च्यवनोपाख्यान : अमूल्य आध्यात्मिक मूल्यों का विनिमय किस प्रकार सम्भव है?

आध्यात्मिक मूल्य और गौ-दान

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 50–51 · पृष्ठ 505–520

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

गौओं के माहात्म्य और धर्म की जिज्ञासा हेतु

युधिष्ठिर ने पूछा— "पितामह! किसी को देखने और उसके साथ रहने पर कैसा स्नेह होता है? तथा गौओं का माहात्म्य क्या है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।"

युधिष्ठिर उवाच

दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह ।
महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! किसीको देखने और उसके साथ रहनेपर कैसा स्नेह होता है? तथा गौओंका माहात्म्य क्या है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 50 · श्लोक 1पृष्ठ 507

भीष्मजी बोले— "महातेजस्वी नरेश! इस विषय में मैं तुमसे महर्षि च्यवन और नहुष के संवाद रूप प्राचीन इतिहास का वर्णन करूँगा। भरतश्रेष्ठ! पूर्वकाल की बात है, भृगु के पुत्र महर्षि च्यवन ने महान व्रत का आश्रय लेकर जल के भीतर रहना आरम्भ किया। वे अभिमान, क्रोध, हर्ष और शोक का परित्याग करके दृढ़तापूर्वक बारह वर्षों तक जल के भीतर रहे। शीतल किरणों वाले चन्द्रमा के समान उन शक्तिशाली मुनि ने सम्पूर्ण प्राणियों, विशेषतः सारे जलचर जीवों पर अपना परम मङ्गलकारी पूर्ण विश्वास जमा लिया था। एक समय वे देवताओं को प्रणाम कर अत्यन्त पवित्र होकर गङ्गा-यमुना के सङ्गम में जल के भीतर प्रविष्ट हुए और वहाँ काष्ठ की भाँति स्थिर भाव से बैठ गये।

भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते ।
नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ॥

भीष्मजीने कहा – महातेजस्वी नरेश! इस विषयमें मैं तुमसे महर्षि च्यवन और नहुषके संवादरूप प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 50 · श्लोक 2पृष्ठ 507

गङ्गा-यमुना का वेग बड़ा भयङ्कर था। उससे भीषण गर्जना हो रही थी। वह वेग वायु के वेग की भाँति दुःसह था, तो भी वे मुनि अपने मस्तक पर उसका आघात सहने लगे; परन्तु गङ्गा, यमुना आदि नदियाँ और सरोवर ऋषिके केवल परिक्रमा करते थे, उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाते थे। वे बुद्धिमान् महामुनि कभी पानी में काठ की भाँति सो जाते और कभी उसके ऊपर खड़े हो जाते थे। वे जलचर जीवों के बड़े प्रिय हो गये थे; जल-जन्तु प्रसन्नचित्त होकर उनका ओठ सूँघा करते थे। इस तरह उन्हें पानी में रहते बहुत दिन बीत गये।"

तदनन्तर एक समय मछलियों से जीविका चलाने वाले बहुत से मल्लाह, मछली पकड़ने का निश्चय करके जाल हाथ में लिये हुए उस स्थान पर आये। वे मल्लाह बड़े परिश्रमी, बलवान् और शौर्यसम्पन्न थे जो पानी से कभी पीछे नहीं हटते थे। वे जाल बिछाने का दृढ़ निश्चय करके आए थे। उस समय जहाँ मछलियाँ रहती थीं, उतने गहरे जल में जाकर उन्होंने अपने जाल को पूर्ण रूप से फैला दिया। मछली प्राप्त करने की इच्छा वाले केवटों ने बहुत से उपाय करके गङ्गा-यमुना के जल को जालों से आच्छादित कर दिया। उनका जाल बहुत मजबूत था और उसी को उन्होंने वहाँ जल पर बिछाया था। थोड़ी देर बाद वे सभी मल्लाह निडर होकर पानी में उतर गये। वे सभी प्रसन्न और एक-दूसरे के अधीन रहने वाले थे। उन सबने मिलकर जाल को खींचना आरम्भ किया। उस जाल में उन्होंने मछलियों के साथ ही दूसरे जल-जन्तुओं को भी बाँध लिया था।

ततस्ते बहुभिर्योगैः कैवर्ता मत्स्यकाङ्क्षिणः ।
गंगायमुनयोर्वारि जालैरभ्यकिरंस्ततः ॥

मछली प्राप्त करनेकी इच्छावाले केवटोंने बहुत से उपाय करके गंगा- यमुनाके जलको जालोंसे आच्छादित कर दिया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 50 · श्लोक 15पृष्ठ 509

जाल खींचते समय मल्लाहों ने दैवेच्छा से उस जाल के द्वारा मत्स्यों से घिरे हुए भृगु पुत्र महर्षि च्यवन को भी खींच लिया। उनका सारा शरीर नदी के सेवारसे से लिपटा हुआ था; उनकी मूँछ, दाढ़ी और जटाएँ हरे रङ्ग की हो गयी थीं और उनके अङ्गों में शङ्ख आदि जलचरों के नख लगने से चित्र बन गया था। ऐसा जान पड़ता था मानो उनके अङ्गों में शूकर के विचित्र रोम लग गये हों। वेदों के पारङ्गत उन विद्वान् महर्षि को जाल के साथ खिञ्चा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़, मस्तक झुकाकर पृथ्वी पर पड़ गये।

तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम् ।
सर्वे प्राञ्जलयो दाशाः शिरोभिः प्रापतन् भुवि ॥

वेदोंके पारंगत उन विद्वान् महर्षिको जालके साथ खिंचा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़ मस्तक झुका पृथ्वीपर पड़ गये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 50 · श्लोक 21पृष्ठ 509

उधर जाल के आकर्षण से अत्यन्त खेद, त्रास और स्थल का संस्पर्श होने के कारण बहुत-से मत्स्य मर गये। मुनि ने जब मत्स्यों का यह संहार देखा, तब उन्हें बड़ी दया आयी और वे बारम्बार लम्बी साँस खींचने लगे। यह देख निषाद बोले— "महामुने! हमने अनजान में जो पाप किया है, उसके लिये हमें क्षमा कर दें और हम पर प्रसन्न हों। साथ ही यह भी बतावें कि हम लोग आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें?"

निषादा ऊचुः अज्ञानाद् यत् कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु ।
करवाम प्रियं किं ते तन्नो ब्रूहि महामुने ॥

यह देख निषाद बोले — महामुने! हमने अनजानमें जो पाप किया है, उसके लिये हमें क्षमा कर दें और हमपर प्रसन्न हों। साथ ही यह भी बतावें कि हमलोग आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 50 · श्लोक 24पृष्ठ 510

मल्लाहों के ऐसा कहने पर मछलियों के बीच में बैठे हुए महर्षि च्यवन ने कहा— "मल्लाहो! इस समय जो मेरी सबसे बड़ी इच्छा है, उसे ध्यान देकर सुनो; मैं इन मछलियों के साथ ही अपने प्राणों का त्याग या रक्षण करूँगा। ये मेरे सहवासी रहे हैं। मैं बहुत दिनों तक इनके साथ जल में रह चुका हूँ; अतः मैं इन्हें त्याग नहीं सकता।"

प्राणोत्सर्गं विसर्गं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह ।
संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेऽध्युषितानहम् ॥

' मैं इन मछलियोंके साथ ही अपने प्राणोंका त्याग या रक्षण करूंगा । ये मेरे सहवासी रहे हैं । मैं बहुत दिनोंतक इनके साथ जलमें रह चुका हूँ; अतः मैं इन्हें त्याग नहीं सकता'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 50 · श्लोक 26पृष्ठ 510

मुनि की यह बात सुनकर निषादों को बड़ा भय हुआ। वे थर-थर काँपने लगे। उन सबके मुख का रङ्ग फीका पड़ गया और उसी अवस्थे में वे राजा नहुष के पास जाकर उन्होंने यह सारा समाचार निवेदन किया। च्यवन मुनि को ऐसी अवस्था में अपने नगर के निकट आया जान, राजा नहुष अपने पुरोहित और मन्त्रियों को साथ ले शीघ्र वहाँ पहुँचे। उन्होंने पवित्र भाव से हाथ जोड़कर और मन को एकाग्र रखते हुए न्यायोचित रीति से महात्मा च्यवन को अपना परिचय दिया।

च्यवन ने कहा— "राजन्! मछलियों से जीविका चलाने वाले इन मल्लाहों ने आज बड़े परिश्रम से मुझे अपने जाल में फँसाकर निकाला है; अतः आप इन्हें इन मछलियों के साथ-साथ मेरा भी मूल्य चुका दीजिये।"

च्यवन उवाच

श्रमेण महता युक्ताः कैवर्ता मत्स्यजीविनः ।
मम मूल्यं प्रयच्छेभ्यो मत्स्यानां विक्रयैः सह ॥

च्यवनने कहा — राजन्! मछलियोंसे जीविका चलानेवाले इन मल्लाहोंने आज बड़े परिश्रमसे मुझे अपने जालमें फँसाकर निकाला है; अतः आप इन्हें इन मछलियोंके साथ-साथ मेरा भी मूल्य चुका दीजिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 51 · श्लोक 5पृष्ठ 512

भीष्म कहते हैं— युधिष्ठिर! जब राजा नहुष ने महर्षि च्यवन का मूल्य पूछना चाहा, तो उन्होंने अपने पुरोहित से कहा— 'पुरोहितजी! भृगुनन्दन च्यवनजी जैसी आज्ञा दे रहे हैं, उसके अनुसार इन पूज्यपाद महर्षिके मूल्यके रूपमें मल्लाहोंको एक हजार अशर्फियाँ दे दीजिये।' परन्तु च्यवन मुनि अडिग थे। उन्होंने कहा— 'नरेश्वर! मैं एक हजार मुद्राओंपर बेचने योग्य नहीं हूँ। क्या आप मेरा इतना ही मूल्य समझते हैं? मेरे योग्य मूल्य दीजिये और वह मूल्य कितना होना चाहिये — यह अपनी ही बुद्धिसे विचार करके निश्चित कीजिये। मुझे एक लाख रुपयेके मूल्यमें ही सीमित न कीजिये, उचित मूल्य चुकाइये। इस विषयमें अपने मन्त्रियोंके साथ विचार कीजिये।'

च्यवन उवाच

सहस्रं नाहमर्हामि किं वा त्वं मन्यसे नृप ।
सदृशं दीयतां मूल्यं स्वबुद्ध्या निश्चयं कुरु ॥

च्यवनने कहा — नरेश्वर! मैं एक हजार मुद्राओंपर बेचने योग्य नहीं हूँ । क्या आप मेरा इतना ही मूल्य समझते हैं, मेरे योग्य मूल्य दीजिये और वह मूल्य कितना होना चाहिये — यह अपनी ही बुद्धिसे विचार करके निश्चित कीजिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 51 · श्लोक 7पृष्ठ 513

नहुष विचलित होने लगे। उन्होंने पुनः कहा— 'महातेजस्वी नरेश! मैं एक करोड़ या उससे भी अधिक मुद्राओंमें बेचने योग्य हूँ?' च्यवन ने उत्तर दिया— 'मैं एक करोड़ या उससे भी अधिक मुद्राओंमें बेचने योग्य नहीं हूँ। जो मेरे लिये उचित हो वही मूल्य दीजिये और इस विषयमें अपने ब्राह्मणों के साथ विचार कीजिये।' राजा नहुष की व्याकुलता बढ़ती गई, वे बोले— 'ब्रह्मन्! यदि ऐसी बात है तो इन मल्लाहोंको मेरा आधा या सारा राज्य दे दिया जाय। इसे ही मैं आपके लिये उचित मूल्य मानता हूँ। आप इसके अतिरिक्त और क्या चाहते हैं?' च्यवन मुनि ने शान्त स्वर में कहा— 'पृथ्वीनाथ! आपका आधा या सारा राज्य भी मेरा उचित मूल्य नहीं है। आप उचित मूल्य दीजिये और वह मूल्य आपके ध्यानमें न आता हो तो ऋषियोंके साथ विचार कीजिये।'

च्यवन उवाच

अर्धं राज्यं समग्रं च मूल्यं नार्हामि पार्थिव ।
सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभिः सह चिन्त्यताम् ॥

च्यवनने कहा — पृथ्वीनाथ! आपका आधा या सारा राज्य भी मेरा उचित मूल्य नहीं है । आप उचित मूल्य दीजिये और वह मूल्य आपके ध्यानमें न आता हो तो ऋषियोंके साथ विचार कीजिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 51 · श्लोक 13पृष्ठ 514

महर्षि के इन वचनों को सुनकर राजा नहुष दुःख से कातर हो उठे। वे अपने मन्त्री तथा पुरोहित के साथ विचार करने लगे। इसी बीच, फल-मूल खाकर जीवन व्यतीत करने वाले एक दूसरे वनवासी मुनि, जिनका जन्म गाय के पेट से हुआ था, राजा नहुष के समीप आए। वे द्विजश्रेष्ठ बोले— 'राजन्! ये मुनि कैसे सन्तुष्ट होंगे - इस बातको मैं जानता हूँ। मैं इन्हें शीघ्र सन्तुष्ट कर दूँगा। मैंने कभी हँसी-परिहास में भी झूठ नहीं कहा है; फिर ऐसे समय में असत्य कैसे बोल सकता हूँ? मैं आपसे जो कहूँ, वह आपको निःशङ्क होकर करना चाहिये।' नहुष ने उनसे प्रार्थना की— 'भगवन्! आप मुझे भृगुपुत्र महर्षि च्यवनका मूल्य बता दीजिये और मेरा, मेरे कुलका तथा समस्त राज्यका सङ्कटसे उद्धार कीजिये। ये भगवान् च्यवन मुनि यदि कुपित हो जायँ तो तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं; फिर मुझ-जैसे तपोबलशून्य केवल बाहुबलका भरोसा रखनेवाले नरेशको नष्ट करना इनके लिये कौन बड़ी बात है?'

नहुष उवाच

ब्रवीतु भगवान् मूल्यं महर्षेः सदृशं भृगोः ।
परित्रायस्व मामस्मद्विषयं च कुलं च मे ॥

नहुषने कहा — भगवन्! आप मुझे भृगुपुत्र महर्षि च्यवनका मूल्य, जो इनके योग्य हो बता दीजिये और ऐसा करके मेरा, मेरे कुलका तथा समस्त राज्यका संकटसे उद्धार कीजिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 51 · श्लोक 18पृष्ठ 515

नहुष ने आगे कहा— 'महर्षे! मैं अपने मन्त्री और पुरोहितके साथ सङ्कटके अगाध महासागरमें डूब रहा हूँ। आप नौका बनकर मुझे पार लगाइये। इनके योग्य मूल्यका निर्णय कर दीजिये।' नहुष की बात सुनकर गाय के पेट से उत्पन्न हुए वे प्रतापी महर्षि, राजा तथा उनके समस्त मन्त्रियोंको आनन्दित करते हुए बोले— 'महाराज! ब्राह्मणों और गौओंका कुल एक है, पर ये दो रूपों में विभक्त हो गये हैं। एक जगह मन्त्र स्थित होते हैं और दूसरी जगह हविष्य। पुरुषसिंह! ब्राह्मण सब वर्णों में उत्तम हैं। उनका और गौओं का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता; इसलिये आप इनकी कीमत में एक गौ प्रदान कीजिये।'

महर्षि के ये वचन सुनकर राजा नहुष को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कठोर व्रत करने वाले महर्षि च्यवन के पास गए और बोले— 'धर्मात्माओं में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! भृगुनन्दन! मैंने एक गौ देकर आपको खरीद लिया; अतः उठिये, उठिये, मैं यही आपका उचित मूल्य मानता हूँ।' च्यवन मुनि ने उत्तर दिया— 'निष्पाप राजेन्द्र! अब मैं उठता हूँ। आपने उचित मूल्य देकर मुझे खरीदा है। अपनी मर्यादा से कभी च्युत न होनेवाले नरेश! मैं इस संसार में गौओं के समान दूसरा कोई धन नहीं देखता। वीर भूपाल! गौओं के नाम और गुणोंका कीर्तन तथा श्रवण करना, उनका दान देना और दर्शन करना— इनकी शास्त्रों में बड़ी प्रशंसा की गयी है। ये सब कार्य सम्पूर्ण पापों को दूर करके परम कल्याण की प्राप्ति करानेवाले हैं। गौएँ सदा लक्ष्मी की जड़ हैं। उनमें पाप का लेशमात्र भी नहीं है। वे ही मनुष्यों को अन्न और देवताओं को हविष्य देने वाली हैं। स्वाहा और वषट्कार सदा गौओं में ही प्रतिष्ठित होते हैं। वे यज्ञ का सञ्चालन करनेवाली तथा उसका मुख हैं। वे दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है। इस पृथ्वी पर गौएँ अपनी कान्ति से अग्निके समान हैं, जो समस्त प्राणियों को सुख देती हैं। जहाँ गौओं का समुदाय होता है, वहाँ की शोभा बढ़ जाती है और वहाँ के सारे पाप खींच लिए जाते हैं। गौएँ स्वर्ग की सीढ़ी हैं और समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली देवियाँ हैं। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने केवल उनके गुणोंका दिग्दर्शन कराया है; उनका सम्पूर्ण वर्णन कोई नहीं कर सकता।'

यह सुनकर मल्लाह बोले— 'मुने! हमने आपका दर्शन किया और बातचीत भी की, अतः आप हमलोगों पर कृपा कीजिये। जैसे अग्निदेव हविष्य को आत्मसात् करते हैं, वैसे ही आप हमारे दोषों को दग्ध करने वाले अग्निरूप हैं। हम आपके चरणों में मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं; हमारी दी हुई यह गौ स्वीकार कीजिये।' च्यवन मुनि ने कहा— 'मल्लाहो! मैं तुम्हारी दी हुई गौ स्वीकार करता हूँ। इस गोदान के प्रभावसे तुम्हारे सारे पाप दूर हो गये। अब तुम लोग जल में पैदा हुई इन मछलियों के साथ ही शीघ्र स्वर्ग को जाओ।'

महर्षि के वचनों के प्रभाव से वे मल्लाह उन मछलियों के साथ ही स्वर्गलोक चले गये। उन्हें और मछलियों को स्वर्ग की ओर जाते देख राजा नहुष को बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् च्यवन और गोजात मुनि ने राजा से वर माँगने को कहा। प्रसन्न होकर नहुष बोले— 'बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है।' परन्तु ऋषियों के आग्रह पर उन्होंने धर्म में स्थित रहने का वरदान माँगा। उनके 'तथास्तु' कहने पर राजा ने दोनों ऋषियों का पूजन किया। उसी दिन च्यवन मुनि की दीक्षा समाप्त हुई और वे अपने आश्रम चले गये, और गोजात मुनि भी अपने आश्रम पधारे। नहुष वर पाकर अपनी राजधानी लौट आए।

तात युधिष्ठिर! मैंने यह सारा प्रसङ्ग सुनाया है। इससे स्पष्ट होता है कि दर्शन और सहवास से कैसा स्नेह होता है, गौओं का माहात्म्य क्या है और धर्म का निश्चय क्या है। अब तुम बताओ, तुम्हारे मन में क्या सुनने की इच्छा है?'

In English

The Story of Chyavana and Nahusha

While living underwater for twelve years, the sage Chyavana is caught in a net by fishermen. To settle the debt for his rescue, King Nahusha learns from another sage that the only proper price for a great sage is the gift of a cow. The fishermen give a cow to Chyavana, and the sage blesses them so they may go to heaven.

This page answers

  • Why was chyavana living underwater?
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Also written: Chyavanopakhyana, Chyavana, Bhishma, Purohita, च्यवनोपाख्यान