श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 801–810
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
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स्थान हो । ' पाण्डुनन्दन! इस सत्य वाक्यका उच्चारण करते हुए तुम शीघ्रतापूर्वक इस वेदीपर आरूढ़ हो जाओ ॥ २७ ॥
अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः । एवं जपन् पाण्डव सत्यवाक्यं ततोऽवगाहेत पतिं नदीनाम् ॥ २८ ॥
‘ हे महासागर! अग्नि तुम्हारी योनि ( कारण ) है और यज्ञ शरीर है, तुम भगवान् विष्णुकी शक्तिके आधार और मोक्षके साधन हो। ' पाण्डुपुत्र! इस सत्य वचनको बोलते हुए नदियोंके स्वामी समुद्रमें स्नान करना चाहिये ॥ २८ ॥
अन्यथा हि कुरुश्रेष्ठ देवयोनिरपां पतिः ।
कुशाग्रेणापि कौन्तेय न स्प्रष्टव्यो महोदधिः ॥ २९ ॥
कुरुश्रेष्ठ! जलका स्वामी समुद्र देवताओंका अधिष्ठान है । कुन्तीनन्दन! ऊपर बतायी हुई रीतिके सिवा दूसरे किसी प्रकारसे इस महासागरका कुशके अग्रभागद्वारा भी स्पर्श नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच ततः कृतस्वस्त्ययनो महात्मा युधिष्ठिरः सागरमभ्यगच्छत् । कृत्वा च तच्छासनमस्य सर्वं महेन्द्रमासाद्य निशामुवास ॥ ३० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर लोमशजीके स्वस्तिवाचन करनेके पश्चात् महात्मा राजा युधिष्ठिरने उनकी बतायी हुई सारी विधियोंका पालन करते हुए समुद्रमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया । इसके बाद महेन्द्रपर्वतपर जाकर रात्रि बितायी ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां महेन्द्राचलगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें महेन्द्राचलगमनविषयक एक सौ चौदहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ११४ ॥
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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन वैशम्पायन उवाच
स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः ।
तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस पर्वतपर एक रात निवास करके भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने तपस्वी मुनियोंका बहुत सत्कार किया ॥ १ ॥
लोमशस्तस्य तान् सर्वानाचख्यौ तत्र तापसान् ।
भृगूनङ्गिरसश्चैव वसिष्ठानथ काश्यपान् ॥ २ ॥
लोमशजीने युधिष्ठिरसे उन सभी तपस्वी महात्माओंका परिचय कराया । उनमें भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा कश्यपगोत्रके अनेक संत महात्मा थे ॥ २ ॥
तान् समेत्य स राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
रामस्यानुचरं वीरमपृच्छदकृतव्रणम् ॥ ३ ॥
कदा तु रामो भगवांस्तापसान् दर्शयिष्यति ।
तेनैवाहं प्रसंगेन द्रष्टुमिच्छामि भार्गवम् ॥ ४ ॥
उन सबसे मिलकर राजर्षि युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और परशुरामजीके सेवक वीरवर अकृतव्रणसे पूछा- ' भगवान् परशुरामजी इन तपस्वी महात्माओंको कब दर्शन देंगे? उसी निमित्तसे मैं भी उन भगवान् भार्गवका दर्शन करना चाहता हूँ' ॥ ३-४ ॥ अकृतव्रणउवाच
आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः ।
प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ॥ ५ ॥
चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः ।
अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी ॥ ६ ॥
अकृतव्रणने कहा- राजन्! आत्मज्ञानी परशुरामजीको पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं । आपपर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे । ये तपस्वीलोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमीको परशुरामजीका दर्शन करते हैं । आजकी रात बीत जानेपर कल सबेरे चतुर्दशी हो जायगी ॥ ५-६ ॥
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युधिष्ठिर उवाच
भवाननुगतो रामं जामदग्न्यं महाबलम् ।
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ॥ ७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- मुने! आप महाबली परशुरामजीके अनुगत भक्त हैं। उन्होंने पहले जो- जो कार्य किये हैं, उन सबको आपने प्रत्यक्ष देखा है ॥ ७ ॥
स भवान् कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः ।
आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ॥ ८ ॥
अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुरामजीने किस प्रकार और किस कारणसे समस्त क्षत्रियोंको युद्धमें पराजित किया था । आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये ॥ ८ ॥
अकृतव्रण उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।
भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत ॥ ९ ॥
अकृतव्रणने कहा - भरतकुलभूषण नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजीकी कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं आपसे उसका वर्णन करूँगा ॥ ९ ॥
रामस्य जामदग्न्यस्य चरितं देवसम्मितम् ।
हैहयाधिपतेश्चैव कार्तवीर्यस्य भारत ॥ १० ॥
भारत! जमदग्निकुमार परशुराम तथा हैहयराज कार्तवीर्यका चरित्र देवताओंके तुल्य है ॥ १० ॥
रामेण चार्जुनो नाम हैहयाधिपतिर्हतः ।
तस्य बाहुशतान्यासंस्त्रीणि सप्त च पाण्डव ॥ ११ ॥
पाण्डुनन्दन! परशुरामजीने अर्जुन नामसे प्रसिद्ध जिस हैहयराज कार्तवीर्यका वध किया था, उसके एक हजार भुजाएँ थीं ॥ ११ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा ।
ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ १२ ॥
पृथ्वीपते! श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे उसे एक सोनेका विमान मिला था और भूतलके सभी प्राणियोंपर उसका प्रभुत्व था ॥ १२ ॥
अव्याहतगतिश्चैव रथस्तस्य महात्मनः ।
रथेन तेन तु सदा वरदानेन वीर्यवान् ॥ १३ ॥
ममर्द देवान् यक्षांश्च ऋषींश्चैव समन्ततः ।
भूतांश्चैव स सर्वांस्तु पीडयामास सर्वतः ॥ १४ ॥
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महामना कार्तवीर्यके रथकी गतिको कोई भी रोक नहीं सकता था । उस रथ और वरके प्रभावसे शक्तिसम्पन्न हुआ कार्तवीर्य अर्जुन सब ओर घूमकर सदा देवताओं, यक्षों तथा ऋषियोंको रौंदता फिरता था और सम्पूर्ण प्राणियोंको भी सब प्रकारसे पीड़ा देता था ॥ १३-१४ ॥
ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः ।
देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥ १५ ॥
भगवन् भूतरक्षार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ।
विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः ॥ १६ ॥
शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम् ।
ततस्तु भगवान् देवः शक्रेण सहितस्तदा ।
कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ॥ १७ ॥
कार्तवीर्यका ऐसा अत्याचार देख देवता तथा महान् व्रतका पालन करनेवाले ऋषि मिलकर दैत्योंका विनाश करनेवाले सत्यपराक्रमी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके पास जा इस प्रकार बोले — ‘ भगवन्! आप समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध कीजिये । ' एक दिन शक्तिशाली हैहयराजने दिव्य विमानद्वारा शचीके साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया । भारत! तब भगवान् विष्णुने कार्तवीर्य अर्जुनका नाश करनेके सम्बन्धमें इन्द्रके साथ विचार - विनिमय किया ॥ १५-१७ ॥
यत् तद् भूतहितं कार्यं सुरेन्द्रेण निवेदितम् ।
सम्प्रतिश्रुत्य तत् सर्वं भगवाँल्लोकपूजितः ॥ १८ ॥
जगाम बदरीं रम्यां स्वमेवाश्रममण्डलम् । समस्त प्राणियोंके हितके लिये जो कार्य करना आवश्यक था उसे देवेन्द्रने बताया । तत्पश्चात् विश्ववन्दित भगवान् विष्णुने वह सब कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके अत्यन्त रमणीय बदरीतीर्थकी यात्रा की, जहाँ उनका अपना ही विस्तृत आश्रम था ॥ १८३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १ ९ ॥
कान्यकुब्जे महानासीत् पार्थिवः सुमहाबलः ।
गाधीति विश्रुतो लोके वनवासं जगाम ह ॥ २० ॥
वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा ।
ऋचीको भार्गवस्तां च वरयामास भारत ॥ २१ ॥
इसी समय इस भूतलपर कान्यकुब्जदेशमें एक महाबली महाराज शासन करते थे जो गाधिके नामसे विख्यात थे । वे राजधानी छोड़कर वनमें गये और वहीं रहने लगे । उनके वनवासकालमें ही एक कन्या उत्पन्न हुई जो अप्सराके समान सुन्दरी थी । भारत! विवाहके योग्य होनेपर भृगुपुत्र ऋचीक मुनिने उसका वरण किया ॥ १ ९ –२१ ॥ तमुवाच ततो गाधिर्ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।
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उचितं नः कुले किंचित् पूर्वैर्यत् सम्प्रवर्तितम् ॥ २२ ॥
एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥ २३ ॥
उस समय राजा गाधिने कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि ऋचीकसे कहा ——द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुलमें पूर्वजोंने जो कुछ शुल्क लेनेका नियम चला रखा है, उसका पालन करना हमलोगोंके लिये भी उचित है । अतः आप यह जान लें कि इस कन्याके लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूपमें देने पड़ेंगे, जिनके शरीरका रंग तो सफेद और पीला मिला हुआ -सा और कान एक ओरसे काले रंगके हों ॥ २२-२३ ॥
न चापि भगवान् वाच्यो दीयतामिति भार्गव ।
देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने ॥ २४ ॥
'भृगुनन्दन! आप कोई निन्दनीय तो हैं नहीं, यह शुल्क चुका दीजिये, फिर आप - जैसे महात्माको मैं अवश्य अपनी कन्या ब्याह दूँगा' ॥ २४ ॥
ऋचीक उवाच
एकतः श्यामकर्णाना पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुतास्तु ते ॥ २५ ॥
ऋचीक बोले— राजन्! मैं आपको एक ओरसे श्याम कर्णवाले पाण्डुरंगके वेगशाली
अश्व एक हजारकी संख्यामें अर्पित करूँगा । आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बने ॥ २५ ॥
अकृतव्रण उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय राजन् वरुणमब्रवीत् ।
एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ॥ २६ ॥
सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं मे प्रदीयताम् ।
तस्मै प्रादात् सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा ॥ २७ ॥
अकृतव्रण कहते हैं— राजन्! इस प्रकार शुल्क देनेकी प्रतिज्ञा करके ऋचीक मुनिने वरुणके पास जाकर कहा – ' देव! मुझे शुल्कमें देनेके लिये एक हजार ऐसे अश्व प्रदान करें, जिनके शरीरका रंग पाण्डुर और कान एक ओरसे श्याम हों । साथ ही वे सभी अश्व तीव्रगामी होने चाहिये । ' उस समय वरुणने उनकी इच्छाके अनुसार एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे दिये ॥
तदश्वतीर्थं विख्यातमुत्थिता यत्र ते हयाः ।
गङ्गायां कान्यकुब्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा ॥ २८ ॥
ततो गाधिः सुतां चास्मै जन्याश्चासन् सुरास्तदा ।
लब्ध्वा हयसहस्रं तु तांश्च दष्ट्वा दिवौकसः ॥ २९ ॥
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जहाँ वे श्यामकर्ण घोड़े प्रकट हुए थे, वह स्थान अश्वतीर्थके नामसे विख्यात हुआ । तत्पश्चात् राजा गाधिने शुल्करूपमें एक हजार श्यामकर्ण घोड़े प्राप्त करके गंगातटपर कान्यकुब्ज नगरमें ऋचीक मुनिको अपनी पुत्री सत्यवती ब्याह दी! उस समय देवता बराती बने थे । देवता उन सबको देखकर वहाँसे चले गये ॥ २८-२९ ॥
धर्मेण लब्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः ।
यथाकामं यथाजोषं तया रेमे सुमध्यया ॥ ३० ॥
विप्रवर ऋचीकने धर्मपूर्वक सत्यवतीको पत्नीरूपमें प्राप्त करके उस सुन्दरीके साथ अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक रमण किया ॥ ३० ॥
तं विवाहे कृते राजन् सभार्यमवलोककः ।
आजगाम भृगुः श्रेष्ठं पुत्रं दृष्ट्वा ननन्द ह ॥ ३१ ॥
राजन्! विवाह करनेके पश्चात् पत्नीसहित ऋचीकको देखनेके लिये महर्षि भृगु उनके आश्रमपर आये और अपने श्रेष्ठ पुत्रको विवाहित देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३१ ॥
भार्यापती तमासीनं गुरुं सुरगणार्चितम् ।
अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा ॥ ३२ ॥
उन दोनों पति- पत्नीने पवित्र आसनपर विराजमान देववृन्दवन्दित गुरु ( पिता एवं श्वशुर) -का पूजन किया और उनकी उपासनामें संलग्न हो वे हाथ जोड़े खड़े रहे ॥ ३२ ॥
ततः स्नुषां स भगवान् प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत् ।
वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ॥ ३३ ॥
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भगवान् भृगुने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधूसे कहा - ' सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छाके अनुरूप वर प्रदान करूँगा ' ॥ ३३ ॥
सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात् ।
आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ॥ ३४ ॥
सत्यवतीने श्वशुरको अपने और अपनी माताके लिये पुत्र प्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्रसन्न किया । तब भृगुजीने उसपर कृपादृष्टि की ॥ ३४ ॥
भृगुरुवाच
ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै ।
आलिङ्गेतां पृथग् वृक्षौ साश्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ॥ ३५ ॥
भृगुजी बोले- बहू! ऋतुकालमें स्नान करनेके पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे दो भिन्न-भिन्न वृक्षोंका आलिंगन करो । तुम्हारी माता तो पीपलका और तुम गूलरका आलिंगन करना ॥ ३५ ॥
चरुद्वयमिदं भद्रे जनन्याश्च तवैव च ।
विश्वमावर्तयित्वा तु मया यत्नेन साधितम् ॥ ३६ ॥
भद्रे! मैंने विराट् पुरुष परमात्माका चिन्तन करके तुम्हारे और तुम्हारी माताके लिये यत्नपूर्वक दो चरु तैयार किये हैं ॥ ३६ ॥
प्राशितव्यं प्रयत्नेन चेत्युक्त्वादर्शनं गतः ।
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आलिङ्गने चरौ चैव चक्रतुस्ते विपर्ययम् ॥ ३७ ॥
तुम दोनों प्रयत्नपूर्वक अपने- अपने चरुका भक्षण करना; ऐसा कहकर भृगुजी अन्तर्धान हो गये । इधर सत्यवती और उसकी माताने वृक्षोंके आलिंगन और चरु - भक्षणमें उलट--फेर कर दिया ॥ ३७ ॥
ततः पुनः स भगवान् काले बहुतिथे गते ।
दिव्यज्ञानाद् विदित्वा तु भगवानागतः पुनः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर बहुत दिन बीतनेपर भगवान् भृगु अपनी दिव्य ज्ञानशक्तिसे सब बातें जानकर पुनः वहाँ आये ॥ ३८ ॥
अथोवाच महातेजा भृगुः सत्यवतीं स्नुषाम् ।
उपयुक्तश्चरुर्भद्रे वृक्षे चालिङ्गनं कृतम् ॥ ३ ९ ॥
विपरीतेन ते सुभ्रूर्मात्रा चैवासि वञ्चिता ।
ब्राह्मणः क्षत्रवृत्तिर्वै तव पुत्रो भविष्यति ॥ ४० ॥
उस समय महातेजस्वी भृगु अपनी पुत्रवधू सत्यवतीसे बोले– ' भद्रे! तुमने जो चरुभक्षण और वृक्षोंका आलिङ्गन किया है, उसमें उलट - फेर करके तुम्हारी माताने तुम्हें ठग लिया । सुभ्रू! इस भूलके कारण तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचारवाला होगा ' ॥ ३ ९ -४० ॥ क्षत्रियो ब्राह्मणाचारो मातुस्तव सुतो महान् । भविष्यति महावीर्यः साधूनां मार्गमास्थितः ॥ ४१ ॥ ' - और तुम्हारी माताका पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित आचारविचारका पालनकरनेवाला होगा । वह महापराक्रमी बालक साधु-महात्माओंके मार्गका अवलम्बन
करेगा' ॥ ४१ ॥
ततः प्रसादयामास श्वशुरं सा पुनः पुनः ।
न मे पुत्रो भवेदीदृक् कामं पौत्रो भवेदिति ॥ ४२ ॥
तब सत्यवतीने बारंबार प्रार्थना करके पुनः अपने श्वशुरको प्रसन्न किया और कहा
—' भगवन्! मेरा पुत्र ऐसा न हो । भले ही, पौत्र क्षत्रियस्वभावका हो जाय ' ॥ ४२ ॥
एवमस्त्विति सा तेन पाण्डव प्रतिनन्दिता ।
जमदग्निं ततः पुत्रं जज्ञे सा काल आगते ॥ ४३ ॥
पाण्डुनन्दन! तब ‘ एवमस्तु ' कहकर भृगुजीने अपनी पुत्रवधूका अभिनन्दन किया ।
तत्पश्चात् प्रसवका समय आनेपर सत्यवतीने जमदग्निनामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४३ ॥
तेजसा वर्चसा चैव युक्तं भार्गवनन्दनम् ।
स वर्धमानस्तेजस्वी वेदस्याध्ययनेन च ॥ ४४ ॥
बहूनृषीन् महातेजाः पाण्डवेयात्यवर्तत ।
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भार्गवनन्दन जमदग्नि तेज और ओज ( बल) दोनोंसे सम्पन्न थे । युधिष्ठिर! बड़े होनेपर महातेजस्वी जमदग्नि मुनि वेदाध्ययनद्वारा अन्य बहुत -से ऋषियोंसे आगे बढ़ गये ॥ ४४३ ||
तं तु कृत्स्नो धनुर्वेदः प्रत्यभाद् भरतर्षभ ।
चतुर्विधानि चास्त्राणि भास्करोपमवर्चसम् ॥ ४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! सूर्यके समान तेजस्वी जमदग्निकी बुद्धिमें सम्पूर्ण धनुर्वेद और चारों प्रकारके अस्त्र स्वतः स्फुरित हो गये ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुनः जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या अकृतव्रण उवाच
स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः ।
तपस्तेपे ततो देवान् नियमाद् वशमानयत् ॥ १ ॥
अकृतव्रण कहते हैं- राजन्! महातपस्वी जमदग्निने वेदाध्ययनमें तत्पर होकर तपस्या आस्मभ की । तदनन्तर शौचसंतोषादि नियमोंका पालन करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंको अपने वशमें कर लिया* ॥ १ ॥
स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम् ।
रेणुकां वरयामास स च तस्मै ददौ नृपः ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! फिर राजा प्रसेनजित्के पास जाकर जमदग्नि मुनिने उनकी पुत्री रेणुकाके लिये याचना की और राजाने मुनिको अपनी कन्या ब्याह दी ॥ २ ॥
रेणुकां त्वथ सम्प्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः ।
आश्रमस्थस्तया सार्धं तपस्तेपेऽनुकूलया ॥ ३ ॥
भृगुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले जमदग्नि राजकुमारी रेणुकाको पत्नीरूपमें पाकर आश्रमपर ही रहते हुए उसके साथ तपस्या करने लगे । रेणुका सदा सब प्रकारसे पतिके अनुकूल चलनेवाली स्त्री थी ॥ ३ ॥
तस्याः कुमाराश्चत्वारो जज्ञिरे रामपञ्चमाः ।
सर्वेषामजघन्यस्तु राम आसीज्जघन्यजः ॥ ४ ॥
उसके गर्भसे क्रमशः चार पुत्र हुए, फिर पाँचवें पुत्र परशुरामजीका जन्म हुआ । अवस्थाकी दृष्टिसे भाइयोंमें छोटे होनेपर भी वे गुणोंमें उन सबसे बढ़े - चढ़े थे ॥ ४ ॥
फलाहारेषु सर्वेषु गतेष्वथ सुतेषु वै ।
रेणुका स्नातुमगमत् कदाचिन्नियतव्रता ॥ ५ ॥
एक दिन जब सब पुत्र फल लानेके लिये वनमें चले गये तब नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली रेणुका स्नान करनेके लिये नदी - तटपर गयी ॥ ५ ॥