श्रीगणेशाय नमः।

कार्तवीर्योपाख्यान : परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का विनाश क्यों किया?

क्रोध और प्रतिशोध का चक्र

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115–117 · पृष्ठ 801–820

2,080 शब्द · 11 मिनटका पाठ · 18 श्लोक

वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा

युधिष्ठिर के आगमन पर कथा का वर्णन

वैशम्पायनजी बोले— हे जनमेजय! उस पर्वत पर एक रात निवास करके भाइयों सहित राजा युधिष्ठिर ने उन तपस्वी मुनियों का बहुत सत्कार किया। लोमशजी ने युधिष्ठिर को उन सभी तपस्वी महात्माओं का परिचय कराया, जिनमें भृगु, अङ्गिरा, वसिष्ठ तथा कश्यप गोत्र के अनेक सन्त महात्मा थे। राजर्षि युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर उन सबको प्रणाम किया और परशुरामजी के सेवक वीरवर अकृतव्रण से पूछा— 'भगवान् परशुरामजी इन तपस्वी महात्माओं को कब दर्शन देंगे? उसी निमित्त से मैं भी उन भगवान् भार्गव का दर्शन करना चाहता हूँ।'

वैशम्पायन उवाच

स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः ।
तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस पर्वतपर एक रात निवास करके भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने तपस्वी मुनियोंका बहुत सत्कार किया ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 1पृष्ठ 802

अकृतव्रण ने उत्तर दिया— 'राजन्! आत्मज्ञानी परशुरामजी को पहले ही ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं। आप पर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे। ये तपस्वी लोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमी को परशुरामजी के दर्शन करते हैं। आज की रात बीत जाने पर कल सवेरे चतुर्दशी हो जाएगी।'

अकृतव्रण उवाच

आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः ।
प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ॥

चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः ।
अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी ॥

अकृतव्रणने कहा- राजन्! आत्मज्ञानी परशुरामजीको पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं । आपपर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे । ये तपस्वीलोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमीको परशुरामजीका दर्शन करते हैं । आजकी रात बीत जानेपर कल सबेरे चतुर्दशी हो जायगी ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 5-6पृष्ठ 802

युधिष्ठिर ने जिज्ञासावश पूछा— 'मुने! आप महाबली परशुरामजी के अनुगत भक्त हैं। उन्होंने पहले जो-जो कार्य किए हैं, उन सबको आपने प्रत्यक्ष देखा है; अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुरामजी ने किस प्रकार और किस कारण से समस्त क्षत्रियों को युद्ध में पराजित किया था। आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये।'

वैशम्पायन उवाच

लोमशस्तस्य तान् सर्वानाचख्यौ तत्र तापसान् ।
भृगूनङ्गिरसश्चैव वसिष्ठानथ काश्यपान् ॥

लोमशजीने युधिष्ठिरसे उन सभी तपस्वी महात्माओंका परिचय कराया । उनमें भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा कश्यपगोत्रके अनेक संत महात्मा थे ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 2पृष्ठ 802

अकृतव्रण बोले— 'भरतकुलभूषण नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजी की कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं आपसे उसका वर्णन करूँगा। पाण्डुनन्दन! परशुरामजी ने अर्जुन नाम से प्रसिद्ध जिस हैहयराज कार्तवीर्य का वध किया था, उसके एक हजार भुजाएँ थीं। उसे श्रीदत्तात्रेय जी की कृपा से एक सोने का विमान मिला था और वह भूतल के सभी प्राणियों पर प्रभुत्व रखता था। महामना कार्तवीर्य के रथ की गति को कोई रोक नहीं सकता था। वह शक्ति सम्पन्न कार्तवीर्य अर्जुन सब ओर घूमकर देवताओं, यक्षों तथा ऋषियों को रौंदता फिरता था और सम्पूर्ण प्राणियों को पीड़ा देता था।

अकृतव्रण उवाच

दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा ।
ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ॥

पृथ्वीपते! श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे उसे एक सोनेका विमान मिला था और भूतलके सभी प्राणियोंपर उसका प्रभुत्व था ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 12पृष्ठ 803

उसका अत्याचार देख देवता और महान् व्रत वाले ऋषि मिलकर देवाधिदेव भगवान् विष्णु के पास गए और बोले— 'भगवन्! आप समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए कृतवीर्य कुमार अर्जुन का वध कीजिये।' एक दिन शक्तिशाली हैहयराज ने दिव्य विमान द्वारा शची के साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्र पर आक्रमण किया। तब भगवान् विष्णु ने कार्तवीर्य अर्जुन का नाश करने के सम्बन्ध में इन्द्र के साथ विचार-विनिमय किया। विश्ववन्दित भगवान् विष्णु ने वह सब कार्य करने की प्रतिज्ञा करके रमणीय बदरी तीर्थ की यात्रा की, जहाँ उनका अपना ही विस्तृत आश्रम था।'

ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः ।
देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥

भगवन् भूतरक्षार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ।
विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः ॥

शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम् ।
ततस्तु भगवान् देवः शक्रेण सहितस्तदा ।
कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ॥

कार्तवीर्यका ऐसा अत्याचार देख देवता तथा महान् व्रतका पालन करनेवाले ऋषि मिलकर दैत्योंका विनाश करनेवाले सत्यपराक्रमी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके पास जा इस प्रकार बोले — ‘ भगवन्! आप समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध कीजिये । ' एक दिन शक्तिशाली हैहयराजने दिव्य विमानद्वारा शचीके साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया । भारत! तब भगवान् विष्णुने कार्तवीर्य अर्जुनका नाश करनेके सम्बन्धमें इन्द्रके साथ विचार - विनिमय किया ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 15-17पृष्ठ 804

अकृतव्रण आगे कहने लगे— 'राजन्! इसी समय कान्यकुब्ज देश में गाधि नाम के एक महाबली राजा शासन करते थे। वे राजधानी छोड़कर वन में रहने लगे। उनके वनवासकाल में ही एक कन्या उत्पन्न हुई जो अप्सरा के समान सुन्दरी थी। विवाह के योग्य होने पर भृगुपुत्र ऋचीक मुनि ने उसका वरण किया। उस समय राजा गाधि ने ऋचीक से कहा— 'द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुल में पूर्वजों ने जो शुल्क लेने का नियम चला रखा है, उसका पालन करना उचित है। अतः आप यह जान लें कि इस कन्या के लिये आपको सहस्र वेगशाली अश्व शुल्क रूप में देने पड़ेंगे, जिनके शरीर का रङ्ग सफेद और पीला मिला हुआ हो और कान एक ओर से काले हों। आप कोई निन्दनीय तो हैं नहीं, यह शुल्क चुका दीजिये, फिर मैं आपको अपनी कन्या ब्याह दूँगा।'

उचितं नः कुले किंचित् पूर्वैर्यत् सम्प्रवर्तितम् ॥

एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥

उस समय राजा गाधिने कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि ऋचीकसे कहा ——द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुलमें पूर्वजोंने जो कुछ शुल्क लेनेका नियम चला रखा है, उसका पालन करना हमलोगोंके लिये भी उचित है । अतः आप यह जान लें कि इस कन्याके लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूपमें देने पड़ेंगे, जिनके शरीरका रंग तो सफेद और पीला मिला हुआ -सा और कान एक ओरसे काले रंगके हों ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 22-23पृष्ठ 805

ऋचीक मुनि बोले— 'राजन्! मैं आपको एक ओर से श्याम कर्ण वाले पाण्डुरङ्ग के एक हजार वेगशाली अश्व अर्पित करूँगा। आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बनेगी।'

ऋचीक मुनि ने वरुण देव के पास जाकर कहा— 'देव! मुझे शुल्क में देने के लिये एक हजार ऐसे अश्व प्रदान करें, जिनके शरीर का रङ्ग पाण्डुर हो और कान एक ओर से श्याम हों। साथ ही वे सभी तीव्रगामी होने चाहिए।' वरुण ने उनकी इच्छा के अनुसार एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे दिए। जहाँ वे घोड़े प्रकट हुए, वह स्थान 'अश्वतीर्थ' कहलाया। तत्पश्चात् राजा गाधि ने ऋचीक मुनि को अपनी पुत्री सत्यवती ब्याह दी।

ऋचीक उवाच

एकतः श्यामकर्णाना पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुतास्तु ते ॥

ऋचीक बोले— राजन्! मैं आपको एक ओरसे श्याम कर्णवाले पाण्डुरंगके वेगशाली अश्व एक हजारकी संख्यामें अर्पित करूँगा । आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बने ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 25पृष्ठ 805

विप्रवर ऋचीक ने धर्मपूर्वक सत्यवती को पत्नी रूप में प्राप्त कर सुखपूर्वक रमण किया। विवाह के पश्चात् महर्षि भृगु अपने श्रेष्ठ पुत्र को देखने के लिये उनके आश्रम आए। पति-पत्नी ने हाथ जोड़े खड़े होकर अपने गुरु और श्वशुर का पूजन किया। भगवान् भृगु ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधू से कहा— 'सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छा के अनुरूप वर प्रदान करूँगा।'

ततः स्नुषां स भगवान् प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत् ।
वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ॥

भगवान् भृगुने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधूसे कहा - ' सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छाके अनुरूप वर प्रदान करूँगा '

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 33पृष्ठ 806

सत्यवती ने अपने और अपनी माता के लिये पुत्र प्राप्ति का उद्देश्य रखकर भृगुजी से प्रार्थना की। तब भृगुजी ने कहा— 'ऋतुकाल में स्नान करने के पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्ति के उद्देश्य से दो भिन्न-भिन्न वृक्षों का आलिङ्गन करना। तुम्हारी माता पीपल का और तुम गूलर का आलिङ्गन करना। मैंने विराट् पुरुष परमात्मा का चिन्तन करके तुम्हारे और तुम्हारी माता के लिये दो चरु तैयार किए हैं; तुम दोनों अपने-अपने चरु का भक्षण करना।' ऐसा कहकर भृगुजी अन्तर्धान हो गए।

भृगुरुवाच ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै ।
आलिङ्गेतां पृथग् वृक्षौ साश्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ॥

भृगुजी बोले- बहू! ऋतुकालमें स्नान करनेके पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे दो भिन्न-भिन्न वृक्षोंका आलिंगन करो । तुम्हारी माता तो पीपलका और तुम गूलरका आलिंगन करना ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 35पृष्ठ 807

परन्तु सत्यवती और उसकी माता ने वृक्षों के आलिङ्गन और चरु-भक्षण में उलट-फेर कर दिया। तब महातेजस्वी भृगु अपनी पुत्रवधू से बोले— 'भद्रे! तुमने जो चरु-भक्षण और वृक्ष का आलिङ्गन किया है, उसमें तुम्हारी माता ने तुम्हें ठग लिया है। इस भूल के कारण तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा; और तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित आचार-विचार का पालन करने वाला होगा।' सत्यवती ने बार-बार प्रार्थना की— 'भगवन्! मेरा पुत्र ऐसा न हो, भले ही वह पौत्र क्षत्रिय स्वभाव का हो जाए।' तब भृगुजी ने 'एवमस्तु' कहकर उसका अभिनन्दन किया और प्रसव के समय सत्यवती ने जमदग्नि नामक पुत्र को जन्म दिया।

एवमस्त्विति सा तेन पाण्डव प्रतिनन्दिता ।
जमदग्निं ततः पुत्रं जज्ञे सा काल आगते ॥

पाण्डुनन्दन! तब ‘ एवमस्तु ' कहकर भृगुजीने अपनी पुत्रवधूका अभिनन्दन किया । तत्पश्चात् प्रसवका समय आनेपर सत्यवतीने जमदग्निनामक पुत्रको जन्म दिया ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 115 · श्लोक 43पृष्ठ 808

जमदग्नि तेज और ओज से सम्पन्न थे। बड़े होने पर वे वेदाध्ययन में अन्य ऋषियों से आगे बढ़ गए। उनकी बुद्धि में सम्पूर्ण धनुर्वेद और चारों प्रकार के अस्त्र स्वतः स्फुरित हो गए। तदनन्तर उन्होंने तपस्या की और देवताओं को अपने वश में कर लिया। फिर उन्होंने राजा प्रसेनजित् की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका सदा पति के अनुकूल रहने वाली स्त्री थी। उनके गर्भ से चार पुत्र हुए और पाँचवें पुत्र के रूप में परशुरामजी का जन्म हुआ। वे भाइयों में छोटे होने पर भी गुणों में सबसे बढ़कर थे। एक दिन जब सभी पुत्र फल लाने वन चले गए, तब नियमपूर्वक व्रत करने वाली रेखूका स्नान करने के लिये नदी तट पर गई।'

राजन्! जब रेणुका स्नान करके लौटने लगी, तब उस समय अकस्मात् उसकी दृष्टि मार्तिकावत देश के राजा चित्ररथ पर पड़ी, जो कमलों की माला धारण करके अपनी पत्नी के साथ जल में क्रीड़ा कर रहा था। उस समृद्धिशाली नरेश को उस अवस्था में देखकर रेणुका की इच्छा हुई; उस समय इस मानसिक विकार से द्रवित हुई रेणुका जल में बेहोश सी हो गयी। फिर त्रस्त होकर वह आश्रम के भीतर प्रवेश कर गई।

परन्तु पतिदेव उसकी सब बातें जान गये। उसे धैर्य से च्युत और ब्रह्मतेज से वञ्चित देख, उन महातेजस्वी शक्तिशाली महर्षि जमदग्नि ने धिक्कारपूर्ण वचनों द्वारा उसकी निन्दा की। इसी समय जमदग्नि के ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् वहाँ आ गये; फिर क्रमशः सुषेण, वसु और विश्वावसु भी वहाँ आ पहुँचे। तब महर्षि जमदग्नि ने बारी-बारी से उन सभी पुत्रों को यह आज्ञा दी— 'तुम अपनी माता का वध कर डालो!' परन्तु मातृ-स्नेह उमड़ आने से वे कुछ भी बोल न सके; वे बेहोश से खड़े रहे। तब महातेजस्वी मुनि कुपित होकर उन सब पुत्रों को शाप दे दिया। शापग्रस्त होने पर वे अपनी चेतना खो बैठे और तुरन्त मृग एवं पक्षियों के समान जड़बुद्धि हो गये।

ततः शशाप तान् क्रोधात् ते शप्ताश्चेतनां जहुः ।
मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रमासञ्जडोपमाः ॥

तब महर्षिने कुपित हो उन सब पुत्रोंको शाप दे दिया । शापग्रस्त होनेपर वे अपनी चेतना ( विचार- शक्ति ) खो बैठे और तुरंत मृग एवं पक्षियोंके समान जडबुद्धि हो गये ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 116 · श्लोक 12पृष्ठ 811

तदनन्तर शत्रुपक्ष के वीरों का संहार करने वाले परशुरामजी सबसे पीछे आश्रम पर आये। उस समय महातपस्वी महाबाहु जमदग्नि ने उनसे कहा— 'बेटा! अपनी इस पापिनी माता को अभी मार डालो और इसके लिये मन में किसी प्रकार का खेद न करो।' तब परशुरामजी ने फरसा लेकर उसी क्षण माता का मस्तक काट डाला।

जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृथाः ।
तत आदाय परशुं रामो मातुः शिरोऽहरत् ॥

' बेटा! अपनी इस पापिनी माताको अभी मार डालो और इसके लिये मनमें किसी प्रकारका खेद न करो । ' तब परशुरामजीने फरसा लेकर उसी क्षण माताका मस्तक काट डाला ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 116 · श्लोक 14पृष्ठ 812

इससे महात्मा जमदग्नि का कोप सहसा शान्त हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा— 'तात! तुमने मेरे कहने से यह कार्य किया है, जिसे करना दूसरों के लिये बहुत कठिन है। तुम धर्म के ज्ञाता हो। तुम्हारे मन में जो-जो कामनाएँ हों, उन सबको माँग लो।' तब परशुकल ने कहा— 'पिताजी! मेरी माता जीवित हो उठें, उन्हें मेरे द्वारा मारे जाने की बात याद न रहे, वह मानस-पाप उनका स्पर्श न कर सके; मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जायें, युद्ध में मेरा सामना करने वाला कोई न हो और मैं बड़ी आयु प्राप्त करूँ।' महातपस्वी जमदग्नि ने वरदान देकर उनकी वे सभी कामनाएँ पूर्ण कर दीं।

ममेदं वचनात् तात कृतं ते कर्म दुष्करम् ।
वृणीष्व कामान् धर्मज्ञ यावतो वाञ्छसे हृदा ॥

‘ तात! तुमने मेरे कहनेसे यह कार्य किया है, जिसे करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है । तुम धर्मके ज्ञाता हो । तुम्हारे मनमें जो- जो कामनाएँ हों, उन सबको माँग लो । ' तब परशुरामजी ने कहा - ' पिताजी! मेरी माता जीवित हो उठें, उन्हें मेरे द्वारा मारे जानेकी बात याद न रहे, वह मानस- पाप उनका स्पर्श न कर सके, मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जायँ, युद्धमें मेरा सामना करनेवाला कोई न हो और मैं बड़ी आयु प्राप्त करूँ । ' भारत! महातपस्वी जमदग्निने वरदान देकर उनकी वे सभी कामनाएँ पूर्ण कर दीं ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 116 · श्लोक 16पृष्ठ 812

युधिष्ठिर! एक दिन इसी तरह उनके सब पुत्र बाहर गये हुए थे। उसी समय अनूपदेश का वीर राजा कार्तवीर्य अर्जुन उधर आ निकला। आश्रम में आने पर ऋषिपत्नी रेणुकाने उसका यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया, परन्तु कार्तवीर्य अर्जुन युद्ध के मद से उन्मत्त हो रहा था। उसने उस सत्कार को आदरपूर्वक ग्रहण नहीं किया; उलटे मुनि के आश्रम को तहस-नहस कर दिया और वहाँ से डकराती हुई होमधेनु के बछड़े को बलपूर्वक हर लिया तथा आश्रम के बड़े-बड़े वृक्षों को भी तोड़ डाला।

जब परशुरामजी आश्रम में आये, तब स्वयं जमदग्नि ने उनसे सारी बातें कहीं। बारम्बार डकराती हुई होम की धेनु पर भी उनकी दृष्टि पड़ी; इससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे और काल के वशीभूत होकर कार्तवीर्य अर्जुन पर धावा बोल दिया। शत्रुवीरों का संहार करने वाले भृगुनन्दन परशुरामजी ने अपना सुन्दर धनुष लेकर युद्ध में महान पराक्रम दिखाया और पैने बाणों द्वारा उसकी परिघ-सदृश सहस्र भुजाओं को काट डाला। इस प्रकार परशुरामजी से परास्त होकर कार्तवीर्य अर्जुन काल के गाल में चला गया।

स मृत्युवशमापन्नं कार्तवीर्यमुपाद्रवत् ।
तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा ॥

चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्बाहून् परिघसंनिभान् ।
सहस्रसम्मितान् राजन् प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥

और कालके वशीभूत हुए कार्तवीर्य अर्जनपर धावा बोल दिया । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भृगुनन्दन परशुरामजीने अपना सुन्दर धनुष ले युद्धमें महान् पराक्रम दिखाकर पैने बाणोंद्वारा उसकी परिघसदृश सहस्र भुजाओंको काट डाला ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 116 · श्लोक 23-24पृष्ठ 814

पिता के मारे जाने से कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र परशुरामजी पर कुपित हो उठे। एक दिन, जब परशुरामजी की अनुपस्थिति में आश्रम पर केवल जमदग्नि ही रह गये थे, वे उन्हीं पर चढ़ आये। यद्यपि जमदग्नि महान शक्तिशाली थे, तो भी तपस्वी ब्राह्मण होने के कारण युद्ध में प्रवृत्त नहीं हुए; इस दशा में भी कार्तवीर्य के पुत्र उन पर प्रहार करने लगे और उन्हें बाणों से घायल करके मार डाला। इस प्रकार मुनि की हत्या करके वे शत्रुसंहारक क्षत्रियों जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये।

जब परशुरामजी हाथों में समिधा लिये आश्रम में आये और अपने पिता को इस प्रकार दुर्दशापूर्वक मरा देख, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके पिता इस प्रकार मारे जाने के योग्य कदापि नहीं थे; परशुरामजी उन्हें याद करके विलाप करने लगे— 'हा तात! मेरे अपराध का बदला लेने के लिये कार्तवीर्य के उन नीच और पामर पुत्रों ने वन में बाणों द्वारा मारे जाने वाले मृग की भाँति आपकी हत्या कर दी है! पिताजी! आप तो धर्मज्ञ होने के साथ ही सन्मार्ग पर चलने वाले थे, कभी किसी भी प्राणी के प्रति कोई अपराध नहीं करते थे, फिर आपकी ऐसी मृत्यु कैसे उचित हो सकती है? आप तपस्या में संलग्न, युद्ध से विरत और वृद्ध थे, तो भी जिन्होंने सैकड़ों तीखे बाणों द्वारा आपकी हत्या की है, उन्होंने कौन-सा पाप नहीं किया? वे निर्लज्ज राजकुमार, युद्ध से दूर रहने वाले आप जैसे धर्मज्ञ एवं असहाय पुरुष को मारकर अपने सुहृदों और मन्त्रियों के सामने क्या कहेंगे?'

राम उवाच

ममापराधात् तैः क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात बालिशैः ।
कार्तवीर्यस्य दायादैर्वने मृग इवेषुभिः ॥

परशुरामजी बोले- हा तात! मेरे अपराधका बदला लेनेके लिये कार्तवीर्यके उन नीच और पामर पुत्रोंने वनमें बाणोंद्वारा मारे जानेवाले मृगकी भाँति आपकी हत्या की है ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 117 · श्लोक 1पृष्ठ 816

राजन्! इस प्रकार भाँति-भाँति से अत्यन्त करुणा-जनक विलाप करके, शत्रुओं की राजधानी पर विजय पाने वाले महातपस्वी परशुरामजी ने अपने पिता के समस्त प्रेतकर्म किये। पहले तो उन्होंने विधिपूर्वक अग्नि में पिता का दाह-संस्कार किया, तत्पश्चात् सम्पूर्ण क्षत्रियों के वध की प्रतिज्ञा की। अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी परशुरामजी क्रोध के आवेश में साक्षात् यमराज के समान हो गये। उन्होंने युद्ध में शस्त्र लेकर अकेले ही कार्तवीर्य के सब पुत्रों को मार डाला। उस समय जिन-जिन क्षत्रियों ने उनका साथ दिया, उन सबको भी योद्धाओं में श्रेष्ठ परशुरामजी ने मिट्टी में मिला दिया।

विलप्यैवं सकरुणं बहु नानाविधं नृप ।
प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपाः ॥

ददाह पितरं चाग्नौ रामः परपुरंजयः ।
प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत ॥

राजन्! इस प्रकार भाँति- भाँतिसे अत्यन्त करुणा-जनक विलाप करके शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महातपस्वी परशुरामजीने अपने पिताके समस्त प्रेतकर्म किये । भारत! पहले तो उन्होंने विधिपूर्वक अग्निमें पिताका दाह- संस्कार किया, तत्पश्चात् सम्पूर्ण क्षत्रियोंके वधकी प्रतिज्ञा की ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 117 · श्लोक 5-6पृष्ठ 817

इस प्रकार भगवान् परशुराम ने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से सूनी करके उनके रक्त से समन्तपञ्चक क्षेत्र में पाँच रुधिर-कुण्ड भर दिये। भृगुकुलभूषण राम ने उन कुण्डों में भृगुवंशी पितरों का तर्पण किया और उस समय साक्षात् प्रकट हुए महर्षि ऋचीक को देखा, जिन्होंने परशुराम को इस घोर कर्म से रोका। तदनन्तर प्रतापी जमदग्नि कुमार ने एक महान यज्ञ करके देवराज इन्द्र को तृप्त किया तथा ऋत्विजों को दक्षिणा रूप में भूमि दी। उन्होंने महात्मा कश्यप को एक सोने की वेदी प्रदान की, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई दस-दस व्याम (चालीस-चालीस हाथ) की थी और ऊँचाई में भी वह वेदी नौ व्याम (छत्तीस हाथ) की थी। उस समय कश्यपजी की आज्ञा से ब्राह्मणों ने उस स्वर्णवेदी को खण्ड-खण्ड करके बाँट लिया, अतः वे खाण्डवायन नाम से प्रसिद्ध हुए।

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ॥

इस प्रकार भगवान् परशुरामने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे सूनी करके उनके रक्तसे समन्तपञ्चक क्षेत्रमें पाँच रुधिर- कुण्ड भर दिये ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 117 · श्लोक 9पृष्ठ 818

इस प्रकार सारी पृथ्वी महात्मा कश्यप को देकर अमित पराक्रमी परशुरामजी इस पर्वतराज महेन्द्र पर निवास करते हैं। उनका सम्पूर्ण जगत् के क्षत्रियों के साथ वैर हुआ था और उसी समय अमित तेजस्वी परशुरामजी ने सारी पृथ्वी जीती थी। वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर चतुर्दशी तिथि को निश्चित समय पर महामना परशुरामजी ने उस पर्वत पर रहने वाले उन ब्राह्मणों तथा भाइयों सहित युधिष्ठिर को दर्शन दिए। प्रभावशाली नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने भाइयों के साथ श्रद्धापूर्वक भगवान् परशुरामजी की पूजा की तथा अन्य ब्राह्मणों का भी बहुत आदर-सत्कार किया। जमदग्नि नन्दन परशुरामजी की पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित होकर वे उन्हीं की आज्ञा से उस रात को महेन्द्रपर्वत पर ही रहे, फिर सबेरे उठकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिये।

वैशम्पायन उवाच

अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदितः ।
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुखः ॥

जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हो वे उन्हींकी आज्ञासे उस रातको महेन्द्रपर्वतपर ही रहे, फिर सबेरे उठकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 117 · श्लोक 18पृष्ठ 820

In English

The Story of Parashurama and Kartavirya Arjuna

Akratravana tells Yudhishthira about the life of Parashurama, including his birth to Jamadagni and Renuka. He describes how Parashurama killed his mother at his father's command and later killed the thousand-armed king Kartavirya Arjuna for destroying the sages' ashram.

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Also written: Kartaviryopakhyana, Kartavirya, Jamadagni, Richika, Satyavati, Gadhi, Renuka, Akritavrana, Yudhishthira, Indra, Parashurama, कार्तवीर्योपाख्यान