इन्द्रमतङ्गसंवाद : क्या कठिन तपस्या से किसी भी वर्ण का व्यक्ति ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है?
कर्म और संस्कार की प्रधानता
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 27–29 · पृष्ठ 372–385
वैशम्पायन ने युधिष्ठिर से कहा
भीष्म द्वारा सुनाया गया इतिहास
{ "katha": "वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! भीष्म द्वारा कहे गए श्रीगङ्गाजी की स्तुति से युक्त इस इतिहास को सुनकर भाइयों सहित राजा युधिष्ठिर को बड़ी प्रसन्नता हुई। युधिष्ठिर ने कहा— आपकी अवस्था सबसे बड़ी है; आप बुद्धि, प्रज्ञा और तपस्या से विशिष्ट हैं, अतः मैं आपसे धर्म की बात पूछता हूँ। नृपश्रेष्ठ! यदि क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त करना चाहे, तो वह किस उपाय से उसे पा सकता है? पितामह! क्या कोई तपस्या, महान् कर्म अथवा वेदों के स्वाध्याय द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है?\n\nभीष्म ने कहा— तात युधिष्ठिर! क्षत्रिय आदि तीन वर्णों के लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि यह समस्त प्राणियों के लिये सर्वोत्तम स्थान है। इस विषय में जानकार मनुष्य मतङ्ग और गर्दभी के संवादरूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। मतङ्ग जन्म से तो ब्राह्मण था, पर वह समस्त सद्गुणों से सम्पन्न था। एक बार यजमान का यज्ञ कराने के लिये वह गधों से जुते हुए शीघ्रगामी रथ पर बैठकर चला। मार्ग में उसने देखा कि एक छोटा गधा रथ का बोझ ढो रहा है। मतङ्ग ने उस छोटे गधे को बारम्बार चाबुक से मारा और उसकी नाक में घाव कर दिया।\n\nपुत्र का भला चाहने वाली वह गधी, अपने बच्चे की नाक में दुस्सह घाव देखकर व्याकुल हो उठी। उसने मतङ्ग को समझाते हुए कहा— 'बेटा! शोक न करो। तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण नहीं, चाण्डाल सवार है। यह जो समस्त प्राणियों को उपदेश देने वाला आचार्य है, वह कैसे किसी पर प्रहार कर सकता है? यह स्वभाव से ही पापात्मा है; इसलिये दूसरे के बच्चे पर दया नहीं करता। अपने इस कुकृत्य द्वारा यह अपनी चाण्डाल योनिका का ही सम्मान बढ़ा रहा है।'\n\nगधी के इन दारुण वचनों को सुनकर मतङ्ग तुरन्त रथ से उतर पड़ा और व्याकुल होकर पूछा— 'कल्याणमयी गर्दभी! बता, मेरी माता किससे कलङ्कित हुई है? तू मुझे चाण्डाल कैसे कह रही है? किस कर्म से मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ है?' गधी ने उत्तर दिया— 'तू नाई द्वारा पैदा किया गया है, इसलिये तू चाण्डाल है; और तेरी माता के व्यभिचार कर्म से तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है।'\n\nमतङ्ग भारी मन से अपने घर लौट आया। उसे लौटा देख उसके पिता ने पूछा— 'बेटा! मैंने तो तुम्हें यज्ञ कराने के भारी कार्य पर लगा रखा था, फिर तुम लौट कैसे आये? तुम कुशल तो हो न?' मतङ्ग ने अत्यन्त दुखी होकर कहा— 'पिताजी! जो चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुआ है, वह कैसे सकुशल रह सकता है? जिसे ऐसी माता मिली हो, उसे कहाँ से पिताजी! यह मानवेतर योनि में उत्पन्न हुई गदही मुझे ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुआ बता रही है। अब मैं महान् तप में लग जाऊँगा।'\n\nतपस्या का दृढ़ निश्चय कर मतङ्ग घर से निकल पड़ा। उसने ऐसी घोर तपस्या की कि देवताओं को भी सन्तप्त कर दिया। वह सुख से ब्राह्मणत्वरूपी अभीष्ट स्थान प्राप्त करना चाहता था। उसकी तपस्या देख इन्द्र प्रकट हुए और बोले— 'मतङ्ग! तुम क्यों मानवीय भोगों का पर त्याग करके तपस्या कर रहे हो? मैं तुम्हें वर देता हूँ, जो चाहते हो प्रसन्नतापूर्वक माँग लो।'\n\मतङ्ग ने कहा— 'मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की इच्छा से यह तपस्या प्रारम्भ की है। उसे पाकर ही यहाँ से जाऊँ, मैं यही वर चाहता हूँ।' इन्द्र ने गम्भीर स्वर में कहा— 'मतङ्ग! तुम जो ब्राह्मणत्व माँग रहे हो, वह तुम्हारे लिये दुर्लभ है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, उनके लिये यह असम्भव है। दुर्बुद्धे! तुम ब्राह्मणत्व माँगते-माँगते मर जाओगे, पर वह नहीं मिलेगा। इस दुराग्रह से शीघ्र निवृत्त हो जा।'\n\nइन्द्र ने आगे कहा— 'सम्पूर्ण भूतों में श्रेष्ठता ही ब्राह्मणत्व है, परन्तु यह तप उस प्रयोजन को सिद्ध नहीं कर सकता। जो चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुआ है, वह देवताओं, असुरों और मनुष्यों में परम पवित्र माने जाने वाले इस पद को किसी तरह नहीं पा सकता।' इन्द्र के इन वचनों के बाद भी मतङ्ग का मन विचलित नहीं हुआ; उसका धैर्य च्युत न हुआ और वह और भी दृढ़ता से उत्तम व्रत का पालन करने लगा।" }
ब्राह्मण्यं तात दुष्प्राप्यं वर्णैः क्षत्रादिभिस्त्रिभिः ।
परं हि सर्वभूतानां स्थानमेतद् युधिष्ठिर ॥
भीष्मजीने कहा - तात युधिष्ठिर! क्षत्रिय आदि तीन वर्णोंके लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि यह समस्त प्राणियोंके लिये सर्वोत्तम स्थान है ।
भीष्मजी कहते हैं— हे युधिष्ठिर! इन्द्र के ऐसे कहने पर मतङ्ग ने अपने मन को और भी दृढ़ और संयमशील बनाया। वह एक पैर से ध्यान लगाए हुए, बिना विचलित हुए एक हजार वर्षों तक खड़ा रहा। जब उस तपस्या के एक हजार वर्ष पूर्ण होने में कुछ ही समय शेष था, तब बल और वृत्रासुर के शत्रु देवराज इन्द्र पुनः मतङ्ग को देखने के लिए आए।
ब्राह्मण्यं कामयानोऽहमिदमारब्धवांस्तपः ।
गच्छेयं तदवाप्येह वर एष वृतो मया ॥
मतंगने कहा — मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे यह तपस्या प्रारम्भ की है । उसे पा करके ही यहाँसे जाऊँ, मैं यही वर चाहता हूँ ।
इन्द्र ने उसे देखकर वही बातें दोहराईं जो पहले कही थीं। इस पर मतङ्ग ने करुण स्वर में कहा— "देवराज! मैंने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, एकाग्र चित्त से एक हजार वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तप किया है; फिर भी मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता?"
देवतासुरमर्त्येषु यत् पवित्रं परं स्मृतम् ।
चण्डालयोनौ जातेन न तत् प्राप्यं कथंचन ॥
‘ देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें भी जो परम पवित्र माना गया है उस ब्राह्मणत्वको चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता'
इन्द्र ने उसे वास्तविकता बताते हुए कहा— "मतङ्ग! चाण्डाल की योनि में जन्म लेने वाले को किसी तरह ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं हो सकता। इस जन्म में तुम्हारे लिए ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असम्भव दिखती है, क्योंकि यह अत्यन्त दुर्लभ है। जो ब्राह्मण काम और क्रोध जैसे लुटेरों से घिरा रहता है, वह दुःख पाता है; किन्तु जो उनका आदर करता है, वही सुख पाता है। ब्राह्मणों के तृप्त होने से ही देवता और पितर भी तृप्त होते हैं। जीव इस जगत में अनेक योनियों में भ्रमण करता है। कोई कभी ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है, तो कोई जन्म लेते-लेते उसी योनि में पड़ा रहता है। अतः जिनका मन अपने वश में नहीं है, वे इस दुष्प्राप्य ब्राह्मणत्व का आग्रह छोड़कर कोई दूसरा ही वर माँगें।"
इन्द्र की बातें सुनकर मतङ्ग अत्यन्त शोकमग्न हो गया। उसने व्याकुल होकर कहा— "देवराज! मैं तो यूँ ही दुःख से आतुर नहीं हो रहा हूँ, फिर आप मुझे पीड़ा क्यों दे रहे हैं? मुझ मरे हुए को क्यों मारते हैं? मैं तो आपके लिए शोक करता हूँ, क्योंकि जन्म से ही ब्राह्मणत्व पाकर भी आप उसे अपना नहीं रहे हैं। हे शत्क्रतु! यदि क्षत्रिय आदि तीन वर्णों के लिए ब्राह्मणत्व दुर्लभ है, तो इस परम दुर्लभ वस्तु को पाकर भी जो मनुष्य ब्राह्मणोचित शम और दम का अनुष्ठान नहीं करते, वे पापियों से भी बढ़कर अत्यन्त पापी और अधम हैं। पहले तो ब्राह्मणत्व प्राप्त करना कठिन है, किन्तु उसे पाकर उसका पालन करना उससे भी अधिक कठिन है; बहुत से मनुष्य इस दुर्लभ वस्तु को पाकर भी तदनुकूल आचरण नहीं करते।"
मतङ्ग ने अपनी व्यथा प्रकट करते हुए आगे कहा— "मैं धर्मज्ञ होकर भी केवल अपनी माता के दोष के कारण इस अवस्था में आ पहुँचा हूँ। हे प्रभो! निश्चय ही पुरुषार्थ द्वारा दैव का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता; क्योंकि मैं जिसके लिए इतना प्रयत्नशील हूँ, उस ब्राह्मणत्व को उपलब्ध नहीं कर पा रहा हूँ। देवराज, यदि ऐसी अवस्था में मैं आपका कृपापात्र हूँ या मेरा कुछ पुण्य शेष है, तो आप मुझे वर प्रदान कीजिए।"
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय के समय में, तब बल और वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र ने मतङ्ग से कहा— "तुम मुझसे वर माँगो।" महेन्द्र से प्रेरित होकर मतङ्ग ने मस्तक रखकर कहा— "मैं आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ, आप मुझे क्या वर देते हैं?"
एवंगते तु धर्मज्ञ दातुमर्हसि मे वरम् ॥
यदि तेऽहमनुग्राह्यः किंचिद् वा सुकृतं मम । धर्मज्ञ देवराज! यदि ऐसी अवस्थामें मैं आपका कृपापात्र हूँ अथवा यदि मेरा कुछ भी पुण्य शेष हो तो आप मुझे वर प्रदान कीजिये ।
इन्द्र ने उसे वर देते हुए कहा— "वत्स! तुम स्त्रियों के पूजनीय होगे। 'छन्दोदेव' के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकों में तुम्हारी अनुपम कीर्तिका विस्तार करेगी।" ऐसा वर देकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गए। मतङ्ग ने भी अपने प्राणों का त्याग किया और उत्तम स्थान, ब्रह्मलोक को प्राप्त हुआ।
छन्दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि ॥
कीर्तिश्च तेऽतुला वत्स त्रिषु लोकेषु यास्यति । इन्द्रने कहा — वत्स! तुम स्त्रियोंके पूजनीय होओगे । 'छन्दोदेव ' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकोंमें तुम्हारी अनुपम कीर्तिका विस्तार होगा ।
In English
The Story of Matanga
Matanga performs intense penance for a thousand years to attain the status of a Brahmin after being told by a female donkey that his birth was impure. Indra tells him that his desired status is impossible to achieve due to his birth, but eventually grants him a boon that he will be famous as Chandodeva. Matanga dies and attains Brahmaloka.
This page answers
- Why did the donkey call matanga a chandala?
- Can a person change their varna through penance according to indra?
- What boon did indra give to matanga?
- How did matanga become famous in the three worlds?
Also written: Indramatangasanvada, Yudhishthira, Bhishma, Matanga, Gadahi, Indra, इन्द्रमतङ्गसंवाद