।। श्रीहरिः ।।
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत
महाभारत (प्रथम खण्ड)
[आदिपर्व और सभापर्व]
(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवाद)
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदिके जन्म तथा भीष्मजीके धर्मपूर्ण शासनसे कुरुदेशकी सर्वांगीण उन्नतिका दिग्दर्शन
वैशम्पायन उवाच
(धृतराष्ट्रे च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि ।)
तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् ।
कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर-इन तीनोंकुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र – इन तीनोंकी बड़ी उन्नतिहुई ।। १ ।।
ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च ।
यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ।। २ ।।
पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीकसमयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत-से फल और फूल लगने लगे ।। २ ।।
वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः ।
गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ।। ३ ।।
घोड़े-हाथी आदि वाहन हष्ट-पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे,फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ।। ३ ।।
वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभि: ।
शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन्।। ४ ।।
सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे ।शूर-वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ।। ४ ।।
नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः।
प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ।। ५ ।।
कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था। पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था।राष्ट्रके विभिन्न प्रान्तोंमें सत्ययुग छा रहा था ।। ५ ।।
धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः ।
अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ।। ६ ।।
उस समयकी प्रजा सत्य-व्रतके पालनमें तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ-कर्ममें लगी रहतीऔर धर्मानुकूल कर्मोंमें संलग्न रहकर एक-दूसरेको प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथपरबढ़ती जाती थी ।। ६ ।।
मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः ।
अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ।। ७ ।।
सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे। लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानताथी ।। ७ ।।
तन्महोदधिवत् पूर्ण नगरं वै व्यरोचत ।
द्वारतोरणनि्यूहैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ।। ८ ।।
समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा-पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े-बड़ेदरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ।। ८ ।।
प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् ।
नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु ।
काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ।। ९ ।।
सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी।वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे-छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीयकाननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ।। ९ ।।
उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा।
विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ।। १० ।।
उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियोंतथा चारणोंके साथ होड़-सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ।। १० ।।
नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः ।
तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ॥ ११ ।।
कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवास्त्रियाँ देखी जाती थीं ।। ११ ।।
कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा ।
बभूवुः सर्वद्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्रे सदोत्सवाः ।। १२ ।।
उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकीसमृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य-नूतन उत्सव हुआ करते थे ।। १२ ।।
भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते ।
बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ।। १३ ।।
जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेशसैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ।। १३ ।।
स देशः परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः ।
भीष्मेण विहितं राष्ट्रे धर्मचक्रमवर्तत ।। १४ ।।
वह देश दूसरे राष्ट्रोंका भी शोधन करके निरन्तर उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहा था।राष्ट्रमें सब ओर भीष्मजीके द्वारा चलाया हुआ धर्मका शासन चल रहा था ।। १४ ।।
क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् ।
पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः सततोत्सवाः ।। १५ ।।
उन महात्मा कुमारोंके यज्ञोपवीतादि संस्कार किये जानेके समय नगर और देशके सभीलोग निरन्तर उत्सव मनाते थे ।। १५ ।।
गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप ।
दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ।। १६ ।।
जनमेजय! कुरुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य नगरनिवासियोंके घरोंमें सदासब ओर यही बात सुनायी देती थी कि ‘दान दो और अतिथियोंको भोजनकराओ’ ।। १६ ।।
धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः ।
जन्मप्रभृति भीष्मेण पुत्रवत् परिपालिताः ।। १७ ।।
धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा परम बुद्धिमान् विदुर-इन तीनों भाइयोंका भीष्मजीने जन्मसे हीपुत्रकी भाँति पालन किया ।। १७ ।।
संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्ययनसंयुताः ।
श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ।। १८ ।।
उन्होंने ही उनके सब संस्कार कराये। फिर वे ब्रह्मचर्यक्रतके पालन और वेदोंकेस्वाध्यायमें तत्पर हो गये। परिश्रम और व्यायाममें भी उन्होंने बड़ी कुशलता प्राप्त की। फिरधीरे-धीरे वे युवावस्थाको प्राप्त हुए ।। १८ ।।
धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि ।
तथैव गरजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ।। १९ ।।
धनुर्वेद, घोड़ेकी सवारी, गदायुद्ध, ढाल-तलवारके प्रयोग, गरजशिक्षा तथा नीतिशास्त्रमेंवे तीनों भाई पारंगत हो गये ।। १९ ।।
इतिहासपुराणेषु नानाशिक्षासु बोधिताः ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ।। २० ।।
उन्हें इतिहास, पुराण तथा नाना प्रकारके शिष्टाचारोंका भी ज्ञान कराया गया। वे वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वत्र एक निश्चित सिद्धान्तके माननेवाले थे ।। २० ।।
पाण्डुर्धनुषि विक्रान्तो नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् ।
अन्येभ्यो बलवानासीद् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।। २१ ।।
पाण्डु धनुर्विद्यामें उस समयके मनुष्योंमें सबसे बढ़-चढ़कर पराक्रमी थे। इसी प्रकारराजा धृतराष्ट्र दूसरे लोगोंकी अपेक्षा शारीरिक बलमें बहुत बढ़कर थे ।। २१ ।।
त्रिषु लोकेषु न त्वासीत् कश्चिद् विदुरसम्मितः ।
धर्मनित्यस्तथा राजन् धर्मे च परमं गतः ।। २२ ।।
राजन्! तीनों लोकोंमें विदुरजीके समान दूसरा कोई भी मनुष्य धर्मपरायण तथा धर्मेंऊँची अवस्थाको प्राप्त (आत्मद्रष्टा)* नहीं था ।। २२ ।।
प्रणष्टं शन्तनोर्वंशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् ।
ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ।। २३ ।।
नष्ट हुए शान्तनुके वंशका पुनः उद्धार हुआ देखकर समस्त राष्ट्रके लोग परस्पर कहनेलगे- ।। २३ ।।
वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् ।
सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ।। २४ ।।
धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद् राज्यं न प्रत्यपद्यत ।
पारसवत्वाद् विदुरो राजा पाण्डुर्बभूव ह।। २५ ।।
‘वीर पुत्रोंको जन्म देनेवाली स्त्रियोंमें काशिराजकी दोनों पुत्रियाँ सबसे श्रेष्ठ हैं, देशोंमेंकुरुजांगल देश सबसे उत्तम है, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें भीष्मजीका स्थान सबसे ऊँचा है तथानगरोंमें हस्तिनापुर सर्वोत्तम है।’ धृतराष्ट्र अंधे होनेके कारण और विदुरजी पारशव (शूद्राकेगर्भसे ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न) होनेसे राज्य न पा सके; अतः सबसे छोटे पाण्डु ही राजाहुए ।। २४-२५ ।।
कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः ।
विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ।। २६ ।।
एक समयकी बात है, सम्पूर्ण नीतिज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वकोजाननेवाले विदुरजीसे इस प्रकार न्यायोचित वचन बोले ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि
पाण्डुराज्याभिषेकेऽष्टाधिकशततमोऽध्यायः || १०८।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुराज्याभिषेकविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०८ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)
‘अयं तु परमो धर्मों यद् योगेनात्मदर्शनम्’ याज्ञवल्क्यस्मृतिके इस कथनके अनुसार आत्मदर्शन ही सबसे उत्कृष्ट धर्महै।
नवाधिकशततमोऽध्यायः
राजा धृतराष्ट्रका विवाह
भीष्म उवाच
गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् ।
अत्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक् । । १ ।।
भीष्मजीने कहा-बेटा विदुर! हमारा यह कुल अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न होकर इसजगत्में विख्यात हो रहा है। यह अन्य भूपालोंको जीतकर इस भूमण्डलके साम्राज्यकाअधिकारी हुआ है ।। १ ।।
रक्षितं राजभिः पूर्वं धर्मविद्धिर्महात्मभिः ।
नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम् ।। २ ।।
पहलेके धर्मज्ञ एवं महात्मा राजाओंने इसकी रक्षा की थी; अतः हमारा यह कुल इसभूतलपर कभी उच्छिन्न नहीं हुआ ।। २ ।।
मया च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना ।
समवस्थापितं भूयो युष्मासु कुलतन्तुषु ।। ३ ।।
(बीचमें संकटकाल उपस्थित हुआ था किंतु) मैंने, माता सत्यवतीने तथा महात्माश्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने मिलकर पुनः इस कुलको स्थापित किया है। तुम तीनों भाई इसकुलके तंतु हो और तुम्हींपर अब इसकी प्रतिष्ठा है ।। ३ ।।
तच्चैतद् वर्धते भूयः कुलं सागरवद् यथा ।
तथा मया विधातव्यं त्वया चैव न संशयः ।। ४ ।।
वत्स! यह हमारा वही कुल आगे भी जिस प्रकार समुद्रकी भाँति बढ़ता रहे, नि:संदेहवही उपाय मुझे और तुम्हें भी करना चाहिये ।। ४ ।।
श्रूयते यादवी कन्या स्वनुरूपा कुलस्य नः ।
सुबलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य च ।। ५ ।।
सुना जाता है, यदुवंशी शूरसेनकी कन्या पृथा (जो अब राजा कुन्तिभोजकी गोद लीहुई पुत्री है) भलीभाँति हमारे कुलके अनुरूप है। इसी प्रकार गान्धारराज सुबल औरमद्रनरेशके यहाँ भी एक-एक कन्या सुनी जाती है ।। ५ ।।
कुलीना रूपवत्यश्च ताः कन्याः पुत्र सर्वशः ।
उचिताश्चैव सम्बन्धे तेऽस्माकं क्षत्रियर्षभाः ।। ६ ।।
बेटा! वे सब कन्याएँ बड़ी सुन्दरी तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं । वे श्रेष्ठ क्षत्रियगण हमारेसाथ विवाह-सम्बन्धकरनेके सर्वथा योग्य हैं ।। ६ । ।
मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर ।
संतानार्थं कुलस्यास्य यद् वा विदुर मन्यसे ।। ७ ।।
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुर! मेरी राय है कि इस कुलकी संतानपरम्पराको बढ़ानेके लियेउक्त कन्याओंका वरण करना चाहिये अथवा जैसी तुम्हारी सम्मति हो, वैसा कियाजाय ।। ७ ।।
विदुर उवाच
भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।
तस्मात् स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम् ।। ८ ।।
विदुर बोले-प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही माता हैं और आप ही परम गुरु हैं;अतः स्वयं विचार करके जिस बातमें इस कुलका हित हो, वह कीजिये ।। ८ ।।
वैशम्पायन उवाच
अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारीं सुबलात्मजाम् ।
आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् ।। ९ ।।
गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा ।
इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ।। १० ।।
ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत ।
अचक्षुरिति तत्रासीत् सुबलस्य विचारणा ।। ११ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इसके बाद भीष्मजीने ब्राह्मणोंसे गान्धारराजसुबलकी पुत्री शुभलक्षणा गान्धारीके विषयमें सुना कि वह भगदेवताके नेत्रोंका नाशकरनेवाले वरदायक भगवान् शंकरकी आराधना करके अपने लिये सौ पुत्र होनेका वरदानप्राप्त कर चुकी है। भारत! जब इस बातका ठीक-ठीक पता लग गया, तब कुरुपितामहभीष्मने गान्धारराजके पास अपना दूत भेजा। धृतराष्ट्र अंधे हैं, इस बातको लेकर सुबलकेमनमें बड़ा विचार हुआ ।। ९-११ ।।
कुलं ख्यातिं च वृत्तं च बुद्धया तु प्रसमीक्ष्य सः ।
दरदौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारीं धर्मचारिणीम् ।। १२ ।।
परंतु उनके कुल, प्रसिद्धि और आचार आदिके विषयमें बुद्धिपूर्वक विचार करके उसनेधर्मपरायणा गान्धारीका धृतराष्ट्रके लिये वाग्दान कर दिया ।। १२ ।।
गान्धारी त्वथ शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् ।
आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ।। १३ ।।
ततः सा पट्टमादाय कृत्वा बहुगुणं तदा ।
बबन्ध नेत्रे स्वे राजन् पतिव्रतपरायणा ।। १४ ।।
नाभ्यसूयां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चया ।
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् ।। १५ ।।
स्वसारं वयसा लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् ।
तां तदा धृतराष्ट्राय दर्दौ परमसत्कृताम्।
भीष्मस्यानुमते चैव विवाहं समकारयत् ।। १६ ।।
जनमेजय! गान्धारीने जब सुना कि धृतराष्ट्र अंधे हैं और पिता-माता मेरा विवाह उन्हींके साथ करना चाहते हैं, तब उन्होंने रेशमी वस्त्र लेकर उसके कई तह करके उसीसे अपनी आँखें बाँध लीं। राजन्! गान्धारी बड़ी पतिव्रता थीं | उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मैं (सदा पतिके अनुकूल रहूँगी,) उनके दोष नहीं देखूंगी । तदनन्तर एक दिन गान्धारराजकुमार शकुनि युवावस्था तथा लक्ष्मीके समान मनोहर शोभासे अपनी बहिन गान्धारीको साथ लेकर कौरवोंके यहाँ गये और उन्होंने बड़े आदर-सत्कारके साथ धृतराष्ट्रको अपनी बहिन सौंप दी। शकुनिने भीष्मजीकी सम्मतिके अनुसार विवाह- कार्य सम्पन्न किया ।। १३-१६ ।।
दत्त्वा स भगिनीं वीरो यथाह्हं च परिच्छदम् ।
पुनरायात् स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः ।। १७ ।।
वीरवर शकुनिने अपनी बहिनका विवाह करके यथायोग्य दहेज दिया। बदलेमें भीष्मजीने भी उनका बड़ा सम्मान किया। तत्पश्चात् वे अपनी राजधानीको लौट आये ।। १७ ।।
गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः ।
तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत ।। १८ ।।
भारत! सुन्दर शरीरवाली गान्धारीने अपने उत्तम स्वभाव सदाचार तथा सद्व्यवहारोंसे समस्त कौरवोंको प्रसन्न कर लिया ।। १८ ।।
वृत्तेनाराध्य तान् सर्वान् गुरून् पतिपरायणा ।
वाचापि पुरुषानन्यान् सुव्रता नान्यकीर्तयत् ।। १९ ।।
इस प्रकार सुन्दर बर्तावसे समस्त गुरुजनोंकी प्रसन्नता प्राप्त करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिपरायणा गान्धारीने कभी दूसरे पुरुषोंका नामतक नहीं लिया ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रविवाहे नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रविवाहविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।
दशाधिकशततमोऽध्यायः
कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको
कवच और कुण्डलोंका दान
वैशम्पायन उवाच शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् ।
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ शूरसेन हो गये हैं, जो वसुदेवजीके पिता थे। उन्हें एक कन्या हुई, जिसका नाम पृथा रखा गया। इस भूमण्डलमें उसके रूपकी तुलनामें दूसरी कोई स्त्री नहीं थी ।। १ ।।
पितृष्वस्त्रीयाय स तामनपत्याय भारत ।
अग्रयमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक् ।। २ ।।
भारत! सत्यवादी शूरसेनने अपने फुफेरे भाई संतानहीन कुन्तिभोजसे पहले ही यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि मैं तुम्हें अपनी पहली संतान भेंट कर दूँगा ।। २ ।।
अग्रजामथ तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षिणे ।
प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने ।। ३ ।।
उन्हें पहले कन्या ही उत्पन्न हुई। अतः कृपाकांक्षी महात्मा सखा राजा कुन्तिभोजको उनके मित्र शूरसेनने वह कन्या दे दी ।। ३ ।।
सा नियुक्ता पितुर्गेहे देवताऽतिथिपूजने ।
उग्रं पर्यचरत् तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।। ४ ।।
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः ।
तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत् ।। ५ ।।
पिता कुन्तिभोजके घरपर पृथाको देवताओंके पूजन और अतिथियोंके सत्कारका कार्य सौंपा गया था। एक समय वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्मके विषयमें अपने निश्चयको सदा गुप्त रखनेवाले एक ब्राह्मण महर्षि आये, जिन्हें लोग दुर्वासाके नामसे जानते हैं। पृथा उनकी सेवा करने लगी। वे बड़े उग्र स्वभावके थे। उनका हृदय बड़ा कठोर था; फिर भी राजकुमारी पृथाने सब प्रकारके यत्नोंसे उन्हें पूर्ण संतुष्ट कर लिया ।। ४-५ ।।
तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया ।
अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनिः ।। ६ ।।
दुर्वासाजीने पृथापर आनेवाले भावी संकटका विचार करके उनके धर्मकी रक्षाके लियेउसे एक वशीकरणमन्त्र दिया और उसके प्रयोगकी विधि भी बता दी। तत्पश्चात् वे मुनिउससे बोले-।। ६ ।।
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
तस्य तस्य प्रसादेन पुत्रस्तव भविष्यति ।। ७ ।।
‘शुभे! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीकेअनुग्रहसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा’ ।। ७ ।।
तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता ।
कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ।। ८ ।।
ब्रह्मर्षि दुर्वासाके यों कहनेपर कुन्तीके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। वह यशस्विनीराजकन्या यद्यपि अभी कुमारी थी, तो भी उसने मन्त्रकी परीक्षाके लिये सूर्यदेवका आवाहनकिया ।। ८ ।।
सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम् ।
विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महद्भुतम् ।। ९ ।।
आवाहन करते ही उसने देखा, सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान्भास्कर आ रहे हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर निर्दोष अंगोंवाली कुन्ती चकित होउठी ।। ९ ।।
तां समासाद्य देवस्तु विवस्वानिदमब्रवीत् ।
अयमस्म्यसितापाङ्गि ब्रुहि किं करवाणि ते ।। १० ।।
इधर भगवान् सूर्य उसके पास आकर इस प्रकार बोले-‘श्याम नेत्रोंवाली कुन्ती! यहमैं आ गया। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करू? ।। १० ।।
(आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम् ।
विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्क शुचिस्मिते ।।)
‘भद्रे! मैं दुर्वासा ऋषिके दिये हुए मन्त्रसे प्रेरित हो तुम्हारे बुलाते ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्तिकरानेके लिये उपस्थित हुआ हूँ। पवित्र मुसकानवाली कुन्ती! तुम मुझे सूर्यदेव समझो।’
कुन्त्युवाच
कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद् वरं विद्यां च शत्रुहन् ।
तद्विजिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो ।। ११ ।।
कुन्तीने कहा-शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभो ! एक ब्राहम्मणने मुझे वरदानके रूपमेंदेवताओंके आवाहनका मन्त्र प्रदान किया है। उसीकी परीक्षाके लिये मैंने आपका आवाहनकिया था ।। ११ ।।
एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये ।
योषितो हि सदा रक्ष्याः स्वापराद्धापि नित्यशः ।। १२ ।।
यद्यपि मुझसे यह अपराध हुआ है, तो भी इसके लिये आपके चरणोंमें मस्तक रखकरमैं यह प्रार्थना करती हूँ कि आप क्षमापूर्वक प्रसन्न हो जाइये। स्त्रियोंसे अपना अपराध होजाय, तो भी श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा उनकी रक्षा ही करनी चाहिये ।। १२ ।।
सूर्य उवाच
वेदाहं सर्वमेवैतद् यद् दुर्वासा वरं दरदौ ।
संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां संगमो मम ।। १३ ।।
सूर्यदेव बोले-शुभे! मैं यह सब जानता हूँ कि दुर्वासाने तुम्हें वर दिया है। तुम भयछोड़कर यहाँ मेरे साथ समागम करो ।। १३ ।।
अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे ।
वृथाह्वानेऽपि ते भीरु दोषः स्वान्नात्र संशयः ।। १४ ।।
शुभे! मेरा दर्शन अमोघ है और तुमने मेरा आवाहन किया है। भीरु! यदि यह आवाहनव्यर्थ हुआ, तो भी निःसंदेह तुम्हें बड़ा दोष लगेगा ।। १४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता बहुविधं सान्त्वपूर्वं विवस्वता ।
सा तु नैच्छद् वरारोहा कन्याहमिति भारत ।। १५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-भारत! भगवान् सूर्यने कुन्तीको समझाते हुए इस तरहकीबहुत-सी बातें कहीं; किंतु मैं अभी कुमारी कन्या हूँ, यह सोचकर सुन्दरी कुन्तीने उनसेसमागमकी इच्छा नहीं की ।। १५ ।।
बन्धुपक्षभयाद् भीता लज्जया च यशस्विनी ।
तामर्कः पुनरेवेदमब्रवीद् भरतर्षभ ।। १६ ।।
यशस्विनी कुन्ती भाई-बन्धुओंमें बदनामी फैलनेके डरसे भी डरी हुई थी औरनारीसुलभ लज्जासे भी वह विवश थी। भरतश्रेष्ठ! उस समय सूर्यदेवने पुनः उससे कहा।। १६ ।।
(पुत्रस्ते निर्मितः सुभ्रु शृणु यादृक्छुभानने ।।
आदित्ये कुण्डले बिभ्रत् कवचं चैव मामकम् ।
शस्त्रास्त्राणामभेद्यं च भविष्यति शुचिस्मिते ॥
न न किंचन देयं तु ब्राह्मणेभ्यो भविष्यति ।
चोद्यमानो मया चापि नाक्षमं चिन्तयिष्यति ।
दास्यत्येव हि विप्रेभ्यो मानी चैव भविष्यति ।।)
‘सुन्दर मुख एवं सुन्दर भौंहोंवाली राजकुमारी! तुम्हारे लिये जैसे पुत्रका निर्माण होगा ,वह सुनो-शुचिस्मिते! वह माता अदितिके दिये हुए दिव्य कुण्डलों और मेरे कवचकोधारण किये हुए उत्पन्न होगा। उसका वह कवच किन्हीं अस्त्र- शस्त्रोंसे टूट न सकेगा। उसकेपास कोई भी वस्तु ब्राह्मणोंके लिये अदेय न होगी। मेरे कहनेपर भी वह कभी अयोग्य कार्यया विचारको अपने मनमें स्थान न देगा। ब्राहम्मणोंके याचना करनेपर वह उन्हें सब प्रकारकीवस्तुएँ देगा ही। साथ ही वह बड़ा स्वाभिमानी होगा।
मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत ।
एवमुक्त्वा स भगवान् कुन्तिराजसुतां तदा ।। १७ ।।
प्रकाशकर्ता तपनः सम्बभूव तया सह ।
तत्र वीरः समभवत् सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
आमुक्तकवचः श्रीमान् देवगर्भः श्रियान्वितः ।। १८ ।।
‘रानी! मेरी कृपासे तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा। कुन्तिराजकुमारी कुन्तीसे यों कहकरप्रकाश और गरमी उत्पन्न करनेवाले भगवान् सूर्यने उसके साथ समागम किया। इससे उसीसमय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने जन्मसे ही कवचपहन रखा था और वह देवकुमारके समान तेजस्वी तथा शोभासम्पन्न था ।। १७-१८ ।।
सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ।
अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।। १९ ।।
जन्मके साथ ही कवच धारण किये उस बालकका मुख जन्मजात कुण्डलोसेप्रकाशित हो रहा था। इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकोंमें विख्यातहै ।। १९ ।।
प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः ।
दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः ।। २० ।।
उत्तम प्रकाशवाले भगवान् सूर्यने कुलीको पुनः कन्यात्व प्रदान किया। तत्पश्चात्तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्य देवलोकमें चले गये ।। २० ।।
दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वाष्णेयी दीनमानसा ।
एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ।। २१ ।।
उस नवजात कुमारको देखकर वृष्णिवंशकी कन्या कुलीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ।उसने एकाग्रचितसे विचार किया कि अब क्या करनेसे अच्छा परिणाम निकलेगा ।। २१ ।।
गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात् तदा ।
उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ।। २२ ।।
उस समय कुटुम्बीजनोंके भयसे अपने उस अनुचित कृत्यको छिपाती हुई कुन्तीनेमहाबली कुमार कर्णको जलमें छोड़ दिया ।। २२ ।।
तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशाः ।
पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ।॥ २३ ।।
जलमें छोड़े हुए उस नवजात शिशुको महायशस्वी सूतपुत्र अधिरथने, जिसकीपत्नीका नाम राधा था, ले लिया। उसने और उसकी पत्नीने उस बालकको अपना पुत्र बनालिया ।। २३ ।।
नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तायुभौ ।
वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवत्विति ।। २४ ।।
उन दम्पतिने उस बालकका नामकरण इस प्रकार किया; यह वसु (कवच-कुण्डलादिधन)-के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिये वसुषेण नामसे प्रसिद्ध हो ।। २४ ।।
स वर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेपूद्यतोऽभवत् ।
आ पृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान् ।। २५ ।।
वह बलवान् बालक बड़े होनेके साथ ही सब प्रकारकी अस्त्रविद्यामें निपुण हुआ।पराक्रमी कर्ण प्रातःकालसे लेकर जबतक सूर्य पृष्ठभागकी ओर न चले जाते, सूर्योपस्थानकरता रहता था ।। २५ ।।
तस्मिन् काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः ।
नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् किंचिद् वसु महीतले ।। २६ ।
उस समय मन्त्र-जपमें लगे हुए बुद्धिमान-वीर कर्णके लिये इस पृथ्वीपर कोई ऐसीवस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे सके ।। २६ ।।
(ततः काले तु कस्मिंश्चिचत् स्वप्नान्ते कर्णमब्रवीत् ।
आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शृणु वीर वचो मम ।।
प्रभातायां रजन्यां त्वामारगमिष्यति वासवः ।
न तस्य भिक्षा दातव्या विप्ररूपी भविष्यति ।।
निश्चयोऽस्यापहर्तुं ते कवचं कुण्डले तथा ।
अतस्त्वां बोधयाम्येष स्मत्तासि वचनं मम ।।
किसी समयकी बात है, सूर्यदेवने ब्राह्मणका रूप धारण करके कर्णको स्वप्नमें दर्शनदिया और इस प्रकार कहा-‘वीर! मेरी बात सुनो- आजकी रात बीत जानेपर सबेरा होतेही इन्द्र तुम्हारे पास आयेंगे। उस समय वे ब्राह्मण-वेषमें होंगे। यहाँ आकर इन्द्र यदि तुमसेभिक्षा माँगें तो उन्हें देना मत। उन्होंने तुम्हारे कवच और कुण्डलोंका अपहरण करनेकानिश्चय किया है। अत: मैं तुम्हें सचेत किये देता हूँ। तुम मेरी बात याद रखना।’
कर्ण उवाच
शक्रो मां विप्ररूपेण यदि वै याचते द्विज ।
कथं चास्मै न दास्यामि यथा चास्म्यव्ोधितः ।।
विप्राः पूज्यास्तु देवानां सततं प्रियमिच्छताम् ।
तं देवदेवं जानन् वै न शक्नोम्यवमन्त्रणे ।।
कर्णने कहा-ब्रह्मन्! इन्द्र यदि ब्राह्मणका रूप धारण करके सचमुच मुझसे याचनाकरेंगे, तो मैं आपकी चेतावनीके अनुसार कैसे उन्हें वह वस्तु नहीं दूँगा। ब्राह्मण तो सदाअपना प्रिय चाहनेवाले देवताओंके लिये भी पूजनीय हैं। देवाधिदेव इन्द्र ही ब्राह्मणरूपमेंआये हैं, यह जान लेनेपर भी मैं उनकी अवहेलना नहीं कर सकूँगा ।
सूर्य उवाच
यद्येवं शृणु मे वीर वरं ते सोऽपि दास्यति ।
शक्तिं त्वमपि याचेथाः सर्वशस्त्रविबाधिनीम् ।।
सूर्य बोले-वीर! यदि ऐसी बात है तो सुनो, बदलेमें इन्द्र भी तुम्हें वर देंगे। उस समयतुम उनसे सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका निराकरण करनेवाली बरछी माँग लेना।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा द्विजः स्वप्ते तत्रैवान्तरधीयत ।
कर्णः प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत् तदा ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं-स्वप्नमें यों कहकर ब्राह्मण-वेषधारी सूर्य वहीं अन्तर्धान होगये। तब कर्ण जाग गया और स्वप्नकी बातोंका चिन्तन करने लगा।
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षार्थी समुपागमत् ।
कुण्डले प्रार्थयामास कवचं च महाद्युतिः ।। २७ ।।
तत्पश्चात् एक दिन महातेजस्वी देवराज इन्द्र ब्राह्मण बनकर भिक्षाके लिये कर्णके पासआये और उससे उन्होंने कवच और कुण्डलोंको माँगा ।। २७ ।।
स्वशरीरात् समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम् ।
कर्णस्तु कुण्डले छित्त्वा प्रायच्छत् कृताञ्जलिः ।। २८ ।।
तब कर्णने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रको अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कवचकोशरीरसे उधेड़कर एवं दोनों कुण्डलोंको भी काटकर दे दिया ।। २८ ।।
प्रतिग्रह तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा ।
(अहो साहसमित्येवं मनसा वासवो हसन् ।
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।।
न तं पश्यामि को होततू कर्म कर्ता भविष्यति ।
प्रीतोऽस्मि कर्मणा तेन वरं वृणु यमिच्छसि ।।
कवच और कुण्डलोंको लेकर उसके इस कर्मसे संतुष्ट हो इन्द्रने मन-ही-मन हँसते हुएकहा-‘अहो! यह तो बड़े साहसका काम है । देवता, दानव , यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस-इनमेंसे किसीको भी मैं ऐसा साहसी नहीं देखता। भला, कौन ऐसा कार्य कर सकता है।’यों कहकर वे स्पष्ट वाणीमें बोले-‘वीर! मैं तुम्हारे इस कर्मसे प्रसन्न हूँ, इसलिये तुम जोचाहो, वही वर मुझसे माँग लो।’
कर्ण उवाच
इच्छामि भगवहत्तां शक्तिं शत्रुनिबर्हणीम् ।।
कर्णने कहा-भगवन्! मैं आपकी दी हुई वह अमोघ बरछी चाहता हूँ, जो शत्रुओंकासंहार करनेवाली है।
वैशम्पायन उवाच
ददौ शक्तिं सुरपतिर्वाक्यं चेदमुवाच ह ।। २९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-तब देवराज इन्द्रने बदलेमें उसे अपनी ओरसे एक बरछीप्रदान की और कहा-।। २९ ।।
देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
यमेकं जेतुमिच्छेथाः सोऽनया न भविष्यति ।। ३० ।।
‘वीरवर! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसोंमेंसे जिस एकको जीतनाचाहोगे, वही इस शक्तिके प्रहारसे नष्ट हो जायगा’ ।। ३० ।।
प्राङ् नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ ।
कर्णों वैकर्तनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत् ।। ३१ ।।
पहले इस पृथ्वीपर उसका नाम वसुषेण कहा जाता था। तत्पश्चात् अपने शरीरसेकवचको कतर डालनेके कारण वह कर्ण और वैकर्तन नामसे भी प्रसिद्ध हुआ ।। ३१ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णसम्भवे दशाधिकशततमोऽध्यायः।। ११० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४४३ श्लोक हैं)
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
कुन्तीद्वारा स्वयंवरमें पाण्डुका वरण और उनके साथ
विवाह
वैशम्पायन उवाच
सत्त्वरूपगुणोपेता धर्मारामा महाव्रता ।
दुहिता कुन्तिभोजस्य पृथा पृथुललोचना ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा कुन्तिभोजकी पुत्री विशाल नेत्रोंवालीपृथा धर्म, सुन्दर रूप तथा उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी। वह एकमात्र धर्ममें ही रत रहनेवालीऔर महान् व्रतोंका पालन करनेवाली थी ।। १ ।।
तां तु तेजस्विनीं कन्यां रूपयौवनशालिनीम् ।
व्यवृण्वन् पार्थिवाः केचिदतीव स्त्रीगुणैर्युताम् ।। २ ।।
स्त्रीजनोचित सर्वोत्तम गुण अधिक मात्रामें प्रकट होकर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ।मनोहर रूप तथा युवावस्थासे सुशोभित उस तेजस्विनी राजकन्याके लिये कई राजाओंनेमहाराज कुन्तिभोजसे याचना की ।। २ ।।
ततः सा कुन्तिभोजेन राज्ञाऽऽहूय नराधिपान् ।
पित्रा स्वयंवरे दत्ता दुहिता राजसत्तम ।। ३ ।।
राजेन्द्र! तब कन्याके पिता राजा कुन्तिभोजने उन सब राजाओंको बुलाकर अपनीपुत्री पृथाको स्वयंवरमें उपस्थित किया ।। ३ ।।
ततः सा रङ्गमध्यस्थं तेषां राज्ञां मनस्विनी ।
ददर्श राजशार्दूलं पाण्डु भरतसत्तमम् ।।४ ।।
मनस्विनी कुन्तीने सब राजाओंके बीच रंगमंचपर बैठे हुए भरतवंशशिरोमणि नृपश्रेष्ठपाएको देखा ।। ४ ।।
सिंहदर्पं महोरस्कं वृषभाक्षं महाबलम् ।
आदित्यमिव सर्वेषां राज्ञां प्रच्छाद्य वै प्रभाः ।। ५ ।।
उनमें सिंहके समान अभिमान जाग रहा था। उनकी छाती बहुत चौड़ी थी। उनके नेत्रबैलकी आँखोंके समान बड़े-बड़े थे। उनका बल महान् था। वे सब राजाओंकी प्रभाकोअपने तेजसे आच्छादित करके भगवान् सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ।। ५ ।।
तिष्ठन्तं राजसमितौ पुरन्दरमिवापरम् ।
तं दृष्टवा सानवद्याङ्गी कुन्तिभोजसुता शुभा ।। ६ ।।
पाण्डुं नरवरं रङ्गे हृदयेनाकुलाभवत् ।
ततः कामपरीताङ्गी सकृत् प्रचलमानसा।। ७ ।।
उस राजसमाजमें वे द्वितीय इन्द्रके समान विराजमान थे। निर्दोष अंगोंवाली कुन्तिभोजकुमारी शुभलक्षणा कुन्ती स्वयंवरकी रंगभूमिमें नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर मन- ही-मन उन्हें पानेके लिये व्याकुल हो उठी। उसके सब अंग कामसे व्याप्त हो गये और चित्त एकबारगी चंचल हो उठा ।। ६-७ ।।
व्रीडमाना स्रजं कुन्ती राज्ञः स्कन्धे समासजत् ।
तं निशम्य वृतं पाण्डुं कुन्त्या सर्वे नराधिपाः ।। ८ ।।
यथागतं समाजग्मुर्गजैरश्चै रथैस्तथा ।
ततस्तस्याः पिता राजन् विवाहमकरोत् प्रभुः ।। ९ ।।
कुन्तीने लजाते-लजाते राजा पाण्डुके गलेमें जयमाला डाल दी । सब राजाओंने जब सुना कि कुन्तीने महाराज पाण्डुका वरण कर लिया, तब वे हाथी, घोड़े एवं रथों आदि वाहनोंद्वारा जैसे आये थे, वैसे ही अपने अपने स्थानको लौट गये। राजन! तब उसके पिताने (पाण्डुके साथ शास्त्रविधिके अनुसार) कुन्तीका विवाह कर दिया।। ८-९ ।।
स तया कुन्तिभोजस्य दुहित्रा कुरुनन्दनः ।
युयुजेऽमितसौभाग्यः पौलोम्या मघवानिव ।। १० ।।
अनन्त सौभाग्यशाली कुरुनन्दन पाए कुन्तिभोज-कुमारी कुन्तीसे संयुक्त हो शचीकेसाथ इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए ।। १० ।।
कुन्त्याः पाण्डोश्च राजेन्द्र कुन्तिभोजो महीपतिः ।
कृत्वोद्वाहं तदा तं तु नानावसुभिरर्चितम् ।
स्वपुरं प्रेषयामास स राजा कुरुसत्तम ।। ११ ।।
ततो बलेन महता नानाध्वजपताकिना ।
स्तूयमानः स चाशीर्भिब्ब्राह्मणैश्व महर्षिभिः ।। १२ ।।
सम्प्राप्य नगर राजा पाण्डुः कौरवनन्दनः ।
न्यवेशयत तां भार्यां कुन्तीं स्वभवने प्रभुः ।। १३ ।।
राजेन्द्र! महाराज कुन्तिभोजने कुन्ती और पाण्डुका विवाहसंस्कार सम्पन्न करके उससमय उन्हें नाना प्रकारके धन और रत्नोंद्वारा सम्मानित किया। तत्पश्चात् पाण्डुको उनकीराजधानीमें भेज दिया। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! तब कौरवनन्दन राजा पाण्डु नाना प्रकारकीध्वजापताकाओंसे सुशोभित विशाल सेनाके साथ चले। उस समय बहुत-से ब्राह्मण एवंमहर्षि आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति करवाते थे। हस्तिनापुरमें आकर उन शक्तिशालीनरेशने अपनी प्यारी पत्नी कुन्तीको राजमहलमें पहुँचा दिया।। ११-१३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कुन्तीविवाहे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। १११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कुन्तीविवाहविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १११ ।।
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
माद्रीके साथ पाण्डुका विवाह तथा राजा पाण्डुकी
दिग्विजय
वैशम्पायन उवाच
ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः ।
विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान् मतिम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर शान्तनुनन्दन परम बुद्धिमान्भीष्मजीने यशस्वी राजा पाण्डुके द्वितीय विवाहके लिये विचार किया।। १ ।।
सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्धं ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम ।। २ ।।
वे बूढ़े मन्त्रियों, ब्राह्मणों, महर्षियों तथा चतुरंगिणी सेनाके साथ मद्रराजकी राजधानीमेंगये ।। २ ।।
तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं बाह्वीकपुङ्गवः ।
प्रत्युद्गम्याच्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ।। ३ ।।
बाह्लीकशिरोमणि राजा शल्य भीष्मजीका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लियेनगरसे बाहर आये और यथोचित स्वागत- सत्कार करके उन्हें राजधानीके भीतर लेगये ।। ३ ।।
दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमघ्घ्यं तथैव च ।
मधुपर्क च महेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ।। ४ ।।
वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा मधुपर्क अर्पण करके मद्रराजनेभीष्मजीसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछा ।। ४ ।।
तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः ।
आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम ।। ५ ।।
तब कुरुकुलका भार वहन करनेवाले भीष्मजीने मद्रराजसे इस प्रकार कहा-‘शत्रुदमन! तुम मुझे कन्याके लिये आया हुआ समझो ।। ५ ।।
श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी ।
तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ।। ६ ।।
‘सुना है, तुम्हारी एक यशस्विनी बहिन है, जो बड़े साधु स्वभावकी है; उसका नाममाद्री है। मैं उस यशस्विनी माद्रीका अपने पाण्डुके लिये वरण करता हूँ ।। ६ ।।
युक्तरूपो हि सम्बन्धे त्वं नो राजन् वयं तव ।
एतत् संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान् यथाविधि ।। ७ ।।
‘राजन्! तुम हमारे यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा योग्य हो और हम भी तुम्हारे योग्य हैं।मद्रेश्वर! यों विचारकर तुम हमें विधिपूर्वक अपनाओ’ ।। ७ ।।
तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः।
न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिमम ।। ८ ।।
भीष्मजीके यों कहनेपर मद्रराजने उत्तर दिया- मेरा विश्वास है कि आपलोगोंसे श्रेष्ठवर मुझे ढूँढ़नेसे भी नहीं मिलेगा’ ।। ८ ।।
पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित् कुलेऽस्मिन् नृपसत्तमैः ।
साधु वा यदि वासाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ।। ९ ।।
‘परंतु इस कुलमें पहलेके श्रेष्ठ राजाओंने कुछ शुल्क लेनेका नियम चला दिया है। वहअच्छा हो या बुरा, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ।। ९ ।।
व्यक्तं तद् भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः ।
न च युक्तं तथा वक्तुं भवान् देहीति सत्तम ।। १० ।।
‘यह बात सबपर प्रकट है, नि:संदेह आप भी इसे जानते होंगे। साधुशिरोमणे! इसदशामें आपके लिये यह कहना उचित नहीं है कि मुझे कन्या दे दो’ ।। १० ।।
कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् ।
तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ।। ११ ।।
‘वीर! वह हमारा कुलधर्म है और हमारे लिये वही परम प्रमाण है। शत्रुदमन! इसीलियेमैं आपसे निश्चितरूपसे यह नहीं कह पाता कि कन्या दे देँगा’ ।। ११ ।।
तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः ।
धर्म एष परो राजन् स्वयमुक्तः स्वयम्भुवा ।। १२ ।।
यह सुनकर जनेश्वर भीष्मजीने मद्रराजको इस प्रकार उत्तर दिया- ‘ राजन्! यह उत्तमधर्म है। स्वयं स्वयम्भू ब्रह्माजीने इसे धर्म कहा है’ ।। १२ ।।
नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वेधिरयं कृतः ।
विदितेय च ते शल्य मर्यादा साधुसम्मता ।। १३ ।।
‘यदि तुम्हारे पूर्वजोंने इस विधिको स्वीकार कर लिया है तो इसमें कोई दोष नहीं है।शल्य! साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम्हारी यह कुलमर्यादा हम सबको विदित है’ ।। १३ ।।
इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् ।
रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात् सहस्रशः ।। १४ ।।
गजानश्वान् रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च ।
मणिमुक्ताप्रवालं च गाड्गेयो व्यसृजच्छूभम् ।। १५ ।।
यह कहकर महातेजस्वी भीष्मजीने राजा शल्यको सोना और उसके बने हुए आभूषणतथा सहस्रों विचित्र प्रकारके रत्न भेंट किये । बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्र, अलंकार तथामणि-मोती और मूँगे भी दिये ।। १४-१५ ।।
तत् प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः सम्प्रीतमानसः ।
ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ।। १६ ।।
वह सारा धन लेकर शल्यका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपनी बहिनकोवस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके राजा पाण्डुके लिये कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीको सौंपदिया ।। १६ ।।
स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः ।
आजगाम पुरीं धीमान् प्रविष्टो गजसाह्वयम् ।। १७ ।।
परम बुद्धिमान् गंगानन्दन भीष्म माद्रीको लेकर हस्तिनापुरमें आये । १७ ।।
तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसम्मते ।
जग्राह विधिवत् पाणिं माद्रयाः पाण्डुर्नराधिपः ।। १८ ।।
तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा अनुमोदित शुभ दिन और सुन्दर मुहूर्त आनेपर राजापाण्डुने माद्रीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ।। १८ ।।
ततो विवाहे निर्ृत्ते स राजा कुरुनन्दनः।
स्थापयामास तां भार्यां शुभे वेश्मनि भाविनीम् ।। १९ ।।
इस प्रकार विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर कुरुनन्दन राजा पाण्डुने अपनीकल्याणमयी भार्याको सुन्दर महलमें ठहराया ।। १९ ।।
स ताभ्यां व्यचरत् सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः ।
कुन्त्या माद्रया च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ।। २० ।।
राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती और माद्रीके साथआनन्दपूर्वक यथेष्ट विहार करने लगे ।। २० ।।
ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः ।
जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत् पुरात् प्रभो ।। २१ ।।
जनमेजय! कुरुवंशी राजा पाण्डु तीस रात्रियोंतक विहार करके समूची पृथ्वीपर विजयप्राप्त करनेकी इच्छा लेकर राजधानीसे बाहर निकले ।। २१ ।।
स भीष्मप्रमुखान् वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च ।
धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान् कुरुसत्तमान् ।
आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ॥ २२ ।।
मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः ।
गजवाजिरथीघेन बलेन महतागमत् ।। २३ ।।
उन्होंने भीष्म आदि बड़े-बूढ़ोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया। कुशनन्दन धृतराष्ट्र तथाअन्य श्रेष्ठ कुशवंशियोंको प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ली और उनका अनुमोदनमिलनेपर मंगलाचारयुत्ह आशीर्वादोंसे अभिनन्दित हो हाथी, घोड़ों तथा रथसमुदायसे युक्तविशाल सेनाके साथ प्रस्थान किया ।। २२-२३ ।।
स राजा देवगर्भाभो विजिगीषुर्वसुंधराम् ।
हृष्टपुष्टबलैः प्रायात् पाण्डुः शत्रूननेकशः ।। २४ ।।
राजा पाण्डु देवकुमारके समान तेजस्वी थे । उन्होंने इस पृथ्वीपर विजय पानेकीइच्छासे हृष्ट-पुष्ट सैनिकोंके साथ अनेक शत्रुओंपर धावा किया।। २४ ।
पूर्वमागस्कृतो गत्वा दशा्णाः समरे जिताः।
पाण्डुना नरसिंहेन कौरवाणां यशोभृता ।। २५ ।।
कौरवकुलके सुयशको बढ़ानेवाले, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी राजा पाण्डुनेसबसे पहले पूर्वके अपराधी दशार्णोपर* धावा करके उन्हें युद्धमें परास्त किया। २५ ।।
ततः सेनामुपादाय पाण्डुर्नानाविधध्वजाम् ।
प्रभूतहस्त्यश्वयुतां पदातिरथसंकुलाम् ।। २६ ।।
आगस्कारी महीपानां बहूनां बलदर्पितः ।
गोप्ता मगधराष्ट्रस्य दीर्घों राजगृहे हतः ।। २७ ।।
तत्पश्चात् वे नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे युक्त और बहुसंख्यक हाथी, घोड़े, रथएवं पैदलोंसे भरी हुई भारी सेना लेकर मगधदेशमें गये। वहाँ राजगृहमें अनेक राजाओंकाअपराधी बलाभिमानी मगधराज दीर्घ उनके हाथसे मारा गया ।। २६-२७ ।।
ततः कोशं समादाय वाहनानि च भूरिशः ।
पाण्डुना मिथिलां गत्वा विदेहाः समरे जिताः ।। २८ ।।
उसके बाद भारी खजाना और वाहन आदि लेकर पाण्डुने मिथिलापर चढ़ाई की औरविदेहवंशी क्षत्रियोंको युद्धमें परास्त किया।। २८ ।।
तथा काशिषु सुह्मेषु पुण्ड्रेषु च नरर्षभ ।
स्वबाहुबलवीर्येण कुरूणामकरोद् यशः ।। २९ ।।
नरश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार वे पाण्डु काशी, सहा तथा पुण्डूर देशोंपर विजय पाते हुएअपने बाहुबल और पराक्रमसे कुरुकुलके यशका विस्तार करने लगे ।। २९ ।।
तं शरौघमहाच्वालं शस्त्रार्चिषमरिन्दमम् ।
पाण्डुपावकमासाद्य व्यदह्यन्त नराधिपाः ।। ३० ।।
उस समय शत्रुदमन राजा पाण्डु प्रज्वलित अग्निके समान सुशोभित थे। बाणोंकासमुदाय उनकी बढ़ती हुई ज्वालाके समान जान पड़ता था। खड्ग आदि शस्त्र लपटोंकेसमान प्रतीत होते थे। उनके पास आकर बहुतसे राजा भस्म हो गये।। ३० ।।
ते ससेनाः ससेनेन विध्वंसितबला तपाः।
पाण्डुना वशगाः कृत्वा कुरुकर्मसु योजिताः ।। ३१ ।।
सेनासहित राजा पाण्डुने सामने आये हुए सैन्यसहित नरपतियोंकी सारी सेनाएँ नष्टकर दीं और उन्हें अपने अधीन करके कौरवोंके आज्ञापालनमें नियुक्त कर दिया।। ३१ ।।
तेन ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरंदरम् ।। ३२ ।।
पाण्डुके द्वारा परास्त हुए समस्त भूपालगण देवताओंमें इन्द्रकी भाँति इस पृथ्वीपर सबमनुष्योंमें एकमात्र उन्हींको शूरवीर मानने लगे ।। ३२ ।।
तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः ।
उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च ।। ३३ ॥
भूतलके समस्त राजाओंने उनके सामने हाथ जोडकर मस्तक टेक दिये और नानाप्रकारके रत्न एवं धन लेकर उनके पास आये ।। ३३ ।।
मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं बहु ।
गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ।। ३४ ।।
खरोष्ट्रमहिषीश्चैव यच्च किंचिदजाविकम् ।
कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च ।
तत् सर्वं प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः ।। ३५ ।।
राजाओंके दिये हुए ढेर-के-ढेर मणि, मोती, मूँगे, सुवर्ण, चाँदी, गोरत्न, अश्वरत्न,रथरत्न, हाथी, गदहे, ऊँट, भैंसें, बकरे, भेंड़ें, कम्बल, मृगचर्म, रत्न, रंकु मृगके चर्मसे बनेहुए बिछौने आदि जो कुछ भी सामान प्राप्त हुए, उन सबको हस्तिनापुराधीश राजा पाण्डुनेग्रहण कर लिया ।। ३४-३५ ।।
तदादाय ययौ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः ।
हर्षयिष्यन् स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम् ।। ३६ ।।
वह सब लेकर महाराज पाण्डु अपने राष्ट्रके लोगोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः हस्तिनापुरचले आये। उस समय उनकी सवारीके अश्व आदि भी बहुत प्रसन्न थे ।। ३६ ।।
शन्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः ।
कीर्तिजः प्रणष्टः शब्दः पाण्डुना पुनराहृतः ।। ३७ ।।
राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी शन्तनु तथा परम बुद्धिमान् भरतकी कीर्ति-कथा जोनष्ट-सी हो गयी थी, उसे महाराज पाण्डुने पुनरुज्जीवित कर दिया ।। ३७ ।।
ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जहुः कुरुधनानि च ।
ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः ।। ३८ ।।
जिन राजाओंने पहले कुरुदेशके धन तथा कुरुराष्ट्रका अपहरण किया था, उनको हस्तिनापुरके सिंह पाण्डुने करद बना दिया ।। ३८ ।।
इत्यभाषन्त राजानो राजामात्याश्च संगताः ।
प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह ।। ३९ ।।
बहुत-से राजा तथा राजमन्त्री एकत्र होकर इस तरहकी बातें कर रहे थे। उनके साथ नगर और जनपदके लोग भी इस चर्चामें सम्मिलित थे। उन सबके हृदयमें पाण्डुके प्रति विश्वास तथा हर्षोल्लास छा रहा था ।। ३९ ।।
प्रत्युद्ययुश्च तं प्राप्तं सर्वे भीष्मपुरोगमाः ।
ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालयात् ।। ४० ।।
आवृतं ददृशुर्हृष्टा लोकं बहुविधैर्धनैः ।
नानायानसमानीतै रत्नैरुच्चावचैस्तदा ।। ४१ ।।
हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रस्तथाविभिः ।
नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवा: ।। ४२ ।।
राजा पाण्डु जब नगरके निकट आये, तब भीष्म आदि सब कौरव उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक देखा, राजा पाण्डु और उनका दल बड़े उत्साहके साथ आ रहे हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे लोग हस्तिनापुरसे थोड़ी ही दूरतक जाकर वहाँसे लौट रहे हों। उनके साथ भाँति-भाँतिके धन एवं नाना प्रकारके वाहनोंपर लादकर लाये हुए छोटे-बड़े रत्न, श्रेष्ठ हाथी, घोड़े, रथ, गौएँ, ऊँट तथा भेंड़ आदि भी थे। भीष्मके साथ कौरवोंने वहाँ जाकर देखा , तो उस धन-वैभवका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया ।। ४०-४२ ।।
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः ।
यथा्हं मानयामास पौरजानपदानपि । ४३ ।।
कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले पाण्डुने निकट आकर पितृव्य भीष्मके चरणोंमें प्रणाम किया और नगर तथा जनपदके लोगोंका भी यथायोग्य सम्मान किया।। ४३ ।।
प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम् ।
पुत्रमाश्लिष्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ।। ४४ ।।
शत्रुओंके राज्योंको धूलमें मिलाकर कृतकृत्य होकर लौटे हुए अपने पुत्र पाण्डुका आलिंगन करके भीष्मजी हर्षके आँसू बहाने लगे ।। ४४ ।।
स तूर्यशतशङ्खानां भेरीणां च महास्वनैः ।
हर्षयन् सर्वशः पौरान् विवेश गजसाह्वयम् ।। ४५ ।।
सैकड़ों शंख, तुरही एवं नगारोंकी तुमुल ध्वनिसे समस्त पुरवासियोंको आनन्दित करते हुए पाण्डुने हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ।। ४५ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदिग्विजये द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुदिग्विजयविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११२ ।।
* किन्ध्यपर्वतके पूर्व-दक्षिणकी ओर स्थित उस प्रदेशका प्राचीन नाम दशार्ण है, जिससे होकर धसान नदी बहती है।विदिशा (आधुनिक भिलसा) इसी प्रदेशकी राजधानी थी।
* काशिराज कोसलकी कन्या होनेसे अम्बिका और अम्बालिका दोनों ही कौसल्या कहलाती थीं।
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डुका पत्नियोंसहित वनमें निवास तथा विदुरका विवाह
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः स्वबाहुविजितं धनम् ।
भीष्माय सत्यवत्यै च मात्रे चोपजहार सः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! बड़े भाई धृतराष्ट्रकी आज्ञा लेकर राजा पाण्डुनेअपने बाहुबलसे जीते हुए धनको भीष्म, सत्यवती तथा माता अम्बिका और अम्बालिकाकोभेंट किया ।। १ ।।
विदुराय च वै पाण्डुः प्रेषयामास तद् धनम् ।
सुहृदश्चापि धर्मात्मा धनेन समतर्पयत् ।। २ ।।
उन्होंने विदुरजीके लिये भी वह धन भेजा। धर्मात्मा पाण्डुने अन्य सुहृदोंको भी उसधनसे तृप्त किया ।। २ ।।
ततः सत्यवती भीष्मं कौसल्यां च यशस्विनीम् ।
शुभैः पाण्डुजितैरर्थेस्तोषयामास भारत ।। ३ ।।
ननन्द माता कौसल्या तमप्रतिमतेजसम् ।
जयन्तमिव पौलोमी परिष्वज्य नर्षभम् ।। ४ ।।
भारत! तत्पश्चात् सत्यवतीने पाण्डुद्वारा जीतकर लाये हुए शुभ धनके द्वारा भीष्म औरयशस्विनी कौसल्याको भी संतुष्ट किया। माता कौसल्याने अनुपम तेजस्वी नरश्रेष्ठ पाण्डुकीउसी प्रकार हृदयसे लगाकर उनका अभिनन्दन किया, जैसे शची अपने पुत्र जयन्तकाअभिनन्दन करती हैं ।। ३-४ ।।
तस्य वीरस्य विक्रान्तैः सहस्रशतदक्षिणैः ।
अश्वमेधशतैरीजे धृतराष्ट्रो महामखैः ।। ५ ।।
वीरवर पाण्डुके पराक्रमसे धृतराष्ट्रने बड़े-बड़े सौ अश्वमेध यज्ञ किये तथा प्रत्येक यज्ञमेंएक-एक लाख स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणा दी ।। ५ ।।
सम्प्रयुक्तस्तु कुन्त्या च माद्र्या च भरतर्षभ ।
जिततन्द्रीस्तदा पाण्डुर्बभूव वनगोचरः ।। ६ ।।
हित्वा प्रासादनिलयं शुभानि शयनानि च।
अरण्यनित्यः सततं बभूव मृगयापरः ।। ७ ।।
भरतश्रेष्ठ! राजा पाण्डुने आलस्यको जीत लिया था। वे कुन्ती और माद्रीकी प्रेरणासेराजमहलोंका निवास और सुन्दर शय्याएँ छोड़कर वनमें रहने लगे। पाण्डु सदा वनमें रहकरशिकार खेला करते थे ।। ६-७ ।।
स चरन् दक्षिणं पार्श्वं रम्यं हिमवतो गिरेः ।
उवास गिरिपृष्ठेषु महाशालवनेषु च ।। ८ ।
वे हिमालयके दक्षिण भागकी रमणीय भूमिमें विचरते हुए पर्वतके शिखरोंपर तथा ऊँचेशालवृक्षोंसे सुशोभित वनोंमें निवास करते थे।। ८ ।।
रराज कुन्त्या माद्र्या च पाण्डुः सह वने चरन् ।
करेण्वोरिव मध्यस्थः श्रीमान् पौरंदरो गजः ।। ९ ।।
कुन्ती और माद्रीके साथ वनमें विचरते हुए महाराज पाण्डु दो हथिनियोंके बीचमें स्थितऐरावत हाथीकी भाँति शोभा पाते थे ।। ९ ।।
भारतं सह भार्याभ्यां खड्गबाणधनुर्धरम् ।
विचित्रकवचं वीरं परमास्त्रविदं नृपम् ।
देवोऽयमित्यमन्यन्त चरन्तं वनवासिनः ।॥ १० ।।
तलवार, बाण, धनुष और विचित्र कवच धारण करके अपनी दोनों पत्नियोंके साथभ्रमण करनेवाले महान् अस्त्रवेत्ता भरतवंशी राजा पाण्डुको देखकर वनवासी मनुष्य यहसमझते थे कि ये कोई देवता हैं ।। १० ।।
तस्य कामांश्च भोगांश्च नरा नित्यमतन्द्रिताः।
उपाजहुर्वनान्तेषु धृतराष्ट्रेण चोदिताः ।। ११ ।।
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे प्रेरित हो बहुत-से मनुष्य आलस्य छोड़कर वनमें महाराज पाण्डुकेलिये इच्छानुसार भोगसामग्री पहुँचाया करते थे ।। ११ ।।
अथ पारशवीं कन्यां देवकस्य महीपतेः ।
रूपयौवनसम्पन्नां स शुश्रावापगासुतः ।। १२ ।।
एक समय गंगानन्दन भीष्मजीने सुना कि राजा देवकके यहाँ एक कन्या है, जोशूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न की गयी है। वह सुन्दर रूप और युवावस्थासेसम्पन्न है ।। १२ ।।
ततस्तु वरयित्वा तामानीय भरतर्षभः ।
विवाहं कारयामास विदुरस्य महामतेः ।। १३ ।।
तब इन भरतश्रेष्ठने उसका वरण किया और उसे अपने यहाँपरम बुद्धिमान् विदुरजीका विवाह कर दिया ।। १३ ।।
तस्यां चोत्पादयामास विदुरः कुरुनन्दनः ।
पुत्रान् विनयसम्पन्नानात्मनः सदृशान् गुणैः ।। १४ ।।
आकर उसके साथकुरुनन्दन विदुरने उसके गर्भसे अपने ही समान गुणवान् और विनयशील अनेक पुत्रउत्पन्न किये ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि विदुरपरिणये त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें विदुरविवाहविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११३ ।।
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथासेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक
पुत्रकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
ततः पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्यां जनमेजय ।
धृतराष्ट्रस्य वैश्यायामेकश्चापि शतात् परः । १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रके उनकी पत्नी गान्धारीकेगर्भसे एक सौ पुत्र उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्रकी एक दूसरी पत्नी वैश्यजातिकी कन्या थी। उससेभी एक पुत्रका जन्म हुआ। यह पूर्वोतक्त सौ पुत्रोंसे भिन्न था ।। १ ।।
पाण्डोः कुन्त्यां च माद्रयां च पुत्राः पञ्च महारथाः ।
देवेभ्यः समपद्यन्त संतानाय कुलस्य वै ।। २ ।।
पाण्डुके कुन्ती और माद्रीके गर्भसे पाँच महारथी पुत्र उत्पन्न हुए। वे सब कुरुकुलकीसंतानपरम्पराकी रक्षाके लिये देवताओंके अंशसे प्रकट हुए थे ।। २ ।।
जनमेजय उवाच
कथं पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्यां द्विजसत्तम ।
कियता चैव कालेन तेषामायुश्च किं परम् ।। ३ ।।
जनमेजयने पूछा-द्विजश्रेष्ठ! गान्धारीसे सौ पुत्र किस प्रकार और कितने समयमेंउत्पन्न हुए? और उन सबकी पूरी आयु कितनी थी? ।। ३ ।।
कथं चैकः स वैश्यायां धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् ।
कथं च सदृशीं भार्या गान्धारीं धर्मचारिणीम् ।। ४ ।।
आनुकूल्ये वर्तमानां धृतराष्ट्रोऽभ्यवर्तत ।
कथं च शप्तस्य सतः पाण्डोस्तेन महात्मना ।। ५ ।।
समुत्पन्ना दैवतेभ्यः पुत्राः पञ्च महारथाः ।
एतद् विद्वन् यथान्यायं विस्तरेण तपोधन ।। ६ ।।
वैश्यजातीय स्त्रीके गर्भसे धृतराष्ट्रका वह एक पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुआ? राजा धृतराष्ट्र सदा अपने अनुकूल चलनेवाली योग्य पत्नी धर्मपरायणा गान्धारीके साथ कैसा बर्ताव करते थे? महात्मा मुनि-द्वारा शापको प्राप्त हुए राजा पाण्डुके वे पाँचों महारथी पुत्र देवताओंके अंशसे कैसे उत्पन्न हुए? विद्वान् तपोधन! ये सब बातें यथोचित रूपसे विस्तारपूर्वक कहिये। अपने बन्धुजनोंकी यह चर्चा सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती ।। ४-६ ||
वैशम्पायन उवाच
कथयस्व न मे तृप्तिः कथ्यमानेषु बन्धुषु ।
क्षुच्छरमाभिपरिग्लानं द्वैपायनमुपस्थितम् ।। ७ ।।
तोषयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वरं ददौ ।
सा वव्रे सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः ।। ८ ।
वैशम्पायनजीने कहा-राजन्! एक समयकी बात है, महर्षि व्यास भूख और परिश्रमसे खिन्न होकर धृतराष्ट्रके यहाँ आये। उस समय गान्धारीने भोजन और विश्रामकी व्यवस्थाद्वारा उन्हें संतुष्ट किया। तब व्यासजीने गान्धारीको वर देनेकी इच्छा प्रकट की। गान्धारीने अपने पतिके समान ही सौ पुत्र माँगे ।। ७-८ ।।
ततः कालेन सा गर्भ धृतराष्ट्रादथाग्रहीत् ।
संवत्सरद्वयं तं तु गान्धारी गर्भमाहितम् ।। ९ ।।
अप्रजा धारयामास ततस्तां दुःखमाविशत् ।
श्रुत्वा कुन्तीसुतं जातं बालार्कसमतेजसम् ।। १० ।।
तदनन्तर समयानुसार गान्धारीने धृतराष्ट्रसे गर्भ धारण किया दो वर्ष व्यतीत हो गये,तबतक गान्धारी उस गर्भको धारण किये रही। फिर भी प्रसव नहीं हुआ। इसी बीचमेंगान्धारीने जब यह सुना कि कुन्तीके गर्भसे प्रातःकालीन सूर्यके समान तेजस्वी पुत्रकाजन्म हुआ है, तब उसे बड़ा दुःख हुआ ।। ९-१० ।।
उदरस्यात्मनः स्थैर्यमुपलभ्यान्वचिन्तयत् ।
ज्ञातं धृतराष्ट्रस्य यत्नेन महता ततः ।। ११ ।
सोदरं घातयामास गान्धारी दुःखमूच्च्छिता ।
ततो जज्ञे मांसपेशी लोहाष्ठीलेव संहता ।। १२ ।।
उसे अपने उदरकी स्थिरतापर बड़ी चिन्ता हुई। गान्धारी दुःखसे मूच्च्छित हो रही थी।उसने धृतराष्ट्रकी अनजानमें ही महान् प्रयत्न करके अपने उदरपर आघात किया। तबउसके गर्भसे एक मांसका पिण्ड प्रकट हुआ, जो लोहेके पिण्डके समान कड़ाथा ।। ११-१२ ।।
द्विवर्षसम्भृता कुक्षौ तामुत्स्रष्टुं प्रचक्रमे ।
अथ द्वैपायनो ज्ञात्वा त्वरितः समुपागमत् ।। १३ ।।
उसने दो वर्षोंतक उसे पेटमें धारण किया था, तो भी उसने उसे इतना कड़ा देखकरफेंक देनेका विचार किया। इधर यह बात महर्षि व्यासको मालूम हुई। तब वे बड़ीउतावलीके साथ वहाँ आये ।। १३ ।।
तां स मांसमयीं पेशीं ददर्श जपतां वरः।
ततोऽब्रवीत् सौबलेयीं किमिदं ते चिकीर्षितम् ।। १४ ।।
जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ व्यासजीने उस मांसपिण्डको देखा और गान्धारीसे पूछा-‘तुमइसका क्या करना चाहती थीं?’ ।। १४ ।।
गान्धार्युवाच
सा चात्मनो मतं सत्यं शशंस परमर्षये ।
ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम् ।। १५ ।।
दुःखेन परमेणेदमुदरं घातितं मया ।
शतं च किल पुत्राणां वितीर्ण मे त्वया पुरा ।। १६ ।।
और उसने महर्षिको अपने मनकी बात सच-सच बता दी। गान्धारीने कहा-मुने! मैंने सुना है, कुन्तीके एक ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो सूर्यकेसमान तेजस्वी है। यह समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखके कारण मैंने अपने उदरपर आघातकरके गर्भ गिराया है। आपने पहले मुझे ही सौ पुत्र होनेका वरदान दिया था; परंतु आजइतने दिनों बाद मेरे गर्भसे सौ पुत्रोंकी जगह यह मांसपिण्ड पैदा हुआ है ।। १५-१६ ।।
व्यास उवाच
इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै ।
एवमेतत् सौबलेयि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् ।। १७ ।।
व्यासजीने कहा-सुबलकुमारी! यह सब मेरे वरदानके अनुसार ही हो रहा है; वहकभी अन्यथा नहीं हो सकता ।। १७ ।।
वितथं नोक्तपूर्व मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
घृतपूर्ण कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीयताम् ।। १८ ।।
मैंने कभी हास-परिहासके समय भी झूठी बात मुँहसे नहीं निकाली है। फिर वरदानआदि अन्य अवसरोंपर कही हुई मेरी बात झूठी कैसे हो सकती है। तुम शीघ्र ही सौ मटके(कुण्ड) तैयार कराओ और उन्हें घीसे भरवा दो ।। १८ ।।
सुगुप्तेषु च देशेषु रक्षा चैव विधीयताम् ।
शीताभिरद्भिरष्ठीलामिमां च परिषेचय ।। १९ ।।
फिर अत्यन्त गुप्त स्थानोंमें रखकर उनकी रक्षा की भी पूरी व्यवस्था करो। इसमांसपिण्डको ठंडे जलसे सींचो ।। १९ ।।
वैशम्पायन उवाच
सा सिच्यमाना त्वष्ठीला बभूव शतधा तदा ।
अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां गर्भाणां पृथगेव तु ।। २० ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! उस समय सींचे जानेपर उस मांसपिण्डके सौटुकड़े हो गये। वे अलग-अलग अँगूठेके पोरुवे बराबर सौ गर्भोंके रूपमें परिणत होगये ।। २० ।।
एकाधिकशतं पूर्ण यथायोगं विशाम्पते ।
मांसपेश्यास्तदा राजन् क्रमशः कालपर्ययात् ।। २१ ।।
राजन्! कालके परिवर्तनसे क्रमशः उस मांसपिण्डके यथायोग्य पूरे एक सौ एक भागहुए ।। २१ ।।
ततस्तांस्तेषु कुण्डेषु गर्भानवदधे तदा ।
स्वनुगुप्तेषु देशेषु रक्षां वै व्यदधात् ततः ।। २२ ।।
तत्पश्चात् गान्धारीने उन सभी गर्भोको उन पूर्वोक्त कुण्डोंमें रखा। वे सभी कुण्डअत्यन्त गुप्त स्थानोंमें रखे हुए थे। उनकी रक्षाकी ठीक-ठीक व्यवस्था कर दीगयी ।। २२ ।।
शशंस चैव भगवान् कालेनैतावता पुनः ।
उद्घाटनीयान्येतानि कुण्डानीति च सौबलीम् ।। २३ ।।
तब भगवान् व्यासने गान्धारीसे कहा-‘इतने ही दिन अर्थात् पूरे दो वर्षोंतक प्रतीक्षाकरनेके बाद इन कुण्डोंका ढक्कन खोल देना चाहिये ।। २३ ।।
इत्युक्त्वा भगवान् व्यासस्तथा प्रतिनिधाय च ।
जगाम तपसे धीमान् हिमवन्तं शिलोच्चयम् ।। २४ ।।
यों कहकर और पूर्वोक्त प्रकारसे रक्षाकी व्यवस्था कराकर परम बुद्धिमान् भगवान्व्यास हिमालय पर्वतपर तपस्याके लिये चले गये ।। २४ ।।
जज्ञे क्रमेण चैतेन तेषां दुर्योधनो नृपः ।
जन्मतस्तु प्रमाणेन ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः ।। २५ ।।
तदनन्तर दो वर्ष बीतनेपर जिस क्रमसे वे गर्भ उन कुण्डोंमें स्थापित किये गये थे, उसीक्रमसे उनमें सबसे पहले राजा दुर्योधन उत्पन्न हुआ। जन्मकालके प्रमाणसे राजा युधिष्ठिरउससे भी ज्येष्ठ थे ।। २५ ।।
तदाख्यातं तु भीष्माय विदुराय च धीमते ।
यस्मिन्नहनि दुर्धर्षों जज्ञे दुर्योधनस्तदा ।। २६ ।।
तस्मिन्नेव महाबाहुर्ज्ञे भीमोऽपि वीर्यवान् ।
स जातमात्र एवाथ धृतराष्ट्रसुतो नृप ।। २७ ।।
रासभारावसदृशं रुराव च ननाद च ।
तं खराः प्रत्यभाषन्त गृध्रगोमायुवायसाः ।। २८ ।।
दुर्योधनके जन्मका समाचार परम बुद्धिमान् भीष्म तथा विदुरजीको बताया गया। जिसदिन दुर्धर्ष वीर दुर्योधनका जन्म हुआ, उसी दिन परम पराक्रमी महाबाहु भीमसेन भी उत्पन्नहुए। राजन्! धृतराष्ट्रका वह पुत्र जन्म लेते ही गदहेके रेंकनेकी-सी आवाजमें रोने-चिल्लानेलगा। उसकी आवाज सुनकर बदलेमें दूसरे गदहे भी रेंकने लगे। गीध, गीदड़ और कौए भीकोलाहल करने लगे ।। २६-२८।।
वाताश्च प्रववुश्चापि दिग्दाहश्चाभवत् तदा ।
ततस्तु भीतवद् राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ।। २९ ।।
समानीय बहून् विप्रान् भीष्मं विदुरमेव च ।
अन्यांश्च सुहृदो राजन् कुरून् सर्वांस्तथैव च ।। ३० ।।
बड़े जोरकी आँधी चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाओंमें दाह-सा होने लगा। राजन्! तबराजा धृतराष्ट्र भयभीत-से हो उठे और बहुत-से ब्राह्मणोंको, भीष्मजी और विदुरजीको,दूसरे-दूसरे सुहृदों तथा समस्त कुरुवंशियोंको अपने समीप बुलवाकर उनसे इस प्रकार बोले।। २९-३० ।।
युधिष्ठिरो राजपुत्रो ज्येष्ठो नः कुलवर्धनः ।
प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन् वाच्यमस्ति नः ।। ३१ ।।
‘आदरणीय गुरुजनो! हमारे कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजकुमार युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठहैं। वे अपने गुणोंसे राज्यको पानेके अधिकारी हो चुके हैं। उनके विषयमें हमें कुछ नहींकहना है ।। ३१ ।।
अयं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति ।
एतद् विब्रूत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ॥ ३२ ।।
‘किंतु उनके बाद मेरा यह पुत्र ही ज्येष्ठ है। क्या यह भी राजा बन सकेगा? इस बातपरविचार करके आपलोग ठीक-ठीक बतायें। जो बात अवश्य होनेवाली है, उसे स्पष्टकहें’ ।। ३२ ।।
वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत ।
क्रव्यादाः प्राणदन् घोराः शिवाश्चाशिवशंसिनः ।। ३३ ।
जनमेजय! धृतराष्ट्रकी यह बात समाप्त होते ही चारों दिशाओंमें भयंकर मांसाहारीजीव गर्जना करने लगे। गीदड़ अमंगलसूचक बोली बोलने लगे ।। ३३ ।।
लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः ।
तेऽब्रुवन् ब्राह्मणा राजन् विदुरश्च महामतिः ।। ३४ ।।
यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप ।
उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ ।। ३५ ।।
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव ।
तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान् ।। ३६ ।।
राजन्! सब ओर होनेवाले उन भयानक अप – शकुनोंको लक्ष्य करके ब्राह्मणलोग तथापरम बुद्धिमान् विदुरजी इस प्रकार बोले-‘नरश्रेष्ठ नरेश्वर! आपके ज्येष्ठ पुत्रके जन्मलेनेपर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट जान पड़ता है किआपका यह पुत्र समूचे कुलका संहार करनेवाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जायतो सब विघ्नोंकी शान्ति हो जायगी और यदि इसकी रक्षा की गयी तो आगे चलकर बड़ाभारी उपद्रव खड़ा होगा।। ३४-३६ ।।
शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते।
त्यजैनमेकं शान्तिं चेत् कुलस्येच्छसि भारत ।। ३७ ।।
‘महीपते! आपके निन्यानबे पुत्र ही रहें; भारत! यदि आप अपने कुलकी शान्ति चाहतेहैं तो इस एक पुत्रको त्याग दें ।। ३७ ।।
एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ३८ ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।
स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ।। ३९ ।।
न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः।
ततः पुत्रशतं पूर्ण धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ।। ४० ।।
‘केवल एक पुत्रके त्यागद्वारा इस सम्पूर्ण कुलका तथा समस्त जगत्का कल्याणकीजिये। नीति कहती है कि समूचे कुलके हितके लिये एक व्यक्तिको त्याग दे, गाँवकेहितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशके हितके लिये एक गाँवका परित्याग कर दे औरआत्माके कल्याणके लिये सारे भूमण्डलको त्याग दे।’ विदुर तथा उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकेयों कहनेपर भी पुत्रस्नेहके बन्धनमें बँधे हुए राजा धृतराष्ट्रने वैसा नहीं किया। जनमेजय!इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रके पूरे सौ पुत्र हुए ।। ३८-४० ।।
मासमात्रेण संजज्ञे कन्या चैका शताधिका।
गान्धार्यां क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता ।। ४१ ।।
धृतराष्ट्रं महाराजं वैश्या पर्यचरत् किल ।
तस्मिन् संवत्सरे राजन् धृतराष्ट्रान्महायशाः ।। ४२ ।।
जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सुः करणो नृप ।
एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः ।। ४३ ।।
महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका ।
युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्रः प्रतापवान् ।। ४४ ।।
तदनन्तर एक ही मासमें गान्धारीसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो सौ पुत्रोंके अतिरिक्तथी। जिन दिनों गर्भ धारण करनेके कारण गान्धारीका पेट बढ़ गया था और वह क्लेशमेंपड़ी रहती थी, उन दिनों महाराज धृतरा्ट्रकी सेवामें एक वैश्यजातीय स्त्री रहती थी।राजन्! उस वर्ष धृतराष्ट्रके अंशसे उस वैश्यजातीय भार्याके द्वारा महायशस्वी बुद्धिमान्युयुत्सुका जन्म हुआ। जनमेजय! युयुत्सु करण कहे जाते थे। इस प्रकार बुद्धिमान् राजाधृतराष्ट्रके एक सौ वीर महारथी पुत्र हुए। तत्पश्चात् एक कन्या हुई, जो सौ पुत्रोंके अतिरिक्तथी। इन सबके सिवा महातेजस्वी परम प्रतापी वैश्यापुत्र युयुत्सु भी थे ।। ४१-४४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि गान्धारीपुत्रोत्पत्तौ चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें गान्धारीपुत्रोत्पत्तिविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११४ ।।
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
दुःशलाके जन्मकी कथा
जनमेजय उवाच
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामादितः कथितं त्वया ।
ऋषेः प्रसादात् तु शतं न च कन्या प्रकीर्तिता ।। १ ।।
जनमेजयने पूछा-ब्रह्मन्! महर्षि व्यासके प्रसादसे धृतराष्ट्रके सौ पुत्र हुए, यह बातआपने मुझे पहले ही बता दी थी। परंतु उस समय यह नहीं कहा था कि उन्हें एक कन्या भीहुई ।। १ ।।
वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च कन्या चैका शताधिका ।
गान्धारराजदुहिता शतपुत्रेति चानघ ।। २ ।।
उक्ता महर्षिणा तेन व्यासेनामिततेजसा।
कथं त्विदानीं भगवन् कन्यां त्वं तु ब्रवीषि मे ।। ३ ।॥
अनघ! इस समय आपने वैश्यापुत्र युयुत्सु तथा सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक कन्याकी भीचर्चा की है। अमिततेजस्वी महर्षि व्यासने गान्धारराजकुमारीको सौ पुत्र होनेका ही वरदानदिया था। भगवन्! फिर आप मुझसे यह कैसे कहते हैं कि एक कन्या भी हुई ।। २-३ ।।
यदि भागशतं पेशी कृता तेन महर्षिणा।
न प्रजास्यति चेद् भूयः सौबलेयी कथंचन ।। ४ ।।
कथं तु सम्भवस्तस्या दुःशलाया वदस्व में ।
यथावदिह विप्रर्षे परं मेऽत्र कुतूहलम् ।। ५ ।।
यदि महर्षिने उक्त मांसपिण्डके सौ भाग किये और यदि सुबलपुत्री गान्धारीने किसीप्रकार फिर गर्भ धारण या प्रसव नहीं किया, तो उस दुःशला नामवाली कन्याका जन्म किसप्रकार हुआ? ब्रह्मर्षे! यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये। मुझे इस विषयमें कौतूहल हो रहाहै ।। ४-५ ।।
वैशम्पायन उवाच
साध्वयं प्रश्न उद्दिष्टः पाण्डवेय ब्रवीमि ते ।
तां मांसपेशीं भगवान् स्वयमेव महातपाः ।। ६ ।।
शीताभिरद्भिरासिच्य भागं भागमकल्पयत् ।
यो यथा कल्पितो भागस्तं तं धात्र्या तथा नृप ।। ७ ।।
घृतपूर्णेषु कुण्डेषु एकैकं प्राक्षिपत् तदा ।
एतस्मिन्नन्तरे साध्वी गान्धारी सुदृढव्रता ।। ८ ।।
दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना ।
मनसाचिन्तयद् देवी एतत् पुत्रशतं मम ।। ९ ।।
भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः ।
ममेयं परमा तुष्टिर्दुहिता मे भवेद् यदि ।। १० ।।
वैशम्पायनजीने कहा-पाण्डवनन्दन! तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ। महातपस्वी भगवान् व्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डको शीतल जलसे सींचकर उसके सौ भाग किये। राजन्! उस समय जो भाग जैसा बना, उसे धायद्वारा वे एक-एक करके घीसे भरे हुए कुण्डोंमें डलवाते गये। इसी बीचमें पूर्ण दृढतासे सतीव्रतका पालन करनेवाली साध्वी एवं सुन्दरी गान्धारी कन्याके स्नेह-सम्बन्धका विचार करके मन- ही-मन सोचने लगी-इसमें संदेह नहीं कि इस मांसपिण्डसे मेरे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे; क्योंकि व्यासमुनि कभी झूठ नहीं बोलते; परंतु मुझे अधिक संतोष तो तब होता, यदि एक पुत्री भी हो जाती ।। ६-१०।।
एका शताधिका बाला भविष्यति कनीयसी ।
ततो दौहित्रजाल्लोकादबाह्योऽसौ पतिर्म ।। ११ ।।
यदि सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक छोटी कन्या हो जायगी तो मेरे ये पति दौहित्रके पुण्यसे प्राप्त होनेवाले उत्तम लोकोंसे भी वंचित नहीं रहेंगे ।। ११ ।।
अधिका किल नारीणां प्रीतिज्जामातृजा भवेत् ।
यदि नाम ममापि स्याद् दुहितैका शताधिका ।। १२ ।।
कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता ।
यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाप्यथवा हुतम् ।। १३ ।।
गुरवस्तोषिता वापि तथास्तु दुहिता मम ।
एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ।। १४ ।।
व्यभजत् स तदा पेशीं भगवानृषिसत्तमः ।
गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौबलीम् ।। १५ ।।
कहते हैं, स्त्रियोंका दामादमें पुत्रसे भी अधिक स्नेह होता है। यदि मुझे भी सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक पुत्री प्राप्त हो जाय तो मैं पुत्र और दौहित्र दोनोंसे घिरी रहकर कृतकृत्य हो जाऊँ। यदि मैंने सचमुच तप, दान अथवा होम किया हो तथा गुरुजनोंको सेवाद्वारा प्रसन्न कर लिया हो, तो मुझे पुत्री अवश्य प्राप्त हो। इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डके विभाग कर दिये और पूरे सौ अंशोंकी गणना करके गान्धारीसे कहा ।। १२-१५ ।।
व्यास उवाच पूर्ण पुत्रशतं त्वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता ।
दौहित्रयोगाय भाग एकः शिष्टः शतात् परः ।
एषा ते सुभगा कन्या भविष्यति यथेप्सिता ।। १६ ।।
व्यासजी बोले-गान्धारी! मैंने झूठी बात नहीं कही थी; ये पूरे सौ पुत्र हैं । सौकेअतिरिक्त एक भाग और बचा है, जिससे दौहित्रका योग होगा। इस अंशसे तुम्हें अपनेमनके अनुरूप एक सौभाग्यशालिनी कन्या प्राप्त होगी ।। १६ ।।
ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः ।
तं चापि प्राक्षिपत् तत्र कन्याभागं तपोधनः ।। १७ ।।
एतत् ते कथितं राजन् दुःशलाजन्म भारत ।
ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ ।। १८ ।।
यों कहकर महातपस्वी व्यासजीने घीसे भरा हुआ एक और घड़ा मँगाया और उनतपोधन मुनिने उस कन्याभागको उसीमें डाल दिया। भरतवंशी नरेश! इस प्रकार मैंने तुम्हेंदुःशलाके जन्मका प्रसंग सुना दिया। अनघ! बोलो, अब पुनः और क्या कहूँ ।। १७-१८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि दुःशलोत्पत्तौ पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें दुःशलाकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।।
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंकी नामावली
जनमेजय उवाच
ज्येष्ठानुज्येष्ठतां तेषां नामानि च पृथक् पृथक् ।
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात् प्रकीर्तय ।। १ ।।
जनमेजयने पूछा-ब्रह्मन्! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ कौन था? फिर उससे छोटाऔर उससे भी छोटा कौन था? उन सबके अलग-अलग नाम क्या थे? इन सब बातोंकाक्रमश: वर्णन कीजिये ।। १ ।।
वैशम्पायन उवाच
दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा ।
दुःसहो दुःशलश्चैव जलसंधः समः सहः ।। २ ।।
विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।
दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ।। ३ ।।
विविंशतिर्विकर्णश्च शलः सत्त्वः सुलोचनः ।
चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्रशरासनः ।। ४ ।।
दुर्मदो दुर्विगाहश्च विवित्सुर्विकटाननः ।
ऊर्णनाभः सुनाभश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ।। ५ ।।
चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ।
अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्राङ्गश्चित्रकुण्डलः ।।६।।
भीमवेगो भीमबलो बलाकी बलवर्धनः ।
उग्रायुधः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ ।। ७ ।।
चित्रायुधो निषङ्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा।
दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ।।८।।
दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक् ।
उग्रश्रवा उग्रसेनः सेनानीर्दुष्पराजयः ।।९।।
अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधरः ।
दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ।। १० ।।
आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तोऽग्रयाय्यपि ।
कवची क्रथनः दण्डी दण्डधारो धनु्ग्रहः ।। ११ ।।
उग्रभीमरथौ वीरौ वीरबाहुरलोलुपः ।
अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रयः ।। १२ ।।
अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी चित्रकुण्डलः ।
प्रमथश्च प्रमाथी च दीर्घरोमश्च वीर्यवान् ।। १३ ।।
दीर्घबाहुर्महाबाहुव्व्यूढोरुः कनकध्वजः ।
कुण्डाशी विरजाश्चैव दुःशला च शताधिका ।। १४ ।।
वैशम्पायनजीने कहा-(जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमशः ये हैं-) १.दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९.विन्द, १०. अनुविन्द, ११. दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख,१६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन,२३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप ), २७. दुर्मद, २८.दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२ . सुनाभ (पद्मनाभ),३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८.दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद) ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल),४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७.सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१ निषंगी, ५२. पाशी, ५३.वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढसन्ध, ५९.जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सदःसुवाक् (सहस्रवाक्), ६२. उग्रश्रवा, ६३. उग्रसेन, ६४.सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९.दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु,७५. बह्वाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९. क्रथन, ८०.दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुर्ग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप,८७. अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२.विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४, प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा(दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोर, ९८. कनकध्वज ( कनकांगद), ९९.कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा-धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशलानामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी।। २-१४ ।।
इति पुत्रशतं राजन् कन्या चैव शताधिका ।
नामधेयानुपूर्व्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप ।। १५ ।।
राजन्! इस प्रकार धृतराष्ट्रके सौ पुत्र और उन सौके अतिरिक्त एक कन्या बतायी गयी ।राजन्! जिस क्रमसे इनके नाम लिये गये हैं, उसी क्रमसे इनका जन्म हुआसमझो ।। १५ ।।
सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ।
सर्वे वेदविदश्चैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः ।। १६ ।।
ये सभी अतिरथी शूरवीर थे। सबने युद्धविद्यामें निपुणता प्राप्त कर ली थी। सब-सब वेदोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके मर्मज्ञ थे ।। १६ ।।
सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते ।
धृतराष्ट्रेण समये परीक्ष्य विधिवन्नृप ।। १७ ।
दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
जयद्रथाय प्रददौ विधिना भरतर्षभ ।। १८ ।।
जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने समयपर भलीभाँति जाँच-पड़ताल करके अपने सभी पुत्रोंका उनके योग्य स्त्रियोंके साथ विवाह कर दिया । भरतश्रेष्ठ! महाराज धृतराष्ट्रने विवाहके योग्य समय आनेपर अपनी पुत्री दुःशलाका राजा जयद्रथके साथ विधिपूर्वक विवाह किया ।। १७-१८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रपुत्रनामकथने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ।।११६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रपुत्रनामवर्णनविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११६ ।।
* आदिपर्वके सरसठवें अध्यायमें भी धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंके नाम आये हैं। वहाँ जो नाम दिये गये हैं, उनमेंसे अधिकांश नाम इस अध्यायमें भी ज्यों-के त्यों हैं। कुछ नामोंमें साधारण अन्तर है, जिन्हें यहाँ कोष्ठकमें दे दिया गया है । इस प्रकार यहाँ और वहाँके नामोंकी एकता की गयी है। थोड़े-से नाम ऐसे भी हैं, जिनका मेल नहीं मिलता । नामोंके क्रममें भी दोनों स्थलोंमें अन्तर है। सम्भव है, उनके दो-दो नाम रहे हों और दोनों स्थलोंमें भिन्न-भिन्न नामोंका उल्लेख हो ।
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति
जनमेजय उवाच
कथितो धार्तराष्ट्राणामार्षः सम्भव उत्तमः ।
अमनुष्यो मनुष्याणां भवता ब्रह्मवादिना ।। १ ।।
जनमेजयने कहा-भगवन्! आपने धृतराष्ट्रके पुत्रोंके जन्मका उत्तम प्रसंग सुनाया है,जो महर्षि व्यासकी कृपासे सम्भव हुआ था। आप ब्रह्मवादी हैं। आपने यद्यपि यह मनुष्योंकेजन्मका वृतान्त बताया है, तथापि यह दूसरे मनुष्योंमें कभी नहीं देखा गया।। १ ।।
नामधेयानि चाप्येषां कथ्यमानानि भागशः।
त्वत्तः श्रुतानि मे ब्रह्मन् पाण्डवानां च कीर्तय ।। २ ।।
ब्रह्मन्! इन धृतराष्ट्रपुत्रोंके पृथक्-पृथक् नाम भी जो आपने कहे हैं, वे मैंने अच्छी तरहसुन लिये। अब पाण्डवोंके जन्मका वर्णन कीजिये ।। २ ।।
ते हि सर्वे महात्मानो देवराजपराक्रमाः ।
त्वयैवांशावतरणे देवभागाः प्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥
वे सब महात्मा पाण्डव देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। आपने ही अंशावतरणकेप्रसंगमें उन्हें देवताओंका अंश बताया था ।। ३ ।।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमतिमानुषकर्मणाम् ।
तेषामाजननं सर्वं वैशम्पायन कीर्तय ।। ४ ।।
वैशम्पायनजी! वे ऐसे पराक्रम कर दिखाते थे, जो मनुष्योंकी शक्तिके परे हैं; अतः मैंउनके जन्म-सम्बन्धी वृत्तान्तको सम्पूर्णतासे सुनना चाहता हूँ; कृपा करके कहिये ।। ४ ।।
वैशम्पायन उवाच
राजा पाण्डुर्महारण्ये मृगव्यालनिषेविते ।
चरन् मैथुनधर्मस्थं ददर्श मृगयूथपम् ।। ५ ।।
वैशम्पायनजी बोले-जनमेजय! एक समय राजा पाण्डु मृगों और सर्पोंसे सेवितविशाल वनमें विचर रहे थे। उन्होंने मृगोंके एक यूथपतिको देखा, जो मृगीके साथ मैथुन कररहा था ।। ५ ।।
ततस्तां च मृगीं तं च रुक्मपुङ्खैः सुपत्रिभिः ।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ।। ६ ।।
उसे देखते ही राजा पाण्डुने पाँच सुन्दर एवं सुनहरे पंखोंसे युक्त तीखे तथा शीघ्रगामी बाणोंद्वारा, उस मृगी और मृगको भी बींध डाला ।। ६ ।।
स च राजन् महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः ।
भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण संगतः ।। ७ ।।
राजन्! उस मृगके रूपमें एक महातेजस्वी तपोधन ऋषिपुत्र थे, जो अपनी मृगीरूपधारिणी पत्नीके साथ तेजस्वी मृग बनकर समागम कर रहे थे ।। ७ ।।
संसक्तश्च तया मृग्या मानुषीमीरयन् गिरम् ।
क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेन्द्रियः ।। ८ ।।
वे उस मृगीसे सटे हुए ही मनुष्योंकी-सी बोली बोलते हुए क्षणभरमें पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे विलाप करने लगे ।। ८ ।।
मृग उवाच काममन्युपरीता हि बुद्ध्या विरहिता अपि ।
वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ।। ९ ।।
न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः।
विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते ।। १० ।।
मृगने कहा-राजन्! जो मनुष्य काम और क्रोधसे घिरे हुए, बुद्धिशून्य तथा पापोंमेंसंलग्न रहनेवाले हैं, वे भी ऐसे क्रूरतापूर्ण क्मको त्याग देते हैं। बुद्धि प्रारब्धको नहीं ग्रसती(नहीं लाँघ सकती) प्रारब्ध ही बुद्धिको अपना ग्रास बना लेता है ( भ्रष्ट कर देता है)।प्रारब्धसे प्राप्त होनेवाले पदार्थोंको बुद्धिमान् पुरुष भी नहीं जान पाता।। ९-१० ।।
शश्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत ।
कामलोभाभिभूतस्य कथं ते चलिता मतिः ।॥ ११ ।।
भारत! सदा धर्ममें मन लगानेवाले क्षत्रियोंके प्रधान कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है, तोभी काम और लोभके वशीभूत होकर तुम्हारी बुद्धि धर्मसे कैसे विचलित हुई? ।। ११ ।।
पाण्डुरुवाच
शत्रूणां या वधे वृत्तिः सा मृगाणां वधे स्मृता ।
राज्ञां मृग न मां मोहात् त्वं गर्हयितुमर्हसि ।। १२ ।।
पाण्डु बोले-शत्रुओंके वधमें राजाओंकी जैसी वृत्ति बतायी गयी है, वैसी ही मृगोंकेवधमें भी मानी गयी है; अतः मृग! तुम्हें मोहवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये ।। १२ ।।
अच्छद्मना मायया च मृगाणां वध इष्यते ।
स एव धर्मो राज्ञां तु तद्धि त्वं किं नु गर्हसे ।। १३ ।।
प्रकट या अप्रकट रूपसे मृगोंका वध हमारे लिये अभीष्ट है । वह राजाओंके लिये धर्महै, फिर तुम उसकी निन्दा कैसे करते हो? ।। १३ ।।
अगस्त्यः सत्रमासीनश्चकार मृगयामृषिः ।
आरण्यान् सर्वदेवेभ्यो मृगान् प्रेषन् महावने ।। १४ ।।
प्रमाणदृष्टधर्मेण कथमस्मान् विगर्हसे ।
अगस्त्यस्याभिचारेण युष्माकं विहितो वधः ।। १५ ।।
महर्षि अगस्त्य एक सत्रमें दीक्षित थे, तब उन्होंने भी मृगया की थी। सभी देवताओंकेहितके लिये उन्होंने सत्रमें विघ्न करनेवाले पशुओंको महान् वनमें खदेड़ दिया था। अगस्त्यऋषिके उक्त हिंसाकर्मके अनुसार (मुझ क्षत्रियके लिये तो) तुम्हारा वध करना ही उचित है।मैं प्रमाणसिद्ध धर्मके अनुकूल बर्ताव करता हूँ, तो भी तुम क्यों मेरी निन्दा करतेहो? ।। १४-१५ ।।
मृग उवाच
न रिपून् वै समुद्दिश्य विमुञ्चन्ति नराः शरान् ।
रन्ध्र एषां विशेषेण वधः काले प्रशस्यते ।। १६ ।।
मृगने कहा-मनुष्य अपने शत्रुओंपर भी, विशेषतः जब वे संकटकालमें हों, बाण नहींछोड़ते। उपयुक्त अवसर (संग्राम आदि)-में ही शत्रुओंके वधकी प्रशंसा की जातीहै ।। १६ ।।
पाण्डुरुवाच
प्रमत्तमप्रमत्तं वा विवृत्तं घ्नन्ति चौजसा ।
उपायैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कस्मान्मृग विगर्हसे ।। १७ ।।
पाण्डु बोले-मृग! राजालोग नाना प्रकारके तीक्ष्ण उपायोंद्वारा बलपूर्वक खुले-आममृगका वध करते है; चाहे वह सावधान हो या असावधान। फिर तुम मेरी निन्दा क्यों करतेहो? ।। १७ ।।
मृग उवाच
नाहं घ्नन्तं मृगान् राजन् विगहें चात्मकारणात् ।
मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे त्वयेहाद्यानृशंस्यतः ।। १८ ।।
मृगने कहा-राजन्! मैं अपने मारे जानेके कारण इस बातके लिये तुम्हारी निन्दा नहींकरता कि तुम मृगोंको मारते हो। मुझे तो इतना ही कहना है कि तुम्हें दयाभावका आश्रयलेकर मेरे मैथुनकर्मसे निवृत्त होनेतक प्रतीक्षा करनी चाहिये थी ।। १८ ।।
सर्वभूतहिते काले सर्वभूतेप्सिते तथा ।
को हि विद्वान् मृगं हन्याच्चरन्तं मैथुनं वने ।। १९ ।।
जो सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकर और अभीष्ट है, उस समयमें वनके भीतर मैथुनकरनेवाले किसी मृगको कौन विवेकशील पुरुष मार सकता है? ।। १९ ।।
अस्यां मृग्यां च राजेन्द्र हर्षान्मैथुनमाचरम् ।
पुरुषार्थफलं कर्तुं तत् त्वया विफलीकृतम् ।। २० ।।
राजेन्द्र! मैं बड़े हर्ष और उल्लासके साथ अपने कामरूपी पुरुषार्थको सफल करनेकेलिये इस मृगीके साथ मैथुन कर रहा था; किंतु तुमने उसे निष्फल कर दिया।। २० ।।
पौरवाणां महाराज तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
वंशे जातस्य कौरव्य नानुरूपमिदं तव ।। २१ ।।
महाराज! क्लेशरहित कर्म करनेवाले कुरुवंशियोंके कुलमें जन्म लेकर तुमने जो यहकार्य किया है, यह तुम्हारे अनुरूप नहीं है ।। २१ ।।
नृशंसं कर्म सुमहत् सर्वलोकविगर्हितम् ।
अस्वर्ग्यमयशस्यं चाप्यधर्मिष्ठं च भारत ।। २२ ।।
भारत! अत्यन्त कठोरतापूर्ण कर्म सम्पूर्ण लोकोंमें निन्दित है। वह स्वर्ग और यशकोहानि पहुँचानेवाला है। इसके सिवा वह महान् पापकृत्य है ।। २२ ।।
स्त्रीभोगानां विशेषज्ञः शास्त्रधर्मार्थतत्त्ववित् ।
नार्हस्त्वं सुरसंकाश कर्तुमस्वर्ग्यमीदृशम् ।। २३।।
देवतुल्य महाराज! तुम स्त्री-भोगोंके विशेषज्ञ तथा शास्त्रीय धर्म एवं अर्थके तत्त्वकोजाननेवाले हो। तुम्हें ऐसा नरकप्रद पापकार्य नहीं करना चाहिये था ।। २३ ।।
त्वया नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः।
निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ।। २४ ।।
नृपशिरोमणे! तुम्हारा कर्तव्य तो यह है कि धर्म, अर्थ और कामसे हीन जो पापाचारीमनुष्य कठोरतापूर्ण कर्म करनेवाले हों, उन्हें दण्ड दो ।। २४ ।।
किं कृतं ते नरश्रेष्ठ मामिहानागसं घ्नता ।
मुनिं मूलफलाहारं मृगवेषधरं नृप ।। २५ ।।
वसमानमरण्येषु नित्यं शमपरायणम् ।
त्वयाहं हिंसितो यस्मात् तस्मात् त्वामप्यहं शपे ।। २६ ।।
नरश्रेष्ठ! मैं तो फल-मूलका आहार करनेवाला एक मुनि हूँ और मृगका रूप धारणकरके शम-दमके पालनमें तत्पर हो सदा जंगलोंमें ही निवास करता हूँ। मुझ निरपराधकोमारकर यहाँ तुमने क्या लाभ उठाया? तुमने मेरी हत्या की है, इसलिये बदलेमें मैं भी तुम्हेंशाप देता हूँ ।। २५-२६ ।।
द्वयोर्नृशंसक्तारमवशं काममोहितम् ।
जीवितान्तकरो भाव एवमेवागमिष्यति ।। २७ ।।
तुमने मैथुन-धर्ममें आसक्त दो स्त्री-पुरुषोंका निष्ठुरता-पूर्वक वध किया है। तुमअजितेन्द्रिय एवं कामसे मोहित हो; अतः इसी प्रकार मैथुनमें आसक्त होनेपर जीवनकाअन्त करनेवाली मृत्यु निश्चय ही तुमपर आक्रमण करेगी ।। २७ ।।
अहं हि किंदमो नाम तपसा भावितो मुनिः ।
व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ।। २८ ।।
मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने।
न तु ते ब्रह्महत्येयं भविष्यत्यविजानतः ।। २९ ।।
मेरा नाम किंदम है। मैं तपस्यामें संलग्न रहनेवाला मुनि हूँ, अतः मनुष्योंमें-मानव-शरीरसे यह काम करनेमें मुझे लज्जाका अनुभव हो रहा था। इसीलिये मृग बनकर अपनीमृगीके साथ मैथुन कर रहा था। मैं प्रायः इसी रूपमें मृगोंके साथ घने वनमें विचरता रहताहूँ। तुम्हें मुझे मारनेसे ब्रह्महत्या तो नहीं लगेगी; क्योंकि तुम यह बात नहीं जानते थे (कियह मुनि है) ।। २८-२९ ।।
मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् ।
अस्य तु त्वं फलं मूढ प्राप्स्यसीदृशमेव हि ।। ३० ।।
परंतु जब मैं मृगरूप धारण करके कामसे मोहित था, उस अवस्थामें तुमने अत्यन्तक्रूरताके साथ मुझे मारा है; अतः मूढ़! तुम्हें अपने इस कर्मका ऐसा ही फल अवश्यमिलेगा ।। ३० ।।
प्रियया सह संवासं प्राप्य कामविमोहितः ।
त्वमप्यस्यामवस्थायां प्रेतलोकं गमिष्यसि ।। ३१ ।।
तुम भी जब कामसे सर्वथा मोहित होकर अपनी प्यारी पत्नीके साथ समागम करनेलगोगे, तब इस-मेरी अवस्थामें ही यमलोक सिधारोगे ।। ३१ ।।
अन्तकाले हि संवासं यया गन्तासि कान्तया ।
प्रेतराजपुरं प्राप्तं सर्वभूतदुरत्ययम् ।
भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वानुगमिष्यति ।। ३२ ।।
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अन्तकाल आनेपर तुम जिस प्यारी पत्नीके साथ समागमकरोगे, वही समस्त प्राणियोंके लिये दुर्गम यमलोकमें जानेपर भक्तिभावसे तुम्हारा अनुसरणकरेगी ।। ३२ ।।
वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वया ।
तथा त्वां च सुखं प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ।। ३३ ।।
मैं सुखमें मग्न था, तथापि तुमने जिस प्रकार मुझे दुःखमें डाल दिया, उसी प्रकार तुमभी जब प्रेयसी पत्नीके संयोग-सुखका अनुभव करोगे, उसी समय तुम्हारे ऊपर दुःख टूटपड़ेगा ।। ३३ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुदुःखातों जीवितात् स व्यमुच्यत ।
मृगः पाण्डुश्च दुःखातः क्षणेन समपद्यत ।। ३४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-यों कहकर वे मृगरूप-धारी मुनि अत्यन्त दुःखसे पीड़ित होगये और उनका देहान्त हो गया तथा राजा पाण्डु भी क्षणभरमें दुःखसे आतुर होउठे ।। ३४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुमृगशापे सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुको मृगका शाप नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।।
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् ।
सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! उन मृगरूपधारी मुनिको मरा हुआ छोड़कर राजा पाण्डु जब आगे बढ़े, तब पत्नीसहित शोक और दुःखसे आतुर हो अपने सगे भाई – बन्धुकी भाँति उनके लिये विलाप करने लगे तथा अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे ।। १ ।।
पाण्डुरुवाच सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् ।
प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ।। २ ।।
पाण्डु बोले-खेदकी बात है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके उत्तम कुलमें उत्पन्न मनुष्य भी अपने अन्तःकरणपर वश न होनेके कारण कामके फंदेमें फँसकर विवेक खो बैठते अनुचित कर्म करके उसके द्वारा भारी दुर्गतिमें पड़ जाते हैं ।। २ ।।
शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम ।
जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ।। ३ ।।
हमने सुना है, सदा धर्ममें मन लगाये रहनेवाले महाराज शन्तनुसे जिनका जन्म हुआ था, वे मेरे पिता विचित्रवीर्य भी कामभोगमें आसक्तचित्त होनेके कारण ही छोटी अवस्थामें ही मृत्युको प्राप्त हुए थे ।। ३ ।।
तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषि: ।
कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् भगवान् मामजीजनत् । । ४ ।।
उन्हीं कामासक्त नरेशकी पत्नीसे वाणीपर संयम रखनेवाले ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने मुझे उत्पन्न किया ।। ४ ।।
तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा।
त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ।। ५ ।।
मैं शिकारके पीछे दौड़ता रहता हूँ; मेरी इसी अनीतिके कारण जान पड़ता है। देवताओंने मुझे त्याग दिया है। इसीलिये तो ऐसे विशुद्ध वंशमें उत्पन्न होनेपर भी आज व्यसनमें फँसकर मेरी यह बुद्धि इतनी नीच हो गयी।। ५ ।।
औरमोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् ।
सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ६ । ।
अतः अब मैं इस निश्चयपर पहुँच रहा हूँ कि मोक्षके मार्गपर चलनेसे ही अपना कल्याणहै। स्त्री-पुत्र आदिका बन्धन ही सबसे महान् दुःख है। आजसे मैं अपने पितावेदव्यासजीकी उस उत्तम वृत्तिका आश्रय लूँगा, जिससे पुण्यका कभी नाश नहींहोता ।। ६ ।।
अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् ।
तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ ।। ७ ।।
चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् ।
पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ।| ८ ।।
मैं अपने शरीर और मनको नि:संदेह अत्यन्त कठोर तपस्यामें लगाऊँगा। इसलिये अबअकेला (स्त्रीरहित) और एकाकी (सेवक आदिसे भी अलग) रहकर एक-एक वृक्षके नीचेफलकी भिक्षा माँगूँगा। सिर मुँड़ाकर मौनी संन्यासी हो इन वानप्रस्थियोंके आश्रमोंमेंविचरूँगा। उस समय मेरा शरीर धूलसे भरा होगा और निर्जन एकान्त स्थानमें मेरा निवासहोगा ।। ७-८ ।।
वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ।
न शोचन् न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।। ९ ।।
अथवा वृक्षोंका तल ही मेरा निवासगृह होगा। मैं प्रिय एवं अप्रिय सब प्रकारकीवस्तुओंको त्याग दूँगा। न मुझे किसीके वियोगका शोक होगा और न किसीकी प्राप्ति यासंयोगसे हर्ष ही होगा। निन्दा और स्तुति दोनों मेरे लिये समान होंगी।। ९ ।।
निराशीर्निर्नमस्कारो नि्द्न्धो निष्परिग्रहः ।
न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भ्रुकुट्टीं क्वचित् ।। १० ।।
न मुझे आशीर्वादकी इच्छा होगी न नमस्कारकी। मैं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहितऔर संग्रह-परिग्रहसे दूर रहूँगा। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न क्रोधसे किसीपरभौंहें टेढ़ी करूँगा ।। १० ।।
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः ।
जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ।॥ ११ ।।
मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी तथा सदा सब भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहूँगा।(स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज, जरायुज-) चार प्रकारके जो चराचर प्राणी हैं, उनमेंसेकिसीकी भी मैं हिंसा नहीं करूँगा ।। ११ ।।
स्वासु प्रजास्विव सदा समः प्राणभृतां प्रति ।
एककालं चरन् भैक्ष्यं कुलानि दश पञ्च वा ।। १२ ।।
जैसे पिता अपनी अनेक संतानोंमें सर्वदा समभाव रखता है, उसी प्रकार समस्तप्राणियोंके प्रति मेरा सदा समानभाव होगा। ( पहले कहे अनुसार) मैं केवल एक समयवृक्षोंसे भिक्षा माँगूँगा अथवा यह सम्भव न हुआ तो दस-पाँच घरोंमें घूमकर (थोड़ी-थोड़ी)भिक्षा ले लँगा ।। १२ ।।
असम्भवे वा भैक्ष्यस्य चरन्ननशनान्यपि।
अल्पमल्पं च भुञ्जानः पूर्वालाभे न जातुचित् ।। १३ ।।
अन्यान्यपि चरँल्लोभादलाभे सप्त पूरयन् ।
अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपाः ।। १४ ।।
अथवा यदि भिक्षा मिलनी असम्भव हो जाय, तो कई दिनतक उपवास ही करताचलूँगा। (भिक्षा मिल जानेपर भी) भोजन थोड़ा-थोड़ा ही करूँगा। ऊपर बताये हुए एकप्रकारसे भिक्षा न मिलनेपर ही दूसरे प्रकारका आश्रय लूँगा। ऐसा तो कभी न होगा किलोभवश दूसरे-दूसरे बहुत-से घरोंमें जाकर भिक्षा लूँ। यदि कहीं कुछ न मिला तो भिक्षाकीपूर्तिके लिये सात घरोंपर फेरी लगा लँगा। यदि मिला तो और न मिला तो , दोनों हीदशाओं में समान दृष्टि रखते हुए भारी तपस्यामें लगा रहूँगा।। १३-१४ ।।
वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः ।
नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः ।। १५ ।।
न जिजीविषुवत् किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् ।
जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन् न च द्विषन् ।। १६ ।।
एक आदमी बसूलेसे मेरी एक बाँह काटता हो और दूसरा मेरी दूसरी बाँहपर चन्दनछिड़कता हो तो उन दोनोंमेंसे एकके अकल्याणका और दूसरेके कल्याणका चिन्तन नहींकरूँगा। जीने अथवा मरनेकी इच्छावाले मनुष्य जैसी चेष्टाएँ करते हैं, वैसी कोई चेष्टा मैंनहीं कूँगा। न जीवनका अभिनन्दन कररूँगा, न मृत्युसे द्वेष ।। १५-१६ ।।
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः ।
ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ।। १७ ।।
तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः ।
सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ।। १८ ।।
जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्तसकाम कर्मोंको मैं त्याग ढूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं । अनित्य फल देनेवालीक्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्यागदूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा। अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध होजाऊँगा ।। १७-१८ ।।
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः ।
न वशे कस्यचित् तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वनः ।। १९ ।।
मैं सब पापोंसे सर्वथा मुक्त हो अविद्याजनित समस्त बन्धनोंको लाँघ जाऊँगा। किसीकेवशमें न रहकर वायुके समान सर्वत्र विचरूँगा ।। १९ ।।
एतया सततं धृत्या चरन्नेवंप्रकारया ।
देहूं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः ।। २० ।।
सदा इस प्रकारकी धृति (धारणा)-द्वारा उक्त रूपसे व्यवहार करता हुआ भयरहितमोक्षमार्गमें स्थित होकर इस देहका विसर्जन करूँगा ।। २० ।।
नाहं सुकृपणे मार्ग स्ववीर्यक्षयशोचिते ।
स्वधर्मात् सततापेते चरेयं वीर्यवर्जितः ।। २१ ।।
मैं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो गया हूँ। मेरा गृहस्थाश्रम संतानोत्पादन आदिधर्मसे सर्वथा शून्य है और मेरे लिये अपने वीर्यक्षयके कारण सर्वथा शोचनीय हो रहा है;अतः इस अत्यन्त दीनतापूर्ण मार्गपर अब मैं नहीं चल सकता ।। २१ ।।
सत्कृतोऽसत्कृतो वापि योऽन्यं कृपणचक्षुषा ।
उपैति वृत्तिं कामात्मा स शुनां वर्तते पथि ।। २२ ।।
जो सत्कार या तिरस्कार पाकर दीनतापूर्ण दृष्टिसे देखता हुआ किसी दूसरे पुरुषकेपास जीविकाकी आशासे जाता है, वह कामात्मा मनुष्य तो कुत्तोंके मार्गपर चलताहै ।। २२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुदुःखात्तों निःश्वासपरमो नृपः ।
अवेक्षमाणः कुन्तीं च माद्रीं च समभाषत ।। २३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! यों कहकर राजा पाण्डु अत्यन्त दुःखसे आतुरहो लंबी साँस खींचते और कुन्ती-माद्रीकी ओर देखते हुए उन दोनोंसे इस प्रकार बोले।। २३ ।।
कौसल्या विदुरः क्षत्ता राजा च सह बन्धुभिः ।
आर्या सत्यवती भीष्मस्ते च राजपुरोहिताः ।। २४ ।।
ब्राह्मणाश्च महात्मानः सोमपाः संशितक्रताः ।
पौरवृद्धाश्च ये तत्र निवसन्त्यस्मदाश्रयाः ।
प्रसाद्य सर्वे वक्तव्याः पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् ।। २५ ।।
‘(देवियो! तुम दोनों हस्तिनापुरको लौट जाओ और) माता अम्बिका, अम्बालिका , भाईविदुर, संजय, बन्धुओंसहित राजा धृतराष्ट्र, दादी सत्यवती चाचा भीष्मजी,राजपुरोहितगण, कठोरव्रतका पालन तथा सोमपान करनेवाले महात्मा ब्राह्मण तथा वृद्धपुरवासीजन आदि जो लोग वहाँ हमलोगोंके आश्रित होकर निवास करते हैं, उन सबकोप्रसन्न करके कहना, ‘राजा पाण्डु संन्यासी होकर वनमें चले गये’ ।। २४-२५ ।।
निशम्य वचनं भर्तुर्वनवासे धृतात्मनः ।
तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ।। २६ ।।
वनवासके लिये दृढ़ निश्चय करनेवाले पतिदेवका यह वचन सुनकर कुन्ती और माद्रीने उनके योग्य बात कही-।। २६ ।।
अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ ।
आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ।। २७ ।।
‘भरतश्रेष्ठ! संन्यासके सिवा और भी तो आश्रम हैं, जिनमें आप हम धर्मपत्नियोंके साथ रहकर भारी तपस्या कर सकते हैं ।। २७ ।।
शरीरस्यापि मोक्षाय स्वर्ग्य प्राप्य महाफलम् ।
त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ।। २८ ।।
‘आपकी वह तपस्या स्वर्गदायक महान् फलकी प्राप्ति कराकर इस शरीरसे भी मुक्ति दिलानेमें समर्थ हो सकती है। इसमें संदेह नहीं कि उस तपके प्रभावसे आप ही स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी हो सकते हैं ।। २८ ।।
प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे ।
त्यक्तकामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ।। २९ ।।
‘हम दोनों कामसुखका परित्याग करके पतिलोककी प्राप्तिका ही परम लक्ष्य लेकरअपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई भारी तपस्या करेंगी ।। २९ ।।
यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशाम्पते ।
अद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः ।। ३० ।।
‘महाप्राज्ञ नरेश्वर! यदि आप हम दोनोंको त्याग देंगे तो आज ही हम अपने प्राणोंकापरित्याग कर देंगी, इसमें संशय नहीं है’ ।। ३० ।।
पाण्डुरुवाच
यदि व्यवसितं ह्येतद् युवयोर्धर्मसंहितम् ।
स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् । ३१ ।।
पाण्डुने कहा-देवियो! यदि तुम दोनोंका यही धर्मयुक्त निश्चय है तो (ठीक है, मैंसंन्यास न लेकर वानप्रस्थाश्रममें ही रहूँगा तथा आजसे अपने पिता वेदव्यासजीकी अक्षयफलवाली जीवनचर्याका अनुसरण करूँगा ।। ३१ ।।
त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत् तपः ।
वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ।। ३२ ।।
भोगियोंके सुख और आहारका परित्याग करके भारी तपस्यामें लग जाऊँगा। वल्कलपहनकर फल-मूलका भोजन करते हुए महान् वनमें विचरूँगा ।। ३२ ।।
अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन् ।
कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ।। ३३ ।।
दोनों समय स्नान-संध्या और अग्निहोत्र करूँगा। चिथड़े, मृगचर्म और जटा धारणकरूँगा। बहुत थोड़ा आहार ग्रहण करके शरीरसे दुर्बल हो जाऊँगा ।। ३३ ।।
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासानवेक्षकः ।
तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोषयन् ।। ३४ ।।
एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् ।
पितृत् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ।। ३५ ।।
सर्दी, गरमी और आँधीका वेग सहूँगा। भूख-प्यासकी परवा नहीं करूँगा तथा दुष्करतपस्या करके इस शरीरको सुखा डालूँगा। एकान्तमें रह(कन्द-मूल आदि) और पके (फल आदि)-से जीवन-निर्वाह करूँगा। देवताओं औरपितरोंको जंगली फल-मूल, जल तथा मन्त्रपाठ-द्वारा तृप्त करूँगा ।। ३४-३५ ।।
शतशृंग पर्वतपर पाण्डुका तपवानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् ।
नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनग्र्रामवासिनाम् ।। ३६ ।।
मैं वानप्रस्थ आश्रममें रहनेवालोंका तथा कुटुम्बी-जनोंका भी दर्शन और अप्रिय नहींकरूँगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ।। ३६ ।।
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् ।
काङ्क्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्या समापनात् ।। ३७ ।।
इस प्रकार मैं वानप्रस्थ-आश्रमसम्बन्धी शास्त्रोंकी कठोर-से-कठोर विधियोंके पालनकीआकांक्षा करता हुआ तबतक वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित रहूँगा जबतक कि शरीरका अन्त नहो जाय ।। ३७ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः ।
ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च ।। ३८ ।।
वासांसि च महाह्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च ।
प्रदाय सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुः पुनरभाषत ।। ३९ ।
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा पाण्डुनेअपनी दोनों पत्नियोंसे यों कहकर अपने सिरपेंच, निष्क (वक्षःस्थलके आभूषण), बाजूबंद,कुण्डल और बहुमूल्य वस्त्र तथा माद्री और कुन्तीके भी शरीरके गहने उतारकर सबब्राह्मणोंको दे दिये। फिर सेवकोंसे इस प्रकार कहा- || ३८-३९ ।।
गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् ।
अर्थं कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् ।। ४० ।।
‘तुमलोग हस्तिनापुरमें जाकर कह देना कि कुरुनन्दन राजा पाण्डु अर्थ, काम,विषयसुख और स्त्रीविषयक रति आदि सब कुछ छोड़कर अपनी पत्नियोंके साथ वानप्रस्थहो गये हैं’ ।। ४०।।
प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः ।
ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारकाः ।। ४१ ।।
श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः ।
भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशुः ।। ४२ ।।
भरतसिंह पाण्डुकी यह करुणायुक्त चित्र-विचित्र वाणी सुनकर उनके अनुचर औरसेवक सभी हाय-हाय करके भयंकर आर्तनाद करने लगे ।। ४१-४२ ।।
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय महीपतिम् ।
ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद् धनम् ।। ४३ ।।
उस समय नेत्रोंसे गरम-गरम आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे सेवक राजा पाण्डुको छोड़कर और बचा हुआ सारा धन लेकर तुरंत हस्तिनापुरको चले गये ।। ४३ ।।
ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः।
कथयाञ्चक्रिरे राज्ञस्तद् धनं विविधं ददुः ।। ४४ ।।
उन्होंने हस्तिनापुरमें जाकर महात्मा राजा पाण्डुका सारा समाचार राजा धृतराष्ट्रसे ज्यों-का-त्यों कह सुनाया और वह नाना प्रकारका धन धृतराष्ट्रको ही सौंप दिया ।। ४४ ।।
श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने ।
धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ।। ४५ ।।
फिर उन सेवकोंसे उस महान् वनमें पाण्डुके साथ घटित हुई सारी घटनाओंको यथावत् सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र सदा पाण्डुकी ही चिन्तामें दुःखी रहने लगे ।। ४५ ।।
न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कह्हिचित् ।
भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन् ।। ४६ ।।
शय्या, आसन और नाना प्रकारके भोगोंमें कभी उनकी रुचि नहीं होती थी। वे भाईकेशोकमें मग्न हो सदा उन्हींकी बात सोचते रहते थे ।। ४६ ।।
राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः ।
जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ।। ४७ ।।
जनमेजय! राजकुमार पाण्डु फल-मूलका आहार करते हुए अपनी दोनों पत्नियोंकेसाथ वहाँसे नागशत नामक पर्वतपर चले गये ।। ४७ ।।
स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च ।
हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ।। ४८ ।।
तत्पश्चात् चैत्ररथ नामक वनमें जाकर कालकूट और हिमालय पर्वतको लाँघतेगन्धमादनपर चले गये ।। ४८ ।।
रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः ।
उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ।। ४९ ।।
इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च ।
शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ।। ५० ।।
महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षिगण उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची- नीची जमीनपर सो लेते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवरपर पहुँचकर तथा उसके बाद हंसकूटकोलाँघते हुए वे शतशृंग पर्वतपर जा पहुँचे। जनमेजय! वहाँ वे तपस्वी-जीवन बिताते हुए भारी तपस्यामें संलग्न हो गये ।। ४९-५० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि
पाण्डुचरितेऽष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुचरितविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११८ ।।