रप्रत्ययश्चिरप्रत्ययश्च काल
भी शब्द रूप विशेष गुण है। यह निर्णय कर चुके हैं कि शब्द आकाश का गुण है, अतः श्रोत्रेन्द्रिय आकाश रूप ही है । व्यापक होने पर भी उससे सर्वत्र सभी शब्दों का प्रत्यक्ष नहीं होता है, क्योंकि प्राणियों के धर्म और अधर्म से कर्णशष्कु ल्यवच्छिन्न आकाश में ही इन्द्रियत्व है। जैसे कि आत्मा में सभी मूर्त द्रव्यों के साथ समान रूप से संयोग रहनेपर भी देहप्रदेश विशिष्ट आत्मा में ही ज्ञान का कत्तु त्व है और प्रदेशों के साथ संयुक्त आत्मा में नहीं, क्योंकि शरीररूप द्रव्य ही भोग का आयतन है। अन्यथा उसकी और कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । ( प्र ० ) इस प्रकार तो बहरे आदमियों को भी शब्द का प्रत्यक्ष होना चाहिए ? इस प्रश्न का समाधान ‘तस्य च’ इत्यादि से देते हैं । ‘तस्य’ अर्थात् आकाश रूप होने के कारण श्रोत्र के नित्य होनेपर भी उसके सहायक धर्म और अधर्म से ही आदमी बहरे होते हैं। यहाँ ‘इति’ शब्द समाप्ति का सूचक है।
काल का निरूपण करने के लिए ‘काल’ इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं। जैसे कि एक स्थान किसी दिशा की अपेक्षा दूर है, उसीमें फिर दूसरी दिशा विशेष की अपेक्षा सामीप्य की भी प्रतीति होती है । एवं कोई स्थान किसी विशेष दिशा से समीप है। उसीमें किसी विशेश दिशा से दूरत्व की भी प्रतीति होती है। यही परल और अपरत्व का ‘व्यतिकर अर्थात् व्यत्यय है। एककालिकत्व और विभिन्नकालिकत्व
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये काल
प्रशस्तपादभाष्यम्
भावाद्यदत्र निमित्तं स कालः । सर्वकार्य्याणाञ्चोत्पत्ति स्थितिविनाश हेतुस्तव्यपदेशात् । क्षणलव निमेषकाष्ठाकला मुहूर्त्तयामाहोरात्रार्द्ध मासमा सवयनसंवत्सरयुग कल्पमन्वन्तरप्रलय महाप्रलयव्यवहारहेतुः ।
प्रतीतिगत इन वैलक्षण्यों का कोई कारण अवश्य है, उसी को ‘काल’ कहते हैं । यह सभी उत्पत्तियों और विनाशों का कारण है, क्योंकि सभी उत्पत्ति और विनाश काल से युक्त होकर ही कहे जाते हैं। यह क्षण, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, याम, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, कल्प, मन्वन्तर, प्रलय और महाप्रलय इन सबों के व्यवहार का कारण है।
न्यायकन्दली
लिङ्गम् । ननु कालस्याप्रत्यक्षत्वात् तेन सह परापरादिप्रत्ययानां व्याप्तिग्रहणा भावात् कुतो लिङ्गत्वमत आह- तेषामिति । तेषां युगपदादिप्रत्ययानां विषयेषु द्रव्यादिषु पूर्वप्रत्ययविलक्षणानां द्रव्यादिप्रत्ययविलक्षणानामुत्पत्तावन्यस्य निमित्त स्याभावात् । एतदुक्तं भवति – द्रव्यादिषु विषयेषु पूर्वापरादिप्रत्यया जायन्ते, न चैषां द्रव्यादयो निमित्तं तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात्, न च निमित्तमन्तरेण कार्य्यस्यो त्पत्तिरस्ति, तस्माद्यदत्र निमित्तं स काल इति ।
आदित्यपरिवर्त्तनाल्पीयस्त्वभूयस्त्वनिबन्धनो युवस्थविरयोः परापरव्यवहार इत्येके, तदयुक्तम्, आदित्यपरिवर्त्तनस्य युवस्थविरयोः सम्बन्धाभावादसम्बद्धस्य निमित्तत्वे चातिप्रसङ्गात् ।
इन दोनों की प्रतीतियाँ भी काल की ज्ञापक हेतु हैं । ( प्र०) काल का तो प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः उन प्रतीतियों के साथ उसकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती हैं। अतः वे किस प्रकार हेतु हो सकती हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर ‘तेषाम्’ इत्यादि से देते हैं। ‘तेषाम’ काल के ज्ञापक उन प्रतीतियों के विषय द्रव्यादि से विलक्षण इस ज्ञान की उत्पत्ति में काल को छोड़कर और कोई भी कारण नहीं है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि द्रव्यादि विषयों में परत्व और अपरस्व की प्रतीतियाँ होती हैं। उनके कारण वे द्रव्य नहीं हैं, क्योंकि केवल द्रव्यादि विषयक प्रतीतियों से परत्वादि विषयक प्रतीति विलक्षण आकार की होती है। निमित्त के बिना कार्य की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। तस्मात् उन ( विलक्षण ) प्रतीतियों का कारण हो ‘काल’ है ।
कोई कहते हैं कि सूर्य की गति की अधिकता एवं न्यूनता से ही वृद्ध और युवक में परत्व एवं अपरत्व की प्रतीति होती है, किन्तु यह ठीक नहीं है। क्योंकि सूर्य की गति के साथ उस वृद्ध और युवक का कोई भी सम्बन्ध नहीं है। असम्बद्ध पदार्थ को कारण मानने से अतिप्रसङ्ग होगा।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१५७
न्यायकन्दली
सहभावो यौगपद्यमित्यपरे, तदसङ्गतम्, कालानभ्युपगमसहार्थाभावात् । कस्याञ्चित् क्रियायां भावानामन्योन्यप्रतियोगित्वं सहार्थ इति चेन्न, अनुत्पन्नस्थित निरुद्धानामन्योन्यप्रतियोगित्वाभावात् सहभवताञ्च प्रतियोगित्वे कालस्याप्रत्या ख्यानमेवेत्युक्तम् । एवमयुगपदादिप्रत्यया अपि समर्थनीयाः । कालस्याभेदात् कथं प्रत्ययभेद इति चेत् ? सामग्रीभेदात्, वस्तुद्वयस्योत्पादसद्भावयोर्यदेकेन ज्ञानेन ग्रहणं तत्सहकारिणा कालेन परापरप्रत्ययौ जन्येते, भूयसामुत्पादव्यापारयो रेकग्रहणसहकारिणा युगपत्प्रत्ययः, कार्य्यस्योत्पादविनाशयोरन्तवंत्तनां क्रियाक्षणानां भूयस्त्वाल्पीयस्त्वग्रहणसहकारिणा चिरक्षिप्रप्रत्ययाविति यथासम्भवं वाच्यम् । ननु तत्तन्निबन्धन एवास्तु प्रत्ययभेदः कृतं कालेन ? न, असति तस्मिन् वस्तू त्पादाभावात् । न तावदत्यन्तसतो गगनस्योत्पादः, नाप्यत्यन्तासतो नरविषाणस्य, किन्तु प्रागसतः । कालासत्वे चाभावविशेषणस्य प्राक्शब्दार्थस्यां भावान्नायं विशेष:
कोई कहते हैं कि एक साथ रहना हो ‘योगपद्य’ है एक कालिकत्व नहीं, किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि काल के न मानने पर ‘सह’ शब्द का कुछ अर्थ हो नहीं होता है । ( प्र० ) किसी क्रिया में अनेक वस्तुओं का अविरोधित्व ही ‘सह शब्द का अर्थ है । ( उ० ) जिसकी उत्पत्ति नहीं हुई है, एवं जो विद्यमान है, एवं जिसका नाश हो गया है, इन तीनों में परस्पर विरोध की कोई सम्भावना ही नहीं है। एक साथ होनेवाले पदार्थों में अगर परस्पर विरोध मानें तो एक काल का न मानना असम्भव ही है। इसी प्रकार अयोगपद्य विषयक प्रतीति का भी समर्थन करना चाहिए | ( प्र० ) काल अगर एक ही है तो तन्मूलक प्रतीतियों में अन्तर क्यों है ? ( उ० ) कारणों ( सामग्री ) के भेद से एक वस्तु की उत्पत्ति और दूसरी वस्तु की स्थिति इन दोनों का एक ज्ञान से ग्रहण ही परत्व और अपरत्व की प्रतीति है । यह प्रतीति अपने सहकारी कारण ‘काल’ से उत्पन्न होती है। बहुत सी वस्तुओं के उत्पादन आदि व्यापारों के एक ज्ञान का सहकारिकाणीभूत ‘काल’ से ही युगपत्प्रत्यय होता है। कार्यों की उत्पत्ति और विनाश के बीच की क्रियाओं के आधार जितने क्षण हैं उन्हीं की न्यूनता और अधिकता से विलम्बस्व और क्षिप्रत्व की प्रतीति होती है। इसी प्रकार और भी कल्पना करनी चाहिए | ( प्र०) (सहकारी काल के अति रिक्त उनके और) निमित्तों से ही उन विलक्षण ( युगपदादि) प्रत्ययों की उत्पत्ति हो ? ( उ०) काल की सत्ता न मानने से सभी वस्तुओं की उत्पत्ति ही अनुपपन्न हो जाएगी, क्योंकि अत्यन्त ‘सत्’ वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती हैं, जैसे कि गगनादि की, अत्यन्त असत् वस्तु की भी उत्पत्ति नहीं होती है, जैसे कि नरविषाण की। किन्तु ‘प्रागसत्’ अर्थात् पहिले से अविद्यमान वस्तु की ही उत्पत्ति होती है। अगर ‘काल’
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न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये काल
सिद्धयतीति न कस्यचिदुत्पत्तिः स्यात् । अप्रत्यक्षेण कालेन कथं विशिष्टा प्रतीतिरिति चेत् ? तत्राह कश्चित् – विशिष्ट प्रत्ययस्योत्पत्ताविन्द्रियवत् कारणत्वं कालस्य, न तु दण्डवद् विशेषणत्वमिति, तद्सारम्, बोधेकस्वभावस्य ज्ञानस्य विषयसम्बन्धमन्तरेण विशेषणान्तराभावात् । तस्मादन्यथोच्यते । युवस्थविरयोः शरीरावस्थाभेदेन तत्कारणतया कालसंयोगेऽनुमिते सति पश्चात्तयोः कालविशिष्टतावगतिः प्रत्येतुरेकत्वात्, प्रमाणान्तरोपनीतस्यापि विशेषणत्वाविरोधात्, यथा सुरभि चन्दनमिति । यथा वा मोमांसकानामघट भूतलमिति, घटादिषु तु मूर्त्तद्रव्यत्वेनावस्थाभेदेन वा शरीरवत् कालसम्बन्धेऽनुमिते तद्विशिष्टो युगपदादिप्रत्ययो जातः । पश्चात् कार्यत्वादिविप्रतिपन्नं प्रति काललिङ्गत्वमित्यनवद्यम् ।
की सत्ता न रहे तो ‘प्रागसत्’ शब्द के अर्थ उस अभाव विशेषार्थक असत् शब्द में विशेषण रूप ‘प्राक्’ शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं होता है। इससे अनुत्पत्तिशील गगनादि और अत्यन्त असत् नरविषाणादि से उत्पत्तिशील घटादि में प्रागसत्व’ रूप विशेष की सिद्धि नहीं होगी, अतः उन्हीं अनुत्पत्तिशील वस्तुओं की तरह और सभी वस्तुओं का उत्पादन असम्भव हो जाएगा । ( प्र० ) अप्रत्यक्ष काल रूप विशेषण से युक्त प्रागसत्त्व रूप विशेषण का ज्ञान ही कैसे होगा ? इस प्रश्न का समाधान कोई यों देते हैं कि प्राग सत्त्व की विशिष्ट प्रतीति में काल इन्द्रियों की तरह सामान्य कारण है, दण्डादि की तरह विशेष नहीं । ( उ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि बोधमात्र स्वभाव के ज्ञानों में विषयों के सम्बन्ध को छोड़कर परस्पर भेद का कोई प्रयोजक नहीं है, अतः उक्त आक्षेप का दूसरा समाधान कहते हैं। बालक और वृद्ध के शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से शरीरभेद का अनुमान होता है। एवं इस विभिन्नशरीरता के कारण रूप से काल का अनुमान होता है। उन शरीरों में कालविशिष्टता की प्रतीति होती है। क्योंकि ज्ञाता एक ही है। प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाणों से ज्ञात अर्थों को भी विशेषण मान लेने में कोई बाधा नहीं है। जैसे कि ‘सुरभि चन्दनम्’ इत्यादि स्थलों में, अथवा मीमांसकों के अघटं भूतलम्’ इत्यादि स्थलों में घटादि द्रव्यों में उक्त शरीर की तरह, अथवा मूतंद्रव्यत्व हेतु से काल का संयोग अनुमित होनेपर एककालिकत्व ( यौगपद्य ) की प्रतीति होती है। उसके बाद काल रूप कारण उन प्रतीतियों से काल का अनुमान होता है। इस प्रकार काल की सत्ता के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवाले पुरुष को काल की सत्ता समझाने के लिए इन यौगपद्यादि प्रतीतियों को हेतु मानने में कोई बाधा नहीं हूं।
प्रकरणम् ]
●भाषानुवादसहितम्
१५९
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्य गुणाः सङ्ख्यापरिमाणपृथकृत्वसंयोगविभागाः | काललिङ्गा विशेषादेस्त्रं सिद्धम् । तदनुविधानात् पृथक्त्वम् । कारणे काल इति
इसमें संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच गुण । कालप्रतीति के ज्ञापक हेतु चूँकि सभी स्थलों में समानरूप से हैं, अतः वह एक ही है। एवं चूँकि उसमें एकत्व संख्या है, अतः पृथक्त्व भी है । “कारणे कालाख्या ( ७११११५) इस सूत्र के बल से इसमें
न्यायकन्दली
सर्वकार्य्याणाञ्चोत्पत्तिविनाशहेतुः । अत्र युक्तिमाह- तद्व्यपदेशादिति । तेन कालेनोत्पत्यादीनां व्यपदेशात् उत्पत्तिकालो विनाशकाल इत्यादिव्यप देशात् कालस्य तत्र हेतुत्वमित्यर्थः । कार्य्यान्तरमपि तस्य कथयति क्षणलवेत्यादि । निमेषस्य चतुर्थो भागः क्षणः, क्षणद्वयेन लवः, अक्षिपक्ष्मकर्मो पलक्षितकालो निमेष इत्यादिगणितशास्त्रानुसारेण प्रत्येतव्यम् ।
एवं धम्मिणि सिद्ध तस्य गुणान् कथयति- तस्य गुणा इति । कालस्य द्रव्यत्वात् सङ्ख्यादियोगे सिद्धे तद्विशेषप्रतिपादनार्थमाह- काललिङ्गाविशेषादिति । कालस्य लिङ्गानां युगपदादिप्रत्ययानामविशेषादेकत्वम्, कालस्य भेदे प्रमाणान्त राभावादित्यर्थः । ननु युगपदादिप्रत्ययभेद एव तद्भेदप्रतिपादकः ? नैवम्, कालाभेदेऽपि सहकारिभेदात् प्रत्ययभेदोपपत्ते: । तदनुविधानात् पृथक्त्वमिति |
‘वह सभी कार्यों की उत्पत्ति स्थिति और विनाश जा कारण है। ‘तद्वयपदेशात्’ इत्यादि से इसी में हेतु देते हैं । ‘तेन’ अर्थात् उस काल के ‘व्यपदेश’ अर्थात् व्यवहारों से । अभिप्राय यह है कि इसका यह उत्पत्तिकाल है, इसका यह विनाशकाल है’ इत्यादि व्यवहारों से काल में उत्पत्त्यादि तीनों के कारणत्व की सिद्धि होती है । ‘क्षणलव’ इत्यादि से काल के द्वारा होनेवाले कार्यों को कहते हैं । ‘निमेष’ का चौथा भाग ‘क्षण’ है। दो क्षणों का एक ‘लव’ होता है। आँख के पलकों की क्रिया से उपलक्षित काल को ‘निमेष’ कहते हैं। ये सभी गणितशास्त्र के द्वारा जानना चाहिए ।
इस प्रकार कालरूप धर्मी के सिद्ध हो जानेपर ‘तस्य गुणाः’ इत्यादि से उसके गुण कहे गये हैं। द्रव्यत्व हेतु के द्वारा काल में सामान्य संख्यादि की सिद्धि हो जानेपर उसमें विशेष संख्यादि की सिद्धि के लिए काललिङ्गाविशेषात् यह हेतु वाक्य लिखते हैं। अभिप्राय यह है कि काल की ज्ञापक योगपद्यादि विषयक प्रतीतियाँ सभी कालों में समान रूप से हैं, अत: ‘काल’ एक ही है। काल में अनेकत्व का ज्ञापक कोई प्रमाण भी नहीं है । ( प्र०) यौगपद्यादि की विभिन्न प्रतीतियाँ काल
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये काल
प्रशस्तपादभाष्यम्
वचनात् परममहत्परिमाणम् । कारणपरत्वादिति वचनात् संयोगः । तविनाशकत्वाद् विभाग इति । तस्याकाशवद्रव्यत्वनित्यत्वे सिद्धे । काल लिङ्गा विशेषादञ्ज सैकत्वेऽपि सर्वकार्याणामारम्भक्रियाभिनिर्वृत्ति स्थिति निरोधोपाधिभेदान्मणिवत्पाचकवद्वा नानात्वोपचार इति ।
महत्परिमाण भी समझना चाहिए। “कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे” ( ७१२।२२) इस सूत्र के बल से इसमें संयोग की सिद्धि समझनी चाहिए। विभाग चूँकि संयोग का विनाशक है, अतः विभाग भी काल में हैं। उसमें आकाश की ही तरह द्रव्यत्व और नित्यत्व भी सिद्ध हैं। चूँकि सभी कालों में उसके ज्ञापक हेतु समान रूप से हैं, अतः यद्यपि वह एक ही है, तथापि सभी क्रियाओं के आरम्भ, स्थिति और समाप्ति आदि उपाधियों से मणि और पाचक की तरह अनेकों जैसा प्रतीत होता है ।
न्यायकन्दली
एकत्वस्य पृथक्त्वानुविधानं साहच्यर्यनियमः, तेनैकत्वात् पृथक्त्वसिद्धिः । कारणे काल इति वचनात् । परममहत्परिमाणमित्यनेन “कारणे कालाख्या” इति सूत्रं लक्षयति । युगपदादिप्रत्ययानां कारणे कालाख्या कालसंज्ञेति सूत्रार्थः । तेन व्यापकः कालो लभ्यते, युगपदादिप्रत्ययानां सर्वत्र भावादित्यभिप्रायः । कारणपरत्वा दिति वचनात् संयोग इति । “कारणपरत्वात् कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे” इति सूत्रे कारणपरत्वशब्देन कालपिण्डसंयोगोऽभिहितः । तेनास्य संयोगगुणत्वं सिद्धम् ।
के अनेकत्व की ज्ञापिका होंगी ? ( प्र०) काल के एक मान लेनेपर भी सहकारियों के भेद से उन विभिन्न प्रतीतियों की सिद्धि हो जाएगी। उसके अनुविधान से ही काल में पृथक्त्व भी हैं। अभिप्राय यह है कि एकत्र के साथ ‘पृथक्त्व’ का ‘अनुविधान’ अर्थात् नियत साहचर्य है। अतः काल में एकत्व की सिद्धि से पृथकृत्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
‘कारणे काल:’ सूत्रकार की इस उक्ति से काल में परममहत्परिमाणवस्वरूप विभुत्व की भी सिद्धि समझनी चाहिए । कथित ‘उक्ति’ शब्द से “कारणे कालाख्या” ( ७ । १ । २५ ) इस सूत्र को समझना चाहिए | उस सूत्र का यह अर्थ है कि योगपद्यादि विषयक प्रतीतियों के असाधारण कारण का ही नाम ‘काल’ है चूंकि ये यौगपद्यादि की प्रतीतियाँ सभी स्थानों में होती हैं, अतः यह समझना चाहिए कि काल व्यापक है । कारणपरत्ववचनात्’ अर्थात् “कारणपरत्वात् कारणापरत्वाच्च परत्वा परत्वे” ( ७ | २ | २२) इस सूत्र में महर्षि कणाद के द्वारा प्रयुक्त कारणपरत्व शब्द से काल और पिण्ड ( अवयवी द्रव्य ) का संयोग अभिप्रेत है। इसीसे काल में संयोगरूप
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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न्यायकन्दली
तद्विनाशकत्वाद्विभाग इति । तस्य संयोगस्य कृतकत्वादवश्यं विनाशिनो विभागो विनाशकः, सर्वत्राश्रयविनाशाभावात् । अतः काले विभागसिद्धिधंधिकर •णस्य विभागस्याविनाशकत्वात् । तस्याकाशवद् द्रव्यत्वनित्यत्वे सिद्धे ( इति ) । यथा गुणवत्त्वादनाश्रितत्वाच्चाकाशं द्रव्यं तथा कालोऽपि यथा समानासमान जातीय कारणाभावान्नित्यमाकाशं तथा कालोऽपि ।
यद्येकः कालः कथं तत्रानेकव्यपदेश इत्याह- काललिङ्गाविशेषादिति । काललिङ्गानां परापरादिप्रत्ययानामविशेषाद् भेदाप्रतिपादकत्वादजसा मुख्यया वृत्त्या कालस्यैकत्वेऽपि सिद्धे नानात्वोपचारान्नानात्वव्यपदेशः । कुतः ? सर्वेषां कार्य्यणामारम्भ उपक्रमः, क्रियाया अभिनिवृत्तिः क्रियायाः परिसमाप्तिः, स्थितिः स्वरूपावस्थानम्, निरोधो विनाशः एषामुपाधीनां भेदानानात्वव्यपदेशः । यथैको मणिः स्फटिकादिनलाद्युपाधिभेदान्नील इति पीत इति व्यपदिश्यते तथा कालोऽप्येक एवोपाधिभेदादारम्भकाल इति, क्रियाभिव्यक्तिकाल इति, निरोधकाल
गुण की सिद्धि होती है। विभाग चूंकि संयोग का विनाशक है, अतः विभाग भी काल में अवश्य है। अभिप्राय यह है कि संयोग उत्पत्तिशील है, उसके विनाशकों में से विभाग भी एक है क्योंकि सभी जगह संयोग का नाश आश्रय के नाश से ही नहीं होता है। एक अधिकरण में रहनेवाला विभाग अन्य अधिकरण में रहनेवाले संयोग का नाश नहीं कर सकता । अतः काल में विभाग भी अवश्य ही है। आकाश की ही तरह इसमें द्रव्यत्व और नित्यत्व भी है, अर्थात् जिस प्रकार अनाभितत्व और गुणत्व हेतु से आकाश द्रव्य है, उसी प्रकार उन्हीं हेतुओं से काल भी द्रव्य है । जैसे समानजातीय और असमानजातीय कारणों के अभाव से आकाश नित्य है, वैसे ही काल भी उसी हेतु से नित्य है। यदि काल एक है तो फिर उसमें अनेकत्व की प्रतीति कैसे होती है ? इसी प्रश्न का उत्तर ‘काललिङ्गाविशेषात्’ इत्यादि से देते हैं। अभिप्राय यह है कि काल को ज्ञापक योगपद्यादि प्रतीतियों के ‘अविशेष’ से अर्थात् भेदप्रतिपादक प्रमाण के न रहने से ‘अञ्जसा’ अर्थात् मुख्यवृत्ति से काल यद्यपि एक ही है, किन्तु लक्षणारूप गौणवृत्ति से उसमें नानात्व का भी व्यवहार होता है, क्योंकि सभी कार्यों का आरम्भ अर्थात् उपक्रम, सभी क्रियाओं की ‘अभिनिवृत्ति’ अर्थात् समाप्ति, ‘स्थिति अर्थात् अपने रूप से विद्यमानता, निरोध’ अर्थात् विनाश, इन उपाधियों की विभिन्नता से एक हो काल में नानात्व का व्यवहार होता है। जैसे एक ही मणि स्फटिकादि और नीलादि उपाधियों से कभी नील और कभी पीत प्रतीत होती हैं, वैसे ही उक्त उपाधियों के भेद से एक ही काल कभी आरम्भकाल, कभी क्रिया को अभिव्यक्ति का काल, कभी निरोधकाल इत्यादि नाना रूपों
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये विकू
प्रशस्तपादभाष्यम्
दिक पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा । मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा मूर्ते ष्वेव द्रव्येष्वेतस्मादिदं पूर्वेण दक्षिणेन पश्चिमेनोत्तरेण पूर्वदक्षिणेन दक्षिणापरेणापरोत्तरेणोत्तरपूर्वेण चाधस्तादुपरिष्टाच्चेति दश प्रत्यया
यतो भवन्ति सा दिगिति, अन्यनिमित्तासम्भवात् ।
‘यह पूर्व है, यह पश्चिम है’ इत्यादि प्रतीतियों से अनुमित होनेवाला (द्रव्य ही) दिक् है। किसी मूर्त्त द्रव्य को अवधि बनाकर किसी दूसरे मूर्त्त द्रव्य में ही इससे यह पूर्व है या इससे यह दक्षिण है, पश्चिम है, उत्तर है, पूर्वदक्षिण है, दक्षिणा पर है, अपरोत्तर है, उत्तरपूर्व है, इससे ऊपर है या इससे नीचे है, ये दश प्रकार के ज्ञान जिससे होते हैं उसे ही ‘दिक्’ कहते हैं। इन प्रतीतियों का कोई अन्य ( असाधारण कारण सम्भव नहीं है ।
न्यायकन्दली
इति व्यपदिश्यत इत्यर्थः । मणेरुपाधिसम्बन्धो न वास्तवः, कालस्य तु क्रिया सम्बन्धो वास्तव इति प्रतिपादयितुं दृष्टान्तान्तरमाह- पाचकेति । यथैकस्य पुरुषस्य पचनादिक्रियायोगात् पाचक इति पाठक इति व्यपदेशस्तथा कालस्यापि, न तु प्रारम्भादिक्रियैव कालः, विलक्षणबुद्धिवेद्यत्वादिति ।
युगपदादिप्रत्ययलिङ्गत्वमिव कालस्य पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गत्वं दिशो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह – दिक् पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गेति । पूर्वमित्य परमित्यादिप्रत्ययो लिङ्गं यस्या दिशः सा तथोक्ता । एतदेव दर्शयति- मूर्त्तद्रव्य मित्यादिना । अमूर्तस्य द्रव्यस्य नावधित्वम्, नापि पूर्वापरादिप्रत्ययविषयत्व से व्यवहृत होता है। मणि एवं उपाधियों का सम्बन्ध अवास्तविक है, किन्तु काल और क्रिया का सम्बन्ध तो वास्तविक है, यही दिखलाने के लिए ‘पाचक’ इत्यादि सन्दर्भ से प्रकृत विषय के अनुरूप दूसरा दृष्टान्त देते हैं। अर्थात् जिस प्रकार एक ही पुरुष में पाक क्रिया के सम्बन्ध से ‘यह पाचक है’ एवं पठन क्रिया के सम्बन्ध से यह पाठक है’ इत्यादि अनेक व्यवहार होते हैं, वैसे ही काल में भी समझना चाहिए। प्रारम्भादि क्रियायें ही काल नहीं हैं, क्योंकि उनसे विलक्षण काल की प्रतीति होती है ।
जैसे योगपद्यादि प्रतीति से ज्ञात होना काल का असाधारण धर्म है, वैसे ही ‘यह पूर्व है, यह पश्चिम है’ इत्यादि प्रतीतियों से ज्ञात होना ‘दिक् का असाधारण घमं है’ यही वैलक्षण्य प्रतिपादन करते हुए ‘दिक् पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा’ इत्यादि पंक्ति लिखते हैं। “पूर्वमपरमित्यादि प्रत्ययो लिङ्गं यस्याः सा पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा” इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसकी ज्ञापक ‘यह पूर्व है, यह पश्चिम है इत्यादि प्रतीतियाँ हैं,
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
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न्यायकन्दली
मस्त्यनवच्छिन्न परिमाणत्वात् । अत इदमुक्तं मूर्त्तद्रव्यमवधि कृत्वा, मूर्त्तेष्वेव द्रव्ये व्विदमस्मात् पूर्वेणेत्यादिप्रत्यया यतो भवन्ति सा दिगिति। एतस्मादिदं पूर्वमित्य स्मिन्नेवायें पूर्वेर्णेति निर्देशः, प्रातिपदिकार्थे तृतीयोपसङ्ख्यानाद् ।
ननु पूर्वापरादिप्रत्ययानां कार्य्यत्वात्कारणमनुमोयते, तत्तु दिगेवेति कुतो निश्चयः ? तत्राह – अन्यनिमित्तासम्भवादिति। न तावत् पूर्वापरादिप्रत्ययानां द्रव्य मात्रं निमित्तम्, यथाकथञ्चिदवस्थिते द्रव्ये तेषामुत्पत्तिप्रसङ्गात् । परस्परा पेक्षया द्रव्ययोरुत्पत्तिनिमित्तत्वेऽपि स एव दोषः, उभयाभावप्रसङ्गश्चाधिक: । क्रियागुणादिनिमित्तत्वे च समानगुणक्रियादिषु प्रत्ययविशेषो न स्यात् । तेन यदेषां निमित्तं सा दिगिति । यत्रतस्मादिदमिति पञ्चमी प्रयुज्यते, अन्यथा सापि निर्विषया वही ‘पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा’ शब्द का अर्थ है । यही ‘मूर्तद्रव्यमवधि कृत्वा’ इत्यादि से समझाते हैं। अमूर्त (आकाशादि) द्रव्य किसी के अवधि नहीं हो सकते और न वे उक्त पूर्वापरादि प्रत्यय के विषय ही हैं, क्योंकि उनमें परममहत्परिमाण है। अतः ‘मूर्त्तद्रव्यमवधि कृत्वा’ यह वाक्य लिखा है। अर्थात् मूत्तंद्रव्यों में ही ‘यह उससे पूर्व है, अथवा यह उससे पश्चिम है’ इत्यादि प्रतीतियाँ होती हैं। ये प्रतीतियाँ जिससे हों वही ‘दिक्’ है। ‘एतस्मादिदं पूर्वम्’ इसी अर्थ में केवल प्रातिपदिक अर्थमात्र के बोधक ‘पूर्वेण’ इस पद में प्रातिपदिकार्थ मात्र में तृतीया है । (प्र०) यह ठीक है कि पूर्वा परादि प्रतीतियाँ यतः कार्य हैं, अतः उनका कोई कारण अवश्य है, वह कारण ‘दिकू’ ही है यह किस प्रकार निश्चय किया जाय ? इसी प्रश्न का समाधान है ‘अन्यनिमित्तासम्भवात्’ । अर्थात् पूर्वापरादि के अवधिभूत वे मूत्तं द्रव्य ही उनकी प्रतीतियों के कारण नहीं हैं, क्योंकि इससे दक्षिणादि दिशाओं में विद्यमान द्रव्य में अनभीष्ट पूर्वापरादि की प्रतीतियाँ होंगी, क्योंकि कारणीभूत मूर्त्त द्रव्य तो है ही। ‘दो विरुद्ध दिशाओं में विद्यमान दोनों द्रव्यों में ही एक दूसरे की सहायता से यथायोग्य पूर्वापरादि प्रतीतियाँ होती है’ यह कहने पर उक्त दोष तो है ही, बल्कि इस कथन में उभयाभाव प्रसङ्ग का दोष अधिक है। द्रव्य में रहने वाले गुणों एवं कर्मों को अगर पूर्वादि प्रत्ययों का कारण मानें तो पूर्व दिशा में विद्यमान द्रव्य में रहनेवाले गुण और क्रिया से युक्त पश्चिम दिशा में विद्यमान मूर्त्त द्रव्य में भी पूर्व दिशा को प्रतीति होगी। ‘अत्र एतस्मादिदम्’ इस अर्थ में पञ्चमी का प्रयोग हैं। नहीं तो अस्मा दिदं प्राची’ इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त पञ्चमी का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । ( प्र०) यदि उक्त पञ्चमीका प्रयोग अवधि के अर्थ में मानें ? ( उ० ) तो ठीक है, किन्तु बिना
१. अर्थात् पूर्व प्रत्यय में पश्चिम दिशा में विद्यमान मूतं द्रध्य और पूर्व दिशा में विद्यमान द्रव्य दोनों को परस्पर सम्मिलित होकर कारण मानें तो पूर्व प्रत्यय एवं पश्चिम प्रत्यय दोनों में से एक की भी उत्पत्ति नहीं होगी। क्योंकि एक प्रत्यय दूसरे प्रत्यय के विषय मूत्तं द्रव्य के अधीन हो जायेंगे। अतः परस्पराश्रयत्वरूप आपत्ति से दोनों प्रत्यय असम्भूत होंगे।
१६४
न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये दिक्
प्रशस्तपादमाष्यम्
विभागाः काल
तस्यास्तु गुणाः सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोग वदेते सिद्धाः । काल की तरह इसके (दिशा के) भी संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और
विभाग ये ही पाँच गुण हैं।
न्यायकन्दली
स्यात् । अवधावियं पञ्चमीति चेत् ? सत्यम्, किन्त्वधित्वं दिगपेक्षया, न तु द्रव्यमात्रस्य, सर्वत्राविशेषप्रसङ्गात् । तस्या अप्रत्यक्षत्वेऽपि कालवद् विशिष्ट प्रत्यय हेतुत्वं वाच्यम् । गुणवत्त्वं द्रव्यलक्षणं तदस्यामस्तीति प्रतिपादयन्नाह – तस्यास्तु गुणा इत्यादि । कालवदेते सिद्धाः, यथा काललिङ्गा विशेषात् कालस्यैकत्वं सिद्धं तथा दिग्लिङ्गाविशेषाद् दिश एकत्वम्, यथा तदनुविधानात् काले पृथक्त्वं तथा दिशि, यथा कारणे काल इति वचनात् परममहत्परिमाणं तथा कारणे दिगिति वचनाद् दिश: परममहत्परिमाणम् । सर्वत्र तत्कार्य्यस्य पूर्वापरादिप्रत्ययस्य भावात् । यथा कारणपरत्वाच्चेति कालस्य संयोगगुणत्वं प्रतिपादितं तथा दिशोऽपि, यथा संयोगविनाशकत्वात् काले विभागः सिद्धस्तथा दिशीत्यतिदेशार्थः । दिशा के वह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि केवल उक्त मूर्त्त द्रव्य को ही अवधि मानने से सभी दिशाओं को प्रतीति सभी वस्तुओं में समान रूप से होगी। दिशा स्वयं यद्यपि अप्रत्यक्ष है, फिर भी काल की ही तरह विशिष्ट बुद्धि का कारण है। दिशा में गुणवत्त्व रूप द्रव्य का लक्षण है’ यह प्रतिपादन करते हुए ‘तस्यास्तु गुणाः’ इत्यादि पंक्ति लिखते हैं। ‘काल की ही तरह इसमें भी इन गुणों की सत्ता समझी जाती है। अर्थात् जैसे सभी कालों में यौगपद्यादि प्रत्यय रूप ज्ञापक हेतुओं के समान रूप से रहने के कारण एकस्व संख्या की सिद्धि होती है, वैसे ही सभी दिशाओं में दिशा के ज्ञापक उक्त पूर्वापरादि प्रत्ययों के होने से दिशा में भी एकत्व संख्या की सिद्धि जाननी चाहिए। जैसे एकत्व संख्या की व्याप्ति से काल में एकपृथक्त्व की सिद्धि की है, वैसे ही दिशा में भी एक पृथक्त्व की सिद्धि समझनी चाहिए। जैसे ‘कारणे काल:’ सूत्रकार की इस उक्ति से काल में परममहत्परिमाण की सिद्धि की गयी है, वैसे ही ‘कारणे दिक् सूत्रकार की इस उक्ति से दिशा में भी परममहत्परिमाण रूप गुण समझना चाहिए । क्योंकि सवंत्र दिशा के कार्य पूर्व, पश्चिम आदि प्रतीतियाँ होती हैं। जैसे ‘कारण परत्वाच्च’ इस सूत्र के अनुसार कालका संयोगगुण प्रतिपादित है, वैसे दिशा में भी संयोगगुण समझना चाहिए। जैसे विनाशशील संयोग की सत्ता से काल में विभाग नाम के गुण की सिद्धि की गयी है, वैसे ही दिशा में भी समझना चाहिए । यही कालवदेते सिद्धा: ‘ इस अतिदेश वाक्य का अर्थ है ।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१६५
प्रशस्तपादभाष्यम्
दिग्लिङ्गा विशेषादञ्जसैकत्वेऽपि दिशः परममहर्षिभिः श्रुतिस्मृति
यतः दिक् के जापक उक्त प्रतीति रूप सभी हेतु सर्वत्र समान रूप से हैं, अतः यह भी वस्तुतः एक ही है। किन्तु श्रुति स्मृति एवं लोकव्यवहार के लिए
न्यायकन्दली
ननु दिग्लिङ्गाविशेषो न सिद्धः, पूर्वापरादिप्रत्ययानां परस्परतो भेदात् । तथा च सति दिशो भेद इति युक्तम् ? न, एकस्मिन्नेवार्थे युगपद्वस्त्वन्तरापेक्षया पूर्वापरादिप्रत्ययोत्पत्तेः, दिग्भेदे हि यत्पूर्वं, न तत्र पश्चिमप्रत्ययो भवेत् । सर्व दिक्सम्बन्धस्तस्यास्तीति चेत् ? तहि सर्वार्थेषु सर्वापेक्षया सर्वेषां सर्वे प्रत्ययाः प्रसज्येरन् । न चैवम्, तस्मादेका दिक्, प्रत्यय भेदस्तूपाधिभेदात् ।
पूर्वमादित्य संयोगस्य तदार्जवावस्थितस्य च द्रव्यस्यान्तराले (पूर्वेति) दक्षि णेति, अस्तमयसंयोगस्य तदार्जवावस्थितस्य च द्रव्यस्यान्तराले पश्चिमेति, यत्रा दित्य संयोगो न दृश्यते तत्र मध्याह्नसंयोगप्रगुणावस्थितद्रव्यापेक्षयोत्तरव्यवहारः, तासामन्तरालेषु पूर्वदक्षिणादिव्यवहार इत्युपपद्यते प्रतीतिभेदः । आदित्यसंयोग निबन्धन एवास्तु प्रत्यय: ? न तस्य मूर्त्तद्रव्यसंयोगाभावात् असम्बद्धस्य च प्रत्ययहेतुत्वा सम्भवात् । एतदेव दर्शयति- दिग्लिङ्गा विशेषादिति । दिश एकत्वे
(प्र०) सभी दिशाओं में तो दिग्बुद्धि के वे हेतु एक से नहीं हैं, क्योंकि पूर्वापरादि प्रत्यय परस्पर भिन्न प्रकार के होते हैं। अतः दिशाओं को भी अनेक मानना पड़ेगा। ( उ०) यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही समय एक ही वस्तु में अवधि रूप वस्तुओं के भेद से पूर्वपश्चिमादि नाना प्रतीतियों की उपपत्ति हो सकती है। अगर वे वास्तव में भिन्न हों तो फिर पूर्व दिशा में विद्य मान वस्तु में कभी पश्चिम दिशा की प्रतीति ही नहीं होगी। ( प्र० ) उस वस्तु में सभी दिशाओं का सम्बन्ध है ? (उ०) तो फिर सभी वस्तुओं में सभी वस्तुओं की अपेक्षा सभी को पूर्वापरारादि प्रत्यय होना चाहिए, किन्तु होते नहीं हैं। तस्मात् ‘दिकू’ एक ही है। उपाधियों के भेद से उसमें नानात्व की प्रतीति होती है ।
सूर्य का प्रथम संयोगाधिकरण देश एवं उसके सामने के द्रव्य इन दोनों के बीच में पूर्वदिशा की प्रतीति होती है। सूर्य के अस्तकालिक संयोग के प्रदेश एवं उसके सम्मुख द्रव्य के बीच पश्चिम दिशा की प्रतीति होती है। मध्याह्नकालिक सूर्य के संयोगवाले प्रदेश के एक ओर दक्षिण ओर दूसरी ओर उत्तर की प्रतीति होती है । इस प्रकार विभिन्न प्रतीतियों की उपपत्ति होती है । ( प्र०) सूर्य के उक्त संयोग से हो पूर्वादि दिशाओं का व्यवहार मान लिया जाय ? ( उ०) नहीं, क्योंकि उन मूत्तं द्रव्यों के साथ सूर्य का संयोग सम्बन्ध नहीं है। असम्बद्ध वस्तु ज्ञान का कारण नहीं हो सकती है। यह “दिग्लिङ्गा विशेषात्” से दिखलाते हैं। इस प्रकार दिक् में एकत्व की सिद्धि हो जाने
१६६
न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये दिक्
लोकसंव्यवहारार्थ मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य भगवतः सवितुर्ये संयोगविशेषा लोकपालपरिगृहीतदिकप्रदेशान।मन्वर्था: प्राच्यादिभेदेन दशविधाः संज्ञाः कृताः, अतो भक्त्या दश दिशः सिद्धाः | तासामेव देवतापरिग्रहात् पुनदेश मेरु की प्रदक्षिण परिक्रमा करते हुए भगवान् सूर्य के जो संयोग विशेष उनका ही लोकपालों से अधिकृत प्रदेशों का योग के द्वारा बोध करानेवाले प्राची प्रभृति दश नाम महर्षियों ने बनाये हैं। अत. गौणवृत्ति से दश दिशाओं का व्यवहार होता है। उन्हीं दिशाओं के ( १ ) माहेन्द्री ( २ ) वैश्वानरी
न्यायकन्दली
स्थिते महर्षिभिः प्राच्यादिभेदेन दशविधाः सञ्ज्ञाः कृताः । कीदृश्यस्ता: ? अन्वर्थाः, अनुगतोऽर्थो यासामिति ता अन्वर्था: । केषामर्थस्तास्वनुगतः ? लोकपालेरिन्द्रादिभिः परिगृहीतानां दिक्प्रदेशानाम् । सवितुर्ये संयोग विभागास्तेषामित्यध्याहारः । तथा हि- प्रथममस्यामन्वति सवितेति प्राची । अवागञ्चतीति अवाची । प्रत्यगञ्चतीति प्रतीची। उदगश्वतीति उदीची । कि विशिष्टस्य सवितुः ? मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य, मेरु प्रदक्षिणं परिभ्रमतः । किमर्थं सञ्ज्ञाः कृताः ? श्रुतिश्च स्मृतिश्च लोकच तेषां सम्यग् व्यवहारार्थम् । श्रौतो
पर भी महर्षियों ने उसकी अन्वर्थ दश संज्ञायें बनायी हैं। ‘अनुगतोऽयों यासामु’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस संज्ञा का जो यौगिक अर्थ हो, उस वस्तु की वही अन्वर्थ संज्ञा है । ( प्र०) किनके अर्थ उन संज्ञाओं में अनुगत हैं ? इस प्रश्न के समाधान के लिए “इन्दादि लोकपालों की अधिकृत दिशाओं के प्रदेश के साथ सूर्य के संयोगों और विभागों का” यह अध्याहार करना चाहिए । ‘अस्यां सविता प्रथमञ्चति’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्राची’ शब्द का अर्थ है कि पूर्व दिशा में सूर्य सबसे पहिले आते हैं, के अतः उसका नाम ‘प्राची’ है । ‘अवागञ्चतीति अवाची’ अर्थात् सूर्य जिस दिशा में पूर्व दिशा से कुटिल गति के द्वारा जाते हैं वही अवाची’ है । ‘प्रत्यगञ्चतीति प्रतीची’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्य जिस दिशा में सबसे पीछे जाँय वही ‘प्रतीची’ है। ‘उदगच्चतीति उदीची’ इस व्युत्पति के अनुसार सूर्य जिस दिशा में सबसे उँचे पर हो वही ‘उदीवी’ है । किस विशेषण से युक्त सूर्य का ? इस आकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए ‘मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य’ यह वाक्य है। अर्थात् मेरु के चारों तरफ प्रदिक्षण क्रम से घूमते हुए सूर्य का महर्षियों ने ये संज्ञायें क्यों बनायीं ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए ‘श्रुतिस्तलोकमवहारा यह वाक्य लिखा गया है। “श्रुतिश्च, स्मृतिश्च, लोकञ्च, तेषां संव्यवहारार्थम्” इस व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ है कि श्रौत स्मातं और लौकिक इन सभी व्यवहारों को अच्छी तरह चलाने के लिए महर्षियों ने उन संज्ञाओं की रचना
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१६७
प्रशस्तपादभाष्यम्
संज्ञा भवन्ति – माहेन्द्री, वैश्वानरी, याम्था, नैर्ऋती, वारुणी, वायच्या, कौबेरी, ऐशानी, ब्राह्मी, नागी चेति ।
आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मा । तस्य सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षत्वे सति (३) याम्या (४) नैऋती (५) वारुणी (६) वायवी (७) कौबेरी
(८) ऐशानी (६) ब्राह्मी और (१०) नागी देवताओं के अधिकारमूलक ये दश (यौगिक) नाम और हैं ।
आत्मत्व जांति के सम्बन्ध से यह आत्मा है’ यह व्यवहार होता है । आत्मत्व जाति ही आत्माओं का असाधारण धर्म है। वह दुर्लक्ष्य होने के
न्यायकन्दली
व्यवहारः न प्रतीचीशिराः शयोत’ इत्यादिः । स्मार्त्तो व्यवहार: ‘आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते’ इत्यादिः । लोकव्यवहारः पूर्वं गच्छ, दक्षिणमवलोकय इत्यादिः । यतो दश संज्ञाः कृतास्ततो भक्त्या उपचारेण दश दिशः सिद्धा व्यवस्थिताः । माहे न्द्रयादिसंज्ञास्तु नार्थान्तरविषयाः, किन्तु तासामेव निमित्तान्तरवशात् प्रवर्त्तन्त इत्याह – तासामेवेत्यादि । महेन्द्रस्येयमिति माहेन्द्री | वंश्वानरस्येयं वैश्वानरीत्यादि सर्वत्र निर्वचनीयम् |
यस्य तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसाय घटते विपर्य्ययज्ञानं संसारहेतुर्यदर्थानि च
भूतानि तत्प्रतिपादनार्थमाह- आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मेति । आत्मत्वं नाम की। श्रोत व्यवहार का उदाहरण है न प्रतीचीशिराः शयीत’ अर्थात् पश्चिम की तरफ शिर रख कर नहीं सोना चाहिए। स्मार्त्त व्यवहार का उदाहरण है ‘आयुष्यं प्राङ् मुखो भुङ्क्ते’ अर्थात् आयु की कामना वाले पुरुष को पूर्वाभिमुख होकर भोजन करना चाहिए इत्यादि । लोक व्यवहार का उदाहरण है पूर्व की ओर जाओ दक्षिण की ओर देखो इत्यादि । यत महर्षियों ने दिशा की दश संज्ञायें बनायो हैं, अतः लक्षणा वृत्ति के द्वारा दिशाओं में भी दशत्व का व्यवहार होता है । माहेन्द्री प्रभृति संज्ञाएँ किसी दूसरी वस्तु की नहीं हैं, वे भी दिशाओं को ही दूसरे निमित्त से समझाती हैं। यही ‘तासामेव ‘ इत्यादि से कहते हैं। ‘महेन्द्रस्येयं माहेन्द्री’ अर्थात् जिस दिशा के अधिष्ठाता महेन्द्र हों उस दिशा को माहेन्द्री कहते हैं। वैश्वानरस्येयं वैश्वानरी’ इस व्युत्पति के अनुसार जिस दिशा के अधिष्ठाता वैश्वानर (अग्नि) हों उस दिशा को वैश्वानरी कहते हैं। इसी प्रकार और संज्ञाओं का भी निर्वचन करना चाहिए ।
जिसका तत्त्वज्ञान निःश्रेयस ( मोक्ष ) का कारण है, एवं जिसका विपर्यय (मिथ्याज्ञान) संसार का कारण है, एवं जिसके उपभोग के लिए ये भौतिक वर्ग हैं उसी के प्रतिपादन के लिए ‘आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मा’ यह सन्दर्भ लिखते हैं। ‘आत्मत्व’
१६८
न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये आत्म
प्रशस्तपादभाष्यम्
करणै: शब्दाद्यपलब्ध्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते । वास्यादीनां करणानां कत्र्त्त प्रयोज्यत्वदर्शनात्, शब्दादिषु प्रसिद्धया च कारण बाह्य इन्द्रियों से गृहीत नहीं होता है । (१) अतः शब्दादि प्रत्यक्ष से अनुमित होनेवाले श्रोत्रादि करणों (इन्द्रियों) के द्वारा आत्मा का अनुमान करते हैं। यह देखा जाता है कि बसुला आदि करण बढ़ई रूप कर्ता के सम्बन्ध से ही छेदनादि कार्य करते हैं । (२) शब्दादि विषयक ज्ञानादि क्रियाओं से भी
न्यायकन्दली
सामान्यं तदभिसम्बन्धादात्मेति व्यवहारः । इदमस्येतरेभ्यो वैधर्म्यम् । ननु दृश्यस्य सत्त्वं तदाकारसंवेदनेन व्याप्तम्, न चात्माकारं कस्यचित्संवेदनमस्ति, अतो व्यापकानुपलब्ध्या तस्य सत्त्वमेव निराक्रियत कुतो धर्मनिरूपणमित्याशङ्क्य तत् सद्भावे बाधकं प्रमाणं नास्ति, प्रत्यक्षानुपलब्धेर न्यथासिद्धत्वात्, साधकञ्च प्रमाणमनुमानमस्तीति प्रतिपादयन्नाह – तस्येति । प्रत्यक्षोपलब्धियोग्यताविरहः सौक्ष्म्यम् । तस्मादप्रत्यक्षस्यात्मनः करणे: शब्दाधुपलब्धयः करणसाध्याः क्रियात्वाच्छिदिक्रियावदित्यनुमितः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते । कुत इत्याह – वास्यादीनां करणानां कर्त्तृ प्रयोज्यत्वदर्शनात् । यत्करणं तत् केनचित् शब्द का अर्थ है आत्मत्व नाम की जाति उसी के सम्बन्ध से ‘यह आत्मा है’ इस प्रकार का व्यवहार होता है। यह ‘आत्मत्व’ जाति ही अन्य पदार्थों की अपेक्षा आत्मा का वैधर्म्य असाधारणधर्म या इतरभेदानुमितिजनक हेतु है । ( प्र० ) उसी वस्तु की सत्ता स्वीकार की जाती है जो अपने आकार द्वारा ज्ञान का विषय हो, किन्तु आत्मा का कोई भी आकार उपलब्ध नहीं है, अतः अस्तित्व के व्यापक स्वाकारविषयत्व’ के अभाव से हम आत्मा के अस्तित्व का ही खण्डन करते हैं। फिर उसके धर्मों का निरूपण क्यों ? इस शङ्का के दो समाधान करते हैं एकतो आत्मा की सत्ता में बाधा डालने वाला कोई प्रमाण ही नहीं है। ‘प्रत्यक्षानुपलब्धेः’ हेतु अन्यथासिद्ध है अर्थात् आत्मस्वाभावका साधक नहीं है। क्योंकि बाह्य इन्द्रियों से आत्मा का प्रत्यक्ष न होने का कोई अन्य ही हेतु है, आत्मा की असत्ता नहीं। दूसरे आत्मा की सत्ता का ज्ञापक अनुमान प्रमाण है। आत्मा की असत्वापत्ति का समाधान करते हुए तस्य’ इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ज्ञात होने की अयोग्यता ही ‘सौक्ष्म्य’ शब्द का अर्थ है। अतः ( १ ) प्रत्यक्ष से ज्ञात न होने पर भी ‘श्रोत्रादि करणों से शब्दादि की ये उपलब्धियाँ करणजन्य हैं, क्योंकि ये भी क्रियारूप हैं। जैसे कि छेदनादि क्रिया’ इस प्रकार के अनुमानों से सिद्ध धोत्र आदि करणों के द्वारा आत्मा का अनुमान होता है । कैसे होता है ? इस प्रश्न का समाधान ‘वास्यादीनाम्’ इत्यादि से करते हैं। कर्ता के द्वारा ही करण कार्य में प्रवृत्त होते हैं ।
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
न्यायकन्दली
१६९
कर्त्रा प्रयुज्यते कार्यों व्यापार्यते, यथा वास्यादिकं वर्धकिणा करणञ्च श्रोत्रादिकं तस्मात् केनचित् प्रयोक्तव्यं य एषां प्रयोक्ता स आत्मा आकाशस्य श्रोत्रस्य यद्यप्यात्मना सह साक्षात् सम्बन्धो नास्ति, विभुत्वात्, तथाप्यात्मना तस्य प्रयोज्य त्वमन्तः करणाधिष्ठानद्वारेण यथा हस्तेन सन्दंशयोगिना तत्संयुक्तस्याय: पिण्डस्य संयोगः | करणत्वञ्च श्रोत्रादीनां नियतार्थस्य ग्राहकत्वात्, प्रदीपवत् । यद्यप्यात्मा अहं समेति मिभन्नो मनसा स्वकर्मोपार्जित कार्यकारणसम्बन्धोपाधिकृतकत्र्त्तृ तास्वामित्वरूपस संवेद्यते, तथाप्यत्रा प्रत्यक्षत्ववाचोयुक्तिर्बाह्येन्द्रियाभिप्रायेण । शब्दादिषु प्रसिद्धचा च प्रसाधकोऽनुमीयते । शब्दादिषु विषयेषु प्रसिद्धिर्ज्ञानं तत्रापि प्रसाधको ज्ञातानुमीयते । ज्ञानं क्वचिदाश्रितं, क्रियात्वात्,
छिदिक्रियावत् यत्रेदमाश्रितं स आत्मा । अथेदं स्वयमेव जानाति, न पराश्रितमिति चेत् ? किमिदं नित्यम् ?
जैसे बढ़ई के द्वारा वसुला प्रभृति करण श्रोत्रादि इन्द्रियाँ भी करण हैं। अतः उनका भी कोई प्रयोग करनेवाला चाहिए। वह प्रयोक्ता ही आत्मा है । यद्यपि श्रोत्र आकाश रूप होने के कारण विभु है । एवं आत्मा भी विभु है। दो विभु किसी भी साक्षात् सम्बन्ध से परस्पर सम्बद्ध नहीं हो सकते, तथापि आत्मा से अधिष्ठित मन के साथ सम्बन्ध के द्वारा आत्मा में श्रोत्र रूप करण का भी प्रयोज्यकत्तृत्व है। जैसे कि तपे हुए लोहे को बढ़ई सीधे हाथ से नहीं छूता | हाथ से सड़सी को और सड़सी से तपे हुए लोहे को, तब भी हाथ में प्रयोज्यत्तत्त्व रहता ही है, क्योंकि चिमट से संयुक्त लोहे के साथ भी चिमटे से संयुक्त हाथ का भी सम्बन्ध है हो । श्रोत्र शब्द- प्रत्यक्ष का ही करण है दूसरे प्रत्यक्ष का नहीं चक्षुरूपप्रत्यक्ष का ही करण है रसादि का नहीं। अतः इन्द्रियाँ प्रदीप की तरह नियत अर्थों की ही प्रकाशक होने से ‘करण’ हैं । यद्यपि अपने कर्मों से उपार्जित शरीर एवं इन्द्रियादि के सम्बन्ध रूप उपाधि के द्वारा स्वामित्व मिश्रित कत्तु त्त्व रूप से आत्मा मानसप्रत्यक्ष का भी विषय है, क्योंकि हम जानते हैं कि यह मेरा शरीर है, मेरी आँखें सुन्दर हैं, अतः अप्रत्यक्षत्व की युक्तियाँ बाह्य प्रत्यक्ष के अभिप्राय से कही गई समझनी चाहिए।
(२) शब्द दिषु प्रसिद्धया च प्रसाधको ज्ञातानुमीयते’ अर्थात् शब्दादि रूप विषयों में जो ‘प्रसिद्धि’ अर्थात् ज्ञान, उससे आत्मा का अनुमान होता है। जैसे कि ज्ञान कहीं पर आश्रित है, क्योंकि वह क्रिया है। जैसे कि छेदनादि किया। यह ज्ञान रूप किया जहाँ पर आश्रित है वही ‘आत्मा’ है ।
( प्र ० ) यह ज्ञान स्वयं ही विषय को समझ लेता है, इसके लिए इसे किसी दूसरी वस्तु में आश्रित होने की आवश्यकता नहीं होती है । ( उ०) यह ज्ञान नित्य २२
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व्यायकन्दली संबलित प्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये आत्म
प्रतिक्षणविनाशि वा ? यदि नित्यम् ? संज्ञाभेदमात्रम् । अथ क्षणिकम्, चिरानु भूतस्य न स्मरणम्, प्रतिपत्तृभेदात् । यत्तु कार्यकारणभावात् पूर्वक्षणानुभूतस्योत्तरेण स्मरणम्, यत्पुनः पित्रानुभूतस्य पुत्रेणास्मरणम्, तत्र पितृपुत्रज्ञानयोः कार्यकारणभावा भावात्, शरीरयोश्च तथाभूतयोरचेतनत्वात् । तदयुक्तम्, आत्माभावे कार्यकारण भावस्यानिश्चयात् । कारणविज्ञानकाले कार्यज्ञानमनागतम्, तत्काले च कारण मतीतम् । न च ताभ्यामन्यः कश्चिदेको द्रष्टास्तीति कस्तयोः क्रमभाविनोः कार्य कारणभावं प्रतीयात् ।
अथ मतम्, स्वात्मग्राहिणी पूर्वा बुद्धिः स्वात्माव्यतिरिक्तिं स्वस्य कारणत्वमतिरूपं गोचरयति । उत्तरापि बुद्धिः स्वरूपविषया तदव्यति रिक्तमात्मीयं कार्य्यत्वमपि गृहह्णाति, ताभ्याञ्च प्रत्येकमुपात्तं कारणत्वं कार्य्यत्वं च तदुभयजनितैकवासनाबलभुवा विकल्पेनाध्यवसीयत इति चेत् ? अहो
है, या प्रशिक्षण विनाशशील १ अगर नित्य है तो फिर फलतः आत्मा ही हैं। केवल नाम का अन्तर है। अगर प्रतिक्षण विनाशशील है तो फिर बहुत दिन पहिले अनुभूत विषय का आज स्मरण नहीं होगा क्योंकि स्मृति और अनुभव के कर्ता ( प्रकृत में ) भिन्न हैं, ( किन्तु अनुभव और स्मृति दोनों का एक ही फर्ता होना चाहिए ) ( प्र० ) पहिले जिस विषय का ज्ञान चक्षुरादि से होता है, वहीं अपने विनाश काल के उत्तर क्षण में उसी विषय के दूसरे ज्ञान को जन्म देता है, फलत: कारणीभूत ज्ञान से ही अनुभूत विषय का स्मरण होता है । “पिता से अनुभूत विषय का स्मरण पुत्र को नहीं होता है’ इसमें यह हेतु है कि पितृविज्ञान पुत्रविज्ञान का कारण नहीं है। पितृ शरीर पुत्रशरीर का कारण है, किन्तु शरीर अचेतन हैं । ( उ० ) आत्मा अगर न माना जाय तो दोनों विज्ञानों में कार्यकारणभाव है, यही निश्चय नहीं हो पायेगा | क्योंकि जिस क्षण में कारणविज्ञान है, उस समय कार्यविज्ञान भविष्य के हो गर्भ में रहता है। जिस क्षण में कार्यविज्ञान की मत्ता रहती है, उसी क्षण कारणविज्ञान का नाश हो जाता है। उन दोनों से भिन्न देखनेवाला कोई नही है, फिर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले उन दोनों विज्ञानों के कार्यकारणभाव को कौन समझे ?
(प्र०) विज्ञान जिस प्रकार विषयों को समझता है, उसी प्रकार अपने स्वरूप को भी समझता है। कारणविज्ञान का कारणस्व हो स्वरूप हैं, फिर कारणविज्ञान ही अपने से अभिन्न कारणत्व को भी समझता है। इसी प्रकार उत्तरकाल में होनेवाले कार्यविज्ञान को भी कार्यत्व का ज्ञान है । फलतः कारणविज्ञान को कारणत्व का ज्ञान है और कार्य विज्ञान को कार्यत्व का ज्ञान है। फिर दोनों विज्ञानों से वासना रूप विलक्षण बल से युक्त ‘विकल्प’ नाम के ज्ञान को उत्पत्ति होती है। उससे ही कार्यकारणभाव
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१७१
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रसाधकोऽकोनुमीयते । न शरीरेन्द्रिय मनसाम्, अज्ञत्वात् । न शरीरस्य चैतन्यम्, घटादिवद् भूतकार्य्यत्वात्, मृते चासम्भवात् । नेन्द्रियाणाम् करणत्वात्,
उक्त क्रिया के आश्रय रूप कारण आत्मा का अनुमान करते हैं। यह आश्रयत्व ( कर्तृत्व) शरीर, इन्द्रिय एवं मन इन तीनों में सम्भव नहीं है, क्योंकि वे अज्ञ (जड़) हैं । चैतन्य (ज्ञान) शरीर का धर्म नहीं है, क्योंकि वह (शरीर ) घटादि की तरह भूत द्रव्य से उत्पन्न होता है। एवं मृत शरीर में ज्ञान सम्भव भी नहीं हैं। वह ( चैतन्य ) इन्द्रियों का भी धर्म नहीं है, क्योंकि वे ( ज्ञानक्रिया के ) करण हैं । एवं इन्द्रियों
न्यायकन्दली
कुसृष्टिकल्पना ? पूर्वोत्तरधियौ स्वात्ममात्रनियते, कुतस्तस्याः कारणहमस्या इचास्मि कार्य्यमिति प्रतीयेताम्, परस्परवार्तानभिज्ञत्वात् । ताभ्यामगृहीतं कुतो ऽध्यवस्यति तस्यानुभवानुसारित्वात् ? भवतु पराश्रितं ज्ञानम्, तदधिकरणन्तु शरीरमिन्द्रियं मनो वा भविष्यति । तत्राह – न शरीरेन्द्रियमनसामिति । उत्तरवाक्यस्थितं चैतन्यमिति पदमिह सम्बद्धयते । शरीरेन्द्रियमनसां चैतन्यं न भवति, कुतस्तत्राह अज्ञत्वादिति । ज्ञानं प्रति समवायिकारणत्वाभावादित्यर्थः । नन्वेतदपि साध्याविशिष्टमित्याशङ्कचाह-न शरीरस्येति । चैतन्यं शरीरस्य न भवति घटादिवच्छरीरस्य भूतकार्य्यत्वात्, यद् भूतकार्यं न तच्चेतनं, यथा घटः ।
गृहीत होता है । ( उ० ) एक तो यह कल्पना ही बड़ी विचित्र है कि वे दोनों ज्ञान अपने स्वरूप को समझ सकते हैं। फिर पूर्वविज्ञान को यह भान ही कैसे होगा कि उत्तरविज्ञान का कारण मैं ही हूँ । एवं उत्तरविज्ञान को भी यह कैसे पता चलेगा कि ‘मैं पूर्वविज्ञान का कार्य क्योंकि दोनों ही अपने से भिन्न किसी भी विज्ञान के स्वरूप और प्रभाव से अनभिज्ञ हैं। फिर दोनों विज्ञानों से अगृहीत कार्यकारणभाव का निश्चय कैसे होगा ? क्योंकि निश्चय अनुभवमूलक है । ( प्र० ) मान लिया कि ज्ञान का अपने से भिन्न कोई आश्रय है। किन्तु वह आश्रय शरीर, इन्द्रिय एवं मन भी हो सकता है ? इसी प्रश्न के उत्तर में “शरीरेन्द्रियमनसाम्” इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । इस वाक्य के आगे लिखित ‘न शरीरस्य चैतन्यम्’ इस वाक्य के चैतन्य पद का अनुस न्धान करके प्रकृत वाक्य को ‘न शरीरेन्द्रियमनसां चैतन्यम्’ इस प्रकार पढ़ना चाहिए । उक्त प्रश्न का ही ‘अज्ञत्वात्’ इत्यादि से समाधान करते हैं। अर्थात् शरीरादि ज्ञान के समवायिकारण नहीं हैं ।
किन्तु यह भी तो सिद्ध नहीं है, किन्तु साध्य ही है, अत: ‘शरीरादि प्रत्येक में चैतन्य नहीं है’ यह प्रतिपादन करने के लिए “न शरीरस्य” इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । शरीर में चैतन्य नहीं है, क्योंकि वह घटादि जड़ द्रव्यों की तरह भूत द्रव्य का कार्य है ।
१७२
न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्त पावभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये आत्म
भूतकार्य्यञ्च शरीरम् तस्मादेतदप्यचेतनम् । युक्त्यन्तरमाह मृते चासम्भ वादिति । मृते शरीरे चैतन्यस्यासम्भवादित्यनेनायावद्रव्यभावित्वं विवक्षितम् । चैतन्यं शरीरस्य विशेषगुणो न भवति, अयावद्रव्यभावित्वात् संयोगदत् । अत एव तत्कारणान्यप्यचेतनानि, तेषां चैतन्ये कार्येऽपि चैतन्यं स्यात् । एकस्मिन् शरीरे ज्ञातृबहुत्वञ्च प्राप्नोति । ततश्चैकाभिप्रायेण प्रवृत्तिनियमाभावादिदोषः । नेन्द्रियाणां करणत्वादिति । इन्द्रियाण्यचेतनानि करणत्वाद्दण्डवत् ।
• हेत्वन्तरञ्च समुच्चिनोति – उपहतेष्विति | विनष्टेष्वपीन्द्रियेषु पूर्वानुभू तोऽर्थः स्मर्थ्यते, न चानुभवितरि विनष्टे स्मरणं युक्तम् तस्मान्नेन्द्रियगुण ज्ञानम् । न च विषयस्य पूर्वानुभूतस्यासान्निध्येऽपि स्मृतिर्दृष्टा, बाह्येन्द्रियाणां प्राप्यकारि त्वात् । तस्मात् स्मृतिस्तावन्नेन्द्रियाणाम् । तदभावादनुभवोऽपि न स्यादन्यस्यानु भवेऽन्यस्यास्मरणादित्यर्थः । अत एव विषयस्यापि न चैतन्यम्, नष्टे विषये
जितने भी कार्य भूतद्रव्यों से उत्पन्न होते हैं वे सभी अचेतन ही होते हैं, जैसे कि घटादि । शरीर भी भूत द्रव्य का ही कार्य है, अतः उसमें भी चैतन्य नहीं है। ‘गृते चास म्भवात्’ इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में दूसरा हेतु देते हैं कि मृत शरीर में चैतन्य असम्भव है। इससे यह अनुमान अभीष्ट है कि चैतन्य ( ज्ञान ) शरीर का विशेषगुण नहीं है क्योंकि वह अयाबद्रव्यभावी है, जैसे कि संयोग । इसी हेतु से शरीर के अव यवों में भी चैतन्य नहीं है । यदि वे चेतन होते तो उनका कार्य शरीर भी चेतन होता। शरीर के अवयवों को अगर चेतन मान लें तो फिर एक ही शरीर में अनेक ज्ञाताओं की सत्ता माननी पड़ेगी जिससे एक अभिप्राय के द्वारा नियमित प्रवृत्यादि की अनुपपत्ति होगी। ‘नेन्द्रियाणां करणत्वात्’ इन्द्रियों अचेतन हैं, क्योंकि करण हैं, जैसे कि दण्डादि ।
‘उपहतेषु’ इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में दूसरा हेतु देते हैं। इन्द्रियों के नाश हो जाने पर भी उनके द्वारा अनुभूत विषयों को स्मृति होती है। फिर तो अनुभव करने वाली इन्द्रिय का नाश हो जाने पर उससे अनुभूत विषयों का स्मरण होना उचित नहीं है, अतः ज्ञान इन्द्रियों का गुण नहीं है । ( इस में एक युक्ति यह भी है कि ) इन्द्रियों का यह स्वभाव है कि जिस विषय के साथ उन का सम्बन्ध विद्यमान रहता है, उसी विषय के ज्ञान का वह उत्पादन करती हैं। किन्तु जिस समय जिस विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध न भी रहे उस समय भी उस विषय की स्मृति होती है, अतः स्मृतियों की उत्पत्ति इन्द्रियों से नहीं होती है। इन्द्रियों में अनुभव करने की क्षमता भी नहीं है, क्योंकि अनुभव करने की एवं स्मरण करने की क्षमता एक ही वस्तु में होनी चाहिए। यह कभी नहीं होता कि अनुभव कोई करे एवं स्मृति किसी और को हो। ठीक इन्हीं कारणों से विषयों में भी चैतन्य नहीं
प्रकरणम् |
भाषानुवादसहितम्
१७३
प्रशस्तपादभाष्यम्
उपहतेषु विषयासान्निध्ये चानुस्मृतिदर्शनात् । नापि मनसः, करणान्तरा नपेक्षित्वे युगपदालोचनस्मृतिप्रसङ्गात्, स्वयं करणभावाच्च । परि का सामीप्य न रहने पर या इन्द्रियों के नष्ट हो जाने पर भी स्मृति की उत्पत्ति देखी जाती है। ज्ञान मन का भी धर्म नहीं है, क्योंकि मन को अगर (चक्षुरादि ) अन्य कारणों से निरपेक्ष होकर ज्ञान का समवायिकारण मानें तो फिर एक ही समय एक ही व्यक्ति को आलोचनज्ञान और स्मृति दोनों होंगी। एवं मन स्वयं करण
न्यायकन्दली
तत्स्मरणायोगात् । इतोऽपि न तस्य चैतन्यम्, तद्देशज्ञानस्य तज्जन्यस्य च सुखादे. रननुभवात् बुद्धिपूर्व्वक चेष्टाविशेषाभावाच्च । न चेन्द्रियचैतन्ये विषयचैतन्ये च रूपमद्राक्षं रसमन्वभवं स्पर्शं स्पृशामि गन्धं प्रास्यामीति रूपादिप्रत्ययानामे कँकरूपत्वप्रतिपत्तिसम्भवः, रूपादीनां चक्षुरादीनाञ्च मेदात् ।
अस्तु र्ताह मनोगुणो ज्ञानम् ? तस्य सर्वविषयत्वे नित्यत्वे च प्रतिसन्धाना द्युपपत्तंस्तत्राह – नापि मनस इति । मनो यदि चक्षुरादिविविक्तं कारणान्तरमपेक्ष्य रूपादीन् प्रत्येति, सञ्ज्ञाभेदमात्रे विवादः, यदपेक्षणीयं तन्मनो यच्च ज्ञानाधिकरणं
स्वीकार किया जाता, क्योंकि विषयों के नष्ट हो जाने पर भी उनकी स्मृति होती है। विषयों में चैतन्य न मानने में एक यह भी युक्ति है कि वे ज्ञान के आश्रय रूप में ज्ञात नहीं होते, एवं उनमें ज्ञानजनित सुख का भी अनुभव नहीं होता है, एवं विषयों में ज्ञानजनित विशेष प्रकार की चेष्टा भी नहीं है । इन्द्रियों में या विषयों में चैतन्य मान लेने से ‘मैंने रूप को देखा, मैंने रस का अनुभव किया, मैं स्पर्श का अनुभव कर रहा हूँ, मैं गन्ध को सूघूगा’ इत्यादि विभिन्न प्रतीतियों में एक कर्त्ता के द्वारा उत्पन्न होने का अनुभव ठीक नहीं बैठेगा क्योंकि वे रूपादि और उनकी ग्राहक इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न है ।
( प्र० ) ज्ञान को मन का ही गुण मान लीजिए, क्योंकि वह सभी विषयों का ग्राहक एवं नित्य भी है । अतः शरीर में इन्द्रियों में या विषयों में चैतन्य मात लेने से होने वाली स्मृति की अनुपपत्तियाँ आपत्तियाँ इस पक्ष में नहीं आयेंगी । इसी पूर्वपक्ष का खण्डन ‘नापि मनसः’ इत्यादि से करते हैं। मन यदि चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न किसी (कारणान्तर) इन्द्रिय की सहायता से रूपादि विषयों के ज्ञान का उत्पादन करता है तो फिर नाममात्र का विवाद रह जाता है। क्योंकि आप के मत से ज्ञान के उत्पादन में मन को चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न जिस इन्द्रिय की अपेक्षा होती है उसे हम लोग ‘मन’ कहते हैं। एवं ज्ञान के जिस अधिकरण को आप ‘मन’ कहते हैं, वही हम लोगों
१७४
न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये आत्म
न्यायकन्दली
• मनः सोऽस्माकमात्मेति । अथ नापेक्षते करणान्तरम्, तदा रूपरसा दिष्विन्द्रियसम्बद्धेषु युगपदालोचनाति प्रसज्यन्ते, कारणयौगपद्यात् । कारणान्तरापेक्षायां तु तस्या णुत्वे सर्वेन्द्रियेषु सान्निध्याभावाद्युगपदालोचनानुत्पत्तिः । अथान्तःकरणाभावो युगपत्स्मरणानि स्युरपेक्षणीभावात् करणापेक्षायां तु तत्संयोगस्य युगपद सामर्थ्यात् क्रमेण स्मृत्युत्पत्तिः ।
यत्तूक्तं केनचिदेकस्य नित्यस्य क्रमयौगपद्याभ्यामकरणमिति ! तदयुक्तम्, युगपत्करणासम्भवात्, उत्तरकालमकरणच कर्त्तव्याभावात् । न च तावता तस्य सत्त्वम्, अर्थक्रियाकारित्वव्यतिरिक्तस्य सत्त्वस्येष्टत्वात् । इतोऽपि मनोगुणो ज्ञानं न भवति, मनसः स्वयं करणत्वादित्याह- स्वयं
की आत्मा है। यदि किसी अन्य (करण) इन्द्रिय की अपेक्षा नहीं होती है तो फिर एक ही क्षण में एक ही अधिकरण में स्मृति और अनुभव दोनों की उत्पत्ति अनिवार्य होगी, क्योंकि एक ही समय दोनों की सामग्री तैयार है। अगर दूसरे कारण की अपेक्षा मानते हैं और मन को अणु मान लेते हैं तो एक काल में अनेक इन्द्रियों के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः ज्ञान योगपद्य’ (अर्थात् एक आश्रय में एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति ) की आपत्ति होगी। ( प्र० ) यह ठीक है कि मन को चक्षुरादि से भिन्न किसी दूसरे करण की भी आवश्यकता रहती है, किन्तु वह करण’ अन्तःकरण नहीं है। ( उ० ) तब भी एक काल में अनेक स्मृतियों की आपत्ति रहेगी, क्योंकि स्मृति के उत्पादन में बाह्य किसी भी करण की आवश्यकता नहीं होती है ? अगर अन्तःकरण मान लेते हैं तो फिर अन्तःकरण में एक काल में अनेक स्मृतियों के उत्पादन का सामर्थ्य नहीं रहता है, अतः उससे क्रमशः हो स्मृतियाँ उत्पन्न होंगी।
(प्र. ) एक एवं नित्य कोई वस्तु कारण ही नहीं हो सकती. क्योंकि कारण का यह स्वभाव है कि या तो वह एक ही समय अपने सभी कामों को करेगा ( यही युगपत्कारित्व है ) या क्रमशः ही अपने कामों को करेगा ( यही क्रमकारि है ) । इन दोनों में से कोई भी किसी नित्य एक वस्तु में सम्भव नहीं है । अतः नित्य आत्मा ज्ञान का समवायिकारण नहीं हो सकता । ( उ०) एक हो कारण से होनेवाले सभी कार्य किसी एक ही क्षण में हो हो नहीं सकते क्योंकि ऐसा मान लेने पर वह उसके बाद कारण ही नहीं रह जायगा । पतः उसने सम्पादित होनेवाले सभी कार्य हो चुके हैं, अब उसे कुछ करना नहीं है । एवं यह भी कोई नियम नहीं है कि जो किसी का कारण न हो उसकी सत्ता हो उठ जाय । जो किसी का कारण नहीं है, उसकी भी सत्ता मानने में कोई बाधा नहीं है। ‘मन स्वयं ही करण है’ इस हेतु से भी ज्ञान मन का गुण नहीं है, यही बात
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
१७५
प्रशस्तपादभाष्यम्
शेषादात्मकार्यत्वात्तेनात्मा समधिगम्यते ।
है ( अतः कर्त्ता नहीं हो सकता ) । परिशेषानुमान के द्वारा यतः ज्ञान आत्मा रूप कारण का कार्य है, अतः ज्ञान रूप कार्य से आत्मा रूप कारण को समझते हैं।
न्यायकन्दली
करणभावाच्चेति । मनश्चेतनं न भवति करणत्वाद् घटादिवदिति । असिद्धं मनसः करणत्वम् कत्तृ त्वाभ्युपगमादिति चेत् ? मनसः कत्तुं त्वे रूपादिप्रतीतौ चक्षुरादिवत् ? सुखादिप्रतीतो करणान्तरं मृग्यं, क्रियायाः करणमन्तरेणानुपजननात् । सति च सञ्ज्ञाभेदमात्रम्, कतु : करणस्य चोभयोरपि सिद्धत्वात् । तथा
इतोऽप्यचेतनं मनो मूर्त्तत्वाल्लोष्टवत् । यदि शरीरेन्द्रियमनसां गुणो ज्ञानं न भवति, तथाप्यात्मसिद्धौ किमायातं तत्राह-परिशेषादिति । ज्ञानं तावत् कार्य्यत्वात् कस्यचित् समवायिकरणस्य कार्य्यम्, शरीरेन्द्रियमनसाव तदाश्रयत्वं प्रतिषिद्धम् । न चान्येषु वक्ष्यमाणेन न्यायेन ज्ञानकारणत्वं प्रति शक्तिरस्ति, अतः परिशेषादात्मकार्य ज्ञानम् आत्मकार्य्यत्वात्तेन ज्ञानेनात्मा समधिगम्यत इत्युपसंहारः ।
ननु सर्वमेतदसम्बद्धम् क्षणिकत्वेनाश्रयाश्रयिभावाभावात् । तथा हि ‘स्वयं करणभावाच्च’ इस वाक्य से कहते हैं । मन चेतन नहीं है, क्योंकि स्वयं करण हैं, जैसे कि घटादि । ( प्र ० ) मैंने तो मन को कर्त्ता मान लिया है फिर उसके करणत्व की चर्चा कैसी ? ( उ० ) मन को अगर कर्ता मान लें तो फिर जैसे रूपादिज्ञान के चक्षु रादि करण हैं, वैसे ही सुखादि ज्ञान के लिए भी कोई करण खोजना पड़ेगा। क्योंकि करण के बिना किया की उत्पत्ति ही असम्भावित है। तब फिर नाम का ही विवाद रह जाता है, क्योंकि सुखादि प्रतीति के कर्त्ता और करण दोनों ही सिद्ध हो चुके हैं ।
मन चेतन नहीं है, क्योंकि वह मूर्त्त है, जैसे कि ढेला, इस प्रकार मूर्त्तत्व हेतु से भी समझते हैं कि मन चेतन नहीं है । ( प्र ० ) ज्ञान शरीर, इन्द्रिय एवं मन इन तीनों में से किसी का भी गुण नहीं यह सिद्ध हो जाने पर आत्मा की सिद्धि में क्या उपकार हुआ ? इसी प्रश्न का उत्तर ‘परिशेषात्’ इत्यादि से देते हैं । यतः ज्ञान ( समवेत ) कार्य है, अतः अवश्य ही उसका कोई समवायिकारण है। यह सिद्ध हो चुका है कि शरीर, इन्द्रिय और मन ये तीनों समदाय सम्बन्ध से उसके आश्रय नहीं हैं। आगे कही जाने वाली युक्तियों से और भी किसी वस्तु में ज्ञान (समवायि) कारणत्व रूप शक्ति सम्भव नहीं है, अतः परिशेषानुमान से यह समझते हैं कि ज्ञान आत्मा रूप समवायिकारण का ही कार्य है । यही प्रकृत विषय का उपसंहार है। ( प्र ० ) किन्तु ये सभी बातें असम्बद्ध हैं, क्योंकि संसार को सभी वस्तुएँ क्षणिक
१. बौद्धों का कहना है कि ‘बीजों में अङ्कुरों को जन्म देने का सामर्थ्य
१७६
न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
[ द्रव्ये आत्म
न्यायकन्दली
सत्त्वमर्थ क्रियाकारित्वम् तच्च क्रमयोगपद्याभ्यां व्याप्तम्, क्रमाक्रमानात्मकस्य प्रकारान्तरस्यासम्भवात् । अनेकार्थक्रियाणामनेककालता हि क्रमः, यौगपद्यं चैक कालता । न चैकानेकाभ्यामन्यः प्रकारोऽस्ति, परस्परविरुद्धयो रेकप्रतिषेधस्येतर विधिनान्तरीयकत्वात् । अक्षणिकत्वे तु न क्रमसम्भवः, समर्थस्य क्षेपायोगात् ।
है, क्षणिक वस्तुओं में आधाराधेयभाव सम्भव ही नहीं है। (अभिप्राय यह है कि अर्थक्रियाकारित्व ही सत्य है, सत् वही है जो किसी कार्य का कारण हो ) अर्थक्रिया कारित्व क्रम और योगपद्य का व्याप्य है। कार्यों की उत्पत्ति के क्रम एवं अक्रम ( यौगपद्य ) ये दो ही प्रकार हैं। इन दोनों को छोड़कर इसका कोई तोसरा प्रकार नहीं है। अनेक अर्थक्रियाओं ( कार्यों ) की एक काल में उत्पत्ति ही ‘क्रम’ है। एक काल में अनेक कार्यों की उत्पत्ति ही ‘अक्रम’ या यौगपद्य है, अतः इन दोनों को छोड़कर कार्योत्पति का कोई तीसरा प्रकार नहीं है । परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं में से एक के प्रतिषेध के बिना दूसरे का विधान नहीं हो सकता । अगर वस्तुओं को क्षणिक न मानें तो कार्यों की यह क्रमशः उत्पत्ति सम्भव नहीं होगी, क्योंकि जिसमें जिस कार्य
है या नहीं ?” इस विकल्प को अगर विधिकोटि मानें, अर्थात् यह कहें कि बीजों में अंकुर के उत्पादन की शक्ति है तो फिर बीज से सर्वदा- बीजों को कोठियों में रहने के समय भी – अंकुरों को उत्पत्ति होनी चाहिए। अगर निषेधकोटि मानें, अर्थात् यह कहें कि बीजों में अंकुरों के उत्पादन करने का सामर्थ्य नहीं है, तो फिर कभी भी खेत में बोने पर भी – बीजों से अंकुरों की उत्पत्ति नहीं होगी। अतः अंकुर के अव्यवहित पूर्वक्षण में बोज में एक विलक्षण धर्म की उत्पत्ति होती है, जिसका नाम है ‘कुवंद्रूपत्व’ । इस रूप से ही बीज अंकुर का कारण है, केवल बीजत्व रूप से नहीं, कोठियों के बीजों में बीजस्व के रहने पर भी यह ‘अंकुरकुन्वंदूपत्व’ धर्म नहीं है, अतः कोठी के बीजों से अंकुरों की उत्पत्ति नहीं होती है। इस प्रकार खेत में बोये हुए बीजों से कोठी के बीज भिन्न हैं, क्योंकि यह सम्भव नहीं है कि एक ही वस्तु में एक ही जाति रहे भी और न भी रहे। बीजों की यह विभिन्नता प्रत्येक क्षण में विभिन्न बीजों की उत्पत्ति के बिना सम्भव नहीं है, अतः यह समझमा चाहिए कि किसी भी स्तु को क्षणिक माने बिना उसमें अर्थक्रियाकारित्व सम्भव हो नहीं है। एवं सत्त्व अर्थक्रियाकारित्व रूप हो है, अत: यह उपसंहार कर सकते हैं कि जो भी सत् है वह अवश्य ही क्षणिक है, जैसे कि बीज, तस्मात् सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं ।
आत्मा को अगर ज्ञान का समवाधिकारण मानें तो उसे भी क्षणिक मानना हो पड़ेगा। अगर आत्मा क्षणिक है तो वह किसी का आश्रय नहीं हो सकता। अतः आत्मसिद्धि को कथित युक्तियां ठोक नहीं हैं।
प्रकरणम्
भाषानुवादसहितम्
१७७
न्यायकन्दली
असमर्थस्य कालान्तरेऽप्यजनकत्वस्वभा प्रस्थान तिवृत्तेः । क्रमवत्सहकारिलाभात्क्रमेण करणं तस्येति चेत् ?
अत्र वदन्ति – यदि सहकारिणो भावातिशयं न जनयन्ति, नापेक्षणीयाः, अश्वित्रत्वात् । जनयन्ति चेत् ? सकिं तावद्व्यतिरिक्तः ? अव्य तिरिक्तो वा ? व्यतिरेकपक्षे तावदतिशयादेवागन्तुकादन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्योत्पत्तिरित्यक्षणिकस्य न हेतुत्वम् सत्यपि तस्मिन्नभावात् । सहकारिकृताश यसहितस्य तस्य जनकत्वमिति चेत् ? अतिशयस्यातिशयान्तरानारम्भे कीदृशी सहायता ? आरम्भे चानवस्थायाः का प्रतिक्रिया ? सहकारिजन्योऽतिशयः स चाक्षणिकस्येति सुभाषितम्, अनुपकार्य्यानुपकारकयोः सम्बन्धाभावात् । भावादभिन्नोऽतिशय: सहकारिभिः क्रियत इत्यपि सुपेशलम्, भावस्य न को करने का सामर्थ्य है, वह कभी नष्ट नहीं हो सकती है। एवं जो जिस कार्य को करने में असमर्थ है वह कभी उस काम को कर ही नहीं सकता है। क्रमशः कार्य करनेवाले सहकारि कारणों की सहायता से क्रमशः कार्यों की उत्पत्ति होती है ।
इस प्रसङ्ग में बौद्धगण कहते हैं कि ( प्र ० ) सहकारि कारण मुख्य कारण में किसी विशेष सामर्थ्य का उत्पादन करते हैं या नहीं ? यदि नहीं करते हैं तो फिर उस कार्य के लिए वे अपेक्षित ही नहीं हैं ( फलत: कारण ही नहीं हैं ) क्योंकि वे कार्योत्पत्ति के लिए कुछ भी नहीं करते। यदि सहकारि कारण मुख्य कारण में किसी विशेष सामर्थ्य का उत्पादन करते हैं तो फिर यह पूछना है कि यह सामर्थ्य क्या अपने आश्रयीभूत मुख्य कारण से भिन्न है, या अभिन्न ? यदि भिन्न है तो फिर कार्य की उत्पत्ति उसी से होगी, क्योंकि कार्य का अन्वय और व्यतिरेक उसी के साथ है। इस से यह सिद्ध होता है कि अक्षणिक वस्तुओं से कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि उनके रहते हुए भी (क्षणिक उस शक्ति के बिना ) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ० ) सहकारी कारणों से विलक्षण शक्ति की उत्पत्ति होती है एवं उस शक्ति से युक्त बीजादि ही कारण हैं । ( प्र० ) यह ‘अतिशय’ ( विलक्षण सामर्थ्य ) उन बीजादि बस्तुओं में किसी दूसरे अतिशय को जन्म देता है या नहीं ? अगर नहीं तो फिर सहायता कैसी ? अगर हाँ ? तो अनवस्था दोष का क्या परिहार होगा ? यद्यपि यह कहना ठीक सा लगता है कि सहकारियों से अतिशय की उत्पत्ति अवश्य होती है किन्तु वह क्षणिक वस्तुओं का धर्म नहीं है, किन्तु अक्षणिकों का धर्म है। यह कहता भी ठीक नहीं हैं कि ‘वह अतिशय या सामर्थ्य विशेष सहकारियों से अवश्य ही उत्पन्न होता है, एवं वह अपने
१. अभिप्राय यह है कि बीजादि में सर्वदा अङकुरादि के उत्पन्न का सामर्थ्य है ही। जब उसे खेत, पानो प्रभृति सहकारियों की सहायता पहुंचती है तभी उन से अङ्कुरादि कार्यों की उत्पत्ति होती है ।
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न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्
[ द्रव्य आत्म
न्यायकन्दली
पूर्वोत्पन्नस्य पुनरुत्पत्त्यभावात् । प्राक्तनो हि भावोऽनतिशयात्मा निवर्त्तते, अन्य श्चातिशयात्मा जायत इति चेत् ? क्षणिकत्वसिद्धिः ।
ननु क्षणिकस्यापि सहकारिभि कि क्रियते ? न किञ्चित्, किमर्थं र्ताह ते अपेक्ष्यन्ते ? को वै ब्रूते अपेक्ष्यन्ते इति, प्रत्येकमेव हि कार्यजननाय समर्था अन्त्या वस्थाभाविनः क्षणाः, का तेषां परस्परापेक्षा ? यत्तु तदानीं परस्परं प्रत्यासीदन्ति तदुपसर्पण कारणस्यावश्यम्भावनियमात्, न तु सम्भूयकार्यकरणाय, तत्काले चोप सर्पणहेतु नियमस्तेषां वस्तुस्वाभाव्यात् । प्रत्येकं समर्था हेतवः प्रत्येकं कार्यं जनयेयुः । किमित्येकमनेके कुर्व्वन्ति ? अत्राप्यमीषां कारणानि प्रष्टव्यानि, यान्यप्रत्येकार्थनिर्वर्त्तनशीला नि प्रभावयन्ति । वयं तु यथादृष्टस्य वस्तुस्वभावस्य वक्तारो न पर्थ्यनुयोगमर्हामः । कार्यमेकेनैव कृतं किमपरे कुर्व्वन्तीति चेत् ? न कृतं कुवंन्ति किन्त्वेकेन क्रियमाणमपरेऽपि कुर्ध्वन्ति । आश्रयीभूत मुख्य कारण से अभिन्न है, क्योंकि अनुपकार्य और अनुपकारक में ( सहाय्य सहायकभाव ) सम्बन्ध असम्भव है” क्योंकि एक बार उत्पन्न वस्तु की फिर से उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ० ) अनतिशय स्वरूप पहली वस्तु का नाश होता है एवं अतिशय स्वरूप दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) फिर तो क्षणिकत्व का सिद्धान्त अटल है।
( उ० ) वस्तुओं को क्षणिक मान लेने पर भी सहकारियों से उन्हें क्या सहायता मिलती है ? ( प्र० ) कुछ भी नहीं ? ( उ०) फिर वे सहकारियों की अपेक्षा क्यों रखते हैं ? ( प्र ० ) कौन कहता है कि बीजादि कारण अपने कार्यों के लिए सह कारियों की अपेक्षा रखते हैं। ‘अन्स्य क्षण अर्थात् कार्योत्पत्ति के अव्यवहित पूर्वक्षण में रहनेवाले सभी ( मुख्य और सहकारी दोनों ही प्रकार के ) कारण अङकुरादि कार्यों को उत्पन्न करने में समर्थ हैं। इस में सब की परस्परापेक्षा कैसी ? उस क्षण में मुख्य सहकारी दोनों प्रकार के कारणों का सम्मेलन इसलिए नहीं होता कि मिलकर ही वे कार्य को उत्पन्न कर सकते हैं, किन्तु उस क्षण में नियमित रूप से सम्मेलन की सामग्री रहती है अतः उस क्षण में सभी कारण अवश्य ही सम्मिलित होते हैं। प्रश्न यह रह जाता है कि ‘नियमतः उसी क्षण में क्यों एकत्र हों ? इस का यही उत्तर है कि ‘यह उनका स्वभाव है ( उ० ) मुख्य कारण और सहकारियों में से प्रत्येक भी यदि स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकते हैं तो फिर वे अलग अलग अपना काम करेंगे, एक ही काम को सब मिलकर क्यों करेंगे ? ( प्र०) यह तो उन कारणों से हो पूछिये कि प्रत्येकशः वे कार्य करने में समर्थ होते हुए भी क्यों सम्मिलित होकर एक ही कार्य को करते हुए से प्रतीत होते हैं। इस अभियोग के भागी हमलोग नहीं हमलोग तो वस्तुओं को जैसा देखते हैं वैसा ही वर्णन करते हैं । ( उ०) कार्य जब एक ही कारण से सम्पादित हो जाता है तब शेष
प्रकरणम् ]
भाषानुवादसहितम्
न्यायकन्दली
१७९
यत्रैकमेव समर्थं तत्रापरेषां क उपयोग इति चेद् ? सत्यम्, न ते प्रेक्षापूर्वकारिणो यदेवं विमृश्योदासते । एकं कार्य्यमनेकस्मादुत्पद्यत इति दुर्घटमिदम्, कारण भेदस्य कार्य भेदहेतुत्वादिति चेन्नैवम्, सामग्रीमेदाद्धि कार्य्यभेदो न सहकारिभेदात्, एक कार्यकारितैव सहकारिता, तस्मात् क्षणिकत्वे क्रमवतां भावानां क्रमेण कार्यकरणं घटते, दुर्घटा तु अक्षणिकस्यार्थक्रियेति । युगपत्करण मपि दुर्घटम्, तावत्कार्य्यकरणसमर्थस्य स्वभावस्योत्तरकालमप्यनिवृतेः । कृतस्य करणं नास्ति, कर्तव्यञ्चास्य न विद्यते । निखिलस्य कार्यकलापस्य सकृदेव कृत. त्वात् अतः क्षणान्तरे न करोतीति चेत् ? तर्हि अयं तदानीमसन्नेव, समस्तार्थ क्रियाविरहात् । तदेवं व्यापकयो: क्रमयोगपद्ययोरनुप लम्भेनाक्षणिकान्निवर्त्तमानं
कारण क्या करते हैं, ठीक है वे उस एक कारण से किए जाते हुए कार्य को ही करते हैं ? ( प्र० ) एक कारण से हुए कार्य को ही शेष उत्पन्न कारण नहीं करते हैं किन्तु एक के द्वारा सम्पादित होते हुए कार्य का ही सम्पादन शेष कारण भी करते हैं । ( उ० ) जहाँ एक ही कार्य सम्पादन की सम्भावना है वहाँ और कारणों का क्या उपयोग है ? ( प्र० ) यह कारण से आक्षेप सत्य है, किन्तु वे कारण तो कुछ समझ कर काम करने की क्षमता नहीं रखते कि एक ने इस काम को कर ही दिया तो हम लोगों को इस झंझट से क्या प्रयोजन ? यह समझकर इस से उदासीन हो जाँय ( उ०) फिर भी यह दुघंट ही है कि समान शक्ति वाले अनेक कारणों से एक ही कार्य की उत्पत्ति हो, क्योंकि कारणों के भेद से ही कार्यों के भेद होते हैं । ( फलतः विभिन्न कारणों से विभिन्न हो कार्य होंगे, एक कार्य नहीं ) ( प्र० ) यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि सहकारियों के भेद से कार्यो का भेद नहीं होता है, किन्तु सामग्रियों ( कारणसमूहों ) के भेद से कार्यों में भेद होता है। एक कार्यकारित्व ही अर्थात् मुख्य कारण से होनेवाले कार्य को मुख्य कारण के साथ मिलकर करना ही ‘सहकारित्व’ है । अतः वस्तुओं को क्षणिक मानने पर ही क्रमशील भावों से क्रमशः कार्य की उत्पत्ति की सम्भावना है। अक्षणिक स्थिर वस्तुओं से कार्य की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है । एवं युगपत्कारित्व ( एक ही काल में अनेक कार्यों का सम्पादन ) भी सम्भव नहीं है, क्योंकि एक ही काल में अनेक कार्यों की सम्पादकता ही ‘युगपरकारिता’ है, इस युगपत्कारिता रूप सामर्थ्य का तो कारणों से लोप नहीं होगा ? तब फिर उन्हीं कार्यों की उत्पत्ति बराबर होती रहेगी। ( उ० ) उत्पन्न कार्यों की फिर से उत्पत्ति नहीं हो सकती है। अपने से होनेवाले सभी कार्यों का सम्पादन वह कर चुका है यतः उस को कुछ कर्त्तव्य भी नहीं है । अतः उसके बाद वह कार्य का सम्पादन नहीं कर सकता । ( प्र० ) फिर आगे के क्षणों में उस की सत्ता ही सम्भव नहीं है, क्योंकि उन क्षणों में उस में किसी किसी अर्थक्रिया का
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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम्
न्यायकन्दली
[ द्रव्ये आत्म
सत्वं क्षणिके व्यवतिष्ठते । तथा च सति सुलभं क्षणिकत्वानुमानं यत् सत् तत् क्षणिकं, सन्ति च द्वादशायतनानीति । अत्रोच्यते- न सत्त्वात् क्षणिकत्व सिद्धिः, तस्य विपक्षव्यावृत्त्यनवगमात् । यत्क्रमयोगपद्यरहितं तदसत्, यथा वाजिविषाणम्, क्रमयोगपद्यरहितञ्चाक्षणिकमिति बाधकेनाक्षणिकात् क्रमयोगपद्यव्यावृत्त्या सत्त्वव्यतिरेकप्रतीतिरिति चेन्न, अक्षणिकस्याप्रतीतो सत्त्वस्य ततो व्यावृत्ति प्रतीत्यसम्भवात्, यथा प्रतीयमाने जले तत्र वह्निधूमयोरभावप्रतीतिः, एवमक्ष णिके दृश्यमाने क्रमयोगपद्याभावात्सत्त्वाभाव: प्रत्येतव्यः । न चाक्षणिको नाम कश्चिदस्ति भवताम्, यथाऽप्रतीयमानेऽपि पिशाचे ततोऽन्यव्यावृत्तिः प्रतीयते
जनकत्व नहीं है। अतः सत्त्व के व्यापक क्रमकारित्व युगपत्कारित्व ये दोनों ही अक्षणिक स्थिर वस्तुओं में नहीं रह सकते ( अत: अक्षणिक स्थिर किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है ) फलतः सत्त्व क्षणिक वस्तुओं में ही नियमित हो जाता है। अतः सभी • वस्तुओं में क्षणिकत्व का यह अनुमान सुलभ हो जाता है कि जो सत् है अवश्य ही क्षणिक है, जैसे कि द्वादश आयतन | ( उ० ) हम लोग इस आक्षेप का यह समाधान करते हैं कि सत्त्व हेतु से क्षणिकत्व की सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि इस अनुमान के हेतु में विपक्षव्यावृत्ति’ अर्थात् विपक्षासत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता है’ । ( प्र० ) “जिसमें न क्रमशः कार्य के उत्पादन का सामर्थ्य है अर्थात् क्रमकारित्व है और न कार्यों को एक ही समय में उत्पादन का सामर्थ्य अर्थात् युगपत्कारित्व है वह सत् भी नहीं है जैसे कि घोड़े की सींग” इस बाधक अनुमान के वल से स्थिर वस्तुओं से सत्त्व हट जाता है, अतः स्थिर वस्तुओं में सत्त्व के अभाव की प्रतीति होती है। अक्षणिक वस्तु हो प्रकृत वस्तु रूप विपक्ष के में विपक्ष है । अत अक्षणिक ज्ञान के विना विपक्षव्यावृति का सम्भव नहीं है। ज्ञान प्रतीत होनेवाले जल में ही वह्नि और धूम के अभाव प्रतीति होती है। इसी प्रकार जब अक्षणिक कोई वस्तु देखी जायेगी तब उस में क्रम और योगपद्य के न होने से सत्त्व का अभाव समझेंगे। किन्तु आप (बौद्ध) के मत में कोई भी वस्तु अक्षणिक
१. अभिप्राय यह है कि वही हेतु साध्य का ज्ञापक हो सकता है जिसमें ( १ ) पक्षसत्व ( २ ) सपक्षसत्व ( ३ ) विपक्षासत्व ( ४ ) अबाधितत्व एवं ( ५ ) असत्प्रतिपक्षितत्व ये पाँच रूप निर्णीत रहे । प्रकृत क्षणिकत्व के साधक सत्त्व हेतु में विपक्षध्यावृत्ति या विपक्षासत्त्व का निर्णय नहीं हो सकता है, क्योकि बौद्धगण संसार की सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व का साधन करते हैं। अतः सभी पदार्थ पक्ष के ही अन्तर्गत आ गये हैं। विपक्ष के लिए कोई बचा ही नहीं। अतः प्रकृत में विपक्ष की अप्रसिद्धि के कारण विपक्षव्यावृत्ति भी अप्रसिद्ध ही है। अतः साध्यसाधक हेतु का ज्ञान न होने के कारण प्रकृतानुमान ठीक नहीं है ।