श्रीगणेशाय नमः।

इन्द्रमतङ्गसंवाद : क्या जन्म की योनि से ब्राह्मणत्व मिटाया जा सकता है?

पुरुषार्थ और जन्म का द्वन्द्व

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 27–29 · पृष्ठ 372–385

1,279 शब्द · 7 मिनटका पाठ · 11 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

ब्राह्मणत्व की दुर्लभता समझाने हेतु

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा— तात! क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र यदि ब्राह्मणत्व प्राप्त करना चाहें, तो यह अत्यन्त कठिन है। यह समस्त प्राणियों के लिए सर्वोत्तम स्थान है। बहुत सी योनियों में बारम्बार जन्म लेते-लेते कभी किसी समय जीव ब्राह्मण की योनि में जन्म लेता है। युधिष्ठिर! इस विषय को समझने के लिए तुम मतङ्ग और गर्दभी के संवाद वाले इस प्राचीन इतिहास को सुनो।

युधिष्ठिर उवाच

प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च यथा भवान् ।
गुणैश्च विविधैः सर्वैर्वयसा च समन्वितः ॥

भवान् विशिष्टो बुद्ध्या च प्रज्ञया तपसा तथा ।
तस्माद् भवन्तं पृच्छामि धर्मं धर्मभृतां वर ।
नान्यस्त्वदन्यो लोकेषु प्रष्टव्योऽस्ति नराधिप ॥

युधिष्ठिरने पूछा - धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! आप बुद्धि, विद्या, सदाचार, शील और विभिन्न प्रकारके सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं। आपकी अवस्था भी सबसे बड़ी है । आप बुद्धि, प्रज्ञा और तपस्यासे विशिष्ट हैं; अतः मैं आपसे धर्मकी बात पूछता हूँ । संसारमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जिससे सब प्रकारके प्रश्न पूछे जा सकें ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 1-2पृष्ठ 373

पूर्वकाल में एक ब्राह्मण के मतङ्ग नामक पुत्र हुआ। वह समस्त सद्गुणों से सम्पन्न था और अपने संस्कारों के कारण ब्राह्मण के समान ही समझा जाता था। एक दिन, अपने पिता द्वारा भेजे जाने पर, मतङ्ग किसी यजमान का यज्ञ कराने के लिए गधों से जुते हुए एक शीघ्रगामी रथ पर सवार होकर चला। यात्रा के दौरान, उसने रथ का बोझ ढोते हुए एक छोटी अवस्था के गधे को देखा और उस पर बार-बार चाबुक से प्रहार किया। उसके प्रहार इतने तीव्र थे कि गधे की नाक में घाव हो गया।

स बालं गर्दभं राजन् वहन्तं मातुरन्तिके ।
निरविध्यत् प्रतोदेन नासिकायां पुनः पुनः ॥

राजन्! रथका बोझ ढोते हुए एक छोटी अवस्थाके गधेको उसकी माताके निकट ही मतंगने बारंबार चाबुकसे मारकर उसकी नाकमें घाव कर दिया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 10पृष्ठ 374

पुत्र का भला चाहने वाली वह गर्दभी अपने बच्चे की नाक में वह दुस्सह घाव देखकर व्याकुल हो उठी। उसने मतङ्ग को समझाते हुए कहा— 'बेटा! शोक न करो। तुम्हारे ऊपर कोई ब्राह्मण नहीं, बल्कि चाण्डाल सवार है। ब्राह्मण में इतनी क्रूरता नहीं होती; वह तो समस्त प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव रखता है और सबको उपदेश देने वाला आचार्य होता है। यह जो तुम कर रहे हो, यह स्वभाव से ही पापात्मा का लक्षण है। तू दूसरे के बच्चे पर दया नहीं करता; अपने इस कुकृत्य द्वारा तू अपनी चाण्डाल योनिका ही सम्मान बढ़ा रहा है।'

ब्राह्मणे दारुणं नास्ति मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।
आचार्यः सर्वभूतानां शास्ता किं प्रहरिष्यति ॥

' ब्राह्मणमें इतनी क्रूरता नहीं होती । ब्राह्मण सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला बताया जाता है । जो समस्त प्राणियोंको उपदेश देनेवाला आचार्य है, वह कैसे किसीपर प्रहार करेगा?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 12पृष्ठ 374

गर्दभी के इन दारुण वचनों ने मतङ्ग को झकझोर दिया। वह तुरन्त रथ से उतर पड़ा और गर्दभी से पूछा— ‘कल्याणमयी गर्दभी! बता, मेरी माता किससे कलङ्कित हुई है? तू मुझे चाण्डाल कैसे समझती है? शीघ्र मुझसे सारी बात बता। तुझे कैसे मालूम हुआ कि मैं चाण्डाल हूँ? किस कर्म से मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ है? तू बड़ी समझदार है; अतः ये सारी बातें मुझे ठीक-ठीक बता।'

गर्दभी ने उत्तर दिया— 'मतङ्ग! तू यौवन के मद से मतवाली हुई एक ब्राह्मणी के पेट से, एक शूद्र जाति के नाई द्वारा पैदा किया गया है; इसीलिए तू चाण्डाल है। तेरी माता के इसी व्यभिचार कर्म से तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है।'

ब्रूहि रासभि कल्याणि माता मे येन दूषिता ।
कथं मां वेत्सि चण्डालं क्षिप्रं रासभि शंस मे ॥

‘ कल्याणमयी गर्दभी! बता, मेरी माता किससे कलंकित हुई है? तू मुझे चाण्डाल कैसे समझती है? शीघ्र मुझसे सारी बात बता ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 15पृष्ठ 375

गर्दभी की बात सुनकर मतङ्ग भारी मन से घर लौट आया। जब उसके पिता ने उसे वापस आते देखा, तो उन्होंने पूछा— 'बेटा! मैं तुम्हें यज्ञ के कार्य पर भेज रहा था, तुम लौट कैसे आए? क्या तुम कुशल हो?'

मतङ्ग ने अत्यन्त दुखी होकर कहा— 'पिताजी! जो चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुआ है, अथवा उससे भी नीच योनि में पैदा हुआ है, वह कैसे सकुशल रह सकता है? जिसे ऐसी माता मिली हो, उसे कहाँ से कुशलता प्राप्त होगी? यह मानवेतर योनि की गदही मुझे बता रही है कि मैं ब्राह्मण के गर्भ से नहीं जन्मा हूँ। अब मैं महान तप में लग जाऊँगा।'

मतंग उवाच

ब्राह्मण्यां वृषलाज्जातं पितर्वेदयतीव माम् ।
अमानुषी गर्दभीयं तस्मात् तप्स्ये तपो महत् ॥

पिताजी! यह मानवेतर योनिमें उत्पन्न हुई गदही मुझे ब्राह्मणीके गर्भसे द्वारा पैदा हुआ बता रही है; इसलिये अब मैं महान् तपमें लग जाऊँगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 21पृष्ठ 375

मतङ्ग ने घर छोड़ दिया और एक महान वन में जाकर अत्यन्त कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दी। उसकी तपस्या इतनी घोर थी कि उसने देवताओं को भी सन्तप्त कर दिया। उसे तपस्या में लीन देखकर इन्द्र प्रकट हुए और बोले— 'मतङ्ग! तुम मानवीय भोगों का त्याग करके यह तप क्यों कर रहे हो? मैं तुम्हें वर देता हूँ। तुम्हारे हृदय में जो कुछ पाने की अभिलाषा है, वह शीघ्र बताओ।'

वरं ददामि ते हन्त वृणीष्व त्वं यदिच्छसि ।
यच्चाप्यवाप्यं हृदि ते सर्वं तद् ब्रूहि माचिरम् ॥

मैं तुम्हें वर देता हूँ । तुम जो चाहते हो उसे प्रसन्नतापूर्वक माँग लो । तुम्हारे हृदयमें जो कुछ पानेकी अभिलाषा हो, वह सब शीघ्र बताओ '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 25पृष्ठ 376

मतङ्ग ने दृढ़ता से कहा— 'मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की इच्छा से यह तप शुरू किया है। उसे पाकर ही मैं यहाँ से जाऊँगा; मुझे यही वर चाहिए।'

इन्द्र ने गम्भीर स्वर में कहा— 'मतङ्ग! तुम जो ब्राह्मणत्व माँग रहे हो, वह तुम्हारे लिए दुर्लभ है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, उनके लिए यह प्राप्ति असम्भव है। दुर्बुद्धे! तुम ब्राह्मणत्व माँगते-माँगते मर जाओगे, पर वह तुम्हें नहीं मिलेगा। इस दुराग्रह से शीघ्र निवृत्त हो जाओ। देवताओं, असुरों और मनुष्यों में जो परम पवित्र माना गया है, उस ब्राह्मणत्व को चाण्डालयोनि में उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता।'

देवतासुरमर्त्येषु यत् पवित्रं परं स्मृतम् ।
चण्डालयोनौ जातेन न तत् प्राप्यं कथंचन ॥

‘ देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें भी जो परम पवित्र माना गया है उस ब्राह्मणत्वको चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 27 · श्लोक 30पृष्ठ 377

इन्द्र के इन वचनों के बाद भी मतङ्ग का मन विचलित नहीं हुआ। उसका धैर्य च्युत नहीं हुआ और वह सौ वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करता रहा। इन्द्र पुनः आए और बोले— 'तात! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। तुम इस उत्तम स्थान को माँगते-माँगते मर जाओगे। दुःसाहस न करो, यह तुम्हारे लिए धर्म का मार्ग नहीं है। तुम इस जीवन में ब्राह्मणत्व नहीं पा सकते; इस अप्राप्य वस्तु के लिए प्रार्थना करते-करते तुम शीघ्र ही काल के गाल में चले जाओगे।'

भीष्म कहते हैं— हे युधिष्ठिर! इन्द्र के ऐसे कहने पर मतङ्ग ने अपने मन को और भी दृढ़ और संयमशील बनाया। उसने एक हजार वर्षों तक केवल एक पैर पर खड़े होकर घोर तपस्या की। जब उस कठिन तपस्या के एक हजार वर्ष पूरे होने में कुछ ही समय शेष था, तब बल और वृत्रासुर के शत्रु देवराज इन्द्र पुनः मतङ्ग को देखने आए। उन्होंने मतङ्ग से वही बात दोहराई जो पहले कही थी।

मतङ्ग ने धैर्यपूर्वक कहा— "देवराज! मैंने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, एकाग्र चित्त होकर एक हजार वर्षों तक केवल एक पैर पर खड़े रहकर तप किया है। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता?"

मतङ्ग उवाच

इदं वर्षसहस्रं वै ब्रह्मचारी समाहितः ।
अतिष्ठमेकपादेन ब्राह्मण्यं नाप्नुयां कथम् ॥

मतंगने कहा— देवराज! मैंने ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तप किया है। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 3पृष्ठ 381

इन्द्र ने उसे समझाते हुए कहा— "मतङ्ग! चाण्डाल की योनि में जन्म लेने वाले को किसी भी प्रकार ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं हो सकता; इसलिए तुम कोई दूसरी अभीष्ट वस्तु माँग लो, ताकि तुम्हारा यह कठिन परिश्रम व्यर्थ न जाए।"

इन्द्र के इन वचनों को सुनकर मतङ्ग अत्यन्त शोक में डूब गया। उसने हार नहीं मानी और अपने सङ्कल्प को और भी कठोर कर दिया। वह अङ्गूठे के बल पर सौ वर्षों तक खड़ा रहा। उसने ऐसा दुर्धर योग अनुष्ठान किया कि उसका सारा शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। उसकी नस-नाड़ियाँ उबड़-उबड़ बाहर आ गईं और उसका शरीर केवल हड्डियों का एक ढाँचा मात्र रह गया, जो चमड़े से ढका हुआ था। उस अवस्था में वह स्वयं को सँभाल न सका और भूमि पर गिर पड़ा।

इन्द्र ने पुनः कहा— "मतङ्ग! इस जन्म में तुम्हारे लिए ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असम्भव दिखती है। यह अत्यन्त दुर्लभ है और काम-क्रोध जैसे लुटेरों से घिरा हुआ है। जो ब्राह्मण का आदर करता है वह सुख पाता है, और जो अनादर करता है वह दुःख पाता है। ब्राह्मण समस्त प्राणियों को योगक्षेम देने वाला है; ब्राह्मणों के तृप्त होने से ही देवता और पितर भी तृप्त होते हैं। तुम कोई दूसरा वर माँगो, क्योंकि जिनका मन वश में नहीं है, उनके लिए यह वर दुष्प्राप्य है।"

शक्र उवाच

मतङ्ग ब्राह्मणत्वं ते विरुद्धमिह दृश्यते ।
ब्राह्मण्यं दुर्लभतरं संवृतं परिपन्थिभिः ॥

इन्द्रने कहा — मतंग! इस जन्ममें तुम्हारे लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति असम्भव दिखायी देती है । ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है; साथ ही वह काम-क्रोध आदि लुटेरोंसे घिरा हुआ है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 8पृष्ठ 382

मतङ्ग ने व्याकुल होकर कहा— "देवराज! मैं तो केवल दुःख से आहत हो रहा हूँ, फिर आप मुझे पीड़ा क्यों दे रहे हैं? मुझ मरे हुए को आप क्यों मारते हैं? मैं तो आपके लिए शोक करता हूँ, क्योंकि आप जन्म से ही ब्राह्मणत्व पाकर भी उसे अपना नहीं रहे हैं। हे शक्र! यदि क्षत्रिय आदि तीन वर्णों के लिए भी ब्राह्मणत्व दुर्लभ है, तो जो लोग इसे पाकर भी ब्राह्मणोचित शम और दम का अनुष्ठान नहीं करते, वे पापियों से भी बढ़कर अत्यन्त पापी हैं। मैं एकान्त में आनन्दपूर्वक रहता हूँ, द्वन्द्वों और परिग्रहों से दूर हूँ; मैं अहिंसा और दम का पालन करता हूँ। फिर मैं ब्राह्मणत्व पाने योग्य क्यों नहीं हूँ? हे पुरन्दर! मैं धर्मज्ञ होकर भी केवल अपनी माता के दोष के कारण इस अवस्था में पहुँचा हूँ। निश्चय ही पुरुषार्थ द्वारा दैव का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, क्योंकि मैं जिस ब्राह्मणत्व के लिए प्रयत्न कर रहा हूँ, उसे प्राप्त नहीं कर पा रहा हूँ। देवराज! यदि मेरा कुछ पुण्य शेष है, तो मुझ पर कृपा करके मुझे वर प्रदान कीजिए।"

एवंगते तु धर्मज्ञ दातुमर्हसि मे वरम् ॥

यदि तेऽहमनुग्राह्यः किंचिद् वा सुकृतं मम । धर्मज्ञ देवराज! यदि ऐसी अवस्थामें मैं आपका कृपापात्र हूँ अथवा यदि मेरा कुछ भी पुण्य शेष हो तो आप मुझे वर प्रदान कीजिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 20पृष्ठ 384

मतङ्ग के आग्रह पर इन्द्र ने कहा— "वत्स! तुम्हारी कीर्ति तीनों लोकों में अतुलनीय होगी। तुम स्त्रियों के पूजनीय होओगे और 'छन्दोदेव' नाम से तुम्हारी अनुपम ख्याति होगी।"

शक्र उवाच

छन्दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि ॥

कीर्तिश्च तेऽतुला वत्स त्रिषु लोकेषु यास्यति । इन्द्रने कहा — वत्स! तुम स्त्रियोंके पूजनीय होओगे । 'छन्दोदेव ' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकोंमें तुम्हारी अनुपम कीर्तिका विस्तार होगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 24पृष्ठ 384

इन्द्र ने यह वर दिया और वहीं अन्तर्धान हो गए। वर प्राप्ति के पश्चात मतङ्ग ने अपने प्राण त्याग दिए और उत्तम स्थान (ब्रह्मलोक) को प्राप्त हुआ।

In English

The Story of Matanga and the Quest for Brahminhood

A man named Matanga learns from a female donkey that he was born of a low caste due to his mother's past actions. Distraught, Matanga performs extreme asceticism for a thousand years to earn the status of a Brahmin. Indra eventually grants him fame and a place in the higher realms before Matanga dies.

This page answers

  • Why did the female donkey call matanga a chandala?
  • How long did matanga perform penance to become a brahmin?
  • What blessing did indra give to matanga?
  • Why did indra say matanga could not achieve brahminhood?

Also written: Indramatangasanvada, Yudhishthira, Bhishma, Matanga, Gardabhi, Indra, इन्द्रमतङ्गसंवाद