Mahabharata Gita Press Vol I Page 301-600 Webpage 6

।। श्रीहरिः ।।

श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत

महाभारत (प्रथम खण्ड)

MAHABHARATA

[आदिपर्व और सभापर्व]

(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवाद)

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त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।

षट्षष्टितमोऽध्यायः

महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका

वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः ।

एकादश सुताः स्थाणोः ख्याताः परमतेजसः ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! ब्रह्माके मानस पुत्र छः महर्षियोंके नामतुम्हें ज्ञात हो चुके हैं। उनके सातवें पुत्र थे स्थाणु। स्थाणुके परम तेजस्वी ग्यारहपुत्र विख्यात हैं ।। १ ।।

मृगव्याधश्च सर्पश्च नित्ऋतिश्च महायशाः ।

अजैकपादहिर्बुध्यः पिनाकी च परंतपः ।। २ ।।

दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः ।

स्थाणुर्भवश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः ।। ३ ।।

मृगव्याध, सर्प, महायशस्वी नित्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्य, शत्रुसंतापनपिनाकी, दहन, ईश्वर, परम कान्तिमान् कपाली, स्थाणु और भगवान् भव – येग्यारह रुद्र माने गये हैं ।। २-३ ।।

मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।

षडेते ब्रह्मणः पुत्रा वीर्यवन्तो महर्षयः ।। ४ ।।

मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु- ये ब्रह्माजीके छः पुत्र बड़ेशक्तिशाली महर्षि हैं ।। ४ ।।

त्रयस्त्वङ्गिरसः पुत्रा लोके सर्वत्र विश्रुताः ।

बृहस्पतिरुतथ्यश्च संवर्तश्च धृतव्रताः ।। ५ ।।

अत्रेस्तु बहवः पुत्राः श्रूयन्ते मनुजाधिप ।

सर्वे वेदविदः सिद्धाः शान्तात्मानो महर्षयः ।। ६ ।।

अंगिराके तीन पुत्र हुए, जो लोकमें सर्वत्र विख्यात हैं। उनके नाम ये हैं -बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त। ये तीनों ही उत्तम व्रत धारण करनेवाले हैं।मनुजेश्वर! अत्रिके बहुत-से पुत्र सुने जाते हैं। वे सब-के-सब वेदवेत्ता, सिद्ध औरशान्तचित्त महर्षि हैं ।। ५-६ ।।

राक्षसाश्च पुलस्त्यस्य वानराः किन्नरास्तथा।

यक्षाश्च मनुजव्याघ्र पुत्रास्तस्य च धीमतः ।। ७ ।।

नरश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुलस्त्य मुनिके पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर तथा यक्ष हैं ।। ७ ।।

पुलहस्य सुता राजञ्छरभाश्च प्रकीर्तिताः ।

सिंहाः किम्पुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ।। ८ ।।

राजन्! पुलहके शरभ, सिंह, किम्पुरुष, व्याघ्र, रीछ, और ईहामृग (भेड़िया)जातिके पुत्र हुए ।। ८ ।।

क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः ।

विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपरायणाः ।।९ ।।

क्रतु (यज्ञ)-के पुत्र क्रतुके ही समान पवित्र, तीनों लोकोंमें विख्यात,सत्यवादी, व्रतपरायण तथा भगवान् सूर्यके आगे चलनेवाले साठ हजार वालखिल्य ऋषि हुए ।। ९ ।।

दक्षस्त्वजायताङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् भगवानृषिः ।

ब्रह्मणः पृथिवीपाल शान्तात्मा सुमहातपाः ।। १० ।।

भूमिपाल! ब्रह्माजीके दाहिने अँगूठेसे महातपस्वी शान्तचित्त महर्षि भगवान्दक्ष उत्पन्न हुए ।। १० ।।

वामादजायताङ्गुष्ठाद् भार्या तस्य महात्मनः ।

तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनयन्मुनिः ।। ११ ।।

इसी प्रकार उन महात्माके बायें अँगूठेसे उनकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ। महर्षिने उसके गर्भसे पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं ।। ११ ।।

ताः सर्वास्त्वनवद्याङ्गयः कन्याः कमललोचनाः ।

पुत्रिकाः स्थापयामास नष्टपुत्रः प्रजापतिः ।। १२ ।।

वे सभी कन्याएँ परम सुन्दर अंगोंवाली तथा विकसित कमलके सदृशविशाल लोचनोंसे सुशोभित थीं। प्रजापति दक्षके पुत्र जब नष्ट हो गये,उन्होंने अपनी उन कन्याओंको पुत्रिका बनाकर रखा ( और उनका विवाहपुत्रिकाधर्मके अनुसार ही किया) ।। १२ ।।

ददौ स दश धर्माय सप्तविंशतिमिन्दवे ।

दिव्येन विधिना राजन् कश्यपाय त्रयोदश ।। १३ ।।

राजन्! दक्षने दस कन्याएँ धर्मको, सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको और तेरहकन्याएँ महर्षि कश्यपको दिव्य विधिके अनुसार समर्पित कर दीं ।। १३ ।।

नामतो धर्मपत्न्यस्ताः कीर्त्यमाना निबोध मे।

कीर्तिर्लक्ष्मीरधृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया तथा ।। १४ ।।

बुद्धिर्लज्जा मतिश्चैव पत्न्यो धर्मस्य ता दश ।

द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वयम्भुवा ।। १५ ।।

तबअब मैं धर्मकी पत्नियोंके नाम बता रहा हूँ, सुनो – किर्ति, लक्ष्मी धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति-ये धर्मकी दस पत्नियाँ हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने इन सबको धर्मका द्वार निश्चित किया है अर्थात् इनके द्वारा धर्ममें प्रवेश होता है ।। १४-१५ ।।

सप्तविंशतिः सोमस्य पत्न्यो लोकस्य विश्रुताः ।

सोमपत्न्यः शुचिव्रताः ।। १६ ।।

कालस्य नयने चन्द्रमाकी सत्ताईस स्त्रियाँ समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। वे पवित्र व्रत धारण करनेवाली सोमपत्नियाँ काल-विभागका ज्ञापन करनेमें नियुक्त हैं ।। १६ ।।

सर्वा नक्षत्रयोगिन्यो लोकयात्राविधानतः ।

पैतामहो मुनिर्देवस्तस्य पुत्रः प्रजापतिः ।

तस्याष्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ।। १७ ।।

धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः ।

प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ।। १८ ।।

लोक-व्यवहारका निर्वाह करनेके लिये वे सब-की-सब नक्षत्र- वाचक नामोंसे युक्त हैं। पितामह ब्रह्माजीके स्तनसे उत्पन्न होनेके कारण मुनिवर धर्मदेव उनके पुत्र माने गये हैं। प्रजापति दक्ष भी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं । दक्षकी कन्याओंके गर्भसे धर्मके आठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्हें वसुगण कहते हैं। अब मैं वसुओंका विस्तारपूर्वक परिचय देता हूँ। धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास-ये आठ वसु कहे गये हैं ।। १७-१८ ।।

धूम्रायास्तु धरः पुत्रो ब्रह्मविद्यो ध्रुवस्तथा।

चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वासायाः श्वसनस्तथा ।। १९ ।।

रतायाश्चाप्यहः पुत्रः शाण्डिल्याश्च हुताशनः ।

प्रत्यूषश्च प्रभासश्च प्रभातायाः सुतौ स्मृतौ ।। २० ।।

धर और ब्रह्मवेत्ता ध्रुव धूम्राके पुत्र हैं। चन्द्रमा मनस्विनीके और अनिल श्वासाके पुत्र हैं। अह रताके और अनल शाण्डिलीके पुत्र हैं तथा प्रत्यूष और प्रभास ये दोनों प्रभाताके पुत्र बताये गये हैं ।। १९-२० ।।

धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा ।

ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः ।। २१ ।।

धरके दो पुत्र हुए-द्रविण तथा हुतहव्यवह। सब लोकोंको अपना ग्रास बनानेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र है ।। २१ ।।

सोमस्य तु सुतो वच्चा वर्चस्वी येन जायते ।

मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ।। २२ ।।

युक्ताः हैं।सोमके मनोहरा नामक स्त्रीके गर्भसे प्रथम तो वच्चा नामक पुत्र हुआ,जिससे लोग वर्चस्वी (तेज, कान्ति और पराक्रमसे सम्पन्न) होते हैं, फिर शिशिर,प्राण तथा रमण नामक पुत्र उत्पन्न हुए ।। २२ ।।

अह्नः सुतस्तथा ज्योतिः शमः शान्तस्तथा मुनिः ।

अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्छरवणालयः ।। २३ ।।

अहके चार पुत्र हुए-ज्योति, शम, शान्त तथा मुनि। अनलके पुत्र श्रीमान्कुमार (स्कन्द) हुए, जिनका जन्मकालमें सरकंडोंके वनमें निवास था ।। २३ ।।

तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजः ।

कृत्तिकाभ्युपपत्तेश्च कार्तिकेय इति स्मृतः ।। २४ ।।

शाख, विशाख और नैगमेय-ये तीनों कुमारके छोटे भाई हैं। छःकृत्तिकाओंको मातारूपमें स्वीकार कर लेनेके कारण कुमारका दूसरा नामकार्तिकेय भी है ।। २४ ।।

अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः ।

अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ।। २५ ।।

अनिलकी भार्याका नाम शिवा है। उसके दो पुत्र हैं -मनोजव तथाअविज्ञातगति। इस प्रकार अनिलके दो पुत्र कहे गये हैं ।। २५ ।।

प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्नाथ देवलम् ।

द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ।

बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी ।। २६ ।।

योगसक्ता जगत् कृत्स्नमसक्ता विचचार ह ।

प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह ।। २७ ।।

देवल नामक सुप्रसिद्ध मुनिको प्रत्यूषका पुत्र माना जाता है। देवलके भी दोपुत्र हुए। वे दोनों ही क्षमावान् और मनीषी थे। बृहस्पतिकी बहिन स्त्रियोंमें श्रेष्ठएवं ब्रह्मवादिनी थीं। वे योगमें तत्पर हो सम्पूर्ण जगत्में अनासक्त भावसेविचरती रहीं। वे ही वसुओंमें आठवें वसु प्रभासकी धर्मपत्नी थीं ।। २६ -२७ ।।

विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः ।

कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः ।। २८ ।।

शिल्पकर्मके ब्रह्मा महाभाग विश्वकर्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं । वे सहस्रोंशिल्पोंके निर्माता तथा देवताओंके बढ़ई कहे जाते हैं ।। २८ ।।

भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः ।

यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह ।। २९ ।।

वे सब प्रकारके भूषणोंको बनानेवाले और शिल्पियोंमें श्रेष्ठ हैं। उन्होंनेदेवताओंके असंख्य दिव्य विमान बनाये हैं ।। २९ ।।

मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः ।

पूजयन्ति च यं नित्यं विश्वकर्माणमव्ययम् ।। ३० ।।

मनुष्य भी महात्मा विश्वकर्माके शिल्पका आश्रय ले जीवननिर्वाह करते हैंऔर सदा उन अविनाशी विश्वकर्माकी पूजा करते रहते हैं ।। ३० ।।

स्तनं तु दक्षिणं भित्त्वा ब्रह्मणो नरविग्रहः ।

निःसृतो भगवान् धर्मः सर्वलोकसुखावहः ।। ३१ ।।

ब्रह्माजीके दाहिने स्तनको विदीर्ण करके मनुष्यरूपमें भगवान् धर्म प्रकटहुए, जो सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले हैं ।। ३१ ।।

त्रयस्तस्य वराः पुत्राः सर्वभूतमनोहराः ।

शमः कामश्च हर्षश्च तेजसा लोकधारिणः ।॥ ३२ ।।

उनके तीन श्रेष्ठ पुत्र हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको हर लेते हैं । उनके नामहैं-शम, काम और हर्ष। वे अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवालेहैं ।। ३२ ।।

कामस्य तु रतिर्भार्या शमस्य प्राप्तिरङ्गना ।

नन्दा तु भार्या हर्षस्य यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः ।। ३३ ।।

कामकी पत्नीका नाम रति है। शमकी भार्या प्राप्ति है। हर्षकी पत्नी नन्दाहै। इन्हींमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ।। ३३ ।।

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः ।

जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ।। ३४ ।।

मरीचिके पुत्र कश्यप और कश्यपके सम्पूर्ण देवता तथा असुर उत्पन्न हुए।नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार कश्यप सम्पूर्ण लोकोंके आदि कारण हैं ।। ३४ ।।

त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी ।

असूयत महाभागा सान्तरिक्षेऽश्चिनावुभौ ।। ३५ ।।

द्वादशैवादितेः पुत्राः शक्रमुख्या नराधिप ।

तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोकाः प्रतिष्ठिताः ।। ३६ ।।

त्वष्टाकी पुत्री संज्ञा भगवान् सूर्यकी धर्मपत्नी हैं। वे परम सौभाग्यवती हैं।उन्होंने अश्विनी (घोड़ी)-का रूपअश्विनीकुमारोंको जन्म दिया। राजन्! अदितिके इन्द्र आदि बारह पुत्र ही हैं।उनमें भगवान् विष्णु सबसे छोटे हैं, जिनमें ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठितहैं ।। ३५-३६ ।।

त्रयस्त्रिंशत इत्येते देवास्तेषामहं तव ।

अन्वयं सम्प्रवक्ष्यामि पक्षैश्च कुलतो गणान् ।। ३७ ।।

धारण करके अन्तरिक्षमें दोनोंइस प्रकार आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य तथा प्रजापति औरवषट्कार-ये तैंतीस मुख्य देवता हैं। अब मैं तुम्हें इनके पक्ष और कुल आदिकेउल्लेखपूर्वक वंश और गण आदिका परिचय देता हूँ ।। ३७ ।।

रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा ।

वसूनां भार्गवं विद्याद् विश्वेदेवांस्तथैव च ।। ३८ ।।

रुद्रोंका एक अलग पक्ष या गण है, साध्य, मरुत् तथा वसुओंका भी पृथक्-पृथक् गण है। इसी प्रकार भार्गव तथा विश्वेदेवगणको भी जाननाचाहिये ।। ३८ ।।

वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा ।

बृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते ।। ३९ ।।

विनतानन्दन गरुड, बलवान् अरुण तथा भगवान् बृहस्पतिकी गणनाआदित्योंमें ही की जाती है ।। ३९ ।।

अश्विनौ गुह्यकान् विद्धि सर्वोषध्यस्तथा पशून् ।

एते देवगणा राजन् कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः ।। ४० ।।

अश्विनीकुमार, सर्वौषधि तथा पशु-इन सबको गुह्यकसमुदायके भीतरसमझो। राजन्! ये देवगण तुम्हें क्रमश: बताये गये हैं ।। ४० ।।

यान् कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते।

ब्रह्मणो हृदयं भित्त्वा निःसृतो भगवान् भृगुः ।। ४१ ।।

मनुष्य इन सबका कीर्तन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भगवान् भृगुब्रह्माजीके हृदयका भेदन करके प्रकट हुए थे ।। ४१ ।।

भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्छुक्रः कविसुतो ग्रहः ।

त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये ।

स्वयम्भुवा नियुक्तः सन् भुवनं परिधावति ।॥ ४२ ।

भृगुके विद्वान् पुत्र कवि हुए और कविके पुत्र शुक्राचार्य हुए, जो ग्रह होकरतीनों लोकोंके जीवनकी रक्षाके लिये वृष्टि, अनावृष्टि तथा भय और अभयउत्पन्न करते हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीकी प्रेरणासे वे समस्त लोकोंका चक्कर लगातेरहते हैं ।। ४२ ।।

योगाचार्यों महाबुद्धिर्देत्यानामभवद् गुरुः ।

सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः ।॥ ४३ ।।

महाबुद्धिमान् शुक्र ही योगके आचार्य और दैत्योंके गुरु हुए। वे ही योगबलसेमेधावी, ब्रह्मचारी एवं व्रतपरायण बृहस्पतिके रूपमें प्रकट हो देवताओंके भीगुरु होते हैं ।। ४३ ।।

तस्मिन् नियुक्ते विधिना योगक्षेमाय भार्गवे ।

अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ।। ४४ ।।

ब्रह्माजीने जब भृगुपुत्र शुक्रको जगत्के योगक्षेमके कार्यमें नियुक्त करदिया, तब महर्षि भृगुने एक दूसरे निर्दोष पुत्रको जन्म दिया ।। ४४ ।।

च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम् ।

यः स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत ।। ४५ ।।

जिसका नाम था च्यवन। महर्षि च्यवनकी तपस्या सदा उद्दीप्त रहती है। वेधर्मात्मा और यशस्वी हैं। भारत ! वे अपनी माताको संकटसे बचानेके लियेरोषपूर्वक गर्भसे च्युत हो गये थे (इसीलिये च्यवन कहलाये) ।। ४५ ।।

आरुषी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः ।

और्वस्तस्यां समभवदूरुं भित्त्वा महायशाः ।। ४६ ।।

मनुकी पुत्री आरुषी मनीषी च्यवन मुनिकी पत्नी थी। उससे महायशस्वीऔर्व मुनिका जन्म हुआ। वे अपनी माताकी ऊरु (जाँघ) फाड़कर प्रकट हुए थे;इसलिये और्व कहलाये ।। ४६ ।।

महातेजा महावीर्यों बाल एव गुणैर्युतः ।

ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत् ।। ४७ ।।

वे महान् तेजस्वी और अत्यन्त शक्तिशाली थे। बचपनमें ही अनेकउनकी शोभा बढ़ाने लगे। और्वके पुत्र ऋचीक तथा ऋचीकके पुत्र जमदग्नि सद्गुणहुए ।। ४७ ।।

जमदग्नेस्तु चत्वार आसन् पुत्रा महात्मनः ।

रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः ।

सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी । ४८ ।।

महात्मा जमदग्निके चार पुत्र थे, जिनमें परशुरामजी सबसे छोटे थे; किंतुउनके गुण छोटे नहीं थे। वे श्रेष्ठ सद्गुणोंसे विभूषित थे, सम्पूर्ण शस्त्रविद्यामेंकुशल, क्षत्रिय-कुलका संहार करनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ।। ४८ ।।

और्वस्यासीत् पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् ।

तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः ।। ४९ ।।

और्व मुनिके जमदग्नि आदि सौ पुत्र थे। फिर उनके भी सहस्रों पुत्र हुए। इसप्रकार इस पृथ्वीपर भृगुवंशका विस्तार हुआ।। ४९ ।।

द्वौ पुत्रौ ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम् ।

लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह ।। ५० ।।

ब्रह्माजीके दो पुत्र और थे, जिनका धारण पोषण और सृष्टिरूप लक्षणलोकमें सदा ही उपलब्ध होता है। उनके नाम हैं धाता और विधाता । ये मनुकेसाथ रहते हैं ।। ५० ।।

तयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा ।

तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ।। ५१ ।।

वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद् देवी व्यजायत ।

तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम् ।। ५२ ।।

कमलोंमें निवास करनेवाली शुभस्वरूपा लक्ष्मीदेवी उन दोनोंकी बहिन हैं।आकाशमें विचरनेवाले अश्व लक्ष्मीदेवीके मानस पुत्र हैं। राजन्! वरुणके बीजसे उनकी ज्येष्ठ पत्नी देवीने एक पुत्र और एक पुत्रीको जन्म दिया । उसके पुत्रको तो बल और देवनन्दिनी पुत्रीको सुरा समझो ।। ५१-५२ ।।

प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् ।

अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ।। ५३ ।।

तदनन्तर एक समय ऐसा आया, जब प्रजा भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे एक-दूसरेको मारकर खाने लगी, उस समय वहाँ अधर्म प्रकट हुआ, जोसमस्त प्राणियोंका नाश करनेवाला है ।। ५३ ।।

तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैत्ऋता येन राक्षसाः ।

घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा ।। ५४ ।।

अधर्मकी स्त्री नित्ऋति हुई, जिससे नैर्ऋत नामवाले तीन भयंकर राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए, जो सदा पापकर्ममें ही लगे रहनेवाले हैं ।। ५४ ।।

भयो महाभयश्चैव मृत्युर्भूतान्तकस्तथा।

न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः ।। ५५ ।।

उनके नाम इस प्रकार है-भय, प्राणियोंका अन्त करनेवाला है। उसके पत्नी या पुत्र कोई नहीं है, क्योंकि वह सबका अन्त करनेवाला है ।। ५५ ।।

काकीं श्येनीं तथा भासीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् ।

ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ।। ५६ ।।

देवी ताम्राने काकी, श्येनी, भासी, धृतराष्ट्री तथा शुकी-इन पाँच लोकविख्यात कन्याओंको उत्पन्न किया।। ५६ ।।

उलूकान् सुषुवे काकी श्येनी श्येनान् व्यजायत ।

भासी भासानजनयद् गृध्रांश्चैव जनाधिप ।। ५७ ।।

जनेश्वर! काकीने उल्लुओं और श्येनीने बाजोंको जन्म दिया; भासीने मुर्गोंतथा गीधोंको उत्पन्न किया ।। ५७ ।।

महाभय और मृत्यु। उनमें मृत्यु समस्त धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः ।

चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ।। ५८ ।।

शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी ।

कल्याणगुणसम्पन्ना सर्वलक्षणपूजिता ।। ५९ ।।

कल्याणमयी धृतरा्ट्रीने सब प्रकारके हंसों, कल-हंसों तथा चक्रवाकोंकोजन्म दिया। कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्तयशस्विनी शुकीने शुकों (तोतों)-को ही उत्पन्न किया।। ५८-५९ ।।

नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञे क्रोधसम्भवाः ।

मृगी च मृगमन्दा च हरी भद्रमना अपि ।। ६० ।।

मातङ्गी त्वथ शार्दूली श्वेता सुरभिरेव च ।

सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा चैव भामिनी ।। ६१ ।।

क्रोधवशाने नौ प्रकारकी क्रोधजनित कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम येहैं-मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमना, मातंगी, शार्दूली, श्वेता, सुरभि तथा सम्पूर्णशुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुन्दरी सुरसा ।। ६०-६१ ।।

अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम ।

ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्च परंतप ।। ६२ ।।

ततस्त्वैसवतं नागं जज्ञे भद्रमनाः सुतम्।

ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः ।। ६३ ।।

नरश्रेष्ठ! समस्त मृग मृगीकी संताने हैं। परंतप! मृगमन्दासे रीछ तथा सृमर(छोटी जातिके मृग) उत्पन्न हुए। भद्रमनाने ऐरावत हाथीको अपने पुत्ररूपमेंउत्पन्न किया। देवताओंका हाथी महान् गजराज ऐरावत भद्रमनाका ही पुत्रहै ।। ६२-६३ ।।

हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तरस्विनः ।

गोलांगूलांश्च भद्रं ते हरयाः पुत्रान् प्रचक्षते ।। ६४ ।।

प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान् व्याघ्राननेकशः ।

द्वीपिनश्च महासत्त्वान् सर्वानेव न संशयः ।। ६५ ।।

राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, वेगवान् घोड़े और वानर हरीके पुत्र हैं। गायकेसमान पूँछवाले लंगूरोंको भी हरीका ही पुत्र बताया जाता है। शादूलीने सिंहों,अनेक प्रकारके बाघों और महान् बलशाली सभी प्रकारके चीतोंको भी जन्मदिया, इसमें संशय नहीं है ।। ६४-६५ ।।

मातङ्गयपि च मातङ्गानपत्यानि नराधिप ।

दिशां गजं तु श्वेताख्यं श्वेताजनयदाशुगम् । ६६ ।।

तथा दुहितरौ राजन् सुरभिर्वै व्यजायत ।

रोहिणी चैव भद्रं ते गन्धर्वी तु यशस्विनी ।। ६७ ।।

नरेश्वर! मातंगीने मतवाले हाथियोंको संतानके रूपमें उत्पन्न किया। श्वेतानेशीघ्रगामी दिग्गज श्वेतको जन्म दिया। राजन्! तुम्हारा भला हो, सुरभिने दोकन्याओंको उत्पन्न किया। उनमेंसे एकका नाम रोहिणी था और दूसरीकागन्धर्वी। गन्धर्वी बड़ी यशस्विनी थी ।। ६६-६७ ।।

विमलामपि भद्रं ते अनलामपि भारत ।

रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धव्व्यां वाजिनः सुताः ।

सप्त पिण्डफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत ।। ६८ ।।

भारत! तत्पश्चात् रोहिणीने विमला और अनला नामवाली दो कन्याएँ औरउत्पन्न कीं। रोहिणीसे गाय-बैल और गन्धर्वीसे घोड़े ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए।अनलाने सात प्रकारके वृक्षोंको उत्पन्न किया, जिनमें पिण्डाकार फल लगतेहैं ।। ६८ ।।

अनलायाः शुकी पुत्री कङ्कस्तु सुरसासुतः ।

अरुणस्य भार्या श्येनी तु वीर्यवन्तौ महाबलौ ।। ६९ ।।

सम्पातिं जनयामास वीर्यवन्तं जटायुषम् ।

सुरसाजनयन्नागान् कद्रूः पुत्रांस्तु पन्नगान् ।। ७० ।।

द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु विख्यातौ गरुडारुणौ।

अनलाके शुकी नामकी एक कन्या भी हुई। कंक पक्षी सुरसाका पुत्र है।अरुणकी पत्नी श्येनीने दो महाबली और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। एककानाम था सम्पाती और दूसरेका जटायु। जटायु बड़ा शक्तिशाली था। सुरसा औरकद्रूने नाग एवं पन्नग जातिके पुत्रोंको उत्पन्न किया। विनताके दो ही पुत्रविख्यात हैं, गरुड और अरुण ।। ६९-७०।।

(सुरसाजनयत् सर्पाञ्छतमेकशिरोधरान् ।

सुरसाकन्यका जातास्तिस्रः कमललोचनाः ।।

वनस्पतीनां वृक्षाणां वीरुधां चैव मातरः ।

अनला रुहा च द्वे प्रोक्ते वीरुधां चैव ताः स्मृताः ।।

गृल्धन्ति ये विना पुष्पं फलानि तरवः पृथक् ।

अनलासुतास्ते विज्ञेयाः तानेवाहुर्वनस्पतीन् ।।

पुष्पैः फलग्रहान् वृक्षान् रुहायाः प्रसवान् विभो ।

लतागुल्मानि वर्यश्च त्वक्सारतृणजातयः ।।

वीरुधायाः प्रजास्ताः स्युरत्रवंशः समाप्यते ।)

सुरसाने एक सौ एक सिरवाले सर्पोंको जन्म दिया था । सुरसासे तीनकमलनयनी कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो वनस्पतियों, वृक्षों और लता-गुल्मोंकीजननी हुईं। उनके नाम इस प्रकार हैं-अनला, रुहा और वीरुधा। जो वृक्ष बिनाफूलके ही फल ग्रहण करते हैं उन सबको अनलाका पुत्र जानना चाहिये; वे हीवनस्पति कहलाते हैं। प्रभो! जो फूलसे फल ग्रहण करते हैं उन वृक्षोंको रुहाकीसंतान समझो। लता, गुल्म, वल्ली, बाँस और तिनकोंकी जितनी जातियाँ हैं उनसबकी उत्पत्ति वीरुधासे हुई है। यहाँ वंशवर्णन समाप्त होता है।

इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप ।

प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मया मतिमतां वर ।। ७१ ।।

यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यङ्मुक्तो भवति पाप्मनः ।

सर्वज्ञतां च लभते गतिमग्रयां च विन्दति ।। ७२ ।।

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजय! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण महाभूतोंकीउत्पत्तिका भलीभाँति वर्णन किया है। जिसे अच्छी तरह सुनकर मनुष्य सबपापोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है और सर्वज्ञता तथा उत्तम गति प्राप्त कर लेताहै ।। ७१-७२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अंशावतरणविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ७६३ श्लोक हैं)

* मनुस्मृतिमें प्रजापति दक्षको ही पुत्रिका-विधिका प्रवर्तक बताकर उसका लक्षण इस प्रकार दिया है-अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् । यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात् स्वधाकरम् ।। (९। १२७)जिसके पुत्र न हों वह निम्नांकित विधिसे अपनी कन्याको पुत्रिका बना ले -यह संकल्प कर ले कि इसकन्याके गर्भसे जो बालक उत्पन्न हो, वह मेरा श्राद्धादि कर्म करनेवाला पुत्ररूप हो।* किसी-किसीके मतमें शाख, विशाख और नैगमेय-ये तीनों नाम कुमार कार्तिकेयके ही हैं। किन्हींकेमतमें कुमार कार्तिकेयके पुत्रोंकी संज्ञा शाख, विशाख और नैगमेय है। कल्पभेदसे सभी ठीक हो सकते हैं।* खर्जूरं तालहिन्तालौ ताली खर्जूरिका तथा । गुणका नारिकेलश्च सप्त पिण्डफला द्रुमाः ।। (खजूर,ताल, हिन्ताल, ताली, छोटे खजूर, सोपारी और नारियल- ये सात पिण्डाकार फलवाले वृक्ष हैं।)

सप्तरषष्टितमोऽध्यायः

देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन

जनमेजय उवाच

देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

सिंहव्याघ्रमृदगाणां च पन्नगानां पतत्त्रिणाम् ।। १ ।।

सर्वेषां चैव भूतानां सम्भवं भगवन्नहम् ।

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन मानुषेषु महात्मनाम् ।

जन्म कर्म च भूतानामेतेषामनुपूर्वशः ।। २ ।।

जनमेजयने कहा-भगवन्! मैं मनुष्य-योनिमें अंशतः उत्पन्न हुए देवता, दानव,गन्धर्व, नाग, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, हरिण, सर्प, पक्षी एवं सम्पूर्ण भूतोंके जन्मका वृत्तान्तयथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। मनुष्योंमें जो महात्मा पुरुष हैं, उनके तथा इन सभीप्राणियोंके जन्म-कर्मका क्रमश: वर्णन सुनना चाहता हूँ ।। १-२ ।।

वैशम्पायन उवाच

मानुषेषु मनुष्येन्द्र सम्भूता ये दिवौकसः ।

प्रथमं दानवांश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः ।। ३ ।।

विप्रचित्तिरिति ख्यातो य आसीद् दानवर्षभः ।

जरासन्ध इति ख्यातः स आसीन्मनुजर्षभः ।। ४ ।।

दितेः पुत्रस्तु यो राजन् हिरण्यकशिपुः स्मृतः ।

स जज्ञे मानुषे लोके शिशुपालो नरर्षभः ।। ५ ।।

वैशम्पायनजी बोले-नरेन्द्र! मनुष्योंमें जो देवता और दानव प्रकट हुए थे, उन सबकेजन्मका ही पहले तुम्हें परिचय दे रहा हूँ। विप्रचित्ति नामसे विख्यात जो दानवोंका राजा था,वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ जरासन्ध नामसे विख्यात हुआ। राजन्! हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्धजो दितिका पुत्र था, वही मनुष्यलोकमें नरश्रेष्ठ शिशुपालके रूपमें उत्पन्न हुआ ।। ३-५ ।।

संहाद इति विख्यातः प्रह्लादस्यानुजस्तु यः ।

स शल्य इति विख्यातो जज्ञे बाह्लीकपुङ्गवः ।। ६ ।।

अनुह्रादस्तु तेजस्वी योऽभूत् ख्यातो जघन्यजः ।

धृष्टकेतुरिति ख्यातः स बभूव नरेश्वरः ।। ७ ।।

प्रह्लादका छोटा भाई जो संहादके नामसे विख्यात था, वही बाह्लीक देशका सुप्रसिद्धराजा शल्य हुआ। प्रह्लादका ही दूसरा छोटा भाई जिसका नाम अनुहलाद था, धृष्टकेतु नामकराजा हुआ ।। ६-७ ।।

यस्तु राजञ्छिबिन्नाम दैतेयः परिकीर्तितः ।

द्रुम इत्यभिविख्यातः स आसीद् भुवि पार्थिवः ।। ८ ।।

राजन्! जो शिबि नामका दैत्य कहा गया है, वही इस पृथ्वीपर ट्रम नामसे विख्यातराजा हुआ ।। ८ ।।

बाष्कलो नाम यस्तेषामासीदसुरसत्तमः ।

भगदत्त इति ख्यातः स जज्ञे पुरुषर्षभः ।।९ ।।

असुरोंमें श्रेष्ठ जो बाष्कल था, वही नरश्रेष्ठ भगदत्तके नामसे उत्पन्न हुआ ।। ९ ।

अयःशिरा अश्वशिरा अयःशङ्कुश्च वीर्यवान् ।

तथा गगनमूर्धा च वेगवांश्चात्र पञ्चमः ।। १० ।।

पज्चैते जज्ञिरे राजन् वीर्यवन्तो महासुराः।

केकयेषु महात्मानः पार्थिवर्षभसत्तमाः ।

केतुमानिति विख्यातो यस्ततोऽन्यः प्रतापवान् ।। ११ ॥

अमितौजा इति ख्यातः सोग्रकर्मा नराधिपः ।

स्वर्भानुरिति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ।। १२ ।।

उग्रसेन इति ख्यात उग्रकर्मा नराधिपः।

यस्त्वश्व इति विख्यातः श्रीमानासीन्महासुरः ।। १३ ।।

अशोको नाम राजाभून्महावीर्योऽपराजितः ।

तस्मादवरजो यस्तु राजन्नश्वपतिः स्मृतः ।। १४ ।।

दैतेयः सोऽभवद् राजा हार्दिक्यो मनुजर्षभः।

वृषपर्वेति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ।। १५ ।।

दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

अजकस्त्ववरो राजन् य आसीद् वृषपर्वणः ।। १६ ।।

स शाल्व इति विख्यातः पृथिव्यामभवन्नृपः ।

अश्वग्रीव इति ख्यातः सत्त्ववान् यो महासुरः ।। १७ ।।

रोचमान इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

सूक्ष्मस्तु मतिमान् राजन् कीर्तिमान् यः प्रकीर्तितः ॥ १८ ।।

बृहद्रथ इति ख्यातः क्षितावासीत् स पार्थिवः ।

तुहुण्ड इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ।। १९ ।।

सेनाबिन्दुरिति ख्यातः स बभूव नराधिपः ।

इषुपान्नाम यस्तेषामसुराणां बलाधिकः ॥ २० ।।

नग्नजिन्नाम राजासीद् भुवि विख्यातविक्रमः ।

एकचक्र इति ख्यात आसीद् यस्तु महासुरः ।। २१ ।।

प्रतिविन्ध्य इति ख्यातो बभूव प्रथितः क्षितौ ।

विरूपाक्षस्तु दैतेयश्चित्रयोधी महासुरः ।। २२ ।।

चित्रधर्मेति विख्यातः क्षितावासीत् स पार्थिवः ।

हरस्त्वरिहरो वीर आसीद् यो दानवोत्तमः ।। २३ ।।

सुबाहुरिति विख्यातः श्रीमानासीत् स पार्थिवः ।

अहरस्तु महातेजाः शत्रुपक्षक्षयंकरः ।। २४ ।।

बाह्लीको नाम राजा स बभूव प्रथितः क्षितौ ।

निचन्द्रश्वन्द्रवक्त्रस्तु य आसीदसुरोत्तमः ।। २५ ।।

मुञ्जकेश इति ख्यातः श्रीमानासीत् स पार्थिवः ।

निकुम्भस्त्वजितः संख्ये महामतिरजायत । २६ ।।

भूमौ भूमिपतिः क्षेष्ठो देवाधिप इति स्मृतः ।

शरभो नाम यस्तेषां दैतेयानां महासुरः ।। २७ ।।

पौरवो नाम राजर्षिः स बभूव नरोत्तमः।

कुपटस्तु महावीर्यः श्रीमान् राजन् महासुरः ।। २८ ।।

सुपार्श्व इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः ।

क्रथस्तु राजन् राजर्षिः क्षितौ जज्ञे महासुरः ।। २९ ।।

पार्वतेय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः ।

द्वितीयः शलभस्तेषामसुराणां बभूव ह ।। ३० ।।

प्रहलादो नाम बाह्लीकः स बभूव नराधिपः।

चन्द्रस्तु दितिजश्रेष्ठो लोके ताराधिपोपमः ।। ३१ ।।

चन्द्रवर्मेति विख्यातः काम्बोजानां नराधिपः।

अर्क इत्यभिविख्यातो यस्तु दानवपुङ्गवः ।। ३२ ।।

ऋषिको नाम राजर्षिर्बभूव नृपसत्तमः ।

मृतपा इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ।। ३३ ।।

पश्चिमानूपकं विद्धि तं नृपं नृपसत्तम ।

गविष्ठस्तु महातेजा यः प्रख्यातो महासुरः ।। ३४ ।।

द्रमसेन इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नुपः ।

मयूर इति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ।। ३५ ।।

स विश्व इति विख्यातो बभूव पृथिवीपतिः ।

सुपर्ण इति विख्यातस्तस्मादवरजस्तु यः ।। ३६ ।।

कालकीर्तिरिति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

चन्द्रहन्तेति यस्तेषां कीर्तितः प्रवरोऽसुरः ।। ३७ ।।

शुनको नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः ।

विनाशनस्तु चन्द्रस्य य आख्यातो महासुरः ।। ३८ ।।

जानकिर्नाम विख्यातः सोऽभवन्मनुजाधिपः ।

दीर्घजिह्वस्तु कौरव्य य उक्तो दानवर्षभः ।। ३९ ।।

काशिराजः स विख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपते ।

ग्रहं तु सुषुवे यं तु सिंहिका्केन्दुमर्दनम् ।

स क्राथ इति विख्यातो बभूव मनुजाधिपः ।। ४० ।।

अयःशिरा, अश्वशिरा, वीर्यवान् अयःशंकु, गगनमूरधथा और वेगवान् – राजन् ! ये पाँच पराक्रमी महादैत्य केकय देशके प्रधान-प्रधान महात्मा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए। उनसे भिन्न केतुमान् नामसे प्रसिद्ध प्रतापी महान् असुर अमितौजा नामसे विख्यात राजा हुआ, जो भयानक कर्म करनेवाला था। स्वर्भानु नामवाला जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही भयंकर कर्म करनेवाला राजा उग्रसेन कहलाया। अश्व नामसे विख्यात जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही किसीसे परास्त उसका छोटा भाई जो अश्वपति नामक दैत्य था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ हार्दिक्य नामवाला राजा हुआ। वृषपर्वा नामसे प्रसिद्ध जो श्रीमान् महादैत्य था, वह पृथ्वीपर दीर्घप्रज्ञ नामक राजा हुआ। राजन्! वृषपर्वाका छोटा भाई जो अजक था, वही इस भूमण्डलमें शाल्व नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ। अश्वग्रीव नामवाला जो धैर्यवान् महादैत्य था, वह पृथ्वीपर रोचमान नामसे विख्यात राजा हुआ। राजन्! बुद्धिमान् और यशस्वी सूक्ष्म नामसे प्रसिद्ध जो दैत्य कहा गया है, वह इस पृथ्वीपर बृहद्रथ नामसे विख्यात राजा हुआ है। असुरोंमें श्रेष्ठ जो तुहुण्ड नामक दैत्य था, वही यहाँ सेनाबिन्दु नामसे विख्यात राजा हुआ। असुरोंके समाजमें जो सबसे अधिक बलवान् था, वह इषुपाद नामक दैत्य इस पृथ्वीपर विख्यात पराक्रमी नग्नजित् नामक राजा हुआ। एकचक्र नामसे प्रसिद्ध जो महान् असुर था, वही इस पृथ्वीपर प्रतिविन्ध्य नामसे विख्यात राजा हुआ। विचित्र युद्ध करनेवाला महादैत्य विरूपाक्ष इस पृथ्वीपर चित्रधर्मा नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ। शत्रुओंका संहार करनेवाला जो वीर दानवश्रेष्ठहर था, वही सुबाहु नामक श्रीसम्पन्न राजा हुआ। शत्रुपक्षका विनाश करनेवाला महातेजस्वीअहर इस भूमण्डलमें बाह्निक नामसे विख्यात राजा हुआ। चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाला जो असुरश्रेष्ठ निचन्द्र था, वही मुंजकेश नामसे विख्यात श्रीसम्पन्न राजा हुआ। परम बुद्धिमान् निकुम्भ जो युद्धमें अजेय था, वह इस भूमिपर भूपालोंमें श्रेष्ठ देवाधिपकहलाया। दैत्योंमें जो शरभ नामसे प्रसिद्ध महान् असुर था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजर्षि पौरव हुआ। राजन्! महापराक्रमी महान् असुर कुपट ही इस पृथ्वीपर राजा सुपार्श्वके रूपमें उत्पन्न हुआ। महाराज! महादैत्य क्रथ इस पृथ्वीपर राजर्षि पार्वतेयके नामसे उत्पन्न हुआ, उसका शरीर मेरु पर्वतके समान विशाल था। असुरोंमें शलभ नामसे प्रसिद्ध जो दूसरा दैत्य था, वह बाह्लीकवंशी राजा प्रह्लाद हुआ। दैत्यश्रेष्ठ चन्द्र इस लोकमें चन्द्रमाके समान सुन्दर और चन्द्रवर्मा नामसे विख्यात काम्बोज देशका राजा हुआ। अर्क नामसे विख्यात जो दानवोंका सरदार था, वही नरपतियोंमें श्रेष्ठ राजर्षि ऋषिक हुआ। नृपशिरोमणे! मृतपा होनेवाला महापराक्रमी राजा अशोक हुआ। राजन्!नामसे प्रसिद्ध जो श्रेष्ठ असुर था, उसे पश्चिम अनूप देशका राजा समझो। गविष्ठ नामसेप्रसिद्ध जो महातेजस्वी असुर था, वही इस पृथ्वीपर द्रुमसेन नामक राजा हुआ। मयूरनामसे प्रसिद्ध जो श्रीमान् एवं महान् असुर था, वही विश्व नामसे विख्यात राजा हुआ।मयूरका छोटा भाई सुपर्ण ही भूमण्डलमें कालकीर्ति नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ। दैत्योंमें जोचन्द्रहन्ता नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ असुर कहा गया है, वही मनुष्योंका स्वामी राजर्षि शुनकहुआ। इसी प्रकार जो चन्द्रविनाशन नामक महान् असुर बताया गया है, वही जानकि नामसेप्रसिद्ध राजा हुआ। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! दीर्घजिह्न नामसे प्रसिद्ध दानवराज ही इस पृथ्वीपरकाशिराजके नामसे विख्यात था। सिंहिकाने सूर्य और चन्द्रमाका मान मर्दन करनेवाले जिसराहु नामक ग्रहको जन्म दिया था, वही यहाँ क्राथ नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ।। १०-४० ।।

दनायुषस्तु पुत्राणां चतुर्णां प्रवरोऽसुरः ।

विक्षरो नाम तेजस्वी वसुमित्रो नृपः स्मृतः ।। ४१ ।।

दनायुके चार पुत्रोंमें जो सबसे बड़ा है, वह विक्षर नामक तेजस्वी असुर यहाँ राजावसुमित्र बताया गया है ।। ४१ ।।

द्वितीयो विक्षराद् यस्तु नराधिप महासुरः ।

पाण्ड्यराष्ट्राधिप इति विख्यातः सोऽभवन्नृपः ।। ४२ ।।

नराधिप! विक्षरसे छोटा उसका दूसरा भाई बल, जो असुरोंका राजा था, पाण्ड्यदेशका सुविख्यात राजा हुआ ।। ४२ ।।

बली वीर इति ख्यातो यस्त्वासीदसुरोत्तमः ।

पौण्ड्रमात्स्यक इत्येवं बभूव स नराधिप: ।४३ ।।

महाबली वीर नामसे विख्यात जो श्रेष्ठ असुर (विक्षरका तीसरा भाई ) था,पौण्ड्रमात्स्यक नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ।। ४३ ।।

वृत्र इत्यभिविख्यातो यस्तु राजन् महासुरः ।

मणिमान्नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः ।। ४४ ।।

राजन्! जो वृत्र नामसे विख्यात (और विक्षरका चौथा भाई ) महान् असुर था, वहीपृथ्वीपर राजर्षि मणिमान्के नामसे प्रसिद्ध भूपाल हुआ।। ४४ ।।

क्रोधहन्तेति यस्तस्य बभूवावरजोऽसुरः ।

दण्ड इत्यभिविख्यातः स आसीन्नृपतिः क्षितौ ।। ४५ ।।

क्रोधहन्ता नामक असुर जो उसका छोटा भाई (कालाके पुत्रोंमें तीसरा) था, वह इसपृथ्वीपर दण्ड नामसे विख्यात नरेश हुआ ।। ४५ ।।

क्रोधवर्धन इत्येवं यस्त्वन्यः परिकीर्तितः ।

दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजर्षभः ।। ४६ ।।

क्रोधवर्धन नामक जो दूसरा दैत्य कहा गया है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ दण्डधार नामसेविख्यात हुआ ।। ४६ ।।

कालेयानां तु ये पुत्रास्तेषामष्टौ नराधिपाः ।

जज्ञिरे राजशा्दूल शार्दूलसमविक्रमाः । ४७ ।।

नृपश्रेष्ठ! कालेय नामक दैत्योंके जो पुत्र थे, उनमेंसे आठ इस पृथ्वीपर सिंहके समानपराक्रमी राजा हुए ।। ४७ ।।

मगधेषु जयत्सेनस्तेषामासीत् स पार्थिवः ।

अष्टानां प्रवरस्तेषां कालेयानां महासुरः ।। ४८ ।।

उन आठों कालेयोंमें श्रेष्ठ जो महान् असुर था, वही मगध देशमें जयत्सेन नामक राजाहुआ ।। ४८ ।।

द्वितीयस्तु ततस्तेषां श्रीमान् हरिहयोपमः ।

अपराजित इत्येवं स बभूव नराधिपः ।। ४९ ।।

उन कालेयोंमेंसे जो दूसरा इन्द्रके समान श्रीसम्पन्न था, वही अपराजित नामक राजाहुआ ।। ४९ ।।

तृतीयस्तु महातेजा महामायो महासुरः ।

निषादाधिपतिर्ज्ञे भुवि भीमपराक्रमः ।। ५० ।।

तीसरा जो महान् तेजस्वी और महामायावी महादैत्य था, वह इस पृथ्वीपर भयंकरपराक्रमी निषादनरेशके रूपमें उत्पन्न हुआ ।। ५० ।।

तेषामन्यतमो यस्तु चतुर्थः परिकीर्तितः ।

श्रेणिमानिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः ।। ५१ ।।

कालेयोंमेंसे ही एक जो चौथा बताया गया है, वह इस भूमण्डलमें राजर्षिप्रवरश्रेणिमान्के नामसे विख्यात हुआ ।। ५१ ।।

पञ्चमस्त्वभवत् तेषां प्रवरो यो महासुरः ।

महौजा इति विख्यातो बभूवेह परंतपः ।। ५२ ।।

कालेयोंमें जो पाँचवाँ श्रेष्ठ महादैत्य था, वही इस लोकमें शत्रुतापन महौजाके नामसेविख्यात हुआ ।। ५२ ।।

षष्ठस्तु मतिमान् यो वै तेषामासीन्महासुरः ।

अभीरुरिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः ।। ५३ ।।

उन कालेयोंमें जो छठा महान् असुर था, वह भूमण्डलमें राजर्षिशिरोमणि अभीरुकेनामसे प्रसिद्ध हुआ ।। ५३ ।।

समुद्रसेनस्तु नृपस्तेषामेवाभवद् गणात् ।

विश्रुतः सागरान्तायां क्षितौ धर्मार्थतत्त्ववित् ।। ५४ ।।

उन्हींमेंसे सातवाँ असुर राजा समुद्रसेन हुआ, जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर सब ओरविख्यात और धर्म एवं अर्थतत्त्वका ज्ञाता था ।। ५४ ।।

बृहन्नामाष्टमस्तेषां कालेयानां नराधिप ।

बभूव राजा धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः ।। ५५ ।।

राजन्! कालेयोंमें जो आठवाँ था, वह बृहत् नामसे प्रसिद्ध सर्वभूतहितकारी धर्मात्माराजा हुआ।। ५५ ।।

कुक्षिस्तु राजन् विख्यातो दानवानां महाबल: ।

पार्वतीय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः ।। ५६ ।।

महाराज! दानवोंमें कुक्षि नामसे प्रसिद्ध जो महाबली राजा था, वह पार्वतीय नामकराजा हुआ; जो मेरुगिरिके समान तेजस्वी एवं विशाल था ।। ५६ ।।

क्रथनश्च महावीर्यः श्रीमान् राजा महासुरः ।

सूर्याक्ष इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः ।। ५७ ।।

महापराक्रमी क्रथन नामक जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वह भूमण्डलमें पृथ्वीपतिराजा सूर्याक्ष नामसे उत्पन्न हुआ ।। ५७ ।।

असुराणां तु यः सूर्यः श्रीमांश्चैव महासुरः ।

दरदो नाम बाह्लीको वरः सर्वमहीक्षिताम् ।। ५८ ।।

असुरोंमें जो सूर्य नामक श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही पृथ्वीपर सब राजाओंमें श्रेष्ठदरद नामक बाह्लीकराज हुआ ।। ५८ ।।

गणः क्रोधवशो नाम यस्ते राजन् प्रकीर्तितः ।

ततः संजज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः ।। ५९ ।।

राजन्! क्रोधवश नामक जिन असुरगणोंका तुम्हें परिचय दिया है, उन्हींमेंसे कुछ लोगइस पृथ्वीपर निम्नांकित वीर राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए ।। ५९ ।।

मद्रकः कर्णवेष्टश्च सिद्धार्थः कीटकस्तथा ।

सुवीरश्च सुबाहुश्च महावीरोऽथ बाह्निकः ।। ६० ।।

क्रथो विचित्रः सुरथः श्रीमान् नीलश्च भूमिपः ।

चीरवासाश्च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः ।। ६१ ।।

दन्तवक्त्रश्च नामासीद् दुर्जयश्चैव दानवः।

रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजयः ।। ६२ ।।

आषाढो वायुवेगश्च भूरितेजास्तथैव च ।

एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः ।। ६३ ।।

कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च ।

श्रुतायुरुद्धहश्चैव बृहत्सेनस्तथैव च ।। ६४ ।।

क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिङ्गेषु नराधिपः ।

मतिमांश्च मनुष्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः ।। ६५ ।।

मद्रक, कर्णवेष्ट, सिद्धार्थ, कीटक, सुवीर, सुबाहु, महावीर, बाह्लिक, क्रथ, विचित्र,सुरथ, श्रीमान् नील नरेश, चीरवासा, भूमिपाल, दन्तवक्त्र, दानव दुर्जय, नृपश्रेष्ठ रुक्मी,राजा जनमेजय, आषाढ, वायुवेग, भूरितेजा, एकलव्य, सुमित्र, वाटधान, गोमुख, करूषदेशके अनेक राजा, क्षेमधूर्ति, श्रुतायु, उद्धह, बृहत्सेन, क्षेम, उग्रतीर्थ, कलिंग-नरेशकुहर तथा परम बुद्धिमान् मनुष्योंका राजा ईश्वर ।। ६० – ६५ ||

गणात् क्रोधवशादेष राजपूगोऽभवत् क्षितौ ।

जातः पुरा महाभागो महाकीर्तिर्महाबलः ।। ६६ ।।

इतने राजाओंका समुदाय पहले इस पृथ्वीपर क्रोधवश नामक दैत्यगणसे उत्पन्न हुआ था। ये सब राजा परम सौभाग्यशाली, महान् यशस्वी और अत्यन्त बलशाली थे ।। ६६ ।।

कालनेमिरिति ख्यातो दानवानां महाबलः ।

स कंस इति विख्यात उग्रसेनसुतो बली ।। ६७ ।।

दानवोंमें जो महाबली कालनेमि था, वही राजा उग्रसेनके पुत्र बलवान् कंसके नामसे विख्यात हुआ ।। ६७ ।।

यस्त्वासीद् देवको नाम देवराजसमद्युतिः ।

स गन्धर्वपतिर्मुख्यः क्षितौ जज्ञे नराधिपः ।। ६८ ।।

इन्द्रके समान कान्तिमान् राजा देवकके रूपमें इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ गन्धर्वराज ही उत्पन्न %3Dहुआ था ।। ६८ ।।

बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्देवर्षेर्विद्धि भारत ।

अंशाद् द्रोणं समुत्पन्नं भारद्वाजमयोनिजम् ।। ६९ ।।

भारत! महान् कीर्तिशाली देवर्षि बृहस्पतिके अंशसे अयोनिज भरद्वाजनन्दन द्रोणउत्पन्न हुए, यह जान लो ।। ६९ ।।

धन्विनां नृपशार्दूल यः सर्वास्त्रविदुत्तमः ।

महाकीर्तिर्महातेजाः स जज्ञे मनुजेश्वर ।। ७० ।।

नृपश्रेष्ठ राजा जनमेजय! आचार्य द्रोण समस्त धनुर्धर वीरोंमें उत्तम और सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी। वे महान् तेजस्वी थे ।। ७० ।।

धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः ।

वरिष्ठं चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ।। ७१ ।।

वेदवेत्ता विद्वान् द्रोणको धनुर्वेद और वेद दोनोंमें सर्वश्रेष्ठ मानते थे। वे विचित्र कर्म करनेवाले तथा अपने कुलकी मर्यादाको बढ़ानेवाले थे ।। ७१ ।।

महादेवान्तकाभ्यां च कामात् क्रोधाच्च भारत ।

एकत्वमुपपन्नानां जज्ञे शूरः परंतपः ।। ७२ ।।

अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षभयावहः ।

वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिप ।। ७३ ।।

भारत! उनके यहाँ महादेव, यम, काम और क्रोधके सम्मिलित अंशसे शत्रुसंतापी शूरवीर अश्वत्थामाका जन्म हुआ, जो इस पृथ्वीपर महापराक्रमी और शत्रुपक्षका संहारकरनेवाला वीर था। राजन्! उसके नेत्र कमलदलके समान विशाल थे ।। ७२-७३ ।।

जज्ञिरे वसवस्त्वष्टौ गङ्गायां शान्तनोः सुताः ।

वसिष्ठस्य च शापेन नियोगाद् वासवस्य च ।। ७४ ।।

महर्षि वसिष्ठके शाप और इन्द्रके आदेशसे आठों वसु गंगाजीके गर्भसे राजा शान्तनुकेपुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ।। ७४ ।।

तेषामवरजो भीष्मः कुरूणामभयंकरः ।

मतिमान् वेदविद् वाग्मी शत्रुपक्षक्षयंकरः ।। ७५ ।।

उनमें सबसे छोटे भीष्म थे, जिन्होंने कौरववंशको निर्भय बना दिया था। वे परमबुद्धिमान्, वेदवेत्ता, वक्ता तथा शत्रुपक्षका संहार करनेवाले थे ।। ७५ ।।

जामदग्न्येन रामेण सर्वास्त्रविदुषां वरः ।

योऽयुध्यत महातेजा भार्गवेण महात्मना ।। ७६ ।।

सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भीष्मने भृगुवंशी महात्माजमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध किया था ।। ७६ ।।

यस्तु राजन् कृपो नाम ब्रह्मर्षिरभवत् क्षितौ ।

रुद्राणां तु गणाद् विद्धि सम्भूतमतिपौरुषम् ।। ७७ ।।

महाराज! जो कृप नामसे प्रसिद्ध ब्रह्मर्षि इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे, उनका पुरुषार्थअसीम था। उन्हें रुद्रगणके अंशसे उत्पन्न हुआ समझो ।। ७७ ।।

शकुनिर्नाम यस्त्वासीद् राजा लोके महारथः।

द्वापरं विद्धि तं राजन् सम्भूतमरिमर्दनम् ।। ७८ ।।

राजन्! जो इस जगत्में महारथी राजा शकुनिके नामसे विख्यात था, उसे तुम द्वापरकेअंशसे उत्पन्न हुआ मानो। वह शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाला था ।। ७८ ।।

सात्यकिः सत्यसन्धश्च योऽसौ वृष्णिकुलोद्बहः ।

पक्षात् स जज्ञे मरुतां देवानामरिमर्दनः ।। ७९ ।।

वृष्णिवंशका भार वहन करनेवाले जो सत्यप्रतिज्ञ शत्रुमर्दन सात्यकि थे, वे मरुत्-देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ।। ७९ ।।

द्रुपदश्चैव राजर्षिस्तत एवाभवद् गणात् ।

मानुषे नृप लोकेऽस्मिन् सर्वशस्त्रभृतां वरः । ८० ।

राजा जनमेजय! सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजर्षि ट्रुपद भी इस मनुष्यलोकमें उसमरुद्गणसे ही उत्पन्न हुए थे ।। ८० ।।

ततश्च कृतवर्माणं विद्धि राजञ्जनाधिपम् ।

तमप्रतिमकर्माणं क्षत्रियर्षभसत्तमम् ।। ८१ ।।

महाराज! अनुपम कर्म करनेवाले, क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ राजा कृतवर्माको भी तुम मरुद्गणोंसेही उत्पन्न मानो ।। ८१ ।।

मरुतां तु गणाद् विद्धि संजातमरिमर्दनम् ।

विराटं नाम राजानं परराष्ट्रप्रतापनम् ।। ८२ ।।

शत्रुराष्ट्रको संताप देनेवाले शत्रुमर्दन राजा विराटको भी मरुद्गणोंसे ही उत्पन्नसमझो ।। ८२ ।।

अरिष्टायास्तु यः पुत्रो हंस इत्यभिविश्रुतः ।

स गन्धर्वपतिर्ज्ञे कुरुवंशविवर्धनः ।। ८३ ।।

धृतराष्ट्र इति ख्यातः कृष्णद्वैपायनात्मजः ।

दीर्घबाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः ।। ८४ ।।

अरिष्टाका पुत्र जो हंस नामसे विख्यात गन्धर्वराज था, वही कुरुवंशकी वृद्धि करनेवालेव्यासनन्दन धृतराष्ट्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। धृतराष्ट्रकी बाँहें बहुत बड़ी थीं । वे महातेजस्वीनरेश प्रज्ञाचक्षु (अन्धे) थे। वे माताके दोष और महर्षिके क्रोधसे अन्धे ही उत्पन्नहुए ।। ८३-८४।।

मातुर्दोषादृषेः कोपादन्ध एव व्यजायत ।

तस्यैवावरजो भ्राता महासत्त्वो महाबलः ।। ८५ ।।

स पाण्डुरिति विख्यातः सत्यधर्मरतः शुचिः।

अत्रेस्तु सुमहाभागं पुत्रं पुत्रवतां वरम् ।

विदुरं विद्धि तं लोके जातं बुद्धिमतां वरम् ।। ८६ ।।

उन्हींके छोटे भाई महान् शक्तिशाली महाबली पाण्डुके नामसे विख्यात हुए । वे सत्य-धर्ममें तत्पर और पवित्र थे। पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ और बुद्धिमानोंमें उत्तम परम सौभाग्यशालीविदुरको तुम इस लोकमें सूर्यपुत्र धर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ समझो ।। ८५-८६ ।।

कलेरंशस्तु संजज्ञे भुवि दुर्योधनो नृपः ।

दुर्बुद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरूणामयशस्करः ।। ८७ ।।

खोटी बुद्धि और दूषित विचारवाले कुरुकुलकलंक राजा दुर्योधनके रूपमें इस पृथ्वीपरकलिका अंश ही उत्पन्न हुआ था ।। ८७ ।।

जगतो यस्तु सर्वस्य विद्विष्टः कलिपूरुषः ।

यः सर्वां घातयामास पृथिवीं पृथिवीपते ।। ८८ ।।

राजन्! वह कलिस्वरूप पुरुष सबका द्वेषपात्र था। उसने सारी पृथ्वीके वीरोंकोलड़ाकर मरवा दिया था ।। ८८ ।।

उद्दीपितं येन वैरं भूतान्तकरणं महत् ।

पौलस्त्या भ्रातरश्चास्य जज्ञिरे मनुजेष्विह ।। ८९ ।।

उसके द्वारा प्रज्वलित की हुई वैरकी भारी आग असंख्य प्राणियोंके विनाशका कारणबन गयी। पुलस्त्य-कुलके राक्षस भी मनुष्योंमें दुर्योधनके भाइयोंके रूपमें उत्पन्न हुएथे ।। ८९ ।।

शतं दुःशासनादीनां सर्वेषां क्रूरकर्मणाम् ।

दुर्मुखो दुःसहश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ।। ९०।।

दुर्योधनसहायास्ते पौलस्त्या भरतर्षभ ।

वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः ।। ९१ ।।

उसके दुःशासन आदि सौ भाई थे। वे सभी क्रूरतापूर्ण कर्म किया करते थे। दुर्मुख,दुःसह तथा अन्य कौरव जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, दुर्योधनके सहायक थे।भरतश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रके वे सब पुत्र पूर्वजन्मके राक्षस थे। धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु वैश्य-जातीयस्त्रीसे उत्पन्न हुआ था। वह दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके अतिरिक्त था ।। ९०-९१ ।।

जनमेजय उवाच

ज्येष्ठानुज्येष्ठतामेषां नामधेयानि वा विभो ।

धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्येण कीर्तय ।। ९२ ।।

जनमेजयने कहा-प्रभो! धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र थे, उनके नाम मुझे बड़े-छोटेकेक्रमसे एक-एक करके बताइये ।। ९२ ।।

वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा ।

दुःसहो दुःशलश्चैव दुर्मुखश्च तथापरः ।। ९३ ।।

विविंशतिर्विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः ।

विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।। ९४ ।।

दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ।

चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुश्चित्राङ्गदश्च ह । ९५ ।।

दुर्मदो दुष्प्रधर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः ।

ऊर्णनाभः पद्मनाभस्तथा नन्दोपनन्दकौ ।। ९६ ।।

सेनापतिः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ ।

चित्रबाहुश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ।। ९७ ।।

अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्रचापसुकुण्डलौ ।

भीमवेगो भीमबलो बलाकी भीमविक्रमौ ।। ९८ ।।

उग्रायुधो भीमशरः कनकायुर्दृढायुधः ।

दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ।। ९९ ।।

जरासन्धो दृढसन्धः सत्यसन्धः सहस्रवाक् ।

उग्रश्रवा उग्रसेनः क्षेममूर्तिस्तथैव च ।। १०० ।।

अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधनः ।। १०१ ।।

दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ।

आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तानुयायिनौ ।। १०२ ।।

कवची निषङ्गी दण्डी दण्डधारो धनुग्ग्रहः ।

उग्रो भीमरथो वीरो वीरबाहुरलोलुपः ।। १०३ ।।

अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथश्च यः।

अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी दीर्घलोचनः । १०४ ।।

दीर्घबाहुर्महाबाहुव्व्यूढोरुः कनकाङ्गदः ।

कुण्डजश्चित्रकश्चैव दुःशला च शताधिका ।। १०५ ।।

वैशम्पायनजी बोले-राजन्! सुनो-१ दुर्योधन, २ युयुत्सु, ३ दुःशासन, ४ दुःसह, ५दुःशल, ६ दुर्मुख, ७ विविंशति, ८ विकर्ण, ९ जलसन्ध, १० सुलोचन, ११ विन्द, १२अनुविन्द, १३ दुर्धर्ष, १४ सुबाहु, १५ दुष्प्रधर्षण, १६ दुर्मर्षण, १७ दुर्मुख, १८ दुष्कर्ण, १९कर्ण, २० चित्र, २१ उपचित्र, २२ चित्राक्ष, २३ चारु, २४ चित्रांगद, २५ दुर्मद, २६ दुष्प्रधर्ष,२७ विवित्सु, २८ विकट, २९ सम, ३० ऊणनाभ, ३१ पद्मनाभ, ३२ नन्द, ३३ उपनन्द, ३४सेनापति, ३५ सुषेण, ३६ कुण्डोदर, ३७ महोदर, ३८ चित्रबाहु, ३९ चित्रवर्मा, ४० सुवर्मा,४१ दुर्विरोचन, ४२ अयोबाहु, ४३ महाबाहु, ४४ चित्रचाप, ४५ सुकुण्डल, ४६ भीमवेग, ४७भीमबल, ४८ बलाकी, ४९ भीम, ५० विक्रम, ५१ उग्रायुध, ५२ भीमशर, ५३ कनकायु, ५४दृढायुध, ५५ दृढवम्मा, ५६ दृढक्षत्र, ५७ सोमकीर्ति, ५८ अनूदर, ५९ जरासन्ध, ६० दृढसन्ध,६१ सत्यसन्ध, ६२ सहस्रवाक्, ६३ उग्रश्रवा, ६४ उग्रसेन, ६५ क्षेममूर्ति, ६६ अपराजित, ६७पण्डितक, ६८ विशालाक्ष, ६९ दुराधन, ७० दृढहस्त, ७१ सुहस्त , ७२ वातवेग, ७३ सुवर्चा,७४ आदित्यकेतु, ७५ बह्वाशी, ७६ नागदत्त, ७७ अनुयायी, ७८ कवची, ७९ निषंगी, ८०दण्डी, ८१ दण्डधार, ८२ धनुग्ग्रह, ८३ उग्र, ८४ भीमरथ, ८५ वीर, ८६ वीरबाहु, ८७अलोलुप, ८८ अभय, ८९ रौद्रकर्मा, ९० दृढरथ, ९१ अनाधृष्य, ९२ कुण्डभेदी, ९३ विरावी,९४ दीर्घलोचन, ९५ दीर्घबाहु, ९६ महाबाहु, ९७ व्यूढोरु, ९८ कनकांगद, ९९ कुण्डज और१०० चित्रक-ये धृतराष्ट्रके सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामकी एक कन्या थी ।। ९३-१०५ ।।

वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः ।

एतदेकशतं राजन् कन्या चैका प्रकीर्तिता ।। १०६ ।।

धृतराष्ट्रका वह पुत्र जिसका नाम युयुत्सु था, वैश्याके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। वहदुर्योधन आदि सौ पुत्रोंसे अतिरिक्त था। राजन्! इस प्रकार धृतराष्ट्रके एक सौ एक पुत्र तथाएक कन्या बतायी गयी है ।। १०६ ।।

नामधेयानुपूर्व्या च ज्येष्ठानुज्जेष्ठतां विदुः ।

सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ।। १०७ ।।

इनके नामोंका जो क्रम दिया गया है, उसीके अनुसार विद्वान् पुरुष इन्हें जेठा औरछोटा समझते हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र उत्कृष्ट रथी, शूरवीर और युद्धकी कलामें कुशलथे ।। १०७ ।।

सर्वे वेदविदश्चैव राजच्छास्त्रे च पारगाः ।

सर्वे संग्रामविद्यासु विद्याभिजनशोभिनः ।। १०८ ।।

राजन्! वे सब-के-सब वेदवेत्ता, शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्, संग्राम-विद्यामें प्रवीण तथाउत्तम विद्या और उत्तम कुलसे सुशोभित थे ।। १०८ ।।

सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते ।

दुःशलां समये राजन् सिन्धुराजाय कौरवः ।॥ १०९ ।।

जयद्रथाय प्रददौ सौबलानुमते तदा ।

धर्मस्यांशं तु राजानं विद्धि राजन् युधिष्टठिरम् ।। ११० ।।

भूपाल! उन सबका सुयोग्य स्त्रियोंके साथ विवाह हुआ था। महाराज ! कुरुराजदुर्योधनने समय आनेपर शकुनिकी सलाहसे अपनी बहिन दुःशलाका विवाह सिन्धुदेशकेराजा जयद्रथके साथ कर दिया। जनमेजय! राजा युधिष्ठिरको तो तुम धर्मका अंशजानो ।। १०९-११० ।।

भीमसेनं तु वातस्य देवराजस्य चार्जुनम् ।

अश्विनोस्तु तथैवांशौ रूपेणाप्रतिमौ भुवि ।। १११ ।।

नकुलः सहदेवश्च सर्वभूतमनोहरौ ।

यस्तु वर्चा इति ख्यातः सोमपुत्रः प्रतापवान् ।। ११२ ।।

सोऽभिमन्युर्बृहत्कीर्तिर्जुनस्य सुतोsभवत् ।

यस्यावतरणे राजन् सुरान् सोमोऽब्रवीदिदम् ।। ११३ ।।

भीमसेनको वायुका और अर्जुनको देवराज इन्द्रका अंश जानो । रूप -सौन्दर्यकी दृष्टिसेइस पृथ्वीपर जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था, वे समस्त प्राणियोंका मन मोहलेनेवाले नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे। वच्चा नामसे विख्यातजो चन्द्रमाका प्रतापी पुत्र था, वही महायशस्वी अर्जुनकुमार अभिमन्यु हुआ। जनमेजय!उसके अवतार-कालमें चन्द्रमाने देवताओंसे इस प्रकार कहा-।। १११-११३ ।।

नाहं दद्यां प्रियं पुत्रं मम प्राणैर्गरीयसम् ।

समयः क्रियतामेष न शक्यमतिवर्तितुम् ।। ११४ ।।

‘मेरा पुत्र मुझे अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है, अत: मैं इसे अधिक दिनोंके लिये नहींदे सकता। इसलिये मृत्युलोकमें इसके रहनेकी कोई अवधि निश्चित कर दी जाय। फिर उसअवधिका उल्लंघन नहीं किया जा सकता ।। ११४ ।।

सुरकार्यं हि नः कार्यमसुराणां क्षितौ वधः ।

तत्र यास्यत्ययं वर्चा न च स्थास्यति वै चिरम् ।। ११५ ।।’पृथ्वीपर असुरोंका वध करना देवताओंका कार्य है और वह हम सबके लियेकरनेयोग्य है। अत: उस कार्यकी सिद्धिके लिये यह वर्चा भी वहाँ अवश्य जायगा। परंतुदीर्घकालतक वहाँ नहीं रह सकेगा ।। ११५ ।।

ऐन्द्रिर्नरस्तु भविता यस्य नारायणः सखा ।

सोऽर्जुनेत्यभिविख्यातः पाण्डोः पुत्रः प्रतापवान् ।। ११६ ।।’भगवान् नर, जिनके सखा भगवान् नारायण हैं, इन्द्रके अंशसे भूतलमें अवतीर्ण होंगे।वहाँ उनका नाम अर्जुन होगा और वे पाण्डुके प्रतापी पुत्र माने जायँगे ।। ११६ ।।

तस्यायं भविता पुत्रो बालो भुवि महारथः ।

ततः षोडश वर्षाणि स्थास्यत्यमरसत्तमाः ।। ११७ ।।

‘श्रेष्ठ देवगण! पृथ्वीपर यह वर्चा उन्हीं अर्जुनका पुत्र होगा, जो बाल्यावस्थामें हीमहारथी माना जायगा। जन्म लेनेके बाद सोलह वर्षकी अवस्थातक यह वहाँरहेगा ।। ११७ ।।

अस्य षोडशवर्षस्य स संग्रामो भविष्यति ।

यत्रांशा वः करिष्यन्ति कर्म वीरनिषूदनम् ।। ११८ ।।

‘इसके सोलहवें वर्षमें वह महाभारत-युद्ध होगा, जिसमें आपलोगोंके अंशसे उत्पन्न हुएवीर-पुरुष शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अद्भुत पराक्रम कर दिखायेंगे ।। ११८ ।।

नरनारायणाभ्यां तु स संग्रामो विना कृतः ।

चक्रव्यूहं समास्थाय योधयिष्यन्ति वः सुराः ।। ११९ ।।

विमुखाञ्छात्रवान् सर्वान् कारयिष्यति मे सुतः ।

बालः प्रविश्य च व्यूहमभेद्यं विचरिष्यति ।। १२० ।।

‘देवताओ! एक दिन जब कि उस युद्धमें नर और नारायण (अर्जुन और श्रीकृष्ण)उपस्थित न रहेंगे, उस समय शत्रुपक्षके लोग चक्रव्यूहकी रचना करके आप- लोगोंके साथयुद्ध करेंगे। उस युद्धमें मेरा यह पुत्र समस्त शत्रु-सैनिकोंको युद्धसे मार भगायेगा औरबालक होनेपर भी उस अभेद्य व्यूहमें घुसकर निर्भय विचरण करेगा।। ११९-१२० ।।

महारथानां वीराणां कदनं च करिष्यति ।

सर्वेषामेव शत्रूणां चतुर्थांशं नयिष्यति ।। १२१ ।।

दिनार्धेन महाबाहुः प्रेतराजपुरं प्रति ।

ततो महारथैर्वरैः समेत्य बहुशो रणे ।। १२२ ।।

दिनक्षये महाबाहुर्मया भूयः समेष्यति ।

एकं वंशकरं पुत्रं वीरं वै जनयिष्यति ।। १२३ ।।

प्रणष्टं भारतं वंशं स भूयो धारयिष्यति ।

एतत् सोमवचःप्रत्यूचुः सहिताः सर्वे ताराधिपमपूजयन् ।

: श्रुत्वा तथास्त्विति दिवौकसः ।। १२४ ।।

एवं ते कथितं राजंस्तव जन्म पितुः पितु: ।। १२५ ।।

‘तथा बड़े-बड़े महारथी वीरोंका संहार कर डालेगा आधे दिनमें ही महाबाहु अभिमन्युसमस्त शत्रुओंके एक चौथाई भागको यमलोक पहुँचा देगा। तदनन्तर बहुत-से महारथी एकसाथ ही उसपर टूट पड़ेंगे और वह महाबाहु उन सबका सामना करते हुए संध्या होते-होतेपुनः मुझसे आ मिलेगा। वह एक ही वंशप्रवर्तक वीर पुत्रको जन्म देगा, जो नष्ट हुएभरतकुलको पुनः धारण करेगा।’ सोमका यह वचन सुनकर समस्त देवताओंने ‘तथास्तु’कहकर उनकी बात मान ली और सबने चन्द्रमाका पूजन किया। राजा जनमेजय! इसप्रकार मैंने तुम्हारे पिताके पिताका जन्म-रहस्य बताया है ।। १२१-१२५ ।।

अग्नेर्भागं तु विद्धि त्वं धृष्टद्युम्नं महारथम्।

शिखण्डिनमथो राजन् स्त्रीपूर्व विद्धि राक्षसम् ।। १२६ ।।

महाराज! महारथी धृष्टद्युम्नको तुम अग्निका भाग समझो। शिखण्डी राक्षसके अंशसेउत्पन्न हुआ था। वह पहले कन्यारूपमें उत्पन्न होकर पुनः पुरुष हो गया था ।। १२६ ।।

द्रौपदेयाश्च ये पञ्च बभूवुर्भरतर्षभ ।

विश्वान् देवगणान् विद्धि संजातान् भरतर्षभ ।। १२७ ।।

भरतर्षभ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि द्रौपदीके जो पाँच पुत्र थे, उनके रूपमें पाँचविश्वेदेवगण ही प्रकट हुए थे ।। १२७ ।।

प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः श्रुतकीर्तिस्तथापरः ।

नाकुलिस्तु शतानीकः श्रुतसेनश्च वीर्यवान् ।। १२८ ।।

उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, नकुलनन्दनशतानीक तथा पराक्रमी श्रुतसेन ।। १२८ ।।

शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् ।

तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणासदृशी भुवि ।। १२९ ।।

वसुदेवजीके पिताका नाम था शूरसेन। वे यदुवंशके एक श्रेष्ठ पुरुष थे। उनके पृथानामवाली एक कन्या हुई, जिसके समान रूपवती स्त्री इस पृथ्वीपर दूसरी नहींथी ।। १२९ ।।

पितुः स्वस्त्रीयपुत्राय सोऽनपत्याय वीर्यवान् ।

अग्रमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यस्य वै तदा ।। १३० ।।

उग्रसेनके फुफेरे भाई कुन्तिभोज संतानहीन थे। पराक्रमी शूरसेनने पहले कभी उनकेसामने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं अपनी पहली संतान आपको दे दूँगा’ ।। १३० ।।

अग्रजातेति तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षया।

अददात् कुन्तिभोजाय स तां दुहितरं तदा ।। १३१ ।।

तदनन्तर सबसे पहले उनके यहाँ कन्या ही उत्पन्न हुई। शूरसेनने अनुग्रहकी इच्छासेराजा कुन्तिभोजको अपनी वह पुत्री पृथा प्रथम संतान होनेके कारण गोद दे दी ।। १३१ ।।

सा नियुक्ता पितुर्गेहे ब्राह्मणातिथिपूजने ।

उग्रं पर्यचरद् घोरं ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।। १३२ ।।

निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः ।

तमुग्रं शंसितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत् ।। १३३ ।।

पिताके घरपर रहते समय पृथाको ब्राह्मणों और अतिथियोंके स्वागत-सत्कारका कार्यसौंपा गया था। एक दिन उसने कठोर व्रतका पालन करनेवाले भयंकर क्रोधी तथा उग्रप्रकृतिवाले एक ब्राह्मण महर्षिकी, जो धर्मके विषयमें अपने निश्चयको छिपाये रखते थे औरलोग जिन्हें दुर्वासाके नामसे जानते हैं, सेवा की। वे ऊपरसे तो उग्र स्वभावके थे, परंतुउनका हृदय महान् होनेके कारण सबके द्वारा प्रशंसित था। पृथाने पूरा प्रयत्न करके अपनीसेवाओंद्वारा मुनिको संतुष्ट किया ।। १३२-१३३ ।।

तुष्टोऽभिचारसंयुक्तमाचचक्षे यथाविधि ।

उवाच चैनां भगवान् प्रीतोऽस्मि सुभगे तव ।। १३४ ।।

भगवान् दुर्वासाने संतुष्ट होकर पृथाको प्रयोग -विधिसहित एक मन्त्रका विधिपूर्वकउपदेश किया और कहा-‘सुभगे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ।। १३४ ।।

यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।

तस्य तस्य प्रसादात् त्वं देवि पुत्राञ्जनिष्यसि ।। १३५ ।।

‘देवि! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीकेकृपाप्रसादसे पुत्र उत्पन्न करोगी’ ।। १३५ ।।

एवमुक्ता च सा बाला तदा कौतूहलान्विता ।

कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ।। १३६ ।।

दुर्वासाके ऐसा कहनेपर वह सती-साध्वी यशस्विनी बाला यद्यपि अभी कुमारी कन्याथी, तो भी कौतूहलवश उसने भगवान् सूर्यका आवाहन किया।। १३६ ।।

प्रकाशकर्ता भगवांस्तस्यां गर्भं दधौ तदा ।

अजीजनत् सुतं चास्यां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।। १३७ ।।

तब सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश फैलानेवाले भगवान् सूर्यने कुन्तीके उदरमें गर्भ स्थापितकिया और उस गर्भसे एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया, जो समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठथा ।। १३७ ।।

सकुण्डलं सकवचं देवगर्भश्रियान्वितम् ।

दिवाकरसमं दीप्त्या चारुसर्वाङ्गभूषितम् ।। १३८ ।।

वह कुण्डल और कवचके साथ ही प्रकट हुआ था। देवताओंके बालकोंमें जो सहजकान्ति होती है, उसीसे वह सुशोभित था। अपने तेजसे वह सूर्यके समान जान पड़ता था।उसके सभी अंग मनोहर थे, जो उसके सम्पूर्ण शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे ।। १३८ ।।

निगूहमाना जातं वै बन्धुपक्षभयात् तदा।

उत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं यशस्विनम् ।। १३९ ।।

उस समय कुन्तीने पिता-माता आदि बान्धव-पक्षके भयसे उस यशस्वी कुमारकोछिपाकर एक पेटीमें रखकर जलमें छोड़ दिया।। १३९ ।।

तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशाः।

राधायाः कल्पयामास पुत्रं सोऽधिरथस्तदा ।। १४० ।।

जलमें छोड़े हुए उस बालकको राधाके पति महायशस्वी अधिरथ सूतने लेकर राधाकीगोदमें दे दिया और उसे राधाका पुत्र बना लिया ।। १४० ।।

चक्रतुर्नामधेयं च तस्य बालस्य तावुभौ ।

दम्पती वसुषेणेति दिक्षु सर्वासु विश्रुतम् ॥ १४१ ।।

उन दोनों दम्पतिने उस बालकका नाम वसुषेण रखा। वह सम्पूर्ण दिशाओंमें भलीभाँतिविख्यात था ।। १४१ ।।

संवर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेषूत्तमोऽभवत् ।

वेदाङ्गानि च सर्वाणि जजाप जयतां वरः ।। १४२ ।।

बड़ा होनेपर वह बलवान् बालक सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको चलानेकी कलामें उत्तम हुआ।उस विजयी वीरने सम्पूर्ण वेदांगोंका अध्ययन कर लिया ।। १४२ ।।

यस्मिन् काले जपन्नास्ते धीमान् सत्यपराक्रमः ।

नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् तस्मिन् काले महात्मनः ।। १४३ ।।

वसुषेण (कर्ण) बड़ा बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी था। जिस समय वह जपमें लगाहोता, उस समय उस महात्माके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंकेमाँगनेपर न दे डाले ।। १४३ ।।

तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थे भूतभावनः ।

ययाचे कुण्डले वीरं कवचं च सहाङ्गजम् ।। १४४ ।।

भूतभावन इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनके हितके लिये ब्राह्मणका रूप धारण करके वीरकर्णसे दोनों कुण्डल तथा उसके शरीरके साथ ही उत्पन्न हुआ कवच मॉँगा ।। १४४ ।।

उत्कृत्य कणो ह्यददात् कवचं कुण्डले तथा।

शक्तिं शक्रो ददौ तस्मै विस्मितश्चेदमब्रवीत् ।। १४५ ।।

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

यस्मिन् क्षेप्स्यसि दुर्धर्ष स एको न भविष्यति ।। १४६ ।।

कर्णने अपने शरीरमें चिपके हुए कवच और कुण्डलोंको उधेड़कर दे दिया। इन्द्रनेविस्मित होकर कर्णको एक शक्ति प्रदान की और कहा-‘दुर्धर्ष वीर! तुम देवता, असुर,मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंमेंसे जिसपर भी इस शक्तिको चलाओगे, वह एक व्यक्तिनिश्चय ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा’ ।। १४५-१४६ ।।

पुरा नाम च तस्यासीद् वसुषेण इति क्षितौ ।

ततो वैकर्तनः कर्णः कर्मणा तेन सोऽभवत् ।। १४७ ।।

पहले कर्णका नाम इस पृथ्वीपर वसुषेण था। फिर कवच और कुण्डल काटनेके कारणवह वैकर्तन नामसे प्रसिद्ध हुआ ।। १४७ ।।

आमुक्तकवचो वीरो यस्तु जज्ञे महायशाः ।

स कर्ण इति विख्यातः पृथायाः प्रथमः सुतः ।। १४८ ।।

जो महायशस्वी वीर कवच धारण किये हुए ही उत्पन्न हुआ, वह पृथाका प्रथम पुत्रकर्ण नामसे ही सर्वत्र विख्यात था ।। १४८ ।।

स तु सूतकुले वीरो ववृधे राजसत्तम ।

कर्ण नरवरश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।। १४९ ।।

महाराज! वह वीर सूतकुलमें पाला-पोसा जाकर बड़ा हुआ था। नरश्रेष्ठ कर्ण सम्पूर्णशस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ।। १४९ ।।

दुर्योधनस्य सचिवं मित्रं शत्रुविनाशनम् ।

दिवाकरस्य तं विद्धि राजन्नंशमनुत्तमम् ।। १५० ।।

वह दुर्योधनका मन्त्री और मित्र होनेके साथ ही उसके शत्रुओंका नाश करनेवाला था।राजन्! तुम कर्णको साक्षात् सूर्यदेवका सर्वोत्तम अंश जानो ।। १५० ।।

यस्तु नारायणो नाम देवदेवः सनातनः ।

तस्यांशो मानुषेष्वासीद् वासुदेवः प्रतापवान् ।। १५१ ।।

देवताओंके भी देवता जो सनातन पुरुष भगवान् नारायण हैं, उन्हींके अंशस्वरूपप्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए थे ।। १५१ ।।

शेषस्यांशश्च नागस्य बलदेवो महाबलः ।

सनत्कुमारं प्रद्युम्नं विद्धि राजन् महौजसम् ।। १५२ ।।

महाबली बलदेवजी शेषनागके अंश थे। राजन्! महातेजस्वी प्रद्युम्नको तुमसनत्कुमारका अंश जानो ।। १५२ ।।

एवमन्ये मनुष्येन्द्रा बहवोंऽशा दिवौकसाम् ।

जज्ञिरे वसुदेवस्य कुले कुलविवर्धनाः ।। १५३ ।।

इस प्रकार वसुदेवजीके कुलमें बहुत-से दूसरे-दूसरे नरेन्द्र उत्पन्न हुए, जो देवताओंकेअंश थे। वे सभी अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले थे ।। १५३ ।।

गणस्त्वप्सरसां यो वै मया राजन् प्रकीर्तितः ।

तस्य भागः क्षितौ जज्ञे नियोगाद् वासवस्य ह ।। १५४ ।।

महाराज! मैंने अप्सराओंके जिस समुदायका वर्णन किया है, उसका अंश भी इन्द्रकेआदेशसे इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ था ।। १५४ ।।

तानि षोडश देवीनां सहस्राणि नराधिप ।

बभूवुर्मानुषे लोके वासुदेवपरिग्रहः ।। १५५ ।।

नरेश्वर! वे अप्सराएँ मनुष्यलोकमें सोलह हजार देवियोंके रूपमें उत्पन्न हुई थीं, जोसब-की-सब भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियाँ हुईं ।। १५५ ।।

श्रियस्तु भागः संजज्ञे रत्यर्थं पृथिवीतले ।

भीष्मकस्य कुले साध्वी रुक्मिणी नाम नामतः ।। १५६ ।।

नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करनेके लियेभीष्मकके कुलमें सती-साध्वी रुक्मिणीदेवीके नामसे लक्ष्मीजीका ही अंश प्रकट हुआ भूतलपर विदर्भराजथा ।। १५६ ।।

द्रौपदी त्वथ संजज्ञे शचीभागादनिन्दिता ।

द्रुपदस्य कुले कन्या वेदिमध्यादनिन्दिता ।। १५७ ।।

सती-साध्वी द्रौपदी शचीके अंशसे उत्पन्न हुई थी। वह राजा द्रुपदके कुलमें यज्ञकीवेदीके मध्यभागसे एक अनिन्द्य सुन्दरी कुमारी कन्याके रूपमें प्रकट हुई थी ।। १५७ ।।

नातिहस्वा न महती नीलोत्पलसुगन्धिनी ।

पद्मायताक्षी सुश्रोणी स्वसिताञ्चितमूर्धजा ।। १५८ ।।

वह न तो बहुत छोटी थी और न बहुत बड़ी ही। उसके अंगोंसे नीलकमलकी सुगन्धफैलती रहती थी। उसके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर और विशाल थे, नितम्बभाग बड़ाही मनोहर था और उसके काले-काले घुँघराले बालोंका सौन्दर्य भी अद्भुत था ।। १५८ ।।

सर्वलक्षणसम्पूर्णा वैदूर्यमणिसंनिभा ।

पञ्चानां पुरुषेन्द्राणां चित्तप्रमथनी रहः ।। १५९ ।।

वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा वैदूर्य मणिके समान कान्तिमती थी। एकान्तमेंरहकर वह पाँचों पुरुषप्रवर पाण्डवोंके मनको मुग्ध किये रहती थी ।। १५९ ।।

सिद्धिर्धृतिश्च ये देव्यौ पञ्चानां मातरौ तु ते ।

कुन्ती माद्री च जज्ञाते मतिस्तु सुबलात्मजा ।। १६० ।।

सिद्धि और धृति नामवाली जो दो देवियाँ हैं, वे ही पाँचों पाण्डवोंकी दोनों माताओं-कुन्ती और माद्रीके रूपमें उत्पन्न हुई थीं। सुबल-नरेशकी पुत्री गान्धारीके रूपमें साक्षात्मतिदेवी ही प्रकट हुई थीं ।। १६० ।।

इति देवासुराणां ते गन्धर्वाप्सरसां तथा ।

अंशावतरणं राजन् राक्षसानां च कीर्तितम् ।। १६१ ।।

ये पृथिव्यां समुद्भूता राजानो युद्ध दुर्मदाः ।

महात्मानो यदूनां च ये जाता विपुले कुले ।। १६२ ।।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मया ते परिकीर्तिताः ।

धन्यं यशस्यं पुत्रीयमायुष्यं विजयावहम् ।

इदमंशावतरणं श्रोतव्यमनसूयता ।। १६३ ।।

राजन्! इस प्रकार तुम्हें देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा राक्षसोंके अंशोंका अवतरण बताया गया। युद्धमें उन्मत्त रहनेवाले जो-जो राजा इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुए और जो-जो महात्मा क्षत्रिय यादवोंके विशाल कुलमें प्रकट हुए थे, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य जो भी रहे हैं, उन सबके स्वरूपका परिचय मैंने तुम्हें दे दिया है। मनुष्यको चाहिये कि वह दोष-दृष्टिका त्याग करके इस अंशावतरणके प्रसंगको सुने । यह धन, यश, पुत्र, आयु तथा विजयकी प्राप्ति करानेवाला है । १६१- १६३ ।।

अंशावतरणं श्रुत्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् ।

प्रभवाप्ययवित् प्राज्ञो न कृच्छ्रेष्ववसीदति ।। १६४ ।।

देवता, गन्धर्व तथा राक्षसोंके इस अंशावतरणको सुनकर विश्वकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान परमात्माके स्वरूपको जाननेवाला प्राज्ञ पुरुष बड़ी-बड़ी विपत्तियोंमें भी दुःखी नहीं होता ।। १६४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अंशावतरणसमाप्तौ सप्तरषष्टितमोऽध्यायः ।। ६७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अंशावतरणसमाप्तिविषयक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६७ ।।

‘अत्रि’ शब्दसे यहाँ सूर्यको ग्रहण किया गया है। नीलकण्ठने भी यही अर्थ लिया है।

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

राजा दुष्यन्तकी अद्भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी

क्षमताका वर्णन

जनमेजय उवाच

त्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन् देवदानवरक्षसाम् ।

अंशावतरणं सम्यग् गन्धर्वाप्सरसां तथा ।। १ ।।

जनमेजय बोले-ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे देवता, दानव, राक्षस, गन्धर्व तथाअप्सराओंके अंशावतरणका वर्णन अच्छी तरह सुन लिया ।। १ ।।

इमं तु भूय इच्छामि कुरूणां वंशमादितः ।

कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिंगणसंनिधौ ।। २ ।।

विप्रवर! अब इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आपके द्वारा वर्णित कुरुवंशका वृत्तान्त पुनःआदिसे ही सुनना चाहता हूँ ।। २ ।।

वैशम्पायन उवाच

पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान् ।

पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम ।। ३ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-भरतवंशशिरोमणे! पूरुवंशका विस्तार करनेवाले एक राजाहो गये हैं, जिनका नाम था दुष्यन्त । वे महान् पराक्रमी तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समूचीपृथ्वीके पालक थे ।। ३ ।।

चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुङ्क्ते मनुजेश्वरः ।

समुद्रावरणांश्चापि देशान् स समितिंजयः ॥ ४ ।।

आम्लेच्छावधिकान् सर्वान् स भुङ्क्ते रिपुमर्दनः ।

रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान् ।। ५ ।।

राजा दुष्यन्त पृथ्वीके चारों भागोंका तथा समुद्रसे आवृत सम्पूर्ण देशोंका भी पूर्णरूपसेपालन करते थे। उन्होंने अनेक युद्धोंमें विजय पायी थी। रत्नाकर समुद्रतक फैले हुए, चारोंवर्णके लोगोंसे भरे-पूरे तथा म्लेच्छ देशकी सीमासे मिले-जुले सम्पूर्ण भूभागोंका वेशत्रुमर्दन नरेश अकेले ही शासन तथा संरक्षण करते थे ।। ४-५ ।।

न वर्णसंकरकरो न कृष्याकरकृज्जनः ।

न पापकृत् कश्चिदासीत् तस्मिन् राजनि शासति ।। ६ ।।

उस राजाके शासनकालमें कोई मनुष्य वर्णसंकर संतान उत्पन्न नहीं करता था; पृथ्वीबिना जोते-बोये ही अनाज पैदा करती थी और सारी भूमि ही रत्नोंकी खान बनी हुई थी,इसलिये कोई भी खेती करने या रत्नोंकी खानका पता लगानेकी चेष्टा नहीं करता था। पापकरनेवाला तो उस राज्यमें कोई था ही नहीं ।। ६ ।।

धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे ।

तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे ।। ७ ।।

नासीच्चौरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि ।

नासीद् व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे ।। ८ ।।

नरश्रेष्ठ! सभी लोग धर्में अनुराग रखते और उसीका सेवन करते थे। अत: धर्म औरअर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाते थे। तात! राजा दुष्यन्त जब इस देशके शासक थे,उस समय कहीं चोरोंका भय नहीं था। भूखका भय तो नाममात्रको भी नहीं था। इस देशपरदुष्यन्तके शासनकालमें रोग-व्याधिका डर तो बिलकुल ही नहीं रह गया था ।। ७-८ ।।

स्वधर्मे रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पूहाः ।

तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः । ९ ।।

सब वर्णोंके लोग अपने-अपने धर्मके पालनमें रत रहते थे। देवाराधन आदि कर्मोंकोनिष्कामभावसे ही करते थे। राजा दुष्यन्तका आश्रय लेकर समस्त प्रजा निर्भय हो गयीथी ।। ९ ।।

कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च ।

सर्वरत्नसमृद्धा च मही पशुमती तथा ।। १० ।।

मेघ समयपर पानी बरसाता और अनाज रसयुक्त होते थे। पृथ्वी सब प्रकारके रत्नोंसेसम्पन्न तथा पशु-धनसे परिपूर्ण थी ।। १० ।।

स्वकर्मनिरता विप्रा नानृतं तेषु विद्यते ।

स चाद्भूतमहावीर्यों वज्रसंहननो युवा ।। ११ ।।

ब्राह्मण अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें तत्पर थे। उनमें झूठ एवं छल-कपट आदिकाअभाव था। राजा दुष्यन्त स्वयं भी नवयुवक थे। उनका शरीर वज्रके सदृश दृढ था। वेअद्भुत एवं महान् पराक्रमसे सम्पन्न थे ।। ११ ।।

उद्यम्य मन्दरं दोभ्य्यां वहेत् सवनकाननम् ।

चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेषु च ।। १२ ।।

नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च बभूव परिनिष्ठितः ।

बले विष्णुसमश्चासीत् तेजसा भास्करोपमः ।। १३ ।।

वे अपने दोनों हाथोंद्वारा उपवनों और काननोंसहित मन्दराचलको उठाकर ले जानेकीशक्ति रखते थे। गदायुद्धके प्रक्षेपः, विक्षेपः, परिक्षेपः, और अभिक्षेप-इन चारों प्रकारोंमेंकुशल तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें अत्यन्त निपुण थे। घोड़े और हाथीकी पीठपरबैठनेकी कलामें वे अत्यन्त प्रवीण थे। बलमें भगवान् विष्णुके समान और तेजमें भगवान्सूर्यके सदृश थे ।। १२-१३ ।।

अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः ।

सम्मतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् ।। १४ ।।

भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत् ।। १५ ।।

वे समुद्रके समान अक्षोभ्य और पृथ्वीके समान सहनशील थे। महाराज दुष्यन्तकासर्वत्र सम्मान था। उनके नगर तथा राष्ट्रके लोग सदा प्रसन्न रहते थे। वे अत्यन्त धर्मयुक्तभावनासे सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन करते थे ।। १४-१५ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।

१. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना ‘प्रक्षेप’ कहलाता है।

२. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना ‘विक्षेप’ कहागया है।

३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना ‘परिक्षेप’ है।

४. गदाकेअग्रभागसे मारना ‘अभिक्षेप’ कहलाता है।

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना

जनमेजय उवाच

सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः ।

शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। १ ।।

जनमेजय बोले-ब्रह्मन्! में परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथाशकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। १ ।।

दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला ।

तं वै पुरुषसिंहस्य भगवन् विस्तरं त्वहम् ।। २ ।।

भगवन्! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया ? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उसचरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। अतः येसब बातें बताइये ।। २ ।।

वैशम्पायन उवाच

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्वं मतिमतां वर ।

स कदाचिन्महाबाहुः प्रभूतबलवाहनः ।। ३ ।।

वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः ।

बलेन चतुरङ्गेण वृतः परमवल्गुना ।। ४ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिकऔर सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाकेसाथ एक गहन वनकी ओर चले ।। ३-४ ।।

खड्गशक्तिधरैर्वीरैर्गदामुसलपाणिभिः ।

प्रासतोमरहस्तैश्च ययौ योधशतैर्वृतः ।। ५ ।।

जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमेंलिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे ।। ५ ।।

सिंहनादैश्च योधानां शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।

रथनेमिस्वनैश्चैव सनागवरबृंहितैः ।। ६ ।।

नानायुधधरैश्चापि नानावेषधरैस्तथा ।

हेषितस्वनमिश्रैश्च क्ष्वेडितास्फोटितस्वनैः ।। ७ ।।

आसीत् किलकिलाशब्दस्तस्मिन् गच्छति पार्थिवे ।

प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया नृपशोभया ।। ८ ।।

ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् ।

शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ।। ९ ।।

महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकीआवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट,नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुईगर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलकेश्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रहीथीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे।शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी ।। ६- ९ ।|

पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं स्म मेनिरे ।

अयं स पुरुषव्याघ्रो रणे वसुपराक्रमः ।। १० ।।

वहाँ देखती हुई स्त्रियोंने उन्हें वज्रपाणि इन्द्रके समान समझा और आपसमें वे इसप्रकार बातें करने लगीं-‘सखियो! देखो तो सही, ये ही वे पुरुषसिंह महाराज दुष्यन्त हैं,जो संग्रामभूमिमें वसुओंके समान पराक्रम दिखाते हैं, जिनके बाहुबलमें पड़कर शत्रुओंकाअस्तित्व मिट जाता है’ ।। १० ।।

यस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः ।

इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा नराधिपम् । ११ ।।

तुष्टुवुः पुष्पवृष्टीश्च ससृजुस्तस्य मूर्धनि ।

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूयमानः समन्ततः ।। १२ ।।

ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनकेमस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति-प्रशंसा करते थे ।। ११-१२ ।।

निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया ।

तं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम् ।। १३ ।

द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे ।

ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्च जयेन च ।। १४ ।।

इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताकेसाथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपरबैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रसभी वर्णोंके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकीकामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे ।। १३-१४ ।।

सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा।न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह ।। १५ ।।

नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे-पीछे गये फिर महाराजकी आज्ञाहोनेपर लौट आये ।। १५ ।।

सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिपः ।

महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा ।। १६ ।।

स गच्छन् ददृशे धीमान् नन्दनप्रतिमं वनम् ।

बिल्वार्कखदिराकीर्ण कपित्थधवसंकुलम् । १७ ।।

उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशनेघरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान् दुष्यन्तनेएक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली)आदि वृक्षोंसे भरपूर था ।। १६-१७ ।।

विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्च समावृतम् ।

निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम् ।। १८ ।।

पर्वतकी चोटीसे गिरे हुए बहुत-से शिला – खण्ड वहाँ इधर-उधर पड़े थे ऊँची-नीचीभूमिके कारण वह वन बड़ा दुर्गम जान पड़ता था। अनेक योजनतक फैले हुए उस वनमेंकही जल या मनुष्यका पता नहीं चलता था ।। १८ ।।

मृगसिंहैर्वृतं घोरैरन्यैश्वापि वनेचरैः ।

तद् वनं मनुजव्याघ्रः सभृत्यबलवाहनः ।। १९ ।।

लोडयामास दुष्यन्तः सूदयन् विविधान् मृगान् ।

बाणगोचरसम्प्राप्तांस्तत्र व्याघ्रगणान् बहून् ।। २० ।।

पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकैः ।

दूरस्थान् सायकैः कांश्चिदभिनत् स नराधिपः ।। २१ ।।

अभ्याशमागतांश्चान्यान् खड्गेन निरकृन्तत।

कांश्चिदेणान् समाजघ्ने शक्त्या शक्तिमतां वरः ।। २२ ।।

वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भराहुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारकेहिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुएबहुत-से व्याघ्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला।शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायलकिया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिकेपशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया।। १९- २२ ।।

गदामण्डलतत्त्वज्ञश्चचारामितविक्रमः ।

तोमरैरसिभिश्चापि गदामुसलकम्पनैः ।। २३ ।।

चचार स विनिघ्नन् वै स्वैरचारान् वनद्विपान् ।

राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रियैः ।। २४ ।।

लोड्यमानं महारण्यं तत्यजुः स्म मृगाधिपाः ।

तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च ।। २५ ।।

मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्ततः ।

शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिताः।। २६ ।।

व्यायामक्लान्तहृदयाः पतन्ति स्म विचेतसः ।

क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि ।। २७ ।।

असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर,तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करतेहुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अद्भुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेकेकारण मूच्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत पशु धरतीपर गिर पड़े ।। २३-२७ ।।

केचित् तत्र नरव्याघ्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितैः ।

केचिदग्निमरथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचराः ।। २८ ।।

भक्षयन्ति स्म मांसानि प्रकुट्य विधिवत् तदा ।

तत्र केचिद् गजा मत्ता बलिनः शस्त्रविक्षताः ।। २९ ।।

संकोच्याग्रकरान् भीताः प्रद्रवन्ति स्म वेगिताः।

शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु ।। ३० ।।

वहाँ कितने ही व्याघ्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने हीबलवान् और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत- विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे ।। २८-३० ।।

वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान् बहून् ।

तद् वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम् ।

व्यरोचत मृगाकीर्ण राज्ञा हतमृगाधिपम् ।। ३१ ।।

सेबड़े-बड़े जंगली हाथियोंने भी वहाँ भागते समय बहुत-से मनुष्योंको कुचल डाला। वहाँबाणरूपी जलकी धारा बरसानेवाले सैन्यरूपी बादलोंने उस वनरूपी व्योमको सब ओरसेघेर लिया था। महाराज दुष्यन्तने जहाँके सिंहोंको मार डाला था, वह हिंसक पशुओंसे भराहुआ वन बड़ी शोभा पा रहा था ।। ३१ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्यान एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ।। ६९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६९ ।।

सप्ततितमोऽध्यायः

तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा

दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

ततो मृगसहस्राणि हत्वा सबलवाहनः ।

राजा मृगप्रसङ्गेन वनमन्यद् विवेश ह ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! तदनन्तर सेना और सवारियोंके साथ राजादुष्यन्तने सहस्रों हिंसक पशुओंका वध करके एक हिंसक पशुका ही पीछा करते हुए दूसरेवनमें प्रवेश किया ।। १ ।।

एक एवोत्तमबलः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः ।

स वनस्यान्तमासाद्य महच्छून्यं समासदत् ।। २ ।।

उस समय उत्तम बलसे युक्त महाराज दुष्यन्त अकेले ही थे तथा भूख, प्यास औरथकावटसे शिथिल हो रहे थे। उस वनके दूसरे छोरमें पहुँचनेपर उन्हें एक बहुत बड़ा ऊसरमैदान मिला, जहाँ वृक्ष आदि नहीं थे ।। २ ।।

तच्चाप्यतीत्य नृपतिरुत्तमाश्रमसंयुतम् ।

मनःप्रह्लादजननं दृष्टिकान्तमतीव च ।। ३ ।।

शीतमारुतसंयुक्तं जगामान्यन्महद् वनम् ।

पुष्पितैः पादपैः कीर्णमतीव सुखशाद्वलम् ।। ४ ।।

उस वृक्षशून्य ऊसर भूमिको लाँघकर महाराज दुष्यन्त दूसरे विशालवनमें जा पहुँचे, जोअनेक उत्तम आश्रमोंसे सुशोभित था । देखनेमें अत्यन्त सुन्दर होनेके साथ ही वह मनमेंअद्भुत आनन्दोल्लासकी सृष्टि कर रहा था। उस वनमें शीतल वायु चल रही थी। वहाँकेवृक्ष फूलोंसे भरे थे और वनमें सब ओर व्याप्त हो उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । वहाँ अत्यन्तसुखद हरी-हरी कोमल घास उगी हुई थी ।। ३- ४ ।।

विपुलं मधुरारावैन्नादितं विहगैस्तथा।

पुंस्कोकिलनिनादैश्च झिल्लीकगणनादितम् ।। ५ ।।

वह वन बहुत बड़ा था और मीठी बोली बोलनेवाले विविध विहंगमोंके कलरवोंसे गूँजरहा था। उसमें कहीं कोकिलोंकी कुहू-कुहू सुन पड़ती थी तो कहीं झींगुरोंकी झीनी झनकारगूँज रही थी ।। ५ ।।

प्रवृद्धविटपैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम् ।

षट्पदाघूर्णिततलं लक्ष्म्या परमया युतम् ।। ६ ।।

वहाँ सब ओर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले विशाल वृक्ष अपनी सुखद शीतल छाया कियेहुए थे और उन वृक्षोंके नीचे सब ओर भ्रमर मँड़रा रहे थे। इस प्रकार वहाँ सर्वत्र बड़ी भारीशोभा छा रही थी ।। ६ ।।

नापुष्पः पादपः कश्चिन्नाफलो नापि कण्टकी ।

षट्पदैन्नाप्यपाकीर्णस्तस्मिन् वै काननेऽभवत् ।। ७ ।।

उस वनमें एक भी वृक्ष ऐसा नहीं था, जिसमें फूल और फल न लगे हों तथा भौरे न बैठेहों। काँटेदार वृक्ष तो वहाँ ढूँढ़नेपर भी नहीं मिलता था ।। ७ ।।

विहगैर्नादितं पुष्पैरलंकृतमतीव च ।

सर्वर्तुकुसुमैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम् ।। ८ ।।

सब ओर अनेकानेक पक्षी चहक रहे थे। भाँति-भाँतिके पुष्प उस वनकी अत्यन्त शोभाबढ़ा रहे थे। सभी ऋतुओंमें फूल देनेवाले सुखद छायायुक्त वृक्ष वहाँ चारों ओर फैले हुएथे ।। ८ ।।

मनोरमं महेष्वासो विवेश वनमुक्तमम् ।

मारुताकलितास्तत्र द्रुमाः कुसुमशाखिनः ।। ९ ।।

पुष्पवृष्टिं विचित्रां तु व्यसृजंस्ते पुनः पुनः ।

दिवःस्पृशोऽथ संघुष्टाः पक्षिभिर्मधुरस्वनैः ।। १० ।।

महान् धनुर्धर राजा दुष्यन्तने इस प्रकार मनको मोह लेनेवाले उस उत्तम वनमें प्रवेशकिया। उस समय फूलोंसे भरी हुई डालियोंवाले वृक्ष वायुके झकोरोंसे हिल-हिलकर उनकेऊपर बार-बार अद्भुत पुष्प-वर्षा करने लगे। वे वृक्ष इतने ऊँचे थे, मानो आकाशको छूलेंगे। उनपर बैठे हुए मीठी बोली बोलनेवाले पक्षियोंके मधुर शब्द वहाँ गूँज रहे थे ।। ९ -१० ।।

विरेजुः पादपास्तत्र विचित्रकुसुमाम्बराः ।

तेषां तत्र प्रवालेषु पुष्पभारावनामिषु ।। ११ ।।

रुवन्ति रावान् मधुरान् षट्पदा मधुलिप्सवः।

तत्र प्रदेशांश्च बहून् कुसुमोत्करमण्डितान् ।। १२ ।।

लतागृहपरिक्षिप्तान् मनसः प्रीतिवर्धनान् ।

सम्पश्यन् सुमहातेजा बभूव मुदितस्तदा ।। १३ ।।

उस वनमें पुष्परूपी विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले वृक्ष अद्भुत शोभा पा रहे थे ।फूलोंके भारसे झुके हुए उनके कोमल पल्लवोंपर बैठे हुए मधुलोभी भ्रमर मधुर गुंजार कररहे थे। राजा दुष्यन्तने वहाँ बहुत-से ऐसे रमणीय प्रदेश देखे जो फूलोंके ढेरसे सुशोभिततथा लतामण्डपोंसे अलंकृत थे। मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले उन मनोहर प्रदेशोंकाअवलोकन करके उस समय महातेजस्वी राजाको बड़ा हर्ष हुआ ।। ११-१३ ।।

परस्पराश्लिष्टशाखैः पादपैः कुसुमान्वितैः ।

अशोभत वनं तत् तु महेन्द्रध्वजसंनिभैः ।। १४ ।।

फूलोंसे लदे हुए वृक्ष एक-दूसरेसे अपनी डालियोंको सटाकर मानो गले मिल रहे थे। वेगगनचुम्बी वृक्ष इन्द्रकी ध्वजाके समान जान पड़ते थे और उनके कारण उस वनकी बड़ीशोभा हो रही थी ।। १४ ।।

सिद्धचारणसंघैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः ।

सेवितं वनमत्यर्थं मत्तवानरकिन्नरम् ।। १५ ।।

सिद्ध-चारणसमुदाय तथा गन्धर्व और अप्सराओंके समूह भी उस वनका अत्यन्तसेवन करते थे। वहाँ मतवाले वानर और किन्नर निवास करते थे ।। १५ ।।

सुखः शीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः ।

परिक्रामन् वने वृक्षानुपैतीव रिरंसया ।। १६ ।।

उस वनमें शीतल, सुगन्ध, सुखदायिनी मन्द वायु फूलोंके पराग वहन करती हुई मानोरमणकी इच्छासे बार-बार वृक्षोंके समीप आती थी।। १६ ।।

एवंगुणसमायुक्तं ददर्श स वनं नृपः ।

नदीकच्छोद्भवं कान्तमुच्छ्रितध्वजसंनिभम् ।। १७ ।।

वह वन मालिनी नदीके कछारमें फैला हुआ था और ऊँची ध्वजाओंके समान ऊँचेवृक्षोंसे भरा होनेके कारण अत्यन्त मनोहर जान पड़ता था। राजाने इस प्रकार उत्तम गुणोंसेयुक्त उस वनका भलीभाँति अवलोकन किया।। १७ ।।

प्रेक्षमाणो वनं तत् तु सुप्रहृष्टविहङ्गमम् ।

आश्रमप्रवरं रम्यं ददर्श च मनोरमम् ।। १८ ।।

इस प्रकार राजा अभी वनकी शोभा देख ही रहे थे कि उनकी दृष्टि एक उत्तमआश्रमपर पड़ी, जो अत्यन्त रमणीय और मनोरम था। वहाँ बहुत-से पक्षी हर्षोल्लासमेंभरकर चहक रहे थे ।। १८ ।।

नानावृक्षसमाकीर्ण सम्प्रज्वलितपावकम् ।

तं तदाप्रतिमं श्रीमानाश्रमं प्रत्यपूजयत् ।। १९ ।।

नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरपूर उस वनमें स्थान- स्थानपर अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलितहो रही थी। इस प्रकार उस अनुपम आश्रमका श्रीमान् दुष्यन्त नरेशने मन-ही-मन बड़ासम्मान किया ।। १९ ।।

यतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणान्वितम् ।

अग्न्यगारैश्च बहुभिः पुष्पसंस्तरसंस्तृतम् ।। २० ।।

वहाँ बहुत-से त्यागी विरागी यति, बालखिल्य ऋषि तथा अन्य मुनिगण निवास करतेथे। अनेकानेक अग्निहोत्रगृह उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे । वहाँ इतने फूल झड़कर गिरेथे कि उनके बिछौने-से बिछ गये थे ।। २० ।।

महाकच्छैर्बृहद्भिश्च विभ्राजितमतीव च ।

मालिनीमभितो राजन् नदीं पुण्यां सुखोदकाम् । । २१ ।।

बड़े-बड़े तूनके वृक्षोंसे उस आश्रमकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। राजन्! बीचमेंपुण्यसलिला मालिनी नदी बहती थी, जिसका जल बड़ा ही सुखद एवं स्वादिष्ट था। उसकेदोनों तटोंपर वह आश्रम फैला हुआ था ।। २१

नैकपक्षिगणाकीर्णां तपोवनमनोरमाम् ।

तत्र व्यालमृगान् सौम्यान् पश्यन् प्रीतिमवाप सः ।। २२ ।।

मालिनीमें अनेक प्रकारके जलपक्षी निवास करते थे तथा तटवर्ती तपोवनके कारणउसकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। वहाँ विषधर सर्प और हिंसक वनजन्तु भी सौम्यभाव(हिंसाशून्य कोमलवृत्ति)-से रहते थे। यह सब देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ।। २२ ।।

तं चाप्रतिरथः श्रीमानाश्रमं प्रत्यपद्यत ।

देवलोकप्रतीकाशं सर्वतः सुमनोहरम् ।। २३ ।।

श्रीमान् दुष्यन्त नरेश अप्रतिरथ वीर थे-उस समय उनकी समानता करनेवालाभूमण्डलमें दूसरा कोई रथी योद्धा नहीं था। वे उक्त आश्रमके समीप जा पहुँचे, जोदेवताओंके लोक-सा प्रतीत होता था। वह आश्रम सब ओरसे अत्यन्त मनोहर था ।। २३ ।।

नदीं चाश्रमसंश्लिष्टां पुण्यतोयां ददर्श सः ।

सर्वप्राणभृतां तत्र जननीमिव धिष्ठिताम् ।। २४ ।।

राजाने आश्रमसे सटकर बहनेवाली पुण्यसलिला मालिनी नदीकी ओर भी दृष्टिपातकिया; जो वहाँ समस्त प्राणियोंकी जननी-सी विराज रही थी ।। २४ ।।

सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम् ।

सकिन्नरगणावासां वानरक्क्षनिषेविताम् ।। २५ ।।

उसके तटपर चकवा-चकई किलोल कर रहे थे। नदीके जलमें बहुत-से फूल इस प्रकारबह रहे थे, मानो फेन हों। उसके तटप्रान्तमें किन्नरोंके निवास-स्थान थे। वानर और रीछ भीउस नदीका सेवन करते थे ।। २५ ।।

पुण्यस्वाध्यायसंघुष्टां पुलिनैरुपशोभिताम् ।

मत्तवारणशार्दूलभुजगेन्द्रनिषेविताम् ।। २६ ।।

अनेक सुन्दर पुलिन मालिनीकी शोभा बढ़ा रहे थे। वेद-शास्त्रोंके पवित्र स्वाध्यायकीध्वनिसे उस सरिताका निकटवर्ती प्रदेश गूँज रहा था। मतवाले हाथी, सिंह और बड़े-बड़ेसर्प भी मालिनीके तटका आश्रय लेकर रहते थे ।। २६ ।।

तस्यास्तीरे भगवतः काश्यपस्य महात्मनः ।

आश्रमप्रवरं रम्यं महर्षिगणसेवितम् ।। २७ ।।

उसके तटपर ही कश्यपगोत्रीय महात्मा कण्वका वह उत्तम एवं रमणीय आश्रम था।वहाँ महर्षियोंके समुदाय निवास करते थे ।। २७ ।।

नदीमाश्रमसम्बद्धां दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं तथा ।

चकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा ।। २८ ।।

उस मनोहर आश्रम और आश्रमसे सटी हुई नदीको देखकर राजाने उस समय उसमेंप्रवेश करनेका विचार किया ।। २८ ।।

अलंकृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरया ।

नरनारायणस्थानं गङ्गयेवोपशोभितम् ।। २९ ।।

टापुओंसे युक्त तथा सुरम्य तटवाली मालिनी नदीसे सुशोभित वह आश्रम गंगा नदीसेशोभायमान भगवान् नर-नारायणके आश्रम-सा जान पड़ता था ।। २९ ।।

मत्तबर्हिणसंघुष्टं प्रविवेश महद् वनम् ।

तत् स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरर्षभः ।। ३० ।।

अतीवगुणसम्पन्नमनिर्देश्यं च वर्चसा ।

महर्षि काश्यपं द्रष्टुमथ कण्वं तपोधनम् ।। ३१ ।।

ध्वजिनीमश्वसम्बाधां पदातिगजसंकुलाम् ।

अवस्थाप्य वनद्वारि सेनामिदमुवाच सः ।। ३२ ।।

तदनन्तर नरश्रेष्ठ दुष्यन्तने अत्यन्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न कश्यपगोत्रीय महर्षि तपोधनकण्वका, जिनके तेजका वाणीद्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता था, दर्शन करनेके लियेकुबेरके चैत्ररथवनके समान मनोहर उस महान् वनमें प्रवेश किया, जहाँ मतवाले मयूरअपनी केकाध्वनि फैला रहे थे। वहाँ पहुँचकर नरेशने रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरीहुई अपनी चतुरंगिणी सेनाको उस तपोवनके किनारे ठहरा दिया और कहा- || ३० -३२ ।।

मुनिं विरजसं द्रष्टुं गमिष्यामि तपोधनम् ।

काश्यपं स्थीयतामत्र यावदागमनं मम ।। ३३ ।।

‘सेनापति! और सैनिको! मैं रजोगुणरहित तपस्वी महर्षि कश्यपनन्दन कण्वका दर्शनकरनेके लिये उनके आश्रममें जाऊँगा। जबतक मैं वहाँसे लौट न आऊँ, तबतक तुमलोगयहीं ठहरो’ ।। ३३ ।।

तद् वनं नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वरः ।

क्षुत्पिपासे जहाँ राजा मुर्दं चावाप पुष्कलाम् ।। ३४ ।।

इस प्रकार आदेश दे नरेश्वर दुष्यन्तने नन्दनवनके समान सुशोभित उस तपोवनमेंपहुँचकर भूख-प्यासको भुला दिया। वहाँ उन्हें बड़ा आनन्द मिला ।। ३४ ।।

सामात्यो राजलिङ्गानि सोऽपनीय नराधिपः ।

पुरोहितसहायश्च जगामाश्रममुक्तमम् ।। ३५ ।।

वे नरेश मुकुट आदि राजचिह्नोंको हटाकर साधारण वेश-भूषामें मन्त्रियों औरपुरोहितके साथ उस उत्तम आश्रमके भीतर गये।। ३५ ।।

दिदृक्षुस्तत्र तमृषिं तपोराशिमथाव्ययम् ।

ब्रह्मलोकप्रतीकाशमाश्रमं सोऽभिवीक्ष्य ह ।

षट्पदोदगीतसंघुष्टं नानाद्विजगणायुतम् ।। ३६ ।।

वहाँ ये तपस्याके भण्डार अविकारी महर्षि कण्वका दर्शन करना चाहते थे। राजाने उसआश्रमको देखा, मानो दूसरा ब्रह्मलोक हो। नाना प्रकारके पक्षी वहाँ कलरव कर रहे थे।भ्रमरोंके गुंजनसे सारा आश्रम गूँज रहा था ।। ३६ ।।

ऋचो बहुचमुख्यैश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमैः ।

शुश्राव मनुजव्याघ्रो विततेष्विह कर्मसु ।। ३७ ।।

श्रेष्ठ ऋग्वेदी ब्राह्मण पद और क्रमपूर्वक ऋचाओंका पाठ कर रहे थे। नरश्रेष्ठ दुष्यन्तनेअनेक प्रकारके यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें पढ़ी जाती हुई वैदिक ऋचाओंको सुना ।। ३७ ।।

यज्ञविद्याङ्गविद्धिश्च यजुर्विद्धिश्च शोभितम् ।

मधुरैः सामगीतैश्च ऋषिभिर्नियतव्रतैः ।। ३८ ।।

भारुण्डसामगीताभिरथर्वशिरसोद्गतैः ।

यतात्मभिः सुनियतैः शुशुभे स तदाश्रमः ।। ३९ ।।

यज्ञविद्या और उसके अंगोंकी जानकारी रखनेवाले यजुर्वेदी विद्वान् भी आश्रमकीशोभा बढ़ा रहे थे। नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले सामवेदी महर्षियोंद्वारा वहाँमधुरस्वरसे सामवेदका गान किया जा रहा था। मनको संयममें रखकर नियमपूर्वक उत्तमव्रतका पालन करनेवाले सामवेदी और अथर्ववेदी महर्षि भारुण्डसंज्ञक साममन्त्रोंके गीतगाते और अथर्ववेदके मन्त्रोंका उच्चारण करते थे; जिससे उस आश्रमकी बड़ी शोभा होतीथी ।। ३८-३९ ।।

अथर्ववेदप्रवराः पूगरयज्ञियसामगाः ।

संहितामीरयन्ति स्म पदक्रमयुतां तु ते ।। ४० ।।

श्रेष्ठ अथर्ववेदीय विद्वान् तथा पूगयज्ञिय नामक सामके गायक सामवेदी महर्षि पदऔर क्रमसहित अपनी-अपनी संहिताका पाठ करते थे ।। ४० ।।

शब्दसंस्कारसंयुक्तैर्ब्रुवद्धिश्चापरैर्द्विजैः ।

नादितः स बभौ श्रीमान् ब्रह्मलोक इवापरः ।। ४१ ।।

दूसरे द्विजबालक शब्द-संस्कारसे सम्पन्न थे– वे स्थान, करण और प्रयत्नका ध्यानरखते हुए संस्कृतवाक्योंका उच्चारण कर रहे थे। इन सबके तुमुल शब्दोंसे गूँजता हुआ वहसुन्दर आश्रम द्वितीय ब्रह्मलोकके समान सुशोभित होता था ।। ४१ ।।

यज्ञसंस्तरविद्धिश्च क्रमशिक्षाविशारदैः ।

न्यायतत्त्वात्मविज्ञानसम्पन्नैर्वेदपारगैः ।। ४२ ।।

नानावाक्यसमाहारसमवायविशारदैः ।

विशेषकार्यविद्धिश्च मोक्षधर्मपरायणैः ।। ४३ ।।

स्थापनाक्षेपसिद्धान्तपरमार्थज्ञतां गतैः ।

शब्दच्छन्दोनिरुक्तज्ञैः कालज्ञानविशारदैः ।। ४४ ।।

द्रव्यकर्मगुणज्ञैश्च कार्यकारणवेदिभिः ।

पक्षिवानररुतज्ञैश्च व्यासग्रन्थसमाश्रितैः ॥ ४५ ।।

नानाशास्त्रेषु मुख्यैश्च शुश्राव स्वनमीरितम् ।

लोकायतिकमुख्यैश्च समन्तादनुनादितम् ।। ४६ ।।

यज्ञवेदीकी रचनाके ज्ञाता, क्रम और शिक्षामें कुशल, न्यायके त्त्व और आत्मानुभवसेसम्पन्न, वेदोंके पारंगत, परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले अनेक वाक्योंकी एकवाक्यताकरनेमें कुशल तथा विभिन्न शाखाओंकी गुणविधियोंका एक शाखामें उपसंहार करनेकीकलामें निपुण, उपासना आदि विशेषकार्योंके ज्ञाता, मोक्षधर्ममें तत्पर, अपने सिद्धान्तकीस्थापना करके उसमें शंका उठाकर उसके परिहारपूर्वक उस सिद्धान्तके समर्थनमें परमप्रवीण, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष तथा शिक्षा और कल्प-वेदके इन छहों अंगोंकेविद्वान्, पदार्थ, शुभाशुभ कर्म, सत्त्व, रज, तम आदि गुणोंको जाननेवाले तथा कार्य(दृश्यवर्ग) और कारण (मूल प्रकृति)- के ज्ञाता, पशु-पक्षियोंकी बोली समझनेवाले,व्यासग्रन्थका आश्रय लेकर मन्त्रोंकी व्याख्या करनेवाले तथा विभिन्न शास्त्रोंके प्रमुखविद्वान् वहाँ रहकर जो शब्दोच्चारण कर रहे थे, उन सबको राजा दुष्यन्तने सुना। कुछलोकरंजन करनेवाले लोगोंकी बातें भी उस आश्रममें चारों ओर सुनायी पड़ती थीं।। ४२-४६ ।।

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रान् नियतान् संशितव्रतान् ।

जपहोमपरान् विप्रान् ददर्श परवीरहा ।। ४७ ।।

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुष्यन्तने स्थान-स्थानपर नियमपूर्वक उत्तम एवं कठोरव्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ एवं बुद्धिमान् ब्राह्मणोंको जप और होममें लगे हुएदेखा ।। ४७ ।।

आसनानि विचित्राणि रुचिराणि महीपतिः ।

प्रयत्नोपहितानि स्म दृष्ट्वा विस्मयमागमत् ।। ४८ ।।

वहाँ प्रयत्नपूर्वक तैयार किये हुए बहुत सुन्दर एवं विचित्र आसन देखकर राजाको बड़ाआश्चर्य हुआ ।। ४८ ।।

देवतायतनानां च प्रेक्ष्य पूजां कृतां द्विजैः ।

ब्रह्मलोकस्थमात्मानं मेने स नृपसत्तमः ।। ४९ ।।

द्विजोंद्वारा की हुई देवालयोंकी पूजा-पद्धति देखकर नृपश्रेष्ठ दुष्यन्तने ऐसा समझा किमैं ब्रह्मलोकमें आ पहुँचा हूँ ।। ४९ ।।

स काश्यपतपोगुप्तमाश्रमप्रवरं शुभम्।

नातृप्यत् प्रेक्षमाणो वै तपोवनगुणैर्युतम् ।। ५० ।।

वह श्रेष्ठ एवं शुभ आश्रम कश्यपनन्दन महर्षि कण्वकी तपस्यासे सुरक्षित तथातपोवनके उत्तम गुणोंसे संयुक्त था। राजा उसे देखकर तृप्त नहीं होते थे ।। ५० ।।

स काश्यपस्यायतनं महाव्रतै-र्वृतं समन्तादृषिभिस्तपोधनैः ।

विवेश सामात्यपुरोहितोऽरिहा विविक्तमत्यर्थमनोहरं शुभम् ।। ५१ ।।

महर्षि कण्वका वह आश्रम, जिसमें वे स्वयं रहते थे, सब ओरसे महान् व्रतका पालनकरनेवाले तपस्वी महर्षियोंद्वारा घिरा हुआ था। वह अत्यन्त मनोहर, मंगलमय और एकान्तस्थान था। शत्रुनाशक राजा दुष्यन्तने मन्त्री और पुरोहितके साथ उसकी सीमामें प्रवेशकिया ।। ५१ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने सप्ततितमोऽध्यायः।। ७० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।

एकसप्ततितमोऽध्यायः

राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाकेद्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमेंविश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना।

वैशम्पायन उवाच

ततोऽगच्छन्महाबाहुरेकोऽमात्यान् विसृज्य तान् ।

नापश्यच्चाश्रमे तस्मिंस्तमृषिं संशितव्रतम् ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! तदनन्तर महाबाहु राजा दुष्यन्त साथ आये हुएअपने उन मन्त्रियोंको भी बाहर छोड़कर अकेले ही उस आश्रममें गये, किंतु वहाँ कठोरव्रतका पालन करनेवाले महर्षि नहीं दिखायी दिये ।। १ ।।

सोऽपश्यमानस्तमृषिं शून्यं दृष्ट्वा तथाऽ5श्रमम् ।

उवाच क इहेत्युच्चैर्वनं संनादयन्निव ।। २ ।।

महर्षि कण्वको न देखकर और आश्रमको सूना पाकर राजाने सम्पूर्ण वनकोप्रतिध्वनित करते हुए-से पूछा-‘यहाँ कौन है?’ ।। २ ।।

श्रुत्वाथ तस्य तं शब्दं कन्या श्रीरिव रूपिणी ।

निश्चक्रामाश्रमात् तस्मात् तापसीवेषधारिणी ।। ३ ॥

दुष्यन्तके उस शब्दको सुनकर एक मूर्तिमती लक्ष्मी-सी सुन्दरी कन्या तापसीका वेषधारण किये आश्रमके भीतरसे निकली ।। ३ ।।

(सुव्रताभ्यागतं तं तु पूज्यं प्राप्तमथेश्वरम् ।

रूपयौवनसम्पन्ना शीलाचारवती शुभा ।

सा तमायतपद्माक्षं व्यूढोरस्कं सुसंहतम् ।।

सिंहस्कन्धं दीर्घबाहुं सर्वलक्षणपूजितम् ।

विस्पष्टं मधुरां वाचं साब्रवीज्जनमेजय ।)

सा तं दृष्ट्वैव राजानं दुष्यन्तमसितेक्षणा ।

स्वागतं त इति क्षिप्रमुवाच प्रतिपूज्य च ।। ४ ।।

जनमेजय! उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह सुन्दरी कन्या रूप, यौवन, शील औरसदाचारसे सम्पन्न थी। राजा दुष्यन्तके विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुशोभितथे। उनकी छाती चौड़ी, शरीरकी गठन सुन्दर, कंधे सिंहके सदृश और भुजाएँ लंबी थीं। वेसमस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित थे। श्याम नेत्रोंवाली उस शुभलक्षणा कन्याने सम्मान्यराजा दुष्यन्तको देखते ही मधुर वाणीमें उनके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित करते हुएशीघ्रतापूर्वक स्पष्ट शब्दोंमें कहा-‘अतिथिदेव! आपका स्वागत है’ ।। ४ ।।

आसनेनाचयित्वा च पाद्येनाघ्य्येण चैव हि ।

पप्रच्छानामयं राजन् कुशलं च नराधिपम् ।। ५ ।।

महाराज! फिर आसन, पाद्य और अर्घ्य अर्पण करके उनका समादर करनेके पश्चात्उसने राजासे पूछा-‘आपका शरीर नीरोग है न? घरपर कुशल तो है?’ ।। ५ ।।

यथावदर्चयित्वाथ पृष्ट्वा चानामयं तदा ।

उवाच स्मयमानेव किं कार्यं क्रियतामिति ।। ६ ।।

उस समय विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके आरोग्य और कुशल पूछकर वह तपस्विनीकन्या मुसकराती हुई-सी बोली-‘कहिये आपकी क्या सेवा की जाय?’ ।। ६ ।।

(आश्रमस्याभिगमने किं त्वं कार्यं चिकीर्षसि ।

कस्त्वमद्येह सम्प्राप्तो महर्षेराश्रमं शुभम् ।।

‘आपके आश्रमकी ओर पधारनेका क्या कारण है? आप यहाँ कौन-सा कार्य सिद्धकरना चाहते हैं? आपका परिचय क्या है? आप कौन हैं? और आज यहाँ महर्षिके इस शुभआश्रमपर (किस उद्देश्यसे) आये हैं?’

तामब्रवीत् ततो राजा कन्यां मधुरभाषिणीम् ।

दृष्ट्वा चैवानवद्याङ्गीं यथावत् प्रतिपूजितः ॥ ७ ।।

उसके द्वारा विधिवत् किये हुए आतिथ्य सत्कारको ग्रहण करके राजाने उससर्वांगसुन्दरी एवं मधुरभाषिणी कन्याकी ओर देखकर कहा ।। ७ ।।

दुष्यन्त उवाच

(राजर्षेरस्मि पुत्रोऽहमिलिलस्य महात्मनः ।

दुष्यन्त इति मे नाम सत्यं पुष्करलोचने ।।)

आगतोऽहं महाभागमृषिं कण्वमुपासितुम् ।

क्व गतो भगवान् भद्रे तन्ममाचक्ष्व शोभने ।। ८ ।।

दुष्यन्त बोले-कमललोचने! मैं राजर्षि महात्मा इलिल* का पुत्र हूँ और मेरा नामदुष्यन्त है। मैं यह सत्य कहता हूँ। भद्रे! मैं परम भाग्यशाली महर्षि कण्वकी उपासना करने-उनके सत्संगका लाभ लेनेके लिये आया हूँ। शोभने! बताओ तो, भगवान् कण्व कहाँगये हैं? ।। ८ ।।

शकुन्तलोवाच

गतः पिता मे भगवान् फलान्याहर्तुमाश्रमात् ।

मुहूर्त सम्प्रतीक्षस्व द्रष्टास्येनमुपागतम् ।। ९ ।।

शकुन्तला बोली-अभ्यागत! मेरे पूज्य पिताजी फल लानेके लिये आश्रमसे बाहर गये हैं। अतः दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। लौटनेपर उनसे मिलियेगा ।। ९ ।।

वैशम्पायन उवाच अपश्यमानस्तमृषिं तथा चोक्तस्तया च सः ।

तां दृष्ट्वा च वरारोहां श्रीमतीं चारुहासिनीम् ।। १० ।।

विभ्राजमानां वपुषा तपसा च दमेन च ।

रूपयौवनसम्पन्नामित्युवाच महीपतिः ।। ११ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा दुष्यन्तने देखा – महर्षि कण्व आश्रमपर नहीं हैं और वह तापसी कन्या उन्हें वहाँ ठहरनेके लिये कह रही है; साथ ही उनकी दृष्टि इस बातकी ओर भी गयी कि यह कन्या सर्वांगसुन्दरी, अपूर्व शोभासे सम्पन्न तथा मनोहर मुसकानसे सुशोभित है। इसका शरीर सौन्दर्यकी प्रभासे प्रकाशित हो रहा है, तपस्या तथा मन-इन्द्रियोंके संयमने इसमें अपूर्व तेज भर दिया है। यह अनुपम रूप और नयी जवानीसे उद्भासित हो रही है, यह सब सोचकर राजाने पूछा- ।। १० ११ ।।

का त्वं कस्यासि सुश्रोणि किमर्थं चागता वनम् ।

एवंरूपगुणोपेता कुतस्त्वमसि शोभने ।। १२ ।।

‘मनोहर कटिप्रदेशसे सुशोभित सुन्दरी! तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो? और किसलिये इस वनमें आयी हो? शोभने! तुममें ऐसे अद्भुत रूप और गुणोंका विकास कैसे हुआ है? ।। १२ ।।

दर्शनादेव हि शुभे त्वया मेऽपहृतं मनः ।

इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने ।। १३ ।।

‘शुभे! तुमने दर्शनमात्रसे मेरे मनको हर लिया है । कल्याणि! मैं तुम्हारा परिचय जानना चाहता हूँ, अतः मुझे सब कुछ ठीक-ठीक बताओ ।। १३ ।।

(शृणु मे नागनासोरु वचनं मत्तकाशिनि ।

राजर्षेरन्वये जातः पूरोरस्मि विशेषतः ।

वृणे त्वामद्य सुश्रोणि दुष्यन्तो वरवर्णिनि ।।

न मेऽन्यत्र क्षत्रियायां मनो जातु प्रवर्तते।

ऋषिपुत्रीषु चान्यासु नावर्णासु परासु वा ।।

तस्मात् प्रणिहितात्मानं विद्धि मां कलभाषिणि ।

तस्य मे त्वयि भावोऽस्ति क्षत्रिया ह्यसि का वद ।।

न हि मे भीरु विप्रायांमनः प्रसहते गतिम् ।

भजे त्वामायतापाङ्गि भक्तं भजितुमर्हसि ।।

‘हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली मतवाली सुन्दरी! मेरी बात सुनो; मैं राजर्षि पूरुकेवंशमें उत्पन्न राजा दुष्यन्त हूँ। आज मैं अपनी पत्नी बनानेके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ।क्षत्रिय-कन्याके सिवा दूसरी किसी स्त्रीकी ओर मेरा मन कभी नहीं जाता। अन्यान्यऋषिपुत्रियों, अपनेसे भिन्न वर्णकी कुमारियों तथा परायी स्त्रियोंकी ओर भी मेरे मनकी गतिनहीं होती। मधुरभाषिणि! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि मैं अपने मनको पूर्णत ः संयममेंरखता हूँ। ऐसा होनेपर भी तुमपर मेरा अनुराग हो रहा है, अतः तुम क्षत्रिय- कन्या ही हो।बताओ, तुम कौन हो? भीरु! ब्राह्मण-कन्याकी ओर आकृष्ट होना मेरे मनको कदापि सह्यनहीं है। विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरी! मैं तुम्हारा भक्त हूँ ; तुम्हारी सेवा चाहता हूँ; तुम मुझेस्वीकार करो। विशाललोचने! मेरा राज्य भोगो। मेरे प्रति अन्यथा विचार न करो मुझेपराया न समझो’।

एवमुक्ता तु सा कन्या तेन राज्ञा तमाश्रमे ।

उवाच हसती वाक्यमिदं सुमधुराक्षरम् ।। १४ ।।

उस आश्रममें राजाके इस प्रकार पूछनेपर वह कन्या हँसती हुई मिठासभरे वचनोंमेंउनसे इस प्रकार बोली- ।। १४ ।।

कण्वस्याहं भगवतो दुष्यन्त दुहिता मता।

तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य महात्मनः ।। १५ ।।

‘महाराज दुष्यन्त! मैं तपस्वी, धृतिमान्, धर्मज्ञ तथा महात्मा भगवान् कण्वकी पुत्रीमानी जाती हूँ ।। १५ ।।

(अस्वतन्त्रास्मि राजेन्द्र काश्यपो मे गुरुः पिता ।

तमेव प्रार्थय स्वार्थं नायुक्तं कर्तुमर्हसि ।।)

‘राजेन्द्र! मैं परतन्त्र हूँ। कश्यपनन्दन महर्षि कण्व मेरे गुरु और पिता हैं। उन्हींसे आपअपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करें। आपको अनुचित कार्य नहीं करना चाहिये।

दुष्यन्त उवाच

ऊर्ध्वरेता महाभागे भगवाँल्लोकपूजितः ।

चलेद्धि वृत्ताद् धर्मोऽपि न चलेत् संशितव्रतः ।। १६ ।।

दुष्यन्त बोले-महाभागे! विश्ववन्द्य कण्व तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। वे बड़े कठोरव्रतका पालन करते हैं। साक्षात् धर्मराज भी अपने सदाचारसे विचलित हो सकते हैं, परंतुमहर्षि कण्व नहीं ।। १६ ।।

कथं त्वं तस्य दुहिता सम्भूता वरवर्णिनी ।

संशयो मे महानत्र तन्मे छेत्तुमिहाहसि ।। १७ ।।

ऐसी दशामें तुम-जैसी सुन्दरी देवी उनकी पुत्री कैसे हो सकती है? इस विषयमें मुझेबड़ा भारी संदेह हो रहा है। मेरे इस संदेहका निवारण तुम्हीं कर सकती हो ।। १७ ।।

शकुन्तलोवाच यथायमागमो मह्यं यथा चेदमभूत् पुरा ।

शृणु राजन् यथातत्वं यथास्मि दुहिता मुनेः ।। १८ ।।

शकुन्तलाने कहा-राजन्! ये सब बातें मुझे जिस प्रकार ज्ञात हुई हैं, मेरा यह जन्म आदि पूर्वकालमें जिस प्रकार हुआ है और मैं जिस प्रकार कण्व मुनिकी पुत्री हूँ , वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता रही हूँ; सुनिये ।। १८ ।।

(भुङ्क्ष्व राज्यं विशालाक्षि बुद्धिं मा त्वन्यथा कृथाः ।

अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु स पापेनावृतो मूर्खः स्तेन आत्मापहारकः ।।)

जिसका स्वरूप तो अन्य प्रकारका है, किंतु जो सत्पुरुषोंके सामने उसका अन्य प्रकारसे ही परिचय देता है, अर्थात् जो पापात्मा होते हुए भी अपनेको धर्मात्मा कहता है, वह मूर्ख, पापसे आवृत, चोर एवं आत्मवंचक है।

(ऊर्ध्वरेता यथासि त्वं कुतस्त्येयं शकुन्तला ।

पुत्री त्वत्तः कथं जाता सत्यं मे ब्रूहि काश्यप ।।)

ऋषिः कश्चिदिहागम्य मम जन्माभ्यचोदयत् । 

तस्मै प्रोवाच भगवान् यथा तच्छृणु पार्थिव ।। १९ ।।

पृथ्वीपते! एक दिन किसी ऋषिने यहाँ आकर मेरे जन्मके सम्बन्धमें मुनिसे पूछा -‘कश्यपनन्दन! आप तो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हैं, फिर यह शकुन्तला कहाँसे आयी? आपसे पुत्रीका जन्म कैसे हुआ? यह मुझे सच-सच बताइये।’ उस समय भगवान् कण्वने उससे जो बात बतायी, वही कहती हूँ, सुनिये ।। १९ ।। भाषते ।

कण्व उवाच तप्यमानः किल पुरा विश्वामित्रो महत् तपः ।

सुभृशं तापयामास शक्रं सुरगणेश्वरम् ।। २० ।।

कण्व बोले-पहलेकी बात है, महर्षि विश्वामित्र बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उन्होंने देवताओंके स्वामी इन्द्रको अपनी तपस्यासे अत्यन्त संतापमें डाल दिया ।। २० ।।

तपसा दीप्तवीर्योऽयं स्थानान्मां च्यावयेदिति ।

भीतः पुरंदरस्तस्मान्मेनकामिदमब्रवीत् ।। २१ ।।

इन्द्रको यह भय हो गया कि तपस्यासे अधिक शक्तिशाली होकर ये विश्वामित्र मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देंगे, अतः उन्होंने मेनकासे इस प्रकार कहा-।। २१ ।।

गुणैरप्सरसां दिव्यैर्मेनके त्वं विशिष्यसे ।

श्रेयो मे कुरु कल्याणि यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।। २२ ।।

असावादित्यसंकाशो विश्वामित्रो महातपाः ।

तप्यमानस्तपो घोरं मम कम्पयते मनः ।। २३ ।।

‘मेनके! अप्सराओंके जो दिव्य गुण हैं, वे तुममें सबसे अधिक हैं। कल्याणि! तुम मेराभला करो और मैं तुमसे जो बात कहता हूँ, सुनो। वे सूर्यके समान तेजस्वी, महातपस्वीविश्वामित्र घोर तपस्यामें संलग्न हो मेरे मनको कम्पित कर रहे हैं ।। २२-२३ ।।

मेनके तव भारोऽयं विश्वामित्रः सुमध्यमे ।

शंसितात्मा सुदुर्धर्ष उग्रे तपसि वर्तते ।। २४ ।।

‘सुन्दरी मेनके! उन्हें तपस्यासे विचलित करनेका यह महान् भार मैं तुम्हारे ऊपरछोड़ता हूँ। विश्वामित्रका अन्तःकरण शुद्ध है। उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन है और वेइस समय घोर तपस्यामें लगे हैं ।। २४ ।।

स मां न च्यावयेत् स्थानात् तं वै गत्वा प्रलोभय ।

चर तस्य तपोविघ्नं कुरु मेऽविघ्नमुक्तमम् ।। २५ ।।

‘अतः ऐसा करो, जिससे वे मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट न कर सकें। तुम उनके पासजाकर उन्हें लुभाओ, उनकी तपस्यामें विघ्न डाल दो और इस प्रकार मेरे विघ्नकेनिवारणका उत्तम साधन प्रस्तुत करो ।। २५ ।।

रूपयौवनमाधुर्यचेष्टितस्मितभाषणैः ।

लोभयित्वा वरारोहे तपसस्तं निवर्तय ।। २६ ।।

‘वरारोहे! अपने रूप, जवानी, मधुर स्वभाव, हाव-भाव, मन्द मुसकान और सरसवार्तालाप आदिके द्वारा मुनिको लुभाकर उन्हें तपस्यासे निवृत्त कर दो’ || २६ ।।

मेनकोवाच

महातेजाः स भगवांस्तथैव च महातपाः।

कोपनश्च तथा होनं जानाति भगवानपि ।। २७ ।।

मेनका बोली-देवराज! भगवान् विश्वामित्र बड़े भारी तेजस्वी और महान् तपस्वी हैं।वे क्रोधी भी बहुत हैं। उनके इस स्वभावको आप भी जानते हैं ।। २७ ।।

तेजसस्तपसश्चैव कोपस्य च महात्मनः ।

त्वमप्युद्विजसे यस्य नोद्विजेयमहं कथम् ।। २८ ।।

जिन महात्माके तेज, तप और क्रोधसे आप भी उद्विग्न हो उठते हैं, उनसे मैं कैसे नहींडूँगी? ।। २८ ।।

महाभागं वसिष्ठं यः पुत्रैरिष्टै्व्ययोजयत् ।

क्षत्रजातश्च यः पूर्वमभवद् ब्राह्मणो बलात् ।। २९ ।।

शौचार्थं यो नदीं चक्रे दुर्गमां बहुभिर्जलैः ।

यां तां पुण्यतमां लोके कौशिकीति विदुर्जनाः । ३० ।।

विश्वामित्र ऋषि वे ही हैं, जिन्होंने महाभाग महर्षि वसिष्ठका उनके प्यारे पुत्रोंसे सदाकेलिये वियोग करा दिया; जो पहले क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर भी तपस्याके बलसे ब्राह्मणबन गये; जिन्होंने अपने शौच-स्नानकी सुविधाके लिये अगाध जलसे भरी हुई उस दुर्गमनदीका निर्माण किया, जिसे लोकमें सब मनुष्य अत्यन्त पुण्यमयी कौशिकी नदीके नामसेजानते हैं ।। २९-३० ।।

बभार यत्रास्य पुरा काले दुर्ग महात्मनः ।

दारान्मतङ्गो धर्मात्मा राजर्षिव्व्याधतां गतः ।। ३१ ।।

विश्वामित्र महर्षि वे ही हैं, जिनकी पत्नीका पूर्वकालमें संकटके समय शापवश व्याधबने हुए धर्मात्मा राजर्षि मतंगने भरण-पोषण किया था ।। ३१ ।।

अतीतकाले दुर्भिक्षे अभ्येत्य पुनराश्रमम् ।

मुनिः पारेति नद्या वै नाम चक्रे तदा प्रभुः ।। ३२ ।।

दुर्भिक्ष बीत जानेपर उन शक्तिशाली मुनिने पुनः आश्रमपर आकर उस नदीका नाम’पारा’ रख दिया था ।। ३२ ।।

मतङ्गं याजयाञ्चक्रे यत्र प्रीतमनाः स्वयम् ।

त्वं च सोमं भयाद् यस्य गतः पातुं सुरेश्वर ।। ३३ ।।

सुरेश्वर! उन्होंने मतंग मुनिके किये हुए उपकारसे प्रसन्न होकर स्वयं पुरोहित बनकरउनका यज्ञ कराया; जिसमें उनके भयसे आप भी सोमपान करनेके लिये पधारे थे ।। ३३ ।।

चकारान्यं च लोकं वै क्रुद्धो नक्षत्रसम्पदा ।

प्रतिश्रवणपूर्वाणि नक्षत्राणि चकार यः ।

गुरुशापहतस्यापि त्रिशङ्कोः शरणं दरदौ ।। ३४ ।।

उन्होंने ही कुपित होकर दूसरे लोककी सृष्टि की और नक्षत्र – सम्पत्तिसे रूठकरप्रतिश्रवण आदि नूतन नक्षत्रोंका निर्माण किया था। ये वे ही महात्मा हैं, जिन्होंने गुरुकेशापसे हीनावस्थामें पड़े हुए राजा त्रिशंकुको भी शरण दी थी ।। ३४ ।।

(ब्रह्मर्षिशापं राजर्षिः कथं मोक्ष्यति कौशिकः ।

अवमत्य तदा देवैर्यज्ञाङ्गं तद् विनाशितम् ।।

अन्यानि च महातेजा यज्ञाङ्गान्यसृजत् प्रभुः ।

निनाय च तदा स्वर्गं त्रिशंकुं स महातपाः ।।)

उस समय यह सोचकर कि ‘विश्वामित्र ब्रह्मर्षि वसिष्ठके शापको कैसे छुड़ा देंगे?’देवताओंने उनकी अवहेलना करके त्रिशंकुके यज्ञकी वह सारी सामग्री नष्ट कर दी । परंतुमहातेजस्वी शक्तिशाली विश्वामित्रने दूसरी यज्ञ-सामग्रियोंकी सृष्टि कर ली तथा उनमहातपस्वीने त्रिशंकुको स्वर्गलोकमें पहुँचा ही दिया।

एतानि यस्य कर्माणि तस्याहं भृशमुद्विजे ।

यथासौ न दहेत् क्रुद्धस्तथाऽऽज्ञापय मां विभो ।। ३५ |।

जिनके ऐसे-ऐसे अद्भुत कर्म हैं, उन महात्मासे मैं बहुत डरती हूँ। प्रभो! जिससे वेकुपित हो मुझे भस्म न कर दें, ऐसे कार्यके लिये मुझे आज्ञा दीजिये ।। ३५ ।।

तेजसा निर्दहेल्लोकान् कम्पयेद् धरणीं पदा ।

संक्षिपेच्च महामेरुं तूर्णमावर्तयेद् दिशः ।। ३६ ।।

वे अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर सकते हैं, पैरके आघातसे पृथ्वीको कँपासकते हैं, विशाल मेरुपर्वतको छोटा बना सकते हैं और सम्पूर्ण दिशाओंमें तुरंत उलट-फेरकर सकते हैं ।। ३६ ।।

तादृशं तपसा युक्तं प्रदीप्तमिव पावकम् ।

कथमस्मद्विधा नारी जितेन्द्रियमभिस्पृशेत् ।। ३७ ।।

ऐसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, तपस्वी और जितेन्द्रिय महात्माका मुझ-जैसीनारी कैसे स्पर्श कर सकती है? ।। ३७ ।।

हुताशनमुखं दीप्तं सूर्यचन्द्राक्षितारकम् ।

कालजिह्वं सुरश्रेष्ठ कथमस्मद्विधा स्पृशेत् ।। ३८ ।।

सुरश्रेष्ठ! अग्नि जिनका मुख है, सूर्य और चन्द्रमा जिनकी आँखोंके तारे हैं और कालजिनकी जिह्वा है, उन तेजस्वी महर्षिको मेरी-जैसी स्त्री कैसे छू सकती है? ।। ३८ ।।

यमश्च सोमश्च महर्षयश्च साध्या विश्वे वालखिल्याश्च सर्वे ।

एतेऽपि यस्योद्विजन्ते प्रभावात् तस्मात् कस्मान्मादृशी नोद्विजेत ।। ३९ ।।

यमराज, चन्द्रमा, महर्षिगण, साध्यगण, विश्वेदेव और सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषि-ये भीजिनके प्रभावसे उद्विग्न रहते हैं, उन विश्वामित्र मुनिसे मेरी-जैसी स्त्री कैसे नहींडरेगी? ।। ३९ ।।

त्वयैवमुक्ता च कथं समीप-मृषेर्न गच्छेयमहं सुरेन्द्र ।

रक्षां तु मे चिन्तय देवराज यथा त्वदर्थं रक्षिताहं चरेयम् ।। ४० ।।

सुरेन्द्र! आपके इस प्रकार वहाँ जानेका आदेश देनेपर मैं उन महर्षिके समीप कैसे नहींजाऊँगी? किंतु देवराज! पहले मेरी रक्षाका कोई उपाय सोचिये; जिससे सुरक्षित रहकर मैंआपके कार्यकी सिद्धिके लिये चेष्टा कर सकूँ ।। ४० ।।

कामं तु मे मारुतस्तत्र वासःप्रक्रीडिताया विवृणोतु देव ।

भवेच्च मे मन्मथस्तत्र कार्ये सहायभूतस्तु तव प्रसादात् ।। ४१ ।।

देव! मैं वहाँ जाकर जब क्रीड़ामें निमग्न हो जाऊँ, उस समय वायुदेव आवश्यकतासमझकर मेरा वस्त्र उड़ा दें और इस कार्यमें आपके प्रसादसे कामदेव भी मेरे सहायक 1.हों ।। ४१ ।।

वनाच्च वायुः सुरभिः प्रवायात् तस्मिन् काले तमृषि लोभयन्त्याः ।

तथेत्युक्त्वा विहिते चैव तस्मिं-स्ततो ययौ साऽऽश्रमं कौशिकस्य ।। ४२ ।।

जब मैं ऋषिको लुभाने लगूँ, उस समय वनसे सुगन्धभरी वायु चलनी चाहिये।’तथास्तु’ कहकर इन्द्रने जब इस प्रकारकी व्यवस्था कर दी, तब मेनका विश्वामित्र मुनिकेआश्रमपर गयी ।। ४२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ५७ श्लोक हैं)

* दुष्यन्तके पिताके ‘इलिल’ और ‘ईलिन’ दोनों ही नाम मिलते हैं।

Vyasa Sewaka
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