श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1521–1530
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1521–1530
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जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, ‘ संनिहित ' अग्नि । ये मनुके तीसरे पुत्र हैं । इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है ॥ १ ९ ॥
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम् ।
अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ॥ २० ॥
कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतयः सदा ।
अग्निः स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तकः ॥ २१ ॥
जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण-पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगत्के कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अग्नि हैं । ( ये मनुके चौथे पुत्र हैं ) ॥ २०-२१ ॥
अग्रं यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा ।
कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ॥ २२ ॥
मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति- भाँतिके कर्मोंमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि ( मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं ॥ २२ ॥
इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि ।
अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्चित्तार्थमुल्बणान् ॥ २३ ॥
मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त ( समाधान ) -के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं ॥ २३ ॥
संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद् वायुनाग्नयः ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचयेऽग्नये ॥ २४ ॥
यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल ( आठ कपालोंमें * संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी ( आहुति देनी चाहिये ॥ २४ ॥
दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेऽग्नये ॥। २५ ॥
जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा ' वीति' नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये ॥ २५ ॥
यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेऽग्नये ॥ २६ ॥
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यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २६ ॥
अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमतेऽग्नये ॥ २७ ॥
यदि अग्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान् अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये ॥ २७ ॥
मृतः श्रूयेत यो जीवः परेयुः पशवो यदा ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या सुरभिमतेऽग्नये ॥ २८ ॥
यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान् नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये ॥ २८ ॥
आर्तो न जुहुयादग्निं त्रिरात्रं यस्तु ब्राह्मणः ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये ॥ २९ ॥
जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अग्निहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा ' उत्तर' नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २ ९ ॥
दर्शं च पौर्णमासं च यस्य तिष्ठेत् प्रतिष्ठितम् ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नये ॥ ३० ॥
जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे 'पथिकृत' नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ॥
सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नये ॥ ३१ ॥
जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा ' अग्निमान् ' नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
इसप्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
3. तप अर्थात् पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे । उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं- पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य । उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है । २. श्रुति भी कहती है — ' आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति । ’
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३. बलद, मन्युमान् तथा विष्णु नामक अग्नि भानुकी भार्या सुप्रजासे उत्पन्न हैं । इसी प्रकार ' आग्रयण ' ' अग्रह ' अ ' स्तुभ’– ये तीन अग्नि बृहद्भासाकी संतान हैं । * मिट्टीके प्याले या पुरवेका नाम कपाल है ।
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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनःउनका प्राकट्य मार्कण्डेय उवाच
आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया ।
भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत् पावकं परम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए ' सह ' नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता । उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने ‘ अद्भुत’ ” नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया ॥ १ ॥
भूतानां चापि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम् ।
आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु ॥ २ ॥
ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि ' अद्भुत' नामक
अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं । वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं ॥ २ ॥
महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पतिः ।
भगवान् स महातेजा नित्यं चरति पावकः ॥ ३ ॥
' वे ही इस जगत्के सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं । उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं । वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं ॥ ३ ॥
अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते ।
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावकः ॥ ४ ॥
‘ जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्को पवित्र करनेवाले हैं ॥ ४ ॥
अपां गर्भो महाभागः सत्त्वभुग् यो महाद्भुतः ।
भूपतिर्भुवभर्ता च महतः पतिरुच्यते ॥ ५ ॥
‘जो ‘ आप ' नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान् अग्नि बुद्धितत्त्वके अधिपति बताये जाते हैं' ॥ ५ ॥
दहन् मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतोऽभवत् ।
अग्निष्टोमे च नियतः क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु ॥ ६ ॥
‘ उन्हीं ‘ अद्भुत’ या गृहपतिके एक अग्निस्वरूप पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘ भरत ’ है । ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं । भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है,
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इसलिये उन्हें ‘ नियत ' भी कहते हैं । नियतका संकल्प उत्तम है ॥ ६ ॥
स वह्निः प्रथमो नित्यं देवैरन्विष्यते प्रभुः ।
आयान्तं नियतं दृष्ट्वा प्रविवेशार्णवं भयात् ॥ ७ ॥
‘ प्रथम अग्नि ‘ सह ’ बड़े प्रभावशाली हैं । एक समय देवतालोग उनको ढूँढ़ रहे थे । उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख ( उससे छू जानेके ) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये ॥ ७ ॥
देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम् ।
दृष्ट्वा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
तब देवतालोग सब दिशाओंमें उनकी खोज करते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे । एक दिन अथर्वा ( अंगिरा ) -को देखकर अग्निने उनसे कहा— ॥ ८ ॥
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बलः ।
अथ त्वं गच्छ मध्वक्षं प्रियमेतत् कुरुष्व मे ॥ ९ ॥
वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ । मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ । अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो ' ॥ ९ ॥
प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत् ।
मत्स्यास्तस्य समाचख्युः क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत् ।
भक्ष्या वै विविधैर्भावैर्भविष्यथ शरीरिणाम् ॥ १० ॥
इस प्रकार अथर्वाको भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थानमें चले गये । किंतु मत्स्योंने अथर्वासे उनकी स्थिति कहाँ है, यह बता दिया । इससे कुपित होकर अग्निने उन्हें शाप देते हुए कहा -' तुम लोग नाना प्रकारसे जीवोंके भक्ष्य बनोगे ' ॥ अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहोऽब्रवीद् वचः ॥ ११ ॥
अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः ।
नैच्छद् वोढुं हविः सोढुं शरीरं चापि सोऽत्यजत् ॥ १२ ॥
तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही । उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य
ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके ।
अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया ॥ ११-१२ ॥
स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा ।
भूमिं स्पृष्टासृजद् धातून् पृथक् पृथगतीव हि ॥ १३ ॥
उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये । भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक् - पृथक् बहुत - से धातुओंकी सृष्टि की ॥ १३ ॥
पूयात् स गन्धं तेजश्च अस्थिभ्यो देवदारु च ।
श्लेष्मणः स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा ॥ १४ ॥
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' सह ' नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया । उनकी हड्डियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए । कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १४ ॥
यकृत् कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभुः प्रजाः ।
नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम् ॥ १५ ॥
और उनका यकृत् ( जिगर ) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा— इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है । उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं । नाडियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं ॥ १५ ॥
शरीराद् विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन् नृप ।
एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थितः ॥ १६ ॥
राजन्! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए । इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ॥ १६ ॥
भृग्वङ्गिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा ।
भृशं जज्वाल तेजस्वी तपसाऽऽप्यायितः शिखी ॥ १७ ॥
जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे ॥ १७ ॥
दृष्ट्वा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् ।
तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् ।
अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥ १८ ॥
महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा — अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की ॥ १८ ॥
अथर्वा त्वसृजल्लोकानात्मनाऽऽलोक्य पावकम् ।
मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम् ॥ १ ९ ॥
अथर्वाने सब प्राणियोंके देखते- देखते समुद्रको मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की ॥ १ ९ ॥
एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा ।
आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥ २० ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया । जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं ॥ २० ॥
एवं त्वजनयद् धिष्ण्यान् वेदोक्तान् विबुधान् बहून् ।
विचरन् विविधान् देशान् भ्रममाणस्तु तत्र वै ॥ २१ ॥
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उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया ॥ २१ ॥
सिन्धुनदं पञ्चनदं देविकाथ सरस्वती ।
गङ्गा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्वया ॥ २२ ॥
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा ।
ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ॥ २३ ॥
तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा ।
वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत ॥ २४ ॥
भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा ।
तुङ्गवेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च ॥ २५ ॥
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र –ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति--स्थान कहे गये हैं ॥ २२–२५ ॥ अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसिः ॥ २६ ॥
यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु ।
अत्रेश्चाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाः प्रजाः ॥ २७ ॥
अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके ' विभूरसि' नामक पुत्र हुआ । अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है । वे सब अग्नि ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ २६-२७ ॥ अत्रिः पुत्रान् स्रष्टुकामस्तानेवात्मन्यधारयत् ॥ २८ ॥
तस्य तद्ब्रह्मणः कार्यान्निर्हरन्ति हुताशनाः । अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया । फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८ ३ ॥ एवमेते महात्मानः कीर्तितास्तेऽग्नयो मया ॥ २ ९ ॥ अप्रमेया यथोत्पन्नाः श्रीमन्तस्तिमिरापहाः । राजन्! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान् महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया ॥ २ ९ ॥ अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् ॥ ३० ॥
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तादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येषु हुताशनः । वेदोंमें ‘ अद्भुत' नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है ॥ ३० ॥
एक एवैष भगवान् विज्ञेयः प्रथमोऽङ्गिराः ॥ ३१ ॥
बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोमः क्रतुर्यथा । ये प्रथम भगवान् अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये । जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है ॥ ३१ ॥
इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया ।
योऽर्चितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान् वंशका प्रतिपादन किया गया । वे भगवान् अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वारा पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्यानेऽग्निसमुद्भवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२२ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक अग्निप्रादुर्भावसम्बन्धीदो सौ बाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २२२ ॥
‘ सहसः पुत्रोऽद्भुतः ’ इति मन्त्रवर्णः ।
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त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार (वैशम्पायनउवाच
श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयं तपस्विनम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यह धर्मयुक्त कल्याणमयी कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उन तपस्वी मुनि मार्कण्डेयजीसे पूछा ॥ युधिष्ठिरउवाच
कुमारस्तु यथा जातो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् ।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलमतीव मे ॥ ) युधिष्ठिर बोले — मुने! कुमार ( स्कन्द ) -का जन्म कैसे हुआ? वे अग्निके पुत्र किस प्रकार हुए? भगवान् शिवसे उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई? तथा वे गंगा और छहों कृत्तिकाओंके गर्भसे कैसे प्रकट हुए? मैं यह सुनना चाहता हूँ । इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ॥ मार्कण्डेय उवाच
अग्नीनां विविधा वंशाः कीर्तितास्ते मयानघ ।
शृणु जन्म तु कौरव्य कार्तिकेयस्य धीमतः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा- निष्पाप युधिष्ठिर! मैंने तुमसे अग्नियोंके विविध वंशोंका वर्णन किया । अब तुम परम बुद्धिमान् कार्तिकेयके जन्मका वृत्तान्त सुनो ॥ १ ॥
अद्भुतस्याद्भुतं पुत्रं प्रवक्ष्याम्यमितौजसम् ।
जातं ब्रह्मर्षिभार्याभिर्ब्रह्मण्यं कीर्तिवर्धनम् ॥ २ ॥
अद्भुत अग्निके अद्भुत पुत्र कार्तिकेयके बल और तेज असीम हैं । उनका जन्म ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके गर्भसे हुआ है । वे अपने उत्तम यशको बढ़ानेवाले तथा ब्राह्मणभक्त हैं । मैं उनके जन्मका वृत्तान्त बता रहा हूँ, सुनो ॥ २ ॥
देवासुराः पुरा यत्ता विनिघ्नन्तः परस्परम् ।
तत्राजयन् सदा देवान् दानवा घोररूपिणः ॥ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है, देवता और असुर युद्धके लिये उद्यत हो एक- दूसरेको अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा चोट पहुँचाया करते थे । उस संघर्षके समय भयंकर रूपवाले दानव सदा ही देवताओंपर विजय पाते थे ॥ ३ ॥
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वध्यमानं बल दृष्ट्वा बहुशस्तैः पुरंदरः ।
स सैन्यनायकार्थाय चिन्तामाप भृशं तदा ॥ ४ ॥
जब इन्द्रने देखा कि दानव बार- बार देवताओंकी सेनाका वध कर रहे हैं, तब उन्हें एक
सुयोग्य सेनापतिकी आवश्यकता हुई । इसके लिये वे बहुत चिन्तित हुए ॥ ४ ॥
देवसेनां दानवैर्हि भरनां दृष्ट्वा महाबलः ।
पालयेद् वीर्यमाश्रित्य स ज्ञेयः पुरुषो मया ॥ ५ ॥
उन्होंने सोचा ‘ मुझे ऐसे पुरुषका पता लगाना चाहिये जो महान् बलवान् हो और अपने पराक्रमका आश्रय ले देवताओंकी उस सेनाका, जिनका दानव नाश कर देते हैं, संरक्षण करे' ॥ ५ ॥
स शैलं मानसं गत्वा ध्यायन्नर्थमिदं भृशम् ।
शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिया तदा ॥ ६ ॥
इसी बातका बार- बार विचार करते हुए इन्द्र मानसपर्वतपर गये । वहाँ उन्हें एक स्त्रीके मुखसे निकला हुआ भयंकर आर्तनाद सुनायी दिया ॥ ६ ॥
अभिधावतु मां कश्चित् पुरुषस्त्रातु चैव ह ।
पतिं च मे प्रदिशतु स्वयं वा पतिरस्तु मे ॥ ७ ॥
वह कह रही थी ‘ कोई वीर पुरुष दौड़कर आये और मेरी रक्षा करे । वह मेरे लिये पति प्रदान करे या स्वयं ही मेरा पति हो जाय' ॥ ७ ॥