कार्तवीर्योपाख्यान : परशुराम जी ने समस्त क्षत्रियों को युद्ध में क्यों पराजित किया?
धर्म और प्रतिशोध का सन्तुलन
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115–117 · पृष्ठ 801–820
अकृतव्रण ने युधिष्ठिर से कहा
तपस्वी मुनियों के सान्निध्य में परशुराम जी की महिमा जानने हेतु
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस पर्वत पर एक रात निवास करके भाइयों सहित राजा युधिष्ठिर ने तपस्वी मुनियों का बहुत सत्कार किया। लोमशजी ने युधिष्ठिर से उन सभी तपस्वी महात्माओं का परिचय कराया; जिनमें भृगु, अङ्गिरा, वसिष्ठ तथा कश्यप गोत्र के अनेक सन्त महात्मा थे। राजर्षि युधिष्ठिर ने उन सबसे मिलकर हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और परशुराम जी के सेवक वीरवर अकृतव्रण से पूछा— 'भगवान् परशुराम जी इन तपस्वी महात्माओं को कब दर्शन देंगे? उसी निमित्त से मैं भी उन भगवान् भभागव का दर्शन करना चाहता हूँ।'
अकृतव्रण ने उत्तर दिया— 'राजन्! आत्मज्ञानी परशुराम जी को पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं। आप पर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे। ये तपस्वी लोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमी को परशुराम जी का दर्शन करते हैं। आज की रात बीत जाने पर कल सवेरे चतुर्दशी हो जाएगी।'
आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः ।
प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ॥
चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः ।
अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी ॥
अकृतव्रणने कहा- राजन्! आत्मज्ञानी परशुरामजीको पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं । आपपर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे । ये तपस्वीलोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमीको परशुरामजीका दर्शन करते हैं । आजकी रात बीत जानेपर कल सबेरे चतुर्दशी हो जायगी ।
युधिष्ठिर ने जिज्ञासा प्रकट की— 'मुने! आप महाबली परशुराम जी के अनुगत भक्त हैं। उन्होंने पहले जो-जो कार्य किए हैं, उन सबको आपने प्रत्यक्ष देखा है; अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुराम जी ने किस प्रकार और किस कारण से समस्त क्षत्रियों को युद्ध में पराजित किया था। आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये।'
स भवान् कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः ।
आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ॥
अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुरामजीने किस प्रकार और किस कारणसे समस्त क्षत्रियोंको युद्धमें पराजित किया था । आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये ।
अकृतव्रण बोले— 'भरतकुल भूषण नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुराम जी की कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं आपसे उसका वर्णन करूँगा। पाण्डुनन्दन! परशुराम जी ने अर्जुन नाम से प्रसिद्ध हैपयराज कार्तवीर्य का वध किया था, जिसके एक हजार भुजाएँ थीं। श्रीदत्तात्रेय जी की कृपा से उसे एक सोने का विमान मिला था और भूतल के सभी प्राणियों पर उसका प्रभुत्व था। महामना कार्तवीर्य के रथ की गति को कोई भी रोक नहीं सकता था। उस रथ और वर के प्रभाव से शक्तिसम्पन्न हुआ कार्तवीर्य अर्जुन सब ओर घूमकर सदा देवताओं, यक्षों तथा ऋषियों को रौंदता फिरता था और सम्पूर्ण प्राणियों को भी सब प्रकार से पीड़ा देता था।'
कार्तवीर्य का ऐसा अत्याचार देख देवता तथा महान् व्रत का पालन करने वाले ऋषि मिलकर दैत्यों का विनाश करने वाले सत्यपराक्रमी देवाधिदेव भगवान् विष्णु के पास जा इस प्रकार बोले— 'भगवन्! आप समस्त प्राणियों की रक्षा के लिये कृतवीर्य कुमार अर्जुन का वध कीजिये।' एक दिन शक्तिशाली हैपयराज ने दिव्य विमान द्वारा शची के साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्र पर आक्रमण किया। तब भगवान् विष्णु ने कार्तवीर्य अर्जुन का नाश करने के सम्बन्ध में इन्द्र के साथ विचार-विनिमय किया।
ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः ।
देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥
भगवन् भूतरक्षार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ।
विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः ॥
शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम् ।
ततस्तु भगवान् देवः शक्रेण सहितस्तदा ।
कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ॥
कार्तवीर्यका ऐसा अत्याचार देख देवता तथा महान् व्रतका पालन करनेवाले ऋषि मिलकर दैत्योंका विनाश करनेवाले सत्यपराक्रमी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके पास जा इस प्रकार बोले — ‘ भगवन्! आप समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध कीजिये । ' एक दिन शक्तिशाली हैहयराजने दिव्य विमानद्वारा शचीके साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया । भारत! तब भगवान् विष्णुने कार्तवीर्य अर्जुनका नाश करनेके सम्बन्धमें इन्द्रके साथ विचार - विनिमय किया ।
विश्ववन्दित भगवान् विष्णु ने समस्त प्राणियों के हित के लिये जो कार्य करना आवश्यक था, उसे देवेन्द्र ने बताया। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु ने वह सब कार्य करने की प्रतिज्ञा करके अत्यन्त रमणीय बदरी तीर्थ की यात्रा की, जहाँ उनका अपना ही विस्तृत आश्रम था।
इसी समय इस भूतल पर कान्यकुब्ज देश में एक महाबली महाराज शासन करते थे जो गाधि के नाम से विख्यात थे। वे राजधानी छोड़कर वन में गये और वहीं रहने लगे। उनके वनवास काल में ही एक कन्या उत्पन्न हुई जो अप्सरा के समान सुन्दरी थी। विवाह के योग्य होने पर भृगु पुत्र ऋचीक मुनि ने उसका वरण किया। उस समय राजा गाधि ने कठोर व्रत का पालन करने वाले ब्रह्मर्षि ऋचीक से कहा— 'द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुल में पूर्वजों ने जो कुछ शुल्क लेने का नियम चला रखा है, उसका पालन करना हम लोगों के लिये भी उचित है। अतः आप यह जान लें कि इस कन्या के लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूप में देने पड़ेंगे, जिनके शरीर का रङ्ग तो सफेद और पीला मिला हुआ सा हो और कान एक ओर से काले रङ्ग के हों। भृगुनन्दन! आप कोई निन्दनीय तो हैं नहीं, यह शुल्क चुका दीजिये, फिर आप जैसे महात्मा को मैं अवश्य अपनी कन्या ब्याह दूँगा।'
उचितं नः कुले किंचित् पूर्वैर्यत् सम्प्रवर्तितम् ॥
एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥
उस समय राजा गाधिने कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि ऋचीकसे कहा ——द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुलमें पूर्वजोंने जो कुछ शुल्क लेनेका नियम चला रखा है, उसका पालन करना हमलोगोंके लिये भी उचित है । अतः आप यह जान लें कि इस कन्याके लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूपमें देने पड़ेंगे, जिनके शरीरका रंग तो सफेद और पीला मिला हुआ -सा और कान एक ओरसे काले रंगके हों ।
ऋचीक बोले— 'राजन्! मैं आपको एक ओर से श्याम कर्ण वाले पाण्डुरङ्ग के वेगशाली अश्व एक हजार की सङ्ख्या में अर्पित करूँगा। आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बने।' ऋचीक मुनि ने वरुण के पास जाकर कहा— 'देव! मुझे शुल्क में देने के लिये एक हजार ऐसे अश्व प्रदान करें, जिनके शरीर का रङ्ग पाण्डुर और कान एक ओर से श्याम हों। साथ ही वे सभी अश्व तीव्रगामी होने चाहिये।' वरुण ने उनकी इच्छा के अनुसार एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे दिये। जहाँ वे घोड़े प्रकट हुए थे, वह स्थान 'अश्वतीर्थ' के नाम से विख्यात हुआ। तत्पश्चात् राजा गाधि ने शुल्करूप में एक हजार श्यामकर्ण घोड़े प्राप्त करके गङ्गा तट पर कान्यकुब्ज नगर में ऋचीक मुनि को अपनी पुत्री सत्यवती ब्याह दी।
विप्रवर ऋचीक ने धर्मपूर्वक सत्यवती को पत्नी रूप में प्राप्त करके सुखपूर्वक रमण किया। विवाह के पश्चात् महर्षि भृगु अपने श्रेष्ठ पुत्र को देखने के लिये उनके आश्रम पर आये। उन दोनों पति-पत्नी ने पवित्र आसन पर विराजमान देववृन्द वन्दित गुरु का पूजन किया और हाथ जोड़े खड़े रहे। भगवान् भृगु ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधू से कहा— 'सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छा के अनुरूप वर प्रदान करूँगा।'
सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात् ।
आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ॥
सत्यवतीने श्वशुरको अपने और अपनी माताके लिये पुत्र प्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्रसन्न किया । तब भृगुजीने उसपर कृपादृष्टि की ।
सत्यवती ने अपने और अपनी माता के लिये पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से श्वशुर से वर माँगा। तब भृगुजी बोले— 'भद्रे! ऋतुकाल में स्नान करने के पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्ति के उद्देश्य से दो भिन्न-भिन्न वृक्षों का आलिङ्गन करना। तुम्हारी माता पीपल का और तुम गूलर का आलिङ्गन करना। मैंने विराट् पुरुष परमात्मा का चिन्तन करके तुम्हारे और तुम्हारी माता के लिये यत्नपूर्वक दो चरु तैयार किए हैं; तुम दोनों प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने चरुक भक्षण करना।' ऐसा कहकर भृगुजी अन्तर्धान हो गये।
किन्तु इधर सत्यवती और उसकी माता ने वृक्षों के आलिङ्गन और चरु-भक्षण में उलट-फेर कर दिया। महातेजस्वी भृगु ने अपनी पुत्रवधू से कहा— 'सुभ्रू! इस भूल के कारण तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। और तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित आचार-विचार का पालन करने वाला होगा।' सत्यवती ने बारम्बार प्रार्थना की— 'भगवन्! मेरा पुत्र ऐसा न हो। भले ही, पौत्र क्षत्रिय स्वभाव का हो जाय।' तब भृगुजी ने 'एवमस्तु' कहकर उसका अभिनन्दन किया।
ततः प्रसादयामास श्वशुरं सा पुनः पुनः ।
न मे पुत्रो भवेदीदृक् कामं पौत्रो भवेदिति ॥
तब सत्यवतीने बारंबार प्रार्थना करके पुनः अपने श्वशुरको प्रसन्न किया और कहा —' भगवन्! मेरा पुत्र ऐसा न हो । भले ही, पौत्र क्षत्रियस्वभावका हो जाय '
तत्पश्चात् प्रसव का समय आने पर सत्यवती ने जमदग्नि नामक पुत्र को जन्म दिया। भार्गवन नन्दन जमदग्नि तेज और ओज दोनों से सम्पन्न थे। बड़े होने पर महातेजस्वी जमदग्नि मुनि वेदाध्ययन द्वारा अन्य बहुत-से ऋषियों से आगे बढ़ गये। सूर्य के समान तेजस्वी जमदग्नि की बुद्धि में सम्पूर्ण धनुर्वेद और चारों प्रकार के अस्त्र स्वतः स्फुरित हो गये।
स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः ।
तपस्तेपे ततो देवान् नियमाद् वशमानयत् ॥
अकृतव्रण कहते हैं- राजन्! महातपस्वी जमदग्निने वेदाध्ययनमें तत्पर होकर तपस्या आस्मभ की । तदनन्तर शौचसंतोषादि नियमोंका पालन करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंको अपने वशमें कर लिया* ।
अकृतव्रण कहते हैं— 'राजन्! महातपस्वी जमदग्नि ने तपस्या आस्मत की। तदनन्तर उन्होंने सम्पूर्ण देवताओं को अपने वश में कर लिया। फिर राजा प्रसेनजित के पास जाकर जमदग्नि मुनि ने उनकी पुत्री रेणुका के लिये याचना की और राजा ने मुनि को अपनी कन्या ब्याह दी। भृगुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले जमदग्नि राजकुमारी रेणुका को पत्नी रूप में पाकर आश्रम पर ही रहते हुए उसके साथ तपस्या करने लगे। रेणुका सदा सब प्रकार से पति के अनुकूल चलने वाली स्त्री थी। एक दिन जब सब पुत्र फल लाने के लिये वन में चले गये, तब नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली रेणुका स्नान करने के लिये नदी-तट पर गयी।'
राजन्! जब रेणुका स्नान करके लौटने लगी, उस समय अकस्मत उसकी दृष्टि मार्तिकावत देश के राजा चित्ररथ पर पड़ी, जो कमलों की माला धारण करके अपनी पत्नी के साथ जल में क्रीड़ा कर रहा था। उस समृद्धिशाली नरेश को उस अवस्थामें देखकर रेणुका का मन मानसिक विकार से द्रवित हो गया और वह जल में बेहोश सी हो गयी। त्रस्त होकर उसने आश्रम के भीतर प्रवेश किया, परन्तु उसके पतिदेव जमदग्नि उसकी सब बातें जान गये। उसे धैर्य से च्युत और ब्रह्मतेज से वञ्चित देख उन महातेजस्वी शक्तिशाली महर्षि ने उसे धिक्कारपूर्ण वचनों द्वारा निन्दा की। इसी समय जमदग्नि के ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् वहाँ आ गये; फिर क्रमशः सुषेण, वसु और विश्वावसु भी आ पहुँचे। भगवान् जमदग्नि ने बारी-बारी से उन सभी पुत्रों को यह आज्ञा दी कि 'तुम अपनी माता का वध कर डालो', परन्तु मातृ-स्नेह उमड़ आने से वे कुछ भी बोल न सके और बेहोश से खड़े रहे। तब महर्षि कुपित होकर उन सब पुत्रों को शाप दे गए। शापग्रस्त होने पर वे अपनी चेतना खो बैठे और तुरन्त मृग एवं पक्षियों के समान जड़बुद्धि हो गये।
तदनन्तर शत्रुपक्ष के वीरों का संहार करने वाले परशुरामजी सबसे पीछे आश्रम पर आये। उस समय महातपस्वी महाबाहु जमदग्नि ने उनसे कहा— 'बेटा! अपनी इस पापिनी माता को अभी मार डालो और इसके लिये मन में किसी प्रकार का खेद न करो।' तब परशुरामजी ने फरसा लेकर उसी क्षण माता का मस्तक काट डाला। इससे महात्मा जमदग्नि का कोप सहसा शान्त हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा— 'तात! तुमने मेरे कहने से यह कार्य किया है, जिसे करना दूसरों के लिये बहुत कठिन है। तुम धर्म के ज्ञाता हो। तुम्हारे मन में जो-जो कामनाएँ हों, उन सबको माँग लो।' तब परशुरामजी ने कहा— 'पिताजी! मेरी माता जीवित हो उठें, उन्हें मेरे द्वारा मारे जाने की बात याद न रहे, वह मानस-पाप उनका स्पर्श न कर सके, मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जायें, युद्ध में मेरा सामना करने वाला कोई न हो और मैं बड़ी आयु प्राप्त करूँ।' महातपस्वी जमदग्नि ने वरदान देकर उनकी वे सभी कामनाएँ पूर्ण कर दीं।
एक दिन इसी तरह उनके सब पुत्र बाहर गये हुए थे। उसी समय अनूपदेश का वीर राजा कार्तवीर्य अर्जुन उधर आ निकला। आश्रम में आने पर ऋषिपत्नी रेणुकाने उसका यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया, परन्तु कार्तवीर्य अर्जुन युद्ध के मद से उन्मत्त हो रहा था। उसने उस सत्कार को आदरपूर्वक ग्रहण नहीं किया; उलटे मुनि के आश्रम को तहस-नहस कर दिया और वहाँ से डकराती हुई होमधेनु के बछड़े को बलपूर्वक हर लिया तथा आश्रम के बड़े-बड़े वृक्षों को भी तोड़ डाला। जब परशुरामजी आश्रम में आये, तब स्वयं जमदग्नि ने उन्हें सारी बातें बताईं। बारम्बार डकराती हुई होम की धेनु पर भी उनकी दृष्टि पड़ी, जिससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे और काल के वशीभूत होकर कार्तवीर्य अर्जुन पर धावा बोल दिया। भृगुनन्दन परशुरामजी ने अपना सुन्दर धनुष लेकर युद्ध में महान पराक्रम दिखाया और पैने बाणों द्वारा उसकी सहस्र भुजाओं को काट डाला। इस प्रकार परशुरामजी से परास्त होकर कार्तवीर्य अर्जुन काल के गाल में चला गया।
पिता के मारे जाने से कार्तवीर्य के पुत्र परशुरामजी पर कुपित हो उठे। एक दिन परशुरामजी की अनुपस्थिति में, जब आश्रम पर केवल जमदग्नि ही रह गये थे, वे उन्हीं पर चढ़ आये। यद्यपि जमदग्नि महान शक्तिशाली थे, तथापि तपस्वी ब्राह्मण होने के कारण युद्ध में प्रवृत्त नहीं हुए। इस दशा में भी कार्तवीर्य के पुत्र उन पर प्रहार करने लगे और उन्हें बाणों से घायल करके मार डाला। इस प्रकार मुनि की हत्या करके वे शत्रुसंहारक क्षत्रिय जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये।
जब परशुरामजी हाथों में समिधा लिये आश्रम में आये, तो वहाँ अपने पिता को इस दुर्दशापूर्वक मरा देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके पिता इस प्रकार मारे जाने के योग्य कदापि नहीं थे; परशुरामजी उन्हें याद करके विलाप करने लगे— 'हा तात! मेरे अपराध का बदला लेने के लिये कार्तवीर्य के उन नीच और पामर पुत्रों ने वन में बाणों द्वारा मारे जाने वाले मृग की भाँति आपकी हत्या कर दी है। पिताजी! आप तो धर्मज्ञ होने के साथ ही सन्मार्ग पर चलने वाले थे, कभी भी किसी प्राणी के प्रति कोई अपराध नहीं करते थे, फिर आपकी ऐसी मृत्यु कैसे उचित हो सकती है? आप तपस्या में संलग्न, युद्ध से विरत और वृद्ध थे, तो भी जिन्होंने सैकड़ों तीखे बाणों द्वारा आपकी हत्या की है, उन्होंने कौन-सा पाप नहीं किया? वे निर्लज्ज राजकुमार युद्ध से दूर रहने वाले आप जैसे धर्मज्ञ एवं असहाय पुरुष को मारकर अपने सुहृदों और मन्त्रियों के सामने क्या कहेंगे?'
इस प्रकार करुणा-जनक विलाप करके महातपस्वी परशुरामजी ने अपने पिता के समस्त प्रेतकर्म किये। उन्होंने विधिपूर्वक अग्नि में पिता का दाह-संस्कार किया और तत्पश्चात् सम्पूर्ण क्षत्रियों के वध की प्रतिज्ञा की। क्रोध के आवेश में वे साक्षात् यमराज के समान हो गये। उन्होंने युद्ध में शस्त्र लेकर अकेले ही कार्तवीर्य के सब पुत्रों को मार डाला। जिस-जिन क्षत्रियों ने उनका साथ दिया, उन सबको भी योद्धाओं में श्रेष्ठ परशुरामजी ने मिट्टी में मिला दिया। इस प्रकार भगवान् परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से सूनी करके उनके रक्त से समन्तपञ्चक क्षेत्र में पाँच रुधिर-कुण्ड भर दिये। भृगुवंशी परशुराम ने उन कुण्डों में अपने पितरों का तर्पण किया।
तेषां चानुगता ये च क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।
तांश्च सर्वानवामृद्नाद् रामः प्रहरतां वरः ॥
क्षत्रियशिरोमणे! उस समय जिन- जिन क्षत्रियोंने उनका साथ दिया, उन सबको भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने मिट्टीमें मिला दिया ।
In English
The Story of Parashurama and Kartavirya Arjuna
Akratravana tells Yudhishthira how Parashurama killed the thousand-armed king Kartavirya Arjuna. He also describes how Jamadagni ordered Parashurama to kill their mother Renuka, and how the sons of Kartavirya later killed Jamadagni.
This page answers
- How did parashurama kill kartavirya arjuna?
- Why did jamadagni ask parashurama to kill renuka?
- Who were the sons of kartavirya arjuna?
- How did jamadagni die?
Also written: Kartaviryopakhyana, Kartavirya, Parashurama, Jamadagni, Renuka, Akritavrana, Yudhishthira, Richika, Satyavati, कार्तवीर्योपाख्यान