सुरभ्युपाख्यान : पुत्रों के प्रति माता का प्रेम और करुणा क्यों विशेष होती है?

दीनता पर आधारित करुणा

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व → अरण्यपर्व · अध्याय 9 · पृष्ठ 94–98

व्यास ने धृतराष्ट्र से कहा

पाण्डवों की दुर्दशा बताते हुए धृतराष्ट्र के मोह को समझाने हेतु

धृतराष्ट्र ने अत्यन्त भारी मन से कहा— "भगवन्! यह जूए का खेल मुझे भी पसन्द नहीं था। मुने! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि विधाता ने मुझे बलपूर्वक खींचकर इस कार्य में लगा दिया। भीष्म, द्रोण और विदुर को भी यह द्यूत का आयोजन अच्छा नहीं लगता था; गान्धारी भी नहीं चाहती थी कि जूआ खेला जाए; परन्तु मैंने मोहवश सबको जूए में लगा दिया। भगवन्! प्रियव्रत! मैं यह जानता हूँ कि दुर्योधन अविवेकी है, तो भी पुत्र स्नेह के कारण मैं उसका त्याग नहीं कर सकता।"

धृतराष्ट्र उवाच

परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम् ।
पुत्रस्नेहेन भगवन् जानन्नपि प्रियव्रत ॥

भगवन्! प्रियव्रत! मैं यह जानता हूँ कि दुर्योधन अविवेकी है, तो भी पुत्रस्नेहके कारण मैं उसका त्याग नहीं कर सकता ।

महाभारत · वनपर्व · अरण्यपर्व · अध्याय 9 · श्लोक 3पृष्ठ 95

व्यास जी ने धृतराष्ट्र की ओर देखा और बोले— "राजन्! विचित्रवीर्यनन्दन! तुम ठीक कहते हो, हम अच्छी तरह जानते हैं कि पुत्र परम प्रिय वस्तु है। पुत्र से बढ़कर संसार में और कुछ नहीं है।" व्यास जी आगे बोले— "जनेश्वर! इस विषय में मैं तुम्हें एक परम उत्तम इतिहास सुनाता हूँ, जो सुरभि तथा इन्द्र के संवाद के रूप में है। राजन्! पहले की बात है, गोमाता सुरभि स्वर्गलोक में जाकर फूट-फूटकर रोने लगी। तात! उस समय इन्द्र को उस पर बड़ी दया आयी।"

इन्द्र ने सुरभि के पास पहुँचकर पूछा— "शुभे! तुम क्यों इस तरह रो रही हो? देवलोकवासियों की कुशल तो है न? मनुष्यों तथा गौओं में तो सब लोग कुशल से हैं न? तुम्हारा यह रोदन किसी अल्प कारण से नहीं हो सकता?"

सुरभि ने विलाप करते हुए कहा— "देवेश्वर! आप लोगों की अवनति नहीं दिखायी देती। इन्द्र! मुझे तो अपने पुत्र के लिये शोक हो रहा है, इसी से रोती हूँ। देखो, इस नीच किसान को जो मेरे दुर्बल बेटे को बार-बार कोड़े से पीट रहा है और वह हल से जुतकर अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। सुरेश्वर! वह तो विश्राम के लिये उत्सुक होकर बैठ रहा है और वह किसान उसे डण्डे मारता है। देवेन्द्र! यह देखकर मुझे अपने बच्चे के प्रति बड़ी दया हो आयी है और मेरा मन उद्विग्न हो उठा है। वहाँ दो बैलों में से एक तो बलवान है जो भारयुक्त जूए को खींच सकता है; परन्तु दूसरा निर्बल है, प्राणशून्य-सा जान पड़ता है। वह इतना दुबला-पतला हो गया है कि उसके सारे शरीर में फैली हुई नाड़ियाँ दीख रही हैं। वह बड़े कष्ट से उस भारयुक्त जूए को खींच पाता है। वासव! मुझे उसी के लिये शोक हो रहा है। इन्द्र! देखो-देखो, चाबुक से मार-मारकर उसे बार-बार पीड़ा दी जा रही है, तो भी उस जूए के भार को वहन करने में वह असमर्थ हो रहा है। यही देखकर मैं शोक से पीड़ित होकर अत्यन्त दुःखी हो गयी हूँ और करुणामग्न होकर दोनों नेत्रों से आँसू बहाती हुई रो रही हूँ।"

इन्द्र ने विस्मय से पूछा— "कल्याणी! तुम्हारे तो सहस्रों पुत्र इसी प्रकार पीड़ित हो रहे हैं, फिर तुमने एक ही पुत्र के मार खाने पर यहाँ इतनी करुणा क्यों दिखायी?" सुरभि बोली— "देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समान भाव ही रखती हूँ; परन्तु दीन-दुःखी पुत्र के प्रति अधिक दया उमड़ आती है।"

शक्र उवाच

सुरभिरुवाच यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे ।
दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥

सुरभि बोली- देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन - दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ।

महाभारत · वनपर्व · अरण्यपर्व · अध्याय 9 · श्लोक 16पृष्ठ 97

सुरभि की यह बात सुनकर इन्द्र बड़े विस्मित हुए और तब से वे पुत्र को प्राणों से भी अधिक प्रिय मानने लगे। उस समय वहाँ पाकशासन भगवान् इन्द्र ने किसान के कार्य में विघ्न डालते हुए सहसा भयङ्कर वर्षा कर दी।

व्यास उवाच

प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोयमुल्बणम् ।
कर्षकस्याचरन् विघ्नं भगवान् पाकशासनः ॥

उस समय वहाँ पाकशासन भगवान् इन्द्रने किसानके कार्यमें विघ्न डालते हुए सहसा भयंकर वर्षा की ।

महाभारत · वनपर्व · अरण्यपर्व · अध्याय 9 · श्लोक 18पृष्ठ 97

व्यास जी बोले— "कुरुराज! इस प्रसङ्ग में सुरभि ने जैसा कहा है, वह ठीक है; कौरव और पाण्डव सभी मिलकर तुम्हारे ही पुत्र हैं। परन्तु राजन्! सब पुत्रों में जो हीन हों, दयनीय दशा में पड़े हों, उन्हीं पर अधिक कृपा होनी चाहिए। वत्स! जैसे पाण्डु मेरे पुत्र हैं, वैसे ही तुम भी हो, उसी प्रकार महाज्ञानी विदुर भी हैं। मैंने स्नेहवश ही तुमसे ये बातें कही हैं। भारत! दीर्घकाल से तुम्हारे एक सौ एक पुत्र हैं, किन्तु पाण्डु के पाँच ही पुत्र देखे जाते हैं। वे भी भोले-भाले, छल-कपट से रहित हैं और अत्यन्त दुःख उठा रहे हैं। वे कैसे जीवित रहेंगे और कैसे वृद्धिको प्राप्त होंगे? इस प्रकार कुन्ती के उन दीन पुत्रों के प्रति सोचते हुए मेरे मन में बड़ा सन्ताप होता है। राजन्! यदि तुम चाहते हो कि समस्त कौरव यहाँ जीवित रहें, तो तुम्हारा पुत्र दुर्योधन पाण्डवों से मेल करके शान्तिपूर्वक रहे।"

In English

The Story of Surabhi and Indra

Vyasa tells Dhritarashtra a story about the cow Surabhi and Indra to explain parental love. Surabhi weeps because one of her many sons is a weak ox being beaten by a farmer, teaching Indra that a parent feels more compassion for a suffering child. Vyasa uses this to urge Dhritarashtra to protect the Pandavas, who are his sons in need.

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