वृत्रवधोपाख्यान : अधर्म के विनाश हेतु सबसे पहले किसका अन्त आवश्यक है?

तपस्या और धर्म की रक्षा

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 101 · पृष्ठ 722–727

लोमश ने राजा से कहा

अधर्म के विरुद्ध शक्ति सञ्चय और धर्म की रक्षा का महत्व समझाने हेतु

लोमशजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्र बलवान् देवताओंसे सुरक्षित हो वृत्रासुरके पास गये। वह असुर भूलोक और आकाशको घेरकर खड़ा था। कालकेय नामवाले विशालकाय दैत्य, जो हाथोंमें हथियार लिये होने के कारण शृङ्गयुक्त पर्वतों के समान जान पड़ते थे, चारों ओर से उसकी रक्षा कर रहे थे। ततो युद्धं समभवद् देवानां दानवैः सह। इन्द्र के आते ही देवताओं का दानवों के साथ दो घड़ी तक बड़ा भीषण युद्ध हुआ जो तीनों लोकों को त्रसा करने वाला था। वीरों की भुजाओं के साथ उठे हुए खड्ग शत्रु के शरीरों पर पड़ते और विपक्षी योद्धाओं के घातक प्रहारों से टूटकर चूर-चूर हो जाते थे; उस समय उनका अत्यन्त भयङ्कर शब्द सुन पड़ता था। अपने मूल स्थान से टूटकर गिरे हुए ताल-फलों के समान आकाश से गिरते हुए योद्धाओं के मस्तकों द्वारा वहाँ की भूमि आच्छादित दिखाई देती थी।

कालकेयों ने सोने के कवच धारण करके हाथों में परिघ लिये देवताओं पर धावा किया। उस समय वे दानव दावानल से दग्ध हुए पर्वतों की भाँति दिखाई देते थे। उनके वेगशाली आक्रमण का वेग देवताओं के लिए असह्य हो गया और वे अपने दल से बिछुड़कर भय से भागने लगे। देवताओं को डरकर भागते देख वृत्रासुर की प्रगतिका अनुमान करके सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र पर महान् मोह छा गया। इन्द्र को इस प्रकार मोहाच्छन्न देखते हुए सनातन भगवान विष्णु ने उनका बल बढ़ाते हुए उनमें अपना तेज स्थापित कर दिया। देवताओं ने देखा कि इन्द्र भगवान विष्णु के द्वारा सुरक्षित हो गये हैं, तब उन सबने तथा शुद्ध अन्तःकरण वाले ब्रह्मर्षियों ने भी देवराज इन्द्र में अपना-अपना तेज भर दिया।

विष्णुना गोपितं शक्रं दृष्ट्वा देवगणास्ततः ।
सर्वे तेजः समादध्युस्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥

देवताओंने देखा इन्द्र भगवान् विष्णुके द्वारा सुरक्षित हो गये हैं, तब उन सबने तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले ब्रह्मर्षियोंने भी देवराज इन्द्रमें अपना- अपना तेज भर दिया ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 101 · श्लोक 11पृष्ठ 725

देवताओंसहित श्रीविष्णु तथा महाभाग महर्षियों के तेज से परिपूर्ण होकर देवराज इन्द्र अत्यन्त बलशाली हो गये। देवेश्वर इन्द्र को बल से सम्पन्न जान वृत्रासुर ने बड़ी विकट गर्जना की। उसके सिंहनाद से भूलोक, सम्पूर्ण दिशाएँ, आकाश, स्वर्गलोक तथा पर्वत सब-के-सब काँप उठे। उस अत्यन्त भयानक गर्जना को सुनकर देवराज इन्द्र बहुत सन्तप्त हो उठे और भयभीत होकर उन्होंने बड़ी उतावली के साथ वृत्रासुर के वध के लिये अपने महान् वज्र का प्रहार किया। इन्द्र के वज्र से आहत होकर सुवर्णमालाधारी वह महान् असुर पूर्वकाल में भगवान विष्णु के हाथ से छूटे हुए महान् पर्वत मन्दर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा।

स शक्रवज्राभिहतः पपात महासुरः काञ्चनमाल्यधारी ।
यथा महाशैलवरः पुरस्तात् स मन्दरो विष्णुकराद् विमुक्तः ॥

इन्द्रके वज्रसे आहत होकर सुवर्णमालाधारी वह महान् असुर पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए महान् पर्वत मन्दरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 101 · श्लोक 15पृष्ठ 726

महादैत्य वृत्र के मारे जाने पर भी इन्द्र भय से पीड़ित होकर तालाब में प्रवेश करने दौड़े। उन्हें भय के कारण यह विश्वास नहीं हो रहा था कि वज्र उनके हाथ से छूट चुका है और वृत्रासुर भी अवश्य मारा गया है। उस समय सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। महर्षिगण भी हर्षोल्लास में भरकर इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे। तत्पश्चात् सब देवताओं ने मिलकर वृत्रासुर के वध से सन्तप्त हुए समस्त दैत्यों को तुरन्त मार भगाया। सङ्गठित देवताओं द्वारा त्रास दिये जाने पर वे सब दैत्य भय से आतुर होकर समुद्र में ही प्रवेश कर गये।

सर्वे च देवा मुदिताः प्रहृष्टा महर्षयश्चेन्द्रमभिष्टुवन्तः ।
सर्वांश्च दैत्यांस्त्वरिताः समेत्य जघ्नुः सुरा वृत्रवधाभितप्तान् ॥

उस समय सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। महर्षिगण भी हर्षोल्लास में भरकर इन्द्रदेवकी स्तुति करने लगे । तत्पश्चात् सब देवताओंने मिलकर वृत्रासुरके वधसे संतप्त हुए समस्त दैत्योंको तुरंत मार भगाया ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 101 · श्लोक 17पृष्ठ 726

मत्स्यों और मगरों से भरे हुए उस अपार महासागर में प्रविष्ट होकर वे सम्पूर्ण दानव तीनों लोकों का नाश करने के लिये बड़े गर्व से एक साथ मन्त्रणा करने लगे। उनमें से कुछ दैत्य, जो अपनी बुद्धि के निश्चय को स्पष्ट रूप से जानने वाले थे, जगत के विनाश के लिये उपयोगी विभिन्न उपायों का वर्णन करने लगे। उन्होंने निश्चय किया कि जो लोग विद्वान् और तपस्वी हों, सबसे पहले उन्हीं का विनाश करना चाहिये क्योंकि सम्पूर्ण लोग तप से ही टिके हुए हैं। अतः तुम सब लोग तपस्या के विनाश के लिये शीघ्रतापूर्वक कार्य करो। भूमण्डल में जो कोई भी तपस्वी, धर्मज्ञ एवं उन्हें जानने-मानने वाले लोग हों, उन सबका तुरन्त वध कर डालो; क्योंकि उनके नष्ट होने पर सारा जगत् नष्ट हो जायेगा। इस प्रकार बुद्धि और विचार से हीन वे समस्त दैत्य संसार के विनाश की बात सोचकर अत्यन्त हर्ष का अनुभव करने लगे और उत्ताल तरङ्गों से भरे हुए वरुण के निवास स्थान रत्नाकर समुद्र रूप दुर्ग का आश्रय लेकर उसमें निर्भय होकर रहने लगे।

तेषां तु तत्र क्रमकालयोगाद् घोरा मतिश्चिन्तयतां बभूव ।
ये सन्ति विद्यातपसोपपन्ना- स्तेषां विनाशः प्रथमं तु कार्यः ॥

लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते तस्मात् त्वरध्वं तपसः क्षयाय ।
ये सन्ति केचिच्च वसुंधरायां तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः ॥

तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव तेषु प्रणष्टेषु जगत् प्रणष्टम् ।
एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः ॥

दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं रत्नाकरं वरुणस्यालयं स्म ॥

कि जो लोग विद्वान् और तपस्वी हों, सबसे पहले उन्हींका विनाश करना चाहिये । सम्पूर्ण लोग तपसे ही टिके हुए हैं । अतः तुम सब लोग तपस्याके विनाशके लिये शीघ्रतापूर्वक कार्य करो । भूमण्डलमें जो कोई भी तपस्वी, धर्मज्ञ एवं उन्हें जानने - माननेवाले लोग हों, उन सबका तुरंत वध कर डालो । उनके नष्ट होनेपर सारा जगत् नष्ट हो जायगा । इस प्रकार बुद्धि और विचारसे हीन वे समस्त दैत्य संसारके विनाशकी बात सोचकर अत्यन्त हर्षका अनुभव करने लगे । उत्ताल तरंगों से भरे हुए वरुणके निवासस्थान रत्नाकर समुद्ररूप दुर्गका आश्रय लेकर वे उसमें निर्भय होकर रहने लगे ।

महाभारत · वनपर्व · तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 101 · श्लोक 20–23पृष्ठ 727

In English

Indra's battle with Vritrasura

Indra fights Vritrasura and the Kalakeya demons to protect the gods. After Vishnu, the gods, and the sages infuse Indra with their strength, Indra kills Vritrasura with his vajra. The surviving demons retreat into the ocean and plan to destroy the world by killing scholars and ascetics.

This page answers

  • How did indra kill vritrasura?
  • Who helped indra gain strength against vritrasura?
  • What was the plan of the demons after vritrasura died?
  • Who were the kalakeya demons?

Also written: Vritravadhopakhyana, Vritravadha, Indra, Vritrasura, Kalakeya, Maharshi, वृत्रवधोपाख्यान