नलोपाख्यानपर्वणिऋतुपर्णस्य : अज्ञात और परिचित ध्वनियों के बीच सत्य की पहचान कैसे करें?

तर्क और आत्म-साक्षात्कार

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व · अध्याय 73 · पृष्ठ 517–523

सूत ने युधिष्ठिर से कहा

राजा नल के विरह और उनकी शक्ति की महिमा बताने हेतु

बृहदश्व मुनि ने कहा— हे युधिष्ठिर! तदनन्तर शाम होते-होते सत्यपराक्रमी राजा ऋतुपर्ण विदर्भ राज्य में जा पहुँचे। जब लोगों ने इसकी सूचना राजा भीम को दी, तब राजा के अनुरोध पर ऋतुपर्ण ने अपने रथ की घर्घराहट से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुर में प्रवेश किया। उस महाभयङ्कर रथनाद को सुनकर महल के मयूर, गजशाला के हाथी और अश्वशाला के घोड़े उतने ही प्रसन्न और उत्साहित हो उठे, जितने वे पहले नल के समीप रहने पर होते थे।

महल की प्रासाद-स्था शिखिनों और वारणाओं के बीच वह गम्भीर घोष गूँज उठा। दमयन्ती ने भी जब रथ की वह घर्घराहट सुनी, तो उसे ऐसा लगा मानो वर्षाकाल में गरजते हुए मेघों का गम्भीर घोष सुनाई दे रहा हो। उस अद्भुत ध्वनि को सुनकर उसे बड़ा विस्मय हुआ; क्योंकि पूर्वकाल में जब राजा नल घोड़ों की बाग सँभालते थे, तब उनके रथ से जैसी गम्भीर ध्वनि निकलती थी, आज भी वैसा ही अनुभव उसे हुआ। दमयन्ती ने मन ही मन कहा— "अहो! रथ की वह घर्घराहट इस पृथ्वी को गुँजाती हुई मेरे मन को जो आह्लाद प्रदान कर रही है, उससे जान पड़ता है कि ये महाराज नल ही पधारे हैं। आज यदि मैं उन वीरवर नल को न देखूँ, तो अपने जीवन का अन्त कर दूँगी। यदि मैं उन सिंह के समान पराक्रमी और मतवाले हाथी की तरह चलने वाले राजराजेश्वर नल की भुजाओं के मध्यभाग में प्रवेश न कर सकी, तो मैं सुवर्ण के समान दहकती आग में प्रवेश कर जाऊँगी। मुझे स्मरण नहीं कि मैंने कभी किसी का अपकार किया या कोई झूठी प्रतिज्ञा की; पर मेरे निषधराज नल शक्तिशाली, क्षमाशील और परायी स्त्री के लिए नपुंसकतुल्य हैं। मैं सदा उन्हीं के गुणों का स्मरण करती हूँ, किन्तु उनके बिना मेरा हृदय विरह-शोक से विदीर्ण हो रहा है।"

यदि मां सिंहविक्रान्तो मत्तवारणविक्रमः ।
नाभिगच्छति राजेन्द्रो विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥

यदि सिंहके समान पराक्रमी और मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले राजराजेश्वर नल मेरे पास नहीं आयेंगे तो आज अपने जीवनको नष्ट कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 73 · श्लोक 12पृष्ठ 519

इस प्रकार विलाप करती हुई दमयन्ती अचेत सी हो गई और वह पुण्यश्लोक नल के दर्शन की तीव्र इच्छा में ऊँचे महल की छत पर जा चढ़ी। वहाँ से उसने देखा कि वार्ष्णेय और बाहुक के साथ रथ पर सवार राजा ऋतुपर्ण मध्यम कक्षा (परकोटे) में पहुँच गए हैं। तदनन्तर वार्ष्णेय और बाहुक ने उस उत्तम रथ से उतरकर घोड़े खोल दिए और रथ को एक स्थान पर खड़ा कर दिया। उधर, कोशल नरेश भीम ने बड़े आदर-सत्कार के साथ उन्हें अपनाया और राजा ऋतुपर्ण का भलीभाँति सत्कार किया।

ततोऽवतीर्य वार्ष्णेयो बाहुकश्च रथोत्तमात् ।
हयांस्तानवमुच्याथ स्थापयामास वै रथम् ॥

तदनन्तर वार्ष्णेय और बाहुकने उस उत्तम रथसे उतरकर घोड़े खोल दिये और रथको एक जगह खड़ा कर दिया ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 73 · श्लोक 18पृष्ठ 520

राजा ऋतुपर्ण कुण्डिनपुर में ठहर गए, किन्तु उन्हें वहाँ स्वयंवर जैसी कोई चीज़ दिखाई नहीं दी। वे विदर्भ नरेश से मिलकर इस बात को समझ न सके कि यह स्त्रियों की कोई गुप्त मन्त्रणा थी। भीम भी यह नहीं जानते थे कि दमयन्ती के लिए ही इनका शुभागमन हुआ है। जब भीम ने आगमन का कारण पूछा, तो राजा ऋतुपूर्ण ने एक साधारण सा कारण बताया। भीम मन ही मन सोचने लगे— "ये बहुत से गाँवों को लाँघकर सौ योजन से अधिक दूर चले आए हैं, किन्तु कार्य इन्होंने बहुत साधारण बतलाया है। जो कारण ये बता रहे हैं, वह इनके आगमन का एकमात्र हेतु नहीं है; पर मैं इसे पीछे मालूम कर लूँगा।" ऐसा विचारकर भीम ने उन्हें सत्कारपूर्वक विश्राम के लिए विदा किया और कहा— "आप बहुत थक गये होंगे, अतः विश्राम कीजिये।"

राजापि च स्मयन् भीमो मनसा समचिन्तयन् ।
अधिकं योजनशतं तस्यागमनकारणम् ॥

ग्रामान् बहूनतिक्रम्य नाध्यगच्छद् यथातथम् ।
अल्पकार्यं विनिर्दिष्टं तस्यागमनकारणम् ॥

यह सुनकर राजा भीम भी मुसकरा दिये और मन- ही- मन सोचने लगे — ‘ ये बहुत --सेस गाँवोंको लाँघकर सौ योजनसे भी अधिक दूर चले आये हैं, किंतु कार्य इन्होंने बहुत साधारण बतलाया है । फिर इनके आगमनका क्या कारण है, इसे मैं ठीक- ठीक न जान सका ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 73 · श्लोक 26-27पृष्ठ 521

राजा ऋतुपर्ण ने प्रसन्नतापूर्वक राजा भीम का आदर स्वीकार किया और राजसेवकों के साथ अपने भवन में विश्राम करने चले गए। उनके जाने के बाद बाहुक रथ लेकर रथशाला में गया। उसने घोड़ों को खोलकर अश्वशास्त्र की विधि के अनुसार उनकी परिचर्या की, उन्हें पुचकारकर धीरज दिया और स्वयं भी रथ के पिछले भाग में जाकर बैठ गया।

राजप्रेष्यैरनुगतो दिष्टं वेश्म समाविशत् ।
ऋतुपर्णे गते राजन् वार्ष्णेयसहिते नृपे ॥

बाहुको रथमादाय रथशालामुपागमत् ।
स मोचयित्वा तानश्वानुपचर्य च शास्त्रतः ॥

स्वयं चैतान् समाश्वास्य रथोपस्थ उपाविशत् । फिर वे राजसेवकोंके साथ गये और बताये हुए भवनमें विश्रामके लिये प्रवेश किया । राजन्! वार्ष्णेयसहित ऋतुपर्णके चले जानेपर बाहुक रथ लेकर रथशालामें गया । उसने उन घोड़ोंको खोल दिया और अश्वशास्त्रकी विधिके अनुसार उनकी परिचर्या करनेके बाद घोड़ोंको पुचकारकर उन्हें धीरज देनेके पश्चात् वह स्वयं भी रथके पिछले भागमें जा बैठा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 73 · श्लोक 30-313पृष्ठ 522

दमयन्ती, जो शोक से आतुर थी, राजा ऋतुपर्ण, सूतपुत्र वार्ष्णेय और बाहुक को देखकर विचार करने लगी— "यह किसके रथ की घर्घराहट सुनाई पड़ती थी? वह गम्भीर घोष तो महाराज नल के रथ जैसा था; परन्तु इन आगन्तुकों में मुझे निषधराज नल नहीं दिखते। क्या वार्ष्णेय ने भी नल के समान ही अश्वविद्या सीख ली है? आज रथ की आवाज बड़े जोर से सुनाई दे रही थी, जैसे नल के रथ हाँकते समय हुई करती थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि राजा ऋतुपर्ण भी वैसे ही अश्वविद्या में निपुण हों जैसे राजा नल हैं?" इस प्रकार विचार करके दमयन्ती ने नल का पता लगाने हेतु अपनी दूती को भेजा।

दमयन्त्यपि शोकार्ता दृष्ट्वा भाङ्गासुरिं नृपम् ॥

सूतपुत्रं च वार्ष्णेयं बाहुकं च तथाविधम् ।
चिन्तयामास वैदर्भी कस्यैष रथनिःस्वनः ॥

दमयन्ती भी शोकसे आतुर हो राजा ऋतुपर्ण, सूतपुत्र वार्ष्णेय तथा पूर्वोक्त बाहुकको देखकर सोचने लगी— ' यह किसके रथकी घर्घराहट सुनायी पड़ती थी ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 73 · श्लोक 32-33पृष्ठ 522

In English

The Arrival of King Rituparna

King Rituparna arrives at Kundinpur on a loud chariot, which reminds Damayanti of the sound of King Nala's chariot. While King Bhima welcomes and hosts Rituparna, Damayanti watches from her palace and wonders if the newcomer is indeed Nala.

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