Mahabharata Vol I Page 600-900 Webpage 9

।। श्रीहरिः ।।

श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत

महाभारत (प्रथम खण्ड)

MAHABHARATA

[आदिपर्व और सभापर्व]

(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवाद)

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।

अष्टाशीतितमोऽध्यायः

ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना

इन्द्र उवाच

सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन्गृहं परित्यज्य वनं गतोऽसि ।

तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्रकेनासि तुल्यस्तपसा ययाते ।। १ ।।

इन्द्रने कहा-राजन्! तुम सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गयेथे। अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम तपस्यामें किसके समान हो ।। १ ।।

ययातिरुवाच

नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्षिषु ।

आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव ।। २ ।।

ययातिने कहा-इन्द्र! मैं देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों और महर्षियोंमेंसे किसीको भीतपस्यामें अपनी बराबरी करनेवाला नहीं देखता हूँ ।। २ ।।

इन्द्र उवाच

यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्चअल्पीयसश्चाविदितप्रभावः ।

तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवेमेक्षीणे पुण्ये पतितास्यद्य राजन् ।। ३ ।।

इन्द्र बोले-राजन्! तुमने अपने समान, अपनेसे बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव नजानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारे इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्तहो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अबतुम यहाँसे नीचे गिरोगे ।। ३ ।।

ययातिरुवाच

सुर्षिगन्धर्वनरावमानात्क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः ।

इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनःसतां मध्ये पतितुं देवराज ।। ४ ।।

ययातिने कहा-देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमानकरनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधुपुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ ।। ४ ।।

इन्द्र उवाच

सतां सकाशे पतितासि राजं-श्र्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः ।

एतद् विदित्वा च पुनर्ययातेत्वं मावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च ।। ५ ।।

इन्द्र बोले-राजा ययाति! तुम यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके समीप गिरोगे औरवहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लोगे। यह सब जानकर तुम फिर कभी अपनेबराबर तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान न करना ।। ५ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रहायामरराजजुष्टान् पुण्याँल्लोकान् पतमानं ययातिम् ।

सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त-मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ।। ६ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्यपुण्यलोकोंका परित्याग करके राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठअष्टकने उन्हें गिरते देखा। वे उत्तम धर्म-विधिके पालक थे। उन्होंने ययातिसे कहा ।। ६ ।।

ययातिका पतनअष्टक उवाच

कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः ।

पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात् खात् खेचराणां प्रवरो यथार्कः ।। ७ ।।

अष्टकने पूछा-इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष तुम कौन हो? तुम अपनेतेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हो। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसेआकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान तुम कैसे गिर रहे हो? ।। ७ ।।

दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम् ।

किं नु स्विदेतत् पततीति सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः ।। ८ ।।

तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। तुम अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हो। तुम्हेंसूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि ‘यह क्यागिर रहा है?’ ।। ८ ।।

दृष्ट्वा च त्वां धिष्ठितं देवमार्गे शक्रा्कविष्णुप्रतिमप्रभावम् ।

अभ्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे तत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमानाः ।। ९ ।।

तुम इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हो। तुम्हें आकाशमें स्थित देखकर हमसब लोग अब यह जाननेके लिये तुम्हारे निकट आये हैं कि तुम्हारे पतनका यथार्थ कारणक्या है? ।। ९ ।।

न चापि त्वां धृष्णुमः प्रष्टुमग्रे न च त्वमस्मान् पृच्छसि ये वयं स्मः ।

तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः ।। १० ।।

हम पहले तुमसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और तुम भी हमसे हमारापरिचय नहीं पूछते हो; कि हम कौन हैं? इसलिये मैं ही तुमसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवालेमहापुरुष! तुम किसके पुत्र हो? और किसलिये यहाँ आये हो? ।। १० ।।

भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव ।

त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहापि शक्रः ।। ११ ।।

इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। अब तुम्हें विषादऔर मोहको भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय तुम संतोंके समीप विद्यमान हो। बलदानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब तुम्हारा तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं ।। ११ ।।

सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प ।

ते संगताः स्थावरजङ्गमेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु ।। १२ ।।

देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वंचित होनेवाले साधु पुरुषोंके लियेसदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जंगम सब प्राणियोंपर शासन करनेवालेसत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। तुम अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हो ।। १२ ।।

प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः ।

प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतः प्रभुः ।। १३ ।।

जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है,प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, इसी प्रकार संतोंपर शासन करनेकी शक्ति केवलअतिथिमें है ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते अष्टाशीतितमोऽध्यायः ।।८८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८८ ।।

एकोननवतितमोऽध्यायः

ययाति और अष्टकका संवाद

ययातिरुवाच

अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रःपूरोः पिता सर्वभूतावमानात् ।

प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोकात्परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ।। १ ।।

ययातिने कहा-महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्तप्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं देवताओं, सिद्धों तथामहर्षियोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ ।। १ ।।

अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भ्य-स्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्जे ।

यो विद्यया तपसा जन्मना वावृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ।। २ ।।

मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ।द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है, वह पूजनीय माना जाताहै ।। २ ।।

अष्टक उवाच

अवादीस्त्वं वयसा यः प्रवृद्धःस वै राजन् नाभ्यधिकः कथ्यते च ।

यो विद्यया तपसा सम्प्रवृद्धःस एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ।। ३ ।।

अष्टक बोले-राजन्! आपने कहा है कि जो अवस्थामें बड़ा हो, वही अधिकसम्माननीय कहा जाता है। परंतु द्विजोंमें तो जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा हो, वहीपूज्य होता है ।। ३ ।।

ययातिरुवाच

प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-स्तद् वर्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम् ।

सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैतद्यथा चैषामनुकूलास्तथाऽऽसन् ।। ४ ।।

ययातिने कहा-पापको करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका श्रेष्ठ पुरुष अनुसरण नहीं करते हैं। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे ।। ४ ।।

अभूद् धनं मे विपुलं गतं तद् विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि ।

एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो यो वर्तते स विजानाति धीरः ।। ५ ।।

मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था; किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और वही धीर है ।। ५ ।।

महाधनो यो यजते सुयज्ञै- र्यः सर्वविद्यासु विनीतबुद्धिः ।

वेदानधीत्य तपसाऽऽयोज्य देहं दिवं समायात् पुरुषो वीतमोहः ।। ६ ।।

जो मनुष्य बहुत धनी होकर उत्तम यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करता है, सम्पूर्ण विद्याओंको पाकर जिसकी बुद्धि विनययुक्त है तथा जो वेदोंको पढ़कर अपने शरीरको तपस्यामें लगा देता है, वह पुरुष मोहरहित होकर स्वर्गमें जाता है ।। ६ ।।

न जातु हृष्येन्महता धनेन वेदानधीयीतानहंकृतः स्यात् ।

नानाभावा बहवो जीवलोके दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः ।

तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो दिष्टं बलीय इति मत्वाऽऽत्मबुद्ध्या ।। ७ ।।

महान् धन पाकर कभी हर्षसे उल्लसित न हो, वेदोंका अध्ययन करे, किंतु अहंकारी न बने। इस जीव-जगत्में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अरधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे ‘प्रारब्ध ही बलवान् है’ यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको प्राप्त न हो ।। ७ ।।

सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं दैवाधीनं विन्दते नात्मशक्त्या ।

तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ।। ८ ।।

पुण्यकर्मांका नाशक बताया जाता है, वह नरककी प्राप्ति जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह प्रारब्धसे ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसेनहीं। अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक नकरे ।। ८ ।।

दुःखैर्न तप्येन्न सुखैः प्रहृष्येत् समेन वर्तेत सदैव धीरः ।

दिष्टं बलीय इति मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ।। ९ ।।

दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे औरभाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो ।। ९ ।।

भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित् संतापो मे मानसो नास्ति कश्चित् ।

धाता यथा मां विदधीत लोके ध्रुवं तथाहं भवितेति मत्वा ।। १० ।।

अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहींहोता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा, वैसे हीरहूँगा ।। १० ।।

संस्वेदजा अण्डजाश्चोद्भिदश्च सरीसृपाः कृमयोऽथाप्सु मत्स्याः ।

तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वे दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति ।। ११ ।।

स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथापर्वत, तृण और काष्ठ-ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिकोप्राप्त हो जाते हैं ।। ११ ।।

अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम् ।

किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः ।। १२ ।।

अष्टक! मैं सुख तथा दुःख दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तोकैसे? मैं क्या कर और क्या करके संतप्त न होऊँ, इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ। अतःसावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ ।। १२ ।।

(दुःखे न खिद्येन्न सुखेन माद्येत् समेन वर्तेत स धीरधर्मा ।

दिष्टं बलीयः समवेक्ष्य बुद्ध्यान सज्जते चात्र भृशं मनुष्यः ।।)

जो दुःखमें खिन्न नहीं होता, सुखसे मतवाला नहीं हो उठता और सबके साथ समानभावसे बर्ताव करता है, वह धीर कहा गया है। विज्ञ मनुष्य बुद्धिसे प्रारब्धको अत्यन्तबलवान् समझकर यहाँ किसी भी विषयमें अधिक आसक्त नहीं होता।

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत् ।

मातामहं सर्वगुणोपपन्नं तत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत् ।। १३ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे औरनातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, मानो स्वर्गलोकमें हों।जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं, तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया।। १३ ।।

अष्टक उवाच

ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्र प्रधाना-स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथावत् ।

तान् मे राजन् ब्रूहि सर्वान् यथावत्क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मान् ।। १४ ।।

अष्टक बोले-महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतकवहाँके सुखोंका भलीभाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये।राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं ।। १४ ।।

ययातिरुवाच

राजाहमासमिह सार्वभौम-स्ततो लोकान् महतश्चाजयं वै ।

तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ।। १५ ।।

ययातिने कहा-अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था।तदनन्तर सत्कर्मोद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजारवर्षोंतक निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा ।। १५ ।।

ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां सहस्रद्वारां शतयोजनायताम् ।

अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रंततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ।। १६ ।।

वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई।उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमेंगया ।। १६ ।।

ततो दिव्यमजंर प्राप्य लोकं प्रजापतेल्लोकपतेर्दुरापम् ।

तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ।। १७ ।।

तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्य लोकमें जा पहुँचा, जहाँजरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चलागया ।। १७ ।।

स देवदेवस्य निवेशने च विहत्य लोकानवसं यथेष्टम् ।

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ।। १८ ।।

वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्नलोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभावऔर तेज देवेश्वरोंके समान था ।। १८ ।।

तथावसं नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम् ।

सहाप्सरोभिर्विहरन् पुण्यगन्धान् पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान् ।। १९ ।।

इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहारकरता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्षदेखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे ।। १९ ।।

तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम् ।

दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण ।। २० ।।

वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीतजानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला-‘गिरजाओ, गिर जाओ, गिर जाओ’ ।। २० ।।

एतावन्मे विदितं राजसिंहततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः ।

वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणां सानुक्रोशाः शोचतां मां नरेन्द्र ।। २१ ।।

राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारणमैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकीअन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी- ।। २१ ।।

अहो कष्टंक्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः ।

तानब्रुवं पतमानस्ततोऽहं सतां मध्ये निपतेयं कथं नु ।। २२ ।।

‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्यक्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं।’ तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा- ‘ देवताओ! मैंसाधु पुरुषोंके बीच गिरू, इसका क्या उपाय है!’ ।। २२ ।।

तैराख्याता भवतां यज्ञभूमिः समीक्ष्य चेमां त्वरितमुपागतोऽस्मि ।

हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमे-ध्ूमापाङ्गं प्रतिगृह्य प्रतीतः ।। २३ ।।

तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंतयहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथाधूमप्रान्तका अवलोकन करके मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते एकोननवतितमोऽध्यायः।। ८९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८९ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)

नवतितमोऽध्यायः

अष्टक और ययातिका संवाद

अष्टक उवाच

यदावसो नन्दने कामरूपीसंवत्सराणामयुतं शतानाम् ।

किं कारणं कार्तयुगप्रधानहित्वा च त्वं वसुधामन्वपद्यः ।। १ ।।

अष्टकने पूछा-सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसाररूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है किआप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये? ।। १ ।।

ययातिरुवाच

ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो वा यथेहक्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि ।

तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यंत्यजन्ति सद्यः सेश्वरा देवसङ्घाः ।। २ ।।

ययाति बोले-जैसे इस लोकमें जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो,धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं; उसी प्रकार परलोकमें जिसका पुण्यसमाप्त हो गया है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देतेहैं ।। २ ।।

अष्टक उवाच

तस्मिन् कथं क्षीणपुण्या भवन्तिसम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम् ।

किं वा विशिष्टाः कस्य धामोपयान्तितद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे ।। ३ ।।

अष्टकने पूछा-देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मनअत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट(अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे क्षेत्रज्ञ(आत्मज्ञानी) जान पड़ते हैं ।। ३ ।।

ययातिरुवाचइमं भौमं नरकं ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव सर्वे ।

ते कङ्कगोमायुबलाशनार्थे क्षीणा विवृद्धिं बहुधा व्रजन्ति ।। ४ ।।

ययाति बोले-नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्य-कर्मोका बखान करते हैं, वे सभीइस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इसशरीरके लिये बड़ा भारी परिश्रम करके क्षीण होते और पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारकोप्राप्त होते हैं ।। ४ ।।

तस्मादेतद् वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म ।

आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि ।। ५ ।।

इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो उसको सर्वथा त्याग देनाचाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया, बोलो, अब और तुम्हें क्याबताऊँ? ।। ५ ।।

अष्टक उवाच

यदा तु तान् वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः ।

कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि ।। ६ ।।

अष्टकने पूछा-जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, नीलकण्ठ और पतंग येनोच-नोचकर खा लेते हैं, तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? मैंने अबतक भौमनामक किसी दूसरे नरकका नाम नहीं सुना था ।। ६ ।।

ययातिरुवाच

ऊर्ध्वं देहात् कर्मणा जृम्भमाणाद् व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति ।

इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान् ।। ७ ।।

ययाति बोले-कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेकेपश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौमनरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेकवर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते ।। ७ ।।

षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि तथा अशीरतिं परिवर्सराणि ।

तान् वै तुदन्ति पततः प्रपातं भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः ।। ८ ।।

कितने ही प्राणी आकाश (स्वर्गादि)-में साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजारवर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंकोतीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं ।। ८ ।।

अष्टक उवाच

यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः ।

कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथंभूता गर्भभूता भवन्ति ।। ९ ।।

अष्टकने पूछा-तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके वे भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरतेहुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसेयुक्त होते हैं? और कैसे गर्भमें आते हैं? ।। ९ ।।

ययातिरुवाच

अस्रं रेतः पुष्पफलानुपृत्त-मन्वेति तद् वै पुरुषेण सृष्टम् ।

स वै तस्या रज आपद्यते वै स गर्भभूतः समुपैति तत्र ।। १० ।।

ययाति बोले-अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी अस्र (जल) होता है। फिर वही क्रमशःनूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। वह वीर्य फूल और फलरूपी शेष कर्मोंसे संयुक्तहोकर तदनुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्गहोनेपर वह वीर्यमें आविष्ट हुआ जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वहीगर्भरूपमें परिणत हो जाता है ।। १० ।।

वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम् ।

चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्व-मेवम्भूता गर्भभूता भवन्ति ।। ११ ।।

जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं। जल, वायु, पृथ्वीऔर अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इसप्रकार भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं ।। ११ ।।

अष्टक उवाच

अन्यद् वपुर्विदधातीह गर्भ-मुताहोस्वित् स्वेन कायेन याति ।

आपद्यमानो नरयोनिमेता-माचक्ष्व मे संशयात् प्रब्रवीमि ।। १२ ।।

अष्टकने पूछा-राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमेंआता है या दूसरा शरीर धारण करता है। आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होनेकेकारण पूछता हूँ ।। १२ ।।

शरीरभेदाभिसमुच्छ्रयं च चक्षुःश्रोत्रे लभते केन संज्ञाम् ।

एतत् तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः क्षेत्रज्ञं त्वां तात मन्याम सर्वे ।। १३ ।।

गर्भमें आनेपर वह भिन्न-भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंकोतथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये। तात!हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं ।। १३ ।।

ययातिरुवाच

वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-मृतौ रेतः पुष्परसानुपृत्तम् ।

स तत्र तन्मात्रकृताधिकारःक्रमेण संवर्धयतीह गर्भम् ।। १४ ।।

ययाति बोले-ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लाता है।वहाँ गर्भाशयमें सूक्ष्मभूत उसपर अधिकार कर लेते हैं और वह क्रमशः गर्भकी वृद्धि करतारहता है ।। १४ ।।

स जायमानो विगृहीतमात्रःसंज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः ।

स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च ।। १५ ।

वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है, तब चेतनताका आश्रय लेयोनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूपदेखता है ।। १५ ।।

घ्राणेन गन्धं जिह्वयारथो रसं च त्वचा स्पर्श मनसा वेद भावम् ।

इत्यष्टकेहोपहितं हि विद्धि महात्मनां प्राणभृतां शरीरे ।। १६ ।।

नासिकासे सुगन्ध लेता है। जिह्वासे रसका आस्वादन करता है। त्वचासे स्पर्श औरमनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महात्मा प्राणधारियोंकेशरीरमें जीवकी स्थापना होती है ।। १६ ।।

अष्टक उवाच

यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा निखन्यते वापि निकृष्यते वा ।

अभावभूतः स विनाशमेत्य केनात्मना चेतयते परस्तात् ।। १७ ।

अष्टकने पूछा-जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है।अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाताहै। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करताहै? ।। १७ ।।

ययातिरुवाच

हित्वा सोऽसून् सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा ।

अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी हित्वा देहं भजते राजसिंह ।। १८ ।।

ययाति बोले-राजसिंह ! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़करस्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इसमृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापकोआगे रखकर वायुके समान वेगसे चलता हुआ अन्य योनिको प्राप्त होता है ।। १८ ।।

पुण्यां योनिं पुण्यकृतो व्रजन्ति पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति ।

कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा न मे विवक्षास्ति महानुभाव ।। १९ ।।

चतुष्पदा द्विपदाः षट्पदाश्च तथाभूता गर्भभूता भवन्ति ।

आख्यातमेतन्निखिलेन सर्वं भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह ।। २० ।।

पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनियोंमें जाते हैं और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमेंजाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतंग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयोंकोविस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चारपैर, छः पैर और दो पैरवाले प्राणियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बतादिया। अब और क्या पूछना चाहते हो? ।। १९-२० ।।

अष्टक उवाच

किंस्वित् कृत्वा लभते तात लोकान् मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा ।

तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव-च्छुभाँल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण ।। २१ ।।

अष्टकने पूछा-तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम लोक प्राप्त करता है? वेलोक तपसे प्राप्त होते हैं या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठलोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थरूपसे बताइये ।। २१ ।।

ययातिरुवाच

तपश्च दानं च शरमो दमश्च हीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा ।

स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम् ।

नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः ।। २२ ।।

ययाति बोले-राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसेप्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं-तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता औरसमस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसेआच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है ।। २२ ।।

अधीयानः पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् ।

तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका न चास्य तद् ब्रह्म फलं ददाति ।। २३ ।।

जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारादूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं औरउसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता ।। २३ ।।

चत्वारि कर्माण्यभयंकराणिभयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि ।

मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः ।। २४ ।।

अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ-ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं;परंतु वे ही ठीकसे न किये जायँ, अभिमानपूर्वक उनका अनुष्ठान किया जाय तो वे उलटेभय प्रदान करते हैं ।। २४ ।।

न मानमान्यो मुदमाददीत न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात् ।

सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते ।। २५ ।।

विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो और अपमानित होनेपर संतप्तन हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषोंको ‘यह सत्पुरुष हैऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती ।। २५ ।।

इति दद्यामिति यज इत्यधीय इति व्रतम् ।

इत्येतानि भयान्याहुस्तानि वज्यानि सर्वशः ।। २६ ।।

मैं यह दे सकता हूँ, इस प्रकार यजन करता हूँ, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहता हूँ औरयह मेरा व्रत है; इस प्रकार जो अहंकारपूर्वक वचन हैं, उन्हें भयरूप कहा गया है। ऐसेवचनोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये ।। २६ ।।

ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम् ।

तद्वः श्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह ।। २७ ।।

जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है वह(परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं, वेउस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होतेहैं ।। २७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते नवतितमोऽध्यायः ।। ९०॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९० ।।

‘बल’ शब्दका अर्थ यहाँ कौआ किया गया है; जो ‘स्थौल्यसामर्थ्यसैन्येषु बलं ना काकसीरिणोः’ अमरकोषके इसवाक्यसे समर्थित होता है।

एकनवतितमोऽध्यायः

ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद

अष्टक उवाच

चरन् गृहस्थः कथमेति धर्मान् कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा ।

वानप्रस्थः सत्पथे संनिविष्टोबहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति ।। १ ।।

अष्टकने पूछा-महाराज! वेदज्ञ विद्वान् इस धर्मके अन्तर्गत बहुत-से कर्मोंको उत्तमलोकोंकी प्राप्तिका द्वार बताते हैं; अतः मैं पूछता हूँ, आचार्यकी सेवा करनेवाला ब्रह्मचारी,गृहस्थ, सन्मार्गमें स्थित वानप्रस्थ और संन्यासी किस प्रकार धर्माचरण करके उत्तम लोकमेंजाता है? ।। १ ।।

ययातिरुवाच

आहूताध्यायी गुरुकर्मस्वचोद्यःपूर्वोत्थायी चरमं चोपशायी।

मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तःस्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी ।। २ ।।

ययाति बोले-शिष्यको उचित है कि गुरुके बुलानेपर उसके समीप जाकर पढ़े।गुरुकी सेवामें बिना कहे लगा रहे, रातमें गुरुजीके सो जानेके बाद सोये और सबेरे उनसेपहले ही उठ जाय। वह मृदुल (विनम्र), जितेन्द्रिय, धैर्यवान्, सावधान और स्वाध्यायशीलहो। इस नियमसे रहनेवाला ब्रह्मचारी सिद्धिको पाता है ।। २ ।।

धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च ।

अनाददानश्च परैरदत्तंसैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी ।। ३ ।।

गृहस्थ पुरुष न्यायसे प्राप्त हुए धनको पाकर उससे यज्ञ करे, दान दे और सदाअतिथियोंको भोजन करावे। दूसरोंकी वस्तु उनके दिये बिना ग्रहण नहीं करे। यह गृहस्थ-धर्मका प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है ।। ३ ।।

स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो दाता परेभ्यो न परोपतापी ।

तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यांवसन्नरण्ये नियताहारचेष्टः ।। ४ ।।

वानप्रस्थ मुनि वनमें निवास करे। आहार और विहारको नियमित रखे। अपने हीपराक्रम एवं परिश्रमसे जीवन-निर्वाह करे, पापसे दूर रहे। दूसरोंको दान दे और किसीकोकष्ट न पहुँचावे। ऐसा मुनि परम मोक्षको प्राप्त होता है ।। ४ ।।

अशिल्पजीवी गुणवांश्चैव नित्यं जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रयुक्तः ।

अनोकशायी लघुरल्पप्रचार-श्वरन् देशानेकचरः स भिक्षुः ।। ५ ।।

संन्यासी शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह न करे। शम, दम आदि श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो।सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखे। सबसे अलग रहे। गृहस्थके घरमें न सोये। परिग्रहकाभार न लेकर अपनेको हलका रखे। थोड़ा थोड़ा चले। अकेला ही अनेक स्थानोंमें भ्रमणकरता रहे। ऐसा संन्यासी ही वास्तवमें भिक्षु कहलानेयोग्य है ।। ५ ।।

रात्र्या यया वाभिजिताश्च लोका भवन्ति कामाभिजिताः सुखाश्च ।

तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा-नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा ।। ६ ।।

जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायँतथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करकेसमस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे ।। ६ ।।

दशैव पूर्वान् दश चापरांश्च ज्ञातीनथात्मानमथैकविंशम् ।

अरण्यवासी सुकृते दधाति विमुच्यारण्ये स्वशरीरधातून् ।॥ ७ ॥

जो वनवासी मुनि वनमें ही अपने पंचभूतात्मक शरीरका परित्याग करता है, वह दसपीढ़ी पूर्वके और दस पीढ़ी बादके जाति-भाइयोंको तथा इक्कीसवें अपनेको भीपुण्यलोकोंमें पहुँचा देता है ।। ७ ।।

अष्टक उवाच

कतिस्विदेव मुनयः कति मौनानि चाप्युत ।

भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।। ८।।

अष्टकने पूछा-राजन्! मुनि कितने हैं? और मौन कितने प्रकारके हैं? यह बताइये,हम इसे सुनना चाहते हैं ।। ८ ।।

ययातिरुवाचअरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः ।

ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप ।। ९ ।।

ययातिने कहा-जनेश्वर! अरण्यमें निवास करते समय जिसके लिये ग्राम पीछे होताहै और ग्राममें वास करते समय जिसके लिये अरण्य पीछे होता है, वह मुनि कहलाताहै ।। ९ ।।

अष्टक उवाच

कथंस्विद् वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः ।

ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः ।। १० ।।

अष्टकने पूछा-अरण्यमें निवास करनेवालेके लिये ग्राम और ग्राममें निवासकरनेवालेके लिये अरण्य पीछे कैसे है? ।। १० ।।

ययातिरुवाच

न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत् ।

तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः ।। ११ ।।

ययातिने कहा-जो मुनि वनमें निवास करता है और गाँवोंमें प्राप्त होनेवालीवस्तुओंका उपयोग नहीं करता, इस प्रकार वनमें निवास करनेवाले उस (वानप्रस्थ) मुनिकेलिये गाँव पीछे समझा जाता है ।। ११ ।।

अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः ।

कौपीनाच्छादनं यावत् तावदिच्छेच्च चीवरम् ।। १२ ।।

यावत् प्राणाभिसंधानं तावदिच्छेच्च भोजनम् ।

तथास्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः ।। १३ ।।

जो अग्नि और गृहको त्याग चुका है, जिसका गोत्र और चरण (वेदकी शाखा एवंजाति)-से भी सम्बन्ध नहीं रह गया है, जो मौन रहता है और उतने ही वस्त्रकी इच्छा रखताहै जितनेसे लंगोटी और ओढ़नेका काम चल जाय; इसी प्रकार जितनेसे प्राणोंकी रक्षा होसके उतना ही भोजन चाहता है; इस नियमसे गाँवमें निवास करनेवाले उस (संन्यासी)मुनिके लिये अरण्य पीछे समझा जाता है ।। १२-१३ ।।

यस्तु कामान् परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः ।

आतिष्ठेच्च मुनिर्मैनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात् ।। १४ ।।

जो मुनि सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़कर कर्मोंको त्याग चुका है और इन्द्रिय – संयमपूर्वकसदा मौनमें स्थित है, ऐसा संन्यासी लोकमें परम सिद्धिको प्राप्त होता है ।। १४ ।।

धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलंकृतम् ।

असितं सितकर्माणं कस्तमर्हति नार्चितुम् ।। १५ ।।

जिसके दाँत शुद्ध और साफ हैं, जिसके नख ( और केश) कटे हुए हैं, जो सदा स्नानकरता है तथा यम-नियमादिसे अलंकृत (है, उन्हें धारण किये हुए ) है, शीतोष्णको सहनेसेजिसका शरीर श्याम पड़ गया है, जिसके आचरण उत्तम हैं-ऐसा संन्यासी किसके लियेपूजनीय नहीं है? ।। १५ ।।

तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः ।

स च लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम् ।। १६ ।।

तपस्यासे मांस, हड्डी तथा रक्तके क्षीण हो जानेपर जिसका शरीर कृश और दुर्बल होगया है, वह (वानप्रस्थ) मुनि इस लोकको जीतकर परलोकपर भी विजय पाता है ।। १६ ।।

यदा भवति निर्द्वन्द्ो मुनिर्मौनं समास्थितः ।

अथ लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम् ।। १७ ।।

जब (वानप्रस्थ) मुनि सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित एवं भलीभाँतिमौनावलम्बी हो जाता है, तब वह इस लोकको जीतकर परलोकपर भी विजय पाताहै ।। १७ ।।

आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः ।

अथास्य लोकः सर्वोऽयं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।। १८ ।।

जब संन्यासी मुनि गाय-बैलोंकी तरह मुखरसे ही आहार ग्रहण करता है,भी सहारा नहीं लेता, तब उसके द्वारा ये सब लोक जीत लिये गये समझे जाते हैं और वहमोक्षकी प्राप्तिके लिये समर्थ समझा जाता है ।। १८ ।।

हाथ आदिकाइति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते एकनवतितमोऽध्यायः ।।९१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९१ ।।

द्विनवतितमोऽध्यायः

अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना

अष्टक उवाच

कतरस्त्वनयोः पूर्वं देवानामेति सात्मताम् ।

उभयोर्धावतो राजन् सूर्याचन्द्रमसोरिव ।। १ ।।

अष्टकने पूछा-राजन्! सूर्य और चन्द्रमाकी तरह अपने-अपने लक्ष्यकी ओर दौडतेहुए वानप्रस्थ और संन्यासी इन दोनोंमेंसे पहले कौन-सा देवताओंके आत्मभाव (ब्रह्म)- कोप्राप्त होता है? ।। १ ।।

ययातिरुवाच

अनिकेतो गृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः ।

ग्राम एव वसन् भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः ।। २ ।।

ययाति बोले-कामवृत्तिवाले गृहस्थोंके बीच ग्राममें ही वास करते हुए भी जोजितेन्द्रिय और गृहरहित संन्यासी है, वही उन दोनों प्रकारके मुनियोंमें पहले ब्रह्मभावकोप्राप्त होता है ।। २ ।।

अवाप्य दीर्घमायुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत् ।

तप्यते यदि तत् कृत्वा चरेत् सोऽन्यत् तपस्ततः ।। ३ ।।

जो वानप्रस्थ बड़ी आयु पाकर भी विषयोंके प्राप्त होनेपर उनसे विकृत हो उन्हींमेंविचरने लगता है, उसे यदि विषयोपभोगके अनन्तर पश्चात्ताप होता है तो उसे मोक्षके लियेपुनः तपका अनुष्ठान करना चाहिये ।। ३ ।।

पापानां कर्मणां नित्यं बिभियाद् यस्तु मानवः ।

सुखमप्याचरन् नित्यं सोऽत्यन्तं सुखमेधते ।। ४ ।।

किंतु जो वानप्रस्थ मनुष्य पापकर्मोंसे नित्य भय करता है और सदा अपने धर्मकाआचरण करता है, वह अत्यन्त सुखरूप मोक्षको अनायास ही प्राप्त कर लेता है ।। ४ ।।

तद् वै नृशंसं तदसत्यमाहु-र्यः सेवतेऽधर्ममनर्थबुद्धिः ।

अर्थोऽप्यनीशस्य तथैव राजं-स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम् ।। ५ ।।

राजन्! जो पापबुद्धिवाला मनुष्य अधर्मका आचरण करता है, उसका वह आचरणनृशंस (पापमय) और असत्य कहा गया है एवं उस अजितेन्द्रियका धन भी वैसा ही पापमयऔर असत्य है। परंतु वानप्रस्थ मुनिका जो धर्मपालन है, वही सरलता है, वही समाधि हैऔर वही श्रेष्ठ आचरण है ।। ५ ।।

अष्टक उवाच

केनासि हूतः प्रहितोऽसि राजन् युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चाः ।

कुत आयातः कतरस्यां दिशि त्व-मुताहोस्वित् पार्थिवं स्थानमस्ति ।। ६ ।।

अष्टकने पूछा-राजन्! आपको यहाँ किसने बुलाया? किसने भेजा है? आपअवस्थामें तरुण, फूलोंकी मालासे सुशोभित, दर्शनीय तथा उत्तम तेजसे उद्भासित जानपड़ते हैं। आप कहाँसे आये हैं? किस दिशामें भेजे गये हैं ? अथवा क्या आपके लिये इसपृथ्वीपर कोई उत्तम स्थान है? ।। ६ ।।

ययातिरुवाच

इमं भौमं नरकं क्षीणपुण्यःप्रवेष्टुमुर्वीं गगनाद् विप्रहीणः ।

उक्त्वाहं वः प्रपतिष्याम्यनन्तरं त्वरन्ति मां लोकपा ब्रह्मणो ये ।। ७ ।।

ययातिने कहा-मैं अपने पुण्यका क्षय होनेसे भौम नरकमें प्रवेश करनेके लियेआकाशसे गिर रहा हूँ। ब्रह्माजीके जो लोकपाल हैं, वे मुझे गिरनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं;अत: आपलोगोंसे पूछकर विदा लेकर इस पृथ्वीपर गिरूँगा ।। ७ ।।

सतां सकाशे तु वृतः प्रपात-स्ते संगता गुणवन्तस्तु सर्वे ।

शक्राच्च लब्धो हि वरो मयैष पतिष्यता भूमितलं नरेन्द्र ।। ८ ।।

नरेन्द्र! मैं जब इस पृथ्वीतलपर गिरनेवाला था, उस समय मैंने इन्द्रसे यह वर माँगा थाकि मैं साधु पुरुषोंके समीप गिरूँ। वह वर मुझे मिला, जिसके कारण आप सब सद्गुणीसंतोंका संग प्राप्त हुआ ।। ८ ।।

अष्टक उवाच

पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र ।

यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि स्थिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। ९ ।।

अष्टक बोले-महाराज! मेरा विश्वास है कि आप पारलौकिक धर्मके ज्ञाता हैं। मैंआपसे एक बात पूछता हूँ-क्या अन्तरिक्ष या स्वर्गलोकमें मुझे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोकभी हैं? यदि हों तो (उनके प्रभावसे) आप नीचे न गिरें, आपका पतन न हो ।। ९ ।।

ययातिरुवाच

यावत् पृथिव्यां विहितं गवाश्वं सहारण्यैः पशुभिः पार्वतैश्च ।

तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह ।। १० ।।

ययातिने कहा-नरेन्द्रसिंह! इस पृथ्वीपर जंगली और पर्वतीय पशुओंके साथ जितनेगाय, घोड़े आदि पशु रहते हैं, स्वर्गमें तुम्हारे लिये उतने ही लोक विद्यमान हैं। तुम इसेनिश्चय जानो ।। १० ।।

अष्टक उवाच

तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति ।

यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ।। ११ ।।

अष्टक बोले-राजेन्द्र! स्वर्गमें मेरे लिये जो लोक विद्यमान हैं, वे सब आपको देता हूँ;परंतु आपका पतन न हो। अन्तरिक्ष या द्युलोकमें मेरे लिये जो स्थान हैं, उनमें आप शीघ्र हीमोहरहित होकर चले जायँ ।। ११ ।।

ययातिरुवाच

नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य ।

यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-स्तथाददं पूर्वमहं नरेन्द्र ।। १२ ।।

ययातिने कहा-नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही प्रतिग्रह लेता है। मेरे-जैसा क्षत्रियकदापि नहीं। नरेन्द्र! जैसे दान करना चाहिये, उस विधिसे पहले मैंने भी सदा उत्तमब्राह्मणोंको बहुत दान दिये हैं ।। १२ ।।

नाब्राह्मणः कृपणो जातु जीवेद् याच्ञापि स्याद् ब्राह्मणी वीरपत्नी ।

सोऽहं नैवाकृतपूर्वं चरेयं विधित्समानः किमु तत्र साधु ।। १३ ।।

जो ब्राह्मण नहीं है, उसे दीन याचक बनकर कभी जीवन नहीं बिताना चाहिये। याचनातो विद्यासे दिग्विजय करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी पत्नी है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको हीयाचना करनेका अधिकार है। मुझे उत्तम सत्कर्म करनेकी इच्छा है; अत: ऐसा कोई कार्यकैसे कर सकता हूँ, जो पहले कभी नहीं किया हो ।। १३ ।।

प्रतर्दन उवाच

पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः ।

यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। १४ ।।

प्रतर्दन बोले-वांछनीय रूपवाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ, यदिअन्तरिक्ष अथवा स्वर्गमें मेरे भी लोक हों तो बताइये । मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञातामानता हूँ ।। १४ ।।

ययातिरुवाच

सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र अप्येकैकः सप्तसप्ताप्यहानि ।

मधुच्युतो घृतपृक्ता विशोका-स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ।। १५ ।।

ययातिने कहा-नरेन्द्र! आपके तो बहुत लोक हैं, यदि एक-एक लोकमें सात-सातदिन रहा जाय तो भी उनका अन्त नहीं है। वे सब-के-सब अमृतके झरने बहाते हैं एवं घृत(तेज)-से युक्त हैं। उनमें शोकका सर्वथा अभाव है। वे सभी लोक आपकी प्रतीक्षा कर रहेहैं ।। १५ ।।

प्रतर्दन उवाच

तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु ।

यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ।। १६ ।।

प्रतर्दन बोले-महाराज! वे सभी लोक मैं आपको देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो मेरेलोक हैं वे सब आपके हो जायँ। वे अन्तरिक्षमें हों या स्वर्गमें, आप शीघ्र मोहरहित होकरउनमें चले जाइये ।। १६ ।।

ययातिरुवाच

न तुल्यतेजाः सुकृतं कामयेतयोगक्षेमं पार्थिव पार्थिवः सन् ।

दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां-श्वरेन्नृशंसं न हि जातु राजा ।। १७ ।।

ययातिने कहा-राजन्! कोई भी राजा समान तेजस्वी होकर दूसरेसे पुण्य तथा योग-क्षेमकी इच्छा न करे। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमयकार्य न करे ।। १७ ।।

धर्म्यं मार्गं यतमानो यशस्यं कुर्यान्नुपो धर्ममवेक्षमाणः ।

न मद्विधो धर्मबुद्धिः प्रजानन् कुर्यादेवं कृपणं मां यथाऽऽत्थ ।। १८ ।।

धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपरही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्णकार्य नहीं करना चाहिये, जिसके लिये आप मुझसे कह रहे हैं ।। १८ ।।

(धर्माधर्मौ सुविनिश्चित्य सम्यक् कार्याकार्येष्वप्रमत्तश्चरेद् यः ।

स वै धीमान् सत्यसन्धः कृतात्मा राजा भवेल्लोकपालो महिम्ना ।।

यदा भवेत् संशयो धर्मकार्ये कामार्थे वा यत्र विन्दन्ति सम्यक् ।

कार्यं तत्र प्रथमं धर्मकार्यं न तौ कुर्यादर्थकामौ स धर्मः ।।)

कुर्यादपूर्वं न कृतं यदन्यै-विधित्समानः किमु तत्र साधु ।

ब्रुवाणमेनं नृपतिं ययारतिं नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत् तम् ।। १९ ।।

जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है, वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्यराजाओंने नहीं किया हो। जो धर्म और अधर्मका भलीभाँति निश्चय करके कर्तव्य औरअकर्तव्यके विषयमें सावधान होकर विचरता है, वही राजा बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ औरमनस्वी है। वह अपनी महिमासे लोकपाल होता है। जब धर्मकार्यमें संशय हो अथवा जहाँन्यायतः काम और अर्थ दोनों आकर प्राप्त हों, वहाँ पहले धर्मकार्यका ही सम्पादन करनाचाहिये, अर्थ और कामका नहीं। यही धर्म है। इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसेनृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते द्विनवतितमोऽध्यायः ।।९२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९२ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)

त्रिनवतितमोऽध्यायः

राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहकोअस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना

वसुमानुवाच

पृच्छामि त्वां वसुमानौषदक्चिर्यद्यस्ति लोको दिवि मे नरेन्द्र ।

यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। १ ।।

वसुमान्ने कहा-नरेन्द! मैं उषदश्वका पुत्र वसुमान् हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदिस्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्! मैं आपकोपारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ।। १ ।।

ययातिरुवाच

यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्चयत्तेजसा तपते भानुमांश्च ।

लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वैते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ।। २ ।।

ययातिने कहा-राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेवअपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं; उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वेअन्तवान् न होकर चिरस्थायी हैं और आपकी प्रतीक्षा करते हैं ।। २ ।। .

वसुमानुवाच

तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातंये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु ।

क्रीणीष्वैतांस्तृणकेनापि राजन्प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन् प्रदुष्टः ।। ३ ।।

वसुमान् बोले-राजन्! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, आप नीचे न गिरें। मेरेलिये जितने पुण्यलोक हैं, वे सब आपके हो जायँ । धीमन्! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोषदिखायी देता हो तो एक मुट्ठी तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंकोखरीद लें ।। ३ ।।

ययातिरुवाच

न मिथ्याहं विक्रयं वै स्मरामिवृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः ।

कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-र्विधित्समानः किमु तत्र साधु ।। ४ ।।

ययातिने कहा-मैंने इस प्रकार कभी झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो अथवाछलपूर्वक व्यर्थ कोई वस्तु ली हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। मैं कालचक्रसे शंकित रहताहूँ। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकिमैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ।। ४ ।।

वसुमानुवाच

तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते ।

अहं न तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्रसर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु ।। ५ ।।

वसुमान् बोले-राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अरपणकिये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये, मैं उन लोकोंमें नहींजाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें ।। ५ ।।

शिबिरुवाच

पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहंममापि लोका यदि सन्तीह तात ।

यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताःक्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। ६ ।।

शिबिने कहा-तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष यास्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों, तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानताहूँ ।। ६ ।।

ययातिरुवाच

यत् त्वं वाचा हृदयेनापि साधून्परीप्समानान् नावमंस्था नरेन्द्र ।

तेनानन्ता दिवि लोकाः श्रितास्तेविद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः ।। ७ ।।

ययाति बोले-नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनकातुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लियेअनन्त लोक विद्यमान हैं, जो विद्युत्के समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्ततथा महान् हैं ।। ७ ।।

शिबिरुवाच

तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन् मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते ।

न चाहं तान् प्रतिपत्स्ये ह दत्त्वायत्र गत्वा नानुशोचन्ति धीराः ।। ८ ।।

शिबिने कहा-महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पणकिये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहींजाऊँगा। वे लोक ऐसे हैं, जहाँ जाकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करते ।। ८ ।।

ययातिरुवाच

यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव-स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः ।

तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्तेतस्माच्छिबे नाभिनन्दामि देयम् ।। ९ ।।

ययाति बोले-नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो, उसीप्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं; तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं करसकता, इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता ।। ९ ।।

अष्टक उवाच

न चेदेकैकशो राजँल्लोकान् नः प्रतिनन्दसि ।

सर्वे प्रदाय भवते गन्तारो नरकं वयम् ।। १० ।।

अष्टकने कहा-राजन्! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंकोप्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें अर्पितकरके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं ।। १० ।।

ययातिरुवाच

यदहोऽहं तद् यतध्वं सन्तः सत्याभिनन्दिनः ।

अहं तन्नाभिजानामि यत् कृतं न मया पुरा ।। ११ ।।

ययाति बोले-मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुषसत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया , उसे अब भीकरनेयोग्य नहीं समझता ।। ११ ।।

अष्टक उवाच

कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः ।

यानारुह्य नरो लोकानभिवाञ्छति शाश्वतान् ।। १२ ।।

अष्टकने कहा-आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जिनपरआरूढ़ होकर मनुष्य सनातन लोकोंमें जानेकी इच्छा करता है ।। १२ ।।

ययातिरुवाच

युष्मानेते वहिष्यन्ति रथाः पञ्च हिरण्मयाः ।

उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव ।। १३ ।।

ययाति बोले-ऊपर आकाशमें स्थित प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान जो पाँचसुवर्णमय रथ प्रकाशित हो रहे हैं, ये आपलोगोंको ही स्वर्गमें ले जायँगे ।। १३ ।।

(वैशम्पायन उवाच)

(एतस्मिन्नन्तरे चैव माधवी तु तपोधना ।

मृगचर्मपरीताङ्गी परिणामे मृगव्रतम् ।।

मृगैः सह चरन्ती सा मृगाहारविचेष्टिता ।

यज्ञवाटं मृगगणैः प्रविश्य भृशविस्मिता ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! इसी समय तपस्विनी माधवी उधर आ निकली।उसने मृगचर्मसे अपने सब अंगोंको ढक रखा था। वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर वह मृगोंके साथविचरती हुई मृगव्रतका पालन कर रही थी। उसकी भोजन-सामग्री और चेष्टा मृगोंके हीतुल्य थी। वह मृगोंके झुंडके साथ यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके अत्यन्त विस्मित हुई औरयज्ञीय धूमकी सुगन्ध लेती हुई मृगोंके साथ वहाँ विचरने लगी।

आघ्रायन्ती धूमगन्धं मृगैरेव चर्चार सा ।

यज्ञवाटमटन्ती सा पुत्रांस्तानपराजितान् ।।

यज्ञशालामें घूम-घूमकर अपने अपराजित पुत्रोंको देखती और यज्ञकी महिमाकाअनुभव करती हुई माधवी बहुत प्रसन्न हुई।

पश्यन्ती यज्ञमाहात्म्यं मुदं लेभे च माधवी ।

असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं तदा ।।

दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा ।

ततो वसुमनाः पृच्छन् मातरं वै तपस्विनीम् ।।

उसने देखा, स्वर्गवासी नहुषनन्दन महाराज ययाति आये हैं, परंतु पृथ्वीका स्पर्श नहींकर रहे हैं (आकाशमें ही स्थित हैं)। अपने पिताको पहचानकर माधवीने उन्हें प्रणाम किया। *

1.तब वसुमनाने अपनी तपस्विनी मातासे प्रश्न करते हुए कहा।

वसुमना उवाच

भवत्या यत् कृतमिदं वन्दनं वरवर्णिनि ।

कोऽयं देवोऽथवा राजा यदि जानासि मे वद ।।

वसुमना बोले-माँ! तुम श्रेष्ठ वर्णकी देवी हो। तुमने इन महापुरुषको प्रणाम कियाहै। ये कौन हैं? कोई देवता हैं या राजा? यदि जानती हो तो मुझे बताओ।

माधव्युवाच

शृणुध्वं सहिताः पुत्रा नाहुषोऽयं पिता मम ।

ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति श्रुतः ।

पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गतः ।

केन वा कारणेनैव इह प्राप्तो महायशाः ।।

माधवीने कहा-पुत्रो! तुम सब लोग एक साथ सुन लो-‘ये मेरे पिता नहुषनन्दनमहाराज ययाति हैं। मेरे पुत्रोंके सुविख्यात मातामह (नाना) ये ही हैं। इन्होंने मेरे भाई पूरुकोराज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोककी यात्रा की थी; परंतु न जाने किस कारणसे येमहायशस्वी महाराज पुन: यहाँ आये हैं’।

वैशम्पायन उवाच

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स्थानभ्रष्टेति चाब्रवीत् ।

सा पुत्रस्य वचः श्रुत्वा सम्भ्रमाविष्टचेतना ।।

माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! माताकी यह बात सुनकर वसुमनाने कहा-माँ! येअपने स्थानसे भ्रष्ट हो गये हैं। पुत्रका यह वचन सुनकर माधवी भ्रान्तचित्त हो उठी औरदौहित्रोंसे घिरे हुए अपने पितासे इस प्रकार बोली।

माधव्युवाच

तपसा निर्जिताँल्लोकान् प्रतिगृह्णीष्व मामकान् ।

पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम् ।।

स्वार्थमेव वदन्तीह ऋषयो वेदपारगाः ।

तस्माद् दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज ।।

माधवीने कहा-पिताजी! मैंने तपस्याद्वारा जिन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है,उन्हें आप ग्रहण करें। पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति पुत्री और दौहित्रोंका धर्माचरणसे प्राप्तकिया हुआ धन भी अपने ही लिये है, यह वेदवेत्ता ऋषि कहते हैं; अतः आप हमलोगोंकेदान एवं तपस्याजनित पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाइये।

ययातिरुवाच

यदि धर्मफलं हयोतच्छोभनं भविता तथा।

दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितोऽहं महात्मभिः ।।

ययाति बोले-यदि यह धर्मजनित फल है, तब तो इसका शुभ परिणाम अवश्यम्भावीहै। आज मुझे मेरी पुत्री तथा महात्मा दौहित्रोंने तारा है।तस्मात् पवित्रं दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके ।भविष्यति न संदेहः पितृणां प्रीतिवर्धनम् ।।इसलिये आजसे पितृ-कर्म (श्राद्ध)-में दौहित्र परम पवित्र समझा जायगा । इसमें संशयनहीं कि वह पितरोंका हर्ष बढ़ानेवाला होगा।

त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।

त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ।।

भोक्तारः परिवेष्टारः श्रावितारः पवित्रकाः ।

श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी जायँगी-दौहित्र, कुतप और तिल। साथ ही इसमेंतीन गुण भी प्रशंसित होंगे-पवित्रता, अक्रोध और अत्वरा (उतावलेपनका अभाव) । तथाश्राद्धमें भोजन करनेवाले, परोसनेवाले और (वैदिक या पौराणिक मन्त्रोंका पाठ)सुनानेवाले-ये तीन प्रकारके मनुष्य भी पवित्र माने जायँगे।

दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभवति भास्करे ।

स कालः कुतपो नाम पितृणां दत्तमक्षयम् ।।

दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समयका नाम कुतप है।उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है।

तिलाः पिशाचाद् रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात् ।

रक्षन्ति श्रोत्रियाः पङ्त्तिं यतिभिर्भुक्तमक्षयम् ।।

तिल पिशाचोंसे श्राद्धकी रक्षा करते हैं, कुश राक्षसोंसे बचाते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मणपंक्तिकी रक्षा करते हैं और यदि यतिगण श्राद्धमें भोजन कर लें तो वह अक्षय हो जाता है।

लब्ध्वा पात्रं तु विद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम् ।

स कालः कालतो दत्तं नान्यथा काल इष्यते ।।

उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पवित्र श्रोत्रिय ब्राह्मण श्राद्धका उत्तम पात्र है। वहजब प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल समझना चाहिये। उसको दिया हुआ दानउत्तम कालका दान है। इसके सिवा और कोई उपयुक्त काल नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान् ।

सर्वे ह्यवभृथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात् ।।)

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! बुद्धिमान् ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपनेदौहित्रोंसे बोले-‘तुम सब लोग अवभृथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकीसिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ’।

अष्टक उवाच

आतिष्ठस्व रथान् राजन् विक्रमस्व विहायसम् ।

वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति ।॥ १४ ।।

अष्टक बोले-राजन्! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये।जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे ।। १४ ।।

ययातिरुवाच

सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम् ।

एष नो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मनः ।। १५ ।।

ययाति बोले-हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समयसबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी देरहा है ।। १५ ।।

वैशम्पायन उवाच

तेऽधिरुह्य रथान् सर्वे प्रयाता नृपसत्तमाः ।

आक्रमन्तो दिवं भाभिर्ध्मेणावृत्य रोदसी।। १६ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकीप्रभा व्याप्त हो रही थी ।। १६ ।।

(अष्टकश्च शिबिश्चैव काशिराजः प्रतर्दनः ।

ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्चत्वारो भूमिपाश्च ह ।।

सर्वे ह्यवभृथस्नाताः स्वर्गताः साधवः सह ।)

अष्टक, शिबि, काशिराज प्रतर्दन तथा इक्ष्वाकुवंशी वसुमना- ये चारों साधु नरेशयज्ञान्त-स्नान करके एक साथ स्वर्गमें गये।

अष्टक उवाच

अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा ।

कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-मेकोऽत्यगात् सर्ववेगेन वाहान् ।। १७ ।।

अष्टक बोले-राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अत: मैं तो समझता था किअकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा। परंतु ये उशीनरपुत्र शिबि अकेले सम्पूर्णवेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ? ।। १७ ।।

ययातिरुवाच

अददद् देवयानाय यावद् वित्तमविन्दत ।

उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः ।। १८ ।।

ययातिने कहा-राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लियेअपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसीलिये ये तुम सब लोगोंमें श्रेष्ठ हैं ।। १८ ।।

दानं तपः सत्यमथापि धर्मो ह्री: श्रीः क्षमा सौम्यमरथो विधित्सा ।

राजन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञःशिबे: स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्ध्या ।। १९ ।।

नरेश्वर! दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्री, श्री, क्षमा, सौम्यभाव और व्रत- पालनकीअभिलाषा-राजा शिबिमें ये सभी गुण अनुपम हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवालाकोई नहीं है ।। १९ ।।

एवंवृत्तो ह्रीनिषेवश्च यस्मात् तस्माच्छिबिरत्यगाद् वै रथेन ।

राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं! (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भीनहीं गयी है।) इसीलिये शिबि हम सबसे आगे बढ़ गये हैं ।

वैशम्पायन उवाच

अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम् ।। २० ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रके तुल्यअपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया ।। २० ।।

पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं कुतश्च कश्चासि सुतश्च कस्य ।

कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता लोके त्वदन्यः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा ।। २१ ।।

महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसेआये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपकेसिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है ।। २१ ।।

ययातिरुवाचययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम् ।

गुह्यं चार्थं मामकेभ्यो ब्रवीमि मातामहोऽहं भवतां प्रकाशम् ।। २२ ।।

ययातिने कहा-मैं नहुषका पुत्र और पिता राजा ययाति हूँ। इस लोकमें मैं चक्रवर्ती नरेश था। आप सब लोग मेरे अपने हैं; अतः आपसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं आपलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ) ।। २२ ।।

सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिंगाय प्रादामहं छादनं ब्राह्मणेभ्यः ।

मेध्यानश्वानेकशतान् सुरूपां- स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति ।। २३ ।।

मैंने इस सारी पृथ्वीको जीत लिया था। मैं ब्राह्मणोंको अन्न-वस्त्र दिया करता था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं, तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं ।। २३ ।।

अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः पूर्णामिमामखिलां वाहनेन ।

गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यै- स्तदाददं गाः शतमर्बुदानि ।। २४ ।।

मैंने तो सवारी, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) गौओंका दान भी किया था । २४ ।।

सत्येन वै द्यौश्च वसुन्धरा च तथैवाग्निज्ज्वलते मानुषेषु ।

न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति ।। २५ ।।

सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा पूरुकासत्यका ही आदर करते है ।। २५ ।।

यदष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं प्रतर्दनं चौषदर्शिव तथैव ।

सर्वे च लोका मुनयश्च देवाः सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम् ।। २६ ।।

अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्वके पुत्र वसुमान्से भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ;वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे हीपूजनीय होते हैं ।। २६ ।।

यो नः स्वर्गजितः सर्वान् यथा वृत्तं निवेदयेत् ।

अनसूयु्द्धिजाग्र्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम् ।। २७ ।।

जो मनुष्य हृदयमें ईष्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इसवृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंकोप्राप्त कर लेगा ।। २७ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं राजा स महात्मा ह्यतीव स्वैदोहित्रैस्तारितोऽमित्रसाहः

त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा स्वर्गं गतः कर्मभिव्याप्य पृथ्वीम् ।। २८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा ययाति बड़े महात्मा थे। शत्रुओंके लियेअजेय और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे अपनेसत्कर्मोद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वी छड़कर स्वर्गलोकमें चलेगये ।। २८ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ त्रिनवतितमोऽध्यायः ।। ९३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ।। ९३ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं)

चतुर्नवतितमोऽध्यायः

ये वसुमान् नामसे भी प्रसिद्ध थे।

पूरुवंशका वर्णन

जनमेजय उवाच

भगवज्छ्रोतुमिच्छामि पूरोर्वशकरान् नृपान् ।

यद्वीर्यान् यादृशांश्चापि यावतो यत्पराक्रमान् ।। १ ।।

जनमेजय बोले-भगवन! अब मैं पूरुके वंशका विस्तार करनेवाले राजाओंकापरिचय सुनना चाहता हूँ। उनका बल और पराक्रम कैसा था? वे कैसे और कितनेथे? ।। १ ।।

न ह्यस्मिन् शीलहीनो वा निर्वीर्यों वा नराधिपः ।

प्रजाविरहितो वापि भूतपूर्वः कथंचन ।। २ ।।

मेरा विश्वास है कि इस वंशरमें पहले कभी किसी प्रकार भी कोई ऐसा राजा नहीं हुआहै, जो शीलरहित, बल-पराक्रमसे शून्य अथवा संतानहीन रहा हो ।। २ ।।

तेषां प्रथितवृत्तानां राज्ञां विज्ञानशालिनाम् ।

चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ।। ३ ।।

तपोधन! जो अपने सदाचारके लिये प्रसिद्ध और विवेकसम्पन्न थे, उन सभी पूरुवंशीराजाओंके चरित्रको मुझे विस्तारपूर्वक सुननेकी इच्छा है ।। ३ ।।

वैशम्पायन उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।

पूरोर्वंशधरान् वीराञ्छक्रप्रतिमतेजसः ।

भूरिद्रविणविक्रान्तान् सर्वलक्षणपूजितान् ।। ४ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-जनमेजय! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुम्हेंबताऊँगा। पूरुके वंशरमें उत्पन्न हुए वीर नरेश इन्द्रके समान तेजस्वी, अत्यन्त धनवान्, परमपराक्रमी तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित थे (उन सबका परिचय देता हूँ) ।। ४ ।।

प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः ।

पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत् ततः ।। ५ ।।

पूरुके पौष्टी नामक पत्नीके गर्भसे प्रवीर, ईश्वर तथा रौद्राश्व नामक तीन महारथी पुत्रहुए। इनमेंसे प्रवीर अपनी वंश-परम्पराको आगे बढ़ानेवाले हुए ।। ५ ।।

मनस्युरभवत् तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः ।

पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः ।। ६ ।।

प्रवीरके पुत्रका नाम मनस्यु था, जो शूरसेनीके पुत्र और शक्तिशाली थे। कमलकेसमान नेत्रवाले मनस्युने चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समस्त पृथ्वीका पालन किया।। ६ ।।

शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः ।

मनस्योरभवन् पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः ।। ७ ।।

मनस्युके सौवीरीके गर्भसे तीन पुत्र हुए- शक्त, संहनन और वाग्मी। वे सभी शूरवीरऔर महारथी थे ।। ७ ।।

अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः।

रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः ।। ८।।

यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः ।

सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः ।॥ ९ ।।

पूरुके तीसरे पुत्र मनस्वी रौद्राश्वके मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे अन्वग्भानु आदि दसमहाधनुर्धर पुत्र हुए, जो सभी यज्ञकर्ता, शूरवीर, संतानवान्, अनेक शास्त्रोंके विद्वान,सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा धर्मपरायण थे ।। ८-९ ।।

ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान् ।

स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः ।। १० ।।

तेजेयुर्बलवान् धीमान् सत्येयुश्चेन्द्रविक्रमः ।

धर्मेयुः संनतेयुश्च दशमो देवविक्रमः । ११ ।।

(उन सबके नाम इस प्रकार हैं-) ऋचेयु , कक्षेयु, पराक्रमी कृकणेयु, स्थण्डिलेयु,वनेयु, महायशस्वी जलेयु, बलवान् और बुद्धिमान् तेजेयु, इन्द्रके समान पराक्रमी सत्येयु,धर्मेयु तथा दसवें देवतुल्य पराक्रमी संनतेयु ।। १० -११ ।।

अनाधृष्टिरभूत् तेषां विद्वान् भुवि तथैकराट् ।

ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः ।। १२ ।।

ऋचेयु जिनका एक नाम अनाधृष्टि भी है, अपने सब भाइयोंमें वैसे ही विद्वान् औरपराक्रमी हुए, जैसे देवताओंमें इन्द्र। वे भूमण्डलके चक्रवर्ती राजा थे ।। १२ ।।

अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद् राजसूयाश्वमेधकृत् ।

मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः ।। १३ ।।

अनाधृष्टिके पुत्रका नाम मतिनार था। राजा मतिनार राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञकरनेवाले एवं परम धर्मात्मा थे ।। १३ ।।

मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः ।

तंसुर्महानतिरथो द्रुहुश्चाप्रतिमद्युतिः ।। १४ ।।

राजन्! मतिनारके चार पुत्र हुए, जो अत्यन्त पराक्रमी थे। उनके नाम ये हैं- तंसु,महान्, अतिरथ और अनुपम तेजस्वी द्रुह्यु ।। १४ ।।

तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्धहन् ।

आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुन्धराम् ।। १५ ।।

इनमें महापराक्रमी तंसुने पौरव वंशका भार वहन करते हुए उज्ज्वल यशका उपार्जनकिया और सारी पृथ्वीको जीत लिया ।। १५ ।।

ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान् ।

सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः ।। १६ ।।

पराक्रमी तंसुने ईलिन नामक पुत्र उत्पन्न किया , जो विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ था। उसने भीसारी पृथ्वी जीत ली थी ।। १६ ।।

रथन्तर्यां सुतान् पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः ।

ईलिनो जनयामास दुष्यन्तप्रभृतीन् नृपान् ।। १७ ।।

ईलिनने रथन्तरी नामवाली अपनी पत्नीके गर्भसे पंच महाभूतोंके समान दुष्यन्त आदिपाँच राजपुत्रोंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया।। १७ ।।

दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च ।

तेषां श्रेष्ठोऽभवद् राजा दुष्यन्तो जनमेजय ।। १८ ।।

(उनके नाम ये हैं-) दुष्यन्त, शूर, भीम, प्रवसु तथा वसु। जनमेजय! इनमें सबसे बड़ेहोनेके कारण दुष्यन्त राजा हुए ।। १८ ।।

दुष्यन्ताद् भरतो जज्ञे विद्वाञ्छाकुन्तलो नृपः ।

तस्माद् भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद् यशः ।। १९ ।।

दुष्यन्तसे विद्वान् राजा भरतका जन्म हुआ, जो शकुन्तलाके पुत्र थे। उन्हींसेभरतवंशका महान् यश फैला ।। १९ ।।

भरतस्तिसृषु स्त्रीषु नव पुत्रानजीजनत् ।

नाभ्यनन्दत तान् राजा नानुरूपा मरमेत्युत ।। २० ।।

भरतने अपनी तीन रानियोंसे नौ पुत्र उत्पन्न किये। किंतु ‘ये मेरे अनुरूप नहीं हैं’ ऐसाकहकर राजाने उन शिशुओंका अभिनन्दन नहीं किया।। २० ।।

ततस्तान् मातरः क्रुद्धाः पुत्रान् निन्युर्यमक्षयम् ।

ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितरथं पुत्रजन्म तत् ।। २१ ।।

तब उन शिशुओंकी माताओंने कुपित होकर उनको मार डाला। इससे महाराजभरतका वह पुत्रोत्पादन व्यर्थ हो गया ।। २१ ।।

ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा ।

लेभे पुत्रं भरद्वाजाद् भुमन्युं नाम भारत ।। २२ ।।

भारत! तब महाराज भरतने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया और महर्षि भरद्वाजकीकृपासे एक पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम भुमन्यु था ।। २२ ।।

ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः ।

भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।। २३ ।।

भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर पौरवकुलका आनन्द बढ़ानेवाले भरतने अपनेको पुत्रवान्समझकर भुमन्युको युवराजके पदपर अभिषिक्त किया। २३ ।।

ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत् सुतः।

सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा।। २४ ।।

पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन् सुताः ।

तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ।। २५ ।।

भुमन्युके दिविरथ नामक पुत्र हुआ। उसके सिवा सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु तथाऋचीक भी भुमन्युके ही पुत्र थे। ये सब पुष्करिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। इन सब क्षत्रियोंमेंसुहोत्र ही ज्येष्ठ थे। अतः उन्हींको राज्य मिला ।। २४-२५ ।।

राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद् बहुभिः सरवै ।

सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम् ।। २६ ।।

पूर्णा हस्तिगजाश्वैश्वच बहुरत्नसमाकुलाम्।

ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ।। २७ ।।

हस्त्यश्वरथसम्पूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् ।

सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ।। २८ ।।

राजा सुहोत्रने राजसूय तथा अश्वमेध आदि अनेक यज्ञोंद्वारा यजन किया औरसमुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका, जो हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्नथी, उपभोग किया। जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजाका शासन कर रहे थे, उस समय सारीपृथ्वी हाथी, घोड़ों, रथ और मनुष्योंसे खरचाखच भरी थी। उन पशु आदिके भारी भारसेपीड़ित होकर राजा सुहोत्रके शासनकालकी पृथ्वी मानो नीचे धँसी जाती थी ।। २६ -२८ ।।

चैत्ययूपाङ्किता चासीद् भूमिः शतसहस्रशः ।

प्रवृद्धजनसंस्या च सर्वदैव व्यरोचत ।। २९ ।।

उनके राज्यकी भूमि लाखों चैत्यों (देव-मन्दिरों) और यज्ञयूपोंसे चिह्नित दिखायी देतीथी। सब लोग हृष्ट-पुष्ट होते थे। खेतीकी उपज अधिक हुआ करती थी। इस प्रकार उसराज्यकी पृथ्वी सदा ही अपने वैभवसे सुशोभित होती थी ।। २९ ।।

ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात् पृथिवीपतेः ।

अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ।। ३० ।।

भारत! राजा सुहोत्रसे ऐक्ष्वाकीने अजमीढ, सुमीढ तथा पुरुमीढ नामक तीन पुत्रोंकोजन्म दिया ।। ३० ।।

अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन् वंशः प्रतिष्ठितः ।

षट् पुत्रान् सोऽप्यजनयत् तिसृषु स्त्रीषु भारत ।। ३१ ।।

उनमें अजमीढ ज्येष्ठ थे। उन्हींपर वंशकी मर्यादा टिकी हुई थी। जनमेजय! उन्होंने भीतीन स्त्रियोंके गर्भसे छः पुत्रोंको उत्पन्न किया । ३१ ||

ऋक्षं धूमिन्यथो नीली दुष्यन्तपरमेष्ठिनौ ।

केशिन्यजनयज्जह्वं सुतौ व्रजनरूपिणौ ।। ३२ ।।

उनकी धूमिनी नामवाली स्त्रीने ऋक्षको, नीलीने दुष्यन्त और परमेष्ठीको तथा केशिनीनेजह्न, व्रजन तथा रूपिण इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया |। ३२ ।।

तथेमे सर्वपञ्चाला दुष्यन्तपरमेष्ठिनोः ।

अन्वयाः कुशिका राजन् जह्नोरमिततेजसः ।। ३३ ।।

इनमें दुष्यन्त और परमेष्ठीके सभी पुत्र पांचाल कहलाये। राजन्! अमिततेजस्वी जहुकेवंशज कुशिक नामसे प्रसिद्ध हुए ।। ३३ ।।

व्रजनरूपिणयोज्ज्येष्ठमृक्षमाहुर्जनाधिपम् ।

ऋक्षात् संवरणो जज्ञे राजन् वंशकरः सुतः ।। ३४ ।।

व्रजन तथा रूपिणके ज्येष्ठ भाई ऋक्षको राजा कहा गया है। ऋक्षसे संवरणका जन्महुआ। राजन्! वे वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्र थे ।। ३४ ।।

आक्क्षे संवरणे राजन् प्रशासति वसुंधराम् ।

संक्षयः सुमहानासीत् प्रजानामिति नः श्रुतम् ।। ३५ ।।

जनमेजय! ऋक्षपुत्र संवरण जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय प्रजाकाबहुत बड़ा संहार हुआ था, ऐसा हमने सुना है ।। ३५ ।।

व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा ।

क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम् ।। ३६ ।।

इस तरह नाना प्रकारसे क्षय होनेके कारण वह सारा राज्य नष्ट-सा हो गया। सबकोभूख, मृत्यु, अनावृष्टि और व्याधि आदिके कष्ट सताने लगे ।। ३६ ।।

अभ्यघ्नन् भारतांश्चैव सपत्नानां बलानि च ।

चालयन् वसुधां चेमां बलेन चतुरङ्गिणा ।। ३७ ।।

अभ्ययात् तं च पाञ्चाल्यो विजित्य तरसा महीम्।

अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजयत् ।। ३८ ।।

शत्रुओंकी सेनाएँ भरतवंशी योद्धाओंका नाश करने लगीं । पांचालनरेशने इस पृथ्वीकोकम्पित करते हुए चतुरंगिणी सेनाके साथ संवरणपर आक्रमण किया और उनकी सारीभूमि वेगपूर्वक जीतकर दस अक्षौहिणी सेनाओंद्वारा संवरणको भी युद्धमें परास्त करदिया ।। ३७-३८ ।।

ततः सदारः सामात्यः सपुत्रः ससुहृज्जनः ।

राजा संवरणस्तस्मात् पलायत महाभयात् ।। ३९ ।।

तदनन्तर स्त्री, पुत्र, सुहृद् और मन्त्रियोंके साथ राजा संवरण महान् भयके कारणवहाँसे भाग चले ।। ३९ ।।

सिन्धोर्नदस्य महतो निकुञ्जे न्यवसत् तदा ।

नदीविषयपर्यन्ते पर्वतस्य समीपतः ।। ४० ।।

उस समय उन्होंने सिंधु नामक महानदके तटवर्ती निकुंजमें, जो एक पर्वतके समीपसेलेकर नदीके तटतक फैला हुआ था, निवास किया।। ४० ।।

तत्रावसन् बहून् कालान् भारता दुर्गमाश्रिताः ।

तेषां निवसतां तत्र सहस्रं परिवर्सरान् ।। ४१ ।।

वहाँ उस दुर्गका आश्रय लेकर भरतवंशी क्षत्रिय बहुत वर्षोंतक टिके रहे। उन सबकोवहाँ रहते हुए एक हजार वर्ष बीत गये ।। ४१ ।।

अथाभ्यगच्छद् भरतान् वसिष्ठो भगवानृषिः ।

तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ।। ४२ ।।

अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा।

निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे ।। ४३ ।।

तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा ।

पुरोहितो भवान् नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि ॥ ४४ ॥

इसी समय उनके पास भगवान् महर्षि वसिष्ठ आये। उन्हें आया देख भरतवंशियोंनेप्रयत्नपूर्वक उनकी अगवानी की और प्रणाम करके सबने उनके लिये अर्घ्य अर्पण किया।फिर उन तेजस्वी महर्षिको सत्कारपूर्वक अपना सर्वस्व समर्पण करके उत्तम आसनपरबिठाकर राजाने स्वयं उनका वरण करते हुए कहा -‘भगवन् ! हम पुनः राज्यके लियेप्रयत्न कर रहे हैं। आप हमारे पुरोहित हो जाइये’ ।। ४२-४४ ।।

ओमित्येवं वसिष्ठोऽपि भारतान् प्रत्यपद्यत ।

अथाभ्यषिञ्चत् साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम् ।। ४५ ।।

विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ।

भरताध्युषितं पूर्वं सोऽध्यतिष्ठत् पुरोत्तमम् ।। ४६ ।।

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर वसिष्ठजीने भी भरतवंशियोंको अपनाया और समस्तभूमण्डलमें उत्कृष्ट पूरुवंशी संवरणको समस्त क्षत्रियोंके सम्राट्-पदपर अभिषिक्त कर दिया,ऐसा हमारे सुननेमें आया है। तत्पश्चात् महाराज संवरण, जहाँ प्राचीन भरतवंशी राजा रहतेथे, उस श्रेष्ठ नगरमें निवास करने लगे ।। ४५-४६ ।।

पुनर्बलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः ।

ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महाबलः । ४७ ।।

आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।

ततः संवरणात् सौरी तपती सुषुवे कुरुम् ।। ४८ ।।

फिर उन्होंने सब राजाओंको जीतकर उन्हें करद बना लिया । तदनन्तर वे महाबलीनरेश अजमीढवंशी संवरण पुनः पृथ्वीका राज्य पाकर बहुत दक्षिणावाले बहुसंख्यकमहायज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करने लगे । कुछ कालके पश्चात् सूर्यकन्या तपतीनेसंवरणके वीर्यसे कुरु नामक पुत्रको जन्म दिया ।। ४७-४८ ।।

राजत्वे तं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वव्रिरे ।

तस्य नाम्नाभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलम् ।। ४९ ।।

कुरुको धर्मज्ञ मानकर सम्पूर्ण प्रजावरगके लोगोंने स्वयं उनका राजाके पदपर वरणकिया। उन्हींके नामसे पृथ्वीपर कुरुजांगलदेश प्रसिद्ध हुआ ।। ४९ ।।

कुरुक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः ।

अश्ववन्तमभिष्यन्तं तथा चैत्ररथं मुनिम् ।। ५० ।।

जनमेजयं च विख्यातं पुत्रांश्चास्यानुशुश्रुम ।

पञ्चैतान् वाहिनी पुत्रान् व्यजायत मनस्विनी ।। ५१ ।।

उन महातपस्वी कुरुने अपनी तपस्याके बलसे कुरुक्षेत्रको पवित्र बना दिया। उनकेपाँच पुत्र सुने गये हैं-अश्ववान्, अभिष्यन्त, चैत्रथ, मुनि तथा सुप्रसिद्ध जनमेजय । इनपाँचों पुत्रोंको उनकी मनस्विनी पत्नी वाहिनीने जन्म दिया था ।। ५० – ५१ ।।

अविक्षितः परिक्षित् तु शबलाश्वस्तु वीर्यवान् ।

आदिराजो विराजश्च शाल्मलिश्च महाबलः ।। ५२ ।।

उच्चैःश्रवा भङ्गकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः ।

एतेषामन्ववाये तु ख्यातास्ते कर्मजैर्गुणैः ।

जनमेजयादयः सप्त तथैवान्ये महारथाः ।। ५३ ।।

अश्ववान्का दूसरा नाम अविक्षित् था। उसके आठ पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं।-परिक्षित्, पराक्रमी शबलाश्व, आदिराज, विराज, महाबली शाल्मलि, उच्चैःश्रवा, भंगकारतथा आठवाँ जितारि। इनके वंशमें जनमेजय आदि अन्य सात महारथी भी हुए, जो अपनेकर्मजनित गुणोंसे प्रसिद्ध हैं ।। ५२-५३ ।।

परिक्षितोऽभवन् पुत्राः सर्वे धर्मार्थकोविदाः ।

कक्षसेनोग्रसेनौ तु चित्रसेनश्च वीर्यवान् ।। ५४ ।।

इन्द्रसेनः सुषेणश्च भीमसेनश्च नामतः ।

जनमेजयस्य तनया भुवि ख्याता महाबलाः ।। ५५ ।।

धृतराष्ट्रः प्रथमजः पाण्डुर्बाह्लीक एव च ।

निषधश्च महातेजास्तथा जाम्बूनदो बली ।। ५६ ।।

कुण्डोदरः पदातिश्च वसातिश्चाष्टमः स्मृतः ।

सर्वे धर्मार्थकुशलाः सर्वभूतहिते रताः ।। ५७ ।।

परिक्षित्के सभी पुत्र धर्म और अर्थके ज्ञाता थे; जिनके नाम इस प्रकार हैं- कक्षसेन,उग्रसेन, पराक्रमी, चित्रसेन, इन्द्रसेन, सुषेण और भीमसेन। जनमेजयके महाबली पुत्रभूमण्डलमें विख्यात थे। उनमें प्रथम पुत्रका नाम धृतराष्ट्र था । उनसे छोटे क्रमश: पाण्डु,बाह्लीक, महातेजस्वी निषध, बलवान् जाम्बूनद, कुण्डोदर, पदाति तथा वसाति थे। इनमेंवसाति आठवाँ था। ये सभी धर्म और अर्थमें कुशल तथा समस्त प्राणियोंके हितमें संलग्नरहनेवाले थे ।। ५४-५७ ।।

धृतराष्ट्रोऽथ राजाऽऽसीत् तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः ।

हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः ।। ५८ ।।

हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः ।

धृतराष्ट्रसुतानां तु त्रीनेतान् प्रथितान् भुवि ।। ५९ ।।

प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत ।

प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ।। ६० ।।

इनमें धृतराष्ट्र राजा हुए। उनके पुत्र कुण्डिक, हस्ती, वितर्क, क्राथ, कुण्डिन, हविःश्रवा,इन्द्राभ, भुमन्यु और अपराजित थे। भारत! इनके सिवा प्रतीप, धर्मनेत्र और सुनेत्र-ये तीनपुत्र और थे। धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें ये ही तीन इस भूतलपर अधिक विख्यात थे। इनमें भीप्रतीपकी प्रसिद्धि अधिक थी। भूमण्डलमें उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था ।। ५८-६० ।।

प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ ।

देवापिः शान्तनुश्चैव बाह्लीकश्च महारथः ।। ६१ ।।

देवापिश्च प्रवव्राज तेषां धर्महितेप्सया ।

शान्तनुश्च महीं लेभे बाह्लीकश्च महारथः ।। ६२ ।।

भरतश्रेष्ठ! प्रतीपके तीन पुत्र हुए-देवापि , शान्तनु और महारथी बाह्लीक। इनमेंसेदेवापि धर्माचरणद्वारा कल्याण-प्राप्तिकी इच्छासे वनको चले गये, इसलिये शान्तनु एवंमहारथी बाह्लीकने इस पृथ्वीका राज्य प्राप्त किया।। ६१-६२ ।।

भरतस्यान्वये जाताः सत्त्ववन्तो नराधिपाः ।

देवर्षिकल्पा नृपते बहवो राजसत्तमाः । ६३ ।।

राजन्! भरतके वंशरमें सभी नरेश धैर्यवान् एवं शक्तिशाली थे उस वंशमें बहुत से श्रेष्ठनृपतिगण देवर्षियोंके समान थे ।। ६३ ।।

एवंविधाश्चाप्यपरे देवकल्पा महारथाः ।

जाता मनोरन्ववाये ऐलवंशविवर्धनाः ।। ६४ ।।

ऐसे ही और भी कितने ही देवतुल्य महारथी मनुवंशमें उत्पन्न हुए थे, जो महाराज पुरूरवाके वंशकी वृद्धि करनेवाले थे ।। ६४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्यायः।। ९४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशवर्णनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९४ ।।

* ऋचेयु, अन्वग्भानु और अनाधृष्टि एक ही व्यक्तिके नाम हैं।

Vyasa Sewaka
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