श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 91–100

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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आगमिष्यन्ति चेन्मोहात् पुनर्द्यूतेन तान् जय ॥ १३ ॥

धीरबुद्धि पाण्डव निश्चित समयकी अवधिको पूर्ण किये बिना यहाँ नहीं आयँगे; और यदि वे मोहवश आ भी जायँ तो तुम पुनः जूएके द्वारा उन्हें जीत लेना ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा ।

नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत् स पराङ्मुखः ॥ १४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कर्णके ऐसा कहनेपर उस समय राजा

दुर्योधनको अधिक प्रसन्नता नहीं हुई । उसने तुरंत ही अपना मुँह फेर लिया ॥ १४ ॥

उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे ।

रोषाद् दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च ॥ १५ ॥

उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना ।

अथो मम मतं यत् तु तन्निबोधत भूमिपाः ॥ १६ ॥

तब उसके आशयको समझकर कर्णने रोषसे अपनी सुन्दर आँखें फाड़कर दुःशासन, शकुनि और दुर्योधनकी ओर देखते हुए स्वयं ही उत्साहमें भरकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक कहा — ' भूमिपालो! इस विषयमें मेरा जो मत है, उसे सुन लो ॥ १५-१६ ॥

प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किङ्करपाणयः ।

न चास्य शक्नुमः स्थातुं प्रिये सर्वे ह्यतन्द्रिताः ॥ १७ ॥

' हम सब लोग राजा दुर्योधनके किंकर और भुजाएँ हैं; अतः हम सब मिलकर इनका प्रिय कार्य करेंगे; परंतु हम आलस्य छोड़कर इनके प्रियसाधनमें लग नहीं पाते ॥ १७ ॥

वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः ।

गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान् वनगोचरान् ॥ १८ ॥

‘ मेरी राय यह है कि हम कवच पहनकर अपने - अपने रथपर आरूढ़ हो अस्त्र- शस्त्र लेकर वनवासी पाण्डवोंको मारनेके लिये एक साथ उनपर धावा करें ॥ १८ ॥

तेषु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम् ।

निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम् ॥ १ ९ ॥

‘ जब वे सभी मरकर शान्त जो जायँ और अज्ञात गतिको अर्थात्र परलोकको पहुँच जायँ, तब धृतराष्ट्रके पुत्र तथा हम सब लोग सारे झगड़ोंसे दूर हो जायँगे ॥ १ ९ ॥

यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपरायणाः ।

यावन्मित्रविहीनाश्च तावच्छक्या मतं मम ॥ २० ॥

‘वे जबतक क्लेशमें पड़े हैं, जबतक शोकमें डूबे हुए हैं और जबतक मित्रों एवं सहायकोंसे वंचित हैं, तभीतक युद्धमें जीते जा सकते हैं, मेरा तो यही मत है ' ॥ २० ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः ।

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बाढमित्येव ते सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा ॥ २१ ॥

कर्णकी यह बात सुनकर सबने बार- बार उसकी सराहना की और कर्णकी बातके उत्तरमें सबके मुखसे यही निकला- ' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ' ॥ २१ ॥

एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक् ।

निर्ययुः पाण्डवान् हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः ॥ २२ ॥

इस प्रकार आपसमें बातचीत करके रोष और जोशमें भरे हुए वे सब पृथक् - पृथक् रथोंपर बैठकर पाण्डवोंके वधका निश्चय करके एक साथ नगरसे बाहर निकले ॥ २२ ॥

तान् प्रस्थितान् परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।

आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥ २३ ॥

उन्हें वनकी ओर प्रस्थान करते जान शक्तिशाली महर्षि शुद्धात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास दिव्य दृष्टिसे सब कुछ देखकर सहसा वहाँ आये ॥ २३ ॥

प्रतिषिध्याथ तान् सर्वान् भगवाँल्लोकपूजितः ।

प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम् ॥ २४ ॥

उन लोकपूजित भगवान् व्यासने उन सबको रोका और सिंहासनपर बैठे हुए प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्रके पास शीघ्र आकर कहा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासागमने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें व्यासजीके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला सातवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७ ॥

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अष्टमोऽध्यायः व्यासजीका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध व्यास उवाच

धृतराष्ट्र महाप्राज्ञ निबोध वचनं मम ।

वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम् ॥ १ ॥

व्यासजीने कहा — महाप्राज्ञ धृतराष्ट्र! तुम मेरी बात सुनो, मैं तुम्हें समस्त कौरवोंके हितकी उत्तम बात बताता हूँ ॥ १ ॥

न मे प्रियं महाबाहो यद् गताः पाण्डवा वनम् ।

निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमैः ॥ २ ॥

महाबाहो! पाण्डवलोग जो वनमें भेजे गये हैं, यह मुझे अच्छा नहीं लगा है । दुर्योधन आदिने उन्हें छलपूर्वक जूएमें हराया है ॥ २ ॥

ते स्मरन्तः परिक्लेशान् वर्षे पूर्णे त्रयोदशे ।

विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धाः कौरवेयेषु भारत ॥ ३ ॥

भारत! वे तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर अपनेको दिये हुए क्लेश याद करके कुपित हो कौरवोंपर विष उगलेंगे, अर्थात् विषके समान घातक अस्त्र- शस्त्रोंका प्रहार करेंगे ॥ ३ ॥

तदयं किं नु पापात्मा तव पुत्रः सुमन्दधीः ।

पाण्डवान् नित्यसंक्रुद्धो राज्यहेतोर्जिघांसति ॥ ४ ॥

ऐसा जानते हुए भी तुम्हारा यह पापात्मा एवं मूर्ख पुत्र क्यों सदा रोषमें भरा रहकर राज्यके लिये पाण्डवोंका वध करना चाहता है ॥ ४ ॥

वार्यतां साध्वयं मूढः शमं गच्छतु तेते सुतः ।

वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन् प्राणान् विमोक्ष्यति ॥ ५ ॥

तुम इस मूढ़को रोको । तुम्हारा यह पुत्र शान्त हो जाय । यदि इसने वनवासी पाण्डवोंको मार डालनेकी इच्छा की तो यह स्वयं ही अपने प्राणोंको खो बैठेगा ॥ ५ ॥

यथा हि विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम् ।

यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधुर्भवानपि ॥ ६ ॥

जैसे ज्ञानी विदुर, भीष्म, मैं, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य हैं, वैसे ही साधुस्वभाव तुम भी हो ॥ ६ ॥

विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितः ।

अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन् प्रतिपद्यताम् ॥ ७ ॥

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महाप्राज्ञ! स्वजनोंके साथ कलह अत्यन्त निन्दित माना गया है । वह अधर्म एवं अयश बढ़ानेवाला है; अतः राजन्! तुम स्वजनोंके साथ कलहमें न पड़ो ॥ ७ ॥

समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान् प्रति भारत ।

उपेक्ष्यमाणा सा राजन् महान्तमनयं स्पृशेत् ॥ ८ ॥

भारत! पाण्डवोंके प्रति इस दुर्योधनका जैसा विचार है, यदि उसकी उपेक्षा की गयी-उसका शमन न किया गया तो उसका वह विचार महान् अत्याचारकी सृष्टि कर सकता है ॥ ८ ॥

अथवायं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः ।

पाण्डवैः सहितो राजन्नेक एवासहायवान् ॥ ९ ॥

अथवा तुम्हारा यह मन्दबुद्धि पुत्र अकेला ही दूसरे किसी सहायकको लिये बिना पाण्डवोंके साथ वनमें जाय ॥ ९ ॥

ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः ।

यदि स्यात् कृतकार्योऽद्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर ॥ १० ॥

मनुजेश्वर! वहाँ पाण्डवोंके संसर्गमें रहनेसे तुम्हारे पुत्रके प्रति उनके हृदयमें स्नेह हो जाय, तो तुम आज ही कृतार्थ हो जाओगे ॥ १० ॥

अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते ।

श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति ॥ ११ ॥

कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा ।

भवान् वात्र क्षमं कार्यं पुरा वोऽर्थोऽभिवर्धते ॥ १२ ॥

किंतु महाराज! जन्मके समय किसी वस्तुका जैसा स्वभाव बन जाता है वह दूर नहीं होता। भले ही वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो? यह बात मेरे सुननेमें आयी है । अथवा इस विषयमें भीष्म, द्रोण, विदुर या तुम्हारी क्या सम्मति है? यहाँ जो उचित हो, वह कार्य पहले करना चाहिये, उसीसे तुम्हारे प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है ॥ ११-१२ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें व्यासवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

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नवमोऽध्यायः व्यासजीके द्वारा सुरभि और इन्द्रके उपाख्यानका वर्णन तथा उनका पाण्डवोंके प्रति दया दिखलाना धृतराष्ट्रउवाच

भगवन् नाहमप्येतद् रोचये द्यूतसम्भवम् ।

मन्ये तद्विधिनाऽऽकृष्य कारितोऽस्मीति वै मुने ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा — भगवन्! यह जूएका खेल मुझे भी पसंद नहीं था । मुने! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि विधाताने मुझे बलपूर्वक खींचकर इस कार्य में लगा दिया ॥ १ ॥

नैतद् रोचयते भीष्मो न द्रोणो विदुरो न च ।

गान्धारी नेच्छति द्यूतं तत्र मोहात् प्रवर्तितम् ॥ २ ॥

भीष्म, द्रोण और विदुरको भी यह द्यूतका आयोजन अच्छा नहीं लगता था । गान्धारी भी नहीं चाहती थी कि जूआ खेला जाय; परंतु मैंने मोहवश सबको जूएमें लगा दिया ॥ २ ॥

परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम् ।

पुत्रस्नेहेन भगवन् जानन्नपि प्रियव्रत ॥ ३ ॥

भगवन्! प्रियव्रत! मैं यह जानता हूँ कि दुर्योधन अविवेकी है, तो भी पुत्रस्नेहके कारण मैं उसका त्याग नहीं कर सकता ॥ ३ ॥

व्यास उवाच

वैचित्रवीर्य नृपते सत्यमाह यथा भवान् ।

दृढं विद्मः परं पुत्रं परं पुत्रान्न विद्यते ॥ ४ ॥

व्यासजी बोले — राजन्! विचित्रवीर्यनन्दन! तुम ठीक कहते हो, हम अच्छी तरह जानते हैं कि पुत्र परम प्रिय वस्तु है । पुत्रसे बढ़कर संसारमें और कुछ नहीं है ॥ ४ ॥

इन्द्रोऽप्यश्रुनिपातेन सुरभ्या प्रतिबोधितः ।

अन्यैः समृद्धैरप्यर्थेर्न सुतान्मन्यते परम् ॥ ५ ॥

सुरभिने पुत्रके लिये आँसू बहाकर इन्द्रको भी यह बात समझायी थी, जिससे वे अन्य समृद्धिशाली पदार्थोंसे सम्पन्न होनेपर भी पुत्रसे बढ़कर दूसरी किसी वस्तुको नहीं मानते हैं ॥ ५ ॥

अत्र ते कीर्तयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।

सुरभ्याश्चैव संवादमिन्द्रस्य च विशाम्पते ॥ ६ ॥

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जनेश्वर! इस विषयमें मैं तुम्हें एक परम उत्तम इतिहास सुनाता हूँ; जो सुरभि तथा इन्द्रके संवादके रूपमें है ॥ ६ ॥

त्रिविष्टपगता राजन् सुरभी प्रारुदत् किल ।

गवां माता पुरा तात तामिन्द्रोऽन्वकृपायत ॥ ७ ॥

राजन्! पहलेकी बात है, गोमाता सुरभि स्वर्गलोकमें जाकर फूट -फूटकर रोने लगी ।

तात! उस समय इन्द्रको उसपर बड़ी दया आयी ॥ ७ ॥

इन्द्र उवाच

किमिदं रोदिषि शुभे कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् ।

मानुषेष्वथ वा गोषु नैतदल्पं भविष्यति ॥ ८ ॥

इन्द्रने पूछा - शुभे! तुम क्यों इस तरह रो रही हो? देवलोकवासियोंकी कुशल तो है न? मनुष्यों तथा गौओंमें तो सब लोग कुशलसे हैं न? तुम्हारा यह रोदन किसी अल्प कारणसे नहीं हो सकता? ॥ ८ ॥

सुरभिरुवाच

विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिप ।

अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक ॥ ९ ॥

सुरभिने कहा – देवेश्वर! आपलोगोंकी अवनति नहीं दिखायी देती । इन्द्र! मुझे तो अपने पुत्रके लिये शोक हो रहा है, इसीसे रोती हूँ ॥ ९ ॥

पश्यैनं कर्षकं क्षुद्रं दुर्बलं मम पुत्रकम् ।

प्रतोदेनाभिनिघ्नन्तं लाङ्गलेन च पीडितम् ॥ १० ॥

देखो, इस नीच किसानको जो मेरे दुर्बल बेटेको बार- बार कोड़ेसे पीट रहा है और वह हलसे जुतकर अत्यन्त पीड़ित हो रहा है ॥ १० ॥

निषीदमानं सोत्कण्ठं वध्यमानं सुराधिप ।

कृपाविष्टास्मि देवेन्द्र मनश्चोद्विजते मम ।

एकस्तत्र बलोपेतो धुरमुद्वहतेऽधिकाम् ॥ ११ ॥

अपरोऽप्यबलप्राणः कृशो धमनिसंततः ।

कृच्छ्रादुद्वहते भारं तं वै शोचामि वासव ॥ १२ ॥

वध्यमानः प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः ।

नैव शक्नोति तं भारमुद्वोढुं पश्य वासव ॥ १३ ॥

सुरेश्वर! वह तो विश्रामके लिये उत्सुक होकर बैठ रहा है और वह किसान उसे डंडे मारता है । देवेन्द्र! यह देखकर मुझे अपने बच्चेके प्रति बड़ी दया हो आयी है और मेरा मन उद्विग्न हो उठा है । वहाँ दो बैलोंमेंसे एक तो बलवान् है जो भारयुक्त जूएको खींच सकता है; परंतु दूसरा निर्बल है, प्राणशून्य-सा जान पड़ता है । वह इतना दुबला- पतला हो गया है

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कि उसके सारे शरीरमें फैली हुई नाड़ियाँ दीख रही हैं। वह बड़े कष्टसे उस भारयुक्त जूएको खींच पाता हैं । वासव! मुझे उसीके लिये शोक हो रहा है । इन्द्र! देखो- देखो, चाबुकसे मार-मारकर उसे बार- बार पीड़ा दी जा रही है, तो भी उस जूएके भारको वहन करनेमें वह असमर्थ हो रहा है ॥ ११–१३ ॥

ततोऽहं तस्य शोकार्ता विरौमि भृशदुःखिता ।

अश्रूण्यावर्तयन्ती च नेत्राभ्यां करुणायती ॥ १४ ॥

यही देखकर मैं शोकसे पीड़ित हो अत्यन्त दुःखी हो गयी हूँ और करुणामग्न हो दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई रो रही हूँ ॥ १४ ॥

शक्र उवाच

तव पुत्रसहस्रेषु पीड्यमानेषु शोभने ।

किं कृपायितवत्यत्र पुत्र एकत्र हन्यति ॥ १५ ॥

इन्द्रने कहा — कल्याणी! तुम्हारे तो सहस्रों पुत्र इसी प्रकार पीड़ित हो रहे हैं, फिर तुमने एक ही पुत्रके मार खानेपर यहाँ इतनी करुणा क्यों दिखायी? ॥ १५ ॥

सुरभिरुवाच

यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे ।

दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥ १६ ॥

सुरभि बोली- देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन - दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ॥ १६ ॥

व्यासउवाच

तदिन्द्रः सुरभीवाक्यं निशम्य भृशविस्मितः ।

जीवितेनापि कौरव्य मेनेऽभ्यधिकमात्मजम् ॥ १७ ॥

व्यासजी कहते हैं— कुरुराज! सुरभिकी यह बात सुनकर इन्द्र बड़े विस्मित हो गये ।

तबसे वे पुत्रको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानने लगे ॥ १७ ॥

प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोयमुल्बणम् ।

कर्षकस्याचरन् विघ्नं भगवान् पाकशासनः ॥ १८ ॥

उस समय वहाँ पाकशासन भगवान् इन्द्रने किसानके कार्यमें विघ्न डालते हुए सहसा भयंकर वर्षा की ॥ १८ ॥

तद् यथा सुरभिः प्राह समवेतास्तु ते तथा ।

सुतेषु राजन् सर्वेषु हीनेष्वभ्यधिका कृपा ॥ १९ ॥

इस प्रसंगमें सुरभिने जैसा कहा है, वह ठीक है, कौरव और पाण्डव सभी मिलकर तुम्हारे ही पुत्र हैं । परंतु राजन्! सब पुत्रोंमें जो हीन हों, दयनीय दशामें पड़े हों, उन्हींपर

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अधिक कृपा होनी चाहिये ॥ १ ९ ॥

यादृशो मे सुतः पाण्डुस्तादृशो मेऽसि पुत्रक ।

विदुरश्च महाप्राज्ञः स्नेहादेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ २० ॥

वत्स! जैसे पाण्डु मेरे पुत्र हैं, वैसे ही तुम भी हो, उसी प्रकार महाज्ञानी विदुर भी हैं । मैंने स्नेहवश ही तुमसे ये बातें कही हैं ॥ २० ॥

चिराय तव पुत्राणां शतमेकश्च भारत ।

पाण्डोः पञ्चैव लक्ष्यन्ते तेऽपि मन्दाः सुदुःखिताः ॥ २१ ॥

भारत! दीर्घकालसे तुम्हारे एक सौ एक पुत्र हैं, किंतु पाण्डुके पाँच ही पुत्र देखे जाते हैं । वे भी भोले - भाले, छल- कपटसे रहित हैं और अत्यन्त दुःख उठा रहे हैं ॥ २१ ॥

कथं जीवेयुरत्यन्तं कथं वर्धेयुरित्यपि ।

इति दीनेषु पार्थेषु मनो मे परितप्यते ॥ २२ ॥

‘ वे कैसे जीवित रहेंगे और कैसे वृद्धिको प्राप्त होंगे?' इस प्रकार कुन्तीके उन दीन पुत्रोंके प्रति सोचते हुए मेरे मनमें बड़ा संताप होता है ॥ २२ ॥

यदि पार्थिव कौरव्याञ्जीवमानानिहेच्छसि ।

दुर्योधनस्तव सुतः शमं गच्छतु पाण्डवैः ॥ २३ ॥

राजन्! यदि तुम चाहते हो कि समस्त कौरव यहाँ जीवित रहें तो तुम्हारा पुत्र दुर्योधन पाण्डवोंसे मेल करके शान्तिपूर्वक रहे ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि सुरभ्युपाख्याने नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें सुरभि- उपाख्यानविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

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दशमोऽध्यायः व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना धृतराष्ट्रउवाच

एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि नो मुने ।

अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- महाप्राज्ञ मुने! आप जैसा कहते हैं, यही ठीक है । मैं भी इसे ही ठीक मानता हूँ तथा ये सब राजालोग भी इसीका अनुमोदन करते हैं ॥ १ ॥

भवांश्च मन्यते साधु यत् कुरूणां महोदयम् ।

तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने ॥ २ ॥

मुने! आप भी वही उत्तम मानते हैं जो कुरुवंशके महान् अभ्युदयका कारण है । मुने! यही बात विदुर, भीष्म और द्रोणाचार्यने भी मुझे कही है ॥ २ ॥

यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि ।

अन्वशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम ॥ ३ ॥

यदि आपका मुझपर अनुग्रह है और यदि कौरव- कुलपर आपकी दया है तो आप मेरे दुरात्मा पुत्र दुर्योधनको स्वयं ही शिक्षा दीजिये ॥ ३ ॥

व्यास उवाच

अयमायाति वै राजन् मैत्रेयो भगवानृषिः ।

अन्विष्य पाण्डवान् भ्रातॄनिहैत्यस्मद्दिदृक्षया ॥ ४ ॥

व्यासजीने कहा — राजन्! ये महर्षि भगवान् मैत्रेय आ रहे हैं । पाँचों पाण्डवबन्धुओंसे मिलकर अब ये हमलोगोंसे मिलनेके लिये यहाँ आते हैं ॥ ४ ॥

एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन् महानृषिः ।

अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च ॥ ५ ॥

महाराज! ये महर्षि ही इस कुलकी शान्तिके लिये तुम्हारे पुत्र दुर्योधनको यथायोग्य शिक्षा देंगे ॥ ५ ॥

ब्रूयाद् यदेष कौरव्य तत् कार्यमविशङ्कया ।

अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुषा ॥ ६ ॥

कुरुनन्दन! मैत्रेय जो कुछ कहें, उसे निःशंक होकर करना चाहिये । यदि उनके बताये हुए कार्यकी अवहेलना की गयी तो वे कुपित होकर तुम्हारे पुत्रको शाप दे देंगे ॥ ६ ॥

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वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ययौ व्यासो मैत्रेयः प्रत्यदृश्यत ।

पूजया प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर व्यासजी चले गये और मैत्रेयजी आते हुए दिखायी दिये । राजा धृतराष्ट्रने पुत्रसहित उनकी अगवानी की और स्वागत-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया ॥ ७ ॥

अर्ध्याद्याभिः क्रियाभिर्वै विश्रान्तं मुनिसत्तमम् ।

प्रश्रयेणाब्रवीद् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ८ ॥

पाद्य, अर्घ्य आदि उपचारोंद्वारा पूजित हो जब मुनिश्रेष्ठ मैत्रेय विश्राम कर चुके, तब अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने नम्रतापूर्वक पूछा— ॥ ८ ॥

सुखेनागमनं कच्चिद् भगवन् कुरुजाङ्गलान् ।

कच्चित् कुशलिनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ॥ ९ ॥

‘ भगवन्! इस कुरुदेशमें आपका आगमन सुख - पूर्वक तो हुआ है न? वीर भ्राता पाँचों पाण्डव तो कुशलसे हैं न? ॥ ९ ॥

समये स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च भरतर्षभाः ।

कच्चित् कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति ॥ १० ॥

‘ क्या वे भरतश्रेष्ठ पाण्डव अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहना चाहते हैं? क्या कौरवोंमें उत्तम भ्रातृभाव अखण्ड बना रहेगा? ' ॥ १० ॥

मैत्रेय उवाच

तीर्थयात्रामनुक्रामन् प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलान् ।

यदृच्छया धर्मराजं 'दृष्टवान् काम्यके वने ॥ ११ ॥

मैत्रेयजीने कहा — राजन्! मैं तीर्थयात्राके प्रसंगसे घूमता हुआ अकस्मात् कुरुजांगल देशमें चला आया हूँ । काम्यकवनमें धर्मराज युधिष्ठिरसे भी मेरी भेंट हुई थी ॥ ११ ॥

तं जटाजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम् ।

समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो ॥ १२ ॥

प्रभो! जटा और मृगचर्म धारण करके तपोवनमें निवास करनेवाले उन महात्मा धर्मराजको देखनेके लिये वहाँ बहुत- से मुनि पधारे थे ॥ १२ ॥

तत्राश्रौषं महाराज पुत्राणां तव विभ्रमम् ।

अनयं द्यूतरूपेण महाभयमुपस्थितम् ॥ १३ ॥

महाराज! वहीं मैंने सुना कि तुम्हारे पुत्रोंकी बुद्धि भ्रान्त हो गयी है । वे द्यूतरूपी अनीतिमें प्रवृत्त हो गये और इस प्रकार जूएके रूपमें उनके ऊपर बड़ा भारी भय उपस्थित हो गया है ॥ १३ ॥