Prashastapada Bhashya Hindi 3

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Prashastapada Bhashya Hindi 3

प्रशस्तपादाचार्य प्रणीतम्

प्रशस्तपादभाष्यम् [ पदार्थधर्म्मसङ्ग्रहाख्यम् ]

श्रीधर भट्टकृत

न्यायकन्दलीव्याख्योपेतम्

श्रीदुर्गाधरझाकृत-हिन्दीभाषानुवादसहितम्

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

१८१

न्यायकन्दली

स्तम्भः पिशाचो न भवतीति तद्वदेतदपि भविष्यतीति चेद् ? न, व्यावृत्तेर नुपलब्धिप्रमाणैकगो चरत्वात् तद्विविक्तेतरपदार्थोपलब्धिस्वभावत्वाच्चानुपलब्धेः प्रतियोग्युपलब्धिमन्तरेणाभावात् । न च स्वरूपविप्रकृष्टत्वे पिशाचस्य ततो व्यावृत्तिप्रतीतिसम्भवः । कथं तह स्तम्भः पिशाचो न भवतीति प्रतीतिरिति चेत् ? नायं संसर्गप्रतिषेधः, किन्तु तादात्म्यप्रतिषेधोऽयम् । स च स्तम्भात्मतया प्रसज्जितस्य पिशाचस्य दृश्यत्वाभ्यनुज्ञानात् प्रवर्त्तते, नान्यथा, यथोक्तम्- “तादात्म्येन यावानिषेधः स सर्व उपलब्धिलक्षणप्राप्तत्वाभ्युपगमेन क्रियते” इति । तत्र स्तम्भस्वरूथै कनियता स्तम्भप्रतीतिस्तदनात्मन्यवच्छेदकारणम्, यदि स्तम्भः पिशाचो भवेत् तेनाप्यात्मना ज्ञातः स्यात् । न च ज्ञानं स्तम्भत्ववत्पिशाचात्मता.

मपि गृह्णाति, तस्मादयं पिशाचो न भवतीति । अथ मतम्, न नीला दिव्यतिरिक्तोऽक्षणिक क्षणिको वा कश्चिदस्ति,

नहीं है । ( प्र० ) जैसे कि अप्रतीत पिशाच में अन्य से व्यावृत्ति की यह प्रतीति होती है कि ‘स्तम्भ पिशाच नहीं है’ यहाँ भी वैसे ही विपक्ष व्यावृत्ति की प्रतीति होगी ? ( उ० ) ‘व्यावृत्ति’ अर्थात् वृत्तित्व के अभाव का निश्चय अनुपलब्धिरूप अभाव प्रमाण से ही हो सकता है। अनुपलब्धि केवल उपलब्धि का अभाव ही नहीं है, किन्तु प्रतीत होनेवाले अभाव के प्रतियोगी से भिन्न की उपलब्धिरूप है। अतः (विरक्ष व्यावृत्ति में अपेक्षित ) अनुपलब्धि साध्याभाव के प्रतियोगीरूप साध्यकी उपलब्धि के विना असम्भव है ( अर्थात् पिशाच की, यदि असत्ता सिद्ध हो जाय तो फिर उस का ज्ञान ही असम्भव है’ ) ( प्र० ) तो फिर स्तम्भ पिशाच नहीं है। यह प्रतीति कैसे होती है ? ( उ० ) यह संसर्ग के अर्थात् आधारआधेयभाव के नियामक पिशाच के सम्बन्ध के अभाव की प्रतीति नहीं है, किन्तु यह उस के तादात्म्य के प्रतिषेध की प्रतीति है, यह भी स्तम्भ रूप से सम्भावित पिशाच को दृश्य मान कर ही प्रवृत्त होता है, अन्यथा नहीं, । जैसा कहा है कि तादात्म्य सम्बन्ध से जितने निषेधों की प्रतीति होती है वे निषिद्ध होनेवाले सभी वस्तुओं की सत्ता मान कर ही होती है। यहाँ केवल स्तम्भ में ही होनेवाली ‘यह स्तम्भ है’ यह प्रतीति ही स्तम्भ के स्वरूप से भिन्न पिशाचादि के निषेध का कारण होती है। तदनुकुल न्याय का प्रयोग ऐसा है कि ‘अगर यह स्तम्भ पिशाच होता तो यह पिशाचत्व रूप से ज्ञात होता, किन्तु स्तम्भोऽयम्’ यह ज्ञान स्तम्भस्त्र की तरह पिशाचत्व को समझाने में असमर्थ है। अतः स्तम्भ पिशाच नहीं है ।

( प्र० ) प्रतीत होनेवाले नीलादि पदार्थों से भिन्न क्षणिक या अक्षणिक कोई पदार्थ है ही नहीं किन्तु पहले की बुद्धि से ज्ञात नीलादि क्षणों में जब वर्तमान कालिक

१८२

न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्

[ द्रव्ये आत्म

न्यायकन्दली

किन्तु प्राक्तनबुद्धिवेद्यो नीलादिक्षणोऽधुनातनबुद्धिवेद्यान्नीलक्षणादभेदेनारोप्य माणोऽक्षणिक इत्युच्यते । भेदेन व्यवस्थाप्यमाणश्च क्षणिक इति। तत्र नीला दिष्वेव क्रमाक्रमव्यावृत्या सत्वाभावप्रतीतिः । यदि पूर्वोपलब्धक्षण एवाय मुपलभ्यते तदा सम्प्रतितनीमर्थक्रियां प्रागेव कुर्य्यात्, प्राक्तनीं वा सम्प्रत्येव, न पुनः क्रमेण कुर्य्यात्, एकस्य कारकत्वाकारकत्व विरोधात् । नापि सर्व पूर्वमेव कुर्य्यात्, सम्प्रत्यर्थक्रियारहितस्यासत्त्वप्रसङ्गादिति । तत्रापि किमेवं सत्त्वस्य हेतोर्वास्तवो विपक्षो दर्शितः ? कल्पनासमारोपितो वा समर्थितः ? न ताव द्वास्तवो विपक्षः, नीलादीनामक्षणिकस्यावास्तवत्वात् तस्मादनुमानाद्वास्तवीमर्थगति मिच्छता लिङ्गस्य त्रैरूप्यविनिश्वयार्थ घूमानुमानवत् सर्वत्र प्रमाणसिद्धः पक्षा दिभावो दर्शयितव्यः, न कल्पनामात्रेण । न चाक्षणिकस्तथाभूतोऽस्तीति व्यतिरेका सिद्धिः । तदसिद्धावन्वयस्याप्यसिद्धिस्तस्यास्तत्पूर्वकत्वादित्यसाधारणत्वं हेतोः ।

बुद्धि के द्वारा ज्ञात क्षण का अभेदभ्रम होता है तभी नीलादि अक्षणिक ( स्थिर ) कहलाते हैं। जब वे ही क्षण भिन्न भिन्न रूप से ज्ञात होते हैं तभी नीलादि क्षणिक कहलाते हैं। यही स्थिर रूप से अभिमत नीलादि न क्रमशः कार्यों का उत्पादन कर सकते हैं, न एक ही समय में ( युगपत् ) कार्यों का उत्पादन कर सकते हैं। इस ( क्रम यौग पद्याभाव ) की प्रतीति से स्थिर रूप से अभिमत नीलादि में ही सत्त्व के अभाव की प्रतीति होगी। क्योंकि अगर पहिले के ज्ञात क्षण में हो नीलादि की प्रतीतियाँ होती हैं, तो फिर वह ( क्षण ) अभी उत्पन्न होने वाले कार्यों को पहिले ही उत्पन्न करता, या पहिले उत्पन्न होनेवाले काय को अभी उत्पन्न करता। किन्तु क्रमशः तो वह कार्यों का उत्पादन कर नहीं सकता है, क्योंकि एक ही वस्तु में कारकत्व एवं अकारकत्व दोनों विरुद्ध धर्मो का समावेश असम्भव है। यह भी सम्भावना नहीं है कि सभी कार्यों को पहिले ही कर देता है तब तो इस समय अर्थ क्रिया से रहित होने के कारण वस्तु की वर्तमान काल में सत्ता हो ) उठ जायगी । ( उ० ) आप के प्रदर्शित विपक्ष की ( स्थिरत्वेन व्यवहृत नीलादि की ) सत्ता यथार्थ है ? या काल्पनिक ? इस की सत्ता वास्तविक तो है नहीं, क्योंकि उक्त नीलादि का अक्षणिकत्व ( आप के मत से ) अवास्तविक है। अतः अनुमान के द्वारा वास्तव वस्तुओं की सिद्धि की इच्छा रखनेवाले को चाहिए कि हेतु के तीनों रूपों ( पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, एवं विपक्षासत्त्व ) के निश्चय के लिए मानुमान की तरह पक्षादि ( पक्ष, सपक्ष, एवं विपक्ष ) की काल्पनिक नहीं, वास्तविक सत्ता दिखलावे, किन्तु आप के मत से अक्षणिक वस्तुओं की वास्तविक सत्ता है नहीं। फलत: व्यतिरेक व्याप्ति भी नहीं बन सकती है। (क्योंकि विपक्ष असिद्ध है) इसी तरह अन्वय व्याप्ति भी नहीं बन सकती है,

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

न्यायकन्दली

१८३

अपि च बाधकेनाक्षणिकात् सत्त्वव्यतिरेकः प्रसाधितः, क्षणिकत्वसत्त्वयोरन्वयः कुतः सिद्धयति ? न च तत्र विपक्षण्यावृत्तिमात्रेण हेतुत्वमसाधारणस्यापि हेतुत्व प्रसङ्गात् । के वलव्यतिरेक्यनुमानञ्च स्वयमनिष्टम् । अक्षणिकेऽपि सत्वं न भवतीत्यवस्थापितेऽर्थात् क्षणिकाश्रयं सत्त्वमित्यन्वयसिद्धिरिति चेत् ? न तावदर्थादिति सत्त्वस्य हेतोः परामर्शः असिद्धान्वयस्य तस्याद्यापि हेतुत्वा भावात् । बाधकमेव तुभयव्यापारं प्रमाणन्तरं व्याप्ति प्रसाधयद् द्वादशायतनेष्वेव प्रसाधयेन्निव्विषयाया व्याप्तेः प्रत्येतुमशक्यत्वात्, द्वादशायतनव्यतिरिक्तस्य चार्थस्या भावात् । तेषु चान्वयप्रतीतौ क्षणिकत्वस्यापि प्रतीतिः, सम्बन्धिप्रतीतिनान्तरीय कत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति सत्त्ववंयर्थ्यम् । पक्षे सामान्येन व्याप्तिग्रहणं, विशेषे सत्त्वस्य हेतुत्वमिति चेन्न, निविशेषस्य सामान्यस्य प्रतीतेरभावात् । विशेष

क्योंकि अन्वयव्याप्ति में भी विपक्ष का ज्ञान आवश्यक है। अतः कथित सत्त्व रूप हेतु ( केवल पक्ष में ही रहने के कारण ) असाधारण नाम का हेत्वाभास है। और भी बात है कि ( कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप ) बाध मूलक अक्षणिकत्व हेतु से विपक्ष में असस्त्र रूप साध्य के अभाव का आपने निश्चय किया है, किन्तु क्षणिकत्व और सत्त्व में ( नियत ) सामानाधिकरण्य रूप अन्वय (व्याप्ति) किस हेतु से सिद्ध होगा ? केवल विपक्ष में न रहने से ही हेतु साध्य का साधन नहीं कर सकता है। क्योंकि इस प्रकार तो असाधारण हेत्वाभास से भी यथार्थ अनुमिति की आपत्ति होगी। केवल •व्यतिरेकी अनुमान तो स्वयं ही दूषित है । ( 40 ) अक्षणिकों ( स्थिरों ) में सत्त्व नहीं है’ यह सिद्ध हो जाने पर यह ‘अन्वय’ अर्थात् सिद्ध हो जाता है कि ‘सत्त्व क्षणिक वस्तुओं में ही है । ( उ० ) “अर्थात्” पञ्चमी विभक्ति युक्त इस हेतु बोधक पद से ‘सत्त्व’ हेतु हो अभिप्रेत है, किन्तु अन्वय के असिद्ध होने के कारण उसमें हेतुत्व हो असिद्ध है । ( प्र० ) कथित कार्यकारणभाव को अनुपपत्ति रूप दोष के ही दो व्यापारों की कल्पना करेंगे, एक से अक्षणकों में असत्व की सिद्धि होगी और दूसरे से क्षणिकों में सत्व की सिद्धि होगी। अथवा वही बाधक अम्वयसाधक दूसरी व्याप्ति रूप प्रमाण को उपस्थित करता हुआ द्वादशायतनों में ही सत्र को सिद्ध करेगा क्योंकि व्याप्ति की प्रतीति विषय के बिना नहीं हो सकती है। एवं द्वादशायतनों से भिन्न किसी वस्तु की सत्ता है नहीं। उस में अस्वय की प्रतीति से क्षणिकत्व की प्रतीति अवश्य होगी। क्योंकि जहाँ सम्बन्ध की प्रतीति रहेगी वहाँ सम्बन्धियों को भी प्रतीति अवश्य हो रहेगी। अतः पहिले पक्ष में सत्त्वसिद्धि की कोई आवश्यकता नहीं है। व्याप्ति सामान्य रूप से ही गृहीत होगी और सत्त्व हेतु से विशेष की सिद्धि होगी ‘अर्थात् उस सामान्य व्याप्ति से ही विशेष तत्तद्वयक्तियों में सत्त्व की सिद्धि होगी। ( उ० )

१८४

न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम्

न्यायकन्दली

[ द्रव्ये आत्म

सत्त्ववैयर्थ्यमिति । बाधकक्षणिकत्वव्यावृत्त्यत्त्व

परिनिष्ठयोश्च क्षणिकत्वसत्त्वसामान्ययोः प्रतीयमानयोनलादिगतं क्षणिकत्वं प्रतीतमिति सूक्तं व्यावृत्योर्व्याप्तिग्रहणम्, सत्त्वात्तु वस्त्वात्मकक्षणिकत्व प्रतीतिरिति चेन्न, व्यावर्यभेदेन कल्पित भेद योर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यभावात् । तादात्म्यञ्चानुमानाङ्ग मुक्तम्, वस्त्वात्मनोः क्षणिकत्वसत्त्वयोस्तादात्म्यभावात् । तदात्मकत्वेनाध्यवसित योरपि व्यावृत्योस्तादात्म्यमिति चेत् ? न, वस्तुनोस्तादात्म्यस्यान्यतोऽप्रसिद्धः, प्रसिद्धौ वा बाधकस्यापि वैयर्थ्यम् । न च व्यावृत्त्योः प्रतिबन्धनिश्चये वस्तुसिद्धि रस्ति वस्त्ववस्तुनोर्भेदादसम्बन्धाच्च ।

यदप्युक्तम्-धर्मोत्तरेण घटे बाधकेन व्याप्ति प्रसाध्य शब्दे सत्त्वात् क्षणिकत्व प्रसाधनमित्युभयोरपि सार्थकत्धं विषयभेदादिति। तत्रापोदमुत्तरम् ।

यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि विशेषों को छोड़कर सामान्य की प्रतीति नहीं होती है। एवं जब कि विशेष व्यक्तियों में क्षणिकत्व सामान्य और सत्त्व सामान्य की सिद्धि उस सामान्य व्याप्ति से हो हो गयी तो फिर नीलादि वस्तुओं में भी क्षणिक ज्ञात हो ही गया। उस के लिए सत्त्व हेतु की फिर से आवश्यकता नहीं है अतः हम ने ठीक ही कहा है कि सत्त्व हेतु की कोई सार्थकता नहीं है । ( प्र० ) कार्यकारणभाव को अनुपपत्ति रूप बाधक से हो अक्षणिकत्वव्यावृत्ति ( अक्षणिकत्वाभाव ) एवं असत्त्व व्यावृत्ति’ ( अर्थात् असत्त्वाभाव ) इन दोनों की व्याप्ति का ज्ञान होता है और सत्त्व से भावस्वरूप क्षणिकत्व की प्रतीति होती है । ( उ० ) व्यावस्यं ( व्यावृत्ति के अभाव के प्रतीति का प्रयोजक ) के भेद से ( असत्त्वव्यावृत्ति एवं अक्षणिकत्व व्यावृत्ति इन ) दोनों व्यावृत्तियों में भी भेद की कल्पना करनी पड़ेगी। किन्तु साध्य और हेतु के तादात्म्य को आप (बौद्ध) अनुमान का अङ्ग मानते हैं । ( प्र० ) भावस्वरूप क्षणिकरत्व और सत्त्व इन दोनों में तो तादात्म्य है ही, इस तादात्म्य से ही, ‘सत्त्व और क्षणिकत्व’ इन दोनों के अभिन्न रूप से कल्पित अक्षणिकत्वव्यावृत्ति और असत्त्वव्यावृत्ति इन दोनों में भी तादात्म्य होगा । ( उ० ) वस्तुओं का तादात्म्य किन्हीं और चीजों से साधन करने योग्य वस्तु नहीं है। अगर वह तादात्म्य अन्य वस्तु से ही सिद्ध हो तो फिर उक्त कार्यकारणभाव की अनुपत्ति का प्रदर्शन ही व्यर्थ है । ( अभाव रूप ) दोनों व्यावृत्तियों में व्याप्ति निश्चय होने पर भी क्षणिकत्व रूप भाव पदार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि भाव और अभाव दोनों भिन्न वस्तुएँ हैं। एवं इन दो विरुद्ध वस्तुओं में सम्बन्ध भी असम्भव है ।

धर्मोत्तर ने यह कहा है कि ( प्र० ) उक्त बाधक के बल से घटादि में व्याप्ति की सिद्धि के बाद शब्दादि में सत्त्व हेतु से क्षणिकत्व की सिद्धि करेंगे। इस

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

१८५

न्यायकन्दली

घट इव शब्देऽपि बाधकस्य प्रवृत्त्याविरोधात् प्रमाणान्तरानुसरणमफलमिति । न चाक्षणिकस्यार्थक्रियानुपपत्तिः, सहकारिसाहित्ये हि सति कार्य्यकरणस्वभावो हि भावो नानपेक्षकारकस्वरूपः, तस्य यथान्वयव्यतिरेकावगतसामर्थ्या: सह कारिण: सन्निपतन्ति तथा कार्य्योत्पत्तिरित्युपपद्यते स्थिरस्यापि क्रमेण करणम् | अनेककारणाधीनस्य कार्य्यस्यैकस्मादुत्पत्त्यभावात् । न च सहकारिसापेक्षित्वे सति सत्कृतादेवातिशयात् कार्योत्पत्तेर्भावो न कारक इति युक्तम्, भावस्वरूपा नुगमनेन कार्योत्पाददर्शनात् । अकारकत्वे हि यवबीजस्य क्षित्युदकसंनिधौ शालिबीजायङ्कुरोऽपि स्यात्, नियमकारणाभावात् । नापि सहकारिणो भावस्य स्वरूपातिशयमादधति, किन्तु सहकारिण एव ते । अतिशयः पुनरेतस्य सहकारि साहित्यम्, अनतिशयोऽपि तदभाव एव, तस्मिन् सति ततः कार्य्यस्य भावाद

प्रकार बाधक के उपन्यास और सत्त्व हेतु दोनों की सार्थकता विषय भेद से है। ( उ० ) किन्तु उनका यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शब्दादि में ( घटादि पदार्थों की तरह ) उस बाधक के बल से ही क्षणिकत्व की सिद्धि होगी, उसके लिए भी सत्त्व हेतु का अवलम्बन व्यर्थ ही है । वस्तुतः यह कहना ही भूल है कि ‘वस्तुएँ अगर क्षणिक न मानो जाँय तो उन से अर्थक्रिया का सम्पादन असम्भव है। क्योंकि वस्तुओं का यह स्वभाव है कि वे सह कारियों से सहायता प्राप्त करके ही कार्यों का सम्पादन करती हैं उन से निरपेक्ष रह कर नहीं। अतः यह निश्चित होने में कोई बाधा नहीं है कि अन्वय और व्यतिरेक से जिस में कार्य को उत्पन्न करने का सामर्थ्य ज्ञात हो गया है, वे सहायक जब बीजादि प्रधान कारणों के साथ सम्मिलित होते हैं तभी कार्यों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार स्थिर वस्तुओं से भी क्रमशः कार्यों की उत्पत्ति हो सकती है। क्योंकि अनेक कारणों से उत्पन्न होने से एक कार्य की उत्पत्ति केवल किसी एक कारण से नहीं हो सकती है । ( प्र० ) तब फिर सहकारि कारणों से उत्पन्न ‘अतिशय’ रूप विलक्षण सामर्थ्य से ही उत्पत्ति होगी, ‘भाव’ ( अर्थात् बीजादि मुख्य कारणों ) को कारण मानने की क्या आवश्यकता है ? ( उ० ) इसलिए कि कार्यों में भावों के मूल कारणों की अनुवृत्ति देखी जाती है। यदि बीज ( अङ्कुर का ) कारण ही न हो, तो फिर यव के बीज से पृथिवी जलादि सहकारियों का संविधान रहने पर धान के अङ्कुर की भी उत्पत्ति होगी । क्योंकि ( यत्र बीज से यवाङ्कुर ही हों एवं धान्य बीज से धान्याकुर हो ) इस नियम का कोई ज्ञापक नहीं है । यह कहना भी दूषित है कि मूल कारण में सहकारिकारणों से किसी अतिशय की उत्पत्ति होती है। क्योंकि वे सहकारी हो हैं और उन का साहित्य हो ‘अतिशय’ है, इस साहित्य का अभाव ही ‘अनतिशय’ अर्थात् विलक्षण सामर्थ्य का न रहना है । ( प्र० ) मूल

१८६

न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्

न्यायकन्दली

[ द्रव्ये आत्म

सत्यभावात् जनकाजनकक्षण भेदाभ्युपगमः सर्वदावस्थानग्राहिप्रत्यक्षबाधितः, सुसवृशक्षणानामव्यवधानोत्पादेनान्तराग्रहणादवस्थान भ्रमोऽयमिति चेत् ? स्थिते क्षणिकत्वे प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता, तद्भ्रान्तत्वे च क्षणिकत्वसिद्धिरित्यन्योन्यापेक्षता । न च यद्यस्योत्पत्तिकारणं विनाशकारण श्वान्वयव्यतिरेकाभ्यामवगतं तयोरभावे तस्योत्पत्तिविनाशकल्पना युक्ता, निर्हेतुको विनाशो, बीजमवि बीजस्य कारण मिति चासिद्धम् । अङ्कुरजनकं बीजं बीजकृतं न भवति बोजत्वाच्छालिस्तम्भ मूर्द्धस्थितबीजवत् । निर्भागं वस्तु तस्य कारकत्वमकारकत्वञ्चेत्यंशावनुपपन्ना विति यत् किञ्चिदेतत् । यथा वह्नहिं प्रति कारकत्वम्, अकारकत्वश्व स्नानं प्रति,

कारण को जिस क्षण में सहकारियों का साहित्य मिलता है, उस से अव्यवहित आगे कार्य की उत्पत्ति होती है। और जिन क्षणों में वह साहित्य उन को नहीं मिलता है उन से अव्यवहित अग्रिम क्षण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है। इस अन्वय और व्यतिरेक से यह समझते हैं कि वह साहित्यक्षण ही ‘जनकक्षण’ है और उस से भिन्न सभी ‘अजनकक्षण’ है ( दो प्रकार के क्षणों में रहनेवाले बीजादि कोई एक स्थिर वस्तु नहीं हैं ) ( उ० ) किन्तु ‘जिस बीज को मैंने कल घर में देखा था उसी बीज को आज खेत में देख रहा है इस प्रकार एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का ग्राहक प्रत्यक्ष बीजों के क्षणिकत्व का बाधक है । ( प्र० ) एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का भान इस लिए होता है कि उत्पन्न हुए अनेक बीजक्षण परस्पर अत्यन्त सध्या हैं, अतः उन का परस्पर भेद समझ नहीं पड़ता है। फलतः एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का ग्राहक उक्त प्रत्यक्ष ही भ्रम रूप है । ( उ० ) उक्त प्रत्यक्ष भ्रान्त क्यों है ? इस लिए कि सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं। सभी वस्तुएँ क्षणिक क्यों हैं ? इसलिए कि उक्त प्रत्यक्ष भ्रान्ति रूप है। इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष स्पष्ट है। यह तो ठीक नहीं है कि अन्वय और व्यतिरेक से जिन में उत्पत्ति और विनाश की कारणता सिद्ध हो गयी है उन के बिना भी उत्पत्ति और विनाश माने जाँय । एवं ये दोनों बातें भी ठीक नहीं है कि (१) विनाश बिना कारण के हो उत्पन्न होता है एवं (२) बीज ही बीज का कारण है । ( ‘बीज ही बीज का कारण नहीं है इस में यह अनुमान भी प्रमाण है कि ) बीज अङ्कुरजनक बीज का कारण नहीं है क्योंकि मञ्च पर रखे हुये बीज की तरह वह भी बीज है। आप (बौद्धों ) का यह कहना भी ठीक नहीं है कि ( प्र० ) ‘वस्तुओं के अनेक भाग नहीं हैं अतः एक ही वस्तु में कारकत्व और अकारकत्व इन दोनों विरुद्ध धर्मों का समावेश नहीं हो सकता है’ ( उ० ) क्योंकि एक हो अग्नि में दाह का कारकत्व भी है एवं स्नान का अकारकत्व

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

न्यायकन्दली

१८७

न च ताभ्यामस्य स्वरूपभेदः, तथैकस्यैव भावस्य सहकारिभावात्कारकत्वमकार कत्वश्व तदभावात् कथमन्यस्य सन्निधावन्यस्य कारकत्वं कारकत्वेऽपि कथं कस्यचिदेव न सर्वस्येति चेत् ? अत्र वस्तुस्वभावाः पर्य्यनुयोक्तव्याः । वयन्तु यत्र येषामन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यमवगच्छामः, तत्र तेषामेव सामग्रीभाव मभ्युपगच्छन्तो नोपालम्भमर्हामः । त्वत्पक्षेऽपि क्षित्युदकबीजानामेवाङ्कुरो त्पत्तौ सहकारिता नापरेषाम् ( अत्र) तवापि वस्तुस्वभावादपरः को हेतुः ? प्रत्येकमेव बीजादयः समर्था न परस्परसहकारिण इति चेत् ? किमर्थं तहि कृषीबल: परिकर्षितायां भूमौ बीजमावपति उदकश्ञ्चासिञ्चति ? परस्परा धिपत्येन तेभ्य: प्रत्येकमङ्कुरजननयोग्यक्षणजननायेति चेत् ? यद्यङ्कुरजनन योग्यक्षणोपजननाय बीजं स्वहेतुभ्य: समर्थमुपजातं किमवनिस लिलाभ्याम् ? अथासमर्थम् ? तथापि तयोरकिञ्चित्करः सन्निधिः स्वभावस्यापरित्यागात् । क्षित्युदकाभ्यां बीजस्य स्वसन्तानवत्तिन्य समर्थक्षणान्तरारम्भणशक्तिनिरुद्धयते

भी है। इस कारकत्व या अकारकत्व से वह्नि में कोई अन्तर नहीं आता है। इसी प्रकार एक भाव ( बीजादि ) में सहकारियों के सहयोग से कारकत्व और असहयोग से अकारकत्व दोनों ही रह सकते हैं ( इसके लिए उन के स्वरूप में कोई अन्तर मानने की आवश्यकता नहीं है ) ( प्र० ) अन्य वस्तुओं के सानिध्य से अन्य वस्तु में कारकत्व ही क्यों आता है ? और कुछ विशेष वस्तुओं में ही वह क्यों सीमित रहता है ? सभी वस्तुओं में नहीं । ( उ० ) यह अभियोग तो वस्तुओं के स्वरूप के ऊपर लाना उचित है, हम लोगों के ऊपर नहीं। पृथिवी, जल और बीज ये तीन ही अङकुर के उत्पादन में परस्पर सहकारी हैं इस अपने पक्ष में आप ही स्वभाव को छोड़ कर और क्या उत्तर देंगे । (प्र०) बीजादि प्रत्येक ही स्वतन्त्र रूप से ) अङ्कुर के उत्पादन में समर्थ है, वे तो परस्पर सहकारी नहीं हैं । ( उ० ) तो फिर जोते हुए खेत में बीजों को बो कर उसे पानी से सींचते क्यों हैं ? ( प्र० ) उन सभी कारणों से परस्पर के आधिपत्य के द्वारा अङ्कुरोत्पत्ति की योग्यता रखने वाले क्षण की उत्पत्ति के योग्य क्षण की उत्पत्ति के लिए ही जल सिवनादि की आवश्यकता होती है । ( उ०) यदि बीज में अपने कारणों से ही अङ्कुर के उत्पादन योग्य क्षण को उत्पन्न का सामर्थ्य उत्पन्न होता है तो फिर खेत और जल वहाँ क्या करते हैं ? अगर बीज उस में असमर्थ है तो असामर्थ्य रूप अपने स्वभाव को छोड़ नहीं सकता है । ( प्र० ) प्रत्येक क्षण में रहनेवाले बीज अनेक हैं, सुतरामू क्षण भी अनेक हैं, उन क्षणों के समूह में से जो क्षण अङ्कुर के उत्पादन में असमर्थ है उन में अङ्कुर की उत्पादिका शक्ति को जल और पृथिवी रोकते हैं । ( उ० ) मान लिया कि पृथिवी और जल से असमर्थ क्षण की

१८८

न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्

न्यायकन्दली

[ द्रव्ये सृष्टिसंहार

इति चेत् ? अस्तु तस्मादसमर्थक्षणानुत्पत्तिः, समर्थक्षणोत्पत्तिस्तु दुर्लभा, कारणाभावात् । न च स्वभावभूतायाश्शक्तेरस्ति निरोधो भावस्यापि निरोध प्रसङ्गात् । सहेतुकश्च विनाशः प्राप्नोति, विशिष्टक्षणोत्पादनशक्त्याधानश्व बीजस्याशक्यं, क्षणिकत्वात् । स्वभावाव्यतिरिक्तशक्त्युत्पादने चोत्पन्नोत्पादन प्रसङ्गात् । तस्मादसमर्थस्योत्पादवतो न काचित् क्रिया, समर्थस्योत्पादानन्तरमेव करणमिति द्वयी गतिः । न त्वर्थान्तरसाहित्ये सति करणम्, तस्यानुपयोगात् । अथ मतम् एकस्मात्कार्य्यानुत्पत्ते बहुभ्यश्च तदुत्पत्तिदर्शनात् सहितानामेव सामर्थ्यमिति ? किमित्येवं वदद्भ्योऽस्मभ्यं भ्राम्यति भवान् ? तदेवमक्षणिकस्यायंक्रियोपपत्तेर नैकान्तिको हेतुः ।

यदप्युक्तं कृतकानामवश्यम्भावी विनाशः, तेनापि शक्यं क्षणिकत्व मनुमातुम् तथाहि यद्येषां ध्रुवभावि तत्र तेषां कारणान्तरापेक्षा नास्ति, यथा

उत्पत्ति रोकी जाती है। फिर भी समर्थक्षण की उत्पत्ति असम्भव ही है, क्योंकि उसका कोई कारण नहीं है। एवं स्वभाव रूप शक्ति का कभी नाश नहीं होगा, क्योंकि इससे भाव का अर्थात् वस्तु का भी नाश हो जायगा | अतः विनाश का भी कारण अवश्य है। यह कहना भी ठीक नहीं है कि ( प्र० ) सहकारियों में बीजादि में समर्थ क्षण की उत्पत्ति की शक्ति लायी जाती है, ( उ० ) क्योंकि बीजादि क्षणिक हैं। स्वभाव से अभिन्न ही शक्ति का यदि उत्पादन मानें तो फिर वह उत्पन्न वस्तु का हो पुनरुत्पादन होगा । अतः आप के मत में भी ये दो ही गतियाँ सम्भव हैं कि ( १ ) जो उत्पत्तिशील होने पर भी असमर्थ हैं उनसे कभी कार्यों की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है। या फिर ( २ ) उन में जो समर्थ हैं वह उत्पन्न होने के बाद ही अपना काम करेगा। किन्तु यह तो आप के मत में ) सर्वथा असम्भव है कि सहकारियों की सहायता से मुख्यकारण भाव ) कार्य को उत्पन्न करते हैं । ( प्र० केवल एक ही वस्तु से कार्य की उत्पत्ति नहीं देखी जाती है, एवं बहुत सी वस्तुओं से कार्य की उत्पत्ति देखो जाती है, अतः समझते हैं कि सहकारियों सहित मुख्यकारण में ही कार्य को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है । ( उ० ) तो फिर यही कहते हुए भी आपने हम लोगों को चक्कर में क्यों डाल रक्खा है ? तस्मात् अक्षणिकत्व की सिद्धि में बाधा डालनेवाली अर्थक्रिया की उपपत्ति रूप हेतु ही व्यभिचारी है ।

( प्र० ) बनाई हुई वस्तुओं का विनाश अवश्यम्भावी है। इस अवश्यम्भावी विनाश से भी वस्तुओं के क्षणिकत्व का अनुमान होता है। अभिप्राय यह है कि जो जिसका ‘ध्रुवभावी’ ( अवश्यम्भावी ) धर्म है वह किसी की अपेक्षा नहीं रखता है,

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

१८९

न्यायकन्दली

शरकृपाणादीनां लोहमयत्वे, ध्रुवभावी च कृतकानां विनाश इत्यनुमानं विना शस्य हेत्वन्तरायततां प्रतिक्षिपति । ये हेत्वन्तरसापेक्षा न ते ध्रुवभाविनः, यथा वाससि रागादयः तथा यदि भावा अपि स्वहेतुभ्यो विनाशं प्रति हेत्वन्तर मपेक्षन्ते तदा हेत्वन्तरस्य प्रतिबन्धवैकल्ययोरपि सम्भवे कश्चित्कृतकोऽपि न विनश्येत् ? स्वहेतुतश्च विनश्वरस्वभावा जायमाना उत्पत्थनन्तरमेव विनश्य न्तीति सिद्धं क्षणिकत्वम् ।

अपि च भावस्याविनश्वरस्वभावत्वे विनाशोऽशक्यकरणो वह्नरिव शीतिमा, विनश्वरस्वभावत्वे वा नार्थी हेतुभिः, न च भावादभिन्नस्य विनाशस्य हेत्वन्तरजन्यता, कारणभेदस्य भेदहेतुत्वात् ! भिन्नस्य हेत्वन्तरादुत्पादे च भावस्योपलब्ध्यादिप्रसङ्गः, अन्योत्पादादन्यस्वरूपप्रच्युतेर भावात् । घटो नष्ट इति च भावकत्तू को व्यपदेशो न स्यात्, किन्त्वभावो जात इति व्यपदिश्येत, तथा च सति घटः किमभूदिति वार्ताप्रश्ने तस्य निवृत्तौ प्रस्तुता

जैसे कि शर, कृपाण आदि वस्तुओं का लोहमवत्व बनाई हुई वस्तुओं का विनाश ‘ध्रुवभावी’ है । यह ( ध्रुवभावित्व ) अनुमान खण्डन करता है कि ‘वस्तुओं का विनाश किन्हीं स्वतन्त्र दूसरे हेतुओं से होता है क्योंकि जो किसी दूसरे हेतुओं से उत्पन्न होते हैं वे ‘ध्रुवभावी’ नहीं हैं। जैसे की कपड़े का रङ्ग | अगर भाव भी अपने विनाश के लिए अपने उत्पादन के हेतुओं से भिन्न दूसरे हेतुओं की अपेक्षा रक्खे, तो फिर उन कारणों में किसी प्रतिबन्ध के आ जाने से या विघटन हो जाने से कभी कभी बनाई हुई वस्तुओं में से किसी किसी का विनाश असम्भव हो जायगा । अतः अपने हेतुओं से विनाश स्वभाव की ही वस्तुओं की उत्पत्ति होती है और उत्पत्ति बाद ही वे विनष्ट हो जाती है। इस प्रकार ( ध्रुवभावित्व के द्वारा ) सभी • वस्तुओं में क्षणिकत्व सिद्ध है।

और भी बात है। वस्तुएँ अगर अविनश्वर स्वभाव की ही उत्पन्न हों तो फिर वह्नि की शीतता की तरह उनका विनाश करना ही शक्ति के बाहर होगा । अगर ( कारणों से ) विनाशस्वभाव की ही वस्तुओं की उत्पत्ति होती है तो फिर विनाश के लिए दूसरे हेतुओं का क्या प्रयोजन ? एवं वस्तुओं से अभिन्न विनाश का कोई और कारण हो भी नहीं सकता है, क्योंकि कारणों की विभिन्नता ही वस्तुओं की विभिन्नता का कारण है। विभिन्न हेतुओं से भावों से भिन्न हो विनाशों की उत्पत्ति मानें तो फिर उन के स्वतन्त्र रूप से उपलब्धि प्रभृति आपत्तियाँ सामने आयेंगी। एवं एक वस्तु की उत्पत्ति से दूसरी वस्तु के स्वरूप का विघटन भी असम्भव है । अतः विनाश की प्रतीति ‘घड़ा फूट गया। इस प्रकार से भाव मूलक नहीं होगी किन्तु ‘अभाव उत्पन्न हुआ है, इसी प्रकार का व्यवहार होगा। तब फिर यदि कोई पूछे कि घट का क्या हुआ ? तो फिर ‘अभाव उत्पन्न हुआ। इस प्रकार का उत्तर देना होगा जो असम्बद्ध ही होगा ।

१९०

न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम्

न्यायकन्दली

[ द्रव्ये आकाश

यामप्रस्तुतमेव कथं स्यात् ? तस्माद् भावस्वभाव एव विनाश इति। अत्रो च्यते उत्पन्नो भावः किमेकक्षणावस्थायी ? किं वा क्षणान्तरेऽव्यवतिष्ठते ? क्षणान्तरावस्थितिपक्षे तावत्क्षणिकत्वव्याहतिः, अनेककालावस्थानात्, एकक्षणा वस्थायित्वे तु क्षणान्तरे स्थित्यभाव इति न भावाभावयोरेकत्वम्, कालभेदात् । अथ मतं न बूमो भावः स्वस्यैवाभावः, किन्तु द्वितीयक्षण: पूर्वक्षणस्याभाव इति, तदप्यसारम् पूर्वापरक्षणयोर्व्यक्तिभेदेऽपि स्वरूपविरोधस्याभावात् । भिन्नसन्ततिवत्तिना घटान्तरेण सह तिष्ठति, एवमेकसन्ततिर्वात्तनाऽपि सह तिष्ठेत्, यथा घटो द्वितीयक्षणग्राहिप्रमाणान्तरस्य तत्स्वरूपविधेश्चरितार्थस्य प्रथमक्षणे निषेधे प्रमाण त्वाभावात् । अभावस्तु भावप्रतिषेधात्मैव, घटो नास्तीति प्रतीत्युदयात् । तत स्तस्योत्पत्तिर्भावस्य निवृत्तिः, तस्यावस्थानं भावस्यानवस्थितिः, तस्योपलम्भो भावस्यानुपलम्भ इति युक्तम्, परस्परविरोधात् । एवञ्च सति न भावस्य क्षणिकत्वं पश्चाद् भाविनस्तदभावस्य हेत्वन्तरसापेक्षस्य भावानन्तर्य्यनियमाभा वात्, तथा च दृश्यते घटस्योत्पन्नस्य चिरेणैव विनाशो मुद्गराभिघातात् ।

अतः भाव एवं अभाव दोनों अभिन्न ही हैं । ( उ० ) इस पर यह पूछना है कि उत्पन्न भाव एक ही क्षण तक रहता है ? या अनेक क्षणों तक भी ? यदि अनेक क्षणों तक उसकी सत्ता मानें तो फिर अनेक क्षणों में रहने के कारण उनका क्षणिकत्व ही व्याहत हो जायगा। यदि एक ही क्षण तक वस्तु की सत्ता मानें तो फिर आगे के क्षण में उत्पन्न होनेवाले विनाश काल में तो उस की सत्ता ही नहीं है फिर भाव और विनाश दोनों एक कैसे हैं ? ( प्र० ) हम यह तो कहते नहीं कि भाव अपने ही अभाव से अभिन्न है किन्तु ( हमारा यह कहना है कि ) द्वितीयक्षण पूर्वक्षण का ही अभाव है। ( उ० ) यह कथन भी असङ्गत हो है क्योंकि पूवंक्षण रूप व्यक्ति और उत्तरक्षण रूप व्यक्ति भिन्न ही हैं, और उन में कोई विरोध नहीं है। जैसे एक घट दूसरे घट के साथ विद्यमान रहता है वैसे ही क्षण समूहरूप एक समुदाय के भी दूसरे व्यक्तियों के साथ रहने में कोई बाधा नहीं है। द्वितीय क्षण का ज्ञापक प्रमाण उसी में चरितार्थ हो जायगा । अतः प्रथमक्षण के निषेध में वह लागू नहीं होगा। भाव का प्रतिषेध ही अभाव है, क्योंकि ‘घट नहीं है’ इस प्रकार से अभाव की प्रतीति होती है । अतः अभाव की उत्पत्ति ही भाव की निवृत्ति है और अभाव का रहना ही भाव का न रहना है एवं अभाव की उपलब्धि हो भाव की अनुपलब्धि है, क्योंकि भाव और अभाव दोनों परस्पर विरोधी हैं। अतएव भाव क्षणिक भी नहीं हैं, क्योंकि भावों के बाद दूसरे हेतुओं से उत्पन्न होनेवाले अभावों का यह नियम नहीं हो सकता कि भाव की उत्पत्ति के अव्यवहित क्षण में ही उत्पन्न हों। यह देखा भी जाता है कि घटादि

प्रकरणम् ]

भाषानुवाद सहितम्

१९१

न्यायकन्दली

भावात्मको घटविनाशो मुद्गराभिघातात् तु कपालसन्तानोत्पादः स्यादित्य सङ्गतम् । सन्तानप्रतिबद्धायाः सदृशारम्भणशक्तेरप्रतिघाते विलक्षणसन्तानो. त्पत्त्यसम्भवात् । मुद्गराघातेन तस्याः प्रतिहतौ भावप्रतिघाते च कः प्रद्वेषः ? न च कारणकार्य्यत्वे भाववदभावस्यापि वस्तुत्वप्रसक्तिस्तस्य वस्तुप्रतिषेधस्वभावस्य प्रत्यक्षादिसिद्धत्वात् । ईदृशश्वास्य स्वरूपं यदयं कृतकोऽपि भाववन्न विनश्यति नष्टस्यानुपलम्भात् । प्रमाणाधिगतस्य वस्तुस्व भावस्य परसाधर्म्येण निराकरणत्वे जगद्वैचित्र्यस्यापि निराकरणम् । अन्योत्पादे कथमन्यस्य स्वरूपप्रच्युतिरित्यपर्य्यनुयोज्यम्, वस्तुस्वाभाव्याद् । घटो विनष्ट इति च व्यपदेशस्तदवयव क्रियादित्यायेना भावोत्पत्त्यैव । अत एवायं तस्यैवाभावो न सर्वस्य । न चास्य समवायिकारणं किञ्चित् तदभावान्नासमवाय कारणम् । क्व कार्य्यमनाधारं दृष्टम् ? इदमेव दृश्यते तावत्, न ह्ययं घटे समवेति, ?

उत्पन्न होने के बहुत दिनों बाद मुद्गरादि के प्रहार से नष्ट होते हैं । ( प्र० ) मुद्गर के प्रहार से उत्पन्न होनेवाला घट का विनाश भावरूप ही है, क्योंकि कपाल समूह का उत्पादन ही घट विनाश का उत्पादन है ? ( उ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ‘सन्तान अपने सदृश ही दूसरे सन्तान को जन्म देता है” आप का यह नियम जब तक अक्षुण्ण है तब तक उससे विसदृश वस्तु की उत्पत्ति नहीं हो सकती है । यदि मुद्गर प्रहार से उस की सादृशारम्भकत्व-शक्ति का विनाश हो इष्ट है तो फिर मुद्गरादि प्रहार से घटादि का नाश मानने में ही क्यों द्वेष है ? ( प्र० ) भावों की तरह अभाव भो स्वतन्त्र कारण जन्य हों तो उन में भी वस्तुत्व ( भावत्व ) मानना अनिवार्य होगा । ( उ०) नहीं, क्योंकि वे वस्तुओं के प्रतिषेध रूप से ही प्रत्यक्ष के विषय हैं। यही उन का स्वरूप है कि भावों की तरह कृतिजन्य होते हुए भी वे भावों की तरह नष्ट नहीं होते हैं, क्योंकि विनष्ट वस्तु की फिर से उपलब्धि नहीं होती है । प्रमाण से सिद्ध वस्तुओं का स्वभाव अगर किसी के सादृश्यमात्र से हट जाय तो फिर जगत् की विचित्रता ही लुप्त हो जायगी। ( प्र० ) एक ( अभाव ) की उत्पत्ति से दूसरे ( अभाव ) की स्वरूपप्रच्युति क्यों होती है। ( उ० ) यह अभियोग लाने योग्य नहीं है, क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव ही इस प्रकार का है। घट के अवयवों में किया, तब विभाग इत्यादि द्रव्यनाश की सामान्य रीति से घटाभाव की उत्पत्ति होने पर ही “घट नष्ट हो गया” यह व्यवहार होता है, अतः यह अभाव घट का ही है पट का नहीं । अभाव का कोई समवायिकारण नहीं है अतएव असमवायिकारण भी नहीं है । ( प्र० ) कार्य को विना आधार के कहाँ देखा है ? ( उ० ) यहीं, इस अभाव रूप कार्य को ही देखते हैं। क्योंकि समवाय सम्बन्ध से घट इसका आधार नहीं है, क्योंकि

१९२

न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपाद भाष्यम्

[ द्रव्ये आकाश

न्यायकन्दली

तस्याभावात्, नापि भूतले, अन्यधर्म्मत्वात् । कथं तर्हि नियतदेश: प्रतीयते ? प्रतियोगिनियमात् । अयमस्य स्वभावो यत् संयुक्त प्रतिषेधे संयुक्तवत् प्रति भाति, समवेतप्रतिषेधे समवेतवत् प्रतिभाति । विशेषणमपीत्थमेव, न पुनरस्य संयोगसमवायौ, तयोर्भावधर्म्मत्वात् । तदेवं सिद्धोऽभावो भावविरोधी नास्ति बुद्धिवेद्योऽर्थः, यत्कृतो दहनतुहिनयोरपि विरोधः । दहनाभावस्तुहिने तुहिना भावश्च दहने इत्यनयोविरोधो न स्वरूपेण विधेवध्यन्तरविरोधाभावात् । यच्च ध्रुवभावित्वादभावस्य हेत्वन्तरानपेक्षेत्युक्तम्, तदपि सवितुरुदयास्त मयाभ्यामनैकान्तिकम्, तयोरनपेक्षत्वे हि कालभेदो न स्यात् । एकसामग्रोप्रति बन्धेऽपि स एव दोषः । नियतो हि वाससि रागहेतुनियतकालश्च तस्य तत्काला सन्निधिमण रागानुत्पाद: सिद्धयति अनन्तास्तु विनाशहेतवो नियतकालाच

वह उसका अभाव ही है। भूतल भी उसका आधार नहीं है क्योंकि वह दूसरे का धर्म है। इसका यह भी स्वभाव है कि वह जहाँ किसी वस्तु में संयोग सम्बन्ध से किसी भाव के प्रतिषेध का स्वरूप होता है वहाँ उस संयुक्त भाव की तरह प्रतीत होता है एवं जहाँ किसी वस्तु में समवाय सम्बन्ध से किसी वस्तु के प्रतिषेध-स्वरूप होता है वहाँ उस समवेत वस्तु की तरह प्रतीत होता है । प्रतियोगियों में रहने वाले संयोगादि के अनुसार ही वह विशेषण भी होता है। अभाव में स्वतः संयोग या समवाय नहीं है, क्योंकि ये दोनों हीं भाव के धर्म हैं । अतः अभाव नाम का एक स्वतन्त्र पदार्थ है और वह भाव पदार्थों का विरोधी है जो ‘नास्ति’ प्रभृति शब्दों से प्रतीत होता है। जिससे कि वह्नि और पाला में विरोध है क्योंकि बह्नि में पाले का अभाव है और पाले में वह्नि का अभाव है। यही उन दोनों में विरोध है स्वतन्त्र रूप से सिद्ध एक भाव का स्वतन्त्र रूप से सिद्ध दूसरे भाव के साथ विरोध का कोई दूसरा प्रकार नहीं है। यह जो आप ने कहा कि (प्र०) अभाव यतः ‘ध्रुवभावी’ है, अतः उसे भाव के कारणों से अतिरिक्त किसी कारण की अपेक्षा नहीं है’ ( उ० ) आपका यह ‘ध्रुव भावित्व’ हेतु भो सूर्य के उदय और अस्त में नहीं देखा जाता है। वे दोनों अगर विभिन्न हेतुओं की अपेक्षा न रक्खें तो फिर वे दोनों विभिन्नकालिक भी न होंगे उदय और अस्त दोनों को आपत्ति एक ही क्षण में होगी । अगर एक की उत्पादक सामग्री से दूसरे का प्रतिरोध मानें तो फिर वही (ध्रुवभावित्वानुपपत्ति की) आपत्ति होगी । वस्त्र के रङ्ग के काल और हेतु दोनों ही नियत हैं, अतः उस नियत काल का भी सांनिध्य न रहने के कारण वस्त्र में राग के अनुत्पाद की सिद्धि होती है, किन्तु भावों के विनाश के काल नियत होने पर भी उसके हेतु अनन्त हैं। अतः सर्वदा सभी

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

न्यायकन्दली

१९३

तेषां सर्वदा सर्वेषां प्रतिबन्धस्पाशक्यत्वात् कश्चिदेको निपतत्येव । कालान्तरे च निपतितः क्षणेनैव भावं विनाशयतीत्युपपद्यते कृतकत्वेऽपि ध्रुवो विनाशः । सर्वञ्चैतत्क्षणभङ्गसाधनं कालात्ययापदिष्टम्, प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षेण प्रतीतस्य पुनः प्रतीतेः । नन्वेष प्रत्ययो न भावस्य पूर्व्वापरकालावस्थानं शक्नोति प्रतिपादयितुम्, न ह्येतदेकं विज्ञानम्, कारणाभावात् । इन्द्रियं सन्निहितविषयं न पूर्वकालत्वमव गाहते, संस्कारोऽपि पूर्वानुभवजन्मा तद्विषये नियतो नापरकालतां परिस्पृशति, न च ताभ्यामन्यदुभयविषयं किश्चिदेकमस्ति यदेतद् विज्ञानं प्रसुवीत । इतोऽपि नैतदेकं विज्ञानं स्वभावभेदात् इदमिति हि प्रत्यक्षता तदिति हि परोक्षत्वम्, प्रत्यक्षतापरोक्षत्वे च परस्परविरोधिनी नैके युज्येते, तस्माद् ग्रहणस्मरणात्मके द्वे इमे संवित्ती भिन्नविषये । ब्रूमः -प्रतीयते तावदेतस्माद् विज्ञानात् पूर्वापर

का प्रतिरोध असमान है। अतः नियमित कालों में से किसी क्षण में कोई अप्रतिरुद्ध कारण रह ही जायगा, यही कारण उसी क्षण में भाव का विनाश कर देगा। इस प्रकार कृतिजन्य होने पर भी विनाश के ध्रुवभावित्व में कोई बाधा नहीं है।

क्षणभङ्ग ( भाव एक क्षण में उत्पन्न होते हैं और उसके बाद के अगले ही क्षण में नष्ट हो जाते हैं इस सिद्धान्त ) के साधक उक्त सभी हेतु कालात्ययापदिष्ट’ अर्थात् बाध रूप हेत्वाभास से दूषित हैं। क्योंकि जिस घट को कल देखा था उसी को में आज देखता हूँ इस प्रत्यभिज्ञा से ज्ञात वस्तु ही फिर से ज्ञात होती है । ( १० ) यह प्रत्यभिज्ञा नाम का प्रतीति अपने विषय घट में पूर्वकालवतित्व और उत्तरकालवतित्व इन दोनों को हीं समझा सकती है, क्योंकि कारण की अनुपपत्ति से यह एक विज्ञान ही सिद्ध नहीं होती है। इन्द्रियाँ अपने सनिहित विषयों को ही ग्रहण करती हैं उनके पूर्व कालिकत्यादि को नहीं । संस्कार भी चूंकि पूर्वानुभवजनित है अतः पहिले अनुभूत विषयों की ही स्मृति को उत्पन्न कर सकता है, उत्तरकालिकत्व विषयक स्मृति को नहीं । पूर्वकालिकत्व और उत्तरकालिकत्व इन दोनों को छोड़ कर कोई दूसरा उभय यहाँ नहीं है जिनसे युक्त घट विषयक ज्ञान को वह जन्म दे । प्रत्यभिज्ञा नाम का कोई एक विज्ञान नहीं है। इसमें यह हेतु भी है कि ‘उसको’ यह प्रत्यक्षत्व का द्योतक है ‘जिसको’ यह परोक्षत्व का द्योतक है। परीक्षत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं। परस्पर विरुद्ध दो वस्तुएँ एक काल में एक ही वस्तु में सम्बद्ध नहीं सकती हैं। अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः दो ज्ञानों का एक समूह है, जिसमें ‘जिस घट को’ यह अंश स्मृति रूप है एवं ‘उसी को मैं देखता हूँ यह अंश अनुभव रूप है किन्तु दोनों ही भिन्न विषय के हैं। ( उ० ) इस आक्षेप के समाधान में मैं कहता हूँ कि इस प्रत्यभिज्ञा से पूर्वकाल और उत्तर काल दोनों से सम्बद्ध एक ही वस्तुत्त्व की प्रतीति

१९४

न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्त पादभाष्यम्

न्यायकन्दली

[ द्रव्ये आत्म

कालावच्छिन्नमेकं वस्तुतत्त्वम्, तदप्यस्य विषयो न भवतीति संविविरुद्धम् । ग्रहणस्मरणे च नैक विषयमालम्बेते, तस्मादेकमेवेदं विज्ञानमिति प्रतीतिसामर्थ्या दुभयविषयमास्थेयम् । प्रतीयमान कार्योत्पत्तये चाप्रतीयमानमपि कारणं कल्पयन्ति विद्वांसो, न तु कारणाप्रतीत्या विशदमपि कार्थ्यमपह्न वते, जगद् वैचित्र्यस्याप्यपह्नवप्रसङ्गात् । तथापि संहताभ्यामिदमेकं तेन यद्यपि प्रत्येक मिन्द्रियसंस्कारावसमथौ कार्य प्रत्यभिज्ञास्वभावं प्रभावयिष्यते, भविष्यति चैतदुभयकारणसामर्थ्यादुर्भार्याविषयम् प्राप्स्यति च प्रत्यक्षतां विष येन्द्रियसामर्थ्यानुविधानात् । न च यत्रैकैकमसमर्थ तत्र मिलितानामपि तेषा मसामर्थ्यम् ? प्रत्येकमकुर्वतामपि क्षित्युदकन्बी जानामन्योन्य सन्निधिभाजामकु रादिजननोपलब्धेः । यत्र विलक्षणा सामग्री तत्र कार्य्यमपि विलक्षणमेव स्या दिति सुप्रतीतम् तेनास्य सन्निहितासन्निहितविषयतालक्षणे प्रत्यक्षतापरोक्षते न विरोत्स्येते । अत एव चेन्द्रियसन्निकर्षाभावेऽपि पूर्वकालप्रत्यक्षतैव, इन्द्रिय

होती है। यह अनुभव से बाहर की बात है कि ‘वह एक वस्तु प्रत्यभिज्ञा का विषय नहीं है यहाँ स्मृति और अनुभव दोनों एक विषयक नहीं हैं। अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा नाम की प्रतीति से यह कल्पना करनी पड़ेगी कि एक ही विज्ञान उभय विषयक है। विद्वान् लोग दृष्ट कार्य से अष्ट कारण की कल्पना करते हैं। कारण की अप्रतीति से अनुभूत कार्य का ही अपलाप नहीं करते। ऐसा करने पर संसार की विचित्रता ही लुप्त हो जायगी । ( अतः यह कल्पना करनी पड़ेगी कि ) यद्यपि संस्कार और इन्द्रिय इन दोनों में से प्रत्येक प्रत्यभिज्ञा रूप कार्य के उत्पादन में असमर्थ हैं तथापि मिलकर वे ही दोनों उक्त प्रत्यभिज्ञा रूप कार्य का सम्पादन कर सकते हैं। उक्त दोनों कारणों के प्रभाव से यह प्रत्यभिज्ञा पूर्वकाल और उत्तर काल दोनों विषयक होंगी। एवं इन्द्रियजन्य होने से प्रत्यक्ष भी कहलाएगी। यह कोई बात नहीं है कि जो स्वयं अकेला जिस कार्य को न कर सके, वह दूसरे के साथ मिलकर भी उस कार्य को न कर सके। क्योंकि पृथिवी जल और बीच इनमें से प्रत्येक अङ्कुर के उत्पादन में असमर्थ होने पर भी तीनों मिलकर अङ्कुर का उत्पादन करते ही हैं। रही यह बात कि एक ही प्रत्यभिज्ञा में इन्द्रियों से जन्य होने के कारण प्राप्त संनिहित विषयवाला ‘प्रत्यक्षत्व’ एवं संस्कार से उत्पन्न होने के कारण प्राप्त असंनिहित विषयवाला परो क्षत्व’ परस्पर विरुद्ध इन दोनों धर्मों का समावेश कैसे होगा ? किन्तु यह अनुभव की बात है कि सामग्री की विलक्षणता से कार्य की विलक्षणता होती है। फलतः ये दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध ही नहीं हैं। अत एव इन्द्रियसंविष के न रहने पर भी ‘पूर्वकाल’ में भी प्रत्यक्षविषयत्व है क्योंकि तह इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय है। इन्द्रियजन्य ज्ञान

प्रकरणम् ।

भाषानुवादसहितम्

१९५

न्यायकन्दली

जज्ञानविषयत्वात् तन्मात्रानुवन्धित्याच्च प्रत्यक्षतायाः । असन्निहितमपि परिच्छि ददिन्द्रियं पूर्वकालतामेव परिच्छिनति न भविष्यत्कालताम्, तत्र संस्कारस्य सहकारिणोऽभावात् । न चेकस्योभयकालतायां काजिदनुपपत्तिः येनास्योभय कालतां सङ्कलयतः कल्पनात्वम्, दृष्टो ह्येकस्यानेकेन विशेषणेन सम्बन्धो यथा चैत्रस्य छत्रपुस्तकाभ्याम् | युगपच्छत्रपुस्तकसम्बन्धे क्रमेण कालद्वय सम्बन्धं च न कश्चिद् विशेषः, एकस्योभयविशेषणावच्छेदप्रतीतेरुभयत्राविशे षात् । तदेवं देशकालावस्थाभेदानुगतमेकं वस्तुतत्वमध्यवसन्ती प्रत्यभिज्ञा भावानां प्रतिक्षणमुत्पादविनाशौ तिरयतीति । भ्रान्तेयं प्रतीतिरिति चेन्न, बाधका भावात् । क्षणभङ्गसाधनमेतस्या बाधकमिति चेत् ? प्रत्यक्षबाधे सत्यबाधित विषयत्वादनुमानोदयः, उदिते च तस्मिन् प्रत्यक्षबाध इत्यन्योन्याश्रयत्वम् । प्रत्यक्षे

विषयत्व ही ( विषयनिष्ठ ) प्रत्यक्षत्व है । ( इन्द्रिय सकि उसका प्रयोजक नहीं है ) । असंनिहित विषयों में से इन्द्रियाँ पूर्वकालिक विषयों को ही ग्रहण करती हैं भविष्यत्कालिक विषयों को नहीं, क्योंकि (असंनिहितविषयक प्रत्यक्ष का ) संस्कार रूप सहकारी नहीं रहता है’। ( अतः ) वर्त्तमान और अतीत काल विषयक एक ज्ञान में कोई विरोध नहीं है, जिससे कि दोनों कालविषयक प्रत्यभिज्ञा रूप ज्ञान में भ्रमत्व को कल्पना की जाय। एक ही वस्तु में अनेक विशेषणों का सम्बन्ध हो सकता है, जैसे कि छाता और पुस्तक दोनों के साथ एक ही चैत्र का सम्बन्ध देखा भी जाता है। चैत्र में इन दोनों के और एककालिक सम्बन्ध और विभिन्नकालिक सम्बन्ध में कोई अन्तर नहीं है। क्योंकि एक ही विशेष्य में दोनों विशेषणों से वैशिष्ट्य की प्रतीति दोनों ( चैत्र और प्रत्यभिज्ञा स्थान में समान ही है। तस्मात् उक्त रीति से विभिन्न देश विभिन्न काल और विभिन्न अवस्था इन तीनों में एक ही वस्तुतत्त्व को समझाने वाली उक्त प्रत्यभिज्ञा भावों की प्रतिक्षण उत्पत्ति और विनाश ( क्षणभङ्ग ) को जड़ मूल से उखाड़ फेंकती है। ( प्र ० ) उक्त प्रत्यभिशा तो भ्रान्ति है ? ( उ० ) क्यों ? कोई बाधक तो नहीं है ? ( प्र ० ) क्षणभङ्ग के साधक ही उक्त प्रत्यभिज्ञा के प्रमात्व के बाधक है। ( उ० ) इसमें यह अन्योन्याश्रय दोष है यतः उक्त प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यक्ष बाधित है अतः क्षणिकत्व का अनुमान होता है, और वह प्रत्यक्ष बाधित क्यों है ? क्योकि अनुमान के द्वारा क्षणिकत्व सिद्ध है। प्रत्यक्ष में यह बात नहीं है, क्योंकि उसे किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा नहीं है । ( ) प्रत्यक्ष प्रमाण से दीप की शिखा अनेक कालों तक रहनेवाली प्रतीत होती है, किन्तु सभी मतों से सिद्ध अनुमान के द्वारा यह निर्णीत है कि वहाँ प्रतिक्षण ज्वाला की उत्पत्ति होती है। अतः प्रत्यक्ष से बाधित

१९६

न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम्

| द्रव्ये आत्म

न्यायकन्दली

तु नायं विधिस्तस्यानपेक्षत्वात्, ज्वालादिषु सामान्यविषयं प्रत्यक्षं विशेषविषय वानुमानमित्यविरोधान्न प्रत्यक्षेणानुमानोत्पत्तिनिषेध इत्यलम् ।

योऽप्यतिप्रौढिम्ना प्रत्यक्षसिद्धं क्षणभङ्गमाह तस्यानुभवाभाव एवोत्तरम् । नीलमेतदिति प्रतिपत्तिर्न क्षणिकमेतदिति नीलत्वाव्यतिरेकिणी क्षणिकता, तस्याः पृथगर्थक्रियाया अभावात् । अतो नीलत्वे गृह्यमाणे क्षणिकत्वमपि गृह्यते, सुसदृशक्षणभेदाग्रह्णात् । तथा नाध्यवसोयत इति चेत् ? अहोऽपरः प्रज्ञाप्रकर्षो यदयमनुभवमपि व्याख्याय कथयति । यन्नाध्यवसितं तद्गृहीतमिति मृगतृष्णिकेयम्, प्रत्यक्षबलोत्पन्नादध्यवसायादन्थस्य प्रत्यक्षदृष्टत्वव्यवस्थानिबन्धनस्यानभ्युपगमात् । यस्मिन्नध्यवसोसमाने यनियमेन नाध्यवसीयते नीलपीतयोरिव तयो स्तादात्म्याभिधानमपि प्रलापः क्षणिकं प्रत्यक्षं ज्ञानं स्वसमानकालवत्तिनोमर्थस्य सत्तां परिच्छिन्दत् तत्कालासम्बद्धतां व्यवच्छिन्दत् तत्कालभावाव्यभिचारिणः कालान्तरसम्बन्धमपि व्यवच्छिन्दत् तदेकक्षणावस्थायित्वं क्षणिकत्वं गृह्णातीति

सभी अनुमान भ्रम ही नहीं होते। ( उ० ) दीपशिखा स्थल में प्रत्यक्ष केवल सामान्य विषयक होता है और अनुमान विशेष विषयक होता है, अतः विभिन्न विषयक होने के कारण वहाँ प्रत्यक्ष से अनुमान का बाध नहीं होता है ।

जो कोई अति प्रौढ़तावश क्षणभङ्ग को प्रत्यक्षप्रमाण से ही सिद्ध करना चाहते हैं उनके लिए अनुभव का अभाव ही उत्तर है। क्योंकि ‘यह नोल है’ यही प्रतीति होती है यह ‘क्षणिक है। इस प्रकार की प्रतिति नहीं होती है । ( प्र० ) नीलरव से क्षणिकत्व कोई भिन्न वस्तु नहीं है, क्योंकि क्षणिक का कोई कार्य नहीं है, अतः यदि नीलत्व गृहीत होता है तो क्षणिकत्व भी ज्ञात हो ही जाता है। ‘यह नील है’ इस बुद्धि में क्षणिकत्व के स्फुट प्रतिभास न होने का यह हेतु है कि दोनों (नील क्षण और क्षणिकत्व का प्रतिभाकक्षण ) अत्यन्त सदृश है । (उ) यह तो बड़ी विलक्षण प्रज्ञा है कि जो अनुभव की भी व्याख्या करके यह समझाती है कि ‘जो आपने नहीं समझा है वह भी उस अनुभव का विषय है अतः ( उक्त कथन से अभिप्राय सिद्धि की अभिलाषा ) मृगतृष्णा ही है। क्योंकि ‘अमुक वस्तु प्रत्यक्ष सिद्ध है इस व्यवस्था का मूल प्रत्यक्ष प्रमाण जनित निश्चय से भिन्न और किसी को नहीं माना जा सकता । जिसके निश्चित हो जाने पर जो अवश्य ही निश्चित नहीं हो जाते, जैसे की नील और पोत उन दोनों को अभिन्न कहना भी प्रलाप ही हैं । ( प्र ० ) क्षणमात्र स्थायी प्रत्यक्षा त्मक ज्ञान अपने काल में रहनेवाली वस्तु की सत्ता को समझाता हुआ एवं उस वस्तु में उस काल कं असम्बद्धता को हटाता हुआ उस काल में रहनेवाली वस्तु की सत्ता के अव्यभिचारी दूसरे काल के सम्बन्ध का भी निषेध करता हुआ उस वस्तु के एक

प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

न्यायकन्दली

१९७

चेत् ? काशकुशावलम्बनमिदम्, स्वात्मानमेव न गृह्णाति विज्ञानम्, कुतः स्वसमान कालतामर्थस्य गृह्णाति ? गृह्णातु वा, तथापि पूर्वमयं नासीत् पशाच्च न भविष्यतीत्यत्र प्रत्यक्षमजागरूकं पूर्वापरकालताग्रहणात् । वर्तमानकाल्परि च्छेदे चातत्कालव्यवच्छेदो युक्तो भावाभावयोदिरोधान्न तु कालान्तरसम्बन्ध व्यवच्छेदो मणिसूत्रव देकस्याने कसम्बन्धत्वाविरोधात् । प्रपश्चितश्चायमर्थोऽस्माभि स्तत्त्वप्रबोधे तत्त्वसंवादिन्याञ्चेति नात्र प्रतन्यते ।

किश्व सर्वभावक्षणिकत्वाभ्युपगमे कस्य संसार: ? ज्ञानसन्तानस्येति चेत् ? न सन्तानिव्यतिरिक्तस्य सन्तानस्याभावात् । अथ मतम्-नकस्यानेक शरीरादियोगः संसारः, कि तर्हि ? ज्ञानसन्तानाविच्छेदः, स च क्षणिकत्वेऽपि नानुप पन्नः । तदप्यसारम्, गर्भादिज्ञानस्य प्राग्भवीयज्ञानकृतत्वे प्रमाणाभावात्, नहि समानजातीयादेवार्थस्योत्पत्तिः, विजातीयादप्यग्नेर्धूमस्योत्पत्तिसम्भवात् । अथ

क्षणावस्थायित्व रूप क्षणिकत्व को भी ग्रहण करता है । ( उ० ) यह कहना भी युक्ति से दुर्बल है। क्योंकि जो विज्ञान अपने स्वरूप को भी ग्रहण नहीं कर सकता वह अपने विषय रूप अर्थ की समानकालीनता (क्षणिकत्व) को कैसे ग्रहण करेगा ? अगर यह मान भी लें कि उक्त प्रत्यक्ष से क्षणिकत्व की प्रतीति होती है तो भी ‘यह वस्तु पूर्वक्षण में नहीं थी, और आगे के क्षणों में भी नहीं रहेगी’ यह समझाने में उक्त प्रत्यक्ष कैसे समर्थ होगा १ क्योंकि पूर्वकाल ? (भूत) और पश्चात् काल ( भविष्यत्) इन दोनों को समझाने में प्रत्यक्ष असमर्थ है। यह ठीक है कि किसी वस्तु में वर्तमान काल के सम्बन्ध का ज्ञान होने पर उस ज्ञान से भविष्यत् काल और भूतकाल दोनों हट जाते हैं, किन्तु ज्ञान के विषय उन नीलादि वस्तुओं से अनेक कालों का सम्बन्ध क्यों हटेगा ? एक ही सूत्र के साथ अनेक मणियों का सम्बन्ध तो होता है, क्योंकि उसमें कोई विरोध नहीं है। आपने ‘तत्त्वप्रबोध’ और ‘तत्त्वसंवादिनी’ नाम के ग्रन्थों में इन्हीं विषयों की आलोचना की है, अतः इस विषय के विस्तार से यहाँ विरत होते हैं ।

अब बात है कि अगर सभी वस्तुएँ क्षणिक हों तो संसार किसको होगा ? ( प्र० ) ज्ञान समूह को ? ( उ० ) नहीं, क्योंकि सन्तान (समूह) अपने सन्ता नियों ( अर्थात् सन्तान घटक प्रत्येक व्यक्ति ) से भिन्न नहीं है । ( प्र० एक ही वस्तु ( आत्मा ) का अनेक शरीरादि के सम्बन्ध ही संसार नहीं है किन्तु ज्ञान की निरवच्छिन्न ( अविरल ) धारा रूप सन्तान हो संसार है। यह संसार तो वस्तुओं को क्षणिक मान लेने पर भी उत्पन्न हो सकता है । ( उ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि ‘गर्भादि विषयक ज्ञान पहिले के ही ज्ञान से उत्पन्न होते हैं। इसमें कोई प्रमाण नहीं है। इसका भी कुछ ठीक नहीं है कि वस्तुओं से ही समानजातीय वस्तुओं की उत्पत्ति होती हो,

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न्यायकन्दलीसवलितप्रशस्तपादभाष्यम्

[ द्रव्ये आत्म

न्यायकन्दली

मतम् — यस्यान्वयव्यतिरेकावतिशयश्व यदनुविधत्ते तत्तस्य समानजातीयमुपादान ञ्चेति स्थितिः, ज्ञानश्च बोधात्मकत्वमतिशयं बिभति तच्च वृथिव्याविभूतेषु नास्ति तस्माद्यस्यायमतिशयस्तदस्य समानजातीयमुपादानकारणमिति स्थिते गर्भज्ञानं ज्ञानान्तरपूर्वकं सिद्धयति, कारणव्यभिचारे कार्य्यस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गा दिति । तदप्यसारम् अदहनस्वभावेभ्यो दारुनिमंथनादिभ्यो वहातिश योत्पत्तिवदबोधात्मकेभ्योऽपि बोधात्मकत्वातिशयोत्पत्तिसम्भवे बोधात्मक कारणकल्पना नवकाशात्, अतो प्राक्तनजन्मसिद्धिर्भविष्यति । न जन्मान्तरमित्यपि न सिद्धघति, मरणे शरीरान्त्यज्ञानेन ज्ञानान्तरं प्रतिसन्धातव्य मित्यत्र प्रमाणाभावात् । यद्यत्राविकलकारणावस्थं तज्जनयत्येव यथाविक लजननावस्थं बीजमङ्कुरं प्रति अविकलजननावस्थं चान्त्यं ज्ञानमिति प्रमाण मस्तीति चेत् ? न, ज्वालादीनामन्त्यक्षणेन व्यभिचारात्, स्नेहवत्त क्षयादीना

क्योंकि वह्नि से विभिन्नजातीय धूम की उत्पत्ति होती है । ( प्र० ) वस्तु स्थिति यह है कि जिसका जिसमें अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही हो, एवं जिसमें जिसके असाधारण रूप की अनुवृत्ति हो वही उसका समानजातीय है और उपादान भी है। ( अतः यह सिद्ध है कि गर्भादि ज्ञान भी पहिले के अपने राजातीय ज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं ) बोधरूपता ही ज्ञान का असाधारण वर्म है, वह पृथिव्यादि भूतों में नहीं हैं। अतः जिसमें वह ( बोधरूपता है ) वही उसका समानजातीय हैं और उपादान भी है। इससे यह सिद्ध है कि गर्भज्ञान भी पहिले के गर्भज्ञान से ही उत्पन्न होता है, क्योंकि कार्य अगर कारणों के बिना भी हों तो फिर उनकी उत्पत्ति अनियमित हो जायगी । ( उ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि काष्ठों के संघर्ष का स्वभाव दाह नहीं है काष्ठ से उनके मन्थन के द्वारा दाह स्वभाव के वह्नि की उत्पत्ति होती है। वैसे ही चक्षुरादि इन्द्रियों में बोधात्मकत्व शक्ति के न रहने पर भी उन से बोध स्वरूप विलक्षण धर्मविशिष्ट ज्ञान की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं है । इसके लिए बोध स्वरूप कारण की कल्पना की आवश्यकता नहीं है। अतः इस मत में पूर्वजन्म की सिद्धि असम्भव है। आगे के जन्म की सिद्धि भी असम्भव है क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि मृत्यु हो जाने पर अन्तिम ज्ञान रूप शरीर अवश्य ही आगे के दूसरे शरीर रूप ज्ञान का अनुसन्धान करेगा। जहाँ पर जिस वस्तु की कारणावस्था में कोई विघटन नहीं हुआ रहता है वहाँ उस कारण से वस्तु की उत्पत्ति अवश्य ही होती है, जैसे कि कारणावस्था के विघटन से रहित बीज से अङ्कुर की उत्पत्ति अवश्य होती है। शरीर के उक्त अन्तिम ज्ञान की भी कारणावस्था विघटित नहीं है अतः यही प्रमाण इस पक्ष में अपर जन्म का साधक है। ( उ० ) उक्त हेतु अन्तिम क्षण

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प्रकरणम् ]

भाषानुवादसहितम्

प्रशस्तपादभाष्यम्

शरीरसमवायिनीभ्याञ्च

हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्यां

प्रवृत्तिनिवृत्तिभ्यां रथकर्म्मणा विग्रहस्याधिष्ठातानुमीयते,

सारथिवत्

प्रयत्नवान् कथम् ?

प्राणादिभिवेति ।

(३) शरीर में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली हित की प्राप्ति एवं अहित का परि हार इन दोनों की प्रयोजक क्रियाओं के द्वारा प्रयत्न से युक्त आत्मा रूप शरीर के अधिष्ठाता का अनुमान करते हैं। जैसे कि रथ की गति रूप क्रिया से सारथि का अनुमान होता है । (४) प्राणादि से भी वायु का अनुमान होता है । ( प्र० ) कैसे ?

न्यायकन्दली

मन्त्यज्वालाक्षणस्य कारणावस्थावकल्यादविकलत्वं नास्तीति चेत् ? अन्त्य ज्ञानस्यापि मरणपीडया पीडितस्याधिकलकारणावस्थात्वमसिद्धनिति सुव्याहृतं क्षणिकत्वे परलोकाभाव इत्युपरम्यते ।

आत्मसिद्धौ प्रभाषान्तरवण्याह- शरीरसमवायिनीभ्यामिति । प्रवृत्ति निवृत्तिभ्यां प्रयत्नवान् विग्रहस्थ शरीरस्याधिष्ठातानुमीयते । लतादिप्रवृत्ति व्यवच्छेदाय शरीरसमदायिनीभ्यामित्युक्तम् । स्रोत: पतितमृतशरीरप्रवृत्तिनि वृत्ति व्यवच्छेदार्थ च हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्यामिति । हितं सुखमहितं दुःखम्, तयोः प्राप्तिपरिहारौ हितस्य प्राप्तिरहितस्य परिहारः, तत्र योग्याभ्यां समर्थाभ्यामिति बुद्धिपूर्वकचेष्टापरिग्रहः । रथकर्मणा सारथिवदिति दृष्टान्त

की ज्वाला में व्यभिचरित है। (प्र०) अन्तिम क्षण में तेल बत्ती प्रभृति कारणता के अवैकल्य के सम्पादक नष्ट हो जाते हैं अतः उस क्षण की दीपशिखा की कारणावस्था विघटित हो जाता है । ( उ० ) तो फिर मरण की पीड़ा से दुःखी अन्तिम शरीर रूप विज्ञान की भी कारणावस्था अविघटित नहीं है। अतः हमने ठीक ही कहा है कि वस्तु मात्र को क्षणिक मानने के पक्ष में परलोक की सिद्धि नहीं होगी अतः इससे विरत होता हूँ ।

‘शरीरसमा यिनीभ्याम् इत्यादि से आत्मा की सिद्धि में और भी प्रमाण देते है | प्रवृत्ति और निवृत्ति से शरीर रूप विग्रह (मूर्ति) के प्रयत्न वाले अधिष्ठाता का अनुमान करते हैं। लताओं (वृक्षादि पर चढ़ने ) की प्रवृत्ति में व्यभिचार वारण करने के लिए ‘शरीरसमवायिनीभ्या यह पद कहा है। जल के प्रवाह में गिरे हुए शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति में व्यभिचार वारण के लिए ‘हिताहित प्राप्तिपरिहारयोग्याभ्याम्’ इत्यादि से प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों में क्रमशः हितप्राप्तियोग्यत्व एवं अतिपरिहार योग्यत्व ये दोनों विशेषण दिये गये हैं। ‘हित’ शब्द का अर्थ है ‘सुख’ एवं ‘अहित’ शब्द का अर्थ है दुःख। इन दोनों का जो प्राप्तिपरिहार’ अर्थात् सुख की प्राप्ति एवं दुःख का परिहार इन दोनों में समर्थ अर्थात् क्षम | इन दोनों विशेषणों में से ज्ञानजनित चेष्टा का संग्रह

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न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्त पादभाव्यम्

[ द्रव्ये आत्म

प्रशस्तपादभाष्यम्

शरीरपरिगृहीते वायौ विकृत कर्म्मदर्शनाद् भस्त्राध्मापयितेव, निमेषोन्मेष कर्मणा नियतेन दारुयन्त्र प्रयोक्तेव, देहस्य वृद्धिक्षत भग्नसंरोहणादिनिमित्त

( उ० ) वायु की गति स्वभावतः कुटिल होती है, किन्तु उसके विपरीत प्राण वायु की गति कभी ऊर्ध्व भी देखी जाती है, अतः भाथी को चलाने वाले की तरह शरीर सम्बन्धी वायु को भी ऊपर की तरफ चलाने वाला कोई अवश्य है। उसी का नाम है ‘आत्मा’ । (५) निमेष और उन्मेष की क्रिया से भी कठपुतली को नचाने वाले की तरह आत्मा का अनुमान होता है । (६) देह की वृद्धि, घाव एवं टूटे हुए अङ्गो

न्यायकन्दली

कथनम् । साधनोपादान परिवर्जनद्वारेण हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्था चेष्टा प्रयत्नपूर्विका विशिष्ट क्रियात्वात् रथक्रियावत् । धिष्ठितं विशिष्टक्रियात्वात् रथवत् । शरीरं वा प्रयत्नवद प्राणादिभिश्चेति । प्राणादिभिश्व प्रयत्नवानविष्ठाताऽनुमीयत इत्यनुषञ्जनीयम् प्राणादिभिरित्यनेन “प्राणापान निमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियविकारः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि” इति पूत्रोक्तमस्तलिङ्गपरिग्रह कथमिति प्रश्नपूर्वक्रं प्राणापानयोलिङ्गत्वं दर्शयति– शरीरपरिगृहीत इति । वायुस्तिर्य्यग्गमनस्वभावः, शरीरपरिगृहीते वायो प्राणापानाध्ये विकृतं स्वभावविपरीत कमवंगमनमधोगमनञ्ज दृश्यते, तस्मात् प्रयत्नवान् विग्रहस्याधिष्ठातानुमीयते, यस्तथा वायु प्रेरयति, अन्य

किया गया है। ‘स्थकर्मणा सारथित’ यह वाक्य अनुमान का दृष्टान्त दिखाने के लिए है। सुखसाधनों के ग्रहण के द्वारा ही जिस चेष्टा से हित की प्राप्ति होती है, एवं दुःख साधनों के परिवर्जन के द्वारा ही जिस चेष्टा अहित का परिहार होता है, वे दोनों प्रकार की चेष्टायें प्रयत्न से उत्पन्न होती है क्योंकि ये विशेष प्रकार की क्रियायें हैं जैसे कि रथ को किया । अथवा प्रयत्न से युक्त कोई व्यक्ति ही शरीर का अधिष्ठाता है क्योंकि उसमें विशेष प्रकार की क्रिया है जैसे कि रथ में । प्राणा दिभिश्व’ अर्थात् प्राणादि से भी प्रयत्न से युक्त अविष्ठाता का अनुमान होता है ” यह अनुषद्ध कर लेना चाहिए | ‘प्राणादिभिः’ इस ‘आदि’ पदघटित हेतु वाक्य से प्राणापानादि, निमेष, उन्मेष, जीवन, मन की गति इन्द्रिय का विकार आदि “सुख दुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि (३ अ. २ आ. ४ सू.) इस सूत्र के द्वारा कथित सभी हेतु अभीष्ट हैं। ‘कथम् ?’ इस वाक्य के द्वारा प्रश्न करके “शरीरपरिगृहीत” इत्यादि वाक्य से प्राण और अपान वायु में आत्मानुमान का हेतुत्व दिखलाते हैं। टेढ़े मेढ़े चलना वायु का स्वभाव है, किन्तु शरीर की प्राण और अपान नाम को वायुओं में विकृत’ अर्थात उन स्वभाव से विपरीत क्रमशः ऊध्वंगति और अधोगति देखी जाती

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