श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 721–730

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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विभिन्न स्थानोंमें अधिक शोभा पानेवाला महर्षि दधीचका वह मनोरम आश्रम स्वर्गके

समान प्रतीत होता था । देवता लोग वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥

तत्रापश्यन् दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् ।

जाज्वल्यमानं वपुषा यथा लक्ष्म्या पितामहम् ॥ १ ९ ॥

उन्होंने देखा, महर्षि दधीच भगवान् सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं । अपने शरीरकी दिव्य कान्तिसे साक्षात् ब्रह्माजीके समान जान पड़ते हैं ॥ १ ९ ॥

तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च ।

अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ २० ॥

राजन्! उस समय सब देवताओंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन एवं प्रणाम करके ब्रह्माजीने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनसे वर माँगा ॥ २० ॥

ततो दधीचः परमप्रतीतः सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच । करोमि यद् वो हितमद्य देवाः स्वं चापि देहं स्वयमुत्सृजामि ॥ २१ ॥

तब महर्षि दधीचने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओंसे इस प्रकार कहा — ' देवगण! आज मैं वही करूँगा, जिससे आपलोगोंका हित हो । अपने इस शरीरको मैं

पृष्ठ 722

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स्वयं ही त्याग देता हूँ ' ॥ २१ ॥

स एवमुक्त्वाद्विपदां वरिष्ठः

प्राणान् वशी स्वान् सहसोत्ससर्ज ।

ततः सुरास्ते जगृहुः परासो- रस्थीनि तस्याथ यथोपदेशम् ॥ २२ ॥

ऐसा कहकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ, जितेन्द्रिय महर्षि दधीचने सहसा अपने प्राणोंका त्याग कर दिया । तब देवताओंने ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार महर्षिके निर्जीव शरीरसे हड्डियाँ ले लीं ॥ २२ ॥

प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवा- स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचुः । त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् ॥ २३ ॥

चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टः । अनेन वज्रप्रवरेण देव भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ॥ २४ ॥

इसके बाद वे हर्षोल्लाससे भरकर विजयकी आशा लिये त्वष्टा प्रजापतिके पास आये और उनसे अपना प्रयोजन बताया । देवताओंकी बात सुनकर त्वष्टा प्रजापति बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने एकाग्रचित्त हो प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण किया । तत्पश्चात् वे -हर्षमें भरकर इन्द्रसे बोले – ' देव! इस उत्तम वज्रसे आप आज ही भयंकर देवद्रोही वृत्रासुरको भस्म कर डालिये ॥ ततो हतारिः सगणः सुखं वै प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः । त्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरंदरस्तद् वज्रं प्रहृष्टः प्रयतो ह्यगृह्णात् ॥ २५ ॥

‘ इस प्रकार शत्रुके मारे जानेपर आप देवगणोंके साथ स्वर्गमें रहकर सुखपूर्वक सम्पूर्ण स्वर्गका शासन एवं पालन कीजिये । ' त्वष्टा प्रजापतिके ऐसा कहनेपर इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शुद्धचित्त होकर उनके हाथसे वह वज्र ले लिया ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वज्रनिर्माणकथने शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वज्रनिर्माणकथनविषयक सौवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १०० ॥

पृष्ठ 723

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पृष्ठ 724

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एकाधिकशततमोऽध्यायः वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा लोमशउवाच

ततः स वज्री बलिभिर्दैवतैरभिरक्षितः ।

आससाद ततो वृत्रं स्थितमावृत्य रोदसी ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्र बलवान् देवताओंसे सुरक्षित हो

वृत्रासुरके पास गये । वह असुर भूलोक और आकाशको घेरकर खड़ा था ॥ १ ॥

कालकेयैर्महाकायैः समन्तादभिरक्षितम् ।

समुद्यतप्रहरणैः सशृङ्गेरिव पर्वतैः ॥ २ ॥

कालकेय नामवाले विशालकाय दैत्य, जो हाथोंमें हथियार लिये होनेके कारण शृंगयुक्त पर्वतोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे उसकी रक्षा कर रहे थे ॥

ततो युद्धं समभवद् देवानां दानवैः सह ।

मुहूर्तं भरतश्रेष्ठ लोकत्रासकरं महत् ॥ ३ ॥

भरतश्रेष्ठ! इन्द्रके आते ही देवताओंका दानवोंके साथ दो घड़ीतक बड़ा भीषण युद्ध हुआ जो तीनों लोकोंको त्रसा करनेवाला था ॥ ३ ॥

उद्यतप्रतिपिष्टानां खड्गानां वीरबाहुभिः ।

आसीत् सुतुमुलः शब्दः शरीरेष्वभिपात्यताम् ॥ ४ ॥

वीरोंकी भुजाओंके साथ उठे हुए खड्ग शत्रुके शरीरोंपर पड़ते और विपक्षी योद्धओंके घातक प्रहारोंसे टूटकर चूर- चूर हो जाते थे, उस समय उनका अत्यन्त भयंकर शब्द सुन पड़ता था ॥ ४ ॥

शिरोभिः प्रपतद्भिश्चाप्यन्तरिक्षान्महीतलम् ।

तालैरिव महाराज वृन्ताद् भ्रष्टैरदृश्यत ॥ ५ ॥

महाराज! अपने मूल स्थानसे टूटकर गिरे हुए ताल- फलोंके समान आकाशसे गिरते हुए योद्धाओंके मस्तकों द्वारा वहाँकी भूमि आच्छादित दिखायी देती थी ॥ ५ ॥

ते हेमकवचा भूत्वा कालेयाः परिघायुधाः ।

त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवाद्रयः ॥ ६ ॥

कालकेयोंने सोनेके कवच धारण करके हाथोंमें परिघ लिये देवताओंपर धावा किया ।

उस समय वे दानव दावानलसे दग्ध हुए पर्वतोंकी भाँति दिखायी देते थे ॥

तेषां वेगवतां वेगं साभिमानं प्रधावताम् ।

न शेकुस्त्रिदशाः सोढुं ते भग्नाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 725

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अभिमानपूर्वक आक्रमण करनेवाले उन वेगशाली दैत्योंका वेग देवताओंके लिये असह्य हो गया । वे अपने दलसे बिछुड़कर भयसे भागने लगे ॥ ७ ॥

तान् दृष्ट्वा द्रवतो भीतान् सहस्राक्षः पुरंदरः ।

वृत्रे विवर्धमाने च कश्मलं महदाविशत् ॥ ८ ॥

देवताओंको डरकर भागते देख वृत्रासुरकी प्रगतिका अनुमान करके सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्रपर महान् मोह छा गया ॥ ८ ॥

कालेयभयसंत्रस्तो देवः साक्षात् पुरंदरः ।

जगाम शरणं शीघ्रं तं तु नारायणं प्रभुम् ॥९ ॥

कालेयोंके भयसे त्रस्त हुए साक्षात् इन्द्रदेवने सर्व-शक्तिमान् भगवान् नारायणकी शीघ्रतापूर्वक शरण ली ॥

तं शक्रं कश्मलाविष्टं दृष्ट्वा विष्णुः सनातनः ।

स्वतेजो व्यदधाच्छक्रे बलमस्य विवर्धयन् ॥ १० ॥

इन्द्रको इस प्रकार मोहाच्छन्न होते देख सनातन भगवान् विष्णुने उनका बल बढ़ाते हुए उनमें अपना तेज स्थापित कर दिया ॥ १० ॥

विष्णुना गोपितं शक्रं दृष्ट्वा देवगणास्ततः ।

सर्वे तेजः समादध्युस्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ११ ॥

देवताओंने देखा इन्द्र भगवान् विष्णुके द्वारा सुरक्षित हो गये हैं, तब उन सबने तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले ब्रह्मर्षियोंने भी देवराज इन्द्रमें अपना- अपना तेज भर दिया ॥ ११ ॥

स समाप्यायितः शक्रो विष्णुना दैवतैः सह ।

ऋषिभिश्च महाभागैर्बलवान् समपद्यत ॥ १२ ॥

ज्ञात्वा बलस्थं त्रिदशाधिपं तु ननाद वृत्रो महतो निनादान् । तस्य प्रणादेन धरा दिशश्च खं द्यौर्नगाश्चापि चचाल सर्वम् ॥ १३ ॥

देवताओंसहित श्रीविष्णु तथा महाभाग महर्षियोंके तेजसे परिपूर्ण हो देवराज इन्द्र अत्यन्त बलशाली हो गये । देवेश्वर इन्द्रको बलसे सम्पन्न जान वृत्रासुरने बड़ी विकट गर्जना की । उसके सिंहनादसे भूलोक, सम्पूर्ण दिशाएँ, आकाश, स्वर्गलोक तथा पर्वत सब - के - सब काँप उठे ॥ १२-१३ ॥ ततो महेन्द्रः परमाभितप्तः श्रुत्वा रवं घोररूपं महान्तम् । भये निमग्नस्त्वरितो मुमोच वज्रं महत् तस्य वधाय राजन् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 726

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 726 का मूल पृष्ठ
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राजन्! उस समय उस अत्यन्त भयानक गर्जनाको सुनकर देवराज इन्द्र बहुत संतप्त हो उठे और भयभीत होकर उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ वृत्रासुरके वधके लिये अपने महान् वज्रका प्रहार किया ॥ १४ ॥

स शक्रवज्राभिहतः पपात महासुरः काञ्चनमाल्यधारी । यथा महाशैलवरः पुरस्तात् स मन्दरो विष्णुकराद् विमुक्तः ॥ १५ ॥

इन्द्रके वज्रसे आहत होकर सुवर्णमालाधारी वह महान् असुर पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए महान् पर्वत मन्दरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १५ ॥

तस्मिन् हते दैत्यवरे भयार्तः शक्रः प्रदुद्राव सरः प्रवेष्टुम् । वज्रं स मेने न कराद् विमुक्तं वृत्रं भयाच्चापि हतं न मेने ॥ १६ ॥

महादैत्य वृत्रके मारे जानेपर भी इन्द्र भयसे पीड़ित हो (छिपनेकी इच्छासे ) तालाबमें प्रवेश करने दौड़े । उन्हें भयके कारण यह विश्वास नहीं होता था कि वज्र मेरे हाथसे छूट चुका है और वृत्रासुर भी अवश्य मारा गया है ॥ १६ ॥

सर्वे च देवा मुदिताः प्रहृष्टा महर्षयश्चेन्द्रमभिष्टुवन्तः । सर्वांश्च दैत्यांस्त्वरिताः समेत्य जघ्नुः सुरा वृत्रवधाभितप्तान् ॥ १७ ॥

उस समय सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। महर्षिगण भी हर्षोल्लास में भरकर इन्द्रदेवकी स्तुति करने लगे । तत्पश्चात् सब देवताओंने मिलकर वृत्रासुरके वधसे संतप्त हुए समस्त दैत्योंको तुरंत मार भगाया ॥ १७ ॥

तैस्त्रास्यमानास्त्रिदशैः समेतैः समुद्रमेवाविविशुर्भयार्ताः । प्रविश्य चैवोदधिमप्रमेयं झषाकुलं नक्रसमाकुलं च ॥ १८ ॥

तदा स्म मन्त्रं सहिताः प्रचक्रु- स्त्रैलोक्यनाशार्थमभिस्मयन्तः ।

तत्र स्म केचिन्मतिनिश्चयज्ञा- स्तांस्तानुपायानुपवर्णयन्ति ॥ १ ९ ॥

संगठित देवताओंद्वारा त्रास दिये जानेपर वे सब दैत्य भयसे आतुर हो समुद्रमें ही प्रवेश कर गये । मत्स्यों और मगरोंसे भरे हुए उस अपार महासागरमें प्रविष्ट हो वे सम्पूर्ण दानव

पृष्ठ 727

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 727 का मूल पृष्ठ
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तीनों लोकोंका नाश करनेके लिये बड़े गर्वसे एक साथ मन्त्रणा करने लगे । उनमेंसे कुछ दैत्य जो अपनी बुद्धिके निश्चयको स्पष्टरूपसे जाननेवाले थे; ( जगत्के विनाशके लिये ) उपयोगी विभिन्न उपायोंका वर्णन करने लगे ॥ १८-१९ ॥ तेषां तु तत्र क्रमकालयोगाद्

घोरा मतिश्चिन्तयतां बभूव ।

ये सन्ति विद्यातपसोपपन्ना- स्तेषां विनाशः प्रथमं तु कार्यः ॥ २० ॥

लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते तस्मात् त्वरध्वं तपसः क्षयाय । ये सन्ति केचिच्च वसुंधरायां तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः ॥ २१ ॥

तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव तेषु प्रणष्टेषु जगत् प्रणष्टम् । एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः ॥ २२ ॥

दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं रत्नाकरं वरुणस्यालयं स्म ॥ २३ ॥

वहाँ क्रमशः दीर्घकालतक उपायचिन्तनमें लगे हुए उन असुरोंने यह घोर निश्चय किया कि जो लोग विद्वान् और तपस्वी हों, सबसे पहले उन्हींका विनाश करना चाहिये । सम्पूर्ण लोग तपसे ही टिके हुए हैं । अतः तुम सब लोग तपस्याके विनाशके लिये शीघ्रतापूर्वक कार्य करो । भूमण्डलमें जो कोई भी तपस्वी, धर्मज्ञ एवं उन्हें जानने - माननेवाले लोग हों, उन सबका तुरंत वध कर डालो । उनके नष्ट होनेपर सारा जगत् नष्ट हो जायगा । इस प्रकार बुद्धि और विचारसे हीन वे समस्त दैत्य संसारके विनाशकी बात सोचकर अत्यन्त हर्षका अनुभव करने लगे । उत्ताल तरंगों से भरे हुए वरुणके निवासस्थान रत्नाकर समुद्ररूप दुर्गका आश्रय लेकर वे उसमें निर्भय होकर रहने लगे ॥ २०–२३ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वृत्रवधोपाख्याने एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वृत्रवधोपाख्यानविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥

पृष्ठ 728

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द्वयधिकशततमोऽध्यायः कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति लोमशउवाच

समुद्रं ते समाश्रित्य वारुणं निधिमम्भसः ।

कालेयाः सम्प्रवर्तन्त त्रैलोक्यस्य विनाशने ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं - राजन्! वरुणके निवासस्थान जलनिधि समुद्रका आश्रय लेकर कालेय नामक दैत्य तीनों लोकोंके विनाश- कार्यमें लग गये ॥ १ ॥

ते रात्रौ समभिक्रुद्धा भक्षयन्ति सदा मुनीन् ।

आश्रमेषु च ये सन्ति पुण्येष्वायतनेषु च ॥ २ ॥

वे सदा रातमें कुपित होकर आते और आश्रमों तथा पुण्य- स्थानोंमें जो निवास करते थे उन मुनियोंको खा जाते थे ॥ २ ॥

वसिष्ठस्याश्रमे विप्रा भक्षितास्तैर्दुरात्मभिः ।

अशीतिः शतमष्टौ च नव चान्ये तपस्विनः ॥ ३ ॥

उन दुरात्माओंने वसिष्ठके आश्रममें निवास करनेवाले एक सौ अट्ठासी ब्राह्मणों तथा नौ दूसरे तपस्वियोंको अपना आहार बना लिया ॥ ३ ॥

च्यवनस्याश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजनिषेवितम् ।

फलमूलाशनानां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ॥ ४ ॥

च्यवन मुनिके पवित्र आश्रममें, जहाँ बहुत- से द्विज निवास करते थे, जाकर उन दैत्योंने फल - मूलका आहार करनेवाले सौ मुनियोंका भक्षण कर लिया ॥ ४ ॥

एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चार्णवं दिवा ।

भरद्वाजाश्रमे चैव नियता ब्रह्मचारिणः ॥ ५ ॥

वाय्वाहाराम्बुभक्षाश्च विंशतिः संनिषूदिताः ।

एवं क्रमेण सर्वांस्तानाश्रमान् दानवास्तदा ॥ ६ ॥

निशायां परिबाधन्ते मत्ता भुजबलाश्रयात् ।

कालोपसृष्टाः कालेया घ्नन्तो द्विजगणान् बहून् ॥ ७ ॥

न चैनानन्वबुध्यन्त मनुजा मनुजोत्तम ।

एवं प्रवृत्तान् दैत्यांस्तांस्तापसेषु तपस्विषु ॥ ८ ॥

इस प्रकार वे रातमें तपस्वी मुनियोंका संहार करते और दिनमें समुद्रके जलमें प्रवेश कर जाते थे । भरद्वाज मुनिके आश्रममें वायु और जल पीकर संयम- नियमके साथ रहनेवाले

पृष्ठ 729

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बीस ब्रह्मचारियोंको कालेयोंने कालके गालमें डाल दिया । इस तरह क्रमशः सभी आश्रमोंमें जाकर अपने बाहुबलके भरोसे उन्मत्त रहनेवाले दानव रातमें वहाँके निवासियोंको सर्वथा कष्ट पहुँचाया करते थे । नरश्रेष्ठ! कालेय दानव कालके अधीन हो रहे थे; इसीलिये वे असंख्य ब्राह्मणोंकी हत्या करते चले जा रहे थे । मनुष्योंको उनके इस षड्यन्त्रका पता नहीं लगता था । इस प्रकार वे तपस्याके धनी तापसोंके संहारमें प्रवृत्त हो रहे थे ॥ ५–८ ॥

प्रभाते समदृश्यन्त नियताहारकर्शिताः ।

महीतलस्था मुनयः शरीरैर्गतजीवितैः ॥ ९ ॥

प्रातःकाल आनेपर नियमित आहारसे दुर्बल मुनिगण अपने अस्थिमात्रावशिष्ट निष्प्राण शरीरोंसे पृथ्वीपर पड़े दिखायी देते थे ॥ ९ ॥

क्षीणमांसैर्विरुधिरैर्विमज्जान्त्रैर्विसंधिभिः ।

आकीर्णेराबभौ भूमिः शङ्खानामिव राशिभिः ॥ १० ॥

राक्षसोंके द्वारा भक्षण करनेके कारण उनके शरीरोंका मांस तथा रक्त क्षीण हो चुका था । वे मज्जा, आँतें और संधिस्थानों ( घुटने आदि) से रहित हो गये थे । इस तरह सब ओर फैली हुई सफेद हड्डियोंके कारण वहाँकी भूमि शंखराशिसे आच्छादित-सी प्रतीत होती थी ॥ १० ॥

कलशैर्विप्रविद्धैश्च स्रुवैर्भग्नैस्तथैव च ।

विकीर्णैरग्निहोत्रैश्च भूर्बभूव समावृता ॥ ११ ॥

उलटे-पुलटे पड़े हुए कलशों, टूटे -फूटे स्रुवों तथा बिखरी पड़ी हुई अग्निहोत्रकी सामग्रियोंसे उन आश्रमोंकी भूमि आच्छादित हो रही थी ॥ ११ ॥

निःस्वाध्यायवषट्कारं नष्टयज्ञोत्सवक्रियम् ।

जगदासीन्निरुत्साहं कालेयभयपीडितम् ॥ १२ ॥

स्वाध्याय और वषट्त्कार बंद हो गये । यज्ञोत्सव आदि कार्य नष्ट हो गये । कालेयोंके भयसे पीड़ित हुए सम्पूर्ण जगत्में कहीं कोई उत्साह नहीं रह गया था ॥

एवं संक्षीयमाणाश्च मानवा मनुजेश्वर ।

आत्मत्राणपराभीताः प्राद्रवन्त दिशो भयात् ॥ १३ ॥

नरेश्वर! इस प्रकार दिन -दिन नष्ट होनेवाले मनुष्य भयभीत हो अपनी रक्षाके लिये चारों दिशाओंमें भाग गये ॥ १३ ॥

केचिद् गुहाः प्रविविशुर्निर्झरांश्चापरे तथा ।

अपरे मरणोद्विग्ना भयात् प्राणान् समुत्सृजन् ॥ १४ ॥

कुछ लोग गुफाओंमें जा छिपे । कितने ही मानव झरनोंके आस- पास रहने लगे और कितने ही मनुष्य मृत्युसे इतने घबरा गये कि भयसे ही उनके प्राण निकल गये ॥ १४ ॥

केचिदत्र महेष्वासाः शूराः परमहर्षिताः ।

मार्गमाणाः परं यत्नं दानवानां प्रचक्रिरे ॥ १५ ॥

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इस भूतलपर कुछ महान् धनुर्धर शूरवीर भी थे, जो अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे युक्त हो दानवोंके स्थानका पता लगाते हुए उनके दमनके लिये भारी प्रयत्न करने लगे ॥ १५ ॥

न चैतानधिजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् ।

श्रमं जग्मुश्च परममाजग्मुः क्षयमेव च ॥ १६ ॥

परंतु समुद्रमें छिपे हुए दानवोंको वे पकड़ नहीं पाते। उन्होंने बहुत परिश्रम किया और अन्तमें थककर वे पुनः अपने घरको ही लौट आये ॥ १६ ॥

जगत्युपशमं याते नष्टयज्ञोत्सवक्रिये ।

आजग्मुः परमामार्तिं त्रिदशा मनुजेश्वर ॥ १७ ॥

मनुजेश्वर! यज्ञोत्सव आदि कार्योंके नष्ट हो जानेपर जब जगत्का विनाश होने लगा, तब देवताओंको बड़ी पीड़ा हुई ॥ १७ ॥

समेत्य समहेन्द्राश्च भयान्मन्त्रं प्रचक्रिरे ।

शरण्यं शरणं देवं नारायणमजं विभुम् ॥ १८ ॥

तेऽभिगम्य नमस्कृत्य वैकुण्ठमपराजितम् ।

ततो देवाः समस्तास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥ १ ९ ॥

इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर भयसे मुक्त होनेके लिये मन्त्रणा की । फिर वे समस्त देवता सबको शरण देनेवाले, शरणागतवत्सल, अजन्मा एवं सर्वव्यापी, अपराजित वैकुण्ठनाथ भगवान् नारायणदेवकी शरणमें गये और नमस्कार करके उन मधुसूदनसे बोले - - ||

त्वं नः स्रष्टा च भर्ता च हर्ता च जगतः प्रभो ।

त्वया सृष्टमिदं विश्वं यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ २० ॥

‘ प्रभो! आप ही हमारे स्रष्टा और पालक हैं । आप ही सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेवाले हैं । इस स्थावर और जंगम सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि आपने ही की है ॥

त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात् पुष्करेक्षण ।

वाराहं वपुराश्रित्य जगदर्थे समुद्धृता ॥ २१ ॥

‘ कमलनयन! पूर्वकालमें आपने वाराहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये समुद्रके जलसे इस खोयी हुई पृथ्वीका उद्धार किया था ॥ २१ ॥

आदिदैत्यो महावीयों हिरण्यकशिपुः पुरा ।

नारसिंहं वपुः कृत्वा सूदितः पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥

' पुरुषोत्तम! प्राचीनकालमें आपने ही नृसिंह- शरीर धारण करके महापराक्रमी आदिदैत्य हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ २२ ॥

अवध्यः सर्वभूतानां बलिश्चापि महासुरः ।

वामनं वपुराश्रित्य त्रैलोक्याद् भ्रंशितस्त्वया ॥ २३ ॥