Mahabharata Gita Press Vol I Page 301-600 Webpage 4

।। श्रीहरिः ।।

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श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत

महाभारत (प्रथम खण्ड)

MAHABHARATA

[आदिपर्व और सभापर्व]

(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवाद)

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।

सप्तत्रिंशोऽध्यायः

माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श

सौतिरुवाच

मातुः सकाशात् तं शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तमः ।

वासुकिश्चिन्तयामास शापोऽयं न भवेत् कथम् ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! माता कद्रूसे नागोंके लिये वह शाप प्राप्त हुआ सुनकरनागराज वासुकिको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे ‘किस प्रकार यह शाप दूर हो सकताहै’ ।। १ ।।

ततः स मन्त्रयामास भ्रातृभिः सह सर्वशः ।

ऐरावतप्रभृतिभिः सर्वधर्मपरायणैः ।। २ ।।

तदनन्तर उन्होंने ऐरावत आदि सर्वधर्मपरायण बन्धुओंके साथ उस शापके विषयमेंविचार किया ।। २ ।।

वासुकिरुवाच

अयं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वस्तथानघाः ।

तस्य शापस्य मोक्षार्थं मन्त्रयित्वा यतामहे ।। ३ ।।

सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते ।

न तु मात्राभिशप्तानां मोक्षः क्वचन विद्यते ।। ४ ।।

वासुकि बोले-निष्पाप नागगण! माताने हमें जिस प्रकार यह शाप दिया है, वह सबआपलोगोंको विदित ही है। उस शापसे छूटनेके लिये क्या उपाय हो सकता है? इसकेविषयमें सलाह करके हम सब लोगोंको उसके लिये प्रयत्न करना चाहिये। सब शापोंकाप्रतीकार सम्भव है, परंतु जो माताके शापसे ग्रस्त हैं, उनके छूटनेका कोई उपाय नहींहै ।। ३-४ ।।

अव्ययस्याप्रमेयस्य सत्यस्य च तथाग्रतः।

शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जायते हृदि वेपथुः ।। ५ ।।

अविनाशी, अप्रमेय तथा सत्यस्वरूप ब्रह्माजीके आगे माताने हमें शाप दिया है-यहसुनकर ही हमारे हृदयमें कम्प छा जाता है ।। ५ ।।

नूनं सर्वविनाशोऽयमस्माकं समुपागतः ।

न ह्येतां सोऽव्ययो देवः शपन्तीं प्रत्यषेधयत् ।। ६ ।।

निश्चय ही यह हमारे सर्वनाशका समय आ गया है, क्योंकि अविनाशी देव भगवान्ब्रह्माने भी शाप देते समय माताको मना नहीं किया।। ६ । ।

तस्मात् सम्मन्त्रयामोऽद्य भुजङ्गानामनामयम् ।

यथा भवेद्धि सर्वेषां मा नः कालोऽत्यगादयम् ।। ७ ।।

सर्व एव हि नस्तावद् बुद्धिमन्तो विचक्षणाः ।

अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे I ८ ।।

यथा नष्टं पुरा देवा गुढमग्निं गुहागतम् ।इसलिये आज हमें अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिये कि किस उपायसे हम सभीनाग कुशलपूर्वक रह सकते हैं। अब हमें व्यर्थ समय नहीं गँवाना चाहिये। हमलोगोंमें प्रायःसब नाग बुद्धिमान् और चतुर हैं। यदि हम मिल-जुलकर सलाह करें तो इस संकटसेछूटनेका कोई उपाय हूँढ़ निकालेंगे; जैसे पूर्वकालमें देवताओंने गुफारमें छिपे हुए अग्निकोखोज निकाला था ।। ७-८ ।।

यथा स यज्ञो न भवेद् यथा वापि पराभवः ।

जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै ।। ९ ।।

सर्पोंके विनाशके लिये आरम्भ होनेवाला जनमेजयका यज्ञ जिस प्रकार टल जायअथवा जिस तरह उसमें विघ्न पड़ जाय, वह उपाय हमें सोचना चाहिये ।। ९ ।।

सौतिरुवाच

तथेत्युक्त्वा ततः सर्वे काद्रवेयाः समागताः ।

समयं चक्रिरे तत्र मन्त्रबुद्धिविशारदाः ।। १० ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! वहाँ एकत्र हुए सभी कट्ूपुत्र ‘बहुत अच्छा’ कहकरएक निश्चयपर पहुँच गये, क्योंकि वे नीतिका निश्चय करनेमें निपुण थे ।। १० ।।

एके तत्राब्रुवन् नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभाः ।

जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति ।। ११ ।।

उस समय वहाँ कुछ नागोंने कहा-‘हमलोग श्रेष्ठ ब्राह्मण बनकर जनमेजयसे यहभिक्षा माँगें कि तुम्हारा यज्ञ न हो’ ।। ११ ।।

अपरे त्वब्रुवन् नागास्तत्र पण्डितमानिनः ।

मन्त्रिणोउस्य वयं सर्वे भविष्यामः सुसम्मताः ।। १२ ।।

अपनेको बड़ा भारी पण्डित माननेवाले दूसरे नागोंने कहा – ‘हम सब लोगजनमेजयके विश्वासपात्र मन्त्री बन जायँगे ।। १२ ।।

स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चयम् ।

तत्र बुद्धिं प्रदास्यामो यथा यज्ञो निवत्स्स्यति ।। १३ ।।

‘फिर वे सभी कार्योंमें अभीष्ट प्रयोजनका निश्चय करनेके लिये हमसे सलाह पूछेंगे ।उस समय हम उन्हें ऐसी बुद्धि देंगे, जिससे यज्ञ होगा ही नहीं ।। १३ ।।

स नो बहुमतान् राजा बुद्धया बुद्धिमतां वरः ।

यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्तं नेति वक्ष्यामहे वयम् ।। १४ ।।

‘हम वहाँ बहुत विश्वस्त एवं सम्मानित होकर रहेंगे। अतः बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजाजनमेजय यज्ञके विषयमें हमारी सम्मति जाननेके लिये अवश्य पूछेंगे। उस समय हम स्पष्टकह देंगे-‘यज्ञ न करो’ ।। १४ ।।

दर्शयन्तो बहून् दोषान् प्रेत्य चेह च दारुणान् ।

हेतुभिः कारणैश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः ।। १५ ।।

‘हम युक्तियों और कारणोंद्वारा यह दिखायेंगे कि उस यज्ञसे इहलोक और परलोकमेंअनेक भयंकर दोष प्राप्त होंगे; इससे वह यज्ञ होगा ही नहीं ।। १५ ।।

अथवा य उपाध्यायः क्रतोस्तस्य भविष्यति ।

सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रतः ।। १६ ।।

तं गत्वा दशतां कश्चिद् भुजङ्गः स मरिष्यति ।

तस्मिन् मृते यज्ञकारे क्रतुः स न भविष्यति ।। १७ ।।

‘अथवा जो उस यज्ञके आचार्य होंगे, जिन्हें सर्पयज्ञकी विधिका ज्ञान हो और जोराजाके कार्य एवं हितमें लगे रहते हों, उन्हें कोई सर्प जाकर डँस ले। फिर वे मर जायँगे।यज्ञ करानेवाले आचार्यके मर जानेपर वह यज्ञ अपने-आप बंद हो जायगा ।। १६-१७ ।।

ये चान्ये सर्पसत्रज्ञा भविष्यन्त्यस्य चत्त्विजः ।

तांश्च सर्वान् दशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति । १८ ।।

‘आचार्यके सिवा दूसरे जो-जो ब्राह्मण सर्पयज्ञकी विधिको जानते होंगे औरजनमेजयके यज्ञमें ऋत्विज् बननेवाले होंगे, उन सबको हम डँस लेंगे। इस प्रकार सारा कामबन जायगा’ ।। १८ ।।

अपरे त्वब्रुवन् नागा धर्मात्मानो दयालवः ।

अबुद्धिरेषा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम् ।। १९ ।।

यह सुनकर दूसरे धर्मात्मा और दयालु नागोंने कहा – ऐसा सोचना तुम्हारी मूर्खता है।ब्रह्म-हत्या कभी शुभकारक नहीं हो सकती ।। १९ ।।

सम्यक्सद्धर्ममूला वै व्यसने शान्तिरुत्तमा।

अधर्मोत्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादयेज्जगत् ।। २० ।।

‘आपत्तिकालमें शान्तिके लिये वही उपाय उत्तम माना गया है जो भलीभाँति श्रेष्ठधर्मके अनुकूल किया गया हो। संकटसे बचनेके लिये उत्तरोत्तर अधर्म करनेकी प्रवृत्ति तोसम्पूर्ण जगत्का नाश कर डालेगी’ ।। २० ।।

अपरे त्वब्रुवन् नागाः समिद्धं जातवेदसम् ।

वर्षैर्निर्वापयिष्यामो मेघा भूत्वा सविद्युतः ।। २१ ।।

इसपर दूसरे नाग बोल उठे-‘जिस समय सर्पयज्ञके लिये अग्नि प्रज्वलित होगी, उससमय हम बिजलियोंसहित मेघ बनकर पानीकी वर्षाद्वारा उसे बुझा देंगे ।। २१ ।।

स्रुग्भाण्डं निशि गत्वा च अपरे भुजगोत्तमाः।

प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति ।। २२ ।

‘दूसरे श्रेष्ठ नाग रातमें वहाँ जाकर असावधानीसे सोये हुए ऋत्विजोंके सुक्, स्रुवा औरयज्ञपात्र आदि शीघ्र चुरा लावें। इस प्रकार उसमें विघ्न पड़ जायगा ।। २२ ।।

यज्ञे वा भुजगास्तस्मिञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।

जनान् दशन्तु वै सर्वे नैवं त्रासो भविष्यति ।। २३ ।

‘अथवा उस यज्ञमें सभी सर्प जाकर सैकड़ों और हजारों मनुष्योंको डँस लें; ऐसाकरनेसे हमारे लिये भय नहीं रहेगा ।। २३ ।।

अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजङ्गमाः ।

स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना ।। २४ ।।

‘अथवा सर्पगण उस यज्ञके संस्कारयुक्त भोज्य पदार्थको अपने मल-मूत्रोंद्वारा, जो सबप्रकारकी भोजन-सामग्रीका विनाश करनेवाले हैं, दूषित कर दें’ ।। २४ ।।

अपरे त्वब्रुवंस्तत्र ऋत्विजोऽस्य भवामहे ।

यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीयतां दक्षिणा इति ।। २५ ।।

इसके बाद अन्य सर्पोने कहा-‘हम उस यज्ञमें ऋत्विज् हो जायँगे और यह कहकरकि ‘हमें मुँहमाँगी दक्षिणा दो’ यज्ञमें विघ्न खड़ा कर देंगे। उस समय राजा हमारे वशमेंपड़कर जैसी हमारी इच्छा होगी, वैसा करेंगे’ ।। २५।।

वश्यतां च गतोऽसौ नः करिष्यति यथेप्सितम् ।

अपरे त्वब्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम् ।। २६ ।।

फिर अन्य नाग बोले-‘जब राजा जनमेजय जल-क्रीड़ा करते हों, उस समय उन्हेंवहाँसे खींचकर हम अपने घर ले आवें और बाँधकर रख लें। ऐसा करनेसे वह यज्ञ होगा हीनहीं-।। २६।।

गृहमानीय बध्नीमः क्रतुरेवं भवेन्न सः ।

अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागाः पण्डितमानिनः । २७ ।।

दशामस्तं प्रगृह्याशु कृतमेवं भविष्यति ।

छिन्नं मूलमनर्थानां मृते तस्मिन् भविष्यति ।। २८ ।

इसपर अपनेको पण्डित माननेवाले दूसरे नाग बोल उठे- ‘हम जनमेजयको पकड़करडँस लेंगे।’ ऐसा करनेसे तुरंत ही सब काम बन जायगा। उस राजाके मरनेपर हमारे लियेअनर्थोंकी जड़ ही कट जायगी ।। २७-२८ ।।

एषा नो नैष्ठिकी बुद्धिः सर्वेषामीक्षणश्रवः ।

अथ यन्मन्यसे राजन् द्रुतं तत् संविधीयताम् ।। २९ ।।

‘नेत्रोंसे सुननेवाले नागराज! हम सब लोगोंकी बुद्धि तो इसी निश्चयपर पहुँची है। अबआप जैसा ठीक समझते हों, वैसा शीघ्र करें’ ।। २९ ।।

इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकिं पन्नगोत्तमम् ।

वासुकिश्चापि संचिन्त्य तानुवाच भुजङ्गमान् ।। ३० ।।

यह कहकर वे सर्प नागराज वासुकिकी ओर देखने लगे। तब वासुकिने भी खूब सोच-विचारकर उन सर्पोंसे कहा-।। ३० ।।

नैषा वो नैष्ठिकी बुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमाः ।

सर्वेषामेव मे बुद्धिः पन्नगानां न रोचते ।। ३१ ।।

‘नागगण! तुम्हारी बुद्धिने जो निश्चय किया है, वह व्यवहारमें लानेयोग्य नहीं है। इसीप्रकार मेरा विचार भी सब सर्पोंको जँच जाय, यह सम्भव नहीं है ।। ३१ ।।

किं तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत् ।

श्रेयःप्रसाधनं मन्ये कश्यपस्य महात्मनः ।। ३२ ।।

‘ऐसी दशामें क्या करना चाहिये, जो तुम्हारे लिये हितकर हो। मुझे तो महात्माकश्यपजीको प्रसन्न करनेमें ही अपना कल्याण जान पड़ता है ।। ३२ ।।

ज्ञातिवर्गस्य सौहार्दादात्मनश्च भुजङ्गमाः।

न च जानाति मे बुद्धिः किंचित् कर्तुं वचो हि वः ।। ३३ ।।

‘भुजंगमो! अपने जाति-भाइयोंके और अपने हितको दृष्टिमें रखकर तुम्हारेकथनानुसार कोई भी कार्य करना मेरी समझमें नहीं आया ।। ३३ ।।

मया हीदं विधातव्यं भवतां यद्धितं भवेत् ।

अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषौ मदाश्रयौ ।। ३४ ।।

‘मुझे वही काम करना है, जिसमें तुम-लोगोंका वास्तविक हित हो। इसीलिये मैं अधिकचिन्तित हूँ; क्योंकि तुम सबमें बड़ा होनेके कारण गुण और दोषका सारा उत्तरदायित्वमुझपर ही है’ ।। ३४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुक्यादिमन्त्रणे सप्तत्रिंशोऽध्यायः।। ३७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें वासुकि आदि नागोंकी मन्त्रणा नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३७ ।।

अष्टत्रिंशोऽध्यायः

वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ

विवाह करनेका निश्चय

सौतिरुवाच

सर्पाणां तु वचः श्रुत्वा सर्वेषामिति चेति च ।

वासुकेश्च वचः श्रुत्वा एलापत्रोऽब्रवीदिदम् ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! समस्त सर्पोंकी भिन्न- भिन्न राय सुनकर औरअन्तर्में वासुकिके वचनोंका श्रवण कर एलापत्र नामक नागने इस प्रकार कहा-I| १ ।।

न स यज्ञो न भविता न स राजा तथाविधः।

जनमेजयः पाण्डवेयो यतोऽस्माकं महद् भयम् ।। २ ।।

‘भाइयो! यह सम्भव नहीं कि वह यज्ञ न हो तथा पाण्डववंशी राजा जनमेजय भी,जिससे हमें महान् भय प्राप्त हुआ है, ऐसा नहीं है कि हम उसका कुछ बिगाड़ सकें ।। २ ।।

दैवेनोपहतो राजन् यो भवेदिह पूरुषः ।

स दैवमेवाश्रयते नान्यत् तत्र परायणम् ।। ३ ।।

‘राजन्! इस लोकमें जो पुरुष दैवका मारा हुआ है, उसे दैवकी ही शरण लेनी चाहिये।वहाँ दूसरा कोई आश्रय नहीं काम देता ।। ३ ।।

तदिदं चैवमस्माकं भयं पन्नगसत्तमाः ।

दैवमेवाश्रयामोऽत्र शृणुध्वं च वचो मम ।। ४ ।।

अहं शापे समुत्सृष्टे समश्रौषं वचस्तदा ।

मातुरुत्संगमारूढो भयात् पन्नगसत्तमाः । ५ ।।

देवानां पन्नगश्रेष्ठास्तीक्ष्णास्तीक्ष्णा इति प्रभो ।

पितामहमुपागम्य दुःखात्तानां महाद्युते ।। ६ ।।

‘श्रेष्ठ नागगण! हमारे ऊपर आया हुआ यह भय भी दैवजनित ही है, अतः हमें दैवकाही आश्रय लेना चाहिये। उत्तम सर्पगण! इस विषयमें आपलोग मेरी बात सुनें। जब मातानेसर्पोंको यह शाप दिया था, उस समय भयके मारे मैं माताकी गोदमें चढ़ गया था।पन्नगप्रवर महातेजस्वी नागराजगण! तभी दुःखसे आतुर होकर ब्रह्माजीके समीप आये हुएदेवताओंकी यह वाणी मेरे कानोंमें पड़ी-‘अहो! स्त्रियाँ बड़ी कठोर होती हैं, बड़ी कठोरहोती हैं’ ।। ४-६ ।।

देवा ऊचुः

का हि लब्ध्वा प्रियान् पुत्राज्छपेदेवं पितामह ।

ऋते कद्ूं तीक्ष्णरूपां देवदेव तवाग्रतः ।॥ ७ ।

देवता बोले-पितामह! देवदेव! तीखे स्वभाववाली इस क्रूर कद्रूको छोड़कर दूसरी कौन स्त्री होगी जो प्रिय पुत्रोंको पाकर उन्हें इस प्रकार शाप दे सके और वह भी आपके सामने ।। ७ ।।

तथेति च वचस्तस्यास्त्वयाप्युक्तं पितामह ।

एतदिच्छामि विज्ञातुं कारणं यन्न वारिता ।। ८ ।।

पितामह! आपने भी ‘तथास्तु’ कहकर कदूरूकी बातका अनुमोदन ही किया है; उसे शाप देनेसे रोका नहीं है। इसका क्या कारण है, हम यह जानना चाहते हैं ।। ८ ।।

ब्रह्मोवाचबहवः पन्नगास्तीक्ष्णा घोररूपा विषोल्बणाः ।

प्रजानां हितकामोऽहं न च वारितवांस्तदा ।। ९ ।।

ब्रह्माजीने कहा-इन दिनों भयानक रूप और प्रचण्ड विषवाले क्रूर हैं (जो प्रजाको कष्ट दे रहे हैं)। मैंने प्रजाजनोंके हितकी इच्छासे ही उस समय कद्रको मना नहीं किया ।। ९ ।।

ये दन्दशूकाः क्षुद्राश्च पापाचारा विषोल्बणाः ।

तेषां विनाशो भविता न तु ये धर्मचारिणः ।। १० ।।

जनमेजयके सर्पयज्ञमें उन्हीं सर्पोंका विनाश होगा जो प्रायः लोगोंको डँसते रहते हैं, क्षुद्र स्वभावके हैं और पापाचारी तथा प्रचण्ड विषवाले हैं। किंतु जो धर्मात्मा हैं, उनका नाश नहीं होगा ।। १० ।।

यन्निमित्तं च भविता मोक्षस्तेषां महाभयात् ।

पन्नगानां निबोधध्वं तस्मिन् काले समागते ।। ११ ।।

वह समय आनेपर सर्पोंका उस महान् भयसे जिस निमित्तसे छुटकारा होगा, उसे बतलाता हूँ, तुम सब लोग सुनो ।। ११ ।।

यायावरकुले धीमान् भविष्यति महानृषिः ।

जरत्कारुरिति ख्यातस्तपस्वी नियतेन्द्रियः ।। १२ ।।

यायावरकुलमें जरत्कारु नामसे विख्यात एक बुद्धिमान् महर्षि होंगे । वे तपस्यामें तत्पर रहकर अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखेंगे ।। १२ ।।

तस्य पुत्रो जरत्कारोर्भविष्यति तपोधनः।

आस्तीको नाम यज्ञं स प्रतिषेत्स्यति तं तदा ।

तत्र मोक्ष्यन्ति भुजगा ये भविष्यन्ति धार्मिकाः ।। १३ ।।

उन्हींके आस्तीक नामका एक महातपस्वी पुत्र उत्पन्न होगा जो उस यज्ञको बंद करा देगा। अतः जो सर्प धार्मिक होंगे, वे उसमें जलनेसे बच जायँगे ।। १३ ।।

सर्प बहुत हो गये |

देवा ऊचुःस मुनिप्रवरो ब्रह्मञ्जरत्कारुर्महातपाः।

कस्यां पुत्रं महात्मानं जनयिष्यति वीर्यवान् ।। १४ ।।

देवताओंने पूछा-ब्रह्मन्! वे मुनिशिरोमणि महातपस्वी शक्तिशाली जरत्कारु किसकेगर्भसे अपने उस महात्मा पुत्रको उत्पन्न करेंगे? ।। १४ ।।

ब्रह्मोवाच

सनामायां सनामा स कन्यायां द्विजसत्तमः ।

अपत्यं वीर्यसम्पन्नं वीर्यवाञ्जनयिष्यति ।। १५ ।।

ब्रह्माजीने कहा-वे शक्तिशाली द्विजश्रेष्ठ जिस ‘जरत्कारु’ नामसे प्रसिद्ध होंगे, उसीनामवाली कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके उसके गर्भसे एक शक्तिसम्पन्न पुत्र उत्पन्नकरेंगे ।। १५ ।।

वासुकेः सर्पराजस्य जरत्कारुः स्वसा किल ।

स तस्यां भविता पुत्रः शापान्नागांश्च मोक्ष्यति ।। १६ ।।

सर्पराज वासुकिकी बहिनका नाम जरत्कारु है । उसीके गर्भसे वह पुत्र उत्पन्न होगा , जोनागोंको शापसे छुड़ायेगा ।। १६ ।।

एलापत्र उवाच

एवमस्त्विति तं देवाः पितामहमथाब्रुवन् ।

उक्त्वैवं वचनं देवान् विरिञ्चिस्त्रिदिवं ययौ ।। १७ ।।

एलापत्र कहते हैं-यह सुनकर देवता ब्रह्माजीसे कहने लगे -‘एवमस्तु’ (ऐसा हीहो)। देवताओंसे ये सब बातें बताकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमें चले गये। १७ ।।

सोऽहमेवं प्रपश्यामि वासुके भगिनीं तव ।

जरत्कारुरिति ख्यातां तां तस्मै प्रतिपादय ।। १८ ।।

भैक्षवद् भिक्षमाणाय नागानां भयशान्तये ।

ऋषये सुव्रतायैनामेष मोक्षः श्रुतो मया ।। १९ ।।

अतः नागराज वासुके! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आप नागोंका भय दूर करनेके लियेकन्याकी भिक्षा माँगनेवाले, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि जरत्कारुको अपनीजरत्कारु नामवाली यह बहिन ही भिक्षारूपमें अर्पित कर दें। उस शापसे छूटनेका यहीउपाय मैंने सुना है ।। १८-१९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि एलापत्रवाक्ये अष्टत्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।।इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें एलापत्र-वाक्यसम्बन्धीअड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकिका जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना

सौतिरुवाच

एलापत्रवचः श्रुत्वा ते नागा द्विजसत्तम ।

सर्वे प्रहृष्टमनसः साधु साध्वित्यरथाब्रुवन् ।। १ ।।

ततः प्रभृति तां कन्यां वासुकिः पर्यरक्षत ।

जरत्कारुं स्वसारं वै परं हर्षमवाप च ।। २ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-द्विजश्रेष्ठ! एलापत्रकी बात सुनकर नागोंका चित्त प्रसन्न हो गया। वे सब-के-सब एक साथ बोल उठे-‘ठीक है, ठीक है।’ वासुकिको भी इस बातसे बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उसी दिनसे अपनी बहिन जरत्कारुका बड़े चावसे पालन- पोषण करने लगे ।। १-२ ।।

ततो नातिमहान् कालः समतीत इवाभवत् ।

अथ देवासुराः सर्वे ममन्थुर्वरुणालयम् ।। ३ ।।

तत्र नेत्रमभूतन्नागो वासुकिर्बलिनां वरः ।

समाप्यैव च तत् कर्म पितामहमुपागमन् ।। ४ ।।

देवा वासुकिना सार्धं पितामहमथाब्रुवन् ।

भगवञ्छापभीतोऽयं वासुकिस्तप्यते भृशम् ।। ५ ।।

तदनन्तर थोड़ा ही समय व्यतीत होनेपर सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंने समुद्रका मन्थन किया। उसमें बलवानोंमें श्रेष्ठ वासुकि नाग मन्दराचलरूप मथानीमें लपेटनेके लिये रस्सी बने हुए थे। समुद्र-मन्थनका कार्य पूरा करके देवता वासुकि नागके साथ पितामह ब्रह्माजीके पास गये और उनसे बोले-‘भगवन्! ये वासुकि माताके शापसे भयभीत हो बहुत संतप्त होते रहते हैं ।। ३ – ५ ।।

अस्यैतन्मानसं शल्यं समुद्धर्तुं त्वमर्हसि ।

जनन्याः शापजं देव ज्ञातीनां हितमिच्छतः ।। ६ ।।

‘देव! अपने भाई-बन्धुओंका हित चाहनेवाले इन नागराजके हृदयमें माताका शाप काँटा बनकर चुभा हुआ है और कसक पैदा करता है। आप इनके उस काँटेको निकाल दीजिये ।। ६ ।।

हितो ह्ययं सदास्माकं प्रियकारी च नागराट् ।

प्रसादं कुरु देवेश शमयास्य मनोज्वरम् ।। ७ ।।

‘देवेश्वर! नागराज वासुकि हमारे हितैषी हैं और सदा हमलोगोंके प्रिय कार्यमें लगे रहतेहैं; अत: आप इनपर कृपा करें और इनके मनमें जो चिन्ताकी आग जल रही है,दें’ ।। ७ ।।

ब्रह्मोवाच

उसे बुझा मयैव तद् वितीर्णं वै वचनं मनसामराः ।

एलापत्रेण नागेन यदस्याभिहितं पुरा ।।८ ।।

ब्रह्माजीने कहा-देवताओ! एलापत्र नागने वासुकिके समक्ष पहले जो बात कहीथी, वह मैंने ही मानसिक संकल्पद्वारा उसे दी थी ( मेरी ही प्रेरणासे एलापत्रने वे बातेंवासुकि आदि नागोंके सम्मुख कही थीं)।। ८ ।।

तत् करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं वचः स्वयम् ।

विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः ।। ९ ।।

ये नागराज समय आनेपर स्वयं तदनुसार ही कार्य करें। जनमेजयके यज्ञमें पापी सर्पही नष्ट होंगे, किंतु जो धर्मात्मा हैं वे नहीं ।। ९ ।।

उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो द्विजः।

तस्यैष भगिनीं काले जरत्कारुं प्रयच्छतु || १० ।।

अब जरत्कारु ब्राह्मण उत्पन्न होकर उग्र तपस्यामें लगे हैं। अवसर देखकर ये वासुकिअपनी बहिन जरत्कारुको उन महर्षिकी सेवामें समर्पित कर दें ।। १० ।।

एलापत्रेण यत् प्रोक्तं वचनं भुजगेन ह ।

पन्नगानां हितं देवास्तत् तथा न तदन्यथा ।। ११ ।।

देवताओ! एलापत्र नागने जो बात कही है, वही सरपोंके लिये हितकर है। वही बातहोनेवाली है। उससे विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता ।। ११ ।।

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा तु नागेन्द्रः पितामहवचस्तदा ।

संदिश्य पन्नगान् सर्वान् वासुकिः शापमोहितः ।। १२ ।।

स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति ।

सर्पान् बहूञ्जरत्कारौ नित्ययुक्तान् समादधत् ।। १३ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-ब्रह्माजीकी बात सुनकर शापसे मोहित हुए नागराज वासुकिनेसब सर्पोंको यह संदेश दे दिया कि मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथकरना है। फिर उन्होंने जरत्कारु मुनिकी खोजके लिये नित्य आज्ञामें रहनेवाले बहुत-सेसर्पोंको नियुक्त कर दिया ।। १२-१३ ।।

जरत्कारुर्यदा भार्यामिच्छेद् वरयितुं प्रभुः ।

शीघ्रमेत्य तदाख्येयं तन्नः श्रेयो भविष्यति ।। १४ ।।

और यह कहा-‘सामर्थ्यशाली जरत्कारु मुनि जब पत्नीका वरण करना चाहें,समय शीघ्र आकर यह बात मुझे सूचित करनी चाहिये। उसीसे हमलोगोंका कल्याणहोगा’ ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कार्वन्वेषणे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ३९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जरत्कारु मुनिका अन्वेषणविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।। ३९ ।।

चत्वारिंशोऽध्यायः

जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित्का उपाख्यान तथाराजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक सॉँप रखनेके कारण दुःखी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना

शौनक उवाच

जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया इच्छामि तदहं श्रोतुं ऋषेस्तस्य महात्मनः । १ ।।

किं कारणं जरत्कारोनर्नामैतत् प्रथितं भुवि ।

जरत्कारुनिरुक्तिं त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ।। २ ।।

शौनकजीने पूछा-सूतनन्दन! आपने जिन जरत्कारु ऋषिका नाम लिया है , उन महात्मा मुनिके सम्बन्धमें मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पृथ्वीपर उनका जरत्कारु नाम क्योंप्रसिद्ध हुआ? जरत्कारु शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है? यह आप ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ।। १-२ ।।

सौतिरुवाच

ननन्दन जरेति क्षयमाहुर्वे दारुणं कारुसंज्ञितम् ।

शरीरं कारु तस्यासीत्तत् स धीमाञ्छनैः शनैः ।। ३ ।।

क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते।

जरत्कारुरिति ब्रह्मन् वासुकेर्भगिनी तथा ।। ४ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-शौनकजी! जरा कहते हैं क्षयको और कारु शब्द दारुणका वाचक है। पहले उनका शरीर कारु अर्थात् खूब हट्टा-कट्टा था। उसे परम बुद्धिमान् महर्षिनेधीरे-धीरे तीव्र तपस्याद्वारा क्षीण बना दिया। ब्रह्मन्! इसलिये उनका नाम जरत्कारु पड़ा। वासुकिकी बहिनके भी जरत्कारु नाम पड़नेका यही कारण था ।। ३-४ ।।

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत् तदा ।

उग्रश्रवासमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन् । ५ ।।

उग्रश्रवाजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा शौनक उस समय खिलखिलाकर हँस पड़े औरफिर उग्रश्रवाजीको सम्बोधित करके बोले-‘तुम्हारी बात उचित है’ ।। ५ ।।

शौनक उवाच

उक्तं नाम यथापूर्वं सर्वं तच्छरमतवानहम् ।

यथा तु जातो ह्यास्तीक एतदिच्छामि वेदितुम् ।

तच्छरृत्वा वचनं तस्य सौतिः प्रोवाच शास्त्रतः ।। ६ ।।

शौनकजी बोले-सूतपुत्र! आपने पहले जो जरत्कारु नामकी व्युत्पत्ति बतायी है, वहसब मैंने ली। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आस्तीक मुनिका जन्म किस प्रकार सुनहुआ? शौनकजीका यह वचन सुनकर उग्रश्रवाजीने पुराणशास्त्रके अनुसार आस्तीककेजन्मका वृत्तान्त बताया ।। ६ ।।

सौतिरुवाच

संदिश्य पन्नगान् सर्वान् वासुकिः सुसमाहितः ।

स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृरषिं प्रति ।। ७।।

उग्रश्रवाजी बोले-नागराज वासुकिने एकाग्रचित्त हो खूब सोच-समझकर सबसर्पोको यह संदेश दे दिया-‘मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथ करनाहै’ ।। ७ ।।

अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः ।

तपस्यभिरतो धीमान् स दारान् नाभ्यकाङ्क्षत ।। ८ ।।

तदनन्तर दीर्घकाल बीत जानेपर भी कठोर व्रतका पालन करनेवाले परम बुद्धिमान्जरत्कारु मुनि केवल तपमें ही लगे रहे। उन्होंने स्त्रीसंग्रहकी इच्छा नहीं की ।। ८ ।।

स तूध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः स्वाध्यायवान् वीतभयः कृतात्मा ।

चरचार सर्वां पृथिवीं महात्मा न चापि दारान् मनसाध्यकाङ्क्षत।| ९ ।।

वे ऊर्ध्वरता ब्रह्मचारी थे। तपस्यामें संलग्न रहते थे। नित्य नियमपूर्वक वेदोंका स्वाध्यायकरते थे। उन्हें कहींसे कोई भय नहीं था वे मन और इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखते थे ।महात्मा जरत्कारु सारी पृथ्वीपर घूम आये; किंतु उन्होंने मनसे कभी स्त्रीकी अभिलाषानहीं की ।। ९ ।।

ततोऽपरस्मिन् सम्प्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु ।

परिक्षिन्नाम राजासीद् ब्रह्मन् कौरववंशजः । १० ।।

ब्रह्मन्! तदनन्तर किसी दूसरे समयमें इस पृथ्वीपर कौरववंशी राजा परीक्षित् राज्यकरने लगे ।। १० ।।

यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि ।

बभूव मृगयाशीलः पुरास्य प्रपितामहः ।। ११ ।।

युद्धमें समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उनके प्रपितामह महाबाहु पाण्डु जिस प्रकारपूर्वकालमें शिकार खेलनेके शौकीन हुए थे, उसी प्रकार राजा परीक्षित् भी थे ।। ११ ।।

मृगान् विध्यन् वराहांश्च तरक्षून् महिषांस्तथा ।

अन्यांश्च विविधान् वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ।। १२ ।।

महाराज परीक्षित् वराह, तरक्षु (व्याघ्रविशेष), महिष तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारकेवनके हिंसक पशुओंका शिकार खेलते हुए वनमें घूमते रहते थे ।। १२ ।।

स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा ।

पृष्ठतो धनुरादाय ससार गहने वने ।। १३ ।।

एक दिन उन्होंने गहन वनमें धनुष लेकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक हिंसक पशुकोबींध डाला और भागनेपर बहुत दूरतक उसका पीछा किया ।। १३ ।।

यथैव भगवान् रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि ।

अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः ।। १४ ।।

जैसे भगवान् रुद्र आकाशमें मृगशिरा नक्षत्रको बींध-कर उसे खोजनेके लिये धनुषहाथमें लिये इधर-उधर घूमते फिरे, उसी प्रकार परीक्षित् भी घूम रहे थे ।। १४ ।।

न हि तेन मृगो विद्धो जीवन् गच्छति वै वने ।

पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं सोऽगात् स्वर्गगतिं प्रति ।। १५ ।।

परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान् मृगः ।

दूरं चापहतस्तेन मृगेण स महीपतिः ।। १६ ।।

उनके द्वारा घायल किया हुआ मृग कभी वनमें जीवित बचकर नहीं जाता था; परंतुआज जो महाराज परीक्षित्का घायल किया हुआ मृग तत्काल अदृश्य हो गया था, वहवास्तवमें उनके स्वर्गवासका मूर्तिमान् कारण था। उस मृगके साथ राजा परीक्षित् बहुतदूरतक खिंचे चले गये ।। १५-१६ ।।

परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने ।

गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् ।। १७ ।।

भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिबतां पयः ।

तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् ।। १८ ।।

अपृच्छद् धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः ।

भो भो ब्रह्मन्नहं राजा परीक्षिदभिमन्युजः ॥ १९ ॥

मया विद्धो मृगो नष्टः कच्चित् तं दृष्टवानसि।

स मुनिस्तं तु नोवाच किंचिन्मौनव्रते स्थितः ।। २० ।।

उन्हें बड़ी थकावट आ गयी। वे प्याससे व्याकुल हो उठे और इसी दशामें वनमें शरमीकमुनिके पास आये। वे मुनि गौओंके रहनेके स्थानमें आसनपर बैठे थे और गौओंका दूध पीतेसमय बछड़ोंके मुखसे जो बहुत-सा फेन निकलता, उसीको खा-पीकर तपस्या करते थे ।राजा परीक्षित्ने कठोर ब्रतका पालन करनेवाले उन महर्षिके पास बड़े वेगसे आकर पूछा ।पूछते समय वे भूख और थकावटसे बहुत आतुर हो रहे थे और धनुषको उन्होंने ऊपर उठारखा था। वे बोले-‘ब्रह्मन्! मैं अभिमन्युका पुत्र राजा परीक्षित् हूँ। मेरे बाणोंसे विद्ध होकरएक मृग कहीं भाग निकला है। क्या आपने उसे देखा है?’ मुनि मौन-व्रतका पालन कर रहेथे, अतः उन्होंने राजाको कुछ भी उत्तर नहीं दिया।। १७- २०।।

तस्य स्कन्धे मृतं सर्प क्रुद्धो राजा समासजत् ।

समुत्क्षिप्य धनुष्कोट्या स चैनं समुपैक्षत ।। २१ ।।

तब राजाने कुपित हो धनुषकी नोकसे एक मरे हुए साँपको उठाकर उनके कंधेपर रखदिया, तो भी मुनिने उनकी उपेक्षा कर दी ।। २१ ।।

न स किंचिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम् ।

स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् ।

दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वासीत् तथैव सः ।। २२ ।॥

उन्होंने राजासे भला या बुरा कुछ भी नहीं कहा। उन्हें इस अवस्थामें देख राजापरीक्षित्ने क्रोध त्याग दिया और मन-ही-मन व्यथित हो पश्चात्ताप करते हुए वे अपनीराजधानीको चले गये। वे महर्षि ज्यों-कें-त्यों बैठे रहे ।। २२ ।।

न हि तं राजशार्दूलं क्षमाशीलो महामुनिः ।

स्वधर्मनिरतं भूपं समाक्षिप्तोऽप्यधर्षयत् ।। २३ ।।

राजाओंमें श्रेष्ठ भूपाल परीक्षित् अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते थे, अतः उस समयउनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी क्षमाशील महामुनिने उन्हें अपमानित नहीं किया।। २३ ।।

न हि तं राजशार्दूलस्तथा धर्मपरायणम् ।

जानाति भरतश्रेष्ठस्तत एनमधर्षयत् ।। २४ ।।

भरतवंशशिरोमणि नृपश्रेष्ठ परीक्षित् उन धर्मपरायण मुनिको यथार्थरूपमें नहीं जानतेथे; इसीलिये उन्होंने महर्षिका अपमान किया।। २४ ।।

तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूत् तिग्मतेजा महातपाः ।

शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः ।। २५ ।।

मुनिके शृंगी नामक एक पुत्र था, जिसकी अभी तरुणावस्था थी। वह महान् तपस्वी,दुःसह तेजसे सम्पन्न और महान् व्रतधारी था। उसमें क्रोधकी मात्रा बहुत अधिक थी; अतःउसे प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन था ।। २५ ।।

स देवं परमासीनं सर्वभूतहिते रतम् ।

ब्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंयतः ।। २६ ।।

वह समय-समयपर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमेंतत्पर रहनेवाले, उत्तम आसनपर विराजमान आचार्यदेवकी सेवामें उपस्थित हुआ करताथा ।। २६ ।।

स तेन समनुज्ञातो ब्रह्मणा गृहमेयिवान् ।

सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल ।। २७ ।।

संरम्भात् कोपनोऽतीव विषकल्पो मुनेः सुतः ।

उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छरुत्वा रोषमाहरत् ।

ऋषिपुत्रेण धर्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम ।। २८ ।।

शृंगी उस दिन आचार्यकी आज्ञा लेकर घरको लौट रहा था। रास्तेमें उसका मित्रऋषिकुमार कृश, जो धर्मके लिये कष्ट उठानेके कारण सदा ही कृश (दुर्बल ) रहा करता था,खेलता मिला। उसने हँसते-हँसते शृंगी ऋषिको उसके पिताके सम्बन्धमें ऐसी बात बतायी,जिसे सुनते ही वह रोषमें भर गया। द्विजश्रेष्ठ! मुनिकुमार शृंगी क्रोधके आवेशमें आनेपरअत्यन्त तीक्ष्ण (कठोर) एवं विषके समान विनाशकारी हो जाता था ।। २७-२८ ।।

कृश उवाच

तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः ।

शवं स्कन्धेन वहति मा शृंगिन् गर्वितो भव ।। २९ ।।

कृशने कहा-शृंगिन्! तुम बड़े तपस्वी और तेजस्वी बनते हो, किंतु तुम्हारे पिताअपने कंधेपर मुर्दा सर्प ढो रहे हैं। अब कभी अपनी तपस्यापर गर्व न करना ।। २९ ।।

व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किंचिद् वचो वद ।

अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु ।। ३० ।।

हम-जैसे सिद्ध, ब्रह्मवेत्ता तथा तपस्वी ऋषिपुत्र जब कभी बातें करते हों, उस समयतुम वहाँ कुछ न बोलना ।। ३० ।।

क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः ।

दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ।। ३१ ।।

कहाँ है तुम्हारा पौरुषका अभिमान, कहाँ गयीं तुम्हारी वे दर्पभरी बातें? जब तुम अपनेपिताको मुर्दा ढोते चुपचाप देख रहे हो! ।। ३१ ।।

पित्रा च तव तत् कर्म नानुरूपमिवात्मनः ।

कृतं मुनिजनश्रेष्ठ येनाहं भृशदुःखितः ।। ३२ ।।

मुनिजनशिरोमणे! तुम्हारे पिताके द्वारा कोई अनुचित कर्म नहीं बना था 3 इसलिये जैसेमेरे ही पिताका अपमान हुआ हो उस प्रकार तुम्हारे पिताके तिरस्कारसे मैं अत्यन्त दुःखी होरहा हूँ ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिदुपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः।। ४० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।

एकचत्वारिंशोऽध्यायः

शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित्को शाप देना और शमीककाअपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना

सौतिरुवाच

एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः ।

मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना I। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! कृशके ऐसा कहनेपर तेजस्वी शृंगी ऋषिको बड़ाक्रोध हुआ। अपने पिताके कंधेपर मृतक (सर्प) रखे जानेकी बात सुनकर वह रोष औरशोकसे संतप्त हो उठा ।। १ ।।

स तं कृशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् ।

अपृच्छत् तं कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः ।। २ ।।

उसने कृशकी ओर देखकर मधुर वाणीमें पूछा- ‘ भैया! बताओ तो, आज मेरे पिताअपने कंधेपर मृतक कैसे धारण कर रहे हैं?’ ।। २ ।।

कृश उवाच

राज्ञा परिक्षिता तात मृगयां परिधावता ।

अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कन्धे भुजङ्गमः ।। ३ ।।

कृशने कहा-तात! आज राजा परीक्षित् अपने शिकारके पीछे दौड़ते हुए आये थे।उन्होंने तुम्हारे पिताके कंधेपर मृतक साँप रख दिया है ।। ३ ।।

शृंग्युवाच

किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः ।

ब्रूहि तत् कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम् ।। ४ ।।

शृंगी बोला-कृश! ठीक-ठीक बताओ, मेरे पिताने उस दुरात्मा राजाका क्या अपराधकिया था? फिर मेरी तपस्याका बल देखना ।। ४ ।।

कृश उवाच

स राजा मृगयां यातः परिक्षिदभिमन्युजः ।

ससार मृगमेकाकी विद्ध्वा बाणेन शीघ्रगम् ।। ५ ।।

न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन् महावने ।

पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ।। ६ ।।

कृशने कहा-अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित् अकेले शिकार खेलने आये थे। उन्होंनेएक शीघ्रगामी हिंसक मृग (पशु)-को बाणसे बींध डाला; किंतु उस विशाल वनमें विचरतेहुए राजाको वह मृग कहीं दिखायी न दिया। फिर उन्होंने तुम्हारे मौनी पिताको देखकरउसके विषयमें पूछा ।। ५-६ ।।

तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः ।

पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ।। ७ ।।

स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत ।

तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्प स्कन्धे समासजत् ।। ८ ।।

राजा भूख-प्यास और थकावटसे व्याकुल थे। इधर तुम्हारे पिता काठकी भाँतिअविचल भावसे बैठे थे। राजाने बार-बार तुम्हारे पितासे उस भागे हुए मृगके विषयमें प्रश्नकिया, परंतु मौन-व्रतावलम्बी होनेके कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब राजानेधनुषकी नोकसे एक मरा हुआ साँप उठाकर उनके कंधेपर डाल दिया।। ७-८ ।।

शृङ्गिंस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः ।

सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम् ।। ९ ।।

शृंगिन्! संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता अभी उसी अवस्थामें बैठे हैं।और वे राजा परीक्षित् अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चले गये हैं ।। ९ ।।

सौतिरुवाच

श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु शवं कन्धे प्रतिष्ठितम् ।

कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना ।। १० ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! इस प्रकार अपने पिताके कंधेपर मृतक सर्पके रखेजानेका समाचार सुनकर ऋषिकुमार शृंगी क्रोधसे जल उठा। कोपसे उसकी आँखें लाल होगयीं ।। १० ।।

आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा ।

वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगबलात्कृतः ।। ११ ।।

वह तेजस्वी बालक रोषके आवेशमें आकर प्रचण्ड क्रोधके वेगसे युक्त हो गया था।उसने जलसे आचमन करके हाथमें जल लेकर उस समय राजा परीक्षित्को इस प्रकार शापदिया ।। ११ ।।

शृंग्युवाच

योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह ।

स्कन्धे मृतं समास्राक्षीत् पन्नगं राजकिल्बिषी ।। १२ ।।

तं पापमतिसंक्रुद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः ।

आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ।। १३ ।।

सप्तरात्रादितो नेता यमस्य सदनं प्रति ।

द्विजानामवमन्तारं कुरूणामयशस्करम् ।। १४ ।।

शृंगी बोला-जिस पापात्मा नरेशने वैसे धर्म-संकटमें पड़े हुए मेरे बूढ़े पिताके कंधेपरमरा साँप रख दिया है, ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले उस कुरुकुलकलंक पापी परीक्षित्कोआजसे सात रातके बाद प्रचण्ड तेजस्वी पन्नगोत्तम तक्षक नामक विषैला नाग अत्यन्तकोपमें भरकर मेरे वाक्यबलसे प्रेरित हो यमलोक पहुँचा देगा ।। १२-१४ ।।

सौतिरुवाच

इति शप्त्वातिसंक्रुद्धः शृंगी पितरमभ्यगात् ।

आसीनं गोव्रजे तस्मिन् वहन्तं शवपन्नगम् ।। १५ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-इस प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप देकर शृंगी अपने पिताकेपास आया, जो उस गोष्ठमें कंधेपर मृतक सर्प धारण किये बैठे थे ।। १५ ।।

स तमालक्ष्य पितरं शृङ्गी स्कन्धगतेन वै ।

शवेन भुजगेनासीद् भूयः क्रोधसमाकुलः ।। १६ ।।

कंधेपर रखे हुए मुर्दे साँपसे संयुक्त पिताको देखकर शृंगी पुनः क्रोधसे व्याकुल होउठा ।। १६ ।।

दुःखाच्चाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमब्रवीत् ।

श्रुत्वेमां धर्षणां तात तव तेन दुरात्मना ।। १७ ।।

राज्ञा परिक्षिता कोपादशपं तमहं नृपम् ।

यथार्हति स एवोग्रं शापं कुरुकुलाधमः ।

सप्तमेऽहनि तं पापं तक्षकः पन्नगोत्तमः । १८ ।।

वैवस्वतस्य सदनं नेता परमदारुणम् ।

तमब्रवीत् पिता ब्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम् ।। १९ ।।

वह दुःखसे आँसू बहाने लगा। उसने पितासे कहा-‘तात! उस दुरात्मा राजापरीक्षितुके द्वारा आपके इस अपमानकी बात सुनकर मैंने उसे क्रोधपूर्वक जैसा शाप दियाहै, वह कुरुकुलाधम वैसे ही भयंकर शापके योग्य है। आजके सातवें दिन नागराज तक्षकउस पापीको अत्यन्त भयंकर यमलोकमें पहुँचा देगा।’ ब्रह्मन्! इस प्रकार क्रोधमें भरे हुएपुत्रसे उसके पिता शरमीकने कहा ।। १७- १९ ।।

शमीक उवाच

न मे प्रियं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम् ।

वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे ।। २० ।।

न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य शापं न रोचये ।

सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा ।। २१ ।।

क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हुन्ति न संशयः ।

यदि राजा न संरक्षेत् पीडा नः परमा भवेत् ।। २२ ।।

शमीक बोले-वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है । यह तपस्वियोंकाधर्म नहीं है। हमलोग उन महाराज परीक्षितुके राज्यमें निवास करते हैं और उनके द्वारान्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है। अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है। हमारे-जैसे साधुपुरुषोंको तो वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको सब प्रकारसे क्षमा ही करना चाहिये।बेटा! यदि धर्मको नष्ट किया जाय तो वह मनुष्यका नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है ।यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है ।। २०-२२ |।

न शक्नुयाम चरितुं धर्म पुत्र यथासुखम् ।

रक्ष्यमाणा वयं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः । । २३ ।।

चरामो विपुलं धर्म तेषां भागोऽस्ति धर्मतः ।

सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि ।। २४ ।।

पुत्र! हम राजाके बिना सुखपूर्वक धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकते । तात! धर्मपर दृष्टिरखनेवाले राजाओंके द्वारा सुरक्षित होकर हम अधिक-से -अधिक धर्मका आचरण कर पातेहैं। अत: हमारे पुण्यकर्मोंमें धर्मतः उनका भी भाग है। इसलिये वर्तमान राजा परीक्षित्केअपराधको तो क्षमा ही कर देना चाहिये ।। २३-२४ ।।

परिक्षित्तु विशेषेण यथास्य प्रपितामहः ।

रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजा विभो ।। २५ ।।

परीक्षित् तो विशेषरूपसे अपने प्रपितामह युधिष्ठिर आदिकी भाँति हमारी रक्षा करतेहैं। शक्तिशाली पुत्र! प्रत्येक राजाको इसी प्रकार प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ।। २५ ।।

तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना ।

अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ।। २६ ।।

वे आज भूखे और थके-माँदै यहाँ आये थे। वे तपस्वी नरेश मेरे इस मौन-व्रतको नहींजानते थे; मैं समझता हूँ इसीलिये उन्होंने मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर दिया ।। २६ ।।

अराजके जनपदे दोषा जायन्ति वै सदा।

उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ।। २७ ।।

जिस देशमें राजा न हो वहाँ अनेक प्रकारके दोष (चोर आदिके भय) पैदा होते हैं।धर्मकी मर्यादा त्यागकर उच्छृंखल बने हुए लोगोंको राजा अपने दण्डके द्वारा शिक्षा देताहै ।। २७ ।।

दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा ।

नोद्धिग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ।। २८ ।।

दण्डसे भय होता है, फिर भयसे तत्काल शान्ति स्थापित होती है। जो चोर आदिकेभयसे उद्विग्न है, वह धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता। वह उद्विग्न पुरुष यज्ञ, श्राद्ध आदिशास्त्रीय कर्मोंका आचरण भी नहीं कर सकता ।। २८ ।।

राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः ।

राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद् देवाः प्रतिष्ठिताः ।। २९ ।।

राजासे धर्मकी स्थापना होती है और धर्मसे स्वर्गलोककी प्रतिष्ठा (प्राप्ति) होती है।राजासे सम्पूर्ण यज्ञकर्म प्रतिष्ठित होते हैं और यज्ञसे देवताओंकी प्रतिष्ठा होती है ।। २९ ।।

देवाद् वृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः ।

ओषधिभ्यो मनुष्याणां धारयन् सततं हितम् ।। ३० ।।

मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः ।

दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत् ।। ३१ ।।

देवताके प्रसन्न होनेसे वर्षा होती है, वर्षासे अन्न पैदा होता है और अन्नसे निरन्तरमनुष्योंके हितका पोषण करते हुए राज्यका पालन करनेवाला राजा मनुष्योंके लिये विधाता(धारण-पोषण करनेवाला) है। राजा दस श्रोत्रियके समान है, ऐसा मनुजीने कहाहै ।। ३०-३१ ।।

तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना ।

अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ।। ३२ ।।

वे तपस्वी राजा यहाँ भूखे-प्यासे और थके-माँदे आये थे। उन्हें मेरे इस मौन-व्रतकापता नहीं था, इसलिये मेरे न बोलनेसे रुष्ट होकर उन्होंने ऐसा किया है ।। ३२ ।।

कस्मादिदं त्वया बाल्यात् सहसा दुष्कृतं कृतम् ।

न ह्यहीति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ।। ३३ ।।

तुमने मूर्खतावश बिना विचारे क्यों यह दुष्कर्म कर डाला? बेटा! राजा हमलोगोंसे शापपानेके योग्य नहीं हैं ।। ३३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिच्छापे एकचत्वारिंशोऽध्यायः।। ४१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-शापविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४१ ।।

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजापरीक्षित्के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत

शृङ्गयुवाच

यद्येतत् साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् ।

प्रियं वाप्यप्रियं वा ते वागुक्ता न मृषा भवेत् ।। १ ।।

शृंगी बोला-तात! यदि यह साहस है अरवा यदि मेरे द्वारा दुष्कर्म हो गया है तो होजाय। आपको यह प्रिय लगे या अप्रिय, किंतु मैंने जो बात कह दी है, वह झूठी नहीं होसकती ।। १ ।।

नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि ते ।

नाहं मृषा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ।। २ ।।

पिताजी! मैं आपसे सच कहता हूँ, अब यह शाप टल नहीं सकता। मैं हँसी-मजाकमेंभी झूठ नहीं बोलता, फिर शाप देते समय कैसे झूठी बात कह सकता हूँ ।। २ ।।

शमीक उवाच

जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यगिरं तथा।

नानृतं चोक्तपूर्वं ते नैतन्मिथ्या भविष्यति ।। ३ ।।

शमीकने कहा-बेटा! मैं जानता हूँ तुम्हारा प्रभाव उग्र है, तुम बड़े सत्यवादी हो,तुमने पहले भी कभी झूठी बात नहीं कही है; अतः यह शाप मिथ्या नहीं होगा ।। ३ ।।

पित्रा पुत्रो वयःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु ।

यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच्च महद् यशः ।। ४ ।।

तथापि पिताको उचित है कि वह अपने पुत्रको बड़ी अवस्थाका हो जानेपर भी सदासत्कर्मोंका उपदेश देता रहे; जिससे वह गुणवान् हो और महान् यश प्राप्त करे ।। ४ ।।

किं पुनर्बाल एव त्वं तपसा भावितः सदा ।

वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ।। ५ ।।

फिर तुम्हें उपदेश देनेकी तो बात ही क्या है, तुम तो अभी बालक ही हो। तुमने सदातपस्याके द्वारा अपनेको दिव्य शक्तिसे सम्पन्न किया है। जो योगजनित ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं,ऐसे प्रभावशाली तेजस्वी पुरुषोंका भी क्रोध अधिक बढ़ जाता है%3B फिर तुम-जैसे बालककोक्रोध हो, इसमें कहना ही क्या है ।। ५ ।।

सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर ।

पुत्रत्वं बालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ।। ६ ।।

(किंतु यह क्रोध धर्मका नाशक होता है) इसलिये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुम्हारेबचपन और दुःसाहसपूर्ण कार्यको देखकर मैं तुम्हें कुछ कालतक उपदेश देनेकीआवश्यकता समझता हूँ ।। ६ ।।

स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् ।

चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ।। ७ ।।

तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करतेहुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहींहोगी ।। ७ ।।

क्रोधो हि धर्म हरति यतीनां दुःखसंचितम् ।

ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ।। ८ ।।

क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है। फिरधर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है।। ८ ।।

शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः ।

क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् । ९ ।।

शम (मनोनिग्रह) ही क्षमाशील साधकोंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाला है। जिनमें क्षमाहै, उन्हींके लिये यह लोक और परलोक दोनों कल्याणकारक हैं ।। ९ ।।

तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।

क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ।। १० ।।

इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो। क्षमासे ही ब्रह्माजीकेनिकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ।। १० ।।

मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै ।

तत् करिष्याम्यहं तात प्रेषयिष्ये नृपाय वै ।। ११ ।।

मम पुत्रेण शप्तोऽसि बालेन कृशबुद्धिना ।

ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्षिणा ।। १२ ।।

तात! मैं तो शान्ति धारण करके अब जो कुछ किया जा सकता है, वह कूंगा।राजाके पास यह संदेश भेज दूँगा कि ‘राजन्! तुम्हारे द्वारा मुझे जो तिरस्कार प्राप्त हुआ है।उसे देखकर अमर्षमें भरे हुए मेरे अल्पबुद्धि एवं मूढ़ पुत्रने तुम्हें शाप दे दियाहै’ ।। ११-१२ ।।

सौतिरुवाच

एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रतः ।

परिक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः ।। १३ ।।

संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च ।

शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ।। १४ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दयालु एवं महातपस्वी शमीकमुनिने अपने गौरमुख नामवाले एकाग्रचित्त एवं शीलवान् शिष्यको इस प्रकार आदेश देकुशल-प्रश्न, कार्य एवं वृतान्तका संदेश देकर राजा परीक्षित्के पास भेजा ।। १३-१४ ।।

सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् ।

विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वाःस्थैर्निवेदितः ।। १५ ।।

गौरमुख वहाँसे शीघ्र कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले महाराज परीक्षित्के पास चला गया।राजधानीमें पहुँचनेपर द्वारपालने पहले महाराजको उसके आनेकी सूचना दी और उनकीआज्ञा मिलनेपर गौरमुखने राजभवनमें प्रवेश किया।। १५ ।।

पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा ।

आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ।। १६ ।।

महाराज परीक्षित्ने उस समय गौरमुख ब्राह्मणका बड़ा सत्कार किया। जब उसनेविश्राम कर लिया, तब शमीकके कहे हुए घोर वचनको मन्त्रियोंके समीप राजाके सामनेपूर्णरूपसे कह सुनाया ।। १६।।

गौरमुख उवाच

शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ ।

शमीको नाम राजेन्द्र वर्तते विषये तव ।। १७ ।।

ऋषिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः ।

तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ।। १८ ।।

अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मौनान्वितस्य च ।

क्षान्तवांस्तव तत् कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ।। १९ ।।

गौरमुख बोला-महाराज! आपके राज्यमें शर्मीक नामवाले एक परम धर्मात्मा महर्षिरहते हैं। वे जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले और महान् तपस्वी हैं। नरव्याघ्र! आपने मौनव्रत धारण करनेवाले उन महात्माके कंधेपर धनुषकी नोकसे उठाकर एक मरा हुआ साँपरख दिया था। महर्षिने तो उसके लिये आपको क्षमा कर दिया था, किंतु उनके पुत्रको वहसहन नहीं हुआ ।। १७-१९ ।।

तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै ।

तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति ।। २० ।।

राजेन्द्र! उस ऋषिकुमारने आज अपने पिताके अनजानमें ही आपके लिये यह शापदिया है कि ‘आजसे सात रातके बाद ही तक्षक नाग आपकी मृत्युका कारण होजायगा’ ।। २० ।।

तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाब्रवीत् ।

तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत ।। २१ ।।

इस दशामें आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था करें। यह मुनिने बार-बार कहा है। उसशापको कोई भी टाल नहीं सकता ।। २१ ।।

न हि शक्नोति तं यन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् ।

ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन् हितार्थिना ।। २२ ।।

स्वयं महर्षि भी क्रोधमें भरे हुए अपने पुत्रको शान्त नहीं कर पा रहे हैं। अतः राजन्!आपके हितकी इच्छासे उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है । २२ ।।

सौतिरुवाच

इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः ।

पर्यतप्यत तत् पापं कृत्वा राजा महातपाः ।। २३ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-यह घोर वचन सुनकर कुरुनन्दन राजा परीक्षित् मुनिकाअपराध करनेके कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे ।। २३ ।।

तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा ।

भूय एवाभवद् राजा शोकसंतप्तमानसः ।। २४ ।।

वे श्रेष्ठ महर्षि उस समय वनमें मौन-व्रतका पालन कर रहे थे, यह सुनकर राजापरीक्षित्का मन और भी शोक एवं संतापमें डूब गया ।। २४ ।।

अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च।

पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत् किल्बिषं मुनेः ।। २५ ।

शमीक मुनिकी दयालुता और अपने द्वारा उनके प्रति किये हुए उस अपराधका विचारकरके वे अधिकाधिक संतप्त होने लगे ।। २५ ।।

न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत ।

अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ।। २६ ।।

देवतुल्य राजा परीक्षित्को अपनी मृत्युका शाप सुनकर वैसा संताप नहीं हुआ जैसाकि मुनिके प्रति किये हुए अपने उस बर्तावको याद करके वे शोकमग्न हो रहे थे ।। २६ ।।

ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुखं तदा ।

भूयः प्रसादं भगवान् करोत्विह ममेति वै ।। २७ ।।

तदनन्तर राजाने यह संदेश देकर उस समय गौरमुखको विदा किया कि भगवान्शमीक मुनि यहाँ पधारकर पुनः मुझपर कृपा करें’ ।। २७ ।।

तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा।

मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह संविग्नमानसः ॥ २८ ।।

गौरमुखके चले जानेपर राजाने उद्विग्नचित्त हो मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणाकी ।। २८ ।।

सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिश्चैव स तथा मन्त्रतत्त्ववित् ।

प्रासादं कारयामास एकस्तम्भं सुरक्षितम् ।। २९ ।।

मन्त्र-तत्त्वके ज्ञाता महाराजने मन्त्रियोंसे सलाह करके एक ऊँचा महल बनवाया;जिसमें एक ही खंभा लगा था। वह भवन सब ओरसे सुरक्षित था ।। २९ ।।

रक्षां च विदधे तत्र भिषजश्चौषधानि च ।

ब्राह्मणान् मन्त्रसिद्धांश्च सर्वतो वै न्ययोजयत् ।। ३० ।।

राजाने वहाँ रक्षाके लिये आवश्यक प्रबन्ध किया , उन्होंने सब प्रकारकी ओषधियाँजुटा लीं और वैद्यों तथा मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणोंको सब ओर नियुक्त कर दिया ।। ३० ।।

राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः ।

मन्त्रिभिः सह धर्मज्ञः समन्तात् परिरक्षितः ।। ३१ ।।

वहीं रहकर वे धर्मज्ञ नरेश सब ओरसे सुरक्षित हो मन्त्रियोंके साथ सम्पूर्ण राज-कार्यकी व्यवस्था करने लगे ।। ३१ ।।

न चैनं कश्चिदारूढं लभते राजसत्तमम् ।

वातोऽपि निश्चरंस्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते । ३२ ।।

उस समय महलमें बैठे हुए महाराजसे कोई भी मिलने नहीं पाता था। वायुको भीवहाँसे निकल जानेपर पुनः प्रवेशके समय रोका जाता था ।। ३२ ।।

प्राप्ते च दिवसे तस्मिन् सप्तमे द्विजसत्तमः |

काश्यपोऽभ्यागमद् विद्वांस्तं राजानं चिकित्सितुम् ।। ३३ ।।

सातवाँ दिन आनेपर मन्त्रशास्त्रके ज्ञाता द्विजश्रेष्ठ काश्यप राजाकी चिकित्सा करनेकेलिये आ रहे थे ।। ३३ ।।

श्रुतं हि तेन तदभूद् यथा तं राजसत्तमम् ।

तक्षकः पन्नगर्रेष्ठो नेष्यते यमसादनम् ।। ३४ ।।

उन्होंने सुन रखा था कि ‘भूपशिरोमणि परीक्षित्को आज नागोंमें श्रेष्ठ तक्षक यमलोकपहुँचा देगा’ ।। ३४ ।।

तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम् ।

तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तयन् ।। ३५ ।।

अतः उन्होंने सोचा कि नागराजके डँसे हुए महाराजका विष उतारकर मैं उन्हें जीवितकर दूँगा। ऐसा करनेसे वहाँ मुझे धन तो मिलेगा ही, लोकोपकारी राजाको जिलानेसे धर्मभी होगा ।। ३५ ।।

तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि।

गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिगः ॥ ३६ ।।

तमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम् ।

क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ।। ३७ ।।

मार्गमें नागराज तक्षकने काश्यपको देखा। वे एकचित्त होकर हस्तिनापुरकी ओर बढ़ेजा रहे थे। तब नागराजने बूढ़े ब्राह्मणका वेश बनाकर मुनिवर काश्यपसे पूछा- ‘ आप कहाँबड़ी उतावलीके साथ जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?’ |। ३६-३७ ।।

काश्यप उवाच

नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परिक्षितमरिन्दमम् ।

तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति ।। ३८ ।।

काश्यपने कहा-कुरुकुलमें उत्पन्न शत्रुदमन महाराज परीक्षित्को आज नागराजतक्षक अपनी विषाग्निसे दग्ध कर देगा ।। ३८ ।।

तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसा ।

पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम् ।

गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम् ।। ३९ ।।

वे राजा पाण्डवोंकी वंशपरम्पराको सुरक्षित रखने-वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी हैं।अतः सौम्य! अग्निके समान तेजस्वी नागराजके डँस लेनेपर उन्हें तत्काल विषरहित करकेजीवित कर देनेके लिये मैं जल्दी-जल्दी जा रहा हूँ ।। ३९ ।।

तक्षक उवाच

अहं स तक्षको ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् ।

निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ।। ४० ।।

तक्षक बोला-ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षक हूँ। आज राजाको भस्म कर डालूँगा। आपलौट जाइये। मैं जिसे डँस लूँ, उसकी चिकित्सा आप नहीं कर सकते ।। ४० ।।

काश्यप उवाच

अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दष्टमपज्वरम् ।

करिष्यामीति मे बुद्धिर्विद्याबलसमन्विता ।। ४१ ।।

काश्यपने कहा-मैं तुम्हारे डँसे हुए राजाको वहाँ जाकर विषसे रहित कर दूँगा। यहविद्याबलसे सम्पन्न मेरी बुद्धिका निश्चय है ।। ४१ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि काश्यपागमने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः।। ४२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें काश्यपागमनविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४२ ।।

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित्के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना

तक्षक उवाच

यदि दष्टं मयेह त्वं शक्तः किंचिच्चिकित्सितुम् ।

ततो वृक्षं मया दष्टमिमं जीवय काश्यप ।। १ ।।

तक्षक बोला-काश्यप! यदि इस जगत्में मेरे डँसे हुए रोगीकी कुछ भी चिकित्साकरनेमें तुम समर्थ हो तो मेरे डँसे हुए इस वृक्षको जीवित कर दो ।। १ ।।

परं मन्त्रबलं यत् ते तद् दर्शय यतस्व च ।

न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ।। २ ।।

द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे पास जो उत्तम मन्त्रका बल है, उसे दिखाओ और यत्न करो। लो,तुम्हारे देखते-देखते इस वटवृक्षको मैं भस्म कर देता हूँ ।। २ ।।

काश्यप उवाच

दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यद्येतदभिमन्यसे ।

अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजङ्गम ।। ३ ।।

काश्यपने कहा-नागराज! यदि तुम्हें इतना अभिमान है तो इस वृक्षको डँसो ।भुजंगम! तुम्हारे डँसे हुए इस वृक्षको मैं अभी जीवित कर दूंगा ।। ३ ।।

सौतिरुवाच

एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना ।

अदशद् वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः ।। ४ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-महात्मा काश्यपके ऐसा कहनेपर सर्पोंमें श्रेष्ठ नागराजतक्षकने निकट जाकर बरगदके वृक्षको डँस लिया ।। ४ ।।

स वृक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना ।

आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ।। ५ ।।

उस महाकाय विषधर सर्पके डँसते ही उसके विषसे व्याप्त हो वह वृक्ष सब ओरसेजल उठा ।। ५ ।।

तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरब्रवीत् ।

कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवयैनं वनस्पतिम् ।। ६ ।।

इस प्रकार उस वृक्षको जलाकर नागराज पुनः काश्यपसे बोला – ‘द्विजश्रेष्ठ! अब तुमयत्न करो और इस वृक्षको जिला दो’ ।। ६ ।।

सौतिरुवाच भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा ।

भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत् ।। ७ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! नागराजके तेजसे भस्म हुए उस वृक्षकी सारीभस्मराशिको एकत्र करके काश्यपने कहा-।| ७ ।।

विद्याबलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽद्य वनस्पतौ ।

अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम ।।८।।

‘नागराज! इस वनस्पतिपर आज मेरी विद्याका बल देखो। भुजंगम! मैं तुम्हारे देखते-देखते इस वृक्षको जीवित कर देता हूँ’ ।। ८ ।।

ततः स भगवान् विद्वान् काश्यपो द्विजसत्तमः ।

भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवयत् ।। ९ ।।

तदनन्तर सौभाग्यशाली विद्वान् द्विजश्रेष्ठ काश्यपने भस्मराशिके रूपमें विद्यमान उसवृक्षको विद्याके बलसे जीवित कर दिया ।। ९ ।।

अङ्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम् ।

पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ।। १० ।।

पहले उन्होंने उसमेंसे अंकुर निकाला, फिर उसे दो पत्तेका कर दिया । इसी प्रकारक्रमशः पल्लव, शाखा और प्रशाखाओंसे युक्त उस महान् वृक्षकों पुनः पूर्ववत् खड़ा करदिया ।। १० ।।

तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना ।

उवाच तक्षको ब्रह्मन् नैतदत्यद्भुतं त्वयि ।। ११ ।।

महात्मा काश्यपद्वारा जिलाये हुए उस वृक्षको देखकर तक्षकने कहा-‘ब्रह्मन्! तुम-जैसे मन्त्रवेत्तामें ऐसे चमत्कारका होना कोई अद्भुत बात नहीं है ।। ११ ।।

द्विजेन्द्र यद् विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा ।

कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ।। १२ ।।

‘तपस्याके धनी द्विजेन्द्र! जब तुम मेरे या मेरे-जैसे दूसरे सर्पके विषको अपनी विद्याकेबलसे नष्ट कर सकते हो तो बताओ, तुम कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ जारहे हो ।। १२ ।।

यत् तेऽभिलषितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् ।

अहमेव प्रदास्यामि तत् ते यद्यपि दुर्लभम् ।। १३ ।।

‘उस श्रेष्ठ राजासे जो फल प्राप्त करना तुम्हें अभीष्ट है, वह अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैंही तुम्हें दे दूँगा ।। १३ ।।

विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे ।

घटमानस्य ते विप्र सिद्धिः संशयिता भवेत् ।। १४ ।।

‘विप्रवर! महाराज परीक्षित् ब्राह्मणके शापसे तिरस्कृत हैं और उनकी आयु भी समाप्तहो चली है। ऐसी दशामें उन्हें जिलानेके लिये चेष्टा करनेपर तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी, इसमेंसंदेह है ।। १४ ।।

ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

निरंशुरिव घर्माशुरन्तर्धानमितो व्रजेत् ॥ १५ ॥

‘यदि तुम सफल न हुए तो तीनों लोकोंमें विख्यात एवं प्रकाशित तुम्हारा यशकिरणरहित सूर्यके समान इस लोकसे अदृश्य हो जायगा’ ।। १५ ।।

काश्यप उवाच

धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजङ्गम ।

ततोऽहं विनिरवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै ॥ १६ ।।

काश्यपने कहा-नागराज तक्षक! मैं तो वहाँ धनके लिये ही जाता हूँ, वह तुम्हीं मुझेदे दो तो उस धनको लेकर मैं घर लौट जाऊँगा ।। १६ ।।

तक्षक उवाच

यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद् राज्ञस्ततोऽधिकम् ।

अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ।। १७ ।।

तक्षक बोला-द्विजश्रेष्ठ! तुम राजा परीक्षित्से जितना धन पाना चाहते हो, उससेअधिक मैं ही दे दूँगा, अतः लौट जाओ ।। १७ ।।

सौतिरुवाच

तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः ।

प्रदर्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान् । १८ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-तक्षककी बात सुनकर परम बुद्धिमान् महातेजस्वी विप्रवरकाश्यपने राजा परीक्षित्के विषयमें कुछ देर ध्यान लगाकर सोचा ।। १८ ।।

दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा ।

क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः ।। १९ ।।

लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद् यावदीप्सितम् ।

निवृत्ते काश्यपे तस्मिन् समयेन महात्मनि ।। २० ।।

जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम् ।

अथ शुश्राव गच्छन् स तक्षको जगतीपतिम् ।। २१ ।।

मन्त्रैर्गदैर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नतः ।तेजस्वी काश्यप दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थे। उस समय उन्होंने जान लिया कि पाण्डववंशीराजा परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो गयी है, अतः वे मुनिश्रेष्ठ तक्षकसे अपनी रुचिकेअनुसार धन लेकर वहाँसे लौट गये। महात्मा काश्यपके समय रहते लौट जानेपर तक्षकतुरंत हस्तिनापुर नगरमें जा पहुँचा। वहाँ जानेपर उसने सुना, राजा परीक्षित्की मन्त्रों तथाविष उतारनेवाली ओषधियोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जा रही है ।। १९ – २१ ।।

सौतिरुवाच

स चिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिवः ।। २२ ।।

मया वञ्चयितव्योऽसौ क उपायो भवेदिति ।

ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत् स भुजङ्गमान् ।। २३ ।।

फलदर्भोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः ।उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! तब तक्षकने विचार किया, मुझे मायाका आश्रयलेकर राजाको ठग लेना चाहिये; किंतु इसके लिये क्या उपाय हो? तदनन्तर तक्षक नागनेफल, दर्भ (कुशा) और जल लेकर कुछ नागोंको तपस्वीरूपमें राजाके पास जानेकी आज्ञादी ।। २२-२३ ।।

तक्षक उवाच

गच्छध्वं यूयमव्यग्रा राजानं कार्यवत्तया ।। २४ ।।

फलपुष्पोदकं नाम प्रतिग्राहयितुं नृपम् ।तक्षकने कहा-तुमलोग कार्यकी सफलताके लिये राजाके पास जाओ, किंतु तनिकभी व्यग्र न होना। तुम्हारे जानेका उद्देश्य है – महाराजको फल, फूल और जल भेंट करना ।। २४ ।।

सौतिरुवाच

ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः ।। २५ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-तक्षकके आदेश देनेपर उन नागोंने वैसा ही किया।। २५ ।।

उपनिन्युस्तथा राज्ञे दर्भानापः फलानि च ।

तच्च सर्वं स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ।। २६ ।।

वे राजाके पास कुश, जल और फल लेकर गये। परम पराक्रमी महाराज परीक्षित्नेउनकी दी हुई वे सब वस्तुएँ ग्रहण कर लीं ।। २६ ।।

कृत्वा तेषां च कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान् ।

गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छद्मरूपिषु ।। २७ ।

अमात्यान् सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिपः।

भक्षयन्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः ।। २८ ।।

तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मया।

ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत ।। २९ ।।

तदनन्तर उन्हें पारितोषिक देने आदिका कार्य करके कहा -‘अब आपलोग जायँ ।’तपस्वियोंके वेषमें छिपे हुए उन नागोंके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियों और सुहृदोंसेकहा-‘ये सब तपस्वियोंद्वारा लाये हुए बड़े स्वादिष्ठ फल हैं। इन्हें मेरे साथ आपलोग भीखायँ।’ ऐसा कहकर मन्त्रियोंसहित राजाने उन फलोंको लेनेकी इच्छा की ।। २७ – २९ ।।

विधिना सम्प्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु ।

यस्मिन्नेव फले नागस्तमेवाभक्षयत् स्वयम् ।। ३० ।।

विधाताके विधान एवं महर्षिके वचनसे प्रेरित होकर राजाने वही फल स्वयं खाया,जिसपर तक्षक नाग बैठा था ।। ३० ।। |

ततो भक्षयतस्तस्य फलात् कृमिरभूदणुः।

हस्वकः कृष्णनयनस्ताम्रवर्णोऽथ शौनक ।। ३१ ।।

शौनकजी! खाते समय राजाके हाथमें जो फल था, उससे एक छोटा-सा कीट प्रकटहुआ। देखनेमें वह अत्यन्त लघु था, उसकी आँखें काली और शरीरका रंग ताँबेके समानथा ।। ३१ ।।

स तं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमब्रवीत् ।

अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम् ।। ३२ ।।

नृपश्रेष्ठ परीक्षित्ने उस कीड़ेको हाथमें लेकर मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा – ‘अब सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये इस समय मुझे सर्पके विषसे कोई भय नहींहै ।। ३२ ।।

सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिर्मा दशतामयम् ।

तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत् ।। ३३ ।।

‘वे मुनि सत्यवादी हों, इसके लिये यह कीट ही तक्षक नाम धारण करके मुझे डँस ले।ऐसा करनेसे मेरे दोषका परिहार हो जायगा ।। ३३ ।।

ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः ।

एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संनिवेश्य ह ।। ३४ ।।

कृमिकं प्राहसत् तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः ।

प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्ट्यत ।। ३५ ।।

तस्मात् फलाद् विनिष्क्रम्य यत् तद् राज्ञे निवेदितम् ।

वेष्टयित्वा च वेगेन विनद्य च महास्वनम्।

अदशत् पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वरः ।। ३६ ।।

कालसे प्रेरित होकर मन्त्रियोंने भी उनकी हाँ-में-हाँ मिला दी। मन्त्रियोंसे पूर्वोक्त बातकहकर राजाधिराज परीक्षित् उस लघु कीटको कंधेपर रखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। वेतत्काल ही मरनेवाले थे; अतः उनकी बुद्धि मारी गयी थी। राजा अभी हँस ही रहे थे किउन्हें जो निवेदित किया गया था उस फलसे निकलकर तक्षक नागने अपने शरीरसे उनकोजकड़ लिया। इस प्रकार वेगपूर्वक उनके शरीरमें लिपटकर नागराज तक्षकने बड़े जोरसेगर्जना की और भूपाल परीक्षित्को डँस लिया ।। ३४- ३६।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि तक्षकदंशे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ।।४३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें तक्षक-दंशनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४३ ।।

चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

जनमेजयका राज्याभिषेक और विवाह

सौतिरुवाच

ते तथा मन्त्रिणो दृष्ट्वा भोगेन परिवेष्टितम् ।

विषण्णवदनाः सर्वे रुरुदुर्भृशदुःखिताः ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! मन्त्रीगण राजा परीक्षित्को तक्षक नागसे जकड़ाहुआ देख अत्यन्त दुःखी हो गये। उनके मुखपर विषाद छा गया और वे सब-के सब रोनेलगे ।। १ ।।

तं तु नादं ततः श्रुत्वा मन्त्रिणस्ते प्रदुद्रुवुः ।

अपश्यन्त तथा यान्तमाकाशे नागमद्भरुतम् ।। २ ।।

सीमन्तमिव कुर्वाणं नभसः पद्मवर्चसम्।

तक्षकं पन्नगश्रेष्ठं भृशं शोकपरायणाः ।। ३ ।।

तक्षककी फुंकारभरी गर्जना सुनकर मन्त्रीलोग भाग चले। उन्होंने देखा लालकमलकी-सी कान्ति-वाला वह अद्भुत नाग आकाशमें सिन्दूरकी रेखा-सी खींचता हुआचला जा रहा है। नागोंमें श्रेष्ठ तक्षकको इस प्रकार जाते देख वे राजमन्त्री अत्यन्त शोकमेंडूब गये ।। २-३ ।।

ततस्तु ते तद् गृहमग्निनाऽऽवृतं प्रदीप्यमानं विषजेन भोगिनः ।

भयात् परित्यज्य दिशः प्रपेदिरे पपात राजाशनिताडितो यथा ।। ४ ।।

वह राजमहल सर्पके विषजनित अग्निसे आवृत हो धू-धू करके जलने लगा। यह देखउन सब मन्त्रियोंने भयसे उस स्थानको छोड़कर भिन्न- भिन्न दिशाओंकी शरण ली तथाराजा परीक्षित् वज्रके मारे हुएकी भाँति धरतीपर गिर पड़े ।। ४ ॥

ततो नृपे तक्षकतेजसा हते प्रयुज्य सर्वाः परलोकसत्क्रियाः।

शुचिर्द्धिजो राजपुरोहितस्तदा तथैव ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः ।। ५ ।।

नृपं शिशुं तस्य सुतं प्रचक्रिरे समेत्य सर्वे पुरवासिनो जनाः ।

नृपं यमाहुस्तममित्रघातिनंकुरुप्रवीरं जनमेजयं जनाः ।। ६ ।।

तक्षककी विषाग्निद्वारा राजा परीक्षित्के दग्ध हो जानेपर उनकी समस्त पारलौकिकक्रियाएँ करके पवित्र ब्राह्मण राजपुरोहित, उन महाराजके मन्त्री तथा समस्त पुरवासीमनुष्योंने मिलकर उन्हींके पुत्रको, जिसकी अवस्था अभी बहुत छोटी थी, राजा बना दिया।कुरुकुलका वह श्रेष्ठ वीर अपने शत्रुओंका विनाश करनेवाला था। लोग उसे राजा जनमेजयकहते थे ।। ५-६ ।।

स बाल एवार्यमतिर्नृपोत्तमःसहैव तैर्मन्त्रिपुरोहितैस्तदा ।

शशास राज्यं कुरुपुङ्गवाग्रजो यथास्य वीरः प्रपितामहस्तथा ।। ७ ।।

बचपनमें ही नृपश्रेष्ठ जनमेजयकी बुद्धि श्रेष्ठ पुरुषोंके समान थी। अपने वीर प्रपितामहमहाराज युधिष्ठिरकी भाँति कुरुश्रेष्ठ वीरोंके अग्रगण्य जनमेजय भी उस समय मन्त्री औरपुरोहितोंके साथ धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगे ।। ७ ।।

ततस्तु राजानममित्रतापनं समीक्ष्य ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः ।

सुवर्णवर्माणमुपेत्य काशिपं वपुष्टमार्थं वरयाम्प्रचक्रमुः ।। ८ ।।

राजमन्त्रियोंने देखा, राजा जनमेजय शत्रुओंको दबानेमें समर्थ हो गये हैं, तब उन्होंनेकाशिराज सुवर्णवर्माके पास जाकर उनकी पुत्री वपुष्टमाके लिये याचना की ।। ८ ।।

ततः स राजा प्रददौ वपुष्टमां कुरुप्रवीराय परीक्ष्य धर्मतः ।

स चापि तां प्राप्य मुदायुतोऽभव-न्न चान्यनारीषु मनोदधे क्वचित् ।। ९ ।।

काशिराजने धर्मकी दृष्टिसे भलीभाँति जाँच-पड़ताल करके अपनी कन्या वपुष्टमाकाविवाह कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर जनमेजयके साथ कर दिया। जनमेजयने भी वपुष्टमाको पाकरबड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया और दूसरी स्त्रियोंकी ओर कभी अपने मनको नहीं जानेदिया ।। ९ ।।

सरःसु फुल्लेषु वनेषु चैव हि प्रसन्नचेता विजहार वीर्यवान् ।

तथा स राजन्यवरो विजह्निवान् यथोर्वशीं प्राप्य पुरा पुरूरवाः ।। १०।

राजाओंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी जनमेजयने प्रसन्न-चित्त होकर सरोवरों तथा पुष्पशोभितउपवनोंमें रानी वपुष्टमाके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे पूर्वकालमें उर्वशीको पाकरमहाराज पुरूरवाने किया था।। १० ।।

वपुष्टमा चापि वरं पतिव्रता प्रतीतरूपा समवाप्य भूपतिम् ।

भावेन रामा रमयाम्बभूव सा विहारकालेष्ववरोधसुन्दरी ।। ११ ।।

वपुष्टमा पतिव्रता थी। उसका रूपसौन्दर्य सर्वत्र विख्यात था। वह राजाके अन्तःपुरमेंसबसे सुन्दरी रमणी थी। राजा जनमेजयको पतिरूपमें प्राप्त करके वह विहारकालमें बड़ेअनुरागके साथ उन्हें आनन्द प्रदान करती थी ।। ११ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जनमेजयराज्याभिषेके चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जनमेजयराज्याभिषेकसम्बन्धी चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४४ ।।

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप

सौतिरुवाच

एतस्मिन्नेव काले तु जरत्कारुर्महातपाः ।

चचार पृथिवीं कृत्स्नां यत्रसायंगृहो मुनिः ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-इन्हीं दिनोंकी बात है, महातपस्वी जरत्कारु मुनि सम्पूर्णपृथ्वीपर विचरण कर रहे थे। जहाँ सायंकाल हो जाता, वहीं वे ठहर जाते थे ।। १ ।।

चरन् दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः ।

तीर्थेष्वाप्लवनं कृत्वा पुण्येषु विचचार ह ।। २ ।।

उन महातेजस्वी महर्षिने ऐसे कठोर नियमोंकी दीक्षा ले रखी थी, जिनका पालन करनादूसरे अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये सर्वथा कठिन था। वे पवित्र तीर्थोमें स्नान करते हुए विचररहे थे ।। २ ।।

वायुभक्षो निराहारः शुष्यन्नहरहर्मुनिः ।

स ददर्श पितृन् गर्ते लम्बमानानधोमुखान्।। ३ ।।

एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्बमाश्रितान् ।

तं तन्तुं च शनैराखुमाददानं बिलेशयम् ।। ४ ।।

वे मुनि वायु पीते और निराहार रहते थे; इसलिये दिन-पर-दिन सूखते चले जाते थे।एक दिन उन्होंने पितरोंको देखा, जो नीचे मुँह किये एक गड्ढेमें लटक रहे थे। उन्होंने खशनामक तिनकोंके समूहको पकड़ रखा था, जिसकी जड़में केवल एक तन्तु बच गया था।उस बचे हुए तन्तुको भी वहीं बिलमें रहनेवाला एक चूहा धीरे-धीरे खा रहा था।। ३-४ ।।

निराहारान् कृशान् दीनान् गर्ते स्वत्राणमिच्छतः ।

उपसृत्य स तान् दीनान् दीनरूपोऽभ्यभाषत ॥ ५ ।।

वे पितर निराहार, दीन और दुर्बल हो गये थे और चाहते थे कि कोई हमें इस गड्ढेमेंगिरनेसे बचा ले। जरत्कारु उनकी दयनीय दशा देखकर दयासे द्रवित हो स्वयं भी दीन होगये और उन दीन-दुःखी पितरोंके समीप जाकर बोले- ॥ ५ ॥

के भवन्तोऽवलम्बन्ते वीरणस्तम्बमाश्रिताः ।

दुर्बलं खादितैर्मूलैराखुना बिलवासिना ।। ६ ।।

‘आपलोग कौन हैं जो खशके गुच्छेके सहारे लटक रहे हैं? इस खशकी जड़ें यहाँबिलमें रहनेवाले चूहेने खा डाली हैं, इसलिये यह बहुत कमजोर है ।। ६ ।।

वीरणस्तम्बके मूलं यदप्येकमिह स्थितम् ।

तदप्ययं शनैराखुरादत्ते दशनैः शितैः ।। ७ ।।

‘खशके इस गुच्छेमें जो मूलका एक तन्तु यहाँ बचा है, उसे भी यह चूहा अपने तीखेदाँतोंसे धीरे-धीरे कुतर रहा है ।। ७ ।।

छेत्स्यतेऽल्पावशिष्टत्वादेतदप्यचिरादिव ।

ततस्तु पतितारोऽत्र गर्ते व्यक्तमधोमुखाः ॥८॥

‘उसका स्वल्प भाग शेष है, वह भी बात-की-बातमें कट जायगा। फिर तो आपलोगनीचे मुँह किये निश्चय ही इस गड्ढेमें गिर जायँगे ।। ८ ।।

तस्य मे दुःखमुत्पन्नं दृष्ट्वा युष्मानधोमुखान् ।

कृच्छ्रमापदमापन्नान् प्रियं किं करवाणि वः ।। ९ ।।

तपसोऽस्य चतुर्थेन तृतीयेनाथवा पुनः ।

अर्धेन वापि निस्तर्तुमापदं ब्रूत मा चिरम् ।। १० ।।

‘आपको इस प्रकार नीचे मुँह किये लटकते देख मेरे मनमें बड़ा दुःख हो रहा है।आपलोग बड़ी कठिन विपत्तिमें पड़े हैं। मैं आपलोगोंका कौन प्रिय कार्य करू? आपलोगमेरी इस तपस्याके चौथे, तीसरे अथवा आधे भागके द्वारा भी इस विपत्तिसे बचाये जा सकेंतो शीघ्र बतलावें ।। ९-१० ।।

अथवापि समग्रेण तरन्तु तपसा मम।भवन्तः सर्व एवेह काममेवं विधीयताम् ।। ११ ।।

‘अथवा मेरी सारी तपस्याके द्वारा भी यदि आप सभी लोग यहाँ इस संकटसे पार होसकें तो भले ही ऐसा कर लें ।। ११ ।।

पितर ऊचुः

वृद्धो भवान् ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि ।

न तु विप्राग्रय तपसा शक्यते तद् व्यपोहितुम् । । १२ ।।

पितरोंने कहा-विप्रवर! आप बूढ़े ब्रह्मचारी हैं, जो यहाँ हमारी रक्षा करना चाहते हैं;किंतु हमारा संकट तपस्यासे नहीं टाला जा सकता ।। १२ ।।

अस्ति नस्तात तपसः फलं प्रवदतां वर ।

संतानप्रक्षयाद् ब्रह्मन् पताम निरयेऽशुचौ ।। १३ ।।

तात! तपस्याका बल तो हमारे पास भी है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! हम तोवंशपरम्पराका विच्छेद होनेके कारण अपवित्र नरकमें गिर रहे हैं ।। १३ ।।

संतानं हि परो धर्म एवमाह पितामहः ।

लम्बतामिह नस्तात न ज्ञानं प्रतिभाति वै ।। १४ ।।

ब्रह्माजीका वचन है कि संतान ही सबसे उत्कृष्ट धर्म है । तात ! यहाँ लटकते हुएहमलोगोंकी सुध-बुध प्रायः खो गयी है, हमें कुछ ज्ञात नहीं होता ।। १४ ।।

येन त्वा नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम् ।

वृद्धो भवान् महाभागो यो नः शोच्यान् सुदुःखितान् ।। १५ ।।

शोचते चैव कारुण्याच्छृणु ये वै वयं द्विज ।

यायावरा नाम वयमृषयः संशितव्रताः ।। १६ ।।

इसीलिये लोकमें विख्यात पौरुषवाले आप-जैसे महापुरुषको हम पहचान नहीं पा रहेहैं। आप कोई महान् सौभाग्यशाली महापुरुष हैं, जो अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए हम-जैसेशोचनीय प्राणियोंके लिये करुणावश शोक कर रहे हैं। ब्रह्मन्! हमलोग कौन हैं इसकापरिचय देते हैं, सुनिये। हम अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले यायावर नामक महर्षिहै ।। १५-१६ ।।

लोकात् पुण्यादिह भ्रष्टाः संतानप्रक्षयान्मुने ।

प्रणष्टं नस्तपस्तीव्रं न हि नस्तन्तुरस्ति वै ।। १७ ।।

मुने! वंशपरम्पराका क्षय होनेके कारण हमें पुण्य-लोकसे भ्रष्ट होना पड़ा है। हमारीतीव्र तपस्या नष्ट हो गयी; क्योंकि हमारे कुलमें अब कोई संतति नहीं रह गयी है ।। १७ ।।

अस्ति त्वेकोऽद्य नस्तन्तुः सोऽपि नास्ति यथा तथा ।

मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एकं समास्थितः ।। १८ ।।

आजकल हमारी परम्परामें एक ही तन्तु या संतति शेष है, किंतु वह भी नहींके बराबरहै। हम अल्पभाग्य हैं, इसीसे वह मन्दभाग्य संतति एकमात्र तपमें लगी हुई है ।। १८ ।।

जरत्कारुरिति ख्यातो वेदवेदाङ्गपारगः ।

नियतात्मा महात्मा च सुव्रतः सुमहातपाः ।। १९ ।।

उसका नाम है जरत्कारु। वह वेद-वेदांगोंका पारंगत विद्वान् होनेके साथ ही मन औरइन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, महात्मा, उत्तम व्रतका पालक और महान् तपस्वीहै ।। १९ ।।

तेन स्म तपसो लोभात् कृच्छ्रमापादिता वयम् ।

न तस्य भार्या पुत्रो वा बान्धवो वास्ति कश्चन ।। २० ।।

उसने तपस्याके लोभसे हमें संकटमें डाल दिया है। उसके न पत्नी है, न पुत्र और नकोई भाई-बन्धु ही है ।। २० ।।

तस्माल्लम्बामहे गर्ते नष्टसंज्ञा ह्यनाथवत् ।

स वक्तव्यस्त्वया दृष्टो ह्यस्माकं नाथवत्तया ।। २१ ।।

इसीसे हमलोग अपनी सुध-बुध खोकर अनाथकी तरह इस गड्ढेमें लटक रहे हैं। यदिवह आपके देखनेमें आवे तो हम अनाथोंको सनाथ करनेके लिये उससे इस प्रकार कहियेगा।। २१ ।।

पितरस्तेऽवलम्बन्ते गर्ते दीना अधोमुखाः ।

साधु दारान् कुरुष्वेति प्रजामुत्पादयेति च ।। २२ ।।

‘जरत्कारो! तुम्हारे पितर अत्यन्त दीन हो नीचे मुँह करके गड्ढेमें लटक रहे हैं। तुमउत्तम रीतिसे पत्नीके साथ विवाह कर लो और उसके द्वारा संतान उत्पन्न करो ।। २२ ।।

कुलतन्तुर्हि नः शिष्टस्त्वमेवैकस्तपोधन ।

यस्त्वं पश्यसि नो ब्रह्मन् वीरणस्तम्बमाश्रितान् ।। २३ ।

एषोऽस्माकं कुलस्तम्ब आस्ते स्वकुलवर्धनः ।

यानि पश्यसि वै ब्रह्मन् मूलानीहास्य वीरुधः ।। २४ ।।

एते नस्तन्तवस्तात कालेन परिभक्षिताः।

यत्त्वेतत् पश्यसि ब्रह्मन् मूलमस्यार्धभक्षितम् ।। २५ ।।

यत्र लम्बामहे गर्ते सोऽप्येकस्तप आस्थितः ।

यमाखुं पश्यसि ब्रह्मन् काल एष महाबलः ।। २६ ।।

‘तपोधन! तुम्हीं अपने पूर्वजोंके कुलमें एकमात्र तन्तु बच रहे हो। ब्रह्मन्! आप जो हमेंखशके गुच्छेका सहारा लेकर लटकते देख रहे हैं, यह खशका गुच्छा नहीं है, हमारे कुलकाआश्रय है, जो अपने कुलको बढ़ानेवाला है। विप्रवर! इस खशकी जो कटी हुई जड़ें यहाँआपकी दृष्टिमें आ रही हैं, ये ही हमारे वंशके वे तन्तु (संतान) हैं, जिन्हें कालरूपी चूहेने खा लिया है। ब्राह्मण! आप जो इस खशकी यह अधकटी जड़ देखते हैं, जिसके सहारे हम गड्ढेमें लटक रहे हैं, यह वही एकमात्र संतान जरत्कारु है, जो तपस्यामें लगा है औरब्राह्मण देवता! जिसे आप चूहेके रूपमें देख रहे हैं, यह महाबली काल है ।। २३-२६ ।।

स तं तपोरतं मन्दं शनैः क्षपयते तुदन् ।

जरत्कारु तपोलब्धं मन्दात्मानमचेतसम् ।। २७ ।।

‘वह उस तपस्वी एवं मूढ़ जरत्कारुको, जो तपको ही लाभ माननेवाला,(अदूरदर्शी) और अचेत ( जड) हो रहा है, धीरे-धीरे पीड़ा देते हुए दाँतोंसे काट रहा है ।। २७ ।।

न हि नस्तत् तपस्तस्य तारयिष्यति सत्तम ।

छिन्नमूलान् परिभ्रष्टान् कालोपहतचेतसः ।। २८ ।।

अधःप्रविष्टान् पश्यास्मान् यथा दुष्कृतिनस्तथा।

अस्मासु पतितेष्वत्र सह सर्वैः सबान्धवैः ।। २९ ।।

छिन्नः कालेन सोऽप्यत्र गन्ता वै नरकं ततः ।

तपो वाप्यथवा यज्ञो यच्चान्यत् पावनं महत् ।। ३० ।।

तत् सर्वमपरं तात न संतत्या समं मतम् ।

स तात दृष्ट्वा ब्रूयास्तं जरत्कारुं तपोधन ।। ३१ ।।

यथा दृष्टमिदं चात्र त्वयाख्येयमशेषतः ।

यथा दारान् प्रकुर्यात् स पुत्रानुत्पादयेद् यथा ।। ३२ ।।

तथा ब्रह्मंस्त्वया वाच्यः सोऽस्माकं नाथवत्तया ।

मन्दात्माबान्धवानां हितस्येह यथा चात्मकुलं तथा ।।३३ ।।

कस्त्वं बन्धुमिवास्माकमनुशोचसि सत्तम ।

श्रोतुमिच्छाम सर्वेषां को भवानिह तिष्ठति ।। ३४ ।।

‘साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये,हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसेभ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होतीहै। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड्ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भीकालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकरमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जोमहान् एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जानपड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपनेयहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसेआप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे औरउसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपनेकुलकी भाँति अपने भाई -बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे!बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं ?हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं’ ।| २८-३४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुपितृदर्शने पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जरत्कारुके पितृदर्शनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।

षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना औरनागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा जरत्कारुर्भृशं शोकपरायणः ।

उवाच तान् पितृन् दुःखाद् वाष्पसंदिग्धया गिरा ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! यह सुनकर जरत्कारु अत्यन्त शोकमें मग्न हो गयेऔर दुःखसे आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें अपने पितरोंसे बोले।। १ ।।

जरत्कारुरुवाच

मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः ।

तद् ब्रूत यन्मया कार्यं भवतां प्रियकाम्यया ।। २ ।।

अहमेव जरत्कारुः किल्बिषी भवतां सुतः ।

ते दण्डं धारयत मे दुष्कृतेरकृतात्मनः ।। ३ ।।

जरत्कारुने कहा-आप मेरे ही पूर्वज पिता और पितामह आदि हैं। अत: बताइयेआपका प्रिय करनेके लिये मुझे क्या करना चाहिये। मैं ही आपलोगोंका पुत्र पापी जरत्कारुहूँ। आप मुझ अकृतात्मा पापीको इच्छानुसार दण्ड दें ।। २-३ ।।

पितर ऊचुः

पुत्र दिष्ट्यासि सम्प्राप्त इमं देशं यदृच्छया ।

किमर्थं च त्वया ब्रह्मन् न कृतो दारसंग्रहः ।।४ ।।

पितर बोले-पुत्र! बड़े सौभाग्यकी बात है जो तुम अकस्मात् इस स्थानपर आ गये।ब्रह्मन्! तुमने अबतक विवाह क्यों नहीं किया ? ।। ४ ।।

जरत्कारुरुवाच

ममायं पितरो नित्यं यद्यर्थः परिवर्तते ।

ऊर्धवरेताः शरीरं वै प्रापयेयममुत्र वै ।। ५ ।।

जरत्कारुने कहा-पितृगण! मेरे हृदयमें यह बात निरन्तर घूमती रहती थी कि मैंऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालक) होकर इस शरीरको परलोक ( पुष्यधाम )- मेंपहुँचाऊँ ।। ५ ।।

न दारान् वै करिष्येऽहमिति मे भावितं मनः ।

एवं दृष्ट्वा तु भवतः शकुन्तानिव लम्बतः ।। ६ ।।

मया निरवर्तिता बुद्धिर्ब्रह्मचर्यात् पितामहाः ।

करिष्ये वः प्रियं कामं निवेक्ष्येऽहमसंशयम् ।। ७ ।।

अतः मैंने अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि ‘मैं कभी पत्नी-परिग्रह(विवाह) नहीं करूँगा।’ किंतु पितामहो! आपको पक्षियोंकी भाँति लटकते देख अखण्डब्रह्मचर्यके पालन-सम्बन्धी निश्चयसे मैंने अपनी बुद्धि लौटा ली है। अब मैं आपका प्रियमनोरथ पूर्ण करूँगा, निश्चय ही विवाह कर लूँगा ।। ६-७ ।।

सनाम्नीं यद्यहं कन्यामुपलप्स्ये कदाचन।

भविष्यति च या काचिद् भैक्ष्यवत् स्वयमुद्यता ।। ८ ।।

प्रतिग्रहीता तामस्मि न भरेयं च यामहम् ।

एवंविधमहं कुर्यां निवेशं प्राप्नुयां यदि ।

अन्यथा न करिष्येऽहं सत्यमेतत् पितामहाः ।। ९ ।।

(परंतु इसके लिये एक शर्त होगी-) ‘यदि मैं कभी अपने ही जैसे नामवाली कुमारीकन्या पाऊँगा, उसमें भी जो भिक्षाकी भाँति बिना माँगे स्वयं ही विवाहके लिये प्रस्तुत होजायगी और जिसके पालन-पोषणका भार मुझपर न होगा, उसीका मैं पाणिग्रहणकरँगा।’ यदि ऐसा विवाह मुझे सुलभ हो जाय तो कर लूँगा, अन्यथा विवाह करूँगा हीनहीं। पितामहो! यह मेरा सत्य निश्चय है ।। ८-९ ।।

तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय वै ।

शाश्वताश्चाव्ययाश्चैव तिष्ठन्तु पितरो मम ।। १० ।।

वैसे विवाहसे जो पत्नी मिलेगी, उसीके गर्भसे आपलोगोंको तारनेके लिये कोई प्राणीउत्पन्न होगा। मैं चाहता हूँ मेरे पितर नित्य शाश्वत लोकोंमें बने रहें, वहाँ वे अक्षय सुखकेभागी हों ।। १० ।।

सौतिरुवाच

एवमुक्त्वा तु स पितृंश्चचार पृथिवीं मुनिः ।

न च स्म लभते भार्यां वृद्धोऽयमिति शौनक ।। ११ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! इस प्रकार पितरोंसे कहकर जरत्कारु मुनि पूर्ववत्पृथ्वीपर विचरने लगे। परंतु ‘यह बूढ़ा है’ ऐसा समझकर किसीने कन्या नहीं दी, अत: उन्हेंपत्नी उपलब्ध न हो सकी ।। ११ ।।

यदा निर्वेदमापन्नः पितृभिश्चोदितस्तथा ।

तदारण्यं स गत्वोच्चैश्चुक्रोश भृशदुःखितः ।। १२ ।।

जब वे विवाहकी प्रतीक्षामें खिन्न हो गये, तब पितरोंसे प्रेरित होनेके कारण वनमेंजाकर अत्यन्त दुःखी हो जोर-जोरसे ब्याहके लिये पुकारने लगे ।। १२ ।।

स त्वरण्यगतः प्राज्ञः पितृणां हितकाम्यया ।

उवाच कन्यां याचामि तिस्रो वाचः शनैरिमाः ।। १३ ।।

वनमें जानेपर विद्वान् जरत्कारुने पितरोंके हितकी कामनासे तीन बार धीरे-धीरे यहबात कही-‘मैं कन्या माँगता हूँ ।। १३ ।।

यानि भूतानि सन्तीह स्थावराणि चराणि च ।

अन्तर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः।। १४ ।।

(फिर जोरसे बोले-) ‘यहाँ जो स्थावर-जंगम, दृश्य या अदृश्य प्राणी हैं, वे सब मेरीबात सुनें- ।। १४ ।।

उग्रे तपसि वर्तन्ते पितरश्चोदयन्ति माम् ।

निविशस्वेति दुःखात्ताः संतानस्य चिकीर्षया ।। १५ ।।

‘मेरे पितर भयंकर कष्टमें पड़े हैं और दुःखसे आतुर हो संतान-प्राप्तिकी इच्छा रखकरमुझे प्रेरित कर रहे हैं कि ‘तुम विवाह कर लो ‘ ।। १५ ।।

निवेशायाखिलां भूमिं कन्याभैक्ष्यं चरामि भोः ।

दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः संनियोजितः ।। १६ ।।

‘अतः विवाहके लिये मैं सारी पृथ्वीपर घूमकर कन्याकी भिक्षा चाहता हूँ। यद्यपि मैंदरिद्र हूँ और सुविधाओंके अभावमें दुःखी हूँ, तो भी पितरोंकी आज्ञासे विवाहके लिये उद्यतहूँ ।। १६ ।।

यस्य कन्यास्ति भूतस्य ये मयेह प्रकीर्तिताः ।

ते मे कन्यां प्रयच्छन्तु चरतः सर्वतोदिशम् । १७ ।।

‘मैंने यहाँ जिनका नाम लेकर पुकारा है, उनमेंसे जिस किसी भी प्राणीके पासविवाहके योग्य विख्यात गुणोंवाली कन्या हो, वह सब दिशाओंमें विचरनेवाले मुझब्राह्मणको अपनी कन्या दे ।। १७ ।।

मम कन्या सनाम्नी या भैक्ष्यवच्चोदिता भवेत् ।

भरेयं चैव यां नाहूं तां मे कन्यां प्रयच्छत ।। १८ ।।

‘जो कन्या मेरे ही जैसे नामवाली हो, भिक्षाकी भाँति मुझे दी जा सकती हो औरजिसके भरण-पोषणका भार मुझपर न हो, ऐसी कन्या कोई मुझे दे’ ।। १८ ।।

ततस्ते पन्नगा ये वै जरत्कारौ समाहिताः ।

तामादाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन् ।। १९ ।।

तब उन नागोंने जो जरत्कारु मुनिकी खोजमें लगाये गये थे, उनका यह समाचार पाकरउन्होंने नागराज वासुकिको सूचित किया।। १९ ।।

तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलंकृताम् ।

प्रगृह्यारण्यमगमत् समीपं तस्य पन्नगः ।। २० ।।

उनकी बात सुनकर नागराज वासुकि अपनी उस कुमारी बहिनको वस्त्राभूषणोंसेविभूषित करके साथ ले वनमें मुनिके समीप गये । २० ।।

तत्र तां भैक्ष्यवत् कन्यां प्रादात् तस्मै महात्मने।नागेन्द्रो वासुकि्ब्रह्मन् न स तां प्रत्यगृह्णत ।। २१ ।।

ब्रह्मन्! वहाँ नागेन्द्र वासुकिने महात्मा जरत्कारुको भिक्षाकी भाँति वह कन्या समर्पितकी; किंतु उन्होंने सहसा उसे स्वीकार नहीं किया।। २१ ।।

असनामेति वै मत्वा भरणे चाविचारिते ।

मोक्षभावे स्थितश्चापि मन्दीभूतः परिग्रहे ।। २२ ।।

ततो नाम स कन्यायाः पप्रच्छ भृगुनन्दन ।

वासुकिं भरणं चास्या न कुर्यामित्युवाच ह ।। २३ ।।

सोचा, सम्भव है। यह कन्या मेरे-जैसे नामवाली न हो। इसके भरण-पोषणका भारकिसपर रहेगा, इस बातका निर्णय भी अभीतक नहीं हो पाया है। इसके सिवा मैंमोक्षभावमें स्थित हूँ, यही सोचकर उन्होंने पत्नी-परिग्रहमें शिथिलता दिखायी । भृगुनन्दन!इसीलिये पहले उन्होंने वासुकिसे उस कन्याका नाम पूछा और यह स्पष्ट कह दिया – ‘मैंइसका भरण-पोषण नहीं करूगा’ ।। २२-२३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुकिजरत्कारुसमागमे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें वासुकि-जरत्कारु-समागमसम्बन्धी छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४६ ।।

सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्याजरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन

सौतिरुवाच

वासुकिस्त्वब्रवीद् वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा ।

सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता ।। १ ।।

भरिष्यामि च ते भार्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम ।

रक्षणं च करिष्येऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन ।

त्वदर्थं रक्ष्यते चैषा मया मुनिवरोत्तम ।। २ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! उस समय वासुकिने जरत्कारु मुनिसे कहा-द्विजश्रेष्ठ! इस कन्याका वही नाम है, जो आपका है। यह मेरी बहिन है और आपकी हीभाँति तपस्विनी भी है। आप इसे ग्रहण करें। आपकी पत्नीका भरण-पोषण मैं करूँगा।तपोधन! अपनी सारी शक्ति लगाकर मैं इसकी रक्षा करता रहूँगा। मुनिश्रेष्ठ! अबतकआपहीके लिये मैंने इसकी रक्षा की है ।। १-२ ।।

ऋषिरुवाच

न भरिष्येऽहमेतां वै एष मे समयः कृतः ।

अप्रियं च न कर्तव्यं कृते चैनां त्यजाम्यहम् ।। ३ ।।

ऋषिने कहा-नागराज! मैं इसका भरण-पोषण नहीं करूँगा, मेरी यह शर्त तो तय होगयी। अब दूसरी शर्त यह है कि तुम्हारी इस बहिनको कभी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये,जो मुझे अप्रिय लगे। यदि अप्रिय कार्य कर बैठेगी तो उसी समय मैं इसे त्याग दूँगा ।। ३ ।।

सौतिरुवाच

प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति ।

जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह ।। ४ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-नागराजने यह शर्त स्वीकार कर ली कि ‘मैं अपनी बहिनकाभरण-पोषण करूँगा।’ तब जरत्कारु मुनि वासुकिके भवनमें गये ।। ४ ।।

तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः ।

जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ।। ५ ।।

वहाँ मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तपोवृद्ध महाव्रती धर्मात्मा जरत्कारुने शास्त्रीय विधि औरमन्त्रोच्चारणके साथ नागकन्याका पाणिग्रहण किया ।। ५ ।।

ततो वासगृहं रम्यं पन्नगेन्द्रस्य सम्मतम् ।

जगाम भार्यामादाय स्तूयमानो महर्षिभिः ।। ६ ।।

तदनन्तर महर्षियोंसे प्रशंसित होते हुए वे नागराजके रमणीय भवनमें, जो मनकेअनुकूल था, अपनी पत्नीको लेकर गये ।। ६ ।।

शयनं तत्र संक्लृप्तं स्पध्ध्यास्तरणसंवृतम् ।

तत्र भार्यासहायो वै जरत्कारुरुवास ह ।। ७ ।।

वहाँ बहुमूल्य बिछौनोंसे सजी हुई शय्या बिछी थी। जरत्कारु मुनि अपनी पत्नीके साथउसी भवनमें रहने लगे ।। ७ ।।

स तत्र समयं चक्रे भार्यया सह सत्तमः ।

विप्रियं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ।। ८ ।।

उन साधुशिरोमणिने वहाँ अपनी पत्नीके सामने यह शर्त रखी- ‘तुम्हें ऐसा कोई कामनहीं करना चाहिये, जो मुझे अप्रिय लगे। साथ ही कभी अप्रिय वचन भी नहीं बोलनाचाहिये ।। ८ ।।

त्यजेयं विप्रिये च त्वां कृते वासं च ते गृहे ।

एतद् गृहाण वचनं मया यत् समुदीरितम् ।। ९ ।।

‘तुमसे अप्रिय कार्य हो जानेपर मैं तुम्हें और तुम्हारे घरमें रहना छोड़ दूँगा । मैंने जोकुछ कहा है, मेरे इस वचनको दृढ़तापूर्वक धारण कर लो’ ।। ९ ।।

ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तदा ।

अतिदुःखान्विता वाक्यं तमुवाचैवमस्त्विति ।। १० ।।

यह सुनकर नागराजकी बहिन अत्यन्त उद्विग्न हो गयी और उस समय बहुत दुःखीहोकर बोली-‘भगवन्! ऐसा ही होगा’ ।। १० ।।

तथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत् ।

उपायैः श्वेतकाकीयैः प्रियकामा यशस्विनी ।। ११ ।।

फिर वह यशस्विनी नागकन्या दुःखद स्वभाववाले पतिकी उसी शर्तके अनुसार सेवाकरने लगी। वह श्वेतकाकीय उपायोंसे सदा पतिका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर निरन्तरउनकी आराधनामें लगी रहती थी ।। ११ ।।

ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद् वासुकेः स्वसा ।

भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम् ।। १२ ।।

तदनन्तर किसी समय ऋतुकाल आनेपर वासुकिकी बहिन स्नान करके न्यायपूर्वकअपने पति महामुनि जरत्कारुकी सेवामें उपस्थित हुई ।। १२ ।।

तत्र तस्याः समभवद् गर्भो ज्वलनसंनिभः ।

अतीवतेजसा युक्तो वैश्वानरसमद्युतिः ।। १३ ।।

वहाँ उसे गर्भ रह गया, जो प्रज्वलित अग्निके समान अत्यन्त तेजस्वी तथा तप:शक्तिसेसम्पन्न था। उसकी अंगकान्ति अग्निके तुल्य थी ।। १३ ।।

शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः।

ततः कतिपयाहस्य जरत्कारुर्महायशाः ।। १४ ।।

उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत् ।

तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमियाद् गिरिम् ।। १५ ।।

जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी नित्य परिपुष्ट होने लगा।तत्पश्चात् कुछ दिनोंके बाद महातपस्वी जरत्कारु कुछ खिन्न-से होकर अपनी पत्नीकीगोदमें सिर रखकर सो गये। उन विप्रवर जरत्कारुके सोते समय ही सूर्य अस्ताचलको जानेलगे ।। १४-१५ ।।

अह्नः परिक्षये ब्रह्मंस्ततः साचिन्तयत् तदा ।

वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी । १६ ।।

किं नु मे सुकृतं भूयाद् भर्तुरुत्थापनं न वा ।

दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुयाम् ।। १७ ।।

ब्रह्मन्! दिन समाप्त होने ही वाला था। अतः वासुकिकी मनस्विनी बहिन जरत्कारुअपने पतिके धर्मलोपसे भयभीत हो उस समय इस प्रकार सोचने लगी-‘इस समयपतिको जगाना मेरे लिये अच्छा (धर्मानुकूल) होगा या नहीं? मेरे धर्मात्मा पतिका स्वभावबड़ा दुःखद है। मैं कैसा बर्ताव करू, जिससे उनकी दृष्टिमें अपराधिनी न बनूँ ।। १६-१७ ।।

कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथवा पुनः ।

धर्मलोपो गरीयान् वै स्यादित्यत्राकरोन्मतिम् ।। १८ ।।

उत्थापयिष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति ।

धर्मलोपो भवेदस्य संध्यातिक्रमणे ध्रुवम् ।। १९ ।।

‘यदि इन्हें जगाऊँगी तो निश्चय ही इन्हें मुझपर क्रोध होगा और यदि सोते सोतेसंध्योपासनका समय बीत गया तो अवश्य इनके धर्मका लोप हो जायगा, ऐसी दशामेंधर्मात्मा पतिका कोप स्वीकार करू या उनके धर्मका लोप? इन दोनोंमें धर्मका लोप हीभारी जान पड़ता है।’ अतः जिससे उनके धर्मका लोप न हो, वही कार्य करनेका उसनेनिश्चय किया ।। १८-१९ ।।

इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजङ्गमा ।

तमृषिं दीप्ततपसं शयानमनलोपमम् ।। २० ।।

उवाचेदं वचः श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी।

उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति ।। २१ ।।

मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके मीठे वचन बोलनेवाली नागकन्या जरत्कारुने वहाँ सोते हुए अग्निके समान तेजस्वी एवं तीव्र तपस्वी महर्षिसे मधुरवाणीमें यों कहा- ‘महाभाग ! उठिये, सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं ।। २०-२१ ।।

संध्यामुपास्स्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः ।

प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽयं मुहूर्तों रम्यदारुणः ।। २२ ।।

‘भगवन्! आप संयमपूर्वक आचमन करके संध्योपासन कीजिये । अब अग्निहोत्रकी बेला हो रही है। यह मुहूर्त धर्मका साधन होनेके कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ता है। इसमें भूत आदि प्राणी विचरते हैं, अत: भयंकर भी है। प्रभो ! पश्चिम दिशामें संध्या प्रकट हो रही है-उधरका आकाश लाल हो रहा है’ ।। २२ ।।

संध्या प्रवर्तते चेयं पश्चिमायां दिशि प्रभो ।

एवमुक्तः स भगवान् जरत्कारुर्महातपाः ।। २३ ।।

भार्यं प्रस्फुरमाणौष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।

अवमानः प्रयुक्तोऽयं त्वया मम भुजङ्गमे ।। २४ ।।

नागकन्याके ऐसा कहनेपर महातपस्वी भगवान् जरत्कारु जाग उठे। उस समय क्रोधके मारे उनके होठ काँपने लगे। वे इस प्रकार बोले-‘नागकन्ये! तूने मेरा यह अपमान किया है ।। २३-२४ ।।

समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् ।

शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुप्ते विभावसोः ।। २५ ।।

अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हदि वर्तते ।

न चाप्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित् ।। २६ ।।

‘इसलिये अब मैं तेरे पास नहीं रहूँगा। जैसे आया हूँ, वैसे ही चला जाऊँगा। वामोरु! सूर्यमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं सोता रहूँ और वे अस्त हो जायँ। यह मेरे हृदयमें निश्चय है। जिसका कहीं अपमान हो जाय ऐसे किसी भी पुरुषको वहाँ रहना अच्छा नहीं लगता। फिर मेरी अथवा मेरे-जैसे दूसरे धर्मशील पुरुषकी तो बात ही क्या है’ ।। २५-२६ ।।

किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा ।

एवमुक्ता जरत्कारुर्भत्रा हृदयकम्पनम् ।। २७ ।।

अब्रवीद् भगिनी तत्र वासुकेः संनिवेशने ।

नावमानात् कृतवती तवाहं विप्र बोधनम् ।। २८ ।।

धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतन्मया कृतम् ।

उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः॥ २९ ।।

ऋषिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजङ्गमाम् ।

न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे ।। ३० ।।

जब पतिने इस प्रकार हृदयमें कँपकँपी पैदा करनेवाली बात कही, तब उस घरमें स्थितवासुकिकी बहिन इस प्रकार बोली-‘विप्रवर! मैंने अपमान करनेके लिये आपको नहींजगाया था। आपके धर्मका लोप न हो जाय, यही ध्यानमें रखकर मैंने ऐसा किया है।’ यहसुनकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी ऋषि जरत्कारुने अपनी पत्नी नागकन्याको त्यागदेनेकी इच्छा रखकर उससे कहा-‘नागकन्ये! मैंने कभी झूठी बात मुँहसे नहीं निकाली है,अतः अवश्य जाऊँगा’ ।। २७-३० ।।

समयो ह्येष मे पूर्वं त्वया सह मिथः कृतः।

सुखमस्म्युषितो भद्रे ब्रूयास्त्वं भ्रातरं शुभे ।। ३१ ।।

इतो मयि गते भीरु गतः स भगवानिति ।

त्वं चापि मयि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमहसि ।। ३२ ।।

‘मैंने तुम्हारे साथ आपसमें पहले ही ऐसी शर्त कर ली थी। भद्रे! मैं यहाँ बड़े सुखसेरहा हूँ। यहाँसे मेरे चले जानेके बाद अपने भाईसे कहना-‘भगवान् जरत्कारु चले गये।’शुभे! भीरु! मेरे निकल जानेपर तुम्हें भी शोक नहीं करना चाहिये’ । I ३१ – ३२ ।।

इत्युक्ता सानवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा।

जरत्कारु जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा ।। ३३ ।।

बाष्पगद्गदया वाचा मुखेन परिशुष्यता।

कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनयना ततः ।। ३४ ।।

धैर्यमालम्ब्य वामोरुर्हृदयेन प्रवेपता ।

न मामह्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ।। ३५ ।।

धर्में स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रियहिते रताम् ।

प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम ।। ३६ ।।

तदलब्धवतीं मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकि ।

मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम ।। ३७ ।।

अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते ।

त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् ।। ३८ ।।

उनके ऐसा कहनेपर अनिन्द्य सुन्दरी जरत्कारु भाईके कार्यकी चिन्ता और पतिकेवियोगजनित शोकमें डूब गयी। उसका मुँह सूख गया, नेत्रोंमें आँसू छलक आये और हृदयकाँपने लगा। फिर किसी प्रकार धैर्य धारण करके सुन्दर जाँघों और मनोहर शरीरवाली वहनागकन्या हाथ जोड़ गद्गद वाणीमें जरत्कारु मुनिसे बोली-‘धर्मज्ञ! आप सदा धर्ममेंस्थित रहनेवाले हैं। मैं भी पत्नी-धर्ममें स्थित तथा आप प्रियतमके हितमें लगी रहनेवाली हूँ।आपको मुझ निरपराध अबलाका त्याग नहीं करना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ! मेरे भाईने जिसउद्देश्यको लेकर आपके साथ मेरा विवाह किया था , मैं मन्दभागिनी अबतक उसे पा नसकी। नागराज वासुकि मुझसे क्या कहेंगे? साधुशिरोमणे! मेरे कुटुम्बीजन माताके शापसेदबे हुए हैं। उन्हें मेरे द्वारा आपसे एक संतानकी प्राप्ति अभीष्ट थी, किंतु उसका भी अबतकदर्शन नहीं हुआ। आपसे पुत्रकी प्राप्ति हो जाय तो उसके द्वारा मेरे जाति-भाइयोंकाकल्याण हो सकता है ।। ३३-३८ ।।

सम्प्रयोगो भवेन्नायं मम मोघस्त्वया द्विज ।

ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादये ।। ३९ ।।

‘ब्रह्मन्! आपसे जो मेरा सम्बन्ध हुआ, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। भगवन्! अपनेबान्धवजनोंका हित चाहती हुई मैं आपसे प्रसन्न होनेकी प्रार्थना करती हूँ ।। ३९ ।।

इममव्यक्तरूपं मे गर्भमाधाय सत्तम ।

कथं त्यक्त्वा महात्मा सन् गन्तुमिच्छस्यनागसम् ।। ४० ।।

‘महाभाग! आपने जो गर्भ स्थापित किया है, उसका स्वरूप या लक्षण अभी प्रकटनहीं हुआ। महात्मा होकर ऐसी दशामें आप मुझ निरपराध पत्नीको त्यागकर कैसे जानाचाहते हैं?’ ।। ४० ।।

एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्यां वचनमब्रवीत् ।

यद् युक्तमनुरूपं च जरत्कारुं तपोधनः ।। ४१ ।।

यह सुनकर उन तपोधन महर्षिने अपनी पत्नी जरत्कारुसे उचित तथा अवसरकेअनुरूप बात कही-।। ४१ ।।

अस्त्ययं सुभगे गर्भस्तव वैश्वानरोपमः ।

ऋषिः परमधर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः ।। ४२ ।।

सुभगे! ‘अयं अस्ति’-तुम्हारे उदरमें गर्भ है । तुम्हारा यह गर्भस्थ बालक अग्निकेसमान तेजस्वी, परम धर्मात्मा मुनि तथा वेद-वेदांगोंका पारंगत विद्वान् होगा’ ।। ४२ ।।

एवमुक्त्वा स धर्मात्मा जरत्कारुर्महानृषिः ।

उग्राय तपसे भूयो जगाम कृतनिश्चयः ।। ४३ ।।

ऐसा कहकर धर्मात्मा महामुनि जरत्कारु, जिन्होंने जानेका दृढ़ निश्चय कर लिया था,फिर कठोर तपस्याके लिये वनमें चले गये ।। ४३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुनिर्गमे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जरत्कारुका तपस्याके लिये निष्क्रमणविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।

श्वेतकाकका अर्थ यह है-श्वा, एत और काक; जिसका क्रमश: अर्थ है-कुत्ता, हरिण और कौआ (श्वा +एतमेंपररूप हुआ है)। तात्पर्य यह है कि यह कुतियाकी भाँति सदा जागती और कम सोती थी, हरिणीके समान भयसे चकितरहती और कौएकी भाँति उनके इंगित (इशारे) समझनेके लिये सावधान रहती थी।

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन

सौतिरुवाच

गतमात्रं तु भर्तारं जरत्कारुरवेदयत् ।

भ्रातुः सकाशमागत्य याथातथ्यं तपोधन । १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-तपोधन शौनक! पतिके निकलते ही नागकन्या जरत्कारुनेअपने भाई वासुकिके पास जाकर उनके चले जानेका सब हाल ज्यों-का-त्यों सुनादिया ।। १ ।।

ततः स भुजगश्रेष्ठः श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।

उवाच भगिनीं दीनां तदा दीनतरः स्वयम् ।। २ ।।

यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकि स्वयं भी बहुत दुःखी हो गयेऔर दुःखमें पड़ी हुई अपनी बहिनसे बोले ।। २ ।।

वासुकिरुवाच

जानासि भद्रे यत् कार्यं प्रदाने कारणं च यत् ।

पन्नगानां हितार्थाय पुत्रस्ते स्यात् ततो यदि । ३ ।।

वासुकिने कहा-भद्रे! सर्पोंका जो महान् कार्य है और मुनिके साथ तुम्हारा विवाहहोनेमें जो उद्देश्य रहा है, उसे तो तुम जानती ही हो। यदि उनके द्वारा तुम्हारे गर्भसे कोई पुत्रउत्पन्न हो जाता तो उससे सर्पोंका बहुत बड़ा हित होता ।। ३ ।।

स सर्पसत्रात् किल नो मोक्षयिष्यति वीर्यवान् ।

एवं पितामहः पूर्वमुक्तवांस्तु सुरैः सह ।। ४ ।।

वह शक्तिशाली मुनिकुमार ही हमलोगोंको जनमेजयके सर्पयज्ञमें जलनेसे बचायेगा;यह बात पहले देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजीने कही थी ।। ४ ।।

अप्यस्ति गर्भः सुभगे तस्मात् ते मुनिसत्तमात् ।

न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ।। ५ ।।

कार्यं च मम न न्याय्यं प्रष्टुं त्वां कार्यमीदृशम् ।

किंतु कार्यगरीयस्त्वात् ततस्त्वाहमचूचुदम् ।। ६ ।।

सुभगे! क्या उन मुनिश्रेष्ठसे तुम्हें गर्भ रह गया है? तुम्हारे साथ उन मनीषी महात्माकाविवाह-कर्म निष्फल हो, यह मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हारा भाई हूँ, ऐसे कार्य ( पुत्रोत्पत्ति)- केविषयमें तुमसे कुछ पूछना मेरे लिये उचित नहीं है, परंतु कार्यके गौरवका विचार करके मैंने तुम्हें इस विषयमें सब बातें बतानेके लिये प्रेरित किया है ।। ५-६ ।।

दुर्वार्यतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः ।

नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत् स माम् ।। ७ ।।

तुम्हारे महातपस्वी पतिको जानेसे रोकना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है, यह जानकर मैं उन्हें लौटा लानेके लिये उनके पीछे नहीं जा रहा हूँ। लौटनेका आग्रह करूँ तो कदाचित् वे मुझे शाप भी दे सकते हैं ।। ७ ।।

आचक्ष्व भद्रे भर्तुः स्वं सर्वमेव विचेष्टितम्।

उद्धरस्व च शल्यं मे घोरं हृदि चिरस्थितम् ।। ८ ।।

अतः भद्रे! तुम अपने पतिकी सारी चेष्टा बताओ और मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो भयंकर काँटा चुभा हुआ है, उसे निकाल दो ।। ८ ।।

जरत्कारुस्ततो वाक्यमित्युक्ता प्रत्यभाषत ।

आश्वासयन्ती संतप्तं वासुकिं पन्नगेश्वरम् ।। ९ ।।

भाईके इस प्रकार पूछनेपर तब जरत्कारु अपने संतप्त भ्राता नागराज वासुकिको धीरज बँधाती हुई इस प्रकार बोली ।। ९ ।।

जरत्कारुरुवाच पृष्टो मयापत्यहेतोः स महात्मा महातपाः ।

अस्तीत्युत्तरमुद्दिश्य ममेदं गतवांश्च सः ।। १० ।।

जरत्कारुने कहा-भाई! मैंने संतानके लिये उन महातपस्वी महात्मासे पूछा था। मेरे गर्भके विषयमें ‘अस्ति’ (तुम्हारे गर्भमें पुत्र है) इतना ही कहकर वे चले गये ।। १० ।।

स्वैरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं वचः।

उक्तपूर्व कुतो राजन् साम्पराये स वक्ष्यति ।। ११ ।।

न संतापस्त्वया कार्यः कार्यं प्रति भुजङ्गमे ।

उत्पत्स्यति च ते पुत्रो ज्वलनार्कसमप्रभः ।। १२ ।।

इत्युक्त्वा स हि मां भ्रातर्गतो भर्ता तपोधनः।

तस्माद् व्येतु परं दुःखं तवेदं मनसि स्थितम् ।। १३ ।।

राजन्! उन्होंने पहले कभी विनोदमें भी झूठी बात कही हो, यह मुझे स्मरण नहीं है। फिर इस संकटके समय तो वे झूठ बोलेंगे ही क्यों? भैया! मेरे पति तपस्याके धनी हैं। उन्होंने जाते समय मुझसे यह कहा-‘नागकन्ये! तुम अपनी कार्य-सिद्धिके सम्बन्धर्ें कोई चिन्ता न करना। तुम्हारे गर्भसे अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा ।’ इतना कहकर वे तपोवनमें चले गये। अतः भैया! तुम्हारे मनमें जो महान् दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये ।। ११-१३ ।।

सौतिरुवाच एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परया मुदा ।

एवमस्त्विति तद् वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ।। १४ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! यह सुनकर नागराज वासुकि बड़ी प्रसन्नतासे बोले-‘ एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) । इस प्रकार उन्होंने बहिनकी बातको विश्वासपूर्वक ग्रहणकिया ।। १४ ।।

सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजया चानुरूपया।

सोदर्या पूजयामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ।। १५ ।।

सर्पोमें श्रेष्ठ वासुकि अपनी सहोदरा बहिनको सान्त्वना, सम्मान तथा धन देकर एवंसुन्दररूपसे उसका स्वागत-सत्कार करके उसकी समाराधना करने लगे ।। १५ ।।

ततः प्रववृधे गर्भों महातेजा महाप्रभः ।

यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ।। १६ ।।

द्विजश्रेष्ठ! जैसे शुक्लपक्षमें आकाशमें उदित होनेवाला चन्द्रमा प्रतिदिन बढ़ता है, उसीप्रकार जरत्कारुका वह महातेजस्वी और परम कान्तिमान् गर्भ बढ़ने लगा ।। १६ ।।

अथ काले तु सा ब्रह्मन् प्रजज्ञे भुजगस्वसा ।

कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभयापहम् ।। १७ ।।

ब्रह्मन्! तदनन्तर समय आनेपर वासुकिकी बहिनने एक दिव्य कुमारको जन्म दिया,जो देवताओंके बालक-सा तेजस्वी जान पड़ता था। वह पिता और माता-दोनों पक्षोंकेभयको नष्ट करनेवाला था ।। १७ ।।

ववृधे स तु तत्रैव नागराजनिवेशने ।

वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् भार्गवाच्च्यवनान्मुनेः ।। १८ ।।

वह वहीं नागराजके भवनमें बढ़ने लगा। बड़े होनेपर उसने भृगुकुलोत्पन्न च्यवन मुनिसेछहों अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन किया।। १८ ।।

चीर्णव्रतो बाल एव बुद्धिसत्त्वगुणान्वितः ।

नाम चास्याभवत् ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ।। १९ ।।

वह बचपनसे ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाला, बुद्धिमान् तथा सत्त्वगुणसम्पन्नहुआ। लोकमें आस्तीक नामसे उसकी ख्याति हुई ।। १९ ।।

अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात् पिता गर्भस्थमेव तम् ।

वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ।। २० ।।

वह बालक अभी गर्भमें ही था, तभी उसके पिता ‘अस्ति’ कहकर वनमें चले गये थे।इसलिये संसारमें उसका आस्तीक नाम प्रसिद्ध हुआ ।। २० ।।

स बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान् ।

गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात् परिरक्षितः ।। २१ ।।

भगवानिव देवेशः शूलपाणिर्हिरण्मयः ।

विवर्धमानः सर्वांस्तान् पन्नगानभ्यहर्षयत् । २२ ।।

अमित बुद्धिमान् आस्तीक बाल्यावस्थामें ही वहाँ रहकर ब्रह्मचर्यका पालन एवं धर्मकाआचरण करने लगा। नागराजके भवनमें उसका भलीभाँति यत्नपूर्वक लालन-पालन कियागया। सुवर्णके समान कान्तिमान् शूलपाणि देवेश्वर भगवान् शिवकी भाँति वह बालकदिनोदिन बढ़ता हुआ समस्त नागोंका आनन्द बढ़ाने लगा ।। २१-२२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकोत्पत्तौ अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीककी उत्पत्तिविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४८ ।।

एकोनपञ्चाशक्तमोऽध्यायः

राजा परीक्षित्के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन,राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शरमीक मुनिका तिरस्कार

शौनक उवाच

यदपृच्छत् तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजयः ।

पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद । १ ।।

शौनकजी बोले-सूतनन्दन! राजा जनमेजयने (उत्तंककी बात सुनकर) अपने पितापरीक्षितुके स्वर्गवासके सम्बन्धमें मन्त्रियोंसे जो पूछ-ताछ की थी, उसका आपविस्तारपूर्वक पुनः वर्णन कीजिये ।। १ ।।

सौतिरुवाच

शृणु ब्रह्मन् यथापृच्छन्मन्त्रिणो नृपतिस्तदा ।

यथा चाख्यातवन्तस्ते निधनं तत् परीक्षितः ।। २ ।।

उग्रश्रवाजीने कहा-ब्रह्मन्! सुनिये, उस समय राजाने मन्त्रियोंसे जो कुछ पूछा औरउन्होंने परीक्षित्की मृत्युके सम्बन्धमें जैसी बातेंें बतायीं, वह सब मैं सुना रहा हूँ ।। २ ।।

जनमेजय उवाच

जानन्ति स्म भवन्तस्तद् यथा वृत्तं पितुर्मम ।

आसीद् यथा स निधनं गतः काले महायशाः ।। ३ ।।

जनमेजयने पूछा-आपलोग यह जानते होंगे कि मेरे पिताके जीवनकालमें उनकाआचार-व्यवहार कैसा था? और अन्तकाल आनेपर वे महायशस्वी नरेश किस प्रकारमृत्युको प्राप्त हुए थे? ।। ३ ।।

श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतः ।

कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातुचित् ॥ ४ ॥

आपलोगोंसे अपने पिताके सम्बन्धमें सारा वृत्तान्त सुनकर ही मुझे शान्ति प्राप्त होगी;अन्यथा मैं कभी शान्त न रह सकूँगा ।। ४

सौतिरुवाच

मन्त्रिणोऽथाब्रुवन् वाक्यं पृष्टास्तेन महात्मना ।

सर्वे धर्मविदः प्राज्ञा राजानं जनमेजयम् ।। ५ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-राजाके सब मन्त्री धर्मज्ञ और बुद्धिमान् थे। उन महात्मा राजाजनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर वे सभी उनसे यों बोले ।। ५ ।।

मनत्रिण ऊचुः

शृणु पार्थिव यद् ब्रूषे पितुस्तव महात्मनः ।

चरितं पार्थिवेन्द्रस्य यथा निष्ठां गतश्च सः ।। ६ ।।

मन्त्रियोंने कहा-भूपाल! तुम जो कुछ पूछते हो, वह सुनो। तुम्हारे महात्मा पिताराजराजेश्वर परीक्षित्का चरित्र जैसा था और जिस प्रकार वे मृत्युको प्राप्त हुए वह सब हमबता रहे हैं ।। ६ ।।

धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव ।

आसीदिह यथावृत्तः स महात्मा शृणुष्व तत् ।। ७ ।।

महाराज! आपके पिता बड़े धर्मात्मा, महात्मा और प्रजापालक थे। वे महामना नरेशइस जगत्में जैसे आचार-व्यवहारका पालन करते थे, वह सुनो ।। ७ ।।

चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्यरक्षत ।

धर्मतो धर्मविद् राजा धर्मों विग्रहवानिव ।। ८॥

वे चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें स्थापित करके उन सबकी धर्मपूर्वक रक्षा करतेथे। राजा परीक्षित् केवल धर्मके ज्ञाता ही नहीं थे, वे धर्मके साक्षात् स्वरूप थे ।। ८ ।।

ररक्ष पृथिवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः ।

द्वेष्टारस्तस्य नैवासन् स च द्वेष्टि न कंचन ।। ९ ।।

उनके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं थी। वे श्रीसम्पन्न होकर इस वसुधादेवीका पालनकरते थे। जगतुमें उनसे द्वेष रखनेवाले कोई न थे और वे भी किसीसे द्वेष नहीं रखतेथे ।। ९ ।।

समः सर्वेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् ।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव स्वकर्मसु ।। १० ।।

स्थिताः सुमनसो राजंस्तेन राज्ञा स्वधिष्ठिताः ।

विधवानाथविकलान् कृपणांश्च बभार सः ।। ११ ।।

प्रजापति ब्रह्माजीके समान वे समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखते थे। राजन्!महाराज परीक्षित्के शासनमें रहकर ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी अपने- अपनेवर्णाश्रमोचित कर्मोंमें संलग्न और प्रसन्नचित्त रहते थे। वे महाराज विधवाओं, अनाथों,अंगहीनों और दीनोंका भी भरण-पोषण करते थे ।। १० -११ ।।

सुदर्शः सर्वभूतानामासीत् सोम इवापरः ।

तुष्टपुष्टजनः श्रीमान् सत्यवाग् दृढविक्रमः ।। १२ ।।

दूसरे चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये सुखद एवं सुलभ था।उनके राज्यमें सब लोग हृष्ट-पुष्ट थे। वे लक्ष्मीवान्, सत्यवादी तथा अटल पराक्रमीथे ।। १२ ।।

धनुर्वेदे तु शिष्योऽभून्नृपः शारद्वतस्य सः ।

गोविन्दस्य प्रियश्चासीत् पिता ते जनमेजय ।। १३ ।।

राजा परीक्षित् धनुर्वेदमें कृपाचार्यके शिष्य थे । जनमेजय! तुम्हारे पिता भगवान्श्रीकृष्णके भी प्रिय थे ।। १३ ।।

लोकस्य चैव सर्वस्य प्रिय आसीन्महायशाः ।

परिक्षीणेषु कुरुषु सोत्तरायामजीजनत् ॥ १४ ।।

परीक्षिदभवत् तेन सौभद्रस्यात्मजो बली ।

राजधर्मार्थकुशलो युक्तः सर्वगुणैर्वृतः ।। १५ ।।

वे महायशस्वी महाराज सम्पूर्ण जगत्के प्रेमपात्र थे। जब कुरुकुल परिक्षीण (सर्वथानष्ट) हो चला था, उस समय उत्तराके गर्भसे उनका जन्म हुआ । इसलिये वे महाबलीअभिमन्युकुमार परीक्षित् नामसे विख्यात हुए। राजधर्म और अर्थनीतिमें वे अत्यन्त निपुणथे। समस्त सद्गुणोंने स्वयं उनका वरण किया था। वे सदा उनसे संयुक्त रहतेथे ।। १४-१५ ।।

जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता ।

षड्वर्गजिन्महाबुद्धिर्नीतिशास्त्रविदुत्तमः ।। १६ ।।

उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर मनको अपने वशमें कर रखा था। वे मेधावी तथाधर्मका सेवन करनेवाले थे। उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्यइन छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली थी। उनकी बुद्धि विशाल थी। वे नीतिके विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठथे ।। १६ ।।

प्रजा इमास्तव पिता षष्टिवर्षाण्यपालयत् ।

ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ।। १७ ।।

ततस्त्वं पुरुषश्रेष्ठ धर्मेण प्रतिपेदिवान् ।

इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कुरुकुलागतम् ।

बाल एवाभिषितक्तस्त्वं सर्वभूतानुपालकः: ।॥ १८ ।।

तुम्हारे पिताने साठ वर्षकी आयुतक इन समस्त प्रजाजनोंका पालन किया था।तदनन्तर हम सबको दुःख देकर उन्होंने विदेह- कैवल्य प्राप्त किया। पुरुषश्रेष्ठ! पिताकेदेहावसानके बाद तुमने धर्मपूर्वक इस राज्यको ग्रहण किया है, जो सहस्रों वर्षोंसेकुरुकुलके अधीन चला आ रहा है। बाल्यावस्थामें ही तुम्हारा राज्याभिषेक हुआ था। तबसेतुम्हीं इस राज्यके समस्त प्राणियोंका पालन करते हो ।। १७-१८ ।।

जनमेजय उवाचनास्मिन् कुले जातु बभूव राजा यो न प्रजानां प्रियकृत् प्रियश्च ।

विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां वृत्तं महद्वृत्तपरायणानाम् ।। १९ ।।

जनमेजयने पूछा-मनंत्रियो! हमारे इस कुलमें कभी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ, जोप्रजाका प्रिय करनेवाला तथा सब लोगोंका प्रेमपात्र न रहा हो । विशेषतः महापुरुषोंकेआचारमें प्रवृत्त रहनेवाले हमारे प्रपितामह पाण्डवोंके सदाचारको देखकर प्रायः सभीधर्मपरायण ही होंगे ।। १९ ।।

कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः ।

आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। २० ।।

अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरे वैसे धर्मात्मा पिताकी मृत्यु किस प्रकार हुई?आपलोग मुझसे इसका यथावत् वर्णन करें। मैं इस विषयमें सब बातें ठीक-ठीक सुननाचाहता हूँ ।। २० ।।

सौतिरुवाच

एवं संचोदिता राज्ञा मन्त्रिणस्ते नराधिपम् ।

ऊचुः सर्वे यथावृत्तं राज्ञः प्रियहितैषिणः ।। २१ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर उन मन्त्रियोंनेमहाराजसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बताया; क्योंकि वे सभी राजाका प्रिय चाहनेवाले औरहितैषी थे ।। २१ ।।

मनत्रिण ऊचुः

स राजा पृथिवीपालः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

बभूव मृगयाशीलस्तव राजन् पिता सदा ।। २२ ।।

यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि ।

अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्याण्यशेषतः ।। २३ ।

स कदाचिद् वनगतो मृगं विव्याध पत्रिणा ।

विद्ध्वा चान्वसरत् तूर्ण तं मृगं गहने वने ।। २४ ।।

मन्त्री बोले-राजन्! समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे पिता भूपाल परीक्षित्का सदामहाबाहु पाण्डुकी भाँति हिंसक पशुओंको मारनेका स्वभाव था और युद्धमें वे उन्हींकीभाँति सम्पूर्ण धनुर्धर वीरोंमें श्रेष्ठ सिद्ध होते थे। एक दिनकी बात है, वे सम्पूर्ण राजकार्यकाभार हमलोगोंपर रखकर वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने पंखयुक्त बाणसेएक हिंसक पशुको बींध डाला। बींधकर तुरंत ही गहन वनमें उसका पीछा किया ।। २२-२४ ।।

पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशस्ततायुधकलापवान् ।

न चाससाद गहने मृगं नष्टं पिता तव ।। २५ ।।

वे तलवार बाँधे पैदल ही चल रहे थे। उनके पास बाणोंसे भरा हुआ विशाल तूणीर था।वह घायल पशु उस घने वनमें कहीं छिप गया। तुम्हारे पिता बहुत खोजनेपर भी उसे पा नसके ।। २५ ।।

परिश्रान्तो वयःस्थश्च षष्टिवर्षो जरान्वितः ।

क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिसत्तमम् । २६ ।।

स तं पप्रच्छ राजेन्द्रो मुनिं मौनव्रते स्थितम् ।

न च किंचिदुवाचैनं पृष्टोऽपि स मुनिस्तदा ।। २७ ।।

प्रौढ़ अवस्था, साठ वर्षकी आयु और बुढ़ापेका संयोग इन सबके कारण वे बहुत थकगये थे। उस विशाल वनमें उन्हें भूख सताने लगी। इसी दशामें महाराजने वहाँ मुनिश्रेष्ठशमीकको देखा। राजेन्द्र परीक्षित्ने उनसे मृगका पता पूछा; किंतु वे मुनि उस समयमौनव्रतके पालनमें संलग्न थे। उनके पूछनेपर भी महर्षि शमीक उस समय कुछ नबोले ।। २६-२७ ।।

ततो राजा क्षुच्छरमार्तस्तं मुनिं स्थाणुवत् स्थितम् ।

मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं गतः ।। २८ ।।

वे काठकी भाँति चुपचाप, निश्चेष्ट एवं अविचल भावसे स्थित थे। यह देख भूख-प्यासऔर थकावटसे व्याकुल हुए राजा परीक्षित्को उन मौनव्रतधारी शान्त महर्षिपर तत्कालक्रोध आ गया ।। २८ ।।

न बुबोध च तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् ।

स तं क्रोधसमाविष्टो धर्षयामास ते पिता ।। २९ ।।

राजाको यह पता नहीं था कि महर्षि मौनव्रतधारी हैं; अतः क्रोधमें भरे हुए आपकेपिताने उनका तिरस्कार कर दिया।। २९ ।।

मृतं सर्प धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् ।

तस्य शुद्धात्मनः प्रादात् स्कन्धे भरतसत्तम ।। ३० ।।

भरतश्रेष्ठ! उन्होंने धनुषकी नोकसे पृथ्वीपर पड़े हुए एक मृत सर्पको उठाकर उनशुद्धात्मा महर्षिके कंधेपर डाल दिया ।। ३० ।।

न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा ।

तस्थौ तथैव चाक्रुद्धः सर्पं स्कन्धेन धारयन् ।। ३१ ।।

किंतु उन मेधावी मुनिने इसके लिये उन्हें भला या बुरा कुछ नहीं कहा। वे क्रोधरहित होकंधेपर मरा सर्प लिये हुए पूर्ववत् शान्त-भावसे बैठे रहे ।। ३१ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारीक्षितीये एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ४९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-चरित्रविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४९ ।।

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शृंगी ऋषिका परीक्षित्को शाप, तक्षकका काश्यपकोलौटाकर छलसे परीक्षित्को डँसना और पिताकी मृत्युकावृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा

मन्त्रिण ऊचुः

ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजङ्गमम् ।

मुनेः क्षुत्क्षाम आसज्य स्वपुरं पुनराययौ ।। १ ।।

मन्त्री बोले-राजेन्द्र! उस समय राजा परीक्षित् भूखसे पीड़ित हो शमीक मुनिकेकंधेपर मृतक सर्प डालकर पुनः अपनी राजधानीमें लौट आये ।। १ ।।

ऋषेस्तस्य तु पुत्रोऽभूद् गवि जातो महायशाः ।

शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः ।। २ ।।

उन महर्षिके शृंगी नामक एक महातेजस्वी पुत्र था, जिसका जन्म गायके पेटसे हुआथा। वह महान् यशस्वी, तीव्र शक्तिशाली और अत्यन्त क्रोधी था ।। २ ।।

ब्रह्माणं समुपागम्य मुनिः पूजां चकार ह ।

सोऽनुज्ञातस्ततस्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा ।। ३ ।।

सख्युः सकाशात् पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा ।

मृतं सर्पं समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम् ।। ४ ।।

वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् ।

तपस्विनमतीवाथ तं मुनिप्रवरं नृप ।। ५ ।।

जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम् ।

तपसा द्योतितात्मानं स्वेष्वङ्गेषु यतं तदा ।। ६ ।।

शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम् ।

अक्षुद्रमनसूयं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम् ।

शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव ।। ७ ।।

एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरकोलौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपनेपिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह ! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिताकाठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भीउस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था । वेमुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वाराकान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चलभावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे , तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनकातिरस्कार किया ।। ३-७ ।।

शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुषान्वितः ।

ऋषेः पुत्रो महातेजा बालोऽपि स्थविरद्युतिः ।। ८ ।।

यह सब जानकर वह बाल्यावस्थामें भी वृद्धोंका-सा तेज धारण करनेवाला महातेजस्वीऋषिकुमार क्रोधसे आगबबूला हो उठा और उसने तुम्हारे पिताको शाप दे दिया ।। ८ ।।

स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच ह ।

पितरं तेऽभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव ।। ९ ।।

अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत् ।

तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति ।। १० ।।

आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ।

सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम् ।। ११ ।।

शृंगी तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। उसने शीघ्र ही हाथमें जल लेकर तुम्हारे पिताकोलक्ष्य करके रोषपूर्वक यह बात कही-‘जिसने मेरे निरपराध पितापर मरा साँप डाल दियाहै, उस पापीको आजसे सात रातके बाद मेरी वाक्शक्तिसे प्रेरित प्रचण्ड तेजस्वी विषधरतक्षक नाग कुपित हो अपनी विषाग्निसे जला देगा। देखो, मेरी तपस्याका बल’ ।। ९-११ ।।

इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सोऽभवत् ।

दृष्ट्वा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत् ।। १२ ।।

ऐसा कहकर वह बालक उस स्थानपर गया, जहाँ उसके पिता बैठे थे। पिताको देखकरउसने राजाको शाप देनेकी बात बतायी ।। १२ ।।

स चापि मुनिशा्दूलः प्रेषयामास ते पितुः ।

शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम् ।। १३ ।।

आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ।

शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते ।। १४ ।।

तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशीलऔर गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेशइस प्रकार सुनाया-‘भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान होजाओ ।। १३-१४ ।।

तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति ।

श्रुत्वा च तद् वचो घोरं पिता ते जनमेजय ।। १५ ।।

यत्तोऽभवत् परित्रस्तस्तक्षकात् पन्नगोत्तमात् ।

ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते ।। १६ ।।

राज्ञः समीपं ब्रह्मर्षिः काश्यपो गन्तुमैच्छत ।

तं ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं तदा ।। १७ ।।

‘महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा ।’ जनमेजय!यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधानरहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपनेराजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपकोदेखा ।। १५-१७ ।।

तमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं द्विजम् ।

क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ।॥ १८ ।।

विप्रवर काश्यप बड़ी उतावलीसे पैर बढ़ा रहे थे। उन्हें देखकर नागराजने (ब्राह्मणकावेष धारण करके) इस प्रकार पूछा-‘द्विजश्रेष्ठ! आप कहाँ इतनी तीव्र गतिसे जा रहे हैं।और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?’ ।। १८ ।।

काश्यप उवाच

यत्र राजा कुरुश्रेष्ठः परिक्षिन्नाम वै द्विज ।

तक्षकेण भुजङ्गेन धक्ष्यते किल सोऽद्य वै ।। १९ ।।

गच्छाम्यहं तं त्वरितः सद्यः कर्तुमपज्वरम् ।

मयाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति ।। २० ।।

काश्यपने कहा-ब्रह्मन्! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित् रहतेहैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अत: मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेकेलिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं करसकेगा ।। १९-२० ।।

तक्षक उवाच

किमर्थं तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि ।

अहं स तक्षको ब्रह्मन् पश्य मे वीर्यमद्भुतम् ।। २१ ।।

न शक्तस्त्वं मया दष्टं तं संजीवयितुं नृपम् ।

इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोऽदशद् वै वनस्पतिम् । २२ ।।

तक्षकने कहा-ब्रह्मन्! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं।मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये । मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवितनहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया ।। २१ – २२ ।।

स दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः ।

काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत तं नगम् ।। २३ ।।

नागके डँसते ही वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। राजन्! तदनन्तर काश्यपने (अपनीमन्त्र-विद्याके बलसे) उस वृक्षको पूर्ववत् जीवित (हरा-भरा) कर दिया।। २३ ।।

ततस्तं लोभयामास कामं ब्रुहीति तक्षकः ।

स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुनः । २४ ।।

धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः ।

तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा ।। २५ ।।

अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा- ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसेमाँग लो।’ तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा – ‘मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जारहा हूँ। उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा।। २४-२५ ।।

यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात् ततोऽधिकम् ।

गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ ।। २६ ।।

‘अनघ! तुम राजासे जितना धन पाना चाहते हो, उससे भी अधिक मुझसे ही ले लोऔर लौट जाओ’ ।। २६ ।।

स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः ।

लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद् यावदीप्सितम् ।। २७ ।।

तक्षक नागकी यह बात सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ काश्यप उससे इच्छानुसार धन लेकरलौट गये ।। २७ ।।

तस्मिन् प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षकः ।

तं नृपं नृपतिश्रेष्ठं पितरं धार्मिकं तव ।। २८ ।।

प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान् विषवह्निना ।

ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः ॥। २९ ।।

ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजापरीक्षितुके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनीविषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाकेपदपर अभिषेक किया गया ।। २८-२९ ।।

एतद् दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम ।

अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं तेऽतिदारुणम् ।। ३० ।।

नृपश्रेष्ठ! यद्यपि यह प्रसंग बड़ा ही निष्ठुर और दुःखदायक है, तथापि तुम्हारे पूछनेसेहमने सब बातें तुमसे कही हैं। यह सब कुछ हमने अपनी आँखों देखा और कानोंसे भीठीक-ठीक सुना है ।। ३० ।।

.श्रुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् ।

अस्य चर्षेरुतंकस्य विधत्स्व यदनन्तरम् ।। ३१ ।।

महाराज! इस प्रकार तक्षकने तुम्हारे पिता राजा परीक्षित्का तिरस्कार किया है। इनमहर्षि उत्तंकको भी उसने बहुत तंग किया है। यह सब तुमने सुन लिया, अब तुम जैसाउचित समझो, करो ।। ३१ ।।

सौतिरुवाच

एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः ।

उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिन्दमः ।। ३२ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनक! उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा जनमेजयअपने सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले ।। ३२ ।।

जनमेजय उवाच

अथ तत् कथितं केन यद् वृत्तं तद् वनस्पतौ ।

आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा । ३३ ।।

यद् वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै ।

नूनं मन्त्रैर्हतविषो न प्रणश्येत काश्यपात् ।। ३४ ।।

जनमेजयने कहा-उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसेकिसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपनेपुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्चर्यकी बात है। यदिकाश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरेपिताजी बच जाते ।। ३३-३४ ।।

चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधमः ।

दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति ।। ३५ ।।

तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम् ।

विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुष्टिर्द्धिजस्य वै ।। ३६ ।

परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा-‘यदि मेरे डँसे हुएराजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकारतक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।’ अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणकोधनके द्वारा संतुष्ट किया था ।। ३५-३६ ।।

भविष्यति ह्युपायेन यस्य दास्यामि यातनाम् ।

एकं तु श्रोतुमिच्छामि तद् वृत्तं निर्जने वने ।॥ ३७ ।।

संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा ।श्रुतवान् दृष्टवांश्चापि भवत्सु कथमागतम् ।श्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरीं मतिम् ।। ३८ ।।

अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्डदूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वहसंवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था?आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोंके नाशका विचारकूँगा ।। ३७-३८ ।।

मन्त्रिण ऊचुः

शृणु राजन् यथास्माकं येन तत् कथितं पुरा ।

समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि ।। ३९ ।।

तस्मिन् वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव ।

विचिन्वन् पूर्वमारूढः शुष्कशाखां वनस्पतौ ।। ४० ।।

मन्त्री बोले-राजन्! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक-दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामनेबताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ीलेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था ।। ३९-४० ।।

न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्विजौ ।

सह तेनैव वृक्षेण भस्मीभूतोऽभवन्नृप ।। ४१ ।।

तक्षक नाग और ब्राह्मण-दोनों ही नहीं जानते थे कि इस वृक्षपर कोई दूसरा मनुष्यभी है। राजन्! तक्षकके काटनेपर उस वृक्षके साथ ही वह मनुष्य भी जलकर भस्म हो गयाथा ।। ४१ ।।

द्विजप्रभावाद् राजेन्द्र व्यजीवत् सवनस्पतिः ।

तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम् ।। ४२ ।।

परंतु राजेन्द्र! ब्राह्मणके प्रभावसे वह भी उस वृक्षके साथ जी उठा। नरश्ेष्ठ! उसीमनुष्यने आकर हमलोगोंसे तक्षक और ब्राह्मणकी जो घटना थी, वह सुनायी ।। ४२ ।।

यथावृत्तं तु तत् सर्वं तक्षकस्य द्विजस्य च ।

एतत् ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत् ।

श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम् ।। ४३ ।।

राजन्! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया।भूपालशिरोमणे! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो ।। ४३ ।।

सौतिरुवाच

मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः ।

पर्यतप्यत दुःखार्तः प्रत्यपिंषत् करं करे ।। ४४ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं-मन्त्रियोंकी बात सुनकर राजा जनमेजय दुःखसे आतुर होसंतप्त हो उठे और कुपित होकर हाथसे हाथ मलने लगे ।। ४४ ।।

निःश्वासमुष्णमसकृद् दीर्घ राजीवलोचनः।

मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन् नृपः ।। ४५ ।।

वे बारम्बार लम्बी और गरम साँस छोड़ने लगे। कमलके समान नेत्रोंवाले राजाजनमेजय उस समय नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फूट-फूटकर रोने लगे ।। ४५ ।।

उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः ।

दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि ॥ ४६ ।।

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृपः।

अमर्षी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ।। ४७ ।।

राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक औरअमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वकजलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले- ॥ ४६-४७ ॥

जनमेजय उवाच

श्रुत्वैतद् भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति ।

निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत ।

अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने । ४८ ।।

प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता ।

शृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम् ।। ४९ ।।

जनमेजयने कहा-मनत्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यहवचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेराविचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्रबनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है ।। ४८-४९ ।।

इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत् ।

यदाऽऽगच्छेत् स वै विप्रो ननु जीवेत् पिता मम ।। ५० ।।

उसकी सबसे बड़ी दुष्टता यह है कि उसने काश्यपको लौटा दिया। यदि वे ब्राह्मणदेवताआ जाते तो मेरे पिता निश्चय ही जीवित हो सकते थे ।। ५० ।।

परिहीयेत किं तस्य यदि जीवेत् स पार्थिवः ।

काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च ।। ५१ ।।

यदि मन्त्रियोंके विनय और काश्यपके कृपाप्रसादसे महाराज जीवित हो जाते तो इसमेंउस दुष्टकी क्या हानि हो जाती? ।। ५१ ।।

स तु वारितवान् मोहात् काश्यपं द्विजसत्तमम् ।

संजिजीवयिषुं प्राप्तं राजानमपराजितम् ।। ५२ ।।

जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षितुको जीवित करनेकीइच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे थे, किंतु तक्षकने मोहवश उन्हें रोक दिया ।। ५२ ।।

महानतिक्रमो ह्येष तक्षकस्य दुरात्मनः।

द्विजस्य योऽददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति ।। ५३ ।

दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धनदिया कि वे महाराजको जिला न दें ।। ५३ ।।

उत्तङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत् प्रियम् ।

भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः ।। ५४ ।।

इसलिये मैं महर्षि उत्तंकका, अपना तथा आप सब लोगोंका अत्यन्त प्रिय करनेके लियेपिताके वैरका अवश्य बदला लूँगा ।। ५४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जनमेजय और मन्त्रियोंका संवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५०॥

Vyasa Sewaka
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