Mahabharata Gita Press Vol I Page 301-600 Webpage 5

।। श्रीहरिः ।।

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श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत

महाभारत (प्रथम खण्ड)

MAHABHARATA

[आदिपर्व और सभापर्व]

(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवाद)

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।

एकपञ्चाशक्तोऽध्यायः

जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम

सौतिरुवाच

एवमुक्त्वा ततः श्रीमान् मन्त्रिभिश्चानुमोदितः ।

आरुरोह प्रतिज्ञां स सर्पसत्राय पार्थिवः ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! श्रीमान् राजा जनमेज्यने जब ऐसा कहा, तब उनकेमन्त्रियोंने भी उस बातका समर्थन किया। तत्पश्चात् राजा सर्पयज्ञ करनेकी प्रतिज्ञापरआरूढ़ हो गये ।। १ ।।

ब्रह्मन् भरतशार्दूलो राजा पारिक्षितस्तदा।

पुरोहितमथाहूय ऋत्विजो वसुधाधिपः ।। २ ।।

अब्रवीद् वाक्यसम्पन्नः कार्यसम्पत्करं वचः ।ब्रह्मन्! सम्पूर्ण वसुधाके स्वामी भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ परीक्षित्कुमार राजा जनमेजयनेउस समय पुरोहित तथा ऋत्विजोंको बुलाकर कार्य सिद्ध करनेवाली बात कही- I1 २||

यो मे हिंसितवांस्तातं तक्षकः स दुरात्मवान् ।। ३ ।।

प्रतिकुर्या तथा तस्य तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे ।

अपि तत् कर्म विदितं भवतां येन पन्नगम् ।। ४ ।।

तक्षकं सम्प्रदीप्तेऽग्नौ प्रक्षिपेयं सबान्धवम् ।

यथा तेन पिता मह्यं पूर्वं दग्धो विषाग्निना ।

तथाहमपि तं पापं दग्धुमिच्छामि पन्नगम् ।। ५ ।।

‘ब्राह्मणो! जिस दुरात्मा तक्षकने मेरे पिताकी हत्या की है, उससे मैं उसी प्रकारकाबदला लेना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे क्या करना चाहिये, यह आपलोग बतावें। क्याआपलोगोंको ऐसा कोई कर्म विदित है जिसके द्वारा मैं तक्षक नागको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित जलती हुई आगमें झोंक सकूँ? उसने अपनी विषाग्निसे पूर्वकालमें मेरेपिताको जिस प्रकार दग्ध किया था, उसी प्रकार मैं भी उस पापी सर्पको जलाकर भस्मकर देना चाहता हूँ’ ।। ३-५ ।।

ऋत्विज ऊचुः

अस्ति राजन् महत् सत्रं त्वदर्थं देवनिर्मितम् ।

सर्पसत्रमिति ख्यातं पुराणे परिपठ्यते ।। ६ ।।

ऋत्विजोंने कहा-राजन्! इसके लिये एक महान् यज्ञ है, जिसका देवताओंने आपकेलिये पहलेसे ही निर्माण कर रखा है। उसका नाम है सर्पसत्र। पुराणोंमें उसका वर्णन आयाहै ।। ६ ।।

आहत्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप ।

इति पौराणिकाः प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतुः ।। ७ ।।

नरेश्वर! उस यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, ऐसापौराणिक विद्वान् कहते हैं। उस यज्ञका विधान हमलोगोंको मालूम है ।। ७ ।।

एवमुक्तः स राजर्षिम्मेने दग्धं हि तक्षकम् ।

हुताशनमुखे दीप्ते प्रविष्टमिति सत्तम ।। ८ ।।

साधुशिरोमणे! ऋत्विजोंके ऐसा कहनेपर राज्षि जनमेजयको विश्वास हो गया किअब तक्षक निश्चय ही प्रज्वलित अग्निके मुखमें समाकर भस्म हो जायगा ।। ८ ।।

ततोऽब्रवीन्मन्त्रविदस्तान् राजा ब्राह्मणांस्तदा ।

आहरिष्यामि तत् सत्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे ।। ९ ।।

तब राजाने उस समय उन मन्त्रवेत्ता ब्राम्मणोंसे कहा-‘मैं उस यज्ञका अनुष्ठानकरूँगा। आपलोग उसके लिये आवश्यक सामग्री संग्रह कीजिये’ ।। ९ ।।

ततस्ते ऋत्विजस्तस्य शास्त्रतो द्विजसत्तम ।

तं देशं मापयामासुर्यज्ञायतनकारणात् ।। १० ।।

द्विजश्रेष्ठ! तब उन ऋत्विजोंने शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञमण्डप बनानेके लियेवहाँकी भूमि नाप ली ।। १० ।।

यथावद् वेदविद्वांसः सर्वे बुद्धेः परं गताः।

ऋद्धया परमया युक्तमिष्टं द्विजगणैर्युतम् ।॥ ११ ।।

प्रभूतधनधान्याढ्यमृत्विग्भिः सुनिषेवितम् ।

निर्माय चापि विधिवद् यज्ञायतनमीप्सितम् ।। १२ ।।

राजानं दीक्षयामासुः सर्पसत्राप्तये तदा ।

इदं चासीत् तत्र पूर्व सर्पसत्रे भविष्यति ।। १३ ।।

वे सभी ऋत्विज् वेदोंके यथावत् विद्वान् तथा परम बुद्धिमान् थे। उन्होंने विधिपूर्वकमनके अनुरूप एक यज्ञ-मण्डप बनाया, जो परम समृद्धिसे सम्पन्न, उत्तम द्विजोंकेसमुदायसे सुशोभित, प्रचुर धनधान्यसे परिपूर्ण तथा ऋत्विजोंसे सुसेवित था। उसयज्ञमण्डपका निर्माण कराकर ऋत्विजोंने सर्पयज्ञकी सिद्धिके लिये उस समय राजाजनमेजयको दीक्षा दी। इसी समय जब कि सर्पसत्र अभी प्रारम्भ होनेवाला था, वहाँ पहलेही यह घटना घटित हुई ।। ११-१३ ।।

निमित्तं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा ।

यज्ञस्यायतने तस्मिन् क्रियमाणे वचोऽब्रवीत् ।। १४ ।।

स्थपतिर्बुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारदः ।

इत्यब्रवीत् सूत्रधारः सूतः पौराणिकस्तदा ।। १५ ।।

उस यज्ञमें विघ्न डालनेवाला बहुत बड़ा कारण प्रकट हो गया। जब वह यज्ञमण्डपबनाया जा रहा था, उस समय वास्तुशास्त्रके पारंगत विद्वान्, बुद्धिमान् एवं अनुभवी सूत्रधारशिल्पवेत्ता सूतने वहाँ आकर कहा-।। १४-१५ ।।

यस्मिन् देशे च काले च मापनेयं प्रवर्तिता ।

ब्राह्मणं कारणं कृत्वा नायं संस्थास्यते क्रतुः ।। १६ ।।

‘जिस स्थान और समयमें यह यज्ञमण्डप मापनेकी क्रिया प्रारम्भ हुई है, उसे देखकरयह मालूम होता है कि एक ब्राह्मणको निमित्त बनाकर यह यज्ञ पूर्ण न होसकेगा’ ।। १६ ।।

एतच्छ्ुत्वा तु राजासौ प्राग्दीक्षाकालमब्रवीत् ।

क्षत्तारं न हि मे कश्चिदज्ञातः प्रविशेदिति ।। १७ ।।

यह सुनकर राजा जनमेजयने दीक्षा लेनेसे पहले ही सेवकको यह आदेश दे दिया-मुझे सूचित किये बिना किसी अपरिचित व्यक्तिको यज्ञमण्डपमें प्रवेश न करने दियाजाय’ ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे एकपञ्चाशक्तमोऽध्यायः ।। ५१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमसम्बन्धी इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५१ ।।

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोका विनाश

सौतिरुवाच

ततः कर्म प्रववृते सर्पसत्रविधानतः ।

पर्यक्रामंश्च विधिवत् स्वे स्वे कर्मणि याजकाः ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! तदनन्तर सर्पयज्ञकी विधिसे कार्य प्रारम्भ हुआ। सबयाजक विधिपूर्वक अपने-अपने कर्ममें संलग्न हो गये।। १ ।।

प्रावृत्य कृष्णवासांसि धूमसंरक्तलोचनाः ।

जुहुवुर्मन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम् ।। २ ।।

सबकी आँखें धूएँसे लाल हो रही थीं। वे सभी ऋत्विज् काले वस्त्र पहनकरमन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें होम करने लगे ।। २ ।।

कम्पयन्तश्च सर्वेषामुरगाणां मनांसि च ।

सर्पानाजुहुवुस्तत्र सर्वानग्निमुखे तदा ।। ३ ।।

वे समस्त सर्पोंके हृदयमें कँपकँपी पैदा करते हुए उनके नाम ले-लेकर उन सबका वहाँआगके मुखमें होम करने लगे ।। ३ ।।

ततः सर्पाः समापेतुः प्रदीप्ते हव्यवाहने ।

विचेष्टमानाः कृपणमाह्वयन्तः परस्परम् । ४ ।।

तत्पश्चात् सर्पगण तड़फड़ाते और दीनस्वरमें एक-दूसरेको पुकारते हुए प्रज्वलितअग्निमें टपाटप गिरने लगे ।। ४ ।।

विस्फुरन्तः श्वसन्तश्च वेष्टयन्तः परस्परम् ।

पुच्छैः शिरोभिश्च भृशं चित्रभानुं प्रपेदिरे ।। ५ ।।

वे उछलते, लम्बी साँसें लेते, पूँछ और फरनोंसे एक- दूसरेको लपेटते हुए धधकतीआगके भीतर अधिकाधिक संख्यामें गिरने लगे ।। ५ ।।

श्वेताः कृष्णाश्च नीलाश्च स्थविराः शिशवस्तथा।

नदन्तो विविधान् नादान् पेतुर्दीप्ते विभावसौ ।। ६ ।।

सफेद, काले, नीले, बूढ़े और बच्चे सभी प्रकारके सर्प विविध प्रकारसे चीत्कार करतेहुए जलती आगमें विवश होकर गिर रहे थे ।। ६ ।।

क्रोशयोजनमात्रा हि गोकर्णस्य प्रमाणतः ।

पतन्त्यजस्रं वेगेन वह्वावग्निमतां वर ।। ७ ।।

कोई एक कोस लम्बे थे, तो कोई चार कोस और किन्हीं-किन्हींकी लम्बाई तो केवलगायके कानके बराबर थी। अग्निहोत्रियोंमें श्रेष्ठ शौनक! वे छोटे-बड़े सभी सर्प बड़े वेगसेआगकी ज्वालामें निरन्तर आहुति बन रहे थे ।। ७ ।।

एवं शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।

अवशानि विनष्टानि पन्नगानां तु तत्र वै ।। ८ ।।

इस प्रकार लाखों, करोड़ों तथा अरबों सर्प वहाँ विवश होकर नष्ट हो गये।। ८ ।।

तुरगा इव तत्रान्ये हस्तिहस्ता इवापरे ।

मत्ता इव च मातङ्गा महाकाया महाबलाः ।। ९ ।।

कुछ सर्पोंकी आकृति घोड़ोंके समान थी और कुछकी हाथीकी सूँड़के सदृश। कितनेही विशाल-काय महाबली नाग मतवाले गजराजोंको मात कर रहे थे ।। ९ ।।

उच्चावचाश्च बहवो नानावर्णा विषोल्बणाः ।

घोराश्च परिघप्रख्या दन्दशूका महाबलाः ।

प्रपेतुरग्नावुरगा मातृवाग्दण्डपीडिताः ।। १० ।।

भयंकर विषवाले छोटे-बड़े अनेक रंगके बहु-संख्यक सर्प, जो देखनेमें भयानक,परिघके समान मोटे, अकारण ही डँस लेनेवाले और अत्यन्त शक्तिशाली थे, अपनी माताकेशापसे पीड़ित होकर स्वयं ही आगमें पड़ रहे थे ।। १० ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गात आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५२ ।।

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोका भयंकर विनाश,तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना

शौनक उवाच

सर्पसत्रे तदा राज्ञः पाण्डवेयस्य धीमतः ।

जनमेजयस्य के त्वासन्नृत्विजः परमर्षयः ॥ १ ।॥

शौनकजीने पूछा-सूतनन्दन! पाण्डववंशी बुद्धिमान् राजा जनमेजयके उससर्पयज्ञमें कौन-कौनसे महर्षि ऋत्विज् बने थे? ।। १ ।।

के सदस्या बभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे ।

विषादजननेऽत्यर्थं पन्नगानां महाभये ।। २ ।॥

उस अत्यन्त भयंकर सर्पसत्रमें, जो सर्पोके लिये महान् भयदायक और विषादजनकथा, कौन-कौनसे मुनि सदस्य हुए थे? ।। २ ।।

सर्वं विस्तरशस्तात भवाज्छंसितुमर्हति ।

सर्पसत्रविधानज्ञविज्ञेयाः के च सूतज ।। ३ ।।

तात! ये सब बातें आप विस्तारपूर्वक बताइये। सूतपुत्र ! यह भी सूचित कीजिये किसर्पसत्रकी विधिको जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ समझे जानेयोग्य कौन-कौनसे महर्षि वहाँउपस्थित थे ।। ३ ।।

सौतिरुवाच

हुन्त ते कथयिष्यामि नामानीह मनीषिणाम् ।

ये ऋत्विजः सदस्याश्च तस्यासन् नृपतेस्तदा ।। ४ ।।

तत्र होता बभूवाथ ब्राह्मणश्चण्डभार्गवः ।

च्यवनस्यान्वये ख्यातो जातो वेदविदां वरः ।। ५ ।।

उद्गाता ब्राह्मणो वृद्धो विद्वान् कौत्सोऽथ जैमिनिः ।

ब्रह्माभवच्छाङ्ग्रवोऽथाध्वर्युश्चापि पिङ्गलः ।। ६ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-शौनकजी! मैं आपको उन मनीषी महात्माओंके नाम बता रहाहूँ, जो उस समय राजा जनमेजयके ऋत्विज् और सदस्य थे। उस यज्ञमें वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठब्राह्मण चण्डभार्गव होता थे। उनका जन्म च्यवन मुनिके वंशमें हुआ था। वे उस समयकेविख्यात कर्मकाण्डी थे। वृद्ध एवं विद्वान् ब्राह्मण कौत्स उद्गाता, जैमिनि ब्रह्मा तथाशार्ङ्गरव और पिंगल अध्वर्यु थे ।। ४-६ ।।

सदस्यश्चाभवद् व्यासः पुत्रशिष्यसहायवान् ।

उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः ।। ७ ।।

असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा ।

आत्रेयः कुण्डजठरौ द्विजः कालघटस्तथा ।। ८ ।।

वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान् ।

कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः ।। ९ ।।

एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगाः ।

सदस्याश्चाभवंस्तत्र सत्रे पारीक्षितस्य ह ।। १० ।।

इसी प्रकार पुत्र और शिष्योंसहित भगवान् वेदव्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु,पिंगल, असित, देवल, नारद, पर्वत, आत्रेय, कुण्ड, जठर, द्विजश्रेष्ठ कालघट, वात्स्य, जपऔर स्वाध्यायमें लगे रहनेवाले बूढ़े श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्गल्य तथा समसौरभ-ये और अन्य बहुत-से वेदविद्याके पारंगत ब्राह्मण जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें सदस्य बनेथे ।। ७-१० ।।

जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ ।

अहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः ।। ११ ।।

उस समय उस महान् यज्ञ सर्पसत्रमें ज्यों-ज्यों ऋत्विज् लोग आहुतियाँ डालते, त्यों-त्योंप्राणिमात्रको भय देनेवाले घोर सर्प वहाँ आ-आकर गिरते थे ।। ११ ।।

वसामेदोवहाः कुल्या नागानां सम्प्रवर्तिताः ।

ववौ गन्धश्च तुमुलो दह्यतामनिशं तदा ।। १२ ।।

नागोंकी चर्बी और मेदसे भरे हुए कितने ही नाले बह चले। निरन्तर जलनेवाले सर्पोंकीतीखी दुर्गन्ध चारों ओर फैल रही थी ।। १२ ।।

पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाम्बरे।

अश्रूयतानिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम् ।। १३ ।।

जो आगमें पड़ रहे थे, जो आकाशमें ठहरे हुए थे और जो जलती हुई आगकी ज्वालामेंपक रहे थे, उन सभी सर्पोंका करुण क्रन्दन निरन्तर जोर-जोरसे सुनायी पड़ताथा ।। १३ ।।

तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दरनिवेशनम् ।

गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम् ।। १४ ।।

नागराज तक्षकने जब सुना कि राजा जनमेजयने सर्पयज्ञकी दीक्षा ली है, तब उसेसुनते ही वह देवराज इन्द्रके भवनमें चला गया ।। १४ ।।

ततः सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः ।

अगच्छच्छरणं भीत आगः कृत्वा पुरन्दरम् ।। १५ ।।

वहाँ उसने सब बातें ठीक-ठीक कह सुनायीं। फिर सर्पोंमें श्रेष्ठ तक्षकने अपराधकरनेके कारण भयभीत हो इन्द्रदेवकी शरण ली ।। १५ ।।

तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक ।

भयं नागेन्द्र तस्माद् वै सर्पसत्रात् कदाचन ।। १६ ।।

तब इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा-‘नागराज तक्षक! तुम्हें यहाँ उस सर्पयज्ञसेकदापि कोई भय नहीं है ।। १६ ।।

प्रसादितो मया पूर्वं तवार्थाय पितामहः ।

तस्मात् तव भयं नास्ति व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। १७ ।।

तुम्हारे लिये मैंने पहलेसे ही पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न कर लिया है, अतः तुम्हें कुछभी भय नहीं है। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये’ ।। १७ ।।

सौतिरुवाच

एवमाश्वासितस्तेन ततः स भुजगोत्तमः ।

उवास भवने तस्मिञ्छक्रस्य मुदितः सुखी ।। १८ ।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-इन्द्रके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सर्पोंमें श्रेष्ठ तक्षक उसइन्द्रभवनमें ही सुखी एवं प्रसन्न होकर रहने लगा ।। १८ ।।

अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदुःखितः।

अल्पशेषपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत । १९ ।।

नाग निरन्तर उस यज्ञकी आगमें आहुति बनते जा रहे थे | सर्पोका परिवार अब बहुतथोड़ा बच गया था। यह देख वासुकि नाग अत्यन्त दुःखी हो मन-ही- मन संतप्त होनेलगे ।। १९ ।।

कश्मलं चाविशद् घोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम् ।

स घूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत् ।। २० ।।

सर्पोमें श्रेष्ठ वासुकिपर भयानक मोहसा छा गया, उनके हृदयमें चक्कर आने लगा।अतः वे अपनी बहिनसे इस प्रकार बोले-|1 २0 ||

दह्यन्त्यङ्गानि मे भद्रे न दिशः प्रतिभान्ति च ।

सीदामीव च सम्मोहात् घूर्णतीव च मे मनः ।। २१ ।।

दृष्टिभ्भ्राम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च ।

पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन् दीप्ते विभावसौ ।। २२ ।।

‘भद्रे! मेरे अंगोंमें जलन हो रही है। मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं। मैं शिथिल-सा हो रहा हूँऔर मोहवश मेरे मस्तिष्कर्में चक्कर-सा आ रहा है, मेरे नेत्र घूम रहे हैं, हृदय अत्यन्तविदीर्ण-सा होता जा रहा है। जान पड़ता है, आज मैं भी विवश होकर उस यज्ञकी प्रज्वलितअग्निमें गिर पडूँगा ।। २१-२२ ।।

पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसया ।

व्यक्तं मयापि गन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम् ।। २३ ।।

‘जनमेजयका वह यज्ञ हमलोगोंकी हिंसाके लिये ही हो रहा है। निश्चय ही अब मुझे भीयमलोक जाना पड़ेगा ।। २३ ।।

अयं स कालः सम्प्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः ।

जरत्कारौ मया दत्ता त्रायस्वास्मान् सबान्धवान् ।। २४ ।।

‘बहिन! जिसके लिये मैंने तुम्हारा विवाह जरत्कारु मुनिसे किया था , उसका यहअवसर आ गया है। तुम बान्धवोंसहित हमारी रक्षा करो ।। २४ ।।

आस्तीकः किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे।

प्रतिषेत्स्यति मां पूर्वं स्वयमाह पितामहः ।। २५ ।।

‘श्रेष्ठ नागकन्ये! पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने मुझसे कहा था-‘आस्तीक उस यज्ञकोबंद कर देगा’ ।। २५ ।।

तद् वत्से ब्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसम्मतम् ।

ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम् ।। २६ ।।

‘अतः वत्से! आज तुम बन्धु-बान्धवोंसहित मेरे जीवनको संकटसे छुड़ानेके लियेवेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अपने पुत्र कुमार आस्तीकसे कहो। वह बालक होनेपर भी वृद्ध पुरुषोंकेलिये भी आदरणीय है’ ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे वासुकिवाक्ये त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रके विषयमें वासुकिवचनसम्बन्धी तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।

चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका

सर्पयज्ञमें जाना

सौतिरुवाच

तत आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजङ्गमा ।

वासुकेर्नागराजस्य वचनादिदमब्रवीत् ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-तब नागकन्या जरत्कारु नागराज वासुकिके कथनानुसारअपने पुत्रको बुलाकर इस प्रकार बोली-।| १ ।।

अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः ।

कालः स चायं सम्प्राप्तस्तत् कुरुष्व यथातथम् ।। २ ।।

‘बेटा! मेरे भैयाने एक निमित्तको लेकर तुम्हारे पिताके साथ मेरा विवाह किया था ।उसकी पूर्तिका यही उपयुक्त अवसर प्राप्त हुआ है। अतः तुम यथावत्रूपसे उस उद्देश्यकीपूर्ति करो’ ।। २ ।।

आस्तीक उवाच

किं निमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे।

तन्ममाचक्ष्व तत्वेन श्रुत्वा कर्तास्मि तत् तथा ।। ३ ।।

आस्तीकने पूछा-माँ! मामाजीने किस निमित्तको लेकर पिताजीके साथ तुम्हाराविवाह किया था? वह मुझे ठीक-ठीक बताओ। उसे सुनकर मैं उसकी सिद्धिके लिये प्रयत्नकरूँगा ।। ३ ।।

सौतिरुवाच

तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी ।

भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्लवा ।। ४ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओंका हित चाहनेवाली नागराजकीबहिन जरत्कारु शान्तचित्त हो आस्तीकसे बोली ।। ४ ।।

जरत्कारुरुवाच

पन्नगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुता ।

तया शप्ता रुषितया सुता यस्मान्निबोध तत् ।। ५ ।।

जरत्कारुने कहा-वत्स! सम्पूर्ण नागोंकी माता कद्रू नामसे विख्यात हैं। उन्होंनेकिसी समय रुष्ट होकर अपने पुत्रोंको शाप दे दिया था। जिस कारणसे वह शाप दिया, वहबताती हूँ, सुनो ।। ५ ।।

उच्चैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम ।

विनतार्थाय पणिते दासीभावाय पुत्रकाः ।। ६ ।।

जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः।

तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ।। ७ ।।

(अश्वोंका राजा जो उच्चैःश्रवा है, उसके रंगको लेकर विनताके साथ कद्रूने बाजी लगायी थी। उसमें यह शर्त थी-‘जो हारे वह जीतनेवालीकी दासी बने।’ कद्रू उच्चैः श्रवाकी पूँछ काली बता चुकी थी। अतः उसने अपने पुत्रोंसे कहा – ‘तुमलोग छलपूर्वक उस घोड़ेकी पूँछ काले रंगकी कर दो।’ सर्प इससे सहमत न हुए। तब उन्होंने सर्पोंको शाप देते हुए कहा -) ‘पुत्रो! तुमलोगोंने मेरे कहनेसे अश्वराज उच्चै:श्रवाकी पूँछका रंग न बदलकर विनताके साथ जो मेरी दासी होनेकी शर्त थी, उसमें-उस घोड़ेके सम्बन्धमें विनताके कथनको मिथ्या नहीं कर दिखाया, इसलिये जनमेजयके यज्ञमें तुमलोगोंको आग जलाकर भस्म कर देगी और तुम सभी मरकर प्रेतलोकको चले जाओगे’ ।। ६-७ ।।

तां च शप्तवत्तीं देवः साक्षाल्लोकपितामहः ।

एवमस्त्विति तद्वाक्यं प्रोवाचानुमुमोद च ।।८॥

कदूने जब इस प्रकार शाप दे दिया, तब साक्षात् लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने ‘एवमस्तु’ कहकर उनके वचनका अनुमोदन किया। ८ ।।

वासुकिश्चापि तच्छुत्वा पितामहवचस्तदा ।

अमृते मथिते तात देवाज्छरणमीयिवान् ।। ९ ।।

तात! मेरे भाई वासुकिने भी उस समय पितामहकी बात सुनी थी। फिर अमृत- मन्थनका कार्य हो जानेपर वे देवताओंकी शरणमें गये ।। ९ ।।

सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् ।

भ्रातरं मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन् ।। १० ।।

ते तं प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसम्भवम् ।

राज्ञा वासुकिना सार्धं शापोऽसौ न भवेदिति ।। ११ ।।

देवतालोग मेरे भाईकी सहायतासे उत्तम अमृत पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर चुके थे। अतः वे मेरे भाईको आगे करके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ समस्त देवताओंने नागराज वासुकिके साथ रहकर पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया उन्हें प्रसन्न करनेका उद्देश्य यह था कि माताका वह शाप लागू न हो ।। १०-११ ।। |

देवा ऊचुः वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात् ।

अभिशापः स मातुस्तु भगवन् न भवेत् कथम् ।। १२ ।।

देवता बोले-भगवन्! ये नागराज वासुकि अपने जाति-भाइयोंके लिये बहुत दुःखीहैं। कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे माताका शाप इन लोगोंपर लागू न हो ।। १२ ।।

ब्रह्मोवाच

जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यति ।

तत्र जातो द्विजः शापान्मोक्षयिष्यति पन्नगान् ।। १३ ।।

ब्रह्माजीने कहा-जरत्कारु मुनि जरत्कारु नामवाली जिस पत्नीको ग्रहण करेंगे,उसके गर्भसे उत्पन्न ब्राह्मण सर्पोंको माताके शापसे मुक्त करेगा ।। १३ ।।

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः ।

प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने ।। १४ ।।

प्रागेवानागते काले तस्मात् त्वं मय्यजायथाः ।

अयं स कालः सम्प्राप्तो भयान्नस्त्रातुमर्हसि ।। १५ ।।

भ्रातरं चापि मे तस्मात् त्रातुमर्हसि पावकात् ।न मोघं तु कृतं तत् स्याद् यदहं तव धीमते ।पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे ।। १६ ।।

देवताके समान तेजस्वी पुत्र! ब्रह्माजीकी वह बात सुनकर नागश्रेष्ठ वासुकिने मुझेतुम्हारे महात्मा पिताकी सेवामें समर्पित कर दिया । यह अवसर आनेसे बहुत पहले इसीनिमित्तसे मेरा विवाह किया गया। तदनन्तर उन महर्षिद्वारा मेरे गर्भसे तुम्हारा जन्म हुआ।जनमेजयके सर्पयज्ञका वह पूर्वनिर्दिष्ट काल आज उपस्थित है (उस यज्ञमें निरन्तर सर्प जलरहे हैं), अतः उस भयसे तुम उन सबका उद्धार करो । मेरे भाईको भी उस भयंकर अग्निसेबचा लो। जिस उद्देश्यको लेकर तुम्हारे बुद्धिमान् पिताकी सेवामें मैं दी गयी, वह व्यर्थ नहींजाना चाहिये। अथवा बेटा! सर्पोको इस संकटसे बचानेके लिये तुम क्या उचित समझतेहो? ।। १४-१६ ।।

सौतिरुवाच

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा ।

अब्रवीद् दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव ।। १७ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-माताके ऐसा कहनेपर आस्तीकने उससे कहा-‘माँ! तुम्हारीजैसी आज्ञा है वैसा ही करूँगा।’ इसके बाद वे दुःखपीड़ित वासुकिको जीवनदान देते हुए-से बोले- ।। १७ ।।

अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम ।

तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। १८ ।।

‘महान् शक्तिशाली नागराज वासुके! मैं आपको माताके उस शापसे छुड़ा दूँगा। यहआपसे सत्य कहता हूँ ।। १८ ।।

भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भयम् ।

प्रयतिष्ये तथा राजन् यथा श्रेयो भविष्यति ।। १९ ।।

‘नागप्रवर! आप निश्चिन्त रहें। आपके लिये कोई भय नहीं है। राजन्! जैसे भी आपकाकल्याण होगा, मैं वैसा प्रयत्न करूंगा।। १९ ।।

न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।

तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम् ।। २० ।।

वाग्भिर्मङ्गलयुक्ताभिस्तोषयिष्येऽद्य मातुल ।

यथा स यज्ञो नृपतेर्निवर्तिष्यति सत्तम । २१ ।।

‘मैंने कभी हँसी-मजाकमें भी झूठी बात नहीं कही है, फिर इस संकटके समय तो कहही कैसे सकता हूँ। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! सर्पयज्ञके लिये दीक्षित नृपश्रेष्ठ जनमेजयकेपास जाकर अपनी मंगलमयी वाणीसे आज उन्हें ऐसा संतुष्ट करूँगा, जिससे राजाका वहयज्ञ बंद हो जायगा ।। २०-२१ ।।

स सम्भावय नागेन्द्र मयि सर्वं महामते ।

न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति ।। २२ ।।

‘महाबुद्धिमान् नागराज! मुझमें यह सब कुछ करनेकी योग्यता है, आप इसपर विश्वासरखें। आपके मनमें मेरे प्रति जो आशा-भरोसा है, वह कभी मिथ्या नहीं होसकता’ ।। २२ ।।

वासुकिरुवाच

आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीर्यते ।

दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडितः ।। २३ ।।

वासुकि बोले-आस्तीक! माताके शापरूप ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण मुझेचक्कर आ रहा है, मेरा हृदय विदीर्ण होने लगा है और मुझे दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहाहै ।। २३ ।।

आस्तीक उवाच

न संतापस्त्वया कार्यः कथंचित् पन्नगोत्तम ।

प्रदीप्ताग्नेः समुत्पन्नं नाशयिष्यामि ते भयम् । । २४ ।।

आस्तीकने कहा-नागप्रवर! आपको मनमें किसी प्रकार संताप नहीं करना चाहिये।सर्पयज्ञकी धधकती हुई आगसे जो भय आपको प्राप्त हुआ है, मैं उसका नाश करदूँगा ।। २४ ।।

ब्रह्मदण्डं महाघोरं कालाग्निसमतेजसम् ।

नाशयिष्यामि मात्र त्वं भयं कार्षीः कथंचन ।। २५ ।।

कालाग्निके समान दाहक और अत्यन्त भयंकर शापका यहाँ मैं अवश्य नाश करडालूँगा। अतः आप उससे किसी तरह भय न करें ।। २५ ।।

सौतिरुवाच

ततः स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम् ।

आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम् ।। २६ ।।

जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वैः समुदितं गुणैः।

मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः ।। २७ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-तदनन्तर नागराज वासुकिके भयंकर चिन्ता-ज्वरको दूर करऔर उसे अपने ऊपर लेकर द्विजश्रेष्ठ आस्तीक बड़ी उतावलीके साथ नागराज वासुकिआदिको प्राण-संकटसे छुड़ानेके लिये राजा जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें गये, जो समस्तउत्तम गुणोसे सम्पन्न था ।। २६-२७ ।।

स गत्वापश्यदास्तीको यज्ञायतनमुक्तमम् ।

वृतं सदस्यैर्बहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः ।। २८ ।।

वहाँ पहुँचकर आस्तीकने परम उत्तम यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्निके समानतेजस्वी अनेक सदस्योंसे भरा हुआ था ।। २८ ।।

स तत्र वारितो द्वाःस्थैः प्रविशन् द्विजसत्तमः ।

अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः ।। २९ ।।

द्विजश्रेष्ठ आस्तीक जब यज्ञमण्डपमें प्रवेश करने लगे, उस समय द्वारपालोंने उन्हें रोकदिया। तब काम-क्रोध आदि शत्रुओंको संतप्त करनेवाले आस्तीक उसमें प्रवेश करनेकीइच्छा रखकर उस यज्ञकी स्तुति करने लगे ।। २९ ।।

स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः ।

तुष्टाव राजानमनन्तकीर्ति-मृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम् ।। ३० ।।

इस प्रकार उस परम उत्तम यज्ञमण्डपके निकट पहुँचकर पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ विप्रवरआस्तीकने अक्षय कीर्तिसे सुशोभित यजमान राजा जनमेजय, ऋत्विजों, सदस्यों तथाअग्निदेवका स्तवन आरम्भ किया ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीकागमने चतुष्पञ्चाशक्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रमें आस्तीकका आगमनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।

पञ्चपञ्चाशक्तमोऽध्यायः

आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा

आस्तीक उवाच

सोमस्य यज्ञो वरुणस्य यज्ञःप्रजापतेर्यज्ञ आसीत् प्रयागे ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। १ ।

आस्तीकने कहा-भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! चन्द्रमाका जैसा यज्ञ हुआ था,वरुणने जैसा यज्ञ किया था और प्रयागमें प्रजापति ब्रह्माजीका यज्ञ जिस प्रकार समस्तसद्गुणोंसे सम्पन्न हुआ था, उसी प्रकार तुम्हारा यह यज्ञ भी उत्तम गुणोंसे युक्त है। हमारेप्रियजनोंका कल्याण हो ।। १ ।।

शक्रस्य यज्ञः शतसंख्य उत्त-स्तथा पूरोस्तुल्यसंख्यं शतं वै ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। २ ।।

भरतकुलशिरोमणि परीक्षित्कुमार! इन्द्रके यज्ञोंकी संख्या सौ बतायी गयी है, राजापूरुके यज्ञोंकी संख्या भी उनके समान ही सौ है। उन सबके यज्ञोंके तुल्य ही तुम्हारा यहयज्ञ शोभा पा रहा है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। २ ।।

यमस्य यज्ञो हरिमेधसश्च यथा यज्ञो रन्तिदेवस्य राज्ञः ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। ३ ॥

जनमेजय! यमराजका यज्ञ, हरिमेधाका यज्ञ तथा राजा रन्तिदेवका यज्ञ जिस प्रकारश्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न था, वैसे ही तुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ३ ।।

गयस्य यज्ञः शशबिन्दोश्च राज्ञो यज्ञस्तथा वैश्रवणस्य राज्ञः ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। ४ ।।

भरतवंशियोंमें अग्रगण्य जनमेजय! महाराज गयका यज्ञ, राजा शशबिन्दुका यज्ञ तथाराजाधिराज कुबेरका यज्ञ जिस प्रकार उत्तम विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ था, वैसा हीतुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ४ ।।

नृगस्य यज्ञस्त्वजमीढस्य चासीद् यथा यज्ञो दाशरथेश्व राज्ञः ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। ५ ।

परीक्षित्कुमार! राजा नृग, राजा अजमीढ़ और महाराज दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीनेजिस प्रकार यज्ञ किया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनोंका कल्याणहो ।। ५ ।।

यज्ञः श्रुतो दिवि देवस्य सूनो-र्युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। ६ ।।

भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अजमीढ़वंशी धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरके यज्ञकी ख्याति स्वर्गकेश्रेष्ठ देवताओंने भी सुन रखी थी, वैसा ही तुम्हारा भी यह यज्ञ है । हमारे प्रियजनोंकाकल्याण हो ।। ६ ।।

कृष्णस्य यज्ञः सत्यवत्याः सुतस्य स्वयं च कर्म प्रचकार यत्र ।

तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ।। ७ ।।

भरताग्रगण्य जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीका यज्ञ जिसमें उन्होंने स्वयं सब कार्यसम्पन्न किया था, जैसा हो पाया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनोंकाकल्याण हो ।। ७ ।।

इमे च ते सूर्यसमानवर्चसःसमासते वृत्रहणः क्रतुं यथा ।

नैषां ज्ञातुं विद्यते ज्ञानमद्य दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत् कदाचित् ।। ८।।

तुम्हारे ये ऋत्विज सूर्यके समान तेजस्वी हैं और इन्द्रके यज्ञकी भाँति तुम्हारे इस यज्ञकाभलीभाँति अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ऐसी जानने योग्य वस्तु नहीं है, जिसका इन्हें ज्ञान नहो। इन्हें दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं हो सकता ।। ८ ।।

ऋत्विक् समो नास्ति लोकेषु चैव द्वैपायनेनेति विनिश्चितं मे ।

एतस्य शिष्याः क्षितिमाचरन्ति सर्वत्त्विजः कर्मसु स्वेषु दक्षाः ।। ९ ।

द्वैपायन व्यासजीके समान पारलौकिक साधनोंमें कुशल दूसरा कोई ऋत्विज नहीं है, यह मेरा निश्चित मत है। इनके शिष्य ही अपने-अपने कर्मोंमें निपुण होता, आदि सभी प्रकारके ऋत्विज हैं, जो यज्ञ करानेके लिये सम्पूर्ण भूमण्डलमें विचरते रहते हैं ।। ९ ।।

विभावसुश्चित्रभानुर्महात्मा हिरण्यरेता हुतभुक् कृष्णवत्म्मा ।

प्रदक्षिणावर्तशिखः प्रदीप्तो हव्यं तवेदं हुतभुग् वष्टि देवः ।। १० ।।

जो विभावसु, चित्रभानु, महात्मा, हिरण्यरेता, हविष्यभोजी तथा कृष्णवत्त्मा कहलाते हैं, वे अग्निदेव तुम्हारे इस यज्ञमें दक्षिणावर्त शिखाओंसे प्रज्वलित हो दी हुई आहुतिको भोग लगाते हुए तुम्हारे इस हविष्यकी सदा इच्छा रखते हैं ।। १० ।।

नेह त्वदन्यो विद्यते जीवलोके समो नृपः पालयिता प्रजानाम् ।

धृत्या च ते प्रीतमनाः सदाहं त्वं वा वरुणो धर्मराजो यमो वा ।। ११ ।।

इस मृत्युलोकमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा राजा नहीं है, जो तुम्हारी भाँति प्रजाका पालन कर सके। तुम्हारे धैर्यसे मेरा मन सदा प्रसन्न रहता है। तुम साक्षात् वरुण, एवं यमके समान प्रभावशाली हो ।। ११ ।।

शक्रः साक्षाद् वज्रपाणिर्यथेह त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् ।

मतस्त्वं नः पुरुषेन्द्रेह लोके न च त्वदन्यो भूपतिरस्ति जज्ञे ।। १२ ।।

पुरुषोमें श्रेष्ठ जनमेजय! जैसे साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस लोकमें हम प्रजावर्गके पालक माने गये हो। संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भूपाल तुम-जैसा प्रजापालक नहीं है ।। १२ ।।

खट्वाङ्गनाभागदिलीपकल्प ययातिमान्धातृसमप्रभाव । आदित्यतेजःप्रतिमानतेजा भीष्मो यथा राजसि सुव्रतस्त्वम् ।। १३ ।।

राजन्! तुम खट्वांग, नाभाग और दिलीपके समान प्रतापी हो। तुम्हारा प्रभाव राजा ययाति और मान्धाताके समान है। तुम अपने तेजसे भगवान् सूर्यके प्रचण्ड तेजकी उद्गाता धर्मराजसमानता कर रहे हो। जैसे भीष्मपितामहने उत्तम ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था, उसीप्रकार तुम भी इस यज्ञमें परम उत्तम व्रतका पालन करते हुए शोभा पा रहे हो ।। १३ ।।

वाल्मीकिवत् ते निभृतं स्ववीर्यं वसिष्ठवत् ते नियतश्च कोपः।

प्रभुत्वमिन्द्रत्वसमं मतं मे द्युतिश्च नारायणवद् विभाति ।। १४ ।।

महर्षि वाल्मीकिकी भाँति तुम्हारा अद्भुत पराक्रम तुममें ही छिपा हुआ है। महर्षिवसिष्ठजीके समान तुमने अपने क्रोधको काबूमें कर रखा है। मेरी ऐसी मान्यता है कितुम्हारा प्रभुत्व इन्द्रके ऐश्वर्यके तुल्य है और तुम्हारी अंगकान्ति भगवान् नारायणके समानसुशोभित होती है ।। १४ ।।

यमो यथा धर्मविनिश्चयज्ञः कृष्णो यथा सर्वगुणोपपन्नः ।

श्रियां निवासोऽसि यथा वसूनां निधानभूतोऽसि तथा क्रतूनाम् ।। १५ ।।

तुम यमराजकी भाँति धर्मके निश्चित सिद्धान्तको जाननेवाले हो । भगवान् श्रीकृष्णकीभाँति सर्वगुणसम्पन्न हो। वसुगणोंके पास जो सम्पत्तियाँ हैं, वैसी ही सम्पदाओंके तुमनिवासस्थान हो तथा यज्ञोंकी तो तुम साक्षात् निधि ही हो ।। १५ ।।

दम्भोद्भवेनासि समो बलेन रामो यथा शास्त्रविदस्त्रविच्च ।

और्वत्रिताभ्यामसि तुल्यतेजा दुष्प्रेक्षणीयोऽसि भगीरथेन ।। १६ ।।

राजन्! तुम बलमें दम्भोद्भवके समान और अस्त्र-शसत्रोंके ज्ञानमें परशुरामके सदृश हो।तुम्हारा तेज और्व और त्रित नामक महर्षियोंके तुल्य है। राजा भगीरथकी भाँति तुम्हारी ओरदेखना भी कठिन है ।। १६ ।।

सौतिरुवाच

एवं स्तुताः सर्व एव प्रसन्ना राजा सदस्या ऋत्विजो हव्यवाहः ।

तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि प्रोवाच राजा जनमेजयोऽथ ।। १७ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-आस्तीकके इस प्रकार स्तुति करनेपर यजमान राजाजनमेजय, सदस्य, ऋत्विज् और अग्निदेव सभी बड़े प्रसन्न हुए । इन सबके मनोभावों तथाबाह्य चेष्टाओंको लक्ष्य करके राजा जनमेजय इस प्रकार बोले ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीककृतराजस्तवे पञ्चपञ्चाशक्तमोऽध्याय ।। ५५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीकद्वारा सर्पसत्रमें राजा जनमेजयकी स्तुतिविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।।

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षकनागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना

जनमेजय उवाच

बालोऽप्ययं स्थविर इवावभाषतेनायं बालः स्थविरोऽयं मतो मे।

इच्छाम्यहं वरमस्मै प्रदातुंतन्मे विप्राः संविदध्वं यथावत् ।। १ ।।

जनमेजयने कहा-ब्राह्मणो! यह बालक है तो भी वृद्ध पुरुषोंके समान बात करताहै, इसलिये मैं इसे बालक नहीं, वृद्ध मानता हूँ और इसको वर देना चाहता हूँ। इस विषयमेंआपलोग अच्छी तरह विचार करके अपनी सम्मति दें |। १ ।।

सदस्या ऊचुः

बालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञांविद्वान् यो वै स पुनर्वै यथावत् ।

सर्वान् कामांस्त्वत्त एवार्हतेऽद्ययथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ।। २ ।।

सदस्योंने कहा-ब्राह्मण यदि बालक हो तो भी यहाँ राजाओंके लिये सम्माननीय हीहै। यदि वह विद्वान् हो तब तो कहना ही क्या है? अतः यह ब्राह्मण बालक आज आपसेयथोचित रीतिसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको पानेके योग्य है, किंतु वर देनेसे पहले तक्षकनाग चाहे जैसे भी शीघ्रतापूर्वक हमारे पास आ पहुँचे, वैसा उपाय करना चाहिये।। २ ।।

सौतिरुवाच

व्याहर्तुकामे वरदे नृपे द्विजंवरं वृणीष्वेति ततोऽभ्युवाच ।

होता वाक्यं नातिहृष्टान्तरात्माकर्मण्यस्मिंस्तक्षको नैति तावत् ।। ३ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! तदनन्तर वर देनेके लिये उद्यत राजा जनमेजयविप्रवर आस्तीकसे यह कहना ही चाहते थे कि ‘तुम मुँहमाँगा वर माँग लो।’ इतनेमें हीहोता, जिसका मन अधिक प्रसन्न नहीं था, बोल उठा- ‘हमारे इस यज्ञकर्में तक्षक नाग तोअभीतक आया ही नहीं ।। ३ ।।

जनमेजय उवाच

यथा चेदं कर्म समाप्यते मे यथा च वै तक्षक एति शीघ्रम् ।

तथा भवन्तः प्रयतन्तु सर्व परं शक्त्या स हि मे विद्विषाणः ।। ४ ।।

जनमेजयने कहा-ब्राह्मणो! जैसे भी यह कर्म पूरा हो जाय और जिस प्रकार भीतक्षक नाग शीघ्र यहाँ आ जाय, आपलोग पूरी शक्ति लगाकर वैसा ही प्रयत्न कीजिये;क्योंकि मेरा असली शत्रु तो वही है ।। ४ ।।

ऋत्विज ऊचुः

यथा शास्त्राणि नः प्राहुर्यथा शंसति पावकः ।

इन्द्रस्य भवने राजंस्तक्षको भयपीडितः ।। ५ ।।

ऋत्विज बोले-राजन्! हमारे शास्त्र जैसा कहते हैं तथा अग्निदेव जैसी बात बता रहेहैं, उसके अनुसार तो तक्षक नाग भयसे पीड़ित हो इन्द्रके भवनमें छिपा हुआ है ।। ५ ।।

यथा सूतो लोहिताक्षो महात्मा पौराणिको वेदितवान् पुरस्तात्।

स राजानं प्राह पृष्टस्तदानीं यथाहुर्विप्रास्तद्वदेतन्नुदेव ।।६ ।।

लाल नेत्रोंवाले पुराणवेत्ता महात्मा सूतजीने पहले ही यह बात सूचित कर दी थी। तबराजाने सूतजीसे इसके विषयमें पूछा। पूछनेपर उन्होंने राजासे कहा -‘नरदेव! ब्राह्मणलोगजैसी बात कह रहे हैं, वह ठीक वैसी ही है ।। ६ ।।

पुराणमागम्य ततो ब्रवीम्यहं दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन् ।

वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो न पावकस्त्वां प्रदहिष्यतीति ।। ७ ।।

‘राजन्! पुराणको जानकर मैं यह कह रहा हूँ कि इन्द्रने तक्षकको वर दिया है।-‘नागराज! तुम यहाँ मेरे समीप सुरक्षित होकर रहो। सर्पसत्रकी आग तुम्हें नहीं जलासकेगी’ ।। ७ ।।

एतच्छुत्वा दीक्षितस्तप्यमान आस्ते होतारं चोदयन् कर्मकाले ।

होता च यत्तोऽस्याजुहावाथ मन्त्रै-रथो महेन्द्रः स्वयमाजगाम ।। ८ ।।

विमानमारुह्य महानुभावःसर्वेद्ैवैः परिसंस्तूयमानः ।

बलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो विद्याधरैरप्सरसां गणैश्च ।। ९ ।।

यह सुनकर यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करनेवाले यजमान राजा जनमेजय संतप्त हो उठे औरकर्मके समय होता-को इन्द्रसहित तक्षक नागका आकर्षण करनेके लिये प्रेरित करने लगे।तब होताने एकाग्रचित्त होकर मन्त्रोंद्वारा इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब स्वयंदेवराज इन्द्र विमानपर बैठकर आकाशमार्गसे चल पड़े। उस समय सम्पूर्ण देवता सबओरसे घेरकर उन महानुभाव इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे। अप्सराएँ, मेघ और विद्याधर भीउनके पीछे-पीछे आ रहे थे ।। ८-९ ।।

तस्योत्तरीये निहितः स नागो भयोद्विग्नः शर्म नैवाभ्यगच्छत् ।

ततो राजा मन्त्रविदोऽब्रवीत् पुनः क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन् ।। १० ।।

तक्षक नाग उन्हींके उत्तरीय वस्त्र ( दुपट्टे)-में छिपा था । भयसे उद्विग्न होनेके कारणतक्षकको तनिक भी चैन नहीं आता था। इधर राजा जनमेजय तक्षकका नाश चाहते हुएकुपित होकर पुनः मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे बोले ।। १० ।।

जनमेजय उवाच

इन्द्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः ।

तमिन्द्रेणैव सहितं पातयध्वं विभावसौ ।। ११ ।।

जनमेजयने कहा-विप्रगण! यदि तक्षक नाग इन्द्रके विमानमें छिपा हुआ है तो उसेइन्द्रके साथ ही अग्निमें गिरा दो ।। ११ ।।

सौतिरुवाच

जनमेजयेन राज्ञा तु नोदितस्तक्षकं प्रति ।

होता जुहाव तत्रस्थं तक्षकं पन्नगं तथा ।। १२ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-राजा जनमेजयके द्वारा इस प्रकार तक्षककी आहुतिके लियेप्रेरित हो होताने इन्द्रके समीपवर्ती तक्षक नागका अग्निमें आवाहन किया-उसके नामकीआहुति डाली ।। १२ ।।

हूयमाने तथा चैव तक्षकः सपुरन्दरः ।

आकाशे ददृशे चैव क्षणेन व्यथितस्तदा ।। १३ ।।

इस प्रकार आहुति दी जानेपर क्षणभरमें इन्द्रसहित तक्षक नाग आकाशमें दिखायीदिया। उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ।। १३ ।।

पुरन्दरस्तु तं यज्ञं दृष्ट्वोरुभयमाविशत् ।

हित्वा तु तक्षकं त्रस्तः स्वमेव भवनं ययौ ।। १४ ।।

उस यज्ञको देखते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो उठे और तक्षक नागको वहीं छोड़करबड़ी घबराहटके साथ अपने भवनको ही चलते बने ।। १४ ।।

इन्द्रे गते तु नागेन्द्रस्तक्षको भयमोहितः ।

मन्त्रशक्त्या पावकार्चिः समीपमवशो गतः ।। १५ ।।

इन्द्रके चले जानेपर नागराज तक्षक भयसे मोहित हो मन्त्रशक्तिसे खिंचकरविवशतापूर्वक अग्निकी ज्वालाके समीप आने लगा ।। १५ ।।

ऋत्विज ऊचुः

वर्तते तव राजेन्द्र कर्मैतद् विधिवत् प्रभो ।

अस्मै तु द्विजमुख्याय वरं त्वं दातुमर्हसि ।। १६ ।।

ऋत्विजोंने कहा-राजेन्द्र! आपका यह यज्ञकर्म विधिपूर्वक सम्पन्न हो रहा है। अबआप इन विप्रवर आस्तीकको मनोवांछित वर दे सकते हैं ।। १६ ।।

जनमेजय उवाच

बालाभिरूपस्य तवाप्रमेय वरं प्रयच्छामि यथानुरूपम् ।

वृणीष्व यत् तेऽभिमतं हृदि स्थितंतत् ते प्रदास्याम्यपि चेददेयम् ।। १७ ।

जनमेजयने कहा-ब्राह्मणबालक! तुम अप्रमेय हो-तुम्हारी प्रतिभाकी कोई सीमानहीं है। मैं तुम-जैसे विद्वान्के लिये वर देना चाहता हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट कामना हो,उसे बताओ। वह देनेयोग्य न होगी, तो भी तुम्हें अवश्य दे देँगा ।। १७ ।।

ऋत्विज ऊचुः

अयमायाति तूर्णं स तक्षकस्ते वशं नृप ।

श्रूयतेऽस्य महान् नादो नदतो भैरवं रवम् ।। १८ ।।

ऋत्विज बोले-राजन्! यह तक्षक नाग अब शीघ्र ही तुम्हारे वशमें आ रहा है। वहबड़ी भयानक आवाजमें चीत्कार कर रहा है। उसकी भारी चिल्लाहट अब सुनायी देने लगीहै ।। १८ ।।

नूनं मुक्तो वज्रभृता स नागो भ्रष्टो नाकान्मन्त्रविस्रस्तकायः ।

घूर्णन्नाकाशे नष्टसंज्ञोऽभ्युपैति तीव्रान् निःश्वासान् निःश्वसन् पन्नगेन्द्रः ।। १९ ।

निश्चय ही इन्द्रने उस नागराज तक्षकको त्याग दिया है। उसका विशाल शरीर मन्त्रद्वाराआकृष्ट होकर स्वर्गलोकसे नीचे गिर पड़ा है। वह आकाशमें चक्कर काटता अपनी सुध-बुधखो चुका है और बड़े वेगसे लम्बी साँसें छोड़ता हुआ अग्निकुण्डके समीप आ रहाहै ।। १९ ।।

सौतिरुवाच

पतिष्यमाणे नागेन्द्रे तक्षके जातवेदसि ।

इदमन्तरमित्येव तदाऽऽस्तीकोऽभ्यचोदयत् ।। २० ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! नागराज तक्षक अब कुछ ही क्षणोंमें आगकीज्वालामें गिरनेवाला था। उस समय आस्तीकने यह सोचकर कि ‘यही वर माँगनेका अच्छाअवसर है’ राजाको वर देनेके लिये प्रेरित किया।। २० ।।

आस्तीक उवाच

वरं ददासि चेन्मह्यं वृणोमि जनमेजय ।

सत्रं ते विरमत्वेतन्न पतेयुरिहोरगाः ।। २१ ।

आस्तीकने कहा-राजा जनमेजय! यदि तुम मुझे वर देना चाहते हो तो सुनो, मैंमाँगता हूँ कि तुम्हारा यह यज्ञ बंद हो जाय और अब इसमें सर्प न गिरने पावें ।। २१ ।।

एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मन् पारिक्षितस्तु सः ।

नातिहृष्टमनाश्चेदमास्तीकं वाक्यमब्रवीत् ।। २२ ।।

ब्रह्मन्! आस्तीकके ऐसा कहनेपर वे परीक्षित्-कुमार जनमेजय खिन्नचित्त होकर बोले।। २२ ।।

सुवर्णं रजतं गाश्च यच्चान्यन्मन्यसे विभो ।

तत् ते दद्यां वरं विप्र न निवर्तेत् क्रतुर्मम् । २३ ।।

‘विप्रवर! आप सोना, चाँदी, गौ तथा अन्य अभीष्ट वस्तुओंको, जिन्हें आप ठीकसमझते हों, माँग लें। प्रभो! वह मुँहमाँगा वर मैं आपको दे सकता हूँ, किंतु मेरा यह यज्ञ बंदनहीं होना चाहिये’ ।। २३ ।।

आस्तीक उवाच

सुवर्णं रजतं गाश्च न त्वां राजन् वृणोम्यहम् ।

सत्रं ते विरमत्वेतत् स्वस्ति मातृकुलस्य नः ।। २४ ।।

आस्तीकने कहा-राजन्! मैं तुमसे सोना, चाँदी और गौएँ नहीं माँगूँगा, मेरी यही इच्छा है कि तुम्हारा यह यज्ञ बंद हो जाय, जिससे मेरी माताके कुलका कल्याणहो ।। २४ ।।

सौतिरुवाचआस्तीकेनैवमुक्तस्तु राजा पारिक्षितस्तदा ।

पुनः पुनरुवाचेदमास्तीकं वदतां वरः ।। २५ ।।

अन्यं वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोक्तम ।

अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन ।। २६ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-भृगुनन्दन शौनक! आस्तीकके ऐसा कहनेपर उस समयवक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजयने उनसे बार-बार अनुरोध किया- ‘विप्रशिरोमणे! आपकाकल्याण हो, कोई दूसरा वर माँगिये।’ किंतु आस्तीकने दूसरा कोई वर नहींमाँगा ।। २५-२६ ।।

ततो वेदविदस्तात सदस्याः सर्व एव तम् ।

राजानमूचुः सहिता लभतां ब्राह्मणो वरम् ।। २७ ।।

तब सम्पूर्ण वेदवेत्ता सभासदोंने एक साथ संगठित होकर राजासे कहा- ‘ब्राह्मणको(स्वीकार किया हुआ) वर मिलना ही चाहिये’ ।। २७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकवरप्रदानं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीकको वरप्रदान नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५६ ।।

सप्तपञ्चाशक्तमोऽध्यायः

सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम

शौनक उवाच

ये सर्पाः सर्पसत्रेऽस्मिन् पतिता हव्यवाहने ।

तेषां नामानि सर्वेषां श्रोतुमिच्छामि सूतज ।। १ ।।

शौनकजीने पूछा-सूतनन्दन! इस सर्पसत्रकी धधकती हुई आगमें जो-जो सर्प गिरेथे, उन सबके नाम मैं सुनना चाहता हूँ ।। १ ।।

सौतिरुवाच

सहस्राणि बहून्यस्मिन् प्रयुतान्यर्बुदानि च ।

न शक्यं परिसंख्यातुं बहुत्वाद् द्विजसत्तम ।। २ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-द्विजश्रेष्ठ! इस यज्ञमें सहस्रों, लाखों एवं अरबों सर्प गिरे थे ,उनकी संख्या बहुत होनेके कारण गणना नहीं की जा सकती ।। २ ।।

यथास्मृति तु नामानि पन्नगानां निबोध मे ।

उच्यमानानि मुख्यानां हुतानां जातवेदसि ।। ३ ।।

परंतु सर्पयज्ञकी अग्निमें जिन प्रधान-प्रधान नागोंकी आहुति दी गयी थी, उन सबकेनाम अपनी स्मृतिके अनुसार बता रहा हूँ, सुनो ।। ३ ।।

वासुकेः कुलजातांस्तु प्राधान्येन निबोध मे ।

नीलरक्तान् सितान् घोरान् महाकायान् विषोल्बणान् ।। ४ ।।

पहले वासुकिके कुलमें उत्पन्न हुए मुख्य-मुख्य सर्पोंके नाम सुनो-वे सब-के सबनीले, लाल, सफेद और भयानक थे। उनके शरीर विशाल और विष अत्यन्त भयंकरथे ।। ४ ।।

अवशान् मातृवाग्दण्डपीडिताम् कृपणान् हुतान् ।

कोटिशो मानसः पूर्णः शलः पालो हलीमकः ।। ५ ।।

पिच्छलः कौणपश्चक्रः कालवेगः प्रकालनः ।

हिरण्यबाहुः शरणः कक्षकः कालदन्तकः ।। ६ ।।

वे बेचारे सर्प माताके शापसे पीड़ित हो विवशतापूर्वक सर्पयज्ञकी आगमें होम दिये गयेथे। उनके नाम इस प्रकार हैं-कोटिश, मानस, पूर्ण, शल, पाल, हलीमक, पिच्छल, कौणप,चक्र, कालवेग, प्रकालन, हिरण्यबाहु, शरण, कक्षक और कालदन्तक ।। ५-६ ।।

एते वासुकिजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहने ।

अन्ये च बहवो विप्र तथा वै कुलसम्भवाः ।

प्रदीप्ताग्नौ हुताः सर्वे घोररूपा महाबलाः ।। ७ ।।

ये वासुकिके वंशज नाग थे, जिन्हें अग्निमें प्रवेश करना पड़ा। विप्रवर! ऐसे ही दूसरेभी बहुत-से महाबली और भयंकर सर्प थे, जो उसी कुलमें उत्पन्न हुए थे। वे सब-के-सबसर्पसत्रकी प्रज्वलित अग्निमें आहुति बन गये थे ।। ७ ।।B.K.Mira

आस्तीकने तक्षकको अग्निकुण्डमें गिरनेसे रोक दियातक्षकस्य कुले जातान् प्रवक्ष्यामि निबोध तान् ।

पुच्छाण्डको मण्डलकः पिण्डसेतक्ता रभेणकः ।। ८ ।।

उच्छिखः शरभो भङ्गो बिल्वतेजा विरोहणः ।

शिली शलकरो मूकः सुकुमारः प्रवेपनः ।। ९ ।।

मुद्गरः शिशुरोमा च सुरोमा च महाहनुः ।

एते तक्षकजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहनम् ।। १० ।।

अब तक्षकके कुलमें उत्पन्न नागोंका वर्णन करूँगा, उनके नाम सुनो-पुच्छाण्डक,मण्डलक, पिण्डसेक्ता, रभेणक, उच्छिख, शरभ, भंग, बिल्वतेजा विरोहण, शिली,शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेपन, मुद्गर, शिशुरोमा, सुरोमा और महाहनु-ये तक्षककेवंशज नाग थे, जो सर्पसत्रकी आगमें समा गये ।। ८-१० ।।

पारावतः पारिजातः पाण्डरो हरिणः कृशः ।

विहङ्गः शरभो मेदः प्रमोदः संहतापनः ।। ११ ।।

पारावत, पारिजात, पाण्डर, हरिण, कृश, विहंग, शरभ, मेद, प्रमोद और संहतापन-येऐरावतके कुलसे आकर आगमें आहुति बन गये थे ।। ११ ।।

ऐरावतकुलादेते प्रविष्टा हव्यवाहनम् ।

कौरव्यकुलजान् नागाञ्छृणु मे त्वं द्विजोत्तम । १२ ।।

द्विजश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे कौरव्यके कुलमें उत्पन्न हुए नागोंके नाम सुनो ।। १२ ।।

एरकः कुण्डलो वेणी वेणीस्कन्धः कुमारकः ।

बाहुकः शृंगवेरश्च धूर्तकः प्रातरातकौ ।। १३ ।।

एरक, कुण्डल, वेणी, वेणीस्कन्ध, कुमारक, बाहुक, शृंगवेर, धूर्तक, प्रातर और आतक-ये कौरव्य-कुलके नाग यज्ञाग्निमें जल मरे थे ।। १३३ ।।

कौरव्यकुलजास्त्वेते प्रविष्टा हव्यवाहनम् ।

धृतराष्ट्रकुले जाताञ्छृणु नागान् यथातथम् ।। १४ ।।

कीर्त्यमानान् मया ब्रह्मन् वातवेगान् विषोल्बणान् ।

शङ्कुकर्णः पिठरकः कुठारमुखसेचकौ ।। १५ ।।

पूर्णाङ्गदः पूर्णमुखः प्रहासः शकुनिर्दरिः ।

अमाहठः कामठकः सुषेणो मानसोऽव्ययः ।। १६ ।।

भैरवो मुण्डवेदाङ्गः पिशङ्गश्चोद्रपारकः ।

ऋषभो वेगवान् नागः पिण्डारकमहाहनू ।। १७ ।।

रक्ताङ्गः सर्वसारङ्गः समृद्धपटवासकौ ।

वराहको वीरणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः ।। १८ ।।

पराशरस्तरुणको मणिः स्कन्धस्तथारुणिः।

इति नागा मया ब्रह्मन् कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः ।। १९ ।।

प्राधान्येन बहुत्वात् तु न सर्वे परिकीर्तिताः ।

एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः ॥ २० ।।

न शक्यं परिसंख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः ।

त्रिशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च दशशीर्षास्तथापरे ।॥ २१ ॥

ब्रह्मन्! अब धृतराष्ट्रके कुलमें उत्पन्न नागोंके नामोंका मुझसे यथावत् वर्णन सुनो। वेवायुके समान वेगशाली और अत्यन्त विषैले थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं – ) शंकुकर्ण,पिठरक, कुठार, मुखसेचक, पूर्णांगद, पूर्णमुख, प्रहास, शकुनि, दरि, अमाहठ, कामठक,सुषेण, मानस, अव्यय, भैरव, मुण्डवेदांग, पिशंग, उद्रपारक, ऋषभ, वेगवान् नाग,पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारंग, समृद्ध, पटवासक, वराहक, वीरणक, सुचित्र,चित्रवेगिक, पराशर, तरुणक, मणि, स्कन्ध और आरुणि- (ये सभी धृतराष्ट्रवंशी नागसर्पसत्रकी आगमें जलकर भस्म हो गये थे। ) ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने अपने कुलकी कीर्तिबढ़ानेवाले मुख्य-मुख्य नागोंका वर्णन किया है। उनकी संख्या बहुत है, इसलिये सबकानामोल्लेख नहीं किया गया है। इन सबकी संतानोंकी और संतानोंकी संततिकी, जोप्रज्वलित अग्निरमें जल मरी थीं, गणना नहीं की जा सकती। किसीके तीन सिर थे तोकिसीके सात तथा कितने ही दस-दस सिरवाले नाग थे ।। १४-२१ ।।

कालानलविषा घोरा हुताः शतसहस्रशः ।

महाकाया महावेगाः शैलशृङ्गसमुच्छ्रयाः ।। २२ ।।

उनके विष प्रलयाग्निके समान दाहक थे। वे नाग बड़े ही भयंकर थे। उनके शरीरविशाल और वेग महान् थे। वे ऊँचे तो ऐसे थे, मानो पर्वतके शिखर हों। ऐसे नाग लाखोंकीसंख्यामें यज्ञाग्निकी आहुति बन गये ।। २२ ।।

योजनायामविस्तारा द्वियोजनसमायताः ।

कामरूपाः कामबला दीप्तानलविषोल्बणाः ।। २३ ।।

दग्धास्तत्र महासत्रे ब्रह्मदण्डनिपीडिताः ।। २४ ।।

उनकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक, दो-दो योजनतककी थी। वे इच्छानुसार रूप धारणकरनेवाले तथा इच्छानुरूप बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे सब-के-सब धधकती हुई आगकेसमान भयंकर विषसे भरे थे। माताके शापरूपी ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण वे उसमहासत्रमें जलकर भस्म हो गये ।। २३-२४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पनामकथने सप्तपञ्चाशक्तमोऽध्यायः ।। ५७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पनामकथनविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५७ ।।

अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना

सौतिरुवाच

इदमत्यद्भुतं चान्यदास्तीकस्यानुशुश्रुम ।

तथा वरैश्छन्द्यामाने राज्ञा पारिक्षितेन हि ।॥ १ ।।

इन्द्रहस्ताच्च्युतो नागः ख एव यदतिष्ठत।

ततश्चिन्तापरो राजा बभूव जनमेजयः ।। २ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! आस्तीकके सम्बन्धमें यह एक और अद्भुत बात मैंनेसुन रखी है कि जब राजा जनमेजयने उनसे पूर्वोक्त रूपसे वर माँगनेका अनुरोध कियाऔर उनके वर माँगनेपर इन्द्रके हाथसे छूटकर गिरा हुआ तक्षक नाग आकाशमें ही ठहरगया, तब महाराज जनमेजयको बड़ी चिन्ता हुई ।। १-२ ।।

हूयमाने भृशं दीप्ते विधिवद् वसुरेतसि ।

न स्म स प्रापतद् वह्नौ तक्षको भयपीडितः ।। ३ ।।

क्योंकि अग्नि पूर्णरूपसे प्रज्वलित थी और उसमें विधिपूर्वक आहुतियाँ दी जा रही थींतो भी भयसे पीड़ित तक्षक नाग उस अग्निमें नहीं गिरा ।। ३ ।।

शौनक उवाच

किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रग्रामो मनीषिणाम्।

न प्रत्यभात् तदाग्नौ यत् स पपात न तक्षकः ।। ४ ।।

शौनकजीने पूछा-सूत! उस यज्ञमें बड़े-बड़े मनीषी ब्राह्मण उपस्थित थे। क्या उन्हेंऐसे मन्त्र नहीं सूझे, जिनसे तक्षक शीघ्र अग्निमें आ गिरे? क्या कारण था जो तक्षकअग्निकुण्डमें न गिरा? ।। ४ ।।

सौतिरुवाच

तमिन्द्रहस्ताद् वित्रस्तं विसंज्ञं पन्नगोत्तमम् ।

आस्तीकस्तिष्ठ तिष्ठेति वाचस्तिस्रोऽभ्युदैरयत् ।। ५ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-शौनक! इन्द्रके हाथसे छूटनेपर नागप्रवर तक्षक भयसे थर्राउठा। उसकी चेतना लुप्त हो गयी। उस समय आस्तीकने उसे लक्ष्य करके तीन बार इसप्रकार कहा-‘ठहर जा, ठहर जा, ठहर जा’ ।। ५ ।।

वितस्थे सोऽन्तरिक्षे च हृदयेन विदूयता ।

यथा तिष्ठति वै कश्चित् खं च गां चान्तरा नरः ।। ६ ।।

तब तक्षक पीड़ित हृदयसे आकाशमें उसी प्रकार ठहर गया, जैसे कोई मनुष्य आकाशऔर पृथ्वीके बीचमें लटक रहा हो ।। ६ ।।

ततो राजाब्रवीद् वाक्यं सदस्यैश्चोदितो भृशम् ।

काममेतद् भवत्वेवं यथाऽऽस्तीकस्य भाषितम् ।। ७ ।।

तदनन्तर सभासदोंके बार-बार प्रेरित करनेपर राजा जनमेजयने यह बात कही- ‘ अच्छा , आस्तीकने जैसा कहा है, वही हो ।। ७ ।।

समाप्यतामिदं कर्म पन्नगाः सन्त्वनामयाः ।

प्रीयतामयमास्तीकः सत्यं सूतवचोऽस्तु तत् ।। ८ ।।

‘यह यज्ञकर्म समाप्त किया जाय। नागगण कुशलपूर्वक रहें और ये आस्तीक प्रसन्नहों। साथ ही सूतजीकी कही हुई बात भी सत्य हो’ ।। ८ ।।

ततो हलहलाशब्दः प्रीतिदः समजायत ।

आस्तीकस्य वरे दत्ते तथैवोपरराम च ।। ९ ।।

स यज्ञः पाण्डवेयस्य राज्ञः पारिक्षितस्य ह ।

प्रीतिमांश्चाभवद् राजा भारतो जनमेजयः ।। १० ।।

जनमेजयके द्वारा आस्तीकको यह वरदान प्राप्त होते ही सब ओर प्रसन्नता बढ़ानेवालीहर्षध्वनि छा गयी और पाण्डववंशी महाराज जनमेजयका वह यज्ञ बंद हो गया। ब्राह्मणकोवर देकर भरतवंशी राजा जनमेजयको भी प्रसन्नता हुई ।। ९-१० ।।

ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो ये तत्रासन् समागताः ।

तेभ्यश्च प्रददौ वित्तं शतशोऽथ सहस्रशः ।| ११ ।।

उस यज्ञमें जो ऋत्विज् और सदस्य पधारे थे, उन सबको राजा जनमेजयने सैकड़ोंऔर सहस्रोंकी संख्यामें धन-दान किया।। ११ ।।

लोहिताक्षाय सूताय तथा स्थपतये विभुः ।

येनोक्तं तस्य तत्राग्रे सर्पसत्रनिवर्तने ।। १२ ।।

निमित्तं ब्राह्मण इति तस्मै वित्तं ददौ बहु ।

दत्त्वा द्रव्यं यथान्यायं भोजनाच्छादनान्वितम् ।। १३ ।।

प्रीतस्तस्मै नरपतिरप्रमेयपराक्रमः ।

ततश्चकारावभृथं विधिदृष्टेन कर्मणा ।। १४ ।।

लोहिताक्ष, सूत तथा शिल्पीको, जिसने यज्ञके पहले ही बता दिया था कि इससर्पसत्रको बंद करनेमें एक ब्राह्मण निमित्त बनेगा, प्रभावशाली राजा जनमेजयने बहुत धनदिया। जिनके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, उन नरेश्वर जनमेजयने प्रसन्न होकरयथायोग्य द्रव्य और भोजन-वस्त्र आदिका दान करनेके पश्चात् शास्त्रीय विधिके अनुसारअवभृथ-स्नान किया ।। १२-१४ ।।

आस्तीकं प्रेषयामास गृहानेव सुसंस्कृतम् ।

राजा प्रीतमनाः प्रीतं कृतकृत्यं मनीषिणम् । । १५ ।।

पुनरागमनं कार्यमिति चैनं वचोऽब्रवीत् ।

भविष्यसि सदस्यो मे वाजिमेधे महाक्रतौ ।। १६ ।।

आस्तीक शुभ-संस्कारोंसे सम्पन्न और मनीषी विद्वान् थे। अपना कर्तव्य पूर्ण करलेनेके कारण वे कृतकृत्य एवं प्रसन्न थे। राजा जनमेजयने उन्हें प्रसन्नचित्त होकर घरकेलिये विदा दी और कहा-‘ब्रह्मन्! मेरे भावी अश्वमेध नामक महायज्ञमें आप सदस्य होंऔर उस समय पुनः पधारनेकी कृपा करें ।। १५-१६ ।।

तथेत्युक्त्वा प्रदुद्राव तदाऽऽस्तीको मुदा युतः ।

कृत्वा स्वकार्यमतुलं तोषयित्वा च पार्थिवम् ।। १७ ।।

आस्तीकने प्रसन्नतापूर्वक ‘बहुत अच्छा’ कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली औरअपने अनुपम कार्यका साधन करके राजाको संतुष्ट करनेके पश्चात् वहाँसे शीघ्रतापूर्वकप्रस्थान किया ।। १७ ।।

स गत्वा परमप्रीतो मातुलं मातरं च ताम् ।

अभिगम्योपसंगृह्य तथावृत्तं न्यवेदयत् ।। १८ ।

वे अत्यन्त प्रसन्न हो घर जाकर मामा और मातासे मिले और उनके चरणोंमें प्रणामकरके वहाँका सब समाचार सुनाया ।। १८ ।।

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा प्रीयमाणाः समेता ये तत्रासन् पन्नगा वीतमोहाः ।

आस्तीके वै प्रीतिमन्तो बभूवु- रूचुश्चैनं वरमिष्टं वृणीष्व ।। १९ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! सर्पसत्रसे बचे हुए जो-जो नाग मोहरहित हो उससमय वासुकि नागके यहाँ उपस्थित थे, वे सब आस्तीकके मुखसे उस यज्ञके बंद होनेकासमाचार सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। आस्तीकपर उनका प्रेम बहुत बढ़ गया और वे उनसे बोले- ‘ वत्स! तुम कोई अभीष्ट वर माँग लो’ ।। १९ ।।

भूयो भूयः सर्वशस्तेऽब्रुवंस्तं किं ते प्रियं करवामाद्य विद्वन् ।

प्रीता वयं मोक्षिताश्चैव सर्वे कामं किं ते करवामाद्य वत्स ।। २० ।।

वे सब-के-सब बार-बार यह कहने लगे-‘विद्वान्! आज हम तुम्हारा कौन-सा प्रियकार्य करें? वत्स! तुमने हमें मृत्युके मुखसे बचाया है; अतः हम सब लोग तुमसे बहुत प्रसन्नहैं। बोलो, तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करें?’ ।। २० ।।

आस्तीक उवाच

सायं प्रात्ये प्रसन्नात्मरूपा लोके विप्रा मानवा ये परेऽपि ।

धर्माख्यानं ये पठेयुर्मेदं तेषां युष्मन्नैव किंचिद् भयं स्यात् ।। २१ ।।

आस्तीकने कहा-नागगण! लोकमें जो ब्राह्मण अथवा कोई दूसरा मनुष्य प्रसन्नचित्तहोकर मेरे इस धर्ममय उपाख्यानका पाठ करे, उसे आपलोगोंसे कोई भय न हो ।। २१ ।।

तैश्चाप्युक्तो भागिनेयः प्रसन्नै-रेतत् सत्यं काममेवं वरं ते ।

प्रीत्या युक्ताः कामितं सर्वशस्ते कर्तारः स्म प्रवणा भागिनेय ।। २२।

यह सुनकर सभी सर्प बहुत प्रसन्न हुए और अपने भानजेसे बोले-‘प्रिय वत्स! तुम्हारीयह कामना पूर्ण हो। भगिनीपुत्र! हम बड़े प्रेम और नम्रतासे युक्त होकर सर्वथा तुम्हारे इसमनोरथको पूर्ण करते रहेंगे ।। २२ ।।

असितं चा्तिमन्तं च सुनीथं चापि यः स्मरेत् ।

दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्य सर्पभयं भवेत् ।। २३ ।।

‘जो कोई असित, आर्तिमान् और सुनीथ मन्त्रका दिन अथवा रातके समय स्मरणकरेगा, उसे सर्पोंसे कोई भय नहीं होगा ।। २३ ।।

यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारौ महायशाः ।

आस्तीकः सर्पसत्रे वः पन्नगान् योऽभ्यरक्षत ।

तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ ।। २४ ।।

(मन्त्र और उनके भाव इस प्रकार हैं-) जरत्कारु ऋषिसे जरत्कारु नामकनागकन्यासे जो आस्तीक नामक यशस्वी ऋषि उत्पन्न हुए तथा जिन्होंने सर्पसत्रमें तुमसर्पोंकी रक्षा की थी, उनका मैं स्मरण कर रहा हूँ। महाभाग्यवान् सर्पो! तुमलोग मुझे मतडँसो ।। २४ ।।

सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष ।

जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर ।। २५ ।।

‘महाविषधर सर्प! तुम भाग जाओ! तुम्हारा कल्याण हो! अब तुम जाओ। जनमेजयकेयज्ञकी समाप्तिमें आस्तीकको तुमने जो वचन दिया था, उसका स्मरण करो ।। २५ ।।

आस्तीकस्य वचः श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते ।

शतधा भिद्यते मूर्ध्नि शिंशवृक्षफलं यथा ।। २६ ।।

‘जो सर्प आस्तीकके वचनकी शपथ सुनकर भी नहीं लौटेगा, उसके फनके शीशमकेफलके समान सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे’ ।। २६ ।।

सौतिरुवाच

स एवमुक्तस्तु तदा द्विजेन्द्रःसमागतैस्तैर्भुजगेन्द्रमुख्यैः ।

सम्प्राप्य प्रीतिं विपुलां महात्मा ततो मनो गमनायाथ दध्रे ।। २७ ।।

मोक्षयित्वा तु भुजगान् सर्पसत्राद् द्विजोत्तमः ।

जगाम काले धर्मात्मा दिष्टान्तं पुत्रपौत्रवान् ।। २८ ।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-विप्रवर शौनक! उस समय वहाँ आये हुए प्रधान-प्रधाननागराजोंके इस प्रकार कहनेपर महात्मा आस्तीकको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई । तदनन्तरउन्होंने वहाँसे चले जानेका विचार किया। इस प्रकार सर्पसत्रसे नागोंका उद्धार करकेद्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा आस्तीकने विवाह करके पुत्र पौत्रादि उत्पन्न किये और समय आनेपर(प्रारब्ध शेष होनेसे) मोक्ष प्राप्त कर लिया ।। २७-२८ ।।

इत्याख्यानं मयाऽऽस्तीकं यथावत् तव कीर्तितम् ।

यत् कीर्तयित्वा सर्पेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ।। २९ ॥

इस प्रकार मैंने आपसे आस्तीकके उपाख्यानका यथावत् वर्णन किया है; जिसका पाठकर लेनेपर कहीं भी सर्पोंसे भय नहीं होता ।। २९ ।।

यथा कथितवान् ब्रह्मन् प्रमतिः पूर्वजस्तव ।

रुरवे प्रीतः पृच्छते भार्गवोत्तम ।। ३० ।।

पुत्राययद् वाक्यं श्रुतवांश्चाहं तथा च कथितं मया ।

आस्तीकस्य कवेर्विप्र श्रीमच्चरितमादितः ।। ३१ ।।

ब्रह्मन्! भृगुवंशशिरोमणे! आपके पूर्वज प्रमतिने अपने पुत्र रुरुके पूछनेपर जिस प्रकारआस्तीकोपाख्यान कहा था और जिसे मैंने भी सुना था, उसी प्रकार विद्वान् महात्माआस्तीकके मंगलमय चरित्रका मैंने प्रारम्भसे ही वर्णन किया है ।। ३०-३१ ।।

श्रुत्वा धर्मिष्ठमाख्यानमास्तीकं पुण्यवर्धनम् ।

यन्मां त्वं पृष्टवान् ब्रह्मञ्छुत्वा डुण्डुभभाषितम् ।

व्येतु ते सुमहद् ब्रह्मन् कौतूहलमरिन्दम ।। ३२ ।।

आस्तीकका यह धर्ममय उपाख्यान पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। काम-क्रोधादिशत्रुओंका दमन करनेवाले ब्राह्मण! कथाप्रसंगमें डुण्डुभकी बात सुनकर आपने मुझसेजिसके विषयमें पूछा था, वह सब उपाख्यान मैंने कह सुनाया| इसे सुनकर आपके मनकामहान् कौतूहल अब निवृत्त हो जाना चाहिये ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।५८।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रविषयक अट्ठावनवाँ

अध्याय पूरा हुआ ।। ५८ ।।(अंशावतरणपर्व)

एकोनषष्टितमोऽध्यायः

महाभारतका उपक्रम

शौनक उवाच

भृगुवंशात् प्रभृत्येव त्वया मे कीर्तितं ।

महत्आख्यानमखिलं तात सौते प्रीतोऽस्मि तेन ते ।। १ ।।

शौनकजी बोले-तात सूतनन्दन! आपने भृगुवंशसे ही प्रारम्भ करके जो मुझे यहसब महान् उपाख्यान सुनाया है, इससे मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ।। १ ।।

वक्ष्यामि चैव भूयस्त्वां यथावत् सूतनन्दन।

याः कथा व्याससम्पन्नास्ताश्च भूयो विचक्ष्व मे ।। २ ।।

सूतपुत्र! अब मैं पुनः आपसे यह कहना चाहता हूँ कि भगवान् व्यासने जो कथाएँ कहीहैं, उनका मुझसे यथावत् वर्णन कीजिये ।। २ ।।

तस्मिन् परमदुष्पारे सर्पसत्रे महात्मनाम् ।

कर्मान्तरेषु यज्ञस्य सदस्यानां तथाध्वरे ।। ३ ।।

या बभूवुः कथाश्चित्रा येष्वर्थेषु यथातथम् ।

त्वत्त इच्छामहे श्रोतुं सौते त्वं वै प्रचक्ष्व नः ।। ४ ।।

जिसका पार होना कठिन था, ऐसे सर्पयज्ञमें आये हुए महात्माओं एवं सभासदोंकोजब यज्ञकर्मसे अवकाश मिलता था, उस समय उनमें जिन-जिन विषयोंको लेकर जो-जोविचित्र कथाएँ होती थीं उन सबका आपके मुखसे हम यथार्थ वर्णन सुनना चाहते हैं।सूतनन्दन! आप हमसे अवश्य कहें ।। ३-४ ।।

सौतिरुवाच

कर्मान्तरेष्वकथयन् द्विजा वेदाश्रयाः कथाः ।

व्यासस्त्वकथयच्चित्रमाख्यानं भारतं महत् ।। ५ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-शौनक! यज्ञकर्मसे अवकाश मिलनेपर अन्य ब्राहम्मण तो वेदोंकीकथाएँ कहते थे, परंतु व्यासदेवजी अति विचित्र महाभारतकी कथा सुनाया करतेथे ।। ५ ।।

शौनक उवाचमहाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम् ।

जनमेजयेन पृष्टः सन् कृष्णद्वैपायनस्तदा ।। ६ ।।

श्रावयामास विधिवत् तदा कर्मान्तरे तु सः ।

तामहं विधिवत् पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम् ।। ७ ।।

शौनकजी बोले-सूतनन्दन! महाभारत नामक इतिहास तो पाण्डवोंके यशका विस्तार करनेवाला है। सर्पयज्ञके विभिन्न कर्मोके बीचमें अवकाश मिलने पर जब राजा जनमेजय प्रश्न करते, तब श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी उन्हें विधिपूर्वक महाभारतकी कथा सुनाते थे। मैं उसी पुण्यमयी कथाको विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ।। ६-७ ।।

मनःसागरसम्भूतां महर्षेर्भावितात्मनः ।

कथयस्व सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम् ।। ८।।

यह कथा पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि वेद-व्यासके हृदयरूपी समुद्रसे प्रकट हुए सब प्रकारके शुभ विचाररूपी रत्नोंसे परिपूर्ण है । साधुशिरोमणे! आप इस कथाको मुझेसुनाइये ।। ८ ।।

सौतिरुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।

कृष्णद्वैपायनमतं महाभारतमादितः ।। ९ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-शौनक! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ महाभारत नामक उत्तमउपाख्यानका आरम्भसे ही वर्णन करूगा, जो श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासको अभिमतहै ।। ९ ।।

शृणु सर्वमशेषेण कथ्यमानं मया द्विज ।

शंसितुं तन्महान् हर्षों ममापीह प्रवर्तते ।। १० ।।

विप्रवर! मेरे द्वारा कही जानेवाली इस सम्पूर्ण महाभारत-कथाको आप पूर्णरूपसेसुनिये। यह कथा सुनाते समय मुझे भी महान् हर्ष प्राप्त होता है ।। १० ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ।। ५९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५९ ।।

षष्टितमोऽध्यायः

जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथाराजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना

सौतिरुवाच

श्रुत्वा तु सर्पसत्राय दीक्षितं जनमेजयम् ।

अभ्यगच्छदृषिर्विद्वान् कृष्णद्वैपायनस्तदा ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! जब विद्वान् महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनने यह सुना किराजा जनमेजय सर्पयज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं, तब वे वहाँ आये ।। १ ।।

जनयामास यं काली शक्तेः पुत्रात् पराशरात् ।

कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ।। २ ।।

वेदव्यासजीको सत्यवतीने कन्यावस्थामें ही शक्तिनन्दन पराशरजीसे यमुनाजीकेद्वीपमें उत्पन्न किया था। वे पाण्डवोंके पितामह हैं ।। २ ।।

जातमात्रश्च यः सद्य इष्ट्या देहमवीवृधत् ।

वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ।। ३ ।।

यन्नैति तपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च ।

न व्रतैर्नोपवासैश्च न प्रशान्त्या न मन्युना ।। ४ ।।

जन्म लेते ही उन्होंने अपनी इच्छासे शरीरको बढ़ा लिया तथा उन महायशस्वीव्यासजीको (स्वतः ही) अंगों और इतिहासोंसहित सम्पूर्ण वेदों और उस परमात्मत्त्वकाज्ञान प्राप्त हो गया, जिसे कोई तपस्या, वेदाध्ययन, व्रत, उपवास, शम और यज्ञ आदिकेद्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ।। ३-४ ।।

विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः ।

परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रत शुचि: ।। ५ ।।

वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे और उन्होंने एक ही वेदको चार भागोंमें विभक्त किया था ।ब्रह्मर्षि व्यासजी परब्रह्म और अपरब्रह्मके ज्ञाता, कवि (त्रिकालदर्शी), सत्यव्रतपरायण तथापरम पवित्र हैं ।। ५ ।।

यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं च विदुरं चाप्यजीजनत् ।

शान्तनोः संततिं तन्वन् पुण्यकीर्तिर्महायशाः ॥ ६ ॥

उनकी कीर्ति पुण्यमयी है और वे महान् यशस्वी हैं। उन्होंने ही शान्तनुकी संतान-परम्पराका विस्तार करनेके लिये पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा विदुरको जन्म दिया था।। ६ ।।

जनमेजयस्य राजर्षेः स महात्मा सदस्तदा ।

विवेश सहितः शिष्यैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ।। ७।।

उन महात्मा व्यासने वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् शिष्योंके साथ उस समय राजर्षेजनमेजयके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ।। ७ ।।

तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजयम् ।

वृतं सदस्यैर्बहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ।। ८ ।।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने सिंहासनपर बैठे हुए राजा जनमेजयको देखा , जो बहुत सेसभासदोंद्वारा इस प्रकार घिरे हुए थे, मानो देवराज इन्द्र देवताओंसे घिरे हुए हों ।। ८ ।।

तथा मूर्धाभिषित्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः ।

ऋत्विग्भि्ब्रह्मकल्पैश्च कुशलैर्यज्ञसंस्तरे ।। ९।।

जिनके मस्तकोंपर अभिषेक किया गया था, ऐसे अनेक जनपदोंके नरेश तथायज्ञानुष्ठानमें कुशल ब्रह्माजीके समान योग्यतावाले ऋत्विज् भी उन्हें सब ओरसे घेरे हुएथे ।। ९ ।।

जनमेजयस्तु राजर्षिर्षट्वा तमृषिमागतम् ।

सगणोऽभ्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ।। १० ।।

भरतश्रेष्ठ राजर्षि जनमेजय महर्षि व्यासको आया देख बड़ी प्रसन्नताके साथ उठकरखड़े हो गये और अपने सेवकगणोंके साथ तुरंत ही उनकी अगवानी करनेके लिये चलदिये ।। १० ।।

काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमतः प्रभुः।

आसनं कल्पयामास यथा शक्रो बृहस्पतेः ।। ११ ।।

जैसे इन्द्र बृहस्पतिजीको आसन देते हैं, उसी प्रकार राजाने सदस्योंकी अनुमति लेकरव्यासजीके लिये सुवर्णका विष्टर दे आसनकी व्यवस्था की ।। ११ ।।

तत्रोपविष्टं वरदं देवर्षिगणपूजितम् ।

पूजयामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।। १२ ।।

देवर्षियोंद्वारा पूजित वरदायक व्यासजी जब वहाँ बैठ गये, तब राजेन्द्र जनमेजयनेशास्त्रीय विधिके अनुसार उनका पूजन किया ।। १२ ।।

पाद्यमाचमनीयं च अर्घ्यं गां च विधानतः ।

पितामहाय कृष्णाय तदह्हाय न्यवेदयत् ।। १३ ।।

उन्होंने अपने पितामह श्रीकृष्णद्वैपायनको विधि- विधानके साथ पाद्य, आचमनीय,अर्घ्य और गौ भेंट की, जो इन वस्तुओंको पानेके अधिकारी थे ।। १३ ।।

प्रतिगृह्य तु तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजयात् ।

गां चैव समनुज्ञाप्य व्यासः प्रीतोऽभवत् तदा ।। १४ ।।

पाण्डववंशी जनमेजयसे वह पूजा ग्रहण करके गौके सम्बन्धरमें अपना आदर व्यक्तकरते व्यासजी उस समय बड़े प्रसन्न हुए ।। १४ ।।

हुएतथा च पूजयित्वा तं प्रणयात् प्रपितामहम् ।

उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपूच्छदनामयम् ।॥ १५ ।।

पितामह व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन करके जनमेजयका चित्त प्रसन्न हो गया और वेउनके पास बैठकर कुशल-मंगल पूछने लगे ।। १५ ।।

भगवानपि तं दृष्ट्वा कुशलं प्रतिवेद्य च ।

सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यान् प्रत्यपूजयत् ।। १६ ।।

भगवान् व्यासने भी जनमेजयकी ओर देखकर अपना कुशल-समाचार बताया तथाअन्य सभासदोंद्वारा सम्मानित हो उनका भी सम्मान किया।। १६ ।।

ततस्तु सहितः सर्वैः सदस्यैर्जनमेजयः ।

इदं पश्चाद् द्विजश्रेष्ठं पर्यपृच्छत् कृताञ्जलिः ।। १७ ।।

तदनन्तर सब सदस्योंसहित राजा जनमेजयने हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ व्यासजीसे इसप्रकार प्रश्न किया ।। १७ ।।

जनमेजय उवाच

कुरूणां पाण्डवानां च भवान् प्रत्यक्षदर्शिवान् ।

तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ।। १८ ।।

जनमेजयने कहा-ब्रह्मन्! आप कौरवों और पाण्डवोंको प्रत्यक्ष देख चुके हैं; अतःमैं आपके द्वारा वर्णित उनके चरित्रको सुनना चाहता हूँ ।। १८ ।।

कथं समभवद् भेदस्तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।

तच्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ।। १९ ।।

वे तो राग-द्वेष आदि दोषोंसे रहित सत्कर्म करनेवाले थे, उनमें भेद-बुद्धि कैसे उत्पन्नहुई? तथा प्राणियोंका अन्त करनेवाला उनका वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ? ।। १९ ।।

पितामहानां सर्वेषां दैवेनानिष्टचेतसाम् ।कात्स्न््येनैतन्ममाचक्ष्व यथावृत्तं द्विजोत्तम् ।। २० ।।

द्विजश्रेष्ठ! जान पड़ता है, प्रारब्धने ही प्रेरणा करके मेरे सब प्रपितामहोंके मनकोयुद्धरूपी अनिष्टमें लगा दिया था। उनके इस सम्पूर्ण वृत्तान्तका आप यथावत् रूपसे वर्णनकरें ।। २० ।।

सौतिरुवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा ।

शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ।। २१ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-जनमेजयकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने पासही बैठे हुए अपने शिष्य वैशम्पायनको उस समय इस प्रकार आदेश दिया।। २१ ।।

व्यास उवाच

कुरूणां पाण्डवानां च यथा भेदोऽभवत् पुरा ।

तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ।। २२ ।।

व्यासजी बोले-वैशम्पायन! पूर्वकालमें कौरवों और पाण्डवोंमें जिस प्रकार फूट पड़ीथी; जिसे तुम मुझसे सुन चुके हो, वह सब इस समय इन राजा जनमेजयकोसुनाओ ।। २२ ।।

गुरोर्वचनमाज्ञाय स तु विप्रर्षभस्तदा ।

आचचक्षे ततः सर्वमितिहासं पुरातनम् ।। २३ ।।

राज्ञे तस्मै सदस्येभ्यः पार्थिवेभ्यश्च सर्वशः।

भेदं सर्वविनाशं च कुरुपाण्डवयोस्तदा ।। २४ ।।

उस समय गुरुदेव व्यासजीकी यह आज्ञा पाकर विप्रवर वैशम्पायनने राजा जनमेजय,सभासद्गण तथा अन्य सब भूपालोंसे कौरव-पाण्डवोंमें जिस प्रकार फूट पड़ी और उनकासर्वनाश हुआ, वह सब पुरातन इतिहास कहना प्रारम्भ किया ।। २३-२४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे षष्टितमोऽध्यायः ।।६० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६० ।।

एकषष्टितमोऽध्यायः

कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका

सूत्ररूपमें निर्देश

वैशम्पायन उवाच

गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य मनोबुद्धिसमाधिभिः ।

सम्पूज्य च द्विजान् सर्वांस्तथान्यान् विदुषो जनान् ।। १ ।।

महर्षेर्विश्रुतस्येह सर्वलोकेषु धीमतः ।

प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यास्य महात्मनः ।। २ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-राजन्! मैं सबसे पहले श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे अपनेगुरुदेव श्रीव्यासजी महाराजको साष्टांग नमस्कार करके सम्पूर्ण द्विजों तथा अन्यान्यविद्वानोंका समादर करते हुए यहाँ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात महर्षि एवं महात्मा इन परमबुद्धिमान् व्यासजीके मतका पूर्णरूपसे वर्णन करता हूँ ।। १-२ ।।

श्रीतुं पात्रं च राजंस्त्वं प्राप्येमां भारतीं कथाम् ।

गुरोर्वक्त्रपरिस्पन्दो मनः प्रोत्साहतीव मे ।। ३ ।।

जनमेजय! तुम इस महाभारतकी कथाको सुननेके लिये उत्त म पात्र हो और मुझे यहकथा उपलब्ध है तथा श्रीगुरुजीके मुखारविन्दसे मुझे यह आदेश मिल गया है कि मैं तुम्हेंकथा सुनाऊँ, इससे मेरे मनको बड़ा उत्साह प्राप्त होता है ।। ३ ।।

शृणु राजन् यथा भेदः कुरुपाण्डवयोरभूत् ।

राज्यार्थे द्यूतसम्भूतो वनवासस्तथैव च ।। ४ ।।

यथा च युद्धमभवत् पृथिवीक्षयकारकम् ।

तत् तेऽहं कथयिष्यामि पृच्छते भरतर्षभ ।। ५ ।।

राजन्! जिस प्रकार कौरव और पाण्डवोंमें फूट पड़ी, वह प्रसंग सुनो। राज्यके लियेजो जुआ खेला गया,भरतश्रेष्ठ! फिर जिस प्रकार पृथ्वीके वीरोंका विनाश करनेवाला महाभारत-युद्ध हुआ, वहतुम्हारे प्रश्नके अनुसार तुमसे कहता हूँ, सुनो ।। ४-५ ।।

मृते पितरि ते वीरा वनादेत्य स्वमन्दिरम् ।

नचिरादेव विद्वांसो वेदे धनुषि चाभवन् ॥ ६ ।।

अपने पिता महाराज पाण्डुके स्वर्गवासी हो जानेपर वे वीर पाण्डव वनसे अपनेराजभवनमें आकर रहने लगे। वहाँ थोड़े ही दिनोंमें वे वेद तथा धनुर्वेदके पूरे पण्डित होगये ।। ६ ।।

उससे उनमें फूट हुई और उसीके कारण पाण्डवोंका वनवास हुआ।तांस्तथा सत्त्ववीय्यौजः सम्पन्नान् पौरसम्मतान् ।

नामृष्यन् कुरवो दृष्ट्वा पाण्डवाञ्छ्रीयशोभृतः ।। ७ ।।

सत्त्व (धैर्य और उत्साह), वीर्य (पराक्रम) तथा ओज (देहबल)-से सम्पन्न होनेके कारणपाण्डवलोग पुरवासियोंके प्रेम और सम्मानके पात्र थे। उनके धन, सम्पत्ति और यशकीवृद्धि होने लगी। यह सब देखकर कौरव उनके उत्कर्षको सहन न कर सके ।। ७ ।।

ततो दुर्योधनः क्रूरः कर्णश्च सहसौबलः ।

तेषां निग्रहनिर्वासान् विविधांस्ते समारभन् ।। ८ ।।

तब क्रूर दुर्योधन, कर्ण और शकुनि तीनोंने मिलकर पाण्डवोंको वशमें करने या देशसेनिकाल देनेके लिये नाना प्रकारके यत्न आरम्भ किये ।। ८ ।।

ततो दुर्योधनः शूरः कुलिङ्गस्य मते स्थितः ।

पाण्डवान् विविधोपायै राज्यहेतोरपीडयत् ।। ९ ।।

शकुनिकी सम्मतिसे चलनेवाले शूरवीर दुर्योधनने राज्यके लिये भाँति-भाँतिके उपायकरके पाण्डवोंको पीड़ा दी ।। ९ ।।

ददावथ विषं पापो भीमाय धृतराष्ट्रजः ।

जरयामास तद् वीरः सहान्तेन वृकोदरः ।। १० ।।

उस पापी धृतराष्ट्रपुत्रने भीमसेनको विष दे दिया, किंतु वीरवर भीमसेनने भोजनकेसाथ उस विषको भी पचा लिया ।। १० |।

प्रमाणकोट्यां संसुप्तं पुनर्बद्ध्वा वृकोदरम् ।

तोयेषु भीमं गंगायाः प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ।। ११ ।।

फिर दुर्योधनने गंगाके प्रमाणकोटि नामक तीर्थपर सोये हुए भीमसेनको बाँधकरगंगाजीके गहरे जलमें डाल दिया और स्वयं चुपचाप नगरमें लौट आया ।। ११ ।।

यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् ।

उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो गतव्यथः ।। १२ ।।

जब कुन्तीनन्दन महाबाहु भीमकी आँख खुली, तब वे सारा बन्धन तोड़कर बिनाकिसी पीड़ाके उठ खड़े हुए ।। १२ ।।

आशीविषैः कृष्णस्पैः सुप्तं चैनमदंशयत् ।

सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ।। १३ ।।

एक दिन दुर्योधनने भीमसेनको सोते समय उनके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगोंमें काले साँपोंसेडँसवा दिया, किंतु शत्रुघाती भीम मर न सके ।। १३ ।।

तेषां तु विप्रकारेषु तेषु तेषु महामतिः ।

मोक्षणे प्रतिकारे च विदुरोऽवहितोऽभवत् ।। १४ ।।

कौरवोंके द्वारा किये हुए उन सभी अपकारोंके समय पाण्डवोंको उनसे छुड़़ाने अथवाउनका प्रतीकार करनेके लिये परम बुद्धिमान् विदुरजी सदा सावधान रहते थे ।। १४ ।।

स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः ।

पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ।। १५ ।।

जैसे स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले इन्द्र सम्पूर्ण जीव-जगत्को सुख पहुँचाते रहते हैं,उसी प्रकार विदुरजी भी सदा पाण्डवोंको सुख दिया करते थे ।। १५ ।।

यदा तु विविधोपायैः संवृतैर्विवृतैरपि ।

नाशकद् विनिहन्तुं तान् दैवभाव्यर्थरक्षितान् ।। १६ ।।

ततः सम्मन्त्र्य सचिवैर्वृषदुःशासनादिभिः ।

धृतराष्ट्रमनुज्ञाप्य जातुषं गृहमादिशत् ।। १७ ।।

भविष्यमें जो घटना घटित होनेवाली थी, उसके लिये मानो दैव ही पाण्डवोंकी रक्षा कररहा था। जब छिपकर या प्रकटरूपमें किये हुए अनेक उपायोंसे भी दुर्योधन पाण्डवोंकानाश न कर सका, तब उसने कर्ण और दुःशासन आदि मन्त्रियोंसे सलाह करके धृतराष्ट्रकीआज्ञासे वारणावत नगरमें एक लाहका घर बनानेकी आज्ञा दी ।। १६-१७ ।।

सुतप्रियैषी तान् राजा पाण्डवानम्बिकासुतः ।

ततो विवासयामास राज्यभोगबुभुक्षया ।। १८ ।।

अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र अपने पुत्रका प्रिय चाहनेवाले थे अतः उन्होंने राज्यभोगकीइच्छासे पाण्डवोंको हस्तिनापुर छोड़कर वारणावतके लाक्षागृहमें रहनेकी आज्ञा देदी ।। १८ ।।

ते प्रातिष्ठन्त सहिता नगरान्नागसाह्वयात् ।

प्रस्थाने चाभवन्मन्त्री क्षत्ता तेषां महात्मनाम् ।। १९ ।।

मातासहित पाँचों पाण्डव एक साथ हस्तिनापुरसे प्रस्थित हुए। उन महात्मा पाण्डवोंकेप्रस्थानकालमें विदुरजी सलाह देनेवाले हुए। उन्हींकी सलाह एवं सहायतासे पाण्डवलोगलाक्षागृहसे बचकर आधीरातके समय वनमें भाग निकले थे ।। १९ ।

तेन मुक्ता जतुगृहान्निशीथे प्राद्रवन् वनम् ।

ततः सम्प्राप्य कौन्तेया नगरं वारणावतम् ।। २० ।।

न्यवसन्त महात्मानो मात्रा सह परंतपाः ।

धृतराष्ट्रेण चाज्ञप्ता उषिता जातुषे गृहे ।। २१ ।।

पुरोचनाद् रक्षमाणाः संवत्सरमतन्द्रिताः।

सुरुङ्गां कारयित्वा तु विदुरेण प्रचोदिताः ।। २२ ।।

आदीप्य जातुषं वेश्म दग्ध्वा चैव पुरोचनम् ।

प्राद्रवन् भयसंविग्ना मात्रा सह परंतपाः ।। २३ ।।

धृतराष्ट्रकी आज्ञासे शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीकुमार महात्मा पाण्डव वारणावतनगरमें आकर लाक्षागृहमें अपनी माताके साथ रहने लगे। पुरोचनसे सुरक्षित हो सदा सजगरहकर उन्होंने एक वर्षतक वहाँ निवास किया। फिर विदुरकी प्रेरणा (विदुरके भेजे हुएआदमियों)-से पाण्डवोंने एक सुरंग खुदवायी । तत्पश्चात् वे शत्रुसंतापी पाण्डव उसलाक्षागृहमें आग लगा पुरोचनको दग्ध करके भयसे व्याकुल हो मातासहित सुरंगद्वारावहाँसे निकल भागे ।। २०-२३ ।।

ददृशुर्दारुणं रक्षो हिडिम्बं वननिरझरे ।

हत्वा च तं राक्षसेन्द्रं भीताः समवबोधनात् ।। २४ ।।

निशि सम्प्राद्रवन् पार्था धार्तरष्ट्रभयार्दिताः ।

प्राप्ता हिडिम्बा भीमेन यत्र जातो घटोत्कचः।। २५ ।।

तत्पश्चात् वनमें एक झरनेके पास उन्होंने एक भयंकर राक्षसको देखा, जिसका नामहिडिम्ब था। राक्षसराज हिडिम्बको मारकर पाण्डवलोग प्रकट होनेके भयसे रातमें हीवहाँसे दूर निकल गये। उस समय उन्हें धृतराष्ट्रके पुत्रोंका भय सता रहा था। हिडिम्ब-वधकेपश्चात् भीमको हिडिम्बा नामकी राक्षसी पत्नीरूपमें प्राप्त हुई, जिसके गर्भसे घटोत्कचकाजन्म हुआ ।। २४-२५ ।।

एकचक्रां ततो गत्वा पाण्डवाः संशितव्रताः।

वेदाध्ययनसम्पन्नास्तेऽभवन् ब्रह्मचारिणः ।। २६ ।।

तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डव एकचक्रा नगरीमें जाकरवेदाध्ययनपरायण ब्रह्मचारी बन गये ।। २६ ।।

ते तत्र नियताः कालं कंचिदूषुर्नर्षभाः ।

मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ।। २७ ।।

उस एकचक्रा नगरीमें वे नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ एक ब्राह्मणके घरमें कुछकालतक टिके रहे ।। २७ ।।

तत्राससाद क्षुधितं पुरुषादं वृकोदरः ।

भीमसेनो महाबाहुर्बकं नाम महाबलम् ।। २८ ।।

उस नगरके समीप एक मनुष्यभक्षी राक्षस रहता था, जिसका नाम था बक। एक दिन भीमसेन उस क्षुधातुर महाबली राक्षस बकके समीप गये ।। २८ ।।

महाबाहु तं चापि पुरुषव्याघ्रो बाहुवीर्येण पाण्डवः ।

निहत्य तरसा वीरो नागरान् पर्यसान्त्वयत् ।। २९ ।।

नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन वीरवर भीमने अपने बाहुबलसे उस राक्षसको वेगपूर्वक मारकरवहाँके नगरनिवासियोंको धैर्य बँधाया ।। २९ ।।

ततस्ते शुश्रुवुः कृष्णां पञ्चालेषु स्वयंवराम् ।

श्रुत्वा चैवाभ्यगच्छन्त गत्वा चैवालभन्त ताम् ।। ३० ।।

ते तत्र द्रौपदीं लब्ध्वा परिसंवत्सरोषिताः ।

विदिता हास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिंदमाः ।। ३१ ।

वहीं सुननेमें आया कि पांचाल देशकी राजकुमारी कृष्णाका स्वयंवर होनेवाला है। यहसुनकर पाण्डव वहाँ गये और जाकर उन्होंने राजकुमारीको प्राप्त कर लिया। द्रौपदीकोप्राप्त करनेके बाद पहचान लिये जानेपर भी वे एक वर्षतक पांचाल देशमें ही रहे। फिर वेशत्रुदमन पाण्डव पुनः हस्तिनापुर लौट आये ।। ३० – ३१ ।।

ते उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च ।

भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति ।। ३२ ।।

अस्माभिः खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः ।

तस्माज्जनपदोपेतं सुविभक्तमहापथम् ।। ३३ ।।

वासाय खाण्डवप्रस्थं व्रजध्वं गतमत्सराः ।

तयोस्ते वचनाज्जग्मुः सह सर्वैः सुहृज्जनैः ॥ ३४ ।।

नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यादाय सर्वशः ।

तत्र ते न्यवसन् पार्थाः संवत्सरगणान् बहून् ।। ३५ ।।

वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीभृतः ।

एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यव्रतपरायणाः ।। ३६ ।।

वहाँ आनेपर राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मजीने उनसे कहा-‘तात! तुम्हेंअपने भाई कौरवोंके साथ लड़ने-झगड़नेका अवसर न प्राप्त हो इसके लिये हमने विचारकिया है कि तुमलोग खाण्डवप्रस्थमें रहो। वहाँ अनेक जनपद उससे जुड़े हुए हैं। वहाँसुन्दर विभागपूर्वक बड़ी-बड़ी सड़कें बनी हुई हैं। अतः तुमलोग ईष्ष्याका त्याग करकेखाण्डवप्रस्थमें रहनेके लिये जाओ।’ उन दोनोंके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सब पाण्डवअपने समस्त सुहृदोंके साथ सब प्रकारके रत्न लेकर खाण्डवप्रस्थको चले गये। वहाँ वेकुन्तीपुत्र अपने अस्त्र-शस्त्रोंके प्रतापसे अन्यान्य राजाओंको अपने वशमें करते हुए बहुतवर्षोंतक निवास करते रहे। इस प्रकार धर्मको प्रधानता देनेवाले, सत्यव्रतके पालनमें तत्पर,सदा सावधान एवं सजग रहनेवाले, क्षमाशील पाण्डव वीर बहुत-से शत्रुओंको संतप्त करतेहुए वहाँ निवास करने लगे ।। ३२-३६ ।।

अप्रमत्तोत्थिताः क्षान्ताः प्रतपन्तोऽहितान् बहून् ।

अजयद् भीमसेनस्तु दिशं प्राचीं महायशाः ।। ३७ ।।

उदीचीमर्जुनो वीरः प्रतीचीं नकुलस्तथा।

दक्षिणां सहदेवस्तु विजिग्ये परवीरहा ।। ३८ ।।

महायशस्वी भीमसेनने पूर्व दिशापर विजय पायी। वीर अर्जुनने उत्तर नकुलने पश्चिमऔर शत्रु वीरोंका संहार करनेवाले सहदेवने दक्षिण दिशापर विजय प्राप्त की ।। ३७-३८ ।।

एवं चक्रुरिमां सर्वे वशे कृत्स्नां वसुन्धराम् ।

पञ्चभिः सूर्यसंकाशैः सूर्येण च विराजता ।। ३९ ।।

षट्सूर्येवाभवत् पृथ्वी पाण्डवैः सत्यविक्रमैः ।

ततो निमित्ते कस्मिंश्चिद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। ४० ।।

वनं प्रस्थापयामास तेजस्वी सत्यविक्रमः ।

प्राणेभ्योऽपि प्रियतरं भ्रातरं सव्यसाचिनम् ।। ४१ ।।

(धैर्यात् सत्याच्च धर्माच्च विजयाच्चाधिकप्रियः ।

अर्जुनो भ्रातरं ज्येष्ठं नात्यवर्तत जातुचित् ।।)

अर्जुनं पुरुषव्याघ्रं स्थिरात्मानं गुणैर्युतम् ।

स वै संवत्सरं पूर्ण मासं चैकं वने वसन् ।। ४२ ।।

इस तरह सब पाण्डवोंने समूची पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया। वे पाँचों भाई सूर्यकेसमान तेजस्वी थे और आकाशमें नित्य उदित होनेवाले सूर्य तो प्रकाशित थे ही; इस तरहसत्यपराक्रमी पाण्डवोंके होनेसे यह पृथ्वी मानो छ: सूर्योंसे प्रकाशित होनेवाली बन गयी।तदनन्तर कोई निमित्त बन जानेके कारण सत्यपराक्रमी तेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने अपनेप्राणोंसे भी अत्यन्त प्रिय, स्थिर-बुद्धि तथा सद्गुणयुक्त भाई नरश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुनकोवनमें भेज दिया। अर्जुन अपने धैर्य, सत्य, धर्म और विजयशीलताके कारण भाइयोंकोअधिक प्रिय थे। उन्होंने अपने बड़े भाईकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं किया था। वे पूरेबारह वर्ष और एक मासतक वनमें रहे ।। ३९ -४२ ।।

(तीर्थयात्रां च कृतवान् नागकन्यामवाप्य च ।

पाण्ड्यस्य तनयां लब्ध्वा तत्र ताभ्यां सहोषितः ।)

ततोऽगच्छद्धृषीकेशं द्वारवत्यां कदाचन ।

लब्धवांस्तत्र बीभत्सुर्भा्यां राजीवलोचनाम् ।। ४३ ।।

अनुजां वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ।

सा शचीव महेन्द्रेण श्रीः कृष्णेनेव संगता ।। ४४ ।।

उसी समय उन्होंने निर्मल तीर्थोंकी यात्रा की और नागकन्या उलूपीको पाकरपाण्ड्यदेशीय नरेश चित्रवाहनकी पुत्री चित्रांगदाको भी प्राप्त किया और उन-उन स्थानोंमेंउन दोनोंके साथ कुछ कालतक निवास किया। तत्पश्चात् वे किसी समय द्वारकामें भगवान्श्रीकृष्णके पास गये। वहाँ अर्जुनने मंगलमय वचन बोलनेवाली कमललोचना सुभद्राको, जोवसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी छोटी बहिन थी, पत्नीरूपमें प्राप्त किया। जैसे इन्द्रसे शची औरभगवान् विष्णुसे लक्ष्मी संयुक्त हुई हैं, उसी प्रकार सुभद्रा बड़े प्रेमसे पाण्डुनन्दन अर्जुनसेमिली ।। ४३-४४ ।।

सुभद्रा युयुजे प्रीत्या पाण्डवेनार्जुनेन ह ।

अतर्पयच्च कौन्तेयः खाण्डवे हव्यवाहनम् ।। ४५ ।।

बीभत्सुर्वासुदेवेन सहितो नृपसत्तम ।

नातिभारो हि पार्थस्य केशवेन सहाभवत् ।। ४६ ।।

व्यवसायसहायस्य विष्णोः शत्रुवधेष्विव ।तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें भगवान् वासुदेवके साथ रहकर अग्निदेवको तृप्त किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका साथ होनेसे अर्जुनको इस कार्यमें ठीक उसी तरह अधिक परिश्रम या भारका अनुभव नहीं हुआ,सहायक बनाकर देवशत्रुओंका वध करते समय भगवान् विष्णुको भार या परिश्रमकीप्रतीति नहीं होती है ।। ४५-४६।।

पार्थायाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ।। ४७ ।।

इषुधी चाक्षयैर्बाणै रथं च कपिलक्षणम् ।

मोक्षयामास बीभत्सुर्मयं यत्र महासुरम् ।। ४८ ।।

तदनन्तर अग्निदेवने संतुष्ट हो अर्जुनको उत्तम गाण्डीव धनुष, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर और एक कपिध्वज रथ प्रदान किया । उसी समय अर्जुनने महान् असुर मयकोखाण्डव वनमें जलनेसे बचाया था ।। ४७-४८ ।।

जैसे दृढ़ निश्चयको स चकार सभां दिव्यां सर्वरत्नसमाचिताम् ।

तस्यां दुर्योधनो मन्दो लोभं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ ४९ ।।

इससे संतुष्ट होकर उसने अर्जुनके लिये एक दिव्य सभाभवनका निर्माण किया, जोसब प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था । खोटी बुद्धिवाले मूर्ख दुर्योधनके मनमें उस सभाको लेलेनेके लिये लोभ पैदा हुआ ।। ४९ ।।

ततोऽक्षैर्वञ्चयित्वा च सौबलेन युधिष्ठिरम् ।

वनं प्रस्थापयामास सप्त वर्षाणि पञ्च च ।। ५० ।।

अज्ञातमेकं राष्ट्रे च ततो वर्ष त्रयोदशम् ।

ततश्चतुर्दशे वर्षे याचमानाः स्वकं वसु ।। ५१ ।।

तब उसने शकुनिकी सहायतासे कपटपूर्ण जुएके द्वारा युधिष्ठिरको ठग लिया और उन्हेंबारह वर्षतक वनमें और तेरहवें वर्ष एक राष्ट्रमें अज्ञात-रूपसे वास करनेके लिये भेजदिया। इसके बाद चौदहवें वर्षमें पाण्डवोंने लौटकर अपना राज्य और धन माँगा ।। ५०-५१ ।।

नालभन्त महाराज ततो युद्धमवर्तत ।

ततस्ते क्षत्रमुत्साद्य हत्वा दुर्याोधनं नृपम् ।। ५२ ।

राज्यं विहतभूयिष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः ।

एवमेतत् पुरावृत्तं तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।

भेदो राज्यविनाशाय जयश्च जयतां वर ।। ५३ ।।

महाराज! जब इस प्रकार न्यायपूर्वक माँगनेपर भी उन्हें राज्य नहीं मिला, तब दोनोंदलोंमें युद्ध छिड़ गया। फिर तो पाण्डव-वीरोंने क्षत्रियकुलका संहार करके राजा दुर्योधनकोभी मार डाला और अपने राज्यको, जिसका अधिकांश भाग उजाड़ हो गया था, पुनः अपनेअधिकारमें कर लिया। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! अनायास महान् कर्म करनेवालेपाण्डवोंका यही पुरातन इतिहास है। इस प्रकार राज्यके विनाशके लिये उनमें फूट पड़ीऔर युद्धके बाद उन्हें विजय प्राप्त हुई ।। ५२-५३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि भारतसूत्रं नामैकर्षष्टितमोऽध्यायः।। ६१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें भारतसूत्र नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)

द्विषष्टितमोऽध्यायः

महाभारतकी महत्ता

जनमेजय उवाच

कथितं वै समासेन त्वया सर्वं द्विजोत्तम ।

महाभारतमाख्यानं कुरूणां चरितं महत् ।। १ ।।

जनमेजयने कहा-द्विजश्रेष्ठ! आपने कुरुवंशियोंके चरित्ररूप महान् महाभारतनामक सम्पूर्ण इतिहासका बहुत संक्षेपसे वर्णन किया है ।। १ ।।

कथां त्वनघ चित्रार्थां कथयस्व तपोधन ।

विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ।। २ ।

निष्पाप तपोधन! अब उस विचित्र अर्थवाली कथाको विस्तारके साथ कहिये; क्योंकिउसे विस्तारपूर्वक सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है |। २ ।।

स भवान् विस्तरेणेमां पुनराख्यातुमर्हति ।

न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ।। ३ ।।

विप्रवर! आप पुनः पूरे विस्तारके साथ यह कथा सुनावें। मैं अपने पूर्वजोंके इस महान्चरित्रको सुनते-सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ ।। ३ ।।

न तत् कारणमल्पं वै धर्मज्ञा यत्र पाण्डवाः ।

अवध्यान् सर्वशो जघ्नुः प्रशस्यन्ते च मानवैः ।॥ ४ ।।

सब मनुष्योंद्वारा जिनकी प्रशंसा की जाती है, उन धर्मज्ञ पाण्डवोंने जो युद्धभूमिमेंसमस्त अवध्य सैनिकोंका भी वध किया था, इसका कोई छोटा या साधारण कारण नहीं होसकता ।। ४ ।।

किमर्थं ते नरव्याघ्राः शक्ताः सन्तो ह्यनागसः ।

प्रयुज्यमानान् संक्लेशान् क्षान्तवन्तो दुरात्मनाम् ।। ५ ।।

नरश्रेष्ठ पाण्डव शक्तिशाली और निरपराध थे तो भी उन्होंने दुरात्मा कौरवोंके दिये हुएमहान् क्लेशोंको कैसे चुपचाप सहन कर लिया ? ।। ५ ।।

कथं नागायुतप्राणो बाहुशाली वृकोदरः ।

परिक्लिश्यन्नपि क्रोधं धृतवान् वै द्विजोत्तम ।। ६ ।।

द्विजोत्तम! अपनी विशाल भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले भीमसेनमें तो दस हजारहाथियोंका बल था। फिर उन्होंने क्लेश उठाते हुए भी क्रोधको किसलिये रोक रखाथा? ।। ६ ।।

कथं सा द्रौपदी कृष्णा क्लिश्यमाना दुरात्मभिः ।

शक्ता सती धार्तराष्ट्रान् नादहत् क्रोधचक्षुषा ।। ७ ।।

द्रुपदकुमारी कृष्णा भी सब कुछ करनेमें समर्थ, सती-साध्वी देवी थीं। धृतराष्ट्रकेदुरात्मा पुत्रोंद्वारा सतायी जानेपर भी उन्होंने अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे उन सबको जलाकरभस्म क्यों नहीं कर दिया? ।। ७ ।।

कथं व्यसनिनं द्युते पार्थी माद्रीसुतौ तदा ।

अन्वयुस्ते नरव्याघ्रा बाध्यमाना दुरात्मभिः ।। ८ ।।

कुन्तीके दोनों पुत्र भीमसेन और अर्जुन तथा माद्री-नन्दन नकुल और सहदेव भी उससमय दुष्ट कौरवोंद्वारा अकारण सताये गये थे। उन चारों भाइयोंने जुएके दुर्व्यसनमें फँसेहुए राजा युधिष्ठिरका साथ क्यों दिया? ।। ८ ।।

कथं धर्मभृतां श्रेष्ठः सुतो धर्मस्य धर्मवित् ।

अनर्हः परमं क्लेशं सोढवान् स युधिष्ठिरः ।। ९ ।।

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिर धर्मके ज्ञाता थे, महान् क्लेशमें पड़नेयोग्य कदापिनहीं थे, तो भी उन्होंने वह सब कैसे सहन कर लिया? ।। ९ ।।

कथं च बहुलाः सेनाः पाण्डवः कृष्णसारथि: ।

अस्यन्नेकोऽनयत् सर्वाः पितृलोकं धनंजयः ।। १० ।।

भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि थे, उन पाण्डुनन्दन अर्जुनने अकेले ही बाणोंकी वर्षाकरके समस्त सेनाओंको, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी, किस प्रकार यमलोक पहुँचादिया? ।। १० ।।

एतदाचक्ष्व मे सर्वं यथावृत्तं तपोधन ।

यद् यच्च कृतवन्तस्ते तत्र तत्र महारथाः ।। ११ ।।

तपोधन! यह सब वृत्तान्त आप ठीक-ठीक मुझे बताइये । उन महारथी वीरोंने विभिन्नस्थानों और अवसरोंमें जो-जो कर्म किये थे, वह सब सुनाइये ।। ११ ।।

वैशम्पायन उवाच

क्षणं कुरु महाराज विपुलोऽयमनुक्रमः ।

पुण्याख्यानस्य वक्तव्यः कृष्णद्वैपायनेरितः ।॥ १२ ।।

वैशम्पायनजी बोले-महाराज! इसके लिये कुछ समय नियत कीजिये;B क्योंकि इसपवित्र आख्यानका श्रीव्यासजीके द्वारा जो क्रमानुसार वर्णन किया गया है, वह बहुतविस्तृत है और वह सब आपके समक्ष कहकर सुनाना है।। १२ ।।

महर्षेः सर्वलोकेषु पूजितस्य महात्मनः ।

प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ।। १३ ।।

सर्वलोकपूजित अमित तेजस्वी महामना महर्षे व्यासजीके सम्पूर्ण मतका यहाँ वर्णनकरूँगा ।। १३ ।।

इदं शतसहस्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् ।

सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा ।। १४ ।।

असीम प्रभावशाली सत्यवतीनन्दन व्यासजीने पुण्यात्मा पाण्डवोंकी यह कथा एकलाख श्लोकोंमें कही है ।। १४ ।।

य इदं श्रावयेद् विद्वान् ये चेदं शृणुयुर्नराः ।

ते ब्रह्मणः स्थानमेत्य प्राप्नुयुर्देवतुल्यताम् ।। १५ ।।

जो विद्वान् इस आख्यानको सुनाता है और जो मनुष्य सुनते हैं, वे ब्रह्मलोकमें जाकरदेवताओंके समान हो जाते हैं ।। १५ ।।

इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।

श्राव्याणामुत्तमं चेदं पुराणमृषिसंस्तुतम् ।। १६ ।।

यह ऋषियोंद्वारा प्रशंसित पुरातन इतिहास श्रवण करनेयोग्य सब ग्रन्थोंमें श्रेष्ठ है । यहवेदोंके समान ही पवित्र तथा उत्तम है ।। १६ ।।

अस्मिन्नर्थश्च धर्मश्च निखिलेनोपदिश्यते ।

इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ।। १७ ।।

अक्षुद्रान् दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् ।

काष्ष्ण वेदमिमं विद्वाञ्छावयित्वार्थमश्नुते ।। १८ ।।

इसमें अर्थ और धर्मका भी पूर्णरूपसे उपदेश किया जाता है। इस परम पावनइतिहाससे मोक्षबुद्धि प्राप्त होती है। जिनका स्वभाव अथवा विचार खोटा नहीं है, जोदानशील, सत्यवादी और आस्तिक हैं, ऐसे लोगोंको व्यासद्वारा विरचित वेदस्वरूप इसमहाभारतका जो श्रवण कराता है, वह विद्वान् अभीष्ट अर्थको प्राप्त कर लेताहै ।। १७-१८ ।।

भ्रूणहत्याकृतं चापि पापं जह्यादसंशयम् ।

इतिहासमिमं श्रुत्वा पुरुषोऽपि सुदारुणः ।। १९ ।।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा ।

जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ।। २० ।।

साथ ही वह भ्रूणहत्या-जैसे पापको भी नष्ट कर देता है, इसमें संशय नहीं है । इसइतिहासको श्रवण करके अत्यन्त क्रूर मनुष्य भी राहुसे छूटे हुए चन्द्रमाकी भाँति सबपापोंसे मुक्त हो जाता है। यह ‘जय’ नामक इतिहास विजयकी इच्छावाले पुरुषको अवश्यसुनना चाहिये ।। १९-२० ।।

महीं विजयते राजा शत्रुश्चापि पराजयेत् ।

इदं पुंसवनं श्रेष्ठमिदं स्वस्त्ययनं महत् ।। २१ ।।

इसका श्रवण करनेवाला राजा भूमिपर विजय पाता और सब शत्रुओंको परास्त करदेता है। यह पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला और महान् मंगलकारी श्रेष्ठ साधन है ।। २१ ।।

महिषीयुवराजाभ्यां श्रोतव्यं बहुशस्तथा ।

वीरं जनयते पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ।। २२ ।।

युवराज तथा रानीको बारम्बार इसका श्रवण करते रहना चाहिये,अथवा राज्यसिंहासनपर बैठनेवाली कन्याको जन्म देती है ।। २२ ।।

धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् ।

मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ।। २३ ।।

अमित मेधावी व्यासजीने इसे पुण्यमय धर्मशास्त्र, उत्तम अर्थशास्त्र तथा सर्वोत्तममोक्षशास्त्र भी कहा है ।। २३ ।।

सम्प्रत्याचक्षते चेदं तथा श्रोष्यन्ति चापरे ।

इससे वह वीर पुत्र पुत्राः शुश्रूषवः सन्ति प्रेष्याश्च प्रियकारिणः ।। २४ ।।

जो वर्तमानकालमें इसका पाठ करते हैं तथा जो भविष्यमें इसे सुनेंगे, उनके पुत्रसेवापरायण और सेवक स्वामीका प्रिय करनेवाले होंगे ।। २४ ।।

शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च ।

सर्वं संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ।॥ २५ ।।

जो मानव इस महाभारतको सुनता है, वह शरीर, वाणी और मनके द्वारा किये हुएसम्पूर्ण पापोंको त्याग देता है ।। २५ ।।

भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् ।

नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ।। २६ ।।

जो दूसरोंके दोष न देखनेवाले भरतवंशियोंके महान् जन्म-वृत्तान्तरूप महाभारतकाश्रवण करते हैं, उन्हें इस लोकमें भी रोग-व्याधिका भय नहीं होता, फिर परलोकमें तो हो हीकैसे सकता है? ।। २६ ।।

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्ग्यं तथैव च ।

कृष्णद्वैपायनेनेदं कृतं पुण्यचिकीर्षुणा ।। २७ ।।

कीर्ति प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् ।

अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ।। २८ ।।

सर्वविद्यावदातानां लोके प्रथितकर्मणाम् ।

य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणाञ्छुचीन् ।। २९ ॥

श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः ।

कुरूणां प्रथितं वंशं कीर्तयन् सततं शुचिः ।। ३० ।।

लोकमें जिनके महान् कर्म विख्यात हैं, जो सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानद्वारा उद्भासित होतेथे और जिनके धन एवं तेज महान् थे, ऐसे महामना पाण्डवों तथा अन्य क्षत्रियोंकीउज्ज्वल कीर्तिको लोकमें फैलानेवाले और पुण्यकर्मके इच्छुक श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासनेइस पुण्यमय महाभारत ग्रन्थका निर्माण किया है। यह धन, यश, आयु, पुण्य तथा स्वर्गकीप्राप्ति करानेवाला है। जो मानव इस लोकमें पुण्यके लिये पवित्र ब्राह्मणोंको इस परमपुण्यमय ग्रन्थका श्रवण कराता है, उसे शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है। जो सदा कौरवोंकेइस विख्यात वंशका कीर्तन करता है, वह पवित्र हो जाता है ।। २७- ३० ।।

वंशमाप्नोति विपुलं लोके पूज्यतमो भवेत् ।

योऽधीते भारतं पुण्यं ब्राह्मणो नियतव्रतः ॥ ३१ ॥

चतुरो वार्षिकान् मासान् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

विज्ञेयः स च वेदानां पारगो भारतं पठन् ।। ३२ ।।

इसके सिवा, उसे विपुल वंशकी प्राप्ति होती है और वह लोकमें अत्यन्त पूजनीय होताहै। जो ब्राह्मण नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वर्षाके चार महीनेतक निरन्तरइस पुण्यप्रद महाभारतका पाठ करता है, वह सब पापोसे मुक्त हो जाता है। जोमहाभारतका पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण वेदोंका पारंगत विद्वान् जाननाचाहिये ।। ३१-३२ ।।

देवा राजर्षयो ह्यत्र पुण्या ब्रह्मर्षयस्तथा ।

कीर्त्यन्ते धूतपाप्मानः कीर्त्यते केशवस्तथा ।। ३३ ।

इसमें देवताओं, राजर्षियों तथा पुण्यात्मा ब्रह्मर्षियों के, जिन्होंने अपने सब पाप धो दियेहैं, चरित्रका वर्णन किया गया है। इसके सिवा इस ग्रन्थमें भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाकाभी कीर्तन किया जाता है ।। ३३ ।।

भगवांश्चापि देवेशो यत्र देवी च कीर्त्यते ।

अनेकजननो यत्र कार्तिकेयस्य सम्भवः ।। ३४ ।।

देवेश्वर भगवान् शिव और देवी पार्वतीका भी इसमें वर्णन है तथा अनेक माताओंसेउत्पन्न होनेवाले कार्तिकेय-जीके जन्मका प्रसंग भी इसमें कहा गया है ।। ३४ ।।

ब्राह्मणानां गवां चैव माहात्म्यं यत्र कीर्त्यते ।

सर्वश्रुतिसमूहोऽयं श्रोतव्यो धर्मबुद्धिभिः ।। ३५ ।।

ब्राह्मणों तथा गौओंके माहात्म्यका निरूपण भी इस ग्रन्थमें किया गया है। इस प्रकारयह महाभारत सम्पूर्ण श्रुतियोंका समूह है। धर्मात्मा पुरुषोंको सदा इसका श्रवण करनाचाहिये ।। ३५ ।।

य इदं श्रावयेद् विद्वान् ब्राह्मणानिह पर्वसु ।

धूतपाप्मा जितस्वर्गों ब्रह्म गच्छति शाश्वतम् ।। ३६ ।।

जो विद्वान् पर्वके दिन ब्राह्मणोंको इसका श्रवण कराता है, उसके सब पाप धुल जातेहैं और वह स्वर्ग-लोकको जीतकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है ।। ३६ ।।

(यस्तु राजा शृणोतीदमखिलामश्नुते महीम् ।

प्रसूते गर्भिणी पुत्रं कन्या चाशु प्रदीयते ।।

वणिजः सिद्धयात्राः स्युर्वीरा विजयमाप्नुयुः ।

आस्तिकाञ्छावयेन्नित्यं ब्राह्मणाननसूयकान् ।।

वेदविद्याव्रतस्नातान् क्षत्रियाञ्जयमास्थितान् ।

स्वधर्मनित्यान् वैश्यांश्च श्रावयेत् क्षत्रसंश्रितान् ।। )

जो राजा इस महाभारतको सुनता है, वह सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग करता है। गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करे तो वह पुत्रको जन्म देती है। कुमारी कन्या इसे सुने तो उसका शीघ्र विवाह हो जाता है। व्यापारी वैश्य यदि महाभारत श्रवण करें तो उनकी व्यापारके लिये की हुई यात्रा सफल होती है। शूरवीर सैनिक इसे सुननेसे युद्धमें विजय पाते हैं। जो आस्तिक और दोषदृष्टिसे रहित हों, उन ब्राहम्मणोंको नित्य इसका श्रवण कराना चाहिये। वेद-विद्याका अध्ययन एवं ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके जो स्नातक हो चुके हैं, विजयी क्षत्रियोंको और क्षत्रियोंके अधीन रहनेवाले स्वधर्म-परायण वैश्योंको भी महाभारत श्रवण कराना चाहिये।

(एष धर्मः पुरा दृष्टः सर्वधर्मेषु भारत ।

ब्राह्मणाच्छ्रुवणं राजन् विशेषेण विधीयते ।।

भूयो वा यः पठेन्नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् ।

श्लोकं वाप्यनु गृह्णीत तथार्धश्लोकमेव वा ।।

अपि पादं पठेन्नित्यं न च निर्भारतो भवेत् ।

इह नैकाश्रयं जन्म राजर्षीणां महात्मनाम् ।।)

भारत! सब धर्मोमें यह महाभारत-श्रवणरूप श्रेष्ठ धर्म पूर्वकालसे ही देखा गया है। राजन्! विशेषतः ब्राह्मणके मुखसे इसे सुननेका विधान है। जो बारम्बार अथवा प्रतिदिन इसका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। प्रतिदिन चाहे एक श्लोक या आधे श्लोक अथवा श्लोकके एक चरणका ही पाठ कर ले, किंतु महाभारतके अध्ययनसे शून्य कभी नहीं रहना चाहिये।

( इह मन्त्रपदं युक्तं धर्मं चानेकदर्शनम् ।

इह युद्धानि चित्राणि राज्ञां वृद्धिरिहैव च ।।

ऋषीणां च कथास्तात इह गन्धर्वरक्षसाम् ।

इह तत् तत् समासाद्य विहितो वाक्यविस्तरः ।।

तीर्थानां नाम पुण्यानां देशानां चेह कीर्तनम् ।

वनानां पर्वतानां च नदीनां सागरस्य च ।।)

इस महाभारतमें महात्मा राजर्षियोंके विभिन्न प्रकारके जन्म-वृत्तान्तोंका वर्णन है। इसमें मन्त्र-पदोंका प्रयोग है। अनेक दृष्टियों (मतों)- के अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थमें विचित्र युद्धोंका वर्णन तथा राजाओंके अभ्युदयकी कथा है। तात! इस महाभारतमें ऋषियों तथा गन्धर्वों एवं राक्षसोंकी भी कथाएँ हैं। इसमें विभिन्न प्रसंगोंको लेकर विस्तारपूर्वक वाक्यरचना की गयी है। इसमें पुण्यतीर्थों, पवित्र देशों, वनों, पर्वतों, नदियों और समुद्रके भी माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है । उन

(देशानां चैव पुण्यानां पुराणां चैव कीर्तनम् ।

उपचारस्तथैवाग्रयो वीर्यमप्यतिमानुषम् ।।

इह सत्कारयोगश्च भारते परमर्षिणा ।

रथाश्ववारणेन्द्राणां कल्पना युद्धकौशलम् ।।

वाक्यजातिरनेका च सर्वमस्मिन् समर्पितम् ।)

पुण्यप्रदेशों तथा नगरोंका भी वर्णन किया गया है। श्रेष्ठ उपचार और अलौकिकपराक्रमका भी वर्णन है। इस महाभारतमें महर्षि व्यासने सत्कार -योग (स्वागत-सत्कारकेविविध प्रकार)-का निरूपण किया है तथा रथसेना, अश्वसेना और गजसेनाकी व्यूहरचनातथा युद्धकौशलका वर्णन किया है। इसमें अनेक शैलीकी वाक्ययोजना – कथोपकथनकासमावेश हुआ है। सारांश यह कि इस ग्रन्थमें सभी विषयोंका वर्णन है।

श्रावयेद् ब्राह्मणाञ्छ्राद्धे यश्चेमं पादमन्ततः ।

अक्षय्यं तस्य तच्छराद्धमुपावत्तेत् पितृनिह ।। ३७ ।।

जो श्राद्ध करते समय अन्तमें ब्राह्मणोंको महाभारतके श्लोकका एक चतुर्थांश भी सुनादेता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होकर पितरोंको अवश्य प्राप्त हो जाताहै ।। ३७ ।।

अह्ना यदेनः क्रियते इन्द्रियैर्मनसापि वा ।

ज्ञानादज्ञानतो वापि प्रकरोति नरश्च यत् ।। ३८ ।।

तन्महाभारताख्यानं श्रुत्वैव प्रविलीयते ।

भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ।। ३९ ।।

दिनमें इन्द्रियों अथवा मनके द्वारा जो पाप बन जाता है अथवा मनुष्य जानकर याअनजानमें जो पाप कर बैठता है, वह सब महाभारतकी कथा सुनते ही नष्ट हो जाता है ।इसमें भरतवंशियोंके महान् जन्म-वृत्तान्तका वर्णन है, इसलिये इसको ‘महाभारत’ कहतेहै ।। ३८-३९ ।।

निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

भरतानां यतश्चायमितिहासो महाद्भुतः ।। ४० ।।

महतो ह्येनसो मत्त्यान् मोचयेदनुकीर्तितः ।

त्रिभिर्वर्षेर्लब्धकामः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।। ४१ ।।

नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः ।

तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा ।। ४२ ।।

तस्मान्नियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् ।

कृष्णप्रोक्तामिमां पुण्यां भारतीमुत्तमां कथाम् ।। ४३ ।।

श्रावयिष्यन्ति ये विप्रा ये च श्रोष्यन्ति मानवाः ।

सर्वथा वर्तमाना वै न ते शोच्याः कृताकृतैः ।। ४४ ।।

जो महाभारत नामका यह निरुक्त (व्युत्पत्तियुक्त अर्थ) जानता है, वह सब पापोंसे मुक्तहो जाता है। यह भरतवंशी क्षत्रियोंका महान् और अद्भुत इतिहास है। अत:ः निरन्तर पाठकरनेपर मनुष्योंको बड़े-से-बड़े पापसे छुड़ा देता है। शक्तिशाली आप्तकाम मुनिवरश्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान-संध्या आदिसे शुद्ध हो आदिसेही महाभारतकी रचना करते थे। महर्षिने तपस्या और नियमका आश्रय लेकर तीन वर्षोंमेंइस ग्रन्थको पूरा किया है। इसलिये ब्राह्मणोंको भी नियममें स्थित होकर ही इस कथाकाश्रवण करना चाहिये। जो ब्राह्मण श्रीव्यासजीकी कही हुई इस पुण्यदायिनी उत्तम भारतीकथाका श्रवण करायेंगे और जो मनुष्य इसे सुनेंगे, वे सब प्रकारकी चेष्टा करते हुए भी इसबातके लिये शोक करने योग्य नहीं हैं कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्मक्यों नहीं किया ।। ४०-४४ ।।

नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि ।

निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ।। ४५ ।।

धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यके द्वारा यह सारा महाभारत इतिहास पूर्णरूपसे श्रवणकरनेयोग्य है। ऐसा करनेसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है ।। ४५ ।।

न तां स्वर्गगतिं प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः ।

यां श्रुत्वैव महापुण्यमितिहासमुपाश्नुते ।। ४६ ।।

इस महान् पुण्यदायक इतिहासको सुननेमात्रसे ही मनुष्यको जो संतोष प्राप्त होता है,वह स्वर्गलोक प्राप्त कर लेनेसे भी नहीं मिलता ।। ४६ ।।

शृण्वज्छाद्धः पुण्यशीलः श्रावयंश्चेदमद्भुतम् ।

नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः । ४७ ।।

जो पुण्यात्मा मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस अद्भुत इतिहासको सुनता और सुनाता है, वहराजसूय तथा अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ।। ४७ ।।

यथा समुद्रो भगवान् यथा मेरुर्महागिरिः ।

उभौ ख्यातौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ।। ४८ ।।

जैसे ऐश्वर्यपूर्ण समुद्र और महान् पर्वत मेरु दोनों रत्नोंकी खान कहे गये हैं, वैसे हीमहाभारत रत्नस्वरूप कथाओं और उपदेशोंका भण्डार कहा जाता है ।। ४८ ।।

इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।

श्रव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम् ।। ४९ ।।

यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र और उत्तम है। यह सुननेयोग्य तो है ही, सुनतेसमय कानोंकोशील-स्वभावकी वृद्धि होती है ।। ४९ ।।

य इदं भारतं राजन् वाचकाय प्रयच्छति ।

तेन सर्वा मही दत्ता भवेत् सागरमेखला ।। ५० ।।

सुख देनेवाला भी है। इसके श्रवणसे अन्तःकरण पवित्र होता और उत्तमराजन्! जो वाचकको यह महाभारत दान करता है, उसके द्वारा समुद्रसे घिरी हुईसम्पूर्ण पृथ्वीका दान सम्पन्न हो जाता है ।। ५० ।।

पारिक्षितकथां दिव्यां पुण्याय विजयाय च ।

कथ्यमानां मया कृत्स्नां शृणु हर्षकरीमिमाम् ।। ५१ ।।

जनमेजय! मेरे द्वारा कही हुई इस आनन्ददायिनी दिव्य कथाको तुम पुण्य औरविजयकी प्राप्तिके लिये पूर्णरूपसे सुनो ।। ५१ ।।

त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।

महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ।। ५२ ।।

प्रतिदिन प्रात:काल उठकर इस ग्रन्थका निर्माण करनेवाले महामुनि श्रीकृष्णद्वैपायननेमहाभारत नामक इस अद्भुत इतिहासको तीन वर्षोंमें पूर्ण किया है ।। ५२ ।।

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ ।

यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ।। ५३ ।।

भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके सम्बन्धमें जो बात इस ग्रन्थमें है, वही अन्यत्रभी है। जो इसमें नहीं है, वह कहीं भी नहीं है ।। ५३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि महाभारतप्रशंसायां द्विषष्टितमोऽध्यायः ।। ६२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें महाभारतप्रशंसाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६२ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११} श्लोक मिलाकर कुल ६४३ श्लोक हैं)

त्रिषष्टितमोऽध्यायः

राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा

वैशम्पायन उवाच

राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः ।

बभूव मृगयां गन्तुं सदा किल धृतव्रतः ।। १ ।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! पहले उपरिचर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो नित्य-निरन्तर धर्में ही लगे रहते थे। साथ ही सदा हिंसक पशुओंके शिकारके लिये वनमें जानेका उनका नियम था ।। १ ।।

स चेदिविषयं रम्यं वसुः पौरवनन्दनः ।

इन्द्रोपदेशाज्जग्राह रमणीयं महीपतिः ।। २ ।।

पौरवनन्दन राजा उपरिचर वसुने इन्द्रके कहनेसे अत्यन्त रमणीय चेदिदेशका राज्य स्वीकार किया था ।। २ ।।

तमाश्रमे न्यस्तशस्त्रं निवसन्तं तपोनिधिम् ।

देवाः शक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे ।। ३ ।।

इन्द्रत्वमह्हो राजायं तपसेत्यनुचिन्त्य वै ।

तं सान्त्वेन नृपं साक्षात् तपसः संन्यवर्तयन् ।। ४ ।।

एक समयकी बात है, राजा वसु अस्त्र- शस्त्रोंका त्याग करके आश्रममें निवास करने लगे। उन्होंने बड़ा भारी तप किया, जिससे वे तपोनिधि माने जाने लगे। उस समय इन्द्र आदि देवता यह सोचकर कि यह राजा तपस्याके द्वारा इन्द्रपद प्राप्त करना चाहता है, उनके समीप गये। देवताओंने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें शान्तिपूर्वक समझाया और तपस्यासे निवृत्त कर दिया ।। ३-४ ।। :

देवा ऊचुः

न संकीर्येत धर्मोऽयं पृथिव्यां पृथिवीपते ।

त्वया हि धर्मो विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत् ।। ५ ।।

देवता बोले-पृथ्वीपते! तुम्हें ऐसी चेष्टा रखनी चाहिये जिससे इस भूमिपर वर्णसंकरता न फैलने पावे (तुम्हारे न रहनेसे अराजकता फैलनेका भय है, जिससे प्रजा स्वधर्ममें स्थित नहीं रह सकेगी। अतः तुम्हें तपस्या न करके इस वसुधाका संरक्षण करना चाहिये)। राजन्! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित धर्म ही सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रहा है ।। ५ ।।

इन्द्र उवाचलोके धर्मं पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहितः ।

धर्मयुक्तस्ततो लोकान् पुण्यान् प्राप्स्यसि शाश्वतान् ।। ६ ।।

इन्द्रने कहा-राजन्! तुम इस लोकमें सदा सावधान और प्रयत्नशील रहकर धर्मकापालन करो। धर्मयुक्त रहनेपर तुम सनातन पुण्यलोकोंको प्राप्त कर सकोगे । ६ ।।

दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः।

रम्यः पृथिव्यां यो देशस्तमावस नराधिप ।। ७ ।।

यद्यपि मैं स्वर्गमें रहता हूँ और तुम भूमिपर; तथापि आजसे तुम मेरे प्रिय सखा हो गये।नरेश्वर! इस पृथ्वीपर जो सबसे सुन्दर एवं रमणीय देश हो, उसीमें तुम निवास करो ।। ७ ।।

पशव्यश्चैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।

स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः । ८।।

अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः ।

वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप ।।९ ।।

धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः ।

न च मिथ्याप्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।। १० ।।

न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रताः ।

युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान् संधुक्षयन्ति च ।। ११ ।।

सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद ।

न तेऽस्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु यद् भवेत् ।। १२ ।।

इस समय चेदिदेश पशुओंके लिये हितकर, पुण्यजनक, प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न,स्वर्गके समान सुखद होनेके कारण रक्षणीय, सौम्य तथा भोग्य पदार्थों और भूमिसम्बन्धीउत्तम गुणोंसे युक्त है। यह देश अनेक पदार्थोंसे युक्त और धन-रत्न आदिसे सम्पन्न है।यहाँकी वसुधा वास्तवमें वसु (धन-सम्पत्ति)-से भरी-पूरी है। अतः तुम चेदिदेशके पालकहोकर उसीमें निवास करो। यहाँके जनपद धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहाँ हास -परिहासमें भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता है। पुत्रसदा गुरुजनोंके हितमें लगे रहते हैं, पिता अपने जीते-जी उनका बँटवारा नहीं करते। यहाँकेलोग बैलोंको भार ढोनेमें नहीं लगाते और दीनों एवं अनाथोंका पोषण करते हैं। मानद!चेदिदेशमें सब वर्णोंके लोग सदा अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोईघटना होगी, वह सब यहाँ रहते हुए भी तुमसे छिपी न रहेगी-तुम सर्वज्ञ बने रहोगे ।। ८-१२ ।।

देवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत् ।

आकाशगं त्वां मद्दत्तं विमानमुपपत्स्यते ।। १३ ।।

जो देवताओंके उपभोगमें आने योग्य है, ऐसा स्फटिक मणिका बना हुआ एक दिव्य,आकाशचारी एवं विशाल विमान मैंने तुम्हें भेंट किया है। वह आकाशमें तुम्हारी सेवाके लियेसदा उपस्थित रहेगा ।। १३ ।।

त्वमेकः सर्वमत्त्येषु विमानवरमास्थितः ।

चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव ।। १४ ।।

सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक तुम्हीं इस श्रेष्ठ विमानपर बैठकर मूर्तिमान् देवताकी भाँति सबकेऊपर-ऊपर विचरोगे ।। १४ ।।

ददामि ते वैजयन्तीं मालामम्लानपंकजाम् ।

धारयिष्यति संग्रामे या त्वां शस्त्रैरविक्षतम् ।। १५ ।।

मैं तुम्हें यह वैजयन्ती माला देता हूँ, जिसमें पिरोये हुए कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं।इसे धारण कर लेनेपर यह माला संग्राममें तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे बचायेगी ।। १५ ।।

लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप ।

इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत् ।। १६ ।।

नरेश्वर! यह माला ही इन्द्रमालाके नामसे विख्यात होकर इस जगत्में तुम्हारी पहचानकरानेके लिये परम धन्य एवं अनुपम चिह्न होगी ।। १६ ।।

यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदनः ।

इष्टप्रदानमुद्दिश्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम् ।। १७ ।।

ऐसा कहकर वृत्रासुरका नाश करनेवाले इ्द्रने राजाको प्रेमोपहारस्वरूप बाँसकी एकछड़ी दी, जो शिष्ट पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली थी ।। १७ ।।

तस्याः शक्रस्य पूजार्थं भूमौ भूमिपतिस्तदा ।

प्रवेशं कारयामास गते संवत्सरे तदा ।। १८ ।।

तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर भूपाल वसुने इन्द्रकी पूजाके लिये उस छड़ीको भूमिमेंगाड़ दिया ।। १८ ।।

ततः प्रभृति चाद्यापि यष्टेः क्षितिपसत्तमैः:।

प्रवेशः क्रियते राजन् यथा तेन प्रवर्तितः ।। १९ ।।

राजन्! तबसे लेकर आजतक श्रेष्ठ राजाओंद्वारा छड़ी धरतीमें गाड़ी जाती है। वसुनेजो प्रथा चला दी, वह अबतक चली आती है ।। १९ ।।

अपरेद्युस्ततस्तस्याः क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपैः ।

अलंकृतायाः पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणैः ।। २० ।।

माल्यदामपरिक्षिप्ता विधिवत् क्रियतेऽपि च ।

भगवान् पूज्यते चात्र हंसरूपेण चेश्वरः ।। २१ ।।

दूसरे दिन अर्थात् नवीन संवत्सरके प्रथम दिन प्रति-पदाको वह छड़ी वहाँसेनिकालकर बहुत ऊँचे स्थानमें रखी जाती है; फिर कपड़ेकी पेटी, चन्दन, माला औरआभूषणोंसे उसको सजाया जाता है। उसमें विधिपूर्वक फूलोंके हार और सूत लपेटे जातेहैं। तत्पश्चात् उसी छड़ीपर देवेश्वर भगवान् इन्द्रका हंसरूपसे पूजन किया जाता है ।। २०-२१ ।।

स्वयमेव गृहीतेन वसोः प्रीत्या महात्मनः ।

स तां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्ट्वा देवः कृतां शुभाम् ।। २२ ।।

वसुना राजमुख्येन प्रीतिमानब्रवीत् प्रभुः ।

ये पूजयिष्यन्ति नरा राजानश्च महं मम ।। २३ ।।

कारयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिर्नृटपः ।

तेषां श्रीर्विजयश्चैव सराष्ट्राणां भविष्यति ।। २४ ।।

इन्द्रने महात्मा वसुके प्रेमवश स्वयं हंसका रूप धारण करके वह पूजा ग्रहण की। नृपश्रेष्ठ वसुके द्वारा की हुई उस शुभ पूजाको देखकर प्रभावशाली भगवान् महेन्द्र प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले-‘चेदिदेशके अधिपति उपरिचर वसु जिस प्रकार मेरी हैं, उसी तरह जो मनुष्य तथा राजा मेरी पूजा करेंगे और मेरे इस उत्सवको रचायेंगे, उनको और उनके समूचे राष्ट्रको लक्ष्मी एवं विजयकी प्राप्ति होगी ।। २२- २४ ।।

तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति ।

एवं महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप ।। २५ ।।

वसुः प्रीत्या मघवता महाराजोऽभिसत्कृतः ।

उत्सवं कारयिष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नराः ।। २६ ।।

भूमिरत्नादिभिर्दानैस्तथा पूज्या भवन्ति ते ।

वरदानमहायज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन च ।। २७ ।।

‘इतना ही नहीं, उनका सारा जनपद ही उत्तरोत्तर उन्नतिशील और प्रसन्न होगा।’ राजन्! इस प्रकार महात्मा महेन्द्रने, जिन्हें मघवा भी कहते हैं, प्रेमपूर्वक महाराज वसुका भलीभाँति सत्कार किया। जो मनुष्य भूमि तथा रत्न आदिका दान करते हुए सदा देवराज इन्द्रका उत्सव रचायेंगे, वे इन्द्रोत्सवद्वारा इन्द्रका वरदान पाकर उसी उत्तम गतिको पा जायँगे, जिसे भूमिदान आदिके पुण्योंसे युक्त मानव प्राप्त करते हैं ।। २५- २७ ।।

सम्पूजितो मघवता वसुश्चेदीश्वरो नृपः ।

पालयामास धर्मेण चेदिस्थः पृथिवीमिमाम् ।। २८ ।।

इन्द्रके द्वारा उपर्युक्त रूपसे सम्मानित चेदिराज वसुने चेदिदेशमें ही रहकर इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया ।। २८ ।।

इन्द्रप्रीत्या चेदिपतिश्चकारेन्द्रमहं वसुः ।

पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः ।। २९ ।।

इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये चेदिराज वसु प्रतिवर्ष इन्द्रोत्सव मनाया करते थे। उनके अनन्त बलशाली महापराक्रमी पाँच पुत्र थे ।। २९ ।।

नानाराज्येषु च सुतान् स सम्राडभ्यषेचयत् ।

पूजा करतेमहारथो मागधानां विश्रुतो यो बृहद्रथः । ३० ।।

सम्राट् वसुने विभिन्न राज्योंपर अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर दिया । उनमें महारथीबृहद्रथ मगध देशका विख्यात राजा हुआ ।। ३० ।।

प्रत्यग्रहः कुशाम्बश्च यमाहुर्मणिवाहनम् ।

मावेल्लश्च यदुश्चैव राजन्यश्चापराजितः ।। ३१ ।।

दूसरे पुत्रका नाम प्रत्यग्रह था, तीसरा कुशाम्ब था, जिसे मणिवाहन भी कहते हैं। चौथामावेल्ल था। पाँचवाँ राजकुमार यदु था, जो युद्धमें किसीसे पराजित नहीं होताथा ।। ३१ ।।

एते तस्य सुता राजन् राजर्षेर्भूरितेजसः ।

न्यवासयन् नामभिः स्वैस्ते देशांश्च पुराणि च ।। ३२ ।।

राजा जनमेजय! महातेजस्वी राजर्षि वसुके इन पुत्रोंने अपने- अपने नामसे देश औरनगर बसाये ।। ३२ ।।

वासवाः पञ्च राजानः पृथग्वंशाश्च शाश्वताः ।

वसन्तमिन्द्रप्रासादे आकाशे स्फाटिके च तम् ।। ३३ ।।

उपतस्थुर्महात्मानं गन्धर्वाप्सरसो नृपम् ।

राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम् ।। ३४ ।।

पाँचों वसुपुत्र भिन्न-भिन्न देशोंके राजा थे और उन्होंने पृथक्-पृथक् अपनी सनातनवंशपरम्परा चलायी। चेदिराज वसु इन्द्रके दिये हुए स्फटिक मणिमय विमानमें रहते हुएआकाशमें ही निवास करते थे। उस समय उन महात्मा नरेशकी सेवामें गन्धर्व औरअप्सराएँ उपस्थित होती थीं। सदा ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण उनका नाम ‘राजाउपरिचर’ के रूपमें विख्यात हो गया ।। ३३-३४ ।।

पुरोपवाहिनीं तस्य नदीं शुक्तिमतीं गिरिः ।

अरौत्सीच्चेतनायुक्तः कामात् कोलाहलः किल ।। ३५ ।

उनकी राजधानीके समीप शुक्तिमती नदी बहती थी। एक समय कोलाहल नामकसचेतन पर्वतने कामवश उस दिव्यरूपधारिणी नदीको रोक लिया ।। ३५ ।।

गिरिं कोलाहलं तं तु पदा वसुरताडयत् ।

निश्चक्राम ततस्तेन प्रहारविवरेण सा ।। ३६ ।।

उसके रोकनेसे नदीकी धारा रुक गयी। यह देख उपरिचर वसुने कोलाहल पर्वतपरअपने पैरसे प्रहार किया। प्रहार करते ही पर्वतमें दरार पड़ गयी, जिससे निकलकर वह नदीपहलेके समान बहने लगी ।। ३६ ।।

तस्यां नद्यामजनयन्मिथुनं पर्वतः स्वयम् ।

तस्माद् विमोक्षणात् प्रीता नदी राज्ञे न्यवेदयत् ।। ३७ ।।

पर्वतने उस नदीके गर्भसे एक पुत्र और एक कन्या, जुड़वीं संतान उत्पन्न की थी।उसके अवरोधसे मुक्त करनेके कारण प्रसन्न हुई नदीने राजा उपरिचरको अपनी दोनोंसंतानें समर्पित कर दीं ।। ३७ ।।

यः पुमानभवत् तत्र तं स राजर्षिसत्तमः ।

वसुर्वसुप्रदश्चक्रे सेनापतिमरिन्दमः ।। ३८ ।।

उनमें जो पुरुष था, उसे शत्रुओंका दमन करनेवाले धनदाता राजर्षिप्रवर वसुने अपनासेनापति बना लिया ।। ३८ ।।

चकार पत्नीं कन्यां तु तथा तां गिरिकां नृपः ।

वसोः पत्नी तु गिरिका कामकालं न्यवेदयत् ।। ३९ ।।

ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः ।

तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति ।। ४० ।।

तं राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वर ।

स पितृणां नियोगं तमनतिक्रम्य पार्थिवः ।। ४१ ।।

चकार मृगयां कामी गिरिकामेव संस्मरन् ।

अतीवरूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ।। ४२ ।।

और जो कन्या थी उसे राजाने अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम था गिरिका।बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! एक दिन ऋतुकालको प्राप्त हो स्नानके पश्चात् शुद्ध हुईवसुपत्नी गिरिकाने पुत्र उत्पन्न होने योग्य समयमें राजासे समागमकी इच्छा प्रकट की। उसीदिन पितरोंने राजाओं में श्रेष्ठ वसुपर प्रसन्न हो उन्हें आज्ञा दी – ‘तुम हिंसक पशुओंका वरकरो।’ तब राजा पितरोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके कामनावश साक्षात् दूसरी लक्ष्मीकेसमान अत्यन्त रूप और सौन्दर्यके वैभवसे सम्पन्न गिरिकाका ही चिन्तन करते हुए हिंसकपशुओंको मारनेके लिये वनमें गये ।। ३९ -४२ ।।

अशोकैश्चम्पकैश्चूतैरनेकैरतिमुक्तकैः ।

पुन्नागैः कर्णिकारैश्च वकुलैर्दिव्यपाटलैः ।। ४३ ।।

पाटलैनर्नारिकेलैश्च चन्दनैश्चार्जुनैस्तथा।

एतै रम्यैर्महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्युतम् ।। ४४ ।।

कोकिलाकुलसंनादं मत्तभ्रमरनादितम् ।

वसन्तकाले तत् तस्य वनं चैत्ररथोपमम् ।। ४५ ।।

राजाका वह वन देवताओके चैत्ररथ नामक वनके समान शोभा पा रहा था। वसन्तकासमय था; अशोक, चम्पा, आम, अतिमुक्तक ( माधवीलता ), पुत्नाग (नागकेसर), कनेर,मौलसिरी, दिव्य पाटल, पाटल, नारियल, चन्दन तथा अर्जुन- से स्वादिष्ट फलोंसे युक्त,रमणीय तथा पवित्र महावृक्ष उस वनकी शोभा बढ़़ा रहे थे कोकिलाओंके कल-कूजनसेसमस्त वन गूँज उठा था। चारों ओर मतवाले भौरे कल-कल नाद कर रहे थे ।। ४३-४५ ।।

मन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यद् गिरिकां तदा ।

अपश्यन् कामसंतप्तश्चरमाणो यदृच्छया ।। ४६ ।।

यह उद्दीपन-सामग्री पाकर राजाका हृदय कामवेदनासे पीड़ित हो उठा। उस समयउन्हें अपनी रानी गिरिकाका दर्शन नहीं हुआ। उसे न देखकर कामाग्निसे संतप्त हो वेइच्छानुसार इधर-उधर घूमने लगे ।। ४६ ।।

पुष्पसंछन्नशाखाग्रं पल्लवैरुपशोभितम् ।

अशोकं स्तबकैश्छन्नं रमणीयमपश्यत ।। ४७ ।।

घूमते-घूमते उन्होंने एक रमणीय अशोकका वृक्ष देखा, जो पल्लवोंसे सुशोभित औरपुष्पके गुच्छोंसे आच्छादित था। उसकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे ढके हुए थे ।। ४७ ।।

अधस्तात् तस्य छायायां सुखासीनो नराधिपः।

मधुगन्धैश्च संयुक्तं पुष्पगन्धमनोहरम् ।। ४८ ।।

राजा उसी वृक्षके नीचे उसकी छायामें सुखपूर्वक बैठ गये। वह वृक्ष मकरन्द औरसुगन्धसे भरा था। फूलोंकी गन्धसे वह बरबस मनको मोह लेता था ।। ४८ ।।

वायुना प्रेर्यमाणस्तु धूम्राय मुदमन्वगात् ।

तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो गहने वने। ४९ ।।

उस समय कामोद्दीपक वायुसे प्रेरित हो राजाके मनमें रतिके लिये स्त्रीविषयक प्रीतिउत्पन्न हुई। इस प्रकार वनमें विचरनेवाले राजा उपरिचरका वीर्य स्खलित हो गया ।। ४९ ।।

स्कन्नमात्रं च तद् रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः ।

प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पतेद् रेत इत्युत ।। ५० ।।

उसके स्खलित होते ही राजाने यह सोचकर कि मेरा वीर्य व्यर्थ न जाय, उसे वृक्षकेपत्तेपर उठा लिया ।। ५० ।।

इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति ।

ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः ।। ५१ ।।

संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनः पुनः ।

अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तमः ।। ५२ ।।

उन्होंने विचार किया, ‘मेरा यह स्खलित वीर्य व्यर्थ न हो, साथ ही मेरी पत्नीगिरिकाका ऋतुकाल भी व्यर्थ न जाय’ इस प्रकार बारम्बार विचारकर राजाओंमें श्रेष्ठ वसुनेउस वीर्यको अमोघ बनानेका ही निश्चय किया ।। ५१-५२ ।।

शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य वै ।

अभिमन्त्र्याथ तच्छुक्रमारात् तिष्ठन्तमाशुगम् ।। ५३ ।।

सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत् ।

मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय ।। ५४ ।।

गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै ।

गृहीत्वा तत् तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान् ।। ५५ ।।

तदनन्तर रानीके पास अपना वीर्य भेजनेका उपयुक्त अवसर देख उन्होंने उस वीर्यकोपुत्रोत्पत्तिकारक मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया । राजा वसु धर्म और अर्थके सूक्ष्मत्त्वकोजाननेवाले थे। उन्होंने अपने विमानके समीप ही बैठे हुए शीघ्रगामी श्येन पक्षी ( बाज) – केपास जाकर कहा-‘सौम्य! तुम मेरा प्रिय करनेके लिये यह वीर्य मेरे घर ले जाओ औरमहारानी गिरिकाको शीघ्र दे दो; क्योंकि आज ही उनका ऋतुकाल है।’ बाज वह वीर्य लेकरबड़े वेगके साथ तुरंत वहाँसे उड़ गया ।। ५३ – ५५ ।।

जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगमः ।

तमपश्यदथायान्तं श्येनं श्येनस्तथापरः ।। ५६ ।।

वह आकाशचारी पक्षी सर्वोत्तम वेगका आश्रय ले उड़ा जा रहा था, इतनेहीमें एक दूसरेबाजने उसे आते देखा ।। ५६ ।।

अभ्यद्रवच्च तं सद्यो दृष्ट्वैवामिषशङ्कया।

तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः ।। ५७ ।।

उस बाजको देखते ही उसके पास मांस होनेकी आशंकासे दूसरा बाज तत्काल उसपरटूट पड़ा। फिर वे दोनों पक्षी आकाशमें एक-दूसरेको चोंचोंसे मारते हुए युद्ध करनेलगे ।। ५७ ।।

युध्यतोरपतद् रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि ।

तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद् वराप्सराः ।। ५८ ।।

मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी ।

श्येनपादपरिभ्रष्टं तद् वीर्यमथ वासवम् ।। ५९ ।।

जग्राह तरसोपेत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी ।

कदाचिदपि मत्सीं तां बबन्धुर्मत्स्यजीविनः ।। ६० ।।

मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम ।

उज्जहुरुदरात् तस्याः स्त्रीं पुमांसं च मानुषम् ।। ६१ ।।

उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसेविख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहतीथी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्रिकानेवेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवीमल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या औरएक पुरुष निकाला ।। ५८-६१ ।।

आश्चर्यभूतं तद् गत्वा राज्ञेऽथ प्रत्यवेदयन् ।

काये मत्स्या इमौ राजन् सम्भूतौ मानुषाविति ।। ६२ ।।

यह आश्चर्यजनक घटना देखकर मछेरोंने राजाके पास जाकर निवेदन किया- ‘महाराज ! मछलीके पेटसे ये दो मनुष्य बालक उत्पन्न हुए हैं’ ।। ६२ ।।

तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा ।

स मत्स्यो नाम राजासीद् धार्मिकः सत्यसंगरः ।। ६३ ।।

मछेरोंकी बात सुनकर राजा उपरिचरने उस समय उन दोनों बालकोंमेंसे जो पुरुष था,उसे स्वयं ग्रहण कर लिया। वही मत्स्य नामक धर्मात्मा एवं सत्यप्रतिज्ञ राजा हुआ ।। ६३ ।।

साप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत ।

या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा ।। ६४ ।।

मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ।

ततः सा जनयित्वा तौ विशस्ता मत्स्यघातिना ।। ६५ ।।

संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च ।

सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः ।। ६६ ।।

इधर वह शुभलक्षणा अप्सरा अद्रिका क्षणभरमें शापमुक्त हो गयी। भगवान् ब्रह्माजीनेपहले ही उससे कह दिया था कि ‘तिर्यग्-योनिमें पड़ी हुई तुम दो मानव-संतानोंको जन्मदेकर शापसे छूट जाओगी।’ अतः मछली मारनेवाले मल्लाहने जब उसे काटा तो वहमानव-बालकोंको जन्म देकर मछलीका रूप छोड़ दिव्य रूपको प्राप्त हो गयी। इस प्रकारवह सुन्दरी अप्सरा सिद्ध महर्षि और चारणोंके पथसे स्वर्गलोकमें चली गयी ।। ६४-६६ ।।

सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी ।

राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ।। ६७ ।।

उन जुड़वी संतानोंमें जो कन्या थी, मछलीकी पुत्री होनेसे उसके शरीरसे मछलीकीगन्ध आती थी। अतः राजाने उसे मल्लाहको सौंप दिया और कहा- ‘यह तेरी पुत्री होकररहे’ ।। ६७ ।।

रूपसत्त्वसमायुक्ता सर्वैः समुदिता गुणैः ।

सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात् ।। ६८ ।।

आसीत् सा मत्स्यगन्धैव कंचित् कालं शुचिस्मिता ।

शुश्रूषार्थं पितुर्नावं वाहयन्तीं जले च ताम् ।। ६९ ।।

तीर्थयात्रां परिक्रामन्नपश्यद् वै पराशरः ।

अतीवरूपसम्पन्नां सिद्धानामपि काङ्क्षिताम् ।। ७० ।।

वह रूप और सत्त्व (सत्य)-से संयुक्त तथा समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण’सत्यवती’ नामसे प्रसिद्ध हुई। मछेरोंके आश्रयमें रहनेके कारण वह पवित्र मुसकानवालीकन्या कुछ कालतक मत्स्यगन्धा नामसे ही विख्यात रही। वह पिताकी सेवाके लियेयमुनाजीके जलमें नाव चलाया करती थी। एक दिन तीर्थयात्राके उद्देश्यसे सब ओरविचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा। वह अतिशय रूप -सौन्दर्यसे सुशोभित थी। सिद्धोंकेहृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी ।। ६८ – ७० ।।

दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् ।

दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरुं मुनिपुङ्गवः ।। ७१ ।।

उसकी हँसी बड़ी मोहक थी, उसकी जाँघें कदलीकी-सी शोभा धारण करती थीं। उसदिव्य वसुकुमारीको देखकर परम बुद्धिमान् मुनिवर पराशरने उसके साथ समागमकी इच्छाप्रकट की ।। ७१ ।।

संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत ।

साब्रवीत् पश्य भगवन् पारावारे स्थितानृषीन् ।। ७२ ।।

और कहा-‘कल्याणी! मेरे साथ संगम करो।’ वह बोली – भगवन् ! देखिये , नदीकेआर-पार दोनों तटोंपर बहुत-से ऋषि खड़े हैं ।। ७२ ।।

आवयोर्दृष्टयोरेभिः कथं तु स्यात् समागमः ।

एवं तयोक्तो भगवान् नीहारमसृजत् प्रभुः ।। ७३ ।।

‘और हम दोनोंको देख रहे हैं। ऐसी दशामें हमारा समागम कैसे हो सकता है?’ उसकेऐसा कहनेपर शक्तिशाली भगवान् पराशरने कुहरेकी सृष्टि की ।। ७३ ।।

येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् ।

दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा ।। ७४ ।।

जिससे वहाँका सारा प्रदेश अन्धकारसे आच्छादित-सा हो गया। महर्षिद्वारा कुहरेकीसृष्टि देखकर वह तपस्विनी कन्या आश्चर्यचकित एवं लज्जित हो गयी।। ७४ ।।

सत्यवत्युवाच

विस्मिता साभवत् कन्या व्रीडिता च तपस्विनी ।

विद्धि मां भगवन् कन्यां सदा पितृवशानुगाम् ।। ७५ ।।

सत्यवतीने कहा-भगवन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं सदा अपने पिताकेअधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ ।। ७५ ।।

त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममानघ ।

कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम ।। ७६ ।।

गृहं गन्तुमृषे चाहं धीमन् न स्थातुमुत्सहे ।

एतत् संचिन्त्य भगवन् विधत्स्व यदनन्तरम् ।। ७७ ।।

निष्पाप महर्षे! आपके संयोगसे मेरा कन्याभाव (कुमारीपन) दूषित हो जायगा।द्विजश्रेष्ठ! कन्याभाव दूषित हो जानेपर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूँ। बुद्धिमान् मुनीश्वर!अपने कन्यापनके कलंकित हो जानेपर मैं जीवित रहना नहीं चाहती। भगवन्! इस बातपरभलीभाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ।। ७६-७७ ।।

एवमुक्तवर्तीं तां तु प्रीतिमानृषिसत्तमः ।

उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ।। ७८ ।।

वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि ।

वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ।। ७९ ।।

सत्यवतीके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले- ‘भीरु! मेरा प्रिय कार्यकरके भी तुम कन्या ही रहोगी। भामिनि! तुम जो चाहो, वह मुझसे वर माँग लो।शुचिस्मिते! आजसे पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है’ ।। ७८- ७९ ।।

एवमुक्ता वरं वक्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् ।

स चास्यै भगवान् प्रादान्मनसःकाङ्क्षितं भुवि ।। ८० ।।

महर्षिके ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपने शरीरमें उत्तम सुमन होनेका वरदान माँगा।भगवान् पराशरने इस भूतलपर उसे वह मनोवांछित वर दे दिया ।। ८० ।।

ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता।

जगाम सह संसर्गमृषिणाद्भुतकर्मणा ।। ८१ ।।

तेन गन्धवतीत्येवं नामास्याः प्रथितं भुवि ।

तस्यास्तु योजनाद् गन्धमाजिघ्रन्त नरा भुवि ।। ८२ ।।

तदनन्तर वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपनके समागमोचित गुण (सद्यःऋतुस्नान आदि)-से विभूषित हो गयी और उसने अद्भुतकर्मा महर्षि पराशरके साथसमागम किया। उसके शरीरसे उत्तम गरन्ध फैलनेके कारण पृथ्वीपर उसका गन्धवती नामविख्यात हो गया। इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी उसकी दिव्य सुगन्धकाअनुभव करते थे। इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया ।। ८१-८२ ।।

तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् ।

इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम् ।। ८३ ।।

पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भ सुषाव सा ।

जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान् ।। ८४ ।।

इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षोल्लाससे भरी हुई सत्यवतीने महर्षि पराशरकासंयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया | यमुनाके द्वीपमें अत्यन्तशक्तिशाली पराशरनन्दन व्यास प्रकट हुए ।। ८३-८४ ।।

स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे ।

स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ।। ८५ ।।

उन्होंने मातासे यह कहा-‘आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना। मैं अवश्यदर्शन दूँगा।’ इतना कहकर माताकी आज्ञा ले व्यासजीने तपस्यामें ही मन लगाया ।। ८५ ।।

एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् ।

न्यस्तो द्वीपे स यद् बालस्तस्माद् द्वैपायनः स्मृतः ।। ८६ ।।

इस प्रकार महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन व्यासजीका जन्म हुआ। वेबाल्यावस्थामें ही यमुनाके द्वीपमें छोड़ दिये गये, इसलिये ‘द्वैपायन’ नामसे प्रसिद्धहुए ।। ८६ ।।

(ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम् ।

तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि ।।)

तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी। उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्यएक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे। उसका पिता दाशराज भीउसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ।

दाश उवाच

(त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता ।

अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता ।।)

दाशराजने पूछा-बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी-सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे’मत्स्यगन्धा’ कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकीदुर्गन्ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है?

सत्यवत्युवाच

(दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिघ्रन् प्रीतिमावहत् ।

शक्तेः पुत्रो महाप्राज्ञः पराशर इति स्मृतः ।।

नावं वाहयमानाया मम दृष्ट्वा सुगर्हितम् ।

अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ ।।

ऋषेः प्रसादं दृष्ट्वा तु जनाः प्रीतिमुपागमन् ।)

सत्यवती बोली-पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, (वे यमुनाजीकेतटपर आये थे; उस समय) मैं नाव खे रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गन्धताकी ओर लक्ष्य करकेमुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एकयोजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है। महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़ेप्रसन्न हुए।

पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान् युगे युगे ।

आयुः शक्तिं च मत्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च ।। ८७ ।।

ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया।

विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृतः ।। ८८ ।।

विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहाहै। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यहसब देख-सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास(विस्तार) किया। इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए ।। ८७-८८ ।।

वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्।

सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ।। ८९ ।।

प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च ।

संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ।। ९० ।।

सर्वश्रेष्ठ वरदायक भगवान् व्यासने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययनसुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुकदेव तथा मुझ वैशम्पायनको कराया। फिर उन सबनेपृथक्-पृथक् महाभारतकी संहिताएँ प्रकाशित कीं ।। ८९-९० ।।

तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः।

वसुवीर्यात् समभवन्महावीर्यों महायशाः ।। ९१ ।।

अमिततेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म आठवें वसुके अंशसे तथा गंगाजीके गर्भसे उत्पन्नहुए। वे महान् पराक्रमी और अत्यन्त यशस्वी थे ।। ९१ ।।

वेदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशाः ।

शूले प्रोतः पुराणर्षिरचौरश्चौरशङ्कया ।। ९२ ।।

अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः ।

स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान् ।। ९३ ।।

पूर्वकालकी बात है वेदार्थोंके ज्ञाता, महान् यशस्वी, पुरातन मुनि, ब्रह्मर्षि भगवान्अणीमाण्डव्य चोर न होते हुए भी चोरके संदेहसे शूलीपर चढ़ा दिये गये। परलोकमें जानेपरउन महायशस्वी महर्षिने पहले धर्मको बुलाकर इस प्रकार कहा- I। ९२-९३ ।।

इषीकया मया बाल्याद् विद्धा हयका शकुन्तिका ।

तत् किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत् पापमहं स्मरे ।। ९४ ।।

‘धर्मराज! पहले कभी मैंने बाल्यावस्थाके कारण सींकसे एक चिड़ियेके बच्चेको छेददिया था। वही एक पाप मुझे याद आ रहा है। अपने दूसरे किसी पापका मुझे स्मरण नहींहै ।। ९४ ।।

तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत् तपः ।

गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद् यतः ।। ९५ ।।

‘मैंने अगणित सहस्रगुना तप किया है। फिर उस तपने मेरे छोटे-से पापको क्यों नहींनष्ट कर दिया। ब्राह्मणका वध समस्त प्राणियोंके वधसे बड़ा है ।। ९५ ।।

तस्मात् त्वं किल्बिषी धर्म शूद्रयोनौ जनिष्यसि ।

तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत ।। ९६ ।।

‘(तुमने मुझे शूलीपर चढ़वाकर वही पाप किया है) इसलिये तुम पापी हो। अतःपृथ्वीपर शूद्रकी योनिमें तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।’ अणीमाण्डव्यके उस शापसे धर्म भीशूद्रकी योनिमें उत्पन्न हुए ।। ९६ ।।

विद्वान् विदुररूपेण धार्मी तनुरकिल्बिषी ।

संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्गणात् ।। ९७ ।।

पापरहित विद्वान् विदुरके रूपमें धर्मराजका शरीर ही प्रकट हुआ था । उसी समयगवल्गणसे संजय नामक सूतका जन्म हुआ, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्माथे ।। ९७ ।।

सूर्याच्च कुन्तिकन्याया जज्ञे कर्णो महाबलः ।

सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ॥ ९८ ।।

राजा कुन्तिभोजकी कन्या कुन्तीके गर्भसे सूर्यके अंशसे महाबली कर्णकी उत्पत्ति हुई।वह बालक जन्मके साथ ही कवचधारी था। उसका मुख शरीरके साथ ही उत्पन्न हुएकुण्डलकी प्रभासे प्रकाशित होता था ।। ९८।।

अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुल्लोकनमस्कृतः ।

वसुदेवात् तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ।। ९९ ।।

उन्हीं दिनों विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेकेलिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए ।। ९९ ।।

अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः

अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ।। १०० ।।

वे भगवान् आदि-अन्तसे रहित, द्युतिमान्, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता तथा प्रभु हैं। उन्हींकोअव्यक्त अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म और त्रिगुणमय प्रधान कहते हैं ।। १०० ।।

आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् ।

पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ।। १०१ ।।

अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् ।

धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ।। १०२ ।।

कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् ।

पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ।। १०३ ।।

आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष(अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींकोअनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य,निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है । वे सर्वव्यापी, परमपुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ।। १०१ – १०३ ।।

धर्मसंवर्धनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु ।

अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ ।। १०४ ।।

उन्होंने ही धर्मकी वृद्धिके लिये अन्धक और वृष्णिकुलमें बलराम और श्रीकृष्णरूपमेंअवतार लिया था। वे दोनों भाई सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, महापराक्रमी और समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें परम प्रवीण थे ।। १०४ ।।

सात्यकिः कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतौ ।

सत्यकाद् हृदिकाच्चैव जज्ञातेऽस्त्रविशारदौ ।। १०५ ।।

सत्यकसे सात्यकि और हृदिकसे कृतवर्माका जन्म हुआ था वे दोनों अस्त्रविद्यामें अत्यन्त निपुण और भगवान् श्रीकृष्णके अनुगामी थे ।। १०५ ।।

भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत ।

महर्षेरुग्रतपसस्तस्माद् द्रोणो व्यजायत ।। १०६ ।।

एक समय उग्रतपस्वी महर्षि भरद्वाजका वीर्य किसी द्रोणी ( पर्वतकी गुफा)- में स्खलित होकर धीरे-धीरे पुष्ट होने लगा। उसीसे द्रोणका जन्म हुआ।। १०६ ।।

गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वतः ।

अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महाबलः ।। १०७ ।।

किसी समय गौतमगोत्रीय शरद्वान्का वीर्य सरकंडेके समूहपर गिरा और दो भागोंमें बँट गया। उसीसे एक कन्या और एक पुत्रका जन्म हुआ। कन्याका नाम कृपी था, अश्वत्थामाकी जननी हुई। पुत्र महाबली कृपके नामसे विख्यात हुआ।। १०७ ।।

अश्वत्थामा तथैव धृष्टद्युम्नोऽपि साक्षादग्निसमद्युतिः ।। १०८ ।।

वैताने कर्मणि ततः पावकात् समजायत ।

वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान् ।। १०९ ।।

तदनन्तर द्रोणाचार्यसे महाबली अश्वत्थामाका जन्म हुआ। इसी प्रकार यज्ञकर्मका अनुष्ठान होते समय प्रज्वलित अग्निसे धृष्टद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् अग्निदेवकेसमान तेजस्वी था। पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये धनुष लेकर प्रकट हुआ था ।। १०८-१०९ ।।

तत्रैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा।

विभ्राजमाना वपुषा बिभ्रती रूपमुक्तमम् ।। ११० ।।

उसी यज्ञकी वेदीसे शुभस्वरूपा तेजस्विनी द्रौपदी उत्पन्न हुई, जो परम उत्तम रूप धारण करके अपने सुन्दर शरीरसे अत्यन्त शोभा पा रही थी ।। ११० ।।

प्रहलादशिष्यो नग्नजित् सुबलश्चाभवत् ततः।

तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात् ।। १११ ।।

गान्धारराजपुत्रोऽभूच्छकुनिः सौबलस्तथा ।

दुर्योधनस्य जननी जज्ञातेऽर्थविशारदौ ।। ११२ ।।

जो ततो जज्ञे द्रोणादेव महाबलः ।प्रहलादका शिष्य नग्नजित् राजा सुबलके रूपमें प्रकट हुआ। देवताओंके कोपसे उसकीसंतति (शकुनि) धर्मका नाश करनेवाली हुई। गान्धारराज सुबलका पुत्र शकुनि एवं सौबलनामसे विख्यात हुआ तथा उनकी पुत्री गान्धारी दुर्योधनकी माता थी। ये दोनों भाई-बहिनअर्थशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे ।। १११-११२ ।।

कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।

क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महाबलः ।। ११३ ।।

धर्मार्थकुशलो धीमान् मेधावी धूतकल्मषः ।

विदुरः शूद्रयोनौ तु जज्ञे द्वैपायनादपि ।। ११४ ।।

पाण्डोस्तु जज्ञिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक् ।

द्वयोः स्त्रियोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद् युधिष्ठिरः ।। ११५ ।।

राजा विचित्रवीर्यकी क्षेत्रभूता अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे कृष्णद्वैपायनव्यासद्वारा राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ। ह्वैपायन व्याससे हीशूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजीका भी जन्म हुआ था। वे धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण,बुद्धिमान्, मेधावी और निष्पाप थे। पाण्डुसे दो स्त्रियोंके द्वारा पृथक्-पृथक् पाँच पुत्र उत्पन्नहुए, जो सब-के-सब देवताओंके समान थे। उन सबमें बड़े युधिष्ठिर थे। वे उत्तम गुणोंमें भीसबसे बढ़-चढ़कर थे ।। ११३-११५ ।।

धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः ।

इन्द्राद् धनंजयः श्रीमान् सर्वशस्त्रभृतां वरः ।। ११६ ।।

जज्ञाते रूपसम्पन्नावश्विभ्यां च यमावपि ।

नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ ।। ११७ ।।

युधिष्ठिर धर्मसे, भीमसेन वायुदेवतासे, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् अर्जुनइन्द्रदेवसे तथा सुन्दर रूपवाले नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न हुए थे। वे जुड़वेंपैदा हुए थे। और सहदेव सदा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते थे ।। ११६-११७ ।।

नकुल तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः ।

दुर्योधनप्रभृतयो युयुत्सुः करणस्तथा ।। ११८ ।।

परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र हुए। इनके अतिरिक्त युयुत्सु भीउन्हींका पुत्र था। वह वैश्यजातीय मातासे उत्पन्न होनेके कारण ‘करण’ कहलाताथा ।। ११८ ।।

ततो दुःशासनश्चैव दुःसहश्चापि भारत ।

दुर्मर्षणो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः ।। ११९ |।

जयः सत्यव्रतश्चैव पुरुमित्रश्च भारत ।

वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च एकादश महारथाः ।। १२० ।।

भरतवंशी जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें दुर्योधन, दुःशासन, दुःसह, दुर्मर्षण, विकर्ण,चित्रसेन, विविंशति, जय, सत्यव्रत, पुरुमित्र तथr वैश्यापुत्र युयुत्सु-ये ग्यारह महारथीथे ।। ११९-१२० ।।

अभिमन्युः सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत ।

स्वस्त्रीयो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः ।। १२१ ।।

अर्जुनद्वारा सुभद्राके गर्भसे अभिमन्युका जन्म हुआ। वह महात्मा पाण्डुका पौत्र औरभगवान् श्रीकृष्णका भानजा था ।। १२१ ।।

पाण्डवेभ्यो हि पाञ्चाल्यां द्रौपद्यां पञ्च जज्ञिरे ।

कुमारा रूपसम्पन्नाः सर्वशास्त्रविशारदाः ।। १२२ ।।

पाण्डवोंद्वारा द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो बड़े ही सुन्दर और सबशास्त्रोंमें निपुण थे ।। १२२ ।।

प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् ।

अर्जुनाच्छ्ुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ।। १२३ ।।

तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेनः प्रतापवान् ।

हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः ।। १२४ ।।

युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीकतथा सहदेवसे प्रतापी श्रुतसेनका जन्म हुआ था। भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासे वनमेंघटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। १२३-१२४ ।।

शिखण्डी द्रुपदाज्जज्ञे कन्या पुत्रत्वमागता ।

यां यक्षः पुरुषं चक्रे स्थूणः प्रियचिकीर्षया ।। १२५ ।।

राजा द्रुपदसे शिखण्डी नामकी एक कन्या हुई, जो आगे चलकर पुत्ररूपमें परिणत होगयी। स्थूणाकर्ण नामक यक्षने उसका प्रिय करनेकी इच्छासे उसे पुरुष बना दियाथा ।। १२५ ।।

कुरूणां विग्रहे तस्मिन् समागच्छन् बहून् यथा ।

राज्ञां शतसहस्राणि योत्स्यमानानि संयुगे ।। १२६ ।।

तेषामपरिमेयानां नामधेयानि सर्वशः ।

न शक्यानि समाख्यातुं वर्षाणामयुतैरपि ।

एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम् ।। १२७ ।।

कौरवोंके उस महासमरमें युद्ध करनेके लिये राजाओंके कई लाख योद्धा आये थे । दसहजार वर्षोंतक गिनती की जाय तो भी उन असंख्य योद्धाओंके नाम पूर्णतः नहीं बताये जासकते। यहाँ कुछ मुख्य-मुख्य राजाओंके नाम बताये गये हैं, जिनके चरित्रोंसे इसमहाभारत-कथाका विस्तार हुआ है ।। १२६-१२७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि व्यासाद्युत्पत्तौ त्रिषष्टितमोऽध्यायः।। ६३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें व्यास आदिकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६३ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४} श्लोक मिलाकर कुल १३१} श्लोक हैं)

चतुःषष्टितमोऽध्यायः

ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उससमयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म औरउनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जानातथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश।

जनमेजय उवाच

य एते कीर्तिता ब्रह्मन् ये चान्ये नानुकीर्तिताः।

सम्यक् ताञ्छ्रोतुमिच्छामि राज्ञश्चान्यान् सहस्रशः ।। १ ।।

जनमेजय बोले-ब्रह्मन्! आपने यहाँ जिन राजाओंके नाम बताये हैं और जिन दूसरेनरेशोंके नाम यहाँ नहीं लिये हैं, उन सब सहस्रों राजाओंका मैं भलीभाँति परिचय सुननाचाहता हूँ ।। १ ।।

यदर्थमिह सम्भूता देवकल्पा महारथाः ।

भुवि तन्मे महाभाग सम्यगाख्यातुमर्हसि ।। २ ।।

महाभाग! वे देवतुल्य महारथी इस पृथ्वीपर जिस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उत्पन्न हुएथे, उसका यथावत् वर्णन कीजिये ।। २ ।।

वैशम्पायन उवाच

रहस्यं खल्विदं राजन् देवानामिति नः श्रुतम् ।

तत्तु ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।। ३ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-राजन्! यह देवताओंका रहस्य है, ऐसा मैंने सुन रखा है।स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार करके आज उसी रहस्यका तुमसे वर्णन करूँगा ।। ३ ।।

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा ।

जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ।। ४ ।।

तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।

ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन् सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥ ५ ॥

पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियरहित करके उत्तमपर्वत महेन्द्रपर तपस्या की थी। उस समय जब भृगुनन्दनने इस लोकको क्षत्रियशून्य करदिया था, क्षत्रिय-नारियोंने पुत्रकी अभिलाषासे ब्राह्हणोंकी शरण ग्रहण की थी ।। ४-५ ।।

ताभिः सह समापेतुब्र्राह्मणाः संशितव्रताः ।

ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा ।। ६ ।।

नरत्न! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकालमें ही उनके साथ मिलते थे; न तोकामवश और न बिना ऋतुकालके ही ।। ६ ।।

तेभ्यश्च लेभिरे गर्भ क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।

ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ।। ७ ।।

कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये ।

एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ।।८ ।।

जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम् ।

चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुब्ब्राह्मणोत्तराः ।। ९ ।।

राजन्! उन सहस्रों क्षत्राणियोंने ब्राह्मणोंसे गर्भ धारण किया और पुनः क्षत्रियकुलकीवृद्धिके लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों तथा कुमारियोंको जन्म दिया । इस प्रकारतपस्वी ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्राणियोंके गर्भसे धर्मपूर्वक क्षत्रिय-संतानकी उत्पत्ति और वृद्धि हुई।वे सब संतानें दीर्घायु होती थीं। तदनन्तर जगत्में पुनः ब्राह्मणप्रधान चारों वर्ण प्रतिष्ठितहुए ।। ७-९ ।।

अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा ।

तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ।। १० ।।

ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत् तथा भरतर्षभ।

ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ।। ११ ।।

उस समय सब लोग ऋतुकालमें ही पत्नीसमागम करते थे; केवल कामनावश याऋतुकालके बिना नहीं करते थे। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिकी योनिमें पड़े हुए जीव भीऋतुकालमें ही अपनी स्त्रियोंसे संयोग करते थे। भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्मका आश्रय लेनेसेसब लोग सहस्र एवं शत वर्षोंतक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करतेथे ।। १०-११ ।।

ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः ।

आधिभिव्र्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ।। १२ ।।

भूपाल! उस समयकी प्रजा धर्म एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहती थी; अत: सभी लोगरोगों तथा मानसिक चिन्ताओंसे मुक्त रहते थे ।। १२ ।।

अथेमां सागरापाङ्गीं गां गजेन्द्रगताखिलाम् ।

अध्यतिष्ठत् पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम् ।। १३ ।।

गजराजके समान गमन करनेवाले राजा जनमेजय! तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्रसे घिरीहुई पर्वत, वन और नगरोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर पुनः क्षत्रियजातिका ही अधिकार होगया ।। १३ ।।

प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम् ।

ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम् ।। १४ ।।

जब पुनः क्षत्रिय शासक धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करने लगे, तब ब्राह्मण आदिवर्णोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ।। १४ ।।

कामक्रोधोद्भवान् दोषान् निरस्य च नराधिपाः ।

धर्मेण दण्डं दण्ड्येषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन् ।। १५ ।।

उन दिनों राजालोग काम और क्रोधजनित दोषोंको दूर करके दण्डनीय अपराधियोंकोधर्मानुसार दण्ड देते हुए पृथ्वीका पालन करते थे ।। १५ ।।

तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्राक्षः शतक्रतुः।

स्वादु देशे च काले च वर्षेणापालयत् प्रजाः ।। १६ ।।

इस तरह धर्मपरायण क्षत्रियोंके शासनमें सारा देश-काल अत्यन्त रुचिकर प्रतीत होनेलगा। उस समय सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र समयपर वर्षा करके प्रजाओंका पालन करतेथे ।। १६ ।।

न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप ।

न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनः ।। १७ ।।

राजन्! उन दिनों कोई भी बाल्यावस्थामें नहीं मरता था। कोई भी पुरुष युवावस्थाप्राप्त हुए बिना स्त्री-सुखका अनुभव नहीं करता था ।। १७ ।।

एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ ।

इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ।। १८ ।।

भरतश्रेष्ठ! ऐसी व्यवस्था हो जानेसे समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी दीर्घकालतक जीवितरहनेवाली प्रजाओंसे भर गयी।। १८ ।।

ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः ।

साङ्गोपनिषदान् वेदान् विप्राश्चाधीयते तदा ।। १९ ।।

क्षत्रियलोग बहुत-सी दक्षिणावाले बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन करते थे। ब्राह्मण अंगों औरउपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करते थे ।। १९ ।।

न च विक्रीणते ब्रह्म ब्राह्मणाश्च तदा नृप ।

न च शूद्रसमभ्याशे वेदानुच्चारयन्त्युत ।। २० ।।

राजन्! उस समय ब्राह्मण न तो वेदका विक्रय करते और न शूद्रोंके निकट वेदमन्त्रोंकाउच्चारण ही करते थे ।। २० ।।

कारयन्तः कृषिं गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविह ।

युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशाङ्गांश्चाप्यजीवयन् ।। २१ ।।

वैश्यगण बैलोंद्वारा इस पृथ्वीपर दूसरोंसे खेती कराते हुए भी स्वयं उनके कंधेपर जुआनहीं रखते थे-उन्हें बोझ ढोनेमें नहीं लगाते थे और दुर्बल अंगोंवाले निकम्मे पशुओंको भीदाना-घास देकर उनके जीवनकी रक्षा करते थे ।। २१ ।।

फेनपांश्च तथा वत्सान् न दुहन्ति स्म मानवाः।

न कूटमानैर्वणिजः पाण्यं विक्रीणते तदा ।। २२ ।।

जबतक बछड़े केवल दूधपर रहते, घास नहीं चरते, तबतक मनुष्य गौओंका दूध नहींदुहते थे। व्यापारीलोग बेचने योग्य वस्तुओंका झूठे माप-तौलद्वारा विक्रय नहीं करतेथे ।। २२ ।।

कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः ।

धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ।। २३ ।।

नरश्रेष्ठ! सब मनुष्य धर्मकी ही ओर दृष्टि रखकर धर्में ही तत्पर हो धर्मयुक्त कर्मोंकाही अनुष्ठान करते थे ।। २३ ।।

स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप ।

एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न हरसते क्वचित् ।। २४ ।।

राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे। नरश्रेष्ठ!इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ।। २४ ।।

काले गावः प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ ।

भवन्त्यृतुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ।। २५ ।।

भरतश्रेष्ठ! गौएँ तथा स्त्रियाँ भी ठीक समयपर ही संतान उत्पन्न करती थीं। ऋतुआनेपर ही वृक्षोंमें फूल और फल लगते थे ।। २५ ।।

एवं कृतयुगे सम्यग् वर्तमाने तदा नृप।

आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिर्भृशम् ।। २६ ।।

नरेश्वर! इस तरह उस समय सब ओर सत्ययुग छा रहा था। सारी पृथ्वी नाना प्रकारकेप्राणियोंसे खूब भरी-पूरी रहती थी ।। २६ ।।

एवं समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ ।

असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ।। २७ ।।

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण मानव-जगत् बहुत प्रसन्न था। मनुजेश्वर! इसी समयअसुरलोग राजपत्नियोंके गर्भसे जन्म लेने लगे ।। २७ ।।

आदित्यै्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि ।

ऐश्वर्याद् भ्रंशिताः स्वर्गात् सम्बभूवुः क्षिताविह । २८ ।।

उन दिनों अदितिके पुत्रों (देवताओं)-द्वारा दैत्यगण अनेक बार युद्धमें पराजित हो चुकेथे। स्वर्गके ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होनेपर वे इस पृथ्वीपर ही जन्म लेने लगे ।। २८ ।।

इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः ।

जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ।। २९ ।।

प्रभो! यहीं रहकर देवत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे वे मनस्वी असुर भूतलपर मनुष्यों तथाभिन्न-भिन्न प्राणियोंमें जन्म लेने लगे ।। २९ ।।

गोष्वश्वेषु च राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिषेषु च ।

क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ।। ३० ।।

जातैरिह महीपाल जायमानैश्च तैर्मही ।

न शशाकात्मनाऽऽत्मानमियं धारयितुं धरा ।। ३१ ।।

राजेन्द्र! गौओं, घोड़ों, गदहों, ऊँटों, भैसों, कच्चे मांस खानेवाले पशुओं, हाथियों औरमृगोंकी योनिमें भी यहाँ असुरोंने जन्म लिया और अभीतक वे जन्म धारण करते जा रहे थे ।उन सबसे यह पृथ्वी इस प्रकार भर गयी कि अपने-आपको भी धारण करनेमें समर्थ न होसकी ।। ३०-३१ ।।

अथ जाता महीपालाः केचिद् बहुमदान्विताः ।

दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोक इह च्युताः ।। ३२ ।।

वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् ।

इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ।। ३३ ।।

स्वर्गसे इस लोकमें गिरे हुए तथा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए कितने ही दैत्य औरदानव अत्यन्त मदसे उन्मत्त रहते थे। वे पराक्रमी होनेके साथ ही अहंकारी भी थे अनेकप्रकारके रूप धारण कर अपने शत्रुओंका मान-मर्दन करते हुए समुद्रपर्यज सारी पृथ्वीपरविचरते रहते थे ।। ३२-३३ ।।

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ्छूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् ।

अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ।। ३४ ।।

वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंको भी सताया करते थे। अन्यान्य जीवोंको भीअपने बल और पराक्रमसे पीड़ा देते थे ।। ३४ ।।

त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते ।

विचेरुः सर्वशो राजन् महीं शतसहस्रशः ।। ३५ ।।

वे लाखोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे और समस्त प्राणियोंको डराते- राजन्! धमकाते तथा उनकी हिंसा करते हुए भूमण्डलमें सब ओर घूमते रहते थे ।। ३५ ।।

आश्रमस्थान् महर्षीश्च धर्षयन्तस्ततस्ततः ।

अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदबलेन च ।। ३६ ।।

वे वेद और ब्राह्मणके विरोधी, पराक्रमके नशेमें चूर तथा अहंकार और बलसे मतवालेहोकर इधर-उधर आश्रमवासी महर्षियोंका भी तिरस्कार करने लगे ।। ३६ ।।

एवं वीर्यबलोत्सित्तैर्भूरियत्नैर्महासुरैः ।

पीड्यमाना मही राजन् ब्रह्माणमुपचक्रमे ।। ३७ ।।

राजन्! जब इस प्रकार बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त महादैत्य विशेष यत्नपूर्वकइस पृथ्वीको पीड़ा देने लगे, तब यह ब्रह्माजीकी शरणमें जानेको उद्यत हुई ।। ३७ ।।

न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् ।

असुरतदा धारयितुं शेकुः संक्रान्तां दानवैर्बलात् ।। ३८ ।।

ततो मही महीपाल भारात्ता भयपीडिता ।

जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ।॥ ३९ ।।

सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः ।

ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ।। ४० ।।

दानवोंने बलपूर्वक जिसपर अधिकार कर लिया था, पर्वतों और वृक्षोंसहित उस पृथ्वीको उस समय कच्छप और दिग्गज आदिकी संगठित शक्तियाँ तथा शेषनाग भी धारणकरनेमें समर्थ न हो सके। महीपाल! तब असुरोंके भारसे आतुर तथा भयसे पीड़ित हुईपृथ्वी सम्पूर्ण भूतोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें उपस्थित हुई। ब्रह्मलोकमेंजाकर पृथ्वीने उन लोकस्रष्टा अविनाशी देव भगवान् ब्रह्माजीका दर्शन किया, जिन्हेंमहाभाग देवता, द्विज और महर्षि घेरे हुए थे ।। ३८-४० ।।

गन्धर्वैरप्सतेभिश्च दैवकर्मसु निष्ठितैः ।

वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ।। ४१ ।।

देवकर्ममें संलग्न रहनेवाले अप्सराएँ और गन्धर्व उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करते थे।पृथ्वीने उनके निकट जाकर प्रणाम किया।। ४१ ।।

अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी ।

संनिधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ।। ४२ ।।

तत् प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयम्भुवः ।

पूर्वमेवाभवद् राजन् विदितं परमेष्ठिनः ।। ४३ ।।

भारत! तदनन्तर शरण चाहनेवाली भूमिने समस्त लोकपालोंके समीप अपना सारादुःख ब्रह्माजीसे निवेदन किया। राजन्! स्वयम्भू ब्रह्मा सबके कारणरूप हैं, अतः पृथ्वीकाजो आवश्यक कार्य था वह उन्हें पहलेसे ही ज्ञात हो गया था ।। ४२-४३ ।।

स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्बुध्येत भारत ।

ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम् ।। ४४ ।।

भारत! भला जो जगत्के स्रष्टा हैं, वे देवताओं और असुरोंसहित समस्त जगत्कासम्पूर्ण मनोगत भाव क्यों न समझ लें ।। ४४ ।।

तामुवाच महाराज भूमिं भूमिपतिः प्रभुः।

प्रभवः सर्वभूतानामीशः शम्भुः प्रजापतिः ।। ४५ ।।

महाराज! जो इस भूमिके पालक और प्रभु हैं, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा समस्तप्राणियोंके अधीश्वर हैं, वे कल्याणमय प्रजापति ब्रह्माजी उस समय भूमिसे इस प्रकारबोले ।। ४५ ।।

ब्रह्मोवाचयदर्थमभिसम्प्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे ।

तदर्थं संनियोक्ष्यामि सर्वानेव दिवौकसः ।॥ ४६ ।।

ब्रह्माजीने कहा-वसुन्धरे! तुम जिस उद्देश्यसे मेरे पास आयी हो, उसकी सिद्धिकेलिये मैं सम्पूर्ण देवताओंको नियुक्त कर रहा हूँ ।। ४६ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा स महीं देवो ब्रह्मा राजन् विसृज्य च ।

आदिदेश तदा सर्वान् विबुधान् भूतकृत् स्वयम् ।। ४७ ।।

अस्या भूमेर्निरसितुं भारं भागैः पृथक् पृथक् ।

अस्यामेव प्रसूयध्वं विरोधायेति चाब्रवीत् ।। ४८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीनेऐसा कहकर उस समय पृथ्वीको तो विदा कर दिया और समस्त देवताओंको यह आदेशदिया-‘देवताओ! तुम इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने-अपने अंशसे पृथ्वीकेविभिन्न भागोंमें पृथक्-पृथक् जन्म ग्रहण करो। वहाँ असुरोंसे विरोध करके अभीष्टउद्देश्यकी सिद्धि करनी होगी’ ।। ४७-४८ ।।

तथैव स समानीय गन्धर्वाप्सरसां गणान् ।

उवाच भगवान् सर्वानिदं वचनमर्थवत् ।। ४९ ।।

इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने सम्पूर्ण गन्धर्वों और अप्सराओंको भी बुलाकर यहअर्थसाधक वचन कहा ।। ४९ ।।

ब्रह्मोवाच

स्वैः स्वैरंशैः प्रसूयध्वं यथेष्टं मानुषेषु च ।

अथ शक्रादयः सर्वे श्रुत्वा सुरगुरोर्वचः ।

तव्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ।। ५० ।।

ब्रह्माजी बोले-तुम सब लोग अपने-अपने अंशसे मनुष्योंमें इच्छानुसार जन्म ग्रहणकरो। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने देवगुरु ब्रह्माजीकी सत्य, अर्थसाधक औरहितकर बात सुनकर उस समय उसे शिरोधार्य कर लिया ।। ५० ।।

अथ ते सर्वशोंsशैः स्वैर्गन्तुं भूमिं कृतक्षणाः ।

नारायणममित्रघ्नं वैकुण्ठमुपचक्रमुः ।। ५१ ।।

अब वे अपने-अपने अंशोंसे भूलोकमें सब ओर जानेका निश्चय करके शत्रुओंका नाशकरनेवाले भगवान् नारायणके समीप वैकुण्ठधाममें जानेको उद्यत हुए ।। ५१ ।।

यः स चक्रगदापाणिः पीतवासाः शितिप्रभः ।

पद्मनाभः सुरारिघ्नः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ।। ५२ ।।

जो अपने हाथोंमें चक्र और गदा धारण करते हैं, पीताम्बर पहनते हैं, जिनके अंगोंकीकान्ति श्याम रंगकी है, जिनकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव हुआ है, जो देव-शत्रुओंकेनाशक तथा विशाल और मनोहर नेत्रोंसे युक्त हैं ।। ५२ ।।

प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथो महाबलः ।

श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ।। ५३ ।।

जो प्रजापतियोंके भी पति, दिव्यस्वरूप, देवताओंके रक्षक, महाबली, श्रीवत्सचिह्नसेसुशोभित, इन्द्रियोंके अधिष्ठाता तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हैं ।। ५३ ।।

तं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् ।

अंशेनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः ।। ५४ ।।

उन भगवान् पुरुषोत्तमके पास जाकर इन्द्रने उनसे कहा- ‘प्रभो! आप पृथ्वीकाशोधन (भार-हरण) करनेके लिये अपने अंशसे अवतार ग्रहण करें।’ तब श्रीहरिने ‘तथास्तु’कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ।। ५४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः ।। ६४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६४ ।।

‘वैश्यायां क्षत्रियाज्जात: करणः परिकीर्तितः ।’ (वैश्य माता और क्षत्रिय पितासे उत्पन्न पुत्र ‘करण’ कहलाता है) इसधर्मशास्त्रीय वचनके अनुसार युयुत्सुकी ‘करण’ संज्ञा बतायी गयी है।(सम्भवपर्व)

पञ्चरषष्टितमोऽध्यायः

मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण

वैशम्पायन उवाच

अथ नारायणेनेन्द्रश्वकार सह संविदम् ।

अवतर्तुं महीं स्वर्गादंशतः सहितः सुरैः ।। १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! देवताओंसहित इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ स्वर्गएवं वैकुण्ठसे पृथ्वीपर अंशतः अवतार ग्रहण करनेके सम्बन्धमें कुछ सलाह की ।। १ ।।

आदिश्य च स्वयं शक्रः सर्वानेव दिवौकसः ।

निर्जगाम पुन्स्तस्मात् क्षयान्नारायणस्य ह ।। २ ।।

तत्पश्चात् सभी देवताओंको तदनुसार कार्य करनेके लिये आदेश देकर वे भगवान्नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठधामसे पुनः चले आये ।। २।

तेऽमरारिविनाशाय सर्वलोकहिताय च ।

अवतेरुः क्रमेणैव महीं स्वर्गाद् दिवौकसः ॥ ३ ।।

तब देवतालोग सम्पूर्ण लोकोंके हित तथा राक्षसोंके विनाशके लिये स्वर्गसे पृथ्वीपरआकर क्रमश: अवतीर्ण होने लगे ।। ३ ।।

ततो ब्रह्मर्षिवंशेषु पार्थिवर्षिकुलेषु च ।

जज्ञिरे राजशार्दूल यथाकामं दिवौकसः ।। ४ ।।

नृपश्रेष्ठ! वे देवगण अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मर्षियों अथवा राजर्षियोंके वंशमें उत्पन्नहुए ।। ४ ।।

दानवान् राक्षसांश्चैव गन्धर्वान् पन्नगांस्तथा।

पुरुषादानि चान्यानि जघ्नुः सत्त्वान्यनेकशः ।। ५ ।।

दानवा राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगास्तथा।

न तान् बलस्थान् बाल्येऽपि जघ्नुर्भरतसत्तम् ।। ६ ।।

वे दानव, राक्षस, दुष्ट गरन्धर्व, सर्प तथा अन्यान्य मनुष्यभक्षी जीवोंका बारम्बार संहारकरने लगे। भरतश्रेष्ठ! वे बचपनमें भी इतने बलवान् थे कि दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा सर्पउनका बाल बॉका तक नहीं कर पाते थे ।। ५-६ ।।

जनमेजय उवाच

देवदानवसङ्घानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ।

मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम् ।। ७ ।।

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सम्भवं कृत्स्नमादितः ।

प्राणिनां चैव सर्वेषां सम्भवं वक्तुमर्हसि ॥८॥

जनमेजय बोले-भगवन्! मैं देवता, दानवसमुदाय, गन्धर्व, अप्सरा, मनुष्य, यक्ष,राक्षस तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। आप कृपा करकेआरम्भसे ही इन सबकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन कीजिये ।। ७-८ ।।

वैशम्पायन उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।

सुरादीनामहं सम्यग् लोकानां प्रभवाप्ययम् ।। ९ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-अच्छा, मैं स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा एवं नारायणको नमस्कारकरके तुमसे देवता आदि सम्पूर्ण लोगोंकी उत्पत्ति और नाशका यथावत् वर्णन करताहूँ ।। ९ ।।

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः ।

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।। १० ।।

ब्रह्माजीके मानस पुत्र छः महर्षि विख्यात हैं- मरीचि, अत्रि अंगिरा, पुलस्त्य, पुलहऔर क्रतु ।। १० ।।

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात् तु इमाः प्रजाः ।

प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश ।। ११ ।।

मरीचिके पुत्र कश्यप थे और कश्यपसे ही ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। (ब्रह्माजीकेएक पुत्र दक्ष भी हैं) प्रजापति दक्षके परम सौभाग्यशालिनी तेरह कन्याएँ थीं ।। ११ ।।

अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा।

क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः ।। १२ ।।

कट्टूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत ।

एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।। १३ ।।

नरश्रेष्ठ! उनके नाम इस प्रकार हैं-अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा(क्रूरा), प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और कटू। भारत! ये सभी दक्षकी कन्याएँ हैं।इनके बल-पराक्रमसम्पन्न पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है ।। १२-१३ ।।

अदित्यां द्वादशादित्याः सम्भूता भुवनेश्वराः ।

ये राजन् नामतस्तांस्ते कीर्तयिष्यामि भारत ।। १४ ।।

अदितिके पुत्र बारह आदित्य हुए, जो लोकेश्वर हैं। भरतवंशी नरेश! उन सबके नामतुम्हें बता रहा हूँ- ।। १४ ।।

धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च ।

भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ।। १५ ।।

एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते ।

जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः । । १६ ।।

धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवेंत्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। इन सब आदित्योंमें विष्णु छोटे हैं; किंतु गुणोंमें वेसबसे बढ़कर हैं ।। १५-१६ ।।

एक एव दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुः स्मृतः ।

नाम्ना ख्यातास्तु तस्येमे पञ्च पुत्रा महात्मनः ।। १७ ।।

दितिका एक ही पुत्र हिरण्यकशिपु अपने नामसे विख्यात हुआ। उस महामना दैत्यकेपाँच पुत्र थे ।। १७ ।।

प्रहलादः पूर्वजस्तेषां संह्रादस्तदनन्तरम् ।

अनुह्ादस्तृतीयोऽभूत् तस्माच्च शिबिबाष्कलौ ।। १८ ।।

उन पाँचोंमें प्रथमका नाम प्रह्लाद है।उससे छोटेको संहाद कहते हैं। तीसरेका नामअनुह्ाद है। उसके बाद चौथे शिबि और पाँचवें बाष्कल हैं ।। १८ ।।

प्रह्लादस्य त्रयः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत ।

विरोचनश्च कुम्भश्च निकुम्भश्चेति भारत ।। १९ ।।

भारत! प्रहलादके तीन पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं । उनके नाम ये हैं- विरोचन, कुम्भ और निकुम्भ ।। १९ ।।

विरोचनस्य पुत्रोऽभूद् बलिरेकः प्रतापवान् ।

बलेश्व प्रथितः पुत्रो बाणो नाम महासुरः ।। २० ।।

विरोचनके एक ही पुत्र हुआ, जो महाप्रतापी बलिके नामसे प्रसिद्ध है। बलिकाविश्वविख्यात पुत्र बाण नामक महान् असुर है ।। २० ।।

रुद्रस्यानुचरः श्रीमान् महाकालेति यं विदुः ।

चतुस्त्रिंशद् दनोः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत ।। २१ ।।

जिसे सब लोग भगवान् शंकरके पार्षद श्रीमान् महाकालके नामसे जानते हैं। भारत !दनुके चौंतीस पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं ।। २१ ।।

तेषां प्रथमजो राजा विप्रचित्तिर्महायशाः ।

शम्बरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः ।। २२ ।।

असिलोमा च केशी च दुर्जयश्चैव दानवः ।

अयःशिरा अश्वशिरा अश्वशंकुश्च वीर्यवान् ।। २३ ।।

तथा गगनमूर्धा च वेगवान् केतुमांश्च सः ।

स्वर्भानुरश्वोऽश्वपतिर्वृषपर्वाजकस्तथा ।। २४ ।।

अश्वग्रीवश्च सूक्ष्मश्च तुहुण्डश्च महाबलः ।

इषुपादेकचक्रश्च विरूपाक्षो हराहरौ ।। २५ ।।

निचन्द्रश्च निकुम्भश्च कुपटः कपटस्तथा ।

शरभः शलभश्चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा ।

एते ख्याता दनोर्वंशे दानवाः परिकीर्तिताः ।। २६ ।।

उनमें महायशस्वी राजा विप्रचित्ति सबसे बड़ा था। उसके बाद शम्बर, नमुचि, पुलोमा,असिलोमा, केशी, दुर्जय, अय:शिरा, अश्वशिरा, पराक्रमी अश्वशंकु, गगनमूर्धा, वेगवान्,केतुमान्, स्वर्भानु, अश्व, अश्वपति, वृषपर्वा अजक , अश्वग्रीव, सूक्ष्म, महाबली तुहुण्ड,इषुपाद, एकचक्र, विरूपाक्ष, हर, अहर, निचन्द्र, निकुम्भ, कुपट, कपट, शरभ, शलभ, सूर्यऔर चन्द्रमा हैं। ये दनुके वंशमें विख्यात दानव बताये गये हैं ।। २२ – २६ ।।

अन्यौ तु खलु देवानां सूर्याचन्द्रमसौ स्मृतौ ।

अन्यौ दानवमुख्यानां सूर्याचन्द्रमसौ तथा ।। २७ ।।

देवताओंमें जो सूर्य और चन्द्रमा माने गये हैं, वे दूसरे हैं और प्रधान दानवोंमें सूर्य तथाचन्द्रमा दूसरे हैं ।। २७ ।।

इमे च वंशाः प्रथिताः सत्त्ववन्तो महाबलाः ।

दनुपुत्रा महाराज दश दानववंशजाः | २८ ।।

महाराज! ये विख्यात दानववंश कहे गये हैं, जो बड़े धैर्यवान् और महाबलवान् हुए हैं।दनुके पुत्रोंमें निम्नांकित दानवोंके दस कुल बहुत प्रसिद्ध हैं- ।। २८ ।।

एकाक्षो मृतपा वीरः प्रलम्बनरकावपि ।

वातापी शत्रुतपनः शठश्चैव महासुरः ।। २९ ।।

गविष्ठश्च वनायुश्च दीर्घजिह्वश्च दानवः ।

असंख्येयाः स्मृतास्तेषां पुत्राः पौत्राश्च भारत ।। ३० ।।

एकाक्ष, वीर मृतपा, प्रलम्ब, नरक, वातापी, शत्रुतपन, महान् असुर शठ, गविष्ठ,तथा दानव दीर्घजिह्व। भारत! इन सबके पुत्र-पौत्र असंख्य बताये गये हैं ।। २९ -३० ।।

सिंहिका सुषुवे पुत्रं राहुं चन्द्रार्कमर्दनम् ।

सुचन्द्रं चन्द्रहर्तारं तथा चन्द्रप्रमर्दनम् ।। ३१ ।।

सिंहिकाने राहु नामक पुत्रको उत्पन्न किया, जो चन्द्रमा और सूर्यका मान-मर्दनकरनेवाला है। इसके सिवा सुचन्द्र, चन्द्रहर्ता तथा चन्द्रप्रमर्दनको भी उसीने जन्मदिया ।। ३१ ।।

वनायु क्रूरस्वभावं क्रूरायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।

गणः क्रोधवशो नाम क्रूरकर्मारिमर्दनः । ३२ ।।

क्रूरा (क्रोधा)-के क्रूर स्वभाववाले असंख्य पुत्र -पौत्र उत्पन्न हुए | शत्रुओंका नाश करनेवाला क्रूरकर्मा क्रोधवश नामक गण भी क्रूराकी ही संतान हैं ।। ३२ ।।

दनायुषः पुनः पुत्राश्चत्वारोऽसुरपुङ्गवाः ।

विक्षरो बलवीरौ च वृत्रश्चैव महासुरः ।। ३३ ।।

दनायुके असुरोंमें श्रेष्ठ चार पुत्र हुए- विक्षर, बल, वीर और महान् असुर वृत्र ।। ३३ ।।

कालायाः प्रथिताः पुत्राः कालकल्पाः प्रहारिणः ।

प्रविख्याता महावीर्या दानवेषु परंतपाः ।। ३४ ।।

कालाके विख्यात पुत्र अस्त्र-शसत्रोंका प्रहार करनेमें कुशल और साक्षात् कालके समान भयंकर थे। दानवोंमें उनकी बड़ी ख्याति थी। वे महान् पराक्रमी और शत्रुओंको संताप देनेवाले थे ।। ३४ ।।

विनाशनश्च क्रोधश्च क्रोधहन्ता तथैव च ।

क्रोधशत्रुस्तथैवान्ये कालकेया इति श्रुताः ।। ३५ ।।

उनके नाम इस प्रकार हैं-विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्ता तथा क्रोधशत्रु। कालकेय नामसे विख्यात दूसरे-दूसरे असुर भी कालाके ही पुत्र थे ।। ३५ ।।

असुराणामुपाध्यायः शुक्रस्त्वृषिसुतोऽभवत् ।

ख्याताश्चोशनसः पुत्राश्चत्वारोऽसुरयाजकाः ।। ३६ ।।

असुरोंके उपाध्याय (अध्यापक एवं पुरोहित ) शुक्राचार्य महर्षि भृगुके पुत्र थे। उन्हें उशना भी कहते हैं। उशनाके चार पुत्र हुए, जो असुरोंके पुरोहित थे ।। ३६ ।।

त्वष्टाधरस्तथात्रिश्च द्वावन्यौ रौद्रकर्मिणौ ।

तेजसा सूर्यसंकाशा ब्रह्मलोकपरायणाः । ३७ ।।

इनके अतिरिक्त त्वष्टाधर तथा अत्रि ये दो पुत्र और हुए, जो रौद्र कर्म करने और करानेवाले थे। उशनाके सभी पुत्र सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्मलोकको ही परम आश्रय माननेवाले थे ।। ३७ ।।

इत्येष वंशप्रभवः कथितस्ते तरस्विनाम् ।

असुराणां सुराणां च पुराणे संश्रुतो मया ।। ३८ ।।

राजन्! मैंने पुराणमें जैसा सुन रखा है, उसके अनुसार तुमसे यह वेगशाली असुरों और देवताओंके वंशकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बताया है ।। ३८ ।।

एतेषां यदपत्यं तु न शक्यं तदशेषतः ।

प्रसंख्यातुं महीपाल गुणभूतमनन्तकम् ।। ३९ ।।

ताक्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च तथैव गरुडारुणौ ।

आरुणिर्वारुणिश्चैव वैनतेयाः प्रकीर्तिताः ।। ४० ।।

महीपाल! इनकी जो संतानें हैं, उन सबकी पूर्णरूपसे गणना नहीं की जा सकती; क्योंकि वे सब अनन्त गुने हैं। ताक्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, आरुणि तथा वारुणि-ये 1.विनताके पुत्र कहे गये हैं ।। ३९-४० ।।

शेषोऽनन्तो वासुकिश्च तक्षकश्च भुजङ्गमः ।

कूर्मश्च कुलिकश्चैव काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः ।। ४१ ।।

शेष, अनन्त, वासुकि, तक्षक, कूर्म और कुलिक आदि नागगण कदूके पुत्र कहलातेहैं ।। ४१ ।।

भीमसेनोग्रसेनौ च सुपर्णो वरुणस्तथा ।

गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च सप्तमः ।। ४२ ।।

सत्यवागर्कपर्णश्च प्रयुतश्चापि विश्रुतः ।

भीमश्चित्ररथश्चैव विख्यातः सर्वविद् वशी ।। ४३ ।।

तथा शालिशिरा राजन् पर्जन्यश्च चतुर्दशः।

कलिः पञ्चदशस्तेषां नारदश्चैव षोडशः।

इत्येते देवगन्धर्वा मौनेयाः परिकीर्तिताः । ४४ ।।

राजन्! भीमसेन, उग्रसेन, सुपर्ण, वरुण, गोपति, धृतराष्ट्र, सातवें सूर्यवच्चा, सत्यवाक्,अर्कपर्ण, विख्यात प्रयुत, भीम, सर्वज्ञ और जितेन्द्रिय चित्ररथ, शालिशिरा, चौदहवें पर्जन्य,पंद्रहवें कलि और सोलहवें नारद-से सब देवगन्धर्व जातिवाले सोलह पुत्र मुनिके गर्भसेउत्पन्न कहे गये हैं ।। ४२-४४ ।।

अथ प्रभूतान्यन्यानि कीर्तयिष्यामि भारत।

अनवद्यां मनुं वंशामसुरां मार्गणप्रियाम् ।। ४५ ।।

अरूपां सुभगां भासीमिति प्राधा व्यजायत ।

सिद्धः पूर्णश्च बर्हिश्च पूर्णायुश्च महायशाः ।। ४६ ।।

ब्रह्मचारी रतिगुणः सुपर्णश्चैव सप्तमः ।

विश्वावसुश्च भानुश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा ।। ४७ ।।

इत्येते देवगन्धर्वाः प्राधेयाः परिकीर्तिताः।

इमं त्वप्सरसां वंशं विदितं पुण्यलक्षणम् ।। ४८ ।।

प्राधासूत महाभागा देवी देवर्षितः पुरा ।

अलम्बुषा मिश्रकेशी विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा ।। ४९ ।।

अरुणा रक्षिता चैव रम्भा तद्वन्मनोरमा ।

केशिनी च सुबाहुश्च सुरता सुरजा तथा ।। ५० ।।

सुप्रिया चातिबाहुश्च विख्यातौ च हाहा हूहूः ।

तुम्बुरुश्चेति चत्वारः स्मृता गन्धर्वसत्तमाः ।। ५१ ।।

भारत! इसके अतिरिक्त अन्य बहुत-से वंशोंकी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ। प्राधानामवाली दक्षकन्याने अनवद्या, मनु, वंशा, असुरा, मार्गणप्रिया, अरूपा, सुभगा और भासीइन कन्याओंको उत्पन्न किया। सिद्ध, पूर्ण, बाहि, महायशस्वी पूर्णायु, ब्रह्मचारी, रतिगुण,सातवें सुपर्ण, विश्वावसु, भानु और दसवें सुचन्द्र- से दस देव-गन्धर्व भी प्राधाके ही पुत्रबताये गये हैं। इनके सिवा महाभागा देवी प्राधाने पहले देवर्षि (कश्यप) -के समागमसे इनप्रसिद्ध अप्सराओंके शुभ लक्षणवाले समुदायको उत्पन्न किया था । उनके नाम ये हैं-अलम्बुषा, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तिलोत्तमा, अरुणा, रक्षिता, रम्भा, मनोरमा, केशिनी,सुबाहु, सुरता, सुरजा और सुप्रिया। अतिबाहु, सुप्रसिद्ध हाहा और हूहू तथा तुम्बुरु- ये चारश्रेष्ठ गन्धर्व भी प्राधाके ही पुत्र माने गये हैं ।। ४५- ५१ ।

अमृतं ब्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा।

अपत्यं कपिलायास्तु पुराणे परिकीर्तितम् ।। ५२ ।।

अमृत, ब्राह्मण, गौएँ, गन्धर्व तथा अप्सराएँ- ये सब पुराणमें कपिलाकी संतानें बतायीगयी हैं ।। ५२ ।।

इति ते सर्वभूतानां सम्भवः कथितो मया ।

यथावत् सम्परिख्यातो गन्धर्वाप्सरसां तथा ।। ५३ ।।

भुजङ्गानां सुपर्णानां रुद्राणां मरुतां तथा ।

गवां च ब्राह्मणानां च श्रीमतां पुण्यकर्मणाम् ।। ५४ ।।

राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बताया है। इसी तरहगन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, सुपर्णों, रुद्रों, मरुद्गाणों गौओं तथा श्रीसम्पन्न पुण्यकर्माब्राह्मणोंके जन्मकी कथा भी भलीभाँति कही है ।। ५३ -५४ ।।

आयुष्यश्चैव पुण्यश्च धन्यः श्रुतिसुखावहः ।

श्रोतव्यश्चैव सततं श्राव्यश्चैवानसूयता ।। ५५ ।।

यह प्रसंग आयु देनेवाला, पुण्यमय, प्रशंसनीय तथा सुननेमें सुखद है। मनुष्यकोचाहिये कि वह दोषदृष्टि न रखकर सदा इसे सुने और सुनावे ।। ५५ ।।

इमं तु वंशं नियमेन यः पठेत् महात्मनां ब्राह्मणदेवसंनिधौ ।

अपत्यलाभं लभते स पुष्कलं श्रियं यशः प्रेत्य च शोभनां गतिम् ।। ५६ ।।

जो ब्राह्मण और देवताओंके समीप महात्माओंकी इस वंशावलीका नियमपूर्वक पाठकरता है, वह प्रचुर संतान, सम्पत्ति और यश प्राप्त करता है तथा मृत्युके पश्चात् उत्तम गतिपाता है ।। ५६ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आदित्यादिवंशकथने पञ्चरषष्टितमोऽध्यायः ।। ६५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आदित्यादिवंशकथनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६५ ।।

Vyasa Sewaka
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