श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 511–520
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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‘ इसके शरीरकी रूपहीनताको लक्ष्य करके मेरी बुद्धिमें यह भेद नहीं पैदा होता कि यह नल नहीं है, परंतु राजा नलकी जो मोटाई है, उससे यह कुछ दुबला- पतला है । उससे मेरे मनमें यह विचार होता है कि सम्भव है, यह नल न हो ॥ ३२ ॥
वयःप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः ।
नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये बाहुकमन्ततः ॥ ३३ ॥
‘ इसकी अवस्थाका प्रमाण तो उन्हींके समान है, परंतु रूपकी दृष्टिसे तो अन्तर पड़ता है । फिर भी अन्ततः मैं इसी निर्णयपर पहुँचता हूँ कि मेरी रायमें बाहुक सर्वगुणसम्पन्न राजा नल ही हैं ' ॥ ३३ ॥
एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेयः पर्यचिन्तयत् ।
हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ॥ ३४ ॥
महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पुण्यश्लोक नलके सारथि वार्ष्णेयने बार- बार उपर्युक्त रूपसे विचार करते हुए मन - ही - मन उक्त धारणा बना ली ॥ ३४ ॥
ऋतुपर्णश्च राजेन्द्रो बाहुकस्य हयज्ञताम् ।
चिन्तयन् मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः ॥ ३५ ॥
महाराज ऋतुपर्ण भी बाहुकके अश्वसंचालन- विषयक ज्ञानपर विचार करके वार्ष्णेय सारथिके साथ बहुत प्रसन्न हुए ॥ ३५ ॥
ऐकाग्रयं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत् ।
परं यत्नं च सम्प्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह ॥ ३६ ॥
उसकी वह एकाग्रता, वह उत्साह, घोड़ोंको काबू में रखनेकी वह कला और वह उत्तम प्रयत्न देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णविदर्भगमने एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमेंऋतुपर्णका विदर्भदेशमें गमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥
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द्विसप्ततितमोऽध्यायः ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना बृहदश्वउवाच
स नदीः पर्वतांश्चैव वनानि च सरांसि च ।
अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! जैसे पक्षी आकाशमें उड़ता है, उसी प्रकार बाहुक (बड़े वेगसे ) शीघ्रतापूर्वक कितनी ही नदियों, पर्वतों, वनों और सरोवरोंको लाँघता हुआ आगे बढ़ने लगा ॥ १ ॥
तथा प्रयाते तु रथे तदा भाङ्गासुरिर्नृपः ।
उत्तरीयमधोऽपश्यद् भ्रष्टं परपुरंजयः ॥ २ ॥
जब रथ इस प्रकार तीव्र गतिसे दौड़ रहा था, उसी समय शत्रुओंके नगरोंको जीतनेवाले राजा ऋतुपर्णने देखा, उनका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर गया है ॥ २ ॥
ततः स त्वरमाणस्तु पटे निपतिते तदा ।
ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामनाः ॥ ३ ॥
निगृह्णीष्व महाबुद्धे हयानेतान् महाजवान् ।
वार्ष्णेयो यावदेनं मे पटमानयतामिह ॥ ४ ॥
उस समय वस्त्र गिर जानेपर उन महामना नरेशने बड़ी उतावलीके साथ नलसे कहा -' महामते! इस वेगशाली घोड़ोंको ( थोड़ी देरके लिये ) रोक लो । मैं अपनी गिरी हुई चादर लूँगा । जबतक यह वार्ष्णेय उतरकर मेरे उत्तरीय वस्त्रको ला दे, तबतक रथको रोके रहो ' ॥ ३-४ ॥
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तव ।
योजनं समतिक्रान्तो नाहर्तुं शक्यते पुनः ॥ ५ ॥
यह सुनकर नलने उसे उत्तर दिया- ' महाराज! आपका वस्त्र बहुत दूर गिरा है । मैं उस
स्थानसे चार कोस आगे आ गया हूँ। अब फिर वह नहीं लाया जा सकता ' ॥ ५ ॥
एवमुक्तो नलेनाथ तदा भाङ्गासुरिर्नृपः ।
आससाद वने राजन् फलवन्तं बिभीतकम् ॥ ६ ॥
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राजन्! नलके ऐसा कहनेपर राजा ऋतुपर्ण चुप हो गये । अब वे एक वनमें एक बहेड़ेके वृक्षके पास आ पहुँचे, जिसमें बहुत - से फल लगे थे ॥ ६ ॥
तं दृष्ट्वा बाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभाषत ।
ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम् ॥ ७ ॥
उस वृक्षको देखकर राजा ऋतुपर्णने तुरंत ही बाहुकसे कहा - ' सूत! तुम देखो, मुझमें भी गणना करने ( हिसाब लगाने ) की कितनी अद्भुत शक्ति है ॥ ७ ॥
सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन ।
नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ॥ ८ ॥
' सब लोग सभी बातें नहीं जानते । संसारमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तथा एक ही पुरुषमें सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रतिष्ठा नहीं है ॥ ८ ॥
वृक्षेऽस्मिन् यानि पर्णानि फलान्यपि च बाहुक ।
पतितान्यपि यान्यत्र तत्रैकमधिकं शतम् ॥ ९ ॥
एकपत्राधिकं चात्र फलमेकं च बाहुक ।
पञ्चकोट्योऽथ पत्राणां द्वयोरपि च शाखयोः ॥ १० ॥
प्रचिनुह्यस्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्याः प्रशाखिकाः ।
आभ्यां फलसहस्रे द्वे पञ्चोनं शतमेव च ॥ ११ ॥
‘ बाहुक! इस वृक्षपर जितने पत्ते और फल हैं, उन सबको मैं बताता हूँ । पेड़के नीचे जो पत्ते और फल गिरे हुए हैं, उनकी संख्या एक सौ अधिक है, इसके सिवा एक पत्र तथा एक फल और भी अधिक है; अर्थात् नीचे गिरे हुए पत्तों और फलोंकी संख्या वृक्षमें लगे हुए पत्तों और फलोंसे एक सौ दो अधिक है । इस वृक्षकी दोनों शाखाओंमें पाँच करोड़ पत्ते हैं । तुम्हारी इच्छा हो तो इन दोनों शाखाओं तथा इसकी अन्य प्रशाखाओं ( को काटकर उन ) -के पत्ते गिन लो । इसी प्रकार इन शाखाओंमें दो हजार पंचानबे फल लगे हुए हैं ॥
ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत् ।
परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन ॥ १२ ॥
प्रत्यक्षमेतत् कर्तास्मि शातयित्वा बिभीतकम् ।
अथात्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता ॥ १३ ॥
प्रत्यक्षं ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम् ।
अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा ॥ १४ ॥
यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा – ' शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है । मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा । महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको कारूँगा । इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी । बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि ( फलोंकी ) संख्या इतनी है या नहीं ॥ १२–१४ ॥
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संख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप ।
मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन् यच्छतु वाजिनाम् ॥ १५ ॥
‘ जनेश्वर! यदि वार्ष्णेय दो घड़ीतक भी इन घोड़ोंकी लगाम सँभाले तो मैं आपके देखते - देखते इसके फलोंको गिन लूँगा' ॥ १५ ॥
तमब्रवीन्नृपः सूतं नायं कालो विलम्बितुम् ।
बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थितः ॥ १६ ॥
प्रतीक्षस्व मुहूर्तं त्वमथवा त्वरते भवान् ।
एष याति शिवः पन्था याहि वार्ष्णेयसारथिः ॥ १७ ॥
तब राजाने सारथिसे कहा-' यह विलम्ब करनेका समय नहीं है । ' बाहुक बोला- ' मैं प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही गणना समाप्त कर दूँगा। आप दो ही घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये । अथवा यदि आपको बड़ी जल्दी हो तो यह विदर्भदेशका मंगलमय मार्ग है, वार्ष्णेयको सारथि बनाकर चले जाइये ' ॥ १६-१७ ॥
अब्रवीदृतुपर्णस्तु सान्त्वयन् कुरुनन्दन ।
त्वमेव यन्ता नान्योऽस्ति पृथिव्यामपि बाहुक ॥ १८ ॥
कुरुनन्दन! तब ऋतुपर्णने उसे सान्त्वना देते हुए कहा - ' बाहुक! तुम्हीं इन घोड़ोंको हाँक सकते हो । इस कलामें पृथ्वीपर तुम्हारे जैसा दूसरा कोई नहीं है ॥ १८ ॥
त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान् हयकोविद ।
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि न विघ्नं कर्तुमर्हसि ॥ १ ९ ॥
‘ घोड़ोंके रहस्यको जाननेवाले बाहुक! तुम्हारे ही प्रयत्नसे मैं विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ । देखो, तुम्हारी शरणमें आया हूँ। इस कार्यमें विघ्न न डालो ॥ १ ९ ॥
कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक ।
विदर्भान् यदि यात्वाद्य सूर्यं दर्शयितासि मे ॥ २० ॥
‘ बाहुक! यदि आज विदर्भदेशमें पहुँचकर तुम मुझे सूर्यका दर्शन करा सको तो तुम जो कहोगे, तुम्हारी वही इच्छा पूर्ण करूँगा ' ॥ २० ॥
अथाब्रवीद् बाहुकस्तं संख्याय च बिभीतकम् ।
ततो विदर्भान् यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम ॥ २१ ॥
यह सुनकर बाहुकने कहा- ' मैं बहेड़ेके फलोंको गिनकर विदर्भदेशको चलूँगा । आप मेरी यह बात मान लीजिये ' ॥ २१ ॥
अकाम इव तं राजा गणयस्वेत्युवाच ह ।
एकदेशं च शाखायाः समादिष्टं मयानघ ॥ २२ ॥
गणयस्वाश्वतत्त्वज्ञ ततस्त्वं प्रीतिमावह ।
सोऽवतीर्य रथात् तूर्णं शातयामास तं द्रुमम् ॥ २३ ॥
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राजाने मानो अनिच्छासे कहा– ' अच्छा, गिन लो । अश्वविद्याके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप बाहुक! मेरे बताये अनुसार तुम शाखाके एक ही भागको गिनो । इससे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी' । बाहुकने रथसे उतरकर तुरंत ही उस वृक्षको काट डाला ॥ २२-२३ ॥
ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमब्रवीत् ।
गणयित्वा यथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु ॥ २४ ॥
गिननेसे उसे उतने ही फल मिले । तब उसने विस्मित होकर राजा ऋतुपर्णसे कहा - ॥ २४ ॥
अत्यद्भुतमिदं राजन् दृष्टवानस्मि ते बलम् ।
श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययैतज्ज्ञायते नृप ॥ २५ ॥
तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप ।
विद्धयक्षहृदयज्ञं मां संख्याने च विशारदम् ॥ २६ ॥
‘ राजन्! आपमें गणितकी यह अद्भुत शक्ति मैंने देखी है । नराधिप! जिस विद्यासे यह गिनती जान ली जाती है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ । ' राजा तुरंत जानेके लिये उत्सुक थे, अतः उन्होंने बाहुकसे कहा-' तुम मुझे द्यूत- विद्याका मर्मज्ञ और गणितमें अत्यन्त निपुण समझो ' ॥ २५-२६ ॥
बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम ।
मत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥
बाहुकने कहा – ' पुरुषश्रेष्ठ! तुम यह विद्या मुझे बतला दो और बदलेमें मुझसे भी अश्व-विद्याका रहस्य ग्रहण कर लो' ॥ २७ ॥
ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुकं कार्यगौरवात् ।
हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यब्रवीद् वचः ॥ २८ ॥
तब राजा ऋतुपर्णने कार्यकी गुरुता और अश्व- विज्ञानके लोभसे बाहुकको आश्वासन देते हुए कहा — ‘ तथास्तु ' ॥ २८ ॥
यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् ।
निक्षेपो मेऽश्वहृदयं त्वयि तिष्ठतु बाहुक ।
एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वै ॥ २ ९ ॥
'बाहुक! तुम मुझसे द्यूत- विद्याका गूढ़ रहस्य ग्रहण करो और अश्वविज्ञानको मेरे लिये अपने ही पास धरोहरके रूपमें रहने दो । ' ऐसा कहकर ऋतुपर्णने नलको अपनी विद्या दे दी ॥ २ ९ ॥
तस्याक्षहृदयज्ञस्य शरीरान्निःसृतः कलिः ।
कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात् सततमुद्वमन् ॥ ३० ॥
कलेस्तस्य तदार्तस्य शापाग्निः स विनिःसृतः ।
स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान् ॥ ३१ ॥
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द्यूत-1-विद्याका रहस्य जाननेके अनन्तर नलके शरीरसे कलियुग निकला । तब कर्कोटक नागके तीखे विषको अपने मुखसे बार- बार उगल रहा था। उस समय कष्टमें पड़े हुए कलियुगकी वह शापाग्नि भी दूर हो गयी । राजा नलको उसने दीर्घकालतक कष्ट दिया था और उसीके कारण वे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥
ततो विषविमुक्तात्मा स्वं रूपमकरोत् कलिः ।
तं शप्तुमैच्छत् कुपितो निषधाधिपतिर्नलः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर विषके प्रभावसे मुक्त होकर कलियुगने अपने स्वरूपको प्रकट किया । उस समय निषधनरेश नलने कुपित हो कलियुगको शाप देनेकी इच्छा की ॥ ३२ ॥
तमुवाच कलिर्भीतो वेपमानः कृताञ्जलिः ।
कोपं संयच्छ नृपते कीर्तिं दास्यामि ते पराम् ॥ ३३ ॥
तब कलियुग भयभीत हो काँपता हुआ हाथ जोड़कर उनसे बोला-' महाराज! अपने क्रोधको रोकिये । मैं आपको उत्तम कीर्ति प्रदान करूँगा ॥ ३३ ॥
इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माशपत् पुरा ।
यदा त्वया परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडितः ॥ ३४ ॥
‘ इन्द्रसेनकी माता दमयन्तीने, पहले जब उसे आपने वनमें त्याग दिया था, कुपित
होकर मुझे शाप दे दिया । उससे मैं बड़ा कष्ट पाता रहा हूँ ॥ ३४ ॥
अवसं त्वयि राजेन्द्र सुदुःखमपराजित ।
विषेण नागराजस्य दह्यमानो दिवानिशम् ॥ ३५ ॥
‘ किसीसे पराजित न होनेवाले महाराज! मैं आपके शरीरमें अत्यन्त दुःखित होकर रहता था। नागराज कर्कोटकके विषसे मैं दिन- रात झुलसता जा रहा था ( इस प्रकार मुझे अपने कियेका कठोर दण्ड मिल गया है ) ॥ ३५ ॥
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि शृणु चेदं वचो मम ।
ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिताः ।
मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद् भविष्यति ॥ ३६ ॥
भयार्तं शरणं यातं यदि मां त्वं न शप्स्यसे ।
एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत् कोपमात्मनः ॥ ३७ ॥
‘ अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी यह बात सुनिये । यदि भयसे पीड़ित और शरणमें आये हुए मुझको आप शाप नहीं देंगे तो संसारमें जो मनुष्य आलस्यरहित हो आपकी कीर्ति- कथाका कीर्तन करेंगे, उन्हें मुझसे कभी भय नहीं होगा । ' कलियुगके ऐसा कहनेपर राजा नलने अपने क्रोधको रोक लिया ॥ ३६-३७ ॥
ततो भीतः कलिः क्षिप्रं प्रविवेश बिभीतकम् ।
कलिस्त्वन्यैस्तदादृश्यः कथयन् नैषधेन वै ॥ ३८ ॥
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तदनन्तर कलियुग भयभीत हो तुरंत ही बहेड़ेके वृक्षमें समा गया । वह जिस समय निषधराज नलके साथ बात कर रहा था, उस समय दूसरे लोग उसे नहीं देख पाते थे ॥ ३८ ॥
ततो गतज्वरो राजा नैषधः परवीरहा ।
सम्प्रणष्टे कलौ राजा संख्यायास्य फलान्युत ॥ ३ ९ ॥
मुदा परमया युक्तस्तेजसाथ परेण वै ।
रथमारुह्य तेजस्वी प्रययौ जवनैर्हयैः ॥ ४० ॥
तदनन्तर कलियुगके अदृश्य हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले निषधनरेश राजा नल सारी चिन्ताओंसे मुक्त हो गये । बहेड़ेके फलोंको गिनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे उत्तम तेजसे युत्ह तेजस्वी रूप धारण करके रथपर चढ़े और वेगशाली घोड़ोंको हाँकते हुए विदर्भदेशको चल दिये ॥ ३ ९ -४० ॥
बिभीतकश्चाप्रशस्तः संवृत्तः कलिसंश्रयात् ।
हयोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुनः पुनः ॥ ४१ ॥
नलः संचोदयामास प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
विदर्भाभिमुखो राजा प्रययौ स महायशाः ॥ ४२ ॥
कलियुगके आश्रय लेनेसे बहेड़ेका वृक्ष निन्दित हो गया । तदनन्तर राजा नलने प्रसन्नचित्तसे पुनः घोड़ोंको हाँकना आरम्भ किया । वे उत्तम अश्व पक्षियोंकी तरह बार- बार उड़ते हुए - से प्रतीत हो रहे थे । अब महायशस्वी राजा नल विदर्भदेशकी ओर ( बड़े वेगसे बढ़े ) जा रहे थे ॥ ४१-४२ ॥ नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमद् गृहम् ।
ततो गतज्वरो राजा नलोऽभूत् पृथिवीपतिः ।
विमुक्तः कलिना राजन् रूपमात्रवियोजितः ॥ ४३ ॥
नलके चले जानेपर कलि अपने घर चले गये । राजन्! कलिसे मुक्त हो भूमिपाल राजा नल सारी चिन्ताओंसे छुटकारा पा गये; किंतु अभीतक उन्हें अपना पहला रूप नहीं प्राप्त हुआ था । उनमें केवल इतनी ही कमी रह गयी थी ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिनिर्गमे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें कलियुगनिर्गमनविषयक बहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत बृहदश्वउवाच
ततो विदर्भान् सम्प्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम् ।
ऋतुपर्णं जना राज्ञे भीमाय प्रत्यवेदयन् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर शाम होते - होते सत्यपराक्रमी राजा
ऋतुपर्ण विदर्भराज्यमें जा पहुँचे। लोगोंने राजा भीमको इस बातकी सूचना दी ॥ १ ॥
स भीमवचनाद् राजा कुण्डिनं प्राविशत् पुरम् ।
नादयन् रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः ॥ २ ॥
भीमके अनुरोधसे राजा ऋतुपर्णने अपने रथकी घर्घराहटद्वारा सम्पूर्ण दिशा-विदिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
ततस्तं रथनिर्घोषं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुः ।
श्रुत्वा तु समहृष्यन्त पुरेव नलसंनिधौ ॥ ३ ॥
नलके घोड़े वहीं रहते थे, उन्होंने रथका वह घोष सुना । सुनकर वे उतने ही प्रसन्न और उत्साहित हुए, जितने कि पहले नलके समीप रहा करते थे ॥ ३ ॥
दमयन्ती तु शुश्राव रथघोषं नलस्य तम् ।
यथा मेघस्य नदतो गम्भीरं जलदागमे ॥ ४ ॥
दमयन्तीने भी नलके रथकी वह घर्घराहट सुनी, मानो वर्षाकालमें गरजते हुए मेघोंका गम्भीर घोष सुनायी देता हो ॥ ४ ॥
परं विस्मयमापन्ना श्रुत्वा नादं महास्वनम् ।
नलेन संगृहीतेषु पुरेव नलवाजिषु ।
सदृशं रथनिर्घोषं मेने भौमी तथा हयाः ॥ ५ ॥
वह महाभयंकर रथनाद सुनकर उसे बड़ा विस्मय हुआ । पूर्वकालमें राजा नल जब घोड़ोंकी बाग सँभालते थे, उन दिनों उनके रथसे जैसी गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी, वैसी ही उस समयके रथकी घर्घराहट भी दमयन्ती और उसके घोड़ोंको जान पड़ी ॥ ५ ॥
प्रासादस्थाश्च शिखिनः शालास्थाश्चैव वारणाः ।
हयाश्च शुश्रुवुस्तस्य रथघोषं महीपतेः ॥ ६ ।
महलपर बैठे हुए मयूरों, गजशालामें बँधे हुए गजराजों और अश्वशालाके अश्वोंने राजाके रथका वह अद्भुत घोष सुना ॥ ६ ॥
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तच्छ्रुत्वा रथनिर्घोषं वारणाः शिखिनस्तथा ।
प्रणेदुरुन्मुखा राजन् मेघनाद इवोत्सुकाः ॥ ७ ॥
राजन्! रथकी उस आवाजको सुनकर हाथी और मयूर अपना मुँह ऊपर उठाकर उसी प्रकार उत्कण्ठापूर्वक अपनी बोली बोलने लगे, जैसे वे मेघोंकी गर्जना होनेपर बोला करते हैं ॥ ७ ॥
दमयन्त्युवाच
यथासौ रथनिर्घोषः पूरयन्निव मेदिनीम् ।
ममाह्लादयते चेतो नल एष महीपतिः ॥ ८ ॥
(उस समय ) दमयन्तीने ( मन - ही- मन) कहा - अहो! रथकी वह घर्घराहट इस पृथ्वीको गुँजाती हुई जिस प्रकार मेरे मनको आह्लाद प्रदान कर रही है, उससे जान पड़ता है, ये महाराज नल ही पधारे हैं ॥ ८ ॥
अद्य चन्द्राभवक्त्रं तं न पश्यामि नलं यदि ।
असंख्येयगुणं वीरं विनङ्क्षयामि न संशयः ॥ ९ ॥
आज यदि असंख्य गुणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले वीरवर नलको न देखूँगी तो अपने इस जीवनका अन्त कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥
यदि वै तस्य वीरस्य बाह्वोर्नाद्याहमन्तरम् ।
प्रविशामि सुखस्पर्शं न भविष्याम्यसंशयम् ॥ १० ॥
आज यदि मैं उन वीरशिरोमणि नलकी दोनों भुजाओंके मध्यभागमें, जिसका स्पर्श अत्यन्त सुखद है, प्रवेश न कर सकी तो अवश्य जीवित न रह सकूँगी ॥ १० ॥
यदि मां मेघनिर्घोषो नोपगच्छति नैषधः ।
अद्य चामीकरप्रख्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥ ११ ॥
यदि रथद्वारा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले निषधदेशके स्वामी महाराज नल आज मेरे पास नहीं पधारेंगे तो मैं सुवर्णके समान देदीप्यमान दहकती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगी ॥ ११ ॥
यदि मां सिंहविक्रान्तो मत्तवारणविक्रमः ।
नाभिगच्छति राजेन्द्रो विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥
यदि सिंहके समान पराक्रमी और मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले राजराजेश्वर नल मेरे पास नहीं आयेंगे तो आज अपने जीवनको नष्ट कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥
न स्मराम्यनृतं किंचिन्न स्मराम्यपकारताम् ।
न च पर्युषितं वाक्यं स्वैरेष्वपि कदाचन ॥ १३ ॥
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मुझे याद नहीं कि स्वेच्छापूर्वक अर्थात् हँसी- मजाकमें भी मैं कभी झूठ बोली हूँ, स्मरण नहीं कि कभी किसीका मेरेद्वारा अपकार हुआ हो तथा यह भी स्मरण नहीं कि मैंने प्रतिज्ञा की हुई बातका उल्लंघन किया हो ॥ १३ ॥
प्रभुः क्षमावान् वीरश्च दाता चाप्यधिको नृपैः ।
रहोऽनीचानुवर्ती च क्लीबवन्मम नैषधः ॥ १४ ॥
मेरे निषधराज नल शक्तिशाली, क्षमाशील, वीर, दाता, सब राजाओंसे श्रेष्ठ, एकान्तमें भी नीच कर्मसे दूर रहनेवाले तथा परायी स्त्रीके लिये नपुंसकतुल्य हैं ॥
गुणांस्तस्य स्मरन्त्या मे तत्पराया दिवानिशम् ।
हृदयं दीर्यत इदं शोकात् प्रियविनाकृतम् ॥ १५ ॥
मैं ( सदा) उन्हींके गुणोंका स्मरण करती और दिन- रात उन्हींके परायण रहती हूँ ।
प्रियतम नलके बिना मेरा यह हृदय उनके विरहशोकसे विदीर्ण- सा होता रहता है ॥ १५ ॥
एवं विलपमाना सा नष्टसंज्ञेव भारत ।
आरुरोह महद् वेश्म पुण्यश्लोकदिदृक्षया ॥ १६ ॥
भारत! इस प्रकार विलाप करती हुई दमयन्ती अचेत- सी हो गयी । वह पुण्यश्लोक नलके दर्शनकी इच्छासे ऊँचे महलकी छतपर जा चढ़ी ॥ १६ ॥
ततो मध्यमकक्षायां ददर्श रथमास्थितम् ।
ऋतुपर्णं महीपालं सहवार्ष्णेयबाहुकम् ॥ १७ ॥
वहाँसे उसने देखा, वार्ष्णेय और बाहुकके साथ रथपर बैठे हुए महाराज ऋतुपर्ण मध्यम कक्षा ( परकोटे ) -में पहुँच गये हैं ॥ १७ ॥
ततोऽवतीर्य वार्ष्णेयो बाहुकश्च रथोत्तमात् ।
हयांस्तानवमुच्याथ स्थापयामास वै रथम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर वार्ष्णेय और बाहुकने उस उत्तम रथसे उतरकर घोड़े खोल दिये और रथको एक जगह खड़ा कर दिया ॥ १८ ॥
सोऽवतीर्य रथोपस्थादृतुपर्णो नराधिपः ।
उपतस्थे महाराजं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ १ ९ ॥
इसके बाद राजा ऋतुपर्ण रथके पिछले भागसे उतरकर भयानक पराक्रमी महाराज भीमसे मिले ॥ १ ९ ॥
तं भीमः प्रतिजग्राह पूजया परया ततः ।
स तेन पूजितो राज्ञा ऋतुपर्णो नराधिपः ॥ २० ॥
तदनन्तर भीमने बड़े आदर- सत्कारके साथ उन्हें अपनाया और राजा ऋतुपर्णका भलीभाँति आदर - सत्कार किया ॥ २० ॥
स तत्र कुण्डिने रम्ये वसमानो महीपतिः । न च किंचित् तदापश्यत् प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ।