आङ्गिरसोपाख्यानेऽग्निसमुद्भव : अग्निदेव ने अपना पद त्यागकर अथर्वा को क्यों नियुक्त किया?
त्याग और उत्तरदायित्व का हस्तान्तरण
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 222 · पृष्ठ 1522–1528
मार्कण्डेय ने राजा से कहा
राजन्, सुनिए जल में निवास करने वाले 'सह' नामक अग्नि की कथा।
मार्कण्डेय जी बोले— राजन्! सुनो, जल में निवास करने के कारण प्रसिद्ध हुए 'सह' नामक अग्नि की कथा। उनकी एक परम प्रिय पत्नी थी मुदिता। उन दोनों के मिलन से भूलोक और भुवर्लोक के स्वामी 'अद्भुत' नामक उत्कृष्ट अग्नि का जन्म हुआ। ब्राह्मण लोग वंश-परम्परा से यह मानते हैं कि अद्भुत ही सम्पूर्ण भूतों के अधिपति, सबके आत्मा और इस जगत् के समस्त महाभूतों के पति हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं और गृहपति के नाम से यज्ञ में पूजे जाते हैं। उन्हीं अद्भुत के एक अग्निस्वरूप पुत्र हुए— भरत। भरत मरे हुए प्राणियों के शव का दाह करते हैं और अग्निष्टोम यज्ञ में उनका नित्य निवास है, इसीलिए उन्हें 'नियत' भी कहा जाता है।
प्रथम अग्नि 'सह' अत्यन्त प्रभावशाली थे। एक समय देवतालोग उन्हें ढूँढ़ रहे थे। जब वे अपने पौत्र नियत को अपने साथ आते देखते, तो उससे छू जाने के भय से सह समुद्र के भीतर घुस जाते। एक दिन जब देवतालोग उनकी खोज कर रहे थे, तब अग्निदेव ने अथर्वा (अङ्गिरा) को देखा और उनसे कहा— 'वीर! तुम देवताओं के पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपद पर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो।' इस प्रकार अथर्वा को भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थान में चले गए। किन्तु मत्स्यों ने अथर्वा को उनकी स्थिति बता दी। इससे कुपित होकर अग्नि ने उन्हें शाप देते हुए कहा— 'तुम लोग नाना प्रकार से जीवों के भक्ष्य बनोगे!'
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बलः ।
अथ त्वं गच्छ मध्वक्षं प्रियमेतत् कुरुष्व मे ॥
वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ । मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ । अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो '
तदनन्तर अग्नि ने अथर्वा से फिर वही बात कही। देवताओं के कहने पर अथर्वा मुनि ने सह नामक अग्निदेव से अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोने का भार लेने की इच्छा दिखाई और न ही वे अपने उस जीर्ण शरीर का भार सह सके। अन्ततः अथर्वा ने स्वयं अपना शरीर त्याग दिया। शरीर त्यागकर वे धरती में समा गए और भूमि को स्पर्श करते हुए उन्होंने पृथक्-पृथक् बहुत से धातुओं की सृष्टि की। 'सह' नामक अग्नि ने अपने पीब तथा रक्त से गन्धक एवं तैजस धातुओं को उत्पन्न किया। उनकी हड्डियों से देवदारु के वृक्ष प्रकट हुए, कफ से स्फटिक और पित्त से मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ। उनका यकृत् काले रङ्ग का लोहा बनकर प्रकट हुआ। उनके नख मेघसमूह बन गए और नाड़ियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुईं। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्या में लग गए।
शरीराद् विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन् नृप ।
एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थितः ॥
राजन्! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए । इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ।
जब भृगु और अङ्गिरा आदि ऋषियों ने पुनः उनको तपस्या से उपरत कर दिया, तब वे तपस्या से पुष्ट हुए और तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे। किन्तु महर्षि अङ्गिरा को अपने सामने देख वे अग्नि भय के मारे पुनः महासागर के भीतर प्रविष्ट हो गए। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जाने पर सारा संसार भयभीत हो गया और अथर्वा-अङ्गिरा की शरण में आया। देवताओं ने इन अथर्वा की पूजा की। अथर्वाने सब प्राणियों के देखते-देखते समुद्र को मथ डाला और अग्निदेव का दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि की।
दृष्ट्वा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् ।
तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् ।
अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥
महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा — अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की ।
इस प्रकार पूर्वकाल में अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अङ्गिरा ने फिर बुलाया, जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियों का हविष्य वहन करते हैं। इस प्रकार सह अग्नि ने समुद्र के भीतर भ्रमण करते हुए विविध वेदोक्त अग्निदेवों और उनके स्थानों को उत्पन्न किया।
एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा ।
आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया । जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं ।
In English
The Story of Sah and Atharva
Sah, a fire deity living in the water, becomes too weak to carry offerings to the gods and hides in the ocean. Atharva Angira sacrifices his body to create various metals and elements from his physical parts to assist the process. After Atharva's sacrifice and the intervention of sages, the fire deity returns to sustain all living beings.
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